#11 क्षमा
परिचय: क्षमा
रवांडा के एक सहायक प्राध्यापक ने बाइबल कॉलेज के मेरे दूसरे वर्ष के दौरान अतिथि के रूप में एक सन्देश दिया। जब वे उस दिन अपने विषय क्षमा पर बोल रहे थे, तो उनके नम्र व्यवहार और प्रबल अधिकार ने हमारा ध्यान उनकी ओर आकर्षित कर दिया।
उन्होंने अपने सन्देश का आरम्भ हमें एक ऐसे बड़े भोज के विषय में बताकर किया, जिसमें उन्होंने पहले कभी भाग नहीं लिया था। ताज़ा पके हुए व्यंजनों की सुगन्ध ऐसी हँसी के साथ घुल-मिल गई थी, जिसकी आशा नहीं की गई थी। परन्तु वहाँ आँसू भी थे, साक्षियाँ थीं, और आनन्द के साथ सरल गीत भी थे। परन्तु उस भोज को वास्तव में असाधारण बनाने वाली बात यह थी कि वहाँ कौन उपस्थित थे और वे क्यों एकत्र हुए थे।
कई वर्ष पहले, रवांडा में हुतु और तुत्सी जनजातियों के बीच युद्ध अपने चरम सीमा पर पहुँच गया था। और उन दिनों युद्ध की भयावह घटनाएँ सामान्य बात थीं। हमारे प्राध्यापक के चेहरे पर हुतु के हथियारों के चिन्ह थे, जो उनके गालों पर ठट्ठे की सलवटें बना रहे थे, क्योंकि इन हथियारों का उपयोग उनके परिवार के कई सदस्यों की हत्या करने के लिए किया गया था।
अकथनीय बुराइयों का उनका वर्णन प्रतिशोध और घृणा को उचित ठहराता हुआ प्रतीत हो रहा था। फिर भी, जैसे-जैसे वे बोलते गए,, उससे यह स्पष्ट हो गया था कि उनके हृदय में घृणा पर किसी और ही चीज़ ने परदा डाल दिया था। वे क्रोध से नहीं, वरन् क्षमा से भरे हुए थे। हमारे अतिथि ने साक्षी दी कि यह शुभ समाचार है कि परमेश्वर ने यीशु की मृत्यु और पुनरुत्थान के द्वारा पापियों को क्षमा कर दिया है, यह बात उनके गाँव में जंगल की आग की तरह फैल गई, और जैसे-जैसे लोगों को परमेश्वर से क्षमा प्राप्त होती गई, तो उन्होंने भी इस समाचार को एक-दूसरे तक पहुँचाया—जिसमें वह भी सम्मिलित थे।
यह भोज विशेष था क्योंकि मेज के चारों ओर हुतु और तुत्सी दोनों पक्ष के लोग बैठे हुए थे। कुछ के पास उनके ही समान घाव थे, कुछ के अंग कटे हुए थे, और सभी अपने प्रियजनों से वंचित थे। पहले तो वे एक-दूसरे का संहार करने का प्रयास करते थे। परन्तु उस रात उन्होंने हाथ पकड़कर प्रार्थना की और रोटी तोड़कर भोजन किया, और यीशु की अद्भुत क्षमा करने वाली, मेल-मिलाप करने वाली और चंगा करने वाले अनुग्रह के लिए स्तुति करते हुए गीत गाए।
भले ही आपको किसी को नरसंहार जैसे कार्यों के लिए क्षमा करने की आवश्यकता न हो, परन्तु हम में से कोई भी इस बात से नहीं बच सकता कि हमें क्षमा मिले और हम भी क्षमा करें। मित्र मित्रों के विरुद्ध पाप करते हैं — और उन्हें क्षमा की आवश्यकता होती है। माता-पिता बच्चों के विरुद्ध और बच्चे माता-पिता के विरुद्ध पाप करते हैं — और उन्हें भी क्षमा की आवश्यकता होती है। पति-पत्नी एक-दूसरे के विरुद्ध पाप करते हैं, पड़ोसी एक-दूसरे के विरुद्ध पाप करते हैं, अपरिचित लोग एक-दूसरे के विरुद्ध पाप करते हैं — इसलिए हम सब को क्षमा पाने की आवश्यकता है।
फिर भी, हमारी क्षमा पाने की सबसे बड़ी आवश्यकता, हमारे परमेश्वर के विरुद्ध किए गए पाप के कारण है। हम सभी ने उसके विरुद्ध अनोखे एवं व्यक्तिगत तरीकों से पाप किया है इसलिए हम उसके उचित न्याय के पात्र हैं (रोमियों 3:23, 6:23)। परन्तु परमेश्वर ने एक ऐसा मार्ग बनाया कि उसका न्याय भी पूरा हो सके और क्षमा भी प्रदान की जा सके। उसके पुत्र यीशु ने हमारे बीच में डेरा किया, पाप रहित जीवन जिया, और जो न्याय हम पर आना चाहिए था वह न्याय उनसे अपने ऊपर लिया और क्रूस पर मर गया, फिर मृतकों में से जी उठा। उसका यह कार्य यह घोषणा करता है कि परमेश्वर न्यायी है और यीशु पर भरोसा रखने वालों को भी वह धर्मी ठहराता है (रोमियों 3:26)। जिन्हें परमेश्वर ने बहुत अधिक क्षमा किया है, उन्हें दूसरों को क्षमा करने के द्वारा पहचाना जाना चाहिए।
यह क्षेत्रीय मार्गदर्शिका, बाइबल आधारित क्षमा की धारणा का परिचय कराती है। यह आपके सभी प्रश्नों का उत्तर तो नहीं देती है, परन्तु मुझे विश्वास है कि जब आप यीशु को जानने वाले लोगों को दिए गए सुसमाचार के जीवन को, अपने जीवन में उतारने का प्रयास करेंगे, तब यह आपके लिए और आपके साथ आत्मिक यात्रा करने वाले लोगों के लिए सहायक सिद्ध होगी।
ऑडियो मार्गदर्शिका
ऑडियो#11 क्षमा
1 क्या और क्यों?
जेसिका अपनी सहेली कैटलिन के सामने मेज़ पर बैठी थी। उसका हृदय घबरा रहा था क्योंकि उसे पता था कि उसे यह बताना है कि उसने झूठ बोला था। वह इस बात से भयभीत थी कि यदि कैटलिन को सच का पता चल गया तो वह क्या सोचेगी, उसने जानकारी छिपा कर रखी और अपनी सहेली को धोखा दिया, यह सोचकर कि कैटलिन को इस बात से बहुत ठेस पहुँचेगी और वह सम्भवतः (उचित रूप से) क्रोधित भी हो सकती थी। अपनी सहेली की आँखों में देखते हुए जेसिका ने कहा कि, “मुझे तुमसे क्षमा माँगनी है। क्योंकि मैंने तुमसे झूठ बोला था, और मुझे इस बात का बहुत दुःख है।”
यह दुःख की बात है कि इस पतित संसार में इस प्रकार की बातचीत आवश्यक हो जाती है। परन्तु वास्तव में, जेसिका कैटलिन से क्या करने के लिए कह रही है? यदि दोनों ही सहेलियाँ मसीही हैं, तो उनसे क्या उम्मीद करनी चाहिए? कैटलिन को कैसे प्रतिक्रिया व्यक्त करनी चाहिए? क्या क्षमा वैकल्पिक है? या अनिवार्य है? क्या क्षमा करने का अर्थ यह है कि सब कुछ भुला दिया जाएगा और उनकी मित्रता पहले जैसी ही हो जाएगी? क्षमा को समझना थोड़ा कठिन तो है, परन्तु यीशु के अनुयायियों के लिए यह आधारभूत बात है।
क्षमा क्या है?
पुराना और नया नियम, क्षमा के विभिन्न पहलुओं का वर्णन करने के लिए कम से कम छह शब्दों का उपयोग करते हैं। कुछ शब्द केवल परमेश्वर के द्वारा पापियों को क्षमा करने का उल्लेख करते हैं, जबकि अन्य शब्द यह भी दर्शाते हैं कि लोग अपने साथी पापियों को क्षमा करने में क्या करते हैं। इन सभी शब्दों के मूल में ऋण से छुटकारा पाने की धारणा सम्मिलित है।
अपने उद्देश्य को पाने के लिए, हम क्षमा को इस प्रकार परिभाषित करेंगे: क्षमा वह अनुग्रह पूर्ण कार्य है जिसमें पाप से संचित ऋण को समाप्त कर दिया जाता है और उस व्यक्ति के साथ ऐसे सम्बन्ध रखने का चुनाव किया जाता है मानो वह क्षमा किया जा चुका हो।
क्षमा करने का अर्थ यह नहीं है कि हम अपने विरुद्ध किए गये गम्भीर कृत्यों को भूल जाएँ।
क्षमा करना यह नहीं है कि मेल-मिलाप करके और बिगड़े हुए सम्बन्धों को सुधारकर फिर से स्थापित करें।
क्षमा करने का अर्थ यह नहीं है कि किए गए गलत कार्य को सुधारने के लिए भरपाई की आवश्यकता समाप्त हो जाती है।
क्षमा करने का अर्थ यह नहीं है कि आप किसी को उचित कानूनी परिणामों से बचाएँ।
क्षमा करने से सम्बन्धों का ऋण समाप्त हो जाता है, परन्तु यह निःशुल्क नहीं होता है। ऐसा कहा गया है कि, “क्षमा करने से हमें बहुत भारी मूल्य चुकाना पड़ता है क्योंकि इसके माध्यम से हम अपने अपराधी पर अपना ऋण चुकाने का अधिकार छोड़ देते हैं। यह हमसे अपेक्षा करती है कि हम प्रेम और दया को तब भी आगे बढ़ाएँ जब उसके योग्य कोई न हो, अपनी स्थिति का बदला स्वयं लेने से अच्छा है कि परमेश्वर पर भरोसा करें, और जीवन के संघर्षों को, परमेश्वर के स्वभाव को प्रकट करने के अवसर के रूप में उपयोग करें।1
पवित्रशास्त्र में कुछ ही कहानियाँ हैं जो क्षमा के सार को दर्शाती हैं परन्तु मत्ती 18:21–35 में उल्लेखित यीशु का दृष्टान्त “क्षमा न करने वाले सेवक” के विषय में एक श्रेष्ठ दृष्टान्त है। यदि आपने इसे हाल ही में नहीं पढ़ा है, तो कुछ समय निकालकर इसे अवश्य पढ़ें।
यह दृष्टान्त तब बताया गया जब पतरस यीशु के पास आकर पूछने लगा, “हे प्रभु, यदि मेरा भाई मेरे विरुद्ध पाप करे, तो मैं उसे कितनी बार क्षमा करूँ? “क्या सात बार क्षमा करूँ?” पतरस का यह सुझाव उस समय की रब्बियों की परम्परा से आगे बढ़ने का प्रयास था, जिसमें केवल तीन बार क्षमा करने की अपेक्षा की जाती थी। परन्तु यीशु ने पतरस को यह उत्तर देकर चकित कर दिया, “मैं तुझ से यह नहीं कहता कि सात बार तक वरन् सात बार के सत्तर गुने तक।”
अपनी बात को समझाने के लिए, यीशु ने एक राजा की कहानी सुनाई जिसने अपने दासों से लेखा-जोखा लेना चाहा। एक देनदार पर राजा का अत्यधिक ऋण (जो लगभग करोड़ों रुपए के बराबर) था। वह व्यक्ति घुटनों के बल गिर पड़ा और विनती करने लगा, “स्वामी धैर्य रख, मैं तुझे सब कुछ चुका दूँगा।” उस व्यक्ति के असाधारण प्रस्ताव ने राजा का हृदय तरस से भर दिया, और “उसने उसे जाने दिया और उसका ऋण भी क्षमा कर दिया।” परन्तु जब वह दास महल से बाहर निकला, तो उसके संगी दासों में से एक उसको मिला, जो उसके सौ रुपए का ऋणी था; उसने उसे पकड़कर उसका गला दबाकर कहा, ‘मेरा ऋण चुका।’ इस पर उसका संगी दास गिरकर, अनुनय-विनय करने लगा; धैर्य रख मैं सब चुका दूँगा।” फिर भी वह न माना, और उसे तब तक के लिए बन्दीगृह में डाल दिया जब तक कि वह ऋण न चुका दे।”
उसके इस कठोर व्यवहार पर लोग अचम्भित हो गए और यह बात सम्पूर्ण राज्य में फैल गई, और अन्त में राजा तक भी पहुँच गई। राजा ने उस व्यक्ति को बुलवाया, उसे फटकार लगाई, उसकी क्षमा वापस ले ली, और उसे जीवन भर के लिए बन्दीगृह में डाल दिया। यीशु ने इस दृष्टान्त को अपनी इस मुख्य बात के साथ समाप्त किया कि: “इसी प्रकार यदि तुम में से हर एक अपने भाई को मन से क्षमा न करेगा, तो मेरा पिता जो स्वर्ग में है, तुम से भी वैसा ही करेगा।” (मत्ती. 18:35)
यह दृष्टान्त क्षमा के विषय में कम से कम तीन सिद्धान्तों को प्रकट करता है।
क्षमा आवश्यक है, और यीशु चाहता है कि जिन्हें क्षमा मिली है, वे भी दूसरों को क्षमा करें। यदि परमेश्वर ने आपके द्वारा उसके विरुद्ध किए गए पाप के लिए आपका भारी ऋण क्षमा कर दिया है, तो आपको भी उन लोगों को क्षमा करने के लिए तैयार रहना चाहिए जो आपके विरुद्ध पाप करते हैं। क्षमा करने में कठिनाई का अनुभव होना एक स्वाभाविक बात है। क्योंकि पाप हमें बहुत अधिक गहराई से कष्ट पहुँचाता है। परन्तु यदि आप परमेश्वर की आज्ञा के विरुद्ध अपना हृदय कठोर करते हैं और दूसरों को क्षमा करने के लिए तैयार नहीं होते हैं, तो इसका अर्थ यह हो सकता है कि आप अपने प्रति परमेश्वर की दया के विषय में अहंकारी हो रहे हैं, और वास्तव में आपको क्षमा नहीं किया गया है।
क्षमा, क्षमा से ही प्रेरित होती है। हर पाठक यह अपेक्षा करता है कि राजा की दया ऋणी का जीवन बदल देगी। जिस व्यक्ति को क्षमा मिली थी, उसे उस मिली हुई दया से इतना प्रभावित होना चाहिए था कि वह दूसरों पर भी दया करने से स्वयं को न रोक पाता। उस पर की गई उदार एवं प्रेम पूर्वक दया से उसके हृदय में क्षमा करने की इच्छा उमड़नी चाहिए थी।
क्षमा करने की कोई सीमा नहीं होनी चाहिए। जब यीशु पतरस से कहता है कि सात बार तक नहीं वरन् सात बार के सत्तर गुने तक क्षमा करो, तो वह केवल सीमा नहीं बढ़ा रहा था, वरन् वह तो सीमा को ही समाप्त कर रहा था। यीशु के शिष्यों के लिए क्षमा करने की सीमा असीमित होनी चाहिए। इसलिए हमें हमेशा दूसरों को क्षमा करने के लिए इच्छुक, तत्पर और उत्सुक रहना चाहिए।
हमें क्षमा क्यों करना चाहिए?
परमेश्वर की ओर से हमें दी गई क्षमा ही हमें क्षमा करने के लिए पर्याप्त कारण होना चाहिए, पवित्रशास्त्र अन्य प्रेरणाओं के द्वारा भी प्रेरित करता है। इसी क्रम में आगे चार स्पष्ट कारणों का विवरण दिया गया है कि मसीहियों को उन लोगों को क्षमा कर देना चाहिए जो उनके विरुद्ध अपराध करते हैं।
- यीशु क्षमा करने की आज्ञा देता है।
यीशु ने स्पष्ट शब्दों में कहा: “क्षमा करो तो तुम्हें भी क्षमा किया जाएगा” (लूका 6:37)। प्रभु की प्रार्थना में भी इसी आज्ञा को दोहराया गया है, “अतः तुम इस रीति से प्रार्थना किया करो…और जिस प्रकार हमने अपने अपराधियों को क्षमा किया है, वैसे ही तू भी हमारे अपराधों को क्षमा कर। और हमें परीक्षा में न ला, परन्तु बुराई से बचा…इसलिए यदि तुम मनुष्य के अपराध क्षमा करोगे, तो तुम्हारा स्वर्गीय पिता भी तुम्हें क्षमा करेगा।” (मत्ती 6:9-14) जब हम इस रीति से प्रार्थना करते हैं, तो हम परमेश्वर से कहते हैं कि, “मेरे पापों के साथ वैसा ही व्यवहार कर जिस प्रकार से मैं उन लोगों के साथ करता हूँ जिन्होंने मेरे विरुद्ध अपराध किया है।” क्या आप इस प्रकार शुद्ध मन से प्रार्थना कर सकते हैं? क्या आप परमेश्वर के सम्मुख यह कह सकते हैं कि, “जैसे मैं दूसरों को क्षमा करता हूँ, वैसे ही मुझे भी क्षमा कर”? ये साहसिक प्रार्थनाएँ हैं।
क्षमा करने से मना करना, यीशु के विरुद्ध ऐसा पाप करना होता है जो हमारे विश्वास के दावे पर गम्भीर प्रश्न उठाता है। परन्तु जब हम क्षमा करते हैं, तो हम उसके मार्ग पर चलते हैं। जैसा कि एक मित्र ने कहा था, “कि क्षमा करना, विशेषकर जब वह महँगा और चुनौतीपूर्ण हो, तो क्षमा करना यीशु के प्रेम और दया का अनुसरण करने का एक सामर्थी तरीका है।”2 निस्संदेह, विश्वासियों का स्वभाव ही क्षमा करना है। पर हमें विवश होकर क्षमा करने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि “उसकी आज्ञाएँ बोझिल नहीं हैं” (1 यूहन्ना 5:3)। वरन्, जैसे-जैसे हम परमेश्वर के प्रति प्रेम में बढ़ते हैं, जिसने हमें क्षमा किया है, तो हम क्षमा के रूप में प्रेम बढ़ाने के लिए प्रेरित होते हैं। जैसा लिखा है, “जिसे थोड़ी क्षमा मिली है, वह थोड़ा प्रेम करता है; पर जिसे बहुत क्षमा मिली है, वह बहुत प्रेम करता है” (लूका 7:36–50)।
- क्षमा हमारे हृदय को स्वतंत्र करती है।
ऐसा कहा गया है कि, “कड़वाहट विष पीने और दूसरे व्यक्ति की मृत्यु की प्रतीक्षा करने के समान है।” क्षमा न करने वाली आत्मा हमारे हृदय पर घातक प्रभाव डालती है। बेथनी इसे भली-भाँति समझती थी। उसने अपने पोते को एक दुखद गोलीबारी में खो दिया था, और एक वर्ष पश्चात् उसके बेटे की भी मृत्यु आकस्मिक नशे की अधिक मात्रा के कारण हो गई थी। वह नशे से स्वतंत्र हो गया था, परन्तु एक परीक्षा की घड़ी में उसने नशीली गोलियाँ खा लीं, जिसके कारण उसकी मृत्यु हो गई थी। बेथनी प्रभु से प्रेम करती थी, परन्तु उसका दुखी हृदय उस व्यक्ति पर क्रोधित था जिसने उसके बेटे को नशीली दवाएँ दी थीं।
लगभग एक वर्ष के पश्चात्, बेथनी को उस व्यक्ति का फोन आया जिसने उसके बेटे को नशीली गोलियाँ दी थीं। उस व्यक्ति ने यह कहते हुए उससे क्षमा की भीख माँगी, कि उसके बेटे की मृत्यु में उसकी भूमिका का बोझ उसे भीतर ही भीतर खाए जा रहा है। बेथनी ने उससे कहा कि, “यीशु ने मुझे बहुत अधिक क्षमा किया है, इसलिए मैं भी तुम्हें क्षमा करना चाहती हूँ।” तत्पश्चात बेथनी ने मुझ से कहा कि, “तुम्हें क्षमा करके ऐसा अनुभव हुआ जैसे मेरे ऊपर से कोई भारी बोझ उतर गया हो। मुझे पता ही नहीं था कि मेरी घृणा मुझे कितने निम्न स्तर तक खींच रही थी।” इस प्रकार क्षमा ने उसे स्वतंत्र कर दिया।
पर हमें केवल इसलिए क्षमा नहीं करना चाहिए कि हमें अच्छा अनुभव हो। हम परमेश्वर के साथ अपनी यात्रा को केवल चिकित्सीय व्यावहारिकता तक सीमित नहीं कर सकते है। परन्तु क्षमा करना परमेश्वर की आज्ञा का पालन करने वाला विश्वास का कार्य है, और यह भरोसा रखना होता है कि यह फलवन्त होगा। क्षमा करने से स्वतंत्रता और वह आनन्द मिलता है जिसकी प्रतिज्ञा यीशु ने उन लोगों से की है जो उसकी आज्ञा मानते हैं: “मैंने ये बातें तुम से इसलिए कही हैं, कि मेरा आनन्द तुम में बना रहे, और तुम्हारा आनन्द पूरा हो जाए।” (यूहन्ना 15:11) क्षमा करने से परमेश्वर की महिमा होती है और रहस्यमय तरीके से हमारी आत्मा को चंगाई मिलती है। हमें आक्रोश, प्रतिशोध या कड़वाहट को मन में रखने के लिए नहीं बनाया गया है। क्षमा करने से सभी गलतियाँ ठीक नहीं होती हैं, परन्तु यह हमारे विरुद्ध की गई बुराइयों को परमेश्वर को सौंपने का एक तरीका है, यह जानते हुए कि वह उन्हें उन तरीकों से दूर करेगा जो केवल वही कर सकता है। जब हम क्षमा करते हैं, तो हम परमेश्वर पर भरोसा करते हैं, जिसने कहा है कि, “बदला लेना मेरा काम है, प्रभु कहता है मैं ही बदला दूँगा।” (रोमियों 12:19)
- क्षमा शैतान की युक्तियों को विफल कर देती है।
ऐसा प्रतीत होता है कि कुरिन्थुस की कलीसिया में कोई व्यक्ति झूठे शिक्षकों से प्रभावित होकर प्रेरित पौलुस के विरुद्ध विद्रोह कर बैठा। तब मण्डली ने उस पर कलीसिया का अनुशासन लागू करके प्रतिक्रिया व्यक्त की। हमें सम्पूर्ण जानकारी के विषय में तो पता नहीं है, परन्तु मण्डली के “बहुमत के द्वारा दण्ड” उसे दिया गया था (2 कुरिन्थियों 2:6)।
अन्त में उस व्यक्ति ने अपने पाप का पश्चाताप किया और कलीसिया से क्षमा माँगी। परन्तु कुछ लोग उसके साथ मेल-मिलाप करने से हिचकिचा रहे थे। इसलिए पौलुस ने उन्हें प्रोत्साहित किया, “कि उसको अपने प्रेम का प्रमाण दो।क्योंकि मैंने इसलिए भी लिखा था, कि तुम्हें परख लूँ, कि तुम सब बातों के मानने के लिये तैयार हो, कि नहीं।जिसका तुम कुछ क्षमा करते हो उसे मैं भी क्षमा करता हूँ, क्योंकि मैंने भी जो कुछ क्षमा किया है, यदि किया हो, तो तुम्हारे कारण मसीह की जगह में होकर क्षमा किया है।कि शैतान का हम पर दाँव न चले, क्योंकि हम उसकी युक्तियों से अनजान नहीं।” (2 कुरिन्थियों 2:8-11)
पौलुस कुरिन्थियों को चेतावनी देता है कि शैतान उनकी कलीसिया के चारों ओर ऐसे घूम रहा है जैसे लहू मिले पानी में शार्क मछली घूमती है। वह उस व्यक्ति, कलीसिया और यीशु के पक्ष में उनकी साक्षी को निगल जाने का षड्यंत्र रच रहा था। पौलुस कुछ ही आयतों में शैतान के कम से कम चार षड्यंत्रों को उजागर करता है।
पहला, शैतान चाहता है कि क्षमा करने में बाधा डाली जाए। परमेश्वर चाहता है कि उसकी कलीसिया एक विज्ञापन-पट्ट के समान हो जो उसके क्षमा करने वाले प्रेम को प्रदर्शित करे। शैतान क्षमा को विफल करके, कड़वाहट को बढ़ावा देकर, और एक-दूसरे के प्रति अलगाव को अधिक गहरा करके इसे नष्ट करना चाहता है। पौलुस विनती करता है कि वे उसके प्रति अपने प्रेम को प्रकट करें—- जिससे उसके मन में कोई सन्देह न रहे कि परमेश्वर उसके विषय में क्या सोचता है। उन्होंने उसे अनुशासित करने में विश्वासयोग्यता दिखाई थी; अब उन्हें उसे क्षमा करने और पुनः स्थापित करने में भी विश्वासयोग्यता दिखानी चाहिए।
दूसरा, शैतान उस व्यक्ति पर बहुत अधिक कलंक लगाना चाहता है। कलीसिया के द्वारा उस व्यक्ति को गले लगाने के विपरीत, शैतान चाहता है कि वह “अत्यधिक दुःख में डूबा रहे।” जिस शब्द का वह उपयोग करता है, वह शब्द उस व्यक्ति के निगले जाने और उसकी सहनशक्ति से परे उसे निर्बल बना देने वाली चिन्ता से ग्रस्त होने का सजीव चित्रण हैं। शैतान चाहता है कि वह उसे लज्जा की बेड़ियों में जकड़ दे, ताकि वह परमेश्वर के फिर से मेल-मिलाप करने वाले प्रेम की स्वतंत्रता में न चल सके। शैतान चाहता है कि वह उसे दोषी ठहराकर कुचल दे, ताकि उसके विश्वास में दृढ़ बने रहने में बाधा खड़ी हो जाए। परन्तु कलीसिया को चाहिए कि वे उसे क्षमा करके उसके शोक का भार उठाएँ। उन्हें क्षमाशील अनुग्रह के मरहम से उसकी लज्जा को चंगा करना चाहिए।
तीसरा, शैतान घमण्ड को भड़काना चाहता है। कलीसिया को मसीह के सदृश दीनता में बढ़ने देने के विपरीत, वह कलीसिया को यह बताता है कि कलीसिया अपने आप में धर्मी है ऐसा करके वह घमण्ड को भड़काना चाहता है। वह चाहता है कि जो लोग उस व्यक्ति के प्रलोभन में नहीं फँसे, वे अपने लिए अनुग्रह की आवश्यकता के प्रति अंधे बने रहें। ऐसा करने से कलीसिया एक-दूसरे के प्रति और अन्त में मसीह के प्रति भी कठोर हो जाएगी। इसके विपरीत, कुरिन्थियों को मसीह की ओर देखना चाहिए और दीन होना चाहिए, यह जानते हुए कि उनके पाप भी उसे क्रूस पर चढ़ाए जाने के लिए उत्तरदायी थे। भले ही उन्होंने उस व्यक्ति के समान पाप न किया हो, फिर भी वे पापी थे। वे भी उसी प्रकार से अनुग्रह के ऋणी थे।
चौथा, शैतान यीशु को दुःखी करना चाहता है। शैतान जानता है कि जब विश्वासी एक-दूसरे से प्रेम नहीं करते, तो परमेश्वर दुःखी होता है (इफिसियों 4:30)। जिस प्रकार यीशु प्रकाशितवाक्य 2-3 में अपनी कलीसियाओं के बीच चलता है, वैसे ही वह कुरिन्थियों की कलीसिया के बीच भी चलता है। यही कारण है कि पौलुस कहता है, “मैंने मसीह की उपस्थिति में क्षमा किया है” (शाब्दिक रूप से, “मसीह के सामने,” 2 कुरिन्थियों 5:10)। पौलुस चाहता है कि वे समझें कि क्षमा करने के बुलाए जाने पर उनकी प्रतिक्रिया यीशु को या तो दुःखी करेगी या प्रसन्न करेगी। उन्हें शैतान की चालों के सामने झुकना नहीं चाहिए।
क्षमा करना आत्मिक युद्ध है। ऋण क्षमा करना और उन लोगों को शान्ति देना जिन्होंने हमारे विरुद्ध अपराध किया है, मसीह के सदृश है। दूसरों को क्षमा करने से हम शैतान के जाल में फँसने से बच जाते हैं।
- क्षमा सुसमाचार की प्रशंसा करती है।
यदि कोई ऐसा व्यक्ति था जिससे कलीसिया को दूर रहना चाहिए था, तो वह शाऊल था। उसने स्तिफनुस की फाँसी को स्वीकृति दी, घर-घर जाकर विश्वासियों की खोजा, और कलीसिया को सरकारी सहायता लेकर नष्ट करने का प्रयास किया। (प्रेरितों के काम 8:1-3, 9:1-2) ईश्वरीय हस्तक्षेप के बिना शाऊल विजयी प्रतीत होता था। फिर भी, प्रभु ने शाऊल के आक्रमणों को रोक दिया और उसे उस कलीसिया से प्रेम करने के लिए छुटकारा मिला जिसे वह किसी समय में नष्ट करना चाहता था (प्रेरितों के काम 9:1-9)।
परन्तु शाऊल को दूसरों की सेवा आरम्भ करने से पहले, यीशु ने हनन्याह को शाऊल के लिए सुसमाचार हेतु क्षमा का प्रतीक बनाकर सेवकाई के लिए बुलाया। प्रेरितों के काम 9:17 में हम उस क्षण को देखते हैं जब वे आपस में मिलते हैं: “हनन्याह…घर में प्रवेश किया और उस पर हाथ रखकर कहा, ‘भाई शाऊल, प्रभु यीशु ने…मुझे भेजा है कि तू फिर से देखने लगे और पवित्र आत्मा से परिपूर्ण हो जाए’…तब वह उठा और बपतिस्मा लिया; और भोजन करके बल पाया। और तब कुछ दिन तक वह दमिश्क में शिष्यों के साथ रहा।”
सुसमाचार की कोमल भावना के एक क्षण में हनन्याह ने प्रेम के साथ अपना हाथ शाऊल पर रखा — यह वही शाऊल था जिसने मसीहियों से घृणा करते हुए उन पर अत्याचार किया था। उसने उससे कहा, “भाई शाऊल।” जबकि शाऊल ने इस परिवार को कष्ट पहुँचाया था, परन्तु अब उसी परिवार ने उसे ग्रहण कर लिया था। बपतिस्मा के जल से निकलते ही, शाऊल ने शिष्यों के साथ भोजन किया। उनका ऐसे भोज में सम्मिलित होना क्षमा के कारण ही सम्भव हुआ। जब हम दूसरों को क्षमा करते हैं, तो हम संसार के सामने ऐसा ही नमूना रखते हैं, मानो कह रहे हों, “यीशु ने मुझ से ऐसा प्रेम किया है; आओ, उससे मिलो। हम इसलिए प्रेम करते हैं क्योंकि उसने पहले हमसे प्रेम किया है।”
चर्चा एवं मनन:
- क्या इस खण्ड ने क्षमा के विषय में आपकी किसी गलत धारणा को सुधारा है? इस खण्ड ने आपके लिए किन बातों को स्पष्ट किया है? करने क्या आप क्षमा पर एक संक्षिप्त विवरण लिख सकते हैं?
- ऊपर बताए गए क्षमा करने के चार कारणों में से, आपके लिए सबसे चुनौतीपूर्ण या दोषी ठहराने वाला कारण कौन सा था? क्या आप इसमें कुछ और जोड़ना चाहेंगे?
2 कौन और कैसे?
पवित्रशास्त्र यह स्पष्ट करता है कि मसीही लोगों को किसे और किस प्रकार से क्षमा करना चाहिए। केवल इतना कहना कि “हमेशा सभी को क्षमा करो” न तो सही है और न ही उन लोगों के लिए उतना सहायक है जो वास्तविक पीड़ाओं से जूझ रहे हैं और प्रभु का सम्मान करना चाहते हैं। आगे कुछ पवित्रशास्त्र-आधारित सिद्धान्त दिए गए हैं, जो हमें क्षमा करने के प्रयास में मार्गदर्शन करेंगे।
क्षमा करने में पहल आपको करनी चाहिए।
यह विश्वासियों का उत्तरदायित्व है कि वे क्षमा करने में पहल करें। हमें क्षमा करना और क्षमा पाना—दोनों का प्रयास करना चाहिए। मत्ती 5:23–24 में यीशु कहता है, “”इसलिए यदि तू अपनी भेंट वेदी पर लाए, और वहाँ तू स्मरण करे, कि मेरे भाई के मन में मेरी ओर से कुछ विरोध है, तो अपनी भेंट वहीं वेदी के सामने छोड़ दे, और जाकर पहले अपने भाई से मेल मिलाप कर, और तब आकर अपनी भेंट चढ़ा।”
परमेश्वर चाहता है कि हम दीन होकर यह समझें कि किस प्रकार से सम्बन्धों को सुधारने की आवश्यकता है। यदि हमने किसी के विरुद्ध अपराध किया है, तो हमें क्षमा और मेल-मिलाप करने का प्रयास करना चाहिए। यीशु का दृष्टान्त प्रभावशाली है। वह कहता है कि यदि आप परमेश्वर के साथ घनिष्ठ आराधना में हैं, और वह आपको किसी पड़ोसी, परिवार के सदस्य, सहकर्मी, कॉलेज के परिचित या कलीसिया के किसी सदस्य—किसी भी ऐसे व्यक्ति—को स्मरण करें, जिसके विरुद्ध आपने अपराध किया है, तो आपको आराधना रोककर पहले मेल-मिलाप करने का प्रयास करना चाहिए।
यीशु की शिक्षा के महत्व को समझने के लिए एक भौगोलिक तथ्य पर ध्यान दें। कि बलिदान यरूशलेम के मन्दिर में चढ़ाए जाते थे। और जब यीशु ने मत्ती 5 में क्षमा से सम्बन्धित शिक्षा दी, तब वह गलील में था (मत्ती 4:23)। यदि आप अपने बाइबल के मानचित्र को देखें, तो पाएँगे कि गलील यरूशलेम से लगभग 70–80 मील की दूरी पर है। बिना कार या साइकिल के यह कई दिनों की यात्रा थी। यीशु कहता है कि यदि तुम यरूशलेम तक पहुँच जाओ और तुम्हें कोई अपराध स्मरण हो जाए — तो लौट जाओ। घर जाओ। और उसे सही करो। और तब वापस आओ। क्योंकि सच्ची आराधना केवल भेंट नहीं है — वरन् यह मेल-मिलाप करने वाला प्रेम है।
परन्तु यदि किसी ने आपके विरुद्ध अपराध किया है तो क्या होगा? क्या आपको यह अधिकार है कि आप कड़वाहट के साथ उनका आपके पास आने की प्रतीक्षा करो, या चुपचाप उनसे बचते रहो जब तक वे मर न जाएँ? नहीं। यीशु कहता है कि हमें उनके पास जाना चाहिए। मत्ती 18:15 पर ध्यान दें, “यदि तेरा भाई तेरे विरुद्ध अपराध करे, तो जा और अकेले में बातचीत करके उसे समझा; यदि वह तेरी सुने तो तूने अपने भाई को पा लिया” यह बहुत अधिक प्रभावशाली शिक्षा है। मत्ती 5 और 18 में, यीशु किससे मेल-मिलाप की पहल करने की अपेक्षा करता है? आप। मैं। हम। हर परिस्थिति में, चाहे गलती किसी की भी क्यों न हो, परन्तु यीशु हमें ही क्षमा करने की पहल करने के लिए कहता है।
दोनों ही आयतों में यीशु “अपने भाई” को क्षमा करने की आज्ञा देता है। क्या इसका अर्थ यह है कि हम अविश्वासियों को क्षमा न करें? कदाचित् नहीं। मरकुस 11:25 में यीशु का निर्देश सुनें, “और जब कभी तुम खड़े हुए प्रार्थना करते हो, तो यदि तुम्हारे मन में किसी की ओर से कुछ विरोध हो, तो क्षमा करो: इसलिए कि तुम्हारा स्वर्गीय पिता भी तुम्हारे अपराध क्षमा करे।” यदि कोई भी व्यक्ति जिसने कुछ भी गलत किया हो, हमें स्मरण आ जाए, तो हमें उसे क्षमा करना चाहिए। प्रेरित पौलुस रोमियों 12:18 में इसी विचार को दोहराता है, “जहाँ तक हो सके, तुम भरसक सब मनुष्यों के साथ मेल मिलाप रखो।” परमेश्वर हमसे कहता है कि चाहे दूसरे कुछ भी करें, परन्तु हमें शान्ति का पीछा करने के लिए पूरा प्रयास करना चाहिए। हमें यह सोचकर उचित नहीं समझना चाहिए कि दूसरे ही लोग मेल-मिलाप की पहल करें। परमेश्वर हमें ही पहला कदम उठाने के लिए कहता है।
हमें पौलुस की इस बात पर “यदि सम्भव हो” (रोमियों 12:18) पर ध्यान देना चाहिए। क्योंकि ऐसी घटनाएँ भी घटित होती हैं जहाँ शान्ति और मेल-मिलाप होना असम्भव होता है। यदि कोई व्यक्ति पाप स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है या पश्चाताप न करने के कारण खतरनाक हो गया है, तो क्षमा से शान्तिपूर्ण मेल-मिलाप नहीं हो सकता है। हम थोड़ी देर में कठिन परिणामों पर चर्चा करेंगे, परन्तु यह निश्चित कर लें कि क्षमा मसीह-सदृश प्रेम को अपनाने के लिए एक परिवर्तनकारी बुलाहट है।
अत्यधिक धैर्य रखते हुए क्षमा करें।
जैकब के पिता ने उसकी माता के प्रति विश्वासघात किया और भावनात्मक रूप से जैकब को इस प्रकार से प्रभावित किया कि उसे लगने लगा कि उनका तलाक उसकी गलती के कारण हुआ था। जैकब के पिता ने उससे लगभग सात वर्षों तक बात नहीं की थी, इसलिए जैकब के घाव एक शान्त कड़वाहट में बदल गए थे — जब तक कि जैकब यीशु से नहीं मिला। जब जैकब ने नया नियम पढ़ा, तो परमेश्वर ने उसे अपने पिता को क्षमा करने पर विचार करने के लिए प्रेरित किया। परन्तु उसे यह कैसे करना था? उसे इस कार्य को शीघ्र ही करना था।
शीघ्रता। यदि हम क्षमा करने के लिए तब तक प्रतीक्षा करें जब तक कि हमारा मन तैयार न हो जाए, तो हो सकता है कि हम कभी किसी को क्षमा ही न करें। जैकब के समान घाव असुरक्षा, भय और कठोरता की भावना को जन्म देते हैं। परन्तु विश्वासियों को अपनी भावनाओं से प्रभावित नहीं होना चाहिए। इसके विपरीत, उन्हें अपनी भावनाओं को परमेश्वर के अधीन करना चाहिए और क्षमा की दिशा में कार्य करना चाहिए। क्योंकि दूसरों को क्षमा करना परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारिता का कार्य है, इसलिए हमें क्षमा करने में विलम्ब नहीं करना चाहिए (मत्ती 5:23–24; और मरकुस 11:25 की तुलना करें)।
धैर्य। किसी भी व्यक्ति को असावधानी के साथ क्षमा नहीं करना चाहिए, क्योंकि यीशु किसी भी मार्ग पर चलने से पहले आज्ञाकारिता की सम्भावित कठिनाइयों और माँगों पर विचार करने की आवश्यकता पर बल देता है (लूका 14:25-33)। सच्ची क्षमा के लिए अधिकतर बहुत अधिक प्रार्थना, पवित्रशास्त्र के साथ तैयारी और बुद्धिमानी के साथ सलाह की आवश्यकता होती है। जैकब के नए विश्वास को यह समझने के लिए समय चाहिए था कि अपने पिता के पास जाने का सबसे अच्छा तरीका क्या है और यदि उसके पिता ने नकारात्मक प्रतिक्रिया दी तो उसे अपने हृदय को कैसे तैयार करना चाहिए।
जैकब ने भजन संहिता 119:32 के अनुसार प्रार्थना की और परमेश्वर से क्षमा करने में सहायता माँगते हुए कहा, “जब तू मेरा हियाव बढ़ाएगा, तब मैं तेरी आज्ञाओं के मार्ग में दौड़ूँगा।” वह तुरन्त क्षमा करना चाहता था क्योंकि परमेश्वर ने ऐसा करने की आज्ञा दी थी, और उसने आज्ञाकारिता के लिए धैर्य रखा क्योंकि उसे अपने हृदय को इस योग्य बनाने के लिए परमेश्वर की आवश्यकता थी।
यीशु की ओर देखकर और उस पर निर्भर रहकर क्षमा करें।
अकेले दुखों, हानि और विश्वासघात का समाधान करना असम्भव सा लगता है। परन्तु निराश होने से अच्छा है कि हम सहायता पाने के लिए प्रभु की ओर देखें। यीशु ने हमें आमंत्रित किया है, “हे सब परिश्रम करनेवालों और बोझ से दबे लोगों, मेरे पास आओ; मैं तुम्हें विश्राम दूँगा।” (मत्ती 11:28) यीशु आपको क्षमा करने में सहायता करेगा। इसलिए सामर्थ्य पाने के लिए उसकी की ओर देखो और उस पर भरोसा रखो। पौलुस ने इफिसियों को प्रेम में फलने-फूलने का आग्रह करते समय इस प्रेरणा का प्रयोग किया: “एक दूसरे पर कृपालु, और करुणामय हो, और जैसे परमेश्वर ने मसीह में तुम्हारे अपराध क्षमा किए, वैसे ही तुम भी एक दूसरे के अपराध क्षमा करो।” (इफिसियों 4:32)
यीशु की ओर देखते हुए न्याय को देखो। क्रूस ही परमेश्वर की घोषणा है कि उसकी सृष्टि में पाप को अनदेखा नहीं किया जाएगा। परमेश्वर हमारे पापों से बहुत अधिक घृणा करता है क्योंकि वह अति पवित्र और सिद्ध परमेश्वर है, और इन्हीं पापों के कारण उसके पुत्र को कुचला गया। “निश्चय उसने हमारे रोगों को सह लिया और हमारे ही दुःखों को उठा लिया; तो भी हमने उसे परमेश्वर का मारा-कूटा और दुर्दशा में पड़ा हुआ समझा। परन्तु वह हमारे ही अपराधों के कारण घायल किया गया, वह हमारे अधर्म के कामों के कारण कुचला गया; हमारी ही शान्ति के लिये उस पर ताड़ना पड़ी कि उसके कोड़े खाने से हम लोग चंगे हो जाएँ। (यशायाह 53:4-5) परमेश्वर की भलाई इस बात में प्रकट होती है कि उसने निर्दोष के माथे पर न्याय की तलवार चला दी।
क्रूस का विकल्प अनन्त आग की झील है। यदि पापी मनुष्य यीशु के पास नहीं आते है, उस यीशु के पास जिसका पापियों के बदले न्याय हुआ है, तो वे नरक में परमेश्वर के न्याय के अधीन हो जाएँगे। पलटा लेना और बदला देना यहोवा का कार्य है और वह ऐसा अवश्य करेगा (व्यवस्थाविवरण 32:35; रोमियों 12:19–20)। यीशु ने हम से यह प्रतिज्ञा की है कि हर एक निकम्मी बातों का न्याय के दिन लेखा-जोखा होगा (मत्ती 12:36) और जब हमारे साथ अन्याय किया जाए, तो हमें उसके नमूने का अनुसरण करना चाहिए। “वह गाली सुनकर गाली नहीं देता था, और दुःख उठाकर किसी को भी धमकी नहीं देता था, पर अपने आपको सच्चे न्यायी के हाथ में सौंपता था।” (1 पतरस 2:23)। इस बात पर विश्वास करें, कि परमेश्वर न्यायपूर्वक न्याय करता है, और हमें उदारता के साथ क्षमा करने के लिए स्वतंत्र करता है।
क्षमा करने का अर्थ यह नहीं है कि हम अपने अपराधियों से कहें, “तुमने जो कुछ किया वह ठीक है” या “यह कोई बड़ी बात नहीं है।” नहीं! क्षमा करने से हमारे साथ की गई ग़लतियों को कम नहीं किया जा सकता है, वरन् जो भी ग़लतियाँ है उन सब का न्याय होगा। न्याय का आश्वासन हमें क्षमा करने के लिए स्वतंत्र करता है। हमारी कलीसिया की एक बहन, जिसका अपनी क्रूर माँ के साथ एक कष्टों से भरा हुआ सम्बन्ध था, उसने कहा कि जब हमारी कलीसिया यह गीत गाती है, “मेरे जीवन के लिए उसने लहू बहाया और मर गया, मसीह मुझे दृढ़ता से थामे रहेगा; न्याय पूरा हो चुका है, वह मुझे दृढ़ता से थामे रहेगा।”3 वह जानती है कि उसके अपने पाप मसीह में समाप्त कर दिए गए हैं, परन्तु साथ ही उसे यह भी स्मरण कराया जाता है कि परमेश्वर पवित्र है और यह सत्य है कि प्रत्येक पाप जिसमें उसकी माँ के द्वारा उसके साथ किए गए पाप भी सम्मिलित हैं — सबका उचित न्याय के साथ लेखा-जोखा होगा, चाहे वह क्रूस पर हो या फिर नरक में हो।
यीशु पर ध्यान देते हुए दया देखिए। क्षमा किए जाने जैसा कोई भी अनुभव हृदय को क्षमा करने के लिए इतना प्रेरित नहीं करता है। मसीह में आपके प्रति परमेश्वर की दया, कड़वाहट से भरे हृदय के विरुद्ध सबसे प्रभावशाली हथियार है। यदि आप क्षमा करने में संघर्ष कर रहे हैं, तो अपना ध्यान यीशु की दया पर लगाइए। और सोचिए कि उसने कितने धैर्य के साथ आपको क्षमा किया है। इस बात पर विचार करें कि उसने आपके कठोर हो चुके हृदय के प्रति कितनी बड़ी दया दिखाई है। क्रूस की ओर देखो कि परमेश्वर का पुत्र आपके लिए लहू बहा रहा है। उसकी पुकार सुनो जो कहती है, “पूरा हुआ!” और जान लो कि उसका कार्य तुम्हारे लिए पूरा हुआ। परमेश्वर के हृदय को यह कहते हुए सुनो, “जो मरे, उसके मरने से मैं प्रसन्न नहीं होता, इसलिए पश्चाताप करो, तभी तुम जीवित रहोगे।” (यहेजकेल 18:32) परमेश्वर से प्रार्थना करें कि वह आपको उन लोगों के प्रति भी उसी प्रकार की दया प्रदान करे जिन्होंने आपको दुःख पहुँचाया है।
सामर्थ्य पाने के लिए यीशु पर निर्भर रहें। क्षमा करने के लिए अद्भुत सामर्थ्य की आवश्यकता होती है। धन्यवाद हो कि परमेश्वर हमें वह सामर्थ्य देता है ताकि हम वह सब कुछ कर सकें जिसको करने के लिए वह हमें आज्ञा देता है (फिलिप्पियों 2:13)। यीशु हमें चेतावनी देते हुए कहता है, “मुझ से अलग होकर तुम कुछ भी नहीं कर सकते” (यूहन्ना 15:5), और यह भी भरोसा देता है कि “मैं जगत के अन्त तक सदैव तुम्हारे संग हूँ (मत्ती 28:20)। क्या आप क्षमा करने के लिए बहुत निर्बल और थके हुए हैं? परन्तु आपके लिए एक सुभ सन्देश है। यीशु प्रतिज्ञा करता है कि, “मेरा अनुग्रह तेरे लिये बहुत है; क्योंकि मेरी सामर्थ्य निर्बलता में सिद्ध होती है” (2 कुरिन्थियों 12:9)। हम इस सामर्थ्य को कैसे प्राप्त करें? प्रार्थना करें। पवित्रशास्त्र पढ़ें। प्रभु के लिए गीत गाएँ। उत्साह के साथ आराधना करें। उसके वचन के द्वारा लगातार यीशु को खोजते रहें। अपने जीवन को किसी अन्य विश्वासी जन के साथ साझा करें जो आपको उत्साहित कर सके और परमेश्वर पर भरोसा रखने की चुनौती दे सके। ऐसा करने से आपके जीवन में परिवर्तन आएगा और आप क्षमा करने में सक्षम हो जाएँगे।
परिणामों के लिए यीशु पर भरोसा रखें। लिन अपनी दादी से प्रेम करती थी, परन्तु पारिवारिक कलह ने उनके सम्बन्धों में तनाव उत्पन्न कर दिया था। वह अपनी वृद्ध दादी से मेल-मिलाप करना चाहती थी, इसलिए उसने सुलह करने के उद्देश्य से बातचीत करना आरम्भ किया। लिन ने प्रार्थना के साथ तैयारी की, तथा जो कुछ घटित हुआ था उसके लिए क्षमा माँगने के सभी तरीकों के बारे में सोचा। और जब वह अपनी दादी से मिलने गई तो उसने अपने मन की बात कह दी और उनसे क्षमा माँगी। परन्तु दया पाने के विपरीत, उसकी दादी ने उसकी आँखों में देखा और कहा, “तुम मेरे लिए मर चुकी हो। इस घर से बाहर निकल जाओ और फिर कभी वापस मत आना।” यह लिन के लिए एक गहरा आघात था, जिसने स्थिति को ठीक करने के लिए अपनी ओर से पूरा प्रयास किया था। यह कहानी हमें स्मरण कराती है कि केवल परमेश्वर ही मन को बदल सकता है। पहली दृष्टि में ऐसा लग सकता है कि लिन के प्रयास व्यर्थ हो चुके हैं। परन्तु ऐसा नहीं था। उस बातचीत से पहले वह महीनों तक परमेश्वर के साथ प्रार्थना के द्वारा परिश्रम करती रही, और इसने उसके जीवन को पूरी रीति से बदल दिया। वह विनम्र हुई, उसका विश्वास दृढ़ हुआ, और जो लोग उसके साथ चलते थे, वे अपने स्वयं के जीवन की जाँच करने के लिए उत्साहित हुए। लिन का उत्तरदायित्व यह था कि वह शान्ति का पीछा करे और परिणामों को विश्वास करते हुए परमेश्वर पर छोड़ दे (रोमियों 12:18)। जब आप दूसरों के साथ शान्ति और मेल-मिलाप करने का प्रयास करें, तो परमेश्वर से सहायता पाने के लिए प्रार्थना करें, परन्तु साथ ही यह भी समझ लें कि परमेश्वर का समय आपका समय नहीं है। इसलिए बीज बोएँ और समय-समय पर पानी डालते रहें, पर स्मरण रहे कि बढ़ाता परमेश्वर ही है (1 कुरिन्थियों 3:6)।
अन्य विश्वासियों की सहायता से क्षमा करें।
मसीही जीवन अकेले जीने के लिए नहीं है। परमेश्वर ने हमें पाप से निकालकर मसीह में— और मसीह की कलीसिया में बुलाया है। विश्वासी एक परिवार के रूप में एकजुट होते हैं जो एक-दूसरे से प्रेम करते हैं और यीशु की आज्ञाकारिता में एक-दूसरे को प्रोत्साहित करते हैं। इब्रानियों का लेखक हमें आज्ञा देता है, “वरन् जिस दिन तक आज का ‘दिन’ कहा जाता है, हर दिन एक दूसरे को समझाते रहो, ऐसा न हो, कि तुम में से कोई जन पाप के छल में आकर कठोर हो जाए” (इब्रानियों 3:13)। क्षमा न करने से हमारे हृदयों पर धोखा देने वाला प्रभाव होता है। यह हमें भरोसा दिलाता है कि हमें अपने मन में कड़वाहट रखने का अधिकार है। यदि हम क्षमा न करने की भावना को बढ़ावा देंगे, तो विश्वास में दृढ़ रहने की हमारी योग्यता ख़तरे में पड़ जाएगी। इसलिए हमें ऐसे भक्ति पूर्ण मित्रों की आवश्यकता है जो हमें प्रतिदिन क्षमा करने की सामर्थ्य के लिए परमेश्वर पर निर्भर रहने के लिए प्रोत्साहित करें। हमें उनकी आवश्यकता इसलिए है ताकि वे हमारे लिए प्रार्थना करें, हमें सलाह दें, हमें प्रोत्साहित करें, हमारे लिए उत्तरदायी बनें, तथा साथ-साथ चलते हुए हमारे साथ दुखी हों और आनन्द मनाएँ।
फिलेमोन कुलुस्से का एक विश्वासयोग्य मसीही व्यक्ति था। वह इतना धनी था कि अपने घर में एक कलीसिया की स्थापना कर सकता था और उसके घर में उनेसिमुस नाम का एक सेवक था। उनेसिमुस ने स्पष्ट रूप से फिलेमोन के यहाँ से कुछ चोरी की और रोम भाग गया, इस उम्मीद के साथ कि वह वहाँ जाकर कुछ नया कार्य आरम्भ कर सके। परन्तु परमेश्वर की कुछ और ही योजना थी। उनेसिमुस की भेंट प्रेरित पौलुस से हुई, जिसने उसे मसीह में विश्वास दिलाया। उनेसिमुस को लगा कि उसे वापस लौटकर फिलेमोन के साथ मेल-मिलाप करना चाहिए। पौलुस ने फिलेमोन को एक पत्र लिखकर विनती की कि वह उनेसिमुस को क्षमा करे और उसे मसीह में भाई समझकर स्वीकार करे। अतः यदि आपने हाल ही में इसे नहीं पढ़ा है, तो फिलेमोन की पुस्तक को अवश्य पढ़ें।
इस पत्री में हम देखते हैं कि पौलुस क्षमा करने और मेल-मिलाप को प्रोत्साहित करने के सात तरीके बताता है।
पहला, पौलुस उनेसिमुस को पश्चाताप करने के लिए प्रोत्साहित करता है। उनेसिमुस को फिलेमोन के पास भेजकर, पौलुस उनेसिमुस को सच्चाई से उस पश्चाताप को करने में सहायता करता है जो पश्चताप परमेश्वर ने उसके मन में उत्पन्न किया था। हम यह नहीं जानते कि पौलुस ने उनेसिमुस को फिलेमोन के प्रति उसके पाप को समझने में कितनी सहायता की है, परन्तु इस बात की अति सम्भावना है कि यह बात उनकी कई चर्चाओं का मुख्य विषय रहा होगा। यदि आप किसी को अनुशासित कर रहे हैं, तो नियमित रूप से किसी भी तनावपूर्ण सम्बन्धों और क्षमा माँगने या क्षमा करने के तरीकों पर चर्चा करें। पौलुस के समान मित्र बनिए और पौलुस के ही समान मित्र बनाइए जो आपको परमेश्वर की आज्ञाकारिता में प्रेरित कर सके।
दूसरा, पौलुस फिलेमोन के विश्वास को प्रोत्साहित करता है (आयत 4-7, 21)। सम्पूर्ण पत्र में पौलुस फिलेमोन के प्रेम और विश्वास (आयत 5) पर प्रकाश डालता है, जिसने विश्वासियों के बीच आनन्द उत्पन्न किया और उनके मन हरे-भरे हो गए (आयत 7)। वह फिलेमोन की आज्ञाकारिता में विश्वास की बात करता है, तथा भरोसा करता है कि जो कुछ उससे करने के लिए कहा गया है, वह उससे भी अधिक करेगा (आयत 21)। पौलुस फिलेमोन को यह भी भरोसा दिला रहा है कि वह उसके लिए प्रार्थना कर रहा है (आयत 6)। प्रार्थना केवल उस विश्वासी के प्रति दयालुता नहीं है जो क्षमा करने का प्रयास कर रहा है। प्रार्थना आवश्यक है क्योंकि यह सर्वशक्तिमान परमेश्वर की सामर्थ्य को कार्य करने के लिए प्रेरित करती है। उनेसिमुस को विनम्रता पूर्वक क्षमा माँगने के लिए आत्मिक सामर्थ्य की आवश्यकता थी। फिलेमोन को क्षमा करने के लिए आत्मिक सामर्थ्य की आवश्यकता थी। प्रार्थना परमेश्वर से इस सामर्थ्य को देने के लिए विनती करती है। यदि आप किसी को क्षमा करने में सहायता कर रहे हैं, तो नियमित रूप से उनके लिए प्रार्थना करके तथा उनके जीवन में परमेश्वर के कार्य करने के तरीकों को प्रोत्साहित करके उन्हें आज्ञाकारिता के लिए प्रेरित करें।
तीसरा, पौलुस अपने सम्बन्ध का उपयोग करता है (आयत 8–14)। पौलुस का फिलेमोन के साथ लम्बे समय से सम्बन्ध था और वह इस बात का एक विश्वासयोग्य नमूना प्रस्तुत करता है कि लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए अपने सम्बन्धों की दृढ़ता का कैसे लाभ उठाएँ। लोगों को परमेश्वर की आज्ञा मानने के लिए प्रेरित करने में अपने सम्बन्धों की दृढ़ता का उपयोग करने से न हिचकें। परमेश्वर ने आपको इस प्रकार के सम्बन्ध किस लिए दिए हैं? किसी मित्र को प्रभु की आज्ञा मानने में सहायता करने से अधिक प्रेम किसी और कार्य से नहीं दिखाया जा सकता है।
चौथा, पौलुस फिलेमोन को सम्पूर्ण हृदय से आज्ञा मानने के लिए कहता है (आयत 8–9)। पौलुस केवल हस्तक्षेप के परिणाम को लेकर ही चिन्तित नहीं था। वह जानता था कि सच्चा और स्थायी परिवर्तन केवल उसी हृदय से आता है जो बदल चुका होता है। इसलिए, फिलेमोन को विवश होकर उनेसिमुस का स्वागत करने के लिए प्रेरित करने के विपरीत वह दया उत्पन्न कराता है। अतः प्रार्थना के साथ लोगों की सहायता करें कि वे मन से क्षमा करने की इच्छा रखें, न कि केवल कर्तव्य वश औपचारिकता निभाएँ।
पाँचवाँ, पौलुस परमेश्वर के प्रभुता सम्पन्न कार्य पर प्रकाश डालता है (आयत 15-16)। पौलुस फिलेमोन को उनकी परिस्थिति में परमेश्वर के प्रभुता सम्पन्न कार्य का बड़ा चित्र देखने में सहायता करता है। वह उनेसिमुस के द्वारा झेले गए अपमान को कम नहीं आँकता और न ही उसके अनुभव किए गए विश्वासघात को छोटा करके दिखाता है। उनेसिमुस ने फिलेमोन के यहाँ से चोरी की और उसका अनादर किया। परन्तु वह फिलेमोन की आँखें उठाकर कहता है, “क्योंकि क्या जाने वह तुझ से कुछ दिन तक के लिये इसी कारण अलग हुआ” (आयत 15)। वह चाहता है कि वह इस बात पर विचार करे कि परमेश्वर की अनुग्रहकारी देखभाल ने फिलेमोन को उससे दूर भागकर सीधे मसीह की बाँहों में पहुँचा दिया। यह सब परमेश्वर की योजना का हिस्सा था “ताकि आप उसे हमेशा के लिए वापस पा सकें…और न केवल एक दास के रूप में… वरन् एक प्रिय भाई के रूप में।” किसी ऐसे व्यक्ति को खोजें जो आपको यह बताने में सहायता कर सके कि आपकी परिस्थिति के बीच में परमेश्वर किस प्रकार कार्य कर रहा है, अर्थात् परमेश्वर व्यक्तिगत जीवन में सक्रिय रूप से कैसे जुड़ा रहता है।
छठवाँ, पौलुस प्रत्येक ऋण को चुकाने की सलाह देता है (आयत 17-19)। पौलुस चाहता है कि मेल-मिलाप के मार्ग में कोई बाधा न आए। वह फिर से सम्बन्धों को सुधारने में सहायता करने की बात करता है, ताकि फिलेमोन को उनेसिमुस को क्षमा करने के लिए प्रोत्साहन मिल सके। यह यीशु के आदर्श का अनुसरण करता है, जिसने दूसरों को आशीषित करने के लिए अपने अधिकार, महिमा और जीवन का बलिदान कर दिया। यदि आपके पास साधन हैं और आप ऋण चुकाकर या धन उधार देकर मेल-मिलाप की बाधाओं को दूर करने में सहायता कर सकते हैं, तो पौलुस के नमूने का अनुसरण करने पर विचार करें।
सातवाँ, पौलुस आत्मिक लाभों पर प्रकाश डालता है (आयत 20)। पौलुस क्षमा करने के लिए यह कहकर विनती करता है कि, “मैं प्रभु में तुमसे कुछ लाभ पाना चाहता हूँ। मसीह में मेरे जी को हर भरा कर दे” (आयत 20) पौलुस फिलेमोन को भरोसा दिलाता है कि उनेसिमुस के जीवन में परमेश्वर की दया का साधन बनने से उसे भी आशीष मिलेगी। वह सुसमाचार को जीवन में लागू होते देखकर उत्साहित होना चाहता है। वह चाहता है कि फिलेमोन अपने पूर्व सेवक को मसीह में एक प्रिय भाई के रूप में देखे। वह फिलेमोन से दया का संदेशवाहक बनने की विनती करता है जो सुसमाचार का साकार रूप है। लोगों को क्षमा के अनन्त महत्व और इस जीवन में उसके जीवनदायी प्रभावों का स्मरण कराना, मेल-मिलाप का पीछा करने के लिए आवश्यक सामर्थ्य दे सकता है।
किसी को क्षमा करना अत्यंत कष्टकारी हो सकता है, परन्तु इसे ऐसे मित्रों की सहायता से करना सबसे अच्छा होता है जो आपको सुसमाचार का स्मरण तुरन्त ही कराते हैं। इन कठिन परिस्थितियों से बाहर निकलने में कौन आपकी सहायता कर रहा है? आप दूसरों की सहायता कैसे कर सकते हैं?
परमेश्वर की प्रभुता सम्पन्न भलाई पर भरोसा रखकर क्षमा करें।
पवित्रशास्त्र में कुछ ही कहानियाँ ऐसी हैं जो परमेश्वर की प्रभुता सम्पन्न भलाई और क्षमा करने के आपसी सम्बन्धों को दर्शाती हैं, जैसे कि यूसुफ की कहानी (उत्पत्ति 37–50)। यूसुफ बारह भाइयों में से एक था। उसके पिता, याकूब को यूसुफ से विशेष प्रेम था, जिसके कारण उसके भाइयों में अत्यधिक ईर्ष्या उत्पन्न हो गई थी। उन्होंने एक षड्यंत्र रचा, और यूसुफ का अपहरण किया, उसे दास के रूप में बेच दिया, और फिर उसकी मृत्यु होने का नाटक किया। घर लौटकर उसके भाइयों ने अपने पिता से झूठ बोला और कहा कि यूसुफ को किसी जंगली पशु ने मार डाला है।
यूसुफ को मिस्र ले जाया गया, जहाँ उसे बहुत अधिक दुःख झेलने पड़े, उस पर झूठा आरोप लगाया गया, उसे बन्दीगृह में डाल दिया गया, और सबने उसे भुला दिया — परन्तु परमेश्वर उसे नहीं भूला था। लगभग बीस वर्षों के बाद, प्रभु ने एक स्वप्न की व्याख्या के उपयोग के द्वारा यूसुफ को मिस्र में दूसरे सर्वोच्च पद पर स्थापित किया। एक वैश्विक अकाल ने लोगों को अन्न खरीदने के लिए मिस्र की ओर उमड़ने पर विवश कर दिया, जिसमें यूसुफ के भाई भी सम्मिलित थे। यूसुफ ने उन्हें पहचान लिया, परन्तु समय ने उसकी पहचान उनसे छिपा दी थी।
कई उलझन भरी घटनाओं के बाद, उसके भाइयों को यह विश्वास हो गया कि उनकी समस्याएँ यूसुफ के साथ किए गए उनके अपने कर्मों के बदले में परमेश्वर की ओर से उन पर दण्ड है। यूसुफ समझ गया कि वे उसके प्रति किए गए अपने पाप के लिए गहराई से पछता रहे हैं, और उसने यहाँ तक देखा कि उसका एक भाई, यहूदा, अपने छोटे भाई बिन्यामीन को बचाने के लिए अपने जीवन को जोखिम में डालने के लिए तैयार है।
यूसुफ भावनाओं में बह गया और उसने अपने भाइयों के सामने अपनी पहचान प्रकट कर दी। और तब आश्चर्य का स्थान भय ने ले लिया क्योंकि उन्हें डर था कि यूसुफ अपनी शक्ति का प्रयोग करके उन्हें उनसे उनके किए गए अपराध का बदला लेगा। परन्तु बदला लेने के स्थान पर उसने उन पर दया की और उनसे अनुरोध किया कि वे याकूब को मिस्र ले आएँ ताकि वह उसकी देखभाल कर सके। जब याकूब की मृत्यु हो गई, तो भाई फिर से डर गए और कहने लगे, “कदाचित् यूसुफ अब हमारे पीछे पडे़, और जितनी बुराई हमने उससे की थी सब का पूरा बदला हम से ले।” उनके डर को जानने के पश्चात्, यूसुफ रो पड़ा…[और] उसने उनसे कहा, “मत डरो, क्या मैं परमेश्वर की जगह पर हूँ? यद्यपि तुम लोगों ने मेरे लिये बुराई का विचार किया था; परन्तु परमेश्वर ने उसी बात में भलाई का विचार किया, जिससे वह ऐसा करे, जैसा आज के दिन प्रगट है, कि बहुत से लोगों के प्राण बचे हैं।” (उत्पत्ति 50:17-20)
हम इस कहानी से क्षमा के विषय में कई सबक सीख सकते हैं, परन्तु सबसे स्पष्ट बात यह है कि परमेश्वर की प्रभुता सम्पन्न भलाई ने यूसुफ को स्वयं बदला लेने से स्वतंत्र कर दिया। यूसुफ इस बात की प्रशंसा करने में योग्य रहा कि कैसे परमेश्वर की बुद्धि ने परिस्थितियों को सुधारा था, जिसमें उसके भाइयों के द्वारा धोखा दिया जाना और बेचा जाना भी सम्मिलित था, ताकि भलाई की जा सके। परमेश्वर के उद्देश्यों और हमारी पीड़ा के बीच ऐसे स्पष्ट सम्बन्धों को देखने का सौभाग्य इस जीवन में हो सकता है, परन्तु वे हमारी अपेक्षा से बहुत अधिक दुर्लभ हैं।
अधिकतर हमें अनन्तकाल की ओर, उस भविष्य की ओर देखना पड़ता है जहाँ परमेश्वर हमें यह भरोसा देता है कि “क्योंकि हमारा पल भर का हलका सा क्लेश हमारे लिये बहुत ही महत्वपूर्ण और अनन्त महिमा उत्पन्न करता जाता है।” (2 कुरिन्थियों 4:17)। जब परमेश्वर कहता है कि इस जीवन में हमारे कष्ट हल्के हैं, तो वह हमारी पीड़ा को कम नहीं कर रहा है; वरन् वह आने वाली महिमा को बढ़ा रहा है। वह इस जीवन के दुर्व्यवहार, विश्वासघात, निन्दा, आक्रमण, उपेक्षा, सताव और पीड़ा का उपयोग एक ऐसे अनन्तकाल के आनन्द की तैयारी के लिए कर रहा है, जो इन सब से कहीं अधिक बढ़कर होगा। इसलिए, चाहे हमारे घाव कितने ही भारी क्यों न हों, परन्तु यीशु जिस महिमा को अपने साथ ला रहा है, उसका भार उनसे कहीं अधिक है। रोमियों 8:28 में हम से यह प्रतिज्ञा की गई है कि, “और हम जानते हैं, कि जो लोग परमेश्वर से प्रेम रखते हैं, उनके लिये सब बातें मिलकर भलाई ही को उत्पन्न करती है; अर्थात् उन्हीं के लिये जो उसकी इच्छा के अनुसार बुलाए हुए हैं।” इस जीवन में सब कुछ अच्छा नहीं होता है, परन्तु परमेश्वर भला है। और यदि हम इस सत्य में विश्राम कर सकें, तो हम इस जीवन में क्षमा करने के लिए स्वतंत्र हो जाएँगे, क्योंकि हमें पता है कि वह आने वाले जीवन में सब कुछ सुधार देगा।
चर्चा एवं मनन:
- क्या इस खण्ड ने आपको किसी भी प्रकार से चुनौती दी है? क्या आपके जीवन में ऐसी कुछ परिस्थितियाँ हैं, जिन परिस्थितियों में आपको इसे पढ़कर लाभ मिलेगा, अर्थात् आपने अभी जो पढ़ा है?
- सच्ची क्षमा किस प्रकार यह प्रकट करती है कि मसीह में परमेश्वर हमारे लिए क्या करता है?
3 स्थायी क्षमा
पतित संसार में क्षमा करना लगभग हमेशा ही कठिन होता है। घाव व्यक्तिगत होते हैं, और जिन सिद्धान्तों पर हमने चर्चा की है, उनका प्रयोग बहुत से लोगों के लिए भिन्न दिखाई देगा। मैंने जानबूझकर इन स्पष्ट करने वाले बिन्दुओं को अन्त तक सुरक्षित रखा। यदि आप भी मेरे ही समान हैं, तो आप इस प्रकार की परीक्षा में पड़ सकते हैं कि अपनी पीड़ा को इतना अनोखा समझने लगें कि वह पीड़ा आपको यीशु के स्पष्ट और महत्वपूर्ण वचनों का पालन करने से रोक दे। छोटे-छोटे अन्तरों को समझना महत्वपूर्ण है, परन्तु इन अन्तरों को यदि बुद्धिमानी से न समझा जाए, तो यह परमेश्वर के क्षमा करने की आज्ञा को हृदय से निकाल सकती है। साथ ही, क्षमा करना उलझन भरा भी हो सकता है, जैसा कि नीचे दिए गए छह प्रश्नों से स्पष्ट होता है।
प्रश्न #1: क्या मुझे क्षमा करना चाहिए और भूल जाना चाहिए?
कुछ कहावतें ऐसी हैं जिन्हें लोग मान लेते हैं कि वे बाइबल में उल्लेखित हैं, परन्तु वास्तव में नहीं हैं। जैसे कि “परमेश्वर उनकी सहायता करता है जो अपनी सहायता स्वयं करते हैं” और दूसरा “परमेश्वर आपको आपकी सहने की शक्ति से अधिक नहीं देगा” ये दो उदाहरण हैं। बचपन में, रविवार स्कूल की शिक्षिका ने मुझे एक और कहावत सिखाई। जो क्षमा से सम्बन्धित थी, उन्होंने हमें बताया कि परमेश्वर चाहता है कि हम “क्षमा करें और भूल जाएँ।” उस समय यह उचित, यहाँ तक कि बाइबल आधारित सलाह लगी। परन्तु परमेश्वर हमें क्षमा करने और भूल जाने की आज्ञा नहीं देता है।
पवित्रशास्त्र कहता है:
“जो मनुष्य बुद्धि से चलता है वह विलम्ब से क्रोध करता है, और अपराध को भुलाना उसको शोभा देता है” (नीतिवचन 19:11)।
“[प्रेम] अशोभनीय व्यवहार नहीं करता, वह अपनी भलाई नहीं चाहता, झुँझलाता नहीं, बुरा नहीं मानता” बी.एस.आई.(1 कुरिन्थियों 13:5)।
“सब में श्रेष्ठ बात यह है कि एक दूसरे से अधिक प्रेम रखो; क्योंकि प्रेम अनेक पापों को ढाँप देता है” (1 पतरस 4:8)।
हाँ, हमें पापियों के प्रति उदार होना चाहिए। परन्तु इसका यह अर्थ नहीं है कि हम हमेशा “क्षमा करें और भूल जाएँ।” यह कहावत सम्भवतः इस बात से जुड़ी है कि परमेश्वर हमारे पापों के साथ किस प्रकार से व्यवहार करता है। भजन संहिता 103:12 में हमें बताया गया है कि, “उदयाचल अस्ताचल से जितनी दूर है, उसने हमारे अपराधों को हम से उतनी ही दूर कर दिया है।” पूरब और पश्चिम के बीच की दूरी अगणनीय है। जब परमेश्वर क्षमा करता है, तो वह हमारे पापों को हमारी कल्पना से भी दूर कर देता है। भविष्यद्वक्ता मीका घोषणा करता है, “वह फिर हम पर दया करेगा, और हमारे अधर्म के कामों को लताड़ डालेगा। तू उनके सब पापों को गहरे समुद्र में डाल देगा” (मीका 7:19)। जब परमेश्वर क्षमा करता है, तो वह हमारे पापों के प्रति प्रतिशोधात्मक दृष्टिकोण अपनाता है, और हमारे पापों को लेकर समुद्र की गहराई में डाल देता है, ताकि वे फिर कभी दिखाई न दें। यशायाह हमें यह भरोसा दिलाता देता है कि, “मैं वही हूँ जो अपने नाम के निमित्त तेरे अपराधों को मिटा देता हूँ और तेरे पापों को स्मरण न करूँगा” (यशायाह 43:25)।
इन आयतों का यह अर्थ नहीं है कि सर्वज्ञानी परमेश्वर हमारे पापों को स्मरण नहीं रख सकता। वह इस बात से अनभिज्ञ नहीं है कि हमने क्या किया है। परन्तु इसका अर्थ यह है कि यीशु ने उन पापों का पूरा दाम चुका दिया है, हम क्षमा किए गए हैं, और “अब जो मसीह यीशु में हैं, उन पर दण्ड की आज्ञा नहीं” (रोमियों 8:1)। परमेश्वर हमें लज्जित करने या हमें दोषी ठहराने के लिए कभी हमारे पापों का वर्णन नहीं करेगा। क्योंकि हमारा उसके साथ मेल-मिलाप हो चुका है। उसने हमारे पापों को क्षमा कर दिया है और उन्हें भुलाने का निश्चय किया है।
हम भी वैसे ही क्षमा करने की अभिलाषा रख सकते हैं जैसे परमेश्वर क्षमा करता है, परन्तु हमारी मानवीय दुर्बलता इसमें बाधा बन जाती है। इसी कारण हमें परमेश्वर के अनुग्रह पर निर्भर रहना पड़ता है, ताकि हम उन जटिल परिस्थितियों में उसकी सहायता से आगे बढ़ सकें, जब हमें अपने विरुद्ध अपराध करने वालों को क्षमा करना होता है। एक महत्वपूर्ण सत्य जिसे हमें स्मरण रखना चाहिए, वह क्षमा, मेल-मिलाप और पुनर्स्थापन के बीच का अन्तर है।
क्षमा → मेल-मिलाप → पुनर्स्थापना
| क्षमा | मेल-मिलाप | पुनर्स्थापना |
| निर्णय | प्रक्रिया | परिणाम |
क्षमा करना एक निर्णय होता है, जिसमें हम उस व्यक्ति से सम्बन्धित ऋण समाप्त करने का निश्चय करते हैं जिसने हमारे विरुद्ध अपराध किया है। उस क्षण से हम यह ठान लेते हैं कि अब हम उनसे एक क्षमा किए हुए व्यक्ति के रूप में सम्बन्ध रखेंगे। पवित्रशास्त्र में क्षमा को दो स्तरों पर बताया गया है: मन सम्बन्धित तथा मेल-मिलाप सम्बन्धित।4
मन सम्बन्धित क्षमा (जिसे कभी-कभी ऊपर से नीचे की ओर वाली क्षमा भी कहा जाता है) उस दृष्टिकोण या मन के स्तर की क्षमा को दर्शाती है जिसमें हम लोगों को क्षमा कर देते हैं, चाहे उन्होंने मन फिराया हो या न फिराया हो। यीशु कहता है, “और जब कभी तुम खड़े हुए प्रार्थना करते हो, तो यदि तुम्हारे मन में किसी की ओर से कुछ विरोध हो, तो क्षमा करो: इसलिए कि तुम्हारा स्वर्गीय पिता भी तुम्हारे अपराध क्षमा करे” (मरकुस 11:25)। जैसे ही एक मसीही व्यक्ति अपने मन में क्षमा न करने की भावना का अनुभव करता है, तो वह उसका अंगीकार करता है और उस परिस्थिति को परमेश्वर के हाथों में सौंप देता है। सच्ची क्षमा इस बात में प्रकट होती है कि प्रतिशोध की भावना से स्वतंत्रता मिल जाती है और यह इच्छा बनी रहती है कि अपराधी का परमेश्वर के साथ सही सम्बन्ध बन जाए (रोमियों 12:17–21)।
ऐंबर का पिता एक दुष्ट व्यक्ति था। उसने वर्षों तक उस पर और उसकी माँ पर लगातार ताने कसे और उन्हें अपमानित किया। और अन्त में उसने परिवार को छोड़ दिया और किसी दूसरी प्रेमिका के साथ रहने लगा। उसने उनके दर्द का उपहास किया, यहाँ तक कि ऐंबर को एक कठोर पत्र लिखकर कहा, काश कि कभी उसका जन्म ही न हुआ होता। उसके शब्दों ने उसे बहुत अधिक दुःख पहुँचाया, फिर भी उसे पूरा विश्वास था कि परमेश्वर चाहता है कि वह उसे क्षमा कर दे। भय और अनिश्चितता उसे तब तक सताते रहे, जब तक कि एक मित्र ने उसकी यह समझने में सहायता नहीं की कि क्षमा का अर्थ भूल जाना नहीं होता है, और अपने पिता को क्षमा करने का निर्णय उसके और प्रभु के बीच अधिक है, न कि केवल उसके और उसके पिता के बीच। ऐंबर ने क्षमा करने की इच्छा से प्रार्थना करना आरम्भ कर दिया। धीरे-धीरे उसका हृदय नरम होता चला गया और उसने अपने पिता को हृदय से क्षमा करने के लिए प्रभु की बुलाहट के आगे समर्पण कर दिया। इस प्रकार क्षमा करना परमेश्वर के हृदय को दर्शाता है, जिसके विषय में कहा गया है, “…परन्तु तू क्षमा करनेवाला अनुग्रहकारी और दयालु, विलम्ब से कोप करनेवाला, और अति करुणामय परमेश्वर है…”(नहेम्याह 9:17)। हम भी सदैव परमेश्वर के समान क्षमा करने की इच्छा में बढ़ते रहें।
मेल-मिलाप वाली क्षमा (कभी-कभी इसे समान स्तर वाली क्षमा भी कहा जाता है) उस सम्बन्धपरक क्षमा को दर्शाती है, जिसमें पश्चाताप करने वाले अपराधी को क्षमा कर दिया जाता है और मेल-मिलाप की प्रक्रिया आरम्भ होती है। यीशु इसका उल्लेख लूका 17:3–4 में करता है, “सचेत रहो; यदि तेरा भाई अपराध करे तो उसे डाँट, और यदि पछताए तो उसे क्षमा कर। यदि दिन भर में वह सात बार तेरा अपराध करे और सातों बार तेरे पास फिर आकर कहे, कि मैं पछताता हूँ, तो उसे क्षमा कर।” इस परिस्थिति में, यीशु स्पष्ट रूप से कहता है कि “यदि वह पश्चाताप करे तो उसे क्षमा कर।” इस स्तर की क्षमा अपराधी के द्वारा अपने पाप का अंगीकार करने और पश्चाताप करने पर निर्भर करती है। जब पाप का अंगीकार किया जाता है, तब मन से की गई क्षमा आगे चलकर मेल-मिलाप करने वाली क्षमा में बदल जाती है।
मेल-मिलाप एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें हम उस व्यक्ति से फिर से सम्बन्ध बनाना सीखते हैं जिसे हमने क्षमा किया है, ताकि यदि सम्भव हो तो हम विश्वास को फिर से स्थापित कर सकें, घावों को भर सकें, तथा उसके साथ शान्तिपूर्ण सम्बन्ध स्थापित कर सकें। इस प्रक्रिया के लिए अपराधी के द्वारा पश्चाताप का प्रमाण होना आवश्यक है। सच्चे पश्चाताप को पहचानने और मेल-मिलाप की गति निर्धारित करने के लिए बुद्धि की आवश्यकता होती है।
सच्चा पश्चाताप। 2 कुरिन्थियों 7:10 हमें विश्वास दिलाता है, “क्योंकि परमेश्वर-भक्ति का शोक ऐसा पश्चाताप उत्पन्न करता है; जिसका परिणाम उद्धार है और फिर उससे पछताना नहीं पड़ता: परन्तु सांसारिक शोक मृत्यु उत्पन्न करता है।” भक्ति का शोक हमारे हृदयों को सच्चे पश्चाताप के लिए तैयार करता है। ऐसा पश्चाताप इस बात को समझने से आरम्भ होता है कि हमारा पाप परमेश्वर के विरुद्ध है (भजन संहिता 51:4) और इस बात से दुखी होकर कि हमने उसे दुःख पहुँचाया है। सांसारिक शोक झूठे पश्चाताप की ओर ले जाता है, जो स्वयं की दया पर केंद्रित होता है। झूठा पश्चाताप हानि को नियंत्रित करने, दोष को टालने और बहाने बनाने पर केंद्रित होता है। यह हमारे पाप को छोटा दिखाता है और तर्क देकर उसका बचाव करता है। परन्तु सच्चा पश्चाताप इस बात का शोक करता है कि हमने परमेश्वर के विरुद्ध पाप किया है और जिसे ठेस पहुँची है, वह उस व्यक्ति को चंगा करने के लिए, जो भी आवश्यक हो करने के लिए तैयार रहता है।
मेल-मिलाप की गति। मेल-मिलाप की गति बहुत ही कम या बहुत लम्बी हो सकती है, यह गति अपराध की गम्भीरता और परमेश्वर के द्वारा चंगाई प्रदान करने की गति पर निर्भर होती है। जिस प्रकार मेल-मिलाप एक प्रक्रिया है, उसी प्रकार प्रायः पश्चाताप भी एक प्रक्रिया है। हममें से अधिकतर लोग हज़ारों छोटे-छोटे कदम गलत दिशा में उठाकर अपनी ही उलझनों में फँस जाते हैं। पश्चाताप प्रायः सही दिशा में उठाए गए हज़ार छोटे-छोटे कदमों का परिणाम होता है। सच्चा पश्चाताप यह स्वीकार करता है कि उनके पाप के लिए धीमी गति से आगे बढ़ना आवश्यक हो सकता है। जब परमेश्वर हमें क्षमा करता है, तब भी वह हमें हमारे पापों के परिणामों से स्वतंत्र नहीं करता है मेल-मिलाप शीघ्रता से हड़बड़ी में नहीं किया जा सकता है, इसलिए सामान्यतः इसके लिए एक परिपक्व, प्रशिक्षित और निष्पक्ष व्यक्ति की आवश्यकता होती है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि बातचीत, प्रार्थना, विश्वासयोग्यता ये सब बातें सभी प्रकार की चालबाजी से स्वतंत्र रहे।
पुनः स्थापना क्षमा और मेल-मिलाप का परिणाम होता है। यह चंगाई की एक सम्बन्धपरक अवस्था होती है जिसमें दर्द अब प्रभावी नहीं होता है, चंगाई हो चुकी होती है और विश्वास दोबारा स्थापित हो जाता है। पाप के कारण टूटे हुए सभी सम्बन्धों को पुनः स्थापित नहीं किया जा सकता है। परन्तु बहुत से हो भी सकते हैं। सुसमाचार की सामर्थ्य मरे हुए पापियों को जीवन देने में योग्य है, और यह सबसे अधिक घायल सम्बन्धों को भी चंगा कर सकती है। पुनर्स्थापना के लिए प्रार्थना करें। पुनर्स्थापना के लिए परिश्रम करें। क्योंकि परमेश्वर इस कार्य से प्रसन्न होता है, इसलिए हियाव रखें और साहस न खोएँ। उस पर आशा रखें जो हमारी माँग या कल्पना से कहीं अधिक करने में योग्य है (इफिसियों 3:20)।
प्रश्न #2: यदि मुझे ऐसा अनुभव हो कि मैं अभी भी क्रोधित हूँ, तो क्या करूँ?
सच्चे मन से क्षमा करने के बाद भी, अशान्त भावनाएँ अचानक से भड़क सकती हैं। इससे हमें चकित नहीं होना चाहिए। हम रोबोट नहीं हैं जो निर्दयता का जीवन जीते हैं। हम देहधारी परमेश्वर के स्वरूप को लेकर चलते हैं, जिनमें वास्तविक भावनाएँ, अस्थिर इच्छाएँ, बना रहने वाला पाप, और निरन्तर परिवर्तन होने वाली परिस्थितियाँ सम्मिलित होती हैं। सम्भवतः ठेस पहुँचाए जाने की कोई स्मृति अचानक आपके मन में आ जाए, या फिर पुराने तरीके फिर से सिर उठाते हुए दिखाई देने लगें — और आप अपने हृदय में क्रोध को धीरे-धीरे उबलता हुआ होने का अनुभव करें। आप आश्चर्यचकित हो सकते हैं कि, “क्या मैंने उन्हें क्षमा नहीं किया था?” क्षमा करना एक निर्णय है, परन्तु उसके बाद आने वाली चंगाई में समय लगता है। प्रार्थना करते रहें। जो लोग सुसमाचार के लिए तत्पर रहते हैं उनके साथ निकट संगति में बनें रहें, ताकि वे आपको अतीत के घावों और वर्तमान के संघर्षों दोनों को समझने में सहायता कर सकें।
प्रश्न #3: यदि क्षमा करना जोखिम भरा हो तो क्या करें?
क्षमा करना कठिन होता है। क्योंकि इसमें अधिकतर असुविधाजनक, पीड़ादायक या थका देने वाली भावनाएँ सम्मिलित होती हैं। पर कठिनाई और संकट में अन्तर होता है। हमने यह स्वीकार किया है कि कुछ सम्बन्ध पाप के घावों से इतने क्षतिग्रस्त हो चुके हैं कि वहाँ क्षमा आवश्यक है, परन्तु मेल-मिलाप न तो उचित है और न ही सम्भव है (“यदि सम्भव हो, तो रोमियों 12:18 से तुलना करें”)। शारीरिक शोषण, यौन शोषण, या गहरी भावनात्मक छेड़छाड़ की घटना किसी व्यक्ति को इतना घायल कर सकती है कि इस संसार में चंगाई प्राप्त करना असम्भव सा लगता है।
यदि आपके साथ इस प्रकार से अपराध किया गया है कि क्षमा करने से मेल-मिलाप की ओर बढ़ना जोखिम भरा हो सकता है, तो इन सत्यों को स्मरण रखें:
चंगाई सम्भव है। जो कुछ आपने अनुभव किया है, वह आपकी पहचान को परिभाषित नहीं करता है। मसीह में चंगाई की भरपूर आशा है। परमेश्वर कुछ भी व्यर्थ नहीं जाने देता, और जो आपके साथ हुआ है उसका उपयोग वह उसके प्रति आपके भरोसे को और दृढ़ करने तथा दूसरों के लिए सहायता का स्रोत बनने के लिए करेगा (2 कुरिन्थियों 1:3–11)।
अपने आस-पास सुसमाचार के मित्रों से सम्बन्ध बना कर रखें। जैसा कि हमने कहा है कि, क्षमा के मार्ग पर अकेले नहीं चलना चाहिए। यदि आपको बहुत अधिक ठेस पहुँची है, तो आपको एक सुसमाचार-केन्द्रित कलीसिया और प्रशिक्षित सुसमाचार आधारित विश्वासियों की संगति की आवश्यकता है, जो आपको आपके द्वारा सहन किए गए कष्टकारी अनुभवों से उबरने में सहायता कर सकते हैं।
अपने मेल-मिलाप न करने के कारणों की जाँच करें। ठेस पहुँचने का अर्थ यह नहीं है कि हम विश्वास के कार्यों को चुनौती देने से बच जाएँ। उन्होंने जो कुछ भी आपके साथ किया वह वास्तव में इतना भयानक हो सकता है कि आप दोबारा शारीरिक और भावनात्मक ठेस पहुँचे और आप उनके आसपास रह भी न सकें। हो सकता है कि वे पश्चातापी न हों, इसलिए स्पष्ट रूप से आप मेल-मिलाप करने की आवश्यकता से स्वतंत्र हैं। परमेश्वर आपसे यह नहीं चाहता कि आप कुटिल लोगों पर भरोसा करके स्वयं को जोखिम में डालो। फिर भी, वह आपसे जो कुछ भी करने के लिए कहता है, उसे करने के लिए तैयार रहें। अपने मन की स्थिति को प्रभु के सामने और सुसमाचार मित्रों के साथ जाँचें, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि मेल-मिलाप के प्रति कोई भी विरोध विश्वास से हो, न कि पापपूर्ण भय से हो।
अपने आप को परमेश्वर के हाथों में सौंप दें। प्रभु आपकी निर्बलताओं को जानता है (भजन संहिता 103:14)। जब आप उस चंगाई के मार्ग पर चलते हो जिस पर वह आपको ले जाना चाहता है, तो वह आपके साथ धैर्य रखेगा। प्रार्थना में उसकी खोज करो। जब आपको डर लगे, तो उस पर अपना भरोसा रखो (भजन संहिता 56:3)। प्रभु आपकी निर्बलताओं को जानता है और उसने आपके लिए अनुग्रह से भरे भण्डार रखे हुए हैं (भजन संहिता 31:19; 2 कुरिन्थियों 12:9)। इब्रानियों का लेखक कहता है, “इसलिए, जब हमारा ऐसा बड़ा महायाजक है, जो स्वर्गों से होकर गया है, अर्थात् परमेश्वर का पुत्र यीशु; तो आओ, हम अपने अंगीकार को दृढ़ता से थामे रहें।क्योंकि हमारा ऐसा महायाजक नहीं, जो हमारी निर्बलताओं में हमारे साथ दुःखी न हो सके; वरन् वह सब बातों में हमारे समान परखा तो गया, तो भी निष्पाप निकला।इसलिए आओ, हम अनुग्रह के सिंहासन के निकट साहस बाँधकर चलें, कि हम पर दया हो, और वह अनुग्रह पाएँ, जो आवश्यकता के समय हमारी सहायता करे” (इब्रानियों 4:14)। अतः यीशु के निकट आओ, उसका अनुग्रह और दया आपकी सहायता करेगी।
यदि आपने किसी के विरुद्ध ऐसा अपराध किया है जो मेल-मिलाप में बाधा डालता है, तो इन सच्चाइयों को स्मरण रखो:
आपको पश्चाताप करना चाहिए। जो कुछ आपने किया है उसके लिए आपको उत्तरदायी ठहराया जाएगा। क्योंकि अन्तिम दिन में कोई भी पाप अनदेखा नहीं किया जाएगा। पश्चाताप करने के लिए परमेश्वर के बुलावे पर ध्यान दें (प्रेरितों के काम 17:30)। अपने पाप को पूरी सच्चाई के साथ परमेश्वर के सामने स्वीकार करो (भजन संहिता 51; 1 यूहन्ना 1:9)। अपने पाप से पूरी रीति से पश्चाताप करो। शोक व्यक्त करो और जिन लोगों को आपने ठेस पहुँचाई है उनसे क्षमा माँगो। यदि आपने किसी के विरुद्ध ऐसा अपराध किया है जिसे अपमानजनक या जोखिम भरा माना जा सकता है, तो उनसे सम्पर्क करने से पहले आपको किसी प्रशिक्षित विशेषज्ञ से सलाह लेनी चाहिए ताकि वह इस प्रक्रिया में आपकी सहायता कर सके। यदि आपके कार्य अवैध थे तो पश्चाताप करने में अधिकारियों को सम्मिलित किया जा सकता है। पश्चाताप में वर्षों के परामर्श की लागत चुकाना भी सम्मिलित हो सकता है (लूका 19:8)। सच्चा पश्चाताप इसी में प्रकट होगा कि धार्मिकता के मार्ग पर चलने के लिए जो कुछ भी करना पड़े, वह किया जाना चाहिए। मत डर; परमेश्वर तेरे साथ होगा (इब्रानियों 13:5b–6)।
परमेश्वर की ओर से क्षमा बहुतायत से दी गई है। यदि आपने परमेश्वर के सामने अपने पापों का अंगीकार कर लिया है और सच्चे मन से पश्चाताप किया है, तो आपके लिए बहुत बड़ी आशा है। जहाँ पाप बहुत अधिक बढ़ता है, वहाँ अनुग्रह उससे भी अधिक होता है (रोमियों 5:20)। परमेश्वर कुकर्मी से कुकर्मी पापियों को भी क्षमा करता है ताकि उसकी दया आप में और आपके द्वारा प्रकट हो सके (1 तीमुथियुस 1:15–16)। जिन्हें परमेश्वर ने क्षमा किया है, वे उसके सामने धर्मी ठहरते हैं। आपने जो कुछ भी किया हो, तौभी वह आप से प्रसन्न होता है। यही सुसमाचार की सुन्दरता है।
अपनी इच्छाएँ परमेश्वर को सौंप दो। परमेश्वर हमारे पापों का दण्ड तो हटा देता है, परन्तु उनके परिणामों को नहीं हटाता है। कुछ पाप आपके जीवन और आपके सम्बन्धों को हमेशा के लिए बदल देंगे। आपने जो कुछ भी किया है उस बोझ का आप अनुभव कर सकते हैं और आपके भीतर मेल-मिलाप की इच्छा भी तीव्र हो सकती है। अपनी भली इच्छाओं को परमेश्वर को सौंप दीजिए। और किसी निष्पक्ष और विश्वासयोग्य मध्यस्थ के द्वारा ही सम्पर्क आरम्भ करें। प्रभु पर भरोसा रखें। आगे बातचीत करने की इच्छा सम्भव हो भी सकती है, और नहीं भी। न्याय के दिन, आपको आपके कर्मों के लिए उत्तरदायी ठहराया जाएगा, न कि दूसरों की प्रतिक्रिया के लिए।
प्रश्न #4: यदि वे मेरी क्षमा नहीं चाहते तो क्या करूँ?
कुछ लोग यह कभी नहीं समझेंगे कि उन्हें क्षमा की आवश्यकता है। वे अपने पापों के करण अन्धे हो सकते हैं और परमेश्वर पर दृढ़ विश्वास करने के प्रति कठोर हो सकते हैं। हम किसी को यह अनुभव नहीं करा सकते कि उसे क्षमा की आवश्यकता है; केवल परमेश्वर ही ऐसा कर सकता है। ऐसे सन्दर्भ में, हम उन्हें हृदय से क्षमा करने के लिए उत्तरदायी हैं (मनोदशा वाली क्षमा और आन्तरिक क्षमा में तुलना करें)। यीशु ने हमें नमूना दिया है कि हमें उसका अनुसरण कैसे करना चाहिए, जब उसने क्रूस पर से प्रार्थना की, “इन्हें क्षमा कर, क्योंकि वे नहीं जानते कि वे क्या कर रहे हैं” (लूका 23:34)। उसने उन्हें क्षमा करने के लिए प्रार्थना की, जबकि उन्हें इसकी आवश्यकता नहीं थी। यीशु ने हमें भी यही निर्देश दिया जब उसने कहा कि, “अपने शत्रुओं से प्रेम रखो; जो तुम से बैर करें, उनका भला करो। परन्तु मैं तुम सुनने वालों से कहता हूँ, कि अपने शत्रुओं से प्रेम रखो; जो तुम से बैर करें, उनका भला करो। जो तुम्हें श्राप दें, उनको आशीष दो; जो तुम्हारा अपमान करें, उनके लिये प्रार्थना करो” (लूका 6:27-28)। हमारे शत्रुओं को नहीं लगता कि उन्हें हमारी क्षमा की आवश्यकता है। हम इस पर नियंत्रण तो नहीं कर सकते हैं, परन्तु हमें उन्हें आशीष देकर मसीह का अद्भुत प्रेम दिखाना चाहिए, भले ही वे हमें श्राप दें।
प्रश्न #5: यदि वे मुझे फिर से ठेस पहुँचाएँ तो क्या करूँ?
मोरिय्याह ने जेफ को क्षमा करने के लिए कठिन परिश्रम किया था। वह अश्लील पिक्चर देखते हुए पकड़ा गया था, और इस कारण उनके हाल ही में हुए विवाह में बड़ी समस्याएँ उत्पन्न हो गई थी। जेफ ने अपने पाप को स्वीकार किया और प्रभु तथा अपनी पत्नी का सम्मान करने में अत्यधिक प्रगति की। जब तक वह शहर से बाहर थी, और जब तक उसने फिर से समझौता नहीं कर लिया। एक क्षण के लिए उसे लगा जैसे वर्ष भर का परिश्रम व्यर्थ हो गया है। जेफ ने अपने पास्टर और अपनी पत्नी के सामने अपने पाप का अंगीकार किया, और उसने अपनी पत्नी से एक बार फिर से क्षमा करने के लिए विनती की। मोरिय्याह को धार्मिकता और पाप के प्रति क्रोध का मिले-जुले प्रभाव का अत्यधिक अनुभव हुआ। उसने कभी उम्मीद नहीं की थी कि वह यहाँ दोबारा आएगी, इसलिए अपने पति के प्रति उसका मन टूट गया।
क्या मोरिय्याह को जेफ को फिर से क्षमा करना चाहिए? हाँ करना चाहिए। भले ही जेफ का पाप गम्भीर था, परन्तु यीशु के शब्द भी गम्भीर थे, “”सचेत रहो; यदि तेरा भाई अपराध करे तो उसे डाँट, और यदि पछताए तो उसे क्षमा कर। यदि दिन भर में वह सात बार तेरा अपराध करे और सातों बार तेरे पास फिर आकर कहे, कि मैं पछताता हूँ, तो उसे क्षमा कर” (लूका 17:3-4) क्षमा असीमित होनी चाहिए। जेफ को पूरे पश्चाताप के साथ जीने के लिए गम्भीर कदम उठाने होंगे और मोरिय्याह के साथ मेल-मिलाप करने की प्रक्रिया में और भी अधिक प्रयास करना होगा। परन्तु परमेश्वर का अनुग्रह उन दोनों की आवश्यकताओं के लिए बहुत है। एक समय ऐसा भी आ सकता है कि जब पाप का स्वरूप, चाहे अश्लील सामग्री हो या कुछ और हो, इतना हानिकारक हो जाए कि सम्बन्धों में विश्वास को ठेस पहुँचे और किसी के विश्वास की प्रामाणिकता पर प्रश्न उठने लगे। ऐसी घटनाओं में प्रत्येक स्थिति के लिए भक्तिपूर्ण पास्टर और सम्भवतः बाहरी सलाहकारों के द्वारा बुद्धिमानी के साथ अगुवाई की आवश्यकता होगी।5
प्रश्न #6: यदि उनकी मृत्यु हो चुकी है तो क्या मैं तब भी उन्हें क्षमा कर सकता हूँ?
सारा अपनी बहन की कब्र के पास खड़ी थी। ऐश्ली की कब्र के पत्थर का सन्नाटा उसे उनके आपसी सम्बन्धों की कड़वाहट का स्मरण करा रहा था। उसकी बहन बहुत निर्दयी और कठोर स्वभाव की थी। उसके शब्दों ने सारा की आत्मा पर घाव कर दिया था, और उस असाध्य घाव को पाप ने संक्रमित कर दिया था। सारा का विनाशकारी मार्ग ऐश्ली की गलती नहीं थी, परन्तु यह निस्संदेह उससे जुड़ा हुआ था। ऐश्ली की दुर्घटनावश मृत्यु ने सारा को अपने दुखों को व्यक्त करने का एक और अवसर दिया, इस उम्मीद में कि ऐश्ली कहेगी कि, “मुझे क्षमा कर दो।” परन्तु अब बहुत देर हो चुकी थी। क्या ऐसा ही हुआ था?
मृत्यु हमसे बहुत कुछ छीन लेती है, परन्तु मृत्यु हमें क्षमा करने के उत्तरदायित्व और अवसर से वंचित नहीं कर सकती है। क्षमा करना एक निर्णय है, जिसमें हम किसी व्यक्ति से सम्बन्धित ऋण को समाप्त कर देते हैं। अंततः, क्षमा करना एक ऐसा निर्णय है जिसे करने के लिए परमेश्वर हमें सामर्थ्य देता है, और ऐसा करके हम उसकी आज्ञा का पालन करते हैं। मृत्यु सारा को अपनी दिवंगत बहन को क्षमा करने से नहीं रोकती। इसलिए सारा अपनी बहन की आत्मा को सच्चे न्यायी के हाथों में सौंप सकती है (1 पतरस 2:23-24)।
यदि आपको भी किसी ऐसे व्यक्ति के द्वारा ठेस पहुँची है जो मर चुका है या जिसे आप कभी नहीं ढूँढ पाएँगे, तौभी आप उसे क्षमा कर सकते हैं। भावनात्मक रूप से क्षमा करना सम्भव है क्योंकि आप हृदय से क्षमा कर रहे हैं। प्रभु से प्रार्थना कीजिए और उन सब बातों पर मनन कीजिए जिन्हें आप उस व्यक्ति से कहना चाहते थे। इन सब बातों को लिखने पर विचार करें। क्योंकि किसी विश्वासयोग्य सुसमाचार-प्रेमी मित्र या सलाहकार से आपको अपनी भावनाओं को समझने में सहायता मिल सकती है। यदि आपको उस व्यक्ति की कब्र पर जाकर ऊँची आवाज में कहने से लाभ मिलता है, तो ठीक है। परन्तु अंततः, अपना दुःख प्रभु के पास ले आइए। जब आप उनके पहले से ठहराए गए स्थान के विषय में विचार करें, तो अब्राहम के इन वचनों पर भरोसा रखें, “क्या सारी पृथ्वी का न्यायी न्याय न करे” (उत्पत्ति 18:25)। परमेश्वर वही करेगा जो सही है। उस पर भरोसा रखें।
चर्चा एवं मनन:
- क्या आपके जीवन में भी कुछ ऐसी परिस्थितियाँ हैं जिनका समाधान ये प्रश्न करते हैं? इस खण्ड ने आपकी कैसे सहायता की है?
- आप क्षमा, मेल-मिलाप और पुनर्स्थापना के बीच के अन्तर को संक्षेप में कैसे प्रस्तुत करेंगे?
- उपरोक्त प्रश्नों में से कौन सा प्रश्न क्षमा के विषय में आपकी समझ को सबसे अधिक चुनौती देता है?
निष्कर्ष
जैसा कि हमने अनुभव किया है, एक न एक दिन बहुत शीघ्र ही अस्तित्व समाप्त हो जाएगा। प्रभु यीशु वापस पृथ्वी पर आएगा और जिसे हम मानव इतिहास के रूप में जानते हैं उसे समाप्त कर देगा। उस दिन, वह विजयी होकर सभी लोगों को कब्र से बाहर निकालेगा और न्याय के लिए अपने महान श्वेत सिंहासन के सामने इकट्ठा करेगा (मत्ती 12:36-37; 2 कुरिन्थियों 5:10; प्रकाशितवाक्य 20:11-15)।
उस दिन क्षमा से अधिक बहुमूल्य कुछ भी नहीं होगा। इसलिए अपनी स्वयं की धार्मिकता में न बनें रहे, जैसे कि असंख्य लोग रहे हैं और उन्हें उनके पापों के लिए दोषी ठहराया जाएगा। परन्तु क्षमा पाए हुए लोग, उस धार्मिकता के वस्त्र पहने हुए होंगे जो मसीह के लहू से खरीदे गए हैं और परमेश्वर के अनुग्रह से दिए गए हैं। ताकि आप क्षमा किए हुओं में गिने जाओ, जिनके नाम मेम्ने की जीवन की पुस्तक में लिखे गए हैं। और उनका स्वागत इन वचनों के साथ किया गाएगा, “धन्य हे अच्छे और विश्वासयोग्य दास… अपने स्वामी के आनन्द में सहभागी हो” (मत्ती 25:23)। परमेश्वर स्वयं आनन्द के साथ हमारे लिए गाता है (सपन्याह 3:17) और हम उसका उत्तर सदा धन्यवाद के गीतों से दें (भजन 79:13)। हमारे गीत परमेश्वर की अनेक दया से प्रेरित होंगे। इन सबके केंद्र में मसीह यीशु में हमें दी गई उसकी अथाह, अपार एवं दया से परिपूर्ण क्षमा सम्मिलित होगी।
हमने इस अध्ययन का आरम्भ उन पूर्व शत्रुओं की मेज़ से किया था, जो यीशु मसीह के सुसमाचार के द्वारा क्षमा पाने के कारण मित्र बन गए थे। हम इसका निष्कर्ष आनेवाली महिमा के उस चित्रण के साथ करते हैं, जिसमें एक और मेज़ केंद्र में होगी। इस भोज का आयोजन सिय्योन नामक पर्वत की चोटी पर किया जाएगा। उस स्थान पर जो मेज़ होगी उस पर मेम्ने के विवाह का भोज होगा, जहाँ क्षमा किए गए लोग स्वादिष्ट भोजन का आनन्द उठाएँगे और सही रीति से निथरा हुआ दाखरस पीएँगे (प्रकाशितवाक्य 19:9; यशायाह 25:6)। वहाँ, मेल-मिलाप किए हुए शत्रु और क्षमा किए गए विरोधी साथ-साथ बैठेंगे। हम सब मिलकर धन्यवाद के साथ पुकारेंगे, “देखो, हमारा परमेश्वर यही है; हम इसी की बाट जोहते आए हैं, कि वह हमारा उद्धार करे। यहोवा यही है; हम उसकी बाट जोहते आए हैं। हम उससे उद्धार पाकर मगन और आनन्दित होंगे” (यशायाह 25:9) हे प्रभु, वह दिन शीघ्र आए।
इस क्षेत्रीय मार्गदर्शिका को पढ़ते हुए, उस दिन के विषय में विचार करें। महिमा की आशा और मसीह को देखने की निश्चितता आपको क्षमा करने के लिए प्रेरित करें। उस दिन को ध्यान में रखते हुए आज ही उन्हें क्षमा करें जिन्होंने आपको कष्ट पहुँचाया है, भले ही उन्हें क्षमा करना अत्यंत कठिन हो सकता है, फिर भी क्षमा करें। क्षमा करने के लिए नम्रता की आवश्यकता होती है। इसके लिए परमेश्वर की सहायता चाहिए। परन्तु मैं आपको यह आश्वासन देता हूँ: यदि आप यीशु का आदर क्षमा करने के द्वारा करते हैं, तो उस अन्तिम दिन आपको इसका कोई पछतावा नहीं होगा। इसलिए आज ही ऐसे निर्णय लें, जिनके लिए आप दस हज़ार वर्ष बाद भी, जब आप परमेश्वर के सामने खड़े होंगे तो, धन्यवाद देंगे। जब आप परमेश्वर को आमने-सामने देखेंगे, तब आपको उन्हें क्षमा करने का कोई पछतावा नहीं होगा जिन्होंने इस जीवन में आपको दुःख दर्द दिया है। किसी न किसी रूप में, अनन्त जीवन का आपका आनन्द इस जीवन में आज्ञाकारिता से ही प्राप्त होगा (प्रकाशितवाक्य 19:8)। इसलिए क्षमा करें। शान्ति का पीछा करें। मेल-मिलाप के लिए प्रयत्न करते रहें। और दया करें।
परमेश्वर के पवित्र लोगों साहस रखो, हम लगभग घर पहुँच चुके हैं।
आगे के अध्ययन के लिए
टिम केलर, क्षमा: मुझे क्षमा क्यों और कैसे करना है?
डेविड पॉविलसन, अच्छा एवं क्रोधित
ब्रैड हैम्ब्रिक, क्षमा का अर्थ समझना: दुःख से आशा की ओर बढ़ना
हेले सैट्रोम, क्षमा: परमेश्वर की दया को दर्शाती है (जीवन के लिए 31-दिवसीय भक्ति श्रृंखला)
“क्रिस ब्रॉन्स, क्षमा के भेद खोलना: कठिन प्रश्नों और गहरे घावों के लिए बाइबल आधारित उत्तर”
स्टीव कॉर्नेल, “क्षमा से मेल-मिलाप की ओर कैसे बढ़ें,” टी जी सी लेख, मार्च 2012
“केन सैंडे, शान्ति देने वाला: व्यक्तिगत विवादों के समाधान के लिए बाइबल आधारित मार्गदर्शिका”
अन्तिम टीका-टिप्पणी
- “एंड्रिया थॉम, ‘बाइबल आधारित क्षमा का क्या अर्थ है?’” टी जी सी कनाडा, 23 सितम्बर 2020”
- “मैथ्यू मार्टेन्स, आपराधिक न्याय में सुधार: एक मसीही प्रस्ताव”
(व्हीटन, आईएल: क्रॉसवे, 2023), 158। - वह मुझे दृढ़ता से थामे रहेगा, ये पंक्तियाँ मैट मर्कर के द्वारा 2013 में लिखी गयी थीं।
- ये विचार डी. ए. कार्सन की पुस्तक लव इन हार्ड प्लेसेस से लिए गए हैं, जिसे टिम केलर की पुस्तक फॉरगिव में उद्धृत किया गया है: मुझे क्यों और कैसे करना, 82, और डेविड पॉवलिसन, अच्छा और क्रोधित: क्रोध, चिड़चिड़ापन, शिकायत और कड़वाहट से छुटकारा, 84–87.
- अश्लील सामग्री एवं कलीसिया का अनुशासन, डिज़ायरिंग गॉड, 30 अप्रैल, 2022 पर विचार करें।
विषयसूची
- 1 क्या और क्यों?
- क्षमा क्या है?
- हमें क्षमा क्यों करना चाहिए?
- चर्चा एवं मनन:
- 2 कौन और कैसे?
- क्षमा करने में पहल आपको करनी चाहिए।
- अत्यधिक धैर्य रखते हुए क्षमा करें।
- यीशु की ओर देखकर और उस पर निर्भर रहकर क्षमा करें।
- अन्य विश्वासियों की सहायता से क्षमा करें।
- परमेश्वर की प्रभुता सम्पन्न भलाई पर भरोसा रखकर क्षमा करें।
- चर्चा एवं मनन:
- 3 स्थायी क्षमा
- प्रश्न #1: क्या मुझे क्षमा करना चाहिए और भूल जाना चाहिए?
- क्षमा → मेल-मिलाप → पुनर्स्थापना
- प्रश्न #2: यदि मुझे ऐसा अनुभव हो कि मैं अभी भी क्रोधित हूँ, तो क्या करूँ?
- प्रश्न #3: यदि क्षमा करना जोखिम भरा हो तो क्या करें?
- प्रश्न #4: यदि वे मेरी क्षमा नहीं चाहते तो क्या करूँ?
- प्रश्न #5: यदि वे मुझे फिर से ठेस पहुँचाएँ तो क्या करूँ?
- प्रश्न #6: यदि उनकी मृत्यु हो चुकी है तो क्या मैं तब भी उन्हें क्षमा कर सकता हूँ?
- चर्चा एवं मनन: