#44 एक अगुवे की वास्तविक उत्तर दिशा
परिचय
क्या आप जानते हैं कि वर्तमान में, ठीक इस समय, अमेज़न पर विक्रय के लिये 57,000 पुस्तकें हैं, जिनके शीर्षक में शब्द “अगुवाई” आता है? यह तथ्य कि इतनी सारी पुस्तकें हैं, कम से कम दो बातों को रेखांकित करता है: 1. लोगों को अगुवाई करने में सहायता की आवश्यकता है, और 2. और अगुवाई किस प्रकार से करनी है, इस पर अनेकों भिन्न विचार हैं। यदि आप से कभी किसी बात में अगुवाई करने के लिये कहा गया है, तो सम्भवतः आप समझ सकते हैं कि सहायता उपलब्ध होने के लिए इतनी इच्छा क्यों रहती है। आखिरकार, एक अगुवा होना सहज नहीं है! और फिर भी 57,000 पुस्तकें?! यदि आप को लगता है कि अगुवाई करना कठिन कार्य है, तो अमेज़न पर उपलब्ध पुस्तकों में से प्रत्येक को पढ़ने और फिर यह निर्णय करने के बारे में सोचिये, कि उन में से कौन सी अच्छी है, और कौन सी जलाए जाने वाले ढेर में डाले जाने के योग्य हैं!
तो, अगुवाई के बारे में बहुत से लोग बात कर रहे हैं, परन्तु चुनाव तो आप को ही करना है . . . कि अच्छी अगुवाई करने का परामर्श प्राप्त करने के लिये आप किस के पास जाएँगे? संभव है कि आप का पहला उत्तर हो, “मैं यह क्षेत्रीय मार्गदर्शिका पढ़ तो रहा हूँ, है कि नहीं? टेलर, मैं सहायता के लिये तुम्हारे पास आया तो हूँ।” अरे। आप को सीधे से यह आभास होना चाहिये कि अपने जीवन में मैंने कुछ बातों में अगुवाई की तो है। कभी तो यह अच्छा रहा। अन्य समयों पर, देखिये. . .उतना अच्छा भी नहीं था।
जब मैं अपनी पिछली असफलताओं के बारे में सोचता हूँ, तो मेरे विचार से यह कहना उचित होगा कि हर बार, असफलता या तो मेरे द्वारा उस तरह से परमेश्वर का भय न रखने के कारण थी जैसा मुझे रखना चाहिये था, या फिर उसकी बुद्धिमानी के लिये उस पर निर्भर नहीं रहने के कारण थी। परमेश्वर का भय नहीं रखना, अन्य कई प्रकार के भय के लिये रास्ते खोल देता है, जैसे कि औरों का भय, असफलता का भय, या ज़िम्मेदारी का भय। परमेश्वर का भय न रखना पाप करने की अनुमति मिल जाने का भी कार्य करता है। आखिरकार, यदि अगुवाई करने वालों में परमेश्वर को अपना हिसाब देने का भय नहीं होगा, तो उन्हें अपने अधिकार को अपनी ही लालसाओं के लिये प्रयोग करने से क्या रोकेगा? इसी प्रकार से, यदि अगुवाई करने वाले परमेश्वर की बुद्धिमानी पर निर्भर नहीं रहेंगे, तो वे फिर अपनी बुद्धिमानी का प्रयोग करेंगे। परमेश्वर की दृष्टि में सांसारिक बुद्धिमानी क्या है? “मूर्खता” (1 कुरिन्थियों 3:19)।
धन्यवाद करना चाहिये कि बाइबल में एक केन्द्रीय पात्र है जिसका उदाहरण, आज हमारे लिये अगुवाई करने के अनेकों सिद्धान्त प्रदान करता है—इतने कि इस मार्गदर्शिका में सभी पर चर्चा करने का समय नहीं है! जिस व्यक्ति के बारे में मैं बात कर रहा हूँ, वह, मूसा है। यदि आप अपनी बाइबल से ज़रा भी परिचित हैं, तो आप मूसा को जानते होंगे। चाहे आपने बाइबल को ठीक से पढ़ा नहीं है, परन्तु बहुत संभव है कि आप ने कम से कम उसके बारे में सुना तो अवश्य होगा! जो भी हो, मेरा सुझाव है कि आप मूसा की कहानी से परिचित होने के लिये कुछ समय अवश्य बिताएँ। आप अगले 4-5 सप्ताहों में, अपने मार्गदर्शक/मार्गदर्शिका के साथ निर्गमन और व्यवस्थाविवरण की पुस्तकों को पढ़ने के बारे में भी विचार कीजिये।
निर्गमन 2 से आरम्भ कीजिये और पूरी पुस्तक को पढ़िये। आप, निर्गमन 20-30 में, सीनै पर्वत पर दिये गए कुछ नियमों को पाएँगे, परन्तु पढ़ते रहिये। कहानी निर्गमन 31 में रोचक हो जाती है, विशेषकर 32 में, जहाँ सोने के बछड़े की, और उसके बाद उन परमेश्वर के पापी लोगों के लिये मूसा द्वारा मध्यस्थता करने की घटना दी हुई है। उसके बाद लैव्यव्यवस्था और गिनती की पुस्तकों में व्यवस्था और मूसा द्वारा इस्राएल की अगुवाई करने से सम्बन्धित विस्तृत वर्णन दिया गया है—अर्थात्, इस्राएल का पहली बार वाचा किये हुए देश के पास पहुँचना और उसके बाद उन्हें जंगल में निष्कासित कर दिये जाने का। इन दोनों पुस्तकों का संक्षिप्त विवरण पढ़ने के लिये, व्यवस्थाविवरण की पुस्तक को देखिये। वहाँ पर आप को इस्राएल की कहानी का मूसा लिखित वर्णन मिलेगा। व्यवस्थविवरण का अन्त, अध्याय 34 में, नबो पर्वत पर मूसा की मृत्यु के साथ होता है।
जैसा कि प्रत्येक अगुवे के जीवन में होता है, मूसा के जीवन में भी उतार और चढ़ाव थे, और हम दोनों से सीखने का प्रयास करेंगे कि उसने क्या सही किया, और क्या गलत किया। परन्तु, अधिकांशतः, मूसा हमारे लिये एक अच्छा अगुवा होने का उदाहरण है। यद्यपि हम से किसी को भी फिरौन के समान किसी बड़े राजा को नीचे लाने या समुद्र के मध्य में से होकर सूखी भूमि पर से लोगों को पार लेकर जाने का कार्य नहीं सौंपा जाएगा, परन्तु अगुवाई करने के उन्हीं सिद्धान्तों को हम अपने जीवनों पर भी लागू कर सकते हैं। मूसा का उदाहरण हमारी, बेहतर जीवन साथी, माता-पिता, अधिकारी, सेवक, और मित्र बनने में सहायता कर सकता है। सबसे अधिक महत्वपूर्ण यह है कि मूसा के साथ बिताया गया समय, हमें और भी अधिक विश्वासयोग्यता के साथ यीशु का अनुसरण करने में सहायता कर सकता है। हम चाहे और कुछ हासिल न भी करें, तौभी मेरी प्रार्थना है कि यह मार्गदर्शिका आप के लिये कम से कम इतना तो अवश्य करे।
ऑडियो मार्गदर्शिका
ऑडियो#44 एक अगुवे की वास्तविक उत्तर दिशा
भाग I: अच्छी अगुवाई क्या नहीं है
क्या आप को याद है कि जब आप स्कूल में थे और आप को कहानी को बनाने के बारे में सीखना पड़ा था? यदि हाँ, तो आप को याद होगा कि किसी भी कहानी को पूरा करने के लिये पाँच आधारभूत भाग होते हैं: प्रकट करना (जहाँ पर कथानक स्थापित किया जाता है), विकसित होता हुआ घटनाक्रम (जहाँ पर समस्या से अवगत करवाया जाता है), चरम (जहाँ पर समस्या अपने उत्कर्ष पर होती है), घटता हुआ घटनाक्रम (जहाँ संघर्ष का समाधान आरम्भ होने लगता है), और समाधान (जहाँ पर संघर्ष का अन्त होता है)। देखिये, निर्गमन के आरम्भिक अध्याय, इस्राएल, मिस्र, और इब्रियों में जन्मे, तथा मिस्र में परवरिश पाए हुए मूसा नामक एक चरवाहे की कहानी का प्रकट किया जाना हैं।
जब हमारी कहानी का आरम्भ होता है, तब उस समय, इस्राएल, कनान देश के लोग, मिस्र में चार सौ वर्ष से रह रहे थे। उसमें से अधिकाँश समय में मिस्री इस्राएलियों के पक्ष में ही रहे थे। वास्तव में निर्गमन का आरम्भ हमें यह बताने के साथ होता है कि “इस्राएल की सन्तान फूलने-फलने लगी; और वे लोग अत्यन्त सामर्थी बनते चले गए; और इतना अधिक बढ़ गए कि सारा देश उन से भर गया।” आप कह सकते हैं कि, इस्राएल के लिये, मिस्र में जीवन बहुत अच्छे से व्यतीत हो रहा था। परन्तु समस्या आने ही वाली थी।
एक नया मिस्री राजा घटनाक्रम में आ गया, और उसे इस्राएल, तथा मिस्र के साथ चले आ रहे उन के मित्रता के सम्बन्धों में कोई रुचि नहीं थी (निर्गमन 2:8)। सीधी सी बात यह थी कि फिरौन ने इस्राएल को एक खतरा समझा—एक ऐसा खतरा, जिसे अनियन्त्रित नहीं छोड़ा जा सकता था। फिरौन ने इस्राएलियों से मिस्र के दास बन जाने के लिये कहा, जिससे उन पर “भारी बोझ” डालकर उन्हें दुःख दिया जाए। परन्तु फिरौन को यह देख कर बहुत निराशा हुई कि वह इस्राएल को जितना अधिक सताता था, वे उतने ही अधिक बढ़ते और फैलते चले जाते थे (निर्गमन 2:11)।
मिस्र इस्राएल से ऐसे डरने लगा, मानो वह एक बीमारी हो, जिससे मृत्यु का भय उत्पन्न करने वाली लम्बे काल की बीमारी हो जाएगी। फिरौन ने निर्णय लिया कि इस्राएल की बढ़ोतरी को रोकने के लिये, कुछ और अधिक करना पड़ेगा। इसलिये, उसने योजना बनाई कि इस्राएलियों के प्रत्येक पुत्र को जन्म लेते ही मार डाला जाए। परन्तु जिन धाइयों को फिरौन की इस घातक योजना को कार्यान्वित करना था, उन्होंने ऐसा नहीं किया, और इसलिये “वे लोग बढ़कर बहुत सामर्थी हो गए” (निर्गमन 1:20)। ऐसा लगता था कि इस्राएल की वृद्धि को रोकने की फिरौन की कोई भी योजना कार्यकारी नहीं होगी। फिरौन की प्रत्येक कुटिलता का, इस्राएल के परमेश्वर ने और भी अधिक आशीष के साथ प्रत्युत्तर दिया।
यही वह संघर्ष था, जिस में मूसा का जन्म हुआ। वास्तव में, उसका व्यक्तित्व इन दो लोगों का परस्पर एक साथ आना है। हम इब्रानियों 2 में पढ़ते हैं कि मूसा एक इब्री स्त्री से जन्मा था, जो उसकी जान बचाने के लिये, मूसा को सरकंडों की एक टोकरी में रखकर, नील नदी के किनारे, कांसों में छोड़ आई (निर्गमन 2:3)। वहाँ पर, फिरौन की अपनी बेटी को मूसा मिला। फिरौन की बेटी ने मूसा को गोद ले लिया, और उसी ने उसे यह नाम दिया, जिसका अर्थ है “मैंने इसको जल से निकाला था” (निर्गमन 2:10)। तो, अब यहाँ हमारे सामने मूसा है, जो जन्म से तो इब्री है, परन्तु उसे मिस्र के राज घराने में अपना लिया गया है। ऐसे लड़के का क्या होगा? अन्ततः उसकी वफादारी किन के प्रति होगी? इस प्रकार के प्रश्नों के उत्तर के लिये हमें कुछ और अधिक पढ़ने की आवश्यकता नहीं है। निर्गमन का लेखक (स्वयं मूसा) लिखता है:
ऐसा हुआ कि जब मूसा जवान हुआ, और बाहर अपने भाई–बन्धुओं के पास जाकर उनके दु:खों पर दृष्टि करने लगा; तब उसने देखा कि एक मिस्री उसके एक इब्री भाई को मार रहा है। उसने इधर उधर देखा कि कोई नहीं है, तो उस मिस्री को मार डाला और बालू में छिपा दिया। फिर दूसरे दिन बाहर जाकर उसने देखा कि दो इब्री पुरुष आपस में लड़ रहे हैं। उसने गलती करने वाले से कहा, “तू अपने भाई को क्यों मारता है?” उसने कहा, “किसने तुझे हम लोगों पर हाकिम और न्यायी ठहराया? जिस भाँति तू ने मिस्री को घात किया, क्या उसी भाँति तू मुझे भी घात करना चाहता है?” तब मूसा यह सोचकर डर गया, “निश्चय वह बात खुल गई है।” जब फ़िरौन ने यह बात सुनी तब मूसा को घात करने का प्रयास किया। तब मूसा फ़िरौन के सामने से भागा, और मिद्यान देश में जाकर रहने लगा; और वह वहाँ एक कुएँ के पास बैठ गया। – निर्गमन 2:11-15
कुछ ही पदों के पश्चात्, मूसा मिस्री राजघराने का जन होने के स्थान पर, एक मिस्री भगोड़ा बन जाता है। बात और भी बिगड़ जाती है क्योंकि उसके अपने लोगों, इस्राएल, ने उन्हें बचाने के लिये किये गये उसके कार्य को अस्वीकार्य कर दिया, और उसके अपनों ने यह कह कर उसका ठट्ठा किया “किसने तुझे हम लोगों पर हाकिम और न्यायी ठहराया?” उसकी कहानी के इस स्थान पर, मूसा के पक्ष में कुछ भी नहीं हो रहा था। यद्यपि वह दो लोगों से संबंधित था, परन्तु कोई भी उसे चाहता नहीं था। मूसा के लिये ऐसा क्या बिगड़ गया था? इस प्रश्न का उत्तर हमें यह समझने में सहायता करेगा कि अच्छी अगुवाई करना क्या नहीं है। यह हमें उसकी सराहना करने में भी सहायता करेगा कि मूसा कितना बड़ा अगुवा बनने वाला था।
1. अच्छी अगुवाई सांसारिक बुद्धिमानी का परिणाम नहीं है
यहाँ पर विशेषक “अच्छी” पर ध्यान दीजिये। अगुवाई को “अच्छी” होने के लिये, उसे ईश्वरीय बुद्धिमानी पर आधारित होना चाहिये, न कि सांसारिक बुद्धिमानी पर। आप को अगुवाई के बारे में अमेज़न पर उपलब्ध वे 57,000 पुस्तकें याद हैं? उनमें से अधिकाँश सांसारिक बुद्धिमानी पर निर्भर हैं। अर्थात्, वे उन तरीकों और युक्तियों से भरी हुई हैं जो आप को औरों से आगे निकलने, प्रथम होने, सर्वोत्तम होने पर केन्द्रित रखती हैं। बहुधा उनकी कार्यविधियों में औरों को नीचे खींचना, या अपने लाभ के लिये प्रयोग करना सम्मिलित होता है। इस सन्दर्भ में, सांसारिक बुद्धिमानी, अपनी ही उन्नति और प्रशंसा करने पर आधारित है।
जब मूसा ने मिस्री कार्य निरीक्षक की हत्या की थी, तब क्या वह सांसारिक बुद्धिमानी के अनुसार कार्य करने का दोषी था? आखिरकार, वह तो बस अपने लोगों की रक्षा कर रहा था! देखिये, मूसा के साथ सहानुभूति रखना चाहे जितना भी सहज हो, उसके कार्य यह तो दिखाते हैं कि उसने अपने लोगों के लिये स्वयं को न्यायी और निर्णायक समिति अर्थात् न्यायपीठ ठहरा लिया था, और उन्हीं लोगों ने तुरन्त ही उसके इस नियम का तिरस्कार भी कर दिया। मूसा ने जल्दबाज़ी में और गुप्त रीति से, उसके अनुसार कार्य किया जो उसे सही लगता था। परमेश्वर से बुद्धिमानी माँगने के स्थान पर, मूसा ने उतावली से कार्य किया और उस व्यक्ति को मार डाला। परन्तु ध्यान कीजिये कि उस परिश्रम कराने वाले के विरुद्ध उसके कार्य ने इस्राएल की दशा को सुधारने में कोई योगदान नहीं दिया। बल्कि, इस्राएल और भी अधिक कराहने लगा क्योंकि उनका दुःख बहुत अधिक था (निर्गमन 2:23)।
इस्राएल को जिसकी आवश्यकता थी, और मूसा को जिसकी प्रतीक्षा करनी चाहिए थी, वह था परमेश्वर से प्राप्त होने वाला उत्तर, कि अगला कदम क्या होना चाहिये। आखिरकार, परमेश्वर अपने लोगों की मुसीबतों से भली-भाँति अवगत था। मूसा ने लिखा, “परमेश्वर ने उनका कराहना सुनकर अपनी वाचा को, जो उसने अब्राहम, इसहाक, और याकूब के साथ बाँधी थी, स्मरण किया। और परमेश्वर ने इस्राएलियों पर दृष्टि करके उन पर चित्त लगाया” (निर्गमन 2:24-25)।
क्या आप किसी ऐसे अवसर को याद कर सकते हैं, जब आप ने एक अगुवा होते हुए, उतावली से कार्य किया हो? सम्भव है कि आपने सोचा हो कि परिस्थिति की माँग, एक तुरन्त-कार्यवाही करने वाले अगुवे की है। निश्चय ही, कभी-कभी परिस्थितियाँ शीघ्रता से कार्य करने की माँग करती हैं। परन्तु फिर भी, उतावली में लिये गये निर्णय, अधिकांशतः सांसारिक बुद्धिमानी से लिये हुए होते हैं। इससे यही पता चलता है कि हम अपने पैरों पर खड़े होकर विचार करने में बहुधा निपुण नहीं होते हैं—निश्चय ही उतने अच्छे तो नहीं, जितना हम स्वयं को समझते हैं। इससे भी बुरा यह कि जब हम उतावली में सोचते हैं, तब बहुधा हम परमेश्वर के विचारों के अनुसार नहीं सोच पाते हैं। बल्कि, हम सांसारिक बुद्धिमानी पर निर्भर करते हैं, जो हमारे लिये अधिक स्वभावी होता है।
अगुवे होने के नाते, हमें अगला कदम क्या उठाना है, इसके लिये परमेश्वर की सहायता की आवश्यकता होती है। चाहे यह हमारी कम्पनियों में हो, हमारे परिवारों में, या हमारी कलीसियाओं में, हमें कार्य करने से पहले, शीघ्रता से, परमेश्वर के परामर्श के खोजी होना चाहिये। यह करने का एक तरीका है परमेश्वर के वचन को पढ़ना, इस आशा के साथ कि हम जितना अधिक जानेंगे कि परमेश्वर कैसा है, हम उतना अधिक समझेंगे कि हमें कैसा होना चाहिये। क्योंकि परमेश्वर धीरजवन्त, न्यायी, और दयालु है, इसलिये हमें भी हमारी अगुवाई के आधीन आने वालों के लिये उसी प्रकार का होना चाहिये। इसे दूसरे शब्दों में कहें तो, हो सकता है कि बाइबल हमें यह न बताए कि क्या हमें अपनी कम्पनी की अगुवाई करते हुए उसकी किसी सम्पत्ति को बेचना चाहिये, या अपने बच्चों को किसी निजी स्कूल में भेजना चाहिये, या नहीं। परन्तु हमें यह बताने के द्वारा कि परमेश्वर कैसा है, बाइबल हमें इन सभी निर्णयों के बारे में, तथा इनके साथ अन्य जिस भी निर्णय का हम सामना करते हैं, उनके बारे में बताती है। हमें ऐसा कोई निर्णय नहीं लेना चाहिये जो परमेश्वर के गुणों के विरुद्ध जाता है। बल्कि हमें प्रयास के साथ ऐसे निर्णय लेने चाहिये जो हमारे अधीन कर्मचारियों को परमेश्वर का चरित्र प्रदर्शित करते हैं।
यदि मूसा ने परमेश्वर की बुद्धिमानी की प्रतीक्षा की होती, तो वह अपनी तथा लोगों की स्थिति में क्या कुछ बेहतर कर पाता? क्या वह अपने जीवन से जंगल में चरवाहा होकर रहने के अपने अध्याय से बच पाता? हो सकता है। हम जो निश्चित कह सकते हैं वह है कि परिणाम चाहे जो भी होता, परन्तु परमेश्वर की बुद्धिमानी पर निर्भर रहने के निर्णय के लिए उसे पछतावा कभी नहीं होता। हमें भी ऐसे प्रतीक्षा करने का कोई पछतावा कभी नहीं होगा।
2. अच्छी अगुवाई घमण्डी महत्वाकांक्षाओं से नहीं आती है
हम देख चुके हैं कि मूसा ने उस मिस्री परिश्रम कराने वाले की हत्या करने का चुनाव करने में, जो उस असहाय इस्राएली दास को पीट रहा था, सांसारिक बुद्धिमानी से कार्य किया। अब हमें मूसा की महत्वाकांक्षा के बारे में विचार करना चाहिये, जिस में, नि:सन्देह कुछ घमण्ड भी सम्मिलित था। मैं यह क्यों कह रहा हूँ? देखिये, एक बात तो यह है कि जब उसने उस परिश्रम कराने वाले की हत्या की थी, तब मूसा को कतई पता नहीं था कि अपने लोगों को दासत्व से छुड़ाने के लिये परमेश्वर उसे नियुक्त करेगा। नील नदी में से फिरौन की अपनी बेटी ने मूसा को जिस प्रकार से बचाया था, उस से निर्गमन के पाठक को बात का हल्का सा अंदाज़ा हो सकता है। परन्तु जहाँ तक मूसा की अपनी जानकारी थी, वह भाग्यशाली था कि वह मात्र जीवित तो था, फिरौन की सम्पत्ति पर उसका अधिकार होने की तो बात ही नहीं है।
परन्तु इसने मूसा को उस अधिकार को लेने से नहीं रोका, जिसे उसे नहीं लेना था। आप देखिये, अगुवाई उत्तर दिशा से आती है—अर्थात्, परमेश्वर से। इससे पहले कि मूसा को अपने लोगों की ओर से निर्णय लेने अधिकार प्राप्त होता—ऐसे निर्णय कि उनके सताने वालों में से किसे मार डालना है—से पहले उसे परमेश्वर द्वारा बुलाया जाना था।
इस्राएल के मूसा को प्रतिक्रिया देने से देखिये कि ऐसी बुलाहट से क्या अन्तर आता है। जब मूसा ने पहली बार मिस्री को मार डाला था, तब लोगों ने उससे पूछा, “किसने तुझे हम लोगों पर हाकिम और न्यायी ठहराया. . . ?” (निर्गमन 2:14)। परन्तु परमेश्वर द्वारा मूसा को बुलाने और फिरौन के पास जाकर उसके लोगों के छुटकारे की माँग करने के बाद, “लोगों ने उनका विश्वास किया; और यह सुनकर कि यहोवा ने इस्राएलियों की सुधि ली और उनके दु:खों पर दृष्टि की है, उन्होंने सिर झुकाकर दण्डवत् किया।” (निर्गमन 4:31)।
मुझे याद है जब मैं जवान था (कुछ के लिये तो मैं अभी भी जवान हूँ!), मैं सोचा करता था कि एक बार मुझे अधिकार मिल जाए, फिर सब ठीक हो जाएगा। आखिरकार, जो मुझ से उच्च अधिकारी हैं, मैं उन से तो कहीं अच्छे निर्णय ले सकता हूँ। मेरा विचार तो यही था। मेरे इस घमण्ड ने मुझे इतनी बार नीचा दिखाया है कि मैं उन्हें याद भी नहीं करना चाहता हूँ। बहुत बार मैं अपनी महत्वाकांक्षा में घमण्डी हुआ हूँ। मित्र, यदि आप अभी तक इसकी या उसकी अगुवाई करने वाले नहीं बने हैं, परन्तु बनना चाहते हैं, तो सबसे पहले आप को अपनी महत्वाकांक्षाओं पर कुछ सन्देह करना पड़ेगा। क्या आप केवल अपने लिये ही कुछ अधिकार प्राप्त करना चाहते हैं? क्या इसलिये कि अधिकार मिलने के बाद अन्य लोग आप के बारे में क्या सोचेंगे? क्या आप इन विचारों के द्वारा कि अधिकार मिल जाने पर आप क्या कुछ हासिल कर सकते हैं, परमेश्वर से आगे बढ़ रहे हैं? क्या आप का प्रभाव आप के चरित्र से आगे बढ़ रहा है?
यदि आप अगुवाई करने के अवसरों की लालसा रखते हैं, तो अपनी महत्वाकांक्षा को दिशा देने के सबसे अच्छे तरीकों में से एक है अपने चरित्र को उन्नत करने पर ध्यान केन्द्रित रखना—परमेश्वर को महिमा देने, तथा औरों की सेवा करने वाला चरित्र। यह पूर्वधारणा मत रखिये कि अन्य लोगों को आप का अनुसरण करने वाला होना चाहिये। बल्कि, स्वयं से तथा औरों से पूछिए कि आप किस तरह से बेहतर होकर औरों के दृष्टिकोण से परमेश्वर की निकटता के अनुरूप हो सकते हैं।
यदि आप पहले से ही अगुवाई कर रहे हैं, परन्तु आप को एहसास हुआ है कि आप परमेश्वर के प्रति विनम्र समर्पण की बजाए, घमण्डी महत्वाकांक्षा में पड़ने की सम्भावना अधिक रखते हैं, तो फिर से स्वयं को सुधारने में लग जाने का यही उचित समय है। अपने घमण्ड के लिये पश्चाताप करें। प्रभु से कहें कि आप को नम्र करे। औरों को आप की सेवा करने के लिये बाध्य करने के स्थान पर, उनकी सेवा करने के अवसरों को खोजें। अपनी सारी महत्वाकांक्षाओं को परमेश्वर के चरित्र के समक्ष जाँचें। यदि वे अनुरूप हैं, तो आगे बढ़िये। यदि नहीं, तो उन महत्वाकांक्षाओं को एक ओर फेंक कर उनसे बेहतर—वे, जो परमेश्वर के अनुसार हैं, रख लीजिये।
मूसा और मिस्री परिश्रम कराने वाले के सन्दर्भ में, हम कुछ पाठ सीखते हैं कि अच्छा नेतृत्व करना क्या नहीं होता है। इस मार्गदर्शिका का शेष भाग मूसा के अनेकों सकारात्मक उदाहरणों से यह दिखाएगा कि अच्छी अगुवाई करना क्या होता है और हम उस में किस प्रकार बढ़ सकते हैं।
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चर्चा के प्रश्न:
- वर्तमान में, अपने जीवन के किन भागों में आप किसी प्रकार की अगुवाई कर रहें हैं?
- क्या आप अगुवाई करने के और अधिक अवसर चाहते हैं? यदि हाँ, तो वे क्या हैं, और आप उन्हें क्यों चाहते हैं?
- क्या आप अतीत में सांसारिक बुद्धिमानी पर भरोसा रखने, या घमण्डी महत्वाकांक्षा के साथ संघर्ष किया है? यदि हाँ, तो अपने मार्गदर्शक होने के सम्बन्धों में उस उदाहरण को साझा कीजिये।
- परमेश्वर के चरित्र के बारे में विचार करने से हमें किस तरह से ऐसे अगुवे बनने में सहायता मिलती है जो उसका सर्वोत्तम रीति से आदर करते हैं?
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भाग II: अच्छी अगुवाई क्या है: नम्रता
जब आप का विवाह होता है और आप माता-पिता बनते हैं, तब कुछ विचित्र होता है। उन स्तरों से होकर जाते हुए, आप अपनी ही लालसाओं को पूरा करने में कम, और भी कम समय व्यतीत करने लगते हैं तथा औरों की लालसाओं—अर्थात्, अपने जीवन साथी और बच्चों की लालसाओं को पूरा करने में अधिक, और भी अधिक समय व्यतीत करने लग जाते हैं। आप गोल्फ खेलने में कम और लॉन की घास काटने में अधिक समय बिताते हैं। आप प्रातः 8 बजे तक सोते रहने से, प्रातः 2 बजे बच्चों के लंगोट बदलने वाले बन जाते हैं। आप पैसा खर्च करने के स्थान पर उसे कॉलेज, विवाह, और विरासत के लिये बचाने लग जाते हैं। माता-पिता अगुवे होते हैं, परन्तु बहुधा अगुवाई करने का अर्थ नम्रता के साथ सेवा करना होता है।
चलिये इसे थोड़ा कड़ाई से परखते हैं, क्योंकि हो सकता है कि पहली झलक में यह सही प्रतीत नहीं हो। माता-पिता होना विनम्र होने के बारे में है? तो फिर उस सारे “उसे करो क्योंकि वह करने के लिये मैंने तुम से कहा है” के बारे में क्या? निश्चय ही, माता-पिता होकर अगुवाई करना केवल नम्रता के बारे में ही नहीं है, परन्तु यह इस से कम भी कभी नहीं होता है। क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि माता-पिता अपने छः महीने के बच्चे से, जिसका लंगोट बदला जाना है, यह कहेंगे, “क्षमा करना। मैं इस समय तुम्हारा लंगोट बदलने के लिये बहुत अच्छे से तैयार, या व्यस्त, या थका हुआ हूँ?” यह हास्यास्पद सा होगा। माता-पिता होने से सम्बन्धित कुछ होता है जिसका अर्थ सेवा करना होता है, और सेवा करने के लिये नम्रता आवश्यक होती है।
और यह केवल माता-पिता होना ही नहीं है, जिस में विनम्रता से अगुवाई करनी होती है। नहीं, हर प्रकार की अगुवाई करना, औरों की सेवा करने से आती है, और सेवा करने के लिये नम्रता चाहिए होती है। यदि आप विनम्र नहीं हैं, तो आप अगुवाई नहीं कर सकते हैं। ऐसा क्यों? देखिये, पहली बात, ऐसा इसलिये, क्योंकि अगुवाई करने में आप का औरों के लिये कुछ करना, औरों के द्वारा आपके लिये कुछ किये जाने से बहुत अधिक होता है—कम से कम होना तो ऐसा ही चाहिये। उन विभिन्न अगुवाई करने के स्थानों के बारे में विचार कीजिये जो आप के या आप के किसी परिचित के पास हैं। माता-पिता, प्रबन्धक, महापौर, न्यायाधीश, पास्टर। इन सभी को किस की आवश्यकता होती है? सेवा और वास्तविक सेवा—ऐसी जिससे परमेश्वर को आदर मिले—यह बिना नम्रता के कभी नहीं होता है। माता-पिता नम्रता के साथ अपने बच्चों की सेवा करते हैं। प्रबंधकों को विनम्र होकर अपने कर्मचारियों की सेवा करनी चाहिये साथ ही, उनके कर्मचारी उनकी अगुवाई में औरों की सेवा करते हैं। निर्वाचित अधिकारियों को विनम्रता के साथ जनता की सेवा करनी चाहिये। पास्टरों को विनम्रता के साथ अपने सदस्यों की सेवा करनी चाहिये। अच्छी अगुवाई करने वाले फूल नहीं जाते हैं। यह स्वयं को आगे बढ़ाने के बारे में नहीं है। यह सेवा करने के बारे में है।
विनम्रता का एक और पक्ष भी है जिसका सामना अगुवाई करने वालों को करना है और जिसमें उन्हें बढ़ना है—अर्थात्, अपनी दुर्बलताओं के बारे में ईमानदार होना। विनम्रता से अगुवाई करने वाले केवल अपनी सामर्थ्य का ही लाभ नहीं उठाते हैं। वे अपनी दुर्बलताओं को भी स्वीकार करते हैं। वे उन पर भी निर्भर होते हैं जिनकी सामर्थ्य उनकी अपनी सामर्थ्य की पूरक होती है। अन्य लोग जिन बातों में अच्छे होते है, बजाए उस से डरने के, एक अच्छा अगुवा औरों को सामर्थी बनाता है ताकि वे अपनी योग्यताओं के द्वारा, उनके साथ मिल कर सेवा करें। मनुष्यों का भय और घमण्ड अगुवों के लिये आगे होकर औरों को अधिकार देने, और पीछे से औरों को श्रेय देना, असम्भव बना देते हैं।
परमेश्वर के अनुसार अगुवाई करना, मनुष्य के भय से उत्पन्न अगुवाई करने के समान नहीं होता है। वह स्वयं को उठाने के लिये औरों को नीचे नहीं दबाता है। परमेश्वर के अनुसार अगुवाई करना, अपने अधीन रहने वाले लोगों को बढ़ावा देता है। परमेश्वर के अनुसार अगुवाई करना स्वयं की दुर्बलताओं को स्वीकार करता है। परमेश्वर के अनुसार अगुवाई करने वाले, औरों की सामर्थ्य और योग्यताओं का नम्रता और उल्लास के साथ आनन्द मनाते हैं। हम इन सभी बातों को मूसा के जीवन में देखते हैं, और विशेषकर उस घटना में जिस में परमेश्वर ने उसे एक असम्भव लगने वाली अगुवाई करने के लिये बुलाया—इस्राएल का अगुवा होने के लिये, उन्हें फिरौन से छुड़ाने और उन्हें वापस कनान की भूमि पर ले कर आने के लिये। मूसा के उदाहरण से हमें सीखना है कि अपनी दुर्बलता को स्वीकार करने, परमेश्वर के प्रबन्ध पर निर्भर रहने, तथा औरों की सामर्थ्य का आनन्द मनाने का अर्थ क्या होता है।
1. अच्छे अगुवे दुर्बलताएँ मान लेते हैं
यदि आप परदेश में एक भगोड़े होते, तब आप क्या करते? यही वह प्रश्न था, जिसका सटीक उत्तर, मिस्र से भागने के बाद, मूसा को देना था। उसका उत्तर? अवश्य ही, एक चरवाहा बन जाना। पहले एक राजसी, अब एक भगोड़ा, मूसा की ज़िम्मेदारी केवल कुछ दुर्गन्ध देने वाली अड़ियल भेड़ों की थी। ईमानदारी से कहें तो, सब कुछ उतना बुरा भी नहीं था। यद्यपि वह एक परदेशी था, फिर भी मूसा को एक पत्नी और एक पुत्र भी मिल गया था। मूसा का ससुर, यित्रो, जिसकी भेड़ों की वह रखवाली किया करता था, उसे बहुत पसन्द करता था, और यदि कुल मिलाकर सब बातों को देखें तो एक अच्छी स्थिति थी। मूसा, अपने दिनभर के कार्य की समाप्ति पर, एक आराम कुर्सी पर बैठकर लम्बी साँस लेकर स्वयं से कहता होगा, “मुझे इस सभी का आदी हो जाना चाहिये।”
इतनी जल्दी नहीं। मूसा के लिये परमेश्वर की अन्य योजनाएँ थीं। एक दिन, जब मूसा यित्रो की भेड़ों को होरेब पर्वत के निकट चरा रहा था, मूसा के पास एक अत्यन्त अप्रत्याशित आगन्तुक आया। परमेश्वर के दूत ने मूसा को जलती हुई झाड़ी में दर्शन दिए, एक ऐसी झाड़ी जो जल तो रही थी, परन्तु भस्म नहीं हो रही थी। परमेश्वर ने मूसा से कहा, “मैं तेरे पिता का परमेश्वर, और अब्राहम का परमेश्वर, इसहाक का परमेश्वर, और याक़ूब का परमेश्वर हूँ. . . मैं ने अपनी प्रजा के लोग जो मिस्र में हैं, उनके दु:ख को निश्चय देखा है; और उनकी जो चिल्लाहट परिश्रम कराने वालों के कारण होती है उसको भी मैं ने सुना है, और उनकी पीड़ा पर मैं ने चित्त लगाया है. . . इसलिये आ, मैं तुझे फ़िरौन के पास भेजता हूँ कि तू मेरी इस्राएली प्रजा को मिस्र से निकाल ले आए” (निर्गमन 3:6-10)। वाह। वाह। क्या आप ये शब्द सुनने की कल्पना भी कर सकते हैं?
मूसा स्तब्ध रह गया होगा। उसने सोचा होगा कि वह पागल हो गया है! वास्तव में प्रतिक्रिया के रूप में उसने जो प्रश्न पूछा सम्भवतः वह इसी भावना के कारण होगा, “मैं कौन हूँ जो फ़िरौन के पास जाऊँ, और इस्राएलियों को मिस्र से निकाल ले आऊँ?” (निर्गमन 3:11)। मूसा, यह बिलकुल सही प्रश्न है। तू है कौन? तू एक हत्यारा है। तेरे पास कोई अधिकार नहीं है। मिस्र में तेरी प्रतिष्ठा, क्या कहा जाए, तू निष्कासित किया गया है! और जैसा कि हम शीघ्र ही जानेंगे, तू तो ठीक से बोल भी नहीं सकता है! संसार के सभी लोगों में से, इतने कठिन अभियान की अगुवाई, तू कैसे करेगा? यदि आप को लगता है कि मैं उस प्रिय लड़के के प्रति तुच्छ व्यवहार कर रहा हूँ, तो कृपया निर्गमन 3 और 4 अध्याय पढ़िये। ये सभी वही विनतियाँ हैं जो मूसा ने परमेश्वर के सामने रखीं, यह प्रमाणित करने के लिये कि इस कार्य के लिये वह उपयुक्त व्यक्ति नहीं था!
देखिये, बात यह है कि मूसा मुख्य बिन्दु को पहचान नहीं रहा था। परमेश्वर द्वारा उसे इस्राएल की अगुवाई करने के लिये चुनना, मूसा की योग्यताओं पर आधारित नहीं था—वह तो पूर्णतः उसकी अयोग्यताओं से सम्बन्धित था। परमेश्वर इस भगोड़े चरवाहे का, जो ठीक से बोल भी नहीं सकता था, उपयोग करके, अपनी सामर्थ्य इस्राएल, मिस्र, और सारे संसार के सामने दिखाना चाहता था। परमेश्वर उस अयोग्यताओं के ऊपर उठना, उनमें होकर मूसा को सशक्त बनाने, औरों की सामर्थ्य से उनको और सहायता देना था, ताकि वह करके दिखाए जो उस समय असम्भव लगता था—अर्थात् इस्राएल को स्वतन्त्र करके निकाल ले जाना।
आप क्या सोचते हैं? क्या मूसा के समान आप भी वह पहचान सकते हैं जो आप को दुर्बल करता है? या दुर्बलता का कोई भी चिन्ह आप को भय और चिन्ता से निष्क्रिय कर देता है? “क्या होगा यदि लोगों को लगेगा कि मैं इसके लिये सबसे उपयुक्त नहीं हूँ?” “यदि अन्य मेरा आदर नहीं करेंगे तो मैं अपना कार्य कैसे करूँगा?” “अगुवे तो दुर्बल नहीं हो सकते हैं।” मेरे मित्र, इस पतित संसार में दुर्बलता मनुष्य होने का एक भाग है। आप उन बातों में दुर्बल हैं जिन्हें आप जानते हैं और कुछ ऐसी बातों में जिन्हें आप नहीं जानते हैं। आप को उन दुर्बलताओं को परमेश्वर, स्वयं, तथा औरों के सामने मान लेने के लिये तैयार रहना चाहिए।
यदि आप अपनी दुर्बलताओं को स्वीकार करने के लिये संघर्ष करते हैं, तो एक अच्छा तरीका होगा कि इसके बारे में कुछ भरोसेमन्द मार्ग दर्शकों की राय प्राप्त करें। हो सकता है आपका जीवन साथी, सह-कर्मी, या पास्टर। परन्तु स्वयं को तैयार रखें। जब आप आलोचना माँगेंगे, तो बहुत सम्भव है कि आप को वही मिलेगी। परन्तु कोई बात नहीं। जो हम से प्रेम करते हैं, उनसे अनुग्रह के साथ परमेश्वरीय आलोचना मिलना, बढ़ने का एक तरीका है। अगुवों द्वारा आलोचना आमंत्रित करने का एक अन्य लाभ यह भी है कि इससे औरों की आलोचना करना भी सुरक्षित हो जाता है। मेरे पास्टर ने इसका एक अद्भुत उदाहरण रखा है। प्रत्येक इतवार की रात को सभी कर्मचारी और प्रशिक्षु उसके अध्ययन कक्ष में एकत्रित होते हैं, कि प्रातः और सन्ध्या की सभाओं की समीक्षा करें, जिस में उनका उपदेश भी सम्मिलित होता है। अब सोचिये, उन्हें मँच से प्रचार करते हुए तीस से भी अधिक वर्ष हो गए हैं, और वे लगभग तीस वर्ष की आयु के लोगों से आलोचना लेते हैं! यद्यपि मैं यह मानता हूँ कि वे यह आलोचना व्यक्तिगत रीति से प्रचारक के रूप में उन्नत होने के लिये लेते हैं, परन्तु ऐसा करने के द्वारा वे हम सभी के लिये भी यही करना सम्भव कर देते हैं। यह कैसे सम्भव होगा कि मैं किसी परमेश्वरीय आलोचना के प्रति क्रोध की प्रतिक्रिया दूँ, जब मेरा पास्टर मुझ से और अन्य लोगों से नियमित आलोचना आमंत्रित करता है?
आप देखिये, क्योंकि आलोचना का अर्थ है कि हम में से प्रत्येक की वैध तरीकों से आलोचना की जा सकती है। परन्तु यदि आप स्वयं की दुर्बलताओं को पहचानने के इच्छुक नहीं हैं, तब आप कभी भी औरों से आलोचना नहीं ले पाएँगे। जिस अगुवे की आलोचना नहीं की जा सकती है, उसके आस-पास लोग बड़ी ही सावधानी से कदम रखेंगे। दूसरी ओर, जो अगुवा आलोचना का स्वागत करता है, वह न केवल स्वयं बढ़ता है, बल्कि आलोचना के द्वारा औरों के बढ़ने को भी सुरक्षित कर देता है।
यदि आप मूसा के समान किसी बात की अगुवाई कर रहे हैं, तो आप को अपनी दुर्बलताएँ मान लेने के लिये तैयार रहना चाहिये। परन्तु इतना ही नहीं है. . .
2. अच्छे अगुवे परमेश्वर के प्रावधानों पर निर्भर रहते हैं।
अपनी दुर्बलताओं को मान लेने का लक्ष्य केवल यही घोषित करना नहीं है कि, “अरे, मेरी ओर देखो! मैं दुर्बल हूँ!” वरन्, दुर्बलता मान लेने का लक्ष्य है परमेश्वर से वह प्राप्त करना जिसकी हमें आवश्यकता है, परन्तु वह हम में है नहीं। आखिरकार, क्या प्रभु हम सभी यह नहीं कहता है कि, “मेरी सामर्थ्य निर्बलता में सिद्ध होती है”? (2 कुरिन्थियों 12:9)।
मूसा दुर्बल था। उसे यह पता था, और परमेश्वर भी यह जानता था। परन्तु मूसा यह नहीं जानता था कि अब्राहम, इसहाक, और याकूब का परमेश्वर, दासत्व में पड़े इस्राएल का परमेश्वर, सर्वसामर्थी था, है, और हमेशा रहेगा। जब मूसा ने सबसे पहले पूछा कि, “मैं कौन हूँ?” तब परमेश्वर का प्रत्युत्तर था “निश्चय मैं तेरे संग रहूँगा. . .” (निर्गमन 3:12) मूसा समाधान अपने अन्दर से खोज रहा था, परन्तु कार्य बहुत विशाल था, मिस्र बहुत अधिक बड़ा था। पहले, मूसा जिस बात को समझ नहीं सका, वह थी कि उसके साथ कौन है। स्वयं परमेश्वर। उसने फिर से एक तीखी प्रतिक्रिया दी, “लोग मुझे नहीं जानते हैं! मैं उन्हें क्या बताऊँ कि मुझे किस ने भेजा है?” परमेश्वर ने मूसा को प्रत्युत्तर दिया, “मैं जो हूँ सो हूँ. . . तू इस्राएलियों से यह कहना, ‘जिसका नाम मैं हूँ है उसी ने मुझे तुम्हारे पास भेजा है’” (निर्गमन 3:14)।
मूसा उसे कर सका, जिसे परमेश्वर ने उसे करने के लिये कहा, क्योंकि परमेश्वर जो है सो है। वही अनन्त, सिद्ध, सर्वसामर्थी परमेश्वर है, और उसके समान अन्य कोई नहीं है। फिरौन, मूसा के परमेश्वर के सामने कुछ नहीं था। मिस्र के सारे घोड़े और रथ उसके सामने कुछ नहीं हैं। मूसा के सामने जो कार्य रखा हुआ था, उसे पूरा करने के लिये जो भी आवश्यक था, परमेश्वर उसे उपलब्ध करने जा रहा था। परन्तु. . . मूसा अभी भी आश्वस्त नहीं था।
मूसा ने परमेश्वर से कहा, “कोई मेरी बात पर विश्वास नहीं करेगा!” और प्रत्युत्तर में परमेश्वर ने मूसा को चमत्कारिक चिन्ह दिखाने की सामर्थ्य दी, कि उसके सन्देश की विश्वसनीयता को स्वीकार किया जा सके। मूसा ने फिर से सन्देह की प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “मैं कोई अच्छा वक्ता नहीं हूँ!” और परमेश्वर का प्रत्युत्तर था “मनुष्य का मुँह किसने बनाया है?” (निर्गमन 4:11)। प्रकट उत्तर है कि स्वयं परमेश्वर ने ही मनुष्य का मुँह बनाया है और परमेश्वर, जैसा भी उचित समझता है, मूसा को प्रयोग कर सकता है। याद कीजिये कि परमेश्वर ने कुरिन्थियों को क्या कहा है? “. . . मेरी सामर्थ्य निर्बलता में सिद्ध होती है।” मूसा दुर्बल था, परन्तु मूसा में होकर कार्य कर रही परमेश्वर की सामर्थ्य उसे विजयी बना देगी।
मूसा ने फिर से बचने का प्रयास किया, और इस बार परमेश्वर क्रोधित हो गया क्योंकि मूसा सन्देह में ही पड़ा हुआ था। परन्तु, परमेश्वर ने मूसा के इस्राएल का अगुवा होने के अपने निर्णय को वापस नहीं ले लिया। उसके स्थान पर उसने एक और प्रबन्ध की प्रतिज्ञा की। “क्या तेरा भाई लेवीय हारून नहीं है? मुझे निश्चय है कि वह बोलने में निपुण है. . .इसलिये तू उसे ये बातें सिखाना; और मैं उसके मुख के संग और तेरे मुख के संग होकर जो कुछ तुम्हें करना होगा वह तुम को सिखलाता जाऊँगा।” (निर्गमन 4:14-15)। मूसा और हारून के लिये परमेश्वर द्वारा दी गई कितनी अद्भुत प्रतिज्ञा! वह उनके मुँह के साथ रहेगा और उन्हें बताएगा कि उन्हें क्या करना है!
और यदि आप यह सोच रहे हैं कि, “हाँ, ठीक है। यह मूसा और हारून के लिये तो अच्छा है, परन्तु यह मुझ पर किस प्रकार से लागू होता है, जिसे दस कर्मचारियों वाली एक छोटी सॉफ्टवेयर कम्पनी की अगुवाई करनी है?” अच्छा प्रश्न है। यद्यपि, मूसा के लिये परमेश्वर की बुलाहट, कि इस्राएलियों को दासत्व से स्वतन्त्र करवाए, क्या कहना चाहिये, उससे अधिक सीधी थी, जो सॉफ्टवेयर कम्पनी की अगुवाई करने के लिये आप की बुलाहट है, फिर भी परमेश्वर की प्रतिज्ञा है कि वह आप के लिये भी वैसे ही प्रबन्ध करेगा जैसा उसने मूसा के लिये किया। क्यों? देखिये, एक बात तो यह है कि परमेश्वर आप के जीवन में महिमा पाएगा, और उसका एक भाग है आप को वह सब कुछ देना जो उसकी आज्ञाकारिता के लिये आप को आवश्यक है। आप पूछेंगे, “टेलर, आप यह कैसे जानते हो?” मैं आप को दो तरीके बताता हूँ जिन से हम जानते हैं कि परमेश्वर उपलब्ध करवाएगा।
पहला, हम जानते हैं कि अगुवे होने की हमारी विभिन्न भूमिकाओं में परमेश्वर उपलब्ध करवाएगा, क्योंकि उसका वचन इसकी ज़िम्मेदारी लेता है। पौलुस ने कुरिन्थियों को लिखा, “परमेश्वर सब प्रकार का अनुग्रह तुम्हें बहुतायत से दे सकता है जिस से हर बात में और हर समय, सब कुछ, जो तुम्हें आवश्यक हो, तुम्हारे पास रहे; और हर एक भले काम के लिये तुम्हारे पास बहुत कुछ हो।” (2 कुरिन्थियों 9:8)। सच में? सभी बातों में, हर समय, पूरी बहुतायत? हाँ। परमेश्वर की प्रतिज्ञा है कि एक अगुवे के रूप में, उसे आदर देने और उसकी महिमा करने के लिये आप को जो भी आवश्यक होगा, वह उसे प्रदान करेगा।
परन्तु इस विशाल, सनकी सी प्रतिज्ञा का आधार क्या है? हम कैसे जान सकते हैं कि यह सच है? यह मुझे उस दूसरे तथा अधिक व्यावहारिक तरीके पर लेकर आता है जिसके द्वारा हम जान लेते हैं कि परमेश्वर हमारे लिये उपलब्ध करेगा। उसने आप के लिये यीशु को दिया। पौलुस ने रोमियों को लिखा, “जिसने अपने निज पुत्र को भी न रख छोड़ा, परन्तु उसे हम सब के लिये दे दिया, वह उसके साथ हमें और सब कुछ क्यों न देगा?” (रोमियों 8:32)। मेरे मित्रों, परमेश्वर के लिये इससे बढ़कर या अधिक महत्वपूर्ण अन्य कुछ भी नहीं है, कि हमें पापों से छुड़ाने और उसके साथ मेल-मिलाप करने के लिये मार्ग बना कर दे। यीशु में होकर उसने हमारे लिये ठीक यही किया है। ध्यान दीजिये कि पौलुस का तर्क किस तरह से बड़े से छोटे की ओर जाता है: क्योंकि परमेश्वर ने यीशु को दे दिया (हमारी सबसे बड़ी आवश्यकता के लिये सबसे बड़ा उपहार), इसलिये हम जानते हैं कि वह अन्य सब कुछ भी दे देगा।
परमेश्वर ने अपने एकलौते प्रिय पुत्र को आप के स्थान पर मरने के लिए भेज दिया, यदि आप उस पर विश्वास करते हैं। तो फिर क्या कारण हो सकता है कि आप के कार्य-स्थल में, घर पर, या कलीसिया में, उसे आदर देने के लिये आप को जो चाहिये, वह उसे आप से रोक कर रखे? कोई भी कारण नहीं हो सकता है। परमेश्वर ने वह सब कुछ करके दे दिया है जो आप पर यह प्रमाणित करने के लिये आवश्यक है, कि आप के द्वारा उसे आदर और महिमा देने के लिये जो कुछ भी आवश्यक है, वह उसे उपलब्ध करवाने के लिये पूर्णतः प्रतिबद्ध है।
इसलिये, अगली बार जब आप को बच्चों से परेशानी हो रही हो या आप यह नहीं समझ पा रहे हों कि समस्या खड़ी करने वाले किसी कर्मचारी के साथ क्या किया जाये, रुक कर स्वयं को याद दिलाएँ कि परमेश्वर आप के लिये प्रावधान करता है। सही निर्णय लेने के लिये आप को जो भी चाहिये, वह आप को वह सब देता है। इसलिये, आप को उसके प्रावधानों पर निर्भर रहना चाहिये। व्यावहारिक रूप में यह कैसा दिखता है? यह परमेश्वर के साथ उसके वचन में, प्रार्थना में, और स्थानीय कलीसिया में उसके लोगों के साथ समय बिताने, जहाँ पर आप औरों को जान सकते है तथा अन्य आप को जान सकते हैं, जैसा दिखता है। इन साधारण बातों के द्वारा, परमेश्वर बहुधा अपने अनुग्रहपूर्ण प्रबन्ध हमें उपलब्ध करवाता है।
मूसा ने परमेश्वर के प्रावधान पर भरोसा किया, और आप जानते हैं कि क्या हुआ? परमेश्वर ने मूसा को उपयोग किया कि इस्राएल के लोगों को मिस्र के दासत्व से स्वतन्त्र करे। उसी परमेश्वर ने आप को उपयोग करने का भी वायदा किया है।
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चर्चा के प्रश्न:
- अगुवे के रूप में दुर्बलता को स्वीकार करना भयावह क्यों होता है?
- यद्यपि औरों की दुर्बलताओं को दिखाना सहज होता है, परन्तु स्वयं की दुर्बलताओं को पहचानना कठिन क्यों होता है?
- दुर्बलताओं को स्वीकार करने से आप को तथा आप के आस-पास के अन्य लोगों को किस प्रकार से लाभ मिलता है?
- क्या आप इस सन्देह के साथ संघर्ष करते हैं कि क्या परमेश्वर ने सच में जो कुछ भी चाहिये उसे उपलब्ध कर दिया है, या कर देगा? यदि हाँ, तो आप को ऐसा क्यों लगता है?
- आप परमेश्वर के प्रावधान पर भरोसा करने में किस प्रकार बढ़ सकते हैं? अपने मार्गदर्शक के साथ, हाल के अपने परमेश्वर के वचन, प्रार्थना, और स्थानीय कलीसिया के लोगों के साथ बिताये गए अपने समय के बारे में बातें करने में कुछ समय बिताएँ।
भाग III: अच्छी अगुवाई क्या है: दर्शन और साहस
पूरे पवित्रशास्त्र में निर्गमन 4-14 से बढ़कर बड़ी यात्रा शायद ही कोई हो। यदि आपने बाइबल की उन कुछ पुस्तकों में से मूसा के जीवन के बारे में पढ़ने के मेरे परामर्श को अभी तक नहीं माना है, तो कम से कम अब, इन अध्यायों को पढ़ लीजिये। जैसा कि परमेश्वर ने उससे कहा, मूसा मिस्र को लौट गया और माँग की, कि इस्राएल के लोगों को कनान लौट जाने दिया जाये। साथ ही, जैसा परमेश्वर ने कहा था, फिरौन ने इनकार कर दिया। उस समय फिरौन इस बात को नहीं जानता था, परन्तु वह एक मँच की भूमिका निभा रहा था। और मिस्र? देखिये वे तो रँगशाला थे। परमेश्वर फिरौन के हठ को अपनी सार्वभौमिक सामर्थ्य को प्रदर्शित करने के लिये उपयोग करने वाला था। मिस्र परमेश्वर तथा उसके लोगों के विरुद्ध उठेगा, और परमेश्वर उन्हें समुद्र में निगल लेगा।
इस महागाथा में मूसा की क्या भूमिका थी? उसे इस्राएल को दर्शन देना था और साहस के साथ, सबसे पहले, परमेश्वर की कही हर बात को करना था। मिस्र पहुँचने के बाद, मूसा और हारून ने सबसे पहले इस्राएल के प्राचीनों को एकत्रित किया और उन्हें वह सब बताया जो परमेश्वर ने मूसा से जलती हुई झाड़ी की घटना में कहा था (निर्गमन 4:28-31)। उन्होंने लोगों के साथ आने वाली बातों के दर्शन को बाँटा। लोगों की प्रतिक्रिया क्या थी? उन्होंने विश्वास किया।
1. अच्छे अगुवों के पास दर्शन होता है
अब, आप और मैं दोनों यह जानते हैं कि आप और मैं मूसा नहीं हैं। हम हारून भी नहीं हैं। हमारे परिवारों, कार्य-स्थलों, कलीसियाओं, या अन्य किसी भी स्थान के लिये जहाँ हम अगुवे हैं, वह दर्शन उतना बड़ा नहीं लगता है, जितना कि परमेश्वर द्वारा मूसा को दिया गया था। अब, मैं यह तर्क दूँगा कि सबसे महत्वपूर्ण दर्शन, जो आप के पास, अपने अधिकार के नीचे कार्य करने वालों के लिए होना चाहिये, वह यह है कि वे परमेश्वर को जानें और उससे प्रेम करें, और जिस तरह से आप अपने अधिकार का प्रयोग करते हैं, उसे देखकर इसके लिए प्रोत्साहित हों। यदि आप के परिवार, कर्मचारियों, कलीसिया, या मित्रों के लिये आप के पास यह दर्शन है, तो, चाहे आप इसका एहसास न भी करें, आप का दर्शन मूसा के दर्शन के समान ही है। उसका दर्शन भी यही था कि जिनकी वह अगुवाई कर रहा था, उन्हें परमेश्वर के साथ एक घनिष्ठ सम्बन्ध में लाये।
परन्तु फिर भी, अगुवा होने के नाते, आप का दर्शन. . . देखिये, मूसा के दर्शन से कम व्यवहारिक है। इस्राएल की स्वतन्त्रता के मूसा के दर्शन से भिन्न, जो उसे परमेश्वर से प्राप्त हुआ था, अपने परिवार को छुट्टियों में घुमाने ले जाना या अपने दफतर के कर्मचारियों के लिये काम करने का बड़ा स्थान उपलब्ध करवाना, ये दर्शन बहुत कम सुरक्षित या निश्चित हैं। आवश्यक नहीं कि आप के पास यह खरीदने या वह करने के लिए परमेश्वर की स्वीकृति हो। निश्चय ही आप के पास उसकी प्रतिज्ञा नहीं है कि वह सफल होगा। दो बातें सच हैं: 1. आप को प्रत्येक दर्शन को परमेश्वर के वचन से जाँचना चाहिए। यह सुनिश्चित कीजिये कि जिन सिद्धान्तों के आधार पर आप दर्शन बना रहे हैं और निर्णय ले रहे हैं वे परमेश्वर द्वारा कही गई बातों के अनुरूप हैं। स्वयं से प्रश्न पूछिये, “क्या आप का दर्शन औरों को ऊपर उठाता है, या नीचे गिराता है?” “क्या आप का दर्शन खराई के साथ आगे जा सकता है?” “यदि आप का दर्शन वास्तविकता हो जाए, तो क्या आप अपनी सफलता के लिये आप परमेश्वर को महिमा देने के लिये तैयार हैं?” 2. यदि आप किसी भी बात की अगुवाई भली-भाँति करना चाहते हैं, तो दर्शन अनिवार्य है। यदि आप लोगों को यह नहीं बताएँगे कि आप कहाँ जा रहे हैं और उन्हें क्यों आप के साथ वहाँ जाना चाहिये, तो आप यह आशा कैसे रख सकते हैं कि वे आपका अनुसरण करेंगे। इसलिये यदि आप कोई अगुवाई कर रहे हैं, तो यह भी सुनिश्चित कीजिये कि आप दर्शन भी दे रहे हैं। आप अपनी इकाई को जहाँ पहुँचाना चाहते हैं, उसका एक सुस्पष्ट चित्र प्रस्तुत करें। यह सुनिश्चित करें कि लोगों को पता हो कि आप उनके लिये सर्वोत्तम चाहते हैं।
इसके बाद मूसा ने क्या किया? वे मिस्र के साथ युद्ध करने लगे। लड़ाइयों की एक श्रृंखला के द्वारा, जिन्हें विपत्तियाँ कहा गया है, मूसा ने साहस के साथ परमेश्वर पर भरोसा रखते हुए, इस्राएल के लिये परमेश्वर की प्रतिज्ञा के साथ, फिरौन का सामना किया। विश्वास के द्वारा मूसा आश्चर्यकर्म करता चला गया, और उन में से प्रत्येक अपने लोगों को बचाने की परमेश्वर की प्रतिबद्धता का प्रमाण था।
यह सब अन्ततः एक बहुत ज्यादा घबरा देने वाली घटना तक पहुँच गया। अन्ततः, मूसा से यह कहने के बाद कि इस्राएल चले जाने के लिये स्वतन्त्र है, फिरौन ने अपना विचार बदल लिया, और अपनी सारी सेना के साथ इस्राएल का पीछा किया। मूसा ने निर्गमन में इस घटना का वर्णन इस प्रकार किया है:
और यहोवा ने मिस्र के राजा फ़िरौन के मन को कठोर कर दिया। इसलिये उसने इस्राएलियों का पीछा किया; परन्तु इस्राएली बेखटके निकले चले जाते थे। पर फ़िरौन के सब घोड़ों, और रथों, और सवारों समेत मिस्री सेना उनका पीछा करके उनके पास, जो. . . समुद्र के तट पर डेरे डाले पड़े थे, जा पहुँची। जब फ़िरौन निकट आया, तब इस्राएलियों ने आँखें उठाकर क्या देखा कि मिस्री हमारा पीछा किए चले आ रहे हैं; और इस्राएली अत्यन्त डर गए, और चिल्लाकर यहोवा की दोहाई दी। (निर्गमन 14:8-10)
इस्राएल लाल समुद्र और फिरौन की विशाल सेना के मध्य में फँस गया था। बच निकलने का कोई रास्ता नहीं दिख रहा था। कोई शरणस्थान नहीं था। इस्राएल के लोग, 430 वर्ष से मिस्र के दास रहे थे, अब वे समुद्र तट पर फिरौन के हाथों मारे जाने वाले थे। लग तो ऐसा ही रहा था. . .
मूसा साहसी बना रहा। वह अपने परमेश्वर को जानता था। पहली बार, जलती झाड़ी में परमेश्वर के सामने आने से भिन्न, इस बार मूसा ने स्वयं के और उन लोगों के लिये परमेश्वर पर भरोसा किया। उसका विश्वास था कि यह दृश्य, चाहे कितना भी भयावह हो, इसका अन्त पराजय नहीं होगा। वह कार्य करने के लिये खड़ा हुआ, और मूसा ने लोगों से कहा, “डरो मत, खड़े खड़े वह उद्धार का काम देखो, जो यहोवा आज तुम्हारे लिये करेगा; क्योंकि जिन मिस्रियों को तुम आज देखते हो, उनको फिर कभी न देखोगे। यहोवा आप ही तुम्हारे लिये लड़ेगा, इसलिये तुम चुपचाप रहो” (निर्गमन 14:13-14)।
आप जानते हैं कि आप अपने जीवन के कुछ महत्वपूर्ण भाग याद कर सकता हैं और अपने मनों में ही सिनेमा के समान उन्हें देख सकते हैं। मेरा मानना है कि इसके बाद जो हुआ, प्रत्येक इस्राएली ने बारम्बार उसे अपने मनों में फिर से जिया होगा। हमें बताया गया है कि:
तब मूसा ने अपना हाथ समुद्र के ऊपर बढ़ाया; और यहोवा ने रात भर प्रचण्ड पुरवाई चलाई, और समुद्र को दो भाग करके जल ऐसा हटा दिया, जिससे उसके बीच सूखी भूमि हो गई। तब इस्राएली समुद्र के बीच स्थल ही स्थल पर होकर चले, और जल उनकी दाहिनी और बाईं ओर दीवार का काम देता था। तब मिस्री, अर्थात् फ़िरौन के सब घोड़े, रथ और सवार उनका पीछा किए हुए समुद्र के बीच में चले गए. . . तब मूसा ने अपना हाथ समुद्र के ऊपर बढ़ाया, और भोर होते होते क्या हुआ कि समुद्र फिर ज्यों का त्यों हो गया. . . और जल के पलटने से, जितने रथ और सवार इस्राएलियों के पीछे समुद्र में आए थे, वे सब वरन् फ़िरौन की सारी सेना उसमें डूब गई, और उसमें से एक भी न बचा. . . परन्तु इस्राएली समुद्र के बीच स्थल ही स्थल पर होकर चले गए. . . (निर्गमन 14:21-23, 27-29)।
किसी अच्छी और बड़ी कहानी के अन्त पर पहुँचकर, मेरी दादी कहा करती थी, “काश कि मैं वहाँ होती और चुपचाप से यह सब देख पाती!” उस कहानी को टाइप करते हुए भी, मैं अनुभव कर सकता हूँ कि मेरे हृदय की गति कुछ बढ़ी हुई है। मूसा के साहसी विश्वास और परमेश्वर के द्वारा इस्राएल के प्रतिभाशाली बचाव तथा मिस्र की पराजय की यह कहानी स्तब्ध कर देने वाली है।
परन्तु अगुवों के रूप में हमारे लिये इस कहानी के अर्थ को समझने के लिये, हमें पीछे उस पल पर जाना होगा जब इस्राएल फँसा हुआ था, और ऐसा लगता था कि उनकी पराजय निश्चित है। लोग आतंकित और निराश थे, क्योंकि उनके अनुसार, मृत्यु निश्चित लग रही थी। इसके विपरीत, मूसा विश्वास से भरा हुआ था, इसलिये उसने साहस के साथ कार्य किया। उसने परमेश्वर पर विश्वास किया, और परमेश्वर ने उसे विजय दी।
2. यह यीशु को सर्वप्रथम रखना है
अब, इस स्थान पर आकर, मैं आप को, जितनी भी स्पष्टता से सम्भव हो सकता है, यह बताने के लिए बहुत बाध्य अनुभव कर रहा हूँ कि—आप मूसा नहीं हैं! इस कहानी का मुख्य बिन्दु आप को उसके स्थान पर रखना नहीं है, कि आप यह कल्पना करने लग जाएँ कि यदि आप पर्याप्त विश्वास रखें, तो फिर कार्य स्थल पर चौथी तिमाही के लिये आप की बड़ी योजना सफल हो जाएगी और आप बजट के अन्दर कार्य पूरा कर लेंगे। नहीं, यह कहानी, किसी अन्य बात की बजाए, हमें परमेश्वर के बारे में कुछ बताती है, और उसके बार में जो उसने मसीह में होकर हमारे लिये किया है। हमारे पापों के कारण, आप और मैं अनन्तकाल तक नरक में परमेश्वर के प्रकोप का सामना करने की असम्भव स्थिति का सामना कर रहे थे। आशा की कोई किरण नहीं थी। और फिर . . . जो अकल्पनीय था, वह हो गया। परमेश्वर ने अपने एकलौते पुत्र को भेजा कि हमारे पापों को अपने ऊपर ले, और एक मनुष्य बनकर हमारे स्थान पर मृत्यु सह ले, एक सिद्ध बलिदान बन जाए। यदि हम यीशु में विश्वास करते हैं, परमेश्वर हमारे पापों को उसे सौंप देता है, और उसकी धार्मिकता हमें दे देता है, और इस तरह से प्रभावी रीति से हमें हमारे पापों और मृत्यु के समुद्र में से सुरक्षित पार निकाल लाता है।
इसलिये, यदि आप लाल समुद्र को पार करने की कहानी से अगुवाई का पाठ नहीं भी समझ पाते हैं, परन्तु यीशु ने आप के लिये जो किया है, उसे बेहतर समझ पाते हैं, तो मैं सन्तुष्ट हूँ। यदि आप ने यीशु पर पहले कभी विश्वास नहीं किया है, मेरी आशा है कि आप उन इस्राएलियों के समान मिस्र की सेना और समुद्र के बीच में फँसा हुआ अनुभव करते हैं। आप की एक मात्र आशा यीशु पर विश्वास करना है। यदि आप यह करेंगे, तो आप का मार्गदर्शन करके, आप को सुरक्षित दूसरी ओर पहुँचा दिया जाएगा। इसलिये, इस कहानी को समझने के द्वारा, यीशु ही वह सबसे महत्वपूर्ण बात है जिसे आप साथ लेकर जा सकते हैं।
3. अच्छे अगुवे साहसी होते हैं
परन्तु फिर भी, इस कहानी में हमें अगुवाई करने का एक सिद्धान्त मिलता है. . .यद्यपि वह महत्व की सीढ़ी में बहुत नीचे स्थित है। पाठ यह है—अगुवाई करने के लिये साहस होना चाहिए। मुझे याद है, एक बार मैं उत्तरी कैरोलाइना के समुद्र तट से लगभग पचास मील दूर तक नाव में था। जब साँझ ढली, हवाएँ तेज़ होने लगीं और लहरें उठने लगीं। नाव ऐसे चरमरा रही थी मानो किसी भी क्षण दो में टूट जाएगी। मैं झूठ नहीं बोलूँगा, मैं बहुत भयभीत था। न केवल यह नाव मेरा सपना थी, परन्तु, मेरी बहन भी मेरे साथ थी। मुझे लग रहा था कि बहुत सम्भव है कि हम डूब जाएँगे।
धन्यवाद की बात है कि मैंने एक कप्तान को साथ ले लिया था कि हमें हमारे अन्तिम गन्तव्य तक पहुँचने में सहायता करे, जो कि विर्जीनिया था। उसका नाम जॉन था, और वह बहुत अनुभवी था। वह वर्षों से इन परिस्थितियों को झेलता आ रहा था। उसने यह सब पहले भी देखा था। यह उसकी पहली नौका यात्रा नहीं थी। मुझे याद हैं, मैंने उससे पूछा, “जॉन, क्या हम परेशानी में हैं?” उसका प्रत्युत्तर था, “हम बिल्कुल ठीक हैं। यह नाव इसी तरह की यात्रा के लिये बनी है।” पता चला कि जॉन सही था। दस घण्टे के बाद, हम शरण के लिए बियूफोर्ट पहुँच गए। नाव और उसके नाविक सभी ठीक थे।
उस रात, समुद्र में, मैंने कुछ महत्वपूर्ण पाठ सीखे। एक बात तो यह थी कि मैंने अपने अनुभव से यह सीखा कि किसी साहसी अगुवे के अधीन होना कितनी सांत्वना प्रदान करता है। जॉन साहसी था, और उसके बिना, मुझे नहीं पता कि हम कैसे पहुँच पाते। दूसरी बात, साहस एक से दूसरे को लगता है। जब आप अपने अगुवे को साहस प्रदर्शित करते हुए देखते हैं, तब आप भी वैसा ही करना चाहते हैं और उनके उदाहरण से आप को भी भरोसा होता है। आप, यदि आज लोगों की अगुवाई कर रहे हैं, तो स्वयं से प्रश्न पूछिये, “क्या मैं निर्णय लेने में साहस दिखाता हूँ?” यदि नहीं, तो आप को अचंभित नहीं होना चाहिये कि आप के लोग घबराए हुए हैं कि आप उन्हें कहाँ ले जा रहे हैं। मूसा साहसी था, और उसके लोगों ने उसका अनुसरण किया। मैं अपने परिवार, अपने मित्रों, अपनी कलीसिया, और अपने सहकर्मियों के लिये साहसी होना चाहता हूँ। आप क्या चाहते हैं?
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चर्चा के प्रश्न:
- ऐसे अगुवों के कुछ उदाहरण कौन से हैं, जिनके अधीन आप ने कार्य किया और जिनके पास दर्शन एवं साहस था? उनके दर्शन और साहस के कारण, उनका अनुसरण करने के लिये आप को सहायता किस प्रकार प्राप्त हुई?
- क्या आप को कभी अपनी अगुवाई को सांसारिक लाभ अर्जित करने के लिये प्रयोग करने का प्रलोभन होता है, और आप यह भूलने लगते हैं कि उस अगुवाई के द्वारा परमेश्वर का उद्देश्य है कि आप उसे समझ पाने में औरों की सहायता करें? यदि हाँ, तो अपने मार्गदर्शक के साथ इसके बारे में बात करें और प्रार्थना करें कि प्रभु आप की सहायता करे कि जो अधिकार उसने आप को सौंपा है, उसके लिये आप के पास एक बड़ा दर्शन भी हो।
- आप जिन की अगुवाई करते हैं, उनके लिये आप का क्या दर्शन है?
- आप जिस दिशा में सोचते हैं कि आप सभी को जाना चाहिये, उस में अगुवाई करने के लिये साहस में आप की बढ़ोतरी कैसी है?
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भाग IV: अच्छी अगुवाई क्या है: आज्ञाकारिता
बचपन में मैं परेशानियों में पड़ता रहता था. . . बहुत सारी। कभी-कभी मेरी माँ मज़ाक करती थी कि उन्हें मुझे प्रति दिन दण्ड देना होता था, क्योंकि वह निश्चित थीं कि उन्हें पता हो या न हो, मैंने अवश्य ही कोई न कोई गलती की ही होगी। इस बात को स्वीकार करना मुझे अच्छा तो नहीं लगता, परन्तु सम्भवतः, वे सही थीं। मैं हमेशा कुछ ऐसा करता ही रहता था, जिसके बारे में मुझे पता था कि मुझे उसे नहीं करना चाहिये। दूसरी ओर, मेरी बहन, देखिये, उसकी कहानी तो बिल्कुल भिन्न है। वह कभी परेशानी में नहीं पड़ती थी! मेरी माँ इससे सहमत नहीं होगी। ठीक है। चलिए, वह लगभग कभी भी परेशानी में नहीं पड़ती थी। आठ, नौ, दस वर्ष की आयु के समय में, ऐसा लगता था मानो माँ और पिता बस उसी का पक्ष लेते हैं। परन्तु अब, वयस्क होने पर, मैं यह जानता हूँ कि उसे “वह” न मिलने के कारणों में एक था (यदि आप के माता-पिता भी मेरे माता-पिता के समान प्रेम करने वाले थे, तो आप समझते हैं कि “वह” का क्या अर्थ है) कि वह बहुधा हमारे माता-पिता की आज्ञा का पालन करती थी। वह उनका अनुसरण करती थी। वह उनके मार्गों पर चलती थी। उसने अपनी इच्छाओं को उन्हें समर्पित कर रखा था।
1. अच्छे अगुवे परमेश्वर को समर्पित रहते हैं
मित्रों, अगुवे होने का यह अर्थ हो सकता है कि अन्य लोग आप के अधीन हों। आप उनके अधिकारी हैं, और सच में उन्हें वही करना चाहिये जो आप कहते हैं। परन्तु क्या आप ने कभी रुक कर विचार किया है कि आप भी अधिकार के अधीन हैं? आप भी, जो किसी व्यवसाय के मालिक हैं, तथा अपने अतिरिक्त किसी को जवाबदेह नहीं हैं. . . आप भी अधिकार के अधीन हैं। किसके? देखिये, चाहे संसार में किसी अन्य के न हों, परन्तु आप फिर भी परमेश्वर के अधिकार के अधीन हैं। अपने हर निर्णय के लिये, आप को उसे उत्तर देना होगा।
इसका अर्थ क्या है? इसका अर्थ है (और मुझे इन शब्दों को लिखते हुए दुःख हो रहा है) कि आप को मेरे समान कम और मेरी बहन के समान अधिक होना चाहिये। आप को स्वयं को परमेश्वर का आज्ञाकारी होने के लिये प्रतिबद्ध करना चाहिये, तब भी आज्ञाकारी रहें, जब आप होना नहीं चाहते हों। उसका वचन आप की धारणाओं से बेहतर है। उसका मार्ग, आपके मार्ग से उत्तम होगा। अगुवा होने के नाते परमेश्वर की दृढ़ आज्ञाकारिता आप की पहचान होनी चाहिये।
नि:सन्देह, आज्ञाकारिता मूसा की एक पहचान थी। निश्चय ही मूसा की आज्ञाकारिता सिद्ध नहीं थी। वह घटना भी थी, जब परमेश्वर ने जब मूसा से चट्टान से बोलने के लिये कहा परन्तु उसने उस पर लाठी मार दी (गिनती 20:10-13)। और फिर भी मूसा इस्राएल की, उनके परमेश्वर के कहे अनुसार, खराई से अगुवाई करना चाहता था। यह बात जितनी स्पष्ट सीनै पर्वत में देखी जाती है, जहाँ मूसा ने इस्राएल के लिये व्यवस्था को प्राप्त किया था, उतनी और कहीं नहीं दिखाई देती है। देखिये, सीनै पर्वत की व्यवस्था की चौड़ाई को विस्तार से समझने के लिये, जितना समय हमारे पास इस मार्गदर्शिका के लिये है, वह उससे बहुत अधिक है। फिर भी, निर्गमन 24 में, मूसा के परमेश्वर से भेंट करने के लिये सीनै पर्वत पर चढ़ने से पहले, उसने “तब मूसा ने यहोवा के सब वचन लिख दिए; और बड़े सबेरे उठकर पर्वत के नीचे एक वेदी और इस्राएल के बारहों गोत्रों के अनुसार बारह खम्भे भी बनवाए. . . तब वाचा की पुस्तक को लेकर लोगों को पढ़ कर सुनाया; उसे सुनकर उन्होंने कहा, “जो कुछ यहोवा ने कहा है उस सब को हम करेंगे, और उसकी आज्ञा मानेंगे।” (निर्गमन 24:4-7)।
मूसा समझता था कि परमेश्वर के होने का अर्थ है परमेश्वर का आज्ञाकारी होना। यदि इस्राएल के लोग निरन्तर उसके मार्गों पर चलने से इनकार करते रहेंगे, तो वे परमेश्वर के लोग नहीं हो सकेंगे। अनेकों युद्ध और बारम्बार निष्कासित होने के बाद, इस्राएल को यह पाठ कठिन रीति से सीखना पड़ा। परन्तु जब वे मूसा की देखभाल में थे, तब आज्ञाकारिता की आवश्यकता को ठीक उनकी नाक के नीचे रखा गया था, कहीं वे उसे भूल जाएँ। इस्राएल को वे लोग होना था जो परमेश्वर के आज्ञाकारी थे।
मेरे मित्रों, हम भी परमेश्वर के लोग हैं, यदि हम मसीह में भरोसा रखते हैं। इसलिये, हम जो कुछ भी करते हैं, उसमें हमें परमेश्वर के आज्ञाकारी होना ही है। क्या आज्ञाकारिता पर दिये जा रहे बल से आप चकित हैं? हो सकता है कि किसी प्रचारक को यह कहते हुए सुनने के बाद आप ने मसीह पर विश्वास किया हो कि, “अपने आप को परमेश्वर की दृष्टि में सही करने के लिये, आप स्वयं कुछ नहीं कर सकते हैं। परमेश्वर के साथ सही होने के लिये जो कुछ भी आवश्यक है, वह यीशु ने उपलब्ध करवा दिया है। पापों की क्षमा के लिये, केवल यीशु पर विश्वास करें!” उस प्रचारक के लिये प्रभु की स्तुति हो। उसने बिलकुल सही कहा। बचाए जाने के लिये, केवल मसीह द्वारा पूरे किये गये कार्य पर भरोसा करना है।
परन्तु फिर भी, मसीह द्वारा पूरा किया गया कार्य और हमारा विश्वास के साथ उसे ग्रहण कर लेना, आज्ञाकारिता की आवश्यकता को रद्द नहीं कर देता है। निश्चय ही, हमारी आज्ञाकारिता, हमारे उद्धार का आधार नहीं है—वह आधार केवल मसीह है। परन्तु आज्ञाकारिता हमारे उद्धार का प्रमाण है। परमेश्वर की आज्ञाकारिता, संसार को संकेत करती है कि हम परमेश्वर से प्रेम करते हैं, और उसका अनुसरण कर रहे हैं। क्या यीशु ने, जिस रात वह पकड़वाया गया, अपने शिष्यों से ठीक यही नहीं कहा था? “यदि तुम मुझ से प्रेम रखते हो, तो मेरी आज्ञाओं को मानोगे” (यूहन्ना 14:15)।
अगुवाई करने से इस सब का क्या सम्बन्ध है? उससे इसका पूरा सम्बन्ध है। चाहे अगुवे होने की आप की स्थिति औपचारिक हो या अनौपचारिक, आप के पास जो भी अधिकार है, उसके साथ आप को परमेश्वर का आज्ञाकारी होना ही है। और क्योंकि आप अगुवाई कर रहे हैं, इसलिये आप को यह समझना चाहिये कि आप के आज्ञाकारी रहने या न रहने के प्रभाव आप के अधीन लोगों पर होंगे।
आप जानते हैं कि अनुसरण करने के लिये सर्वोत्तम अगुवे कौन से होते हैं? जो धर्मी होते हैं। मेरे बड़े होने के समय, मेरे मित्र बहुधा मेरे घर रात बिताना चाहते थे। क्या आप जानते हैं क्यों? क्योंकि मेरे माता-पिता अद्भुत थे। मेरे पिता मज़ाकिया थे, और वे बहुत प्रयास करते थे कि सूर्योदय होने से पहले हम सभी को किसी न किसी प्रकार का कोई रोमांचक अनुभव हो। दूसरी ओर, मेरी माँ, चीनी के समान मीठी थी और हमारे सिनेमा देखते समय कुछ खाने के लिये जो वो पका के देती थीं, उसमें भी बहुत मीठे का प्रयोग करती थीं। मेरे माता-पिता अद्भुत थे। वे अभी भी हैं। परन्तु क्या आप उस वास्तविक कारण को जानते हैं कि मेरे मित्रों को मेरे घर आना क्यों पसन्द था? क्योंकि मेरे माता-पिता धर्मी विश्वासी जन थे। वे परमेश्वर का भय रखते थे और यथा सम्भव उसकी आज्ञाकारिता करने का प्रयास करते थे। उनका विश्वास था कि हमारी सेवा करने के द्वारा, वे परमेश्वर की आज्ञाकारिता कर रहे हैं। वे हमारे लिये परमेश्वर के प्रतिनिधि थे, हमें दिखाने के लिये कि परमेश्वर कैसा है।
मुझे जिन धर्मी अगुवों के अधीन रहने का सौभाग्य मिला है, मैं उनकी कहानियाँ सुनाता रह सकता हूँ। मेरे पापा, हाई स्कूल में मेरे बास्केटबॉल प्रशिक्षक, कॉलेज में मेरे इब्रानी भाषा के प्रोफेसर, मेरे वर्तमान अधिकारी। परमेश्वर ने मुझे बहुतायत से धर्मी अगुवों की आशीष दी है, जो हर बात को करने से पहले प्रभु की आज्ञा का पालन करने का प्रयास करते हैं।
क्या आप उस तरह के अगुवे हैं? यह जानने का एक तरीका यह पता करना है कि जो आप का अनुसरण करते हैं, क्या वे लोग आप की अगुवाई में रहना पसन्द करते हैं। निश्चय ही उनके पाप उनके मार्ग में बाधा बनते होंगे कि प्रभु की आज्ञाकारिता के आप के यथा सम्भव प्रयासों की सराहना न कर पाएँ। परन्तु फिर भी, यह तो होता ही है कि जब अगुवे प्रभु के आज्ञाकारी रहते हैं, तब जो उनके अधिकार के अधीन रहते हैं, उन्हें लाभ होता है, चाहे वे इसे जानें या न जानें।
परमेश्वर का वचन जीवन जीने के निर्देशों से भरा पड़ा है। यदि आप मसीही हैं, तो परमेश्वर का आत्मा आप में वास करता है, उसकी सभी आज्ञाओं का पालन करने में आप की सहायता करता है। इसलिये, आज ही स्वयं को आज्ञाकारिता के लिये समर्पित कीजिये। उसके वचन को पढ़िये, समझने का प्रयास कीजिये कि वह क्या चाहता है कि आप करें, और फिर जाकर उसे करें। ईमानदार, उदार, प्रेम करने वाले, न्यायी, धीरजवन्त, संयमी, और दयालु बनें। इन बातों को तथा इससे भी बढ़कर, परमेश्वर के लिए आज्ञाकारी होने और अपने अधीन लोगों की भलाई के लिये करते रहें।
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चर्चा के प्रश्न:
- क्या आप के जीवन में किसी धर्मी अगुवे का कोई उदाहरण है? यदि हाँ, तो अपने मार्गदर्शक को बताएँ कि उन की देखभाल से आप को क्या लाभ हुआ। आप ने उन से क्या गुण सीखे, जिन्हें आप स्वयं के द्वारा औरों की अगुवाई करते समय लागू करना चाहते हैं।
- अगुवे होने की अपनी जिम्मेदारियों का निर्वाह करते हुए, आप सक्रिय होकर किन तरीकों से प्रभु के आज्ञाकारी रहने के प्रयास कर रहे हैं?
- अगुवाई करने में प्रभु का आज्ञाकारी होना किस तरह से कठिन हो सकता है?
- अगुवाई करने की अपनी विभिन्न जिम्मेदारियों के निर्वाह के लिये, आप प्रभु के और भी अधिक आज्ञाकारी किस प्रकार हो सकते हैं?
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निष्कर्ष
हम मूसा के, और बाइबल की छुटकारे की कहानी में उसकी भूमिका के बारे में और बहुत कुछ कह सकते हैं। बाइबल के अनुसार अगुवाई के बारे में भी हम और भी बहुत कुछ कह सकते हैं। फिर भी, मेरी प्रार्थना है कि इस मार्गदर्शिका ने आप की तथा आप के मार्गदर्शक/मार्गदर्शिका की सहायता की है कि उनमें परमेश्वर का भय विकसित हो और यह लालसा और भी अधिक बढ़े कि अगुवे होने की अपनी ज़िम्मेदारियों को उसकी महिमा के लिये उपयोग करें। मेरी यह आशा भी है कि आप यह समझने के लिये प्रोत्साहित हो सकें कि आप जिनकी अगुवाई कर रहे हैं, उनकी भलाई करना ही वह प्राथमिक कारण है कि प्रभु ने आप को एक अगुवा बनाया है।
लेखक के बारे में
टेलर हार्टले वॉशिंगटन, डी.सी. स्थित 9Marks में संपादकीय निदेशक के रूप में सेवा करते हैं। वे अपनी पत्नी रैचेल (Rachel) के साथ विवाहित हैं और उनके एक पुत्र हैं, जिनका नाम बोदे (Bode) है। टेलर ने साउदर्न बैपटिस्ट थियोलॉजिकल सेमिनरी से एम.डिवि. (M.Div.) की उपाधि प्राप्त की है और वर्तमान में यूनाइटेड किंगडम के लंदन सेमिनरी में थ.एम. (Th.M.) की पढ़ाई कर रहे हैं।
विषयसूची
- भाग I: अच्छी अगुवाई क्या नहीं है
- 1. अच्छी अगुवाई सांसारिक बुद्धिमानी का परिणाम नहीं है
- 2. अच्छी अगुवाई घमण्डी महत्वाकांक्षाओं से नहीं आती है
- चर्चा के प्रश्न:
- भाग II: अच्छी अगुवाई क्या है: नम्रता
- 1. अच्छे अगुवे दुर्बलताएँ मान लेते हैं
- 2. अच्छे अगुवे परमेश्वर के प्रावधानों पर निर्भर रहते हैं।
- चर्चा के प्रश्न:
- भाग III: अच्छी अगुवाई क्या है: दर्शन और साहस
- 1. अच्छे अगुवों के पास दर्शन होता है
- 2. यह यीशु को सर्वप्रथम रखना है
- 3. अच्छे अगुवे साहसी होते हैं
- चर्चा के प्रश्न:
- भाग IV: अच्छी अगुवाई क्या है: आज्ञाकारिता
- 1. अच्छे अगुवे परमेश्वर को समर्पित रहते हैं
- चर्चा के प्रश्न:
- निष्कर्ष
- लेखक के बारे में