#12 पुरुषों की तरह व्यवहार करें
परिचय: आसानी से खो जाने वाली बहुमूल्य वस्तुएँ
यह मेरे लिए यह बात उल्लेखनीय है कि बहुमूल्य वस्तुएँ कितनी आसानी से खो सकती हैं। एक व्यक्ति अपने भोलेपन, ईमानदारी या अच्छी प्रतिष्ठा जैसी मूल्यवान सम्पत्तियाँ बहुत जल्दी खो सकता है। कलीसिया भी बहुमूल्य वस्तुएँ खो सकती है, और आज के समय में ऐसा होता हुआ दिख रहा है। एक आदर्श जो शायद हम खो रहे हैं, वह एक मजबूत, बाइबल आधारित और आत्म-विश्वासी मसीही पुरुषत्व है। इस बात को अधिक समय नहीं हुआ है, जब अमेरिकी पुरुषों से कहा गया था कि वे अपने “स्त्री पक्ष” से जुड़ें (मेरे वाले पक्ष का नाम शेरोन है), और इसी सांस्कृतिक मूर्खता के कारण एक धर्मी पुरुष, एक प्रेम करने वाले पति, एक अच्छे पिता और एक विश्वासयोग्य मित्र होने के अर्थ को लेकर मिथ्याबोध उत्पन्न हुए हैं।
मुझे इस बात में थोड़ा सन्देह है कि आज के समय के पुरुषत्व की समस्या आंशिक रूप से धर्मनिरपेक्ष संस्कृति की एक व्यापक समस्या से उत्पन्न होती है। आज के समय में बहुत सारे जवान अपने पिता के बिना बड़े होते हैं — या ऐसे पिता के साथ बड़े होते हैं, जो अपने पुत्रों के साथ ठीक से जुड़ नहीं पाता — अर्थात् पुरुषत्व को लेकर भ्रम होना बाध्यकारी है। धर्मनिरपेक्ष मीडिया हम सभी पर पुरुषत्व-स्त्रीत्व की ऐसी छवियों और नमूनों की बौछार करता है, जो पूरी तरह से बनावटी हैं। इस बीच, बढ़ती हुई संख्या में सुसमाचार प्रचार करने वाली कलीसियाओं में, स्त्री-केन्द्रित आत्मिकता के सामने मजबूत और धर्मी पुरुषों की उपस्थिति कम होती दिख रही है। हमारे आधुनिक पश्चिमी समाज के बाद वाली समृद्धि में, पुरुष अब जीवित रहने के लिए उस तरह के संघर्ष में शामिल नहीं होते, जो पहले लड़कों को पुरुष बनाता था। फिर भी, हमारे परिवारों और कलीसियाओं को मजबूत, पौरुष वाले मसीही पुरुषों की उतनी ही — या उससे भी अधिक — आवश्यकता है, जितनी पहले कभी नहीं थी। अत: हम अपने खतरे में पड़े पुरुषत्व को फिर से जीवित या फिर से प्राप्त कैसे कर सकते हैं? हमेशा की तरह, इसे आरम्भ करने का पड़ाव परमेश्वर का वचन है, जिसमें इस बात का मजबूत दृष्टिकोण और स्पष्ट शिक्षा मिलती है कि न केवल पुरुष होने का, बल्कि परमेश्वर का जन होने का क्या अर्थ है।
इस क्षेत्रीय मार्गदर्शिका का उद्देश्य इस बारे में सीधी, स्पष्ट और सटीक शिक्षा प्रदान करना है कि पुरुष होने के रूप में बाइबल पुरुषों से क्या कहती है। हमारे लिए ऐसा मसीही पुरुष बनने का क्या अर्थ है, जो हम बनना चाहते हैं, जिसकी हमारे परिवारों को आवश्यकता है कि हम वैसे बनें, और जैसा परमेश्वर ने मसीह में बनने के लिए हमें बनाया और छुड़ाया है? इसके बाइबल आधारित उत्तर बहुत ही सरल हैं, फिर भी आसान होने से बहुत दूर हैं। मैं आशा करता हूँ कि इस अध्ययन के माध्यम से, आप प्रबुद्ध एवं प्रोत्साहित होंगे और इसके परिणामस्वरूप, उन लोगों को भरपूर आशीष मिलेगी, जो आपके जीवन में पाए जाते हैं।
आगे जो लिखा है, वह हमें याद दिलाता है कि मनुष्य होने के रूप में हमारी पहली प्राथमिकता उस परमेश्वर के साथ हमारा वह रिश्ता है, जिसने हमें बनाया है। उसके बाद, सृष्टि में परमेश्वर की रचना से आगे बढ़ते हुए, हम बाइबल के तीन महत्वपूर्ण सिद्धान्तों पर ध्यान देते हैं। अन्त में, हम इन सिद्धान्तों को उन मुख्य रिश्तों पर लागू करेंगे, जिसे परमेश्वर मनुष्यों को प्रदान करता है।
पहली प्राथमिकता: परमेश्वर के साथ आपका रिश्ता महत्वपूर्ण है
हमें आरम्भ से ही यह स्पष्ट कर लेना चाहिए कि कोई भी पुरुष सच्चे पौरुष के लिए बाइबल की बुलाहट को तभी पूरा कर पाएगा, जब वह परमेश्वर के साथ अपने रिश्ते की आशीषों में होकर ही जीवन बिताएगा। पुरुषों के बारे में बाइबल आधारित दृष्टिकोण हमारे सृष्टिकर्ता के रूप में परमेश्वर के साथ आरम्भ होता है: “परमेश्वर ने मनुष्य को अपने स्वरूप के अनुसार उत्पन्न किया” (उत्प. 1:27)। परमेश्वर ने स्त्री-पुरुषों को समान हैसियत और महत्व, परन्तु अलग-अलग रचनाओं और बुलाहटों के साथ बनाया था। परन्तु परमेश्वर को जानना और उसकी महिमा करना ही स्त्री-पुरुष दोनों की सर्वोच्च बुलाहट है।
जिस तरह से परमेश्वर ने हमें बनाया है, उसमें हम परमेश्वर और मानवजाति के बीच के विशेष रिश्ते को देख सकते हैं। मनुष्य को बनाने से पहले, अपने वचन मात्र से ही परमेश्वर वस्तुओं को अस्तित्व में लाया। परन्तु मनुष्य की रचना में, परमेश्वर ने व्यक्तिगत् निवेश का प्रदर्शन किया: “तब यहोवा परमेश्वर ने आदम को भूमि की मिट्टी से रचा, और उसके नथनों में जीवन का श्वास फूँक दिया; और आदम जीवित प्राणी बन गया” (उत्प. 2:7)। यहोवा ने अपने हाथों से मनुष्य को रचा और प्रेम के आमने-सामने वाले रिश्ते के लिए उसकी रचना की। मनुष्य की रचना का वाचा वाला यह स्वभाव आपको बताता है कि परमेश्वर आपको जानना चाहता है और वह चाहता है कि आप उसे जानें। परमेश्वर आपके साथ एक व्यक्तिगत् सम्बन्ध रखना चाहता है। जिस प्रकार परमेश्वर ने प्रथम मनुष्य में जीवन “फूँक दिया”, ठीक उसी प्रकार मसीही लोग परमेश्वर के पवित्र आत्मा के निवास का अनुभव करते हैं, जो हमें उसकी धार्मिकता में होकर जीवन बिताने में सक्षम बनाता है। परमेश्वर ने मनुष्य को अपने स्वरूप में बनाया, कि वह पृथ्वी पर उसकी महिमा का विस्तार करे और उसकी आराधना करे। आज के समय में कुछ पुरुष आराधना को ऐसा कुछ मानते हैं, जिसे करने में एक वास्तविक व्यक्ति उत्साहित नहीं होता। हालाँकि, परमेश्वर को जानना और उसकी महिमा करना किसी भी पुरुष की सर्वोच्च बुलाहट और सौभाग्य है।
इस मामले में, बाइबल आधारित पुरुषत्व पर किसी भी चर्चा के लिए पहली प्राथमिकता यह है कि हम स्वयं को परमेश्वर के वचन — बाइबल — के दैनिक अध्ययन और प्रार्थना के लिए समर्पित करें। जिस प्रकार परमेश्वर का प्रकाश आदम के मुख पर चमका, ठीक उसी प्रकार परमेश्वर का वचन वह प्रकाश है, जिसके द्वारा हम उसे जानते हैं और उसकी आशीष का आनन्द मनाते हैं (भज. 119:105)।
प्रथम मनुष्य की रचना के तुरन्त बाद, परमेश्वर ने आदम को काम पर लगा दिया: “और यहोवा परमेश्वर ने पूर्व की ओर अदन में एक वाटिका लगाई, और वहाँ आदम को जिसे उसने रचा था, रख दिया” (उत्प. 2:8)। आरम्भ से ही, मनुष्यों को यहोवा की सेवा में फलदायी रहना था। वैसे भी, अधिकांश मनुष्यों से सबसे पहला प्रश्न क्या पूछा जाता है? “आप क्या काम करते हैं?” मनुष्य और उसके काम के बीच यह पहचान बाइबल के चित्रण के अनुरूप है। मनुष्यों को परमेश्वर को जानने, उसकी आराधना करने, और अपने काम में उसकी सेवा करने के लिए रचा गया था। इसी कारण परमेश्वर ने आदम और हव्वा को आज्ञा दी: “फूलो–फलो, और पृथ्वी में भर जाओ, और उसको अपने वश में कर लो; और समुद्र की मछलियों, तथा आकाश के पक्षियों, और पृथ्वी पर रेंगने वाले सब जन्तुओं पर अधिकार रखो” (उत्प. 1:28)।
उत्पत्ति की पुस्तक के आरम्भिक अध्यायों से हम मसीही पुरुषत्व के बारे में जो सीखते हैं, आइए उसे सारांशित करें:
- परमेश्वर ने मनुष्य की रचना की, जिसका अर्थ है कि उसे हमें यह बताने का अधिकार है कि हमें क्या करना है।
- हमें परमेश्वर के साथ एक रिश्ते के लिए बनाया गया था। इस कारण सच्चा पुरुषत्व परमेश्वर और उसके तरीकों के हमारे ज्ञान से प्रवाहित होता है।
- परमेश्वर ने अपना आत्मा हमारे भीतर रखा है, जिससे कि हम उसकी महिमा और आराधना करने के लिए जीवन बिता सकें।
- परमेश्वर ने पहले मनुष्य को तुरन्त काम करने के लिए नियुक्त किया, जो यह दर्शाता है कि मसीही पुरुषों को कड़ा परिश्रम करना है और फलदायी होना है।
हमें बाइबल की सृष्टि सम्बन्धी शिक्षा के बारे में इस बात को ध्यान में रखे बिना कभी बात नहीं करनी चाहिए कि पहला मनुष्य परमेश्वर की आज्ञा का उल्लंघन करके पाप में गिर गया था (उत्प. 3:1-6)। उसके परिणामस्वरूप, हम सब के सब पापी हैं, जो परमेश्वर की सृष्टि की योजना से रहित हो गए हैं (रोमि. 3:23; 5:19)। इसी कारण से परमेश्वर ने अपने पुत्र, यीशु मसीह को हमें पाप से बचाने के लिए भेजा कि हमारे स्थान पर मरे और हमें नया जीवन देने के लिए मरे हुओं में से जी उठे। मसीही पुरुष न केवल परमेश्वर की सृष्टि की योजना के अनुसार, बल्कि परमेश्वर के उद्धारक अनुग्रह के द्वारा भी जीवन बिताते हैं। हालाँकि, हमें यह समझना चाहिए कि परमेश्वर की महिमा और हमारी अपनी आशीष के लिए उत्पत्ति के आरम्भिक अध्यायों में प्रकट की गई योजना को पूरा करने के लिए मसीह हमें उद्धार देता है। पापियों के रूप में, परमेश्वर के साथ हमारा रिश्ता उसके पुत्र, यीशु मसीह के माध्यम से है, जो हमें पाप से छुड़ाने वाला अनुग्रह के द्वारा है और जो हमें परमेश्वर के वचन का पालन करने में सक्षम बनाता है।
पुरुषों के रूप में इसी पहली प्राथमिकता से विश्वासयोग्यता के लिए महत्वपूर्ण सिद्धान्त निकलते हैं।
ऑडियो मार्गदर्शिका
ऑडियो#12 पुरुषों की तरह व्यवहार करें
1 विश्वासयोग्यता के सिद्धान्त
बाइबल पुरुषों को अगुवे बनने के लिए बुलाती है
जो कुछ हमने कहा है, उनमें से अधिकांश बातें पुरुषों की तरह स्त्रियों के लिए भी उतनी ही सच हैं, परन्तु यह इतनी महत्वपूर्ण हैं कि हम इसे यूँही नहीं छोड़ सकते। परन्तु जब हम मनुष्य को दी गई विशिष्ट बुलाहट पर ध्यान देते हैं, तो परमेश्वर का सृष्टि क्रम हमारे पहले सिद्धान्त अर्थात् प्रभुता रखने में पुरुषत्व का बुलाहट पर प्रकाश डालता है। थोड़े शब्दों में कहें तो यहोवा ने मनुष्यों को उनके रिश्तों में प्रधानता प्रदान की है, जिसमें अधिकार और जिम्मेदारी दोनों शामिल हैं। इसमें कोई सन्देह नहीं कि परमेश्वर सब लोगों और वस्तुओं पर सर्वोच्च प्रभु है। परन्तु परमेश्वर के द्वारा हमें सौंपी गई जिम्मेदारी वाले क्षेत्रों में प्रभुता का उपयोग करके मनुष्यों को उसकी सेवा करने के लिए बुलाया गया है।
इसे ध्यान में रखते हुए, बाइबल आधारित पुरुषत्व का एक सर्वोत्तम सारांश कुलपति अब्राहम के बारे में यहोवा की एक टिप्पणी में मिलता है:
“क्योंकि मैं जानता हूँ कि वह अपने पुत्रों और परिवार को, जो उसके पीछे रह जाएँगे, आज्ञा देगा कि वे यहोवा के मार्ग में अटल बने रहें, और धर्म और न्याय करते रहें; ताकि जो कुछ यहोवा ने अब्राहम के विषय में कहा है उसे पूरा करे” (उत्प. 18:19)।
ध्यान दें कि परमेश्वर ने अब्राहम से अपेक्षा की थी कि वह अपने बच्चों और परिवार पर अधिकार रखे, जो अब्राहम के दायित्व के अधीन सब लोगों को संदर्भित करता है। अब्राहम को यह सुनिश्चित करते हुए इस रीति से नेतृत्व करना था कि उसका परिवार “यहोवा के मार्ग” पर चले — जिसका अर्थ है कि परमेश्वर के वचन के अनुसार जीवन बिताएँ। इस बात पर भी ध्यान दें कि परमेश्वर कहता है कि यह अब्राहम के धार्मिकता से भरे नेतृत्व के माध्यम से ही होगा “ताकि जो कुछ यहोवा ने अब्राहम के विषय में कहा है उसे (वह) पूरा करे।” यह एक ऐसा कथन है, जो बाइबल आधारित पुरुषत्व के अत्यावश्यक महत्व पर प्रकाश डालता है। यदि मसीही पुरुष अपने परिवारों का नेतृत्व नहीं करते हैं, तो विश्वासियों को परमेश्वर के द्वारा प्रतिज्ञा की गई आशीषों की प्राप्ति सम्भव नहीं है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि सब लोगों को विश्वास और आज्ञाकारिता में परमेश्वर के मार्गों पर चलने के लिए कहा गया है। परन्तु मनुष्य इस रीति में अलग है कि उसे नेतृत्व करने और आज्ञा देने का दायित्व सौंपा गया है: उसे परमेश्वर के द्वारा प्रभुता सौंपी गई है।
उत्पत्ति 2 अध्याय, जो परमेश्वर के द्वारा रचित जीवन पर ध्यान केन्द्रित करता है, उसमें पाई जाने वाली सब बातें उस नेतृत्व की ओर संकेत करती हैं, जिसे परमेश्वर ने मनुष्य को सौंपा था। उदाहरण के लिए, जब परमेश्वर ने मानवजाति के साथ वाचा बाँधी, तो उसने हव्वा को नहीं, परन्तु आदम को आज्ञा दी थी (उत्प. 2:16-17)। परमेश्वर ने अपनी आज्ञा आदम और हव्वा दोनों को क्यों नहीं दी? इसका उत्तर यह है कि परमेश्वर ने आदम को आज्ञा दी थी, और यह आदम की जिम्मेदारी थी कि वह इसे हव्वा को बताए। इसी प्रकार, यह आदम ही था, जिसने पशुओं की विभिन्न प्रजातियों के नाम रखे (उत्प. 2:19)। यदि आपको किसी वस्तु का नाम रखने का अधिकार मिले, तो आप उसके स्वामी हुए! यहाँ तक कि आदम ने ही स्त्री को उसका नाम, हव्वा भी दिया, जो प्रभुता रखने के माध्यम से पुरुषों के द्वारा परमेश्वर की सेवा करने के उसकी बुलाहट की अभिव्यक्ति है (उत्प. 3:20)।
धार्मिकता से भरी प्रभुता का उपयोग करने के लिए पुरुषों को जिम्मेदारी स्वीकार करने और अधिकार के काम में लाने की आवश्यकता होती है। इसका एक अच्छा उदाहरण रूत अध्याय 2 में हमें मिलता है, जब बोअज़ नाम के एक जमींदार ने एक निर्धन परन्तु भली स्त्री पर ध्यान दिया, जो उसके खेतों में अनाज बीन रही थी (अर्थात् फसल के बाद जो थोड़ा-बहुत बच गया था, उसे बटोर रही थी)। बोअज़ को मालूम था कि स्त्रियाँ अपनी स्थिति में कमजोर होती हैं और उसके सभी पुरुषों पर भरोसा नहीं किया जा सकता। उसने रूत के बारे में पूछताछ करके जान लिया था कि उसका चरित्र अच्छा है। अत: उसने न केवल उसे अपने खेतों में अनाज बीनने की अनुमति दी, बल्कि अपने अधिक लापरवाह पुरुषों को भी आदेश दिया कि उसे परेशान न करें, और फिर जब उसे प्यास लगी तो उसके लिए पानी पीने का प्रबन्ध किया (रूत 2:9)। यही धार्मिकता से भरी प्रभुता है! उस पुरुष ने जिम्मेदारी स्वीकार की और अधिकार का उपयोग किया, जिससे कि यह सुनिश्चित हो सके कि एक आवश्यकता में पड़ी स्त्री की देखभाल और सुरक्षा हो। बोअज़ ने परमेश्वर के वचन के अध्ययन करने के माध्यम से दया और धार्मिकता के महत्व को सीखा था; ये वही प्राथमिकताएँ हैं, जिन्हें मसीही पुरुष बाइबल के अपने अध्ययन में खोजते और सीखते हैं। बोअज़ ने अपने घराने पर शासन करने के लिए परमेश्वर के द्वारा प्रदान की गई प्रभुता का उपयोग किया, जिससे कि परमेश्वर की इच्छा पूरी हो, प्रभु की महिमा हो, और लोगों की देखभाल हो। यह उस प्रकार की प्रभुता का एक उत्कृष्ट चित्रण है, जिसके लिए परमेश्वर सभी मनुष्यों को बुलाता है।
जब मनुष्य नेतृत्व नहीं करते तो क्या होता है? हम पहले ही परमेश्वर की यह टिप्पणी देख चुके हैं कि यदि अब्राहम अपने घराने को आज्ञा न देता, तो उससे किए गए परमेश्वर के वादे पूरे नहीं होते। इसका एक और उदाहरण राजा दाऊद की अपने परिवार के विषय में असफलता है। दाऊद बाइबल के बड़े नायकों में से एक है। उसने गोलियत को घात किया और इस्राएल का राजा होने के लिए परमेश्वर के द्वारा उसका अभिषेक किया गया। उसने युद्ध में परमेश्वर के लोगों का नेतृत्व किया, यरूशलेम को इस्राएल की राजधानी के रूप में स्थापित किया, और भजन संहिता की पुस्तक का एक बड़ा भाग लिखा। फिर भी दाऊद अपने परिवार में एक घोर असफल व्यक्ति था, और नेतृत्व करने की इस उपेक्षा ने न केवल दाऊद के जीवन को बर्बाद कर दिया, बल्कि लोगों के लिए उसके द्वारा किए गए बहुत से अच्छे कार्यों को भी नष्ट कर दिया।
दाऊद के पुत्रों पर विचार करें, जो प्रसिद्ध बदमाशों की सूची में शामिल हैं। सबसे पहले हम अम्नोन से मिलते हैं। यह पुत्र अपनी सुन्दर सौतेली बहन तामार पर इतना मोहित था कि उसने उसका यौन उत्पीड़न किया और फिर उसे सार्वजनिक रूप से अपमानित किया। जैसा कि आप 2 शमूएल 13 अध्याय पढ़ते हैं, यह स्पष्ट है कि दाऊद को अपनी पुत्री के संकट का पता होना चाहिए था और दाऊद को उसे बचाने के लिए हस्तक्षेप करना चाहिए था। जब दाऊद ने इस अपराध के बारे में कुछ नहीं किया, तो तामार के सगे भाई अबशालोम ने मामले को अपने हाथों में लेकर अपने भाई अम्नोन को मार डाला, जिससे राजकीय घराने में उथल-पुथल मच गई। फिर से, दाऊद ने इसमें कोई नेतृत्व नहीं दिया, बल्कि अबशालोम को केवल निर्वासन में जाने दिया। इस निर्वासन से, अबशालोम ने एक विद्रोह का षड्यंत्र रचा, जिसने दाऊद के राज्य को लगभग उखाड़ फेंका और एक बड़े युद्ध की आवश्यकता आ पड़ी, जिसमें कई सैनिक मारे गए (2 शमू. 13-19 अध्यायों को देखें)। दाऊद के जीवन के अन्त में भी, उसके एक और दुष्ट पुत्र, अदोनिय्याह उत्पन्न हुआ, जिसने दाऊद के उत्तराधिकारी सुलैमान से उसका सिंहासन छीनने का प्रयत्न किया (1 राजा 1 अध्याय)।
दु:खद सच्चाई यह है कि दाऊद का शासन उथल-पुथल और अराजकता में इसलिए समाप्त हुआ, क्योंकि उसने अपने घराने का नेतृत्व नहीं किया। हम इस मूर्खतापूर्ण व्यवहार की व्याख्या कैसे करें? बाइबल इसकी दो व्याख्याएँ देती है। पहला राजाओं 1:6 में दाऊद के द्वारा अदोनिय्याह को क्षमा करने के बारे में एक टिप्पणी मिलती है, जिसे हम उसके सभी पुत्रों के लिए सत्य मान सकते हैं: दाऊद ने “उसे कभी यह कहकर उदास न किया था, “तू ने ऐसा क्यों किया।” दाऊद ने अपने पुत्रों की जिम्मेदारी नहीं ली और न ही उन पर अधिकार जताया। उसने यह नहीं जाना कि उनके जीवनों में (और उससे भी महत्वपूर्ण बात, उनके हृदयों में) क्या चल रहा था और न ही उसने उन्हें सुधारा या अनुशासित किया। शायद दाऊद युद्ध लड़ने और गीत लिखने में इतना व्यस्त था कि एक पिता के रूप में वह अपना कर्तव्य ही पूरा नहीं कर पाया। उसकी असफलता पुरुषों के लिए, विशेष रूप से घर में, प्रभुता का उपयोग करने के महत्व को उजागर करती है।
परन्तु दाऊद के नेतृत्व की असफलता का एक और अधिक तीखा उत्तर मिलता है। हम इन सभी परेशानियों के आरम्भ होने से पहले की ओर जाते हैं और बतशेबा के साथ दाऊद के भयंकर पाप को पाते हैं। दूसरा शमूएल 11 अध्याय उन मसीही पुरुषों को चेतावनी देता है, जो काम और घर में अपने कर्तव्यों से बचने की परीक्षा में पड़ते हैं। इस्राएली सेना युद्ध लड़ रही थी, परन्तु दाऊद आराम करने के लिए घर पर ही रह गया। पूरी तरह सतर्क न रहते हुए, जब उसने एक सुन्दर स्त्री को नहाते देखा, तो वह वासना की परीक्षा का आसान शिकार बन गया। एक पुरुष के रूप में उसके पतन का संकेत देने वाली एक छोटी सी घटना में, दाऊद ने बतशेबा को बुलाया और उसके साथ सोया, भले ही वह जानता था कि वह उसके सबसे अच्छे सैनिकों में से एक की पत्नी थी। जब बतशेबा गर्भवती हो गई, तो दाऊद ने उसके पति की हत्या का षड्यंत्र रचा, जिससे कि वह उससे विवाह करके अपना पाप छिपा सके।
क्या आपने ध्यान दिया कि दाऊद के पुत्रों ने बाद में जो पाप किए, वे उन्हीं पापों के अनुरूप थे, जो उन्होंने उसे करते हुए देखे थे? दाऊद ने एक सुन्दर लड़की के साथ कुकर्म किया, और उसके पुत्र अम्नोन ने भी वैसा किया। दाऊद ने एक धर्मी व्यक्ति के विरुद्ध षडयंत्र रचा और उसे छिपा लिया, और अबशालोम के लिए एक मार्ग तैयार किया, जो बाद में उस पर चलेगा। इससे क्या शिक्षा मिलती है? मसीही पुरुषों को अवश्य ही नेतृत्व करना चाहिए। और हमारा नेतृत्व विश्वास और भक्ति के उस उदाहरण से आरम्भ होता है, जिसे हम स्थापित करते हैं। यदि हम पाप करते हैं — और हम ऐसा करते भी हैं — तो हमें पश्चाताप करके अपने पापों को मान लेना चाहिए, और अपनी बुरी आदतों को बदलने के लिए कदम उठाने चाहिए। यदि हम भक्ति का उदाहरण नहीं स्थापित करते, तो परमेश्वर की सेवा में प्रभुता रखने की हमारी बुलाहट एक दिखावा मात्र बनकर रह जाएगी। और, राजा दाऊद की तरह, परमेश्वर की आशीष खो जाएगी, क्योंकि जिस व्यक्ति को नेतृत्व करने के लिए बुलाया गया था, वह ऐसा करने में विफल रहा।
आगे बढ़ने से पहले, आइए कुछ बातों पर विचार करें, जो एक धर्मी व्यक्ति अपनी पत्नी और परिवार का नेतृत्व करने के लिए करता है:
- वह यीशु मसीह पर विश्वास करने और परमेश्वर के वचन के अनुसार ईमानदारी से जीवन जीने के द्वारा एक उदाहरण स्थापित करता है।
- वह यह सुनिश्चित करता है कि उसका परिवार एक ऐसी विश्वासयोग्य कलीसिया में जाए, जहाँ परमेश्वर का वचन सही ढंग से सिखाया जाता है।
- वह अपनी बाइबल पढ़ता है, प्रार्थना करता है और अपने घर के अन्य सदस्यों को भी ऐसा करने के लिए कहता है।
- वह अपनी पत्नी और बच्चों की जिम्मेदारी लेता है, उनका ध्यान रखता है, और उन्हें उचित रीति से जीवन जीने हेतु प्रोत्साहित करने के लिए परमेश्वर के द्वारा प्रदान किए गए अपने अधिकार का उपयोग करता है।
बाइबल पुरुषों को पालन-पोषण करने के लिए कहती है
बाइबल पुरुषों के लिए एक अनमोल संसाधन है। परमेश्वर का वचन न केवल हमें यह बताता है कि हमें क्या करना है, बल्कि हमें एक तरीका भी प्रदान करता है कि घर के बाहर पति, पिता और अगुवे के रूप में हमें सेवा और नेतृत्व कैसे करना है। हमने पहले ही उस बात के महत्व पर ध्यान दिया है, जो सृष्टि में पुरुषों के लिए परमेश्वर की रचना के बारे में पवित्रशास्त्र कहता है। असल में, बाइबल आधारित पुरुषत्व के बारे में सबसे अधिक जानकारीपूर्ण कथनों में से एक उत्पत्ति 2:15 में दिखता है, जिसे मैंने किसी और जगह पर पौरुष के आदेश के रूप में संदर्भित किया है।1 यह आयत एक ऐसा प्रतिमान स्थापित करती है, जिसे हम पूरी बाइबल में देखते हैं, और पुरुषों को दो कार्य देती है, जो उन्हें मसीही अगुवों के रूप में सफल होने में सक्षम बनाते हैं: “तब यहोवा परमेश्वर ने आदम को लेकर अदन की वाटिका में रख दिया, कि वह उसमें काम करे और उसकी रक्षा करे” (उत्प. 2:15)।
अदन की वाटिका वाचा के सम्बन्धों का एक ऐसा संसार था, जिसे प्रभु ने मानवजाति के लिए तैयार किया था। इसमें विवाह, परिवार, कलीसिया और यहाँ तक कि कार्यस्थल भी शामिल था। यहोवा ने आदम को इस वाटिका में और साथ ही उन रिश्तों में भी रखा, जो परमेश्वर ने वहाँ जीवन के लिए तैयार किए थे।
जिन दो शब्दों पर मैं ध्यान लगाना चाहता हूँ, वे हैं “काम करे” और “रक्षा करे”। यहाँ बाइबल आधारित पुरुषत्व का तरीका मिलता है। यही तो परमेश्वर की आज्ञाकारिता वाली प्रभुता है। और ऐसे ही काम करना है और रक्षा करनी है, अर्थात् ये ऐसे दो शब्द हैं, जो पूरी बाइबल में पुरुषत्व की दिशा निर्धारित करते हैं। इनमें से दूसरे का — अर्थात् रक्षा करे — का अर्थ है, रखवाली करना और सुरक्षा प्रदान करना (इस पर हम अगले भाग में विचार करेंगे)। इनमें से पहली आज्ञा काम करने की है, जिसका अर्थ है, अच्छी फसल उत्पन्न करने के लिए अपना परिश्रम निवेश करना। इस मामले में, जिसमें आदम को एक वाटिका में रखा गया है, काम करने का अर्थ है कि उसकी देखभाल करना और उसके पौधों की खेती करनी है, जिससे कि वे बढ़ें और भरपूर फलें-फूलें। यहाँ पुरुषत्व के लिए बाइबल आधारित दूसरा सिद्धान्त मिलता है। पहला यह है कि पुरुष को प्रभुता रखना के लिए बुलाया गया है। और दूसरा यह है कि परमेश्वर का वचन पुरुषों को पालन-पोषण करने के लिए कहता है।
काम करने का बाइबल आधारित विचार — जिसका अर्थ खेती करना और पोषण करना है — हो सकता है कि पुरुषत्व का वह पहलू हो, जो हमारे समाज के पारम्परिक विचारों से सबसे अधिक मेल नहीं खाता। पुरुषों को अक्सर “मजबूत और चुप रहने वाले” के रूप में देखा जाता है, जो शायद ही कभी संवाद करते हैं या भावनाएँ प्रदर्शित करते हैं। हालाँकि, हमारे रिश्तों में परमेश्वर के द्वारा पुरुषों को जो करने के लिए कहा जाता है, यह उसके ठीक विपरीत है। आदम की उंगलियाँ वाटिका की मिट्टी से भूरी हो जानी चाहिए थीं; इसी रीति से, मसीही पुरुषों के हाथ अपनी पत्नियों और बच्चों के हृदय की मिट्टी से भूरे हो जाने चाहिए। चाहे कोई पुरुष काम पर हो, कलीसिया में किसी से बात कर रहा हो, या अपने घर का नेतृत्व कर रहा हो, उसे व्यक्तिगत् रुचि लेनी चाहिए और इस तरह से कार्य करना चाहिए, जिससे उन्हें आशीष मिले और उन्हें उन्नति करने के लिए प्रेरित करें।
क्या आपका कभी कोई पुरुष मालिक रहा है, जिसका आप सचमुच सम्मान करते हों, जिसने आपसे हाथ मिलाकर कहा हो कि तुमने बहुत अच्छा काम किया है? शायद यह कोई प्रशिक्षक था, जिसने आपसे कहा हो कि उसे आप पर विश्वास है, या कोई शिक्षक जिसने आपको अलग ले जाकर कहा हो कि आप में असली क्षमता है। यही पुरुष का “काम करना” — अर्थात् विशिष्ट रूप से पुरुषत्व की सेवा है, जो सीधे हृदय तक पहुँचती है।
कॉलेज में गर्मियों के समय बाग-बगीचों की भूमि पर काम करना मेरी पसन्द वाली नौकरी थी। हर दिन हम गाड़ी चलाकर काम की जगह पर — जो अक्सर किसी के घर पर होता था — पेड़ लगाने, बगीचे की दीवारें बनाने और झाड़ियों की कतारें लगाने के लिए जाते थे। यह काम कठिन परन्तु संतोषजनक था। जो बात मुझे सबसे अच्छी लगती थी, वह गाड़ी से जाते समय दर्पण में निहारकर यह देखना था कि हमने कुछ ऐसा काम कर दिया है, जो अच्छा है और बढ़ रहा है। यह वही संतुष्टि है, जिसे परमेश्वर चाहता है कि मनुष्यों को लोगों के साथ अपने सम्बन्धों में मिले — विशेष रूप से उन लोगों के साथ जिन्हें हमारे नेतृत्व और देखभाल के अधीन रखा गया है। हमें उनमें व्यक्तिगत् रुचि लेनी है, उनका मार्गदर्शन करना है, उनके हृदयों को जानना है, अपने मन की बातें उनसे साझा करनी हैं, तथा उन्हें प्रेरणा और प्रोत्साहन देना है, जिससे अक्सर उनके जीवन बदल जाते हैं।
पुरुषों को बच्चों को विकसित करने और उनका पालन-पोषण करने के लिए मिला यह आदेश लैंगिक भूमिकाओं के बारे में एक गम्भीर भ्रांति को उजागर करता है। हमें सिखाया गया है कि स्त्रियाँ ही मुख्य पालन-पोषणकर्ता होती हैं, जबकि पुरुषों को दूर रहना चाहिए और उसमें शामिल नहीं होना चाहिए। परन्तु बाइबल पुरुषों को अपने नेतृत्व में लोगों के हृदयों के विकास और चरित्र निर्माण की प्राथमिक जिम्मेदारी की बुलाहट देती है। एक पति से कहा जाता है कि वह अपनी पत्नी का भावनात्मक और आत्मिक रूप से पालन-पोषण करे। ठीक उसी रीति से, एक पिता से कहा जाता है कि वह अपने बच्चों के हृदय में खेती करने और रोपने के प्रति सजग रहे। कोई भी सलाहकार जिसने बचपन के मुद्दों को देखा हो, वह आपको बता सकता है कि एक बच्चे के लिए अपने पिता से भावनात्मक दूरी से अधिक हानिकारक कुछ नहीं हो सकता। इतने सारे लोग अपने पिता के साथ अपने रिश्ते को लेकर असमंजस में रहते हैं, इसका एक यह कारण है कि परमेश्वर ने भावनात्मक और आत्मिक पालन-पोषण का प्राथमिक दायित्व पुरुषों को दिया है, और हममें से कई लोग इसे अच्छे से नहीं कर पाते हैं। यह पुरुष के द्वारा कंधे पर हाथ रखना या पीठ थपथपाना ही है, जिससे परमेश्वर किसी बच्चे या कर्मचारी के हृदय तक सबसे तेजी से पहुँच पाता है। हो सकता है कि यह हमारी पूर्वधारणाओं से मेल न खाए, परन्तु जो पुरुष परमेश्वर की इच्छा के अनुसार नेतृत्व करना चाहते हैं, उन्हें पालन-पोषण करने वाला होना चाहिए।
इस बात को ध्यान में रखते हुए, नीतिवचन की पुस्तक में मेरी पसन्द वाली आयत 23:26 है, “हे मेरे पुत्र, अपना मन मेरी ओर लगा।” इसमें कोई सन्देह नहीं कि जो व्यक्ति इस प्रकार बोलता है, उसने पहले अपने पुत्र, पुत्री या कर्मचारी की ओर अपना मन लगाया होगा। मुझे संयुक्त राज्यों की सेना में एक शस्त्राधिकारी के रूप में कई वर्षों तक सेवा करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। अब मैं अपने विभिन्न सेनापतियों को याद करता हूँ, जिनमें से कुछ के लिए मैं शीशे में रेंगकर जाता था (और मैं सच में रेंगा था), और कुछ ऐसे भी थे, जो बिलकुल भी प्रेरणादायी नहीं थे। मुझे उन बढ़िया सेनापतियों के बारे में कौन सी बात याद है? वे अपने अधिकारियों और सैनिकों से बात करते थे। वे हँसते थे, सिखाते थे, सुधारते थे और प्रोत्साहित करते थे। वे उपस्थित रहते थे और कड़ा परिश्रम करते थे, और बड़ी इच्छा रखते थे कि उनकी पलटन जीते। आपको ऐसा लगता था, जैसे आप उन्हें जानते हैं और वे आपको जानते हैं। पुरुष नेतृत्व के साथ हर क्षेत्र में ऐसा ही होता है। बच्चे चाहते हैं कि उनका पिता उनकी ओर अपना मन लगाए, और जब वह उनकी ओर अपना मन लगाता है, तो बदले में वे भी उसकी ओर अपना मन लगाते हैं।
इसमें कोई सन्देह नहीं कि नेतृत्व करना कभी भी केवल मजाक और खेल नहीं होता। इसमें कुछ आज्ञाएँ शामिल होती हैं, जिनका पालन किया जाना आवश्यक होता है। इसमें किए जाने वाले सुधार और दिए जाने वाले दण्ड होते हैं। परन्तु बाइबल आधारित एक व्यक्ति नेतृत्व के सभी कार्यों को अपने अनुयायियों की भलाई में व्यक्तिगत् रुचि और उन्हें उनकी क्षमता तक पहुँचाने की जुनूनी इच्छा के साथ करता है। आप ऐसे पिता को गेंद से खेलते समय अपने पुत्र या पुत्री का उत्साहवर्धन करते हुए देखते हैं — जो उनका उपहास नहीं उड़ाता या उन्हें उत्पीड़ित नहीं करता — और गेंद पकड़ना खेलते हुए या उन्हें गेंद मारना सिखाते हुए वह कई घण्टे बिता देता है, परन्तु फिर जब वे सफल होते हैं, तो सारा श्रेय उन्हें दे देता है। जब एक मसीही व्यक्ति दूसरों के जीवन में “काम” करता है — अर्थात् वाटिका में आदम की तरह उनके हृदयों का पोषण और निर्माण करता है — तो लाभार्थी उसके ध्यान से प्रसन्न होते हैं और उसके प्रेम के प्रभाव में उन्नति करते हैं।
बाइबल एक व्यक्ति के काम करने और पालन-पोषण करने की बुलाहट का वर्णन एक और तरीके से अपनी भेड़ों के साथ एक चरवाहे की छवि के माध्यम से करती है। भजन संहिता 23 अध्याय एक ऐसे चरवाहे के बारे में बात करता है, जो अपने मेम्नों के कल्याण में अपने आप को पूरी तरह से न्यौछावर कर देता है, उनका नेतृत्व करता है, उनकी सेवा करता है, और उनकी सभी आवश्यकताओं को पूरा करता है।
यहोवा मेरा चरवाहा है, मुझे कुछ घटी न होगी।
वह मुझे हरी हरी चराइयों में बैठाता है;
वह मुझे सुखदाई जल के झरने के पास ले चलता है; वह मेरे जी में जी ले आता है।
धर्म के मार्गों में वह अपने नाम के निमित्त मेरी अगुवाई करता है। (भज. 23:1-3)
यही वह सेवक वाली प्रभुता है, जिसके लिए परमेश्वर मनुष्यों को दूसरे लोगों का, विशेष रूप से अपनी पत्नी और बच्चों का पालन-पोषण करने के लिए बुलाता है। इसके लिए प्रयास, ध्यान और गहन चिन्ता की आवश्यकता होती है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि ये शब्द आखिरकार यीशु मसीह अर्थात् अच्छे चरवाहे के बारे में लिखे गए थे, जो अपनी भेड़ों के लिए अपना प्राण देता है (यूह. 10:11)। यह मनुष्य जो यीशु के बारे में इन शब्दों को कह सकता है, वह हमारी आत्माओं का चरवाहा है, जो हमें अनन्त जीवन की ओर ले जाता है, जिसके हृदय में दूसरों की चरवाही करने का भाव है। यीशु सच्चे पुरुषत्व का सबसे बड़ा उदाहरण हैं, जिसने उन लोगों के पालन-पोषण और उद्धार के लिए अपना प्राण न्यौछावर कर दिया, जिन्हें वह बहुत प्रेम करता है, यहाँ तक कि उन्हें पाप से छुड़ाने के लिए क्रूस पर भी मर गया।
काम करने के — अर्थात् जिनसे हम प्रेम करते हैं, उनके हृदयों का पोषण और मार्गदर्शन करने के — इस महत्वपूर्ण विषय पर अपनी चर्चा समाप्त करते हुए, मैं कुछ प्रश्न पूछना चाहता हूँ, जिससे कि यह पता चल सके कि हम कैसा कर रहे हैं (और हम कैसा करना चाहते हैं!):
- क्या मैं अपनी पत्नी और बच्चों (या महत्वपूर्ण रिश्तों में अन्य लोगों) के निकट हूँ, जिससे कि मैं उनके हृदय को जान और समझ सकूँ?
- क्या मेरी देखभाल में रहने वाले लोगों को ऐसा महसूस होता है कि मैं उन्हें जानना चाहता हूँ और क्या मैं उनसे इस तरह बात करता हूँ, जिससे उन्हें प्रोत्साहन और शिक्षा मिले?
- क्या मेरी पत्नी और बच्चे (या अन्य लोग) ऐसा महसूस करते हैं कि वे मुझे जानते हैं? क्या मैंने उन्हें अपने हृदय की बात बताई है? क्या वे ऐसा महसूस करते हैं कि वे उन कार्यों में मेरे साथ शामिल हो सकते हैं, जिनके बारे में मैं जुनूनी हूँ? क्या वे ऐसा महसूस करते हैं कि मैं उनके बारे में और उनकी आशीष के बारे में जुनूनी हूँ?
- जब मैं सुसमाचारों में यीशु मसीह का जीवन देखता हूँ, तो उसने चिन्ता करना दिखाने के लिए, अपने शिष्यों से जुड़ने के लिए, और उन्हें आत्मिक विकास की ओर ले जाने के लिए क्या किया, जिसका मैं अनुभव और फिर उसका अनुकरण करता हूँ?
बाइबल पुरुषों को रखवाला बनने के लिए बुलाती है
उत्पत्ति 2:15 के पुरुषत्व वाले आदेश का दूसरा भाग “रक्षा करना” है, जिसका अर्थ है कि एक पुरुष परमेश्वर के द्वारा उसकी देखरेख में रखी गई वस्तुओं की रखवाली और सुरक्षा करता है। यह बाइबल आधारित पुरुषत्व के सम्बन्ध में हमारा तीसरा सिद्धान्त है। जब दाऊद ने अपने जीवन में प्रभु की चरवाही वाली देखभाल के बारे में विचार किया, तो उसने न केवल प्रभु के द्वारा उसका मार्गदर्शन करने की, बल्कि उसकी रक्षा करने की भी बात कही: “चाहे मैं घोर अन्धकार से भरी हुई तराई में होकर चलूँ, तौभी हानि से न डरूँगा; क्योंकि तू मेरे साथ रहता है; तेरे सोंटे और तेरी लाठी से मुझे शान्ति मिलती है” (भज. 23:4)। इसी रीति से, पुरुष के नेतृत्व के तरीके में न केवल पालन-पोषण करना और प्रोत्साहन देना, बल्कि लोगों और वस्तुओं की सुरक्षा के लिए खड़े होकर रखवाली करना भी शामिल है।
बाइबल में एक और स्थान नहेम्याह 4:17-18 है जहाँ हम “काम करना” और “रक्षा करना” — अर्थात् निर्माण करना और सुरक्षा देना — दोनों को देखते हैं, जब यरूशलेम के लोग शहरपनाह बना रहे थे। नहेम्याह ने पुरुषों से कहा था कि एक हाथ में फावड़ा या कुदाल रखें और दूसरे हाथ में तलवार या भाला रखें। बाइबल आधारित पुरुषत्व — अर्थात् निर्माण करना और सुरक्षा देना यही है।
जैसे भजन संहिता 23 अध्याय में एक चरवाहे के रूप में यहोवा एक उत्तम आदर्श है, वैसे ही भजन संहिता 121 अध्याय में यहोवा अपनी रखवाली करने वाली देखभाल की बात करता है। वहाँ, यहोवा यह प्रतिज्ञा करता है कि वह अपने लोगों की निगरानी करेगा: “तेरा रक्षक कभी न ऊँघेगा। सुन, इस्राएल का रक्षक, न ऊँघेगा और न सोएगा” (भज. 121:3-4)। भजनकार कहता है कि “यहोवा सारी विपत्ति से तेरी रक्षा करेगा; वह तेरे प्राण की रक्षा करेगा” (भज. 121:7)। परमेश्वर हमारी रक्षा करने और हमें सुधारने के लिए हमारी निगरानी करता है, जिससे कि हम भटक न जाएँ। यहाँ पुरुषों के रूप में हमारा उदाहरण है, जो अपनी देखभाल में सौंपी गई वस्तुओं की रक्षा करते हैं।
पुरुष होने का अर्थ खतरे या अन्य बुराई के समय खड़े होना और भरोसा के योग्य होना है। परमेश्वर नहीं चाहता कि पुरुष निष्क्रिय खड़े रहें और हानि होने दें या दुष्टता करने की अनुमति दें। इसके बजाय, हमें उन सभी वाचा वाले सम्बन्धों में जिनमें हम प्रवेश करते हैं, दूसरों को सुरक्षित रखने के लिए बुलाया गया है। हमारे परिवारों में, हमारी उपस्थिति का अर्थ हमारी पत्नियों और बच्चों को सुरक्षित और सहज महसूस कराना है। कलीसिया में, हमें सांसारिकता और बुराई के विरुद्ध सत्य और भक्ति के लिए खड़ा होना है। समाज में, हमें उन पुरुषों के रूप में अपना स्थान लेना है, जो बुराई के विरुद्ध खड़े होते हैं और देश को खतरे की आशंका से बचाते हैं।
हालाँकि, दु:खद वास्तविकता तो यह है कि कई मामलों में, सबसे बड़ा खतरा जिससे हमें अपनी पत्नियों और बच्चों की सुरक्षा करने की आवश्यकता है, वह हमारा अपना पाप होता है। मुझे याद है कि मैंने वर्षों पहले एक ऐसे व्यक्ति को सलाह दी थी, जिसका विवाह संकट में था। एक पड़ाव पर, उसने शेखी बघारते हुए कहा था कि यदि कोई व्यक्ति बंदूक लेकर उनके घर में घुस जाए, तो वह अपनी पत्नी की सुरक्षा करेगा: “उसके लिए तो मैं गोली भी खा लूँगा।” परन्तु फिर, पलक झपकते ही उसने स्वीकार किया, “असल में, मैं ही वह व्यक्ति हूँ, जो मेरे घर में घुसकर मेरी पत्नी को चोट पहुँचाता है।” हमें अपनी देखभाल में रहने वाले लोगों की अपने क्रोध, कठोर शब्दों, आत्म-केन्द्रितता और उपेक्षा से सुरक्षा करने की आवश्यकता है।
निगरानी करने और सुरक्षा देने की हमारी पौरुष की बुलाहट के सम्बन्ध में विचार करने के लिए यहाँ कुछ प्रश्न दिए गए हैं:
- क्या मुझे मेरी पत्नी और बच्चों के लिए मुख्य खतरों की जानकारी है? मैं उनके बारे में क्या कर रहा हूँ?
- क्या मेरी पत्नी (या मेरी देखभाल में रहने वाले अन्य लोग) उस समय सुरक्षित महसूस करते हैं, जब मैं उपस्थित होता हूँ? मुझे यह सुनिश्चित करने के लिए कौन से बदलाव करने चाहिए कि वह सुरक्षित महसूस करे?
- मेरे वे कौन से पाप हैं, जो दूसरे लोगों को, विशेष रूप से मेरे परिवार को, हानि पहुँचाते हैं? क्या मैं उनकी इतनी चिन्ता करता हूँ कि अपनी पापी आदतों से निपट सकूँ? क्या मैं आदत के अनुसार क्रोध करता हूँ? क्या मैं गालियाँ देता हूँ या कठोरता से बात करता हूँ? यदि ऐसा है, तो क्या मैंने बदलाव लाने का प्रयत्न करते हुए इन बातों के बारे में अपने पास्टर से बात की है? क्या मैं इन पापों के बारे में प्रार्थना करता हूँ? यदि मैं इन हानिकारक व्यवहारों का पश्चाताप करूँ, तो दूसरों पर क्या असर पड़ेगा?
बाइबल पुरुषों को परमेश्वर के द्वारा बनाए गए रिश्तों में बुलाती है
अब तक हमने जो देखा है, वह पुरुषत्व के लिए मूल बाइबल आधारित वास्तुकला है। पुरुषों को अपने रिश्तों में “काम करने और रक्षा करने” के द्वारा, अर्थात् पालन-पोषण और सुरक्षा करके प्रभुता का उपयोग करते हुए परमेश्वर की सेवा और महिमा करने के लिए बुलाया गया है। ये सभी सिद्धान्त उत्पत्ति के आरम्भिक अध्यायों से निकलते हैं और फिर पूरी बाइबल में इन्हें सुदृढ़ किया जाता है।
इस क्षेत्रीय मार्गदर्शिका में हमारा अन्तिम विषय उन संदर्भों पर विचार करेगा, जिनमें पुरुषत्व को जिया जाता है, जिन्हें बाइबल में पाए जाने वाले परमेश्वर के द्वारा बनाए गए रिश्ते कहा जाता है। याद करें जब हमने देखा था कि परमेश्वर ने “उस वाटिका में आदम को रख दिया” जिसे उसने बनाया था (उत्प. 2:8)? हम उस वाटिका को परमेश्वर की रचना का एक वाचा वाला संसार मान सकते हैं, जिसमें स्त्री-पुरुषों को परमेश्वर की महिमा के लिए रहना है और फल उत्पन्न करना है। इन रिश्तों में विवाह और पितृत्व प्रमुख हैं, यद्यपि अन्य रिश्ते (जैसे काम, मित्रता और कलीसिया) भी महत्वपूर्ण हैं। हमने विवाह और पितृत्व के अनुप्रयोगों पर चर्चा की है, परन्तु आइए अगले भाग में इन पर थोड़ा और ध्यान दें।
चर्चा एवं मनन:
- पुरुषत्व के इस दर्शन का कौन सा भाग इस बारे में आपकी सोच के तरीके को चुनौती देता है कि पुरुष होने का क्या अर्थ है?
- इनमें से आपको किस क्षेत्र में सबसे अधिक उन्नति करने की आवश्यकता है? क्या इनमें से कोई एक आपकी सामर्थ्य है?
2 विवाह में बाइबल आधारित पुरुषत्व
उत्पत्ति 2:18 में एक महत्वपूर्ण कथन मिलता है, जब यहोवा ने ध्यान दिया, “आदम का अकेला रहना अच्छा नहीं।” सृष्टि के वृत्तांत में अब तक सब कुछ कितना अच्छा रहा है! परमेश्वर ने सृष्टि की, और फिर अपने काम पर दृष्टि करके “देखा कि वह अच्छा है” (उत्प. 1:25)। परन्तु अब सृष्टिकर्ता ने कुछ ऐसा देखा जो अच्छा नहीं है — यह बहुत महत्वपूर्ण बात होनी चाहिए। परमेश्वर ने जिस समस्या पर ध्यान दिया, वह उसकी रचना में कोई दोष नहीं था, बल्कि कुछ अपूर्णता थी। परमेश्वर ने स्त्री-पुरुष को विवाह के पवित्र बन्धन में साथ रहने के लिए रचा था; इसी कारण यहोवा ने आगे कहा, “मैं उसके लिए एक ऐसा सहायक बनाऊँगा जो उस से मेल खाए” (उत्प. 2:18)। परमेश्वर ने स्त्री को पुरुष का प्रतिद्वंद्वी बनने के लिए नहीं, बल्कि उसका पूरक बनने के लिए रचा था।
यह स्पष्ट बाइबल आधारित शिक्षा दर्शाती है कि पुरुषों को एक धार्मिकता से भरी पत्नी से विवाह करने की इच्छा रखनी चाहिए। जैसा कि आज के समय में आम बात है, उसके विपरीत, पुरुषों को अपना अधिकांश जीवन “खेल-खेल में” बिताते हुए प्रतिबद्धता से पीछे नहीं हटना चाहिए। इसके बजाय, एक पुरुष को घर बसाना चाहिए, एक स्त्री के साथ सम्बन्ध बनाने की प्रतिबद्धता रखनी चाहिए, और एक परिवार का आरम्भ करना चाहिए। यह स्पष्ट है कि ऐसे अपवाद भी मिलते हैं, जब ऐसा नहीं होता, और मैं पुरुषों को दोषी महसूस नहीं कराना चाहता कि यदि उन्होंने विवाह की इच्छा की और निराशा का सामना किया। मुख्य बात तो यह है कि पुरुषों को विवाह के पक्ष में होना चाहिए। हमें अपने पुत्रों को इस आशा के साथ बड़ा करना चाहिए कि आज नहीं तो कल, वे जल्दी ही पति बनेंगे। नीतिवचन 18:22 बाइबल के दृष्टिकोण को सारांशित करता है: “जिसने स्त्री ब्याह ली, उसने उत्तम पदार्थ पाया, और यहोवा का अनुग्रह उस पर हुआ है।”
यह कोई रहस्य नहीं है कि हमारी पीढ़ी को विवाह करना कठिन लगता है, और ऐसा मुख्य रूप से इसलिए है, क्योंकि हम अपने पापों को बनाए रखते हैं और फिर भी सफलता की आशा करते हैं। उन मसीही पुरुषों को, जिनके पापों को क्षमा कर दिया गया है और जो परमेश्वर के वचन के अनुसार जीवन बिताने का प्रयास करते हैं, उन्हें विवाह में जाने का आत्मविश्वास होना चाहिए, जब तक कि उनकी पत्नी स्वयं एक समर्पित मसीही हो। एक गैर-मसीही स्त्री से विवाह करना “असमान जुए” में जुतने के समान है (2 कुरिं. 6:14)। यह रूपक बिना मेल वाले दो बैलों की तुलना करता है, जिन्हें एक साथ जुए में जोता दिया गया है, जिससे कि वे एक साथ मिलकर काम नहीं कर सकते हैं। यही बात उस विवाह के विषय में भी सत्य है, जिसमें एक साथी मसीही है और दूसरा मसीही नहीं है। अविश्वासी से विवाह करने के बाद भी मसीह पर विश्वास करना एक बात है, ऐसे में हमें परमेश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए कि जब हम सुसमाचार की सेवा करें और उसकी गवाही दें, तो परमेश्वर हमारी पत्नी का हृदय परिवर्तन करे। परन्तु एक ऐसे पुरुष का जो पहले से ही मसीही है, एक अविश्वासी स्त्री से विवाह करना बिलकुल अलग बात है।
पुरुषत्व पर बाइबल की मूल शिक्षा यदि हमें शिक्षाप्रद लगी है, तो हम पाएँगे कि ये सिद्धान्त मसीही विवाह के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण हैं। पुरुष को पालन-पोषण करने और सुरक्षा करने के द्वारा नेतृत्व करना है। इससे यह सिद्ध होता है कि यह ढाँचा विवाह में पतियों के बारे में बाइबल में कही गई बातों से बिलकुल मेल खाता है, जो इस शिक्षा को एक सुखी परिवार के लिए आवश्यक बनाता है।
वैवाहिक प्रभुता
सबसे पहली बात, बाइबल इस बारे में बिलकुल स्पष्ट है कि पति को विवाह को आत्मिक रूप से और अन्य रूप से नेतृत्व प्रदान करना है। आप इस पर दिए गए जोर को उस बात में देख सकते हैं, जो प्रभु धार्मिकता से भरी पत्नियों को सिखाता है:
“हे पत्नियों, अपने अपने पति के ऐसे अधीन रहो जैसे प्रभु के। क्योंकि पति पत्नी का सिर है जैसे कि मसीह कलीसिया का सिर है और स्वयं ही देह का उद्धारकर्ता है। पर जैसे कलीसिया मसीह के अधीन है, वैसे ही पत्नियाँ भी हर बात में अपने अपने पति के अधीन रहें” (इफि. 5:22-24; और 1 पत. 3:1-6 को भी देखें)।
जब हम इसे पढ़ते हैं, तो पुरुषों के रूप में हमारी पहली प्रतिक्रिया दीनता की होनी चाहिए। परमेश्वर पत्नियों को अपने पति के नेतृत्व के अधीन रहने के लिए इसलिए नहीं कहता क्योंकि वह अधिक चतुर, समझदार या अधिक धर्मी है — कई मामलों में, वह ऐसा नहीं होता! इसके बजाय, विवाह में पुरुष प्रधानता का कारण सृष्टि में परमेश्वर की रचना है। पुरुषों को दृढ़ निश्चयी होने के लिए बनाया गया है (टेस्टोस्टेरोन के बारे में सोचें), जबकि स्त्रियों को यहोवा के द्वारा पुरुष के साथ आने और उसकी सहायता करने के लिए बुलाया गया है (“मैं उसके लिए एक सहायक बनाऊँगा”)। ये व्यक्तित्व के लक्षण नहीं हैं, बल्कि एक बुलाहट है, जिसमें परमेश्वर पुरुषों को एक मजबूत-परन्तु-कोमल, आत्मविश्वासी-परन्तु-दीन, मसीह-समान तरीके से नेतृत्व करने के लिए तैयार करता है।
पुरुष प्रधानता का अर्थ यह नहीं है कि पति हर वस्तु के बारे में सभी निर्णय ले। मसीह ने कहा कि एक धर्मिकता से भरा विवाह सर्वोपरि एकता को प्रतिबिम्बित करेगा: “अत: वे अब दो नहीं, परन्तु एक तन हैं” (मत्ती 19:6)। एक विवाहित जोड़े को आपसी सहमति बनाने की खोज करनी चाहिए, और इस प्रयास में पति को अगुवाई करनी चाहिए। उदाहरण के लिए, एक पुरुष और उसकी पत्नी को साथ बैठकर अपने आर्थिक लक्ष्यों पर चर्चा करनी चाहिए। कई मामलों में, स्त्री की भूमिका महत्वपूर्ण होगी और वह अपने पति से बेहतर धन का प्रबन्धन कर पाएगी। परन्तु पति को अपनी पत्नी का बोझ कम करते हुए और धन तथा दान देने के बारे में बाइबल के सिद्धान्तों को लागू करते हुए आर्थिक निर्णय लेने में अगुवाई करनी चाहिए। पति और पत्नी को मिलकर यह निर्धारित करना चाहिए कि किस कलीसिया में जाना है, और पति इस बात पर जोर दे कि बाइबल की विश्वासयोग्य शिक्षाओं को प्राथमिकता दी जाए। विवाहित जीवन के हर क्षेत्र में ऐसा ही होता है कि पति को धार्मिकता से भरी एकता के लक्ष्य के साथ अगुवाई करनी चाहिए। इन सभी निर्णयों के लिए प्रार्थना की आवश्यकता होगी, अत: नेतृत्व करना हमेशा संयुक्त प्रार्थना और परमेश्वर के वचन के प्रति आज्ञाकारिता के विषय में प्रतिबद्ध होना चाहिए।
जब हम “प्रभारी होने” के बारे में सोचते हैं, तो जो खण्ड हमारी पत्नियों को अधीन रहने के लिए कहता है, वही पुरुषों को भी मसीह-समान, सेवक नेतृत्व के लिए बुलाता है: “हे पतियों, अपनी अपनी पत्नी से प्रेम रखो, जैसा मसीह ने भी कलीसिया से प्रेम करके अपने आप को उसके लिए दे दिया” (इफि. 5:25)। यीशु ने अपनी कलीसिया से कैसे प्रेम किया? उसके लिए अपना प्राण देकर! इसी रीति से, एक पति को अपनी पत्नी के हितों को, विशेष रूप से उसकी आत्मिक और भावनात्मक आवश्यकताओं को, सबसे पहले रखना चाहिए। जब एक पति अपनी पत्नी को अधीन रहने के लिए “अपना पाँव नीचे रखता” है, तो ऐसा आमतौर पर बाइबल आधारित शिक्षा या ज्ञान की आज्ञाकारिता में होना चाहिए या पुरुष को उसके लिए बलिदान चढ़ाना चाहिए। ऐसा पति जो मसीह-समान आत्म-बलिदान के साथ विवाह में नेतृत्व करता है, वह अक्सर अपनी पत्नी को उसकी प्रधानता के प्रति समर्पण करने में संघर्ष करते हुए नहीं पाएगा।
वैवाहिक पालन-पोषण
पुरुषों को न केवल अपनी पत्नियों का नेतृत्व करना होता है, बल्कि उनके साथ “काम” भी करना होता है। इसका अर्थ है कि उन्हें आदम के द्वारा पहली वाटिका में खेती के समान तरीके से उनका पालन-पोषण करना है। इसका अर्थ है कि एक पति के पास अपनी पत्नी की आत्मिक और भावनात्मक आशीष के लिए एक योजना होनी चाहिए। उसे अपने जीवन में उसकी उन्नति और कल्याण को अपने सबसे महत्वपूर्ण कार्यों में से एक मानना चाहिए। वह केवल “उससे विवाह करके आगे बढ़” नहीं जाता। इसके बजाय, वह अपनी पत्नी के निर्माण और उसकी आशीष को प्रोत्साहित करने में अपने विवाह के सारे दिनों में अपने आप के समर्पित कर देता है।
आप इस प्राथमिकता को उन बातों में देखते हैं, जो प्रेरित पौलुस ने इफिसियों 5:28-30 में विवाह के बारे में कही थीं:
”इसी प्रकार उचित है कि पति अपनी अपनी पत्नी से अपनी देह के समान प्रेम रखे। जो अपनी पत्नी से प्रेम रखता है, वह अपने आप से प्रेम रखता है। क्योंकि किसी ने कभी अपने शरीर से बैर नहीं रखा वरन् उसका पालन–पोषण करता है, जैसा मसीह भी कलीसिया के साथ करता है। इसलिए कि हम उसकी देह के अंग हैं।”
पौलुस का अर्थ है कि जिस तरह एक पुरुष में अपने शरीर की आवश्यकताओं को पूरा करने की सहज प्रवृत्ति होती है — अर्थात् वह भूख लगने पर खाता है, प्यास लगने पर पीता है, और थकने पर सोता है — ठीक उसी तरह एक पति को भी अपनी पत्नी की आवश्यकताओं के प्रति एक सहज प्रतिक्रिया विकसित करनी चाहिए। यह अनिवार्य रूप से एक पति के अपनी पत्नी से बात करने के तरीके में झलकेगा। एक पास्टर के रूप में, मैं ऐसे पतियों को जानता हूँ, जो अपनी पत्नियों से उसी तरह बात करते हैं, जैसे वे फुटबॉल के लॉकर वाले कमरे में लड़कों से बात करते थे। ऐसा न करें। वह तुम्हारी पत्नी है! पुरुषों को बोलने से पहले, और विशेष रूप से अपनी पत्नियों से बोलने से सोचना चाहिए।
अपनी पत्नी का पालन-पोषण करने के निमित्त पुरुष की बुलाहट यह जानने के लिए है कि उसके हृदय में क्या चल रहा है। और चूँकि स्त्रियाँ पुरुषों के लिए पूरी तरह से रहस्यमयी होती हैं, इसलिए इसे जानने का एकमात्र तरीका यह है कि उससे पूछ लें। इसे आजमा कर देखें: अपनी पत्नी के पास जाएँ, और उसे बताएँ कि आप उसके पालन-पोषण के लिए समर्पित रहना चाहते हैं, और आप जानना चाहेंगे कि उसके हृदय में क्या चल रहा है। आप यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि वह आपको बता देगी कि कौन सी बात उसे चिन्तित करती है, वह किससे डरती है, वह किससे सुन्दर और हर्षित महसूस करती है, और वह किस बात के लिए प्रार्थना करती है और किस बात की लालसा करती है। यह एक पालन-पोषण करने वाले पति के लिए उपयोगी जानकारी है। इसका एक अच्छा अभ्यास यह है कि आप हर सुबह अपनी पत्नी के साथ प्रार्थना करें, और उससे ईमानदारी से पूछें कि आप उसके लिए कैसे प्रार्थना कर सकते हैं। समय बीतने के साथ, वह आपकी प्रेमी सेवा पर भरोसा करते हुए, अपना हृदय और भी खोल देगी, और आपकी पालन-पोषण करने वाली देखभाल आप दोनों को वैवाहिक प्रेम में बाँध देगी।
अब तक, मैंने इफिसियों 5 अध्याय में प्रेरित पौलुस की विवाह सम्बन्धी शिक्षा का उल्लेख किया है। परन्तु प्रेरित पतरस के पास 1 पतरस 3:7 में भी मूल्यवान शिक्षा मिलती है। मेरे विचार से, यह पतियों के लिए सबसे मूल्यवान आयत है:
“वैसे ही हे पतियों, तुम भी बुद्धिमानी से पत्नियों के साथ जीवन निर्वाह करो, और स्त्री को निर्बल पात्र जानकर उसका आदर करो, यह समझकर कि हम दोनों जीवन के वरदान के वारिस हैं, जिससे तुम्हारी प्रार्थनाएँ रुक जाएँ।”
जब पतरस कहता है कि हमें अपनी पत्नियों के साथ “जीवन निर्वाह करना” चाहिए, तो वह एक क्रिया का उपयोग करता है, जिसका अर्थ किसी और जगह पर “बातचीत करना” होता है। दूसरे शब्दों में कहें तो हमें अपनी पत्नियों के साथ केवल भोजन के समय और यौन सम्बन्ध के लिए नहीं, बल्कि अपना जीवन साझा करना है। जब वह कहता है कि हमें ऐसा “बुद्धिमानी से” करना है, तो उसका अर्थ है कि हमें उसके बारे में, विशेष रूप से उसके हृदय की बातों के बारे में जानकारी होनी चाहिए। “आदर करने” का अर्थ अपनी पत्नियों को हर्ष से भर देना है — अर्थात् ऐसी बातें कहना और करना जो यह दर्शाएँ कि हम उनसे प्रेम करते हैं और उन्हें महत्व देते हैं। और हमें यह याद रखना है कि हमारी पत्नियाँ परमेश्वर की प्रिय पुत्रियाँ हैं — और हाँ, यदि हम अपनी पत्नियों की उपेक्षा करते हैं, तो परमेश्वर कहता है कि वह हमारी प्रार्थनाओं की उपेक्षा करेगा।
मेरे अनुभव से पता चला है कि “कार्य करने” का यह सिद्धान्त — अर्थात् अपनी पत्नियों का भावनात्मक रूप से और आत्मिक रूप से पालन-पोषण करना — अक्सर मसीही विवाहों में से गायब रहने वाली बात है। पुरुषों को यह पता ही नहीं होता कि उन्हें अपनी पत्नियों का हृदय जीतना है। अत: एक मसीही पुरुष के द्वारा अपनी पत्नी से इस बुलाहट की उपेक्षा के लिए क्षमा माँगना और फिर ईमानदारी से (और उसकी सहायता से) ऐसा करना आरम्भ करना अक्सर विवाह में क्रांति ला देता है और जोड़े को एक साथ ऐसे बाँध देता है, जैसा पहले कभी नहीं हुआ।
वैवाहिक सुरक्षा
“काम करे और रक्षा करे” का दूसरा भाग एक पुरुष के लिए विवाह में अपनी पत्नी की सुरक्षा करना है। थोड़े शब्दों में कहें तो एक पति जिस तरह से अपनी पत्नी के साथ व्यवहार करता है और उससे बात करता है, उससे उसे सुरक्षित महसूस होना चाहिए। निश्चित रूप से इसमें शारीरिक सुरक्षा भी शामिल है, जिसे एक पुरुष को अपनी पत्नी के लिए सुनिश्चित करना चाहिए। मसीही पुरुषों को विशेष रूप से अपनी पत्नियों को उनके सबसे स्पष्ट और हानिकारक पापों से बचाना चाहिए। उदाहरण के लिए, बहुत से पुरुष अपनी पत्नियों पर बहुत अधिक क्रोध दिखाते हैं या उनसे कठोर बातें करते हैं, जिससे वैवाहिक बन्धन का भरोसा और सुरक्षा कमजोर हो जाती है। चाहे वह क्रोध हो या कोई और पापी प्रवृत्ति हो, हम अपनी पत्नियों की सुरक्षा के लिए परमेश्वर के अनुग्रह की ओर मुड़कर उनकी बुराइयों के स्थान पर धार्मिकता से भरे सद्गुणों का सहारा लेते हैं।
“रक्षा करने” में रिश्तों को बचाना और उनकी सुरक्षा करना भी शामिल है, जो एक स्वस्थ विवाह के लिए बहुत आवश्यक है। उदाहरण के लिए, एक पत्नी को अन्य स्त्रियों के प्रति आदर में सुरक्षित महसूस करना चाहिए। एक धर्मी पुरुष किसी अन्य स्त्री के आकर्षक और कामुक होने पर टिप्पणी नहीं करेगा, और वह उसे किसी अन्य स्त्री को घूरते हुए नहीं देखेगी। यौन शुद्धता पर पौलुस की शिक्षा विशेष रूप से पतियों पर लागू होती है: “और न निर्लज्जता, न मूढ़ता की बातचीत की, न ठट्ठे की; क्योंकि ये बातें शोभा नहीं देतीं, वरन् धन्यवाद ही सुना जाए” (इफि. 5:4)।
यदि हम सुखी वैवाहिक जीवन चाहते हैं, तो हम विपरीत लिंग के सदस्यों के साथ घनिष्ठ मित्रता नहीं बढ़ाएँगे, और हम किसी अन्य स्त्री से अकेले में नहीं मिलेंगे (यह दोनों तरफ से लागू होता है, क्योंकि ऐसा व्यवहार विवाह की सुरक्षा को ही खतरे में डाल सकता है)। यदि किसी पुरुष का किसी स्त्री के साथ घनिष्ठ कार्य सम्बन्ध है, तो उसे अपनी पत्नी के साथ ही भावनात्मक रूप से अंतरंगता बनाए रखने के लिए विशेष रूप से सावधान रहने की आवश्यकता होगी। यदि वह (मेरी तरह) एक पास्टर है और उसे कलीसिया में स्त्रियों की सेवा करनी है, तो उसे भावनात्मक रूप से न जुड़ने के विषय में बहुत सावधान रहना होगा। मैंने उस नियम का पालन किया है, जिसे पहले “बिली ग्राहम का नियम” कहा जाता था और जिसे अब मसीही पूर्व उपराष्ट्रपति “माइक पेंस के नियम” के रूप में जाना जाता है। यह नियम कहता है कि मैं कभी भी किसी ऐसी स्त्री के साथ बंद कमरे में नहीं रहूँगा, जो मेरी माता, मेरी पत्नी या मेरी पुत्री न हो। मैं अपने परिवार से बाहर की किसी स्त्री के साथ अकेले गाड़ी में यात्रा नहीं करूँगा। मैं अपने परिवार से बाहर की स्त्रियों के साथ अकेले बिलकुल नहीं मिलता, और यदि मुझे बातचीत करने की आवश्यकता होती है, तो मैं दरवाजा खुला रखने या कम से कम कमरे में झाँकने वाली एक खिड़की रखने पर जोर देता हूँ। यह आपके लिए — परीक्षा और बदनामी के आरोपों के विषय में एक समझदारी भरा बचाव है। और जबकि कुछ लोग आपको घमण्डी या पुराने जमाने का समझेंगे, परन्तु आपकी पत्नी इसकी बहुत सराहना करेगी। वह इस रिश्ते में सुरक्षित महसूस करेगी।
सम्भवत: आप विवाहित न हों, परन्तु केवल मिलना-जुलना ही चल रहा हो। तो मैं आपको प्रोत्साहित करना चाहूँगा कि विवाह में पुरुषत्व के लिए बाइबल आधारित प्रतिमान उस रिश्ते में बहुत कार्यशील होता है, जो विवाह की ओर बढ़ रहा है। असल में, वैवाहिक रिश्ते को विकसित करने का सबसे अच्छा तरीका है कि अभी से उन सिद्धान्तों का पालन करना आरम्भ कर दिया जाए, जो एक अच्छे विवाह के लिए आवश्यक हैं। इसका अर्थ है कि प्रेमी को त्यागपूर्ण तरीके से उस रिश्ते का नेतृत्व करना चाहिए। वह इस बात की प्रतीक्षा नहीं करता कि वह बारे में बातचीत आरम्भ करे कि “इस रिश्ते में हम कहाँ हैं”, बल्कि वह इस बारे में बात करता है और इसे स्पष्ट करता है कि उसकी क्या मंशाएँ हैं (और हाँ, कभी-कभी इसका अर्थ यह होता है कि वह कहे कि उन्हें अलग हो जाना चाहिए)। जब कोई जोड़ा एक साथ होता है, तो लड़का अपना सारा समय अपने बारे में, अपने काम के बारे में और अपने खेल के दलों के बारे में बात करने में नहीं बिताता। इसके बजाय, वह उस लड़की में रुचि लेता है और उसके हृदय को समझने का प्रयत्न करता है। वह उससे पूछता है कि उसकी रुचि किन बातों में है, वह परमेश्वर के वचन से क्या सीख रही है, उसकी प्रार्थना की आवश्यकताएँ क्या हैं, इत्यादि। और वह उसे सुरक्षित महसूस कराता है। इसका अर्थ है कि वह उस पर यौन दबाव नहीं डालता, बल्कि यौन शुद्धता में उसका नेतृत्व करता है। वह इस तरह से बात करता और व्यवहार करता है, जिससे उसे सहज महसूस हो। यह बाइबल आधारित प्रतिमान न केवल एक धार्मिकता से भरे विवाह की तैयारी का एक अच्छा तरीका है, बल्कि यह एक मसीही स्त्री को अपने प्रेम में डालने का सबसे अच्छा तरीका भी है!
मैंने पहले बताया था कि कैसे बोअज़ ने रूत के कल्याण की जिम्मेदारी उठाई थी, जब वह विधवा थी और उसके खेतों में अनाज बीनने का काम कर रही थी। वह उसके प्रति दयालु हुआ, उसकी सुरक्षा को सुनिश्चित किया, और उदारता से उसकी आवश्यकताओं का ध्यान रखा। क्या इसमें कोई आश्चर्य की बात है कि यह कहानी उन दोनों के विवाह के साथ समाप्त होती है? हम इसके बारे में रूत 3:9 में पढ़ते हैं, जहाँ रूत बोअज़ के पास जाकर उसे सुझाव देती है कि उन्हें विवाह कर लेना चाहिए: “मैं तो तेरी दासी रूत हूँ; तू अपनी दासी को अपनी चद्दर ओढ़ा दे, क्योंकि तू हमारी भूमि छुड़ाने वाला कुटुम्बी है।” ध्यान दें कि उसने अपनी बात कैसे रखी — वह बोअज़ की पत्नी इसलिए बनना चाहती थी, क्योंकि वह उसके प्रति मसीह-समान व्यवहार करता था। इससे यह स्पष्ट होता है कि कोई भी मसीही पुरुष किसी धर्मी स्त्री के जीवन में यीशु का स्थान कभी नहीं ले सकता। परन्तु वह उससे इस तरह प्रेम कर सकता है कि जो उसे यीशु की याद दिलाए। यदि हम विवाह में पुरुषत्व के बाइबल आधारित प्रतिमान का पालन करें, तो हमारी पत्नियाँ भी हमारे प्रति ऐसा ही महसूस करेंगी।
चर्चा एवं मनन:
- क्या आप किसी विश्वासयोग्य पति का अच्छा उदाहरण जानते हैं? अपने प्रशिक्षक के साथ चर्चा करें कि कौन सी बात उसे एक अच्छा उदाहरण बनाती है।
- यदि आप विवाहित हैं, तो एक पति के रूप में आपको किस क्षेत्र में उन्नति करनी चाहिए? यदि आप अभी तक विवाहित नहीं हैं, तो आप एक अच्छा पति बनने की तैयारी कैसे कर सकते हैं?
3 पिताओं के रूप में बाइबल आधारित पुरुषत्व
यदि विवाह परमेश्वर के द्वारा पुरुष के लिए तैयार किया गया प्राथमिक सम्बन्ध है, तो पितृत्व सम्भवत: ऐसी सबसे महत्वपूर्ण भूमिका है, जिसे कोई भी पुरुष निभाएगा। यदि एक मसीही पति अपनी पत्नी से वैसा ही प्रेम करे जैसा मसीह ने कलीसिया से प्रेम किया था, तो मसीही पिताओं को अपने बच्चों के पालन-पोषण करने के तरीके में परमेश्वर पिता के प्रेमी चरित्र का अनुकरण करना चाहिए। यह सौभाग्य की बात है, चूँकि परमेश्वर पिता और परमेश्वर पुत्र एक ही पटकथा से चलते हैं, इसलिए सामान्य रूप से पुरुषत्व के बारे में हमने जो सिद्धान्त सीखे हैं, वे एक विश्वासयोग्य और प्रभावी मसीही पिता बनने की कुंजी हैं।
पितृत्व की प्रभुता
अपने बच्चों को आज्ञा देने का एक पिता का अधिकार इफिसियों 6:1 के निर्देश में उजागर किया गया है, “हे बालकों, प्रभु में अपने माता-पिता के आज्ञाकारी बनो, क्योंकि यह उचित है।” ध्यान दें कि बच्चों को अपने पिता (और माता) की आज्ञा इसलिए नहीं माननी है, क्योंकि वे बड़े हैं और शक्तिशाली हैं तथा दण्ड देने में सक्षम हैं, बल्कि इसलिए माननी है, क्योंकि “यह उचित है।” पिताओं के लिए यह परमेश्वर की योजना है कि वे अपने बच्चों का नेतृत्व करें और उन्हें इसी आधार पर आज्ञाकारिता सिखाई जानी चाहिए। इसके अतिरिक्त, बाइबल सिखाती है कि माता-पिता की आज्ञा मानना सीखना जीवन में बच्चे की सफलता के लिए महत्वपूर्ण है। बच्चे को अपने पिता की आज्ञा इस कारण माननी है “कि तेरा भला हो, और तू धरती पर बहुत दिन जीवित रहे” (इफि. 6:3)। इस कारण, जबकि एक पिता को नियम बताते और उन्हें लागू करते हुए अपने बच्चों पर अधिकार जताना चाहिए, और साथ ही उदाहरण के लिए उसे कोमल-हृदय और दयालु भी होना चाहिए: “हे बच्चेवालों, अपने बच्चों को रिस न दिलाओ, परन्तु प्रभु की शिक्षा और चेतावनी देते हुए उनका पालन–पोषण करो” (इफि. 6:4)।
पितृत्व की सुरक्षा
पुरुष नेतृत्व के विषय में “कैसे करें” पर चर्चा करते समय, मैंने पिछली बातों में “रक्षा करने” से पहले “काम करने” पर विचार किया है। इस मामले में, मैं बच्चों की सुरक्षा और रखवाली में पिता की भूमिका पर इसलिए सबसे पहले चर्चा करना चाहता हूँ, क्योंकि यह अत्यन्त महत्वपूर्ण है कि हम अपने बच्चों को अनुशासित करें।
याद करें कि कैसे राजा दाऊद ने अपने पुत्रों को कभी “उदास” नहीं किया, जिसके परिणामस्वरूप वे बड़े होकर दुष्ट विद्रोही बन गए? इस्राएल के महायाजक एली के विषय में, उसके पुत्रों होप्नी और पीनहास के साथ भी यही हुआ। ये निकम्मे पुत्र इतने दुष्ट थे कि उन्होंने तम्बू के बाहर ही व्यभिचार किया, इसलिए परमेश्वर ने उन्हें मार डाला और एली का कुल समाप्त हो गया (1 शमू. 2:27-34)। एली ने कम से कम अपने पुत्रों को डाँटने का प्रयत्न तो किया, परन्तु उसने उन्हें रोकने के लिए कुछ नहीं किया और वे मर गए।
इन उदाहरणों को देते हुए, यह आश्चर्य की बात नहीं है कि बाइबल मसीही माता-पिताओं को अपने बच्चों को अनुशासित करने की आज्ञा देती है। इसका अर्थ है कि जब वे छोटे हों, तो उन्हें अपने माता-पिता की अनाज्ञाकारिता (और अन्य पापों) के लिए पीटा जाना चाहिए। नीतिवचन 13:24 बच्चों को अनुशासित करने के बाइबल की बुलाहट के दोनों पहलुओं को प्रस्तुत करता है। पहला पहलू नकारात्मक है: “जो बेटे पर छड़ी नहीं चलाता, वह उसका बैरी है।” उसके बाद का पहलू सकारात्मक है: “परन्तु जो उस से प्रेम रखता, वह यत्न से उसे शिक्षा देता है।” यदि हम बच्चों को उस समय अनुशासित नहीं करते जब उनका बालक हृदय लचीला होता है, तो हम उन्हें आगे के जीवन के लिए बर्बाद कर रहे होते हैं — वे बाद में उचित अधिकार के अधीन नहीं आएँगे। नीतिवचन 29:15 कहता है, “छड़ी और डाँट से बुद्धि प्राप्त होती है।” यह नितम्बों की पीड़ा का स्पर्शनीय प्रभाव ही है जो हृदय को सद्गुणों की इच्छा करना सिखाता है।
मुझे यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि हमें अपने बच्चों को पीटते समय कभी भी शारीरिक रूप से चोट नहीं पहुँचानी चाहिए। इसका लक्ष्य हानि पहुँचाना नहीं, बल्कि एक पीड़ादायी प्रभाव छोड़ना है। इस कारण से, पिताओं को हमेशा अपने पुत्र या पुत्री के पास जाने से पहले क्रोध पर नियंत्रण रखते हुए आत्म-संयम से अनुशासित रहना चाहिए। सार्वजनिक रूप से पीटने से बेहतर है कि निजी अनुशासन दिया जाए, जिससे कि हम उन्हें लज्जित न करें। हमारे बच्चों के लिए हमारा लक्ष्य है कि वे अपनी गलती को उसके पीड़ादायी दुष्परिणामों से जोड़ें, कि हम अपनी बात स्पष्ट रूप से समझाएँ और फिर अनुशासन समाप्त होने के बाद उनसे मेल-मिलाप कर लें।
जैसे-जैसे हमारे बच्चे बड़े होते हैं, तो यूँ कहें कि पीटने का प्रभाव कम होता जाता है। किशोरावस्था से कुछ समय पहले, पिता अनाज्ञाकारिता को सुधारने और परमेश्वर के वचन के प्रति कोमल विवेक को ढालने के लिए मौखिक फटकार पर निर्भर होना आरम्भ कर देंगे। यह फटकार कहीं अधिक प्रभावी होती है, यदि हमने अपने बच्चों के साथ स्नेह का एक मजबूत बन्धन बना लिया है। विशेष रूप से जब हमारे बच्चे बड़े होते हैं और अधिक बातों को समझने लगते हैं, तो हमें उन्हें अपनी माँगों का बाइबल का आधार और साथ ही जीवन के अनुभव जो हमारी सीमाओं को निर्धारित करते हैं, स्पष्ट रूप से समझाना चाहिए। बच्चों को अनुशासित करना उन्हें उस सबसे बड़े खतरे से बचाने का प्राथमिक तरीका है, जिसका वे— उनके अपने पाप और मूर्खता से कभी सामना करेंगे।
पितृत्व वाला पालन-पोषण
मैं सबसे पहले पितृत्व वाले अनुशासन को इसलिए सम्बोधित करना चाहता था, क्योंकि यह पहले आता है, अर्थात् यह हमारे बच्चों के छोटे होने के समय से ही आरम्भ हो जाता है। परन्तु अनुशासनात्मक सुरक्षा को शिष्यत्व के रूप में पितृत्व वाले पालन-पोषण से जोड़ा जाना चाहिए। पिताओं को व्यक्तिगत् रूप से अपने बच्चों का प्रभु पर विश्वास करने और अपने जीवनों के माध्यम से उन्नति के पथ पर नेतृत्व करना चाहिए। यह पिता ही है, जो सबसे पहले विनती करता है, “हे मेरे पुत्र, अपना मन मेरी ओर लगा” (नीति. 23:26), और फिर जब फटकारने का समय आता है तो उसकी बात सुनी जाती है।
जिस प्रकार एक धर्मी पति यह जानना चाहता है कि उसकी पत्नी के हृदय में क्या चल रहा है, ठीक उसी प्रकार एक धर्मी पिता भी अपने पुत्र-पुत्रियों के हृदय को जानने का प्रयत्न करता है। वह सफलता को केवल व्यवहार के संदर्भ में नहीं, बल्कि चरित्र और विश्वास के संदर्भ में परिभाषित करता है। नीतिवचन यह नहीं कहता, “हे मेरे पुत्र, अपना आचरण मुझे दे,” या “अपनी भौतिक उपस्थिति मुझे दे।” शिष्यत्व का लक्ष्य हृदय को: अर्थात् इच्छाओं, आकांक्षाओं, पहचान की भावना और उद्देश्य को प्राप्त करना है। शिष्यत्व की पालन-पोषण वाली सेवकाई में, एक पिता भरोसे वाले प्रेम के रिश्ते और यीशु मसीह पर विश्वास के एक साझा बन्धन की खोज करता है। अपने बच्चों के हृदय तक पहुँचने के लिए दृढ़ता, प्रयास और प्रार्थना की आवश्यकता होती है। परन्तु यदि हमारा लक्ष्य हृदय नहीं है, तो हम इसे कभी प्राप्त नहीं कर पाएँगे। यही कारण है कि हम अपना मन अपने बच्चों की ओर लगाते हैं, उनके साथ समय बिताते हैं, साथ मिलकर अच्छे समय का आनन्द लेते हैं, परिवार के रूप में विपरीत परिस्थितियों का सामना करते हैं, और उत्साह के साथ प्रभु की आराधना करते हैं।
अपने बच्चों के हृदय तक पहुँचने के लिए मैंने चार चरणों वाला एक तरीका निकाला है: पढ़ें — प्रार्थना करें — काम करें — खेलें।
1. पढ़ें
एक पिता अपने बच्चों को उनके लिए बाइबल पढ़कर और बाइबल की सच्चाइयों के बारे में बताकर शिष्य बनाता है। सबसे अच्छी बात यह है कि ऐसा पारिवारिक आराधना के लिए निर्धारित समय पर ही नहीं, बल्कि हमारे दैनिक जीवन में भी हो सकता है। पौलुस कहता है कि “विश्वास सुनने से, और सुनना मसीह के वचन से होता है” (रोमि. 10:17)। किसी व्यक्ति के लिए यीशु पर विश्वास करना केवल परमेश्वर के वचन की सामर्थ्य के द्वारा ही हो सकता है। हम भी अपने बच्चों के साथ बाइबल की उन सच्चाइयों को साझा करना चाहते हैं, जो हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं और बाइबल की खोज की इस यात्रा में उनके साथ चलना चाहते हैं।
बहुत से पिता अपने बच्चों की शिष्यता दूसरों को सौंपने का प्रयत्न करने की गलती करते हैं। वे उन्हें कलीसिया ले जाते हैं, उन्हें जवानों के समूह में रखते हैं, और उन्हें मसीही विद्यालयों में या घरेलू पाठशाला में भेजते हैं। परन्तु पिता की जगह कोई और नहीं ले सकता! अपने बच्चों के लिए बाइबल पढ़ने और उनके साथ बाइबल पढ़ने के लिए आपको बाइबल का विद्वान होने की आवश्यकता नहीं है (यद्यपि यदि पिता होने के रूप में आप बाइबल के सिद्धान्तों के प्रति गम्भीर हैं, तो यह और भी बेहतर होगा)।
एक पिता जिसके पास अपने परिवार के साथ बाइबल पढ़ने का समय नहीं है, उसे अपनी प्राथमिकताओं पर गम्भीरता से चिन्तन करने की आवश्यकता है। नाश्ते के समय या रात के खाने के बाद बाइबल का एक खण्ड पढ़ने और फिर उस पर चर्चा करने में अधिक समय नहीं लगता। और जब एक पिता अपने बच्चों के लिए पवित्रशास्त्र पढ़ता है, तो परमेश्वर का वचन पिता और बच्चों के हृदयों को सत्य और दृढ़ विश्वास की एकता में बाँधता है।
2. प्रार्थना करें
हम अपने बच्चों के लिए और उनके साथ प्रार्थना करके उनका पालन-पोषण करते हैं। एक बात तो यह है कि जब अपने बच्चों की बात आती है, तो एक पिता के पास प्रार्थना करने के लिए बहुत कुछ होता है! उसका अपना स्वर्गीय पिता उसकी बात सुनना चाहता है और प्रार्थनाओं का उत्तर देने के लिए उत्सुक रहता है। इसके अतिरिक्त, हमारे बच्चों को अपने माता-पिता को उनके लिए प्रार्थना करते हुए सुनते हुए बड़े होना चाहिए। हमारी प्रार्थनाओं में परमेश्वर के प्रति श्रृद्धा और उसके द्वारा दी गई आशीषों के लिए धन्यवाद शामिल होना चाहिए। हमें उन वस्तुओं के लिए प्रार्थना करनी चाहिए, जिनके लिए हमें मालूम है कि उनकी उन्हें आवश्यकता है और साथ ही उन बातों के लिए भी जिन्हें वे महसूस करते हैं। और अपने बच्चों से अपने लिए प्रार्थना करने को कहने में — अर्थात् उनके साथ अपनी कुछ कठिनाइयों को साझा करने में जिनका हम सामना करते हैं और प्रार्थना में तथा उसके माध्यम से हमारे प्रति उनके प्रेम के लिए कृतज्ञता व्यक्त करने में कुछ भी गलत नहीं है।
3. काम करें
एक पिता को अपने बच्चों के साथ काम करना चाहिए। मैं उन्हें हमारे कार्यस्थल पर काम देने की बात नहीं कर रहा हूँ, बल्कि घर के कामों और विद्यालय या कलीसिया की परियोजनाओं की बात कर रहा हूँ। बच्चों को अपने पिता के साथ कमरे की पुताई करना बहुत पसन्द होता है, और भले ही इसका अर्थ यह हो कि गंदगी फैल जाएगी, तौभी इससे उनके बीच एक बहुमूल्य रिश्ता भी बनता है। जो सबसे सार्थक काम हमारे बच्चे करते हैं, उनमें उनकी विद्यालयी शिक्षा के साथ-साथ खेलकूद और संगीत का प्रशिक्षण भी शामिल है। जब कभी मैं किसी जवान पिता को अपने पुत्र या पुत्री के साथ आँगन में गेंद पकड़ना खेलते या उन्हें बल्ला घुमाना सिखाते हुए देखता हूँ, तो मैं सोचता हूँ कि काश मैं भी जवान होता और उन सुनहरे दिनों में वापस जा पाता। जितना अधिक हम अपने बच्चों के काम में सहयोग और प्रोत्साहन वाले तरीके के साथ शामिल होंगे, उतना ही अधिक उनका जीवन हमारे साथ प्रेम के बन्धन में बन्ध जाएगा।
4. खेलें
अन्त में, एक पिता अपने बच्चों के साथ खेलकर उनसे जुड़ता है। जब वे छोटे होते हैं, तो इसका अर्थ है कि हम उनके साथ खेल के मैदान में जाकर लीगो प्रोजेक्ट पर काम करते हैं। या फिर हम झूलने के लिए प्लेसेट की ओर जाते हैं। हम उन कामों में रुचि लेते हैं, जो उन्हें मजेदार लगते हैं और हम अपने बच्चों के साथ उन कामों को साझा करते हैं, जो हमें मजेदार लगते हैं। उदाहरण के लिए, मैं खेल के कई टीमों का बहुत बड़ा समर्थक हूँ, और मैंने यह जुनून अपने बच्चों के साथ भी साझा किया है (जो सभी इन टीमों का उत्साहवर्धन करते हैं, भले ही वे किसी दूसरे विद्यालय में गए हों)। हम हार का शोक और जीत का जश्न साथ मिलकर मनाते हैं और इसका भरपूर आनन्द लेते हैं।
इस बात को सुनिश्चित करने की मेरी सरल रणनीति यह है कि मैं अपने बच्चों के जीवन में सक्रिय और घनिष्ठ रूप से शामिल रहूँ: पढ़ें, प्रार्थना करें, काम करें और खेलें। मुझे अपने बच्चों के लिए और उनके साथ नियमित रूप से परमेश्वर का वचन पढ़ना चाहिए। हमें प्रार्थना में एक-दूसरे का बोझ उठाना चाहिए और प्रभु के अनुग्रह के सिंहासन के पास साथ मिलकर उसकी आराधना करनी चाहिए। मेरे बच्चों को उनके काम में मेरी सकारात्मक और उत्साहवर्धक भागीदारी की आवश्यकता है (और उन्हें मेरे कुछ कामों में शामिल होने की आवश्यकता है)। और हमें एक-दूसरे के साथ और एक परिवार के रूप में, साझा खेल में हँसी और प्रसन्नता के साथ अपने हृदयों को बाँधने की आवश्यकता है। इन सब के लिए समय चाहिए, क्योंकि समय ही वह धन है, जिससे एक व्यक्ति यह कहने का अधिकार खरीदता है, “हे मेरे पुत्र, हे मेरी पुत्री, अपना मन मेरी ओर लगा।”
चर्चा एवं मनन:
- आपके पिता के साथ आपका किस प्रकार का रिश्ता था? आप उनसे या अपने जीवन के अन्य अच्छे पुरुषों से क्या सीखना चाहते हैं?
- यदि आप एक पिता हैं, तो वह कौन सा क्षेत्र है, जिसमें आप उन्नति करना चाहते हैं? यदि आप अभी तक पिता नहीं बने हैं, तो आप एक अच्छे पिता बनने के लिए कैसे तैयारी कर सकते हैं?
निष्कर्ष
इसमें कोई सन्देह नहीं कि विवाह और पितृत्व एक पुरुष के सम्बन्धों के एक बड़े हिस्से पर कब्जा कर लेते हैं, परन्तु ऐसे अन्य रिश्ते भी हैं, जहाँ बाइबल आधारित पुरुषत्व के सिद्धान्त लागू होते हैं। उदाहरण के लिए, हमें विश्वासयोग्य कलीसियाओं के सदस्य बनने के लिए बुलाया गया है। किसी और जगह की तरह, वहाँ एक पुरुष को प्रभुता का उपयोग करना होता है, जब मसीह का अनुसरण करते हुए एक सेवक अगुवे के रूप में परमेश्वर उसे प्रभारी बनाता है, जो परमेश्वर के वचन के अनुसार अधिकार का उपयोग करता है। जब हम दूसरों के साथ रिश्ता बनाते हैं, तो हम ऐसे तरीकों से “काम करते और रक्षा करते” हैं, जो उन रिश्तों के लिए उपयुक्त हैं। एक धर्मी व्यक्ति सभी प्रकार के लोगों को प्रोत्साहित करता है, तथा बाइबल के सत्य और ईश्वरीय आचरण की रखवाली करता है।
एक धर्मी व्यक्ति के पास नौकरी भी होती है। और कार्यस्थल पर बाइबल आधारित पुरुषत्व का प्रतिमान फलदायी सिद्ध होता रहता है। जब उसे कर्मचारियों का या किसी विभाग का प्रभारी बनाया जाता है, तो वह जिम्मेदारी लेकर एक सेवक के रूप में अधिकार का उपयोग करता है। एक मालिक अपने कर्मचारियों का निर्माण करने के लिए उसी तरह परिश्रम करता है, जैसे एक पति अपनी पत्नी का पालन-पोषण करता है या एक पिता अपने बच्चों को शिष्य बनाता है। और वह दूसरों को भ्रष्टाचार, छल या जहरीले वातावरण से बचाने के लिए कदम उठाता है।
एक धर्मी व्यक्ति की मित्रता अक्सर घनिष्ठ होती है, और बाइबल आधारित पुरुषत्व का प्रतिमान आज भी एक आदर्श के रूप में कार्य करता है। उदाहरण के लिए, यदि आप 1 शमूएल में पाई जाने वाली दाऊद और योनातान के बीच की वाचा के बन्धन का अध्ययन करें, तो आप देखेंगे कि कैसे उन्होंने एक-दूसरे को प्रोत्साहित किया और आवश्यकता पड़ने पर सहायता के लिए उपस्थित रहे। उन्होंने एक-दूसरे के कल्याण की और प्रतिष्ठा की रखवाली की।
याद करें कि हमने आरम्भ में पुरुषत्व के लिए बाइबल आधारित बुलाहट के बारे में क्या कहा था: यह सरल है, परन्तु इस कारण से आसान नहीं है! पुरुषों को उनके अधीन किए गए क्षेत्रों और लोगों पर प्रभुता करने के लिए बुलाया जाता है, और वे “कार्य करके और रक्षा करके”— अर्थात् लोगों का निर्माण करके और उन्हें सुरक्षित रखकर अपने नेतृत्व का अभ्यास करते हैं।
मैं एक ऐसे व्यक्ति की कहानी बताकर अपनी बात समाप्त करना चाहूँगा, जिसने मुझ पर उस समय गहरा प्रभाव डाला, जब मैं एक नया विश्वासी था। लॉरेंस से मेरी मुलाकात उस रात हुई जब मैंने सुसमाचार सुनकर यीशु पर विश्वास किया। वह एक वृद्ध व्यक्ति थे, जो उस कलीसिया के द्वार पर सेवक के रूप में सेवा कर रहे थे, जहाँ मैं गया था। अपने हृदय परिवर्तन के बाद, मैं नियमित रूप से कलीसिया जाने लगा, और परमेश्वर का वचन सुनने तथा आराधना में शामिल होने के लिए अकेता ही आता था। थोड़े समय के बाद, लॉरेंस ने मेरे पास आकर अपना परिचय दिया और मेरे विश्वास के बारे में पूछा। उन्होंने मुझे नाश्ते पर बुलाया, जहाँ उन्होंने अपनी गवाही साझा की और मुझे बाइबल पढ़ना और प्रार्थना करना सिखाया। कई वर्षों तक हमारी एक मधुर मित्रता बनी रही, जिसमें इस वृद्ध विश्वासी ने मेरे लिए प्रार्थना की और एक मसीही के रूप में मेरी उन्नति में मुझे प्रोत्साहित किया।
कैंसर से लॉरेंस की मृत्यु के बाद, मैं उनके अन्तिम संस्कार को कभी नहीं भूल पाऊँगा। वे कोई प्रमुख व्यक्ति नहीं थे और उनके पास बहुत कम धन था। परन्तु उनकी श्रृद्धांजलि सभा के लिए कलीसिया भरी हुई थी। एक घण्टे से भी अधिक समय तक, इस एक व्यक्ति के उस प्रभाव के बारे में गवाही दी गई, जो इतने सारे लोगों पर पड़ा था। इसमें कोई सन्देह नहीं कि उनके सभी पुत्रों ने बात की और उनकी पुत्री ने बताया कि कैसे उन्होंने उनसे प्रेम किया और उनके विश्वास का पालन-पोषण किया। ऐसे लोग भी आगे आए, जिनकी लॉरेंस ने सहायता की थी, या, मेरी तरह, जो मसीह के इस अनुभवी अनुयायी के शिष्य बने थे। आखिरकार जब अन्तिम संस्कार समाप्त हुआ, तो मेरे एक साथी पास्टर ने एक ऐसी टिप्पणी की, जिसे मैं कभी नहीं भूलूँगा। हम चुपचाप उस पवित्र अवसर पर विचार कर रहे थे, जिसे हमने अभी-अभी देखा था। मेरे मित्र ने फिर कहा, “क्या आप जानते हैं, इससे पता चलता है कि परमेश्वर उस व्यक्ति के जीवन में क्या करेगा, जो पूरे हृदय से स्वयं को यीशु मसीह को समर्पित करता है।”
मसीही पुरुषत्व पर इस क्षेत्रीय मार्गदर्शिका के समापन में मैं आपको यही शब्द देना चाहता हूँ। कल्पना करें कि यदि आप परमेश्वर पर भरोसा रखेंगे और बाइबल में बताए गए धार्मिकता से भरे पुरुषत्व के प्रतिमान पर चलेंगे, तो वह कितने लोगों के जीवन में क्या करेगा। हो सकता है कि जब आपकी मृत्यु हो, तो अन्तिम संस्कार चलता रहे और लोग आपसे प्राप्त आशीषों के बारे में बात करते रहें। परन्तु हम निश्चित हो सकते हैं कि विश्वासयोग्य पुरुषों के लिए बाइबल के बुलाहट को स्वीकार करते हुए, जब तक आप जीवित हैं, तब तक कई लोग — जिनमें वे लोग भी शामिल हैं, जिन्हें आप सबसे अधिक प्रेम करते हैं — हमारे प्रेमी परमेश्वर के अनुग्रह से आपके द्वारा बने एक मसीही पुरुष के कारण अनन्त काल तक आशीषित रहेंगे।
अन्तिम टिप्पणियाँ
- रिचर्ड डी. फिलिप्स, द मैस्क्युलिन मैंडेट: गॉड्स कॉलिंग टू मेन (The Masculine Mandate: God’s Calling to Men) (लिगोनियर मिनिस्ट्रीज़, 2016).
विषयसूची
- बाइबल पुरुषों को अगुवे बनने के लिए बुलाती है
- बाइबल पुरुषों को पालन-पोषण करने के लिए कहती है
- बाइबल पुरुषों को रखवाला बनने के लिए बुलाती है
- बाइबल पुरुषों को परमेश्वर के द्वारा बनाए गए रिश्तों में बुलाती है
- चर्चा एवं मनन:
- वैवाहिक प्रभुता
- वैवाहिक पालन-पोषण
- वैवाहिक सुरक्षा
- चर्चा एवं मनन:
- पितृत्व की प्रभुता
- पितृत्व की सुरक्षा
- पितृत्व वाला पालन-पोषण
- 1. पढ़ें
- 2. प्रार्थना करें
- 3. काम करें
- 4. खेलें
- चर्चा एवं मनन:
- अन्तिम टिप्पणियाँ