#11 क्षमा

By गैरेट केल

परिचय: क्षमा

रवांडा के एक सहायक प्राध्यापक ने बाइबल कॉलेज के मेरे दूसरे वर्ष के दौरान अतिथि के रूप में एक सन्देश दिया। जब वे उस दिन अपने विषय क्षमा पर बोल रहे थे, तो उनके नम्र व्यवहार और प्रबल अधिकार ने हमारा ध्यान उनकी ओर आकर्षित कर दिया।

 

उन्होंने अपने सन्देश का आरम्भ हमें एक ऐसे बड़े भोज के विषय में बताकर किया, जिसमें उन्होंने पहले कभी भाग नहीं लिया था। ताज़ा पके हुए व्यंजनों की सुगन्ध ऐसी हँसी के साथ घुल-मिल गई थी, जिसकी आशा नहीं की गई थी। परन्तु वहाँ आँसू भी थे, साक्षियाँ थीं, और आनन्द के साथ सरल गीत भी थे। परन्तु उस भोज को वास्तव में असाधारण बनाने वाली बात यह थी कि वहाँ कौन उपस्थित थे और वे क्यों एकत्र हुए थे।

 

कई वर्ष पहले, रवांडा में हुतु और तुत्सी जनजातियों के बीच युद्ध अपने चरम सीमा पर पहुँच गया था। और उन दिनों युद्ध की भयावह घटनाएँ सामान्य बात थीं। हमारे प्राध्यापक के चेहरे पर हुतु के हथियारों के चिन्ह थे, जो उनके गालों पर ठट्ठे की सलवटें बना रहे थे, क्योंकि इन हथियारों का उपयोग उनके परिवार के कई सदस्यों की हत्या करने के लिए किया गया था।

 

अकथनीय बुराइयों का उनका वर्णन प्रतिशोध और घृणा को उचित ठहराता हुआ प्रतीत हो रहा था। फिर भी, जैसे-जैसे वे बोलते गए,, उससे यह स्पष्ट हो गया था कि उनके हृदय में घृणा पर किसी और ही चीज़ ने परदा डाल दिया था। वे क्रोध से नहीं, वरन् क्षमा से भरे हुए थे। हमारे अतिथि ने साक्षी दी कि यह शुभ समाचार है कि परमेश्वर ने यीशु की मृत्यु और पुनरुत्थान के द्वारा पापियों को क्षमा कर दिया है, यह बात उनके गाँव में जंगल की आग की तरह फैल गई, और जैसे-जैसे लोगों को परमेश्वर से क्षमा प्राप्त होती गई, तो उन्होंने भी इस समाचार को एक-दूसरे तक पहुँचाया—जिसमें वह भी सम्मिलित थे।

 

यह भोज विशेष था क्योंकि मेज के चारों ओर हुतु और तुत्सी दोनों पक्ष के लोग बैठे हुए थे। कुछ के पास उनके ही समान घाव थे, कुछ के अंग कटे हुए थे, और सभी अपने प्रियजनों से वंचित थे। पहले तो वे एक-दूसरे का संहार करने का प्रयास करते थे। परन्तु उस रात उन्होंने हाथ पकड़कर प्रार्थना की और रोटी तोड़कर भोजन किया, और यीशु की अद्भुत क्षमा करने वाली, मेल-मिलाप करने वाली और चंगा करने वाले अनुग्रह के लिए स्तुति करते हुए गीत गाए।

 

भले ही आपको किसी को नरसंहार जैसे कार्यों के लिए क्षमा करने की आवश्यकता न हो, परन्तु हम में से कोई भी इस बात से नहीं बच सकता कि हमें क्षमा मिले और हम भी क्षमा करें। मित्र मित्रों के विरुद्ध पाप करते हैं — और उन्हें क्षमा की आवश्यकता होती है। माता-पिता बच्चों के विरुद्ध और बच्चे माता-पिता के विरुद्ध पाप करते हैं — और उन्हें भी क्षमा की आवश्यकता होती है। पति-पत्नी एक-दूसरे के विरुद्ध पाप करते हैं, पड़ोसी एक-दूसरे के विरुद्ध पाप करते हैं, अपरिचित लोग एक-दूसरे के विरुद्ध पाप करते हैं — इसलिए हम सब को क्षमा पाने की आवश्यकता है।

 

फिर भी, हमारी क्षमा पाने की सबसे बड़ी आवश्यकता, हमारे परमेश्वर के विरुद्ध किए गए पाप के कारण है। हम सभी ने उसके विरुद्ध अनोखे एवं व्यक्तिगत तरीकों से पाप किया है इसलिए हम उसके उचित न्याय के पात्र हैं (रोमियों 3:23, 6:23)। परन्तु परमेश्वर ने एक ऐसा मार्ग बनाया कि उसका न्याय भी पूरा हो सके और क्षमा भी प्रदान की जा सके। उसके पुत्र यीशु ने हमारे बीच में डेरा किया, पाप रहित जीवन जिया, और जो न्याय हम पर आना चाहिए था वह न्याय उनसे अपने ऊपर लिया और क्रूस पर मर गया, फिर मृतकों में से जी उठा। उसका यह कार्य यह घोषणा करता है कि परमेश्वर न्यायी है और यीशु पर भरोसा रखने वालों को भी वह धर्मी ठहराता है (रोमियों 3:26)। जिन्हें परमेश्वर ने बहुत अधिक क्षमा किया है, उन्हें दूसरों को क्षमा करने के द्वारा पहचाना जाना चाहिए।

 

यह क्षेत्रीय मार्गदर्शिका, बाइबल आधारित क्षमा की धारणा का परिचय कराती है। यह आपके सभी प्रश्नों का उत्तर तो नहीं देती है, परन्तु मुझे विश्वास है कि जब आप यीशु को जानने वाले लोगों को दिए गए सुसमाचार के जीवन को, अपने जीवन में उतारने का प्रयास करेंगे, तब यह आपके लिए और आपके साथ आत्मिक यात्रा करने वाले लोगों के लिए सहायक सिद्ध होगी।

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