#9 अनुग्रह में बढ़ना
परिचय
ऐसा कहा जाता है कि एक औसत वयस्क के पास लगभग 30,000 शब्दों की शब्दावली होती है। बाइबल मसीहियों के लिए इस संख्या में कुछ और आवश्यक शब्द जोड़ती है। हमारे ईश्वर विज्ञान की अपनी एक विशेष शब्दावली होती है — ऐसे शब्द जो सटीक और गहरे अर्थ वाले होते हैं। परन्तु ये शब्द अधिकाँश पूरी रीति से या ठीक प्रकार से समझ में नहीं आते हैं। ऐसी उपेक्षा जानबूझकर नहीं की जाती है; ये शब्द इतने सामान्य हो गए हैं कि इन पर ध्यान ही नहीं दिया जाता है। यदि हम सावधान नहीं रहे, तो हम मसीही विश्वास की मूल भाषा का उपयोग तो करेंगे, परन्तु उसकी गहराई को समझे बिना ही करेंगे। “परमेश्वर की महिमा” जैसे वाक्यांश और “सुसमाचार” तथा “पवित्रीकरण” जैसे शब्द प्रचलित शब्द बन गए हैं — जिनका नियमित रूप से उपयोग तो होता है, परन्तु बिना पर्याप्त ज्ञान या समझ के साथ। परिणामस्वरूप, इन शब्दों का अर्थ जो इतने गहरे हैं, प्रभावहीन हो सकते हैं, जिससे मसीह के प्रति हमारा भय कम हो जाता है और अंततः एक विश्वासी के रूप में हमारी आत्मिक उन्नति भी रुक जाती है। हमारी मसीही संस्कृति में इन गहरे अर्थ वाले शब्दों के साथ हम अधिकतर सार (मुख्य बात) के बजाय केवल खोखला छिलका पकड़ने का जोखिम उठाते हैं।
“अनुग्रह” शब्द इसका एक अच्छा उदाहरण है। इस शब्द को बार-बार तोड़ा-मरोड़ा गया है, और यह हमारी भाषा में किसी महिला के नाम, भोजन से पहले की गई छोटी प्रार्थना, किसी शिक्षक के द्वारा देर से किए गए कार्य के प्रति सहानुभूति हेतु पूर्ण प्रतिक्रिया, रात भर की प्रार्थना-आराधना में गाया जाने वाले गीत, या यहाँ तक कि किसी कलीसिया के नाम के रूप में बना हुआ है। और इसके अत्यधिक उपयोग के कारण हो सकता है कि इसने अपना अर्थ, अपनी शक्ति और यहाँ तक कि हमारे जीवन में अपना कार्य भी खो दिया है। सम्भवतः हम “अनुग्रह” से ऊब गए हैं क्योंकि हमने इसे गलत रूप में अपनाया है या समझा ही नहीं कि यह क्या है, यह कैसे कार्य करता है, और एक विश्वासी के जीवन में यह कितना आवश्यक है।
इफिसियों 2:8 कहता है, “क्योंकि विश्वास के द्वारा अनुग्रह ही से तुम्हारा उद्धार हुआ है …” दूसरे शब्दों में, अनुग्रह किसी कोमल और दयालु परमेश्वर का केवल शान्त स्वभाव नहीं है जो उसके क्रोध को कम कर देता है, वरन् वह एक प्रभावशाली युद्ध का हथियार है जिसका उपयोग परमेश्वर ने हमारे पत्थर जैसे कठोर हृदयों को तोड़ने के लिए किया है। अनुग्रह में कुछ भी कोमल नहीं है। यह केवल हमारा उद्धार करने, परिवर्तित करने और स्वर्ग तक पहुँचाने के लिए परमेश्वर की सामर्थ्य है।
जब पत्र लिखते समय प्रेरित पौलुस ने “अनुग्रह” शब्द को समापन अभिवादन के रूप में प्रयोग किया, तो वह केवल एक औपचारिक वाक्यांश के साथ पत्र समाप्त नहीं कर रहा था। परन्तु वह अपने पाठकों को एक सामर्थ्य भरी सच्चाई के साथ छोड़ रहा था, जो उस सम्पूर्ण गहराई को दर्शाती है जिस सच्चाई पर उसने अभी-अभी प्रकाश डाला था। दूसरे शब्दों में, वह कहता है, “यदि मैं आपको अपने कहे गए सभी शब्दों का सार केवल एक या दो शब्दों में दूँ, तो वह शब्द “अनुग्रह’ ही होगा।” और यह शब्द केवल उसकी पत्रियों के अन्त में ही नहीं आया है, वरन् यह शब्द उसकी पत्रियों के ताने-बाने में सौ से भी अधिक बार बुना गया है। इसका महत्व हम से यह माँग करता है कि हम इस गौरवशाली विचार पर लगी धूल को साफ करें, और इसकी सुन्दरता को अपने मन में फिर से स्थापित करें, तथा इसे अपनी नसों में प्रवाहित होने दें ताकि यह फिर से अद्भुत बन सके।
इस क्षेत्रीय मार्गदर्शिका में आप सीखेंगे: 1. अनुग्रह क्या है, 2. अनुग्रह एक पापी को कैसे बचाता है, 3. अनुग्रह में बढ़ोतरी की आवश्यकता क्यों है, और 4. अनुग्रह में कैसे बढ़ें। आप समझेंगे कि अनुग्रह क्या है, जैसा कि पवित्रशास्त्र में परिभाषित किया गया है, कि यह परमेश्वर के द्वारा पापियों को उद्धार के लिए दिया गया एक वरदान है, साथ ही यह मसीही जीवन में हर समय और हर कार्य में आनन्द के साथ अनुभव किया जाता है। हर अध्याय पिछले अध्याय पर आधारित होते हुए उद्धार से लेकर उस अनुग्रह तक की यात्रा की सुन्दरता को पूरी रीति से प्रकट करता है, जो “हमें अनन्त जीवन में पहुँचाता है।”
पवित्रशास्त्र में अनुग्रह शब्द का प्रयोग कई अलग-अलग और अद्भुत तरीकों से किया गया है। उदाहरण के लिए, अनुग्रह का प्रयोग उद्धार के सम्बन्ध में किया जाता है, परन्तु यह एक विश्वासी को पवित्रता और दुखों में स्थिर बनाए रखने में भी सहभागी होता है। पवित्रशास्त्र के सावधानी पूर्वक अध्ययन करने वाले विद्यार्थी यह समझेंगे कि इसका अर्थ ईश्वर विज्ञान के अलग-अलग सन्दर्भ पर निर्भर करता है। “अनुग्रह” शब्द की व्यापकता और गहराई स्वयं परमेश्वर का एक निमंत्रण है कि हम पूरे उत्साह के साथ अनुग्रह की सम्पूर्ण समझ को प्राप्त करने के लिए प्रयास करते रहें।
फिर भी, इसके सन्दर्भ या उपयोग चाहे जैसे भी हों, परन्तु अनुग्रह परमेश्वर के अनपेक्षित अनुग्रह के रूप में कार्य करता है। यह एक रंगीन दूरबीन के समान है, अर्थात् यह विचार इस बात को दर्शाता है कि जटिल प्रणालियाँ और सूक्ष्म भिन्नताएँ अपने स्वाभाविक मूल्य और गहराई के लिए प्रशंसा के योग्य हैं। पौलुस इस बहुतायत की उदारता का वर्णन इस प्रकार करता है, “कि वह अपनी उस दया से जो मसीह यीशु में हम पर है, आनेवाले समयों में अपने अनुग्रह का असीम धन दिखाए।” (इफिसियों 2:7) यह अध्याय 1) अनुग्रह को परिभाषित करेगा, 2) यह बताएगा कि अनुग्रह परमेश्वर के स्वभाव का एक स्वाभाविक पहलू है, और 3) उन अयोग्य पापियों को दिए गए अनुग्रह की उदारता को दर्शाएगा। आइए हम अपने अध्ययन का आरम्भ परमेश्वर के अनुग्रह को परिभाषित करते हुए करें।
अनुग्रह की परिभाषा
यद्यपि परमेश्वर के सभी गुण योग्य और सुन्दर हैं, फिर भी सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र में अनुग्रह के साथ विशेषण जोड़ने पर विशेष ध्यान दिया गया है। ऐसा प्रतीत होता है जैसे लेखकों ने पर्यायवाची शब्दों की एक पूरी सूची निकाल ली हो और अनुग्रह के गुणों की व्याख्या करने के लिए जितने शब्द मिल सके, उन्हें खोज निकाल लिया हो।
पौलुस के द्वारा परमेश्वर के अनुग्रह का उत्सव मनाने पर ध्यान दीजिए: “कि उसके उस अनुग्रह की महिमा की स्तुति हो, जिसे उसने हमें अपने प्रिय पुत्र के द्वारा सेंत-मेंत दिया। हमको मसीह में उसके लहू के द्वारा छुटकारा, अर्थात् अपराधों की क्षमा, परमेश्वर के उस अनुग्रह के धन के अनुसार मिला है, जिसे उसने सारे ज्ञान और समझ सहित हम पर बहुतायत से किया।” (इफिसियों 1:6-8) प्रशंसनीय, महिमामय, बहुतायत और भव्य — ये अनुग्रह की विशेषताओं और गुणों का वर्णन करने के लिए असाधारण शब्द हैं।
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भाग I: समस्त अनुग्रह का परमेश्वर
यह भाषा इस अद्भुत, आश्चर्यजनक अनुग्रह के सर्वोच्च स्वभाव को समझती है। और फिर इस पर ध्यान दीजिए कि इस अनुग्रह को पाने वाले प्राणी पूरी रीति से अप्रशंसीय हैं — महिमा से बहुत दूर, दरिद्र और पूर्ण रीति से पाप में डूबे हुए हैं। और अनुग्रह पाने वालों के विपरीत, परमेश्वर का अनुग्रह उन पर प्रकट होता है जो सबसे अधिक अयोग्य होते हैं। अतः, इस अनुग्रह की परिभाषा में अथाह उदारता एक अनिवार्य तत्व है।
मैथ्यू हेनरी इस प्रकार कहते हैं: “अनुग्रह परमेश्वर के द्वारा सेंत-मेंत में दिया जाने वाला दान, अयोग्य मनुष्यजाति के प्रति भलाई और कृपा है।” जेरी ब्रिजेस इसे इस प्रकार परिभाषित करते हैं, “अनुग्रह परमेश्वर का सेंत-मेंत में दी जाने वाली कृपा है जो दोषी पापियों पर प्रकट की जाती है, अर्थात् उन पर जो केवल न्याय के पात्र हैं। यह परमेश्वर का प्रेम है जो अप्रिय लोगों के प्रति प्रकट होता है। यह परमेश्वर का उन लोगों तक पहुँचने का प्रयास है जो उसके विरुद्ध विद्रोह करते हैं।”
परिभाषा: अनुग्रह परमेश्वर का अनपेक्षित और अद्भुत उदारता का कार्य है जो उद्धार के दान के माध्यम से विद्रोही पापियों को बचाता है और फिर उन्हें परमेश्वर की महिमा के लिए पवित्रता में आगे बढ़ाता है।
बाइबल के अनुसार परिभाषित किया गया अनुग्रह चार आवश्यक विशेषताओं को सम्मिलित करता है:
– अन्तहीन और असाधारण उदारता
– अनपेक्षित अनुग्रह
– उद्धार का वरदान
– आत्मिक उन्नति को प्रेरित करने वाली सामर्थ्य
परमेश्वर के अनुग्रह का प्रकाशन
निर्गमन की पुस्तक स्पष्ट रूप से परमेश्वर के अनुग्रह के द्वारा चुनी हुई घटनाओं से भरी हुई है। इस्राएलियों का अविश्वास और असफलता की पुनरावृत्ति का सामना बार-बार बहुतायत की उदारता से होता है। सम्भवतः किसी अन्य व्यक्ति ने इस बात को उतनी स्पष्टता से नहीं देखा जितना उनके अगुवे मूसा ने देखा। निर्गमन अध्याय 33 इस्राएल की बहुत अधिक लम्बे समय से प्रतीक्षा की गई प्रतिज्ञा के देश की ओर उनकी अनोखी यात्रा में एक निर्णायक मोड़ का वर्णन करता है। अपनी बाइबल उठाइए और इस अनोखी घटना को समझने के लिए निर्गमन 33:7 से 34:9 तक पढ़िए।
इस्राएल की मूर्खता की रीति के अनुसार, वे लड़खड़ा गए थे, और मूसा को इस आश्वासन की अति आवश्यकता थी कि परमेश्वर स्वयं इस थकाऊ यात्रा के अन्तिम चरण में उनके साथ रहेगा। मूसा शक्तिहीन हो गया था, उसका साहस समाप्त हो गया था, और वह आत्मा में टूट चुका था (निर्गमन 33:12)। उसे एक दिखाई देने वाले प्रमाण की आवश्यकता थी जो उनके विश्वास और इस आश्वासन को दृढ़ कर सके कि परमेश्वर की उपस्थिति उनके संग-संग जाएगी। उसने यह माँग की कि जब तक परमेश्वर स्वयं प्रत्यक्ष रूप से उनके साथ न चलें, वह एक कदम भी आगे नहीं बढ़ेगा (निर्गमन 33:16)। यह साहसिक निवेदन — कि “मुझे अपना तेज दिखा” — यदि यह निवेदन स्वीकार कर लिया जाता, तो इससे उन्हें आगे के उद्देश्य पूरा करने में परमेश्वर के स्वभाव और वाचा की साझेदारी का आश्वासन मिल जाता (33:18)।
अद्भुत दया करते हुए, परमेश्वर ने इस असाधारण विनती को स्वीकार कर लिया। परमेश्वर ने बड़ी सावधानी से मूसा को चट्टान की दरार में रखा, और उसकी आँखों को ढक दिया ताकि मूसा परमेश्वर की महिमा का दर्शन केवल उसकी पीठ के द्वारा कर सके (निर्गमन 33:23)। अनुग्रह से परिपूर्ण एक क्षण में परमेश्वर मूसा को अपनी उपस्थिति का पूरा प्रमाण देता है, तथा साथ ही मूसा को उस अनुभव से भी बचाता है जो उसे मार डाल सकता था (33:20)।
इस्राएल को परमेश्वर के उचित कोप और न्याय का अनुभवात्मक ज्ञान था, और यह भी कि एक पवित्र परमेश्वर के विरोध में खड़े होने का क्या अर्थ होता है (निर्गमन 19:16; 32:10, 35; 33:5)। सोने का बछड़ा बनाया जाना (जो अभी-अभी बनाया गया था) इस बात का स्पष्ट प्रमाण था कि परमेश्वर यह सहन नहीं करेगा कि उसे अनदेखा किया जाए या उसके स्थान पर किसी और को रख दिया जाए, और यही बात दया के इस कार्य को और भी अधिक आश्चर्यजनक बनाती है। मूसा परमेश्वर से बड़ी गम्भीरता के साथ विनती करता है, और परमेश्वर ऐसे उदारता के साथ उत्तर देता है जो उसकी करुणा, धैर्य, प्रेमपूर्ण दया, स्थिरता, क्षमा और दृढ़ता को प्रकट करता है। यही अनुग्रह है! तब मूसा परमेश्वर के “अटल प्रेम,” “वैभव,” और “अनुग्रह” का वर्णन करते हुए स्तुति में लिखता है (भजन संहिता 90)।
और यह प्रकटीकरण मूसा के लिए केवल एक बार की घटना नहीं थी, क्योंकि अनुग्रह परमेश्वर के स्वभाव में गहराई से समाया हुआ है। पुराने नियम से नए नियम की ओर बढ़ते हुए, हम पढ़ते हैं कि परमेश्वर “अनुग्रह पर अनुग्रह” का स्रोत और परिपूर्णता है (यूहन्ना 1:16)। इफिसियों में पौलुस ने अनुग्रह का वर्णन इस प्रकार किया है कि यह पापियों को जीवन देता है:
परन्तु परमेश्वर ने जो दया का धनी है; अपने उस बड़े प्रेम के कारण जिससे उसने हम से प्रेम किया,जब हम अपराधों के कारण मरे हुए थे, तो हमें मसीह के साथ जिलाया; अनुग्रह ही से तुम्हारा उद्धार हुआ है,और मसीह यीशु में उसके साथ उठाया, और स्वर्गीय स्थानों में उसके साथ बैठाया।कि वह अपनी उस दया से जो मसीह यीशु में हम पर है, आनेवाले समयों में अपने अनुग्रह का असीम धन दिखाए।क्योंकि विश्वास के द्वारा अनुग्रह ही से तुम्हारा उद्धार हुआ है, और यह तुम्हारी ओर से नहीं, वरन् परमेश्वर का दान है;और न कर्मों के कारण, ऐसा न हो कि कोई घमण्ड करे। (इफिसियों 2:4-9)
हमारे उद्धार की मुख्य विशेषता अनुग्रह है, और पौलुस इस सच्चाई का उत्सव मनाने के लिए इस खण्ड में जानबूझकर बार-बार उसी बात को दोहराता है।
एक के बाद एक खण्ड इस बात की पुष्टि करते हैं कि अनुग्रह परमेश्वर के स्वभाव का मूल केन्द्र है:
– वह ऐसा राजा है जिसका सिंहासन “अनुग्रह” कहलाता है (इब्रानियों 4:16)।
– वह एक दयालु और अनुग्रहकारी दाता है, जो अपने लोगों के लिए अपने अनुग्रह को “बहुतायत से” देता है
(2 कुरिन्थियों 9:8)।
– परमेश्वर सारे अनुग्रह का दाता है (1 पतरस 5:10), जो पृथ्वी के उन राजाओं के ठीक विपरीत है जो अपने पद को कठोर और अडिग शक्ति के साथ दिखाते हैं।
– वह “तुम पर अनुग्रह करने के लिये तत्पर रहता है, और इसलिए ऊँचे उठेगा कि तुम पर दया करे।” (यशायाह 30:18)।
– वह ऐसा राजा है जो “तुमसे अपना मुँह नहीं मोड़ेगा,” क्योंकि वह “अनुग्रहकारी और दयालु” है (2 इतिहास 30:9)।
हमारे जीवन में “मूसा वाला क्षण” तब आया जब परमेश्वर ने अपनी महिमा को अपने पुत्र के रूप में प्रकट किया, जो अनुग्रह और सत्य से परिपूर्ण होकर देहधारी हुआ (तीतुस 2:11)। यीशु का जीवन ही वह दृश्य है जिसकी हमें आवश्यकता है, जिसके द्वारा हम “अनुग्रह पर अनुग्रह” पाना आरम्भ करते हैं (यूहन्ना 1:16)। और अत्यधिक भलाई के अन्तिम कार्य में, परमेश्वर ने विद्रोहियों के लिए अपने ही पुत्र की मृत्यु का आदेश दे दिया (रोमियों 3:24–25)। सच में, वह सारे अनुग्रह का परमेश्वर है।
अयोग्य पापी
अनुग्रह की सुन्दरता यह है कि यह सम्पूर्ण अन्धकार के विरुद्ध चमकता है। इस्राएलियों के प्रकरण में, हठीले, आज्ञा का घोर उल्लंघन के लम्बे इतिहास ने मूसा के प्रति परमेश्वर की दयालु प्रतिक्रिया को और भी अधिक आश्चर्यजनक और तेजस्वी बना दिया। हमारे अपने सम्बन्ध में, हमारी सम्पूर्ण भ्रष्टता और विद्रोह न केवल अनुग्रह की आवश्यकता और गहराई को बढ़ाता है, वरन् हमें दिए जा रहे अनुग्रह की चमक को भी बढ़ाता है।
मैं आपको बता सकता हूँ कि मैं कहाँ खड़ा था जब मैंने वह सुन्दर हीरा देखा जिसे मैं अपनी पत्नी जूली को भेंट करने वाला था। मैंने एक ऐसे हीरे को आकर देने लिए कठिन परिश्रम किया, जो उसके प्रति मेरे समर्पण और उत्साह को दर्शाता है। मेरा एक मित्र जो हीरे के व्यापार में बिचौलिए का कार्य करता है, उसने वह रत्न खरीदा और उत्सुकता से उसे निरीक्षण के लिए मेरे पास लाया। उस धूप भरे दिन में हम बाहर निकल गए।
मैंने बड़ी उम्मीद के साथ उसे देखा, जब उसने काले मखमल का एक कपड़ा निकाला और उस पर वह हीरा रख दिया। उस हीरे ने मेघधनुष के हर रंग को प्रतिबिंबित कर दिया। वह चमक रहा था और जगमगा रहा था, और मैं बहुत अधिक आनन्दित था। वह हीरा ठीक वैसा ही था जैसी मैंने उम्मीद की थी — अर्थात् मेरी होने वाली दुल्हन के लिए एक उपयुक्त उपहार था। क्योंकि उसकी सुन्दरता कालेपन की पृष्ठभूमि के विरुद्ध और भी अधिक निखरकर सामने आई। इसी प्रकार अनुग्रह वह चमकता हुआ हीरा है जो मनुष्य की पापी पृष्ठभूमि के विरुद्ध सबसे अधिक चमकता है।
परमेश्वर के अनुग्रह की महानता को समझने के लिए, हमें सबसे पहले अपने पाप की काली पृष्ठभूमि को खोलना होगा। यदि हमें अनुग्रह की सराहना करनी है — और उससे भी महत्वपूर्ण, उसे विनम्रता और कृतज्ञता के साथ पूरी रीति से आनन्दित होकर स्वीकार करना है, तो यह बाइबल आधारित दृष्टिकोण अनिवार्य है। यदि हम अपनी भयावह स्थिति का सही मूल्याँकन नहीं करते है, तो अनुग्रह हमारे आरामदायक जीवन में केवल एक साधारण सहायक तत्व बनकर रह जाएगा। क्योंकि हम अपनी अयोग्यता को समझ नहीं पाते हैं, इसलिए अनेक नामधारी मसीहियों के हृदयों पर उदासीनता की छाप दिखाई देती है।
हम “पापी” होने का सूचक पत्र का उपयोग इस उद्देश्य से करते हैं कि यह क्षमा और उद्धार की आवश्यकता को दर्शाए (रोमियों 3:23)। परन्तु बाइबल हमारी स्थिति का वर्णन करने के लिए कहीं अधिक अपमानजनक भाषा का प्रयोग करती है: जैसे “परमेश्वर के बैरी” (याकूब 4:4), “पराये और मन के विरोधी” (कुलुस्सियों 1:21), “परमेश्वर के विरोधी” (रोमियों 8:7), और “बलवा करने वाले लड़के” (यशायाह 30:1)। जोनाथन एडवर्ड्स ने सही कहा था कि, “आप अपने उद्धार में कुछ भी योगदान नहीं देते, सिवाय उस पाप के जो इसे आवश्यक बनाता है।”
मनुष्य की पूर्ण अयोग्यता ही परमेश्वर की उदारता को ऊँचा उठाती और महान बनाती है। हमारी दयनीय स्थिति उसकी अत्यधिक प्रतिक्रिया को उजागर करती है और उसके अद्भुत अनुग्रह के प्रति हमारी कृतज्ञता को बढ़ाती है। फिलिप्स ब्रूक्स हमें स्मरण कराते हैं कि हम सब उस असाधारण अनुग्रह को पाने के लिए अयोग्य हैं: परन्तु “जिसे अनुग्रह ने छू लिया है, वह अब भटकने वालों को ‘दुष्ट’ या ‘असहाय के रूप में नहीं देखेगा, अर्थात उन लोगों को जिन्हें हमारी सहायता की आवश्यकता है, और न ही हमें ‘प्रेम के योग्य’ होने के संकेतों की खोज करनी चाहिए। अनुग्रह हमें सिखाता है कि परमेश्वर प्रेम करता है इसलिए नहीं कि हम कौन हैं, वरन् इसलिए कि वह स्वयं कौन है।”
अनुग्रह परमेश्वर की अनपेक्षित और चौंका देने वाली उदारता है, जो उद्धार के वरदान के द्वारा विद्रोही पापियों को बचाती है और फिर उन्हें उसकी महिमा के लिए पवित्रता में आगे बढ़ाती है। मसीहियों के हृदय को, परमेश्वर की अविश्वासी सृष्टि के प्रति बहुतायत की उदारता से प्रभावित होना चाहिए। और यह सोचना कि यह अनुग्रह परमेश्वर के स्वभाव से निकलकर हमारे आवश्यकता भरे जीवन तक पहुँचता है, यह वास्तव में चकित कर देने वाला है।
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चर्चा एवं मनन:
- आपके अपने शब्दों में “अनुग्रह” क्या है? अनुग्रह को जीना क्यों चुनौतीपूर्ण है?
- उस क्षण पर विचार करें जब मूसा के समान आपको अपनी परिस्थितियों में परमेश्वर की उपस्थिति के भरोसे की आवश्यकता थी, और अनुग्रह में, परमेश्वर ने अपने वचन के द्वारा आपसे बातचीत की।
- भजन संहिता 103 कहता है कि धन्यवाद के भाव में “उसके सारे उपकारों को न भूलना” अच्छा है, और इन क्षणों को उसके अनुग्रह की साक्षी के रूप में दूसरों के साथ साझा करना चाहिए। इन आशीषों की सूची को अपने मार्गदर्शक के साथ साझा करें।
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भाग II: वह अनुग्रह जो उद्धार करता है
यद्यपि अनुग्रह परमेश्वर के मूल स्वभाव में से एक है, फिर भी पापी व्यक्ति व्यक्तिगत रूप से अनुग्रह का अनुभव तब तक नहीं करते जब तक कि वे उद्धार न पा लें। हाँ, एक सामान्य अनुग्रह अवश्य है जिसका आनन्द सभी लोग उठाते हैं। परन्तु वह अनुग्रह जो हमें परमेश्वर के साथ अनन्त सम्बन्ध में प्रवेश कराता है, वह केवल उन्हीं लोगों के लिए सुरक्षित है जिन्हें उसने चुना और धर्मी ठहराया है (रोमियों 8:30)। जब उद्धार करने वाले विश्वास को हमारे भीतर फूँका जाता है, तब हम अनुग्रह की भरपूरी को देखने, उसका आनन्द लेने और उससे लाभान्वित होने के लिए जाग्रत होते हैं।
अनुग्रह: मृत्यु से जीवन की ओर तथा स्वर्गीय धन की ओर
प्रसिद्ध कहानियों में प्रायः निर्धनता से धनी होने तक की यात्रा सम्मिलित होती है, तथा परिस्थितियों में अनोखा परिवर्तन आता है। परन्तु सबसे परिवर्तनकारी कहानी जिसे कभी सुनाया गया है, वह परमेश्वर के अनुग्रह के द्वारा ही लिखी गई है। यह केवल “निर्धनता से धनी” होने तक की कहानी नहीं है; यह उससे कहीं बढ़कर है, यह वह अनुग्रह है जो मरे हुओं को जीवन में ले आता है।
इफिसियों का दूसरा अध्याय हर उद्धार की कहानी को एक अलौकिक परिवर्तन के रूप में समझाता है, जब हम “अपने अपराधों और पापों में मरे हुए थे” परन्तु अब “मसीह में जीवन” पाते हैं। पापियों के रूप में, जब हमारे पास न तो आशा थी और न ही जीवन था, तब हमें शैतान के दुष्ट और कपटी अधिकार से ऊपर उठाकर स्वर्गीय महिमा की ऊँचाइयों तक पहुँचाया गया और मसीह के साथ स्वर्गीय स्थानों में बैठाया गया (इफिसियों 2:1, 2, 6)। ऐसा परिवर्तन करने वाला और इसका कारण “उसके अनुग्रह का असीम धन है जो मसीह यीशु में हम पर है” (इफिसियों 2:7)। हम विश्वास के द्वारा अनुग्रह से बचाए जाते हैं, और यह अनुग्रह और विश्वास परमेश्वर की ओर से दान है (इफिसियों 2:8)। हमारे कर्म और धर्मी ठहरने के असफल प्रयास कुछ भी योगदान नहीं देते, सिवाय इसके कि वे हमें और अधिक ऋणी बनाकर भारी दोषी ठहराते हैं (इफिसियों 2:9)। परन्तु अनुग्रह वह माध्यम है जिसके द्वारा उद्धार पाने वाला विश्वास प्रवाहित होता है और अयोग्य पापियों को उद्धार प्रदान करता है (इफिसियों 2:8–9)। हर आत्मा परमेश्वर के अनुग्रह की आवश्यकता में तड़पती है, क्योंकि आत्मिक दृष्टि से वह पूरी रीति से दिवालिया होती है। हमारे पास उसे देने के लिए कुछ भी नहीं है जिससे हम अपने आप को योग्य ठहरा सकें। हमें उसकी अनुग्रहपूर्ण उदारता की आवश्यकता है, जो हमारी अयोग्यता पर विजय पाए और हमारा उद्धार करे।
आरम्भिक दिनों में जब कलीसिया तेजी से बढ़ रही थी, तब यरूशलेम की सभा ने स्पष्ट रूप से यह घोषणा की: “हाँ, हमारा यह तो निश्चय है कि जिस रीति से वे प्रभु यीशु के अनुग्रह से उद्धार पाएँगे; उसी रीति से हम भी पाएँगे” (प्रेरितों के काम 15:11)। यीशु मसीह के व्यक्तित्व, जीवन, मृत्यु और पुनरुत्थान में परमेश्वर की अथाह करुणा और अनुग्रह की अभिव्यक्ति के रूप में पापियों को उद्धार प्रदान किया जाता है।
यही बात पौलुस रोमियों 5:20 में स्पष्ट रूप से कहता है कि अनुग्रह बहुतायत से बढ़ता है, और वह हर प्रकार के पाप को ढक लेता है, यदि पापी मन फिराए। अपने अनुग्रह के द्वारा, परमेश्वर पूरा-पूरा उद्धार कर सकता है (इब्रानियों 7:25)। स्पर्जन अनुग्रह और उसके अनेक उद्धार के दानों का एक चित्र प्रस्तुत करते हैं:
आदरपूर्वक उस स्रोत की ओर निहारो जो हमारे उद्धार का मूल है, अर्थात् वह परमेश्वर का अनुग्रह है। अनुग्रह से ही आपका उद्धार हुआ है। क्योंकि परमेश्वर अनुग्रहकारी है, इसलिए पापी मनुष्य क्षमा किए जाते हैं, परिवर्तित होते हैं, शुद्ध किए जाते हैं, और उद्धार पाते हैं। वे उद्धार इसलिए नहीं पाते कि उनके भीतर कोई गुण हैं, और न ही कभी किसी गुण के कारण ऐसा हो सकता है, कि वे उद्धार पाते हैं; वरन् उद्धार परमेश्वर का बहुतायत का प्रेम, भलाई, दया, करुणा, कृपा और अनुग्रह के कारण होता है।
अनुग्रह एक वरदान है
सन् 1978 के बड़े दिन (यीशु के जन्म दिवस) पर मुझे एक मिलेनियम फाल्कन उपहार में मिला — सम्भवतः यह अब तक का सबसे बढ़िया उपहार था जो मुझे दिया गया था। मुझे स्मरण है कि हम अपने विशाल भवन में उस YT-कोरेलियन चमकदार माल वाहक जहाज़ को उड़ाते हुए बारह पारसेक (खगोलीय दूरी नापने की ईकाई) से कम समय में एक खतरनाक और तेज उड़ान के द्वारा पार करना असम्भव समझ रहे थे। रडार, रैंप, कॉकपिट, हान और च्यूई — ये सब मिलकर उस बड़े दिन के उपहार को अब तक के सबसे अच्छे उपहारों में से एक बना देते थे, जिसका अनुभव आज भी ताज़ा है। परन्तु कुछ मायनों में, मैं उस उपहार के योग्य था। मैं एक आज्ञाकारी और अच्छा बेटा था, और मैं उम्मीद कर रहा था कि मुझे कुछ अच्छा ही उपहार मिलेगा, क्योंकि मैंने कुछ ऐसा ही होने का सपना देखा था।
यही बात उद्धार के अनुग्रह को उत्कृष्ट बनाती है। चयन करने वाला अनुग्रह, मैं कौन हूँ या मैंने क्या किया है के आधार पर किसी भी प्रकार की अपेक्षा की कोई सम्भावना नहीं छोड़ता है। यह एक चौंका देने वाला बहुतायत का वरदान था, जिसकी कोई उम्मीद नहीं की गई थी और पूरी रीति से अयोग्य लोगों को मिला हुआ है, — हमने तो उस वरदान की इच्छा भी नहीं की थी, जैसी मैंने उस बड़े दिन पर अपने उपहार के लिए की थी। सम्पूर्ण उद्धार, जिसमें उद्धार पाने वाले की इच्छा भी सम्मिलित है, अनुग्रह के वरदान का ही हिस्सा होता है (रोमियों 3:10-12)। पौलुस परमेश्वर के अनुग्रह के वितरण की स्वतंत्रता को विशेष रूप से उजागर करता है जब वह कहता है कि हम “उसके अनुग्रह से सेंत-मेंत धर्मी ठहराए गए” हैं (रोमियों 3:24; 4:4)। उद्धार में “धार्मिकता का वरदान बहुतायत से” सम्मिलित है (रोमियों 5:17)। धर्मी ठहराया जाना न केवल हमें परमेश्वर के न्यायसंगत क्रोध से बचाता है, वरन् इसमें मसीह की धार्मिकता का वरदान भी सम्मिलित है (2 कुरिन्थियों 5:21)। और मसीह की धार्मिकता के अतिरिक्त, अब हम अनन्त जीवन के भी वारिस हैं, “जिससे हम उसके अनुग्रह से धर्मी ठहरकर, अनन्त जीवन की आशा के अनुसार वारिस बनें।” (तीतुस 3:7)। परन्तु इस अनुग्रह के वरदान की विशालता हमारी समझ से परे है।
क्योंकि हमें कुछ योग्यता, वंशावली, या आत्म-धार्मिकता में योगदान करने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है, इसलिए पौलुस इस बात पर प्रकाश डालने में तत्पर रहता है कि अनुग्रह व्यवस्था के कार्यों से जुड़ा हुआ नहीं है: “यदि यह अनुग्रह से हुआ है, तो फिर कर्मों से नहीं, नहीं तो अनुग्रह फिर अनुग्रह नहीं रहा।” (रोमियों 11:6) परमेश्वर ने उद्धार को अपने अनुग्रह के वरदान के अतिरिक्त कहीं और से पाना असम्भव कर दिया है, ताकि कोई भी घमण्ड न कर सके, और यदि कोई करे तो वह प्रभु में घमण्ड करे (1 कुरिन्थियों 1:30–31)। परमेश्वर अपने अनुग्रह की रक्षा करता है ताकि पापी की ओर से किसी भी सहायता के दावे की कोई सम्भावना न रहे। इसी कारण उद्धार का वरदान कोई विकल्प नहीं है। डेरेक थॉमस स्पष्ट रूप से कहते हैं कि, “यदि आप मानते हैं कि उद्धार को पूरी रीति से आपने ही चुना है, तो साहस और दृढ़ विश्वास के साथ परमेश्वर के सामने खड़े होकर उससे कहें कि आप उसे धन्यवाद देना बन्द करना चाहते हैं, और स्वयं को धन्यवाद देना चाहते हैं।”
वरदान निरन्तर बना हुआ है
यह बात समझ से परे है कि कई मसीही लोग यह मान लेते हैं कि जिस अनुग्रह ने उन्हें उद्धार दिलाया था, उसने अपना कार्य पूरा कर लिया है और अब वह व्यावहारिक रूप से उपयोगी नहीं है। वे इस बात से सन्तुष्ट हैं कि उनका “मृत्यु से जीवन” में परिवर्तन हो गया है, परन्तु अब शेष जीवन को अपनी ही शक्ति से संघर्ष करते हुए जीना होगा, वे ऐसा मानते हैं। परन्तु यह एक विश्वासी के जीवन में अनुग्रह की दिशा और गहराई का बहुत कम आकलन है। निष्पक्षता से कहें तो, मसीही साहित्य में जो कुछ लिखा गया है, उसमें उद्धार करने वाले अनुग्रह पर अधिक बल दिया गया है और आत्मिक उन्नति करने वाले अनुग्रह पर अपेक्षाकृत कम ध्यान दिया गया है।
परन्तु परमेश्वर का अनुग्रह न केवल उद्धार करता है, वरन् हमें बनाए भी रखता है। मसीही विश्वासी को अनुग्रह (वरदान रूपी अनुग्रह) के द्वारा परमेश्वर तक पहुँच प्राप्त होती है और उसमें स्थिर रहने (उन्नति सम्बन्धी अनुग्रह) के द्वारा उसे निरन्तर सामर्थ्य प्राप्त होती है। अनुग्रह उस समृद्धि को सम्भव कर देता है जिसे पवित्रशास्त्र “बहुतायत का जीवन” कहता है (उदाहरण के लिए यूहन्ना 10:10)। यही बात प्रेरित पौलुस के मन में थी जब वह वरदान स्वरूप विश्वास को आत्मिक उन्नति के विश्वास से जोड़ता है, “क्योंकि जब एक मनुष्य के अपराध के कारण मृत्यु ने उस एक ही के द्वारा राज्य किया, तो जो लोग अनुग्रह और धर्मरूपी वरदान बहुतायत से पाते हैं वे एक मनुष्य के, अर्थात् यीशु मसीह के द्वारा अवश्य ही अनन्त जीवन में राज्य करेंगे” (रोमियों 5:17)। पौलुस ने बड़ी कुशलता से परमेश्वर की उद्धार करने वाली भलाई (“धार्मिकता का सेंत-मेंत वरदान”) और अनुग्रह की बहुतायत (“जीवन में राज्य करने के लिए”) के बीच के अन्तर को स्पष्ट किया है।
सामान्यतः बाइबल “वरदान रूपी अनुग्रह” और “उन्नति के लिए अनुग्रह” जैसे शब्दों का उपयोग उन्हें अलग करने के लिए नहीं करती, क्योंकि इसे परमेश्वर की उदारता का सम्पूर्ण वरदान के रूप में देखा जाता है — अर्थात् उद्धार के लिए अनुग्रह तथा पवित्रता के लिए भी अनुग्रह। वरदान अनुग्रह और उन्नति मसीही जीवन की महिमा की यात्रा को आरम्भ करते हैं और उसे बनाए रखते हैं। पौलुस एक ऐसे जीवन की कल्पना करता है जिसमें अनुग्रह बहुतायत से राज्य करता है (रोमियों 5:17; 6:14–19)। यहाँ तक कि वह पाठक को पवित्र आत्मा के कार्य के द्वारा दिए गए अनुग्रह के बाहर उन्नति करने के प्रयास के लिए भी डाँटता है: “क्या तुम ऐसे निर्बुद्धि हो, कि आत्मा की रीति पर आरम्भ करके अब शरीर की रीति पर अन्त करोगे?” (गलातियों 3:3)
परमेश्वर की यह कितनी बड़ी दया है कि वह विश्वासियों के जीवन के अन्त तक उद्धार के भरोसे को बढ़ाता है, जबकि वे इस पतित संसार में सुसमाचार के योग्य जीवन जीने की जटिलताओं से जूझते रहते हैं। इसलिए परमेश्वर की महिमा के लिए जीवन जीने के लिए इस उन्नति के अनुग्रह को समझना आवश्यक है।
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चर्चा एवं मनन:
- अपने दिवालियापन और अयोग्यता की गहराई के विषय में सोचें और उन्हें लिखें। मरकुस 7:20–23; रोमियों 1:29–32; इफिसियों 2:1–3 और 4:17–19 पर विचार करें। मसीह से पहले, इन आयतों में दिए गए वचन आपके हृदय का प्रतिनिधित्व कैसे करते थे? हमारी अयोग्यता का आकलन हमारे उस उत्साह को कैसे बढ़ाता है जो परमेश्वर ने हमें दिया है?
- परमेश्वर द्वारा दिए गए उद्धार के अनेक अनुग्रह के वरदानों पर विचार करें। उद्धार के अनुग्रह से सम्बन्धित इन अद्भुत वरदानों को खोजने के लिए रोमियों 3-8 और इफिसियों 1-3 को पढ़ें, और उन सभी की सूची बनाने में कुछ समय व्यतीत करें जिन्हें परमेश्वर अनुग्रह के साथ उद्धार में देता है।
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भाग III: अनुग्रह की बढ़ोतरी
यह सच है कि सभी वरदान एक समान नहीं होते हैं। वे आकार और रूप में भिन्न होते हैं, और यही बात बड़े दिन की सुबह को रहस्यमय आनन्द से भर देती है। मसीहियों के रूप में अनुग्रह से सम्बन्धित हमारा अनुभव भी ऐसा ही है; क्योंकि इसका स्वरूप और आकार भी भिन्न-भिन्न होता है।
इससे दो प्रश्न उठते हैं:
- क्या सभी मसीही लोगों को समान रूप से परमेश्वर का अनुग्रह प्राप्त होता है?
- क्या सभी मसीही लोग एक समान परमेश्वर के अनुग्रह का अनुभव करते हैं?
पवित्रशास्त्र पहले प्रश्न का स्पष्ट उत्तर “हाँ” में देता है; और दूसरे प्रश्न का उत्तर “न” में देता है। आइए मैं इसे समझाता हूँ। वरदान रूपी अनुग्रह और उन्नति रूपी अनुग्रह के बीच एक महत्वपूर्ण अन्तर यह है कि इन्हें प्राप्त करने का तरीका भिन्न होता है। वरदान रूपी अनुग्रह, या चुने जाने वाला अनुग्रह उस पापी को दिया जाता है जिसे परमेश्वर ने चुना है (इफिसियों 1:4–5); उन्नति रूपी अनुग्रह (उसकी गहराई और व्यापकता में) विश्वासी द्वारा चुना या आगे बढ़कर ग्रहण किया जाता है (1 पतरस 4:10)। और जिस हद तक एक विश्वासी अनुग्रह पाने की इच्छा करता है, उन्हें खोजता है और उनका अभ्यास करता है, उसी हद तक वह भर दिया जाएगा, और इतनी भरपूरी से भरा जाएगा कि वह उमड़ पड़ेगा।
सभी मसीही लोगों को परमेश्वर के अनुग्रह का एक समान भाग नहीं मिल पाता है। परन्तु इस बात पर विचार पूर्वक ध्यान करें कि मसीही लोग अपने जीवन में परमेश्वर के अनुग्रह के अनुभव को बढ़ा सकते हैं। आप परमेश्वर के अनुग्रह के अनुभव में बढ़ोतरी कर सकते है, केवल समझ में नहीं, वरन् अनुभव में भी। आप उसकी अद्भुत उदारता की अधिक मात्रा (याकूब 4:6) और उच्च गुणवत्ता (2 कुरिन्थियों 9:8) का अनुभव कर सकते हैं।
वास्तव में, पतरस हमें स्पष्ट रूप से आज्ञा देता है कि हम प्रभु यीशु मसीह के अनुग्रह और ज्ञान में बढ़ते चले जाएँ (2 पतरस 3:18)। मसीहियों को परमेश्वर के अनुग्रह के अनुभव और आनन्द की देखभाल करने और आगे बढ़ने के लिए बुलाया गया है। उद्धार देने वाले अनुग्रह की महानता को परिभाषित करने के पश्चात् यह अध्याय बढ़ोतरी रूपी अनुग्रह की अवधारणा को स्पष्ट करता है और बताता है कि हम इसे कैसे बढ़ा सकते हैं।
परमेश्वर के अनुग्रह में बढ़ने का सौभाग्य
विश्वासी को उद्धार देने वाले अनुग्रह को, अनुग्रह के कई वरदानों में से पहला समझना चाहिए। उद्धार का अनुग्रह वह द्वार है जिससे होकर मसीही लोग प्रवेश करते हैं, ताकि प्रतिदिन अनुग्रह के मार्ग पर चल सकें। यदि कोई विश्वासी जन अनुग्रह से भरे जीवन की इस व्यापक दृष्टि को नहीं समझता है, तो वह परमेश्वर की बहुतायत की उदारता के अपने अनुभव को सीमित कर देगा। वरदान रूपी अनुग्रह एक क्षण (मन परिवर्तन का क्षण) और एक उद्देश्य (हमें परमेश्वर के सामने धर्मी ठहराता है) को पूरा करता है। परमेश्वर का अनुग्रह अद्भुत रीति से बहुत व्यापक है — यह ऐसा वरदान है जिसका उद्देश्य विश्वासी के जीवन के हर पहलू और हर क्षण तक पहुँचना है।
कई आयतें इस सत्य को उजागर करती हैं कि मसीही लोग अपने जीवन में अनुग्रह को बढ़ा सकते हैं। पतरस अपने दूसरे पत्र को इस आशीष के साथ समाप्त करता है: “हमारे प्रभु और उद्धारकर्ता यीशु मसीह के अनुग्रह और पहचान में बढ़ते जाओ” (2 पतरस 3:18)। हमारा जीवन उस अनुग्रह की बहुतायत से भरा होना चाहिए जो हम पर उण्डेला गया है (रोमियों 5:17; इफिसियों 1:8)। हमारी विभिन्न आवश्यकताओं और सीमाओं के बीच, “परमेश्वर हर प्रकार का अनुग्रह तुम पर बहुतायत से कर सकता है” (2 कुरिन्थियों 9:8)।
तो आइए हम अनुग्रह के इन दो पहलुओं पर विचार करें: वरदान रूपी अनुग्रह और उन्नति रूपी अनुग्रह।
वरदान रूपी अनुग्रह और उन्नति रूपी अनुग्रह
अनुग्रह के विषय में सबसे बड़ी गलत धारणा यह है कि यह एक स्थिर (कभी न बदलने वाला) वरदान है। परन्तु सच्चाई यह है कि अनुग्रह एक असाधारण, गतिशील (लगातार बदलने वाली) सामर्थ्य है। यह उतनी ही मात्रा में उपलब्ध कराया जाता है, जितनी इच्छाशक्ति विश्वास करने वाले व्यक्ति में उसे उपयोग करने की होती है।
आइए हम वरदान रूपी अनुग्रह और उन्नति रूपी अनुग्रह के विभिन्न कार्यों पर विचार करें।
वरदान रूपी अनुग्रह परमेश्वर की प्रभुता सम्पन्न उदारता का सर्वव्यापी उद्धार का कार्य है, जो सभी के लिए एक समान है। मसीही लोग उद्धार के वरदान के रूप में अनुग्रह की समान मात्रा और गुणवत्ता का आनन्द लेते हैं। मसीह की योग्यता और विश्वास के द्वारा ही धर्मी ठहराए जाने से केवल विश्वास पर आधारित मसीह का अनुयायी, अनुग्रह के जीवन में उद्धार पाता है (रोमियों 3:24)। जैसा कि पहले ही उल्लेख किया गया है कि उद्धार का वरदान अनेक प्रकार के अनुग्रहों को सम्मिलित करता है (उदाहरण स्वरूप: पापों की क्षमा, लेपालक होना, छुटकारा, शुद्धिकरण, पवित्र आत्मा, आत्मिक वरदान आदि)। वरदान रूपी अनुग्रह परमेश्वर की उदारता का एक भव्य और गौरवशाली अभिव्यक्ति है, जो अयोग्य पापियों को दिया जाता है और यह उन सभी को भी समान रूप से दिया जाता है जो इसे ग्रहण करते हैं। सारा गुण मसीह का है; और सारी महिमा परमेश्वर की है (2 कुरिन्थियों 5:21)।
इस क्षेत्रीय मार्गदर्शिका में हम जो सीख रहे हैं वह यह है कि उन्नति सम्बन्धी अनुग्रह में जीवन की प्रत्येक आवश्यकता के लिए प्रतिदिन, हर घड़ी बहुतायत का प्रावधान करने का विशेष अधिकार सम्मिलित है (2 कुरिं. 9:8-15)। उन्नति सम्बन्धी अनुग्रह वह अनुग्रह है जो विश्वास करने वाले को स्थिर बनाए रखता है और थामे रहता है, जिससे वह परमेश्वर की महिमा के लिए स्थिर हो सके और फल ला सके, और साथ ही उन्नति रूपी अनुग्रह सक्रिय रहता है, और धर्मी जीवन और पवित्र प्रयास करने के लिए सामर्थ्य प्रदान करता है।
दोनों प्रकार के अनुग्रहों के परिणाम व्यापक और अद्भुत होते हैं। परमेश्वर अनुग्रह के साथ पापी का उद्धार करता है, और मसीह की धार्मिकता के राज्य के द्वारा उसके विद्रोही स्वभाव को वश में करता है। फिर मानो यह दयालुता का कार्य, विशेष रूप से क्षमा और बिना किसी योग्यता के कुछ सकारात्मक रूप देने की प्रतिज्ञा से अभिभूत होने की भावना का संकेत देता है। और तब परमेश्वर उस व्यक्ति को जिसकी आत्मा में परिवर्तन आया है, अनुग्रह के अधीन कर देता है (रोमियों 5:17)। अनुग्रह का यह नियम मसीहियों को पवित्रता के मार्ग पर ले जाता है।
पवित्रीकरण: अनुग्रह की बढ़ोतरी में परमेश्वर के साथ सहयोग करना
प्रगतिशील पवित्रीकरण सिखाता है कि मसीही लोग जैसे-जैसे मसीह में परिपक्व होते हैं, उनका विश्वास और विश्वासयोग्यता और अधिक बढ़ती चली जाती है (कुलुस्सियों 1:28; इफिसियों 4:14-16)। कई तरीकों से, यह बढ़ोतरी ही अनुग्रह की बढ़ोतरी है। अनुग्रह एक प्रेरित करने वाली सामर्थ्य है जो मसीही लोगों को आगे बढ़ने और प्रेरित करने का कार्य करती है ताकि वे परमेश्वर का आदर करें और उसकी सेवा करें (तीतुस 2:11–14)।
परमेश्वर का अनुग्रह एक कार्य करने वाली सामर्थ्य है और वह इसलिए उद्धार करता है ताकि वह मसीही लोगों के जीवन में राज्य कर सके। परमेश्वर के वरदान रूपी अनुग्रह के द्वारा पाया गया उद्धार (रोमियों 5:20) उन्नति रूपी अनुग्रह की स्थापना की ओर ले जाता है (रोमियों 5:21)। अनुग्रह पाप पर विजयी होकर हमें धर्मी ठहराता है (रोमियों 5:1) और पवित्र बनाता है (रोमियों 6:15–18)।
मसीही लोगों को यह विशेष अधिकार प्राप्त है कि वह अनुग्रह की सामर्थ्य, अधिकार और पवित्र करने वाले प्रभाव के अधीन जीवन व्यतीत करें। अब व्यवस्था का शासन नहीं रहा (रोमियों 6:14)। व्यवस्था के नाखून अब मसीही लोगों को जकड़े हुए नहीं हैं। अब हमें परमेश्वर और दूसरों की सेवा करने के लिए स्वतंत्रता के साथ सामर्थ प्रदान की गई है (गलातियों 5:13)।
वरदान रूपी अनुग्रह
अनुग्रह उद्धार करता है
तथा क्षमा भी करता है
अनुग्रह परिवर्तन करता है
उन्नति रूपी अनुग्रह
अनुग्रह बढ़ता है
और सेवा करता है
अनुग्रह उत्पन्न करता है।
वेस्टमिंस्टर धर्म प्रश्नोत्तरी इसे अच्छी रीति से व्यक्त करती है: “पवित्रीकरण परमेश्वर का सेंत-मेंत अनुग्रह का कार्य है, जिसके द्वारा हम सम्पूर्ण व्यक्ति के रूप में परमेश्वर के स्वरूप के अनुसार नए बनाए जाते हैं, और पाप के लिए मरने तथा धार्मिकता के लिए जीने में और अधिक योग्य बनाए जाते हैं।”
उद्धार देने वाले अनुग्रह और उन्नति रूपी अनुग्रह के बीच के भेद को स्पष्ट करने के पश्चात, अब हम इस सुन्दर और सामर्थी सच्चाई को उजागर करना चाहते हैं कि उद्धार का अनुग्रह हमें चुनता है, और हम उन्नति करने वाले अनुग्रह को चुनते हैं। बढ़ते हुए अनुग्रह को चुनने के लिए पवित्र आत्मा के संसाधनों के बीच एक सहयोगात्मक प्रयास और उन्हें उपयोग करने में स्वयं को प्रयत्नशील रखने की इच्छा की आवश्यकता होती है (1 कुरिन्थियों. 15:10)।
परमेश्वर के अनुग्रह में एक विकसित की जा सकने वाली विशेषता होती है, जिसके द्वारा एक विश्वासी आत्मिक रूप से परिपक्व हो सकता है और उसके अनुग्रह का और अधिक आनन्द ले सकता है। परन्तु उस अनुग्रह की सही देखभाल करना अगली चुनौती होती है — आइए जानें कि अनुग्रह में बढ़ने के कुछ व्यावहारिक उपाय क्या हैं।
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चर्चा एवं मनन:
- हम अपने जीवन में परमेश्वर के अनुग्रह के अनुभव को किस प्रकार से नकार सकते हैं?
- मसीही लोग परमेश्वर का उद्धार करने वाला अनुग्रह कैसे प्राप्त करते हैं?
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भाग IV: अनुग्रह में बढ़ने के दस तरीके
अनुग्रह की सुन्दरता प्रकट हो चुकी है। हमारे पापों की पृष्ठभूमि के विरुद्ध और एक बढ़ते हुए विश्वासी के रूप में अनुग्रह से ही उद्धार हुआ है तथा उसी ने अगुवाई भी की है। परन्तु कई मसीहियों के पास पवित्रता का फल उत्पन्न करने के सम्बन्ध में परमेश्वर के अनुग्रह के विषय में पर्याप्त दृष्टिकोण नहीं है। इसलिए परिणामस्वरूप उन विश्वासियों को परमेश्वर के अनुग्रह का अनुभव भी सीमित ही होता है। मसीही लोग इस उद्देश्य के लिए बनाए गए हैं कि वे परमेश्वर के अनुग्रह को ग्रहण करें, उसके अनुग्रह पर प्रतिक्रिया दें, और अपने दैनिक जीवन में उसके प्रभाव को बढ़ते हुए देखें।
इसलिए परमेश्वर विश्वासियों को आज्ञा देता है कि आप अनुग्रह में बढ़ें। ये दस प्रयास मसीही लोगों को यह आनन्द देते हैं कि वे अपने जीवन में अनुग्रह के अनुभव को अधिक से अधिक बढ़ा सके। आइए, हम इन दस प्रेरणाओं के माध्यम से अनुग्रह में बढ़ने का प्रयास करें।
1. परमेश्वर के अनुग्रह के भण्डारी
मसीहियों को यह समझना चाहिए कि परमेश्वर ने उन पर अनुग्रह इस उद्देश्य से किया है कि वे उसका सही उपयोग करके उसका लाभ उठा सकें। ऐसा प्रतीत होता है कि पतरस विशेष रूप से “बढ़ने वाले अनुग्रह” के अधिकार के प्रति सजग था। इसलिए वह अपनी पहली पत्री में विश्वासियों को आज्ञा देता है कि, “जिसको जो वरदान मिला है, वह उसे परमेश्वर के नाना प्रकार के अनुग्रह के भले भण्डारियों के समान एक दूसरे की सेवा में लगाए” (1 पतरस 4:10)। इस खण्ड में “नाना प्रकार के अनुग्रह” मात्रा को नहीं, वरन् उन भिन्न-भिन्न वरदानों को दर्शाते हैं जिन्हें यीशु मसीह अपनी सम्प्रभु इच्छा से प्रदान करता है (इफिसियों 4:7)। यहाँ पर एक अद्भुत विचार यह है कि मसीहियों को परमेश्वर के अनुग्रह का “भण्डारी” या “प्रबन्धक” बनने के लिए बुलाया गया है। बढ़ने वाले अनुग्रह में हमारे कार्य और विकास सम्मिलित है, अर्थात् जब हम परमेश्वर के द्वारा प्राप्त वरदान को “प्रज्वलित” करने का प्रयास करते हैं (2 तीमुथियुस 1:6)।
अनुग्रह के भण्डारी को एक बहुमूल्य भण्डार सौंपा गया है, जिसे वह सावधानी पूर्वक विचार करके इस उद्देश्य से देखभाल करें कि दूसरे लोग उत्साहित हो सकें और आशीष पा सकें। यह कोई सुझाव या हमारी व्यस्त जीवनशैली में जोड़ी गई अतिरिक्त बात नहीं है — यही हमारा जीवन है। परमेश्वर ने वास्तव में हर विश्वासी को विभिन्न प्रकार की योग्यताओं, कौशल और संसाधनों से भरपूर किया है। एक विशेष क्षेत्र जहाँ विश्वासियों को परमेश्वर के अनुग्रह का भण्डारी बनने के लिए बुलाया गया है, और वह आत्मिक वरदान है, जो प्रत्येक विश्वासी के लिए विशेष रूप से निर्धारित किए गए हैं।
“चमत्कार” शब्द नए नियम में अनुग्रह के लिए उपयुक्त शब्द है। परमेश्वर के अनुग्रह के वरदान में आत्मिक वरदान भी सम्मिलित होते हैं। इफिसियों 4:7 कहता है कि, “पर हम में से हर एक को मसीह के दान के परिमाण के अनुसार अनुग्रह मिला है।”
अपने सम्पूर्ण वरदानों पर विचार करें। प्रत्येक मसीही व्यक्ति के पास वरदानों के पाँच स्रोत होते हैं:
- जन्म से प्राप्त स्वाभाविक वरदान (जन्मजात योग्यताएँ)
- जीवन में अनुभव और सीख (आप कहाँ रहते थे, और आपने कौन सी भाषा सीखी)
- विकसित जीवन-कौशल (जैसे वाद्य यंत्र बजाना, सेवा में उपलब्धियाँ)
- व्यावसायिक कौशल जो विकसित किए गए हैं (प्रशिक्षण और उपलब्धियाँ)
- आत्मिक वरदान (जैसे शिक्षा देना, उत्साह बढ़ाना, दान देना, अगुवाई करना आदि)
उन अनेक वरदानों पर विचार करें जो आपको दिए गए हैं (और हर एक विश्वासयोग्य व्यक्ति ने बिना किसी आपत्ति के आत्मिक वरदान पाए हैं) इसलिए पूरे मन से उन अवसरों और स्थानों की खोज करें जहाँ ये वरदान दूसरों के लिए आशीष और सेवा का कारण बन सकते हैं, ताकि परमेश्वर की महिमा हो (रोमियों 12:6–8)। अतः मसीही लोगों को अर्थात् आपको परमेश्वर के विशाल एवं अद्भुत अनुग्रह की परिपूर्णता को प्रभावी ढँग से प्रबन्धन करने के लिए बुलाया गया है। परमेश्वर ने प्रत्येक विश्वासी को वरदानों से भरकर सामर्थी बनाया है। इसलिए इन वरदानों का भली-भाँति प्रबन्धन करते हुए परमेश्वर के वरदानों का पूरा आनन्द लीजिए।
2. परमेश्वर के अनुग्रह का बहुतायत से आनन्द लें
मसीहियों को परमेश्वर के अनुग्रह के असीम स्वभाव पर विचार करना चाहिए — अर्थात् उसकी उदारता की अद्भुत और आश्चर्यजनक बहुतायत पर। परमेश्वर के अनुग्रह के भण्डारी होने के नाते, मसीहियों को इस असम्भव कार्य में आनन्द लेना चाहिए ताकि वे उसके अनुग्रह को मापने का प्रयास कर सकें।
पौलुस इस प्रकार से कहता है: “कि वह अपनी उस दया से जो मसीह यीशु में हम पर है, आनेवाले समयों में अपने अनुग्रह का असीम धन दिखाए।क्योंकि विश्वास के द्वारा अनुग्रह ही से तुम्हारा उद्धार हुआ है, और यह तुम्हारी ओर से नहीं, वरन् परमेश्वर का दान है” (इफिसियों 2:7-8) जब आप उसकी सृष्टि पर विचार करते हैं — अर्थात् विशाल महासागर, अंतरिक्ष की आकाशगंगाएँ, किसी एक जीव के भीतर अरबों अणुओं और परमाणुओं की जटिलता, तो क्या आप उसकी उस अनन्त अनुग्रह की कल्पना कर सकते हैं जिसकी कोई सीमा या अन्त ही नहीं है?
इसी पुस्तक में पहले, पौलुस एक बार फिर उस असीम अनुग्रह की बात करता है जो मसीही विश्वासियों के लिए उपलब्ध है, “कि उसके उस अनुग्रह की महिमा की स्तुति हो, जिसे उसने हमें …उस अनुग्रह के धन के अनुसार मिला है,जिसे उसने…बहुतायत से किया।” (इफि. 1:6–8) “धम” शब्द का अर्थ “अनियंत्रित सुन्दरता, असीमित और बहुतायत” से है।
स्पर्जन परमेश्वर के अनुग्रह की अति विशाल महिमा पर प्रकाश डालते हुए कहते हैं कि: “परमेश्वर का अनुग्रह कैसा अथाह है! इसकी चौड़ाई कौन नाप सकता है? उसकी गहराई को कौन समझ सकता है? उसके शेष गुणों के समान वह भी असीम है।” सारा अनुग्रह विनम्र और वचन के भूखे-प्यासे मसीहियों के लिए उपलब्ध है (2 कुरिं. 9:8)।
3. अनुग्रह में खड़े रहो
अनुग्रह मसीही लोगों का आधार है। यह यात्रा का आरम्भ है और हमारे निरन्तर आत्मिक जीवन की सामर्थ्य है, जो पवित्र आत्मा के द्वारा प्राप्त होती है (रोमियों 3:24; यूहन्ना 1:16)। पतरस अपने पहले पत्र को एक उत्साह देने वाले प्रोत्साहन के साथ यह कहते हुए समाप्त करता है कि “अब परमेश्वर जो सारे अनुग्रह का दाता है, जिसने तुम्हें मसीह में अपनी अनन्त महिमा के लिये बुलाया, तुम्हारे थोड़ी देर तक दुःख उठाने के बाद आप ही तुम्हें सिद्ध और स्थिर और बलवन्त करेगा।उसी का साम्राज्य युगानुयुग रहे। आमीन।” (1 पतरस 5:10-11) वह तुरन्त ही सिलावानुस को परमेश्वर के सच्चे अनुग्रह में खड़े रहने के लिए प्रोत्साहित करता है (5:12)। परमेश्वर हमें अनुग्रह में स्थिर कर रहा है, और हमें इस बात को जानते हुए उसी अनुग्रह में दृढ़ बने रहना है जिसे परमेश्वर ने हमें प्रदान किया है। यहाँ पवित्रीकरण का सुन्दर तालमेल मिलता है (फिलि. 2:12, 13; यहूदा 21)।
स्थिर बने रहने के लिए एक निश्चित स्थिति को स्थापित करना और बनाए रखना आवश्यक होता है। अतः मसीही जीवन परमेश्वर के अनुग्रह में जड़ें जमाए और स्थिर बना होना चाहिए। मसीही विश्वासियों को उसके अनुग्रह में बने रहने का विशेष सौभाग्य प्राप्त है (प्रेरितों के काम 13:43)।
अनुग्रह में खड़े होने का क्या अर्थ है?
1) इस बात को समझें कि परमेश्वर ने हमारे उद्धार की रचना अपने अनुग्रह से की है।
2) प्रावधान और सामर्थ्य के लिए उसके अनुग्रह पर निर्भर रहें।
3) परमेश्वर के अनुग्रह के मार्गों का अनुसरण करो।
4)इस संसार के भ्रष्टाचार से दूर रहो।
परमेश्वर के अनुग्रह के स्रोतों का अनुसरण करें, जिनमें आत्मिक अनुशासन, परमेश्वर का वचन, आत्मा का फल और स्थानीय कलीसिया में सहभागिता सम्मिलित हैं। इस संसार की मलिनता से दूर रहो, जिसमें वासना, शरीर की अभिलाषाएँ, और सांसारिक मनोरंजन आदि सम्मिलित हैं (2 तीमुथियुस 2:22)।
मसीही जीवन परमेश्वर के अनुग्रह में जड़ पकड़ कर स्थिर होना चाहिए, जिसका अर्थ है कि हम परमेश्वर को स्वीकार करते हैं और निरन्तर उसकी स्तुति करते हैं, क्योंकि हम एक अनुग्रह से दूसरे अनुग्रह की ओर बढ़ते हैं अर्थात् अनुग्रह पर अनुग्रह। (यूहन्ना 1:16) हमारे अनुभवों को — चाहे वे दुःख में हों या सफलता में — बार-बार इस रूप में समझा जाता है कि वे प्रदर्शित होता हुआ अनुग्रह है।
अभ्यास: उन आत्मिक अनुशासनों की पहचान करें जिन्हें आपको सुधारने की आवश्यकता है ताकि आप परमेश्वर के अनुग्रह में और अधिक स्थिर रह सकें।
अपने मार्गदर्शक से बातचीत करें कि बाइबल आधारित गहरी जड़ें जमाने वाली आदतें कैसे विकसित की जा सकती हैं।
4. अधिक अनुग्रह पाने के लिए अपने आप को दीन बनाओ।
वरदान रूपी अनुग्रह तब आता है जब एक पश्चातापी पापी पवित्र परमेश्वर के सामने अपने अहंकार और आत्मनिर्भरता को स्वीकार करता है (मरकुस 1:15)। दीनता का यह भाव उस मसीही जन के लिए भी आवश्यक है जो सुसमाचार के योग्य जीवन जीने की इच्छा रखता है (इफिसियों 4:1–2)। दीनता वह माध्यम है जिसके द्वारा अनुग्रह एक विश्वासी के जीवन में स्वतंत्र रूप से प्रवाहित होता है (1 पतरस 5:6)। किसी भी विश्वासी के हृदय में राजा के सिंहासन के लिए कोई प्रतिस्पर्धा नहीं हो सकती है। यदि प्रभु हमें ऊँचा उठाना चाहता है, तो यह उसी पर निर्भर करता है कि वह कब और कैसे इस कार्य को करेगा; परन्तु कोई भी अन्य प्राथमिकता मूर्तिपूजा के समान है। हमारा पापी स्वभाव निरन्तर हमारी स्थिति और सफलता को आगे बढ़ाने की इच्छा रखता, परन्तु एक विश्वासी ऐसी प्रवृत्तियों के प्रति सतर्क रहता है कि जो महिमा गलत स्थान पर चली गई है, उसे उसके सच्चे स्वामी को लौटा दे। घमण्ड अनुग्रह को नष्ट करता है, परन्तु “यहोवा झुके हुओं को सीधा खड़ा करता है” (भजन 146:8)। यह केवल एक पापपूर्ण प्रवृत्ति नहीं है जिसे नियंत्रित करना आवश्यक है; घमण्ड को एक विश्वासी के जीवन से, जो अनुग्रह में बढ़ना चाहता है, नियमित रूप से और दृढ़ता से मिटाना आवश्यक है (1 पतरस 5:5)।
परमेश्वर दीन मसीही जन पर और अधिक अनुग्रह करता है। याकूब 4:6 पर ध्यान दें: “वह तो और भी अनुग्रह देता है; इस कारण यह लिखा है, परमेश्वर अभिमानियों से विरोध करता है, पर नम्रों पर अनुग्रह करता है।” क्या ही अद्भुत घोषणा है: और अधिक अनुग्रह! एक विश्वासी को परमेश्वर के अधिक अनुग्रह की प्राप्ति कैसे होती है? इसका उत्तर हमारी आवश्यकताओं और सीमाओं की नम्र स्वीकृति के द्वारा होता है। परमेश्वर की निकटता और उसका महान अनुग्रह उन लोगों के लिए है जो पश्चाताप के साथ पाप से दूरी बना लेते हैं (याकूब 4:8, 9)। पश्चाताप और शोक की नम्र भावना परमेश्वर का ध्यान आकर्षित करती है, जैसा कि यशायाह कहता है, “परन्तु मैं उसी की ओर दृष्टि करूँगा जो दीन और खेदित मन का हो, और मेरा वचन सुनकर थरथराता हो” (यशायाह 66:2)।
यशायाह ने दीन मन वाले विश्वासियों के प्रति परमेश्वर की विशेष देखभाल पर और अधिक बल दिया है:
क्योंकि वह ऐसा कहता है वह जो ऊँचा और महान है, जो अनन्तकाल में विराजमान है, जिसका नाम पवित्र है: “मैं ऊँचे पर और पवित्र स्थान में निवास करता हूँ, और उसके संग भी रहता हूँ, जो खेदित और नम्र हैं, कि नम्र लोगों के हृदय और खेदित लोगों के मन को हर्षित करूँ।” (यशायाह 57:15)
यह कितना अद्भुत अनुग्रह है जिसे प्राप्त किया जाना चाहिए और जिसका अनुसरण भी किया जाना चाहिए: अर्थात् परमेश्वर की आत्मा की निकटता की उपस्थिति और आत्मिक जागृति होना। पवित्रशास्त्र लगातार सिखाता है कि परमेश्वर का अनुग्रह उन लोगों पर आता है जो उस पर निर्भर होते हैं और साथ ही दीन होते हैं (मत्ती 5:8)। परमेश्वर का ध्यान हमारी सांसारिक दिखावे और घमण्ड की ओर नहीं जाता, वरन् उस नम्र और दीन हृदय की ओर आकर्षित होता है जो अपनी असफलताओं और निर्बलताओं के प्रति विश्वासयोग्य बना रहता है और पश्चाताप करने के लिए उत्सुक रहता है। जिस प्रकार कुचले हुए और पश्चातापी चुंगी लेने वाले ने दया के लिए निराश होकर पुकारा, ठीक उसी प्रकार यीशु मसीह उन लोगों की सराहना करता है जो स्वयं को दीन बनाते हैं (लूका 18:13-14)।
पतरस भी यह तर्क देता है, “तुम सब के सब एक दूसरे की सेवा में दीनता से कमर बान्धे रहो, क्योंकि परमेश्वर अभिमानियों का विरोध करता है, और दीनों पर अनुग्रह करता है” (1 पतरस 5:5)। इसलिए जहाँ वरदान रूपी अनुग्रह सभी के लिए समान रूप से दिया जाता है, वहीं उन्नति रूपी अनुग्रह विश्वासी की स्वयं को दीन बनाने की इच्छा पर निर्भर करता है।
पवित्रशास्त्र बार-बार बल पूर्वक विश्वासी जन को यह आज्ञा देता है कि वह स्वयं को दीन बनाए (उदाहरण के लिए, याकूब 4:10)। यीशु मसीह कहता है, “क्योंकि जो कोई अपने आप को बड़ा बनाएगा, वह छोटा किया जाएगा; और जो कोई अपने आप को छोटा बनाएगा, वह बड़ा किया जाएगा।” (लूका 14:11) पवित्रशास्त्र की यह पुकार बार-बार विश्वासियों को “स्वयं” दीन करने की आज्ञा देती है (1 पतरस 5:5–6)। इसे प्रतिवर्ती क्रिया कहा जाता है अर्थात् ऐसी क्रिया जिसे मसीही व्यक्ति को अपने ऊपर स्वयं लागू करनी होती है। हमारी सांसारिक प्रवृत्ति स्वयं का उल्लेख करने, स्वार्थ में लिप्त रहने, और स्वयं की महिमा बढ़ाने की ओर होती है (नीतिवचन 16:18)। क्योंकि शत्रु बहुत चालाक है, इसलिए हम अपने भीतर उस प्रवृत्ति के होने से भी अनजान रह सकते हैं। हमारा विद्रोह घमण्ड के एक बीज से आरम्भ हुआ था, और यह कहना कठिन नहीं है कि लगभग हर अन्य पाप के मूल में भी अहंकार ही छिपा होता है (ओबद्याह 3)।
पवित्रशास्त्र की यह स्पष्ट साक्षी है कि जब यीशु मसीह का अनुयायी दीनता और नम्रता का भाव अपनाता है, तो परमेश्वर का ध्यान उसकी ओर आकर्षित होता है, और अनुग्रह को उसके जीवन में स्वतंत्र रूप से कार्य करने का स्थान मिल जाता है। फिलिप ब्रूक्स ने बहुत सुन्दर ढँग से वर्णन किया है कि, “अनुग्रह, जल की भाँति, सबसे नीचे भाग की ओर बहता है।” काश, हम भी दीनता की चाहत रखते और अनुग्रह के लिए अपने भीतर स्थान बनाते कि वह हमें भर सके।
5. अनुग्रह से परिपूर्ण आज्ञाकारिता की शिक्षा को सीखें।
बहुत से लोगों के लिए अनुग्रह का अर्थ छूट मिलना, अच्छा व्यवहार करना, या यहाँ तक कि समझौता करना होता है। हालाँकि, बाइबल के अनुसार अनुग्रह धार्मिकता को बढ़ावा देता है और पाप से घृणा करता है। यह आज्ञाकारिता और सम्मान का पालन करता है। अनुग्रह भक्ति की भावना को बढ़ावा देता है और सांसारिकता से घृणा करना सिखाता है। इसलिए, अनुग्रह हमें संसार से छेड़छाड़ करने की छूट नहीं देता, वरन् यह हमें वासना का त्याग करना सिखाता है।
पौलुस के शब्द हमें परमेश्वर के अनुग्रह के सामर्थी और पवित्र करने वाले प्रभाव के विषय में बताते हैं:
क्योंकि परमेश्वर का अनुग्रह प्रगट है, जो सब मनुष्यों में उद्धार लाने में सक्षम है।और हमें चिताता है, कि हम अभक्ति और सांसारिक अभिलाषाओं से मन फेरकर इस युग में संयम और धार्मिकता से और भक्ति से जीवन बिताएँ;और उस धन्य आशा की अर्थात् अपने महान परमेश्वर और उद्धारकर्ता यीशु मसीह की महिमा के प्रगट होने की प्रतीक्षा करते रहें।जिस ने अपने आप को हमारे लिये दे दिया, कि हमें हर प्रकार के अधर्म से छुड़ा ले, और शुद्ध करके अपने लिये एक ऐसी जाति बना ले जो भले-भले कामों में सरगर्म हो (तीतुस 2:11-14)।
अनुग्रह मसीही जन को निम्न बातों के लिए प्रशिक्षित करता है:
1) अभक्ति का त्याग करें।
2)सांसारिकता से मन फिराएँ।
3)स्वयं-संयमित रहें।
4)धार्मिकता और भक्ति का पीछा करें।
5)भले कामों को करने के लिए सरगर्म रहें।
यही उन्नति रूपी अनुग्रह की सामर्थ्य है।
यह उल्लेखनीय है कि अनुग्रह के प्रभुत्व के अधीन रहने का मुख्य अर्थ यह है कि मसीही लोग आज्ञाकारी जीवन जीने के लिए स्वयं को समर्पित करें (रोमियों 5:17; 6:14)। वास्तव में, जब हमारे जीवन में अनुग्रह का राज्य होता है, तब हम अपने जीवन के हर भाग को धार्मिकता का दास बनाकर प्रस्तुत करते हैं (रोमियों 6:18)। यह समर्पण पवित्रीकरण को बढ़ावा देगा और अनन्त जीवन की ओर ले जाता है।
सम्भवतः हमारे दुर्बल क्षणों में हमने दूसरों से यह कहकर अनुग्रह माँगा हो कि वे हमारी किसी गलती को अनदेखा कर दें, परन्तु यह अनुग्रह के कार्य का गलत उपयोग है। अनुग्रह को केवल गलतियों के लिए “छूट” या पाप में बने रहने की अनुमति के रूप में समझना गलत है। वास्तव में, यह तो वह प्रेरक सामर्थ्य है जो हमें पवित्रता की ओर अग्रसर करती है। जॉन पाइपर ने बहुत ही उत्साह के साथ कहा है: “अनुग्रह सामर्थ्य है, न कि क्षमा।” इस धारणा से कहीं आगे कि अनुग्रह समझौते की अनुमति देता है, वास्तव में अनुग्रह पवित्रता और आज्ञाकारिता के लिए भूख उत्पन्न करता है।
अभ्यास: अपने मार्गदर्शक से उन जीवन क्षेत्रों के विषय में बातचीत करें जहाँ अधिक ध्यान देने और धार्मिकता तथा आज्ञाकारिता के उच्च स्तर की आवश्यकता है। परमेश्वर आपके जीवन के किस क्षेत्र में उसके शुद्धिकरण करने वाले अनुग्रह का अनुभव और अधिक करवाना चाहता है?
6. परमेश्वर के अनुग्रह में अपनी सामर्थ्य को पाएँ।
एक ऐसी संस्कृति जो पहचान की खोज में उलझी हुई है, परन्तु अनुग्रह से परिपूर्ण विश्वासी इस बात को भली भाँति जानता है कि वह कौन है और किसका है। आज का मनोवैज्ञानिक समाज किसी भी ऐसी बात से कतराता है जो हमारी दुर्बलता, निर्बलता या अपराधबोध को उजागर करती है। हमारी संस्कृति हमें इन सब से दूर भागने को कहती है। सुरक्षा हमारी आत्म-संरक्षण करने वाली व्यक्तिवादी संस्कृति की प्राथमिकता है। इसके विपरीत, विश्वासी अपनी दीनता का उत्सव मनाता है, और समझता है कि “उसकी सामर्थ्य निर्बलता में सिद्ध होती है,” और स्वयं को अपने पाप, शर्म, निर्बलताओं और पीड़ा की वास्तविकता में पाता है, जिसे एक अनुग्रहकारी उद्धारकर्ता के द्वारा ढका गया है (2 कुरिं. 12:9-12)। विश्वासी जन अनुग्रह के द्वारा सामर्थ्य पाता है, क्योंकि यह हमें बुद्धि, धैर्य, सहनशीलता और आशा में जिस बात की भी कमी होती है, वह सब देता है (2 तीमुथियुस 2:1)।
अनुग्रह विश्वासी के लिए सही समय पर मिलने वाली सहायता है (2 कुरिन्थियों 9:8)। इसके प्रमाण हमें एलिज़ाबेथ एलियट, जॉन पैटन, रिडली और लैटिमर, तथा एमी कार्माइकल जैसे पुरुषों और महिलाओं के जीवन में मिलते हैं। अपने दुःखों में स्थिर रहने और पीड़ा में भी आनन्दित होने के लिए अनेक पवित्र लोगों ने इतिहास में गहन आत्मिक उन्नति और परमेश्वर के अनुग्रह से जुड़े होने का अनुभव किया है। पहला पतरस परीक्षाओं का सामना कर रहे मसीहियों के लिए एक सामर्थ्य से भरी मार्गदर्शिका के रूप में कार्य करता है। हर अध्याय में एक ऐसा वचन सम्मिलित है जो पाठकों को यह सिखाता है कि तूफानों का सामना केवल जीवित रहने के लिए ही नहीं, वरन् पवित्रता के लिए भी करना होता है। यदि हम विश्वास करते हैं कि सभी परिस्थितियाँ परमेश्वर के प्रेमपूर्ण हाथ और उसकी सिद्ध योजना से उत्पन्न होती हैं, तो हम निश्चिंत हो सकते हैं कि हमें स्थिर बने रहने में सहायता, सहने की शक्ति, और विश्राम के लिए शान्ति अवश्य मिलेगी।
अनुग्रह के बिना, हमारा दुःख व्यर्थ प्रतीत होगा, हमारा भरोसा डगमगा सकता है, और हमारी आशा जाती रहेगी। अनुग्रह हमारे हृदयों, हमारे मनों और हमारी स्मृतियों में यीशु मसीह के सभी सत्यों को स्थिर रखता है, अर्थात् जब हम उसकी अटल विश्वासयोग्यता को स्मरण करते हैं। इसलिए मसीही लोगों इस बात को स्मरण रखो कि परीक्षाओं के बीच आपकी सेवा करने वाला वही परमेश्वर है जो सम्पूर्ण अनुग्रह का दाता है (1 पतरस 5:10)।
सैमुअल रदरफोर्ड, एक स्कॉटलैंड निवासी धर्म सुधारक जो कठिन परिस्थितियों को भली-भाँति जानते थे, संक्षेप में कहते हैं कि, “कठिनाई और पीड़ादायक समय आत्मिक उन्नति और परमेश्वर के अनुग्रह का अनुभव होने के लिए सबसे उपजाऊ भूमि हो सकती है।” इसलिए अपनी कठिनाइयों को तुच्छ मत समझो। हमारी निर्बलताएँ ही वे खुले हाथ हैं जिनमें परमेश्वर अपना अधिक से अधिक अनुग्रह रखता है। इसलिए इस बात को भली भाँति समझिए कि आपकी निर्बलताएँ ही वह खाली बर्तन हैं जिन्हें परमेश्वर बहुतायत से भरना चाहता है (2 कुरिन्थियों 9:8)।
इब्रानियों का लेखक उस अनुग्रह को प्रमुखता से दर्शाता है जो अनुग्रह के सिंहासन से प्राप्त होता है: “इसलिए आओ, हम अनुग्रह के सिंहासन के निकट साहस बाँधकर चलें, कि हम पर दया हो, और वह अनुग्रह पाएँ, जो आवश्यकता के समय हमारी सहायता करे” (इब्रानियों 4:16)।
सम्भवतः 2 कुरिन्थियों 9:8 से बड़ी कोई प्रतिज्ञा संकटग्रस्त आत्मा को प्रोत्साहित नहीं कर सकती: जो कहती है कि, “परमेश्वर सब प्रकार का अनुग्रह तुम्हें बहुतायत से दे सकता है।” जिससे हर बात में और हर समय, सब कुछ, जो तुम्हें आवश्यक हो, तुम्हारे पास रहे, और हर एक भले काम के लिये तुम्हारे पास बहुत कुछ हो।” कितना असाधारण विस्तार और व्यापकता उस अनुग्रह में है, जो आपके लिए उपलब्ध है। इसलिए मुख्य बात यह है कि आप अपनी आवश्यकता को स्वीकार करते हुए प्रार्थना में दीनता के साथ उसकी सहायता माँगें। डी. एल. मूडी ने उस मसीही व्यक्ति की स्थिति का सार संक्षेप में वर्णन किया है जो परमेश्वर के उन्नति सम्बन्धी अनुग्रह की परिपूर्णता प्राप्त करता है, “सच्चा अनुग्रह तब प्राप्त होता है जब व्यक्ति स्वयं को दीन करता है और परमेश्वर के अनुग्रह की आवश्यकता को स्वीकार करता है। जब कोई व्यक्ति स्वयं को दीन करता है और दया की आवश्यकता को समझता है, कि उसे दया की आवश्यकता है, तो प्रभु उस पर अनुग्रह करता है।”
7. उत्सुकता से अनुग्रह का वचन बोलो
सुसमाचार अनुग्रह का वचन है। इफिसुस के प्राचीनों को दिए गए अपने अन्तिम सन्देश में पौलुस ने उनसे कहा कि, “परन्तु मैं अपने प्राण को कुछ नहीं समझता कि उसे प्रिय जानूँ, वरन् यह कि मैं अपनी दौड़ को, और उस सेवा को पूरी करूँ, जो मैंने परमेश्वर के अनुग्रह के सुसमाचार पर गवाही देने के लिये प्रभु यीशु से पाई है।” (प्रेरितों के काम 20:24) परमेश्वर के अनुग्रह का सुसमाचार उस की उदारता का सन्देश है जो अयोग्य मनुष्य जाति के लिए प्रकट हुआ है। हमें भी इसी प्रकार अनुग्रह के सुसमाचार को जीने और प्रचार करने के लिए उत्सुक होना चाहिए। तत्पश्चात पौलुस ने सुसमाचार को केवल “उसके अनुग्रह का वचन” कहा (प्रेरितों के काम 20:32)। गलातियों की पुस्तक में, “मसीह का अनुग्रह” को “मसीह के सुसमाचार” का पर्यायवाची रूप में प्रयोग किया गया है (गलातियों 1:6–7)। इसके अतिरिक्त, पौलुस आज्ञा देता है कि हम केवल वही वचन बोलें जो समय की आवश्यकता के अनुसार अनुग्रह प्रदान करें (इफिसियों 4:29)।
8. परमेश्वर के अनुग्रह के द्वारा कार्य करें
1 कुरिन्थियों अध्याय 15 में पौलुस कहता है कि, वह हमारे लिए अनुग्रह का सामर्थ्य और मूल्य को समझने से जीवन-परिवर्तनकारी हो सकता है। पौलुस लिखता है कि, “परन्तु मैं जो कुछ भी हूँ, परमेश्वर के अनुग्रह से हूँ। और उसका अनुग्रह जो मुझ पर हुआ, वह व्यर्थ नहीं हुआ परन्तु मैंने उन सबसे बढ़कर परिश्रम भी किया तो भी यह मेरी ओर से नहीं हुआ परन्तु परमेश्वर के अनुग्रह से जो मुझ पर था।” (1 कुरिन्थियों 15:10) वह दीनता से यह स्वीकार करता है कि उसके जीवन में जो कुछ भी अच्छा और छुटकारा देने वाला हुआ है, उसका कारण केवल परमेश्वर का अनुग्रह है। और वह यह भी स्वीकार करता है कि अनुग्रह ने उसके भीतर काम करने की यह लगन उत्पन्न की है। वास्तव में, उसने कहा कि अनुग्रह के कारण ही वह “उन सब से अधिक परिश्रम” करने लगा। अनुग्रह ने पौलुस को प्रभु के लिए पूरे उत्साह और समर्पण के साथ कार्य करने के लिए प्रेरित किया।
बहुत से मसीहियों के लिए आत्मिक कार्य एक बोझिल उत्तरदायित्व बन गया है, जिसे वे टालने का प्रयास करते हैं। उद्धार करने वाले अनुग्रह का वरदान हमें भले कामों और सेवा के प्रति समर्पित जीवन की ओर ले जाना चाहिए (इफिसियों 2:10)। पौलुस के लिए, दूसरों की देखभाल करना उसके जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य था (2 कुरिन्थियों 12:15)। उसने अपनी सारी ऊर्जा और प्रयास सुसमाचार की उन्नति में लगा दिए, ताकि वह अनुग्रह के सुसमाचार में और अधिक गहराई से और अर्थपूर्ण रीति से भाग ले सके (1 कुरिन्थियों 9:23)। परमेश्वर की ओर से अनुग्रह प्रकट हुआ कि “शुद्ध करके अपने लिए एक ऐसी जाति बना ले जो भले-भले कामों में सरगर्म हो।” (तीतुस 2:14) भले काम परमेश्वर के द्वारा दिए जाने वाले अनुग्रह पर निर्भर होने से उत्पन्न होते हैं।
यह पवित्र आत्मा की सामर्थ्य ही है जो आज्ञाकारिता को सामर्थ्य और ऊर्जा प्रदान करती है (कुलुस्सियों 1:29)। मसीही व्यक्ति का आज्ञाकारी कार्य करना, उद्धार के बदले परमेश्वर को कुछ देना नहीं है, वरन् मसीही सेवा उसके अनुग्रह के प्रति निरन्तर बढ़ती हुई निर्भरता और ऋणी होने का एक साहसिक कार्य है, ताकि उसका फल हम में उत्पन्न हो सके (यूहन्ना 15:7-8)।
अनुग्रह कार्य करने के लिए उत्साहित करता है। इसलिए उसके अनुग्रह की प्रेरणा का अनुसरण करो और स्वयं को कार्य में लगाओ — परमेश्वर के प्रेम को पाने के लिए नहीं, वरन् उसके प्रेम के उत्तर में कार्य करें। उसके उद्देश्यों के लिए कार्य करें और उसकी सामर्थ्य के द्वारा कार्य करने का आनन्द उठाने का अनुभव करें (यूहन्ना 15:5)।
9. सरों के साथ योग्यता के आधार पर नहीं, वरन् अनुग्रह के सिद्धान्त के अनुसार व्यवहार करो।
अपने शत्रुओं से प्रेम करने के विषय में मसीह की शिक्षाओं ने धार्मिक अगुवों को चकित और विचलित कर दिया। लूका 6:27–36 में यीशु की उस शिक्षा का वर्णन है, जिसमें वह बताता है कि हमें उन लोगों के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए जो हमें अयोग्य प्रतीत होते हैं। वह अपनी शिक्षा का आरम्भ चौंका देने वाली आज्ञा से करता है: “अपने शत्रुओं से प्रेम करो,” और अपने सन्देश का समापन इस वचन के साथ करता है, “क्योंकि वह उन पर जो धन्यवाद नहीं करते और बुरों पर भी कृपालु है। इसलिए जैसा तुम्हारा पिता दयावन्त है, वैसे ही तुम भी दयावन्त बनो।” (लूका 6:35–36)
अयोग्य लोगों से प्रेम करने की मसीही सामर्थ्य एक ऐसे जीवन से आती है जो अनुग्रह से परिपूर्ण होता है। यीशु मसीह की शिक्षा में “अनुग्रह शब्द इस खण्ड में तीन बार आया है, परन्तु इसका असामान्य तरीके से अनुवाद किया गया है। यीशु मसीह अपने अनुयायियों से पूछता है, “यदि तुम उनसे प्रेम रखो जो तुमसे प्रेम रखते हैं, तो तुम्हारी क्या बड़ाई?” (लूका 6:32–33), और “यदि तुम उसे उधार दो, जिनसे फिर पाने की आशा रखते हो, तो तुम्हारी क्या बड़ाई?” (लूका 6:34)। हमारे जीवन दया और अनुग्रह के द्वारा परिवर्तित कर दिए गए हैं; इसलिए हमें उस अनुग्रह को दूसरों के साथ भी बाँटना चाहिए, यहाँ तक कि उनके साथ भी, जो हमारी दृष्टि में अयोग्य होते हैं।
दूसरे शब्दों में, जब आप उन लोगों से प्रेम करते हो जो बदले में प्रेम नहीं करते, तो आप यह प्रकट करते हो कि आपका जीवन अनुग्रह से भर गया है, और आपके पास देने के लिए ऐसी उदारता है जो किसी उत्तर या प्रतिफल की आशा नहीं करती है। जब मसीही विश्वासी उस गहरे अनुग्रह के स्रोत से कार्य करते हैं जो उन्हें प्राप्त हुआ है, तब परमेश्वर की महिमा होती है, और उनके लिए प्रतिफल तैयार किया जाता है (लूका 6:35–36)।
अभ्यास: अपने जीवन के तीन ऐसे लोगों पर विचार करें जिन्हें आपसे और अधिक अनुग्रह मिलना चाहिए। सम्भवतः आप उनके साथ वैसा व्यवहार कर रहे हैं, जैसा आप सोचते हैं कि वे योग्य हैं। परन्तु इन अनुग्रह के पात्रों के प्रति अपने व्यवहार पर पुनर्विचार करें।
10. परमेश्वर के अनुग्रह के राज्य के अधीन हो जाओ।
वह कितना दयालु और करुणामय शासक है जो “अनुग्रह के सिंहासन” पर विराजमान है! (इब्रानियों 4:16) परमेश्वर का स्वभाव और इच्छा उसे अनुग्रह के साथ राज्य करने के लिए प्रेरित करते हैं ताकि विश्वासियों को अनुग्रह के प्रभुत्व के अधीन अपना सम्पूर्ण जीवन जीने का अवसर और सत्कार प्राप्त हो।
पौलुस हमें समझाते हुए कहता है कि अनुग्रह के इस राज्य के अधीन जीवन व्यतीत करना कितना बड़ा अधिकार है: “क्योंकि जब एक मनुष्य के अपराध के कारण मृत्यु ने उस एक ही के द्वारा राज्य किया, तो जो लोग अनुग्रह और धर्मरूपी वरदान बहुतायत से पाते हैं वे एक मनुष्य के, अर्थात् यीशु मसीह के द्वारा अवश्य ही अनन्त जीवन में राज्य करेंगे” (रोमियों 5:17)।
क्योंकि मसीह में परमेश्वर के अनुग्रह ने उसकी आत्मा के द्वारा पाप की शक्ति और प्रभाव को निष्प्रभावी कर दिया है, इसलिए एक विश्वासी उद्देश्य पूर्ण जीवन जीने के लिए स्वतंत्र है। अनुग्रह के राज्य के अधीन रहने से मसीही जन को, जो मसीह के बाहर स्वयं का बन्धक है, भक्ति और उत्साह के साथ धार्मिकता की सेवा करने की अनुमति मिलती है। (रोमियों 5:21; 6:6)। और अंततः “तब तुम पर पाप की प्रभुता न होगी, क्योंकि तुम व्यवस्था के अधीन नहीं वरन् अनुग्रह के अधीन हो।” (रोमियों 6:14)
अब पवित्रता ही मुख्य लक्ष्य, उद्देश्य और प्रतिफल बन जाता है। अनुग्रह से प्रेरित आज्ञाकारिता व्यवस्था के बोझ को अस्वीकार करती है और मसीह के द्वारा खरीदी गई स्वतंत्रता का आनन्द उठाती है। परमेश्वर का अनुग्रह हमें हमारी मूल रचना और उद्देश्य की खोज करने की सामर्थ्य प्रदान करता है। यह अदन की महिमा से भरी गूँज है!
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चर्चा एवं मनन:
- यदि आप किसी कठिन परीक्षा की स्थिति में हैं, तो 1 पतरस को पढ़ें और प्रत्येक अध्याय में दुःख से सम्बन्धित सच्चाइयों को सूचीबद्ध करें और देखें कि उन सच्चाइयों का आपके दुःख पर क्या प्रभाव होना चाहिए।
- आपके जीवन में कौन ऐसा व्यक्ति है जिसे परमेश्वर के अनुग्रह का सुसमाचार शब्दों और कर्मों दोनों के माध्यम से सुनने की आवश्यकता है? अपने मार्गदर्शक से इस विषय में चर्चा करें और एक ठोस योजना बनाएँ ताकि आप परमेश्वर के अनुग्रह का उद्धार करने वाला सन्देश दूसरों तक पहुँचा सकें।
- आपको परमेश्वर के अनुग्रह के द्वारा कौन से भले काम करने चाहिए? तथा आपको कहाँ अधिक समय और ऊर्जा लगानी चाहिए?
- आपके जीवन के कौन से क्षेत्र अभी भी अनुग्रह के द्वारा स्वतंत्र होने के बजाय व्यवस्था के अधीन बन्धक बने हुए हैं (ऐसे क्षेत्र जहाँ आप परमेश्वर का अनुग्रह पाने के लिए जी रहे हैं, न कि उसके उत्तर में जी रहे हैं)? आपको अपने जीवन को धार्मिकता के साथ परमेश्वर के प्रति अधिक विश्वासयोग्यता से कैसे प्रस्तुत करना चाहिए?
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निष्कर्ष
परमेश्वर प्रत्येक मसीही व्यक्ति के जीवन में अपने अनुग्रह को भरपूरी से उण्डेलना चाहता है। अनुग्रह पापियों के प्रति परमेश्वर की अनपेक्षित और चौंका देने वाली उदारता है; यह विद्रोहियों का वरदान के द्वारा उद्धार करता है और फिर उन्हें परमेश्वर की महिमा के लिए पवित्रता में बढ़ाता है। यद्यपि यह आश्चर्यजनक है कि परमेश्वर ने हमें उद्धार देने के लिए अपने अनुग्रह को नियुक्त किया, परन्तु यह अति आवश्यक है कि मसीही व्यक्ति इस बात को समझे कि अनुग्रह की भरपूरी उसके सम्पूर्ण जीवन को भरने के लिए ठहराई गई है। वरदान स्वरूप अनुग्रह की व्यापक भलाई और उन्नति सम्बन्धी अनुग्रह की महानता दोनों को मसीह में परमेश्वर के द्वारा सेंत-मेंत दिया गया है।
मार्टिन लॉयड-जोंस अनुग्रह की महिमा का वर्णन इन शब्दों में करते हैं:
यह आरम्भ में अनुग्रह है, और अन्त में भी अनुग्रह है। इसलिए जब आप और मैं अपनी मृत्यु शय्या पर लेटें हों, तो एक बात जो हमें शान्ति दे सकती है, तथा उस समय हमारी सहायता कर सकती है और हमें दृढ़ बनाए रख सकती हैं, वह वही चीज है जिसने आरम्भ में हमारी सहायता की थी। इसलिए नहीं कि हम क्या थे, या हमने क्या किया, वरन् इसलिए कि हमारे प्रभु यीशु मसीह में परमेश्वर का अनुग्रह क्या है। मसीही जीवन अनुग्रह से आरम्भ होता है, अनुग्रह से ही आगे बढ़ता है, और अनुग्रह में ही समाप्त होता है। वास्तव में अनुग्रह अद्भुत है। मैं जो कुछ भी हूँ, वह परमेश्वर के अनुग्रह से हूँ। परन्तु वह मैं नहीं, वरन् यह परमेश्वर का ही अनुग्रह है जो मेरे साथ था।
हमारे हृदय उसके महिमामय और अति श्रेष्ठ अनुग्रह के प्रति पौलुस की इन भावनाओं के साथ उत्तर दें:
“परमेश्वर को उसके उस दान के लिये जो वर्णन से बाहर है, धन्यवाद हो।” (2 कुरिन्थियों 9:15)! और इस प्रकार परमेश्वर का लिखित वचन, जो अनुग्रह से परिपूर्ण है, इस आशीष के साथ समाप्त होता है:
“प्रभु यीशु का अनुग्रह पवित्र लोगों के साथ रहे। आमीन।” (प्रकाशितवाक्य 22:21)
लेखक के बारे में
कर्ट गेबहार्ड्स जूली के आनन्दित पति हैं और राइली, शे (और नोआ), मैकिंले, कैमडिन, मैसी और डैक्स के प्रसन्न पिता हैं। फ्लोरिडा के वैलरिको में द ग्रोव बाइबल चैपल में विश्वासयोग्य पवित्र लोगों का पास्टर बनना और परमेश्वर के लोगों को उनसे
प्रेम करने और उनकी सेवा करने के लिए प्रोत्साहित करने वाले विषयों पर लिखना एक आनन्द की बात है। अरे हाँ, मुझे तो नैतिकतावादी पुस्तकें और दूसरे विश्व युद्ध के इतिहास, और न्यूयॉर्क बेसबॉल मेट्स की सभी चीजों में विशेष आनन्द मिलता है!
विषयसूची
- भाग I: समस्त अनुग्रह का परमेश्वर
- परमेश्वर के अनुग्रह का प्रकाशन
- अयोग्य पापी
- चर्चा एवं मनन:
- भाग II: वह अनुग्रह जो उद्धार करता है
- अनुग्रह: मृत्यु से जीवन की ओर तथा स्वर्गीय धन की ओर
- अनुग्रह एक वरदान है
- वरदान निरन्तर बना हुआ है
- चर्चा एवं मनन:
- भाग III: अनुग्रह की बढ़ोतरी
- परमेश्वर के अनुग्रह में बढ़ने का सौभाग्य
- वरदान रूपी अनुग्रह और उन्नति रूपी अनुग्रह
- पवित्रीकरण: अनुग्रह की बढ़ोतरी में परमेश्वर के साथ सहयोग करना
- वरदान रूपी अनुग्रह
- उन्नति रूपी अनुग्रह
- चर्चा एवं मनन:
- भाग IV: अनुग्रह में बढ़ने के दस तरीके
- 1. परमेश्वर के अनुग्रह के भण्डारी
- 2. परमेश्वर के अनुग्रह का बहुतायत से आनन्द लें
- 3. अनुग्रह में खड़े रहो
- 4. अधिक अनुग्रह पाने के लिए अपने आप को दीन बनाओ।
- 5. अनुग्रह से परिपूर्ण आज्ञाकारिता की शिक्षा को सीखें।
- 6. परमेश्वर के अनुग्रह में अपनी सामर्थ्य को पाएँ।
- 7. उत्सुकता से अनुग्रह का वचन बोलो
- 8. परमेश्वर के अनुग्रह के द्वारा कार्य करें
- 9. सरों के साथ योग्यता के आधार पर नहीं, वरन् अनुग्रह के सिद्धान्त के अनुसार व्यवहार करो।
- 10. परमेश्वर के अनुग्रह के राज्य के अधीन हो जाओ।
- चर्चा एवं मनन:
- निष्कर्ष
- लेखक के बारे में