#39 बिना पिता के बड़े होना
परिचय
यदि आप बिना पिता के बड़े हुए हैं, तो आप को पता होगा कि यह कितना कठिन हो सकता है और आप के जीवन पर कितना गहरा प्रभाव डाल सकता है। इसके कारण आप अकेला और असुरक्षित अनुभव कर सकते हैं, यहाँ तक कि अपने स्वयं के महत्व और पहचान के बारे में भी प्रश्न उठा सकते हैं। जब आप के जीवन में पिता उपस्थित होता है, तब वह मार्गदर्शन और सहारा ला सकता है; जब वह अनुपस्थित होता है, तब हमेशा ही कुछ अव्यवस्थित सा लगता है।
दूसरी ओर, बाइबल हमें याद दिलाती है कि परमेश्वर सिद्ध पिता है, जो आप को कभी नहीं छोड़ेगा, न निराश करेगा, और न कभी अपने बच्चों से प्रेम करना बन्द करेगा। भजन 68:5 कहता है कि, वह “अनाथों का पिता” है। यदि आप के जीवन में कोई पिता समान जन नहीं है, तो परमेश्वर आप के सम्बन्धों में जो भी कमी है, उसके रिक्त स्थान को भर देता है।
दुःख, चँगाई, भरोसे के साथ व्यवहार करना सीखना, और किसी व्यक्ति में शरण एवं सान्त्वना प्राप्त करना, विशेषकर इस यात्रा में, यह कोई सरल कार्य नहीं है। यह मार्गदर्शिका हमें दिखाएगी कि सच में विश्वास में आगे बढ़ने, स्वस्थ सम्बन्धों को पोषित करने, और परमेश्वर के पिता समान प्रेम को अनुभव करने का अर्थ क्या होता है।
ऑडियो मार्गदर्शिका
ऑडियो#39 बिना पिता के बड़े होना
भाग I: पिता घाव को समझना
कुँजी वचन: भजन 68:5
“परमेश्वर अपने पवित्र धाम में, अनाथों का पिता और विधवाओं का न्यायी है।”
पिता की अनुपस्थिति का पहचान और मानसिक बढ़ोतरी पर प्रभाव
पिता के शारीरिक रूप में होने के स्थान पर केवल दीवार पर टँगे हुए चित्र में विद्यमान होने, के साथ बड़ा होना बहुत विनाशकारी होता है। जो रिक्त स्थान पीछे छूट जाता है, वह किसी के साथ खेलने वाले की अनुपस्थिति से कहीं अधिक जटिल होता है। पिता से प्रेम, देखभाल, और सहारा मिलता है, परन्तु जब यह हटा दिया जाता है, तब स्थिति को संभालना कठिन हो जाता है।
सम्भव है कि आप ने स्वयं इसका अनुभव किया हो। वह आभास कि कुछ महत्वपूर्ण विद्यमान नहीं है। आप जो हैं, उसमें सुरक्षित अनुभव करने के साथ संघर्ष है। प्रश्न—क्या मैं इस योग्य नहीं था कि मेरे लिये रुका जाए? क्या मैं पर्याप्त हूँ?
इन भावनाओं की अवहेलना नहीं की जा सकती है क्योंकि ये वास्तविक हैं, और बड़े होने के साथ धूमिल नहीं पड़ते हैं। पिता की अनुपस्थिति आप के जीवन के विभिन्न पक्षों पर एक स्थाई प्रभाव छोड़ सकती है, आप की पहचान से लेकर आप के भरोसे तथा भावनात्मक स्वास्थ्य पर भी। परन्तु भला समाचार यह है कि आप अकेले नहीं हैं, क्योंकि परमेश्वर आप के साथ है। वह देखता है, समझता है, और आप पर जो भी बीत रहा है, उसे चँगा कर सकता है।
“पिता घाव” का अर्थ क्या होता है?
“पिता घाव,” पिता की अनुपस्थिति के भावनात्मक और मानसिक प्रभावों के बारे में है। यह उसकी शारीरिक, भावनात्मक, या आत्मिक अनुपस्थिति से हो सकता है। एक पिता घाव तब होता है जब पिता चुनाव या परिस्थिति के कारण चला जाता है। चाहे वह शारीरिक रूप में उपस्थित हो, पिता घाव तब भी हो सकता है यदि वह भावनात्मक रीति से दूर, लापरवाह, दुर्व्यवहार करने वाले, या बचपन में आप की सहायता के लिये विद्यमान नहीं होता है।
जैसा कि हम भजन 68:5 में देखते हैं, परमेश्वर “अनाथों का पिता” है। हमने पृथ्वी के एक पिता से चाहे जो भी सताव सहा हो, परमेश्वर हमारी सहायता के लिये साथ उपस्थित होने के द्वारा, उसकी पूर्ति कर देता है।
जब कोई गहरा घाव बनता है, तो सामान्यतः वह इन आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये पिता के अनुपस्थित होने के कारण होता है। उस अनुपस्थिति से व्यवहार करने के प्रयास में व्यक्ति जिस तरह से स्वयं को, औरों को, या परमेश्वर को देखता है, वह बिगड़ जाता है। परन्तु वास्तव में उसकी चँगाई को अनुभव करने के लिये, हमें पहले पिता की अनुपस्थिति के प्रभावों को समझना पड़ेगा।
पिता की अनुपस्थिति व्यक्ति की पहचान पर किस प्रकार प्रभाव डाल सकती है
पहचान के बनते समय, पिता की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। वे हमारी सहायता करते हैं कि हम अपनी पहचान, हमारे महत्व, और हमें जीवन में स्वयं को किस तरह संतुलित बनाए रखना है, को समझ सकें। पिता के बिना, ये आधारभूत भाग असंतुलित रहते हैं। जो लोग पिता समान व्यक्ति के बिना बड़े होते हैं, बहुधा वे इन के साथ संघर्ष करते हैं:
आत्म-सम्मान: आप को लग सकता है कि कोई भी आप पर ध्यान या आप को महत्व नहीं दे रहा है।
निर्णय लेने की योग्यता: पिताओं से मिलने वाला भारी प्रोत्साहन स्वयं पर भरोसे का निर्माण करता है। उसके बिना, असुरक्षा की भावना आ जाती है।
दिशा: पिता अपने बच्चों का वयस्क होने में मार्गदर्शन और सहायता करते हैं। बहुत से लोगों के जीवनों में कोई दिशा नहीं होती है और वे अपने भविष्य के बारे में अनिश्चितता का सामना करते हैं, क्योंकि उनके जीवनों में पिता समान कोई जन नहीं होता है।
पिता समान जन के न होने पर व्यक्ति पुष्टि, स्वीकृति, या ऐसी किसी बात का खोजी बन सकता है जिससे उसे पूर्ति का अनुभव हो। इसके लिये कुछ लोग हानिकारक सम्बन्धों, स्वयं को नष्ट करने वाले व्यवहार, या पुष्टि प्राप्त करने के लिये अत्यधिक दूरी तक जा सकते हैं।
परमेश्वर हमें एक भिन्न सत्य बताता है। उस में हम बुलाए गए, प्रेम किये हुए, और बहुमूल्य हैं—हमारे किसी कार्य के द्वारा नहीं, बल्कि हमारी पहचान के कारण।
पिता की अनुपस्थिति की भावनात्मक कीमत
पहचान से परे, पिता के न होने से भावनात्मक स्वास्थ्य पर भी दुष्प्रभाव पड़ता है।
तिरस्कृत होने की भावनाएँ
चाहे पिता जानबूझकर छोड़कर न गया हो, परन्तु यह फिर भी व्यक्तिगत अनुभव हो सकता है। मैं इस योग्य क्यों नहीं था कि मेरे लिये रुक जाए? इस प्रकार के विचार, तिरस्कार किए जाने के तीव्र भय के पनपने के कारण, अन्य सम्बन्धों को भी प्रभावित कर सकते हैं।
औरों पर भरोसा रखना कठिन हो सकता है।
अनुपस्थित या अस्थिर पिता, अन्य लोगों पर भरोसा करने में समस्याएँ उत्पन्न कर सकते हैं। त्याग दिए जाने के भय के कारण सम्बन्ध असुरक्षित लग सकते हैं।
क्रोध या रोष की समस्याएँ
दुःख के कारण अनसुलझी समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं जैसे कि क्रोध—जो अनुपस्थित पिता के प्रति है। ऐसी भावनाएँ, समय के साथ स्वतः ही धूमिल नहीं पड़ेंगी।
उन्हें चँगाई की आवश्यकता होती है। और इस चँगाई का आरम्भ अपने घावों को परमेश्वर के सामने लाने के द्वारा होता है—वही एकमात्र ऐसा पिता है जो न तो कभी छोड़ेगा, न ही निराश करेगा, और न कभी हम से प्रेम करना बन्द करेगा।
अपने दुःख को आप की पहचान को परिभाषित न करने दें
दुःख को, स्वयं के प्रति दृष्टिकोण को प्रभावित करने देना सहज होता है। यदि पिता अनुपस्थित है, तो ऐसा लग सकता है कि आपकी पहचान का एक भाग भी खो गया है। आप को तिरस्कृत होने, आत्म-विश्वास का न होना, या अचानक ही अति क्रुद्ध हो जाना जैसी भावनाओं का सामना करना पड़ सकता है।
परन्तु यह याद रखना महत्वपूर्ण है कि आप का दुःख, यह निर्धारित नहीं करता है कि आप कौन हैं।
आप का अतीत आप को परिभाषित नहीं करता है। हाँ, उसने आप को स्वरूप दिया है। हाँ, वह दुःख पहुँचाता है। परन्तु उसे आप के भविष्य को नियन्त्रित नहीं करना है। परमेश्वर का प्रेम आप के दुःख से बढ़कर है। और पृथ्वी पर आप के सम्बन्धों में चाहे जो भी कमी रही हो, परमेश्वर वह पिता है जो हमेशा आप के साथ खड़ा रहेगा।
दुःख उठाना आप को बदलता है, परन्तु वह आप के जीवन का मार्ग निर्धारित नहीं करता है।
आप के अनुभव किसी रीति से आप को प्रभावित करेंगे, आप को आकार देंगे, या जीवन में चलते हुए आप को कोई स्वरूप देंगे, और पिता समान व्यक्ति का अभाव कुछ भावनात्मक चोट पहुँचा सकता है, जिसे भरने में समय लगता है।
हो सकता है कि आप के बचपन में आप को स्वयं को प्रमाणित करना पड़ा हो, क्योंकि आप का मार्गदर्शन करने वाला कोई नहीं था। हो सकता है कि छोड़ दिये जाने के कारण, आप की सबसे बड़ी समस्या भरोसा रखना रही हो। सम्भव है कि दुःख उठाने के कारण आप ने अपनी भावनाओं को दबा के रखना सीख लिया हो, क्योंकि आहत होने के लिये भेद्य होने का अर्थ है कमज़ोरी, लज्जा, और हार। ये प्रतिक्रियाएँ सामान्य हैं। पीड़ा हमें बदलती है। परन्तु उसे हमारी पहचान नहीं बनाना है।
जो आपके साथ नहीं था, वह आप के महत्व को निर्धारित नहीं करता है—बल्कि वह करता है जो हमेशा आप के साथ बना रहता है। परमेश्वर ने आप को एक उद्देश्य के साथ रचा है। वह आप को अपनी सन्तान कहता है। आप इतने नहीं टूटे हैं कि आप फिर से ठीक न हो सकें। आप असीम प्रेम के पात्र हैं।
वे झूठ, जो पीड़ा हम से बोलती है
जब हम अपने अन्दर बहुत आहत होते हैं, विशेषकर छोटी आयु में, तब हमारा मस्तिष्क उसे वैध ठहराने के लिये कहानियाँ बनाने लगता है। बहुधा, ये कहानियाँ हमारे बारे में वे झूठ बन जाती हैं, जिन पर हम अपने लिये विश्वास करने लग जाते हैं।
हो सकता है कि आपने यह मान लिया हो कि:
– क्योंकि मेरे पिता साथ बने नहीं रहे, इसलिये में स्वयं से कहता हूँ कि मैं प्रेम के योग्य नहीं हूँ।
– मुझे हर समय बलवान बने रहना होगा, क्योंकि मेरी देखभाल कोई नहीं करेगा।
– मैं कभी पर्याप्त नहीं हो सकता हूँ।
– मुझे अपना महत्व प्रमाणित करने के लिये, सफल होना पड़ेगा।
ये झूठ वास्तविक प्रतीत होते हैं, परन्तु वे सत्य नहीं होते हैं। एक भिन्न दृष्टिकोण जानने के लिये, परमेश्वर के वचन को सुनिये।
भजन 139:14 कहता है, “मैं तेरा धन्यवाद करूँगा, इसलिये कि मैं भयानक और अद्भुत रीति से रचा गया हूँ।”
आप भुलाए नहीं गए हैं। आप अवांछित नहीं हैं। परमेश्वर ने आप को एक उद्देश्य से रचा है, और इस में से, आप के साथ जो भी हुआ है, वह कुछ भी हटा नहीं सकता है।
चँगाई सत्य के साथ आरम्भ होती है
यदि आप पिता के न होने के बोझ को लिये हुए चल रहे हैं, तो यह जान लीजिये कि: चँगाई सम्भव है।
इसका अर्थ, जो हुआ, उसे भुला देना नहीं है। इसका अर्थ यह ढोंग करना भी नहीं है कि पीड़ा वास्तविक नहीं थी। इसका अर्थ है उस पीड़ा को परमेश्वर को समर्पित कर देना और उसे आप की कहानी को फिर से लिख लेने देना।
चँगाई का आरम्भ झूठ के स्थान पर सत्य को ले आने से होता है।
यह मत कहिये कि “मैं अयोग्य हूँ,” यह कहिये कि “परमेश्वर मुझ से प्रेम करता है” (यिर्मयाह 31:3)
यह मत कहिये कि “मैं कभी पर्याप्त नहीं हो पाऊँगा,” यह कहिये कि “मैं चुना हुआ और अलग किया हुआ हूँ” (1 पतरस 2:9)।
यह मत कहिये कि “मुझे जीवन अकेले जीना पड़ेगा,” यह कहिये कि “परमेश्वर हमेशा मेरा सहायक है” (भजन 46:1)।
एक बार जब आप स्वयं को परमेश्वर के दृष्टिकोण से देखने लगेंगे, तब आप अपने बारे में, अपनी कमियों के सन्दर्भ में सोचना बन्द कर देंगे, और उसकी बजाए आप उस सन्दर्भ में सोचने लगेंगे जिसे परमेश्वर कहता है कि आप हैं।
अपने अतीत की बेड़ियों से बच निकलिये
आप सही हैं। दुःख को छोड़ देना सहज नहीं होता है। आप इसके आदी हो चुके हैं। बहुधा, ऐसा भी लगता है कि यह आपकी पहचान का एक भाग है। परन्तु परमेश्वर की कभी यह इच्छा नहीं रही है कि आप अकेले ही दुःख उठाएँ।
सम्भव है कि आप स्नेह की अनदेखी इसलिये कर रहे हैं क्योंकि आप आहत होने से घबरा रहे हैं। हो सकता है कि आप अपने पिता के प्रति अपने क्रोध को थामे हुए हैं। यह भी हो सकता है कि आप आवश्यकता से अधिक कुछ कर के दिखाना चाह रहे हैं, ताकि अपने महत्व को औरों पर प्रमाणित कर सकें।
आप उस दुःख को जितनी बार परमेश्वर को समर्पित करेंगे, आप स्वयं को स्वतन्त्र होने की स्थिति के उतना निकट लाते चले जाएँगे।
यशायाह 61:3 कहता है कि परमेश्वर चाहता है कि “सिर पर की राख दूर करके सुन्दर पगड़ी बाँध दूँ, कि उनका विलाप दूर करके हर्ष का तेल लगाऊँ और उनकी उदासी हटाकर यश का ओढ़ना ओढ़ाऊँ।” अपने अतीत को स्वयँ को परिभाषित मत करने दीजिये, क्योंकि परमेश्वर, जो टूट गया था उसे लेकर, फिर से ठीक कर सकता है।
आप की कहानी अभी आरम्भ हुई ही है
आप को ऐसा लगता है कि आप की निरन्तर बनी हुई समस्याएँ, आप को अनन्तकाल तक बाँधे रखेंगी, क्योंकि आप ने बिना पिता के जीवन आरम्भ किया है। इसलिये, यह आप को हमेशा अपूर्ण अनुभव करवाता है।
परन्तु परमेश्वर छुटकारा देने में माहिर है।
बाइबल में अनेकों लोगों ने गहरी वेदना का अनुभव किया, परन्तु उन्होंने उसे उनको परिभाषित नहीं करने दिया:
– मूसा शिशु ही था, जब उसे त्याग दिया गया, परन्तु वह अगुवा बन गया।
– यूसुफ को उसके भाइयों ने तिरस्कार कर दिया परन्तु आगे चलकर उसने पूरी जाति को बचाया।
– दाऊद को तुच्छ समझा गया, परन्तु फिर भी वह परमेश्वर के मन के अनुसार व्यक्ति कहलाया।
आप का संघर्ष, आप की कहानी का अन्त नहीं है। समय के साथ परमेश्वर आप को स्वरूप देगा, सामर्थी करेगा कि आप उन्हें सहारा दे सकें जो ऐसी ही परिस्थितियों से होकर निकल रहे हैं।
फिर से भरोसा करना सीखना
बिना पिता के बड़े होने का सबसे चुनौतीपूर्ण भाग है भरोसा करना सीखना—प्रेम करना, लोगों पर, और परमेश्वर पर भी भरोसा करना।
जब किसी से अपेक्षा की जाती है कि वह अपने निर्धारित स्थान पर हो, किन्तु वह वहाँ नहीं होता है, तो इससे उसके भरोसेमन्द होने की समझ बदल सकती है। यद्यपि यह यथोचित है, परन्तु चँगाई की प्रक्रिया तब आरम्भ होती है जब आप यह समझ लेते हैं कि परमेश्वर उन लोगों के समान नहीं है, जिन्होंने आप को बारम्बार निराश किया है।
व्यवस्थाविवरण 31:8 में लिखा है, “तेरे आगे आगे चलने वाला यहोवा है; वह तेरे संग रहेगा, और न तो तुझे धोखा देगा और न छोड़ देगा।”
परमेश्वर अटल है। वह उपस्थित रहता है। वह कभी छोड़ता नहीं है।
उस पर भरोसा रखना सीखना एक प्रक्रिया है। इसमें समय लगता है। एक बार जब आप उसका सहारा लेना आरम्भ कर देते हैं, तब आप को एहसास होता है कि वही वह पिता है, जिसकी आप को आवश्यकता है।
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चर्चा: पिता के बिना बड़े होना कितना कठिन है?
- पिता के न होने से आप किन भावनाओं के कारण आहत हुए?
- इससे आप की स्वयँ-की-छवि पर क्या प्रभाव पड़ा?
- आप ने किन झूठों को स्वीकार किया और उन्होंने किस तरह से परमेश्वर के सत्य का स्थान ले लिया?
- अपनी चँगाई की प्रक्रिया को आरम्भ करने के लिये, अपनी पीड़ा को किस प्रकार छोड़ दें?
—
बिना पिता के जीवन बहुत कठिन हो सकता है, परन्तु इसे आप को परिभाषित नहीं करना चाहिये। आप का महत्व उस पर आधारित नहीं है जो आप के बड़े होते समय आप के पास नहीं था, और न ही इसमें आप की कोई गलती है, परन्तु महत्व उसका है जो ठीक इसी समय आप के साथ विद्यमान है।
परमेश्वर पिता आप की पीड़ा को देखता है, आप के संघर्षों को समझता है, और आप के प्रत्येक क्षतिग्रस्त भाग को चँगा करने
के लिये तैयार है। इसलिये, आज, स्वतन्त्रता की ओर एक कदम बढ़ाइये। असत्यों को छोड़ दीजिये। परमेश्वर के सत्यों को
थामे रहिये। यह मानना चुन लीजिये कि आपकी कहानी समाप्त नहीं हुई है—क्योंकि परमेश्वर के साथ, सर्वोत्तम आना तो
अभी शेष है।
भाग II: परमेश्वर, हमारा सिद्ध पिता
कुँजी वचन: 2 कुरिन्थियों 6:18
“और मैं तुम्हारा पिता हूँगा, और तुम मेरे बेटे और बेटियाँ होगे। यह सर्वशक्तिमान प्रभु परमेश्वर का वचन है।”
उस पिता में सुरक्षा पाना जो कभी नहीं छोड़ता है
उन सभी के लिये, जिनके पास बड़े होते समय पिता नहीं थे, लोगों पर भरोसा रखना कठिन हो सकता है। यह इसलिये, क्योंकि आप के बड़े हो जाने तक, पिता से अपेक्षा रखी जाती है कि वह आप को सुरक्षा, प्रेम, और मार्गदर्शन दे। परन्तु जब यह सहारा नहीं होता है, तो इससे एक स्थाई रिक्त स्थान रह जाता है।
हो सकता है कि आपने व्यक्तिगत रीति से किसी से सहारा मिलने की आवश्यकता पूरी न होने की पीड़ा को सहा है, और इस भावना को भी कि आप कभी सच में सुरक्षित नहीं हो सकते हैं। इसके साथ ही अभिभूत कर देने वाले ये विचार भी आ सकते हैं कि: जब मेरे पिता ही मेरे साथ बने नहीं रहे, तो मैं यह क्यों मान लूँ कि कोई अन्य साथ रहेगा?
यह मान लेना बहुत सहज होता है कि परमेश्वर उस पिता का एक वैकल्पिक रूप है, जो आप के साथ कभी नहीं रहा, परन्तु वह तो उससे बहुत भिन्न है।
परमेश्वर, जैसा पृथ्वी के पिता करते हैं, भौतिक रीति से आप से न तो आप से दूर हो सकता है और न ही आप को निराश कर सकता है। पिता आप के लिये उदाहरण स्थापित करते हैं और आप से ‘प्रेम करने’ के लिये कुछ शर्तें रखते हैं, परन्तु इसके विपरीत, वह आप को अपने ‘पुत्र’ और ‘पुत्री’ घोषित करता है। बड़े कार्यों को करने के द्वारा प्राप्त होने वाले किसी ईनाम के समान नहीं, परन्तु इसलिये, क्योंकि आप उसके परिवार का भाग हैं।
इसीलिये 2 कुरिन्थियों 6:18 इतनी सामर्थी प्रतिज्ञा है—“मैं तुम्हारा पिता हूँगा।” हो सकता हूँ नहीं, यदि स्वयँ को प्रमाणित करोगे तब, नहीं, बल्कि मैं हूँगा।
इसका अर्थ है कि आप कभी यह अनुभव नहीं करेंगे कि आप ने कुछ खोया है, क्योंकि परमेश्वर सभी रिक्त स्थानों को भर देगा।
परमेश्वर का प्रेम स्थिर और अटल है
बिना पिता के बड़े होने के सबसे कठिन भागों में से एक है असंगतियों के साथ व्यवहार करना। हो सकता है कि आप के पिता पूर्णतः अनुपस्थित रहे हों। हो सकता है कि वे थे तो, किन्तु भावनात्मक रीति से दूर रहते थे। या हो सकता है कि वे आते और जाते रहते थे, जिससे आप अपनी स्थिति के बारे में अनिश्चित रहते थे।
इस प्रकार की अस्थिरता एक खतरनाक झूठ सिखाती है—कि प्रेम पर भरोसा नहीं किया जा सकता है। यह कि जब आप को उनकी सबसे अधिक आवश्यकता होती है, तब लोग छोड़ कर चले जाते हैं। यह कि किसी भी समय, वह थोड़ी सी सुरक्षा जो आपके पास है, वह अदृश्य हो जाएगी।
परन्तु परमेश्वर का प्रेम भिन्न है।
हमें भजन 136:26 में याद दिलाया गया है कि:“परमेश्वर का धन्यवाद करो, उसकी करुणा सदा की है।”
इसका अर्थ है कि उसका प्रेम अस्थाई नहीं है। वह धूमिल नहीं पड़ता है। वह छोड़कर चला नहीं जाता है। वह आपके भले या बुरे कार्यों पर निर्भर नहीं है। जब वह यह कहता है कि वह आप का पिता है, तो जान लीजिये कि उसका तात्पर्य अनन्तकाल से है।
एक ऐसा पिता जो मार्गदर्शन करता और सुरक्षा देता है
मार्गदर्शन, शिक्षा, और सुरक्षा हमेशा पिता से ही आते हैं, हमेशा। पिता जब अपने किसी बच्चे से कहता है कि, “तुम्हारे पास यह है,” तो पिता की भूमिका में सुधारना और मार्गदर्शन करना भी सम्मिलित होते हैं। प्रत्येक बच्चे को मार्गदर्शन और शिक्षा के लिये पिता चाहिये होता है। जीवन को मार्गों के एक ऐसे नक्शे के समान लीजिये जिसके लिये मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है, अन्यथा वह बहुत पेचीदा और नीरस हो जाता है। मोड़ अंदाज़ा लगाने का खेल बन जाते हैं, और आप का उद्देश्य एक प्रश्न चिन्ह बन जाता है।
काश कि कोई होता जो सम्बन्धों को संभालना सिखाता, बच्चों को सिखाता कि अपनी जिम्मेदारियों का निर्वाह किस प्रकार से करें, और बिना किसी भी प्रकार के भय के उन्हें सामना करने की चुनौती को लेना करना सिखाता। परमेश्वर यह सब करता है।
वह यशायाह 41:10 में कहता है: “मत डर, क्योंकि मैं तेरे संग हूँ, इधर उधर मत ताक, क्योंकि मैं तेरा परमेश्वर हूँ; मैं तुझे दृढ़ करूँगा और तेरी सहायता करूँगा, अपने धर्ममय दाहिने हाथ से मैं तुझे सम्हाले रहूँगा।”
वह दूर नहीं है, वह आपके साथ है। वह अपने वचन, प्रार्थना, और उन विभिन्न लोगों के द्वारा, जिन्हें वह आप के जीवन में भेजता है, आप का मार्गदर्शन करता है। जब भी आप स्वयँ को अकेला पड़ा हुआ पाते हैं, तब आप उससे सहायता माँग सकते हैं। आप को अकेले ही जीवन का सामना नहीं करना पड़ेगा।
परमेश्वर के प्रेम के द्वारा पिता-घावों से चँगा होना
यदि पिता के सम्बन्ध के साथ आप का अनुभव दु:खदायी रहा है, तो किसी पिता समान जन पर भरोसा करना सरल नहीं होता है। हो सकता है कि आप ने दीवारें खड़ी कर ली हों कि, परमेश्वर सहित, कोई भी, अधिक निकट न आने पाए। हो सकता है कि आपने स्वयँ को बहला-फुसला कर यह समझा लिया हो कि आप को पिता समान किसी जन की आवश्यकता नहीं है। परन्तु चँगाई का आरम्भ तब ही होता है जब आप परमेश्वर को उस रिक्त स्थान को भर लेने देते हैं।
यह अतीत को त्याग देने के साथ आरम्भ होता है। उसकी अनदेखी करना, या यह ढोंग करना छोड़ दीजिये कि उससे कोई पीड़ा नहीं हुई, बल्कि परमेश्वर पर भरोसा करना सीखिये और उसे अपनी बात सुन लेने दीजिये।
भजन 147:3 में लिखा है कि, “वह खेदित मनवालों को चंगा करता है, और उनके शोक पर मरहम–पट्टी बाँधता है।”
इसमें पिता-घाव भी सम्मिलित हैं।
जब आप परमेश्वर को अपना पिता होने देते हैं, तब फिर आप को अपनी पीड़ा को उठाए हुए फिरना नहीं पड़ेगा। वह उसे आप से ले लेगा, और अपना विश्राम तथा बहाली आप को देगा।
परमेश्वर पर पिता के रूप में भरोसा करना सीखना
फिर से अपने भरोसे को बनाने में समय लगता है। यदि आप अपने अतीत के कारण लोगों पर भरोसा करने से संघर्ष करते हैं, तो यह समझिये – परमेश्वर आप के प्रति धैर्य रखता है।
उसके पिता होने को, आप इस प्रकार से अपना सहारा बना सकते है:
उससे एक पिता के समान वार्तालाप करें – प्रार्थना केवल वस्तुओं को माँगने के लिए ही नहीं है। वह सम्बन्धों के बारे में है। अपनी सबसे गहरी अनुभूतियों को भी उसके साथ बाँटें, वे चाहे आप के भय हों, आप की हताशा, आप की आकांक्षाएँ, या आप के सपने हों – ठीक उसी तरह से जिस तरह एक बच्चा, अपने परवाह करने वाले पिता के साथ करता है।
उसके वचनों को, आप को, परिभाषित करने दीजिये – सम्भव है कि आप के पिता ने आप की अवहेलना की हो, या आपकी बढ़ोतरी में सहायक ना रहे हों, परन्तु परमेश्वर का वचन आप पर जीवन की बातें बोलता है। नि:सन्देह, उसका वचन उन सत्यों से भरा हुआ है, जो आप हैं। उन पदों पर ध्यान केंद्रित रखिये जो आप को आप के महत्व तथा उसके प्रेम को याद दिलाते हैं।
उसके समय पर भरोसा रखें – परमेश्वर ने आप के लिये जो योजनाएँ बनाई हैं, वे आप की अपेक्षाओं से भिन्न हो सकती हैं, परंतु अन्त में, वे सार्थक होंगी। हमेशा उसके बड़े कारणों पर भरोसा रखें। तब भी जब जीवन जटिल और असमंजस भरा लगता है। जैसा हमेशा होता है, उसे सब कुछ पता है।
तुलना करना छोड़ दें – हो सकता है कि आप औरों को जीवन में पिता समान सामर्थी लोगों के साथ देखते हैं। और इससे आप के मन में विचार आता है कि मुझे ऐसा क्यों नहीं मिल सकता है? परन्तु आप को जिस की आवश्यकता है, परमेश्वर, उसे अपने तरीके से आप को उपलब्ध करवाता है। कभी-कभी यह मार्गदर्शकों, मित्रों, या कलीसिया के समुदाय में होकर होता है।
स्वयँ को परमेश्वर की सन्तान के समान देखना
यह जानना एक बात है कि परमेश्वर हमारा पिता है। परन्तु इस पर सच में विश्वास करना एक बिलकुल भिन्न बात है।
उन बहुत से लोगों के लिए जो बिना पिता के—या किसी दूर रहने वाले, या दुख देने वाले—के साथ बड़े हुए, उनके लिये परमेश्वर को पिता स्वीकार करना स्वाभाविक रीति से नहीं हो पाता है। हो सकता है कि शब्द “पिता” कुछ पीड़ादायक यादें लाता है, या उनके लिए उसका कोई विशेष महत्व नहीं होता है क्योंकि उन्होंने कभी ऐसे सम्बन्ध को अनुभव ही नहीं किया।
परन्तु बाइबल यह स्पष्ट कर देती है: आप परमेश्वर की सन्तान हैं। केवल वह नहीं हैं जिसे परमेश्वर ने रचा है, न ही वह हैं जिस पर वह दूर से दृष्टि रखता है, परन्तु उसके पुत्र हैं। उसकी पुत्री हैं।
यह सत्य सब कुछ बदल देता है।
जब हम स्वयँ को उस तरह से देखने लगते हैं, जैसे परमेश्वर हमें देखता है, तब यह हमारी पहचान को, हमारी चँगाई को, हमारे जीवन से होकर जाने के तरीके को बदल देता है। फिर हम अपने अतीत, अपने घावों, या अपने अवांछित होने की भावनाओं के द्वारा परिभाषित नहीं होते हैं। बल्कि हम अपने स्वर्गीय पिता के अटल, अपरिवर्तनीय प्रेम द्वारा परिभाषित होते हैं।
आप परमेश्वर के हैं
पिता की भूमिका पहचान, सुरक्षा, और प्रेम प्रदान करने की होती है। जब ये बातें नहीं होती हैं, तब खोया हुआ अनुभव करना सरल होता है। मैं कौन हूँ? मैं किस स्थान का हूँ? क्या मैं पर्याप्त हूँ? ये प्रश्न बहुधा उनके मनों में बने रहते हैं जो बिना पिता के बड़े होते हैं।
परन्तु परमेश्वर इन प्रश्नों का उत्तर ऐसी रीति से देता है, जैसा पृथ्वी का कोई भी पिता कभी नहीं दे सका है।
1 यूहन्ना 3:1 में लिखा है, “देखो, पिता ने हम से कैसा प्रेम किया है कि हम परमेश्वर की सन्तान कहलाएँ; और हम हैं भी।”
यह केवल एक अच्छा विचार नहीं है—यह सत्य है। आप बिना पिता के नहीं हैं। आप भुलाए हुए नहीं हैं। परमेश्वर ने आप पर पहले से ही अपनी सन्तान होने का दावा कर रखा है। आपको इसे कमाने की आवश्यकता नहीं है। आप को स्वयँ को प्रमाणित नहीं करना है।
आप सीधे से, बस उसके हैं।
हमें परमेश्वर का प्रेम परिभाषित करता है, हमारी पीड़ा नहीं
बहुत से लोग अनुपस्थित पिता के कारण घाव लिये हुए फिरते हैं। चाहे वह छोड़ कर चला गया, या वह भावनात्मक रीति से दूर बना रहा, या उसने किसी रीति से आप को दु:ख पहुँचाया, यह अनुपस्थिति एक गहरी पीड़ा उत्पन्न करती है। परन्तु ये सब झूठ हैं।
हो सकता है कि पृथ्वी का आप का संसारिक पिता आपके लिए असफल रहा, परन्तु आप का स्वर्गीय पिता कभी असफल नहीं होगा। उसका प्रेम आप के अतीत पर निर्भर नहीं है। न ही इस पर निर्भर है कि आप का पृथ्वी के पिता आप को चाहता था नहीं।
आप के पहली साँस लेने से पहले ही परमेश्वर आप को चाहता था।
भजन 139:13-14 में लिखा है, “तू ने मुझे माता के गर्भ में रचा। मैं तेरा धन्यवाद करूँगा, इसलिये कि मैं भयानक और अद्भुत रीति से रचा गया हूँ।”
आप कोई दुर्घटना नहीं हैं। आप कोई गलती नहीं हैं। आप परमेश्वर की प्रिय सन्तान हैं।
परमेश्वर को पिता जानने के द्वारा चँगाई
जब हम सच में विश्वास करते हैं कि परमेश्वर हमारा पिता है, कुछ अद्भुत होता है: चँगाई आरम्भ हो जाती है।
एक अनुपस्थित पिता द्वारा दिए गए घाव रातों-रात तो नहीं भरेंगे, परन्तु जब हम इस सत्य में विश्राम करते हैं कि मसीह में हम कौन हैं, तब हम पर उन घावों की सामर्थ्य निष्क्रिय हो जाती है।
चँगाई तब आरम्भ होती है जब हम:
– उन झूठों को छोड़ देते हैं जो कहते हैं कि हम अयोग्य हैं।
– उन बातों में, जो कभी सन्तुष्टि प्रदान नहीं करेंगी, अपनी पहचान ढूँढ़ना बन्द कर देते हैं।
– उस प्रेम को स्वीकार कर लेते हैं जिसे परमेश्वर हमेशा ही हमें देना चाहता रहा है।
रोमियों 8:15 कहता है, “क्योंकि तुम को दासत्व की आत्मा नहीं मिली कि फिर भयभीत हो, परन्तु लेपालकपन की आत्मा मिली है, जिससे हम हे अब्बा, हे पिता कहकर पुकारते हैं।”
“अब्बा,” अंतरंग प्रेम के साथ “पिता” को सम्बोधित करने की अभिव्यक्ति है। यह “डैड” या “डैडी” कहने के समान है।
परमेश्वर आप से ऐसा ही सम्बन्ध रखना चाहता है—दूर का नहीं, औपचारिक नहीं, बल्कि घनिष्ठ, व्यक्तिगत, और प्रेम से भरा हुआ।
परमेश्वर की सन्तान होने का जीवन जीना
जब आप सच में विश्वास कर लेते हैं कि आप परमेश्वर की सन्तान हैं, तो यह आपकी जीवन शैली बदल देता है।
1. आप अनुमोदन के लिये परिश्रम करना बन्द कर देते हैं।
पिता-घावों वाले बहुतेरे लोग, स्वयँ को प्रमाणित करने के प्रयासों में, अपना जीवन व्यतीत कर देते हैं—सफल होने के, सिद्ध होने के, प्रेम को कमाने के प्रयासों में। परन्तु आप को स्वयँ को परमेश्वर के सामने प्रमाणित करने की आवश्यकता ही नहीं है। वह पहले से ही आप से प्रेम करता है। आप को उसके अनुमोदन के पीछे भागने की आवश्यकता नहीं है। वह तो पहले से ही आपके पास है।
2. आप आत्मविश्वास के साथ चलते हैं
जब आप जानते हैं कि आप किस के हैं, तब आप भय में जीवन जीना बन्द कर देते हैं। आप यह चिन्ता करना छोड़ देते हैं कि आप पर्याप्त भले हैं कि नहीं। आप इस आत्मविश्वास के साथ चलने लगते हैं कि आपका स्वर्गीय पिता हमेशा आप के साथ है।
3. आप भरोसा रखते हैं कि आप के लिये प्रावधान कर दिए गए हैं
एक भला पिता अपनी सन्तान के लिये प्रबन्ध करते है, और परमेश्वर भी यही करता है। वह आप की आवश्यकताओं को देखता है। उसे आप के संघर्षों के बारे में पता है। और उसने आपकी देखभाल करने की प्रतिज्ञा की है।
मत्ती 6:26 कहता है, “आकाश के पक्षियों को देखो! वे न बोते हैं, न काटते हैं, और न खत्तों में बटोरते हैं; फिर भी तुम्हारा स्वर्गीय पिता उनको खिलाता है। क्या तुम उनसे अधिक मूल्य नहीं रखते?”
यदि परमेश्वर पक्षियों के लिए उपलब्ध करवाता है, तो वह अपनी प्रिय सन्तान, आप के लिए, और भी बढ़कर उपलब्ध क्यों नहीं करवाएगा?
—
चर्चा: परमेश्वर को पिता जान लेने से चँगाई किस तरह आ सकती है?
- आप के पृथ्वी के पिता के साथ आपके सम्बन्ध ने आप को अपने प्रति क्या दृष्टिकोण दिया है?
- आप के लिए इस सत्य को पूर्णतः स्वीकार कर लेना कैसा रहेगा कि आप परमेश्वर की सन्तान हैं?
- आप ने अपने बारे में किन असत्यों पर विश्वास किया है, जिन्हें परमेश्वर के सत्यों से बदले जाने की आवश्यकता है।
- परमेश्वर पर पिता होने का भरोसा रखने से, पृथ्वी के अनुपस्थित पिता से मिले घावों से चँगाई किस प्रकार से मिलेगी?
—
स्वयँ को परमेश्वर की सन्तान देखने से सब कुछ बदल जाता है। इसका अर्थ है कि आप अपने अतीत के घावों द्वारा परिभाषित नहीं होते हैं। इसका अर्थ है कि आप उन बातों में अपनी पहचान नहीं खोज रहे हैं जो आपको कभी सन्तुष्टि प्रदान नहीं कर सकती हैं। इसका अर्थ है कि आप से पहले से ही प्रेम किया गया है। आप पहले से चुने हुए हैं। आप पहले से ही परमेश्वर के हैं।
यदि आप पिता के न होने की पीड़ा के साथ संघर्ष करते आए हैं, तो यह जान लीजिए कि: परमेश्वर पर्याप्त है। परमेश्वर केवल उसकी भरपाई नहीं है, जो अनुपस्थित था। वह ऐसा पिता है, जिसे हमेशा आपके साथ होना ही था। इसलिये, आज ही सत्य पर विश्वास करना चुन लें। आप त्यागे हुए नहीं हैं। आप अकेले नहीं हैं। आप एक राजा की सन्तान हैं। और कुछ भी, कभी भी, इसे हटा नहीं सकता है।
भाग III: क्रोध, रोष, और असुरक्षा पर विजयी होना
कुँजी वचन: इफिसियों 4:31-32
“सब प्रकार की कड़वाहट, और प्रकोप और क्रोध, और कलह, और निन्दा, सब बैरभाव समेत तुम से दूर की जाए।
एक दूसरे पर कृपालु और करुणामय हो, और जैसे परमेश्वर ने मसीह में तुम्हारे अपराध क्षमा किए, वैसे ही तुम
भी एक दूसरे के अपराध क्षमा करो।”
क्रोध और बैर को साथ लिए चलना
क्रोधित होना, बहुधा किसी दु:खदायी बात की प्रतिक्रिया होता है। क्रोध सबसे पहले तब प्रकट होता है जब कोई ऐसा जिस पर हम भरोसा रखते हैं, हमें छोड़ कर चला जाता है, हमें निराश करता है, या हमें अयोग्य अनुभव करवाता है। क्रोधित होना उदास होने से कहीं अधिक सहज होता है। पीड़ा को स्वीकार करने की अपेक्षा, दीवारों को खड़ा करना अधिक सरल होता है।
परन्तु वह क्रोध जिसे नियन्त्रित न किया जाए, मात्र क्रोध नहीं रहता है। वह रोष में बदल जाता है। वह कड़वाहट में परिवर्तित हो जाता है। वह हमारे जीवनों के प्रत्येक भाग में घुस आता है, उनमें भी कि हम औरों को कैसे देखते हैं, औरों से कैसा व्यवहार करते हैं, और हम किस प्रकार से परमेश्वर पर भरोसा करने के बारे में चुनते हैं।
हो सकता है कि आपने इसका सीधे से अनुभव किया होगा। सम्भवतः आप ने अपने अनुपस्थित पिता के प्रति आवेश अनुभव किया हो और गहराई से इस यह धारणा बना रखी है कि उन्होंने आप की परवरिश नहीं की, आप के लिए प्रावधान नहीं किये, और पिता के समान आप से प्रेम नहीं किया, जैसा कि उन्हें करना चाहिए था। हो सकता है कि उस क्रोध के कारण आप के सम्बन्धों में समस्याएँ उत्पन्न हुई हैं, जिससे आप के लिये औरों पर भरोसा रखना कठिन हो गया है, आपके आहत होने की संभावनाएँ बढ़ गई हैं, और यह आशा रखना कि लोग वास्तव में आप के लिये उपलब्ध होना चाहते हैं। क्रोध बहुत परिवर्तनशील है, और सबसे बुरी बात यह कि उसे कभी भी नियन्त्रित करके नहीं रखा जा सकता है।
वह फैलता है। जो एक व्यक्ति का घाव बन कर आरम्भ होता है वह सभी के साथ हमारे व्यवहार को आकार दे देता है। वह एक ऐसा दृष्टिकोण बन जाता है, जिससे हम सारे संसार को देखते हैं। और हमें स्वतन्त्र करने की बजाए, वह हमें फँसाए रखता है।
इफिसियों 4:31 हमसे कहता है कि, “सब प्रकार की कड़वाहट, और प्रकोप और क्रोध तुम से दूर की जाए।” इसलिये नहीं कि पीड़ा वास्तविक नहीं थी। इसलिये नहीं कि जो हुआ उसका कोई महत्व नहीं है। बल्कि इसलिये, क्योंकि उस पीड़ा को थामे रहना, हमें आगे बढ़ने से रोके रखेगा।
जाने देने का अर्थ यह ढोंग करना नहीं है कि यह कभी हुआ ही नहीं। बल्कि इसका अर्थ यह चुनाव करना है कि अब से हम उसे स्वयँ पर और नियन्त्रण करने नहीं देंगे।
कड़वाहट को थामे रखना हमें और अधिक दु:ख कैसे देता है
यह मान लेना बहुत सरल हो सकता है कि हमारे क्रोध का एक उद्देश्य है। और कुछ बातों में यह है भी। छोड़ दिए जाने से उत्पन्न पीड़ा समझ में आती है। एक अनुपस्थित पिता के प्रति रोष पूरी तरह से समझ आता है। परन्तु कड़वाहट रखने से आहत करने वाले को दुःख नहीं होगा, बल्कि, उससे हमें ही और अधिक दुःख होगा।
अपने अन्दर रोष बनाए रखना ऐसा है मानो स्वयँ विष पीकर यह अपेक्षा रखना कि किसी अन्य को उसके परिणामों के प्रभावों को झेलना पड़ेगा। इससे अतीत में कभी कोई बदलाव नहीं आएँगे। इसकी बजाए, अपनी चँगाई प्राप्त करने का तरीका है, क्षमा कर देने और छोड़ देने के द्वारा, कहानी को ही बदल दिया जाये।
क्रोध के साथ शक्ति भी आती है, और एक व्यक्ति के रूप में हम किस प्रकार से उसका सामना करना चुनते हैं, वह हमारे अस्तित्व को परिभाषित करता है।
कठिन परिस्थितियाँ, अनोखे तरीकों से व्यक्ति के चरित्र को प्रकट कर देती हैं। इफिसियों 4:32 चरित्र के एक ऐसे गुण की ओर संकेत करता है जो दयालुता, सहानुभूति, तथा औरों को क्षमा करने पर केन्द्रित रहता है। चिल्लाना, अपशब्द बोलना, या द्वेष रखना, क्रोध का प्रत्युत्तर नहीं हैं, और यद्यपि क्षमा करना आप के साथ हुए गलत व्यवहार की अनदेखी करना नहीं है, परन्तु आप के साथ हुए गलत व्यवहार को सम्बोधित करने के भी अपने ही लाभ होते हैं।
चँगाई की प्रक्रिया में क्षमा करने का महत्व
क्षमा करने को एक संवेदनशील विषय माना जाता है, और बहुधा इस गलत समझा जाता है। नि:सन्देह यह चँगाई के साथ-साथ चलता है, परन्तु बहुतेरे, एक बार जब पीड़ा कम हो जाती है, तब चँगाई को “सब कुछ ठीक है” चिल्लाने के समान समझते हैं। परन्तु वास्तविक चँगाई चोट की अवहेलना करना नहीं है, वरन् वह इसके स्रोत को समझना है। चाहे हम क्षमा करें या न करें, परन्तु यह पहचानना कि हमारी पीड़ा कहाँ से आई है, हमें शान्ति प्रदान करता है।
क्षमा करना किसी के प्रति क्रोध रखने के बोझ को हटा देना है, परन्तु इसके लिये, व्यक्ति को नरम होकर परमेश्वर के सामने झुकना पड़ेगा।
अन्ततः, परमेश्वर को समर्पित होना स्वयँ की एक अद्भुत सामर्थ्य है। अपने आप में कोप वर्षों से जमा होता चला जाता है, और क्रोध एक ग्लास को भरते चले जाने के समान है, अर्थात्, छोड़ देना रातों-रात होने वाली बात नहीं है। चाहे वह एक बहुत पुरानी याद के समान लगे, या कल के समान ताज़ा हो, विचार करने के समयों को अनुमति होती है। आप को जितना भी समय चाहिये, आप लगाएँ, परन्तु इस तथ्य को स्वीकार कर लें कि चँगाई पाना एक यात्रा के समान है।
बहुत से लोग परमेश्वर को चुनते हैं, जो कि एक सही तरीका है। पहले, स्वयँ को चुनने और परमेश्वर पर भरोसा रखने से सांत्वना आएगी, परमेश्वर के प्रति समर्पण की ओर एक कदम, जो एक बड़ा कार्य प्रतीत हो सकता है, परन्तु नरम पड़ने से हल्का अनुभव होगा।
आत्म-धारणा और असुरक्षाओं पर विजयी होना
उन बहुतेरों के लिए, जो बिना पिता के बड़े हुए हैं, क्रोध, संघर्ष का केवल एक भाग है। बहुधा अन्दर की गहरी बात असुरक्षा है।
एक पिता की उपस्थिति का अर्थ पुष्टि, पहचान, और सुरक्षा प्रदान करना है। जब ऐसा नहीं होता है, तब यह सोचना सहज होता है कि क्या हम पर्याप्त हैं। क्या हम प्रेम करने के योग्य हैं। क्या हम योग्य हैं।
बहुतेरे, सम्बन्धों, उपलब्धियों, सिद्ध बनने के प्रयासों के द्वारा—इस पुष्टि को पाने में वर्षों लगा देते हैं। परन्तु चाहे जितनी भी सफलता मिले, या औरों से कितनी भी पुष्टि मिले, वह अनुपस्थित पिता के कारण आए रिक्त स्थान को कभी नहीं भर सकते हैं।
वह एकमात्र बात जो इस रिक्त स्थान को भर सकती है, यह जानना है कि हम परमेश्वर में कौन हैं।
परमेश्वर हमें अपनी सन्तान कहता है। वह हमें त्यागा हुआ, भुलाया हुआ, या अयोग्य नहीं देखता है। वह हमें चुना हुआ, प्रेम का पात्र, और बहुमूल्य देखता है।
यशायाह 43:1 में, परमेश्वर कहता है, “मैं ने तुझे नाम लेकर बुलाया है, तू मेरा ही है।”
आपका मूल्य कभी भी किसी व्यक्ति के उपस्थित या अनुपस्थित होने के साथ जुड़ा हुआ नहीं रहा है। वह हमेशा ही परमेश्वर से जुड़ा हुआ रहा है। और उसने कभी, एक बार भी, आप को नहीं छोड़ा है।
अतीत से स्वतन्त्र हो जाना
क्रोध, रोष, और असुरक्षा से चँगा होने का अर्थ यह ढोंग करना कभी नहीं रहा है कि पीड़ा कभी हुई ही नहीं। बल्कि यह, इस चुनाव को करना है कि वह आप को कभी परिभाषित नहीं करेगी।
यह इस निर्णय को लेने के बारे में है कि आप की पहचान उससे नहीं है जो आप के पास नहीं है, परन्तु इससे है कि परमेश्वर क्या कहता है कि आप कौन हैं। यह स्वतन्त्रता में कदम रखना है, तब भी जब वह अपरिचित सा लगे।
कुछ दिन औरों से कठिन होंगे। किसी दिन, पुराने घाव फिर से खुलने के प्रयास करेंगे। परन्तु प्रति दिन आप के पास एक चुनाव होगा:
– यह चुनना कि अतीत को पकड़े रहें, या यह चुनना कि परमेश्वर के प्रेम में आगे बढ़ें।
– यह चुनना कि कड़वाहट को जड़ पकड़ने दें, या यह चुनना कि उसे परमेश्वर के हाथों में सौंप दें।
– यह चुनना कि आप अपर्याप्त हैं, या यह चुनना कि परमेश्वर ने पहले ही आप को पर्याप्त कह दिया है।
चँगाई पाने की यात्रा हमेशा ही आसान तो नहीं होती है, परन्तु परमेश्वर के साथ, हमेशा सम्भव होती है।
क्षमा करने और विश्वास में आगे बढ़ने के कदम
क्षमा करना सबसे कठिन कार्यों में से एक है, विशेषकर तब जब घाव गहरे हों। यदि किसी ने हमें आहत किया है—विशेषकर उस पिता ने जिसे वहाँ पर होना चाहिये था—तब पीड़ा को जा लेने देना अनुचित लगता है। तब क्षमा करना यह कहना प्रतीत हो सकता है कि “आपने जो किया उसका कोई महत्व नहीं है।”
परन्तु यह क्षमा करना नहीं है।
क्षमा किसी के द्वारा की गई बातों की अनदेखी कर देना नहीं है। वह स्वयँ को पीड़ा के बोझ को उठाए रहने से स्वतन्त्र करना है। वह, आपके साथ जो हुआ, उसे आप के भविष्य को नियन्त्रित करने देने से इनकार कर देना है।
जब हम कड़वाहट को पकड़े रहते हैं, तब हम किसी और के किये हुए के बोझ को उठाए रहते हैं। वह क्रोध, रोष, और वह पीड़ा, उसका उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है—वे हमें प्रभावित करते हैं। उनसे उसे आकार मिलता है कि हम स्वयँ को कैसे देखते हैं, औरों पर कैसे भरोसा करते हैं, और हम परमेश्वर से किस प्रकार सम्बन्धित होते हैं।
परन्तु परमेश्वर एक अन्य मार्ग देता है। वह हमें क्षमा करने के लिए कहता है, इसलिये नहीं क्योंकि यह सहज है, परन्तु क्योंकि यह चँगाई को लेकर जाता है।
इफिसियों 4:31-32 कहता है, “सब प्रकार की कड़वाहट, और प्रकोप और क्रोध, और कलह, और निन्दा, सब बैरभाव समेत तुम से दूर की जाए। एक दूसरे पर कृपालु और करुणामय हो, और जैसे परमेश्वर ने मसीह में तुम्हारे अपराध क्षमा किए, वैसे ही तुम भी एक दूसरे के अपराध क्षमा करो।”
परमेश्वर जानता है कि पीड़ा को थामे रहना हमें केवल फँसाए रखता है। इसीलिये वह हमें आमंत्रित करता है कि हम उसे जा लेने दें, और अपने घावों के लिये उस पर भरोसा रखें, और उस स्वतन्त्रता में कदम रखें जो केवल क्षमा ला सकती है।
परन्तु वास्तविकता में हम इसे कर कैसे सकते हैं? जब पीड़ा वास्तविक हो और अतीत छोड़ देने के लिए बहुत भारी हो, तब हम क्षमा कैसे करें?
कदम 1: पीड़ा के बारे में ईमानदार हों
क्षमा का आरम्भ आहत होने को स्वीकार करने के साथ होता है। यह ढोंग करना कि उसका कोई अस्तित्व नहीं है, उसे हटा नहीं देगा। उसे दबा के रखने से वह केवल और सड़ेगी।
हो सकता है कि आप वर्षों से घावों को लिए हुए जी रहे हैं, उन्होंने आप को कितना प्रभावित किया है, उसे मान लेने से डरे हुए हैं। हो सकता है कि आपने स्वयं से कहा है कि आप को कोई परवाह नहीं है, कि आप अपने पिता के बिना ठीक हैं, कि उनकी अनुपस्थिति ने आप को कोई आकार नहीं दिया है।
परन्तु अन्दर, गहराई में, पीड़ा अभी भी है।
इससे पहले की आप क्षमा करें, आप को सत्य का सामना करना पड़ेगा कि आप कैसा अनुभाव करते हैं। अपनी भावनाओं को परमेश्वर के पास लाएँ। उसे अपने क्रोध, उदासी, और असमंजस के बारे में बताएँ। वह उसे संभाल सकता है। वह उसे पहले से ही जानता है।
भजन संहिता 34:18 हमें याद दिलाता है, “यहोवा टूटे मनवालों के समीप रहता है, और पिसे हुओं का उद्धार करता है।”
परमेश्वर को आपकी पीड़ा की परवाह है। और वह उसे चँगा करना चाहता है।
कदम 2: क्षमा करना चुनें, तब भी जब यह असम्भव प्रतीत हो
क्षमा करना कोई भावना नहीं है—यह एक चुनाव है। यदि हम इस अनुभव के आने की प्रतीक्षा करेंगे, कि हम क्षमा करने के लिये तैयार हैं, तो सम्भव है कि यह कभी न आए।
कभी-कभी हम अपने आप को मना लेते हैं कि क्षमा करना बात को समाप्त करने के साथ होता है, क्षमा माँगने के साथ, जहाँ दूसरा व्यक्ति सब बातों को ठीक कर देता है। परन्तु सत्य यह है कि हम तब भी क्षमा कर सकते हैं जब दूसरा कभी क्षमा माँगता ही नहीं है।
यीशु ने इसे क्रूस पर दिखाया। जब उसे क्रूस पर चढ़ाया जा रहा था, उसने कहा, “हे पिता, इन्हें क्षमा कर, क्योंकि ये जानते नहीं कि क्या कर रहे हैं।” (लूका 23:34)
जिन लोगों ने उसे चोट पहुँचाई थी, उन्होंने कभी उससे क्षमा नहीं माँगी। परन्तु फिर भी उसने उन्हें क्षमा किया।
क्षमा देना एक निर्णय लेना है। वह यह कहना है, “मैं इस व्यक्ति को परमेश्वर के हाथों में स्वतंत्र करता हूँ। मैं कडवाहट को अपने मन को नियन्त्रित नहीं करने दूँगा।”
यह एक बार होने वाली घटना नहीं है। किन्ही दिनों में क्रोध चुपके से फिर से अन्दर आ जाएगा। किसी दिन, पीड़ा फिर से ताज़ा अनुभव होगी। परन्तु हम हर दिन, फिर से क्षमा करना चुन सकते हैं।
कदम 3: परमेश्वर पर न्याय करने के लिये भरोसा रखिये
क्षमा करने के सबसे कठिन भागों में से एक है, यह अनुभव करना कि कोई अपने किये हुए के परिणामों से बच कर निकल रहा है। क्षमा करने का विचार यह कहना प्रतीत हो सकता है कि, “इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है।”
परन्तु क्षमा करने का यह अर्थ नहीं है कि न्याय नहीं होगा। इसका बस यह अर्थ है कि हम भरोसा रखते हैं कि हमारे कुछ करने के स्थान पर, परमेश्वर उससे व्यवहार करेगा।
रोमियों 12:19 कहता है, “हे प्रियो, बदला न लेना, परन्तु परमेश्वर के क्रोध को अवसर दो, क्योंकि लिखा है, ‘बदला लेना मेरा काम है, प्रभु कहता है मैं ही बदला दूँगा।’”
परमेश्वर न्यायी है। वह सब कुछ देखता है। और वह अपने सिद्ध तरीके से प्रत्येक चोट के लिये व्यवहार करेगा।
जब हम क्षमा करते हैं, तब हम यह नहीं कहते हैं कि जो भी हुआ, कोई बात नहीं। हम यह कहते हैं कि हम प्रतिशोध की स्वयं की भावना से बढ़कर परमेश्वर पर भरोसा करते हैं।
कदम 4: पीड़ा को परमेश्वर को सौंप दें
पीड़ा को जा लेने देना सहज नहीं होता है। कुछ घाव बहुत गहरे, बहुत पीड़ाजनक, बहुत अभिभूत करने वाले लगते हैं।
परन्तु परमेश्वर हम से इसे अकेले ही करने के लिये नहीं कहता है।
मत्ती 11:28 कहता है, “हे सब परिश्रम करनेवालो और बोझ से दबे हुए लोगो, मेरे पास आओ; मैं तुम्हें विश्राम दूँगा।”
परमेश्वर हमें आमन्त्रित करता है कि अपनी पीड़ा को उसके पास लाएँ। उसे वहीं छोड़ दें। स्वयं उसे उठाए फिरना बन्द कर दें।
यह कैसा दिखता है?
– इसका अर्थ है प्रार्थना करना और उसे समर्पित कर देना—हर बार जब भी पीड़ा फिर से उठती है।
– इसका अर्थ है उससे क्षमा करने की सामर्थ्य माँगना—तब भी जब यह असम्भव लगता है।
– इसका अर्थ है भरोसा रखना कि वह टूटे हुए को ठीक कर देगा—चाहे उसमें समय लगे।
परमेश्वर हम से कभी कुछ छोड़ देने के लिये नहीं कहेगा, बिना उसके स्थान पर कुछ उससे भी बड़ा दिए हुए। जब हम अपनी चोट को उसे समर्पित करते हैं, वह उसके स्थान पर अपनी शान्ति दे देता है।
कदम 5: स्वतन्त्रता में चलें
क्षमा केवल अतीत के बारे में ही नहीं है—वह भविष्य के बारे में है।
जब हम क्षमा करते हैं, हम उन बेड़ियों से स्वतंत्र हो जाते हैं जिन्होंने हमें रोक कर रखा हुआ है। हम स्वयं को अपने घावों से परिभाषित करना बन्द कर देते हैं। हम किसी और के कार्यों को हमारी शान्ति को नियन्त्रित करने देने से रोक देते हैं।
– क्रोध में चलने के स्थान पर, हम आनन्द में चलते है।
– रोष से बोझिल होने के स्थान पर, हम अनुग्रह द्वारा ऊपर उठाए जाते हैं।
– बात के अतीत में समाप्त किये जाने के स्थान पर हम परमेश्वर के प्रेम में चँगाई को प्राप्त करते हैं।
2 कुरिन्थियों 5:17 कहता है, “इसलिये यदि कोई मसीह में है तो वह नई सृष्टि है: पुरानी बातें बीत गई हैं; देखो, सब बातें नई हो गई हैं।”
आप अपने अतीत से बंधे हुए नहीं हैं। आप के साथ जो हुआ, आप उससे परिभाषित नहीं हैं।
जब आप क्षमा करना चुनते हैं, आप एक नए आरम्भ को चुनते हैं।
—
चर्चा: आप पीड़ा को परमेश्वर को कैसे समर्पित कर सकते हैं?
- आप ने क्षमा करने से सम्बंधित किन भावनाओं के साथ संघर्ष किया है?
- पीड़ा को पकडे रहने ने आप के मन, आपके मस्तिष्क, और आप के सम्बन्धों को किस प्रकार से प्रभावित किया है?
- आप आज वह कौन सा एक कदम उठा सकते हैं कि कडवाहट को छोड़कर स्वतंत्र होकर चलें?
- परमेश्वर के न्याय पर भरोसा रखना, आप को रोष को छोड़ देने में किस प्रकार सहायता करता है?
—
क्षमा यह ढोंग करना नहीं है कि अतीत में कुछ हुआ ही नहीं था। यह पीड़ा की अनदेखी करना नहीं है। यह कडवाहट की बजाए स्वतन्त्रता, रोष की बजाए चँगाई, और क्रोध की बजाए शान्ति को चुनना है।
यह रातों-रात नहीं होता है। किसी दिन घाव अभी भी ताज़ा अनुभव होंगे। किसी दिन आप को फिर से पूरी तरह से क्षमा करना पडेगा।
परन्तु आप जितनी बार क्षमा करना चुनते हैं, आप अतीत की पकड़ को ढीली करते हैं।
परमेश्वर का कभी यह उद्देश्य नहीं था कि आप पीड़ा का बोझ उठाए हुए जीवन जीएँ। उसका यह उद्देश्य कभी नहीं था कि आप क्रोध और रोष को शेष जीवन भर लिये चलते रहें। उसके पास आप के लिये कुछ बहुत बेहतर है—शान्ति, आनन्द, और वह स्वतन्त्रता जो छोड़ देने से आती है।
इसलिये आज, एक कदम बढ़ाएँ। प्रार्थना करें। समर्पित हो जाएँ। और भरोसा रखें कि परमेश्वर प्रत्येक घाव को भर देने के लिये पर्याप्त बड़ा है।
भाग IV: परमेश्वर के साथ एक दृढ़ भविष्य बनाना
कुँजी वचन: यिर्मयाह 29:11
“क्योंकि यहोवा की यह वाणी है, कि जो कल्पनाएँ मैं तुम्हारे विषय करता हूँ उन्हें मैं जानता हूँ, वे हानि की नहीं,
वरन् कुशल ही की हैं, और अन्त में तुम्हारी आशा पूरी करूँगा।”
अतीत से स्वतन्त्र हो जाना
अतीत प्रयास करता रहता है कि हमें परिभाषित करे। यदि आप पिता के बिना बड़े हुए हैं या आपने अपने बचपन में पीड़ा अनुभव की है, तो यह समझना सहज होता है कि आप एक ऐसे चक्र में फंसे हुए हैं जिसे आप ने नहीं चुना है। हो सकता है कि आपने लोगों को यह कहते हुए सुना हो, “तुम भी ठीक उसी के समान हो जाओगे” या, “तुम जहाँ से आए हो उसे नहीं बदल सकते हो।”
परन्तु यह सत्य नहीं है।
परमेश्वर यिर्मयाह 29:11 में यह स्पष्ट कर देता है कि आप के जीवन के लिये उसके पास एक योजना है—ऐसी योजना जो आशा और उद्देश्य से भरी हुई है। हो सकता है कि आप के अतीत ने आप को आकार दिया है, परन्तु आवश्यक नहीं है कि वह आप का भविष्य भी परिभाषित करे। परमेश्वर के साथ आप आहत होने, असुरक्षा, और टूटेपन के नमूनों से स्वतन्त्र हो सकते हैं, और एक नए जीवन में कदम रख सकते हैं जो सार्थक होने, दिशा, और शान्ति से भरा हुआ है।
सम्भव है कि आप के पिता की अनुपस्थिति ने एक रिक्त स्थान छोड़ा है। हो सकता है कि उससे आप में अपने महत्व के बारे में डर, रोष, या सन्देह उत्पन्न हुए हैं। हो सकता है कि इससे आप यह मान बैठे हों कि आप को स्वयं ही जीवन को समझना पड़ेगा। परन्तु परमेश्वर आप को कुछ भिन्न देना चाहता है—एक ऐसा भविष्य जो अतीत की पीड़ा पर नहीं, परन्तु उसके प्रेम और मार्गदर्शन की नींव पर बना है।
परमेश्वर के साथ एक दृढ़ भविष्य बनाने के लिये पहला कदम है जो था उसे छोड़ कर, जो सम्भव है उसे गले लगा लेना।
नकारात्मक चक्रों को तोड़ना
बहुधा यह कहा जाता है कि इतिहास स्वयं को दोहराता रहता है। बहुत से लोग जो टूटे हुए घरों में बड़े होते हैं, उन्हें इसका डर बना रहता है कि उनके अपने जीवनों में भी वही नमूने ज़ारी रहेंगे। शत्रु चाहता है कि आप इस बात को मान कर चलें, कि क्योंकि आप के पिता नहीं थे, इसलिये आप भी अपने सम्बन्धों, अपने परिवार, और अपने परमेश्वर के साथ चलते रहने में असफल रहेंगे।
परन्तु परमेश्वर बेड़ियों को तोड़ता है।
हो सकता है कि आप का पिता उपस्थित नहीं था। परन्तु इसका यह अर्थ नहीं है कि आप को भी उस अनुपस्थिति को अपने परिवार में ले जाना ही होगा। हो सकता है कि आप अपूर्णता के साथ बड़े हुए हैं। परन्तु इसका यह अर्थ नहीं है कि आप अपने घर को विश्वास और प्रेम पर केन्द्रित करके नहीं बना सकते हैं। हो सकता है कि आप को कभी भरोसा रखना नहीं सिखाया गया। परन्तु इसका यह अर्थ नहीं है कि आप परमेश्वर पर भरोसा रखना नहीं सीख सकते हैं।
2 कुरिन्थियों 5:17 हमें याद दिलाता है कि, “इसलिये यदि कोई मसीह में है तो वह नई सृष्टि है: पुरानी बातें बीत गई हैं; देखो, सब बातें नई हो गई हैं!”
आप अतीत की गलतियों से बन्धे हुए नहीं हैं। आप को उसी मार्ग पर नहीं चलना है जिससे पीड़ा उत्पन्न हुई थी। मसीह के द्वारा, आप नई शुरुआत कर सकते हैं।
अपने भविष्य को परमेश्वर को समर्पित करना
परमेश्वर के बिना अपने भविष्य को नियन्त्रित करने के प्रयास, तनाव, डर, और निराशा में लेकर जाते हैं। परन्तु जब आप अपने भविष्य को परमेश्वर के हाथों में सौंप देते हैं, तब वह बुद्धिमानी, सुरक्षा, और अनुग्रह के साथ आप की अगुवाई करता है।
नीतिवचन 3:5-6 कहता है, “तू अपनी समझ का सहारा न लेना, वरन् सम्पूर्ण मन से यहोवा पर भरोसा रखना। उसी को स्मरण करके सब काम करना, तब वह तेरे लिये सीधा मार्ग निकालेगा।”
परमेश्वर पर भरोसा रखने का अर्थ यह मानना है कि वह जानता है कि सर्वोत्तम क्या है, तब भी जब आप के पास सारे उत्तर नहीं होते हैं। इसका अर्थ है अपनी योजनाओं, अपने डर, और अपने सपनों को उसे समर्पित कर देना और उसे आप का मार्गदर्शन करने देना।
समर्पित होना दुर्बलता का चिन्ह नहीं है—यह विश्वास करने का चिन्ह है। इसका अर्थ है कि आप को सब कुछ स्वयं ही नहीं समझना पड़ेगा, क्योंकि आप का स्वर्गीय पिता आप की अगुवाई कर रहा है।
एक मसीह-केन्द्रित जीवन बनाना
परमेश्वर के साथ भविष्य को बनाने का अर्थ है उसे अपने हर कार्य का आधार बना लेना। जब मसीह आप के जीवन का केन्द्र होगा, तब आप के निर्णय, सम्बन्ध, और उद्देश्य सभी उसकी इच्छा के अनुसार होंगे।
तो, आप मसीह-केन्द्रित जीवन किस प्रकार बनाते हैं?
पहला, परमेश्वर के साथ अपने सम्बन्ध को प्राथमिकता दें। उसके वचन के साथ समय बिताएँ, प्रार्थना में उससे बातें करें, उसे अपने जीवन के प्रत्येक भाग में आमन्त्रित करें।
दूसरा, स्वयं को भक्तिपूर्ण प्रभावों से घेर लें। जिन लोगों को आप अपने जीवन में आने देते हैं, वे आप के भविष्य को आकार देंगे। एक उद्देश्य के साथ स्वयं को ऐसे लोगों से घेर लें जो आप को विश्वास में प्रोत्साहित करें, जो आप के सामने बढ़ते जाने की चुनौती रखें, और जब भी जीवन कठिन हो, तब आपको परमेश्वर के सत्यों को याद दिलाएँ।
तीसरा, ऐसे निर्णय लें जो आप के विश्वास को दिखाते हैं। जब आप के सामने आप के कार्य, सम्बन्धों, और दैनिक जीवन के बारे में चुनाव आते हैं, स्वयं से प्रश्न पूछें: क्या यह मुझे परमेश्वर के और भी निकट लाता है? क्या इससे उसे आदर मिलता है?
एक दृढ़ भविष्य निराधार विचारों पर आधारित नहीं होता है, वह उन दैनिक चुनावों पर बनाया जाता है जो आपके जीवन के लिये परमेश्वर के उद्देश्यों के अनुरूप हैं।
सन्देह और डर से चँगाई
अज्ञात भयावह हो सकता है। हो सकता है कि आप असफल होने से डरते हैं। हो सकता है कि आप सन्देह करते हैं कि आप में बेहतर भविष्य बनाने की क्षमता है। हो सकता है कि आप सोचते हों कि जिन बातों से होकर आप निकले हैं, उसके बावजूद क्या परमेश्वर के पास आप के लिये कोई अच्छी योजना होगी।
परन्तु परमेश्वर ने हमें डर का आत्मा नहीं दिया है।
2 तीमुथियुस 1:7 कहता है, “क्योंकि परमेश्वर ने हमें भय की नहीं पर सामर्थ्य और प्रेम और संयम की आत्मा दी है।”
डर, आप को फँसाए रखने के लिये शत्रु का एक साधन है। वह चाहता है कि आप यही मानते रहें कि आप अयोग्य हैं, कभी बदल नहीं सकते हैं, कभी पर्याप्त नहीं होंगे। परन्तु परमेश्वर का वचन आप पर एक भिन्न सत्य को बोलता है।
– आप उसमें होकर सामर्थी हैं।
– आप उसमें होकर योग्य हैं।
– आप पहले से ही प्रेम के पात्र, चुने हुए, और योग्य हैं।
आप का भविष्य, आप के अतीत पर निर्भर नहीं है। वह परमेश्वर की विश्वासयोग्यता पर निर्भर है।
परमेश्वर के समय पर भरोसा रखना
कभ-कभी हम चाहते हैं कि बातें तुरन्त बदल जाएँ। हम रातों-रात चँगाई चाहते हैं, संघर्षों से तुरन्त छुटकारा चाहते हैं, तुरन्त ही परिणाम देखना चाहते हैं। परन्तु परमेश्वर की योजनाएँ उसके सिद्ध समय में उजागर होती हैं।
सभोपदेशक 3:11 हमें याद दिलाता है कि, “उसने सब कुछ ऐसा बनाया कि अपने अपने समय पर वे सुन्दर होते हैं।”
भरोसा रखें कि परमेश्वर कार्य कर रहा है, तब भी जब आप अभी उसे होता हुआ नहीं देख पाते हैं। भरोसा रखें कि वह आप के भविष्य को, आप की कल्पना से भी कहीं अधिक बढ़कर, आकार दे रहा है। उसके समय में विलम्ब नहीं है—वह सिद्ध है।
भरोसे के साथ आगे बढ़ना
परमेश्वर के साथ भविष्य बनाना अतीत को पीछे छोड़ देना नहीं है—यह भरोसे के साथ, उसमें आगे बढ़ते जाना है, जिसे होने के लिये उसने आप को बुलाया है।
इस यात्रा में आप अकेले नहीं हैं। परमेश्वर आप के साथ है, मार्गदर्शन कर रहा है, सामर्थी बना रहा है, और आगे आने वाले के लिये तैयार कर रहा है।
यिर्मयाह 29:11 एक प्रतिज्ञा है, केवल कुछ लोगों के लिये नहीं—परन्तु आप के लिये।
इसलिये कदम को आगे बढ़ाएँ। अतीत के बोझ को छोड़ दीजिये। भरोसा रखिये कि परमेश्वर ने आप के लिये जो रखा हुआ है, वह उससे कहीं अधिक बढ़कर है, जिसे आपने पीछे छोड़ दिया है।
अच्छे मार्गदर्शक और सम्बन्ध खोजना
सम्बन्ध हमें आकार देते हैं। हम जिन लोगों से स्वयं को घेर लेते हैं, वे हमारे सोचने, निर्णय लेने, यहाँ तक कि स्वयं को देखने को भी प्रभावित करते हैं। यदि आप बिना पिता के, या ऐसे पिता के साथ जो अनुपस्थित रहता था या दुःख देता था, के साथ बड़े हुए हैं, तो आपने यह समझने के लिये संघर्ष किया होगा कि किस पर भरोसा किया जाये, किससे सीखा जाये, या मार्गदर्शन के लिये किस की ओर मुड़ा जाये।
परन्तु अच्छा समाचार यह है: आप को अकेले ही सब कुछ पता नहीं लगाना है।
परमेश्वर ने हमें अकेले ही जीवन से होकर जाने के लिये नहीं बनाया है। वह हमारे जीवनों में लोगों को रखता है, हमें प्रोत्साहित करने, सिखाने, और बढ़ने में हमारी सहायता करने के लिये। अच्छे मार्गदर्शक और सम्बन्धों को खोजना केवल एक अच्छा विचार नहीं है—यह, हमाई चँगाई और भविष्य के लिये परमेश्वर की योजना का एक भाग है।
नीतिवचन 27:17 कहता है, “जैसे लोहा लोहे को चमका देता है, वैसे ही मनुष्य का मुख अपने मित्र की संगति से चमकदार हो जाता है।” इसका अर्थ है कि सही सम्बन्ध आप को साफ कर सकते हैं, दृढ़ बना सकते हैं, और, आप को वह व्यक्ति बना सकते हैं, जो परमेश्वर ने आप के बनने के लिए आप को रचा है।
परन्तु आप इन सम्बन्धों के बारे में पता कैसे लगाएँ? आप कैसे जाने कि किस पर भरोसा रखना है? क्योंकि भरोसा पहले भी टूट चुका है, इसलिये स्वयं को मार्गदर्शन के लिये किस प्रकार से खोलें?
अच्छे सम्बन्धों का महत्व क्यों होता है
यदि आप ने अपना अधिकाँश जीवन यही अनुभव करते हुए बिताया है कि आप को केवल स्वयं पर ही निर्भर करना पड़ता है, तब औरों से सहायता खोजना असुविधाजनक लग सकता है। हो सकता है कि अतीत में आप को निराशा ही मिली हो। हो सकता है कि आप को सिखाया गया है कि आहत होने के लिये भेद्य होना एक दुर्बलता है। हो सकता है कि लोगों पर भरोसा रखने से आप को निराशा मिली हो इसलिये आप ने स्वयं को समझा लिया है कि केवल अपने पर भरोसा रखने में ही सुरक्षा है।
परन्तु अकेलापन कोई उत्तर नहीं है। परमेश्वर ने हमें सम्बन्धित रहने के लिये रचा है।
अच्छे सम्बन्धों से हमें यह प्राप्त होता है:
– बुद्धिमानी – कोई भी सब कुछ नहीं जानता है। एक दृढ़ मार्गदर्शक आप को मार्गदर्शन दे सकता है, चुनौतियों में से विश्वास और बुद्धमानी से होकर निकलने में सहायता कर सकता है।
– प्रोत्साहन – जीवन कठिन है। जब लोग आपके साथ होते हैं, तब आप को ध्यान रहता है कि आप अकेले नहीं हैं।
जवाबदेही – हम सभी को ऐसे लोगों की आवश्यकता होती है जो हमें सही चुनाव करने के लिये चुनौती दें, तब भी जब यह कठिन हो।
– चँगाई – हम जिन घावों को स्वयं ठीक नहीं कर सकते हैं, परमेश्वर बहुधा उन्हें चँगा करने के लिये सम्बन्धों के द्वारा कार्य करता है।
सही मार्गदर्शक ढूँढ़ना
एक मार्गदर्शक वह व्यक्ति होता है जो आप से पहले उस मार्ग पर चल चुका हो—कोई बुद्धिमान, अनुभवी, और विश्वास में दृढ़ नींव वाला व्यक्ति। सही मार्गदर्शक आप को परमेश्वर की ओर संकेत करेगा, केवल अपने व्यक्तिगत अनुभवों पर आधारित परामर्श नहीं देगा।
तो, आप किसी अच्छे मार्गदर्शक को किस प्रकार खोज सकते हैं?
पहला, इसके बारे में प्रार्थना करें। परमेश्वर से माँगें कि सही लोगों को आपके जीवन में लाए। उसे पता है कि वास्तव में आप को किस की और कब आवश्यकता है।
दूसरा, किसी ऐसे को खोजिये जिसका जीवन मसीह को प्रतिबिंबित करता है। मार्गदर्शक का सिद्ध होना अनिवार्य नहीं है, परन्तु उन्हें ऐसा होना चाहिए जो सक्रिय होकर परमेश्वर के खोजी रहता है और अपने विश्वास को जी कर दिखाता है।
तीसरा, सीखने के लिये तैयार रहें। एक मार्गदर्शक तब ही सहायता कर सकता है, यदि आप मार्गदर्शन को स्वीकार करने के लिये तैयार हों। नम्रता ही कुँजी है—कभी-कभी उनका परामर्श आप को चुनौती दे सकता है, परन्तु बढ़ोतरी के लिये सीखने को तैयार रहना अनिवार्य है।
यदि आप निश्चित नहीं हैं कि मार्गदर्शक कहाँ मिलेगा, तो अपनी कलीसिया, छोटे समूह, या समुदाय में देखिये। परमेश्वर बहुधा सही लोगों को हमारे जीवनों में रखता है—हमें बस, उन्हें पहचानने के लिए इच्छुक होना चाहिए।
अच्छे मित्र-सम्बन्ध बनाना
मार्गदर्शकों के अतिरिक्त, धर्मी मित्र साथ होना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। आप जिन लोगों के साथ सबसे अधिक समय बिताएँगे, वे आपकी मानसिकता, आदतों, और आत्मिक वृद्धि को आकार देंगे।
1 कुरिन्थियों 15:33 सचेत करता है, “धोखा न खाना, ‘बुरी संगति अच्छे चरित्र को बिगाड़ देती है।‘”
गलत सम्बन्ध आप को परमेश्वर से दूर खींच सकते हैं। वे बुरी आदतों को बढ़ावा दे सकते हैं, नकारात्मकता को पोषित कर सकते हैं, और आप को हताश अनुभव करवा सकते हैं। परन्तु सही मित्र-सम्बन्ध आप को उठाएँगे, परमेश्वर के सत्य याद दिलाएँगे, और बढ़ोतरी के लिये चुनौती देंगे।
यदि आप ने लोगों पर भरोसा रखने के साथ संघर्ष किया है, तब मित्र बनाना कठिन लग सकता है। परन्तु परमेश्वर नहीं चाहता है कि आप जीवन को अकेले ही निभाएँ। वह चाहता है कि आप का एक समुदाय हो—ऐसे लोगों का समूह जो आप के साथ खड़ा रहे, प्रार्थना करे, और जीवन में आप के साथ होकर चले।
तो, आप अच्छे सम्बन्ध किस प्रकार बना सकते हैं?
आप जैसा मित्र चाहते हैं, किसी और के लिये वैसा ही मित्र बनने के द्वारा आरम्भ करें। यदि आप दयालु, विश्वासयोग्य, और धर्मी मित्र चाहते हैं, तो औरों के लिये उस प्रकार का मित्र बनिये।
उन लोगों के साथ जो आप के विश्वास को प्रोत्साहित करते हैं, समय बिताने का निर्णय लें। किसी बाइबल अध्ययन, छोटे समूह, या सेवकाई के साथ जुड़िये, जहाँ पर आप अन्य ऐसे लोगों से मिल सकते हैं जो आप के समान आत्मिक विचार रखते हैं।
मित्रता में समय लगता है, परन्तु जब आप ऐसे सम्बन्धों के खोजी होंगे जो उसे आदर देते हैं, तब परमेश्वर आप के जीवन में सही लोगों को लेकर आएगा।
हानिकारक सम्बन्धों से बचकर रहना
आवश्यक नहीं कि प्रत्येक सम्बन्ध आप के लिये भला हो। कुछ लोग आप को क्षीण कर देते हैं, आप की असुरक्षाओं को पोषित करते हैं, या आप को परमेश्वर से दूर खींच लेते हैं। यदि आप ने अतीत में त्यागे जाने या तिरस्कृत होने के साथ संघर्ष किया है, तो सम्भव है कि आप स्वयं को बुरे सम्बन्धों की ओर आकर्षित होते हुए पाएँ—ऐसे जो आहत होने के उसी चक्र को फिर से दोहराएँगे।
परन्तु परमेश्वर आप के लिये बेहतर चाहता है।
एक स्वस्थ सम्बन्ध:
– आप को बढ़ाता है, न कि हानि पहुँचाता है।
– आप को परमेश्वर के निकट लाता है, न कि दूर ले जाता है।
– बढ़ोतरी को प्रोत्साहित करता है न कि बुरी आदाओं को पोषित करता है।
यदि कोई सम्बन्ध हानिकारक हो—वह चाहे मित्रता हो, प्रेम सम्बन्ध हो, या चाहे पारिवारिक सम्बन्ध हो—परमेश्वर से सामर्थ्य माँगे कि उससे दूर हट सकें।
परमेश्वर ने आप को ऐसे सम्बन्धों के लिए रचा है जो उसके प्रेम को दिखाते हैं। इससे कम किसी भी बात को स्वीकार न करें।
सम्बन्धों के लिए परमेश्वर की योजना पर भरोसा रखना
यदि अतीत में आप आहत हुए हैं, तो फिर से भरोसा करना जोखिम भरा लग सकता है। हो सकता है कि आप ने पहले भी टूटे हुए सम्बन्धों को अनुभव किया है, और आप स्वयं को फिर से उनके प्रति खुला हुआ होने से डरते हैं। हो सकता है कि आप सोचते हों कि क्या मैं कभी अच्छे और सही लोगों को पा सकूँगा, जो वास्तव में परवाह करते हैं।
परन्तु परमेश्वर बहाली का परमेश्वर है।
वह आप के मन को जानता है। वह आप के संघर्षों को देखता है। और वह सही लोगों को आप के जीवन में लाने के लिए पर्याप्त से अधिक सक्षम है।
यिर्मयाह 29:11 हमें याद दिलाता है कि हमारे लिये परमेश्वर की योजनाएँ भली हैं। इसमें वे लोग भी सम्मिलित हैं, जिन्हें परमेश्वर हमारे जीवनों में लाता है। वह आपको अकेला, दिशाहीन, या बिना सहारे के कभी नहीं छोड़ेगा। वह पृष्ठभूमि में कार्य कर रहा है, और ऐसे सम्बन्धों को तैयार कर रहा है जो आप के विश्वास तथा भविष्य को और दृढ़ करेंगे।
परन्तु पहला कदम आप को उठाना पड़ेगा।
समुदाय के प्रति खुले बनें। फिर से भरोसा करने के इच्छुक बनें। प्रक्रिया के प्रति धीरज रखें। परमेश्वर विश्वासयोग्य है, वह सही लोगों को सही समय पर लेकर आएगा।
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चर्चा: परमेश्वर की योजना पर भरोसा रखने के लिये, आप क्या कदम उठा सकते हैं?
- क्या पिछली चोटों के कारण आप लोगों पर भरोसा करने के लिये संघर्ष करते हैं? इसके कारण आप के सम्बन्धों पर क्या प्रभाव आया है?
- किसी मार्गदर्शक या धर्मी मित्र में आप को किन गुणों को खोजना चाहिये?
- स्वयं को धर्मी लोगों से घेरे रखने के द्वारा, आप को, अपने विश्वास में बढ़ने में, किस प्रकार सहायता मिल सकती है?
- अच्छे सम्बन्धों और अपने भविष्य के लिये परमेश्वर की योजनाओं पर भरोसा रखने के लिये, आज आप क्या कदम उठा सकते हैं?
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अन्तिम विचार
अच्छे सम्बन्धों और मार्गदर्शकों को खोजने का अर्थ केवल आप के आस-पास कुछ लोगों का होना मात्र ही नहीं है—यह एक सहारा देने वाला ऐसा ढाँचा बनाए रखना है जो आप के जीवन के लिये परमेश्वर की योजना के साथ सुसंगत हो।
आप को अकेले ही जीवन का निर्वाह नहीं करना है। परमेश्वर ने आप के साथ चलने, आप को प्रोत्साहित करने, और बढ़ोतरी में आप की सहायता करने के लिये लोगों को तैयार करके रखा हुआ है।
इसलिये, एक कदम बढ़ाइए। सही सम्बन्धों के लिये अपने मन को खोलिये। डर को जाने दीजिये और भरोसा रखिये कि परमेश्वर सही समय पर सही लोगों को लेकर आएगा।
आप का भविष्य अकेले रहकर जीवन जीना नहीं है। परमेश्वर ने आप को समाज के लिये नियोजित किया है। और वह आपको वह सभी उपलब्ध करेगा जो आप को चाहिये।
लेखक के बारे में
CHRISTIAN LINGUA टीम विश्व की सबसे बड़ी मसीही अनुवाद एजेंसी है, जो विश्वभर में वीडियो, ऑडियो और मीडिया परियोजनाओं के लिए अनुवाद और ओवरडब सेवाएँ प्रदान करती है।
विषयसूची
- भाग I: पिता घाव को समझना
- कुँजी वचन: भजन 68:5
- पिता की अनुपस्थिति का पहचान और मानसिक बढ़ोतरी पर प्रभाव
- “पिता घाव” का अर्थ क्या होता है?
- पिता की अनुपस्थिति व्यक्ति की पहचान पर किस प्रकार प्रभाव डाल सकती है
- पिता की अनुपस्थिति की भावनात्मक कीमत
- तिरस्कृत होने की भावनाएँ
- औरों पर भरोसा रखना कठिन हो सकता है।
- क्रोध या रोष की समस्याएँ
- अपने दुःख को आप की पहचान को परिभाषित न करने दें
- दुःख उठाना आप को बदलता है, परन्तु वह आप के जीवन का मार्ग निर्धारित नहीं करता है।
- वे झूठ, जो पीड़ा हम से बोलती है
- चँगाई सत्य के साथ आरम्भ होती है
- अपने अतीत की बेड़ियों से बच निकलिये
- आप की कहानी अभी आरम्भ हुई ही है
- फिर से भरोसा करना सीखना
- चर्चा: पिता के बिना बड़े होना कितना कठिन है?
- भाग II: परमेश्वर, हमारा सिद्ध पिता
- कुँजी वचन: 2 कुरिन्थियों 6:18
- उस पिता में सुरक्षा पाना जो कभी नहीं छोड़ता है
- परमेश्वर का प्रेम स्थिर और अटल है
- एक ऐसा पिता जो मार्गदर्शन करता और सुरक्षा देता है
- परमेश्वर के प्रेम के द्वारा पिता-घावों से चँगा होना
- परमेश्वर पर पिता के रूप में भरोसा करना सीखना
- स्वयँ को परमेश्वर की सन्तान के समान देखना
- आप परमेश्वर के हैं
- हमें परमेश्वर का प्रेम परिभाषित करता है, हमारी पीड़ा नहीं
- परमेश्वर को पिता जानने के द्वारा चँगाई
- परमेश्वर की सन्तान होने का जीवन जीना
- 1. आप अनुमोदन के लिये परिश्रम करना बन्द कर देते हैं।
- 2. आप आत्मविश्वास के साथ चलते हैं
- 3. आप भरोसा रखते हैं कि आप के लिये प्रावधान कर दिए गए हैं
- चर्चा: परमेश्वर को पिता जान लेने से चँगाई किस तरह आ सकती है?
- भाग III: क्रोध, रोष, और असुरक्षा पर विजयी होना
- कुँजी वचन: इफिसियों 4:31-32
- क्रोध और बैर को साथ लिए चलना
- कड़वाहट को थामे रखना हमें और अधिक दु:ख कैसे देता है
- चँगाई की प्रक्रिया में क्षमा करने का महत्व
- आत्म-धारणा और असुरक्षाओं पर विजयी होना
- अतीत से स्वतन्त्र हो जाना
- क्षमा करने और विश्वास में आगे बढ़ने के कदम
- कदम 1: पीड़ा के बारे में ईमानदार हों
- कदम 2: क्षमा करना चुनें, तब भी जब यह असम्भव प्रतीत हो
- कदम 3: परमेश्वर पर न्याय करने के लिये भरोसा रखिये
- कदम 4: पीड़ा को परमेश्वर को सौंप दें
- कदम 5: स्वतन्त्रता में चलें
- चर्चा: आप पीड़ा को परमेश्वर को कैसे समर्पित कर सकते हैं?
- भाग IV: परमेश्वर के साथ एक दृढ़ भविष्य बनाना
- कुँजी वचन: यिर्मयाह 29:11
- अतीत से स्वतन्त्र हो जाना
- नकारात्मक चक्रों को तोड़ना
- अपने भविष्य को परमेश्वर को समर्पित करना
- एक मसीह-केन्द्रित जीवन बनाना
- सन्देह और डर से चँगाई
- परमेश्वर के समय पर भरोसा रखना
- भरोसे के साथ आगे बढ़ना
- अच्छे मार्गदर्शक और सम्बन्ध खोजना
- अच्छे सम्बन्धों का महत्व क्यों होता है
- सही मार्गदर्शक ढूँढ़ना
- अच्छे मित्र-सम्बन्ध बनाना
- हानिकारक सम्बन्धों से बचकर रहना
- सम्बन्धों के लिए परमेश्वर की योजना पर भरोसा रखना
- चर्चा: परमेश्वर की योजना पर भरोसा रखने के लिये, आप क्या कदम उठा सकते हैं?
- अन्तिम विचार
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