#13 परमेश्वर की योजना के अनुसार विवाह
परिचय
मुझे ठीक से स्मरण नहीं है कि मैं अपनी पत्नी जूली से कब मिला था। परन्तु मुझे एक क्षण स्मरण है।
यह 1972 का प्रेम दिवस था, जब हम हाई स्कूल के अन्तिम वर्ष में थे। मैंने उसे हाथ से बना हुआ एक कार्ड दिया, जिस पर लिखा हुआ था: “आनन्द वस्तुओं में नहीं होता, वह हम में होता है… और विशेष रूप से तुम में।”
यह एक मार्मिक भावना थी, जिसका उद्देश्य एक ऐसी लड़की को उत्साहित करना था जो थोड़ी अंतर्मुखी लग रही थी। उच्च कक्षा के अध्यक्ष और संगीत मण्डली के सहायक कलाकार, और (मेरे अपने विचार में) मुझे सच में पसन्द किए जाने वाले लड़के के रूप में, मैंने सोचा कि जूली मेरे द्वारा दिया गया कार्ड पाकर सम्मानित होने का अनुभव करेगी। ठीक वैसे ही जैसे शेष 16 लड़कियों ने किया जिन्हें एक-एक कार्ड मिला था।
वे लड़कियाँ प्रभावित हुईं या नहीं, यह मैं कभी नहीं जान पाऊँगा। परन्तु जूली ने वास्तव में उत्तर दिया। उसने मुझे एक लम्बा पत्र लिखा, जिसमें उसने बताया कि वह मुझे बहुत अधिक पसन्द करती है। परन्तु मेरा उद्देश्य इस कार्ड को देकर किसी गहरे सम्बन्ध की ओर बढ़ने का नहीं था। कम से कम जूली के साथ तो नहीं। इसलिए मैं उसके आसपास अटपटा व्यवहार करने लगा और एक समय तो मैंने उसके लिए एक गीत भी लिखा, जो इस प्रकार से था “तुम वही मार्ग चुनो, जिस पर तुम जाना चाहती हो।” मैं तुम्हें बहुत लम्बी-चौड़ी बात नहीं लिखना चाहता परन्तु मुख्य बात यह है कि “मुझे तुम्हारा मित्र बने रहने में कोई आपत्ति नहीं है, परन्तु तुम्हारा प्रेमी बनने में है।”
परन्तु जूली निरन्तर प्रयास करती रही और अंततः उसने मुझे मना ही लिया, इसका एक कारण यह भी था कि वह बहुत अच्छी ब्राउनी मिठाई बनाती थी और उसके पास एक कार भी थी। उन गर्मियों में हमने मिलना-जुलना आरम्भ कर दिया और शरद ऋतु में मैं टेम्पल विश्वविद्यालय चला गया, जबकि वह एक ऐसे प्रतिष्ठान में कार्य करने के लिए चली गई, जहाँ घोड़ों को प्रजनन के लिए रखा जाता है।
एक वर्ष के पश्चात् उसने भी टेंपल विश्वविद्यालय में आवेदन किया और उसे भी विश्वविद्यालय के ओर से स्वीकृति मिल गई थी। हम अभी भी आपस में मिल-जुल रहे थे, पर मुझे सन्देश था कि क्या वह “वही” जूली है। इस सन्देह के कारण मैंने धन्यवाद दिवस के दिन उसे फिल्म “द वे वी वेयर” दिखाने ले जाने के ठीक बाद उससे सम्बन्ध तोड़ दिया। जो कि एक बहुत ही उत्कृष्ट फिल्म थी।
अगले दो वर्षों में, हमारी अधिकाँश बातचीत इसी विषय पर आधारित रही कि मैं उसे प्रभु में आनन्दित रहने (तब तक हम दोनों मसीही बन चुके थे) और कहीं और प्रेम सम्बन्ध ढूँढने के लिए कहता रहा। परन्तु समय के साथ, परमेश्वर ने जूली के द्वारा मेरे गहरे और व्यापक अहंकार को उजागर किया। मैं चाहता था कि वह 10 में से 10 हो जबकि मैं स्वयं मात्र 3 के बराबर था। मुझे समझ आने लगा कि मेरे लगातार इनकार के बाद भी जूली जैसा प्रेम मुझे किसी से नहीं मिला था। कोई भी मेरे प्रति इतना अधिक विश्वासयोग्य, उत्साह देने वाला या उदार हृदय वाला नहीं था। और जब मैं प्रभु के साथ निकटता में चल रहा था, तो यह स्पष्ट प्रतीत हुआ कि मुझे उससे विवाह करना चाहिए।
अतः हमारे सम्बन्ध टूटने के दो वर्ष बाद, फिर उसी धन्यवाद दिवस के दिन मैंने जूली से विवाह के लिए पूछा। अद्भुत ढँग से उसने “हाँ” कह दिया। पाँच दशकों से भी अधिक समय के बाद, मैं पहले से कहीं अधिक आभारी हूँ कि उसने ऐसा किया।
मैं इस कहानी का आरम्भ इसलिए कर रहा हूँ ताकि यह सच्चाई सामने आ सके कि परमेश्वर निराशाजनक सम्बन्धों को अपनी महिमा के लिए परिवर्तित करना पसन्द करता है। वह हमारी कमियों, पापों, निर्बलताओं और अन्धेपन से न तो भयभीत होता है और न ही आश्चर्यचकित होता है। इसके विपरीत, उसके बुद्धिमान और प्रभुता सम्पन्न हाथों में ये सब कमियाँ वह साधन बन जाते हैं जिनके द्वारा वह अपना कार्य पूरा करता है। जिस प्रकार कोई भी विवाहित जोड़ा अपने आप में पूर्ण नहीं होता, ठीक उसी प्रकार कोई भी जोड़ा अपूरणीय नहीं होता है।
हो सकता है कि आप अविवाहित हों, या हाल ही में विवाह किया हो, या कुछ वर्ष पहले विवाह किया होगा। हो सकता है कि आप हनीमून पर रोमांच का आनन्द ले रहे हों, या पहले से ही अपने वैवाहिक सम्बन्ध को और अधिक दृढ़ करना चाहते हों। या फिर आप यह सोच रहे होंगे कि पति-पत्नी बनना उतना आसान नहीं है जितना कि बताया जाता है। सम्भवतः आप बड़ी उतावली से आशा लगाए बैठें होंगे और इधर-उधर जीवन साथी ढूँढ रहे होंगे और साथ ही यह भी सोच रहे हैं कि आप कितने समय तक सम्भले रह पाएँगे।
आप किसी भी परिस्थिति में हों, परन्तु मेरी प्रार्थना है कि यह क्षेत्रीय मार्गदर्शिका आपको वर्तमान या भविष्य के जीवन साथी के रूप में नया विश्वास दे और आपको परमेश्वर की उस बुद्धि और भलाई पर अचम्भित कर दे, जिसने इस सम्बन्ध को रचा है जिसे हम “विवाह” कहते हैं।
हमारे वर्तमान सांस्कृतिक समय में विवाह हर ओर से आक्रमण के अधीन है। लोग इस बात को लेकर असमंजस और दुविधा में हैं कि कौन विवाह कर सकता है, विवाह में कितने लोग सम्मिलित हो सकते हैं, और क्या विवाह करना वास्तव में आवश्यक है या इच्छा पर निर्भर है। इसलिए हम एकमात्र अधिकारपूर्ण, विश्वसनीय और अनन्त स्रोत की ओर देखेंगे: अर्थात् परमेश्वर के वचन की ओर। ये चार बाइबल आधारित सत्य उन सभी बातों में अगुवाई करेंगे जिन्हें हम आगे देखेंगे।
विवाह परमेश्वर की ओर है
यदि विवाह की रचना मनुष्य ने की होती, तो हमें इसे परिभाषित करने का भी अधिकार होता। परन्तु परमेश्वर ने विवाह की स्थापना की, जैसा कि यीशु ने कहा, “सृष्टि के आरम्भ से” (मरकुस 10:6)। स्वयं परमेश्वर ने प्रथम विवाह की अध्यक्षता की। और उत्पत्ति के आरम्भिक पृष्ठों में हम देख सकते हैं कि विवाह की रचना परमेश्वर ने किस उद्देश्य से की थी।
- विवाह केवल दो लोगों के बीच होता है। परमेश्वर ने प्रथम पहले जोड़े को अपने स्वरूप में बनाया, “नर और नारी करके उसने उनकी रचना की” (उत्पत्ति 1:27)। उसने तीन या चार लोगों के समूह से आरम्भ नहीं किया। यद्यपि सन्तान होने के बाद विवाह एक परिवार या समुदाय बन जाता है, फिर भी विवाह का बन्धन विशेष रूप से दो ही व्यक्तियों के बीच में होता है। आदम और हव्वा के थोड़े ही समय बाद बहुविवाह की प्रथा (उत्पत्ति 4:19) केवल यह दर्शाती है कि पाप किस प्रकार से मनुष्य के हृदय में व्यापक रूप से फैल गया था। यही विशेषता और एक सीमा निर्धारित करने का कारण है कि परमेश्वर विवाह के वाचा से बाहर व्यभिचार, विवाह से पहले शारीरिक सम्बन्ध और यौन गतिविधियों के अन्य रूपों को अवैध, विनाशकारी और अपनी योजना के विरुद्ध मानता है (नीति. 5:20–23; 6:29, 32; 7:21–27; 1 कुरि. 7:2–5; 1 थिस्स. 4:3–7; इब्रा. 13:4)।
- विवाह में दो विपरीत लिंग के सदस्य सम्मिलित होते हैं। विवाह करने वाले दो व्यक्ति एक समान नहीं होते हैं। विवाह दो पुरुषों या दो स्त्रियों से आरम्भ नहीं हुआ था। परमेश्वर ने आदम की पसली से “एक स्त्री बनाई और उसे आदम के पास लाया” (उत्पत्ति 2:22)। पुरुष एवं स्त्री का अपने समान लिंग के सदस्यों के साथ गहरा, और सार्थक सम्बन्ध हो सकता है, परन्तु परमेश्वर की दृष्टि में इसे कभी भी विवाह नहीं कहा जा सकता है।
- विवाह के द्वारा परमेश्वर जीवनभर के लिए एक जोड़े को जोड़ता है। जब यीशु ने फरीसियों से कहा कि पति और पत्नी “एक तन” हैं (उत्पत्ति 2:24 को उद्धृत करते हुए), तो उसने आगे यह भी कहा: “इसलिए जिसे परमेश्वर ने जोड़ा है, उसे मनुष्य अलग न करे।” (मरकुस 10:9)। परमेश्वर ने आदम और हव्वा को तब तक के लिए नहीं जोड़ा जब तक वे दोनों “प्रेम में” रहें, वरन् तब तक के लिए जोड़ा जब तक कि वे दोनों जीवित रहे।
- विवाह में विशेष भूमिकाएँ होती हैं। पुरुष और स्त्री की भिन्न-भिन्न भूमिकाएँ होती हैं, और विशेष रूप से पति और पत्नी की भूमिकाएँ जो पतन से पहले ही परमेश्वर के द्वारा स्थापित कर दी गई थीं (उत्पत्ति 3:6)। आदम और हव्वा दोनों को परमेश्वर के स्वरूप में बनाया गया था और उन्होंने “पृथ्वी को भर दो और उसको अपने वश में कर लो” (उत्पत्ति 1:28) परमेश्वर की आज्ञा का पालन करने में दोनों ने समान रूप से महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, फिर भी उनके पास विशेष उत्तरदायित्व थे।
उत्पत्ति 2:15 में परमेश्वर ने आदम को बगीचे में काम करने और रखवाली करने की आज्ञा दी, परन्तु उसे यह कार्य अकेले करने के लिए नहीं छोड़ा। परमेश्वर ने उसे हव्वा दी, जो उसके लिए “एक उपयुक्त सहायक” थी (उत्पत्ति 2:18)। कुछ लोगों ने यह सुझाव दिया है कि, क्योंकि कभी-कभी परमेश्वर का वर्णन “सहायक” के रूप में किया गया है (निर्गमन 18:4; होशे 13:9), इसलिए यह शब्द पुरुषों और स्त्रियों दोनों के लिए समान रूप से प्रयोग किया जा सकता है। परन्तु आदम को कभी भी हव्वा का सहायक नहीं कहा गया है, इस कारण उसे एक विशेष अगुवाई करने की भूमिका दी गई थी। आदम पहले रचा गया था (उत्पत्ति 2:7), उसे बगीचे में काम करने और देखभाल करने का उत्तरदायित्व सौंपा गया था (उत्पत्ति 2:15), उसने पशुओं और अपनी पत्नी का नाम रखा (उत्पत्ति 2:20, 3:20), और उसे यह भी कहा गया कि वह उस दिन की पहले से प्रतीक्षा करते हुए अपने माता-पिता को छोड़ दे कि जब उनकी भी वही अभिभावक वाली भूमिका होगी जो उनके अपने पुरुष साथियों की पहले से ही है। (उत्पत्ति 2:24)।
नए नियम में उन भेदों की पुष्टि के साथ स्पष्टीकरण दिया गया है (इफिसियों 5:22-29; कुलुस्सियों 3:18-19; 1 तीमुथियुस 2:13; 1 कुरिन्थियों 11:8-9; 1 पतरस 3:1-7) परमेश्वर के सामने पति-पत्नी की स्वीकृति, समानता या मूल्य में कोई भेद नहीं है, जैसा कि पौलुस ने गलातियों 3:28 में स्पष्ट किया है। परन्तु पत्नी को अपने पति का अनुसरण करने और उसे सहयोग देने का विशेष आनन्द और उत्तरदायित्व प्राप्त है, ठीक उसी प्रकार पति को भी अपनी पत्नी की अगुवाई करने, उससे प्रेम करने और उसकी देखभाल करने का विशेष अधिकार प्राप्त है।
विवाह अच्छा है
हो सकता है कि आप ऐसे परिवार में पले-बढ़ें हों जहाँ आपके माता-पिता लगातार लड़ते रहे हों। या हो सकता है कि आप एक बुरे तलाक के कारण उत्पन्न हुए विनाश के घावों को ढो रहे हों। या यह भी सम्भव है कि आप बहुत से ऐसे विवाहित लोगों को न जानते हों जो आनन्दित रहते हैं। जिस वर्ष मेरी और जूली का विवाह हुआ, उसी वर्ष मेरे माता-पिता, और उसके माता-पिता तथा हमारे पास्टर साहब, सब का तलाक हो गया। इस घटना से हमारे नए जीवन के लिए हमारा विश्वास बिल्कुल भी दृढ़ न हो सका!
परन्तु परमेश्वर कहता है, “जिस ने स्त्री ब्याह ली, उसने उत्तम पदार्थ पाया, और यहोवा का अनुग्रह उस पर हुआ है” (नीतिवचन 18:22)। विवाह एक आशीष है और परमेश्वर के अनुग्रह का प्रतीक है। इसीलिए जब प्रभु ने आदम को बगीचे में अकेला देखा तो उसने कहा, “आदम का अकेला रहना अच्छा नहीं; मैं उसके लिये एक ऐसा सहायक बनाऊँगा जो उसके लिये उपयुक्त होगा” (उत्त्पत्ति 2:18) आदम को यह पता ही नहीं था कि उसे किसी अन्य व्यक्ति की आवश्यकता है। परन्तु परमेश्वर इस बात को जानता था। वह जानता है कि हर मनुष्य को उस संगति, सलाह, निकटता और फलदायी जीवन से लाभ होगा जो विवाह के द्वारा आता है। हमने भले ही चाहे अपने जीवन में कितने भी बुरे उदाहरण देखे या अनुभव किए हों, परन्तु विवाह फिर भी अच्छा है, क्योंकि यह परमेश्वर की योजना है।
विवाह एक दान है
जब यीशु ने फरीसियों से कहा कि परमेश्वर ने व्यभिचार के अलावा तलाक देने से मना किया है, तो उसके शिष्यों को बहुत आश्चर्य हुआ। उन्होंने सोचा कि यीशु मानकों को बहुत ऊँचे स्तर पर तय कर रहा है। “यदि पुरुष का स्त्री के साथ ऐसा सम्बन्ध है, तो विवाह करना अच्छा नहीं।” परन्तु यीशु ने और भी दृढ़ता से कहा: “सब यह वचन ग्रहण नहीं कर सकते, केवल वे जिनको यह दान दिया गया है। जो इसको ग्रहण कर सकता है, वह ग्रहण करे” (मत्ती 19:10-12 एवं 1 कुरिन्थियों 7:7 की तुलना करें)।
विवाह में उन्नति करने की योग्यता परमेश्वर का वह वरदान है, जो वह उन्हें देता है जो इसे ग्रहण करने के लिए तैयार हैं। यह कोई ऐसी वस्तु नहीं है जिसे प्राप्त किया जा सके या जिसकी माँग की जा सके। इसे न तो अर्जित किया जा सकता है और न ही इसके लिए सौदेबाज़ी की जा सकती है। साथ ही, इसका अर्थ बोझ, समस्या या डरने जैसी कोई बात नहीं है। यह एक बुद्धिमान, भले और प्रेमी पिता की ओर से अनुग्रह के साथ दिया गया दान है, जो भली-भाँति जानता है कि हमें क्या चाहिए।
विवाह महिमामय है
यदि विवाह वास्तव में सब कुछ वही है जो अब तक हमने कहा है — अर्थात् परमेश्वर की ओर से एक अच्छा वरदान — इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि विवाह महिमामय है। निश्चय ही, अपने मन में हमें “है” के स्थान पर “होना चाहिए” रख सकते हैं। क्या हम सच्चाई से कह सकते हैं कि विवाह अपने आप में महिमामय है? हाँ, बिल्कुल है। एक पुरुष और एक स्त्री को, जो अपने-अपने पतन और पाप से प्रभावित हैं, एक-दूसरे की सेवा करने, समर्पित होने, देखभाल करने, सहारा देने, यौन सन्तुष्टि प्रदान करने, प्रेम करने और एक-दूसरे के प्रति विश्वासयोग्य बने रहने में जीवन भर की वाचा निभाते हुए देखना एक अद्भुत, आश्चर्यजनक, और सच में महिमामय है।
परन्तु विवाह का अद्भुत होने का सबसे बड़ा और सबसे अद्भुत कारण विवाह में नहीं, वरन् उसके प्रतिनिधित्व में छिपा होता है। और यही कारण अगले प्रश्न की ओर ले जाता है जिस पर हम विचार करेंगे कि: विवाह किस लिए होता है?
चर्चा एवं मनन:
- क्या इस खण्ड ने आपके लिए यह स्पष्ट करने में सहायता की है कि विवाह क्या है? क्या आप ऐसे किसी विवाहित दम्पत्ति के विषय में जानते हैं जो इस प्रकार के विवाह को पूरी विश्वासयोग्यता के साथ से निभाते हैं?
- क्या आप अपने शब्दों में समझा सकते हैं कि विवाह क्यों परमेश्वर का दिया हुआ एक अच्छा और महिमामय दान है?
ऑडियो मार्गदर्शिका
ऑडियो#13 परमेश्वर की योजना के अनुसार विवाह
1 भाग 1:
विवाह क्या है?
हमने परमेश्वर के वचन में बताए गए विवाह की चार विशेषताओं पर संक्षेप में चर्चा की है। परन्तु हमने विवाह के उद्देश्य पर बात करने से पहले थोड़ी प्रतीक्षा की है। इन सबका क्या अर्थ है? क्यों परमेश्वर ने सबसे पहले विवाह की स्थापना की?
कलीसिया के साथ मसीह के सम्बन्ध को दर्शाने के लिए
हम पुराने नियम में हर स्थान पर यह चिन्ह देखते हैं कि विवाह परमेश्वर और उसके लोगों के सम्बन्ध का एक रूप है। भविष्यद्वक्ता यशायाह इस्राएल को यह स्मरण कराकर उत्साहित करता है कि, “तेरा कर्ता तेरा पति है” (यशायाह 54:5)। यिर्मयाह की पुस्तक में परमेश्वर इस्राएल के विश्वासघात को कठोर शब्दों में व्यभिचार और वेश्या के समान आचरण करना कहकर सम्बोधित करता है (यिर्मयाह 3:8)। फिर भी भविष्यद्वक्ता होशे ने इस्राएल को भरोसा दिलाया कि परमेश्वर हमेशा के लिए उनसे विवाह कर लेगा (होशे 2:19–20)।
परन्तु जब तक हम नए नियम तक नहीं पहुँचते तब तक परमेश्वर उस “भेद” को पूरी रीति से प्रकट नहीं करता जो मसीह के आने तक छिपा हुआ था: विवाह यीशु और उसकी दुल्हन, अर्थात कलीसिया के बीच के सम्बन्ध को दर्शाता है।
जैसे कि पौलुस लिखता है, “इस कारण पुरुष माता-पिता को छोड़कर अपनी पत्नी से मिला रहेगा, और वे दोनों एक तन होंगे।” यह भेद तो बड़ा है; पर मैं मसीह और कलीसिया के विषय में कहता हूँ” (इफिसियों 5:31-32)।
जब परमेश्वर ने यह बताना चाहा कि मसीह का उन लोगों के साथ सम्बन्ध कितना गहन, सुन्दर, शक्तिशाली और अटल है जिन्हें उसने छुटकारा दिलाया है, तब उसने विवाह की स्थापना की। दाम्पत्य जीवन में पति-पत्नी के बीच जीवन भर की वाचा के अतिरिक्त कोई भी सम्बन्ध इस सम्पूर्ण सृष्टि में परमेश्वर के परम उद्देश्य को इतनी परिपूर्णता से प्रदर्शित नहीं करता। यह अनुग्रह के सुसमाचार का एक जीवित, साँस लेता हुआ उदाहरण है।
यह सच है कि परमेश्वर हमारे साथ अपने सम्बन्ध का वर्णन विभिन्न प्रकार से करता है: जैसे अपनी सन्तान के लिए एक पिता (यशायाह 63:16), अपने सेवक के लिए एक स्वामी (यशायाह 49:3), अपने झुण्ड के लिए एक चरवाहा (भजन संहिता 23:1), मित्र के लिए एक मित्र (यूहन्ना 15:15)। परन्तु बाइबल के आरम्भ में और अन्त में यह एक दुल्हन और एक दूल्हा है।
फिर मैंने पवित्र नगर नये यरूशलेम को स्वर्ग से परमेश्वर के पास से उतरते देखा, और वह उस दुल्हन के समान थी, जो अपने दुल्हे के लिये श्रृंगार किए हो।फिर मैंने सिंहासन में से किसी को ऊँचे शब्द से यह कहते हुए सुना, “देख, परमेश्वर का डेरा मनुष्यों के बीच में है; वह उनके साथ डेरा करेगा, और वे उसके लोग होंगे, और परमेश्वर आप उनके साथ रहेगा; और उनका परमेश्वर होगा। और वह उनकी आँखों से सब आँसू पोंछ डालेगा; और इसके बाद मृत्यु न रहेगी, और न शोक, न विलाप, न पीड़ा रहेगी; पहली बातें जाती रहीं” (प्रकाशितवाक्य 21:2-4)
इतिहास के अन्त में हम इतिहास का उद्देश्य देखते हैं। परमेश्वर अंततः अपने लोगों के साथ निवास कर रहा है, और यह एक पति और उसकी दुल्हन — अर्थात् यीशु और कलीसिया है — जो हमेशा-हमेशा के लिए परिपूर्ण एकता का आनन्द उठा रहे हैं।
इस जीवन में प्रत्येक विवाह, चाहे कितना भी भव्य क्यों न हो, आने वाले मेम्ने के विवाह भोज की तुलना में फीका है (प्रकाशितवाक्य 19:9)। विवाह एक ऐसे प्रेम का प्रतिनिधित्व करता है जो बहुत ही अधिक महिमामय, दृढ़, बहुत सामर्थी, अति आनन्दमय है, अर्थात् बहुत ही अधिक सुन्दर है। और यह बात तब और भी स्पष्ट हो जाती है जब हम इसे परमेश्वर के दृष्टिकोण से देखते हैं:
- एक विवाह में, हम दो दोषपूर्ण व्यक्तियों को यह प्रतिज्ञा करते हुए सुनते हैं कि वे एक-दूसरे से जीवन भर प्रेम करेंगे। परमेश्वर देखता है कि यीशु भी अपने लोगों से अनतकाल तक प्रेम करने की प्रतिज्ञा कर रहा है।
- विवाह में हम दो व्यक्तियों को “हाँ” कहते हुए सुनते हैं, यह जाने बिना कि आगे क्या होने वाला है। परन्तु परमेश्वर देखता है कि समय के आरम्भ से पहले ही यीशु ने “हाँ” कहा था, इस बात को भली-भाँति जानते हुए कि आगे क्या होगा।
- विवाह के अवसर में हम एक सुन्दर विवाह और स्वागत समारोह देखते हैं, जो कुछ ही घण्टों में समाप्त हो जाता है। परन्तु परमेश्वर एक अनन्त भोज देखता है, जो आनन्द, शान्ति और प्रेम से भरा हुआ है, जिसमें मसीह और उसकी दुल्हन की एकता में होने का उत्सव का मनाया जाता है, वह दुल्हन जो मसीह के प्रायश्चित के कार्य के द्वारा निर्दोष बनाई गई है (प्रकाशितवाक्य 19:9)।
इसका अर्थ है कि विवाह अंततः हमारे बारे में नहीं है। यह हो ही नहीं सकता, क्योंकि इस जीवन में विवाह अस्थायी होते हैं। यद्यपि प्रेमी एक-दूसरे से सदा सर्वदा के लिए बने रहने की प्रतिज्ञा कर सकते हैं, फिर भी नए आकाश और नई पृथ्वी में “न वे विवाह करेंगे और न विवाह में दिए जाएँगे” (मत्ती 22:30)। पति और पत्नी होना, उस भावना को दर्शाता है जिसमें स्वयं को या अपने उद्देश्य को संसार के ध्यान में लाने का एक अनोखा अवसर मिलता है। इसमें विश्वासयोग्यता, पवित्रता, उत्साह, दया, धैर्य और आनन्द को दर्शाना सम्मिलित होता है, जो यीशु और उन लोगों के बीच के अनन्त सम्बन्ध की विशेषता है, जिनके उद्धार के लिए उसने अपना प्राण दिया।
हमें मसीह के समान और अधिक बनाने के लिए
विवाह कितना महिमामय है, यह स्पष्ट है कि हममें से कोई भी इस कार्य के लिए योग्य नहीं है! यह बात मेरे सम्बन्ध में विशेष रूप से सच थी। मैं अधिकतर अपने विवाह के दिन को स्मरण करता हूँ और सोचता हूँ कि किस बात ने मुझे यह सोचने पर विवश किया था कि मैं विवाह करने के लिए तैयार हूँ। मैं घमण्डी, स्वार्थी, अपरिपक्व, आलसी और भ्रमित था। और यह कहने की आवश्यकता ही नहीं कि मैं निर्धन भी था।
परन्तु परमेश्वर की दया में, वह हमें अपने पुत्र के स्वरूप में ढालने के लिए विवाह का उपयोग करता है (रोमियों 8:29)। हम हमेशा एक समान व्यक्ति नहीं बने रहते हैं। निस्संदेह, जब हम अविवाहित होते हैं तब भी परमेश्वर हमें परिवर्तित कर सकता है। परन्तु विवाह नाना प्रकार की चुनौतियाँ लेकर आता है, जो कभी तो साधारण सी होती हैं जैसे (टॉयलेट पेपर किस दिशा में टाँगना है, किसी स्थान पर कैसे जाना है, “गन्दगी” किसे माना जाए), और कभी महत्वपूर्ण (कहाँ रहना है, किस कलीसिया से जुड़ना है, अपने पैसे कैसे खर्च करने हैं)। जो निर्णय हम पहले अकेले लेते थे, अब उनमें एक और व्यक्ति सम्मिलित हो जाता है। और वह व्यक्ति संयोग से आपके ही बिस्तर पर सोता है!
नए नियम में पतियों और पत्नियों के लिए परमेश्वर की शिक्षाएँ हमें यह सिखाती हैं कि वह किस प्रकार का परिवर्तन हमारे भीतर देखना चाहता है। पत्नियों को अपने पति के अधीन रहना चाहिए और उनका आदर करना चाहिए (इफिसियों 5:22, 33)। पतियों को यह आज्ञा दी गई है कि वे अपनी-अपनी पत्नी से प्रेम करें, उसके लिए अपने आप को समर्पित करें, और उसकी अपनी ही देह के समान स्नेहपूर्वक देखभाल करें (इफिसियों 5:25, 28–29)। पतरस कहता है कि पत्नियों को अपने पतियों के अधीन रहना चाहिए और बाहरी सुन्दरता के स्थान पर आन्तरिक सुन्दरता पर ध्यान देना चाहिए (1 पतरस 3:1-3)। वह कहता है कि पतियों को अपनी पत्नियों को समझने का प्रयास करना चाहिए (बजाय इसके कि वे मान लें कि वे जानते हैं कि उनकी पत्नियाँ क्या सोच रही हैं), और उन्हें परमेश्वर के अनुग्रह की सह-वारिस समझना चाहिए (1 पतरस 3:7)। ये महत्वूर्ण आज्ञाएँ हमारे पुरुष और स्त्री होने के नाते पापपूर्ण झुकावों के विरुद्ध जाती हैं, और साथ ही हमें यह आश्वासन देती हैं कि परमेश्वर हमारे जीवन साथी का उपयोग हमें परिवर्तित करने के लिए करना चाहता है। क्या आप कम स्वार्थी, घमण्डी, क्रोधित, स्वतंत्र, दबंग और धैर्य रहित होने के अवसर खोज रहे हैं? यदि हाँ, तो विवाह कर लीजिए।
परन्तु हमारे पापों का सामना करना ही विवाह में परमेश्वर का हमें परिवर्तित करने का एकमात्र तरीका नहीं है। यह हमें उस प्रकार के प्रेम, दया और अनुग्रह का आदर्श प्रस्तुत करने और स्वयं अनुभव करने का भी अवसर देता है, जिसे मसीह ने हम पर दिखाया है। संगति, क्षमा, प्रोत्साहन और दया के संदर्भ में परमेश्वर हमारे हृदयों को कोमल बनाता है और अपनी आत्मा के द्वारा हमें मसीह की समानता में लाता है।
परमेश्वर के राज्य का विस्तार करने के लिए
अभी तक हमने इस पर चर्चा नहीं की है कि विवाह के उद्देश्य में सन्तान कैसे सम्मिलित होती है। परन्तु सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र में सन्तान को एक प्रतिफल, आनन्द का कारण, और ऐसी वस्तु के रूप में देखा गया है जिसके लिए हमें प्रार्थना करनी चाहिए (भजन संहिता 113:9; 127:3; उत्पत्ति 25:21)। बाँझपन को कभी दुःख का कारण और कभी अनुशासन के संकेत के रूप में वर्णित किया गया है (1 शमूएल 1:6–7; उत्पत्ति 20:18)। परमेश्वर पति-पत्नी को एक साथ इसलिए लाता है ताकि वे फलवन्त हों और बढ़ें, तथा पृथ्वी को अन्य स्वरूप धारण करने वालों से भर दें जो उसे महिमा देंगे (उत्पत्ति 1:22, 28)।
इसका अभिप्राय यह नहीं कि निःसंतान दम्पत्ति पाप कर रहे हैं या परमेश्वर की इच्छा के विरुद्ध हैं। परन्तु कुछ दम्पत्ति गर्भधारण करने में असमर्थ होते हैं। कुछ लोगों ने विभिन्न कारणों से सन्तान उत्पन्न करने में विलम्ब करने का निर्णय लिया है। यह कहना गलत नहीं होगा कि पति-पत्नी को पूर्ण होने के लिए सन्तान उत्पन्न करनी ही होगी। परन्तु परिवार ही शिष्यों के पालन-पोषण के लिए सबसे सुरक्षित और सबसे सन्तोषजनक वातावरण में से एक होता है, जो बड़े होने पर मसीह के राजदूत बनेंगे।
चर्चा एवं मनन:
- क्या इस अध्याय में विवाह के उद्देश्यों में से कोई भी बात आपके लिए नई थी? क्या इनमें से कोई भी उद्देश्य विवाह को समझने में आपकी सहायता कर रहा है?
- यदि आप विवाहित हैं, तो आप इन उद्देश्यों को प्रदर्शित करने का प्रयास कैसे करते हैं? यदि आप अभी तक अविवाहित हैं, तो आप उन्हें प्रदर्शित करने की आशा किस प्रकार से करेंगे?
2 भाग II: विवाह
किस लिए होता है?
सम्भावना है कि इस क्षेत्रीय मार्गदर्शिका को पढ़ने वाले कुछ लोग अविवाहित हो सकते हैं। इसलिए मैं मित्रता और सगाई के बीच के समय के विषय में बात करना चाहता हूँ। कोई व्यक्ति उस सम्भावित असहज, तनावपूर्ण, असुविधाजनक और चिन्ता जनक समय से कैसे निपटता है? क्या यह वास्तव में इतना भ्रमित करने वाला होना चाहिए? क्या इसके लिए कोई बाइबल आधारित प्रक्रिया है?
जैसा कि मेरी कहानी से स्पष्ट है, कि जब मैं और जूली प्रेम से मिलते-जुलते और बातचीत करते थे, तो मुझे इस बात का कोई अनुमान नहीं था कि मैं क्या कर रहा हूँ। परन्तु अपने छह बच्चों को विवाह तक पहुँचाने और सैकड़ों अविवाहित लोगों से बातचीत करने के बाद, अब यह बात पहले से कहीं अधिक स्पष्ट हो गई है!
बाइबल वयस्कों के तीन मूलभूत सम्बन्धों का वर्णन करती है: जैसे मित्रता, सगाई और विवाह। प्रत्येक बात में समर्पण सम्मिलित होता है।
- मित्रता में हम प्रभु और दूसरों की सेवा करने के लिए समर्पित होते हैं।
- सगाई में हम किसी से विवाह करने के लिए समर्पित होते हैं।
- विवाह में, हम पति या पत्नी के रूप में परमेश्वर के उद्देश्यों को पूरा करने के लिए समर्पित होते हैं।
पहली दो श्रेणियों के बीच एक नई श्रेणी बनाने का प्रलोभन होता है। हम इन्हें अनोखे नाम देते हैं: जैसे प्रेम से मिलना-जुलना, प्रेमालाप, अति गहरी मित्रता, पहले से खोजबीन, विशेष मित्र होना, या उद्देश्य के साथ एक-दूसरे से जुड़े रहना।
हम इसे चाहे जो भी नाम दें, यह कोई नई स्थिति नहीं है जिसमें शारीरिक निकटता या एक-दूसरे के कार्यों पर अधिकार रखना जैसी विशेष सुविधाएँ हों। हम एक नए प्रयास में लगे हुए हैं जो हमें परमेश्वर की इच्छा को समझने में योग्य बनाएगा। मुख्य रूप से हम मित्र ही बने रहते हैं जो यह जानने के लिए समर्पित रहते हैं कि क्या यह वही व्यक्ति है जिसके साथ हम अपना जीवन बिताना चाहते हैं या नहीं। यहाँ कुछ सिद्धान्त दिए गए हैं जो हमें खोज करने की इस यात्रा में अगुवाई कर सकते हैं।
मित्र होने का अर्थ जानें
परमेश्वर विशेष रूप से बताता है कि किस प्रकार की मित्रताएँ उसकी महिमा करती हैं, और जब हम यह विचार कर रहे होते हैं कि कोई व्यक्ति भविष्य का जीवन साथी हो सकता है या नहीं, तब भी वे आज्ञाएँ महत्वहीन नहीं होती हैं। परन्तु वे आज्ञाएँ हमारे लिए आधार बन जाती हैं।
- “मित्रों के बढ़ाने से तो नाश होता है, परन्तु ऐसा मित्र होता है, जो भाई से भी अधिक मिला रहता है” (नीतिवचन 18:24)। मित्र आपकी विशेष रूप से और व्यक्तिगत रूप से देखभाल करते हैं।
- “मित्र सब समयों में प्रेम रखता है, और विपत्ति के दिन भाई बन जाता है” (नीतिवचन 17:17)। मित्र चंचल या अवसरवादी नहीं होते। वे कठिन समय में भी साथ में बने रहते हैं।
- “टेढ़ा मनुष्य बहुत झगड़े को उठाता है, और कानाफूसी करनेवाला परम मित्रों में भी फूट करा देता है” (नीतिवचन 16:28)। मित्र एक-दूसरे की चुगली या निन्दा नहीं करते हैं।
- “जो घाव मित्र के हाथ से लगें वह विश्वासयोग्य हैं, परन्तु बैरी अधिक चुम्बन करता है” (नीतिवचन 27:6)। मित्र आपके भले के लिए आपके विषय में सच्चाई बताते हैं।
- “जैसे तेल और सुगन्ध से, वैसे ही मित्र के हृदय की मनोहर सम्मति से मन आनन्दित होता है” (नीतिवचन 27:9)। मित्रता सोच-समझकर की गई बातचीत से ही दृढ़ और मधुर होती हैं।
रोमियों 12:9–11 इस बात पर अधिक प्रकाश डालता है कि परमेश्वर को सम्मान देने वाली मित्रता कैसी होती है:
“प्रेम निष्कपट हो; बुराई से घृणा करो; भलाई में लगे रहो। भाईचारे के प्रेम से एक दूसरे पर स्नेह रखो; परस्पर आदर करने में एक दूसरे से बढ़ चलो।प्रयत्न करने में आलसी न हो; आत्मिक उन्माद में भरे रहो; प्रभु की सेवा करते रहो” (रोमियों 12:9-11)।
दूसरे शब्दों में, मित्रता का मुख्य उद्देश्य स्वार्थ नहीं, वरन् सेवा करना है; प्रलोभन नहीं, वरन् उत्साहित करना है; खिलवाड़ नहीं, वरन् तैयार करना है। मित्रता की पहचान सच्चाई, भक्तिभाव, आदर, उत्साह और सेवा से होनी चाहिए। वास्तव में, जितना अधिक हम दूसरों की सेवा करने का लक्ष्य रखते हैं, उतने ही अधिक अवसर हमें सम्बन्ध विकसित करने के लिए मिलते हैं।
परन्तु तब क्या होगा जब आप किसी ऐसे व्यक्ति से मिलते हैं जिसके विषय में आपको लगता है कि वह आपका सम्भावित जीवन साथी हो सकता है? इससे पहले कि हम यह पूछना आरम्भ करें कि क्या वही व्यक्ति मेरे लिए है, हमें स्वयं से यह पूछना चाहिए कि, “क्या मैं किसी और के लिए वह हो सकता/सकती हूँ?” यदि उत्तर “नहीं” है, तो आपको अभी विवाह के विषय में सोचने की आवश्यकता नहीं है।
अपनी पुस्तक सिंगल, डेटिंग, एंगेज्ड, मैरिड, में बेन स्टुअर्ट ने इन दोनों दृष्टिकोणों को उपभोक्ता मानसिकता तथा साथी मानसिकता के बीच के अन्तर को बताया है। एक उपभोक्ता के रूप में, मैं यह सोचता हूँ कि मुझे क्या चाहिए, मैं क्या ढूँढ रहा हूँ, और क्या मेरे काम आएगा। यह एक संकीर्ण और स्वार्थी दृष्टिकोण है, जो लोगों को वस्तुओं में बदल देता है। परन्तु लोग वस्तुएँ नहीं हैं। वे परमेश्वर के स्वरूप में बनाए गए मनुष्य हैं, जिनका आदर और महत्व होना चाहिए।
इसके विपरीत, साथी मानसिकता यह दर्शाती है कि मेरे पास इस सम्बन्ध में योगदान देने के लिए कुछ है, और यह पूछती है कि क्या मैं इस व्यक्ति के साथ जीवन में सार्थक रूप से योगदान कर सकता/सकती हूँ, न कि केवल यह कि वे मेरी सभी अपेक्षाओं पर खरे उतरते हैं या नहीं।
अतः मान लीजिए कि आप जीवन साथी खोजना आरम्भ करने की स्थिति में हैं। और फिर आपको कोई ऐसा व्यक्ति मिल जाता है जिसकी ओर आप आकर्षित हो जाते हैं। यह उनका भक्ति पूर्ण जीवन, उनकी हँसी, उनका व्यक्तित्व, उनका विनम्र स्वभाव, या उनकी सेवा करने का तरीका हो सकता है। इसलिए आपको यह व्यक्ति अच्छा लगता है और आप उनके साथ अधिक समय बिताना चाहते हैं।
इसके बाद क्या होता है, यह पुरुषों और महिलाओं के लिए अलग होता है। सामान्यतः, पुरुष पहल करते हैं और महिलाएँ प्रतिक्रिया देती हैं। परन्तु हम इस खोज के समय में छह विशेषताओं को देखेंगे, जो दोनों लिंगों के लिए सहायक होंगे।
1. दीनता के साथ आगे बढ़ें
यह असामान्य बात नहीं है कि कई जोड़े सम्बन्ध में बहुत आगे बढ़ जाने के बाद ही सलाह लेने के विषय में सोचते हैं। हो सकता है कि हम अपने आप पर भरोसा करते हों, और नहीं चाहते कि दूसरे हमें यह कहें कि यह एक बुरा विचार है, “या हम इस बात से उत्साहित हों कि कोई हमें सचमुच पसन्द करता है। परन्तु पवित्रशास्त्र हमें बताता है कि, जो अपने ऊपर भरोसा रखता है, वह मूर्ख है; और जो बुद्धि से चलता है, वह बचता है:” (नीतिवचन 28:26)।
जिन अविवाहित लोगों ने दीनता के साथ किसी नए सम्बन्ध के विषय में सलाह ली है, उनकी संख्या उन लोगों की तुलना में बहुत कम है जिन्होंने स्वतंत्र होकर सम्बन्ध खोजे और अन्त में दुःख या पाप में पड़ गए।
अपने मित्रों, माता-पिता, छोटे समूह के अगुवों या पास्टर से पूछें कि क्या उन्हें लगता है कि इस व्यक्ति के साथ सम्बन्ध आगे बढ़ाने का प्रयास करना समझदारी है। उनको जानकारी देते रहें ताकि वे उत्तरदायित्व, प्रोत्साहन और प्रार्थना में आपकी सहायता कर सकें। और सुनिश्चित करें कि आप ऐसे लोगों से पूछ रहे हैं जो आपके साथ पूरी विश्वासयोग्यता से बात करेंगे!
2. प्रार्थना के साथ आगे बढ़ें
याकूब प्रतिज्ञा करता है, “पर यदि तुम में से किसी को बुद्धि की घटी हो, तो परमेश्वर से माँगो, जो बिना उलाहना दिए सब को उदारता से देता है; और उसको दी जाएगी” (याकूब 1:5)। किसी से विवाह करने की सम्भावना का पता लगाना बहुत अधिक बुद्धिमानी की माँग करता है। परन्तु यह समझना महत्वपूर्ण है कि बुद्धिमानी के लिए प्रार्थना करना और यह प्रार्थना करना कि परमेश्वर किसी विशेष व्यक्ति को आपका भविष्य का जीवन साथी बनाए, दोनों ही अलग हैं। मैं ऐसे व्यक्तियों को जानता हूँ जो सम्बन्ध में बने हुए थे और केवल यही प्रार्थना करते थे कि यह सम्बन्ध विवाह में बदल जाए। परन्तु यह बुद्धि के लिए प्रार्थना नहीं है। यह परिणाम की माँग है। विनम्रता भरी प्रार्थना कहती है कि हम परमेश्वर से यह सुनने के लिए तैयार हैं कि कोई विशेष व्यक्ति हमारा जीवन साथी बन सकता है या नहीं।
3. खराई से आगे बढ़ें
परमेश्वर हमें बताता है कि, “जो खराई से चलता है वह निडर चलता है, परन्तु जो टेढ़ी चाल चलता है उसकी चाल प्रगट हो जाती है” (नीतिवचन 10:9)। खराई के साथ चलने का अर्थ यह है कि आपके सम्बन्ध में क्या हो रहा है, इसके प्रति स्पष्ट होना चाहिए।
किसी लड़की (या लड़के) को इस बात से आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि आप अचानक ही एक साथ इतना समय क्यों बिता रहे हैं। उनके मध्य बातचीत होनी चाहिए। पुरुष को यह स्पष्ट करना चाहिए कि वह जानना चाहता है कि क्या परमेश्वर चाहता है कि यह सम्बन्ध विवाह तक पहुँचे, साथ ही उसे यह भी बताना चाहिए कि उसका उद्देश्य बढ़ते हुए ज्ञान की खोज करना है, न कि बढ़ती हुई घनिष्ठता की। और चार बेटियों के पिता होने के नाते, मैं आपको आश्वस्त कर सकता हूँ कि अधिकाँश परिस्थितियों में लड़की के पिता से मिलकर अपने उद्देश्यों को स्पष्ट करना उपयोगी होता है।
जैसे-जैसे सम्बन्ध आगे बढ़ता है, तो इस विषय में बातचीत करें कि स्थिति कैसी चल रही हैं और अगला चरण क्या होना चाहिए। क्या आप एक-दूसरे से बहुत अधिक मिलते-जुलते हैं? या बहुत कम मिलते हैं? उन बातों पर चर्चा करें जो उत्साह बढ़ाती हैं, साथ ही उन चिन्ताजनक विषयों पर भी बातचीत करें जो आपके मन में हैं। एक-दूसरे के सम्बन्ध को आगे बढ़ाने के लिए समय देने के साथ-साथ, बिना किसी बातचीत के समय बिताना भी उपयोगी हो सकता है।
यदि कोई सन्देह या बाधाएँ उत्पन्न होती हैं, तो उनके विषय में खुलकर और विश्वासयोग्यता के साथ बातचीत करें, क्योंकि आप अभी तक जीवन भर के सम्बन्ध के लिए समर्पित नहीं हुए हैं। यदि चिन्ताएँ गम्भीर हों, जैसे कि ईश्वर विज्ञान सम्बन्धी विचारों में भिन्नताएँ या जीवनशैली की पसन्द और नापसन्द में भिन्नता, और यदि उनका समाधान सम्भव न हो, तो आप इस सम्बन्ध को मैत्रीपूर्ण ढँग से समाप्त कर सकते हैं। “जो सीधा उत्तर देता है, वह होंठों को चूमता है” (नीतिवचन 24:26)। सम्भवतः यह उस प्रकार का चूमना न हो जैसा आप दोनों ने सोचा हो, परन्तु लम्बे समय में आप दोनों इस बात के लिए आभारी होंगे कि आपने ज्योति में चलकर अपनी बातों को खुलेपन और सच्चाई से साझा किया है।
4. शुद्धता के साथ आगे बढ़ें
शुद्धता के क्षेत्र में भ्रम, परमेश्वर की महिमा करने वाले खोज के समय भ्रम सबसे बड़ी बाधाओं में से एक बाधा है। परन्तु पवित्रशास्त्र यह दर्शाता है कि किसी भी प्रकार की यौन उत्तेजना पुरुष और स्त्री के बीच, विवाह की वाचा के लिए ही सुरक्षित रखी गई है। 1 थिस्सलुनीकियों 4:3–6 हमें बताता है कि हमें अविश्वासियों के समान वासना की अभिलाषा में नहीं चलना चाहिए; क्योंकि इस क्षेत्र में पाप करने से दूसरे लोग प्रभावित होते हैं; और यह भी कि परमेश्वर की दृष्टि में यौन शुद्धता एक अत्यंत गम्भीर विषय है। इसलिए हमें “व्यभिचार, अशुद्धता, दुष्कामना, बुरी लालसा और लोभ जो मूर्तिपूजा के बराबर है” (कुलुस्सियों 3:5) जैसी बातों को मार डालना है। पौलुस तीमुथियुस से कहता है कि “जवान स्त्रियों को पूरी पवित्रता से बहन जानकर, समझा दे” (1 तीमुथियुस 5:1–2)।
स्पष्ट दिशा निर्देश बनाइए और उनका पालन कीजिए। हमारी सगाई के समय, जूली और मैंने यह निश्चय किया था कि हम ऐसा कुछ नहीं करेंगे जिससे हम दोनों में से किसी के भी भीतर यौन उत्तेजना उत्पन्न हो। इसका अर्थ उतना ही सरल और निर्दोष हो सकता है जितना कि हाथ पकड़ना। कभी-कभी केवल एक-दूसरे के निकट रहना भी बहुत अधिक हो सकता है। इसलिए सावधान रहें क्योंकि आत्म-संयमी होने का यह और भी बड़ा कारण है!
परमेश्वर नहीं चाहता कि हम इस क्षेत्र में धोखे में पड़ें। उत्तेजना उत्पन्न करने वाले सम्बन्ध हमें शारीरिक रूप से प्रभावित करते हैं क्योंकि ये स्वाभाविक रूप से हमें उसी दिशा में और आगे ले जाने के लिए बने होते हैं। परमेश्वर ने इसे इस प्रकार ठहराया है ताकि विवाह में निरन्तर यौन सम्बन्ध बने रहें और पृथ्वी पर जनसंख्या भी बढ़ती रहे।
नीतिवचन उन लोगों के लिए चेतावनियों से भरा हुआ है जो यौन पाप के विरुद्ध परमेश्वर के मना करने वाली आज्ञा को गम्भीरता से नहीं लेते हैं। यदि आप रात के समय एक कमरे में एक-दूसरे के निकट दो घंटे तक अकेले बैठ सकते हैं और कुछ नहीं होता है, तो यह मत समझिए कि आप समझौता करने की सम्भावना से ऊपर हैं। यह सोचकर गर्व करना कि आप किसी सम्भावित प्रलोभन वाली स्थिति को सम्भाल सकते हैं, अधिकाँश यह केवल उस स्थिति का आरम्भ होता है जब आप उसे सम्भाल नहीं पाते हैं (नीतिवचन 16:18)। नीतिवचन 6:27-28 में परमेश्वर हमें चेतावनी देता है, “क्या हो सकता है कि कोई अपनी छाती पर आग रख ले; और उसके कपड़े न जलें?क्या हो सकता है कि कोई अंगारे पर चले, और उसके पाँव न झुलसें?”
जब सन्देह हो, तो अपनी सीमाओं को परखने से अच्छा है कि मसीह का आदर करें।
और यह स्मरण रखो कि मसीह का लहू हमें हर एक पाप के लिए पूर्ण रीति से क्षमा का भरोसा देता है, परन्तु इसका यह भी अर्थ है कि हम दाम देकर मोल लिए गए हैं — इसलिये अपनी देह के द्वारा परमेश्वर की महिमा करो (1 कुरिन्थियों 6:20)।
5. उद्देश्य पूर्ण ढँग से आगे बढ़ें।
सम्भावित जीवन साथी के साथ सम्बन्ध की खोज केवल साथ-साथ घूमने-फिरने से नहीं, वरन् इससे कहीं अधिक बढ़कर होती है। दूसरे व्यक्ति के विषय में जितना हो सके उतना अधिक जानें ताकि यह समझ आ जाए कि क्या वही आपका भविष्य में होने वाला जीवन साथी है। अभी समय है कि आप जितने प्रश्न पूछ सकते हैं, उनसे पूछें और हो सके तो अधिक से अधिक प्रश्न पूछें।
क्या वे मसीही हैं? वे सुसमाचार को कितने अच्छे ढँग से समझते हुए लागू करते हैं? परमेश्वर के वचन के प्रति उनका दृष्टिकोण क्या है? वे अपनी कलीसिया में कितने सक्रिय हैं? उनके मित्र उनके विषय में क्या कहते हैं? वे विवादों या टकरावों को कैसे सुलझाते हैं? उनके लक्ष्य, शौक और रुचियाँ क्या हैं? वे अपने भाई-बहनों से कैसे व्यवहार करते हैं? वे पुरुषों और महिलाओं की भूमिकाओं को किस दृष्टिकोण से देखते हैं? उनका स्वास्थ्य पृष्ठभूमि क्या है? वे पाप, निराशा और हताशा से कैसे निपटते हैं? उनके जीवन की दिशा क्या है?
और यह तो केवल आरम्भ करने के लिए है। जैसे-जैसे आपके प्रश्नों के उत्तर मिलते जाएँगे, परमेश्वर या तो आपके आकर्षण की पुष्टि करेगा या फिर आपको उस सम्बन्ध को समाप्त करने की ओर ले जाएगा।
6. विश्वास के साथ आगे बढ़ें
मैंने अधिकाँश ऐसे अविवाहित वयस्कों से बात की है जो इस बात को लेकर चिन्तित रहते हैं कि क्या कभी उनके लिए भी खोज करने का समय आएगा, या फिर वे अपने वर्तमान सम्बन्ध को लेकर भयभीत रहते हैं।
और वह विश्वास किस दिशा की ओर है? एक पुरुष के लिए, इसका अर्थ यह है कि वह विश्वास करता है कि परमेश्वर इस बात की पुष्टि करेगा कि उसे वह स्त्री मिली है या नहीं, जिसकी वह जीवन के शेष समय में अगुवाई करना, देखभाल करना, स्नेह करना और सुरक्षा करना चाहता है (इफिसियों 5:25-33; 1 पतरस 3:7; नीति 5:15-19; कुलुस्सियों 3:19)। और एक स्त्री के लिए इसका अर्थ यह है कि परमेश्वर इस बात की पुष्टि करेगा कि क्या उसे वह पुरुष मिल गया है जिसे वह अपने जीवन भर सेवा करना, आदर करना, प्रेम करना, सम्मान देना, आज्ञाकारी होना, प्रोत्साहित करना और सहारा देना चाहती है (इफिसियों 5:22–24; 1 पतरस 3:1–6; कुलुस्सियों 3:18)।
अधिक प्रश्न या तो पुष्टि करेंगे या फिर चिन्ताएँ बढ़ाएँगे। यदि चिन्ताएँ सामने आती हैं, तो वह जोड़ा विश्वास में बने रहते हुए एक-दूसरे से अलग हो सकता है—यह जानते हुए कि परमेश्वर ने उन्हें एक सम्भावित समस्या भरे सम्बन्ध से बचा लिया है और वह अपनी सिद्ध इच्छा में उनकी अगुवाई आगे भी करता रहेगा।
चर्चा एवं मनन:
- यदि आप अविवाहित हैं, तो क्या इस भाग में से कोई भी बात आपके जीवन साथी की खोज करने के तरीके में सहायक सिद्ध हुई है? आप इससे अधिक और क्या अलग कर सकते हैं?
- यदि आप विवाहित हैं, तो आप जिन अविवाहित लोगों को जानते हैं उन्हें कैसे उत्साहित कर सकते हैं कि वे अपने जीवन साथी की खोज दीनता, प्रार्थना, खराई, पवित्रता, उद्देश्य पूर्ण ढँग और विश्वास के साथ करें?
3 भाग III:
मैं कैसे ढूँढूँ
एक जीवन साथी?
लगभग पचास वर्ष हो चुके हैं जब जूली और मैंने यह निश्चय किया था कि हमारा विवाह करना परमेश्वर की इच्छा के अनुसार है। कोई भी जन यह पूछ सकता है कि हमारा जैसा विवाह, जो इस प्रकार से आरम्भ हुआ था, वह हर दम्पति के सामने आने वाली चुनौतियों, दुखों और बिना उम्मीद के आने वाली बाधाओं के बीच कैसे ऐसी परिस्थिति में न केवल हमारा वैवाहिक सम्बन्ध टिका रहा वरन् फलता-फूलता भी गया।
वर्षों से हमारी उन्नति के लिए परमेश्वर ने विभिन्न साधनों का उपयोग किया है, जिसमें स्थानीय कलीसिया में हमारी सहभागिता और मित्रों के उदाहरण तथा परामर्श सम्मिलित हैं। परन्तु अब तक का सबसे महत्वपूर्ण कारण सुसमाचार ही रहा है। क्योंकि सुसमाचार हमें बताता है कि परमेश्वर ने हमें अपने साथ प्रेम पूर्वक मित्रता में रहने के लिए बनाया है। परन्तु हमने उसे ठुकरा दिया और अपने अभिमान, स्वार्थी स्वभाव तथा विद्रोह के कारण न्याय के लिए योग्य ठहरे हैं। इसलिए परमेश्वर ने अपने पुत्र यीशु को भेजा, ताकि वह उस दण्ड को सहे जिस दण्ड को पाने के योग्य हम थे और हमें हमेशा-हमेशा के लिए अपने साथ मेल-मिलाप में ग्रहण कर ले। जो लोग उस सुसमाचार पर विश्वास करते हैं, वे इस बात से निश्चिंत रहते हैं कि एक दिन वे परमेश्वर से मिलेंगे, न कि ऐसे न्यायी से मिलेंगे जो उन्हें अनन्त दण्ड सुनाएगा, परन्तु ऐसे पिता से मिलेंगे जो उन्हें अनन्तकाल के आनन्द में उनका स्वागत करेगा।
एक मसीही विवाह अन्य विवाह के समान नहीं होता है, क्योंकि पति और पत्नी दोनों ने ही सुसमाचार के द्वारा परमेश्वर के अनुग्रह का अनुभव किया हुआ होता है। वे अपने सम्बन्ध को अपनी सामर्थ्य से नहीं निभाते, वरन् यीशु ने अपने जीवन, मृत्यु और पुनरुत्थान के द्वारा उनके लिए और उनमें जो कुछ किया है, उससे लाभ उठाते हैं।
परन्तु वास्तव में इसका क्या अर्थ है? और यदि हम अपने विवाह में सुसमाचार को भूल जाएँ या उसे लागू करने में असफल हो जाएँ तो परिणाम क्या होंगे?
इन प्रश्नों का उत्तर देने के लिए, हम तीन विशेष तरीकों पर ध्यान देंगे, जिसके द्वारा सुसमाचार, पति या पत्नी होने के विषय में हमारी सोच में परिवर्तन लाता है।
सुसमाचार हमारी पहचान के विषय में हमारी समझ को परिवर्तित कर देता है
जब हम विवाह करते हैं, तो हमारे विषय में बहुत सी बातों में परिवर्तन आ जाता है। हम एक नए सम्बन्ध में, एक नए परिवार में, एक नए घर में होते हैं, और विभिन्न प्रकार के दृष्टिकोण से हमारी एक नई पहचान होती है। अब हम अविवाहित नहीं हैं, अब हम एक “जोड़े” का आधा हिस्सा हैं। अर्थात् अब आप पति हो, और आप पत्नी हो।
परन्तु सबसे मूलभूत अर्थ में, हमारी पहचान वही रहती है, कि हम “मसीह में” हैं।
मैं मसीह के साथ क्रूस पर चढ़ाया गया हूँ, और अब मैं जीवित न रहा, पर मसीह मुझ में जीवित है: और मैं शरीर में अब जो जीवित हूँ तो केवल उस विश्वास से जीवित हूँ, जो परमेश्वर के पुत्र पर है, जिस ने मुझसे प्रेम किया, और मेरे लिये अपने आप को दे दिया (गलातियों 2:20)।
इसी प्रकार, पौलुस कुलुस्सियों से कहता है:
पृथ्वी पर की नहीं परन्तु स्वर्गीय वस्तुओं पर ध्यान लगाओ। क्योंकि तुम तो मर गए, और तुम्हारा जीवन मसीह के साथ परमेश्वर में छिपा हुआ है। जब मसीह जो हमारा जीवन है, प्रगट होगा, तब तुम भी उसके साथ महिमा सहित प्रगट किए जाओगे (कुलुस्सियों 3:2–4)।
मसीह हमारा जीवन है, चाहे हम अविवाहित हों या विवाहित। चाहे हमारे जीवन साथी की मृत्यु हो जाए या हम तलाक ले लें, मसीह हमारा जीवन है। अपने व्यक्तित्व, स्वभाव, इतिहास या चरित्र की विशेषताओं को मिटाए बिना, हम मसीह में एक नए व्यक्ति बन गए हैं: “इसलिए यदि कोई मसीह में है तो वह नई सृष्टि है: पुरानी बातें बीत गई हैं; देखो, वे सब नई हो गईं” (2 कुरिन्थियों 5:17)
परन्तु कभी-कभी हम सोचते हैं कि हमारी पहचान मसीह के अतिरिक्त कुछ और भी है — जैसे हमारा अतीत। हम अपने आपको मुख्यतः वही व्यक्ति मानते हैं जो हम हमेशा से रहे हैं, जैसे कि अपने परिवार, अनुभवों, व्यक्तित्व और संस्कृति का परिणाम। निस्संदेह हमारा पारिवारिक पृष्ठभूमि हम पर प्रभाव डालती है। बड़े होते समय दुर्व्यवहार सहना, अकेले माता या पिता के द्वारा पालन-पोषण किया जाना, या बचपन में अपमान सहना, हमारे जीवन साथी के साथ हमारे सम्बन्धों को विभिन्न प्रकार से प्रभावित कर सकता है।
परन्तु हमारा अतीत हमारी पहचान नहीं है। हम अपने अतीत से प्रभावित हो सकते हैं। हमारा अतीत ही बता सकता है कि हम क्यों लुभाए जाते हैं। हमारा अतीत हमें उन लोगों के प्रति आकर्षित कर सकता है जो हमारे ही समान पले-बढ़े हैं। हमारा अतीत बहुत सी बातों को समझा सकता है। परन्तु हमारा अतीत ही हमारी पहचान नहीं है। पौलुस 1 कुरिन्थियों 6:9–11 में कहता है:
धोखा न खाओ, न वेश्यागामी, न मूर्तिपूजक, न परस्त्रीगामी, न लुच्चे, न पुरुषगामी। न चोर, न लोभी, न पियक्कड़, न गाली देनेवाले, न अंधेर करनेवाले परमेश्वर के राज्य के वारिस होंगे। और तुम में से कितने ऐसे ही थे, परन्तु तुम प्रभु यीशु मसीह के नाम से और हमारे परमेश्वर के आत्मा से धोए गए, और पवित्र हुए और धर्मी ठहरे।
सुसमाचार में हमें इस प्रकार से परिवर्तित करने की सामर्थ्य है कि हम अब उन बातों के वश में नहीं हैं जिनमें हम पहले थे।
हमारा अतीत हमारी पहचान नहीं है; हमारी पहचान मसीह है।
अपनी पहचान को हम एक और स्थान पर देख सकते हैं, और वह पत्नी या पति के रूप में हमारी भूमिका है। हम विवाह में अपनी भूमिका को अनोख या यहाँ तक कि श्रेष्ठ मानते हैं। परन्तु जैसा हमने पहले देखा, यद्यपि पति और पत्नी की भूमिकाओं में वास्तविक अन्तर हैं, फिर भी वे परमेश्वर के अनुग्रह पूर्ण योजना को प्रकट करते हैं और परमेश्वर के सामने हमारे मूल्य को निर्धारित नहीं करते हैं (गलातियों 3:28)।
सुसमाचार में अपनी पहचान स्थापित करने का एक परिणाम यह है कि यह हमें तुलना करने के पाप से छुटकारा देता है। कई “संचार” समस्याएँ मूलतः “प्रतिस्पर्धा” की समस्याएँ हैं। हम किसी समाधान की खोज नहीं कर रहे हैं, वरन् जीत की खोज कर रहे हैं। हम अपने जीवन साथी के साथ प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं, न कि अपने जीवन साथी के लिए। परन्तु पतरस हमें स्मरण दिलाता है कि पति और पत्नी दोनों मिलकर “जीवन के वरदान” के वारिस हैं (1 पतरस 3:7)।
एक दम्पति ने बुद्धिमानी के साथ हमें हमारे विवाह के आरम्भ में सलाह दी कि “समस्या से लड़ें, एक दूसरे से नहीं।” “समस्या” पापपूर्ण न्याय करने की प्रवृत्ति, घमण्ड, क्रोध, गलत जानकारी, संसार का हमें अपने ढाँचे में ढालने का प्रयास, या फिर मनुष्यों का भय हो सकती है। हम उस लड़ाई को प्रतिद्वंद्वी नहीं, परन्तु सहकर्मी बनकर साथ-साथ लड़ सकते हैं, क्योंकि हम मसीह के साथ संगी वारिस हैं। महिमा उसे मिलती है, और आशीष हमें मिलती है।
यह जानना कि हमारी पहचान सबसे बढ़कर मसीह में है, और यही बात हमें जीवन की समस्याओं, चुनौतियों, परीक्षाओं और कठिनाइयों का सामना शान्ति, सहयोग और अनुग्रह के साथ करने में सामर्थी बनाती है। परन्तु इसका यह अर्थ नहीं है कि हम कभी भी एक-दूसरे के विरुद्ध अपराध नहीं करेंगे।
इससे सुसमाचार का हमारे विवाहों पर दूसरा प्रभाव पड़ता है:
सुसमाचार क्षमा के विषय में हमारी समझ को बदल देता है
विवाह में क्षमा करना सबसे बड़ी बाधाओं में से एक हो सकती है। आप अपेक्षा करते हैं कि सब कुछ ठीक चलेगा, आपसी मेल-जोल बना रहेगा, आपका जीवन साथी आपसे सहमत रहेगा। आप यह भी सोचते हैं कि वह कभी पाप नहीं करेगा/करेगी। परन्तु वे करते हैं।
और कभी-कभी उन्हें क्षमा करना बहुत कठिन हो जाता है। इससे भी बुरी बात यह है कि हमारा क्षमा न करना भी हमें उचित ठहरता है। हमें लगता है कि हमारे विरुद्ध अपराध किया गया है। हमें लगता है कि हम धर्मी हैं। हमें ऐसा भी लगता है कि वे दण्ड पाने के योग्य हैं। उनके विरुद्ध उनके पापों का विस्तार से वर्णन करने का हमें अधिकार है।
क्योंकि जब कोई पाप करता है, तो असन्तुलन उत्पन्न होता है। न्याय पूरा नहीं होता है। कोई न कोई ऋणी हो जाता है, और जब तक वह ऋण चुकाया नहीं जाता, तब तक परिस्थितियाँ ठीक नहीं हो पाती हैं।
इसलिए, परिस्थितियों को सुधारने के लिए हम विभिन्न योजनाएँ बनाते हैं।
क्रोध – हम अपने शब्दों से प्रहार करते हैं या अपने चेहरे के भावों से दण्डित करते हैं।
अलगाव – हम दूर होते जाते हैं, भावनात्मक या शारीरिक रूप से पीछे हट जाते हैं।
स्वयं–पर–दया– दिखाना–हम सोचते हैं, “आपको वास्तव में मेरी कोई चिन्ता नहीं है।”
उदासीनता – हम संवाद करते हैं, “मुझे वास्तव में आपकी चिन्ता नहीं है।”
विवाद – हम टकराव, बल पूर्वक तर्क-वितर्क करके तथा कठोर शब्दों के द्वारा प्रतिरोध करते हैं।
लेखा रखना – हमें लगता है कि हमने इसे “जीतने” का अधिकार अर्जित कर लिया है।
इनमें से कोई भी तरीका वह नहीं है जिसे परमेश्वर चाहता है कि हम विवाद सुलझाने के लिए अपनाएँ। फिर भी, किसी न किसी प्रकार से हम आगे बढ़ जाते हैं। कोई हड़बड़ाहट में क्षमा माँगता है। और आप हँसकर टाल देते हैं। या फिर ऐसा जताते हैं कि मानो कुछ हुआ ही नहीं। पर वास्तव में कुछ भी नहीं बदलता और परिस्थिति कभी सुलझती ही नहीं है।
केवल सुसमाचार ही क्षमा न करने की भावना से पूरी और स्थायी रीति से निपट सकता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि परमेश्वर हमें दूसरों को उसी प्रकार से क्षमा करने के लिए कहता है जैसे उसने हमें क्षमा किया है।
…एक दूसरे की सह लो, और एक दूसरे के अपराध क्षमा करो; जैसे प्रभु ने तुम्हारे अपराध क्षमा किए, वैसे ही तुम भी करो (कुलुस्सियों 3:13)।
क्षमा के विषय पर बोलते हुए पास्टर /धर्मशास्त्री जॉन पाइपर लिखते हैं,
अनुग्रह और विश्वास के द्वारा धर्मी ठहराए जाने का सिद्धान्त ही वह मूलभूत सत्य है, जो विवाह को उसी प्रकार कार्य करने के लिए योग्य बनाता है जैसा कि परमेश्वर ने उसे रचा है। हमारे पापों के बावजूद भी धर्मी ठहराया जाना परमेश्वर के साथ ऊपर की ओर शान्ति स्थापित करता है। और जब इसे समान स्तर से अनुभव किया जाता है, तो यह एक अपूर्ण पुरुष एवं अपूर्ण स्त्री के बीच बिना लज्जा के शान्ति लाता है।1
हम उस “लज्जा-रहित शान्ति” को कैसे अनुभव कर सकते हैं? जिसके विषय में वह कहता है कि हम यह स्मरण रखते हैं कि प्रभु ने हमें कैसे क्षमा किया है।
- पूरी रीति से: “और उसने तुम्हें भी, जो अपने अपराधों, और अपने शरीर की खतनारहित दशा में मुर्दा थे, उसके साथ जिलाया, और हमारे सब अपराधों को क्षमा किया” (कुलुस्सियों 2:13)। परमेश्वर हमारे कुछ ही पापों को क्षमा नहीं करता है, अर्थात् कम या अधिक पापों को नहीं, वरन् वह छोटे से छोटे महत्वहीन पापों को भी क्षमा करता है। वह हमारे सभी पापों को क्षमा करता है। इसलिए हम भी अपने जीवन साथी के सभी अपराधों को क्षमा कर सकते हैं।
- अन्त में: “पर यह व्यक्ति तो पापों के बदले एक ही बलिदान सर्वदा के लिये चढ़ाकर परमेश्वर के दाहिने जा बैठा” (इब्रानियों 10:12)। परमेश्वर उन पापों को सामने नहीं लाता जिनके लिए हमने पश्चाताप किया है। वह उन्हें बार-बार हमारे सामने नहीं लाता है। वह उन पापों को अपनी जेब में नहीं रखता है कि किसी बहस के समय हथियार के रूप में उनका उपयोग करे। अंततः हमें पूरी रीति से क्षमा कर दिया गया है।
- सम्पूर्ण हृदय से: परमेश्वर हमें अनिच्छा से क्षमा नहीं करता है—काश कि उसे ऐसा करना ही न पड़े। वह आधे अधूरे मन से नहीं कहता कि, “मैं तुम्हें क्षमा करता हूँ।” वह यह दिखावा नहीं करता कि कुछ हुआ ही नहीं है। इब्रानियों का लेखक कहता है कि यीशु, “जिसने उस आनन्द के लिये जो उसके आगे धरा था, लज्जा की कुछ चिन्ता न करके, क्रूस का दुःख सहा; और सिंहासन पर परमेश्वर के दाहिने जा बैठा”(इब्रानियों 12:2)। वह पूरे हृदय और आत्मा से क्षमा करता है, तथा सम्बन्ध को पुनःस्थापित करके आनन्दित होता है, ठीक उसी प्रकार से जैसे एक पिता अपने उड़ाऊ पुत्र को स्वीकार करता है (लूका 15:20)।
- योग्य रूप से: परमेश्वर हम से यह प्रमाणित करने के लिए नहीं कहता कि हम क्षमा के योग्य हैं, न ही हमें किसी कठिन परीक्षा से होकर जाने के लिए कहता है, और न ही प्रतीक्षा करता है कि हम सच में पछता रहे हैं। उसकी क्षमा का हमारे साथ कोई लेना-देना नहीं है, वरन् सब कुछ उसी से सम्बन्धित है। “तो उसने हमारा उद्धार किया और यह धार्मिक कामों के कारण नहीं, जो हमने आप किए, पर अपनी दया के अनुसार” (तीतुस 3:5)।
परमेश्वर हमें हमारी योग्यता के कारण क्षमा नहीं करता है, परन्तु अपनी दया के कारण करता है।
यहाँ यह स्पष्ट करना महत्वपूर्ण है कि हम हृदय से की जाने वाली क्षमा की बात कर रहे हैं, न कि उन परिस्थितियों की, जिनमें अत्याचार, अन्याय, या लगातार बिना पश्चाताप के किए जा रहे पाप सम्मिलित होते है, जहाँ परिणामस्वरूप दण्ड आवश्यक हो जाता है। और क्षमा पुनः स्थापित किए गए विश्वास या पूर्ण मेल-मिलाप के समान नहीं होती है। इसके लिए और अधिक बातचीत और कार्य करने की आवश्यकता हो सकती है।
परन्तु अधिकाँश परिस्थितियों में जब हमारे विरुद्ध अपराध किया जाता है, तो परमेश्वर हमें यह विचार करने के लिए कहता है कि परमेश्वर के विरुद्ध हमारे पाप कितने बड़े थे और उसने हमें कैसे क्षमा किया है ताकि हम मन से क्षमा करने के लिए तैयार हो सकें। क्योंकि उस सच्चाई के प्रकाश में सब कुछ बदल जाता है। हमें यह समझ में आता है कि हमें क्षमा की आवश्यकता अपने जीवन साथी से भी अधिक है। परमेश्वर के सामने हमारे पाप उसके पापों से बहुत बड़े हैं। यीशु ने हम दोनों के पापों का मूल्य चुका दिया है।
इसका यह अर्थ नहीं है कि हम अपने जीवन साथी से यह माँग कर रहे हैं कि वह क्षमा कर दे। अधिकतर आपको अपने जीवन साथी को क्षमा करना कठिन होता है क्योंकि आपने अपने पाप को ठीक से स्वीकार नहीं किया है।
एक ऐसा अंगीकार जो क्षमा और मेल-मिलाप की ओर ले जाता है, वह संयोग से नहीं होता। प्रत्येक अपराध के बाद मुझे कम से कम चार कार्य करने का लक्ष्य रखना चाहिए:
- अपने पापों के नाम बताइए। उन्हें बाइबल के नामों से पुकारिए। “मैं घमण्डी, कठोर, निर्दयी, स्वार्थी था।” न कि, “मैं थोड़ा बिगड़ा हुआ था, अति संवेदनशील था, या मैंने कोई गलती की थी।”
- अपने पापों को स्वीकार करो। उन्हें क्षमा मत करो, उन्हें उचित मत ठहराओ, या उनके लिए किसी और को दोषी मत ठहराओ।
- अपने पापों के लिए शोक व्यक्त करो। अपने किए पर दुःख व्यक्त करना आत्मा के दृढ़ विश्वास का संकेत है।
- अपने पापों के लिए क्षमा माँगो। “मैं क्षमा चाहता हूँ” कहना उतना साकार नहीं है जितना कि साधारण तरीके से कहना कि, “क्या आप मुझे क्षमा करेंगे?” अर्थात् उस समय जब आप परिस्थितियों को सुधारना चाहते हैं।
इस प्रक्रिया में 15 सेकंड या दो घंटे का समय लग सकता है, यह अपराध की प्रकृति तथा उस समय हम क्या देख पा रहे हैं, इस पर निर्भर करता है। इस सम्बन्ध में बातचीत के कई क्रम सम्मिलित हो सकते हैं। अलग-अलग समय पर आप कभी क्षमा करने वाले जीवन साथी होंगे और कभी क्षमा माँगने वाले। परन्तु हम सबके लिए सुसमाचार आशा, शान्ति, दीनता तथा भरोसे की बात करता है, कि हम भी उसी प्रकार से क्षमा कर सकते हैं जैसे हमें क्षमा किया गया है।
सुसमाचार परिवर्तन के विषय में हमारी समझ को बदल देता है
कभी-कभी विवाह में कुछ आदतें — चाहे वे पापपूर्ण हों या अन्य — विद्यमान रहती हैं जो बदलती हुई नहीं दिखाई देती हैं। यह उतनी ही साधारण बात हो सकती है जैसे कि हमेशा देर से आना, कपड़े न उठाना, रक्षात्मक दृष्टिकोण अपनाना, या गाड़ी ठीक से न चलाना। यह बात और भी अधिक गम्भीर हो सकती है जैसे कि अश्लीलत सामग्री का उपयोग, सांसारिकता, या कड़वाहट। सुसमाचार के बिना परिवर्तन असम्भव सा लगता है। इसलिए सच्चा परिवर्तन “जड़” (हृदय) से सम्बन्धित है, और तब ही स्वाभाविक रूप से अच्छे “फल” (भले काम) उत्पन्न होते हैं।
परन्तु परमेश्वर ने वास्तव में हमें परिवर्तित कर दिया है, और वही सुसमाचार है जो उस परिवर्तन को तीन तरीकों से वास्तविकता बनने में योग्य बनाता है।
- सुसमाचार हमें सही प्रेरणा देता है। अब हमारा उद्देश्य परमेश्वर को प्रसन्न करना है। हम अन्तहीन स्वयं का सुधार इसलिए नहीं करते कि हम यह दिखा सकें कि हम कितने अच्छे पति या पत्नी हैं। ऐसा करके हम या तो ऊब जाएँगे या फिर घमण्ड से भर जाएँगे।
हम केवल अपने जीवन साथी को प्रसन्न करने के लिए परिवर्तन लाने का प्रयास नहीं करते। यह एक सराहनीय उद्देश्य तो है, परन्तु यह अन्तिम उद्देश्य नहीं है। हम अपने आपको फँसा हुआ होने जैसा अनुभव कर सकते हैं, और ऐसा करके कभी भी अपने जीवन साथी की अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतरते हैं।
क्योंकि यीशु मरा, अब हम अपने लिए नहीं जीते, “परन्तु उसके लिये जो [हमारे] लिये मरा और जी उठा” (2 कुरिन्थियों 5:15)। दूसरे शब्दों में, हमें परमेश्वर को प्रसन्न करने के लिए स्वतंत्र किया गया है। जैसा कि पतरस हमें बताता है, यीशु “हमारे पापों को अपनी देह पर लिए हुए क्रूस पर चढ़ गया जिस से हम पाप के लिये मर करके धार्मिकता के लिए जीवन बिताएँ” (1 पतरस 2:24)।
- सुसमाचार परिवर्तन के लिए बहुत अनुग्रह देता है। यह अनुग्रह इस बात से आता है कि हमारे पाप और असफलताएँ क्षमा कर दी गई हैं। ध्यान दें कि कैसे पतरस हमें भक्ति पूर्ण गुणों में बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करने के बाद यह समझाता है कि बढ़ने के लिए हमें क्या स्मरण रखना चाहिए:
इसी कारण तुम सब प्रकार का यत्न करके, अपने विशवास पर सद्गुण, और सद्गुण पर समझ, और भक्ति पर भाईचारे की प्रीति, और भाईचारे की प्रीति पर प्रेम बढ़ाते जाओ। क्योंकि जिसमें ये बातें नहीं, वह अन्धा है, और धुन्धला देखता है, और अपने पूर्वकाली पापों से धुलकर शुद्ध होने को भूल बैठा है। (2 पतरस 1:5–7, 9)।
भक्ति के गुणों में हमारा बढ़ना इस बात पर निर्भर करता है कि हम सुसमाचार के द्वारा पायी जाने वाली क्षमा को स्मरण रखें। हम असफल होने और उन्हीं पापों में गिरने के लिए क्षमा माँगने के कभी न समाप्त होने वाले चक्र पर नहीं हैं, और न ही कभी बदलने की आशा रखते हैं। परन्तु हम बदल सकते हैं क्योंकि हम मसीह के साथ क्रूस पर चढ़ाये गये हैं, और अब हम जीवित नहीं, वरन् मसीह हम में जीवित है। हमारे पास नई दिशा, आशाएँ, अभिलाषाएँ और एक नया भविष्य है। हम सच में पाप की शक्ति और उसके राज्य से स्वतंत्र हो चुके हैं।
- सुसमाचार हमें धीरज धरने की सामर्थ्य देता है। हम दृढ़ रह सकते हैं क्योंकि हम जानते हैं कि परमेश्वर हमें अपने पुत्र के स्वरूप में ढालने के लिए प्रतिबद्ध है (रोमियों 8:29-30)। परमेश्वर ने जो ठान लिया है, उसमें वह विश्वासयोग्य रहेगा। वह हमें मझधार में नहीं छोड़ेगा।
अंततः, यह युद्ध परमेश्वर का है जो उसे ही जीतना है, हमें नहीं। वह अपने पुत्र के कार्य की रक्षा, यह सिद्ध करते हुए कर रहा है कि क्रूस पर उसका एक बार और सदा के लिए दिया गया बलिदान किसी के भी छुटकारे के लिए पर्याप्त है “हर एक कुल, और भाषा, और लोग, और जाति में से परमेश्वर के लिये लोगों को मोल लिया है। और उन्हें हमारे परमेश्वर के लिये एक राज्य और याजक बनाया; और वे पृथ्वी पर राज्य करते हैं” (प्रकाशितवाक्य 5:9-10)।
परमेश्वर हमारे विवाह की दृढ़ता के प्रति हमसे कहीं अधिक समर्पित है।
इसलिए आइए हम उस महान आशा और सामर्थ्य को हल्के में न लें, जो परमेश्वर ने हमें दी है। आइए हम अपनी पहचान, अपनी क्षमा और अपने परिवर्तन के लिए सुसमाचार में दी गई विधियों की ओर दौड़ने में असफल न हों।
चर्चा एवं मनन:
- इस खण्ड ने सुसमाचार के विषय में आपकी समझ को किस प्रकार से चुनौती दी तथा यह आपके जीवन को किस प्रकार प्रभावित कर सकता है?
- किस प्रकार से सुसमाचार को आपके विवाह या आपके जीवन के अन्य सम्बन्धों को बदलने की आवश्यकता है?
4 भाग IV:
सुसमाचार जो
अन्तर लाता है
हमने विवाह के लिए परमेश्वर के उद्देश्य को देखा है, वह इसके माध्यम से क्या पूरा करना चाहता है, मित्रता से सगाई तक विश्वास और शान्ति के साथ कैसे आगे बढ़ना है, और हमारे विवाह में सुसमाचार की आधारभूत भूमिका क्या है।
इस अन्तिम खण्ड में, हम लम्बे समय तक चलने वाले विवाह के विषय में बात करेंगे। कई दशकों तक विवाहित रहने के लाभों में से एक लाभ यह है कि हम पीछे मुड़कर देख सकें और यह समझ सकें कि कैसे प्रत्येक चरण में परमेश्वर विशेष तरीकों से कार्य कर रहा था ताकि मसीह और कलीसिया के सम्बन्ध की महिमा प्रकट हो सके।
मैंने उन चरणों को आरम्भिक वर्ष (1–7), मध्यम वर्ष (8–25), और बाद के वर्ष (26+) में विभाजित किया है। ये विभाजन कुछ सीमा तक मनमाने हैं तथा ये कुछ आगे-पीछे के ओर भी हैं। पवित्रशास्त्र की आज्ञाएँ और प्रतिज्ञाएँ नहीं बदलतीं, चाहे हम किसी भी चरण में क्यों न हों। हमें सदैव परमेश्वर के वचन के अधीन रहना चाहिए, और सुसमाचार में जड़ पकडनी चाहिए, और स्थानीय कलीसिया के लिए परमेश्वर के आत्मा से सामर्थ्य प्राप्त करनी चाहिए। और अलग-अलग चरणों की प्राथमिकताएँ अन्य चरणों में अनुपस्थित नहीं होंगी।
परन्तु जब जूली और मैंने समय के साथ पीछे मुड़कर देखा, तो हमने पाया कि हमारे विवाह के आरम्भिक वर्षों के पहलुओं ने बाद के वर्षों में हमारे आगे बढ़ने में योगदान दिया। और इसका धीरे-धीरे प्रभाव बढ़ता ही चला गया।
इसलिए हम प्रत्येक चरण में ध्यान केंद्रित करने के लिए दो प्राथमिकताओं पर ध्यान देंगे, जो हमारे विवाह को लम्बे समय तक दृढ़ बनाने में सहायता करेंगी।
आरम्भिक वर्ष (1–7): विश्वास और दीनता
आरम्भिक वर्षों में बढ़ने की पहली प्राथमिकता विश्वास है। क्योंकि नए जीवन साथी अधिकतर भय और अनिश्चितता में रहते हैं। जैसे कि सब कुछ कैसे ठीक होगा? क्या मैं वास्तव में अपने जीवन साथी को उतना ही भलीभाँति जानता/जानती हूँ जितना मुझे लगता है? क्या मैंने सही निर्णय लिया? यह कौन कह सकता है कि हमारा विवाह लम्बे समय तक टिक पाएगा? सम्भवतः आपने अपने आप से इनमें से एक या एक से अधिक प्रश्न पूछे होंगे। हम उत्तर ढूँढने के लिए जहाँ जाते हैं, उससे पता चलता है कि हम किस पर भरोसा करते हैं, और यह भरोसा अत्यंत आवश्यक है।
सबसे आवश्यक भरोसा जो हमें बढ़ना है, वह परमेश्वर पर भरोसा करना है। भजनहार हमें प्रोत्साहित करता है, “हे लोगों, हर समय उस पर भरोसा रखो; उससे अपने-अपने मन की बातें खोलकर कहो; परमेश्वर हमारा शरणस्थान है” (भजन संहिता 62:8)। हमारे आरम्भिक वर्षों में, जूली और मुझे भरोसा करना पड़ा कि परमेश्वर ने हमें एक साथ रखा है, क्योंकि वही प्रभुता सम्पन्न है, और तलाक विकल्प नहीं था, और उसकी पुस्तक में पहले से ही हमारे लिए बनाए गए प्रत्येक दिन लिखे हुए थे, जब कोई भी अस्तित्व में नहीं था (भजन संहिता 139:16)।
इस प्रकार का भरोसा परमेश्वर के वचन में समय बिताने, तथा इन प्रतिज्ञाओं पर मनन करने से बढ़ता है:
मैं जानता हूँ कि तू सब कुछ कर सकता है, और तेरी युक्तियों में से कोई रुक नहीं सकती (अय्यूब 42:2)।
मुझे इस बात का भरोसा है कि जिसने तुम में अच्छा काम आरम्भ किया है, वही उसे यीशु मसीह के दिन तक पूरा करेगा (फिलिप्पियों 1:6)।
क्योंकि मैं निश्चय जानता हूँ, कि न मृत्यु, न जीवन, न स्वर्गदूत, न प्रधानताएँ, न वर्तमान, न भविष्य, न सामर्थ्य, न ऊँचाई,न गहराई और न कोई और सृष्टि, हमें परमेश्वर के प्रेम से, जो हमारे प्रभु मसीह यीशु में है, अलग कर सकेगी (रोमियों 8:38-39)।
परन्तु एक और प्रकार का भरोसा बढ़ना होता है जो समान स्तर का होता है: अर्थात् एक-दूसरे पर परस्पर भरोसा करना सीखना है।
विश्वास वह होता है जो वैवाहिक जीवन में समय के साथ-साथ बढ़ता जाता है। और हम धीरे-धीरे एक-दूसरे को समझ रहे होते हैं। हम यह सीखते हैं कि हमारे पापों का स्वरूप क्या है, संकट के समय हम किस प्रकार से प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं, हमारा मूल विश्वास क्या है। हम इस बात का पता लगा रहे होते हैं कि हम अपने आप को कितने अच्छे ढँग से जानते हैं।
आरम्भिक वर्षों में, दम्पति या तो विश्वास बना रहे होते हैं या उसे तोड़ रहे होते हैं। पति अपनी पत्नी को उस पर विश्वास करने का भरोसा दे रहा होता है या उसे यह समझा रहा होता है कि ऐसा करना मूर्खतापूर्ण है। मुझे स्मरण है कि मैं अपनी सीमाओं को स्वीकार करने के विपरीत जूली को यह जताना चाहता था कि मेरे पास सब कुछ है। मैं कभी-कभी उससे कहता कि, “इस बात के लिए मुझ पर भरोसा रखो।” परन्तु इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं कि इससे उसका विश्वास नहीं बढ़ा।
समस्या यह है कि: पुरुष यह सोच सकते हैं कि हम पति हैं, इसलिए हम अपने आप ही सम्मान पाने और आधीनता करने के योग्य हैं। परन्तु ऐसा सम्मान, आधीनता, और विश्वास — कभी भी माँगा नहीं जा सकता है। यह बात परमेश्वर की उस आज्ञा को कम नहीं करती कि पत्नी को अपने पति का सम्मान करना चाहिए, परन्तु पति को विश्वासयोग्य बनने के लिए परिश्रम करना होगा।
चैड और एमिली डिक्सहॉर्न लिखते हैं कि, “हमें एक-दूसरे के कर्तव्यों के विषय में इसलिए बताया गया है ताकि उनका कार्य उनके लिए आनन्द का कारण बने — ठीक वैसे ही जैसे पवित्रशास्त्र एक अन्य संदर्भ में, अगुओं और कलीसिया के सदस्यों के लिए कहता है (इब्रानियों 13:17)।”2 (पृष्ठ 43)।
इसलिए, अपनी पत्नी से “मुझ पर भरोसा करो” कहने से अच्छा है कि, पति की प्राथमिकता यह होनी चाहिए कि वह अपने वचन का पक्का और खराई से चलने वाला व्यक्ति बने। दूसरे शब्दों में कहें, तो ऐसा व्यक्ति बनें जिस पर भरोसा किया जा सके।
भरोसा दिलाने के लिए आरम्भिक वर्षों में एक अन्य क्षेत्र पर भी ध्यान देना आवश्यक है: और वह दीनता है।
विवाह आपको ऐसे व्यक्ति के साथ निरन्तर सम्पर्क में रखता है जो कई क्षेत्रों में आपसे भिन्न सोचता है, जिसके कारण अधिकाँश संघर्ष, भ्रम, कड़वाहट, पापपूर्ण निर्णय और बहुत कुछ उत्पन्न जो जाता है। ऐसे क्षणों में हमें परमेश्वर के अनुग्रह की आवश्यकता होती है। और परमेश्वर हमें बताता है कि उस अनुग्रह को कैसे पाया जा सकता है: “वरन् तुम सब के सब एक दूसरे की सेवा के लिये दीनता से कमर बाँधे रहो, क्योंकि परमेश्वर अभिमानियों का विरोध करता है, परन्तु दीनों पर अनुग्रह करता है” (1 पतरस 5:5)।
दीनता वह आधार है जिस पर शेष सब कुछ टिका हुआ रहता है, जिसे परमेश्वर हमारे विवाह के द्वारा हम में करना चाहता है। परन्तु वास्तव में दीनता कैसी दिखती है? कम से कम तीन रूपों में दिखती है:
स्वयं का प्रकटीकरण। दीनता का अर्थ यह समझना है कि आपके जीवन साथी के पास मन को पढ़ने का आत्मिक वरदान नहीं है। यह इस प्रकार से प्रकट होती है कि आप स्वेच्छा से यह बताते हैं कि आप क्या अनुभव कर रहे हैं, क्या सोच रहे हैं, कहाँ संघर्ष कर रहे हैं, क्या अपेक्षा कर रहे हैं, क्या योजना बना रहे हैं, और किस क्षेत्र में आप स्वयं को निर्बल या भ्रमित होने का अनुभव कर रहे हैं। “जो दूसरों से अलग हो जाता है, वह अपनी ही इच्छा पूरी करने के लिये ऐसा करता है, और सब प्रकार की खरी बुद्धि से बैर करता है” (नीतिवचन 18:1)।
सलाह लेना। “बुद्धि श्रेष्ठ है इसलिए उसकी प्राप्ति के लिये यत्न कर; अपना सब कुछ खर्च कर दे ताकि समझ को प्राप्त कर सके” (नीतिवचन 4:7)। यह बुद्धिमानी है कि आप अपने जीवन साथी से महत्वपूर्ण बातों पर चर्चा करें, जैसे कि नौकरी करनी है या नहीं, मकान कब खरीदना है, सन्तान कब उत्पन्न करनी है, या शिक्षा जारी रखनी है या नहीं। परन्तु छोटे-छोटे निर्णयों में भी सलाह लेना उतना ही बुद्धिमानी है—जैसे कहीं पहुँचने का सबसे अच्छा तरीका क्या होगा, कमरे की सफाई कैसे करें, सही ढँग से पुताई कैसे करवाएँ, वस्तुओं को कैसे और कहाँ रखें (ये सभी व्यक्तिगत अनुभव के क्षेत्र हैं)। और अधिकतर इन्हीं विषयों पर चर्चा करना सबसे कठिन होता है!
सलाह को स्वीकार करें। कभी-कभी हमारा जीवन साथी हमें ऐसी सलाह देता/देती है जो हमने नहीं चाही थी। परन्तु वह सलाह चाहे किसी भी प्रकार से दी गई हो, उसे स्वीकार करना ही बुद्धिमानी है। “मूर्ख का मन समझ की बातों में नहीं लगता, वह केवल अपने मन की बात प्रगट करना चाहता है” (नीतिवचन 18:2)। दीनता का अर्थ यह है कि आप अपने जीवन साथी के दृष्टिकोण पर विचार करें और इस सम्भावना के लिए तैयार रहें कि आपका दृष्टिकोण गलत हो सकता है, जब आप 99.9% सुनिश्चित हों कि वह गलत नहीं है, तो यही दीनता का स्वरूप है।
मध्यम वर्ष (8–25): खोज एवं धैर्य
गैरी और बेट्सी रिकुच्ची की उत्कृष्ट पुस्तक में, बेट्सी लिखती हैं: “हम सभी जानते हैं कि विवाह की समझ और दैनिक दिनचर्या उत्साही समर्पण को धीरे-धीरे आरामदायक सहनशीलता जैसा बना सकती है।”3
मध्य वर्षों में आरामदायक सहनशीलता या असुविधाजनक कड़वाहट की बहुत अधिक सम्भावना बनी रहती है। ये ऐसे वर्ष होते हैं जब दायित्व बढ़ते चले जाते हैं, प्रतिबद्धताएँ बढ़ती हैं, कार्यक्रमों में व्यक्ति व्यस्त रहता है, नौकरी का उत्तरदायित्व बढ़ जाता हैं, भविष्य आगे बढ़ता है, और खाली समय कम हो जाता है। यदि आपके बच्चे हैं, तो उन प्रभावों की तीव्रता और भी बढ़ जाती है। और कई बार तो पूरा दिन इन्हीं संघर्षों में बीत जाता है।
परन्तु इन वर्षों में हमारे हृदय आकार ले रहे होते हैं, या तो प्रभु और उसके उद्देश्यों की ओर, या फिर हमारे अपने उद्देश्यों की ओर। हम बार-बार दोहराए जाने वाले नमूनों, आदतों और अभ्यास करने के द्वारा वैसे पति-पत्नी बनते जा रहे होते हैं जैसे हमने बनना चाहिए।
जो दम्पति दशकों के बाद तलाक लेते हैं, वे शरीर से अलग होने से बहुत पहले ही मन से एक-दूसरे से अलग हो चुके होते हैं। इसीलिए नीतिवचन 4:23 हमें यह निर्देश देता है कि: “सबसे अधिक अपने मन की रक्षा कर; क्योंकि जीवन का मूल स्रोत वही है।” इसे दूसरे तरीके से कहें तो, “सही बातों से प्रेम करो।” इसलिए, इन वर्षों में हमारी प्राथमिकता को दर्शाने वाले दो शब्द हैं: खोज और धैर्य।
आइए सर्व प्रथम हम खोज पर विचार करेंगे। यद्यपि हमारे जीवन के कुछ क्षेत्र ऐसे होते हैं जिनका हमें हमेशा पीछा करना चाहिए जैसे कि — मसीह के साथ हमारा सम्बन्ध, हमारी कलीसिया, और हमारा परिवार — फिर भी मैं पतियों के लिए तीन विशेष क्षेत्रों पर प्रकाश डालना चाहता हूँ, जिनका वर्णन इफिसियों 5 और 1 पतरस 3 में किया गया है।
अपना जीवन समर्पित करने का प्रयास करें। प्रभु के साथ हमारे सम्बन्ध के बाद, इन वर्षों में हमारा सबसे बड़ा लक्ष्य यह सीखना होना चाहिए कि अपनी पत्नियों के लिए अपनी प्राथमिकताओं, आराम और स्वयं पर ध्यान देना कैसे त्यागें। हमें अब भी अपनी पत्नियों की अगुवाई करने, उन्हें सुरक्षा देने, उनका मार्गदर्शन करने तथा पहल करने के लिए बुलाया गया है। परन्तु हम ये सब कार्य अपने जीवन को समर्पित करने वाले मन से करते हैं, न कि मन मारकर करते हैं।
हम अपनी पत्नी की चिन्ताओं, विचारों, भावनाओं, कठिनाइयों, संघर्षों और परीक्षाओं के विषय में सबसे पहले सोचने का अभ्यास करना चाहते हैं — जब हम काम से घर आते हैं, या अवकाश के दिन, या जब कोई असुविधाजनक स्थिति आ जाती है। तो यह मानने के विपरीत कि “वह इन सब बातों का ध्यान रख सकती है,” हम पहले आपना कार्य करना चाहते हैं।
हम इस क्षेत्र में बार-बार असफल हो सकते हैं। परन्तु परमेश्वर के अनुग्रह से हम अपनी पत्नी के लिए अपना जीवन समर्पित करने की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं।
समझ में बढ़ने का यत्न करो। पतरस हमें बताता है कि “वैसे ही हे पतियों, तुम भी बुद्धिमानी से पत्नियों के साथ जीवन निर्वाह करो और स्त्री को निर्बल पात्र जानकर उसका आदर करो, यह समझकर कि हम दोनों जीवन के वरदान के वारिस हैं, जिससे तुम्हारी प्रार्थनाएँ रुक न जाएँ” (1 पतरस 3:7)। क्यों? क्योंकि अधिकतर लड़ाई-झगड़े इसलिए होते हैं कि पति अपनी सारी शक्ति इस बात में लगा देता है कि उसकी पत्नी उसके दृष्टिकोण को समझे।
अपनी पत्नी के साथ समझदारी से रहने के लिए निम्नलिखित प्रश्न पूछना आवश्यक है:
आज उसका दिन कैसा बीता?
मेरे कौन से कार्यों से उसे कठिनाई होती है? वह क्या सपने देखती है?
वह आत्मिक रूप से किस बात से जूझ रही है? किन सम्बन्धों से जूझ रही है?
उसकी क्षमता क्या है? उसे किस बात से शान्ति मिलती है?
वह किस बात से आनन्दित होती है? और किस बात से दुखी होती है?
हमारे वैवाहिक जीवन में एक बार मैंने जूली को केवल तभी सुना जब वह फूट-फूट कर रोने लगी थी। और यह बात समझदारी के साथ उसके साथ रहने योग्य, लगभग नहीं के बराबर थी। अतः अगले सप्ताह किसी शान्ति पूर्ण समय में अपनी पत्नी से पूछें कि, “आपके जीवन का ऐसा कौन सा क्षेत्र है जिसके विषय में आपको लगता है कि मैं उसे अच्छी रीति से नहीं समझता हूँ?” फिर उसकी प्रतिक्रिया के विषय में उससे प्रश्न पूछें। गहराई में जाएँ। और आपसी समझ को बढ़ाने का यत्न करें।
स्नेह बढ़ाने का यत्न करें। यह मत मानकर चलें कि उत्साह भरी आग अब बुझ जानी चाहिए, क्योंकि जैसे-जैसे समय बीतता जाता है, तो वैसे-वैसे समय के साथ वैवाहिक जीवन का आनन्द भी कम होता चला जाता है! परन्तु मसीह का कलीसिया के प्रति प्रेम कभी कम नहीं होता, घटता नहीं, उत्साह नहीं खोता, बदलता नहीं, और समाप्त नहीं होता है।
इफिसियों 5:29 कहता है कि वह अपनी दुल्हन का “पालन-पोषण करता है।” उसका प्रेम सदैव उत्साह से भरा होता है। इसलिए हमारा प्रेम भी अपनी पत्नियों के लिए ऐसा ही होना चाहिए। हमारी संस्कृति हमें बताती है कि प्रेम कुछ ऐसा होता है जिसमें हम उतार-चढ़ाव देखते हैं, जो अधिकाँश हमारी भावनाओं पर निर्भर होता है, और यह इस बात से जुड़ा होता है कि क्या दूसरा व्यक्ति प्रेम करने के योग्य है या नहीं। परमेश्वर हमें बताता है कि, “हमने प्रेम इसी से जाना, कि उसने हमारे लिए अपने प्राण दे दिए; और हमें भी भाइयों के लिये प्राण देना चाहिए” (1 यूहन्ना 3:16)।
किसी कारण वश जूली को विवाह के बाद भी विश्वास करना कठिन हो रहा था कि मैं उससे सच्चा प्रेम करता हूँ। 20 वर्ष के बाद परमेश्वर ने उसके मन में एक सन्तोषजनक कार्य किया जिससे उसे विश्वास हो गया कि मैं उससे प्रेम करता हूँ। और तब से मैं आगे बढ़ने का प्रयास कर रहा हूँ। यहाँ कुछ तरीके दिए गए हैं जिनके द्वारा मैंने प्रेम बढ़ाने का यत्न किया है:
- रात्रि में प्रेमियों के लिए मिलना-जुलना कभी भी सरल नहीं होता है, परन्तु नियमित रूप से मिलने से यह कार्य सरल हो जाता है। मिलने के लिए यह आवश्यक नहीं है कि वह मिलना-जुलना महँगा ही हो, यह घर के बाहर भी हो सकता है। परन्तु बाहर जाकर मिलने से आपको एक नया दृष्टिकोण मिल सकता है।
- स्पर्श। क्या आपने कभी ध्यान दिया है कि नवविवाहित जोड़े हमेशा कैसे एक-दूसरे को स्पर्श करते रहते हैं? वे उस रोमांच, वरदान, और उस उपस्थिति के प्रति सचेत रहते हैं। हमें कभी भी उस रोमांच को खोने की आवश्यकता नहीं है जो हमें उस व्यक्ति का हाथ पकड़ने से मिलता है जिसे परमेश्वर ने हमारे लिए बनाया है।
- चुम्बन। चुम्बन एक अति घनिष्ठ क्रिया है जो रोमांटिक इच्छा को व्यक्त करने और उत्तेजित करने के लिए बनायी गई है। अपने चुम्बनों को व्यर्थ न गँवाएँ। हमने एक-दूसरे से विदा लेते समय या एक-दूसरे से मिलते समय चुम्बन लेने की आदत बना ली है। सार्वजनिक रूप से स्नेह प्रदर्शित करना अच्छी बात है!
- चित्र। मैं अपनी पत्नी का चित्र अपने फोन, कंप्यूटर, आईपैड और घड़ी में रखता हूँ। इससे मुझे अपनी पत्नी की सुन्दरता निहारने में सहायता मिलती है।
- बातचीत। कई बार ऐसा होता है कि सन्देश भेजना ही पर्याप्त नहीं होता है। फोन पर बातचीत करें या उससे भी अच्छा यह है कि वीडियो कॉल करते हुए बातचीत करें, यह हमें उस समय निकट ले आता है जब हम दूर होते हैं।
आप स्नेह जताने के अन्य तरीकों में निपुण हो सकते हैं, जैसे छोटे-छोटे सन्देश लिखना, उपहार देना, फूल ख़रीदना, एक-दूसरे के लिए प्रेम भरे नामों का उपयोग करना। आप जो कुछ भी कर सकते हैं अवश्य कीजिए ताकि अपनी पत्नी को लगे कि वह आपके लिए विशेष और अनमोल है।
मध्य आयु के वर्षों में दूसरी प्राथमिकताओं में धैर्य बनाए रखना है। इन दिनों व्यस्त दिनचर्या, चुनौतीपूर्ण भविष्य, बढ़ता हुआ परिवार और बढ़ते हुए उत्तरदायित्व के बीच कभी-कभी ऐसा लग सकता है कि आप कोई विशेष उपलब्धि प्राप्त नहीं कर पा रहे हैं। जीवन नीरस दिनचर्या में बदल सकता है और हर वस्तु एक अन्तहीन कार्य की सूची जैसी लगने लगती है। यह बात विशेषकर उस पत्नी के लिए सच है जो एक माँ भी है।
आपके भीतर कुछ और रोमांचक, कुछ और अद्भुत, कुछ अलग सोच वाला, कुछ और उत्साहजनक, कुछ और फलदायी, कुछ… और की अभिलाषा हो सकती है। आप सोचते हैं, क्या केवल यही सब कुछ है?
परन्तु आप यह कर रहे हैं।
पति और पत्नी के रूप में आप वही जीवन जी रहे हैं जिसके लिए परमेश्वर ने आपको रचा है। आप एक अद्भुत महत्वपूर्ण सम्बन्ध का उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं —अर्थात मसीह और उसकी दुल्हन का सम्बन्ध। यह एक ऐसे प्रेम को दर्शाता है जो वाचा पर आधारित है, केवल भावनाओं पर नहीं, जो यह कहता है कि: “मैं अपनी मृत्यु तक तुम्हारे प्रति विश्वासयोग्य बना रहूँगा।”
पत्नियाँ यह प्रदर्शित कर रही होती हैं कि एक ऐसे संसार में, जहाँ यह माना जाता है कि आप तभी सच में आनन्दित रह सकते हैं जब कोई आपको यह न बताए कि आपको क्या करना है। पति हमारी संस्कृति को यह दर्शा रहे होते हैं कि दया, दृढ़ता, स्पष्ट, भक्ति, प्रेम और त्यागपूर्ण अगुवाई में क्या करना है।
माता-पिता होने के नाते आप अपनी सन्तानों को यह दिखा रहे हैं कि वे मूल्यवान हैं, प्रिय हैं, उनकी देखभाल की जा रही है और वे सुरक्षित हैं। आप उन्हें यह सिखा रहे हैं कि एक परमेश्वर है, जिसने उन्हें बनाया है, और वे उसकी महिमा के लिए रचे गए हैं। आप हमारी संस्कृति में लिंग सम्बन्धी भ्रम की प्रचण्ड लहर के सामने दृढ़ता से खड़े हैं, और ऐसे बेटियों और बेटों का पालन-पोषण कर रहे हैं जो परमेश्वर की योजना में आनन्द पाते हैं। आप एक सुसमाचार-आधारित संस्कृति का निर्माण कर रहे हैं जो आने वाली पीढ़ियों को आकार दे सकती है।
आप कलीसिया का हिस्सा हैं, और प्रत्येक सप्ताह की संगति को आप महत्व देते हैं, और आप मसीह की देह में बनाए जा रहे हैं जो इस बात की साक्षी है कि परमेश्वर पृथ्वी पर क्या कर रहा है।
इसलिए परमेश्वर के उत्साह को स्मरण करते हुए हम धीरज रखे हुए हैं: “इसलिए, अपना साहस न खोएँ, क्योंकि उसका प्रतिफल बड़ा है।क्योंकि तुम्हें धीरज रखना अवश्य है, ताकि परमेश्वर की इच्छा को पूरी करके तुम प्रतिज्ञा का फल पाओ” (इब्रानियों 10:35-36)।
ये वे वर्ष होते हैं जब आपको उस बुलाहट में विश्वासयोग्यता से चलना है जिसके लिए परमेश्वर ने आपको बुलाया है, यह जानते हुए कि आप मनुष्यों की नहीं, प्रभु की सेवा कर रहे हैं। क्योंकि हम इस आशा में आगे देखते हैं कि स्वयं प्रभु हमसे कहेगा, “धन्य हे अच्छे और विश्वासयोग्य दास” (मत्ती 25:21)।
और यह हमारी विश्वासयोग्यता के कारण नहीं होगा, वरन् उसके कारण होगा: “और अपनी आशा के अंगीकार को दृढ़ता से थामे रहें; क्योंकि जिस ने प्रतिज्ञा की है, वह विश्वासयोग्य है” (इब्रानियों 10:23)।
बाद के वर्ष (26+): कृतज्ञता और सेवाभाव
हमारे जीवन के अन्तिम वर्षों में सबसे बड़ी परीक्षा की घडी यह हो सकती है कि हम पीछे मुड़कर पछतावे या निन्दा की दृष्टि से देखें। हम निराशा या हताशा से जूझ सकते हैं — हम पूछ सकते हैं कि “यदि ऐसा होता तो क्या होता” या “क्यों नहीं हुआ” या इस बात में व्यस्त हो सकते हैं कि हमने क्या किया या क्या नहीं किया, और वे गलत निर्णय जिन्हें हम कभी दोबारा सुधार नहीं पाएँगे।
इसीलिए जीवन के अन्तिम वर्ष कृतज्ञता को प्राथमिकता देने का समय होता है। परमेश्वर ने आपको इस स्थान तक पहुँचाया है और उसने हर कदम पर विश्वासयोग्यता के साथ आपकी अगुवाई की है, आपको कई बार बुराई से बचाया है, और कई बार आपके हर पाप और असफलता से छुटकारा दिलाया है। जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं तो महत्वपूर्ण बात यह है कि हम अपने कार्यों पर नहीं, वरन् परमेश्वर के कार्यों पर ध्यान लगाएँ:
धर्मी लोग खजूर के समान फूले फलेंगे, और लबानोन के देवदार के समान बढ़ते रहेंगे।वे यहोवा के भवन में रोपे जाकर, हमारे परमेश्वर के आँगनों में फूले फलेंगे।वे पुराने होने पर भी फलते रहेंगे, और रस भरे और लहलहाते रहेंगे,जिससे यह प्रगट हो, कि यहोवा सच्चा है; वह मेरी चट्टान है, और उसमें कुटिलता कुछ भी नहीं (भजन संहिता 92:12-15)।
ये वर्ष यह बताने के हैं कि “प्रभु धर्मी है और उसमें कुछ भी अधर्म नहीं।”
बाद के वर्षों में कृतज्ञता दिखाना आरम्भ करने का समय नहीं हैं, वरन् इसमें उत्कृष्ट होने का समय हैं। क्योंकि जिनके पास देखने के लिए आँखें हैं वे जानते हैं कि उनका जीवन परमेश्वर की दया और करुणा से भरा हुआ है, और वे भजनकार के साथ कह सकते हैं कि: “यहोवा तू मेरा चुना हुआ भाग और मेरा कटोरा है; मेरे भाग को तू स्थिर रखता है।
5 भाग V:
दीर्घकाल तक के लिए विवाह
मेरे लिये माप की डोरी मनभावने स्थान में पड़ी, और मेरा भाग मनभावना है” (भजन संहिता 16:5-6)।
जूली और मैं अधिकतर एक-दूसरे को यह स्मरण कराते हैं कि हमारी आशीषें हमारी परीक्षाओं से कहीं अधिक बढ़कर हैं। जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं तो पाते है कि उसकी प्रभुता न केवल हमें एक साथ लाने में, वरन् हमारे विवाह के आरम्भ में अंडाशय की शल्य चिकित्सा, दो गर्भपात, डकैतियों, कारों की चोरी, एक बेटी जिसका पति उसे पाँच बच्चों के साथ छोड़ गया, एक पोता जिसने 13 वर्ष की आयु से पहले ही दो बार रक्त कैंसर से लड़ाई लड़ी, और हाल ही में स्तन कैंसर से दो बार जूझने के बाद भी प्रभु ने हमें सम्भाले रखा हुआ है।
इन सबके बीच परमेश्वर कभी भी विश्वासयोग्य होने में असफल नहीं हुआ और उसने उस हर बात को भलाई में बदल दिया जिसे शत्रु ने बुराई के लिए ठहराया था। और भले ही हमने इन परीक्षाओं में उसके द्वारा हमें सँभालने में प्रभु की विश्वासयोग्यता न देखी हो, तो भी हम पीछे मुड़कर देखते हैं कि परमेश्वर ने बिना हमारी जानकारी या माँगने के बिना ही अपने एकलौते पुत्र को भेजा ताकि वह वह परिपूर्ण जीवन जिए जो हम कभी नहीं जी सकते थे, और वह उचित दण्ड पाए, वह दण्ड जो हमें मिलना था, और नए जीवन के लिए जी उठे ताकि हमें क्षमा, परमेश्वर के परिवार में लेपालक होने, और अनन्त आनन्द की निश्चिन्त आशा मिल सके।
इसलिए हम आभारी हैं। परमेश्वर के अटल, अपरिवर्तनीय, कभी न समाप्त होने वाले प्रेम के लिए आभारी हैं।
बाद के वर्षों की दूसरी प्राथमिकता सेवाभाव है। पौलुस हमें 2 कुरिन्थियों 4:16 में स्मरण कराता है कि हमारा बाहरी मनुष्यत्व नाश हो जाता है और यह बात बहुत स्पष्ट दिखाई देती है। परन्तु बुढ़ापे का समय आराम करने, अपने लिए जीने और किसी की सेवा न करने के लिए नहीं है। सेवा करने के अवसर बहुतायत की मात्रा में हैं! और यही कारण है कि जैसे-जैसे हम बड़े होते चले जाते हैं, यह अपेक्षा करना बहुत आवश्यक हो जाता है कि परमेश्वर हमें और अधिक दूसरों की सेवा के लिए उपयोग करेगा।
हमारे पास सेवा करने के लिए अधिक समय होता है। इस वर्षों में हममें से अधिकाँश लोगों के बच्चे हमारे आसपास नहीं होते हैं हमारे कार्य का उत्तरदायित्व भी कम हो जाता है, साथ ही हमारे पास अधिक स्वेच्छा से उपयोग करने का समय होता है।
ज्ञान एक प्रचुर संसाधन है, जो किसी एक स्रोत तक सीमित नहीं है। यदि हम केवल अपनी गलतियों में से ही बाँटें, तो भी हमारे पास युवा दम्पतियों को देने के लिए बहुत कुछ होगा! परन्तु हमने उन बातों से भी सीखा है जो हमारे लिए अच्छी प्रमाणित हुई हैं। बड़ी आयु के दम्पति उन लोगों के लिए ज्ञान का भण्डार होते हैं जो सलाह लेने के लिए अधिकाँश केवल अपनी ही आयु के लोगों के पास जाते हैं।
हमारे पास अधिक संसाधन हैं। स्कूल, नौकरी और परिवार पालने का उत्तरदायित्व समाप्त हो गया है। जब मुझसे सेवानिवृत्ति के बारे में पूछा जाता है, तो मुझे नहीं पता कि क्या कहूँ। निस्संदेह, जैसे-जैसे बाहरी मनुष्यत्व नष्ट होता जाएगा, तो दूसरों के लिए अपना जीवन समर्पित करने की हमारी क्षमता और मात्रा सीमित होती चली जाएगी। परन्तु मैं यीशु के शब्दों को स्मरण किए बिना नहीं रह सकता: “क्योंकि बड़ा कौन है, वह जो भोजन पर बैठा या वह जो सेवा करता है? क्या वह नहीं जो भोजन पर बैठा है? पर मैं तुम्हारे बीच में सेवक के समान हूँ”(लूका 22:27)।
क्या हम यीशु के समान नहीं होना चाहते? क्या हम वह नहीं बनना चाहते जो सेवा करता है?
चर्चा एवं मनन:
- क्या यहाँ बताए गए विवाह के चरण आपके अपने विवाह पर भी लागू होते हैं? आप जिस चरण में हैं, उसकी प्राथमिकताओं में आप कैसे आगे बढ़ सकते हैं?
- किसी मार्गदर्शक से पूछें कि क्या उन्होंने विवाह के इन चरणों में कुछ सीखा है और उस पर चर्चा करें।
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निष्कर्ष
मैं प्रार्थना करता हूँ कि इस क्षेत्रीय मार्गदर्शिका ने आपको यह समझने में सहायता की होगी कि विवाह जिसकी योजना परमेश्वर ने बनाई है, वह संजोने योग्य तथा संघर्ष करने योग्य है। विवाह को पवित्र मानना आवशयक है। और यह ऐसा है जिसका हम पूरे विश्वास के साथ पालन कर सकते हैं, क्योंकि जैसा कि जॉन न्यूटन ने लिखा है:
हम पहले ही अनेक खतरों, कष्टों और फन्दों से होकर निकल चुके हैं। यह अनुग्रह ही है जो हमें अब तक सुरक्षित लेकर आया है, और अनुग्रह ही हमें हमारे सदा के निवास स्थान में पहुँचाएगा।
विवाह की इस अद्भुत, रहस्यमयी, चुनौतीपूर्ण, साहसिक, अद्भुत यात्रा में आप जहाँ कहीं भी हों — परमेश्वर का अनुग्रह आपको आपके सदा के निवास स्थान में पहुँचाएगा।
अब शान्तिदाता परमेश्वर जो हमारे प्रभु यीशु को जो भेड़ों का महान रखवाला है सनातन वाचा के लहू के गुण से मरे हुओं में से जिलाकर ले आया, तुम्हें हर एक भली बात में सिद्ध करे, जिससे तुम उसकी इच्छा पूरी करो, और जो कुछ उसको भाता है, उसे यीशु मसीह के द्वारा हम में पूरा करे, उसकी महिमा युगानुयुग होती रहे। आमीन (इब्रानियों 13:20-21)।
अन्तिम टिप्पणियाँ
- जॉन पाइपर, क्षणिक विवाह: स्थायित्व का दृष्टान्त (व्हीटन, आईएल: क्रॉसवे, 2012), 34।
- चाड और एमिली वैन डिक्सहॉर्न, गॉस्पेल-शेप्ड मैरिज: ग्रेस फॉर सिनर्स टू लव लाइक सेंट्स (व्हीटन, आईएल: क्रॉसवे, 2022), 43.
- गैरी और बेट्सी रीकुच्ची, लव दैट लास्ट्स: जब विवाह अनुग्रह से होता है (व्हीटन, आईएल: क्रॉसवे, 2006), 49।
विषयसूची
- 1 भाग 1:
- विवाह क्या है?
- कलीसिया के साथ मसीह के सम्बन्ध को दर्शाने के लिए
- हमें मसीह के समान और अधिक बनाने के लिए
- परमेश्वर के राज्य का विस्तार करने के लिए
- चर्चा एवं मनन:
- 2 भाग II: विवाहकिस लिए होता है?
- मित्र होने का अर्थ जानें
- 1. दीनता के साथ आगे बढ़ें
- 2. प्रार्थना के साथ आगे बढ़ें
- 3. खराई से आगे बढ़ें
- 4. शुद्धता के साथ आगे बढ़ें
- 5. उद्देश्य पूर्ण ढँग से आगे बढ़ें।
- 6. विश्वास के साथ आगे बढ़ें
- चर्चा एवं मनन:
- 3 भाग III:मैं कैसे ढूँढूँएक जीवन साथी?
- सुसमाचार हमारी पहचान के विषय में हमारी समझ को परिवर्तित कर देता है
- सुसमाचार क्षमा के विषय में हमारी समझ को बदल देता है
- सुसमाचार परिवर्तन के विषय में हमारी समझ को बदल देता है
- चर्चा एवं मनन:
- 4 भाग IV:सुसमाचार जोअन्तर लाता है
- आरम्भिक वर्ष (1–7): विश्वास और दीनता
- मध्यम वर्ष (8–25): खोज एवं धैर्य
- बाद के वर्ष (26+): कृतज्ञता और सेवाभाव
- 5 भाग V:दीर्घकाल तक के लिए विवाह
- चर्चा एवं मनन:
- निष्कर्ष
- अन्तिम टिप्पणियाँ