#1 मार्गदर्शक: कैसे एक मार्गदर्शक को ढूँढ़ें, और उसके समान कैसे बनें
परिचय: कैसे एक मार्गदर्शक को ढूँढ़ें, और उसके समान कैसे बनें
पिछले बीस वर्षों से कॉलेज के छात्रों से भरी एक कलीसिया के पास्टर के रूप में सेवा करने के पश्चात्, मुझ से अधिकाँश एक प्रश्न पूछा जाता रहा है कि, “मैं एक मार्गदर्शक कैसे ढूँढ़ सकता हूँ?” यह प्रश्न सामान्यतः किसी छात्र या हाल ही में पास हुए व्यक्ति के द्वारा पूछा जाता है, जो अपनी उम्र के साथियों से घिरा हुआ होता है, तथा ज्ञान, सलाह को पाने के लिए किसी ऐसे व्यक्ति के साथ सम्बन्ध स्थापित करने के लिए लालसा रखता है जो उससे उम्र में बड़ा हो तथा जीवन के अनुभव में आगे हो। भले ही उन्हें ठीक से पता भी न हो कि इसका क्या अर्थ है, परन्तु वे एक मार्गदर्शक चाहते हैं। कई लोग तो यह भी मानते हैं कि यह मसीही जीवन का एक प्रकार का जन्मसिद्ध अधिकार है।
अनिवार्य रूप से कहना, हमारी मण्डली में युवा महिलाओं एवं पुरुषों की इस इच्छा और मार्गदर्शक की खोज ने दूसरे लोगों के अन्दर इस प्रश्न को उत्पन्न किया कि, “मैं किसी को मार्गदर्शक कैसे बनाऊँ?” हालाँकि उम्र में बड़े होने के कारण या जीवन के किसी दूसरे पड़ाव पर होने के कारण आप स्वयं ही एक उम्मीदवार बन सकते हैं, परन्तु जब कोई आपसे उनका मार्गदर्शन करने के लिए कहता है, तो इसका क्या अभिप्राय होता है? वे वास्तव में क्या पूछ रहे होते हैं? किसी का मार्गदर्शन करने में क्या-क्या सम्मिलित होता है? आप यह कैसे करते हैं?
पिछले कुछ वर्षों में हमने अपनी कलीसिया में सैकड़ों बार इस समस्या को देखा है। लोग मार्गदर्शन पाने के लिए उत्सुक रहते हैं। कुछ दूसरे लोग मार्गदर्शक बनने के लिए उत्सुक रहते हैं। फिर भी दोनों समूहों में से कोई भी यह नहीं जानता कि आरम्भ कहाँ से करना है। मूल बात यह है कि उन्हें मार्गदर्शन की सही समझ ही नहीं होती है। इसलिए इस मार्गदर्शिका का उद्देश्य मार्गदर्शक को ढूँढ़ने और स्वयं एक मार्गदर्शक बनने के अर्थ को स्पष्ट करना है।
मार्गदर्शन क्या है?
सामान्यतः कहा जाए तो, मार्गदर्शन सम्पूर्ण जीवन के लिए ईश्वरीय अगुवाई है।
मसीही होने के नाते, यह हमारा कर्तव्य है कि हम दूसरों को उनके सम्पूर्ण जीवन को यीशु मसीह के अधीन लाने में सहायता करें। इसलिए, मार्गदर्शन में हर प्रकार की अगुवाई सम्मिलित होती है, जहाँ एक व्यक्ति अपने ज्ञान, कौशल और अनुभव को दूसरे व्यक्ति की उन्नति करने में सहायता करने के लिए साझा करता है।
मार्गदर्शक एक ऐसा व्यक्ति होता है जिसका जीवन अनुकरणीय होता है, जो सोच समझ कर ऐसे सम्बन्ध बनाने में निवेश करता है जहाँ दोनों को लाभ होता है। शिष्य सीखने और आगे बढ़ने के लिए उत्सुक रहते हैं, तथा एक योग्य उदाहरण के द्वारा ज्ञान और मार्गदर्शन प्राप्त करना चाहते हैं। इस प्रकार, मसीही मार्गदर्शन एक ऐसा सम्बन्ध होता है जहाँ आयु में बड़ा व्यक्ति जीवन के व्यापक ज्ञान को अपने से छोटे व्यक्ति को देता है। यह सम्बन्ध बहुत ही अधिक विस्तृत होता है और इस में वह भी सम्मिलित होता है जिसे हम शिष्यत्व कहते हैं।
मार्गदर्शन के इस विवरण से आगे, पवित्रशास्त्र मार्गदर्शन का एक शिक्षाप्रद और स्पष्ट उदाहरण देता है जिस पर अब हम विचार करेंगे।
नए नियम में प्रेरित पौलुस और तीमुथियुस के बीच के सम्बन्ध को देखकर मार्गदर्शन का एक उत्तम उदाहरण मिलता है, वास्तव में, पिछले कुछ वर्षों में कई लोगों ने मार्गदर्शन के लिए अपने प्रश्नों और निवेदनों को इसी सम्बन्ध के आस-पास रखा है।
ऑडियो मार्गदर्शिका
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भाग I: पौलुस एवं तीमुथियुस
प्ररितों के काम की पुस्तक और पौलुस के द्वारा तीमुथियुस को लिखी गई दो पत्रियों (1 और 2 तीमु.) से पता चलता है कि सेवकाई में तीमुथियुस यीशु के एक युवा शिष्य से पौलुस का उत्तराधिकारी बन गया। पौलुस के मार्गदर्शन में तीमुथियुस की उन्नति की झलकियाँ हमें मार्गदर्शन के लिए एक दृढ़ आधार और मार्गदर्शन का नमूना प्रदान करती हैं। यह लेख पवित्रशास्त्र में वर्णित तीमुथियुस के प्रति पौलुस के मार्गदर्शन पर विचार करता है, और आज के समय में मार्गदर्शन के व्यावहारिक पहलुओं पर प्रकाश डालता है।
हो सकता हैं कि आपका धार्मिक विचारों को छोड़कर सीधे व्यावहारिक पहलुओं पर ध्यान देने का मन हो, परन्तु ऐसा न करें। पौलुस और तीमुथियुस के सम्बन्ध पर यह एक रूपक अभिव्यक्ति प्रतीत होती हैं। इसका उद्देश्य हमें मार्गदर्शन के लिए एक विशेष मसीही दृष्टिकोण के लिए एक धार्मिक आधार प्राप्त करने और उसे स्पष्ट करने में सहायता करना है। यदि आप मार्गदर्शन के उद्देश्य को नहीं समझते हैं, तो आप वास्तव में किसी का मार्गदर्शन कैसे कर सकते हैं या किसी से मार्गदर्शन का लाभ कैसे उठा सकते हैं? पौलुस और तीमुथियुस के सम्बन्धों से प्राप्त यह विचार एक ठोस आधार और व्यावहारिक श्रेणियाँ प्रदान करते हैं जो मार्गदर्शक और मार्गदर्शन प्राप्त करने वालों दोनों को उनके मार्गदर्शन से सम्बन्धित आत्मविश्वास से जुड़े रहने में योग्य बनाते हैं।
तीमुथियुस को पौलुस की सलाह: सारांश
यद्यपि तीमुथियुस के आरम्भिक जीवन और विश्वास के विषय में बहुत अधिक जानकारी नहीं है, परन्तु प्रेरित पौलुस द्वारा तीमुथियुस को लिखे गए पत्र से हमें पता चलता है कि उसे अपनी यहूदी माता यूनीके और दादी लोइस द्वारा छोटी उम्र से ही परमेश्वर का भय मानना सिखाया गया था (2 तीमुथियुस 1:5)। ये परमेश्वर का भय मानने वाली स्त्रियाँ तीमुथियुस की पहली और आधारभूत मार्गदर्शक थीं। तीमुथियुस के बचपन से ही, इन विश्वासयोग्य स्त्रियों ने उसे पवित्रशास्त्र से परिचित कराया और उसके लिए विश्वास का नमूना प्रस्तुत किया (2 तीमुथियुस 3:14-15)।
जितना हम बता सकते हैं वह यह है, कि पौलुस के द्वारा तीमुथियुस को सलाह देना उसकी दूसरी सुसमाचार प्रचार-प्रसार यात्रा के दौरान लुस्त्रा शहर में आरम्भ हुआ (प्रेरितों के काम 16:1)। जब पौलुस ने तीमुथियुस को पाया, तब तक वह अपनी कलीसिया में सम्मानित व्यक्ति बन चुका था (प्रेरितों के काम 16:2)। दूसरे शब्दों में कहें, तो वह एक उत्तम शिष्य बनने के योग्य था। यात्रा के दौरान, पौलुस ने तीमुथियुस में कुछ ऐसा देखा जिसने उसे इस युवक को अपने सुसमाचार प्रचार-प्रसार में सम्मिलित करने के लिए प्रेरित किया (प्रेरितों 16:3)। पौलुस मार्गदर्शन के क्षेत्र में अधिक सक्रिय और अवसरों का लाभ उठाने वाला व्यक्ति दिखाई देता है। वह उन लोगों को सलाह देने के अवसरों की खोज में रहता था, जो तीमुथियुस के समान अगली पीढ़ी में सबसे अलग थे। तीमुथियुस के साथ सलाह देने का आरम्भ उसने इसी प्रकार किया था।
लुस्त्रा छोड़ते ही तीमुथियुस ने पौलुस और सीलास की सेवकाई में तत्परता से काम करना आरम्भ कर दिया था। यात्रा के आरम्भ में ही पौलुस ने तीमुथियुस को सीलास के साथ छोड़ दिया था, जिससे उसे अधिक उत्तरदायित्व सम्भालने का कई अवसरों में से पहला अवसर मिला (प्रेरितों के काम 17:14)। पौलुस ने तीमुथियुस को यात्रा के समय विशेष कार्य भी सौंपे (प्रेरितों 19:22) और उसे अधिक से अधिक अगुवाई करने का दायित्व भी सौंपा। पौलुस ने तीमुथियुस को पूरी रीति से तैयार किया और उसे सेवकाई में सफल बनाने के लिए कठिन परिश्रम किया। प्रेरितों के काम की पुस्तक में तीमुथियुस ने जो कुछ देखा, उसका सारांश तो दिया गया है, परन्तु उसने क्या सीखा और यात्रा के समय पौलुस ने उसे क्या समझाया, इस सम्बन्ध में हम मात्र कल्पना ही कर सकते हैं। इसमें कोई सन्देह नहीं है कि इन अनुभवों के कारण तीमुथियुस का विश्वास, उसकी बुलाहट, उसका चरित्र और उसकी योग्यताओं में शीघ्रता से उन्नति हुई। और जैसे-जैसे समय बीतता गया, तीमुथियुस, पौलुस के कई शिष्यों में से बढ़कर प्रेरित का सबसे भरोसेमंद और विश्वासयोग्य सहकर्मियों में से एक बन गया।
तीमुथियुस को एक सहकर्मी (रोमियों 16:21; 1 थिस्सलुनीकियों 3:2) और मसीह में भाई (2 कुरिन्थियों 1:1; कुलुस्सियों 1:1; 1 थिस्सलुनीकियों 3:2) से कहीं अधिक मानते हुए, पौलुस ने तीमुथियुस को प्रभु में अपना प्रिय और विश्वासयोग्य पुत्र माना (1 कुरिन्थियों 4:17; 1 तीमुथियुस 1:18; 2 तीमुथियुस 1:2)। अपने निजी पत्रों में, तीमुथियुस को सम्बोधित करते हुए, पौलुस हमें उनके मार्गदर्शक के सम्बन्ध की एक झलक दिखाता है, जिसमें उसकी यह आशा भी सम्मिलित है कि प्रेरित के चले जाने के पश्चात् तीमुथियुस कैसे आगे बढ़ेगा और कैसे सफल होगा।
पौलुस भले ही तीमुथियुस को एक विशेष कार्य अर्थात् — सेवकाई — के लिए प्रशिक्षित कर रहा था, परन्तु पौलुस की तीमुथियुस को दी गई सलाह में बहुत कुछ ऐसा है जो किसी भी मार्गदर्शक के सम्बन्ध पर लागू होता है। हाँ, तीमुथियुस को लिखे पौलुस के दोनों पत्रों का मुख्य विषय यह है कि वह तीमुथियुस को उसके जीवन के चार पहलुओं — विश्वास, ईश्वरीय बुलाहट, चरित्र और योग्यताओं — में प्रशिक्षित करना चाहता था। क्योंकि प्रेरित पौलुस जानता था कि उसके शिष्य के जीवन के ये चार क्षेत्र उसकी उन्नति के लिए आधार हैं। अतः, पौलुस के नमूने से हम यह सीखते हैं कि हमारे मार्गदर्शन का मुख्य उद्देश्य इन चारों क्षेत्रों में शिष्य की उन्नति करना है। तीमुथियुस को लिखे पौलुस के दो पत्रों का गहन अध्ययन इन श्रेणियों को और भी अधिक स्पष्ट करता है।
तीमुथियुस की पहली पत्री
तीमुथियुस को लिखे पौलुस के पहले पत्र में तीमुथियुस को इफिसुस शहर में कलीसिया की अगुवाई करने और उसकी देखभाल करने का निर्देश दिया गया है। अपने एक विशेष कार्य के लिए पौलुस ने तीमुथियुस को इफिसुस में छोड़ दिया ताकि वह शहर में झूठे शिक्षकों का सामना कर सके।1 यह काम सरल नहीं था। सम्भवतः तीमुथियुस की आयु तीस वर्ष के आसपास रही होगी2 और संसार के मानकों के अनुसार अभी भी वह युवा ही था, पौलुस को विश्वास था कि उसका शिष्य इस पास्टर के चुनौती भरे कार्य के लिए योग्य है। उसने इफिसुस में अपने प्रतिनिधि के रूप में तीमुथियुस की पुष्टि करने और उसे सेवा के प्रति उत्साहित करने के लिए पत्र लिखा।3 यह पत्र उन मार्गदर्शकों के लिए गहरी समझ रखता है जो यह सीखना चाहते हैं कि अगली पीढ़ी के अगुवों की कैसे उन्नति करनी है।
दृढ़ विश्वास और बुलाहट
पौलुस ने तीमुथियुस को लिखे अपने पहले पत्र का आरम्भ एक व्यक्तिगत सम्बोधन और आज्ञा के साथ किया, जिसमें उसने उसे अपने सम्पूर्ण जीवन और कार्य के मुख्य उद्देश्य को स्मरण रखने के लिए प्रोत्साहित किया: “आज्ञा का सारांश यह है कि शुद्ध मन और अच्छे विवेक, और निष्कपट विश्वास से प्रेम उत्पन्न हो।” (1:5) तीमुथियुस को इस कार्य को पूरा करने के लिए उसे मुख्य बात का स्मरण कराते हुए, पौलुस उसे यह स्मरण रखने का आग्रह करता है, “हे पुत्र तीमुथियुस, उन भविष्यद्वाणियों के अनुसार जो पहले तेरे विषय में की गई थीं, मैं यह आज्ञा सौंपता हूँ, कि तू उनके अनुसार अच्छी लड़ाई को लड़ता रह।और विश्वास और उस अच्छे विवेक को थामे रह जिसे दूर करने के कारण कितनों का विश्वास रूपी जहाज डूब गया।” (1:18-19) पत्र के आरम्भ में पौलुस तीमुथियुस को उसकी सेवकाई के लिए निर्देश देने से पहले, सबसे आवश्यक बात का स्मरण कराता है। वह उसे उसकी सेवकाई की बुलाहट का स्मरण कराता है और उसके विश्वास के सिद्धान्तों को दृढ़ता से थामे रहने का आग्रह करता है, जो उसकी सेवकाई का आधार हैं।
पौलुस का विश्वास है कि तीमुथियुस का सही सिद्धान्त और सेवकाई के लिए मिली उसकी बुलाहट — जो आत्मा के वरदान और उसके विषय में की गई भविष्यद्वाणियों से प्रमाणित है4 — उसे आगे आने वाले कठिन कार्य के लिए योग्य बनाएगा। पौलुस समझता है कि यदि तीमुथियुस अपने सिद्धान्तों और अपनी सेवकाई में विश्वास को दृढ़ता से नहीं थामे रखेगा, तो उसका विश्वास और सेवकाई रूपी जहाज डूब जाएगा। इसी बात से वह अपने शिष्य को लिखे इस पत्र का आरम्भ करता है।
पौलुस पत्र के अन्त में भी इसी प्रकार की बात कहता है। तीमुथियुस के विश्वास और उसकी ईश्वरीय बुलाहट को उसके जीवन में कैसे दिखना चाहिए, इस ओर संकेत करते हुए पौलुस उसे अपने शारीरिक इच्छाओं के प्रलोभनों से दूर रहने की सलाह देता है। “विश्वास की अच्छी कुश्ती लड़; और उस अनन्त जीवन को धर ले, जिसके लिये तू बुलाया गया, और बहुत से गवाहों के सामने अच्छा अंगीकार किया था।मैं तुझे परमेश्वर को, जो सबको जीवित रखता है, और मसीह यीशु को गवाह करके जिसने पुन्तियुस पिलातुस के सामने अच्छा अंगीकार किया, यह आज्ञा देता हूँ,कि तू हमारे प्रभु यीशु मसीह के प्रगट होने तक इस आज्ञा को निष्कलंक और निर्दोष रख।”(6:12-14) कुछ वाक्यों के पश्चात्, पौलुस ने यह विनती करते हुए पत्र समाप्त किया, “हे तीमुथियुस इस धरोहर की रखवाली कर। जो तुझे दी गई है और मूर्ख बातों से और विरोध के तर्क जो झूठा ज्ञान कहलाता है दूर रह। (6:20) यह ध्यान देने योग्य बात है कि पौलुस ने पत्र का अन्त भी उसी प्रकार से किया जिस प्रकार से उसने इसे आरम्भ किया था, तथा तीमुथियुस पर यह प्रभाव डाला कि उसका दृढ़ विश्वास, जो उसके अच्छे अंगीकार में स्पष्ट दिखाई देता है, इफिसुस में उसकी पास्टरीय सेवकाई के लिए सर्व श्रेष्ठ है।5
पौलुस के पत्र का आरम्भ और अन्त, विशेष रूप से मसीही मार्गदर्शन के दो महत्वपूर्ण सिद्धान्तों की गहरी समझ प्रदान करते हैं। जब पौलुस तीमुथियुस को बताता है कि उसे इफिसुस में अपनी सेवकाई किस प्रकार से करनी चाहिए, तो वह इस बात पर बल देता है कि सबसे पहले यह आवश्यक है कि तीमुथियुस अपने विश्वास के अंगीकार और अपनी दृढ़ बुलाहट के विश्वास को स्मरण रखे, उसे सुरक्षित रखे और उसकी रक्षा करे। पौलुस ने अपने पत्र का आरम्भ और अन्त इस प्रकार से किया है जिससे तीमुथियुस के लिए इस बात को अपने हृदय में स्थान देने के लिए उसकी वेदना और आग्रह स्पष्ट हो जाता है। फिर भी, अपने मार्गदर्शन में पौलुस तीमुथियुस को यह भी साफ रीति से बताता है कि उसे केवल अपने मसीही विश्वास को स्मरण रखने या अपनी बुलाहट के प्रति आत्मविश्वास से कहीं अधिक आवश्यकता है, ताकि वह सफल हो सके। तीमुथियुस को अपने चरित्र और योग्यताओं को विकसित करते हुए इन मूलभूत बातों पर आगे बढ़ना होगा।
चरित्र एवं योग्यता
पवित्रशास्त्र में मार्गदर्शन सम्बन्धी सबसे अविस्मरणीय अनुच्छेदों में से एक पर पौलुस मार्गदर्शन के उद्देश्य पर अधिक प्रकाश डालता है:
यदि तू भाइयों को इन बातों की सुधि दिलाता रहेगा, तो मसीह यीशु का अच्छा सेवक ठहरेगा; और विश्वास और उस अच्छे उपदेश की बातों से, जो तू मानता आया है, तेरा पालन-पोषण होता रहेगा।पर अशुद्ध और बूढ़ियों की सी कहानियों से अलग रह; और भक्ति की साधना कर।क्योंकि देह की साधना से कम लाभ होता है, पर भक्ति सब बातों के लिये लाभदायक है, क्योंकि इस समय के और आनेवाले जीवन की भी प्रतिज्ञा इसी के लिये है।यह बात सच और हर प्रकार से मानने के योग्य है।क्योंकि हम परिश्रम और यत्न इसलिए करते हैं कि हमारी आशा उस जीविते परमेश्वर पर है; जो सब मनुष्यों का और निज करके विश्वासियों का उद्धारकर्ता है।
इन बातों की आज्ञा दे और सिखाता रह।कोई तेरी जवानी को तुच्छ न समझने पाए; पर वचन, और चाल चलन, प्रेम, और विश्वास, और पवित्रता में विश्वासियों के लिये आदर्श बन जा।जब तक मैं न आऊँ, तब तक पढ़ने और उपदेश देने और सिखाने में लौलीन रह।उस वरदान से जो तुझ में है, और भविष्यद्वाणी के द्वारा प्राचीनों के हाथ रखते समय तुझे मिला था, निश्चिन्त मत रह। इन बातों को सोचता रह और इन्हीं में अपना ध्यान लगाए रह, ताकि तेरी उन्नति सब पर प्रगट हो।अपनी और अपने उपदेश की चौकसी रख। इन बातों पर स्थिर रह, क्योंकि यदि ऐसा करता रहेगा, तो तू अपने, और अपने सुननेवालों के लिये भी उद्धार का कारण होगा। (1 तीमुथियुस 4:6-16)
इन आयतों में पौलुस इस बात को बार-बार दोहराता है कि तीमुथियुस को ‘विश्वास और सही सिद्धान्तों में स्वयं को प्रशिक्षित करना आवश्यक है, जिनका उसने अनुसरण किया है (4:6)। वह अपनी पिछली चेतावनी को भी दोहराता है कि “उस वरदान के विषय में निश्चिन्त मत रह” (4:14) जो परमेश्वर ने तीमुथियुस को दिया है। यह तीमुथियुस के लिए पौलुस की चिन्ता का एक और प्रमाण है कि वह अपने विश्वास और बुलाहट में दृढ़ बना रहे। परन्तु इस खण्ड में और भी बहुत कुछ है।
इस लेख का मुख्य बिन्दु तीमुथियुस के दृढ़ विश्वास और उसकी दृढ़ बुलाहट पर बल देना है ताकि वह अपनी दो मुख्य सेवकाई को आकार दे सके: अर्थात् उसकी जीवनशैली और उसकी शिक्षा। गॉर्डन फी स्पष्ट करते हैं कि यह अनुच्छेद दर्शाता है कि पौलुस चाहता था कि तीमुथियुस एक आदर्श बने (आयत 12, 14), भक्तिमय जीवन (आयत 12) और सेवकाई (आयत 13-14) दोनों में — यह सब उसके श्रोताओं के हित में है।”6 दूसरे शब्दों में, अपने विश्वास और बुलाहट के आधार पर तीमुथियुस को एक दोषरहित चरित्र और उल्लेखनीय योग्यता वाला व्यक्ति बनना था। क्योंकि वह मसीही जीवन की शिक्षा देता और उसका आदर्श प्रस्तुत करता था। तीमुथियुस की जीवनशैली (आयत 7, 8, 12, 15-16) और उसकी शिक्षा (आयत 6, 11, 13, 15-16) का तालमेल, जो उसके विश्वास और बुलाहट से प्रेरित था तथा उसे बताया गया कि पास्टरीय सेवकाई एक वास्तविक कार्य है, जिसके लिए तीमुथियुस को स्वयं को समर्पित करना था।
पहला तीमुथियुस हमें बतात है, कि मार्गदर्शन का उद्देश्य शिष्य के विश्वास और बुलाहट को दृढ़ करना होता है। एक शिष्य परमेश्वर के विषय में क्या विश्वास करता है और परमेश्वर ने उसे बड़ी आज्ञा के रूप में संसार में सेवकाई करने के लिए क्या वरदान दिया है और क्या करने के लिए बुलाया है, ये बातें उसकी उन्नति के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं। फिर भी, यह पत्र हमें बताता है कि एक शिष्य के चरित्र और योग्यता में उन्नति करना किनता महत्वपूर्ण है। यदि हम 1 तीमुथियुस में पौलुस के मार्गदर्शन के उद्देश्यों को संक्षेप में कहें, तो हम कहेंगे कि वे उद्देश्य व्यक्ति के दृढ़ विश्वास, बुलाहट, चरित्र और योग्यता को विकसित करना है। हम इसे 2 तीमुथियुस में भी देखते हैं।
तीमुथियुस की दूसरी पत्री
तीमुथियुस को लिखी पौलुस की दूसरी पत्री उसकी पहली पत्री से अधिक व्यक्तिगत है। यद्यपि पौलुस इफिसुस की कलीसिया में व्याप्त अनेक समस्याओं के लिए चिन्तित है, फिर भी इस पत्री में उसका स्वर पूरी रीति से भिन्न है। इसका एक बड़ा कारण यह है कि पौलुस की पहली पत्री के पश्चात् उसकी व्यक्तिगत स्थिति में बहुत बड़ा परिवर्तन आया है। जब पौलुस तीमुथियुस को अपना दूसरा पत्र लिखता है, तब वह बन्दीगृह में मृत्युदण्ड की प्रतीक्षा कर रहा होता है, और उसकी मृत्यु जो निकट थी, उस शिष्य के साथ उसके अन्तिम पत्र-व्यवहार पर प्रभावी हो जाती है, जिसका वह मार्गदर्शन कर रहा था।
फी एक विस्तृत व्याख्या प्रस्तुत करते हैं; यह एक प्रकार से अन्तिम इच्छा और वसीयतनामा है, अर्थात् ‘उत्तरदायित्व का हस्तान्तरण’। 1 तीमुथियुस के विपरीत, 2 तीमुथियुस बहुत अधिक व्यक्तिगत है, जो उनके आरम्भिक दिनों को स्मरण कराता है (3:10-11; तुलना करें 1:3-5) और, सबसे बढ़कर, तीमुथियुस की दृढ़ विश्वासयोग्यता का निवेदन करता है — सुसमाचार के प्रति, एवं स्वयं पौलुस के प्रति, तथा उसकी स्वयं की बुलाहट के प्रति (1:6-14; 2:1-13; 3:10-4:5)।7
इस पत्र में पौलुस ने अपने मन की भावनाओं को खुलकर व्यक्त किया है। थॉमस ली और हेन पी. ग्रिफिन ने इसे संक्षेप में इस प्रकार प्रस्तुत किया है: पौलुस ने तीमुथियुस पर विशेष ध्यान दिया, यह उसके प्रिय शिष्य के लिए एक व्यक्तिगत सन्देश था।8 उसके शब्दों से उसके बेटे के प्रति उसके विश्वास में मरती हुए आशा का चित्रण होता है। यह पत्र इस बात का संक्षिप्त सारांश बताता है कि पौलुस किस प्रकार आशा करता है कि तीमुथियुस सेवकाई के कार्य में दृढ़ रहेगा तथा अगली पीढ़ी तक अपना विश्वास पहुँचाएगा। यह मसीही मार्गदर्शन के हृदय और आशा की सबसे स्पष्ट झलक प्रदान करता है।
दृढ़ विश्वास और बुलाहट
भले ही दोनों पत्रों की भाषा शैली भिन्न है, परन्तु इस दूसरे पत्र में पौलुस के उपदेश के शब्द उन शब्दों के ही समान हैं जिनका सारांश हम पहले पत्र में दे चुके हैं। पौलुस तीमुथियुस को स्मरण कराता है कि उसका विश्वास और बुलाहट ही उसकी उन्नति का आधार हैं: “मुझे तेरे उस निष्कपट विश्वास की सुधि आती है, इसी कारण मैं तुझे सुधि दिलाता हूँ, कि तू परमेश्वर के उस वरदान को जो मेरे हाथ रखने के द्वारा तुझे मिला है प्रज्वलित कर दे।क्योंकि परमेश्वर ने हमें भय की नहीं पर सामर्थ्य, और प्रेम, और संयम की आत्मा दी है।” 1:5, 6-7)
तीमुथियुस का “निष्कपट विश्वास” (1:5) और “परमेश्वर का वरदान” (1:6) उसके जीवन और सेवकाई का आरम्भिक केन्द्र था। तीमुथियुस को अपने निष्कपट विश्वास को दृढ़ता से थामे रखना था और अपनी सेवकाई के प्रति, बुलाहट के वरदानों को “प्रज्वलित” करना था। पौलुस स्वयं को तीमुथियुस के लिए आदर्श मानता है। इसलिए वह प्रोत्साहित करते हुए कहता है कि, “जो खरी बातें तूने मुझसे सुनी हैं उनको उस विश्वास और प्रेम के साथ, जो मसीह यीशु में है, अपना आदर्श बनाकर रख। 14 और पवित्र आत्मा के द्वारा जो हम में बसा हुआ है, इस अच्छी धरोहर की रखवाली कर।” (1:13-14)
पौलुस को आशा और अपेक्षा है कि तीमुथियुस उसके स्वयं के उदाहरण से जीवन और सेवकाई के सम्बन्ध में सबसे महत्वपूर्ण बात सीखेगा: जैसे कि खरी शिक्षा, खरे विशवास तथा प्रेम की ओर ले जाती है। वह चाहता है कि तीमुथियुस इसी नमूने का पालन करे। पहले पत्र के समान ही, पौलुस इन मूलभूत बातों के पश्चात् तीमुथियुस को स्मरण कराते हुए चेतावनी देता है कि जो लोग अपने जीवन और सेवकाई को अपने विश्वास और बुलाहट के अनुसार नहीं ढालते, उनके साथ क्या होता है: वे विश्वास को त्याग देते हैं और अपने सहकर्मियों से दूर हो जाते हैं (1:15)। पौलुस तीमुथियुस के लिए ऐसा नहीं चाहता है।
पत्र में आगे चलकर, पौलुस फिर से अपनी आशा व्यक्त करता है कि तीमुथियुस उसके नमूने का पालन करेगा और अपनी सेवकाई को अपने दृढ़ विश्वास और बुलाहट पर आधारित करेगा:
पर तूने उपदेश, चाल-चलन, मनसा, विश्वास, सहनशीलता, प्रेम, धीरज, उत्पीड़न, और पीड़ा में मेरा साथ दिया, और ऐसे दुःखों में भी जो अन्ताकिया और इकुनियुम और लुस्त्रा में मुझ पर पड़े थे। मैंने ऐसे उत्पीड़नों को सहा, और प्रभु ने मुझे उन सबसे छुड़ाया। पर तू इन बातों पर जो तूने सीखी हैं और विश्वास किया था, यह जानकर दृढ़ बना रह; कि तूने उन्हें किन लोगों से सीखा है,और बालकपन से पवित्रशास्त्र तेरा जाना हुआ है, जो तुझे मसीह पर विश्वास करने से उद्धार प्राप्त करने के लिये बुद्धिमान बना सकता है। (3:10-11, 14-15)
पौलुस की मृत्यु निकट होने के कारण, उसे अपने प्रिय शिष्य के लिए सबसे अधिक चिन्ता यही है: कि क्या वह अपने विश्वास और सेवकाई में दृढ़ बना रहेगा, अपने विश्वास पर दृढ़ता से खड़ा रहेगा और अपनी बुलाहट को स्मरण रखेगा। ऐसा प्रतीत होता है कि पौलुस इन मूल बातों को जितना भी दोहराए, कम ही है।
चरित्र एवं योग्यता
फिर भी, पहले पत्र के समान ही पौलुस तीमुथियुस से अपनी इच्छा व्यक्त करना चाहता है कि वह अपने विश्वास और बुलाहट को केवल थामे रहने से कुछ और अधिक करे। तीमुथियुस को दूसरों को अपना विश्वास सिखाने और आदर्श बनाने के लिए बुलाया गया है और वरदान दिया गया है। पौलुस कहता है, “और जो बातें तूने बहुत गवाहों के सामने मुझसे सुनी हैं, उन्हें विश्वासी मनुष्यों को सौंप दे; जो औरों को भी सिखाने के योग्य हों।” (2:2) यहीं से हमें कलीसिया को परिपक्व बनाने के लिए पौलुस की योजना समझ में आने लगती है।9 पौलुस ने तीमुथियुस के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया। इसलिए अब वह उम्मीद करता है कि तीमुथियुस भी दूसरों के लिए वैसे ही अपना जीवन समर्पित करेगा। मार्गदर्शन का कार्य दूसरों के जीवन में दृढ़ विश्वास और चरित्र को समाहित करना होता है, ताकि आगे चलकर वे भी वैसा ही कर सकें। विश्वास को आगे ले जाने का यह वही कार्य है जिसे करने के लिए तीमुथियुस को बुलाया गया था। अपनी मृत्यु के निकट पहुँचते हुए, पौलुस को आशा थी कि तीमुथियुस के द्वारा दूसरों में किए गए विश्वासयोग्य और सोच-समझकर किए गए योगदान से उसकी सेवकाई आगे बढ़ेगी।
पहले पत्र के समान ही, पौलुस यहाँ भी तीमुथियुस को परमेश्वर के स्वभाव का आदर्श प्रस्तुत करके और सत्य के वचन को कुशलतापूर्वक सिखाने के द्वारा, इस कार्य को करने की आज्ञा देता है। पत्र के दो भाग इसे स्पष्ट करते हैं। और पहला भाग 2 तीमुथियुस 2 में पाया जाता है:
इन बातों की सुधि उन्हें दिला, और प्रभु के सामने चिता दे, कि शब्दों पर तर्क-वितर्क न किया करें, जिनसे कुछ लाभ नहीं होता; वरन् सुननेवाले बिगड़ जाते हैं।अपने आप को परमेश्वर का ग्रहणयोग्य और ऐसा काम करनेवाला ठहराने का प्रयत्न कर, जो लज्जित होने न पाए, और जो सत्य के वचन को ठीक रीति से काम में लाता हो।पर अशुद्ध बकवाद से बचा रह; क्योंकि ऐसे लोग और भी अभक्ति में बढ़ते जाएँगे।और उनका वचन सड़े-घाव की तरह फैलता जाएगा: हुमिनयुस और फिलेतुस उन्हीं में से हैं, जवानी की अभिलाषाओं से भाग; और जो शुद्ध मन से प्रभु का नाम लेते हैं, उनके साथ धर्म, और विश्वास, और प्रेम, और मेल-मिलाप का पीछा कर।पर मूर्खता, और अविद्या के विवादों से अलग रह; क्योंकि तू जानता है, कि इनसे झगड़े उत्पन्न होते हैं।और प्रभु के दास को झगड़ालू नहीं होना चाहिए, पर सब के साथ कोमल और शिक्षा में निपुण, और सहनशील हो। वहविरोधियों को नम्रता से समझाए, क्या जाने परमेश्वर उन्हें मन फिराव का मन दे, कि वे भी सत्य को पहचानें।और इसके द्वारा उसकी इच्छा पूरी करने के लिये सचेत होकर शैतान के फंदे से छूट जाएँ। (2:14-17, 22_26)
तीमुथियुस को कलीसिया के भीतर (2:14) और बाहर (2:25) लोगों को मसीही जीवन का आदर्श प्रस्तुत करना है (2:15-16, 22-25) और सिखाना है (2:14-15, 24-25)।10 ऐसा करने के लिए तीमुथियुस को भक्तिमय जीवन जीने और प्रचार करने की योग्यता बढ़ानी होगी। और अब प्रार्थना यह है कि तीमुथियुस के जीवन और उपदेश से परमेश्वर लोगों को, विशेषकर उनको जो उसकी जीवन शैली और सन्देश का विरोध करते हैं, पश्चाताप करने का मार्ग दिखाए (2:25-26).
पौलुस के द्वारा तीमुथियुस को दिया गया अन्तिम आदेश भी यही आशा व्यक्त करता है। यह आदेश पत्र के अन्त में पाया जाता है। पौलुस लिखता है,
परमेश्वर और मसीह यीशु को गवाह करके, जो जीवितों और मरे हुओं का न्याय करेगा, उसे और उसके प्रगट होने, और राज्य को सुधि दिलाकर मैं तुझे आदेश देता हूँ। कि तू वचन का प्रचार कर; समय और असमय तैयार रह, सब प्रकार की सहनशीलता, और शिक्षा के साथ उलाहना दे, और डाँट, और समझा।क्योंकि ऐसा समय आएगा, जब लोग खरा उपदेश न सह सकेंगे पर कानों की खुजली के कारण अपनी अभिलाषाओं के अनुसार अपने लिये बहुत सारे उपदेशक बटोर लेंगे।और अपने कान सत्य से फेरकर कथा-कहानियों पर लगाएँगे। पर तू सब बातों में सावधान रह, दुःख उठा, सुसमाचार प्रचार का काम कर और अपनी सेवा को पूरा कर। क्योंकि अब मैं अर्घ के समान उण्डेला जाता हूँ, और मेरे संसार से जाने का समय आ पहुँचा है। (4:1-6)
एक बार फिर, हम तीमुथियुस के लिए पौलुस के उस दर्शन को देखते हैं जिसमें तीमुथियुस अपने धैर्य, संयम, समझदारी, दृढ़ चरित्र तथा स्थिर, परिश्रमी, योग्य प्रचार और शिक्षा के तालमेल के द्वारा अपनी सेवकाई की बुलाहट को पूरा करेगा। अपने शिष्य के विश्वास और बुलाहट की रक्षा करने और उसकी उन्नति करने के अतिरिक्त, पौलुस का उद्देश अन्त तक उसके चरित्र और योग्यता को बढ़ावा देना था।
तीमुथियुस के साथ पौलुस का सम्बन्ध मार्गदर्शन के स्वरूप के विषय में बहुत अधिक गहरी समझ प्रदान करता है। पौलुस के द्वारा तीमुथियुस को लिखे पत्रों से स्पष्ट होता है कि उसने तीमुथियुस के जीवन के चार मुख्य पहलुओं पर ध्यान केंद्रित करते हुए उसका मार्गदर्शन किया: वे चार पहलू इस प्रकार थे अर्थात् उसका विश्वास, बुलाहट, चरित्र और योग्यता। मसीही मार्गदर्शन का उद्देश्य भी यही है। यद्यपि हमारे मार्गदर्शन सम्बन्धी कार्य और सन्दर्भ पौलुस और तीमुथियुस से भिन्न हैं, फिर भी उनका सम्बन्ध हमें मार्गदर्शन के मूल स्वरूप और उद्देश्यों को समझने में सहायता करता है। कोई भी युवक जो मार्गदर्शन प्राप्त करना चाहता है और कोई भी वृद्ध व्यक्ति जो मार्गदर्शन देने की आशा रखता है, उन्हें पौलुस के निर्देशों से अच्छी सेवा मिलेगी और उनके प्रकाशन में हमें हमारे मार्गदर्शन सम्बन्धों को व्यवस्थित करना चाहिए। इस क्षेत्रीय मार्गदर्शिका का शेष भाग इस विषय में व्यावहारिक विचार प्रदान करने पर केंद्रित है कि ऐसा कैसे कर सकते हैं।
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चर्चा एवं मनन:
- तीमुथियुस को पौलुस के द्वारा किया गया मार्गदर्शन के कौन से पहलू इस बात पर प्रकाश डालते हैं कि हमारा अपना मार्गदर्शन सम्बन्ध कैसा होना चाहिए?
- सूचीबद्ध चार क्षेत्रों (दृढ़ विश्वास, चरित्र, बुलाहट, योग्यता) में से आपको क्या लगता है कि आपको किस क्षेत्र में सबसे अधिक आगे बढ़ने की आवश्यकता है?
- क्या आप अपनी बुलाहट को ऊपर बताए गए नमूने के अनुसार देखते हैं? इसे इस प्रकार से देखने के लिए आपको क्या परिवर्तन करने की आवश्यकता होगी?
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भाग II: मार्गदर्शक को ढूँढना
एक प्रकार से मार्गदर्शक को ढूँढना सरल है — केवल पूछ लें! किसी ऐसे व्यक्ति को खोजें जिसका जीवन — जिसका विश्वास, बुलाहट, चरित्र और योग्यताएँ — ग्रहण करने योग्य हों और उन्हें अपना मार्गदर्शक बनने के लिए कहें। परन्तु एक मार्गदर्शक को ढूँढना सामान्यतः बहुत अधिक सरल नहीं होता है। यदि यह इतना सरल होता, तो यह उन सबसे अधिक पूछे जाने वाले प्रश्नों में से एक न होता, जो मुझे वर्षों से बार-बार पूछा जा रहा है, और यह क्षेत्रीय मार्गदर्शिका भी बहुत ही संक्षिप्त होती। परन्तु ध्यान रखें, अंततः यहीं पर मार्गदर्शक ढूँढने का कार्य पूरा होता है: आप किसी से भी मार्गदर्शक बनने के लिए कह सकते हैं। इस दौरान, कुछ बातें ध्यान में रखनी चाहिए जो आपको सही मार्गदर्शक ढूँढने में सहायता कर सकती हैं।
1. योग्य मार्गदर्शक बनें
मार्गदर्शक की खोज में इस बात को आसानी से अनदेखा किया जा सकता है। और निश्चित रूप से, तीमुथियुस के उदाहरण में इसे अनदेखा करना सरल है। जब पौलुस लुस्त्रा में आया, तब तक तीमुथियुस कलीसिया में प्रतिष्ठित व्यक्ति बन चुका था। यद्यपि हम यह नहीं जानते कि ऐसा क्यों हुआ, परन्तु पौलुस ने तीमुथियुस में कुछ ऐसे गुण देखे जो उसे मार्गदर्शक बनने के लिए एक उत्तम व्यक्ति बनाते थे। अर्थात् तीमुथियुस मार्गदर्शक बनने के लिए योग्य व्यक्ति था।
जैसा कि मैंने पहले भी उल्लेख किया है, कि पिछले कुछ वर्षों में मेरी भेंट ऐसे कई युवाओं से हुई है जो यह मानते थे कि एक मार्गदर्शक होना मसीही जीवन का एक प्रकार का जन्मसिद्ध अधिकार है। अधिकतर बिना सोचे समझे ही यह मान लिया जाता था कि, ”प्रत्येक को पौलुस जैसा व्यक्ति मिलता है। मैं बार-बार यह स्पष्ट करना चाहता हूँ कि हर किसी को पौलुस जैसा मार्गदर्शक नहीं मिल सकता है। और यह केवल इसलिए नहीं है कि पौलुस एक प्रेरित था! मेरे स्थानीय कलीसिया जैसे कई स्थानों पर मार्गदर्शकों की माँग मार्गदर्शकों की उपलब्धता से बहुत अधिक है। इसलिए जिनके जीवन का अनुकरण करने योग्य होता है, वे पहले से ही लोगों का मार्गदर्शन कर रहे होते हैं। अर्थात् मार्गदर्शक कम हैं, और जो हैं उन्हें कुछ ही चुने हुए लोगों को मार्गदर्शन करना होता है।
जब आप किसी एक मार्गदर्शक की खोज करते हैं, तो आपको अपने आप से पूछना चाहिए कि, “क्या मैं उस प्रकार का व्यक्ति हूँ जो सुसमाचार के योग्य जीवन जीने के लिए तैयार है?” हर कोई पौलुस जैसा नहीं बन सकता है। और इसका एक कारण यह है कि हर कोई तीमुथियुस जैसा भी नहीं है। तीमुथियुस के विषय में हम बहुत सी बातें नहीं जानते हैं परन्तु हम इतना जानते हैं कि वह मार्गदर्शक बनने के योग्य था। वह किसी ऐसे व्यक्ति को पाने के लिए उत्सुक और तैयार था जो उसके विश्वास, उसकी बुलाहट, उसके चरित्र और उसकी योग्यताओं को आकार देकर उन्हें दृढ़ कर सके। जब पौलुस नगर में आया तो वह पहले से ही परमेश्वर के प्रति समर्पित जीवन जी रहा था।
2. इस बात को समझें कि कहाँ ढूँढना है
एक मार्गदर्शक को ढूँढने के लिए महत्वपूर्ण बात यह समझना है कि उन्हें कहाँ पाया जा सकता है। आप कहीं भी एक मार्गदर्शक पा सकते हैं। परन्तु मार्गदर्शक ढूँढने के लिए सबसे उपयुक्त स्थान आपकी स्थानीय कलीसिया होती है। इस प्रकार, आपका जीवन एक-दूसरे से अधिक घनिष्टता से जुड़ा रहेगा, और आपका मार्गदर्शन और भी अधिक गहरा होगा, क्योंकि आपके आत्मिक जीवन को एक ही मण्डली के द्वारा ढाला जा रहा है। आप प्रत्येक सप्ताह एक ही आराधना और शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। इसलिए आपके सैद्धान्तिक विश्वास और साथ ही आपकी साप्ताहिक आराधना का तालमेल भी सामान्यतः एक जैसा ही होता है। अपनी मण्डली में एक मार्गदर्शक को पाने से हमारा जीवन एक-दूसरे के साथ जुड़ा रहता है तथा जीवन के एक ही क्षेत्र तक सीमित न रहने का अधिक अवसर मिलता है। अपनी स्थानीय कलीसिया में एक मार्गदर्शक को पाना यह सुनिश्चित करने में बहुत सहायक होता है कि मार्गदर्शक वाले सम्बन्ध का सबसे महत्वपूर्ण और आधारभूत क्षेत्र — यह है कि आपका मसीही विश्वास — साझा किया जाए।
बहुत से लोगों के लिए, एक मार्गदर्शक पाने में सबसे बड़ी रुकावट यह होती है कि वे उन लोगों के सम्पर्क में नहीं रहते हैं जो उनसे उम्र में बड़े होते हैं या जीवन के अलग स्तर पर होते हैं। दुःख की बात यह है कि कलीसियाओं में भी अधिकाँश यही स्थिति बनी रहती है। पिछले कई वर्षों से मेरी कलीसिया में बहुत से लोगों के लिए मार्गदर्शक खोजने के सम्बन्ध में गम्भीरता से सोचने का अर्थ था कि वे जल्दी उठते थे और पहले वाली आराधना सभा में जाते थे। कुछ और लोगों ने कलीसिया की मासिक प्रार्थना सभाओं में भाग लेना आरम्भ कर दिया, ताकि उन्हें वहाँ कोई मार्गदर्शक मिल सके। कुछ और लोगों के लिए, इसका अर्थ था कि वे अपने उम्र के लोगों से भरे सामुदायिक समूह से अलग होकर, कई भिन्न-भिन्न पीढ़ियों के समूह में सम्मिलित हो गए। या उन्होंने आयु में अपने से बड़े पुरुषों और महिलाओं के बाइबल अध्ययन में भाग लिया। चलो छोड़िए बात जो भी हो, पर बहुतों को मार्गदर्शक ढूँढ़ने तथा इस सम्बन्ध में गम्भीरता से सोचने के लिए, उन्हें अपने समय का प्रबन्धन करना पड़ा, ताकि वे उन स्थानों पर पहुँच सकें जहाँ मार्गदर्शक मिल सकते थे।
जब आप किसी मार्गदर्शक को खोजने के विषय में सोचते हैं, तो क्या आप उस समय सही स्थान पर होते हैं? आपको अपने समय में, और विशेष रूप से अपनी स्थानीय कलीसिया में तथा अपने जीवन में फिर से क्या व्यवस्थित करने की आवश्यकता है, ताकि आपको ऐसे व्यक्ति को ढूँढने में अधिक सरलता हो जिसका जीवन अपनाने योग्य हो?
3. इस बात को समझें कि आप किस को ढूँढ रहे हैं
जब आप मार्गदर्शक की खोज में स्थान ढूँढ रहे होते हैं, तो यह भी स्पष्ट होना महत्वपूर्ण है कि आप किस प्रकार के मार्गदर्शक की खोज कर रहे हैं। जब आप उन महिलाओं एवं पुरुषों के विषय में सोचते हैं जिनका जीवन आदर्श माना जाता है, तो क्या आप यह जानते हैं कि इसका क्या अर्थ है? मसीही होने के अतिरिक्त आप एक मार्गदर्शक में और क्या-क्या विशेषता देखते हैं? यहीं पर पौलुस के द्वारा तीमुथियुस को लिखे गए पत्रों से हमने जो श्रेणियाँ छाँटी हैं, वे एक शिष्य के रूप में आपके लिए उपयोगी हो सकती हैं। अपने मार्गदर्शक के रूप में किसी महिला या पुरुष की खोज करते समय आप किसी ऐसे व्यक्ति की खोज कर रहे होते हैं जो आपके विश्वास, बुलाहट, चरित्र और आपकी योग्यताओं को आकार दे सके।
– दृढ़ विश्वास: जब आप एक मार्गदर्शक की खोज में रहते हैं, तो आप ऐसे व्यक्ति की खोज कर रहे होते हैं जो परमेश्वर और सुसमाचार के प्रति अपने विश्वास में स्पष्ट और दृढ़ हो। यह आवश्यक नहीं है कि वे बाइबल कॉलेज के प्रोफेसर हों या वे अपनी कार में विधिवत् ईश्वर विज्ञान की पुस्तकें रखकर घूमते रहें, परन्तु आपको भरोसा होना चाहिए कि यह व्यक्ति परमेश्वर के वचन की सच्चाई पर दृढ़ता से विश्वास करता है। केवल सही सिद्धान्तों को जानना और समझाना ही पर्याप्त नहीं है, वरन् उन्हें उसके प्रकाश में अपना जीवन भी जीना चाहिए। स्मरण रखें, कि पौलुस ने तीमुथियुस को न केवल अपने विश्वास का अनुसरण करने के लिए प्रोत्साहित किया, वरन् अपने विश्वास के अनुसार जीवन जीने के लिए भी प्रोत्साहित किया था। जब आप किसी मार्गदर्शक की खोज में रहते हैं, तो आप किसी ऐसे व्यक्ति की खोज में होते हैं जिसका जीवन इस सम्बन्ध में ग्रहण करने योग्य हो। इसलिए मार्गदर्शक कोई ऐसा व्यक्ति होना चाहिए जो आपको आपके मसीही विश्वास में मार्गदर्शन करने, आकार देने, निर्देशित करने और दृढ़ करने में सक्षम हो।
– बुलाहट: मसीही विश्वास के अतिरिक्त, आप किसी ऐसे व्यक्ति की भी खोज में रहते हैं जो आपको आपकी दृढ़ बुलाहट में आगे बढ़ने में आपकी सहायता कर सके। चाहे हम पास्टर हों या गृहिणी या शिक्षक या नाई, हम चाहे जो कुछ भी हों परन्तु परमेश्वर के राज्य में हमारा कार्य मायने रखता है। हम अपने जीवन का सबसे अधिक समय, नींद के अतिरिक्त अपने कार्य को देंगे। इसलिए हमारी आराधना और कार्य को एक साथ जोड़ना बहुत महत्वपूर्ण है। तीमुथियुस का कार्य पास्टरीय सेवकाई करना था, और प्रेरित पौलुस उसे इस बुलाहट को विश्वासयोग्यता से पूरी करने में सहायता करने के लिए विशेष तरीके से तैयार था। आप अपने सम्बन्ध के विषय में क्या सोचते हैं? क्या आपको सेवकाई के लिए अपनी बुलाहट का अनुभव है? हो सकता है आप ऐसा करना चाहते हों और एक ऐसे मार्गदर्शक को खोज रहे हों जो इसी क्षेत्र में कार्य कर रहा हो। सम्भवतः आप इस विषय में अधिक स्पष्टता चाहते हों, और इसीलिए आप आरम्भ करने के लिए एक मार्गदर्शक की खोज कर रहे हैं। चलो बात जो भी हो; परन्तु मार्गदर्शक खोजने में एक महत्वपूर्ण बात यह है कि आप किसी ऐसे व्यक्ति का चुनाव करें जिसकी सेवकाई और कार्य नीति का आप सम्मान करते हों। चाहे आप विश्वास करें या न करें, परन्तु मार्गदर्शन के दौरान आपकी अधिकाँश बातचीत आपके कार्य से ही जुड़ी रहेंगी। जब आप किसी सम्भावित मार्गदर्शक की खोज में चौकस रहते हैं, तो आपको अपनी बुलाहट की भावना, या बुलाहट में कमी, आपके विचारों में सहायक हो सकती है।
– चरित्र: मेरे एक मित्र और मार्गदर्शक कहते हैं कि, “चरित्र सबसे महत्वपूर्ण होता है।” एक उत्तम मार्गदर्शक के सम्बन्ध में यह बात सत्य होगी। हम इस बात को तीमुथियुस को लिखे पौलुस के पत्रों में देखते हैं। बार-बार पौलुस तीमुथियुस को उसके चरित्र के विषय में सलाह देता है, स्मरण कराता है और उत्साहित करता है। और जब बात मार्गदर्शन की आती है तो आप वह नहीं दे सकते जो आपके पास नहीं है। जब आप मार्गदर्शक ढूँढते हैं, तो आप ऐसे पुरुष या महिला की खोज में होते हैं जिनका चरित्र उनके स्वभाव में गहराई से जड़ा हो और उसी के द्वारा आगे बढ़ा हो विश्वास, सुसमाचार के योग्य तरीके से जीया जाता है। मार्गदर्शन और अनुशासन में यह एक कहावत है कि “सिखाए जाने से अधिक सीखा जाता है”, और यह बात चरित्र के सम्बन्ध में भी निश्चित रूप से सत्य है। इसलिए चाहे अच्छा हो या बुरा हो, परन्तु आपका चरित्र आपके मार्गदर्शक के ही चरित्र से प्रभावित होगा। सम्भवतः यह आपसी सम्बन्धों को सबसे अधिक प्रभावित करने वाला पहलू है। अतः जब आप किसी मार्गदर्शक की खोज करें तो इस बात को ध्यान में रखें। उन सहायक पहलुओं को अनदेखा न करें जो आरम्भ में आपको किसी की ओर आकर्षित कर सकते हैं और एक ऐसे मार्गदर्शक को खोजें जिसका चरित्र उसके विषय में सबसे आकर्षक बात हो।
– योग्यताएँ: अंततः आपको आने वाले दिनों और वर्षों में कार्य स्थल पर, घर पर और सम्बन्धों में कई प्रकार के तथा जीवन में आगे बढ़ना होगा। एक अच्छे मार्गदर्शक का कार्य होता है कि वह आपको प्रोत्साहित करे और उन क्षेत्रों में आपको आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करे जिस क्षेत्र में आप योग्य हों, और आपको उन क्षेत्रों में सलाह दे, हियाव बन्धवाए और सुधार करे जिन क्षेत्रों में आप अभी तक योग्य नहीं हैं। परन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि आपको एक ऐसा मार्गदर्शक खोजने की आवश्यकता है जो जीवन के हर क्षेत्र में निपुण हो। ऐसा कोई व्यक्ति नहीं होता है। परन्तु आगे चलकर जीवन के ऐसे क्षेत्र होंगे, सम्भवतः विशेषकर कार्य क्षेत्र में, जहाँ आपके पास अपने मार्गदर्शक की तुलना में अधिक योग्यता और कौशल होगा। मेरा कहना यह है कि जब आप जीवन के हर क्षेत्र में ईश्वरीय मार्गदर्शन पाने के लिए किसी मार्गदर्शक के साथ जुड़े होते हैं, तो उनके द्वारा आपकी योग्यताओं पर किए गए विचारों का सम्मान करना आवश्यक होता है। कई पहलुओं से देखे तो, यही वह क्षेत्र होगा जहाँ आपकी सबसे अधिक व्यावहारिक बातचीत होगी। और एक कुशल मार्गदर्शक आपकी प्रमुख योग्यताओं और अयोग्यताओं को पहचानकर उन्हें उत्तम बनाने में आपकी सहायता करेगा। दोनों ही पहलू महत्वपूर्ण हैं।
यद्यपि इस विषय में सोचना बहुत कठिन लगता है, और यह थोड़ा बोझिल भी लगता है, परन्तु जब आप एक मार्गदर्शक की खोज में रहते हैं तो यह जानना महत्वपूर्ण है कि आप किस प्रकार के व्यक्ति की खोज कर रहे हैं। सामान्यतः, आप किसी ऐसे व्यक्ति की खोज में रहते हैं जिसका जीवन आपके अनुसार अनुकरणीय हो। यदि और अच्छे ढँग से कहें तो, आपको ऐसे व्यक्ति की आवश्यकता है जो आपके विश्वास, बुलाहट, चरित्र और योग्यता को आगे बढ़ाने में सहायता कर सके।
4. इस बात को समझें कि निवेदन क्या करना है
वास्तव में, एक मार्गदर्शक को खोजने में “बड़ी माँग” करना ही वह चुनौती होती है कि आप अपनी आवश्यकता की बात कैसे व्यक्त करते हैं। एक सम्भावित मार्गदर्शक को ढूँढना सरल नहीं है, परन्तु आप उनसे सम्पर्क कैसे करते हैं, यह आपके सम्बन्ध को दृढ़ बनाने में अहम भूमिका निभाता है। वर्षों से मैंने देखा है कि जब कोई पूछता है कि “क्या आप मेरे मार्गदर्शक बनेंगे?”, तो सबसे अधिक मिलने वाला उत्तर यह होता है कि “इस बात से आपका क्या अभिप्राय है?” इसलिए, एक बार जब आप यह तय कर लें कि आप किसे अपना मार्गदर्शन करने के लिए कहना चाहते हैं, तो आपके लिए यह विचार करना अच्छा होगा कि आप क्या निवेदन कर रहे हैं।
अधिक स्पष्ट रूप से कहें तो, मार्गदर्शन के औपचारिक समय का स्वरूप कैसे हो, इस पर विचार करना आपके लिए लाभदायक होगा। यद्यपि संरचना पूरी रीति से मार्गदर्शक की उपलब्धता और पसन्द पर निर्भर करेगी, परन्तु आरम्भ में आप क्या पूछना चाहते हैं, यह जानना अच्छा होगा। क्या आप अपने मार्गदर्शक से महीने में दो बार मिलना चाहते हैं? या सप्ताह में एक बार? क्या आप चाहते हैं कि समय स्वतंत्र बातचीत से या पुस्तक अध्ययन से या या दोनों को साथ जोड़कर केन्द्रित किया जाए? आप कब और कहाँ मिलना चाहेंगे? दोपहर के भोजन पर? या कार्यालय में? ये ऐसे प्रश्न हैं जिनके विषय में आपको उस समय विचार करना चाहिए जब आप किसी से मार्गदर्शन पाने की तैयारी कर रहे हों। फिर भी, अन्त में संरचना का अधिकाँश भाग मार्गदर्शक के द्वारा ही निर्धारित किया जाएगा, परन्तु इन बातों पर आरम्भ से ही विचार करने से आपके निवेदन की गम्भीरता और विचारशीलता व्यक्त होगी। आप जिस प्रकार के सम्बन्ध की खोज में हैं, उससे होने वाली उन्नति के विषय में और स्पष्ट रूप से जानने के लिए, ‘विश्वास’, ‘बुलाहट’, ‘चरित्र’, और ‘योग्यताएँ’ इन श्रेणियों का उपयोग करके एक विस्तृत सूची बनाना भी सहायक सिद्ध हो सकता है।
अतः जब आप किसी मार्गदर्शक की खोज में हों, तो इस बात को समझ लें कि आप उनसे क्या पूछ रहे हैं। इस प्रकार से जब आप प्रश्न पूछते हैं कि, “क्या आप मेरा मार्गदर्शन करेंगे?” और वह उत्तर देते हैं कि, “आपके मन में क्या है?” तो आप को तैयार रहना होगा। सम्बन्ध से आप क्या चाहते हैं, यह स्पष्ट करने में आपकी सहायता करने के अतिरिक्त, इस प्रकार की विचारशीलता सम्भावित मार्गदर्शक को आपके साथ यह कल्पना करने में सहायता करेगी कि मार्गदर्शन कैसा होना चाहिए।
5. इस बात को समझें कि किससे पूछना है
मार्गदर्शक की खोज करते हुए अधिकाँश अनदेखा किया जाने वाला एक अन्य पहलू है, और वह है आपके आपके आसपास के लोग! उन लोगों को बताएँ कि आप एक मार्गदर्शक की खोज कर रहे हैं, और देखें कि क्या उनके पास कोई अच्छा सुझाव है। यदि आपने अपनी कलीसिया में मार्गदर्शक खोजने का निर्णय कर लिया है, तो अपने पास्टर या अन्य अगुवों से पूछें कि वे इस कार्य के लिए किसकी संस्तुति करेंगे। अधिकाँश समयों में, वे आपके जीवन और मार्गदर्शन में आपकी अपेक्षाओं की जानकारी लेंगे, कि आप क्या उम्मीद कर रहे हैं, इस प्रकार वे आपकी सही मार्गदर्शक ढूँढने में सहायता कर सकते हैं। कई अवसरों पर, मैंने देखा है कि लोग इस प्रकार से संस्तुति माँगते हैं और कई लोगों से उन्हें एक ही नाम का सुझाव मिलता है। इस प्रकार की पुष्टि हमेशा उत्साहित करने वाली तो होती है, परन्तु इसमें में आपको को थोड़ा कमतर होने का अनुभव हो सकता है। परन्तु अन्य लोगों को बताना भी सहायक होता है कि आप एक मार्गदर्शक की खोज कर रहे हैं और उनकी गहरी समझ के साथ आने वाले सुझावों के लिए भी तैयार रहें।
6. प्रार्थना
अन्त में, परन्तु सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जिस मार्गदर्शक की आप खोज कर रहे हैं उसके लिए प्रार्थना करें। एक प्रकार से एक उत्तम मार्गदर्शक पाना एक अच्छे मित्र को पाने के समान है। आप किसी को खोजने के लिए योजना तो बना सकते हैं और उस योजना पर कार्य भी कर सकते हैं, साथ ही आप संस्तुति पाने के लिए चारों ओर भी पूछ सकते हैं, परन्तु आप अपने स्वयं के प्रयासों से किसी को तैयार नहीं कर सकते हैं और न ही उसे साकार कर सकते हैं। अंततः एक प्रभावशाली मार्गदर्शक एक सच्ची मित्रता के समान परमेश्वर के अनुग्रह से ही प्राप्त होता है। इसके लिए आपको अपनी प्रार्थनाओं के उत्तर की प्रतीक्षा करनी होगी!
यदि आप इस लेख को यहाँ तक पढ़ चुके हैं, तो इसका अर्थ है कि आपको एक मार्गदर्शक की बहुत आवश्यकता है, अर्थात् कोई ऐसा मार्गदर्शक जो आपको आपके विश्वास, बुलाहट, चरित्र, और योग्याताओं को पूरी रीति से निखारने में सहायता करे और दिशा दे सके। सच में, इस अभिलाषा को पूरा होने के उत्तर में आप जो सबसे व्यावहारिक कार्य कर सकते हैं, वह है प्रार्थना करना। परमेश्वर से प्रार्थना करें कि वह आपको ऐसा मार्गदर्शक प्रदान करे जिसकी आपको आवश्यकता है। और सचेत होकर तैयार रहें, ताकि वह जो मार्गदर्शक प्रदान करेगा उसे स्वीकार करने और अपनाने के लिए तैयार रहें। हमारा पिता इस बात से आनन्दित होता है कि वह हमें अपने पुत्र के स्वरूप में ढाल दे, इसलिए हमें आश्चर्य नहीं करना चाहिए यदि वह हमारे लिए किसी ऐसे व्यक्ति को लाता है जिसे वह इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए उपयोग करेगा। इसलिए जब आप इस बात पर विचार करें कि किससे क्या पूछना है, तो परमेश्वर से पूछना न भूलें। वह भलीभाँति जानता है कि आपको किससे क्या चाहिए।
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चर्चा एवं मनन:
- ऊपर दिए गए भाग से आपको क्या कदम उठाने चाहिए?
- क्या आपको लगता है कि आप मार्गदर्शन के लिए तैयार हैं? यदि हाँ, तो ठीक है! यदि नहीं, तो आपके जीवन के किन क्षेत्रों में ध्यान देने की आवश्यकता है?
- वे कौन लोग हैं जो अच्छे मार्गदर्शक हो सकते हैं?
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भाग III: एक मार्गदर्शक बनना
जैसे मार्गदर्शक ढूँढना सरल है, वैसे ही मार्गदर्शक बनना भी सरल है — केवल हाँ कह दो! या इससे भी अच्छा तरीका यह है कि किसी के पूछने की प्रतीक्षा न करें। स्वयं ही पहल करो। ऐसे व्यक्तियों को ढूँढ़ें जिनके जीवन — विश्वास, चरित्र और योग्यताओं — को आप निखारना चाहते हैं और उनसे पूछें कि क्या आप उनका मार्गदर्शन कर सकते हैं। हाँ, यह सुनने में सरल लगता है, परन्तु हम जानते हैं कि एक अच्छा मार्गदर्शक बनना इतना सरल नहीं होता है। यदि इतना ही सरल होता, तो मार्गदर्शक ढूँढने वालों की कमी न होती। परन्तु मार्गदर्शन के केंद्र में यह सरल इच्छा होती है कि परमेश्वर के द्वारा हमें दी गई सभी भली वस्तुओं को दूसरों को सौंपें और आगे बढ़ाएँ। ऐसा करने की इच्छा होने के अतिरिक्त, यहाँ कुछ विचारों का वर्णन किया गया हैं जिन्हें ध्यान में रखना चाहिए, जो मार्गदर्शन देने में आपके प्रयासों के साथ सहायक हो सकते हैं।
1. इस बात को समझें कि आपके पास देने के लिए कुछ है
मार्गदर्शन करने के क्षेत्र में महिलाओं एवं पुरुषों के सामने आने वाली पहली और सबसे बड़ी बाधा यह भावना होती है कि उनके पास देने के लिए कुछ भी नहीं है। लोग पूछेंगे कि, “कोई क्यों चाहेगा कि मैं उनका मार्गदर्शन करूँ?” या “मेरा इसमें क्या योगदान है?” दुःख की बात यह है कि इन भावनाओं ने कई लोगों को किनारे पर खड़ा कर दिया है, जबकि उनके पास देने के लिए बहुत कुछ है।
इन असुरक्षाओं का सामना करने का एक तरीका यह है कि आप उन्हें सामान्य मान लें और साथ ही यह भी मान लें कि ये मार्गदर्शन की यात्रा का ही हिस्सा हैं। हाँ, हमारे बीच में कुछ ऐसे सौभाग्यशाली लोग हैं जो जानते हैं कि उनके पास संसार को देने के लिए कुछ है। परन्तु अधिकतर लोग, यहाँ तक कि जिनके जीवन अनुकरणीय हैं, वे भी ऐसा कम ही अनुभव करते हैं। हम स्वयं को मार्गदर्शक के समान नहीं मानते हैं क्योंकि हम अपने जीवन के उन क्षेत्रों के विषय में बहुत अधिक समझते हैं जहाँ हमें स्वयं को मार्गदर्शन की आवश्यकता है! इसलिए इस बात को स्मरण रखना आवश्यक है कि मार्गदर्शक बनने का अर्थ यह नहीं है कि हमें स्वयं मार्गदर्शन की आवश्यकता नहीं है। हम कभी भी पूर्ण रीति से विशेषज्ञ नहीं बन सकते, इसलिए हमें दूसरों की सहायता करने के लिए प्रतीक्षा करने की आवश्यकता नहीं है। एक मार्गदर्शक बनने के लिए यह आवश्यक है कि हम विनम्रतापूर्वक स्वीकार करें कि हमारे पास देने के लिए कुछ है। यदि आपको लगता है कि एक मार्गदर्शक के रूप में आपके पास देने के लिए कुछ नहीं है, तो उस व्यक्ति से पूछें जिसने आपको मार्गदर्शक बनने के लिए कहा है कि आप उन्हें क्या दे सकते हैं।
और स्मरण रहे कि मार्गदर्शन आपके विषय में नहीं है,वरन् उस व्यक्ति के विषय में है जिसका आप मार्गदर्शन कर रहे हैं। एक मार्गदर्शक के लिए, मार्गदर्शन का वास्तविक उद्देश्य यह समझना होता है कि शिष्य को क्या चाहिए और हम उसे उसके लक्ष्य तक पहुँचाने में कैसे सहायता कर सकते हैं, न कि यह, कि हमारे पास उसे देने के लिए क्या है। प्रेम से दूसरों की सेवा हम सब सरलता से कर सकते हैं। और यदि आपको समझने में आसानी हो, तो स्मरण रखें कि मार्गदर्शन में आपसे यही अपेक्षा की जाती है: अर्थात् अपने शिष्य की प्रेम के साथ सेवा करना।
2. इस बात को समझें, कि आप मार्गदर्शन कैसे कर रहे हैं
अपने मार्गदर्शन के अधिकार का ध्यान रखते हुए और उसकी सम्भावनाओं की कल्पना करते हुए, यह जानना आवश्यक है कि आप वास्तव में अपने शिष्यों को क्या सिखाना चाहते हैं — आप उन्हें किस प्रकार से ढालना, विकसित करना और आगे बढ़ाना चाहते हैं। आप अपने मार्गदर्शन से क्या परिणाम देखना चाहते हैं? आपका उद्देश्य क्या है? फिर से, यहाँ पर पौलुस के द्वारा तीमुथियुस को लिखे गए पत्रों में देखी गई श्रेणियाँ आपके लिए एक मार्गदर्शक के रूप में उपयोगी हो सकती हैं। आप प्रेरित पौलुस नहीं हैं, और न ही आप तीमुथियुस का मार्गदर्शन कर रहे हैं, परन्तु आपके द्वारा दिए जा रहे मार्गदर्शन का लक्ष्य, पौलुस के मार्गदर्शन के समान ही आपके द्वारा मार्गदर्शन प्राप्त करने वाले व्यक्ति के विश्वास, बुलाहट, चरित्र और योग्यताओं को निखारना है।
– विश्वास: हम अपने शिष्यों को सबसे पहले जो सिखाना चाहते हैं, वह है उनका मसीही विश्वास। विशेष मसीही मार्गदर्शन पर ही विशेष मसीही विश्वास टिका हुआ होता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि आपके पास बाइबल कॉलेज की बड़ी-बड़ी उपाधियाँ होनी चाहिए या अपनी कार में विधिवत ईश्वर विज्ञान की पुस्तकें रखकर धूमते फिरें, परन्तु हाँ, आपके मार्गदर्शन का मुख्य उद्देश्य परमेश्वर आधारित ही होना चाहिए। एक विशेष प्रकार का मसीही मार्गदर्शक बनने के लिए यह समझना आवश्यक है कि आपके मार्गदर्शन का मूल उद्देश्य ज्ञान बाँटना नहीं है, वरन् और भी कुछ है, परन्तु साथ ही ज्ञान के प्रसार के लिए भी उम्मीद की जाती है। अपने शिष्य को यीशु मसीह के सुसमाचार में दृढ़ता से जड़ पकड़ने और स्थापित करने के लिए आपको स्वयं समर्पित होना चाहिए। {4}
– बुलाहट: निश्चित रूप से आप उन्हें मसीही विश्वास में और अधिक दृढ़ करने में सहायता करने के अतिरिक्त, उनकी बुलाहट को स्मरण रखने और सम्भवतः उसे समझने में भी सहायता कर सकते हैं। पौलुस के द्वारा तीमुथियुस को लिखे गए पत्रों से स्पष्ट होता है कि आपका अधिकाँश मार्गदर्शन आपके शिष्य की बुलाहट पर केंद्रित होगा। आप उनकी ईश्वरीय बुलाहट में आने वाली चुनौतियों और सफलताओं, उतार-चढ़ाव और उनके मन में होने वाली इच्छा या अनिच्छा को समझने में उनकी सहायता करेंगे। प्रायः यह आपके शिष्य के सामने आने वाला सबसे महत्वपूर्ण और चिन्ताजनक विषय होगा। इसलिए हो सकता है कि उन्होंने अपनी बुलाहट के विषय में स्पष्टता या आत्मविश्वास पाने के लिए आपको मार्गदर्शक के रूप में चुना हो। इसका अर्थ यह नहीं है कि आपके पास भी उन्हीं के समान ईश्वरीय बुलाहट होनी चाहिए जिनका आप मार्गदर्शन कर रहे हैं, वैसे यह उपयोगी हो सकता है। और कुछ लोग इसे पसन्द भी करते हैं। परन्तु एक अग्निशामक भी एक लेखाकार का मार्गदर्शन कर सकता है और एक गृहिणी भी एक वकील का मार्गदर्शन कर सकती है। मार्गदर्शन करने में, विशेष बुलाहट कम मायने रखती है, बजाय इसके कि कोई व्यक्ति अपनी बुलाहट के विषय में ईश्वरीय तरीके से कैसे आगे बढ़ता है। एक मार्गदर्शक होने के नाते, आपके पास सबसे महत्वपूर्ण अवसर यह है कि आप अपने शिष्य के विश्वास और सेवकाई को आपस में जोड़ने में सहायता करें, ताकि वे सेवकाई को जीवन का एक सच्चा उद्देश्य और बुलाहट के रूप में देखें, न कि केवल एक नौकरी या व्यवसाय के रूप में। इस प्रकार आप उनका इस बुलाहट के प्रति आत्मविश्वास और आनन्द की ओर मार्गदर्शन करेंगे।
– चरित्र: चरित्र निर्माण मसीही मार्गदर्शन का मूल है। एक मार्गदर्शक के रूप में, आप अपने शिष्य को यीशु का अनुसरण करने तथा अपने साथ-साथ उसके चरित्र का निर्माण करने का प्रयास करते हैं। अंततः यही मार्गदर्शन का मुख्य उद्देश होता है। इसलिए, जब आप मार्गदर्शक बनने की तैयारी करें, तो इसे अपना मुख्य उद्देश्य बनाएँ। आपका शिष्य चाहे जो भी सोचे कि वह आपसे मार्गदर्शक होने के नाते क्या बनने या करने को कह रहा है, परन्तु स्मरण रहे, कि सबसे अधिक आवश्यक यह है कि उसका चरित्र उत्तम बने। आपको इस बात को उनके सामने स्पष्ट रूप से कहने की आवश्यकता नहीं है, जैसा कि इस अनुच्छेद में लिखा गया है (परन्तु यदि आप चाहें, तो ऐसा कर सकते हैं), परन्तु एक मार्गदर्शक के रूप में यह बात आपकी दृष्टि में पहले स्थान पर होनी चाहिए। ध्यान रहे कि आपका मुख्य कार्य अपने शिष्यों को रहस्यमयी ज्ञान देना नहीं है, वरन् उन्हें मसीह के स्वभाव के अनुसार ढालने में मार्गदर्शन करना है, जिसमें बुद्धि और ज्ञान की बातें छिपी हुई हैं।
अपने मार्गदर्शन में चरित्र निर्माण को मुख्य रूप से ध्यान में रखते हुए, यह भी स्मरण रखें कि आपका शिष्य आपके चरित्र के विषय में बात करने से अधिक, उसे देखकर सीखेगा। इस बात को ध्यान में रखते हुए, अपने द्वारा दिखाए जाने वाले नमूने को लेकर सचेत रहें। और रचनात्मक तरीकों पर भी ध्यान दें जिनसे आप अपने शिष्य को अपने जीवन का साक्षी बनने का अवसर दे सकेंगे। यदि आवश्यक हो तो उन्हें अपने घर पर या अपने कार्य स्थल पर आमन्त्रित करें ताकि वह आपके कार्य को देखकर समझ सके। भले ही वे जानते हों या नहीं, परन्तु आपके द्वारा किए गए मार्गदर्शन का सबसे बड़ा लाभ आपके शिष्य के व्यक्तित्व पर पड़ने वाला प्रभाव होगा। और अधिकतर तो उन्हें केवल आपका जीवन देखकर ही समझ आ जाएगा। इसलिए इस बात पर ध्यान बनाए रखें। आप के द्वारा बातचीत से मिलने वाले ज्ञान और अनुभव के अतिरिक्त, यह भी स्मरण रखें, कि आपके शिष्य को सबसे अधिक आवश्यकता उसके चरित्र में परिवर्तन करने की है। और परमेश्वर इस बात को आपके द्वारा दिखाए गए उदाहरण से सिद्ध करेगा।
– योग्यताएँ: अंततः जीवन में विभिन्न योग्यताएँ होंगी आपके शिष्य को आने वाले दिनों और वर्षों में आगे बढ़ने के लिए काम पर, घर पर, आपसी सम्बन्धों में, तथा अन्य स्थानों पर आगे बढ़ने की आवश्यकता होगी। शान्त रहें, इसका अभिप्राय यह नहीं है कि आपको उन्हें सब कुछ सिखाना होगा। और निश्चित रूप से इसका अभिप्राय यह भी नहीं है कि आपको उनकी प्रत्येक अयोग्यता के सभी क्षेत्रों में योग्य बनाना होगा। वास्तव में, अपने शिष्य की सहायता करने का एक उत्तम तरीका यह है कि आप उन्हें यह बताएँ कि आप स्वयं भी कई वर्षों से अपने जीवन में अभी भी ऐसे क्षेत्रों की पहचान कर रहे हैं जहाँ आपको आगे बढ़ने और सीखने तथा अधिक योग्य बनने की आवश्यकता है। इसलिए साहस रखें, क्योंकि आपकी अपनी अयोग्यता ही वह क्षेत्र है जो आपको एक उत्तम मार्गदर्शक बनाएगी!
जब मार्गदर्शन में योग्यताओं की बात आती है, तो हम मुख्य रूप से जागरूकता के विषय में सोचते हैं। एक मार्गदर्शक की भूमिका में सबसे बड़ी योग्यताओं और स्पष्ट रूप से अयोग्यताओं को पहचानना, उन पर बातचीत करना और उन्हें निखारना सम्मिलित होता है। दोनों ही महत्वपूर्ण हैं। परन्तु आपकी भूमिका में एक बड़ा हिस्सा यह है कि आप उन्हें उनकी सामर्थ्य और निर्बलताओं के क्षेत्रों को पहचानने में उनकी सहायता करें, उन्हें स्वीकार करें और सच्चाई से उन्हें उत्साहित करते हुए उत्तर दें।
3. इस बात को समझें कि आप किसका मार्गदर्शन कर रहे हैं
आप दूसरों का किस प्रकार से मार्गदर्शन कर रहे हैं, यह जानने के साथ-साथ यह भी जानना आवश्यक है कि हम किसका मार्गदर्शन कर रहे हैं। यद्यपि मार्गदर्शन के स्पष्ट उद्देश्य सदैव एक जैसे ही होते हैं, परन्तु हर शिष्य अलग होता है। और यह आपको मार्गदर्शन में सबसे अधिक अवसर देता है कि आप उस व्यक्ति को निकटता से जानें एवं समझें, जिसका आप मार्गदर्शन कर रहे हैं।
यद्यपि हमारी संस्कृति में विलक्षणता को बहुत अधिक महत्व दिया जाता है, फिर भी आप अपने शिष्य के विषय में जितना अधिक जानेंगे, उतना ही अधिक अच्छा और सटीक मार्गदर्शन आप उन्हें दे पाएँगे। इस अर्थ में, यह कई बच्चों का पालन-पोषण करने के समान हो सकता है। अपने बच्चों का पालन-पोषण सामान्य रूप से कैसे करना है, यह जानना एक बात है; परन्तु प्रत्येक बच्चे का पालन-पोषण विशेष रूप से कैसे करना है, यह जानना दूसरी बात है। सामान्यतः आप सबका एक जैसा ही पालन-पोषण करते हैं। परन्तु साथ ही, आप सब बच्चों का अलग-अलग तरीके से भी पालन-पोषण करते हैं। मार्गदर्शन में भी यही बात लागू होती है।
इस बात को ध्यान में रखते हुए, अपने शिष्य को समझने का भरपूर आनन्द उठाइए। माता-पिता के ही समान अपने शिष्य के साथ दृढ़ सम्बन्ध बनाइये, इससे आपको भरोसा और आनन्द मिलेगा। और यदि आप मार्गदर्शक के सम्बन्ध को केवल एक औपचारिकता मान लेंगे तो यह संसार कभी नहीं बन पाएगा। पौलुस तीमुथियुस के साथ इतनी व्यक्तिगत बातें इसलिए कर पाया क्योंकि उसका सम्बन्ध केवल लेन-देन तक ही सीमित नहीं था। यह मात्र जानकारी या ज्ञान का आदान-प्रदान नहीं था, वरन् इससे कहीं अधिक बढ़कर था।
आप अपने शिष्य को जानने और उनसे प्रेम करने में जितना अधिक समय देंगे, मार्गदर्शन आप दोनों के लिए उतना ही अधिक परिवर्तनकारी होगा। आप दोनों के लिए। सच कहूँ तो, मार्गदर्शक के द्वारा शिष्य को दिया जाने वाला सबसे बड़ा उपहार मधुर सम्बन्ध ही होता है। यदि चरित्र निर्माण मार्गदर्शन का हृदय है, तो सम्बन्ध उसकी आत्मा है। इसलिए इस बात को अवशय जानें कि आप किसका मार्गदर्शन कर रहे हैं।
4. इस बात को जानें कि आप कैसे मार्गदर्शन कर रहे हैं
आप किसको और क्या मार्गदर्शन कर रहे हैं, यह जानने के साथ ही यह भी समझें कि आप किस तरीके से मार्गदर्शन कर रहे हैं। इसका अर्थ यह है कि आपके मार्गदर्शन का स्वरूप और संरचना क्या होगी। मार्गदर्शन करने के कई तरीके हैं। आप किस प्रकार से मार्गदर्शन करना चाहते हैं? आप अपने समय को कैसे निर्धारित करते हैं? क्या आप अपने शिष्य से महीने में दो बार मिलना चाहते हैं? या सप्ताह में एक बार? क्या आप चाहते हैं कि समय का आरम्भ स्वतंत्र बातचीत से या पुस्तक अध्ययन से या या दोनों को साथ जोड़कर किया जाए? आप कब और कहाँ मिलना चाहेंगे? दोपहर के भोजन पर? कार्यालय में? अपने घर पर? या उपरोक्त सभी स्थानों में? ऐसी क्या रूपरेखा होगी जिससे आपके शिष्य का विश्वास, बुलाहट, चरित्र और योग्यताओं को सबसे अच्छे ढँग से आगे बढ़ाया जा सके? किसी को मार्गदर्शन देने की तैयारी करते समय आप इस प्रकार के प्रश्नों पर विचार कर सकते हैं। आपको यह तय करने में कुछ समय लग सकता है कि आपको क्या पसन्द है या आपके लिए सबसे अच्छा तरीका कौन सा है। चलो ठीक है, परन्तु यहाँ मुख्य बात यह है कि एक निश्चित रुपरेखा और स्थिरता बनी रहनी चाहिए, भले ही चाहे वह रुपरेखा और स्थिरता समय के साथ परिवर्तित ही क्यों न होती रहे।
सबसे पहले, आप अपने शिष्य के साथ सप्ताह में एक बार मिलने पर विचार कर सकते हैं। हो सकता है कि आपके पास प्रत्येक सप्ताह एक ही दिन और एक ही समय हो, परन्तु स्थान भिन्न-भिन्न होने चाहिए। इससे आप अपने शिष्य को जान पाएँगे और साथ ही समझ भी पाएँगे कि मार्गदर्शन के आरम्भ में सबसे आवश्यक क्या है, साथ ही आप दोनों इस कार्य के लिए लम्बे समय तक के लिए रूपरेखा और संरचना विकसित कर सकते हैं। अंततः यह आप पर निर्भर करेगा कि रूपरेखा कैसी होनी चाहिए। इस बात से लज्जित न हों। आप ही मार्गदर्शक हैं। और यद्यपि आप कभी भी मार्गदर्शक के सम्बन्ध में स्वार्थी नहीं होना चाहते हैं, परन्तु मार्गदर्शक के सम्बन्ध को इस प्रकार से बनाना और ढालना चाहिए कि आप सेवा कर सकें, अन्त में आपके शिष्य के लिए सबसे अच्छा यही होगा।
5. उपस्थित रहें
एक मार्गदर्शक होने के नाते केवल उपस्थिति रहना और सुनना ही पर्याप्त नहीं होता हैं, यद्यपि ये महत्वपूर्ण पहलू हैं। परन्तु शिष्य के साथ भावनात्मक रूप से जुड़ना भी आवश्यक है। यह मार्गदर्शन का एक महत्वपूर्ण पहलू है। जब आप एक मार्गदर्शक बनने का वचन देते हैं, तो आप केवल नियमित सभाओं से कहीं अधिक क्षेत्रों के लिए समर्पित होते हैं। आप अपने शिष्य के जीवन में सक्रिय रूप से जुड़े होने की प्रतिज्ञा करते हैं। मार्गदर्शन भले ही चाहे जितने समय तक चले, और सम्भवतः मार्गदर्शन के पश्चात् भी, आप उन लोगों में से एक होंगे जो उनके साथ खड़े रहेंगे। आप जीवन के इस अनोखे पड़ाव में एक ऐसे व्यक्ति के रूप में कार्य करने को तैयार हैं जो देखे, सुने और जिससे बात की जा सके। यह मुख्य रूप से मार्गदर्शन के तय समय में दिखाई देता है, परन्तु अच्छे मार्गदर्शन में यह सीमाओं से आगे बढ़ जाता है।
मार्गदर्शन का स्वरूप और संरचना चाहे जो भी हो, परन्तु जब आप सभा की अगुवाई कर रहे होते हैं, तो अवश्य वहाँ पर उपस्थित रहें। यह स्मरण रखना आवश्यक है कि मार्गदर्शक का कार्य केवल समय देना ही नहीं, वरन् गुणवत्तापूर्ण समय देना होता है। हम सब जानते हैं कि आप बिना ध्यान दिए भी सभा या बातचीत में भाग ले सकते हैं। इसलिए अपने मार्गदर्शन के समय इसको दूर करें! और उपस्थित रहें। सुनने का प्रयास करें और मसीह की आत्मा में अपने शिष्य से प्रेम करें। जब आप उनके साथ हों, तो पूरा ध्यान उन पर दें। सबसे आवश्यक बात यह है कि मार्गदर्शन में शिष्य को एक ऐसे ही व्यक्ति की आवश्यकता होती है जो उनके आगे रहे, साथ ही उनके साथ रहने के लिए तैयार रहे। तथा ध्यान से सुनकर उनसे प्रेम करे।
सुनने से विमुख न होकर, सबसे बड़ा उपहार जो मार्गदर्शक अपने शिष्यों को दे सकता है, वह है उनके लिए प्रार्थना करना। परन्तु दुःख की बात यह है कि यह विषय अधिकाँश मसीहियों के मध्य भी, मार्गदर्शन के ससमय अनदेखा किया जाता है। इसके विपरीत स्वीकार करने के पश्चात् भी कई मसीही लोग प्रार्थना को निष्फल और निरर्थक समझते हैं। सम्भवतः यही कारण है कि इतने सारे मार्गदर्शकों में प्रार्थना करना लगभग न के बराबर है। अर्थात् जब आप किसी मार्गदर्शक से इस विषय पर चर्चा कर सकते हैं तो इस सम्बन्ध में प्रार्थना क्यों करें? इसका उत्तर यह है: कि एक मार्गदर्शक के प्रार्थना करने के एक घंटे के अन्दर ही एक शिष्य के जीवन में, उनके जीवन भर चर्चा करने से कहीं अधिक परिवर्तन आ सकता है।
सब कुछ कहे जाने और किए जाने के पश्चात्, मार्गदर्शन का वास्तविक सार यही है कि आप उपस्थित रहें। अर्थात् जब आप मार्गदर्शन करते हैं तो उपस्थित रहें। अपने शिष्य के साथ मिलते समय पूरी रीति से उपस्थित रहें, और उनके लिए प्रार्थना में भी उपस्थित रहें। आपके मार्गदर्शन के दौरान ऐसे कई क्षण आएँगे जब आपको पता नहीं होगा कि क्या कहना है, विशेषकर जब आपको लगेगा कि आप नहीं जानते कि अपने शिष्य के विश्वास, बुलाहट, चरित्र और योग्यताओं को कैसे दृढ़ करना है। हर समय विशेषकर, उन महत्वपूर्ण समयों में उपस्थित रहकर अपने मार्गदर्शक होने की भूमिका को पूरा करें। उपस्थित रहें, सुनें और प्रार्थना करें।
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चर्चा एवं मनन:
- क्या आप मार्गदर्शक बनने के लिए तैयार हैं? ऐसा कौन है जिस पर आप निवेश कर सकते हैं?
- उपरोक्त गुणों में से, एक अच्छे मार्गदर्शक के रूप में आपकी क्या विशेषता है और क्या कमियाँ हैं?
- क्या आपने अच्छे मार्गदर्शकों के उदाहरण देखे हैं? यदि हाँ, तो आप उनसे क्या सीख सकते हैं?
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निष्कर्ष
संक्षेप में, मैं उन लोगों को प्रोत्साहित करने के लिए एक अन्तिम बात कहना चाहूँगा जो मार्गदर्शक बनना या ढूँढना चाहते हैं। मार्गदर्शन हमेशा के लिए नहीं होता है, अर्थात् हमेशा नहीं चलता है। कई लोग ऐसा नहीं मानते हैं। यदि सब नहीं तो अधिकाँश मार्गदर्शन कुछ समय के लिए ही होता है। परमेश्वर विशेष समय के लिए और ईश्वरीय मार्गदर्शन के विशेष पहलुओं के लिए हमारे जीवन में मार्गदर्शक एवं शिष्य भेजता है।
इसलिए जब आप मार्गदर्शक ढूँढ़ने या बनने की तैयारी कर रहे हों, तो शान्त रहें। क्योंकि यह मार्गदर्शन हमेशा तक नहीं चलेगा। यह आवश्यक नहीं है कि ये आपके जीवन या आपके द्वारा मार्गदर्शन प्राप्त करने वाले व्यक्ति के जीवन का अन्तिम या सबसे महत्वपूर्ण मार्गदर्शन का सम्बन्ध हो। ग़लत उम्मीदें छोड़ देने से दबाव कम होगा, इसलिए उम्मीद है कि आप परमेश्वर के द्वारा दिए गए मार्गदर्शक का आनन्द ले पाएँगे।
हाँ, तीमुथियुस के पास पौलुस था और उनका सम्बन्ध अनोखा और लम्बे समय तक चलने वाला था। परन्तु हर किसी को पौलुस नहीं मिलता है। हम में से अधिकतर लोगों को नहीं मिलता है। परन्तु परमेश्वर के अनुग्रह से, वह हमें अपनी कलीसिया के अन्य लोगों के पास ले जाता है जहाँ हम एक-दूसरे का आत्मिक मार्गदर्शन करके और उनसे मार्गदर्शन लेकर अपने विश्वास को और अधिक दृढ़ कर सकते हैं, तथा अपनी बुलाहट को और अधिक सामर्थी बना सकते हैं, और अपने चरित्र को और अधिक निखार सकते हैं और अपनी योग्यताओं को बढ़ा सकते हैं। यह सब मिलकर परमेश्वर की महिमा और आदर के लिए है।
अन्त टिप्पणीयाँ
- गॉर्डन डी. फी, 1 और 2 तीमुथियुस, तीतुस, द न्यू इंटरनेशनल बाइबिलिकल कमेंट्री (पीबॉडी, एमए: हेंड्रिक्सन, 1988), 2.
- जॉन स्टॉट, सत्य की रक्षा करें: 1 तीमुथियुस और तीतुस का सन्देश, बाइबल आज भी बोलती है (डाउनर्स ग्रोव, आईएल: इंटरवर्सिटी, 1996), 37.
- हेन पी. ग्रिफिन और थॉमस डी. ली, 1, 2 तीमुथियुस, तीतुस, द न्यू अमेरिकन कमेंट्री, खंड 34 (नैशविले: ब्रॉडमैन,
1992), 43. - फी, 1 और 2 तीमुथियुस, तीतुस, 58.
- प्लैट, अकिन और मेरिडा ने बल देकर कहा कि, “पौलुस उसी उपदेश पर लौटता है जिससे उसने आरम्भ किया था, और जिस विषय पर उसने सम्पूर्ण पत्र में चर्चा की थी—सुसमाचार की सच्चाई को दृढ़ता से थामे रहो।” डेविड प्लैट, डैनियल एल. अकिन और टोनी मेरिडा द्वारा लिखित पुस्तक, “यीशु की प्रशंसा करना: 1 और 2 तीमुथियुस तथा तीतुस की यीशु —केंद्रित व्याख्या”, नैशविले, बी एंड एच प्रकाशन, 2013, पृष्ठ 129.
- फी, 1 और 2 तीमुथियुस, तीतुस, 102.
- फी, 1 और 2 तीमुथियुस, तीतुस, 13.
- ग्रिफिन और ली, 1, 2 तीमुथियुस, तीतुस, 44.
- फी का अभिप्राय यह है कि तीमुथियुस को यह सन्देश दूसरों को सौंपने की पौलुस की इच्छा का एक कारण यह भी था कि तीमुथियुस शीघ्रता से इफिसुस को छोड़कर शीघ्र पौलुस के पास आ जाए। यदि ऐसा है, तो पौलुस यहाँ केवल एक साधारण सेवकाई नमूने का ही समर्थन नहीं कर रहा है, वरन् कलीसिया को शीघ्रता से परिपक्व बनाने का मार्ग दिखा रहा है। फी, 1 और 2 तीमुथियुस, तीतुस, 13.
- फी के अनुसार, “पौलुस चाहता है कि तीमुथियुस एक ऐसी शिक्षा का उदाहरण प्रस्तुत करे जो केवल त्रुटियों को दूर न करे और श्रोताओं को बचाए, वरन् परमेश्वर उसका उपयोग उन लोगों को छुटकारा दिलाने में भी करे जो पहले से ही झूठी शिक्षा के जाल में फँसे हुए हैं।” फी, 1 और 2 तीमुथियुस, तीतुस, 266.
लेखक के बारे में
ब्यू ह्यूज मिनियापोलिस–सेंट पॉल में स्थित सिटीज़ चर्च के मुख्य पादरी हैं। वे “Mercy for Today: A Daily Prayer from Psalm 51” और “Never Settle for Normal: The Proven Path of Significance and Happiness” के लेखक हैं।
वे अपनी पत्नी और अपने आठ बच्चों के साथ ट्विन सिटीज़ के हृदय में रहते हैं।
विषयसूची
- भाग I: पौलुस एवं तीमुथियुस
- तीमुथियुस को पौलुस की सलाह: सारांश
- तीमुथियुस की पहली पत्री
- तीमुथियुस की दूसरी पत्री
- चर्चा एवं मनन:
- भाग II: मार्गदर्शक को ढूँढना
- 1. योग्य मार्गदर्शक बनें
- 2. इस बात को समझें कि कहाँ ढूँढना है
- 3. इस बात को समझें कि आप किस को ढूँढ रहे हैं
- 4. इस बात को समझें कि निवेदन क्या करना है
- 5. इस बात को समझें कि किससे पूछना है
- 6. प्रार्थना
- चर्चा एवं मनन:
- भाग III: एक मार्गदर्शक बनना
- 1. इस बात को समझें कि आपके पास देने के लिए कुछ है
- 2. इस बात को समझें, कि आप मार्गदर्शन कैसे कर रहे हैं
- 3. इस बात को समझें कि आप किसका मार्गदर्शन कर रहे हैं
- 4. इस बात को जानें कि आप कैसे मार्गदर्शन कर रहे हैं
- 5. उपस्थित रहें
- चर्चा एवं मनन:
- निष्कर्ष
- अन्त टिप्पणीयाँ
- लेखक के बारे में