#28 कलीसिया की सदस्यता के लिये कारण
परिचय
मैं सोच में हूँ कि आप कलीसिया की सदस्यता विषय के बारे में क्या सोचते हैं। यदि मैं अंदाज़ा लगाऊँ, तो, आप इस विषय को कुछ उबाऊ समझते होंगे। ये शब्द — “कलीसिया की सदस्यता” — अपने आप में संस्थागत या नौकरशाही से सम्बन्धित प्रतीत होते हैं।
या, हो सकता है कि आप की चिन्ताएँ कुछ अधिक गम्भीर हैं। आप को लगता है कि कलीसिया की सदस्यता लोगों को जीवन में हस्तक्षेप करने का अधिकार देती है। यीशु ने कहा कि वह हमें स्वतन्त्र करने के लिये आया है। परन्तु क्या कलीसिया की सदस्यता, मसीहियों को एक दूसरे के मामलों में हस्तक्षेप करने के लिये नहीं कहती है?
अब आप से कहा जा रहा है कि आप इस संस्थागत या नौकरशाही से सम्बन्धित विषय के बारे में एक क्षेत्रीय मार्गदर्शिका को पढ़ें। हो सकता है कि आप इसे लेकर बिल्कुल भी उत्साहित न हों?
सम्भवतः मेरा स्वयं के प्रति ईमानदार होना सहायक होगा: क्योंकि मुझे भी कलीसिया का सदस्य होना, हमेशा से ही अच्छा नहीं लगा है। और मैंने इस विषय पर कुछ पुस्तकें लिखी हैं! कभी-कभी मैं चाहता हूँ कि मुझे अकेला छोड़ दिया जाए। मैं नहीं चाहता हूँ कि मुझे अन्य लोगों या उनकी समस्याओं या विचारों द्वारा परेशान किया जाए। कभी-कभी मेरा मन उनकी सेवा करना नहीं चाहता है।
हो सकता है कि आप जानते हैं कि यह अनुभव कैसा होता है। हमारे जीवन पहले से ही व्यस्त हैं। हमारे जीवन-साथी और बच्चे हमारा बहुत सा समय ले लेते हैं। और हमारी नौकरियों में भी ऐसा ही होता है। ऐसे में, क्या वास्तव में हमें कलीसिया के लोगों के बारे में चिन्ता करनी चाहिये? हमारे समय पर उनका तो कोई अधिकार नहीं है, है न?
यदि हम ईमानदार होंगे, तो हमें यह स्वीकार करना पड़ सकता है कि यहाँ कुछ गुप्त प्रवृत्तियाँ भी काम कर रही होती हैं (मैं मानता हूँ कि मेरे लिये तो यह सच है)। हमें अपनी स्वतन्त्रता पसन्द है, और स्वतन्त्रता को जवाबदेही पसन्द नहीं होती है। हमारे अन्दर का पुराना मनुष्यत्व छुपा हुआ, अनदेखा, और अज्ञात रहने की चाह रख सकता है। और छुपा हुआ रहना, आप को अपनी इच्छा के अनुसार आने-जाने देता है, तब आप जो चाहे वह कर सकते हैं, और यह आप को अवांछित आँखों और अनुपयुक्त वार्तालापों से बचाए रखता है।
और फिर यह अपरिहार्य तथ्य भी है कि हमारी कलीसियाएँ सिद्ध नहीं हैं, और कुछ तो ऐसा होने के निकट भी नहीं हैं। कलीसिया के हमारे साथी सदस्य रूखे हो सकते हैं, या अत्याधिक भावनात्मक माँगों को रखने वाले हो सकते हैं, या बस उबाऊ हो सकते हैं। कुछ तो आप की, और उनकी सेवा के लिए जो कार्य आप करते हैं, उसकी कोई सराहना नहीं करते हैं। कुछ आप के विरुद्ध और भी नाटकीय तरीकों से पाप करते हैं।
हमारे पास्टर भी हमें निराश कर सकते हैं। वे अपने द्वारा तय समय पर, हम से संपर्क नहीं करते हैं (ऐसा मैंने भी किया है)। वे हमारे, या हमारे बच्चों के नाम भूल जाते हैं (मैंने यह भी किया है)। कभी-कभी वे गलत निर्णय ले लेते हैं या मंच से उपदेश देते समय मूर्खता भरी बातें बोल देते हैं (एक बार फिर, मैं इसका भी दोषी हूँ)।
सम्भवतः सबसे अधिक दुःखदायी तब होता है, जब पास्टर अपनी नैतिक असफलताओं के कारण स्वयं को अपनी जिम्मेदारी के अयोग्य बना लेते हैं। वे कठोर या अपमानित करने वाले हो सकते हैं। वे लोगों को दुःख पहुँचा सकते हैं।
अपनी कलीसियाओं को “स्वर्ग के दूतावास” कहने के द्वारा, हम उच्च-स्तरीय ईश-विज्ञान भाषा का प्रयोग सरलता से कर सकते हैं, और मैं इस वाक्यांश का इस क्षेत्रीय मार्गदर्शिका में प्रयोग करूँगा। स्वर्ग का दूतावास बड़ा महिमान्वित सा शब्द लगता है, है न? आप स्वर्गीय प्रकाश में एकत्रित लोगों के एक समूह को लगभग चित्रित कर लेते हैं। परन्तु — पारदर्शी होने के लिये — बहुधा हमारी कलीसियाएँ ऐसी लगती नहीं है। कुछ तो “बुरी” होती हैं। अधिकाँश साधारण, नीरस, कुछ उबाऊ, महत्वहीन सी होती हैं। तो उन्हें स्वर्ग के दूतावास कहने में क्या मूल्य है?
यह सब कुछ यह कहने के लिये है कि, कलीसियाओं और कलीसिया की सदस्यता के बारे में स्वर्गीय अभिव्यक्तियों में होकर बात करने की कोई आवश्यकता नहीं है, अगर हम उन्हें पृथ्वी की वास्तविकताओं के संदर्भ में नहीं रखेंगे। क्योंकि कलीसिया की सदस्यता का अर्थ चाहे जो भी हो, उसे स्वर्ग और पृथ्वी, दोनों के लिए जवाबदेह होना होगा।
ऑडियो मार्गदर्शिका
ऑडियो#28 कलीसिया की सदस्यता के लिये कारण
1 क्या बाइबल में कलीसिया की सदस्यता लेना बताया गया है?1
किसी भी सिद्धान्त या प्रथा के बारे में, मसीहियों को सबसे पहला प्रश्न यह करना चाहिए कि, “क्या यह बाइबल के अनुसार है?”
यदि किसी लिफ्ट में जाते समय, इस प्रश्न का उत्तर देने के लिये केवल तीस सेकेण्ड ही हों, तो कलीसियाई अनुशासन से सम्बन्धित बाइबल के खण्डों को बताया जा सकता है। उदाहरण के लिये, पौलुस ने कुरिन्थुस की कलीसिया को लिखा, “और तुम शोक तो नहीं करते, जिससे ऐसा काम करने वाला तुम्हारे बीच में से निकाला जाता, परन्तु घमण्ड करते हो?” (1 कुरिन्थियों 5:2, टेढ़े अक्षर मेरे द्वारा)। और एक पल के बाद: “क्योंकि मुझे बाहर वालों का न्याय करने से क्या काम? क्या तुम भीतरवालों का न्याय नहीं करते? परन्तु बाहर वालों का न्याय परमेश्वर करता है। इसलिये उस कुकर्मी को अपने बीच में से निकाल दो” (1 कुरिन्थियों 5:12-13; साथ ही मत्ती 18:17; तीतुस 3:10 भी देखें)। कलीसिया अपने “अन्दर” से किसी को तब तक नहीं “निकाल” सकती है, जब तक कि निकाले जा सकने के लिये वह अन्दर न हो।
वैकल्पिक रीति से प्रेरितों के काम पुस्तक से अनेकों खण्डों को दिखाया जा सकता है, जहाँ लोगों के कलीसियाओं में जोड़े जाने या कलीसिया के रूप में एकत्रित होने को कहा गया है:
- “अत: जिन्होंने उसका [पतरस] वचन ग्रहण किया उन्होंने बपतिस्मा लिया; और उसी दिन तीन हज़ार मनुष्यों के लगभग उनमें मिल गए।” (प्रेरितों 2:41)।
- “सारी कलीसिया पर और इन बातों के सब सुनने वालों पर बड़ा भय छा गया…और वे सब एक चित्त होकर सुलैमान के ओसारे में इकट्ठे हुआ करते थे। परन्तु औरों में से किसी को यह हियाव न होता था कि उनमें जा मिले; तौभी लोग उनकी बड़ाई करते थे” (प्रेरितों 5:11, 12b–13)।
- “तब उन बारहों ने चेलों की मण्डली को अपने पास बुलाकर कहा” (प्रेरितों 6:2).
वे 3,000 किन में “जुड़” गए? प्रेरितों 2 और 5 में “उनमें” कौन है? यरूशलेम की कलीसिया, सुलैमान के ओसारे में कौन इकट्ठे हुआ करते थे, जिन्हें बारह प्रेरितों द्वारा बुलाया जाना सम्भव था? वे उन्हें गिन सकते थे, अर्थात् वे उनके नाम जानते थे। किसे पता है कि कलीसिया ने उन 3,000 के नाम कम्प्यूटर में दर्ज किये गए, या किसी चर्मपत्र पर। परन्तु उन्हें पता था कि “वे” कौन थे।
या, सदस्यता के प्रमाण के लिये शेष नए नियम में दिखाया जा सकता है कि किस प्रकार कुछ विशिष्ट लोगों के स्थापित समूहों को कलीसिया कहकर सम्बोधित किया गया है। उदाहरण के लिये, यूहन्ना “इफिसुस की कलीसिया” तथा “स्मुरना की कलीसिया” और “पिरगमुन की कलीसिया” (प्रकाशितवाक्य 2:1, 8, 12) को लिखता है। इफिसुस की कलीसिया के सदस्य स्मुरना की कलीसिया के सदस्य नहीं थे, और स्मुरना की कलीसिया के सदस्य, पिरगमुन की कलीसिया के सदस्य नहीं थे, इत्यादि। इसी प्रकार से, पौलुस “परमेश्वर की उस कलीसिया के नाम जो कुरिन्थुस में है” को लिखता है, और उन्हें निर्देश देता है कि, “जब तुम इकट्ठे हो” या उनसे कहता है कि, प्रभु-भोज खाने से पहले “एक दूसरे के लिये ठहरा करो” (1 कुरिन्थियों 1:2; 5:4; 11:33)। एक बार फिर, उन्हें पता था कि “वे” कौन थे। और नए नियम में जिस भी कलीसिया का नाम लिया गया, उसके साथ ऐसा ही था।
कलीसिया की सदस्यता को परिभाषित करना
अगला प्रश्न है, “कलीसिया की सदस्यता क्या है?” यदि मैं यह आप से पूछूँ, तो आप क्या कहेंगे? मेरा मानना है कि आप, कलीसिया क्या है, के प्रति अपने दृष्टिकोण के अनुसार, आप इस प्रश्न का कुछ भिन्न ही उत्तर देंगे। यदि आप कलीसिया को लोगों के लिये आत्मिक लाभ उपलब्ध करवाने वाला मात्र ही समझते हैं, तो फिर आप का कलीसिया की सदस्यता के प्रति दृष्टिकोण, दुकानदारी से सम्बन्धित किसी क्लब में, या किसी व्यायाम-शाला में सदस्यता लेने से भिन्न नहीं होगा। अपनी इच्छानुसार आएँ या जाएँ। नियन्त्रण आप के हाथ में है। स्वयं ही निर्धारित कर लें कि आप की आत्मिक बढ़ोतरी के लिए कौन से कार्यक्रम सबसे उत्तम हैं। प्रशिक्षित पेशेवर लोग लक्ष्य निर्धारित तथा पूरे करने में आप की सहायता करेंगे। और यह भी है कि, आप जितनी अधिक बार आएँगे, उतने ही अधिक लाभ पाएँगे।
परन्तु, इसके विपरीत, यदि आप कलीसिया को एक परिवार समझते हैं, तो सदस्यता भाइयों और बहनों के सम्बन्धों के समान लगेगी। हर एक जन, परिवार की पहचान में भागीदार होगा, और ध्यान रखने तथा प्रेम करने के पारिवारिक कार्य में योगदान भी देगा। प्रत्येक की बुलाहट प्रेम देने और प्राप्त करने की होगी। और प्रेम अनेकों स्वरूपों में आता है। कभी यह प्रोत्साहन के रूप में आ सकता है, और कभी सुधार के समान। लगभग हर बार, इसमें समय लगाना होता है। जब कलीसिया एक परिवार होती है, तो सदस्यता में, केवल इतवार को ही नहीं, बल्कि पूरे सप्ताह, अन्य सदस्यों के साथ समय बिताना भी सम्मिलित होता है।
रोचक बात है कि बाइबल में कलीसिया का वर्णन करने के लिये कई चित्रण दिये गये हैं। यीशु तथा शिष्यों ने कलीसिया का वर्णन, एक परिवार, देह, मन्दिर, झुण्ड, दुल्हिन, और अन्य रूपों में किया है। इनमें से प्रत्येक चित्रण कलीसिया की सदस्यता को गहराई से समझने में योगदान करता है। दूसरे शब्दों में, एक ही परिवार के सदस्य होने के कारण, कलीसिया की सदस्यता में, साझा पहचान रखना और एक-दूसरे की सहायता करना सम्मिलित होता है। इसमें एक ही देह के भिन्न अँग होने के नाते परस्पर निर्भरता का अनुभव सम्मिलित होता है, जैसे कंधे की बाँह के प्रति, और बाँह की कंधे के प्रति निर्भरता। इसमें एक मन्दिर की ईंटों के समान परमेश्वर की पवित्रता को दिखाने के लिए एक-दूसरे की सहायता करना सम्मिलित होता है; इत्यादि।
बाइबल के इन सभी चित्रणों को साथ जोड़ लीजिये और आप को तुरन्त एहसास हो जाएगा कि कलीसिया की सदस्यता एक बिलकुल भिन्न बात है। यह किसी क्लब, व्यायाम-शाला, या संघ, या अन्य किसी भी सदस्यता से बिलकुल भिन्न है।
आप सोचेंगे, फिर भी, क्या कलीसिया की सदस्यता को परिभाषित करने का कोई अन्य संक्षिप्त तरीका है? चलिये, इस परिभाषा से आरम्भ करते हैं: कलीसिया की सदस्यता वह औपचारिक प्रतिबद्धता है जो बपतिस्मा ले चुके मसीही एक-दूसरे से करते हैं, कि उपदेश तथा प्रभु-भोज के लिए नियमित रीति से साथ एकत्रित होने के द्वारा, वे इन दोनों बातों का निर्वाह करने, मसीही होने की अपनी पहचान को बनाए रखने, और यीशु का अनुसरण करने में एक-दूसरे की सहायता करेंगे।
चर्च की सदस्यता का यह सम्पूर्ण तात्पर्य नहीं है, परन्तु यह एक आधारभूत ढाँचा है। इस परिभाषा की तीन बातों पर ध्यान कीजिए:
- यह बपतिस्मा ले चुके मसीहियों के मध्य एक औपचारिक प्रतिबद्धता है। संज्ञा यही है। यही सदस्यता है: अर्थात् एक परस्पर प्रतिबद्धता। कभी-कभी कलीसियाएँ इस प्रतिबद्धता का वर्णन करने के लिए शब्द “वाचा” को प्रयोग करती हैं।
- यह प्रतिबद्धता क्या करने के लिए है? दो बातें करने के लिए: सार्वजनिक रीति से एक दूसरे के मसीही होने को पहचानना, और विश्वास में बढ़ने तथा दृढ़ बने रहने में एक दूसरे की सहायता करना।
- और यह इन बातों को किस प्रकार से निभाने करने की प्रतिबद्धता है? नियमित रीति से उपदेश तथा प्रभु भोज के लिए साथ एकत्रित होने के द्वारा।
जैसा कि मैंने कहा, यह एक आधारभूत ढाँचा है, जिस के ऊपर हम पहले कहे गए विभिन्न चित्रणों को लेकर माँसपेशियाँ और माँस को भरते है। हम प्रतिबद्ध हैं कि हम एक परिवार के समान जीने, देह के समान बढ़ने, मन्दिर के समान खड़े रहने, आदि में एक-दूसरे की सहायता करेंगे।
कलीसिया में कौन जुड़ सकता है? कोई भी जो अपने पापों से पश्चाताप करता है, मसीह में विश्वास करता है, और बपतिस्मा लेने की मसीह की आज्ञा का पालन करता है। कलीसिया की सदस्यता अविश्वासियों के लिये, विश्वासियों के बच्चों के लिये, या किसी ऐसे विश्वासी के लिये जिसने बपतिस्मा नहीं लिया है, नहीं है। यह बपतिस्मा लिये हुए विश्वासियों — नई वाचा के उन सदस्यों के लिये है, जो औपचारिक रीति से यीशु के नाम से पहचाने जाने के लिये समर्पित हैं।
कोई व्यक्ति कलीसिया का सदस्य किस प्रकार से बन सकता है? विभिन्न सांस्कृतिक पृष्ठ-भूमियों के कारण विभिन्न प्रथाएँ हैं। पश्चिमी सभ्यता में, जो नामधारी मसीहियत और अनेकों झूठे मसीहों से त्रस्त है, एक बुद्धिमान कलीसिया, सम्भवतः, सदस्यता के लिए कक्षाओं और साक्षात्कार को सम्मिलित करेगी। इससे कलीसिया यह जान पाती है कि उस व्यक्ति का विश्वास क्या है, और व्यक्ति जान पाता है कि उस कलीसिया की मान्यताएँ क्या हैं। जो न्यूनतम होना ही चाहिए, वह बाइबल के अनुसार कम से कम (i) एक वार्तालाप है, जिसमें वे प्रश्न पूछे जाएँ, जैसे यीशु ने प्रेरितों से पूछे थे, “परन्तु तुम मुझे क्या कहते हो?” (मत्ती 16:15); और (ii) एक प्रतिबद्धता या एक अनुबंध, जिससे लोगों को सहमत किया जाता है या होते हैं (मत्ती 18:18-20)।
कोई व्यक्ति कलीसिया को कैसे छोड़ सकता है? इसका लघु उत्तर है, मृत्यु के द्वारा, किसी अन्य सुसमाचार प्रचार करने वाली कलीसिया में सदस्यता लेने के द्वारा, या कलीसिया के अनुशासन के द्वारा, जिन पर चर्चा हम नीचे करेंगे। परमेश्वर के राज्य के दृष्टिकोण से, कलीसिया की सदस्यता स्वेच्छा से नहीं है। मसीहियों को कलीसियाओं से जुड़ना ही है। बाइबल में, जैसा एक पुरानी पीढ़ी की धारणा थी, पीछे हट जाने, या समझौता करके “संसार में चले जाने” का कोई स्थान नहीं है।
और अन्त में, सदस्यता की क्या ज़िम्मेदारियाँ हैं? हम थोड़ी ही देर में इस विषय को एक पूरा खण्ड देंगे, परन्तु इसका शीघ्र उत्तर है कि सदस्यों को अन्य शिष्य बनाने के लिए कार्य करना चाहिये। इसमें, सुसमाचार बाँटना, सुसमाचार की गलत व्याख्याओं से रक्षा करना, सुसमाचार में नए सदस्यों की पहचान करना, सुसमाचार में एक-दूसरे की रक्षा करना और सुधारना, सुसमाचार में एक दूसरे को बढ़ाना, सम्मिलित हैं।
चर्चा एवं मनन:
- इस खण्ड ने कलीसिया की सदस्यता के प्रति आप के दृष्टिकोण को किस प्रकार चुनौती दी?
- क्या आप बता सकते हैं कि किस प्रकार से कलीसिया की सदस्यता बाइबल का एक सिद्धान्त है और मात्र बुद्धिमानी की बात नहीं है?
2 कलीसिया क्या है?
मैंने ऊपर कहा है कि कलीसिया की सदस्यता के प्रति हमारा दृष्टिकोण, कलीसिया के प्रति हमारे दृष्टिकोण पर निर्भर करता है। तो, कलीसिया क्या है?
मैं एक और ढाँचे-रूपी उत्तर के साथ आरम्भ करूँगा, जो ऊपर दी गई सदस्यता की परिभाषा से बहुत मेल खाता है: कलीसिया ऐसे मसीहियों का एक समूह है, जिन्होंने मसीह के अनुयायी और परमेश्वर के राज्य के सदस्य होने के नाते, साथ मिलकर बाइबल का प्रचार करने एवं संस्कारों का पालन के द्वारा उस वाचा की पुष्टि करने के लिए, नियमित रीति से एक दूसरे के साथ एकत्रित होते रहने की वाचा बाँधी है।
कलीसिया की सदस्यता की परिभाषा, तथा कलीसिया की परिभाषा एक-दूसरे के समान हैं, क्योंकि एक कलीसिया उसके सदस्य ही होते हैं।
मैं अन्तिम वाक्य को एक ऐसे उदाहरण के द्वारा समझाता हूँ, जिसे मैं बहुधा प्रयोग करता हूँ। कल्पना कीजिये आप गरम क्षेत्रों में, किसी जलपोत से यात्रा कर रहे हैं। वह पोत समुद्री चट्टानों से टकराकर डूब जाता है, परन्तु उसके हजारों यात्री वहीं पर स्थित एक वीरान टापू पर पहुँच कर बच जाते हैं। कई दिन बीत जाते हैं। आप को तट पर बह कर आई एक बाइबल मिलती है, और आप उसे वहीं रेत पर बैठे हुए पढ़ने लगते हैं। बचे हुए अन्य लोगों में से कई आप को उसे पढ़ते हुए देखते हैं, आप के पास आते हैं और पूछते हैं कि क्या आप एक मसीही हैं। आप कहते हैं कि आप हैं, और यीशु मसीह के सुसमाचार को उन्हें समझाते हैं। वे सभी उस समाचार से सहमत होते हैं, और फिर उसे अपने ही शब्दों में समझाते हैं। आप सभी सहमत हैं कि मसीह कौन है और उसने क्या किया है। आप सभी उत्साहित हैं कि आप को साथी मसीही मिल गए हैं।
उस समय पर, समूह के एक जन ने कहा कि उसे उस टापू पर कुछ अँगूर मिले हैं, जिनसे वह दाखरस बना सकता है। तब, आप सभी सहमत होते हैं कि जब तक हम इस टापू पर रहेंगे, हम सप्ताह में एक बार, एक-दूसरे को बाइबल सिखाने के लिये, तथा टापू पर बने रस से प्रभु भोज लेने के लिए एकत्रित हुआ करेंगे। आप इस पर भी सहमत होते हैं कि इस सुसमाचार को, जहाज़ से बचे हुए अन्य लोगों के साथ भी बाँटेंगे, और उन्हें, जो पश्चाताप करते तथा विश्वास करते हैं, उन्हें समुद्र के सुन्दर नीले पानी में बपतिस्मा देंगे।
आपका यह छोटा सा समूह, अब क्या हो गया है? पूफ — आप एक कलीसिया हैं, और आप सभी उसके सदस्य हैं। एक-दूसरे को सदस्य मानने के द्वारा, आप एक कलीसिया बन गये हैं। या इसे पलट कर कहें, कलीसिया का अस्तित्व उसके सदस्यों से है। उसके सदस्य ही कलीसिया हैं।
कलीसिया बनने के लिये, मसीहियों को किसी बिशप की आशीष नहीं चाहिये। उन्हें धर्म-स्थल की जटिल सामग्री भी नहीं चाहिये। वहाँ किसी पास्टर की उपस्थिति भी नहीं चाहिये। उदाहरण के लिए, सेवकाई के लिये उनकी पहली यात्रा के बाद, पौलुस और बरनबास दूसरी यात्रा पर निकले, जिस में वे फिर से उन कलीसियाओं में गये जिन्हें उन्होंने स्थापित किया था, और उन में प्राचीन नियुक्त किये (प्रेरितों 14:23)। पौलुस ने तीतुस से भी क्रेते में, जिन कलीसियाओं को वह स्थापित कर के आया था, उन में यही करने के लिये कहा (तीतुस 1:5)। दूसरे शब्दों में, इन कलीसियाओं की स्थापना और उनका कुछ समय तक कार्य करते रहना, किसी पास्टर की उपस्थिति के बिना ही बना रहा। हमारे लिये एक शिक्षा: कलीसिया के व्यवस्थित संचालन, और स्वस्थ रहने के लिये निःसन्देह पास्टरों का होना आवश्यक है; परन्तु कलीसिया के अस्तित्व के लिये उनका होना अनिवार्य नहीं है।
कलीसिया के अस्तित्व के लिये, आप को सदस्य चाहियें। आप को — एक बार फिर से, हमारी परिभाषा — मसीहियों का एक समूह चाहिये, जिन्होंने मसीह के अनुयायी और परमेश्वर के राज्य के नागरिक होने के नाते, साथ वाचा बाँधी है कि बाइबल के उपदेश के लिये नियमित एकत्रित होंगे, और संस्कारों के द्वारा उस वाचा की एक-दूसरे के साथ पुष्टि करते रहेंगे।
मेरे विचार से प्रभु-भोज के कार्य को प्रमुख करने के द्वारा आप को इसे समझने में सहायता मिलेगी। यदि आप प्रभु भोज के दौरान बैठे रहे हैं, तो सम्भवतः आप ने पास्टर को 1 कुरिन्थियों 11:26 को पढ़ते सुना होगा: “क्योंकि जब कभी तुम यह रोटी खाते और इस कटोरे में से पीते हो, तो प्रभु की मृत्यु को जब तक वह न आए, प्रचार करते हो।” दूसरे शब्दों में, प्रभु-भोज, सुसमाचार की ओर संकेत करता है। आप प्रभु की मृत्यु को स्मरण करते हैं। परन्तु वह भोज बस इतना ही नहीं करता है। इससे एक अध्याय पहले, पौलुस उस भोज के बारे में यह कहता है: “इसलिये कि एक ही रोटी है तो हम भी जो बहुत हैं, एक देह हैं: क्योंकि हम सब उसी एक रोटी में भागी होते हैं” (1 कुरिन्थियों 10:17)। पौलुस पुष्टि करता है कि हम जो बहुत हैं, एक देह हैं। परन्तु हम कैसे जानते हैं कि हम एक देह हैं? वाक्य के पहले और अन्तिम वाक्यांश उत्तर प्रदान करते हैं:
- “इसलिये कि एक ही रोटी है तो हम भी जो बहुत हैं, एक देह हैं…”
- या फिर से: “हम भी जो बहुत हैं, एक देह हैं: क्योंकि हम सब उसी एक रोटी में भागी होते हैं।”
एक प्रकार से, यह उसी एक बात को दो बार कहना है। एक ही रोटी से भाग लेने के द्वारा, हम यह दिखाते हैं कि हम एक देह हैं। हम यह जानते हैं कि हम एक देह हैं क्योंकि हम एक ही रोटी में से भाग लेते हैं।
दूसरे शब्दों में, प्रभु भोज को लेना दिखाता, प्रदर्शित करता, इस तथ्य पर तेज़ प्रकाश डालता है कि हम एक देह हैं। प्रभु भोज कलीसिया को प्रकट करने वाला संस्कार है। यह मसीही मित्रों के लिये शुक्रवार रात को एकत्रित होकर साथ समय बिताते हुए लिया गया भोजन नहीं है। यह माता-पिता और उनके बच्चों के लिये नहीं है। यह कलीसिया के लिये है, क्योंकि यह कलीसिया का कलीसिया होना दिखाता है। इसीलिये पौलुस कुरिन्थुस के लोगों से कहता है कि यदि भूख लगती है तो भोजन घर पर कर लें, परन्तु कलीसिया के रूप में प्रभु भोज लेते समय “एक दूसरे के लिये ठहरा करें” (11:33)।
और, प्रभु भोज न केवल कलीसिया को, कलीसिया के रूप में दिखाता है। इससे कलीसिया, कलीसिया भी बनती है। ज़रा सोचिये: क्या होता है जब आप तथा अन्य मसीही, उस टापू पर पहली बार प्रभु भोज लेते हैं? यह करना, आप को एक साथ कलीसिया बना देता है। पौलुस से 1 कुरिन्थियों 10:17 की बात को लेते हुए, यह उस पल होता है कि आप स्वयं को एक देह घोषित करते हैं।
प्रभु भोज एक चिन्ह और एक मुहर है। यह हमारे एक देह होने के तथ्य का चिन्ह है। और किसी चेक पर हस्ताक्षर करने या पासपोर्ट पर मुहर लगाने के समान, यह वह मुहर है जो मसीहियों के एक समूह को आधिकारिक रीति से कलीसिया की एक देह के रूप में पंजीकृत करती है। यह आँखें-बन्द-करके-खाने वाला भोजन नहीं है। जब आप भोज लेते हैं, तब कलीसिया के सदस्य एक दूसरे के संगी मसीही होने की पुष्टि करते हैं।
थोड़ा पीछे हटकर देखते हैं, यहाँ महत्वपूर्ण शिक्षा यह है कि कलीसिया उसके सदस्य ही हैं। हम सुसमाचार के प्रचार और उस पर प्रभु भोज की मुहर लगाने के लिए एकत्रित होने के द्वारा इसे प्रकट करते हैं। साथ मिलकर प्रभु भोज लेने के द्वारा, हम एक-दूसरे की पुष्टि करते हैं कि हम उसकी कलीसिया के सदस्य, तथा मसीह के राज्य के नागरिक हैं।
सन् 2018 में, 62 अन्य मसीहियों तथा मैंने मिल कर चेवर्ली बैपटिस्ट कलीसिया की, मेरिलेण्ड की ओर, वॉशिंग्टन, डीसी के ठीक बाहर, स्थापना की थी। फरवरी के पहले तीन इतवार हम एकत्रित होते थे, गीत गाते थे, और पास्टर जॉन का उपदेश सुनते थे। परन्तु हम अभी तक एक कलीसिया नहीं थे। हमने इन तीन इतवारों को कलीसियाई ढाँचे के लिए अभ्यास कह कर बुलाया। फिर, महीने के चौथे इतवार, हमने सभा का अन्त, प्रभु भोज लेने के द्वारा किया। हमने कहा, यह करने के द्वारा, स्वर्ग की पुस्तकों में, हम आधिकारिक, पासपोर्ट की मुहर लगी हुई कलीसिया के रूप में, दर्ज हो गये हैं। उसके बाद ही हमने पास्टरों और प्राचीनों को नामांकित किया और फिर उनके लिए वोट दिये।
दूतावास के रूप में कलीसिया, और राजदूतों के रूप में सदस्य
मैंने अभी तक कई बार कहा है कि कलीसिया और कलीसिया की सदस्यता की उपरोक्त परिभाषाएँ मात्र एक ढाँचे के समान ही हैं। मेरा अर्थ यह है, यदि हमारे पास समय होता, तो हम नए नियम में कलीसिया के प्रत्येक चित्रण (परिवार, देह, मन्दिर, दुल्हिन, आदि) को देखते और उन हड्डियों पर कुछ माँसपेशियाँ और माँस को भरते, ताकि सच में यह आभास हो कि कलीसिया की सदस्यता क्या होती है।
समय बचाने के लिये, मैं नए नियम से एक और विषय लेना चाहता हूँ, जिससे हमें कलीसिया और उसके सदस्यों दोनों को बेहतर समझ सकें, और यह विषय परमेश्वर का राज्य है। यीशु ने बारम्बार अपने आने वाले राज्य के बारे में बात की। मसीह का राज्य उसका शासन है, और कलीसियाएँ उसके शासन की चौकियाँ या दूतावास हैं। इसके अतिरिक्त, प्रत्येक सदस्य, मसीह के राज्य का नागरिक भी है, और राजदूत भी।
यदि आप इस चित्रण से परिचित हैं, एक दूतावास, एक राज्य की सीमाओं के अन्दर, किसी दूसरे राज्य की आधिकारिक, अनुमति प्राप्त चौकी होती है। वह उस विदेशी राज्य का प्रतिनिधित्व करती है तथा उसके लिये बात करती है। हमारे पास, वॉशिंग्टन, डीसी में यह दर्जनों हैं। मुझे उस स्थान से होकर, जिसे दूतावास कतार कहते हैं, जहाँ संसार के देशों के एक के बाद एक दूतावास हैं, चलना अच्छा लगता है। वहाँ जापानी झण्डा और दूतावास है, इंग्लैण्ड है, फिनलैण्ड है। प्रत्येक दूतावास एक भिन्न देश, भिन्न सरकार, एक भिन्न संस्कृति, एक भिन्न प्रकार के लोगों का प्रतिनिधित्व करता है।
या, यदि आप मेरे समान एक अमरीकी हैं, और आप अन्य देशों की यात्राएँ करते हैं, तो आप को उन अन्य देशों में अमेरिका के दूतावास मिलेंगे। उदाहरण के लिये, मैंने ब्रसेल्स, बेल्जियम के एक कॉलेज में आधा वर्ष बिताया, जिस दौरान, मेरे अमरीकी पासपोर्ट की अवधि समाप्त हो गई। इसलिये, मैं ब्रसेल्स में अमरीकी दूतावास में गया। उन्होंने मुझे बताया कि मेरे वहाँ अन्दर आने पर मैंने मानो अमेरिका की धरती पर कदम रख लिये थे। वह इमारत, बेल्जियम के लिए राजदूत, अन्दर कार्य करने वाले सभी सरकारी कर्मचारी, अमेरिकी सरकार से अधिकार प्राप्त हैं। वे मेरी सरकार के लिये इस प्रकार से बोल सकते हैं, जैसा कि मैं, अमरीकी नागरिक होने के बावजूद, नहीं बोल सकता हूँ, कम से कम आधिकारिक रीति से तो नहीं। दूतावास और राजदूत किसी विदेशी राज्य के आधिकारिक निर्णयों को प्रस्तुत करते हैं — उस देश को क्या चाहिये, वह क्या करेगा, वह किस बात को मानता है।
मेरे अवधि पूरी हुए पासपोर्ट को देखने और अपने कम्प्यूटरों द्वारा जाँच करने के बाद, उन्होंने निर्णय लिया: मैं सच में एक अमरीकी नागरिक हूँ, और इसलिये उन्होंने मुझे के नया पासपोर्ट दे दिया।
इसी प्रकार से, यीशु ने स्थानीय कलीसियाओं को स्थापित किया कि स्वर्ग के कुछ निर्णय घोषित करे, चाहे अस्थायी रूप में। राज्य की कुँजियों को पहले पतरस और प्रेरितों को, तथा बाद में एकत्रित कलीसियाओं को देने के द्वारा, यीशु ने कलीसियाओं को ब्रसेल्स में अमरीकी दूतावास के समान ही अधिकार दिया: अस्थायी निर्णय लेने का अधिकार कि सुसमाचार का सही अंगीकार करना क्या है (मत्ती 16:13-19), और स्वर्ग के राज्य का नागरिक कौन है (18:15-20)। जब यीशु ने कहा कि कलीसियाओं को पृथ्वी पर उसे बाँधने और खोलने का अधिकार है, जो स्वर्ग में बाँधा या खोला गया है (16:18; 18:17-18), तो उसका यही अर्थ था। उसका अर्थ यह नहीं था कि वे लोगों को मसीही बना सकते थे, या सुसमाचार को, जो वह है, वह बना सकते थे, जिस प्रकार से दूतावास मुझे न तो अमरीकी बना सकता था, और न ही, अमरीकी नियम बना सकता था। बल्कि, यीशु के कहने का अर्थ था कि कलीसियाएँ, स्वर्ग की ओर से, सुसमाचार के क्या और कौन से सम्बन्धित आधिकारिक घोषणाएँ या निर्णय देंगे। सही अँगीकार क्या है? सच्चा अँगीकार करने वाला कौन है?
कलीसिया, अपने उपेदशों और संस्कारों के द्वारा इन निर्णयों को करती है। जब एक पास्टर अपनी बाइबल खोल कर प्रचार करता है कि, “यीशु ही प्रभु है,” और “सब परमेश्वर की महिमा से रहित हैं, “और “विश्वास सुनने से आता है,” वह स्वर्ग कि निर्णयों को दोहरा रहा है। और वह उनके विवेक को बाँध रहा है, जो स्वयं को स्वर्ग के राज्य का नागरिक कहता है। इस प्रकार का प्रचार करना सुसमाचार के क्या की ओर संकेत करता है — इसे स्वर्गीय अँगीकार कह सकते हैं।
इसी प्रकार से, जब कलीसिया बपतिस्मा देती है और प्रभु भोज का आनन्द लेती है, तब वह सुसमाचार के कौन पर स्वर्गीय निर्णय लाती है — उन्हें स्वर्गीय अँगीकार करने वाले कह सकते हैं। जब हम पिता, पुत्र, और पवित्र आत्मा के नाम में बपतिस्मा देते हैं (मत्ती 28:19 देखिये), तब हम यही करते हैं। हम ऐसे लोगों को पासपोर्ट दे रहे हैं, और कहते हैं कि, “वे यीशु के लिये बोलते हैं।” हम इसी प्रक्रिया को प्रभु भोज द्वारा दोहराते हैं। एक ही रोटी से भाग लेना, हम ने 1 कुरिन्थियों 10:17 से देखा है, यह दिखाता और पुष्टि, दोनों, करता है कि मसीह की एक देह का भागीदार कौन है। यह कलीसिया को प्रकट करने वाला संस्कार है।
स्तुति, अँगीकार, और धन्यवाद की कलीसिया की प्रार्थनाएँ भी, परमेश्वर के निर्णयों को घोषित करती हैं। हम उसकी हस्ती को, और हम कौन हैं को स्वीकार करते हैं, और उसको जो मसीह में होकर उसने दिया है। मध्यस्थता की हमारी प्रार्थनाएँ भी, जब उसके वचन और आत्मा के अनुरूप होती हैं, दिखाती हैं कि हमारी अभिलाषाएँ परमेश्वर के निर्णयों के अनुरूप हो गई हैं।
कलीसिया का गीत गाना वह गतिविधि है जिससे हम उसके निर्णय, उसी के सामने तथा एक-दूसरे के सामने एक लयबद्ध और भावनात्मक रीति से दोहराते हैं।
अन्त में, हम अपने जीवनों में परमेश्वर के निर्णयों को पूरे सप्ताह बताते रहते हैं, साथ रहने के, तथा अलग रहने के, दोनों ही समयों में। हमारी संगति, और उस के विभिन्न स्वरूप, जब हम धार्मिकता को सम्मिलित करते हैं और अधार्मिकता का तिरस्कार करते हैं, तो वे परमेश्वर के विभिन्न निर्णयों के साथ हमारी सहमति को चित्रित करने वाले होने चाहियें। प्रत्येक सदस्य को, अपना जीवन, परमेश्वर के न्याय के पूर्वानुमान को प्रकट करते हुए जीना चाहिये।
अन्ततः, इसे ही हम कलीसिया की आराधना कहते हैं। एक कलीसिया की आराधना, परमेश्वर के निर्णयों के साथ उसकी सहमति और उनको घोषित करना होती है। जब हम शब्दों या कार्यों के द्वारा यह बताते हैं कि, “हे प्रभु आप ही योग्य और कीमती और महत्वपूर्ण हैं। न कि मूर्तियाँ।” तब हम आराधना करते हैं।
इस दौरान, प्रत्येक सदस्य एक राजदूत है। फिलिप्पियों में, पौलुस हमें स्वर्ग के “नागरिक” (फिलिप्पियों 3:20) कहता है। वह 2 कुरिन्थियों में, हमने “राजदूत” (2 कुरिन्थियों 5:20) कहता है। राजदूत क्या करता है? जैसा मैंने कहा था, वह किसी विदेशी सरकार का प्रतिनिधि है। दूतावास का कार्य उस व्यक्ति में केन्द्रित होता है। और प्रत्येक मसीही स्वर्ग का एक ऐसा ही राजदूत है।
इसलिये, हम प्रति सप्ताह अपने एकत्रित होने से जाने के बाद, अपने शहरों और नगरों में जाते हैं, और शिष्य बनाने के द्वारा राजा यीशु का प्रतिनिधित्व करने का प्रयास करते हैं। हम मेल-मिलाप के सन्देश के द्वारा सुसमाचार प्रचार करते हुए, उसके निर्णयों को घोषित करते हैं। मसीही जीवन जीने के द्वारा, हम परमेश्वर के निर्णयों को देहधारी करने का प्रयास करते हैं। अमेरिका के राष्ट्रपतियों ने बहुधा अमेरिका को पहाड़ पर बसा हुआ नगर कहा है। यीशु का अर्थ यह नहीं था। उसने कहा था कि उसके लोगों को पहाड़ों पर बसे हुए नगर होना चाहिये (मत्ती 5:14)। इसका अर्थ है कि मसीहियों के जीवनों को, वे चाहे साथ हों या पृथक, कलीसिया के रूप में स्वर्ग का प्रतिनिधित्व करना चाहिये।
जब गैर-मसीही किसी कलीसिया के सदस्यों के साथ समय बिताते हैं, तो उन्हें एक स्वर्गीय संस्कृति के प्रथम फल चखने को मिलने चाहिये। स्वर्ग के ये नागरिक आत्मा में दीन और नम्र होंगे। वे सत्य और धार्मिकता के भूखे और प्यासे, और मन में शुद्ध होंगे। वे शान्ति करवाने वाले, जो फेर कर दूसरा गाल देने वाले, अतिरिक्त कोस जाने वाले, जो कुर्ता माँगता है उसे दोहर भी दे देने वाले, व्यभिचार करना तो दूर किसी स्त्री की ओर बुरी दृष्टि भी न डालने वाले, हत्या करना तो दूर किसी से घृणा भी नहीं करने वाले लोग होंगे। हम जिस प्रकार का व्यवहार गैर-मसीहियों के साथ करते हैं, उससे उन्हें इन सभी बातों का अनुभव होना चाहिये, और वे जब हमें साथ रहते हुए देखते हैं, तब भी उन्हें यही बातें दिखाई देनी चाहिये।
अब, चलिये, ईमानदारी से बात करते हैं। हमारी कलीसियाएँ बहुधा पहाड़ पर बसे हुए नगरों के समान जीवन नहीं जीती हैं, और न ही स्वर्ग के दूतावासों के समान दिखाई देती हैं। और आप को याद है, हमने इस निबन्ध को इसी बात से आरम्भ किया था? मुझे याद आता है कि मेरा मित्र पास्टर बॉबी, प्रभु भोज की अगुवाई किस प्रकार से करता है। वह टिप्पणी करता है कि यह भोज “उस स्वर्गीय दावत का एक पूर्वाभास मात्र ही है।” यह एक बहुत मनोहर विचार है। परन्तु जब वह यह बात कहता है, तब मैं अपने हाथ में उस बिस्कुट समान छोटी सी वस्तु को देखता हूँ, और प्लास्टिक से बने उस छोटे से कप को, जो मेरी उँगलियों से ही टूट सकता है, और जिस में पानी मिला हुआ मात्र इतना दाखरस है, कि मेरा पूरा मुँह भी उससे गीला नहीं हो पाता है। और मैं सोचता हूँ, “सच में? यही पूर्वाभास है? आशा करता हूँ कि मसीही दावत इससे कहीं अधिक बेहतर होगी!”
मेरे यह कहने के प्रति कि कलीसिया स्वर्ग का दूतावास है, आप का प्रत्युत्तर भी ऐसा ही हो सकता है। कलीसिया के हमारे साथी सदस्य हमें निराश करेंगे और असंवेदनशील बातें कहेंगे। वे हमारे विरुद्ध पाप करेंगे, और हम उनके विरुद्ध पाप करेंगे।
न केवल यह, बल्कि कुछ हम अपनी कलीसिया के साथ एकत्रित तो होंगे, परन्तु गाने हमारे मनों को नहीं छूएँगे। उपदेश के दौरान हमारे मन भटकने लगेंगे। प्रार्थनाएँ प्रासंगिक नहीं लगेंगी। और सभा के बाद मित्रों से होने वाला वार्तालाप छोटी-मोटी व्यर्थ की बातों में फँसा हुआ होगा। “अच्छा, आप का शनिवार कैसा था?” “ठीक था, हमने कुछ विशेष नहीं किया।” “ठीक है।” इनमें से कुछ भी स्वर्गीय प्रतीत नहीं होता है।
इसीलिये बाइबल के ईश-विज्ञानी हमें याद दिलाते हैं कि हम मसीह के पहले और दूसरे आगमन के समयों के मध्य में रहते हैं। हम “हो चुके/अभी नहीं” के मध्य के समय में रहते हैं। हम बचाये जा चुके हैं, परन्तु हम अभी सिद्ध नहीं हुए हैं। इस बीच के समय द्वारा, हमारे मनों को कलीसिया की सिद्धता और उस आने वाली मसीही दावत के आनन्द की लालसा को भर देना चाहिये। और भी अधिक महत्वपूर्ण है कि हमारी असिद्धताएँ हमें याद दिलाती हैं कि हम मसीह ही की ओर लोगों को संकेत करते रहें। वह न तो कभी पाप करता है, और न कभी निराश करता है। दावत वही है। परन्तु अच्छा समाचार यह है कि हमारे जैसे पापी भी इस उपक्रम में सम्मिलित हो सकते हैं, यदि हम केवल अपने पापों को मान लें, और उसके पीछे चलने लगें।
चर्चा और मनन:
- कलीसिया क्या है को समझने के लिये, परमेश्वर के राज्य को समझना सहायक क्यों है?
- “राजदूत” होने की श्रेणी, कलीसिया की सदस्यता की आप की समझ में किस प्रकार योगदान करती है? इससे आप की अपनी कलीसिया में आप की कार्य-विधि पर क्या प्रभाव आ सकता है?
3 सदस्यता एक कार्य है
मैंने इस तथ्य का उल्लेख किया है कि कलीसिया की सदस्यता हमें स्वर्ग के राजदूत बना देती है। इसे दूसरे शब्दों में कहें तो, कलीसिया की सदस्यता एक कार्य है। बाइबल हमें दर्शक होने के लिए नहीं बुलाती है, जो किसी साप्ताहिक प्रदर्शन के लिये आ जाएँ, और फिर, अपने जीवन साथी के साथ टिप्पणियाँ करते हुए, वापस घर लौट जाएँ, कि: “आज सुबह संगीत जीवन्त था। मुझे तो पसन्द आया!” “हाँ, मुझे भी। और प्रचारक जैक तो बहुत मज़ाकिया थे, क्या तुम्हें ऐसा नहीं लगता है?” नहीं। यीशु ने आप की कलीसिया के प्रत्येक सदस्य को कोई कार्य सौंपा है। और उसने अगुवों को भी एक विशेष कार्य सौंपा है: कि सदस्यों को उनके कार्य करने के लिये प्रशिक्षित करें। इफिसियों 4 को सुनिये:
उसने कुछ को प्रेरित नियुक्त करके, और कुछ को भविष्यद्वक्ता नियुक्त करके, और कुछ को सुसमाचार सुनाने वाले नियुक्त करके, और कुछ को रखवाले और उपदेशक नियुक्त करके दे दिया, जिस से पवित्र लोग सिद्ध हो जाएँ और सेवा का काम किया जाए और मसीह की देह उन्नति पाए, जब तक कि हम सब के सब विश्वास और परमेश्वर के पुत्र की पहचान में एक न हो जाएँ, और एक सिद्ध मनुष्य न बन जाएँ और मसीह के पूरे डील–डौल तक न बढ़ जाएँ। ताकि हम आगे को बालक न रहें जो मनुष्यों की ठग–विद्या और चतुराई से, उन के भ्रम की युक्तियों के और उपदेश के हर एक झोंके से उछाले और इधर–उधर घुमाए जाते हों (4:11-14)।
मसीह की देह को बढ़ाते जाने का कार्य कौन करता है? पवित्र लोग। इस कार्य के लिये उन्हें प्रशिक्षित कौन करता है? पास्टर और शिक्षक। किस लक्ष्य के लिये? एकता, परिपक्वता, और मसीह के डील-डौल तक पहुँचने के लिये।
ठोस रीति से कहें, तो फिर कलीसिया के प्रत्येक सदस्य का अधिकार और कार्य क्या है? सदस्य होने के नाते हमारा कार्य सुसमाचार को बाँटना तथा उसकी रक्षा करना, और साथ ही सुसमाचार के पालन करने वालों — कलीसिया के अन्य सदस्यों की पुष्टि एवं देखरेख करना है।
गलातियों 1 में पौलुस के “आश्चर्य” के बारे में विचार कीजिये: “मुझे आश्चर्य होता है कि…तुम इतनी जल्दी फिर कर और ही प्रकार के सुसमाचार की ओर झुकने लगे” (1:6)। वह पास्टरों को नहीं, बल्कि कलीसिया के सदस्यों को डाँटता है, और उनसे कहता है कि झूठे सुसमाचार को सुनाने वाले प्रेरितों और स्वर्गदूतों का भी तिरस्कार कर दें। उन्हें सुसमाचार की रक्षा करनी थी।
या, 1 कुरिन्थियों 5 में पौलुस के अचरज के बारे में विचार कीजिये। कुरिन्थुस के लोग ऐसे पाप को स्वीकार कर रहे थे “जो अन्यजातियों में भी नहीं होता” (5:1)। “ऐसा काम करनेवाला तुम्हारे बीच में से निकाला जाता” (5:2), वह पूरी कलीसिया से कहता है। वह यह भी बताता है कि यह कार्य किस प्रकार से किया जाये — बृहस्पतिवार शाम को प्राचीनों की सभा में, बन्द द्वारों के पीछे नहीं, बल्कि जब पूरी कलीसिया एकत्रित हो रखी हो और एक साथ कार्यवाही कर सके: “कि जब तुम और मेरी आत्मा, हमारे प्रभु यीशु की सामर्थ्य के साथ इकट्ठे हो, तो ऐसा मनुष्य हमारे प्रभु यीशु के नाम से शरीर के विनाश के लिये शैतान को सौंपा जाए, ताकि उसकी आत्मा प्रभु यीशु के दिन में उद्धार पाए” (5:4-5)। जब वे उसके नाम में एकत्रित हैं, तब प्रभु यीशु की सामर्थ्य वास्तव में वहाँ उपस्थित होती है (मत्ती 18:20)। उस सामर्थ्य के साथ, उस जन को सदस्यता से निकाल देने के द्वारा, उन्हें सुसमाचार की रक्षा करनी थी।
कलीसिया के प्रत्येक सदस्य को यह पहचानना चाहिये कि, “सुसमाचार की रक्षा करना मेरी ज़िम्मेदारी है, और सदस्यों का स्वागत करना या तिरस्कार करना भी मेरी ज़िम्मेदारी है। यह अधिकार मुझे यीशु ने दिया है।” एक बार फिर से व्यवसायी भाषा का प्रयोग करें, हम सभी मालिक हैं। हानि या लाभ में हम सभी हिस्सेदार हैं।
इसलिये, वे पास्टर, जो कलीसिया के सदस्यों को यह कार्य करने से हटा देते हैं, चाहे कलीसिया के किसी औपचारिक स्वरूप के द्वारा, या उन्हें मात्र उपभोगता बना देने के द्वारा, वे सदस्यों में सम्मिलित होने तथा स्वामित्व रखने की भावना को दुर्बल करते हैं। वे लापरवाही करना, नाम के पीछे चलना, और अन्ततः ईश-विज्ञान में उदार सिद्धान्तों के घुस आने को प्रोत्साहित करते हैं। यदि आज कलीसिया की सदस्यता की जिम्मेदारियों का अन्त किया जाएगा, तो जान लीजिये कि कल निश्चय ही बाइबल के साथ समझौते घुस आएँगे।
निश्चय ही, यहाँ पर कार्य सदस्यों की सभा में उपस्थित होने के लिये आ जाने तथा नये सदस्यों के बारे में वोट डालने से बढ़कर है। कलीसिया के सदस्यों का कार्य पूरे सात दिन चलता रहता है। आप जिन लोगों को जानते नहीं हैं, उनकी पुष्टि कैसे कर सकते हैं, उन्हें ज़िम्मेदारी कैसे दे सकते हैं? कम से कम ईमानदारी से तो नहीं यह नहीं कर सकते हैं। इसका यह अर्थ नहीं है कि आप को कलीसिया के प्रत्येक सदस्य को व्यक्तिगत रीति से जानना है। हम इस कार्य को मिल-जुल कर करते हैं। परन्तु ऐसे तरीकों को अपनाइये जिन से आप के और अधिक साथी सदस्य, आप के जीवन की लय में नियमित स्थान पाएँ। हमारा कार्य प्रतिदिन यीशु का प्रतिनिधित्व करना और उसके सुसमाचार की एक-दूसरे के जीवनों में सुरक्षा करना है। पौलुस द्वारा रोमियों 12 में दी गई जाँचने की उस सूची के बारे में ध्यान कीजिये। मैं उसके लेख को आप के लिए बिन्दुओं में विभाजित कर देता हूँ, कि आप उसके अनुसार कार्य कर सकें:
- भाईचारे के प्रेम के साथ, एक-दूसरे के साथ पारिवारिक स्नेह को प्रदर्शित करें।
- परस्पर आदर देने में एक-दूसरे से बढ़ कर हों।
- प्रयत्न करने में आलसी न हों; आत्मिक उन्माद में भरे रहें; प्रभु की सेवा करते रहें।
- आशा में आनन्दित रहें; क्लेशों में स्थिर रहें; प्रार्थना में नित्य लगे रहें।
- पवित्र लोगों की आवश्यकताओं में उनके साथ बाँटें; पहुनाई करने में लगे रहें (रोमियों 12:10-13)।
इस सूची के आधार पर आप की क्या स्थिति है?
सुसमाचार को और बेहतर जानने के लिये हमें अध्ययन और कार्य करने में लगे रहना चाहिये। हमें सुसमाचार के तात्पर्यों का अध्ययन करना चाहिये और विचार करना चाहिए कि वे पश्चाताप से किस प्रकार से सम्बन्धित हैं। इसके अतिरिक्त, हमें कार्य करते रहना चाहिये जिससे हम अपने साथी सदस्यों को जान सकें, और वे हमें जान सकें। हम अपने दैनिक जीवनों में साथी सदस्यों में से और अधिक को सम्मिलित करने के द्वारा आरम्भ करने का प्रयास कर सकते हैं। यह कोई पेट्रोल पम्प पर लाभ मिलने के किसी कार्यक्रम के समान नहीं है, कि फार्म भरा और गाड़ी आगे बढ़ा ली।
अब, पास्टरों या प्राचीनों के लिये: यदि कलीसिया के सदस्यों का कार्य एक दूसरे की देख-रेख करने के द्वारा सुसमाचार की रक्षा करना है, तो हम क्या कहें कि पास्टर का कार्य क्या है? फिर से, इफिसियों 4 कहता है कि पास्टरों का कार्य है कि वे कलीसिया को बढ़ाने की सेवकाई के लिए पवित्र लोगों को तैयार करें (4:11-16)। तो, वे हमें तैयार करते हैं, कि हम सुसमाचार की रक्षा करें, और वे यह मुख्यतः साप्ताहिक सभाओं में करते हैं।
तो, कलीसिया की साप्ताहिक सभा, कार्य करने के लिये प्रशिक्षण का समय है। यह वह समय है जब जो लोग पास्टर का कार्य कर रहे हैं, वे उन्हें जो सदस्य हैं, तैयार करें कि वे सुसमाचार को जानें, सुसमाचार के अनुसार जीवन जियें, कलीसिया द्वारा सुसमाचार की गवाही को सुरक्षित रखें, और एक-दूसरे के तथा बाहर के लोगों के जीवनों में सुसमाचार की पहुँच को और अधिक बढ़ाएँ। यदि यीशु ने सदस्यों को यह ज़िम्मेदारी दी है कि वे एक-दूसरे को सुसमाचार में बढ़ाएँ और पुष्टि करें, तो वह पास्टरों से कहता है कि यह करने के लिये उन्हें प्रशिक्षित करें। यदि पास्टर अपने कार्य को भली-भाँति नहीं करेंगे, तो सदस्य भी नहीं कर पाएँगे।
मसीही, इसका अर्थ है कि आप ज़िम्मेदार हैं कि स्वयं के लिये प्राचीनों से निर्देश और परामर्श प्राप्त करें। आप ने उन से खरी शिक्षा का जो नमूना सीखा है, उसे अपना आदर्श बनाएँ (2 तीमुथियुस 1:13)। उनके उपदेश, चाल-चलन, मनसा, विश्वास, सहनशीलता, प्रेम, धीरज, और सताए जाने तथा दुःखों (2 तीमुथियुस 3:10–11) का भी अनुसरण करें। नीतिवचन के वह बुद्धिमान पुत्र या पुत्री बनें जो प्रभु का भय रखने और उसकी शिक्षाओं का पालन करने के द्वारा बुद्धिमानी, समृद्धि, और जीवन का मार्ग अपनाते हैं। यह रत्नों और सोने से भी बेहतर है।
इब्रानियों के लेखक को सुनिये, “अपने अगुवों की आज्ञा मानो और उनके अधीन रहो, क्योंकि वे उनके समान तुम्हारे प्राणों के लिये जागते रहते हैं” (13:17)। यदि प्राचीन या पास्टर बाइबल के विरुद्ध नहीं सिखा रहे हैं, तो सदस्यों को कलीसिया के जीवन से सम्बन्धित बातों में उनका अनुसरण करना चाहिये। सामान्यतः, उन्हें अधीन रहना चाहिये। यदि प्राचीन पवित्रशास्त्र के विरुद्ध जाते हैं, तो कलीसिया के लोगों का अधिकार अन्तिम है; परन्तु जब तक ऐसा न हो, कलीसिया के लोगों को अनुसरण करना चाहिये।
जब आप पास्टर के कार्य को सदस्यों के कार्य के साथ रखते हैं, तब आप को क्या मिलता है? शिष्यता के लिये यीशु का कार्यक्रम।
मैं जहाँ का पास्टर हूँ, यदि कोई उस कलीसिया में सम्मिलित होना चाहता है, तो सदस्यता के लिए साक्षात्कार के समय मैं कुछ इस तरह से बात को कहूँगा:
मित्र, इस कलीसिया में सम्मिलित होने के द्वारा, आप औरों के साथ इसके ज़िम्मेदार बन जाएँगे कि इस कलीसिया के लोग विश्वासयोग्यता से सुसमाचार का प्रचार करते हैं कि नहीं। इसका अर्थ है कि आप भी औरों के साथ दोनों बातों के लिये ज़िम्मेदार होंगे कि यह कलीसिया क्या सिखाती है, और क्या इसके सदस्यों के जीवन विश्वासयोग्य रहते हैं या नहीं। और एक दिन आप परमेश्वर के सामने खड़े होंगे और हिसाब देंगे कि आपने इस ज़िम्मेदारी का निर्वाह कैसे किया। हमें फसल काटने के लिये और अधिक सहायकों की आवश्यकता है, इसलिये हमारी आशा है कि आप इस कार्य में हमारे साथ सम्मिलित होंगे।
आखिरकार, सदस्यता के लिए साक्षात्कार, कार्य पर नियुक्त करने के लिये साक्षात्कार है। मैं यह सुनिश्चित करना चाहता हूँ कि वे यह जानते हैं। मैं यह सुनिश्चित करना चाहता हूँ कि वे कार्य करने के योग्य हैं।
कलीसिया में अनुशासन के बारे में क्या?
सदस्यता के बारे में चर्चा करते समय, एक अन्य बड़ा विषय है, जिस के बारे में हमें विचार करना चाहिये, और वह कलीसिया में अनुशासन है। यदि सदस्यता सिक्के का एक पहलू है, तो अनुशासन दूसरा है।
कलीसिया के मेरे एक साथी सदस्य ने एक बार मुझ से पूछा कि मेरे साथ उसके सम्बन्ध में, और उन मसीहियों के साथ, जो हमारी कलीसिया के सदस्य नहीं हैं, मेरे सम्बन्ध में क्या भिन्नता है। क्योंकि, अन्ततः यही प्रतीत होता है कि बाइबल हमें उन मसीहियों से भी प्रेम करने, उनके लिए प्रार्थना करने, उन्हें देने, और कभी-कभी सिखाने का निर्देश देती है, जो हमारी कलीसिया के सदस्य नहीं हैं। कभी-कभी हम सम्मेलनों में उनके साथ भी एकत्रित होते हैं। तो, भिन्नता क्या है?
पहली भिन्नता यह है कि हमें अपने साथी सदस्यों के साथ प्रति सप्ताह एकत्रित होना चाहिये। इसीलिये इब्रानियों का लेखक कहता है, “और प्रेम, और भले कामों में उस्काने के लिये हम एक दूसरे की चिन्ता किया करें, और एक दूसरे के साथ इकट्ठा होना न छोड़ें, जैसे कि कितनों की रीति है, पर एक दूसरे को समझाते रहें; और ज्यों ज्यों उस दिन को निकट आते देखो त्यों–त्यों और भी अधिक यह किया करो।” (इब्रानियों 10:24-25)। हम साप्ताहिक एकत्रित होने के लिये प्रतिबद्ध हैं, ताकि एक-दूसरे को प्रेम और भले कामों के लिए उभार सकें।
फिर भी दूसरी महत्वपूर्ण भिन्नता, मैंने अपने मित्र से कहा है कि, हम एक दूसरे को अनुशासित रखने में सहभागी हो सकते हैं। हो सकता है कि मैं अन्य कलीसियाओं के मसीही मित्रों को पाप के बारे में चेतावनी दे सकूँ। परन्तु कलीसिया के अनुशासन के लिये, मैं उन्हें कलीसिया की सदस्यता से निकालने की औपचारिक प्रक्रिया में सम्मिलित नहीं हो सकता हूँ। कलीसिया की अनुशासनात्मक कार्यवाही, हमारे साथी सदस्यों के साथ हमारे सम्बन्धों तथा अन्य स्थानों के मसीहियों के साथ हमारे सम्बन्धों को भिन्न करती है। इस कारण से यह समझने के लिये कि अनुशासन क्या है, इस में कुछ समय लगाना उचित होगा।
मोटे तौर पर, कलीसिया का अनुशासन, शिष्यता की प्रक्रिया का एक भाग है। जैसा कि जीवन के अनेकों क्षेत्रों में होता है, मसीही शिष्यता में, दोनों, निर्देश और अनुशासन, सम्मिलित होते हैं, जैसे कि फुटबॉल का अभ्यास और गणित की कक्षा।
बारीकी से, कलीसिया का अनुशासन पाप को सुधारना है। यह व्यक्तिगत चेतावनियों के साथ आरम्भ होता है। इसका अन्त, जहाँ अनिवार्य हो जाए, किसी को कलीसिया की सदस्यता से तथा प्रभु की मेज़ में भाग लेने से रोक देने के साथ होता है। वह व्यक्ति सार्वजनिक सभाओं में सम्मिलित होने के लिए स्वतन्त्र है, परन्तु वह अब सदस्य नहीं है। अब कलीसिया सार्वजनिक रीति से उसके विश्वास के दावे की पुष्टि नहीं करेगी।
कई प्रकार के पाप व्यक्तिगत रीति से सप्रेम दी गई चेतावनियों की माँग करते हैं। परन्तु सार्वजनिक अनुशासनात्मक कार्यवाही विशेषतः उन पापों के लिये होती है, जिनमें तीन अन्य मापदण्ड भी होने चाहियें:
- वह प्रकट होना चाहिये — उसे देखा या सुना जा सके (न कि अप्रत्यक्ष, जैसे घमण्ड)
- वह गम्भीर होना चाहिये — इतना गम्भीर कि उस जन द्वारा यीशु का अनुसरण करने के मौखिक दावे पर सन्देह उत्पन्न करे।
- वह अपश्चात्तापी होना चाहिये — व्यक्ति को उस पाप से अवगत किया गया है, किन्तु वह उसे छोड़ना नहीं चाहता है।
कलीसिया में अनुशासन का पहला उल्लेख मत्ती 18 में है, जहाँ पर यीशु पाप के लिये अपश्चात्तापी व्यक्ति के बारे में कहता है, “यदि वह उनकी भी न माने, तो कलीसिया से कह दे, परन्तु यदि वह कलीसिया की भी न माने तो तू उसे अन्यजाति और महसूल लेनेवाले जैसा जान” (18:17)। अर्थात्, उस से वाचा-बद्ध समूह से बाहर का जन होने के समान व्यवहार करना। उस व्यक्ति ने दिखा दिया है कि वह सुधरेगा नहीं। उसका जीवन, उसके मसीही होने के दावे के अनुरूप नहीं है।
अनुशासन पर एक अन्य जाना-माना खण्ड, 1 कुरिन्थियों 5, हमें अनुशासन के उद्देश्य को समझने में सहायता करता है। पहला, अनुशासन प्रकट कर देता है। कैंसर के समान ही, पाप भी गुप्त रहना चाहता है। अनुशासन उस कैंसर को प्रकट कर देता है, ताकि उसे काट के निकाला जा सके (1 कुरिन्थियों 5:2 देखिये)। दूसरा, अनुशासन चेतावनी देता है। एक कलीसिया, अनुशासन के द्वारा, परमेश्वर के न्याय को लागू नहीं करती है। बल्कि, वह एक ऐसी लघु प्रस्तुति करती है, जो आने वाले बड़े न्याय का चित्रण है (5:5)। तीसरा, अनुशासन बचाता है। कलीसिया ऐसा तब करती है जब वह देखती है कि कोई सदस्य मृत्यु के मार्ग पर अग्रसर है, और उनका कोई भी समझाना-बुझाना उस व्यक्ति को रोक नहीं पा रहा है। यह करना ही अन्तिम विकल्प रह जाता है (5:5)। चौथा, अनुशासन बचाव करता है। जिस प्रकार से कैंसर एक कोशिका से दूसरी में फैलता है, उसी प्रकार से पाप भी एक से दूसरे व्यक्ति में तेज़ी से फैलता है (5:6)। पाँचवां, अनुशासन कलीसिया की गवाही को सुरक्षित रखता है। कहना विचित्र लगता है, कि यह गैर-मसीहियों के काम आता है, क्योंकि इससे कलीसियाएँ विशिष्ट और आकर्षक बनी रहती हैं (5:1 देखिये)। आखिरकार, कलीसियाओं को नमक और प्रकाश होना है। “परन्तु यदि नमक का स्वाद बिगड़ जाए…”, यीशु ने कहा, “तो वह फिर किस वस्तु से नमकीन किया जाएगा? फिर वह किसी काम का नहीं, केवल इसके कि बाहर फेंका जाए और मनुष्यों के पैरों तले रौंदा जाए” (मत्ती 5:13)।
अनुशासन की चुनौती है कि: पापी अपने पापों के लिये उत्तरदायी होना नहीं चाहते हैं। आप इस ग्रह पर चाहे जहाँ पर भी हों, लोग अनुशासन का पालन नहीं करने का कोई-न-कोई बहाना ढूँढ लेते हैं। पूर्वी एशिया में वे तर्क देते हैं कि लज्जा की संस्कृति अनुशासन को असम्भव बना देती है। दक्षिणी अफ्रीका में वे कबीले की पहचान की भूमिका, और सम्भव है, ऊबुनटू का, हवाला देते हैं। ब्राज़ील में उनका दावा है कि परिवार की संरचना बाधा बनती है। हवाई में वे शान्त होकर आराम से रहने की संस्कृति तथा अलोहा आत्मा के बारे में बात करते हैं। अमेरिका में वे कहते हैं कि आप पर मुकदमा कर दिया जाएगा!
संक्षेप में, अदन की वाटिका के समय से ही, पापियों ने पाप को उचित ठहराने और उसे सुधारने से बचने के लिये, कोई-न-कोई तर्क बना लिया है। परन्तु आज्ञाकारिता और प्रेम हमें कलीसिया के अनुशासन का पालन करने के लिये कहते हैं।
कलीसिया का अनुशासन, उसके केन्द्र में, प्रेम के बारे में है। प्रभु जिन से प्रेम करता है, उनकी ताड़ना भी करता है (इब्रानियों 12:6)। यही हमारे लिये भी सत्य है।
आज, बहुतेरे लोगों ने प्रेम के दृष्टिकोण को भावुक बना दिया है: प्रेम, अर्थात, विशिष्ट अनुभव करवाना। या प्रेम का रूमानी दृष्टिकोण: प्रेम, अर्थात, बिना किसी के भी द्वारा सुधारे गये, स्वयं को व्यक्त करने की अनुमति। या, प्रेम का उपभोगता समान दृष्टिकोण: प्रेम, जैसा भी उचित लगे। लोकप्रिय मनसा के अनुसार, प्रेम का सत्य, पवित्रता, और अधिकार से कुछ लेना-देना नहीं है।
परन्तु बाइबल में प्रेम यह नहीं है। बाइबल में प्रेम पवित्र है। वह माँग करता है। वह आज्ञाकारिता में समर्पित होता है। वह कुकर्म से आनन्दित नहीं होता वरन सत्य से आनन्दित होता है (1 कुरिन्थियों 13:6)। यीशु हमें बताता है कि यदि हम उसकी आज्ञाओं को मानेंगे, तो हम उसके प्रेम में बने रहेंगे (यूहन्ना 15:10)। और यूहन्ना कहता है कि यदि हम परमेश्वर के वचन का पालन करेंगे, तो परमेश्वर का प्रेम हम में सिद्ध होगा (1 यूहन्ना 2:5)। कलीसिया के सदस्य मसीह के प्रेम में बने रहने में एक-दूसरे की सहायता कैसे करते हैं तथा संसार को कैसे दिखाते हैं कि परमेश्वर का प्रेम कैसा होता है? उसके वचन का पालन करने में एक-दूसरे की सहायता करने के द्वारा। निर्देश एवं अनुशासन का द्वारा।
चर्चा और मनन:
- सदस्यता को क्यों एक कार्य के समान देखा जाना चाहिये, क्या आप संक्षेप में उन कारणों को बता सकते हैं? कलीसिया का सदस्य होने से आपकी क्या ज़िम्मेदारियाँ हैं?
- कलीसिया का अनुशासन, किस प्रकार से प्रेम के बारे में वर्तमान धारणाओं का सामना करता है, और प्रेम के बारे में बाइबल की अभिव्यक्ति के अनुरूप है?
4 बारह कारण कि
सदस्यता महत्व रखती है
हमारी कलीसियाएँ सिद्ध नहीं हैं। इतना तो निश्चित है। वे हमें निराश कर सकती हैं। जैसा कि मैंने आरम्भ में कहा, मेरा शरीर कभी-कभी उत्तरदायी होने तथा प्रेम और सेवा करने की बुलाहट का प्रतिरोध करता है। परन्तु यीशु के लिये कलीसिया कितनी बहुमूल्य है। क्या आप को याद है कि जब शाऊल कलीसिया को सता रहा था, तब यीशु ने शाऊल से क्या कहा था? “हे शाऊल, हे शाऊल, तू मुझे क्यों सताता है?” (प्रेरितों 9:4)। ध्यान कीजिये कि यीशु अपनी कलीसिया से इतना घनिष्ट है कि वह शाऊल को उसे ही सताने का दोषी ठहराता है।
यदि यीशु, हम जिसके उद्धारकर्ता और प्रभु होने का दावा करते हैं, कलीसिया से इतना प्रेम करता है, क्या हम इस पर फिर से विचार करें कि हम कलीसिया से कितना कम प्रेम करते हैं?
न केवल यह, वरन्, ध्यान दीजिये कि यीशु हम से अपनी कलीसियाओं से किस प्रकार प्रेम करने के लिये कहता है। उसने निर्देश दिया, “मैं तुम्हें एक नई आज्ञा देता हूँ कि एक दूसरे से प्रेम रखो; जैसा मैंने तुम से प्रेम रखा है, वैसा ही तुम भी एक दूसरे से प्रेम रखो। यदि आपस में प्रेम रखोगे, तो इसी से सब जानेंगे कि तुम मेरे चेले हो” (यूहन्ना 13:34-35)। यीशु यह भी कह सकता था कि, “उनके प्रति तुम्हारे प्रेम के द्वारा, वे जान लेंगे कि तुम मेरे चेले हो,” और यह भी सत्य होता। परन्तु यीशु ने यह नहीं कहा। बल्कि, उसने कहा कि “आपस में प्रेम” उनकी गवाही देगा और उसके प्रेम को दिखाएगा। यह एक रोचक टिप्पणी है। कलीसिया के सदस्यों में आपस में प्रेम इस तथ्य को कैसे दिखाता है कि हम उसके चेले हैं?
अब, यीशु के इस वाक्यांश पर ध्यान दीजिए “जैसा मैंने तुमसे प्रेम रखा है।” यीशु ने हमसे कैसा प्रेम रखा? पौलुस के अनुसार, “परन्तु परमेश्वर हम पर अपने प्रेम की भलाई इस रीति से प्रगट करता है कि जब हम पापी ही थे तभी मसीह हमारे लिये मरा” (रोमियों 5:8)। यीशु ने हमें क्षमा करते हुए, सहन करते हुए, अनुग्रह के साथ, हमारे पापों के बावजूद हम से प्रेम किया, इसलिये नहीं क्योंकि हम सुन्दर थे, बल्कि इसलिये क्योंकि हमें दया की आवश्यकता थी।
अब मेरे साथ विचार कीजिये: क्या होता है जब कुछ पापी साथ रहते हैं? वे एक-दूसरे को ठेस पहुँचाते हैं। वे एक-दूसरे के विरुद्ध पाप करते हैं। वे एक-दूसरे को दुःखी करते हैं। वे एक-दूसरे को निराश करते हैं। वे समय पर नहीं आते हैं, या जो करने का वायदा किया उसे नहीं करते हैं, या आप का नाम भूल जाते हैं, या अपने वायदों को पूरा नहीं करते हैं, या आप को और भी अधिक गम्भीरता से निराश करते हैं। हमारी कलीसियाएँ हमें निराश करेंगी, जैसा कि मैं बारम्बार कहता आ रहा हूँ। परन्तु ठीक वहीं पर, जहाँ पर हमारी निराशाएँ, और खिसियाहट, और चोटें हैं, हमारे पास अवसर होते हैं कि हम एक-दूसरे से ऐसे प्रेम करें, जैसे यीशु ने हम से — क्षमा, सहनशीलता, अनुग्रह के साथ किया। जब हम यह करते हैं, हम संसार को दिखाते हैं कि यीशु का प्रेम कैसा है — क्षमा, सहन, अनुग्रह करने वाला। हम सुसमाचार को दिखाते हैं।
इसी सुसमाचार के द्वारा, वही पौलुस जो कभी मसीहियों को सताया करता था, कहता है कि, उन प्रधानों और अधिकारियों पर जो स्वर्गीय स्थानों में हैं, परमेश्वर का नाना प्रकार का ज्ञान कलीसिया के द्वारा प्रकट होता है (देखिये इफिसियों 3:10)। यह परमेश्वर की महिमा को प्रदर्शित करने का स्थान है। हम बहुत सरलता से अपनी कलीसियाओं को हल्के में ले लेते हैं।
कलीसिया की सदस्यता के महत्वपूर्ण होने के बारह कारणों पर विचार करने के द्वारा, हम उन बातों का कुल योग देख सकते हैं, जो हमने अभी तक कहीं हैं।2
- यह बाइबल के अनुसार है। यीशु ने स्थानीय कलीसिया स्थापित की और सभी प्रेरितों ने उसके द्वारा अपनी सेवकाई की। नए नियम में मसीही जीवन कलीसिया का जीवन है। आज मसीहियों को इसी की आशा और लालसा रखनी चाहिये।
- कलीसिया, उसके सदस्य हैं। नए नियम में एक कलीसिया होने की लालसा रखने का अर्थ उस का एक सदस्य होना है (प्रेरितों के काम पढ़िये)। और आप इसलिये कलीसिया का भाग होना चाहते हैं, क्योंकि यीशु उसे बचाने और स्वयं से उसका मेल-मिलाप करवाने के लिये आया था।
- यह प्रभु की मेज में भाग लेने के लिए अनिवार्य है। प्रभु भोज एकत्रित कलीसिया के लिये, अर्थात, सदस्यों के लिये (1 कुरिन्थियों 11:20, 33 देखिये) भोज है। और आप प्रभु भोज लेना चाहते हैं। यह टीम का वह वस्त्र है, जो कलीसिया की टीम को देशों पर प्रकट करता है।
- यही यीशु के आधिकारिक प्रतिनिधि होने का तरीका है। सदस्यता, कलीसिया द्वारा अनुमोदन है कि आप मसीह के राज्य के नागरिक हैं और इसलिये देशों के सामने पहचान-पत्र प्राप्त किये हुए मसीह के प्रतिनिधि हैं। और आप यीशु के एक आधिकारिक प्रतिनिधि बनना चाहते हैं। इसी से मिलता-जुलता यह भी है . . .
- यही व्यक्ति की सर्वोच्च निष्ठा को घोषित करने का तरीका है। जब आप टीम का वस्त्र पहनते हैं, तब आप की टीम की सदस्यता प्रकट हो जाती है, और एक सार्वजनिक गवाही होती है कि आप की सर्वोच्च निष्ठा यीशु के प्रति है। परीक्षाएँ और सताव आ सकते हैं, परन्तु आपके शब्द यही होंगे कि, “मैं यीशु के साथ हूँ।”
- यही बाइबल की छवियों को देहधारी करने और अनुभव करने का तरीका है। यह स्थानीय कलीसिया के प्रति उत्तरदायी होने के ढाँचे में है कि “मसीह की देह होना,” “पवित्र आत्मा का मंदिर होना,” “परमेश्वर का परिवार होना,” आदि तथा अन्य रूपकों को (उदाहरण के लिये, देखिये 1 कुरिन्थियों 12) अपने जीवन में जी कर या अपनी देह में दिखाए। और आप उसकी देह के इस परस्पर सम्बन्धित होने को, उसके मंदिर होने की आत्मिक भरपूरी को, उसके परिवार की साझा पहचान, सुरक्षा, और घनिष्ठता को अनुभव करना चाहते हैं।
- यही अन्य मसीहियों की सेवा करने का तरीका है। सदस्यता आप को बताती है कि आप पर किन विशिष्ट मसीहियों से प्रेम करने, सेवा करने, सचेत करने, और प्रोत्साहित करने की ज़िम्मेदारी है। इससे आप मसीह की देह के प्रति, बाइबल के अनुसार अपनी ज़िम्मेदारियों को पूरा कर पाते हैं (उदाहरण के लिये इफिसियों 4:11-16; 25-32 को देखिये)।
- यही मसीही अगुवों का अनुसरण करने का तरीका है। सदस्यता आप की यह जानने में सहायता करती है कि आप को किन मसीही अगुवों की आज्ञाकारिता तथा अनुसरण करना है। फिर से, यह उनके प्रति आप की बाइबल के अनुसार ज़िम्मेदारी को पूरा करने देती है (देखिये इब्रानियों 13:7; 17)
- यह मसीही अगुवों की, अगुवाई करने में सहायता करती है। सदस्यता, मसीही अगुवों को यह जान लेने देती है कि उन्हें किन मसीहियों के लिए “हिसाब देना होगा” (प्रेरितों 20:28; 1 पतरस 5:2)।
- इससे कलीसिया में अनुशासन सम्भव होता है। इससे आप को बाइबल द्वारा निर्धारित वह स्थान मिलता है जहाँ पर आप ज़िम्मेदारी, बुद्धिमानी, और प्रेम के साथ कलीसिया के अनुशासन के कार्य में सम्मिलित हो सकते हैं। (1 कुरिन्थियों 5)
- इससे मसीही जीवन को एक स्वरूप मिलता है। यह किसी जन के यीशु का आज्ञाकारी होने तथा उसका अनुसरण करने के दावे को निभाने के लिये, उसे एक वास्तविक स्थान देता है, जहाँ हम पर अधिकार रखने का निर्वाह, वास्तव में किया जाता है (देखिये यूहन्ना 14:15; 1 यूहन्ना 2:19; 4:20-21)।
- इससे गवाही बनती है तथा देशों को निमन्त्रण मिलता है। सदस्यता द्वारा, हम जगत को, मसीह के वैकल्पिक शासन को दिखा सकते हैं (देखिये मत्ती 5:13; यूहन्ना 13:34-35; इफिसियों 3:10; 1 पतरस 2:9-12)। एक कलीसिया की सदस्यता के चारों ओर की सीमाएँ, लोगों के एक ऐसे समाज का निर्माण करती हैं, जो देशों को कुछ बेहतर के लिये आमन्त्रित करता है।
चर्चा और मनन:
- उपरोक्त बारह कारणों में से, आप को सबसे दमदार कौन से लगते हैं?
- ऐसे कुछ नए और ठोस तरीके कौन से हैं, जिन के द्वारा आप अपनी कलीसिया के लोगों से प्रेम कर सकते हैं?
परिशिष्ट: कलीसिया की सदस्यता न लेने के गलत कारण, तथा लेने के अच्छे कारण
कभी-कभी लोग कलीसिया की सदस्यता न लेने के लिये बहाने देते हैं। वे यह कहते हैं, और उन्हें मेरा सम्भावित उत्तर यह हो सकता है।
- “मैं किसी अन्य स्थान पर सदस्य हूँ।” कभी-कभी लोग कहते हैं कि वे इसलिये सदस्यता नहीं लेना चाहते हैं, क्योंकि वे कहीं और सदस्य हैं। यदि ऐसा है तो, मैं उन्हें समझाने का प्रयास करता हूँ कि कलीसिया की सदस्यता कोई भावनात्मक सम्बन्ध नहीं है। यह एक जीवित, और साँस लेने वाला सम्बन्ध है। यदि आप किसी स्थान पर कुछ महीनों से अधिक हैं, तो, जहाँ आप जाते हैं, आप को उस कलीसिया की सदस्यता ले लेनी चाहिए।
- “कलीसिया के साथ मेरा अनुभव बुरा रहा है।” संभव है कि किसी जन का, अतीत में किसी अन्य कलीसिया के साथ बुरा, या अपमानजनक अनुभव रहा हो। यदि ऐसा हुआ है, तो धीरज और समझ-बूझ दिखाने चाहियें। उनकी चुनौती किसी अपमानजनक विवाह से निकलकर आने वाले जन की चुनौती के समान है। फिर से भरोसा करना कठिन होता है, और भरोसा जबरन नहीं करवाया जा सकता है। परन्तु आप यह भी जानते हैं कि सम्बन्धों के स्वस्थ होते जाने का अर्थ होता है फिर से भरोसा करना सीखना, और यह हमेशा जोखिम उठाने के समान होता है। अन्तिम बात: आप को उस जन को सदस्यता लेने के लिये प्रोत्साहित करना चाहिये, चाहे इसके लिए आप को अपने तरीके और गति में कुछ परिवर्तन करने पड़ें।
- “मुझे अगुवों पर भरोसा नहीं है।” यदि व्यक्ति इसलिये सदस्य नहीं बनना चाहता है, क्योंकि उसे अगुवों पर भरोसा नहीं है, तो उन्हें प्रोत्साहित किया जाना चाहिये कि वे किसी ऐसी कलीसिया का पता लगाएँ, जहाँ वे अगुवों पर भरोसा कर सकते हैं, और उसकी सदस्यता ले लें। आखिरकार, क्या आप को सच में ऐसा लगता है कि, यदि आप मसीही परिपक्वता की ओर ले जाने वाले अपने अगुवों पर भरोसा नहीं कर सकते हैं, तो आप उस परिपक्वता में बढ़ेंगे?
- “मैं विश्वास वचन में कही गई सभी बातों से सहमत नहीं हूँ।” पिछले उत्तर को देखिये (किसी ऐसी कलीसिया का पता लगाएँ, जहाँ आप सहमत हों, और उसकी सदस्यता ले लें)।
- “बाइबल में यह नहीं दिया गया है।” जो यह कहता है कि यह विषय बाइबल में नहीं है, मैं सामान्यतः मत्ती 18 और 1 कुरिन्थियों 5 पढ़ने के लिये कहता हूँ। मैं यह भी समझाता हूँ कि, नहीं, “क्लब की सदस्यता” बाइबल में नहीं दी गई है, परन्तु कलीसिया की सदस्यता नागरिकता के समान है, इसीलिये यीशु ने प्रेरितों की स्थानीय कलीसिया को परमेश्वर के राज्य की कुंजियाँ दी।
तो, कलीसिया की सदस्यता लेने के भले कारण क्या हैं? इस प्रश्न का संक्षिप्त उत्तर देने का एक तरीका यह है:
- पास्टरों के लिए। इससे पास्टरों को पता चल जाता है कि आप कौन हैं, और उन्हें आप के लिए उत्तरदायी बना देता है (देखिये प्रेरितों 20:28; इब्रानियों 13:17)।
- यीशु की आज्ञाकारिता के लिये। यीशु ने परमेश्वर के राज्य की कुंजियाँ आप को खोलने या बन्द करने के लिये नहीं दीं। उसने कुंजियाँ प्रेरितों की स्थानीय कलीसिया को दीं (मत्ती 16:13-20; 18:15-20)। आप के पास स्वयं को बपतिस्मा देने, या स्वयं को प्रभु-भोज देने का अधिकार नहीं है। आप के विश्वास के दावे की पुष्टि के लिये, एक कलीसिया की आवश्यकता है, और अपने मर्म में, यही सदस्यता है (देखिये प्रेरितों 2:38)।
- अन्य विश्वासियों के लिये। सदस्यता लेना आप को एक स्थानीय कलीसिया के लोगों के लिये, और उन्हें आप के लिये उत्तरदायी ठहराता है। मसीह में उनकी शिष्यता में अब आप का भी एक भाग होता है। अर्थात, अब आप उनकी बढ़ोतरी तथा विश्वास के दावों के लिये उत्तरदायी हैं, जिस में आप का कलीसिया द्वारा विश्वासयोग्यता से सुसमाचार प्रचार करना (गलातीयों 1) और व्यक्ति को अनुशासित रखना सम्मिलित हैं (मत्ती 18:15-20; 1 कुरिन्थियों 5)।
- स्वयं की आत्मिक भलाई और सुरक्षा के लिए। मान लीजिये, कभी आप वह भेड़ हो जाते हैं, जो झुंड से भटक गई (मत्ती 18:12-14)। तब यीशु आप की कलीसिया को आप को ढूँढने के लिए भेजेगा (मत्ती 18:15-20)।
- गैर-मसीही पड़ोसियों के कारण। सदस्यता, कलीसिया की गवाही की रक्षा करने के द्वारा, पृथ्वी पर मसीह की प्रतिष्ठा को सुरक्षित रखने और बढ़ावा देने में सहायता करती है (देखिये मत्ती 5:13-16; 28:18-20; यूहन्ना 13:34-35)। सदस्यता के द्वारा ही संसार जानने पाता है कि कौन यीशु का प्रतिनिधित्व करता है!
पाद-टिप्पणियाँ
- यह उपखण्ड मूल में A Handbook of Theology (ए हैंड बुक ऑफ थीओलोजी) मेंछपाथा, संपादक:डेनियलएल. ऐकिन, डेविडएस. डॉकरी, औरनेथनऐ. फिन्न (बी&एच, 2023), 435-36.
- बारह की सूची मूल में मेरी पुस्तक Church Membership: How the World Knows Who Represents Jesus (चर्च मेम्बरशिप: हाओ द वर्ल्ड नोस हू रेप्रेसेन्टस जीसस) (क्रॉसवे, 2012), 79-81.
विषयसूची
- 1 क्या बाइबल में कलीसिया की सदस्यता लेना बताया गया है?1
- कलीसिया की सदस्यता को परिभाषित करना
- चर्चा एवं मनन:
- 2 कलीसिया क्या है?
- दूतावास के रूप में कलीसिया, और राजदूतों के रूप में सदस्य
- चर्चा और मनन:
- 3 सदस्यता एक कार्य है
- कलीसिया में अनुशासन के बारे में क्या?
- चर्चा और मनन:
- 4 बारह कारण किसदस्यता महत्व रखती है
- चर्चा और मनन:
- परिशिष्ट: कलीसिया की सदस्यता न लेने के गलत कारण, तथा लेने के अच्छे कारण
- पाद-टिप्पणियाँ