#28 कलीसिया की सदस्यता के लिये कारण

By जोनाथन लीमैन

परिचय

मैं सोच में हूँ कि आप कलीसिया की सदस्यता विषय के बारे में क्या सोचते हैं। यदि मैं अंदाज़ा लगाऊँ, तो, आप इस विषय को कुछ उबाऊ समझते होंगे। ये शब्द — “कलीसिया की सदस्यता” — अपने आप में संस्थागत या नौकरशाही से सम्बन्धित प्रतीत होते हैं।

या, हो सकता है कि आप की चिन्ताएँ कुछ अधिक गम्भीर हैं। आप को लगता है कि कलीसिया की सदस्यता लोगों को जीवन में हस्तक्षेप करने का अधिकार देती है। यीशु ने कहा कि वह हमें स्वतन्त्र करने के लिये आया है। परन्तु क्या कलीसिया की सदस्यता, मसीहियों को एक दूसरे के मामलों में हस्तक्षेप करने के लिये नहीं कहती है?

अब आप से कहा जा रहा है कि आप इस संस्थागत या नौकरशाही से सम्बन्धित विषय के बारे में एक क्षेत्रीय मार्गदर्शिका को पढ़ें। हो सकता है कि आप इसे लेकर बिल्कुल भी उत्साहित न हों?

सम्भवतः मेरा स्वयं के प्रति ईमानदार होना सहायक होगा: क्योंकि मुझे भी कलीसिया का सदस्य होना, हमेशा से ही अच्छा नहीं लगा है। और मैंने इस विषय पर कुछ पुस्तकें लिखी हैं! कभी-कभी मैं चाहता हूँ कि मुझे अकेला छोड़ दिया जाए। मैं नहीं चाहता हूँ कि मुझे अन्य लोगों या उनकी समस्याओं या विचारों द्वारा परेशान किया जाए। कभी-कभी मेरा मन उनकी सेवा करना नहीं चाहता है।

हो सकता है कि आप जानते हैं कि यह अनुभव कैसा होता है। हमारे जीवन पहले से ही व्यस्त हैं। हमारे जीवन-साथी और बच्चे हमारा बहुत सा समय ले लेते हैं। और हमारी नौकरियों में भी ऐसा ही होता है। ऐसे में, क्या वास्तव में हमें कलीसिया के लोगों के बारे में चिन्ता करनी चाहिये? हमारे समय पर उनका तो कोई अधिकार नहीं है, है न?

यदि हम ईमानदार होंगे, तो हमें यह स्वीकार करना पड़ सकता है कि यहाँ कुछ गुप्त प्रवृत्तियाँ भी काम कर रही होती हैं (मैं मानता हूँ कि मेरे लिये तो यह सच है)। हमें अपनी स्वतन्त्रता पसन्द है, और स्वतन्त्रता को जवाबदेही पसन्द नहीं होती है। हमारे अन्दर का पुराना मनुष्यत्व छुपा हुआ, अनदेखा, और अज्ञात रहने की चाह रख सकता है। और छुपा हुआ रहना, आप को अपनी इच्छा के अनुसार आने-जाने देता है, तब आप जो चाहे वह कर सकते हैं, और यह आप को अवांछित आँखों और अनुपयुक्त वार्तालापों से बचाए रखता है।

और फिर यह अपरिहार्य तथ्य भी है कि हमारी कलीसियाएँ सिद्ध नहीं हैं, और कुछ तो ऐसा होने के निकट भी नहीं हैं। कलीसिया के हमारे साथी सदस्य रूखे हो सकते हैं, या अत्याधिक भावनात्मक माँगों को रखने वाले हो सकते हैं, या बस उबाऊ हो सकते हैं। कुछ तो आप की, और उनकी सेवा के लिए जो कार्य आप करते हैं, उसकी कोई सराहना नहीं करते हैं। कुछ आप के विरुद्ध और भी नाटकीय तरीकों से पाप करते हैं।

हमारे पास्टर भी हमें निराश कर सकते हैं। वे अपने द्वारा तय समय पर, हम से संपर्क नहीं करते हैं (ऐसा मैंने भी किया है)। वे हमारे, या हमारे बच्चों के नाम भूल जाते हैं (मैंने यह भी किया है)। कभी-कभी वे गलत निर्णय ले लेते हैं या मंच से उपदेश देते समय मूर्खता भरी बातें बोल देते हैं (एक बार फिर, मैं इसका भी दोषी हूँ)।

सम्भवतः सबसे अधिक दुःखदायी तब होता है, जब पास्टर अपनी नैतिक असफलताओं के कारण स्वयं को अपनी जिम्मेदारी के अयोग्य बना लेते हैं। वे कठोर या अपमानित करने वाले हो सकते हैं। वे लोगों को दुःख पहुँचा सकते हैं।

अपनी कलीसियाओं को “स्वर्ग के दूतावास” कहने के द्वारा, हम उच्च-स्तरीय ईश-विज्ञान भाषा का प्रयोग सरलता से कर सकते हैं, और मैं इस वाक्यांश का इस क्षेत्रीय मार्गदर्शिका में प्रयोग करूँगा। स्वर्ग का दूतावास बड़ा महिमान्वित सा शब्द लगता है, है न? आप स्वर्गीय प्रकाश में एकत्रित लोगों के एक समूह को लगभग चित्रित कर लेते हैं। परन्तु — पारदर्शी होने के लिये — बहुधा हमारी कलीसियाएँ ऐसी लगती नहीं है। कुछ तो “बुरी” होती हैं। अधिकाँश साधारण, नीरस, कुछ उबाऊ, महत्वहीन सी होती हैं। तो उन्हें स्वर्ग के दूतावास कहने में क्या मूल्य है?

यह सब कुछ यह कहने के लिये है कि, कलीसियाओं और कलीसिया की सदस्यता के बारे में स्वर्गीय अभिव्यक्तियों में होकर बात करने की कोई आवश्यकता नहीं है, अगर हम उन्हें पृथ्वी की वास्तविकताओं के संदर्भ में नहीं रखेंगे। क्योंकि कलीसिया की सदस्यता का अर्थ चाहे जो भी हो, उसे स्वर्ग और पृथ्वी, दोनों के लिए जवाबदेह होना होगा।

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