#43 धर्मी मित्रों की खोज करने का सही तथा गलत तरीका
परिचय
“मुझे नहीं लगता है कि हम अब मित्र रह सकते हैं,” नील ने मुझ से कहा। छठी कक्षा के मेरे कानों के लिये, ये मेरे द्वारा कभी भी सुने गये सबसे बुरे शब्द थे, और उन्हें मेरे सबसे अच्छे मित्र नील ने बोला था। नील और मैं पहली कक्षा के पहले दिन से ही घनिष्ठ मित्र रहे थे। मुझे अभी तक याद है कि मैं उस से स्कूल के भोजनालय में मिला था और मुझे बहुत दिलासा हुई थी कि मुझे एक मित्र मिल गया है। मेरी दादी का घर मेरे और उसके घर के बीच में था, और हम अपनी-अपनी चार पहियों वाली गाड़ियों में बहुधा वहीं पर एकत्रित होते थे, और फिर साथ मिलकर अनेकों प्रकार के रोमांचक कार्यों के लिये निकल पड़ते थे। हम एक दूसरे के साथ बास्केटबॉल से खेलते-खेलते उसकी हवा निकाल देते थे, प्रत्येक सप्ताहान्त एक दूसरे के घर पर बिताया करते थे, और स्कूल में हमें पृथक करना लगभग असम्भव था।
परन्तु फिर भी अब जब हम अपने प्राथमिक स्कूल के अन्तिम सप्ताह के अन्त में पहुँच गए थे, और इसके तुरन्त बाद, तीन अन्य स्कूलों से छठी कक्षा वाले विद्यार्थी आने वाले थे, कि सब से मिलकर एक विशाल सातवीं कक्षा बने. . . तब मैंने अपने सबसे अच्छे मित्र को खो दिया।
क्या आप ने यह वाक्याँश सुना है, “जब तक आप उसे गँवा नहीं देते हैं, आप समझ नहीं पाते हैं कि आप के पास क्या था।” मेरे जीवन में यह छोटा सा वाक्याँश बहुत बार सच साबित हुआ है। मध्य कक्षाओं के मेरे स्कूल के वर्ष बहुत बुरे थे। मेरे कोई मित्र नहीं थे, और मुझे धौंस दिये और धमकाए जाने को बहुत अधिक सहना पड़ा था। उन वर्षों ने मुझे यह समझने में सहायता की, कि मित्र कितने महत्वपूर्ण होते हैं।
क्या आप कभी बिना मित्रों के रहे हैं? क्या आप अभी बिना मित्रों के हैं? यदि हाँ, तो आप सही स्थान पर हैं। यह जीवन कौशल मार्गदर्शिका आप को अच्छे मित्रों को खोजना सिखाने के बारे में है—और केवल अच्छे ही नहीं, बल्कि धर्मी भी। आखिरकार, धर्मी मित्रताएँ एक प्रमुख तरीका है जिन से प्रभु स्वर्ग की ओर हमारी यात्रा में हमारी देखभाल करता है।
हम आरम्भ इस बात पर विचार करने के द्वारा करेंगे कि मित्र को बुरा क्या बनाता है। यह विचित्र लग सकता है, क्योंकि इस मार्गदर्शिका का लक्ष्य, अच्छे और धर्मी मित्र बनाने में आप की सहायता करना है। परन्तु यह पहचानने के लिये कि धर्मी मित्रता कैसी दिखती है, हमें पहले यह समझना होगा कि बुरी मित्रता कैसी दिखती है और हम पर उसके क्या प्रभाव पड़ते हैं। इसके बाद हम देखेंगे कि अच्छी (धर्मी) मित्रता क्या होती हैं, केवल उसके बाद ही विचार करेंगे कि हम ऐसे मित्र किस प्रकार से प्राप्त कर सकते हैं। अन्त में, हम अपने अन्दर देखेंगे कि जिन्हें परमेश्वर ने हमें दिया है, उनके लिये हम बेहतर मित्र किस प्रकार बन सकते हैं।
मेरी प्रार्थना है कि यह मार्गदर्शिका धर्मी मित्रों को खोजने में आप की सहायता करेगी। मेरी यह प्रार्थना भी है कि इस प्रक्रिया में आप उनके लिये, जिन्हें परमेश्वर ने आप को दिया है, एक बेहतर मित्र बनने की चुनौती को स्वीकार करें।
ऑडियो मार्गदर्शिका
ऑडियो#43 धर्मी मित्रों की खोज करने का सही तथा गलत तरीका
भाग I: बुरा मित्र होना क्या होता है?
एक बुरे मित्र को परिभाषित करने के लिए प्रयोग किये जा सकने वाले बहुत सारे अवगुण हैं। हम स्वयं को तीन तक ही सीमित रखेंगे: स्वार्थी, मूर्ख, और क्रोधित। इनमें से प्रत्येक की जड़ में घमण्ड है।
स्वार्थी मित्र
मैं लॉर्ड ऑफ द रिंगस (पुस्तकों और सिनेमा) को बहुत पसन्द करता हूँ। मैंने वे पुस्तकें कई बार पढ़ीं हैं, और सर्दियों की रातों की गतिविधियों में से मेरी एक मनपसन्द गतिविधि है अपनी पत्नी के साथ इस श्रृंखला के तीनों सिनेमाओं को एक के बाद एक देखना। हाँ ठीक है, ठीक है, हम पहली वाली को देखते है (या पहली और दूसरी आधी फिल्म को एक साथ) और शेष दोनों में अधिकांशतः ऊँघते और सोते रहते हैं। आप मेरी बात समझ रहे हैं। यदि आप ने कभी भी लॉर्ड ऑफ द रिंगस को पढ़ा या देखा नहीं है, तो मैं आप का एक अच्छा मित्र बनकर आप को इस मार्गदर्शिका से जा लेने देता हूँ, ताकि ठीक इसी समय आप इस कमी को सुधार सकें!
यह टोलकीन के द्वारा फ्रोडो की मोरडोर को की गई परेशान कर देने वाली यात्रा की कहानी है, जिस में हमें एक बुरे मित्र, गोनडोर के रखवाले के पुत्र बोरोमीर का उदाहरण मिलता है। बोरोमीर को, नौ अन्य लोगों के साथ मिलकर, छल्ले को डूम पर्वत की आग में भस्म करने में फ्रोडो की सहायता करने के लिये कहा जाता है। बोरोमीर अभी रिवेनडेल से निकल कर आया ही है, और लगता है कि वह ठीक वैसा ही मित्र है, जिसकी फ्रोडो को आवश्यकता है, क्योंकि फ्रोडो कद में छोटा है और उस पर एक बड़ी ज़िम्मेदारी का बोझ है। इसके विपरीत, बोरोमीर, शक्तिशाली है, और एक प्रचण्ड योद्धा है। वह फ्रोडो की सौरोन और उसके सेवकों से रक्षा कर सकता है। वास्तव में बोरोमीर यही करने के लिए आया है।
उस सहभागिता में बात तब बिगड़ जाती है, जब बोरोमीर उस छल्ले को अपने उपयोग के लिये फ्रोडो से ले लेने के प्रयास करता है। बोरोमीर, स्वार्थी आकांक्षाओं के कारण, उस एक व्यक्ति से विश्वासघात करता है, जिसकी रक्षा करने की उसने शपथ ली थी। क्या आप ने कभी स्वार्थी होने के कारण मित्रता के टूट जाने का अनुभव किया है?
प्रेरित याकूब हमें बताता है कि स्वार्थ, ईर्ष्या के साथ मिलकर, “बखेड़ा और हर प्रकार का दुष्कर्म” (याकूब 3:16) ले आते हैं। स्वार्थ, बखेड़ा और दुष्कर्म के मध्य के सम्बन्ध को समझने के लिये, हमें पहले यह समझना होगा कि स्वार्थ क्या होता है। इस की मेरी हल्की-फुलकी सी परिभाषा यह है: स्वार्थ व्यक्ति द्वारा अपनी इच्छाओं को सबसे पहले रखना है, क्योंकि वह स्वयं को अन्य सभी से बेहतर समझता है, और इस कारण उन्हें पूरा किये जाने के योग्य मानता है। यहाँ पर हमें कार्य और उसके लिये प्रेरणा, दोनों मिलते हैं, जो स्वार्थ को भली-भाँति समझने के लिये अनिवार्य हैं। स्वार्थी लोग अपनी इच्छाओं ही को औरों से आगे नहीं रखते हैं—वे यह इसलिये करते हैं क्योंकि वे स्वयं को औरों से बेहतर समझते हैं। स्वार्थी होना, मूलतः समान होने का इनकार करना है।
और यही वह कारण है कि क्यों स्वार्थी होना मित्रता के लिये इतना हानिकारक है। एक स्वार्थी मित्र, जो स्वयं को औरों से बेहतर समझता है, अपने मित्रों को अपने लिए उपयोग करने और उनसे दुर्व्यवहार करने को वैध ठहराएगा। स्वार्थी लोग किस प्रकार का लाभ उठाना चाहते हैं? बखेड़े और दुष्कर्म वाला। देखिये, स्वार्थ केवल औरों के प्रति अपने रवैये की दिशा को ही नहीं बताता है, बल्कि परमेश्वर के प्रति भी बताता है। उनके अनुसार, परमेश्वर का अस्तित्व उनकी इच्छा-पूर्ति के लिये है, न कि उनका स्वयं का अस्तित्व परमेश्वर की इच्छा-पूर्ति के लिये। इस प्रकार का व्यक्ति पूर्णतः अपने में ही लीन रहता है। परमेश्वर के सर्वोच्च होने, तथा अन्यों के समान मूल्य का होने को न पहचानने के कारण, स्वार्थी व्यक्ति स्वयं को ही सर्वोच्च होने के सिंहासन पर आसीन कर लेता है। अन्य सभी का अस्तित्व, जिन में परमेश्वर भी सम्मिलित है, उन ही की सेवा करने के लिये है, न कि कभी भी इसका उलट होना।
मूर्ख मित्र
जब आप मूर्ख के बारे में सोचते हैं, तो आपके मस्तिष्क में क्या विचार आता है? हो सकता है कोई ऐसा व्यक्ति जो हमेशा ही गलत निर्णय लेता है? मैं कुछ ऐसे लोगों को जानता हूँ जो इस विवरण से मेल खाते हैं! परन्तु, गलत निर्णय लेना किसी मूर्ख का वर्णन करने के लिये एक बहुत विस्तृत वर्णनकर्ता है, और इसी लिये एक बुरे मित्र का भी।
सुलैमान ने अपने पुत्रों के लिये बुद्धिमानी के बारे में लिखते हुए कहा, “यहोवा का भय मानना बुद्धि का मूल है; बुद्धि और शिक्षा को मूढ़ ही लोग तुच्छ जानते हैं” (नीतिवचन 1:7; मेरे द्वारा जोर देने के लिए शब्द तिरछा किया गया है)। बुद्धि का होना और उसे तुच्छ जाने के मध्य का अन्तर स्वयं को, सही रीति से, परमेश्वर की ओर बनाए रखना है। बुद्धिमान व्यक्ति जानता है कि समस्त सत्य परमेश्वर से होता है, और यदि उन्हें बुद्धिमान होना है तो स्वयं को भय के साथ परमेश्वर को समर्पित करना होगा। इसके विपरीत, मूर्ख विनाशक रीति से यह मान कर चलता है कि वह पहले से ही बुद्धिमान है, और क्या करना है जानने के लिये, उसे केवल अपने अन्दर ही देखना होगा। यह सब-कुछ-जानने-वाले की सबसे सच्ची परिभाषा है। सुलैमान के अनुसार यह समझने में असफल रहना कि बुद्धि परमेश्वर ही से आती है, सीधे से बुद्धि को तुच्छ समझना है।
अब, मूर्खता को मित्रता पर लागू कीजिये। किसी का यह मान कर चलना कि उसके पास सारी आवश्यक बुद्धि है, किस प्रकार से मित्रता के लिये हानिकारक होगा? देखिये, एक बात तो यह, कि यह सच नहीं है! परमेश्वर, स्वयं, और संसार के बारे में सत्य जानने के लिये, कोई भी ऐसा नहीं है जिसे परमेश्वर की आवश्यकता नहीं है। वास्तव में ऐसा कोई नहीं है, जिसे सब कुछ पता हो।
परन्तु मूर्खता और मित्रता के बारे में विचार करते हुए, चलिये एक कदम और आगे बढ़ते हैं। जिस प्रकार से स्वार्थ व्यक्ति के स्वयं में ही लीन रहने, ठीक से परमेश्वर और मनुष्यों को न देख पाने का परिणाम होता है, मूर्खता भी इसी प्रकार से कार्य करती है। अन्तर यह है कि स्वार्थ मुख्यतः लालसाओं से सम्बन्धित होता है, जबकि मूर्खता बुद्धि से सम्बन्धित होती है। ध्यान देने की बात यह है कि स्वयं पर ही दृष्टि रखने वाला व्यक्ति परमेश्वर तथा औरों को ठीक से नहीं देख सकता है, और इसीलिये औरों की सेवा सार्थक रीति से नहीं कर सकता है। एक मूर्ख मित्र इस प्रकार से बोलेगा और कार्य करेगा, जिस से उसके आस-पास के लोग परमेश्वर या इस संसार के बारे सत्य से प्रोत्साहित नहीं होंगे। इससे भी बुरा यह कि, एक मूर्ख मित्र की मूर्खता, बहुधा स्वार्थी दृष्टिकोण से ही दी जाएगी। मूर्ख अपने ही अनुसार कार्य करता है, और अपनी नाक से आगे नहीं देख पाता है। और यह मित्रता के लिये कोई सार्थक गुण नहीं है।
क्रोधित मित्र
क्या आप कभी किसी ऐसे व्यक्ति को जानते थे जो अपने क्रोध पर नियन्त्रण नहीं रख पाता था? मैं जानता था। और, क्या आप को पता है, क्रोधी व्यक्ति सुरक्षित अनुभव नहीं करते हैं, और मैं उनके साथ समय बिताने का आनन्द नहीं ले पाता हूँ। मुझे नहीं लगता है कि यह आँकलन करने में मैं अनोखा हूँ। वास्तव में, मैं ऐसे किसी भी व्यक्ति को नहीं जानता हूँ जो ईमानदारी से यह कहे कि वे किसी ऐसे व्यक्ति के साथ समय बिताने से आनन्दित होते हैं जो हमेशा ही… चिढ़ा हुआ रहता है।
मेरा बेटा सोलह महीने का है, और अधिकांशतः वह बहुत आनन्दित रहता है। जब तक कि किशमिश समाप्त नहीं हो जाती हैं और उसकी गाने बजने वाली पुस्तक की बैटरी काम करती रहती है, मेरा बेटा सर्वोच्च स्वर्ग के निकट ही कहीं रहता है। परन्तु ऐसे समय भी आते हैं जब उस पर कुछ बड़ी भावनाएँ हावी हो जाती हैं, और वह अपनी आयु के अनुसार, कुछ असंगत व्यवहार करने लगता है। वह अपनी आँखें बन्द कर लेता है, चिल्लाता है, अपनी कमर धनुष के समान मोड़ लेता है, और यदि वह अपनी ऊँची कुर्सी पर बैठा हुआ है, तो सावधान हो जाइये, भोजन उड़ने ही वाला है! ये बच्चों के लिए क्रोध व्यक्त करने की सामान्य अभिव्यक्तियाँ होती हैं। उसका पिता होने के नाते, मेरा काम है कि उसकी खिसियाहट से बाहर निकलने में उसकी सहायता करूँ, और वह इन अभिव्यक्तियों से आगे बढ़ते हुए बड़ा हो सके।
मैंने वयस्कों को, सोलह महीने के बच्चों के समान, अपने क्रोध को व्यक्त करते हुए नहीं देखा है। परन्तु इसका यह अर्थ नहीं है कि वयस्क अपने क्रोध को बच्चों के समान हानिकारक रीति से व्यक्त नहीं करते हैं, विशेषतः मित्रता के सन्दर्भ में। कभी-कभी क्रोधित लोग अवश्य ही चिल्लाते हैं, और कुछ अन्य समयों पर होंठ बिचकाते हैं। कभी-कभी क्रोधित लोग, निष्क्रिय-आवेशपूर्ण टिप्पणियाँ करते हैं, और अन्य समयों पर, औरों को दण्ड देने के लिये, वे उन्हें स्वयं से दूर कर देते हैं। यह समझना कठिन नहीं है कि केवल यह अभिव्यक्तियाँ ही किस प्रकार से मित्रता को चुनौतीपूर्ण बना देंगी। परन्तु, इसे और भी बेहतर समझने के लिये कि क्यों क्रोध मित्रता के लिए हानिकारक है, हमें इन अभिव्यक्तियों की तह में जाकर विचार करना होगा कि अपने आप में क्रोध क्या है।
आप को इससे कोई अचम्भा नहीं होना चाहिये कि क्रोध की जड़ भी वहीं है जहाँ स्वार्थ और मूर्खता की है—घमण्ड में—स्वयं के बारे में आवश्यकता से अधिक फूलना, आवश्यकता से अधिक परवाह रखना, और आवश्यकता से अधिक रुचि रखना। जब कि स्वार्थ और मूर्खता आक्रामक होते हैं, क्रोध प्रतिरक्षात्मक होता है। यह एक घमण्डी व्यक्ति के अन्दर तब उठता है जब बातें उनके अनुसार नहीं हो रही होती हैं। एक क्रोधी व्यक्ति संगति के लिये तब तक ठीक है जब तक कि बात बिगड़ने नहीं लगती है, उसके बाद फिर कुछ नहीं पता कि क्या होगा।
बाइबल में क्रोध के बारे में बहुत कुछ कहा गया है। यद्यपि उचित क्रोध की एक श्रेणी होती है, परन्तु पवित्रशास्त्र के लेखकों ने पापमय क्रोध के बारे में बहुत कुछ लिखा है। कुछ उदाहरण सहायक हो सकते हैं। याकूब लिखता है, “हे मेरे प्रिय भाइयो, यह बात तुम जान लो: हर एक मनुष्य सुनने के लिये तत्पर और बोलने में धीर और क्रोध में धीमा हो, क्योंकि मनुष्य का क्रोध परमेश्वर के धर्म का निर्वाह नहीं कर सकता।” (याकूब 1:19-20)। साथ ही इफिसुस की कलीसिया को लिखे गए पौलुस के शब्दों पर भी विचार कीजिए: “सब प्रकार की कड़वाहट, और प्रकोप और क्रोध, और कलह, और निन्दा, सब बैरभाव समेत तुम से दूर की जाए।” (इफिसियों 4:31)। यीशु ने अपने शिष्यों को यहाँ तक भी सिखाया है कि परमेश्वर की दृष्टि में क्रोध करना हत्या करने के समान है (मत्ती 5:21-22)! इन खण्डों से हम जो समझ पाते हैं, वह यह है कि क्रोध एक गम्भीर बात है, और जो इसके साथ व्यवहार रखता है, उसके लिये यह बहुत हानिकारक है, और उन लोगों के लिए भी, जो उसके चारों ओर हैं। इसीलिये सुलैमान ने अपने पुत्रों को चेतावनी दी, “क्रोधी मनुष्य का मित्र न होना, और झट क्रोध करनेवाले के संग न चलना, कहीं ऐसा न हो कि तू उसकी चाल सीखे, और तेरा प्राण फन्दे में फँस जाए।” (नीतिवचन 22:24-25)।
क्रोधी व्यक्ति घमण्डी व्यक्ति होते हैं, जो अपने आस-पास के लोगों पर टूट पड़ते हैं, यदि वे उनके बारे में उन्हीं के आँकलन से सहमत नहीं होते हैं और इस संसार में उनकी माँगों को पूरा करने के लिए योगदान नहीं करते हैं। दूसरे शब्दों में, क्रोधी लोग, कूड़े के समान मित्र होते हैं।
यदि अभी, मेरे मित्र बुरे हैं, तो मुझे क्या करना चाहिये?
यदि आप स्वयं को अभी बुरे मित्रों के साथ पाते हैं, तो आप को क्या करना चाहिए, इस प्रश्न का एक बहुत छोटा उत्तर यह है। सबसे पहले, सचेत हो जाएँ। पौलुस ने लिखा “धोखा न खाना, ‘बुरी संगति अच्छे चरित्र को बिगाड़ देती है’” (1 कुरिन्थियों 15:33)। यदि आप के मित्रों के गुण उनके घमण्ड, उनके स्वार्थ, मूर्खता, क्रोध, या इन सभी बातों के द्वारा प्रकट करते हैं, तो आप को सचेत हो जाने की आवश्यकता है। उनका घमण्ड बड़ी सरलता से आप पर भी आ सकता है। सुलैमान यही बात अपने पुत्रों को बता रहा था जब उसने उन से क्रोधी व्यक्ति के फँसाने वाले फँदा होने की बात कही थी।
दूसरा, बुरे मित्रों को अच्छे मित्रों से घेर लें उनसे सहायता ले लें! इस पर अगले तीन खण्डों में देखेंगे।
तीसरा (अ), आप को अपने जीवन में बुरे मित्रों को सीमित करना पड़ सकता है, या उन्हें अपने जीवन से हटाना पड़ेगा। सावधानी से कार्य करें। अपूर्ण मित्रों (जिन में से एक आप हैं, और मैं भी हूँ!) में और बुरे मित्रों में अन्तर होता है। अपने मित्रों का आँकलन सिद्धता के मापदण्ड से मत कीजिये। ऐसा करने से आप पाखण्डी बन जाएँगे, और साथ ही आप के चारों ओर के लोगों को वह देना पड़ेगा, जो वे दे नहीं सकते हैं। सिद्ध तो केवल एक ही है—प्रभु यीशु मसीह।
तीसरा (ब), यदि आप को लगता है कि आप को अपने जीवन में किसी मित्र को सीमित करना है, या उसे हटाना है, तो परामर्श लें! अपने जीवन में विद्यमान किसी बुद्धिमान व्यक्ति (माता-पिता, अच्छा मित्र, परामर्शदाता, अगुवा, आदि) से उस परिस्थिति से व्यवहार करने के लिए परामर्श लें। उन के साथ अपने विचारों और कारणों को साझा करें। देखें कि क्या उनकी सहायता से आप सम्बन्धों को बिगाड़ने वाली बातों को पहचान पाते हैं कि नहीं। इस निर्णय को अकेले ही मत लीजिये। हम बहुत सरलता से मान लेते हैं कि हमें सब कुछ स्पष्ट दिख रहा है, और हमें पता है कि करने के लिये सही क्या है। परामर्श लेना हमें ऐसे गलत निर्णय लेने से बचा सकता है, जिन से लोग आहत हो सकते हैं।
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मनन के लिए प्रश्न:
- क्या बुरे मित्र बनाने वाली प्रवृत्तियों (स्वार्थ, मूर्खता, घमण्ड) में से किसी के साथ आप का संघर्ष बना रहता है?
- क्या आप किसी ऐसे समय के बारे ध्यान कर सकते हैं जब इन प्रवृत्तियों के कारण आप की किसी मित्रता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा हो? अपने परामर्शदाता के साथ किसी उदाहरण को साझा करें।
- इन में से प्रत्येक प्रवृत्ति की जड़ में घमण्ड किस प्रकार से होता है?
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भाग II: अच्छा मित्र होना क्या होता है?
एक अच्छे मित्र बनने के लिये बहुत सारे गुण चाहिये होते हैं। परन्तु, पिछले खण्ड के समान, हम सबसे महत्वपूर्ण में से केवल तीन पर ही विचार करेंगे, जिन्हें आप को अपने मित्रों में देखना चाहिये: वफादारी, ईमानदारी, और प्रेम।
एक वफादार मित्र
क्या आप को बोरोमीर याद है? वह फ्रोडो के लिये अच्छा मित्र नहीं था, क्योंकि वह स्वार्थी था और उस छल्ले को अपने ही प्रयोग के लिये लेना चाहता था। परन्तु फ्रोडो के पास एक अच्छा मित्र था। सैमवाइज़ गैमजी। आप में से जितने भी लॉर्ड ऑफ द रिंगस के प्रशंसक है, आप जानते थे कि यह बात आने वाली है। उन लोगों के लिये जिन्हें इस कहानी से कोई लेना-देना नहीं है, या जो उस से परिचित नहीं हैं, वे मेरे साथ बने रहें, और मैं शीघ्रता से उन्हें इसे बता देता हूँ।
सैमवाइज़ भी, फ्रोडो के समान, एक हॉबिट था। वह कद में छोटा, थोड़ा गोलाकार, और कुल मिला कर सीधा-सादा था। यद्यपि उसमें कोई विशिष्ट उल्लेखनीय गुण तो नहीं था, परन्तु सैमवाइज़ किसी भी से मित्र से, जिसकी आशा फ्रोडो कर सकता था, अच्छा था। एक बात तो यह कि, जब फ्रोडो को पता चला कि उसे डूम पर्वत की आग में छल्ले को भस्म करने जाने के लिये शायर को छोड़ना होगा, तो सैम ने कोई आपत्ति नहीं की। यह तो कतई सम्भव ही नहीं था कि फ्रोडो उसके बिना कहीं चला जाए। फिर, उनकी यात्रा में सैम यह सुनिश्चित करता रहा कि फ्रोडो भोजन करे, विश्राम ले, और हर ओर से खतरों से सुरक्षित रहे। एक वह बहुत जोखिम भरा पल भी आया जब सैम, फ्रोडो के पीछे जाने के लिये, नदी में कूद गया, क्योंकि बोरोमीर के स्वार्थी कार्यों के कारण सहभागिता टूट गई थी। यद्यपि सैम को तैरना नहीं आता था, परन्तु वह फ्रोडो को अकेले जाते हुए नहीं देख सकता था। मुझे, फ्रोडो के प्रति सैम की वफादारी का, एक अन्तिम उदाहरण भी बता लेने दीजिये। जब फ्रोडो की सारी ऊर्जा समाप्त हो चुकी थी, और डूम पर्वत का शिखर अभी भी उसके आगे ही था, सैम ने फ्रोडो को अपनी पीठ पर उठा लिया, यह कहते हुए कि, “मैं तुम्हारे स्थान पर उसे (छल्ले को) तो नहीं ले जा सकता हूँ, परन्तु मैं तुम्हें तो ले जा सकता हूँ!” इसके बारे में सोचने से ही सिहरन होने लगती है।
इस सब से आप क्या समझ पाते हैं? देखिये, यदि आप, अपनी कहानी के फ्रोडो हैं, उस छल्ले और आप के पीछे पड़े हुए विकराल प्राणियों और संसार की नियति आप पर निर्भर होने और ऐसी अन्य बातों के बिना, तो आप को अपने साथ सैमवाइज़ गैमजी जैसा एक मित्र चाहिये। एक अच्छा मित्र वह है जो आप की रक्षा करता है, आप को बचा कर रखने के प्रयास करता है, आप के साथ बना रहता है, और आप के लिये लड़ता है। एक अच्छा मित्र, एक वफादार मित्र होता है।
क्या आप एक मित्र में वफादारी होने को मूल्यवान समझते हैं? जैसा कि हम अपने अगले बिन्दु पर विचार करते समय देखेंगे, एक वफादार मित्र वह नहीं है जो आप की कही हुई हर बात पर अन्ध विश्वास रखते हुए आप से सहमत रहता है और आप की हर बात को स्वीकार कर लेता है। इस तरह की वफादारी, वास्तविकता में, बुरे मित्र की श्रेणी में आएगी। नहीं, एक वफादार मित्र, जैसा हमें स्वयं होने और अपने लिए मिलने की लालसा रखनी चाहिये, वह होता है जो हमारी भलाई के लिए प्रतिबद्ध है, और जब हम भलाई के पीछे जाते हैं, तब हमारे साथ चलता है। कभी-कभी हमारे लिए जो भला होता है, उस में हमारी अप्रिय बातों को सम्बोधित करना सम्मिलित होता है। वफादार मित्र हमारी बुराइयों से अनभिज्ञ नहीं होते हैं, और न ही वे हमारी कमज़ोरियों के प्रति आँखें बन्द रखते हैं। बल्कि, वफादार मित्र पूरे मार्ग में हमारे साथ-साथ चलते रहते हैं, और उन कमज़ोरियों में से होकर हमारे विकसित होते जाने में हमारी देखभाल करते हैं।
सुलैमान ने इसी बात को स्पष्ट करते हुए अपने पुत्रों को लिखा, “जो तेरा और तेरे पिता का भी मित्र हो उसे न छोड़ना, और अपनी विपत्ति के दिन अपने भाई के घर न जाना। प्रेम करने वाला पड़ोसी, दूर रहने वाले भाई से कहीं उत्तम है” (नीतिवचन 27:10)। किसी पड़ोसी को भाई से बेहतर बनाने वाली बात है, उसका निकट होना—जिसे मित्रता के लेखे-जोखे में हम वफादारी कह सकते हैं। वफादारी में साथ बने रहने का गुण होता है। यह दो मित्रों के मध्य की वह बात है जो उन्हें तब भी निकट रखती है जब चुनौतियाँ उन्हें खींच कर अलग करने के प्रयास करती हैं। वफादारी कहती है, “यह एक कठिन परिस्थिति है, परन्तु तुम्हें छोड़े देने के द्वारा मुझे प्राप्त होने वाले आराम और सुविधा से बढ़ कर, मैं तुम्हारे प्रति प्रतिबद्ध हूँ।” वफादारी हार नहीं मानती है, और न ही वह मित्रों को छोड़ती है। एक अच्छा मित्र, एक वफादार मित्र होता है।1
एक ईमानदार मित्र
बीती रात, भोजन की मेज़ पर, एक मित्र ने यह सम्भावना बताई, और उसके बाद एक प्रश्न पूछा। सम्भावना यह थी: आप मित्रों के साथ भोजन करने के लिये बाहर गये हुए हैं, और आप का एक मित्र देखता है कि आप के मुँह पर थोड़ा सा भोजन लगा हुआ है। प्रश्न यह है कि क्या आप के मित्र को आप से कुछ कहना चाहिये, या उसे ऐसे ही छोड़ देना चाहिये, कि कहीं आप लज्जित अनुभव न करें। मेरी पत्नी ने तुरन्त ही उत्तर दिया कि वह तो चाहेगी कि कोई उसे यह बता दे कि उसके मुँह पर भोजन लगा हुआ है। वास्तव में, उसने तो कहा कि उसे यह जानकर बुरा लगेगा कि कोई अन्य यह जानता था कि चटनी से उसके मुँह पर दाग़ था, परन्तु उसने यह बात उसे बताई नहीं। मेरी पत्नी को ईमानदारी चाहिये। आप को भी पसन्द करनी चाहिये।
परन्तु, ईमानदारी एक विचित्र बात होती है। उसकी अपेक्षा रखना तो सहज होता है, परन्तु साथ ही, उसे स्वीकार करना कठिन होता है। यही उन कारणों में से एक है कि सुलैमान मित्र की ईमानदारी को “घाव” के समान बताता है (नीतिवचन 27:6)। यद्यपि वह उन्हें “वफादार” कहता है, परन्तु वह यह भी स्वीकार करता है कि मित्रों की ईमानदारी, एक तरह से घाव के समान दुःख भी देती है। क्या आप ने कभी किसी के द्वारा आप से आप के बारे में किसी तीखे सत्य के कहे जाने से आहत अनुभव किया है?
हाल ही में मेरे एक प्रिय मित्र ने मुझ से कहा कि उसे मेरे साथ कार्य करना कठिन होता है, क्योंकि मैं केवल अपने ही तरीके कार्य करवाना चाहता हूँ। इससे मुझे बुरा लगा। इससे मुझे अभी भी बुरा लगता है। और क्या आप जानते हैं कि सबसे अधिक बुरा किस बात से लगता है? इस तथ्य से कि वह सही कह रहा था—मैं वैसा हो सकता हूँ। और यद्यपि मैं कुछ तरह से इससे अवगत तो था, उसके सीधे से इसे कहने और ईमानदारी ने मुझे यह देखने में सहायता की, कि मेरे इस भाग को बदले जाने की आवश्यकता है। मेरा घमण्ड अभी भी आहत है, परन्तु मेरा मन प्रसन्न है कि वह मुझ से सत्य कहने का इच्छुक था।
आलोचना स्वीकार करना सरल नहीं होता है, परन्तु यह महत्वपूर्ण है क्योंकि हम हमेशा ही स्वयं को स्पष्टता से नहीं देखते हैं। हमें ऐसे लोग चाहिये होते हैं जो हमारे द्वारा अवहेलना किए जा रहे अपने पक्ष पर ध्यान रखें, और यदि कोई समस्या उत्पन्न हो तो हमें बता दें। और इसे किसी को भी नहीं करना है… हमें ऐसे मित्र चाहिये, जो हमारे लिये यह करें। आखिरकार, यदि हम से प्रेम करने वाले मित्र हम से सत्य नहीं बोल सकेंगे, तो कौन बोलेगा? या, इसे भिन्न तरह से कहें तो, आप कठोर बातें किस से सुनना चाहेंगे—उससे जो आप से प्रेम करता है, या किसी ऐसे से जिस पर आप सन्देह करते हैं या जिसे आप भली-भाँति नहीं जानते हैं? प्रतिबद्ध मित्रता की ऊँची दीवारों के अन्दर, सत्य के प्रति सुरक्षा भी होनी चाहिये। उन दीवारों के अन्दर आप को ऐसी मित्रता खोजनी चाहिये जहाँ लोहा लोहे को पैना करे और आप तथा आप का मित्र, दोनों बढ़ सकें (नीतिवचन 27:17)।
परन्तु, आप को मित्रों से केवल आलोचना ही सुनने की आवश्यकता नहीं है। आप को उनके धार्मिकता भरे प्रोत्साहन की भी आवश्यकता है। बहुधा हम प्रोत्साहन को चापलूसी के समान सोच लेते हैं, परन्तु ऐसा नहीं होना चाहिये। एक मित्र ने एक बार मुझसे कहा कि चापलूसी वह कहना होती है जो आप उनके बारे में तब नहीं कहेंगे, जब वे आप के आस-पास नहीं होंगे। मेरे विचार से यह एक अच्छा वर्णन है। आप चापलूसी तब करते हैं, जब आप किसी से वह कहते हैं, जो वह सुनना चाहता है, यद्यपि आप जानते हैं कि जो कहा जा रहा है वह सत्य नहीं है। पवित्रशास्त्र में चापलूसी के अति हानिकारक होने के बारे में बहुत कुछ कहा गया है। उदाहरण के लिये दाऊद को लीजिये, जिसने लिखा, “उन में से प्रत्येक अपने पड़ोसी से झूठी बातें कहता है; वे चापलूसी के ओठों से दो रंगी बातें करते हैं। प्रभु सब चापलूस ओठों को और उस जीभ को जिस से बड़ा बोल निकलता है काट डालेगा।” ये, एक चरवाहे से राजा बने व्यक्ति से आने वाले बहुत कठोर शब्द हैं। इसलिये, आप को मित्र के रूप में कोई चापलूसी करने वाला नहीं चाहिये।
परन्तु आप को अवश्य ही ऐसे मित्र की आवश्यकता है जो आप को धार्मिकता भरा प्रोत्साहन उपलब्ध करवाए। यह कम से कम दो भिन्न स्वरूप में हो सकता है। पहला, धार्मिकता भरे प्रोत्साहन में वे भली बातों को साझा कर सकते हैं जिन्हें वे आप में देखते हैं और उनके कारण आप से आनन्दित होते हैं। इस प्रकार का प्रोत्साहन छोटी बातों के लिये हो सकता है: “मुझे आप का व्यक्तित्व बहुत पसन्द है। आप के साथ समय उत्तम होता है।” “आप सच में एक ध्यान रखने वाले व्यक्ति हैं। आप की मित्रता के लिये मैं कृतज्ञ हूँ।” “आप का अनुशासित रहना मुझे बहुत पसन्द है। मैं उसी के समान बढ़ना चाहता हूँ।” या, यह बड़ी और अनन्तकालीन बातों के बारे में हो सकता है: “मैं देख रहा हूँ कि हाल में, आप में परमेश्वर के वचन और उसे समझने की भूख कितनी बढ़ गई है, और उसके लिये मैं परमेश्वर की स्तुति करता हूँ।” “मुझे पता है कि इस समय आप बहुत दुःख सह रहे हैं, परन्तु मैं आप को बताना चाहता हूँ कि परमेश्वर के भले होने के बारे में आप के विश्वास से मैं बहुत प्रोत्साहित हुआ हूँ।” “आप की कलीसिया के लोगों के प्रति आप का आदर-सत्कार एक उदाहरण है। मैं भी इस में आप के समान बनना चाहता हूँ!” एक ऐसे मित्र के समान जो ईमानदार, प्रोत्साहक बात बोल सकता है, और कुछ नहीं होता है।
धार्मिकता भरे प्रोत्साहन का दूसरा स्वरूप हो सकता है, जब आप के मित्र परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं को आप को याद दिलाते हैं, कहीं आप उन्हें भूल न जाएँ। पवित्रशास्त्र के मेरे सबसे प्रिय खण्डों में से एक है 1 थिस्सलुनीकियों 4:13-5:11, जहाँ पौलुस थिस्सलुनीकिया की डरी हुई कलीसिया को याद दिलाता है कि जगत के अन्त के समय उन्हें किन बातों की अपेक्षा रखनी चाहिये। यह खण्ड महिमा से भरा हुआ है, यीशु के स्वर्ग से उतर आने, उसके द्वारा मृतकों को जिलाए जाने, और जीवतों को रूपान्तरित कर देने पर केन्द्रित है। इस खण्ड के अन्त में पौलुस कलीसिया को निर्देश देता है कि “इस कारण एक दूसरे को शान्ति दो, और एक दूसरे की उन्नति के कारण बनो…” यद्यपि यह 4:18 में कही गई बात को दोहराना है, परन्तु यह कहना सही होगा कि कलीसिया द्वारा एक दूसरे को प्रोत्साहित करने का तरीका था, एक दूसरे को उन सत्यों को याद दिलाते रहना था, जिन्हें पौलुस ने पवित्रशास्त्र के इस खण्ड में बताया था। हमें भी यही करना चाहिये। धर्मी मित्र एक दूसरे को परमेश्वर के शब्दों को याद दिलाते हैं—प्रतिज्ञा, चेतावनी, और सान्त्वना के शब्द। एक अच्छा मित्र अपने मित्रों की सहायता करता है कि वह अपने मार्ग में अपनी दृष्टि यीशु पर जमाए रहें।
एक प्रेम करने वाला मित्र
एक अच्छे मित्र का सबसे प्रकट और महत्वपूर्ण गुण यह है—प्रेम। एक अच्छा मित्र प्रेम करता है। बाइबल इस बात को बारम्बार बताती है। एक बार फिर, सुलैमान ने लिखा, “मित्र सब समयों में प्रेम रखता है, और विपत्ति के दिन भाई बन जाता है।” (नीतिवचन 17:17)। अपने अच्छे मित्रों के लिये आप को हमेशा यह कह सकने वाला होना चाहिये कि वे आप से प्रेम करते हैं। और मित्र का प्रेम इससे मूल्यवान और कभी नहीं होता है जब आप अपने जीवन में किसी कठिन परिस्थिति से निकल रहे होते हैं। वास्तव में, सुलैमान मित्रता की तुलना भाईचारे से करता है और फिर कहता है कि वह विपत्ति के दिन के लिये होता है। एक “भाई” (मित्र) विपत्ति के दिन के लिए “बन जाता है” (होता) है। मित्र को आप के साथ क्या बनाए रखता है, जब आप कठिनाई का सामना कर रहे होते हैं? आप के लिये उनका प्रेम।
एक मित्र का प्रेम, आप की भलाई के लिये उनके बलिदान करने में भी दिखता है। यीशु ने कहा, “इससे बड़ा प्रेम किसी का नहीं कि कोई अपने मित्रों के लिये अपना प्राण दे” (यूहन्ना 15:13)।, जब हम मित्रता के बारे में सामान्य व्यवहार के दृष्टिकोण से देखते हैं, तब मित्र के लिये अपने प्राण बलिदान कर देना चरम कार्य लग सकता है, परन्तु यीशु इस बात को उठता है, इसलिये हमें उस पर ध्यान देना चाहिये।
सबसे पहली बात, हमारे जैसे पापियों के लिये यीशु सर्वोत्तम मित्र है। उसने अपने प्राण बलिदान कर देने के द्वारा हमारे प्रति मित्रता का प्रेम दिखाया। यह करने के द्वारा उसने उन सभी के लिये पाप के दण्ड को चुका दिया जो पश्चाताप कर के उस में विश्वास करें। और हमें यीशु से अधिक किसी अन्य मित्र की कोई आवश्यकता नहीं है। यदि यीशु आप का मित्र नहीं है, तो मैं आप को प्रोत्साहित करना चाहता हूँ कि अभी रुक कर स्वयं से यह प्रश्न पूछिये: “वह क्या है जो मुझे रोके हुए है?” अपने पापों से मुड़कर यीशु में आज ही विश्वास करें। उसने अपने वचन में प्रतिज्ञा की है कि, यदि आप विश्वास के साथ उसे पुकारेंगे, तो वह आप का मित्र बनेगा, और आप को आपके पापों से बचा लेगा (रोमियों 10:9-11)। इसे आज ही कर लीजिये।
हम में से कोई भी अपने मित्रों से वैसा प्रेम नहीं कर सकता है जैसा यीशु ने हम से किया है। उसके प्रेम की कोई सीमा नहीं है और हमें मित्र बना लेने के लिये उसने किसी बात को आड़े नहीं आने दिया। वह हमसे सिद्ध प्रेम करता है, और हम यह नहीं कर सकते हैं। यह कहने पर भी, एक अच्छे मित्र को अपने प्रेम को हमारे प्रति यीशु के प्रेम के अनुसार स्वरूप देना चाहिये।
अब, हम से अधिकाँश को अपने मित्रों के लिये अपने प्राण देने के लिये नहीं कहा जाएगा। ध्यान में रखने की बात: आप को किसी व्यक्ति से साक्षात्कार में यह नहीं पूछना चाहिये कि क्या वह आप के लिये अपने प्राण देने के लिये तैयार है। यह करना बहुत विचित्र होगा। परन्तु फिर भी, यीशु ने मित्रता का वह स्तर स्थापित किया है जो मृत्यु तक भी जा सकता है। यदि चरम परिस्थितियों में बलिदानी मृत्यु एक उचित बात है, तो निश्चय ही अच्छे मित्रों को एक बलिदानी मित्र होने के साथ आने वाली दिन-प्रति-दिन की जिम्मेदारियों को प्रसन्नता के साथ स्वीकार कर लेना चाहिये।
यदि वे दिन-प्रति-दिन की जिम्मेदारियाँ अस्पष्ट हैं, तो चलिये कुछ ठोस उदाहरणों के द्वारा हम सुस्पष्ट हो जाते हैं। जब रात के 11 बजे आप के तहखाने में पानी भर जाता है, आपको एक ऐसे मित्र की आवश्यकता होती है जो बरसात के विशिष्ट जूतों और पानी निकालने वाली मशीन के साथ आ जाए। जब आप को काम से निकाल दिया जाता है, तब आप को एक ऐसे मित्र की आवश्यकता होती है जो यह सुनिश्चित रखे कि आप के और आप के परिवार के पास खाने-पीने का सामान और खाना पकाने के लिये ईंधन उपलब्ध है। जब आप की गाड़ी की बैट्री बैठ जाए और आप रास्ते में फँसे हुए हैं, तब आप को एक ऐसे मित्र की आवश्यकता होती है जो अपने साथ उन तारों को लेकर आए जिन से वह अपनी कार की बैट्री से आप की गाड़ी को चालू कर दे। जब आप पाप करते हैं, और उस के कारण दुःख उठाते हैं, तब आप को एक ऐसे मित्र की आवश्यकता होती है जो उस अँधियारी रात में भी आपके साथ रहे और आप को याद दिलाए कि जो भी यीशु पर भरोसा रखेगा, उसे क्षमा मिलने की प्रतिज्ञा की गई है। जब आप का गर्भपात हो जाता है और आप शोक में डूबे हुए हैं, तब आप को एक ऐसे मित्र की आवश्यकता होती है जो आप के साथ बैठे, आप के साथ आँसू बहाए, और आप को तथा आपकी हानि को याद रखे। जब आप का विवाह खतरे में आ जाए, तब आप को एक ऐसा मित्र चाहिये, जो आप पर आरोप न लगाए, बल्कि आप की बात को सुने, और धार्मिकता भरा परामर्श दे, जिससे कि आप और आप का जीवन साथी साथ मिलकर बात को संभाल लें।
मित्र अपने प्रेम को इन तथा इनके समान अनेकों अन्य बातों में बलिदान करने के द्वारा अपने प्रेम को व्यक्त करते हैं। क्या आप के पास इस तरह के मित्र हैं? जीवन कठिन है, और आप को पार लगने में सहायता के लिये मित्रों की आवश्यकता होगी। “सही बात है” आप सोच रहे होंगे, “कृपया मुझे यह बताएँ, कि मैं कहाँ जाकर ऐसे मित्रों को खोजूँ जो मेरे लिये ये सब करने के लिये तैयार हैं?” हम इसका उत्तर अगले खण्ड में देंगे।
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मनन के लिए प्रश्न:
- क्या आप के जीवन में किसी वफादार, ईमानदार, प्रेम करने वाले मित्र का उदाहरण है? उन्हें अपने परामर्शदाता के साथ साझा करें।
- अन्य किन तरीकों से अच्छे मित्र यीशु के उदाहरण के अनुसार हमारे प्रति अपनी देखभाल को दिखा सकते हैं?
- इन में से कौन सा गुण किसी मित्र में मिलना सबसे कठिन होता है? इन में से कौन सा गुण का उदाहरण बनना आप के लिए सबसे कठिन है? क्यों?
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भाग III: मित्र कैसे खोजें
अब हम इस जीवन कौशल मार्गदर्शिका के व्यावहारिक भाग में पहुँच गये हैं। आप ने सोचा होगा कि क्या हम कभी वहाँ पहुँचेंगे कि नहीं! अच्छे (धर्मी) मित्र भला कैसे खोजे जा सकते हैं? इस प्रश्न का उत्तर देने से पहले मेरे पास आप के लिये केवल एक ही प्रश्न है—केवल मेरे शीर्षकों को पढ़ने से यह मत समझ लीजिये कि आप को पता है कि मैं क्या कहने जा रहा हूँ। इस भाग में से धीमी गति से जाइये, और रचनात्मक होकर विचार कीजिये कि आप धर्मी मित्रों को खोजने के लिए इन सिद्धान्तों को कैसे और अधिक नियमित रीति से लागू कर सकते हैं। जैसे कि फूल हाउस में जेसी पूछती, “क्या तुम समझे?” ठीक है। धर्मी मित्रों को पाने के लिये आप को मार्गदर्शिका देने का यह मेरा सर्वोत्तम प्रयास है।
1. प्रार्थना करें
बिलकुल प्रत्यक्ष लगता है, है न? परन्तु मैं गंभीर हूँ। यदि आप अपनी मित्रताओं का आँकलन करें, और आप को कमी अनुभव हो, तो आप को इसे अपनी प्रार्थनाओं का एक विषय बना लेना चाहिये। मुझे मत्ती 7 में हम से कहे गए यीशु के शब्द बहुत पसन्द हैं। उसने पद 7-11 में कहा:
माँगो, तो तुम्हें दिया जाएगा; ढूँढ़ो तो तुम पाओगे; खटखटाओ, तो तुम्हारे लिये खोला जाएगा। क्योंकि जो कोई माँगता है, उसे मिलता है; और जो ढूँढ़ता है, वह पाता है; और जो खटखटाता है, उसके लिये खोला जाएगा। तुम में से ऐसा कौन मनुष्य है, कि यदि उसका पुत्र उससे रोटी माँगे, तो वह उसे पत्थर दे? या मछली माँगे, तो उसे साँप दे? अत: जब तुम बुरे होकर, अपने बच्चों को अच्छी वस्तुएँ देना जानते हो, तो तुम्हारा स्वर्गीय पिता अपने माँगने वालों को अच्छी वस्तुएँ क्यों न देगा?
मेरे उपरोक्त सोलह महीने आयु पुत्र के पास केवल तीन शब्द हैं, और उन में से एक “डैडी” है। जब मैं पढ़ने के लिये अपनी कुर्सी पर बैठा होता हूँ और वह चलकर मेरे पास आता है, तो वह केवल मेरा नाम बोलेगा, अपने हाथ फैलाएगा, और विचित्र आवाज़ें निकालने लगेगा। मुझे पता है कि वह मुझसे क्या माँग रहा है। वह चाहता है कि मैं उसे उठा लूँ, ताकि वह मेरी गोदी में बैठ सके। अब, मैं कैसा पिता होऊँगा यदि मैंने उसे अपनी बाँहों में उठा लेने के स्थान पर, अपने पैर उसकी ओर कर दूँ? सबसे बुरे प्रकार का, है न।
यीशु हमें सिखाता है कि हम परमेश्वर को सर्वोत्तम प्रकार का पिता समझें, कि हम उसके पास जा सकें और उसके साथ अपनी आवश्यकताएँ साझा कर सकें। हमारी आवश्यकताओं के लिये परमेश्वर हमें तुच्छ नहीं समझता है। बल्कि वह उन्हें भरपूरी से पूरी करता है। इसलिये, यदि आप स्वयं के पास मित्रों की कमी पाते हैं, तो प्रभु से कहिए कि आप को उपलब्ध करवाए और भरोसा रखें कि वह ठीक ऐसा ही करेगा।
2. कलीसिया में जाएँ!
इस भाग में यह सबसे महत्वपूर्ण बात है जो मैं कहना चाहता हूँ, इसलिये नहीं क्योंकि अन्य महत्वपूर्ण नहीं हैं, परन्तु क्योंकि मुझे लगता है कि इस बात की सबसे अधिक अवहेलना की जाती है। धर्मी मित्र खोजने जाने के लिये, एक सुसमाचार प्रचार करने वाली स्थानीय कलीसिया से बढ़कर उत्तम स्थान और कोई नहीं हो सकता है। क्यों? चार कारण हैं। पहला, सुसमाचार प्रचार करने वाली कलीसियाओं में हर प्रभु के दिन सभाएँ आयोजित होती हैं। इतवार के दिन प्रातः 10 बजे, आप को सोचने की आवश्यकता नहीं है कि आप के नगर के मसीही कहाँ पर होंगे। सम्भवतः वे कलीसिया में हैं! यह एक पीपे के अन्दर की मछली पकड़ने के समान है, जहाँ पर सभा ही अपने लिये पीपे का कार्य कर रही है!
इस रूपक का मछली वाला भाग, मुझे मेरे दूसरे कारण पर लाता है कि क्यों धर्मी मित्रों को खोजने के लिये कलीसिया से बेहतर कोई स्थान नहीं है। वह है, सुसमाचार प्रचार करने वाली कलीसियाओं में ऐसे मसीही होते हैं जो मसीही विश्वास से सम्बन्धित सबसे महत्वपूर्ण बातों के लिये परस्पर सहमत होते हैं। नि:सन्देह, आप को मित्र स्कूल, कार्य-स्थल, या व्यायामशाला में भी मिल जाएँगे, और सम्भव है कि वे मसीही भी हों। परन्तु दूसरी ओर, अपनी परिभाषा के अनुसार, सुसमाचार प्रचार करने वाली कलीसियाएँ, मसीही होती ही हैं। इसका अर्थ है कि उस कलीसिया के लोग परमेश्वर, उद्धार पाने, मृत्यु के बाद क्या होता है, जीवन कैसे जीना चाहिये, आदि बातों पर आप के समान ही विचार रखते हैं।
ठीक है, अब तीसरा कारण, कि क्यों स्थानीय कलीसिया धर्मी लोग मिलने और मित्र बनाने के लिये सर्वोत्तम स्थान है: कलीसिया की वाचा। मुझे पूरा विश्वास है कि आप ने इस बात की अपेक्षा नहीं की थी; क्या की थी? अधिकाँश स्थानीय कलीसियाओं में वाचाएँ होती हैं। एक वाचा वह अनुबन्ध होता है जो कलीसिया के सभी सदस्य मिलकर करते हैं कि सभी किस प्रकार से साथ मिलकर जीवन जीएँगे तथा यीशु का अनुसरण करेंगे। यह आवश्यक है कि प्रत्येक सदस्य को कलीसिया से जुड़ने के लिये, कलीसिया की वाचा का पालन करने के लिए सहमत होना पड़ता है। यह मेरी कलीसिया की वाचा का एक अनुच्छेद है, जिससे आप को कुछ अंदाज़ा हो जाएगा:
हम भाईचारे के प्रेम में साथ मिलकर चलेंगे, जैसा कि मसीही कलीसिया के सदस्यों के लिए उचित है, एक दूसरे पर प्रेमपूर्ण देखभाल और सतर्कता रखेंगे, और अवसर की आवश्यकता के अनुसार विश्वासयोग्यता से एक दूसरे को टोकेंगे और व्यवहार करेंगे।2
याद कीजिये कि मैंने प्रतिबद्ध मित्रता की ऊँची दीवारों के बारे में क्या कहा था? किसी ऐसी स्थानीय कलीसिया का सदस्य बनना, जिस में सदस्यों को वाचा के द्वारा एक दूसरे के साथ बाँध दिया जाता है, कलीसिया में प्रत्येक मित्रता की उन दीवारों को बनाने के लिये एक पहल मिल जाती है। मेरी कलीसिया में मेरे कुछ अद्भुत मित्र हैं। इनमें से प्रत्येक मित्रता के लिये, आरम्भ हमारे साझा विश्वास और एक दूसरे के तथा कलीसिया के अन्य सदस्यों के साथ की हुई वाचा से हुआ था। कैसा अद्भुत सौभाग्य!
यह अन्तिम बात है कि क्यों सुसमाचार प्रचार करने वाली कलीसिया धर्मी मित्र बनाने के लिये सर्वोत्तम स्थान है—कलीसिया में धर्मी अगुवे आपकी देखभाल करते हैं। बाइबल बताती है कि अगुवे कलीसिया को दिए गये उपहार हैं (इफिसियों 4:11-12)। मेरे पास समय नहीं है कि उन सभी कारणों को बता सकूँ कि यह सत्य क्यों है, इसलिये यह केवल एक कारण है, जिस पर आप मनन कर सकते हैं। धर्मी मित्रों को खोजने में अगुवे आप की सहायता कर सकते हैं। मेरे अगुवों ने नि:सन्देह मेरी सहायता की है, चाहे यह सुझाव देने के द्वारा कि मैं किसी को साथ कॉफी पीने के लिये आमंत्रित करूँ और उसके साथ जीवन के बारे में वार्तालाप करूँ, या मेरे लिये यह प्रार्थना करने के द्वारा कि मैं कलीसिया के अन्य सदस्यों के लिये अच्छा मित्र रहूँ। यदि आपको धर्मी मित्र चाहिये, तो अपने अगुवों से बात करें।
3. खुले होने के लिए तैयार रहें और पहल कर के भरोसा करें
आप में से कुछ ने इस उप-शीर्षक को पढ़ कर स्वयं से कहा होगा, “मैं इसे यहीं बन्द कर रहा हूँ।” मुझे पता है, मुझे पता है। खुला होना कठिन होता है। यह विशेषकर तब होता है जब आप वहाँ गए हैं, वैसा किया है, और इसे प्रमाणित करने के लिये आप में सम्बन्धों के दाग़ हैं। दुर्भाग्यवश टूटे हुए संसार में जीवन जीने से बहुधा टूटापन आ जाता है, मसीही सम्बन्धों में भी। परन्तु फिर भी, मसीहियत को जीने के लिये समुदाय की आवश्यकता होती है, और समुदाय मित्रता पर बना होता है, जिनके गुणों का कुछ भाग, खुला होना होता है।
यद्यपि सभोपदेशक का लेखक मुख्यतः कार्य स्थल में सम्बन्धों के बारे में बात कर रहा था, सम्बन्धों के बारे में उसकी अन्तर्दृष्टि बड़ी सरलता से मित्रता के क्षेत्र में भी लागू की जा सकती है। उसने लिखा, “iफिर यदि दो जन एक संग सोएँ तो वे गर्म रहेंगे, परन्तु कोई अकेला कैसे गर्म हो सकता है? यदि कोई अकेले पर प्रबल हो तो हो, परन्तु दो उसका सामना कर सकेंगे। जो डोरी तीन तागे से बटी हो वह जल्दी नहीं टूटती” (सभोपदेशक 4:11-12)। मूलभूत आधार यही है कि परस्पर निर्भर रहने वाले सम्बन्धों में सामर्थ्य होती है और अकेले रहने में खतरा होता है। क्या आप ने उस शब्द निर्भर पर ध्यान किया? सम्बन्धों में निर्भर रहना कहने का एक दूसरा तरीका है आहत होने के लिये तैयार रहना।
हम जब पहली बार अपनी कलीसिया से जुड़े थे, तब हमारे कोई मित्र नहीं थे। हमारे जीवनों में हुई महत्वपूर्ण हानि के कारण, हम जानते थे कि हमें मित्रों की आवश्यकता थी—और अति शीघ्र थी। परमेश्वर ने अपने अनुग्रह में मित्र बनाने का एक तरीका जो दिया वह था अपने दुःख के बारे में लोगों से खुला होना। तुरन्त ही लोग हमारी सहायता के लिये आए, और हमारी बहुत सारी घनिष्ठ मित्रताएँ आरम्भ हुई।
आप के बारे में कैसा है? यदि आप मित्र बनाने जा रहे हैं, तो आप को अपनी दुर्बलताओं, अपने दुःखों, अपने अतीत, अपनी आशाओं, और अपने संघर्षों के बारे में खुला होना होगा। निश्चय ही यह सरल नहीं है, परन्तु यह आवश्यक है। बिना खुले हूए मित्रता, बहुधा ऊपरी ही रहती है। ऊपरी से मेरा अर्थ है कि आप अपने कार्य, या परस्पर सामान्य रुचियों, या परिवार के बारे में बात करते हैं, परन्तु आप उन भारी बातों तक नहीं पहुँचते हैं—ऐसी बातें, जिनके लिये लगता है कि यदि आप को उनके लिये किसी की सहायता नहीं मिली तो वे आप को कुचल देंगी।
कठिन बातों के बारे में खुले होने के लिये पहल करके भरोसा करना होता है। इससे मेरा अर्थ है, जो बात आप को दबा रही है, उसे किसी के साथ बाँटने के लिये आवश्यक नहीं है कि आप पहले उस व्यक्ति को अपनी विश्वासयोग्यता को प्रमाणित करने दें। इसकी बजाए आप सुसमाचार के प्रति अपनी आस्था और वाचा, जिन पर आप परस्पर सहमत हुए हैं, पर भरोसा रखते हैं और जिस के साथ आप खुल रहे हैं, उसके बहुत भले होने को मान लेते हैं। बहुत भला होना मान लेना संस्कृति के बिलकुल विपरीत है। यह मसीही भी है। इसलिये पहल कर के भरोसा करें, बहुत भला होने को मान लें, और अपनी स्थानीय कलीसिया में नये मित्रों के साथ खुले हो जाएँ। आप जिस भी बात के साथ संघर्ष कर रहे हैं, उन से उस बात के लिये प्रार्थना करने को कहें। उन्हें आमंत्रित करें कि आप के पापमय प्रलोभनों में आप को चुनौती दें। उन्हें अपने बोझ और दुःखों को उठाने दें।
4. पहल करें
मैंने बहुत से मसीहियों को यह कहते सुना है कि बाइबल स्वयं से प्रेम करने को बुरा बताती है। मुझे काल्पनिक बातों को भंग करना पसन्द तो नहीं है, परन्तु यह बात सच नहीं है। जो बात सच है वह यह है कि बाइबल स्वयं से सर्वाधिक प्रेम करने को बुरा कहती है। परन्तु बाइबल में ऐसी कोई शिक्षा नहीं है कि व्यक्ति को स्वयं के प्रति शून्य के बराबर स्नेह रखना चाहिये। वास्तव में, यीशु इसका ठीक विपरीत कहता हुआ प्रतीत होता है, जब उसने दूसरी सबसे बड़ी आज्ञा के बारे में कहा: “तू अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रख” (मत्ती 22:39)। आप को अपने पड़ोसी से कैसा प्रेम करना है? वैसा, जैसा आप स्वयं से करते हैं।
मित्रता के लिये इसका यह अर्थ हुआ कि आप पहले औरों से ऐसा प्रेम करना आरम्भ करें, जैसा आप स्वयं से करते हैं, और चाहते हैं कि अन्य लोग आप से करें। आप वह मित्र बनिये, जो आप चाहते हैं कि आप को मिलें। निश्चय ही, इसका विकल्प यही है कि आप बैठे हुए प्रतीक्षा करते रहें कि कोई आए, आप को अपनी परवाह से प्रभावित करे, और तब ही आप प्रत्युत्तर में उन्हें दयालुता और प्रेम दिखाएँगे। कम से कम कुछ कारणों से, इस कार्यविधि को नहीं अपनाना चाहिये। पहला, औरों के प्रति आप की देखभाल को आपके प्रति यीशु की देखभाल के अनुसार होना चाहिये। उसने आप से पहले आकर उसकी सेवा करने के लिये नहीं कहा। बल्कि, वह आप की सेवा करने के लिये आया और आप की आत्मा को बचाने के लिये अपने प्राण दे दिये (मत्ती 20:28)।
दूसरा, केवल तब ही देना, जब किसी से मिलने लगे, उस व्यक्ति के प्रति कृपालु होना नहीं है। केवल मिलने के बाद ही देने से उस उद्देश्य पर प्रश्न उठते हैं जिस से प्रेरित होकर आप ने दिया है। इसके स्थान पर, पवित्रशास्त्र हमें “भाईचारे के प्रेम से एक दूसरे से स्नेह रखो; परस्पर आदर करने में एक दूसरे से बढ़ चलो” (रोमियों 12:10) के लिये कहता है।
अन्तिम कारण कि क्यों आपको मित्रता दिखने से पहले, मित्रता मिलने के लिये प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिये, पूर्णतः व्यावहारिक है, परन्तु फिर भी वैध है—प्रतीक्षा करना आप को धीमा बना देगा। कभी यह शिक्षा सुनी है कि “पहल करने वाले को प्रतिफल मिलता है?” यही सिद्धान्त मित्रता पर भी लागू होता है। जिन के पास मित्र होते हैं, वे पहल करके औरों के लिये वैसे मित्र बने, जैसे वे चाहते हैं कि उनके भी हों।
मित्रता के लिये पहल करने के लिये ये कुछ व्यावहारिक बातें हैं।
– किसी इतवार को कलीसिया सभा समाप्त होने के बाद किसी के पास जाएँ, और उन से उन के बारे में तीन जिज्ञासा पूर्ण प्रश्न पूछें। ये प्रश्न उनके कलीसिया में होने के समय से लेकर वे कहाँ कार्य करते है और उन्होंने उद्धार कब पाया तक हो सकते हैं।
– ठीक है, अब आप को किसी व्यक्ति का नाम और उस के बारे में तीन रोचक बातें पता हैं। उन से पूछें कि क्या वे किसी समय आप के घर भोजन के लिये आना पसन्द करेंगे, या कभी साथ कॉफी पीने के लिये मिलना चाहेंगे। पहल करके परस्पर मिलने का समय और स्थान तय करें।
– चलिये, मान लेते हैं कि आप के पास अब एक नई मित्रता के आरम्भ होने की सम्भावना है, और आप को पता चलता है कि उस व्यक्ति की किसी प्रकार की कोई महत्वपूर्ण आवश्यकता है (उदाहरण के लिये, लम्बे समय से चला आ रहा कोई दर्द, बहुत ही व्यस्त कार्य समय, घर में करने के लिये बहुत अधिक कार्य)। स्वयं से प्रश्न पूछें, “उस की आवश्यकता के अनुसार, क्या ऐसा कुछ है, जिसे मैं अपने नये मित्र के लिये कर सकता हूँ?” एक बार जब आप उस प्रश्न के निष्कर्ष पर पहुँच जाएँ, तो उसे कर डालिये! अभी कर देने जैसा अन्य कोई समय नहीं होगा।
– उसे याद रखने का प्रयास करें जो आप के मित्र अपने जीवनों के बारे में आप के साथ बाँटते हैं। उनके जन्मदिनों, मन पसन्द भोजन या घूमने जाने के स्थान, महत्वपूर्ण तिथियाँ, आदि। उन्हें कोई सन्देश या कार्ड भेजें, यह दिखाने के लिये कि आप को यह या वह याद है, और आप उन के बारे में सोच रहे हैं।
किसी को आदर देने के लिए अनगिनत तरीके होते हैं, और मित्रता में पहले करने के भी अनगिनत तरीके हैं। बात है वैसा मित्र बनना, जैसे आप चाहते हैं आप के हों।
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मनन के लिए प्रश्न:
- मित्र खोजने के लिये कलीसिया एक अति उत्तम स्थान क्यों होता है?
- औरों के सामने खुले होने की चुनौती के बारे में आप क्या सोचते हैं?
- क्या आप औरों के बहुत भले होने को मान लेने के बारे में सोचने के लिये संघर्ष करते हैं? क्यों हाँ, या क्यों नहीं?
- ऐसे कुछ व्यावहारिक तरीके कौन से हैं जिनका प्रयोग आप पहल करके अपने मित्रों से प्रेम करने के लिये कर सकते हैं?
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भाग IV: अपने मित्रों से डरें नहीं
यह देखते हुए कि यह मार्गदर्शिका धार्मिकता भरी मित्रता प्राप्त करने के बारे में है, यह खण्ड अनायास ही लिखा गया प्रतीत हो सकता है, परन्तु मुझ पर भरोसा रखिये, यह उन सबसे महत्वपूर्ण बातों में से एक है जिसके लिये मैं इस विषय के बारे में आप को प्रोत्साहित कर सकता हूँ। यदि आप ने इस मार्गदर्शिका को इस आशा के साथ उठाया है कि आप मित्र प्राप्त कर सकेंगे, विशेषकर तब जब अभी आप के पास कुछ अधिक नहीं हैं, तो कृपया बहुत ध्यान दीजिये। मित्र आप को ठीक नहीं कर सकते हैं। आप के जीवन में जो भी टूटा हुआ है, आप वर्तमान में जैसे भी संघर्ष कर रहे हैं, या आप जिस भी अकेलेपन का अनुभव कर रहे हैं, अन्ततः मित्र उस को ठीक नहीं कर सकते हैं। नि:सन्देह वे आप की सहायता कर सकते हैं। वास्तव में, वे जीवन में बहुत प्रोत्साहित करने वाले हो सकते हैं—विशेषकर कठिनाइयों से भरे हुए जीवन में। वे आप के लिये परमेश्वर के सेवक हो सकते हैं, परन्तु वे आप के ईश्वर नहीं हो सकते हैं। इसलिये, आप को अपने मित्रों को मूर्तियाँ बनाकर उनकी उपासना करने और उनका भय मानने के प्रलोभन का प्रतिरोध करना होगा।
केवल परमेश्वर से डरें
सुलैमान ने अपने पुत्रों को लिखा, “मनुष्य का भय खाना फन्दा हो जाता है, परन्तु जो यहोवा पर भरोसा रखता है उसका स्थान ऊँचा किया जाएगा” (नीतिवचन 29:25)। फन्दा एक ऐसा यन्त्र होता है जिसे जंगलों में धरती के अन्दर छिपा कर रखा जाता है, ताकि वहाँ से जाने वाले किसी असावधान जानवर को उसके पाँव से पकड़ ले। इस रूपक का प्रयोग दिखाता है कि मनुष्य का भय चालाकी से कार्य करता है। अन्य पापों के विपरीत जो स्वयँ को स्पष्ट प्रकट कर देते हैं, मनुष्य का भय हमेशा ही हम पर प्रकट नहीं होता है। वास्तव में, मैं तो यह तर्क दूँगा कि मनुष्य का भय, इसे बारे में लोगों की समझ से भी कहीं अधिक मित्रताओं को बिगाड़ देता है। बहुत ही कम लोग होते हैं जो इसे आता हुआ देखते हैं, या घटित हो जाने बाद इसे समझ पाते हैं।
आप के चरम स्नेह और भरोसा, आप के मित्रों पर रखने के लिये नहीं हैं। बल्कि, आप को प्रभु पर भरोसा रखना चाहिये। क्यों? क्योंकि सुलैमान कहता है कि सुरक्षा उसी में है। वह सारा टूटापन और दुःख जो आप लिये फिरते हैं, वे सारे उलझाने वाले पाप, आप जितना भी अकेलापन अनुभव करते हैं। मित्र सहायता कर सकते हैं, परन्तु केवल परमेश्वर ही ठीक कर सकता है। मित्र सेवा कर सकते हैं, परन्तु केवल परमेश्वर ही बचा सकता है। मित्र प्रोत्साहित कर सकते हैं, परन्तु केवल परमेश्वर ही आप की परेशानी का अन्त कर सकता है।
मित्रता तब अधिक सुरक्षित होती है जब आप परमेश्वर पर भरोसा करते हैं, न कि मनुष्यों पर, कि क्या वह आप को स्वीकार करेंगे, आप से प्रेम करेंगे, आप की देखभाल करेंगे, या आप को पूर्ण करेंगे। मनुष्य से मत डरें। परमेश्वर पर भरोसा रखिये।
आप जिन से डरते हैं उनसे प्रेम नहीं कर सकते हैं
हाल ही में मुझे मनुष्यों से डरने का सामना करना पड़ा था—विशेषकर स्वीकार किए जाने या आदर दिए जाने डर के साथ। मेरे लिये यह बारम्बार आने वाली चुनौती और ठोकर देने वाला पाप है। मैंने एक मित्र और परामर्शदाता की सहायता ली, और उसने मुझे वही बताया, जो मैं पहले से जानता था, परन्तु उस पल में उसका कहा हुआ बहुत सहायक था: “यदि आप लोगों से डरते हैं, तो आप उन से प्रेम नहीं कर सकते हैं। यदि आप उन से डरते हैं, तो आप केवल अपने लाभ के लिये उन का उपयोग कर सकेंगे।” मेरे भाई की बुद्धिमानी कितनी सच है।
इसका गणित इस प्रकार से कार्य करता है। यदि आप को डर रहता है कि आप को अपने मित्रों से कुछ अपेक्षित नहीं मिलेगा, तो निश्चित है कि आप अपना समय और ऊर्जा उनसे प्राप्त करने में लगाएँगे, न कि उन्हें देने में। यहाँ तक कि वे शब्द और कार्य भी, जो सेवा के समान प्रतीत होते हैं, प्रत्युत्तर में कुछ प्राप्त कर लेने के लिये किये जाएँगे। हम उस क्रिया को क्या कहते हैं जो व्यक्तिगत लाभ के लिये एक विशिष्ट प्रत्युत्तर प्राप्त करने के उद्देश्य से की जाती है? हम उसे चालाकी से उपयोग करना कहते हैं। जब आप अपने मित्रों से डरते हैं, तब आप चालाकी से उनका उपयोग करते हैं कि उनसे वह प्राप्त कर सकें, जो आप को लगता है कि आप को उन से चाहिये।
परन्तु जब आप केवल परमेश्वर से डरते हैं, तब आप अपने मित्रों से प्रेम करने और उनकी सेवा करने के लिये स्वतन्त्र रहते हैं, यह जानते हुए कि आप को मिलने वाला सर्वोच्च लाभ मसीह में है, न कि मनुष्य में। यदि आप मनुष्य के डर के साथ संघर्ष करते हैं, तो आप को इसके बारे में अपने मित्रों के साथ खुला होने पर विचार करना चाहिये, और इसे अपने मित्रों के सामने मान लेना चाहिये। अपनी बात कुछ इस प्रकार से कहिये, “अरे भाई (या बहन), मुझे यह स्वीकार करना है कि कुछ समय से मुझे आप मेरे बारे में जो सोचते हैं, उससे अधिक डर लगता है, न कि उससे जो परमेश्वर सोचता है। आप के प्रति मेरे शब्द और कार्य अधिकांशतः स्वार्थ से प्रेरित रहे हैं, और इस कारण से मैं परमेश्वर तथा आप से अपने प्रेम के कारण आप की सेवा करने में असफल रहा हूँ। कृपया मुझे इसके लिए क्षमा कर दें और प्रार्थना करें कि परमेश्वर अपनी महिमा और हमारी मित्रता के लिये, इस डर से बाहर निकलने में मेरी सहायता करे।” हो सकता है कि इस प्रकार का अंगीकार वह बात हो जिस की आप को आवश्यकता है कि आप मनुष्यों से डरें कम, ताकि उन से और अधिक प्रेम कर सकें। मनुष्य का डर आप की मित्रता के लिये हानिकारक है, परन्तु जब आप परमेश्वर से डरते हैं तथा औरों से प्रेम करते हैं, तब आप (और आप की मित्रता) सुरक्षित हैं। इसलिये, जब आप इस मार्गदर्शिका में दिए गये सिद्धान्तों को, मित्र प्राप्त करने के लिये लागू करते हैं, तब मित्रता की भलाई को परिप्रेक्ष्य में अवश्य ही रखें। नि:सन्देह उन की कीमत बहुत अधिक है, परन्तु उन का स्थान सर्वोच्च नहीं है। केवल परमेश्वर ही आप के लिये सब कुछ हो सकता है।
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मनन के लिए प्रश्न:
- क्या कभी आप अपने मित्रों से डरे हैं? वह अनुभव कैसा था?
- हमें केवल परमेश्वर से ही क्यों डरना चाहिये?
- मनुष्य से डरने का, उन से प्रेम करने और उन की सेवा करने से क्या सम्बन्ध है?
- हमारे मित्रों से डरने के कुछ अनुचित तरीके क्या हो सकते हैं?
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निष्कर्ष
आप को आरम्भ में उल्लेख किये गए, प्राथमिक स्कूल का मेरा मित्र, नील, याद है? अभी भी मैं कभी-कभी उसके बारे में सोचता हूँ। यह वह बात है जो मैंने आरम्भ में, बात आरम्भ करते हुए आप को नहीं बताई थी—सम्भवतः वह सही था कि वह अब और मेरा मित्र नहीं रहना चाहता था। सच तो यह है कि मैं उसका अच्छा मित्र नहीं था। मैंने उससे प्रेम करना और उसकी सेवा करने का कभी प्रयास नहीं किया। बल्कि, मुझे इस बात से डर लगता था, कि वह मेरे बारे में क्या सोचता होगा। इसलिये, मैं हमारी मित्रता में बहुत नाटक ले आया था, और अन्ततः यह सहन करना उस के लिये बहुत कठिन हो गया, और वह अलग हो गया। मैं एक बुरा मित्र था।
परमेश्वर के अनुग्रह से मैं हमारे प्राथमिक स्कूल के दिनों की अपेक्षा अब काफी परिपक्व हो गया हूँ। मैं अभी भी असिद्ध (और कभी-कभी बुरा) मित्र हूँ। परन्तु मेरी इच्छा है कि मैं इन सिद्धान्तों को अपने जीवन में लागू करने के द्वारा, जिन्हें मैंने इस जीवन कौशल मार्गदर्शिका में आप के साथ साझा किया है, एक बेहतर मित्र बन सकूँ। मेरी प्रार्थना है कि न केवल मैं बढ़ कर और भी अच्छा मित्र बनूँ, परन्तु आप भी बनें। मेरी यह प्रार्थना भी है कि प्रभु आप को बहुतायत से अनेकों धर्मी मित्र प्रदान करे और आप के जीवन मार्ग में आप को प्रोत्साहित रखे।
अंतिम टिप्पणियाँ
1. यह एक विरोधाभास के समान प्रतीत हो सकता है, परन्तु यह ध्यान करना महत्वपूर्ण है कि यदा-कदा ऐसे समय आ सकते हैं जब आप एक वफादार मित्र नहीं हो सकते हैं, क्योंकि उस समय वफादारी आप को, या आप के मित्र को किसी प्रकार के जोखिम में डाल सकती है। यद्यपि वफादारी ऐसा मूल्य है जिसे हमें पकड़े रहना है, परन्तु यही एकमात्र मूल्य नहीं है। यह जानने के लिये कि क्या किसी के प्रति आप की वफादारी अपने अन्त तक पहुँच गई है, अपने पास्टर या किसी भरोसेमन्द परामर्शदाता से सहायता प्राप्त कीजिये।
2. https://www.capitolhillbaptist.org/about-us/what-we-believe/church-covenant/
लेखक के बारे में
CHRISTIAN LINGUA टीम विश्व की सबसे बड़ी मसीही अनुवाद एजेंसी है, जो विश्वभर में वीडियो, ऑडियो और मीडिया परियोजनाओं के लिए अनुवाद और ओवरडब सेवाएँ प्रदान करती है।
विषयसूची
- भाग I: बुरा मित्र होना क्या होता है?
- स्वार्थी मित्र
- मूर्ख मित्र
- क्रोधित मित्र
- यदि अभी, मेरे मित्र बुरे हैं, तो मुझे क्या करना चाहिये?
- मनन के लिए प्रश्न:
- भाग II: अच्छा मित्र होना क्या होता है?
- एक वफादार मित्र
- एक ईमानदार मित्र
- एक प्रेम करने वाला मित्र
- मनन के लिए प्रश्न:
- भाग III: मित्र कैसे खोजें
- 1. प्रार्थना करें
- 2. कलीसिया में जाएँ!
- 3. खुले होने के लिए तैयार रहें और पहल कर के भरोसा करें
- 4. पहल करें
- मनन के लिए प्रश्न:
- भाग IV: अपने मित्रों से डरें नहीं
- केवल परमेश्वर से डरें
- आप जिन से डरते हैं उनसे प्रेम नहीं कर सकते हैं
- मनन के लिए प्रश्न:
- निष्कर्ष
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