#22 बुलाहट: कार्यस्थल पर परमेश्वर की महिमा करने के लिए एक व्यावहारिक मार्गदर्शिका
परिचय
दो बिलकुल अलग समूहों के लोगों के पास, जो कि सोलहवीं शताब्दी के सुधारक और देशी-संगीत के गायक हैं, काम के बारे में कहने के लिए कुछ अत्यन्त रोचक बातें हैं। सन् 1980 में आया डॉली पार्टन का गीत और फिल्म “9 से 5” को कौन भूल सकता है? उस गीत के बोलों में, वह बस एक बेहतर जीवन के सपने देख सकती है। अभी के लिए वह बस दिन-रात-आने-जाने के काम का रोना रोती है। आज 9 से 5 है, कल 9 से 5 है, और 9 से 5 वाले दिनों के आगे सप्ताह, महीने, वर्ष और दशक हैं। और इतने प्रयास के बावजूद, पार्टन इस बात का रोना रोती है कि वह “कठिनाई से गुजारा कर पा रही है।”
या फिर एलन जैक्सन का गीत “अच्छा समय” है। आप उसकी आवाज में थकान को सुन सकते हैं, जब वह पीड़ा से भरकर कहता है कि, “काम, काम, पूरे सप्ताह काम।” सप्ताह का अन्त ही उसके लिए एकमात्र चमकता हुआ उजियाला है। काम से मुक्ति, मालिक से मुक्ति, समय की घड़ी से मुक्ति इत्यादि। जब शुक्रवार को काम छोड़ने का समय होता है, तो वह एक “अच्छा समय” बिता सकता है। वह इसके लिए इतना तरसता है कि वह “अच्छा” और “समय” शब्दों का संधि विच्छेद भी करता है।
जब से काम हो रहा है, तब से काम के गीत भी आते रहते हैं। दास आत्मिक गीतों में काम की कठिनाइयों के बारे में गाते थे। बीसवीं शताब्दी के मोड़ पर, रेलवे के काम करने वाले दल या कपास चुनने वाले बटाईदार क्रूर और निर्मम परिस्थितियों से बचने के साधन के रूप में एक-दूसरे के लिए “काम के नारे” गाकर समय बिताते थे। और वह धुन आज भी जारी है। न केवल देशी संगीत में, बल्कि अमेरिकी संगीत की लगभग सभी अन्य शैलियों में, काम को बुरा माना जाता है।
सप्ताहों के अन्त में आने वाली अस्थायी राहत, छुट्टियों के अनमोल और बहुत कम सप्ताह, तथा सेवानिवृत्ति के क्षणभंगुर वर्षों के साथ कार्य के सप्ताह को तो सहना ही पड़ता है। हममें से बहुत कम लोग काम में संतुष्टि पाते हैं, गरिमा की तो बात ही छोड़ दें।
पिछले कुछ वर्षों में काम करना और अधिक जटिल हो गया है। कोविड ने काम करने के मामले में सब कुछ बदल दिया। सन् 2020 की वसंत ऋतु में, सब कुछ रुक गया और कई लोगों के लिए, काम रुक गया। पर कुछ व्यवसाय फिर से चल पड़े। अन्य विलुप्त हो गए। कुछ अभी भी अपने पाँव जमाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। दूरस्थ कार्य आया, और इसके साथ जीवन की लय एवं अनुभवों के लिए अधिक उपलब्ध होने की एक नयी प्रसन्नता मिली। कार्य और जीवन के संतुलन का प्रश्न पहले जैसा मार्मिक नहीं रहा। कुछ लोगों ने हमेशा के लिए 40-50 घण्टे के कार्य सप्ताह से दूरी बना ली है।
कुछ और भी घटित हुआ। नये और उभरते हुए कार्यबल, अर्थात् 18-28 वर्ष के युवाओं को एक डरावने नये संसार का सामना करना पड़ा। वॉल स्ट्रीट जर्नल ने भविष्य के रोजगार और आर्थिक सम्भावनाओं को लेकर भारी निराशा का समाचार दिया है। इस आयु वर्ग के एक बड़े हिस्से का मानना है कि वे आर्थिक रूप से अपने माता-पिता से बेहतर नहीं कर पाएँगे। कई पीढ़ियों से पश्चिमी संस्कृति की पहचान रही उन्नति की आशा, उभरते हुए लोगों की दृष्टि में धूमिल होती जा रही है। यह सारी निराशा अपने साथ अभूतपूर्व स्तर की चिन्ता, अवसाद और मानसिक बीमारियों का एक दु: खद सिलसिला लेकर आती है।
और फिर आता है ए.आई., जो सफेद कॉलर वाली नौकरियों के संसार के साथ वही करने का जोखिम उत्पन्न करता है, जो मशीनों और रोबोटों ने नीली कॉलर वाली नौकरियों के साथ किया था।
जब इस नये संसार के और भी डरावने गलियारे अपने आप को प्रकट करते हैं, तो हर दिन हमें और भी भयावह समाचार सुनने को मिलते हैं। मध्य पूर्व और पूर्वी यूरोप में क्षेत्रीय युद्धों का कोई अन्त दिखाई नहीं देता। क्या कोई आर्थिक पतन आने वाला है? क्या हम अमेरिकी साम्राज्य के धूमिल हो जाने के गवाह हैं?
परन्तु देशी गायकों, कोविड के बाद की बेचैनी, भयावह आर्थिक और राजनीतिक पूर्वानुमानों, और अगली बड़ी तकनीकी खोज के लगातार बदलते परिदृश्य के साथ, एक विचित्र और अप्रत्याशित समूह भी खड़ा हुआ है, जिसके पास काम के विषय पर कहने के लिए कुछ है। यह समूह सोलहवीं शताब्दी के प्रोटेस्टेंट सुधारकों का है। मानो या न मानो, उनके पास काम के बारे में कहने के लिए बहुत कुछ है। असल में, वे काम के लिए एक अलग शब्द पसन्द करते हैं। वे इसे वोकेशन कहते हैं। इस शब्द का अर्थ है “बुलाहट”, जो तुरन्त ही काम की अवधारणा को उद्देश्य, अर्थ, पूर्णता, गरिमा, और यहाँ तक कि संतोष और प्रसन्नता से भर देता है।
क्या आप निराशा, अवसाद, चिन्ता, या फिर अव्यवस्था से ग्रस्त हैं? तो बुलाहट की ओर जाएँ। जैसा कि यह क्षेत्रीय मार्गदर्शिका प्रदर्शित करेगी, मसीहियों को काम के बारे में एक क्रांतिकारी, एक परिवर्तनकारी तरीके से सोचने के लिए प्रतिबद्ध होना चाहिए। हमें अभी भी वेतन के भुगतानों और आर्थिक रुझानों और पूर्वानुमानों की चिन्ता करने की आवश्यकता है, परन्तु हम उस तूफानी समुद्र का सामना करने के लिए जिसमें हम सभी को फेंक दिया गया है, एक लंगर ढूँढ़ सकते हैं।
सुधारकों के हाथों में, काम का रूपांतरण होता है, या उसे उस स्थान और स्थिति में फिर से आकार दिया जाता है, जहाँ परमेश्वर ने उसके होने की मंशा की थी।
काम से सम्बन्धित सांस्कृतिक माहौल को देखते हुए, उस पर कुछ ऐतिहासिक, ईश-वैज्ञानिक और बाइबल आधारित चिन्तन हमारे लिए उपयोगी होंगे। घण्टों, सप्ताहों, महीनों और वर्षों को जोड़िए। काम हमारे जीवनों का सबसे बड़ा हिस्सा है। शुभ समाचार यह है कि: जब काम की बात आती है, तो परमेश्वर ने हमें अंधियारे में नहीं छोड़ा है। उसने हमें अपने वचन के पन्नों में बहुत कुछ सिखाया है।
जब काम की बात आती है, तो कई लोगों के लिए, डॉली पार्टन की यह पंक्ति बिलकुल सच साबित होती है कि हम “मालिक की सीढ़ी पर बस एक पायदान पर हैं।” यह कितनी दु: खद बात है, जब भजनकार की एक पंक्ति एक बिलकुल अलग धारणा की घोषणा करती है: “हमारे परमेश्वर यहोवा की मनोहरता हम पर प्रकट हो, तू हमारे हाथों का काम हमारे लिए दृढ़ कर, हमारे हाथों के काम को दृढ़ कर” (भज. 90:17)। कल्पना करें कि जिस परमेश्वर ने सभी वस्तुओं की रचना की है, वह हमारे निर्बल हाथों के काम की बहुत चिन्ता करता है।
यह उस कार्य का दर्शन है, जिसे हम सभी चाहते हैं। हम सभी काम करते हुए परमेश्वर की महिमा करना चाहते हैं — और केवल काम से छुट्टी के समय परमेश्वर की महिमा करने के लिए काम को एक साधन के रूप में उपयोग करना नहीं चाहते हैं। और ऐसा होना सम्भव है।
अब लातीनी भाषा के पाठ का समय है। जैसा कि बताया गया है, अंग्रेजी भाषा का शब्द “वोकेशन” (vocation) लातीनी भाषा के शब्द “वोकाटियो” या क्रिया रूप में “वोकेरे” से आया है। इसके मूल का अर्थ “बुलाहट” है। ऐसा प्रतीत होता है कि विलियम टिंडेल ने बाइबल के अपने अंग्रेजी भाषा के अनुवाद में पहली बार इस शब्द का अंग्रेजी भाषा में उपयोग किया था। टिंडेल ने बस लातीनी भाषा के शब्द को सीधे-सीधे अंग्रेजी भाषा में ला दिया।
ऑडियो मार्गदर्शिका
ऑडियो#22 बुलाहट: कार्यस्थल पर परमेश्वर की महिमा करने के लिए एक व्यावहारिक मार्गदर्शिका
1 सोली देओ ग्लोरिया
इस लातीनी भाषा के शब्द “वोकाटियो” का एक तकनीकी और विशिष्ट अर्थ था। लूथर के समय तक, यह शब्द केवल और विशेष रूप से कलीसिया के काम पर लागू होता था। याजक, भक्तिन, भिक्षु — सभी के पास एक बुलाहट थी। मध्ययुगीन संस्कृति में बाकी सब लोग, व्यापारियों से लेकर किसानों तक, कुलीनों से लेकर शूरवीरों तक, बस काम ही करते थे। वे सूर्य-घड़ी पर छाया को घूमते हुए देखते थे और घण्टों के बीतने की प्रतीक्षा करते थे।
हालाँकि, मध्य युग में, ऐसा हमेशा नहीं था। विशेष रूप से मठवाद के आरम्भिक दिनों में और कई मठवासी सम्प्रदायों में, काम को सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था। ओरा एट लाबोरा (Ora et Labora) उनका आदर्श वाक्य था। इस वाक्यांश का अनुवादित अर्थ है, “प्रार्थना करो और काम करो।” भिक्षु यह भी जानते थे कि काम के बाद अपने आप को कैसे पुरस्कृत किया जाए। अन्य वस्तुओं के अतिरिक्त, उन्होंने एक प्रकार की प्रार्थना रोटी प्रेट्ज़ेल (pretzel) का आविष्कार किया, जो एक लातीनी भाषा के शब्द से आया है, जिसका अर्थ है “उपहार”, और विशेष रूप से कहें तो “छोटा उपहार”। प्रेट्ज़ेल छोटे-छोटे पुरस्कार होते थे, जिनका भिक्षु आनन्द लिया करते थे और कठिन काम या दासों वाला परिश्रम पूरा होने के बाद बच्चों को दिया करते थे। कर्तव्यों के पूरा होने के बाद यह पुरस्कार मिलता था। ये भिक्षु काम को महत्व देते थे और खेल व फुर्सत को भी महत्व देते थे। इनमें से कई भिक्षुओं ने काम को परमेश्वर के अनुग्रहकारी हाथों से मिले अच्छे वरदानों में से एक माना। उन्होंने शैंपेन का भी आविष्कार किया। और, जबकि उन्होंने बीयर का आविष्कार नहीं किया था — क्योंकि उसका अविष्कार प्राचीन सुमेरियों ने किया था — परन्तु उन्होंने बीयर के विकास को निश्चित रूप से आगे बढ़ाया। यह अच्छी तरह से किए गए कड़े परिश्रम के लिए एक तरल पुरस्कार था।
परन्तु मध्य युग की अन्तिम शताब्दियों तक, लगभग सन् 1200 से 1500 की शताब्दियों तक, काम करने का चलन कम हो गया था। इसे एक तुच्छ बात, अर्थात् केवल समय खर्च करने के रूप में देखा जाने लगा। जिन लोगों को बुलाहट मिली थी, वे पूरी तरह से कलीसिया की प्रत्यक्ष सेवा में लगे हुए थे। बाकी सभी काम अधिक से अधिक मालूमी थे, और वे निश्चित रूप से परमेश्वर की महिमा के लिए किए जाने वाले काम के रूप में योग्य नहीं थे। आप उससे जूझते रहते थे।
फिर सोलहवीं शताब्दी के सुधारक आए। उन सुधारकों ने उत्तर मध्ययुगीन रोमन कैथोलिकवाद की कई प्रथाओं और मान्यताओं को चुनौती दी। यहाँ हम उस सुधार के पाँच सोलाओं को प्रस्तुत करते हैं:
सोला स्क्रिप्चरा केवल पवित्रशास्त्र
सोला ग्राटिया केवल अनुग्रह
सोला फिडा केवल विश्वास
सोलस क्राइस्टस केवल मसीह
सोली देओ ग्लोरिया केवल परमेश्वर की महिमा के लिए
यह अन्तिम, सोली देओ ग्लोरिया, कार्य और बुलाहट की हमारी चर्चा में महत्वपूर्ण कारक है। इसी विचार को आगे बढ़ाते हुए, मार्टिन लूथर ने “बुलाहट” शब्द में नया प्राण डाल दिया। उन्होंने इस शब्द को जीवनसाथी, माता-पिता या सन्तान होने के लिए लागू किया। उन्होंने इस शब्द को विभिन्न व्यवसायों पर लागू किया।
माना कि सन् 1500 की शताब्दी में ये व्यवसाय सीमित थे और आज के समय की विशेषज्ञताओं के समीप भी नहीं थे। परन्तु चिकित्सक, वकील, व्यापारी — ये सभी वोकेशन थे, बुलाहटें थीं (एक व्यवसाय जिसकी लूथर अधिक परवाह नहीं करते थे, वह बैंकिंग था, परन्तु यह बात हम किसी और समय करेंगे)। लूथर ने “वोकेशन” शब्द का उपयोग खेती करने वाले वर्ग, किसानों और सेवकों के काम पर भी किया। लूथर के लिए, सभी कार्य और हमारे द्वारा निभाई जाने वाली सभी भूमिकाएँ सम्भावित रूप से पवित्र बुलाहटें थीं, जिन्हें केवल परमेश्वर की महिमा के लिए ही पूरा किया जा सकता था।
कुछ पीढ़ियों के बाद, एक अन्य जर्मन लूथरन, जोहान सेबेस्टियन बाख़ ने लूथर की शिक्षाओं को बढ़िया तरीके से चित्रित किया। चाहे बाख़ कलीसिया की आज्ञा से और कलीसिया के लिए या किसी अन्य उद्देश्य के लिए संगीत लिख रहे हों, परन्तु उन्होंने अपने सभी संगीत पर दो प्रकार के आद्याक्षरों के समूह लिखे: एक उनके नाम के लिए, और दूसरा, “एस.डी.जी.”, सोली देओ ग्लोरिया के लिए। सभी कार्य — केवल कलीसिया की सेवा में किया गया कार्य नहीं, बल्कि सभी प्रकार के कार्य — एक बुलाहट थी। हम सभी कार्य के द्वारा परमेश्वर की महिमा कर सकते हैं।
मसीही मान्यताओं और प्रथाओं में सुधारकों के अनेक योगदानों के लिए हम उनके प्रति अत्यन्त आभारी हो सकते हैं। इस सूची में सबसे ऊपर “वोकेशन” शब्द को पुनर्स्थापित करने में उनका योगदान होना चाहिए। अपनी पुस्तक “द कॉल” (The Call) में, ओस गिनीज़ “बुलाहट” का अर्थ इस प्रकार बताते हैं कि “हर कोई, हर जगह, और हर वस्तु में, परमेश्वर की बुलाहट के प्रत्युत्तर में अपना पूरा जीवन जीता है।” हालाँकि, वे तुरन्त बताते हैं कि यह समग्र और व्यापक दृष्टिकोण अक्सर विकृत हो जाता है। लूथर से पहले का समय विकृति के ऐसे ही उदाहरणों में से एक था। परन्तु जैसा कि लेखक गिनीज़ यह भी बताते हैं कि विकृति अन्य समयों और स्थानों पर भी आती है।
समकालीन सुसमाचार प्रचार-कार्य के कुछ हिस्से बुलाहट को केवल कलीसिया के कार्य तक ही सीमित रखते हैं। मुझे याद है कि कॉलेज के दौरान, मैं जवानों की सेवकाई के एक कार्यक्रम में प्रशिक्षण ले रहा था। और एक वयस्क सहायक अगुवे ने मुझसे कहा कि जो मैं कर रहा था, काश उसे वह भी कर पाता। अर्थात् जैसा कि उसने कहना जारी रखा कि वह सेमिनरी जाकर “पूर्णकालिक मसीही कार्य” के जीवन की तैयारी कर पाता। मुझे याद है कि मैं यह सोच रहा था कि यदि वह अपने जीवन और कार्य के बारे में एक अलग दृष्टिकोण रखे तो उसे कितना लाभ मिलेगा। वह उस राज्य का एक गुप्त पुलिस अधिकारी था — जिससे किशोरों के बीच उसकी “बढ़िया छवि” बहुत बढ़ गई थी। वह एक पति और तीन बेटियों का पिता था, और कलीसिया में एक सक्रिय अगुवा था। उसका प्रभाव बहुत बड़ा था, फिर भी उसे यह सोचने की स्थिति में रखा गया था कि वह किसी कमतर वस्तु से संतुष्ट हो रहा है, अर्थात् उसका काम उतना महत्वपूर्ण नहीं है, जितना मेरा भविष्य का काम होगा।
मुझे लगता है कि इस कहानी को दु: खद बनाने वाली बात यह है कि यह कोई अकेली कहानी नहीं है। बहुत से लोग, अर्थात् बहुत सारे लोग, अपने काम के बारे में ऐसा ही महसूस करते हैं। जिसे बुलाहट मिली है, उसके पास उस काम के बारे में एक अलग दृष्टिकोण है। बुलाहट को सही ढंग से समझना ही वह दृष्टिकोण प्रदान कर सकता है, जिसकी हमें आवश्यकता है।
सुधारकों ने बुलाहट पर बाइबल कीआधारित शिक्षा को फिर से स्थापित करके हमारी बहुत बड़ी सेवा की। आइए देखें कि बाइबल इस विषय पर क्या कहती है।
चर्चा एवं मनन:
- यदि आप अपने काम को सुधारकों की समझ में एक बुलाहट के रूप में देखें, तो अपने काम के प्रति आपका दृष्टिकोण कैसे बदल सकता है?
- आप अपने वर्तमान कार्य से, चाहे वह एक छात्र, माता-पिता, कर्मचारी, आदि के रूप में हो, परमेश्वर की महिमा कैसे कर सकते हैं?
2 वाटिका में काम करना
काम पर बाइबल आधारित शिक्षा को सबसे पहले आरम्भ में ही देखा जा सकता है। ईश-वैज्ञानिकों ने उत्पत्ति 1:26-28 को सांस्कृतिक आदेश के रूप में संदर्भित किया है। स्वरूप-धारकों के रूप में, हमें पृथ्वी पर प्रभुता करने और उसे वश में रखने का कार्य सौंपा गया है। इस पाठ को सर्वोत्तम रूप से कैसे समझा जाए, इस बारे में बहुत कुछ कहा गया है। पहली चुनौती परमेश्वर के स्वरूप के विचार को समझना है। कुछ लोगों ने बताया है कि इसे मूलरूप से समझा जाना चाहिए। परमेश्वर का स्वरूप हमारे सार — हमारे अस्तित्व — का हिस्सा है और मनुष्य होने के रूप में परमेश्वर का यह स्वरूप हमें बाकी सृजित प्राणियों से अलग करता है। यह जीवन की गरिमा, यहाँ तक कि पवित्रता का स्रोत है।
अन्य लोग यह विचार प्रस्तुत करते हैं कि परमेश्वर का स्वरूप कार्यात्मक है। अन्य प्राचीन निकट पूर्वी संस्कृतियों में समान विचारों को बताते हुए, इस दृष्टिकोण को मानने वाले लोग बताते हैं कि उस स्वरूप का उल्लेख पृथ्वी पर प्रभुता करने और उसे वश में रखने की आज्ञाओं के बीच में आता है। वे आगे बताते हैं कि अन्य प्राचीन निकट पूर्वी संस्कृतियों और धार्मिक ग्रंथों में, राजाओं को पृथ्वी पर अपने देवताओं की छवि अर्थात् स्वरूप-धारक के रूप में सम्मानित किया जाता था, कि वे उन देवताओं के कर्तव्यों का पालन करें। इसका वर्णन करने के लिए प्रयुक्त शब्द उप-शासक है — वे राजा उप-शासक थे।
उत्पत्ति में सृष्टि के वृत्तांत में, इस विचार को काफी संशोधित किया गया है। केवल एक राजा ही उप-शासक नहीं है। इसके बजाय, समस्त मानवता, पुरुष और स्त्री दोनों (उत्प. 1:27), सामूहिक रूप से उप-शासक के रूप में कार्य कर रहे हैं। यह देखना रोचक बात है कि पवित्रशास्त्र के पन्नों में इस विषय को कैसे विकसित किया गया है। जब हम प्रकाशितवाक्य 22 अध्याय में इस कहानी के अन्त तक पहुँचते हैं, तो हम पाते हैं कि हम नये आकाश और नयी पृथ्वी में हैं, और प्रकाशितवाक्य 22:2 में दिया गया वर्णन बहुत कुछ अदन की वाटिका जैसा प्रतीत होता है। फिर हम प्रकाशितवाक्य 22:5 में पढ़ते हैं कि हम परमेश्वर और मेम्ने के साथ “युगानुयुग राज्य करेंगे।” जिस परम उद्देश्य के लिए हमें रचा गया था, वह पूरा हो चुका होगा; हम परमेश्वर के साथ उसके राज्य में शासन करेंगे।
जबकि हम आने वाले उत्सव की लालसा कर रहे हैं, परन्तु अभी हम इसी संसार में काम कर रहे हैं। हमें उत्पत्ति 3 अध्याय पर लौटकर देखना होगा कि परमेश्वर के स्वरूप का क्या होता है और उसके स्वरूप-धारकों को क्या परिणाम मिलते हैं। उत्पत्ति 3 अध्याय में आदम का पतन वास्तव में हम सभी का पतन है। इसका प्रभाव उन बन्धनों को तोड़ने का प्रभाव है, जो हमें परमेश्वर से बाँधते हैं, और उन बन्धनों को भी हानि पहुँचाने की तो क्या ही बात करें, जो हमें एक-दूसरे से और धरती से — अर्थात् स्वयं इस पृथ्वी से — बाँधते हैं (उत्प. 3:14-19)। उत्पत्ति 3:15 तुरन्त इस त्रासदी का समाधान और उपाय प्रदान करता है। उत्पत्ति 3:15 में प्रतिज्ञा किया हुआ वंश, जो हमारा उद्धारकर्ता मसीह होता है, आदम के किए गए काम को रद्द करता है और हमें परमेश्वर से फिर से जोड़कर राज्य को लाता है, जिसकी परिणति प्रकाशितवाक्य 22:1-5 में वर्णित है।
इस बाइबल आधारित विशाल चित्र का हमारे कार्य से क्या सम्बन्ध है? तो इसका उत्तर है: सब कुछ। सृष्टि, पतन और छुटकारे की यह बाइबल आधारित कथा-रेखा ही वह ईश-वैज्ञानिक ढाँचा है, जिसमें हम जीवन में अपने उद्देश्य को समझना आरम्भ करते हैं। यह वह संदर्भ भी है, जिसके माध्यम से हम कार्य को एक बुलाहट के रूप में समझते हैं। इसके बिना, कार्य केवल कार्य है — अर्थात् केवल समय लगाना है। और इसके बिना, जीवन जीना केवल समय लगाना है।
आदम और हव्वा को दी गई वश में करने और प्रभुता रखने की परमेश्वर की आज्ञा मानवता के लिए उसका सृजनात्मक उद्देश्य है। हम इसे सृष्टि का आदेश या सांस्कृतिक आदेश कहते हैं। परमेश्वर ने स्वयं सृष्टि करते हुए “कार्य” किया — और उसने “विश्राम” भी किया (उत्प. 2:2-3), परन्तु इस पर बाद में और अधिक बात करेंगे। फिर उसने अपनी विशेष सृष्टि को, अर्थात् मानवता को, अपनी सृष्टि को बनाए रखने और विकसित करने का कार्य सौंपा।
आप खेती करना शब्द पर ध्यान दें। यह शब्द मुझे सांस्कृतिक आदेश — अर्थात् पृथ्वी और उसके निवासियों पर प्रभुता करने और वश में करने के आदेश को समझने में सहायक लगता है। ऐसे कई तरीके मौजूद हैं, जिससे कोई व्यक्ति किसी को अपने वश में कर सकता है। आप अधीन करने के लिए पीट-पीटकर वश में कर सकते हैं। परन्तु ऐसा तरीका, आरम्भ में प्रभावी होते हुए भी, उल्टा असर कर सकता है। यह तथ्य शिक्षाप्रद है कि यह आज्ञा एक वाटिका में, अर्थात् अदन की वाटिका में दी गई थी। आप भूमि के किसी टुकड़े को पीट-पीटकर वश में नहीं कर सकते; यह बात मैंने पेंसिल्वेनिया के लैंकेस्टर काउंटी में अपने पूर्व अमिश संप्रदाय के किसान पड़ोसियों से सीखी है। ऐसा लगता था कि वे सड़क के बीचों-बीच फसलें उगा सकते थे। मैंने उनसे सीखा कि आप भूमि के किसी टुकड़े पर खेती करके उसे वश में करते हैं। आप उसे पोषक तत्व देकर, उसे कटाव से बचाकर और कभी-कभार उसे आराम देकर उसकी खेती करते हैं।
इन अमिश किसानों के पास शक्तिशाली भारवाहक घोड़े थे, जो विशालकाय, क्रूर बल वाले मोटे प्राणी थे। वे लोग भारवाहक घोड़ों की एक टोली को द्वारा खींचे जाने वाले हलों पर खड़े होकर अपने खेत जोतते थे। जब ये घोड़े हल से नहीं जुड़े होते थे, तो ये चरागाह में तीन-चार घोड़ों की कतार में खड़े होते थे। ये बिना लगाम के या लगाम के साथ एक साथ चलते थे। उन्हें उत्कृष्ट धावकों की तरह अच्छी तरह से प्रशिक्षित किया गया था। समय के साथ इन्हें वश में किया गया था, और प्रदर्शन के लिए तैयार किया गया था। किसी पर प्रभुता का सर्वोत्तम अभ्यास अधीन करने से नहीं, बल्कि उसे तैयार करने से होता है।
केवल किसान ही परमेश्वर की सृष्टि की खेती नहीं कर सकते। हम सभी कर सकते हैं। असल में, हम सभी को वश में करने और प्रभुता रखने का आदेश दिया गया है। हमें यह समझने की आवश्यकता है कि इस संसार में पाप का पतन और उपस्थिति इस कार्य को कठिन बना देती है। हममें से कोई भी इसे स्वीकार नहीं करना चाहता, परन्तु पाप से कलंकित, स्वरूप-धारी के रूप में अपनी भूमिका में, हम इसे गलत कर सकते हैं। यह एक पतित संसार है — या, जैसा कि डिट्रिच बोन्होफर ने एक बार कहा था, यह एक “पतित-पतनशील संसार” है। और हम पतित-पतनशील प्राणी हैं। परन्तु फिर मसीह में छुटकारे का शुभ समाचार आता है। उसमें, हमारा पतन और हमारी टूटन ठीक हो सकती है। यद्यपि आदम ने इसे गलत किया, और यद्यपि हम इसे गलत करते हैं, तौभी केवल मसीह के माध्यम से ही हम इसे सही कर सकते हैं।
अब हम समझ सकते हैं कि भजनकार परमेश्वर से अपने हाथों के काम को दृढ़ करने के लिए क्यों कहता है (भज. 90:17)। हमारे लिए परमेश्वर की मंशा काम करने की है। उसने हमें काम करने के लिए बनाया है, और अन्त में उसने हमें उसके निमित्त काम करने के लिए बनाया है। आइए हम उस तरह के काम को अनदेखा न करें, जो आदम और हव्वा कर रहे थे। यह पशुओं की देखभाल करने, वाटिका की देखभाल करने — अर्थात् उसके पेड़ों और वनस्पतियों की देखभाल करने शारीरिक परिश्रम था।
जैसे-जैसे मानवता आगे बढ़ी और विकसित हुई, काम का विस्तार होता गया और इसमें कई तरह की बातें शामिल हो गईं। मैं बैठकों में या कीबोर्ड पर टाइप करते हुए कई घण्टे बिताता हूँ — और यह बिलकुल भी उस तरह का काम नहीं है, जिसमें आदम और हव्वा लगे हुए थे। परन्तु हम सभी परमेश्वर के स्वरूप-धारी हैं, जिनका काम उसकी वाटिका के उस विशेष हिस्से की देखभाल करना है, जिसमें उसने हमें रखा है। हम यह काम पतन की वास्तविकताओं के सूर्य की कड़ी धूप के नीचे करते हैं। हम पसीना बहाते हैं और हमें काँटों का सामना करना पड़ता है (यहाँ रूपक सम्बन्धी रूप से, क्या तकनीकी मुद्दों की तुलना काँटों से की जा सकती है?)। परन्तु पसीने और काँटों के बीच, हमें अभी भी काम करने की आज्ञा दी गई है।
यह ईश-वैज्ञानिक ढाँचा काम को समझ के एक बिलकुल नये क्षितिज पर ले जाता है। जब हम इस पर गहराई से विचार करते हैं, तो हम समझने लगते हैं कि हमारा काम उस राजा की सेवा में है, जो काम को एक कर्तव्य और एक अद्भुत सौभाग्य दोनों बनाता है। डॉली पार्टन के गीत की याद दिलाते हुए, हम “मालिक की सीढ़ी” के केवल पहले पायदान नहीं हैं। वरन् हम राजा के स्वरूप-धारी हैं, जो उसकी वाटिका की देखभाल करते हैं।
इसमें एक और बात है। यदि परमेश्वर ने हमें इस तरह बनाया है — और उसने हमें ऐसा ही बनाया है — तो यह समझ में आता है कि जब हम वही कर रहे होते हैं, जिसके लिए परमेश्वर ने हमें बनाया है, तो हम भरपूर, संतुष्ट और प्रसन्न रहेंगे। फिर काम एक कर्तव्य से कहीं बढ़कर हो जाता है; काम वास्तव में आनन्द दे सकता है। यह उतना कठिन परिश्रम नहीं है जितना अक्सर इसे लीपा-पोती करके बनाया जाता है।
मुझे नहीं लगता कि यह आपके कार्यस्थल को प्रेरक नारों से घेरने या दल के खिलाड़ी बनकर आत्म-संतुष्टि पर सेमिनार प्रस्तुत करने वाले गुरुओं के साथ कर्मचारी वाली बैठकें आयोजित करने का प्रश्न है। ये तकनीकें चालाकीपूर्ण हो सकती हैं, जो कर्मचारियों को मोहरा बना देती हैं। या फिर ये स्थायी नहीं, परन्तु अल्पकालिक परिणाम दे सकती हैं। इसके बजाय, यह एक ईश-वैज्ञानिक ढाँचे को अपनाने का मामला है कि परमेश्वर संसार में क्या कर रहा है और आप उस तस्वीर में कैसे उपयुक्त बैठते हैं। और यह उस ईश-वैज्ञानिक ढाँचे को अपने काम में, दिन-रात, हर घण्टे लागू करने का मामला भी है। मसीही जीवन जीना, जिसे ईश-वैज्ञानिक पवित्रीकरण कहते हैं, मन को फिर से नया करने और रूपांतरित करने के बारे में है, जो फिर हमारे व्यवहारों में प्रकट होता है। यह जीवन के सभी क्षेत्रों पर, यहाँ तक कि काम पर भी लागू होता है। हमें अपने काम के बारे में एक फिर से नये और रूपांतरित मन के लिए प्रार्थना करने और उसे तैयार करने की आवश्यकता है।
आइए इसे थोड़ी देर और जारी रखें। आप सुबह 9 बजे से लेकर शाम 5 बजे तक (या जब भी आप काम करते हैं) जो करते हैं, वह आपके मसीही जीवन और आचरण से अलग नहीं है। यह किसी भी तरह से उन बातों के मानदण्डों से बाहर नहीं है, जो सेवा है और जो परमेश्वर को प्रसन्न करती है। आपका काम पूरी तरह से आपकी भक्ति, सेवा और यहाँ तक कि परमेश्वर की आराधना के केन्द्र में है। यहाँ तक कि जो काम अभी अर्थहीन या तुच्छ लगता है, उसका महत्व कहीं अधिक हो सकता है। कई बार ऐसा केवल तथ्यों को देखने के बाद होता है और, जब हम अपने जीवनों पर फिर से विचार करते हैं, तभी हम देख पाते हैं कि परमेश्वर ने हमें और हमारे काम को अपनी महिमा के लिए कैसे उपयोग किया।
इस प्रश्नोत्तरी का उत्तर दें। इसमें केवल एक ही प्रश्न है:
सही या गलत: जो मैं रविवार के दिनों में करता हूँ, केवल उसके बारे में ही परमेश्वर को परवाह है।
हम जानते हैं कि इसका उत्तर गलत है। और सोमवार से लेकर शुक्रवार या शनिवार तक मेरा अधिकांश समय किसमें जाता है? काम में। यदि परमेश्वर को मेरे जीवन के सभी सप्ताहों के सातों दिनों की परवाह है, तो निश्चित रूप से परमेश्वर को मेरे काम की भी परवाह है। अत:, बात यह है:
मेरा काम मेरी बुलाहट का हिस्सा है, मेरी “आत्मिक सेवा” का हिस्सा है (रोमि. 12:1), मेरे जीवन के लक्ष्य और उद्देश्य का हिस्सा है — जिसका अर्थ सम्पूर्ण जीवन से परमेश्वर की आराधना करना है।
यह ईश-वैज्ञानिक ढाँचा तब भी लागू होता है, जब आपका काम किसी ऐसी कम्पनी के लिए हो जो आपको एक ऐसी मशीन की तरह मानती हो, जिससे वह अधिकतम सम्भावित उत्पादकता प्राप्त कर सके। यह उन परिस्थितियों में लागू होता है, जहाँ आपसे ऊपर वालों के पास ऐसा कोई ईश-वैज्ञानिक ढाँचा दूर-दूर तक उपस्थित नहीं होता। यह इसलिए लागू होता है, क्योंकि अन्त में, हम जो कुछ भी करते हैं, उसके लिए हम कम्पनियों या मालिकों के प्रति नहीं — परन्तु परमेश्वर के प्रति जवाबदेह हैं। ब्लूज़ ब्रदर्स ने फिल्म में मजाक में यह कहा था, परन्तु हममें से प्रत्येक व्यक्ति परमेश्वर के द्वारा दिए गए एक मिशन पर है।
कार्य के इस ईश-वैज्ञानिक ढाँचे का एक अन्तिम भाग है, और वह विश्राम से सम्बन्धित है। स्वयं परमेश्वर ने जगत की रचना के लिए छह दिनों तक काम करके और फिर विश्राम करके एक प्रारूप स्थापित किया। परमेश्वर के द्वारा सृष्टि करने के तरीके की बाइबल आधारित शिक्षा का उससे अधिक हमसे सम्बन्ध है। मैं इसे समझाता हूँ। परमेश्वर को सृष्टि करने के लिए छह दिनों की आवश्यकता नहीं थी। वह इसे तुरन्त कर सकता था। और उसे निश्चित रूप से विश्राम करने की आवश्यकता नहीं थी। चूँकि परमेश्वर सर्व-शक्तिमान है, इसलिए सृष्टि के कार्य ने उसकी ऊर्जा का एक कण भी कम नहीं किया।
सृष्टि के वृत्तांत में हमें बड़े अच्छे से हमारे लिए जो एक प्रारूप मिल सकता है, वह काम करने और विश्राम करने का प्रारूप है। परमेश्वर के द्वारा छह दिनों में सृष्टि करने का यह प्रारूप हमें सिखाता है कि कार्यों में समय लगता है। किसान मिट्टी तैयार करते हैं, बीज बोते हैं और फिर लम्बी प्रतीक्षा के बाद कटाई करते हैं। हमारे काम के साथ भी ऐसा ही है। वस्तुओं का निर्माण करने में और उन्हें बनाने में — विशेष रूप से ठोस और सुन्दर वस्तुओं को बनाने में — समय लगता है। परन्तु उसमें विश्राम करने का भी एक प्रारूप है। यह कार्य-दिवस के अन्त में आता है। और यह कार्य-सप्ताह के अन्त में आता है। निर्गमन 20:8-11 में सब्त के दिन की चर्चा सीधे सृष्टि करने के सप्ताह से ली गई है। छह दिन हमें काम करना है और सातवें दिन हमें विश्राम करना है: “क्योंकि छ: दिन में यहोवा ने आकाश, और पृथ्वी, और समुद्र, और जो कुछ उनमें हैं, सब को बनाया, और सातवें दिन विश्राम किया” (निर्ग. 20:11)।
फ्रांसीसी क्रांति के बाद, फ्रांस को उसकी धार्मिक पहचान और परम्परा से मुक्त करने के कार्यक्रम के रूप में, सात-दिवसीय सप्ताह के स्थान पर दस-दिवसीय सप्ताह लागू किया गया। किसी व्यक्ति को कहना चाहिए कि इसे बदलने का प्रयास किया गया, क्योंकि यह असफल रहा था। सब्त के दिन को बदलने के प्रयास का हमारा अपना संस्करण है, जैसा कि 24/7 वाक्यांश में स्पष्ट है। हमारे जुड़े हुए संसार में, हम पूरे दिन, सप्ताह के हर दिन, हमेशा उपलब्ध रहते हैं, हमेशा काम करते रहते हैं। कम से कम, एक मसीही को केवल 24/6 कहने पर विचार करना चाहिए। परमेश्वर ने हमारे लिए विश्राम का एक दिन ठहराया है। हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि हम परमेश्वर से अधिक बुद्धिमान हैं। परन्तु 24/6 कहना भी अतिशयोक्ति हो सकती है। मशीनें चौबीसों घण्टे काम करती हैं। मनुष्य नहीं कर सकते।
कई लोगों ने बताया है कि आजकल के लोग, विशेष रूप से हम में से पश्चिमी संस्कृतियों वाले लोग, अपने काम पर खेलते हैं और अपने खेल पर काम करते हैं। यह एक और तरीका है, जिससे हमने काम और विश्राम के बाइबल आधारित प्रारूप को विकृत कर दिया है। हमने अवकाश का सही अर्थ खो दिया है, और ऐसा सम्भवत: इसलिए है, क्योंकि हमने काम का सही अर्थ खो दिया है।
हमें छह दिन काम और एक दिन विश्राम का प्रारूप देकर, परमेश्वर हमें सीमाएँ स्थापित करना और जीवन की स्वस्थ लय स्थापित करना सिखा रहा है। मेरा एक सहकर्मी हाल ही में हमारे कार्यस्थल से कुछ दूर चला गया। उसे लग रहा था कि इतने पास रहने की वजह से, — वह एक लम्बे दिन बाद, रात में, और सप्ताहांत में भी वहाँ अधिकांश समय बिताता है। उसने और उसके परिवार ने यह कदम इसलिए उठाया जिससे कि, उसके शब्दों में कहें तो, “काम, परिवार के लिए समय और विश्राम के बीच स्वस्थ लय” विकसित हो सके।
हो सकता है कि आपके लिए ऐसे चले जाना बहुत बड़ा कदम हो। परन्तु यहाँ सीखने के लिए एक शिक्षा है। हम 24/7 के द्वारा या “खेल पर काम, और काम पर खेल” जैसे सांस्कृतिक भेदभाव के द्वारा प्रभावित हो सकते हैं, जो हमें परेशान करते हैं। मसीही होने के रूप में हम इन प्रभावों से अछूते नहीं हैं। शनिवार और रविवार को, अथवा अपने जीवनसाथी या परिवार के साथ रात्रिभोज के दौरान स्वयं को अपना ई-मेल देखते हुए पाना, काम के अस्वस्थ प्रारूप का लक्षण हो सकता है। इसके बजाय, हमें उन सीमाओं पर ध्यान देने की आवश्यकता है जो परमेश्वर ने हमारे लिए ठहराई हैं। हमें काम और विश्राम की स्वस्थ लय के साथ तालमेल बैठाने की आवश्यकता है।
यदि आप काम पर हैं, तो काम करें। जब आप काम से दूर हों, तो विश्राम करें तथा अपनी ऊर्जा कहीं और लगाएँ। यह सिद्धान्त आपको एक बेहतर कार्यकर्ता और एक बेहतर मनुष्य बनाएगा। जबकि हो सकता है कि हम इस सिद्धान्त का शत-प्रतिशत पालन कर पाने में सक्षम न हों, तौभी हम सभी इसमें बेहतर कर सकते हैं।
हमें यह पहचानना होगा कि हम परमेश्वर के द्वारा प्रदान किए गए संसाधनों के केवल भण्डारी हैं और यह भी समझना होगा कि हमारा सबसे मूल्यवान संसाधन हमारा समय है। जब हम अपने सम्पूर्ण समय के साथ परमेश्वर का आदर करने की खोज में रहते हैं, तो हम काम पर, विश्राम करते समय और खेलते समय परमेश्वर की महिमा करना सीख सकते हैं। हो सकता है कि हम हमेशा इसे सही से न कर पाएँ। आशा है कि समय के साथ हम समय के अपने भण्डारीपन में परिपक्व होंगे और जीवन भर परमेश्वर की महिमा करेंगे और उनका आनन्द लेंगे।
बाइबल न केवल स्वरूप-धारी के रूप में हमारी भूमिका तथा काम और विश्राम के प्रारूप के रूप में काम की यह व्यापक तस्वीर प्रस्तुत करती है, बल्कि पवित्रशास्त्र हमारे काम के बारे में बहुत सी विशिष्ट जानकारी भी प्रदान करता है। असल में, बाइबल हमें न केवल यह समझने में सहायता करती है कि काम कैसे करना है, बल्कि यह समझने में भी सहायता करती है कि काम कैसे नहीं करना है। परमेश्वर जानता है कि नकारात्मकता कभी-कभी सकारात्मकता की ओर स्पष्ट रूप से हमारा मार्गदर्शन कर सकती है। दूसरे शब्दों में कहें तो यह सीखना कि काम कैसे नहीं करना है, सबसे अच्छा काम करने का तरीका सीखने की दिशा में पहला कदम हो सकता है।
चर्चा एवं मनन:
- आपका वर्तमान कार्य सांस्कृतिक आदेश की अभिव्यक्ति कैसे हो सकता है? यह आपको किन तरीकों से प्रभुता का अभ्यास करने और फल उत्पन्न करने के लिए कहता है?
- अस्वस्थ काम या विश्राम (या उसकी कमी) की आदतों ने आपको किन तरीकों से प्रभावित किया है? आप परमेश्वर की महिमा बढ़ाने के लिए अपना काम करने और विश्राम करने की खोज कैसे कर सकते हैं?
3 काम कैसे न करें
ओलिवर स्टोन की सन् 1987 की फिल्म वॉल स्ट्रीट में, माइकल डगलस के द्वारा अभिनीत निर्दयी निवेशक गॉर्डन गेको, टेल्डर पेपर के शेयरधारकों की वार्षिक बैठक में उनके सामने लालच पर एक भाषण देते हैं। गेको वहाँ अपना अधिग्रहण आरम्भ करने के लिए उपस्थित हैं। “अमेरिका एक दोयम दर्जे की शक्ति बन गया है,” वह लालच को इसका उत्तर बताते हुए साथी निवेशकों से कहते हैं। “किसी बेहतर शब्द के अभाव में, लालच शब्द अच्छा है। लालच करना सही है,” और आगे कहते हैं कि लालच अपने कच्चे और पूर्ण सार में ऊपर की ओर विकासवादी चढ़ाई का प्रतीक है। फिर वह अपनी बात बढ़ाते हुए कहते हैं, “मेरे शब्दों पर ध्यान दें, लालच न केवल टेल्डर पेपर को बचाएगा, बल्कि उस दूसरे खराब संयोजन, यू.एस.ए. को भी बचाएगा।” गॉर्डन गेको का “लालच करना अच्छा है” भाषण न केवल फोर्ब्स पत्रिका के पाठकों के बीच, बल्कि एक अमेरिकी प्रतीक के रूप में संस्कृति के व्यापक दायरे में भी प्रसिद्ध हो गया है। हालाँकि, यह भाषण जीवन की नकल करने वाली कला का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।
सन् 1980 के दशक में बन्दी बनाए गए कुछ उच्च-स्तरीय व्यावसायिक लुटेरों में से कोई भी इस किरदार के लिए प्रेरणा और आदर्श बन सकता था। परन्तु यह इवान बोएस्की ही थे, जिन्होंने सन् 1986 में कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी-बर्कले स्कूल ऑफ बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन में एक दीक्षांत भाषण दिया था और भावी स्नातकों से कहा था कि “लालच करना बिलकुल सही है,” और आगे कहा था, “लालच करना स्वस्थ बात है।” अगले वर्ष, वॉल स्ट्रीट के प्रदर्शित होने के ठीक बाद, बोएस्की को फेडरल जेल में साढ़े तीन वर्ष की सजा सुनाई गई और 10 करोड़ डॉलर का जुर्माना लगाया गया।
काल्पनिक गेको और वास्तविक जीवन के बोएस्की जैसे स्पष्ट उदाहरणों के साथ समस्या यह है कि वे उस कम स्पष्ट और कम ज्वलंत लालच को छिपाते हैं, जिसे हम सभी में कम से कम कभी न कभी, और हममें से अधिकांश में उससे कहीं अधिक बार काम करता है, जितना हम स्वीकार करना चाहते हैं। इसमें कोई सन्देह नहीं कि लालच और महत्वाकांक्षा में अन्तर होता है। महत्वाकांक्षा एक भली बात हो सकती है। नियोक्ता महत्वाकांक्षी कर्मचारियों को पसन्द करते हैं। शिक्षक महत्वाकांक्षी छात्रों को पसन्द करते हैं। माता-पिता महत्वाकांक्षी बच्चों को पसन्द करते हैं। और पास्टर महत्वाकांक्षी विश्वासियों के समूह को पसन्द करते हैं। एक अतिरिक्त टिप्पणी के रूप में, यह एक ब्रिटिश पास्टर थे, जिन्होंने हमें यह समझने में सहायता की कि हिन्दी भाषा का यह शब्द महत्वाकांक्षा एक भली बात हो सकता है। चार्ल्स स्पर्जन पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने इस अंग्रेजी भाषा के शब्द का सकारात्मक अर्थ में उपयोग किया। वह चाहते थे कि उनकी कलीसिया परमेश्वर की सेवा में महत्वाकांक्षी हो।
परन्तु महत्वाकांक्षा जल्दी ही अपने आप में बह जाती है। इस मुद्दे को यह पूछने के द्वारा उठाया जा सकता है, “किस बात के लिए महत्वाकांक्षी?” मसीह हमें स्पष्ट रूप से पहले परमेश्वर के राज्य की खोज करने के लिए कहता है (मत्ती 6:33)। यदि हम किसी और बात के लिए महत्वाकांक्षी हैं, तो हम कामों को, यहाँ तक कि भले कामों को भी, गलत कारणों से करते हैं।
इन कारणों से, महत्वाकांक्षा आसानी से लालच में बदल सकती है। और एक बार अपनी सीमा पार कर जाने पर, लालच हमें भस्म कर देता है। हम बहुत परिश्रम कर सकते हैं, जो एक अच्छी बात हो सकती है। परन्तु हम गलत कारण से, आत्म-उन्नति और आत्म-प्रचार के लिए, आसानी से और जल्दी से बहुत कठोर परिश्रम भी कर सकते हैं। काल्पनिक गेको अन्त में सही हो सकता है। लालच ऊपर की ओर विकासवादी चढ़ाई का प्रतीक है। बस जो लोग मसीह के शिष्य हैं, उनके लिए लालच से प्रेरित, योग्यतम के जीवित रहने का नियम एक झूठ है — और वह भी एक घोर झूठ है।
लालच का विपरीत एक और घातक पाप है, आलस्य। यदि हास्यास्पद न हो तो, बाइबल में आलस्य का सबसे रंगीन वर्णन नीतिवचन 26:15 में मिलता है: “आलसी अपना हाथ थाली में तो डालता है, परन्तु आलस्य के कारण कौर मुँह तक नहीं उठाता।” और यह बात तब लिखी गई थी, जब हमने सोफे पर बैठे रहने वाले व्यक्ति का नाम नहीं रखा था। यहाँ एक ऐसा व्यक्ति है, जो इतना आलसी है कि एक बार थाली में हाथ डालने के बाद, उसमें पकड़े गए भोजन को, मुँह तक लाने की भी ऊर्जा नहीं बचती।
हमारी संस्कृति में असल में लालच के जितने ज्वलंत उदाहरण मौजूद हैं, उतने ही आलस्य के उदाहरण भी मौजूद हैं। और हमारे द्वारा अपने लिए बनाए गए अन्य सभी तकनीकी उपकरणों का उल्लेख न करें, तौभी रिमोट कंट्रोल यह प्रकट करता है कि एक संस्कृति के रूप में हम प्रयास करने के विरुद्ध हैं, हम पसीना बहाने के विरुद्ध हैं और हम काम करने के विरुद्ध हैं। यह आलस्य हमारे व्यवसायों और हमारे रिश्तों को प्रभावित कर सकता है। हम बिना काम किए या बिना कोई समय निवेश किए, तुरन्त सफलता चाहते हैं। हम केवल आसान अनुभवों की सराहना करने और कठोर परिश्रम की दिनचर्या से डरने के आदी हो जाते हैं। ये सांस्कृतिक कुरीतियाँ हमारे व्यावसायिक जीवनों और व्यक्तिगत् जीवनों से निकलकर हमारे आत्मिक जीवनों में भी फैल सकती हैं। इस मामले में भी, हम आत्मिक परिपक्वता के छोटे तरीके ढूँढ़ सकते हैं। परन्तु ऐसे छोटे तरीके अपनाना व्यर्थ ठहरता है।
जैसे कि हमें यह बताना आवश्यक है कि महत्वाकांक्षा और लालच में अन्तर होता है (यद्यपि यह एक पतली रेखा है), वैसे ही आलस्य और विश्राम में भी अन्तर होता है। विश्राम करना हमारे लिए स्वास्थ्यवर्धक होता है, यहाँ तक कि यह आवश्यक भी होता है। परन्तु विश्राम करने की आदतें आसानी से और जल्दी ही अस्वस्थ हो सकती हैं। फिर से कहूँ तो जैसे काम करने के प्रति एक स्वस्थ दृष्टिकोण महत्वाकांक्षा से पराजित हो सकता है और फिर लालच से पराजित हो सकता है, वैसे ही हमारा विश्राम, जो आवश्यक भी है और परमेश्वर के द्वारा प्रदान किया गया है, आलस्य और सुस्ती से पराजित हो सकता है। जहाँ महत्वाकांक्षा का अर्थ शीर्ष की ओर दौड़ लगाता है, वहीं आलस्य का अर्थ नीचे की ओर दौड़ लगाना है। दोनों ही हमें गलत रास्ते पर ले जाते हैं। नीतिवचन लालच और आलस्य के साथ नाचने के इस खेल को खेलने के बारे में चेतावनियों से भरा पड़ा है। और नीतिवचन बुद्धिमानी से दिखाता है कि कैसे ये दोनों साथी मृत्यु और विनाश की ओर ले जाते हैं।
महत्वाकांक्षा और आलस्य के इन दोनों तरीकों पर विचार करना उचित है। बहुत से लोग काम के बारे में सोचते समय इन्हें ही केवल दो विकल्पों के रूप में देखते हैं। या तो काम ही सब कुछ भस्म करने वाला हो जाता है या फिर इसे हर मूल्य पर टाला जाता है। इसका समाधान संतुलन की खोज करने में नहीं है, परन्तु उसके बजाय काम और विश्राम के बारे में अलग-अलग सोचने में है। हमने ऊपर बाइबल के जिन खण्डों पर विचार किया था, उनमें हमने इसे संक्षेप में देखा था, जब हमने काम के लिए एक ईश-वैज्ञानिक ढाँचा तैयार किया था। अब समय आ गया है कि हम एक बार फिर उस ढाँचे की ओर मुड़ें, और इस बार काम कैसे करें के तरीके के व्यावहारिक अनुप्रयोग की खोज में मुड़ें।
चर्चा एवं मनन:
- क्या आपके काम को ऊपर दी गई किसी बात के द्वारा वर्णित किया जा सकता है? क्या आप आलस्य और सुस्ती की ओर अधिक झुकाव रखते हैं या अस्वस्थ महत्वाकांक्षा की ओर अधिक झुकाव रखते हैं?
- काम करने की किसी भी अस्वस्थ आदत को सम्बोधित करने के लिए अपनी सोच और विश्वास में किस बात को बदलने की आवश्यकता है?
4 काम कैसे करें — और अर्थ कैसे खोजें!
हमारी तकनीकी संस्कृति में, हम अधिकांश रूप से स्वयं को उन वस्तुओं से दूर पाते हैं, जिन्हें हम पहनते हैं, और उपयोग करते हैं और यहाँ तक कि खाते भी हैं। अतीत की संस्कृतियों में, विशेष रूप से बाइबल के काल की प्राचीन संस्कृतियों में, किसी के काम और उस काम के फल या उत्पादों के बीच कहीं अधिक गहरा सम्बन्ध था। जैसे-जैसे हम कृषि अर्थव्यवस्थाओं से औद्योगिक अर्थव्यवस्थाओं की ओर गए, वैसे-वैसे यह विभाजन चौड़ा होता गया। जैसे-जैसे हम औद्योगिक अर्थव्यवस्थाओं से अपनी वर्तमान तकनीकी अर्थव्यवस्थाओं की ओर गए, वैसे-वैसे यह खाई और भी चौड़ी होती गई। इसका हमारी इक्कीसवीं शताब्दी की संवेदनशीलताओं पर शुद्ध प्रभाव पड़ा है तथा इसने हमें काम और उसके उत्पादों के महत्व के बारे में पिछली शताब्दियों के लोगों से बिलकुल अलग सोचने वाला बना दिया है। कुछ हद तक इसका नकारात्मक प्रभाव भी पड़ा है। हम उन विदेशी श्रमिकों के कारखाने की परिस्थितियों के प्रति उदासीन हैं, जो उन वस्तुओं का उत्पादन करती हैं, जिनका हम उपयोग करते हैं और फेंक देते हैं। और हम उस बात के प्रति उदासीन हैं, जो उन उत्पादों के साथ होता है, जिन्हें हम फेंक देते हैं और वे गड्ढों की भराई में चले जाते हैं। ये विसंगतियाँ, जो हमारी उपभोक्ता संस्कृति का इतना अभिन्न अंग हैं, एक-दूसरे से और परमेश्वर के द्वारा बनाए गए संसार से हमारे सम्पर्क के टूटने का कारण बनती हैं।
जब हम मजदूरी के असंतुलित पैमाने पर विचार करते हैं, तो हमारे बीच की विसंगति और भी गहरी हो जाती है। कारखाने के श्रमिक — जो बेसबॉल और बास्केटबॉल और खेलकूद के जूते बनाते हैं
— वे अपने जीवन भर में जितना कमाते हैं, उससे अधिक पेशेवर खिलाड़ी एक वर्ष में कमा लेते हैं। और चलिए छोड़िए हम अन्य हस्तियों की तो बात ही न करें।
इन विसंगतियों के आलोक में, यह और भी आवश्यक हो जाता है कि हम काम के बारे में बाइबल के अनुसार और ईश-विज्ञान के अनुसार सोचें। यह बात कर्मचारियों और नियोक्ताओं, दोनों के लिए सच है। जो मसीही स्वयं को किसी भी भूमिका में पाते हैं, उनका यह दायित्व बनता है कि वे काम पर बाइबल के अनुसार सोचें और जीवन जिएँ।
प्रभु के बारे में
एक पाठ, जो यहाँ सहायता कर सकता है, वह इफिसियों 6:5-9 है। इस खण्ड में, पौलुस दासों और स्वामियों को सम्बोधित कर रहा है। ये आयतें अक्सर गलत व्याख्या का स्रोत रही हैं, अत: किसी भी तरह की गड़बड़ी से बचने के प्रयास में, मैं इस खण्ड को एक कर्मचारी और एक नियोक्ता होने के अर्थ में कुछ योगदान देने वाला मानूँगा। कर्मचारियों के लिए, पौलुस बताता है कि वे अन्त में परमेश्वर के लिए काम करते हैं। हमें “उस सेवा को मनुष्यों की नहीं परन्तु प्रभु की जानकर सच्चे हृदय से” करना है (6:7)। यह सीधे-सीधे बुलाहट से सम्बन्धित है। जब काम को बुलाहट के रूप में समझा जाता है, तो इसे परमेश्वर की ओर से बुलाहट समझा जाता है। अन्त में वही है, जिसके लिए हम काम करते हैं।
यह समझ मध्ययुगीन वास्तुकला में कुछ मूर्तिकला कृतियों में देखी जा सकती है। किसी महा-गिरजाघर की ऊँची चोटियों पर, बारीकियों पर उतना ही ध्यान दिया जाता है, जितना कि आँखों के सामने नीचे रखी मूर्तियों पर। अब, कोई भी इतनी ऊपर रखी मूर्ति के बारीक विवरणों को सम्भावित रूप से कभी नहीं देख सकता। इन बारीकियों में कटौती करने से उस संरचना की मजबूती पर किसी भी तरह का नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ता है, और न ही यह नीचे की मंजिल पर बैठे लोगों की आराधना में बाधा डालता है। तो फिर वास्तुकारों ने इसे क्यों बनाया और कारीगरों ने इसे क्यों उकेरा? क्योंकि वे जानते थे कि यह परमेश्वर की सेवा में किया गया कार्य है।
हम कार्यस्थल पर जो कुछ भी करते हैं, उसमें से बहुत कुछ अनदेखा किया जा सकता है; हम जो कुछ भी करते हैं, उसमें से बहुत कुछ की जाँच नहीं की जाएगी (जब मैं किसी कोठरी में पुताई कर रहा होता हूँ या अपने घर के पीछे फूलों की क्यारियों की निराई कर रहा होता हूँ, तो मैं स्वयं को यही सोचते हुए पाता हूँ)। जो हम करते हैं, उसके बारे में थोड़ी सी चिन्ता करते हुए हम सब बहुत आसानी से अपने काम में लगे रह सकते हैं। ठीक इसी बिंदु पर पौलुस के शब्द अपनी भूमिका निभाते हैं। हमारा काम, चाहे वह अदृश्य हो या कम दिखाई देने वाला हो, अन्त में वह काम परमेश्वर के सामने होता है।
मेरे दादाजी ने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान घरेलू मोर्चे पर युद्ध के प्रयासों के भाग के रूप में, न्यू जर्सी में डेलावेयर नदी के किनारे स्थित रोबलिंग स्टील कम्पनी में काम करने के लिए एक स्थानीय समाचार पत्र और उसकी छपाई की दुकानों के पारिवारिक व्यवसाय को छोड़ दिया। यह संयंत्र अधिकतर पुल निर्माण के लिए स्टील के तार बनाता था। परन्तु युद्ध के दौरान इसने टैंक की पटरियों के लिए स्टील के तार बनाए। यह एक जटिल काम था। जब उन तारों को मशीन से बनाया जाता था, तब वे आसानी से गलत दिशा में मुड़ सकते थे और अनुपयोगी हो सकते थे। युद्ध के दौरान संसाधनों की कमी के कारण, उन लोगों को प्रोत्साहन राशि दी जाती थी, जो इन उलझे हुए स्टील के तारों को कुशलता से खोल सकते थे। कुछ ही समय बाद, मेरे दादाजी ध्यान देने लगे कि उनके आसपास के कर्मचारी जानबूझकर स्टील के उन तारों को मोड़ने लगे थे, जिससे कि वे उन्हें ठीक कर सकें और अतिरिक्त मुआवजा प्राप्त कर सकें। यह सारी बेईमानी उन्हें अच्छी नहीं लगी। दशकों बाद उन्हें यह बात याद आई और उन्होंने मेरे साथ ये किस्से साझा किए। एक कामगार के रूप में मैं उनकी खराई की प्रशंसा करता था। उन्होंने मुझे सिखाया कि कौशल और ईमानदारी, इन दोनों के साथ काम करना कितना महत्वपूर्ण है।
हमारे जीवन में एक निश्चित तात्कालिकता होती है। हो सकता है कि यह युद्धकाल की स्पष्ट तात्कालिकता न हो, परन्तु परमेश्वर के सामने काम करने वाले लोगों के रूप में, हमें एक उच्च और पवित्र बुलाहट मिली है। ईमानदारी के साथ किया गया खरा कार्य ही परमेश्वर को आदर देता है और अवसर के अनुकूल होता है। बेईमानी करना बहुत आसान है और बहुत स्वाभाविक रूप से आती है। हमें इससे सावधान रहने की आवश्यकता है।
सच्चे मन से
इस बात से उद्देश्यों के बारे में भी कुछ कहने के लिए पौलुस की अगुवाई होती है: हमें अपने मालिकों की सेवा “मन की सीधाई” से करनी चाहिए (इफि. 6:5)। उद्देश्य हमेशा एक कठिन परीक्षा होती है। हम गलत कारण के लिए आसानी से गलत काम कर देते हैं। गलत कारण के लिए सही काम करना थोड़ा कठिन होता है। सही कारण के लिए सही काम करना सबसे कठिन होता है। परमेश्वर न केवल हमारे द्वारा किए जाने वाले कार्य की चिन्ता करता है, बल्कि इस बात की भी चिन्ता करता है कि हम वह कार्य क्यों करते हैं। उद्देश्य महत्व रखता है। स्वीकार्य रूप से, हर दिन और हर काम में सही उद्देश्य रखना कठिन होता है। यह जानना अच्छी बात है कि परमेश्वर क्षमाशील और अनुग्रहकारी है। परन्तु ऐसा नहीं होना चाहिए कि कठिनाई का स्तर हमें प्रयास करने से रोक दे।
कर्मचारी ही एकमात्र ऐसे लोग नहीं हैं, जिन्हें मानक प्राप्त करने होते हैं — पौलुस के पास नियोक्ताओं से कहने के लिए भी कुछ बातें हैं। उनमें एक यह है कि नियोक्ताओं को सही उद्देश्यों के समान नियम के द्वारा जीवन बिताने की आवश्यकता है: “हे स्वामियों, तुम भी… उनके साथ वैसा ही व्यवहार करो” (इफि. 6:9)। इससे यह पता चलता है कि जो बत्तख के लिए अच्छा है वह हंस के लिए भी अच्छा है। इसके बीच में पौलुस कहता है, “धमकियाँ देना छोड़कर” (इफि. 6:9)। चालाकी करना और धमकियाँ देना किसी कम्पनी को चलाने या कर्मचारियों के साथ व्यवहार करने का तरीका नहीं है। हम वापस खेती बनाम अधीनता पर आ गए हैं, है न? शक्ति को जिम्मेदारी से और सच्चे मन से सम्भालने की आवश्यकता है।
परमेश्वर के सामने हमारी समानता कर्मचारियों और नियोक्ताओं के बीच अच्छे सम्बन्धों का आधार है: जब परमेश्वर नियोक्ताओं और कर्मचारियों को देखता है तो “वह किसी का पक्ष नहीं करता” (इफि. 6:9)। कार्यस्थल के वातावरण में एक बेहतर स्थिति एक व्यक्ति के रूप में बेहतर स्थिति को प्रतिबिम्बित नहीं करती। जब नियोक्ता यह पहचान लेते हैं कि कर्मचारी परमेश्वर के स्वरूप को धारण किए हुए हैं, तथा उनमें गरिमा और पवित्रता पाई जाती है, तो वे उनका आदर करते हैं और उनके साथ निष्पक्ष व्यवहार करते हैं। जब कर्मचारी नियोक्ताओं को स्वरूप-धारी के रूप में देखते हैं, तो वे उनका आदर करते हैं।
दीनता के साथ
बाइबल के द्वारा प्रशंसा किए गए अनेक गुणों में से एक गुण सीधे-सीधे काम से भी सम्बन्धित है, और वह दीनता का गुण है। दीनता को कभी-कभी अपने आप को यह समझने के रूप में गलत मान लिया जाता है कि हम केवल एक पायदान से अधिक ही हैं। यह दीनता नहीं है। और कभी-कभी हम सोचते हैं कि दीनता का अर्थ अपनी प्रतिभा को छिपाना या उसे कम आंकना है। इसके बजाय, दीनता का अर्थ है, दूसरों को मूल्यवान और योगदान देने वाला समझना। इसका अर्थ है दूसरों के सर्वोत्तम के लिए अपनी सर्वोत्तम क्षमता का उपयोग करने के लिए चिन्तित रहना। इसका अर्थ है हमेशा श्रेय की खोज न करना, हमेशा सर्वोत्तम पद या आदर वाली कुर्सी की खोज न करना। इसका अर्थ है दूसरे व्यक्ति के बारे में यह जानते हुए इतनी चिन्ता करना कि मुझे उनसे कुछ सीखना है।
सच्ची और असली दीनता मसीह के देहधारी जीवन में सबसे अच्छी तरह से दर्शाई गई है। फिलिप्पियों 2 अध्याय में, मसीह के उदाहरण और देहधारण में उसके “अपमान” को पौलुस इस बात के मानक के रूप में उपयोग करता है कि हमें मसीह की देह में दूसरों के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए। एक विश्वासयोग्य कलीसिया या एक धार्मिकता से भरा परिवार होने के लिए दीनता आवश्यक है।
दीनता कर्मचारियों और कार्यस्थल के लिए भी आवश्यक है। रोनाल्ड रीगन के ओवल वाले कार्यालय में उनकी मेज पर बरगंडी रंग के चमड़े पर सोने की पन्नी में एक नारा छपा हुआ था। जिस पर लिखा था:
यह किया जा सकता है।
सकता है शब्द पर स्पष्ट जोर उनके सलाहकारों और सहयोगियों के द्वारा अक्सर सुनी गई इस बात के विपरीत था कि विभिन्न परियोजनाओं को या कामों को “नहीं किया जा सकता।”
हालाँकि, उनकी एक और बात है, जो इस संक्षिप्त एवं निर्णायक बात की कुंजी है, जो सामान्य रूप से यह घोषित करती है कि यह किया जा सकता है। यह लम्बी बात हमें एक मूल्यवान गूढ़ज्ञान प्रदान करती है: “यदि आप इस बात की चिन्ता नहीं करते कि इसका श्रेय किसे मिलेगा, तो आपके द्वारा की गई भलाई की मात्रा की कोई सीमा नहीं है।”
मैं एक ऐसे कमरे की कल्पना करता हूँ, जो प्रधानों, विभागाध्यक्षों और प्रतिभाशाली, सिद्धहस्त लोगों से भरा हुआ है, और उन्हें ऐसी बातें सुनने की आदत नहीं है। फिर भी, रीगन दीनता को एक अनिवार्य तत्व मानते थे। इसमें कोई सन्देह नहीं कि हमें उन कम ईमानदार सहकर्मियों से सावधान रहना चाहिए, जो आगे बढ़ने के लिए विचार चुरा सकते हैं या धूर्त तरीकों का सहारा ले सकते हैं। परन्तु, हम अक्सर दल से अधिक अहंकार की चिन्ता करते हैं। और, फिर से, जब हम “प्रभु के लिए” काम करते हैं, तो परमेश्वर जानता है। ये प्रशंसाएँ, जिनकी हम खोज करते हैं, वैसे ही लुप्त होती चली जा रही हैं, जैसे विजेता के सिर पर रखी प्राचीन ओलंपिक पुष्पमालाओं पर जैतून के पत्ते लुप्त हो गए हैं।
हम अक्सर किसी काम को बस पूरा करने की तुलना में इस बात के बारे में अधिक चिन्ता करते हैं कि श्रेय किसे मिलेगा। कभी-कभी, जब हम यह सोचते या कहते हैं कि यह काम नहीं हो सकता, तो ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि हमने दीनता के गुण का पालन करने के बजाय आत्म-प्रशंसा का प्रयत्न किया है। हम स्वयं को आगे बढ़ाने या व्यक्तिगत् पहचान बनाने की होड़ में रहने के बजाय, एक साथ काम करके और एक-दूसरे में सर्वश्रेष्ठ को निकालकर कहीं अधिक हासिल कर पाएँगे। दीनता एक आवश्यक मसीही गुण है और कार्यस्थल में अनिवार्य है।
अच्छे प्रतिफल के लिए
पौलुस के अतिरिक्त, सम्भवत: सबसे अधिक जिस स्थान पर काम के बारे में हम सीखते हैं, वह नीतिवचन की पुस्तक है। यहाँ हम न केवल आलस्य के तौर-तरीकों के बारे में सीखते हैं, बल्कि उस प्रकार के काम के बारे में भी सीखते हैं, जो परमेश्वर का आदर करता है। नीतिवचन 16:3 आज्ञा देता है, “अपने काम यहोवा पर डाल दे,” और आगे कहता है कि “इस से तेरी कल्पनाएँ सिद्ध होंगी।” यह नीतिवचन की पुस्तक में दिए गए कई व्यापक उपयोगी सिद्धान्तों में से एक है। यह हमें याद दिलाता है कि परमेश्वर हमारे काम के आरम्भ, मध्य और अन्त में उपस्थित है। वह हमारे काम पर उसी तरह प्रभुता रखता है, जैसे वह अपनी सारी सृष्टि और प्राणियों पर प्रभुता रखता है। यह नीतिवचन हमें केवल जो पहले से ही है, उसे स्वीकार करने के अतिरिक्त और कुछ नहीं करने के लिए कह रहा है। यह याद दिलाना फिर भी आवश्यक है, क्योंकि हम अक्सर वह करना भूल जाते हैं, जो स्थिति को स्वीकार करने के स्वाभाविक परिणाम के रूप में सामने आता है। हमें परमेश्वर का अपने काम के स्रोत, साधन और साध्य के रूप में आदर करना चाहिए, क्योंकि वह हमारे काम का स्रोत और साधन और समापन है।
अन्य नीतिवचन बारीकियों में उतरते हैं। कई नीतिवचन काम के प्रतिफल की बात करते हैं। नीतिवचन 10:5 हमें बताता है कि “जो बेटा धूपकाल में बटोरता है वह बुद्धि से काम करनेवाला है,” जबकि इसके विपरीत, “जो बेटा कटनी के समय भारी नींद में पड़ा रहता है, वह लज्जा का कारण होता है।” कुछ अध्यायों के बाद, हम इसी तरह की बातें पाते हैं कि “जो अपनी भूमि को जोतता, वह पेट भर खाता है, परन्तु जो निकम्मों की संगति करता, वह निर्बुद्धि ठहरता है” (12:11)। और नीतिवचन 14:23 में अपनाए गए सीधे दृष्टिकोण को भी छोड़ा नहीं जा सकता: “परिश्रम से सदा लाभ होता है, परन्तु बकवाद करने से केवल घटी होती है।”
नीतिवचन में लाभ के उद्देश्य से कहीं अधिक गहरे स्तर पर प्रतिफल की इस अवधारणा को व्यक्त करने का एक तरीका भी मिलता है। इस सम्बन्ध में एक आयत विशेष रूप से उल्लेखनीय है, जो कि नीतिवचन 12:14 है। यहाँ हमें बताया गया है, “सज्जन अपने वचनों के फल के द्वारा भलाई से तृप्त होता है, और जैसी जिसकी करनी वैसी उसकी भरनी होती है।” यहाँ जिस प्रतिफल की बात की गई है, वह पूर्णता है, अर्थात् संतुष्टि है। अन्त में, यह संतुष्टि धन संचय करने या उस धन से खरीदी जाने वाली वस्तुओं से नहीं मिलती। यह ऐसी संतुष्टि है, जो परमेश्वर की सेवा में काम करने के अपने उद्देश्य को पूरा करने से मिलती है।
सभोपदेशक का लेखक इसी बात पर जोर देता है। वहाँ हमें बताया गया है, “यह भी परमेश्वर का दान है कि मनुष्य खाए–पीए और अपने सब परिश्रम में सुखी रहे” (सभो. 3:13)। कुछ लोग इसे व्यंग्यात्मक बात कहते हैं, और मानते हैं कि सभोपदेशक का लेखक अब तक जीवित रहे लोगों में से सबसे अधिक उदास और क्लांत व्यक्ति है। परन्तु यह पाठ, नीतिवचन के विभिन्न खण्डों के साथ, किसी बिलकुल सच्ची बात की ओर संकेत करता प्रतीत होता है। परमेश्वर ने हमें काम करने के लिए बनाया है, और जब हम काम करते हैं, तो हमें संतोष, संतुष्टि और प्रसन्नता मिलती है। यह परमेश्वर की ओर से हमें दिए गए कई अच्छे वरदानों में से एक है।
कौशल के साथ
वापस नीतिवचन की बात करें तो, इसकी कई शिक्षाएँ कुशलता के मुद्दे को सम्बोधित करती हैं। नीतिवचन 22:29 इसका एक उदाहरण है, जो बताता है, “यदि तू ऐसा पुरुष देखे जो काम–काज में निपुण हो, तो वह राजाओं के सम्मुख खड़ा होगा; छोटे लोगों के सम्मुख नहीं।” आसाप के एक भजन में भी दाऊद के विषय में ऐसा ही विचार व्यक्त किया गया है। आसाप हमें बताता है कि दाऊद ने “अपने हाथ की कुशलता से उनकी [इस्राएल की] अगुवाई की” (भज. 78:72)। हम पवित्रशास्त्र में अन्यत्र भी कुशलता के उदाहरण देखते हैं। बसलेल और ओहोलीआब कुशल कारीगर थे, जिन्होंने तम्बू की साजसज्जा और निर्माण का निरीक्षण किया था। ये “कुशलता” और “शिल्प कौशल” से परिपूर्ण लोग थे, जिन्होंने “कलात्मक साजसज्जा” को तैयार किया (निर्ग. 35:30-35)। “बसलेल और ओहोलीआब और सब बुद्धिमान जिनको यहोवा ने ऐसी बुद्धि और समझ दी” थी वे भी तम्बू के काम शामिल हुए (निर्ग. 36:1)।
यहाँ हम सीखते हैं कि हमारे पास जो भी कौशल है, वह परमेश्वर की ओर से मिलता है; अर्थात् वही हमें वह देता है। परन्तु जिन लोगों को यह वरदान दिए गए हैं, उन्हें भी इनको बढ़ाने की आवश्यकता है। मैंने समय-समय पर घरेलू परियोजनाओं पर काम किया है। हमने स्नानागारों का नवीनीकरण किया है, लकड़ी के फर्श लगाए हैं, और उन्हें तराशा है। हालाँकि, मैंने पाया है कि अधिकांश समयों पर कुशल बढ़ई, बिजली के कारीगर और नलसाज मुझसे कहीं बेहतर होते हैं और एक तरफ हटकर किसी पेशेवर को वह काम करने देना कहीं अधिक समझदारी की बात है। जब मैं परियोजनाओं पर काम करता हूँ, तो मैं उस विचारधारा के अन्तर्गत आता हूँ, जिसका आदर्श वाक्य है, “अपना सर्वश्रेष्ठ करो और बाकी को कसकर बन्द कर दो।” फिर मैं पेशेवरों को देखता हूँ। वे एकदम सही काटकर एक बिलकुल चौकोर कोने को बैठा सकते हैं।
यह बात शीर्ष खिलाड़ियों, संगीत समारोहों के संगीतकारों, कलाकारों, बढ़ई, नलसाजों और बिजली के कारीगरों को देखकर सच साबित होती है। कौशल प्रभावशाली होता है। जिनके पास यह होता है, वे इसे सहज बना देते हैं। ऐसा नहीं है। यह अभ्यास करने, बार-बार अभ्यास करने और अधिकाधिक अभ्यास करते रहने से आता है। असल में, मुझे अपने हाई स्कूल के तैराकी के प्रशिक्षक के शब्द याद आते हैं। अपने पानी से भरे कानों से मैं उन्हें यह कहते हुए सुन सकता था, “अभ्यास से सिद्धता नहीं मिलती। सिद्ध अभ्यास से सिद्धता मिलती है।” क्या यह एक कठिन काम है? हाँ। परन्तु फिर हमें याद आता है कि हम “प्रभु के लिए” काम कर रहे हैं (कुलु. 3:23)। इससे अधिक कठिन कुछ नहीं हो सकता।
कुछ काम ऐसे हैं जिनमें मैं (कुछ हद तक) अच्छा हूँ, और कुछ कामों में अच्छा नहीं हूँ। परमेश्वर ने हम सभी को वरदान दिए हैं और हम सभी को कुछ विशेष कार्यों के लिए बुलाया है। यदि हम अपने काम को बुलाहट के रूप में समझें, तो हम इसे बसलेल और ओहोलीआब और कई अन्य लोगों की तरह करेंगे, जब उन्होंने परमेश्वर के लिए तम्बू बनाया था। हम अपना काम कुशल हाथों से करेंगे। और जब हम घरेलू परियोजनाओं को कर रहे होते हैं, तब भी हमें याद दिलाया जाएगा कि हम अपना काम प्रभु के लिए करें।
मसीह का कार्य
बाइबल आधारित इस पहेली का अन्तिम हिस्सा मसीह और कार्य पर विचार करना है। हम यहाँ देहधारण की ओर मुड़ते हैं, जहाँ हम मसीह को पूर्ण और सच्चे मनुष्य के साथ-साथ पूर्ण और सच्चे ईश्वरीय रूप में भी देखते हैं। अपने मनुष्यत्व में यीशु ने कुछ भूमिकाएँ निभाईं। वह एक पुत्र और एक भाई था। वह रोमी साम्राज्य के एक अधिग्रहीत राज्य का नागरिक भी था। और वह एक बढ़ई का पुत्र था तथा सम्भव है कि वह स्वयं भी एक बढ़ई था। इन भूमिकाओं को पूरी तरह निभाते हुए, मसीह हमारे लिए इन भूमिकाओं के महत्व और खराई, और हमारे कार्य के महत्व और खराई को प्रदर्शित करता है। परन्तु इससे भी बढ़कर, मसीह अपने छुटकारे के कार्य के माध्यम से आदम के द्वारा पतन में किए गए कार्यों को नष्ट कर देता है। और वह हमें परमेश्वर का स्वरूप धारण करने की क्षमता और सामर्थ्य फिर से प्रदान करता है, जैसा होने की मंशा परमेश्वर ने हमारे लिए की थी (1 कुरिं. 15:42-49 को देखें, और साथ ही इसके आसपास के संदर्भ में 2 कुरिं. 3:18 को देखें)।
जब हम देहधारी मसीह की ओर देखते हैं और अपने जीवन के सभी क्षेत्रों में उसके स्वरूप में रूपांतरित होने और उसके अनुरूप होने का प्रयास करते हैं, तो हम सीखते हैं कि — कैसे काम करना है — और कैसे जीवन बिताना है। यद्यपि काम हमारे जीवनों का एक बड़ा हिस्सा लेता है, परन्तु यह हमारे जीवनों को परिभाषित नहीं करता। मसीह में हम कौन हैं, यह हमारे जीवन को परिभाषित करता है और पहिये के उस केन्द्र से तीलियाँ निकलती हैं। हमारे रिश्ते, हमारी सेवा, हमारा कार्य, हमारी विरासत — यही वे तीलियाँ हैं। ये सभी मायने रखते हैं और इनका अपना महत्व है। और जब हम मसीह के साथ अपनी एकता में रहते हैं और उसमें अपनी पहचान में विश्राम करते हैं, तो ये सभी अच्छी बातें अनन्त काल तक मायने रखती हैं और महत्वपूर्ण बनी रहती हैं।
जब हम अपने कार्य, अपनी बुलाहट को इस दृष्टिकोण से देखते हैं, तो ऐसा लगता है कि मानो हम किसी ऊँचे पहाड़ पर चढ़ गए हैं और अपने कार्य के अर्थ एवं मूल्य के लम्बे तथा व्यापक क्षितिज को देख सकते हैं। हमें यह जानकर आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि पवित्रशास्त्र हमारे कार्य के बारे में कुछ कहता है। कार्य के बारे में हमारे चारों ओर व्याप्त कई गलत धारणाओं के आलोक में, हमें मार्गदर्शन और दिशा-निर्देश के लिए इसके पृष्ठों की ओर शीघ्रता से पलटना चाहिए। जब हम इसकी ओर देखते हैं, तो हम बुलाहट को समझने लगते हैं और उसकी सराहना करने लगते हैं। सबसे बढ़कर, हमारा कार्य “प्रभु के लिए” किया जाना चाहिए (कुलु. 3:23)। यह व्यापक सत्य हमारे सभी कार्यों में हमारे सामने होना चाहिए।
चर्चा एवं मनन:
- आप प्रभु के लिए अपने कार्य को देखते और करते हुए किन तरीकों से उन्नति कर सकते हैं?
- ऊपर दी गई श्रेणियों में से कौन सी आपकी सामर्थ्य है? और कौन सी निर्बलता है?
- आपके आसपास ऐसे कौन से कुछ लोग हैं, जो प्रभु के लिए काम करने के अच्छे उदाहरण हैं? आप उनके उदाहरण से क्या सीख सकते हैं?
निष्कर्ष
लॉस एंजिल्स से दो घण्टे उत्तरी दिशा में, चिलचिलाती गर्मी और विशाल मोजावे रेगिस्तान की रेत पर, एक ऐसी जगह है, जहाँ हवाई जहाज मरने के लिए जाते हैं। मोजावे एयर एंड स्पेस पोर्ट (Mojave Air and Space Port) के सभी विमान मरने के लिए नहीं हैं। शुष्क जलवायु विमानों को जंग से बचाने के लिए एक बढ़िया स्थान प्रदान करती है, जब वे वहाँ खड़े कर दिए जाते हैं और मरम्मत या नवीनीकरण की प्रतीक्षा करते हैं। एक बार ठीक से मरम्मत और सुसज्जित होने के बाद, वे फिर से घूमने लगते हैं और वही करते हैं, जिसके लिए उन्हें बनाया गया था। परन्तु सैकड़ों विमानों को आगे से पीछे की ओर पंक्तिबद्ध किया जाता है और कलपुर्जों के लिए उन्हें खोला जाएगा और मरने के लिए छोड़ दिया जाएगा। ये विमान कभी आधुनिक इंजीनियरिंग के चमत्कार थे। जब कई टन भार ले जाने वाले विशाल स्टील के शरीर के रूप में उन्होंने उड़ान भरी, अर्थात् जब उन्होंने 36,000 फुट की ऊँचाई पर उड़ान भरी और सुरक्षित रूप से धरती पर उतर गए, तब उन्होंने गुरुत्वाकर्षण को पछाड़ दिया। यह मायने नहीं रखता कि आपने कितनी बार उड़ान भरी है, उड़ान भरने के रोमांच से आपको फिर से बचपन जैसा एहसास होता है। आपको सामर्थ्य का एहसास होता है। आपको लगता है कि आप किसी भी बात पर विजय प्राप्त कर सकते हैं। इन मशीनों ने तूफानों और उथल-पुथल के बीच से होकर उड़ान भरी। वे पर्वत श्रृंखलाओं से भी ऊँची उठे और विशाल समुद्रों के ऊपर अनगिनत घण्टे उड़ते रहे, और आकाश में अदृश्य राजमार्गों पर चलते हुए किसी भी टक्कर से बचते रहे।
जटिल बिजली के कामों से लेकर जोड़ों पर लगी कीलों तक, इन्हें प्रतिभाशाली और कुशल तकनीकी लोगों ने बनाया था। इन्हें उच्च प्रशिक्षित और अनुशासित विमान चालक उड़ाते थे और कुशल परिचारक, सैकड़ों भूमि पर काम करने वाले लोग, सामान ले जाने वाले, टिकट और द्वार पर खड़े होने वाले प्रतिनिधि, और अन्य एयरलाइन कर्मचारी हर उड़ान में किसी न किसी तरह से योगदान देते थे।
ये लुभावनी मशीनें हैं, बड़े-बड़े लोगों को बड़े-बड़े कार्य करने के लिए प्रेरित करती हैं। और अब ये धीरे-धीरे रेत में धँस रही हैं, इनके नाक के ढकने हटा दिए गए हैं, उपकरण खोल लिए गए हैं, और सीटें हटा दी गई हैं। ये मोजावे की “मृत्यु की घाटी” नामक स्थान पर धीरे-धीरे मर रहे हैं।
मरते हुए ये विमान इस बात का प्रतीक हैं कि हमारी विरासत कितनी क्षणभंगुर है। बड़े-बड़े और जटिल कार्यों का भी एक जीवनकाल होता है। आज किए गए शानदार और स्मारकीय कार्य कल भुला दिए जाएँगे। सभोपदेशक की पुस्तक इसे कैसे व्यक्त करती है? “व्यर्थ ही व्यर्थ, व्यर्थ ही व्यर्थ! सब कुछ व्यर्थ है।” किसी ने एक बार टिप्पणी की थी कि बाइबल के उस शब्द “व्यर्थता” को समझने का सबसे अच्छा तरीका साबुन के बुलबुले हैं। फुफक के आए और मिट गए।
हम अपनी विरासत के लुप्त होने की अनिवार्यता पर कैसे प्रतिक्रिया देते हैं — चाहे वह कितनी भी महान क्यों न हो, वह मायने नहीं रखता?
सबसे पहले, हमें यह समझना होगा कि इस संसार में हमारा काम और हम जो कुछ भी हासिल करते हैं, वह क्षणभंगुर है। घास सूख जाती है, फूल मुरझा जाते हैं। हमारी जगह कोई और ले लेगा। और, जैसा कि हमसे पहले आए लोगों के काम पर आधारित है, हमारे बाद आने वाले लोग शायद हमसे भी बड़े-बड़े काम करेंगे। मेरे पिछले मालिक, आर. सी. स्प्राउल, हमें याद दिलाया करते थे कि कब्रिस्तान परम आवश्यक लोगों से भरा है। इसके विपरीत सोचना व्यर्थ है।
मुझे याद है कि मैं स्कॉटडेल, पेंसिल्वेनिया स्थित वाई.एम.सी.ए. के तरणताल में यह देखने के लिए लौटा था कि क्या मेरे पुराने तैराकी के कीर्तिमान अभी भी बने हुए हैं। एक समय पर, किसी ने कर दिया था। फिर कोई नहीं कर पाया। फिर पूरा भवन पुरस्कारों की दराज और कीर्तिमान वाली दीवार के साथ गायब हो गया। अब नया, चमकदार तरणताल आ गया था।
इस संसार में हम जो कुछ भी करते हैं, उसके बने रहने का एक समय होता है। हालाँकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि कोई विरासत हमसे छूट जाती है। फिर से, हम अपने काम को नियंत्रित करने वाले उस विशिष्ट सिद्धान्त अर्थात् “प्रभु के लिए” पर लौटते हैं। जब हमारा काम प्रभु के लिए — अर्थात् उसके द्वारा, उसके माध्यम से और उसके लिए — किया जाता है, तो उसकी एक विरासत होगी।
मूसा हमारे काम के लिए उस दर्शन को व्यक्त करता है, जिसे इस मार्गदर्शिका ने प्रस्तुत करने का प्रयास किया है: “हमारे परमेश्वर यहोवा की मनोहरता हम पर प्रगट हो, तू हमारे हाथों का काम हमारे लिए दृढ़ कर, हमारे हाथों के काम को दृढ़ कर” (भज. 90:17)। मूसा के लिए इसे केवल एक बार कहना ही पर्याप्त होता। परन्तु वह इसे दो बार कहता है। यह दोहराव एक काव्यात्मक युक्ति है, जिसका उपयोग जोर देने के लिए किया जाता है। अपने पवित्र वचन में, परमेश्वर न केवल एक बार, बल्कि दो बार घोषणा करता है कि वह हमारे हाथों के तुच्छ, सांसारिक, सीमित परिश्रम को दृढ़ करना चाहता है। वह हमारी निर्बल उपलब्धियों को लेता है और उन पर अपनी स्वीकृति की छाप लगाकर उन्हें दृढ़ करता है।
जब हम अपने काम में इस तरह का अर्थ पाते हैं, तो हमें कुछ स्थायी मिलता है, अर्थात् कुछ ऐसा जो हमसे आगे तक बना रहता है। जैसे-जैसे हम बड़े होते हैं, वैसे-वैसे हम अपनी विरासत के बारे में अधिकाधिक सोचने लगते हैं। भजनकार स्पष्ट रूप से परमेश्वर से अपने हाथों के काम को दृढ़ करने के लिए कहता है — कि परमेश्वर कुछ ऐसा बनाए, जो स्थायी हो, कुछ ऐसा जो बना रहे। जिस सीमा तक हम अपने काम को सेवा करने और अन्त में परमेश्वर की महिमा करने के लिए एक बुलाहट के रूप में देखते हैं, उतनी ही सीमा तक हमारी विरासत बनी रहेगी, जो परमेश्वर की महिमा के लिए किए गए अच्छे और विश्वासयोग्य परिश्रम की विरासत होगी।
जॉन कैल्विन ने एक बार कहा था, “प्रत्येक व्यक्ति की अपनी बुलाहट होती है, जिसे प्रभु ने उसे एक प्रकार के प्रहरी के रूप में सौंपा है, जिससे कि वह जीवन भर में लापरवाही से भटक न जाए।”1 यह वह स्थान और कार्य है, जिसके लिए परमेश्वर ने हमें बुलाया है। परमेश्वर हमसे केवल एक ही काम करने के लिए कहता है: अर्थात् उन बुलाहटों के प्रति विश्वासयोग्य भण्डारी बनना जो उसने हमें सौंपी हैं और अपनी प्रहरी चौकियों के प्रति विश्वासयोग्य भण्डारी बनना।
मूसा के भजन के अतिरिक्त हमारे पास भजन संहिता 104 अध्याय भी है, जो हमें अपने काम और अपनी विरासत को समझने में सहायता करता है।
भजन संहिता 104 अध्याय सृष्टि और प्राणियों की रचना में परमेश्वर की महानता के साथ-साथ, सृष्टि और प्राणियों द्वारा किए गए कार्य में दिखाई देने वाली महानता पर भी विचार करता है। भजनकार उन जवान सिंहों का गुणगान करता है, जो अपने “अहेर के लिए गरजते हैं, और ईश्वर से अपना आहार माँगते हैं” (भज. 104:21)। भजनकार उन सोतों का भी वर्णन करता है, जो “नालों में” और “पहाड़ों के बीच से बहते हैं” (भज. 104:10)। जब हम इस बात पर विचार करते हैं कि कार्य करने का — अर्थात् कार्य करते हुए परमेश्वर की महिमा करने का क्या अर्थ है, तो यह पूरा भजन अध्ययन और मनन के लिए उपयुक्त है। परन्तु 24-26 आयतें सृष्टिकर्ता की छवि में सृजे गए एकमात्र प्राणियों द्वारा किए गए कार्य पर विशेष ध्यान केन्द्रित करती हैं। ये आयतें घोषणा करती हैं:
24: हे यहोवा, तेरे काम अनगिनित हैं!
इन सब वस्तुओं को तू ने बुद्धि से बनाया है;
पृथ्वी तेरी सम्पत्ति से परिपूर्ण है।
25: इसी प्रकार समुद्र बड़ा और बहुत ही चौड़ा है,
और उस में अनगिनित जलचर, जीव–जन्तु, क्या छोटे,
क्या बड़े भरे पड़े हैं।
26: उस में जहाज भी आते जाते हैं,
और लिव्यातान भी जिसे तू ने वहाँ खेलने के लिए बनाया है।
स्पष्ट रूप से समुद्र और समुद्री जीव परमेश्वर की महानता, वैभव और सुन्दरता की गवाही देते हैं। जब हम नीली व्हेल पर विचार करते हैं, जो एक फुटबॉल के मैदान के एक तिहाई जितनी लम्बी होती है, तो हम केवल विस्मय में पड़ जाते हैं। या, शार्क से कौन प्रभावित नहीं होता? परन्तु 26वीं आयत को ध्यान से देखें। भजनकार दो वस्तुओं को समानांतर रखता है: जहाज और लिव्यातान। भजन संहिता और अय्यूब जैसी काव्यात्मक पुस्तकें, और यहाँ तक कि कभी-कभार भविष्यद्वाणियों की पुस्तकें भी, इस प्राणी, लिव्यातान का संदर्भ देती हैं। इस प्राणी की सटीक पहचान को लेकर अटकलों की कोई कमी नहीं रही है। क्या यह एक बड़ी मछली है? क्या यह एक डायनासोर है? एक विशाल जैली मछली है? हम निश्चित रूप से जो जानते हैं, वह यह है कि लिव्यातान हमारी साँसें रोक लेता है। हम शायद “अद्भुत” शब्द का बहुत अधिक उपयोग करते हैं और इसके अलंकारिक प्रभाव को समाप्त कर चुके हैं। परन्तु इस मामले में यह शब्द सटीक बैठता है: लिव्यातान अद्भुत है।
लिव्यातान को खेलना भी पसन्द है। हम इसे अनदेखा नहीं कर सकते। जोनाथन एडवर्ड्स ने उड़ने वाली मकड़ी के बारे में लिखते हुए लिखा कि जब यह मकड़ी उड़ती थी, तो उसके मुख पर मुस्कान होती थी। इससे एडवर्ड्स इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि परमेश्वर ने “सभी प्रकार के जीवों, यहाँ तक कि कीड़ों के लिए भी आनन्द और मनोरंजन की” व्यवस्था की है।2 यहाँ तक कि लिव्यातान के लिए भी। और फिर 26वीं आयत में दूसरा प्राणी भी है। यह मनुष्य के द्वारा निर्मित प्राणी है: “जहाज भी आते जाते हैं।” परमेश्वर की रचना और हमारी रचना को एक-दूसरे के साथ, समानांतर रूप से एक-दूसरे के ठीक बगल में रखा गया है। भजनकार लिव्यातान पर अचम्भित होता है, और भजनकार जहाजों पर भी अचम्भित होता है। इसे समझें। परमेश्वर हम पर कितना अनुग्रहकारी है कि वह हमारे काम को सच्चा और वास्तविक महत्व वाला मानने के लिए झुकता है?
जब हम इस भजन को पढ़ना जारी रखते हैं, तो हम पाते हैं कि यहाँ समुद्र पार करने वाले और लहरों में खेलने वाले प्राकृतिक और मनुष्य द्वारा निर्मित दैत्यों से कहीं अधिक है। 27वीं और 28वीं आयत हमें बताती हैं: परमेश्वर की सभी रचनाओं को संदर्भित करते हुए, “इन सब को तेरा ही आसरा है, कि तू उनका आहार समय पर दिया करे। तू उन्हें देता है, वे चुन लेते हैं; तू अपनी मुट्ठी खोलता है और वे उत्तम पदार्थों से तृप्त होते हैं।” हमें आनन्द मिलता है, हमें तृप्ति मिलती है, हमें अपने काम से अर्थ मिलता है। हम अपने परमेश्वर के द्वारा प्रदान किए गए वरदानों, अपने परमेश्वर के द्वारा प्रदान किए गए संसाधनों को स्वीकार करते हैं, और फिर हम काम पर लग जाते हैं। और तब हम संतुष्ट होते हैं। दाखमधु हमारे हृदयों को हर्षित करता है (आ. 15)। हमारी रचनाएँ, हमारे हाथों के काम, विमान, रेलगाड़ियाँ, मोटरगाड़ियाँ और जहाज, हमें विस्मित करते हैं। और पुस्तकें और अभिलेख और बिक्री के सौदे और व्यवसाय, भवन, विद्यालय और कॉलेज, कलीसिया और सेवकाइयाँ — हमारे हाथों के ये सभी काम हमें विस्मित करते हैं और हमें गहरा आनन्द देते हैं। ये सभी परमेश्वर के वरदान हैं। यदि आप अपने काम करने के लिए प्रेरणा ढूँढ़ रहे हैं, तो आपको वह मिल गई है।
ये सब हमारे काम के परिणाम हैं। परन्तु इनमें से कोई भी हमारे काम का मुख्य समापन या अन्तिम परिणाम नहीं है। हमारे काम का मुख्य समापन 31वीं आयत में आता है: “यहोवा की महिमा सदा काल बनी रहे, यहोवा अपने कामों से आनन्दित होवे!” हमारे काम का अर्थ है। हमारा काम उस परमेश्वर की ओर संकेत करता है जिसके स्वरूप में हम बनाए गए हैं। जब हम काम करते हैं, तो हम परमेश्वर की महिमा करते हैं। जब हम काम करते हैं, तो परमेश्वर हमसे हर्षित होता है। अब हमने अपनी विरासत पर ठोकर खाई है। “उस में जहाज भी आते जाते हैं!” जहाज हमने बनाए हैं और बनाते रहेंगे। परमेश्वर की महिमा हो।
पौलुस स्पष्ट रूप से कहता है: “चाहे जो कुछ करो, सब कुछ परमेश्वर की महिमा के लिए करो” (1 कुरिं. 10:31)। यह निश्चित रूप से हमारे काम पर लागू होता है। जोहान सेबेस्टियन बाख की तरह, हमें अपने हर काम में दो तरह के आद्याक्षर जोड़ने चाहिए: अपने आद्याक्षर और SDG, अर्थात् सोली देओ ग्लोरिया के आद्याक्षर। और जब हम ऐसा करेंगे, तो हम पाएँगे कि भजनकार के शब्द सत्य हो जाते हैं। हम पाएँगे कि परमेश्वर की कृपा हम पर है, और वह अपने अनुग्रह से और अपनी महिमा के लिए, हमारे हाथों के काम को दृढ़ कर रहा है।
अन्तिम टिप्पणियाँ
- जॉन कैल्विन, द इंस्टीट्यूट्स ऑफ द क्रिश्चियन रिलिजन (The Institutes of the Christian Religion), तीसरी पुस्तक, अध्याय 20, खण्ड 6 (मैकनील और बैटल्स संस्करण, खण्ड 2), 724.
- जोनाथन एडवर्ड्स, “द स्पाइडर लेटर”, ए जोनाथन एडवर्ड्स रीडर (A Jonathan Edwards Reader) में, सम्पादक स्मिथ, स्टाउट और मिंकमा (येल यूनिवर्सिटी प्रेस, 1995), 5.