#2 मसीही होने का क्या अर्थ है
परिचय
मसीहियों के अस्तित्व का कारण यह है कि परमेश्वर दयालु है, और मसीही जीवन परमेश्वर की निरन्तर दया के प्रति हमारी निरन्तर प्रतिक्रिया है। पिछले वाक्य में “मसीही” शब्द का दो बार उपयोग किया गया है, और यह एक ऐसा शब्द है, जिसका उपयोग लोग अक्सर लोगों के एक समूह का संदर्भ देने के लिए या अपने स्वयं के जीवन के बारे में दावा करने के लिए कर सकते हैं। परन्तु एक मसीही व्यक्ति कौन है? इस शब्द की उत्पत्ति कहाँ से हुई?
“मसीही” उपाधि आरम्भ में गैर-मसीही लोगों के द्वारा बोला जाने वाला शब्द था। “मसीही” शब्द का उपयोग शिष्यों के विरोधियों ने मसीह का अनुसरण करने वाले लोगों को संदर्भित करने के लिए किया था। प्रेरितों 11:26 में, अन्ताकिया में “चेले सबसे पहले मसीही कहलाए”। मसीही शब्द का अर्थ “मसीह का अनुयायी” होता है, और यह वही उपाधि है, जिसे चेलों ने इसलिए अपनाया, क्योंकि वे वास्तव में मसीह के अनुयायी थे। यदि इस शब्द का अर्थ यही है, तो मसीह का अनुयायी होने का क्या अर्थ है?
यह क्षेत्रीय मार्गदर्शिका इस बात पर एक चिन्तन है कि मसीही होने का क्या अर्थ है।
ऑडियो मार्गदर्शिका
ऑडियो#2 मसीही होने का क्या अर्थ है
भाग I: मसीही क्या विश्वास करते हैं
यीशु के बारे में
मसीहियों की पहचान सबसे पहले उस बात से होती है, जिस पर वे यीशु के बारे में विश्वास करते हैं। जब यीशु ने अपने शिष्यों से पूछा कि “तुम मुझे क्या कहते हो?” (मत्ती 16:15), तो उन्हें इस सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न का उत्तर इसलिए देने की आवश्यकता थी, क्योंकि यीशु के बारे में किसी भी बात पर विश्वास करके आप मसीही नहीं बन सकते।
यदि कोई कहे कि यीशु तो “केवल एक मनुष्य था,” “वह तो केवल एक अच्छा शिक्षक था,” “उसने तो कभी भी परमेश्वर होने का दावा नहीं किया,” या “वह तो दूसरे प्राचीन भविष्यद्वक्ताओं के समान ही एक भविष्यद्वक्ता था,” अब ऐसे कथन मसीही शिक्षा के अनुरूप नहीं हैं।
मेअर क्रिश्चियेनिटी (Mere Christianity) में, लेखक सी. एस. लुईस ने इस गलत धारणा को स्पष्ट रूप से सम्बोधित किया है कि यीशु तो बस एक महान् नैतिक शिक्षक था।
मैं यहाँ किसी भी व्यक्ति को वह मूर्खतापूर्ण बात कहने से रोकने का प्रयत्न कर रहा हूँ, जो लोग अक्सर उसके बारे में कहते हैं: मैं यीशु को एक महान् नैतिक शिक्षक के रूप में स्वीकार करने के लिए तैयार हूँ, परन्तु मैं उसके परमेश्वर होने के दावे को स्वीकार नहीं करता हूँ। यह वही बात है, जो हमें नहीं कहनी चाहिए। एक व्यक्ति जो केवल एक मनुष्य था और जिसने यीशु के द्वारा कही गई बातों को बोला, वह एक महान् नैतिक शिक्षक नहीं हो सकता। वह या तो पागल होगा – अर्थात् उस व्यक्ति के स्तर पर होगा जो स्वयं को उबला हुआ अण्डा कहता है – या फिर वह नरक का शैतान होगा। आपको अपना विकल्प चुनना होगा। या तो यह व्यक्ति परमेश्वर का पुत्र था, और है, या फिर एक पागल या उससे भी बुरा कुछ है। आप उसे मूर्ख कहकर चुप करा सकते हैं, आप उस पर थूक सकते हैं और दानव मानकर उसकी हत्या कर सकते हैं या आप उसके पाँवों पर गिरकर उसे प्रभु और परमेश्वर कह सकते हैं, परन्तु आइए हम उसके महान् मानवीय शिक्षक होने के बारे में बचाव करने वाली कोई बकवास न करें। उसने इसे हमारे लिए खुला नहीं छोड़ा है। उसकी मंशा ऐसा करने की नहीं थी।
यीशु कौन है, इस बात पर नया नियम बहुत अधिक ध्यान देता है, और इसलिए हमें इस बिंदु को सही रीति से समझना होगा।
उदाहरण के लिए, चारों ही सुसमाचार अपने लेखन-कार्यों के आरम्भ में यीशु की पहचान का परिचय देते हैं। मत्ती 1:1 से, हम जानते हैं कि यीशु ही मसीह है, वही “दाऊद का पुत्र, अब्राहम का पुत्र” है। मरकुस 1:1 में, उसे “परमेश्वर का पुत्र” कहा गया है। लूका 1–2 अध्यायों में, यीशु ईश्वरीय-रूप से गर्भ में आया हुआ मरियम से जन्मा पुत्र है। यूहन्ना 1 अध्याय में, वह वही अनन्त वचन है, जो देहधारी हुआ।
जब पाठक चारों सुसमाचारों को देखते हैं, तो वे उस व्यक्ति पर दृष्टि कर रहे होते हैं, जिसके लिए सब वस्तुएँ रची गई थीं, और साथ ही उस व्यक्ति को भी जो सब वस्तुओं को छुड़ाने के लिए आया था। यीशु वास्तव में अलौकिक है, और उसने अपने ईश्वरत्व से समझौता किए बिना स्वयं को एक मानवीय स्वभाव में ढाल लिया। मसीही परम्परा ने हमें मसीह के व्यक्तित्व का वर्णन करने के लिए सहायक भाषा प्रदान की है। यीशु एक ऐसा व्यक्ति है, जिसके दो स्वभाव हैं, अर्थात् ईश्वरीय और मानवीय।
चौथी शताब्दी ईस्वी में लिखे गए, नीकिया के विश्वास वचन ने मसीह के व्यक्तित्व के बारे में बाइबल की शिक्षा को यह कहते हुए सारांशित किया कि परमेश्वर का पुत्र “सब युगों से पहले पिता से उत्पन्न हुआ; वह परमेश्वर से परमेश्वर, ज्योति से ज्योति, सत्य परमेश्वर से सत्य परमेश्वर है, जो उत्पन्न हुआ, न कि रचा गया; और वह पिता के समान तत्व का है; और उसी के द्वारा सब कुछ बनाया गया।”
यीशु कौन है, इस बारे में नये विश्वासियों को अपनी समझ में उन्नति करनी चाहिए और इसका अर्थ है कि ख्रिस्त-विज्ञान के रूप में ज्ञात सिद्धान्त पर चिन्तन करना। लम्बे समय से चली आ रही मसीही अंगीकार के वचन की परम्परा के द्वारा समर्थित पवित्रशास्त्र का अध्ययन, हमें यीशु के एक व्यक्तित्व और दो स्वभावों की पुष्टि करने के लिए प्रेरित करेगा। क्योंकि हम केवल यही जानते हैं कि एक स्वभाव वाला व्यक्ति होना कैसा होता है, इसलिए यीशु कौन है, इस बारे में हमें पवित्रशास्त्र का प्रकाशन प्राप्त करना होगा। उचित मसीही अंगीकार यीशु के अडिग ईश्वरत्व और वास्तविक मनुष्यत्व को स्वीकार करेगी।
यीशु कौन है, इसके प्रकाश में, मसीही उसके प्रभुत्व को स्वीकार करते हैं। यीशु प्रभुओं का प्रभु और राजाओं का राजा है (प्रका. 19:16)। हम उसकी सम्पूर्ण सम्प्रभुता (मत्ती 28:18), उसके धर्मी न्याय (यूह. 5:22), उसके महान् शासन (फिलि. 2:9) और उसकी अथाह बुद्धि (कुलु. 2:3) को स्वीकार करते हैं। पवित्र आत्मा के प्रकाशित करने वाले कार्य के द्वारा, हम यह अंगीकार करते हैं कि “यीशु ही प्रभु है” (1 कुरिं. 12:3)।
उद्धार के बारे में
मसीह के व्यक्तित्व पर चिन्तन करने के अतिरिक्त, हमें मसीह के कार्य पर भी विचार करना होगा। मसीह का व्यक्तित्व और कार्य हमारे ख्रिस्तीय-विज्ञान से जुड़े हुए अंगीकार के दो स्तम्भ हैं।
मसीही यह विश्वास करते हैं कि पुत्र का देहधारण कुँवारी मरियम पर पवित्र आत्मा के कार्य के द्वारा पूरा हुआ था, और इस कुँवारी के गर्भधारण ने यीशु के निष्पाप मानवीय स्वभाव को सुनिश्चित किया। जैसे-जैसे यीशु बड़ा हुआ, उसकी परीक्षा की गई, फिर भी उसने कभी पाप नहीं किया (इब्रा. 4:15)। चारों सुसमाचार यीशु की उस सांसारिक सेवकाई का वर्णन करते हैं, जिसमें उसने बीमारों को चंगा किया, दुष्टात्माओं को वश में किया, और अपने पार्थिव मिशन को पूरा किया।
उसके मिशन का समापन क्रूस का कार्य था। वह निष्पाप व्यक्ति हमारे लिए पाप बन गया (2 कुरिं. 5:21)। परमेश्वर का पुत्र हमारे बदले में क्रूस पर चढ़ाया गया, और उसने परमेश्वर का क्रोध इसलिए सहन किया, जिससे कि हम परमेश्वर की सन्तान बन सकें (रोमि. 3:25)। पाप की मजदूरी तो मृत्यु है (रोमि. 6:23), परन्तु सुसमाचार का सन्देश यह है कि यीशु ने हमारे लिए इस मजदूरी को चुका दिया है। अत: मसीही लोग यह अंगीकार करते हैं कि यीशु ही हमारा विश्वासयोग्य विकल्प, अर्थात् पाप हर लेने वाला और न्याय को संतुष्ट करने वाला है।
तो फिर, क्रूस पर यीशु की मृत्यु पराजय नहीं, बल्कि विजय है। क्रूस का कार्य इसलिए नहीं हुआ, क्योंकि सब कुछ पटरी पर से उतर गया था, बल्कि इसलिए हुआ, क्योंकि उसकी सेवकाई में सब कुछ उस पड़ाव की ओर, अर्थात् यरूशलेम नगर के बाहर उस स्थान की ओर ले जा रहा था। वह जो प्रतिज्ञा किया गया राजा और उद्धारकर्ता था, “हमारे अधर्म के कामों के कारण कुचला गया; हमारी ही शान्ति के लिए उस पर ताड़ना पड़ी, कि उसके कोड़े खाने से हम लोग चंगे हो जाएँ। हम तो सब के सब भेड़ों के समान भटक गए थे; हम में से हर एक ने अपना अपना मार्ग लिया; और यहोवा ने हम सभों के अधर्म का बोझ उसी पर लाद दिया” (यशा. 53:5–6)।
क्रूस के द्वारा, प्रभु यीशु पापियों के लिए उद्धार लेकर आया। उसने यह कैसे किया? उसने अपनी देह और लहू के द्वारा एक नयी वाचा स्थापित की (इब्रा. 8:6–12)।
इस नयी वाचा में, क्रोध से छुटकारा मिलता है। उसकी क्रूस पर विजय के बाद उसे धर्मी ठहराया गया। यीशु का यह धर्मी ठहराया जाना मरे हुओं में से उसका पुनरुत्थान था। देहधारी पुत्र को महिमामय मानवता में, अर्थात् एक ऐसी देह में जिलाया गया, जो मर नहीं सकती, जो देहधारी महिमा और अमरता वाली देह है।
मसीही लोग यीशु की मृत्यु और पुनरुत्थान का अंगीकार करते हैं और उसके गीत गाते हैं। उद्धार की सामर्थ्य और परमेश्वर की बुद्धि ही क्रूस है (1 कुरिं. 1:18–25)। हम इसलिए क्रूस का प्रचार करते, उस पर आनन्दित होते, और घमण्ड करते हैं, क्योंकि “क्रूस” मसीह की पार्थिव सेवकाई के समापन पर विजय का संक्षिप्त रूप है। हमारे पाप और शर्म को सहते हुए, उसने एक वैकल्पिक प्रायश्चित को पूरा किया।
यीशु कौन है और उसने क्या किया है, यह स्पष्ट करते हुए वह हमें बताता है, “मार्ग और सत्य और जीवन मैं ही हूँ; बिना मेरे द्वारा कोई पिता के पास नहीं पहुँच सकता” (यूह. 14:6)। उसका दावा विशिष्ट है: मसीह के अतिरिक्त उद्धार या अनन्त जीवन का कोई दूसरा मार्ग नहीं है। इसकी घोषणा तो प्रेरितों ने भी की और साथ ही पतरस ने अपने सुनने वालों से कहा, “किसी दूसरे के द्वारा उद्धार नहीं; क्योंकि स्वर्ग के नीचे मनुष्यों में और कोई दूसरा नाम नहीं दिया गया, जिसके द्वारा हम उद्धार पा सकें” (प्रेरि. 4:12)।
क्रूस और खाली कब्र की विजय, उस व्यक्ति का पक्का प्रमाण है, जिसे उद्धार और अनन्त जीवन के लिए परमेश्वर ने हमें दिया है। मसीह के पुनरुत्थान के चालीस दिन बाद, वह पिता के पास ऊपर चढ़ गया (प्रेरि. 1:9–11; इब्रा. 1:3), जहाँ वह अपने बैरियों को वश में करते हुए सब वस्तुओं पर शासन करता है और अपनी महिमामय वापसी की तैयारी कर रहा है (मत्ती 25:31–46; 1 कुरिं 15:25–28)।
यीशु कौन है, इसके बारे में सच्ची बात का मसीही लोग अंगीकार करते हैं और जो कुछ भी उसने किया है, उसके अद्भुत काम का आनन्द मनाते हैं। नीकिया के विश्वास वचन में हम कहते हैं, कि यीशु “मनुष्य बना; और पुन्तियुस पिलातुस के अधीन हमारे लिए क्रूस पर भी चढ़ाया गया; और उसने दुःख उठाया और गाड़ा गया, और पवित्रशास्त्र के अनुसार वह तीसरे दिन जी उठा, और स्वर्ग पर चढ़ गया और पिता के दाहिने हाथ पर बैठा है।”
विश्वास के बारे में
मसीही वे लोग हैं, जो विश्वास करते हैं, अर्थात् वे विश्वास करने वाले लोग हैं। यद्यपि, वे केवल काल्पनिक अर्थ में विश्वास नहीं करते। किसी वस्तु को अपने शरणस्थान के रूप में गिने बिना उसके अस्तित्व पर विश्वास करना सम्भव है। परमेश्वर ने जो प्रकट किया है, उसके प्रति विश्वास की प्रतिक्रिया ही बाइबल का विश्वास है, और इसका अर्थ मसीह के पास वह सब कुछ प्राप्त करने के लिए तैयारी के साथ खाली हाथ आना है, जो मसीह अपने लोगों के लिए है।
विश्वास करने वाले लोग ही मसीही हैं, और हमारे विश्वास का उद्देश्य मसीह है। हम उसके दावों पर, उसके कार्यों पर, उसकी विजय पर, उसकी सामर्थ्य पर, उसकी प्रतिज्ञाओं पर, उसकी वाचा पर भरोसा कर रहे हैं। यीशु की ओर ताकना ही बाइबल आधारित विश्वास है।
मसीही कर्मों की भी परवाह करते हैं — जिन्हें आज्ञाकारिता के रूप में भी जाना जाता है — परन्तु ये सच्चे विश्वास का फल होते हैं। विश्वास करने का अर्थ निर्भर रहना, अर्थात् उद्धारकर्ता और उद्धारक होने के लिए मसीह पर निर्भर रहना है। यह विश्वास अंधा नहीं है; परन्तु परमेश्वर ने अपने पुत्र के बारे में जो कहा है, यह उसका उत्तर है। इस कारण, विश्वास करने का अर्थ, यीशु के वचन पर भरोसा करना है।
यूहन्ना 3:16 यह प्रतिज्ञा करते हुए पाठक को मसीह पर विश्वास करने की ओर ले जाता है, “जो कोई उस पर विश्वास करे वह नष्ट न हो, परन्तु अनन्त जीवन पाए।” मसीही वे लोग हैं, जिन्होंने मसीह पर विश्वास किया है। इस तरह के विश्वास की उपस्थिति स्वयं परमेश्वर की ओर से वरदान है, जैसे पौलुस इफिसियों 2:8-9 में वर्णन करता है: “क्योंकि विश्वास के द्वारा अनुग्रह ही से तुम्हारा उद्धार हुआ है; और यह तुम्हारी ओर से नहीं, वरन् परमेश्वर का दान है, और न कर्मों के कारण, ऐसा न हो कि कोई घमण्ड करे।”
एक मसीही व्यक्ति के विश्वास को केवल निर्णय लेने, अर्थात् इच्छा के कार्य तक सीमित नहीं किया जा सकता। मसीह पर भरोसा करना कुछ ऐसा है, जिसे हम उस समय करते हैं, जब हम सही रीति से समझ पाते हैं कि वह कौन है और उसने क्या किया है। और मसीह की यह धारणा आत्मा के पिछले कार्य का परिणाम है। यीशु ने आत्मा के कार्य और हमारी प्रतिक्रिया के बारे में “खींचे जाने” के संदर्भ में बात की। उसने कहा, “कोई मेरे पास नहीं आ सकता जब तक पिता, जिसने मुझे भेजा है, उसे खींच न ले” (यूह. 6:44)। इसके अतिरिक्त, “जब तक किसी को पिता की ओर से यह वरदान न दिया जाए तब तक वह मेरे पास नहीं आ सकता” (यूह. 6:65)।
विश्वास करने का अर्थ मसीह के पास आना है, और मसीह के पास आना कुछ ऐसा होता है, जिसे पापी उस समय करते हैं, जब परमेश्वर का आत्मा उन्हें नया जन्म देता है। विश्वास करना परमेश्वर की दया के प्रति विश्वासपूर्ण प्रतिक्रिया है: “परन्तु जितनों ने उसे ग्रहण किया, उसने उन्हें परमेश्वर की सन्तान होने का अधिकार दिया, अर्थात् उन्हें जो उसके नाम पर विश्वास रखते हैं। वे न तो लहू से, न शरीर की इच्छा से, न मनुष्य की इच्छा से, परन्तु परमेश्वर से उत्पन्न हुए हैं” (यूह. 1:12-13)। जब पापी मसीह पर विश्वास करते हैं, तो परमेश्वर को उसके नवजीवन और दयापूर्ण कार्य के लिए महिमा मिलनी चाहिए।
मन फिराने के बारे में
अक्सर एक साथ बोले जाने वाले शब्दों की जोड़ी “विश्वास” और “मन फिराना” है। पहले के बारे में विचार करने के बाद, हमें दूसरे के बारे में विचार करना चाहिए।
मरकुस 1 अध्याय में जब यीशु गलील में प्रचार कर रहा था, तो उसने कहा, “समय पूरा हुआ है, और परमेश्वर का राज्य निकट आ गया है; मन फिराओ और सुसमाचार पर विश्वास करो” (मर. 1:15)। प्रेरितों 2 अध्याय में पतरस के द्वारा प्रचार किए जाने के बाद, सुनने वालों के हृदय छिद गए और उन्होंने पूछा कि वे क्या करें। पतरस ने कहा, “मन फिराओ, और तुम में से हर एक अपने अपने पापों की क्षमा के लिए यीशु मसीह के नाम से बपतिस्मा ले; तो तुम पवित्र आत्मा का दान पाओगे” (प्रेरि. 2:38)।
यदि विश्वास करने का अर्थ किसी की ओर मुड़ना होता है, तो मन फिराने का अर्थ किसी की ओर से मुड़ना होता है। जब हम मसीह पर भरोसा करते हैं कि वह हमारा उद्धारकर्ता और प्रभु है, तब हम अनिवार्य रूप से झूठी मूर्तियों और परमेश्वर का अपमान करने वाले जीवन जीने के तरीकों से दूर हो जाएँगे। इस कारण, विश्वास करना और मन फिराना एक दूसरे से जुड़े हुए हैं — और यद्यपि ये एक समान नहीं हैं — परन्तु ये धारणाएँ हैं। पौलुस को थिस्सलुनीकियों के बारे में एक समाचार की जानकारी थी, जो इस प्रकार थी: “क्योंकि वे आप ही हमारे विषय में बताते हैं कि तुम्हारे पास हमारा आना कैसा हुआ; और तुम कैसे मूरतों से परमेश्वर की ओर फिरे ताकि जीवते और सच्चे परमेश्वर की सेवा करो” (1 थिस्स. 1:9)।
चूँकि हृदय परिवर्तन का अर्थ तात्कालिक नैतिक पूर्णता नहीं है, इसलिए मसीही जीवन पाप के फंदे और झूठ का सामना करता रहेगा, और इसी प्रकार मन फिराना भी एक बार का कार्य नहीं है। मसीही ऐसे पापी नहीं हैं, जिन्होंने मन फिराया है; वे ऐसे पापी हैं, जो मन फिरा रहे हैं। मार्टिन लूथर ने अपने पंचानवे सिद्धान्तों में से सबसे पहले में इस विचार को व्यक्त किया: “जब हमारे प्रभु और स्वामी यीशु मसीह ने कहा, ‘मन फिराओ’ (मत्ती 4:17), तो उसने इच्छा की थी कि विश्वासियों की सम्पूर्ण जीवन मन फिराव वाला जीवन बन जाए।”
विश्वासी विश्वास करने और मन फिराने में दृढ़ बने रहते हैं। हम मसीह की ओर ताकते रहते हैं और हम पाप से दूर होते रहते हैं। हम मसीह की प्रतिज्ञाओं पर भरोसा करते रहते हैं और हम इस युग की मूर्तियों को अस्वीकार करते रहते हैं। इस कारण, हृदय परिवर्तन के समय के साथ-साथ शिष्यत्व में भी, विश्वास करना और मन फिराना एक मसीही व्यक्ति के जीवन को चिन्हित करते हैं।
मसीही यह अंगीकार करते हैं कि परमेश्वर उन लोगों का उद्धार करता है, जो विश्वास करके मसीह के पास आते हैं और अपने पापों से मन फिराते हैं। जैसे पौलुस ने रोमियों 10:9 में लिखा है, “यदि तू अपने मुँह से यीशु को प्रभु जानकर अंगीकार करे, और अपने मन से विश्वास करे कि परमेश्वर ने उसे मरे हुओं में से जिलाया, तो तू निश्चय उद्धार पाएगा।”
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चर्चा एवं मनन:
- क्या ऐसे तरीके मौजूद हैं, जिनकी आपको यीशु, उद्धार, विश्वास और मन फिराने के बारे में अपने ज्ञान में वृद्धि करने के लिए आवश्यकता है? इस तरीके से उन्नति करने के लिए आप क्या कर रहे हैं?
- यह देखने के लिए ऊपर दिए गए प्रत्येक विषय का संक्षिप्त सारांश लिखने का प्रयत्न करें कि क्या आप इन सत्यों को स्पष्ट और संक्षिप्त रूप से व्यक्त कर सकते हैं।
- मसीही सत्य के वे अन्य क्षेत्र कौन से हैं, जिनका आप अनुसरण करना चाहते हैं?
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भाग II: आपके उद्धार की तस्वीरें
यीशु, उद्धार, विश्वास और मन फिराने के बारे में सही रीति से सोचने और विश्वास करने के अतिरिक्त, मसीहियों को उस तरीके पर भी ध्यान देना चाहिए, जिससे बाइबल उनके जीवनों में परमेश्वर के उद्धार वाले कार्य का वर्णन करती है। बाइबल हमारी कल्पना के लिए ऐसे कई विवरण और चित्र प्रदान करती है। हमारे उद्धार की वास्तविकता के माध्यम से सोचने के लिए, आइए हम उन पाँच चित्रों पर विचार करें, जो मसीह में आपकी नयी पहचान को आकार प्रदान करते हैं।
अन्धकार से ज्योति तक
अलौकिक दया के कारण, हमारी आत्मिक स्थिति बदल गई है। पहले हम आत्मिक अन्धकार में थे, परन्तु आत्मा का कार्य हमें ज्योति में ले आया है। आत्मिक क्षेत्रों में एक बदलाव हुआ है।
पौलुस ने लिखा कि परमेश्वर ने हमें “अन्धकार के वश से छुड़ाया है” (कुलु. 1:13)। अब हम “ज्योति की सन्तान और दिन की सन्तान हैं; हम न रात के हैं, न अन्धकार के हैं” (1 थिस्स. 5:5)। अन्धकार अविश्वास और अनाज्ञाकारिता का क्षेत्र है। आत्मिक अन्धकार में हम परमेश्वर को नहीं जानते थे।
सुसमाचार के सन्देश के माध्यम से, मसीह ने “तुम्हें अन्धकार में से अपनी अद्भुत ज्योति में बुलाया है” (1 पत. 2:9)। ज्योति के विषय में उद्धार के क्षेत्र के रूप में विचार करें, और यहीं पर परमेश्वर की दया हमें लेकर आई है। यह “ज्योति” हमारा स्थायी क्षेत्र है। हम क्षेत्रों के बीच आगे-पीछे नहीं घूमते। परमेश्वर के उद्धार करने वाले अनुग्रह ने हमें आत्मिक रूप से प्रत्यारोपित किया है। अन्धकार हमारा अतीत था, परन्तु ज्योति हमारा वर्तमान और भविष्य है।
मृत्यु से जीवन तक
आत्मिक अन्धकार आत्मिक मृत्यु का लोक है। हृदय परिवर्तन से पहले, पापी लोग आत्मिक जीवन से रहित होने के कारण अपने पापों में मरे हुए होते हैं।
यद्यपि वे शारीरिक रूप से जीवित हों, तौभी पापी लोग इफिसियों 2 अध्याय में पौलुस के द्वारा वर्णन की गई आत्मिक दशा में वास करते हैं। उसने लिखा, “तुम जो अपने अपराधों और पापों के कारण मरे हुए थे, जिनमें तुम पहले इस संसार की रीति पर… चलते थे” (इफि. 2:1–2)। यह आत्मिक मृत्यु एक असहाय दशा है, जिस पर अकेला व्यक्ति विजय नहीं पा सकता।
केवल एक ही बात जो आत्मिक मृत्यु पर विजय पा सकती है, वह आत्मिक जीवन है, और इस जीवन को देने वाला परमेश्वर है। इस कारण, इफिसियों 2:4–5 के शब्द प्रत्येक मसीही व्यक्ति की गवाही हैं: “परन्तु परमेश्वर ने जो दया का धनी है, अपने उस बड़े प्रेम के कारण जिस से उसने हम से प्रेम किया, जब हम अपराधों के कारण मरे हुए थे – तो हमें मसीह के साथ जिलाया (अनुग्रह ही से तुम्हारा उद्धार हुआ है)।”
प्रभु यीशु ने दावा किया कि वह अपने भीतर वही जीवन रखता है जिसकी हमें आवश्यकता है। उसने कहा, “जीवन की रोटी मैं हूँ” (यूह. 6:35)। और “जो कोई यह रोटी खाएगा, वह सर्वदा जीवित रहेगा” (यूह. 6:58)। उद्धार पाने का अर्थ है कि आप अब आत्मिक रूप से मरे हुए नहीं हैं। क्योंकि आपके पास मसीह है, इसलिए आपके पास जीवन है, अर्थात् उसमें अनन्त जीवन है। “उसमें जीवन था, और वह जीवन मनुष्यों की ज्योति था” (यूह. 1:4)।
दासत्व से स्वतंत्रता तक
आत्मिक अन्धकार और मृत्यु के क्षेत्र में, पापी बंधे हुए हैं। पाप का ऐसा दासत्व विद्यमान है, जो हमारी समस्या की गम्भीरता और अपराध के उत्पीड़न की पुष्टि करता है। हमारी इच्छा दुष्टता करने के लिए प्रतिबद्ध है। हमारी इच्छा हाशिए पर नहीं है, बल्कि यह परमेश्वर के प्रति शत्रुता से भरी हुई है।
हमें स्वतंत्रता की आवश्यकता है। हमें बंधन से आत्मिक निर्गमन की आवश्यकता है। पौलुस ने उद्धार को ठीक इसी रूप में दर्शाया। वह कहता है, “हम जानते हैं कि हमारा पुराना मनुष्यत्व उसके साथ क्रूस पर चढ़ाया गया ताकि पाप का शरीर व्यर्थ हो जाए, और हम आगे को पाप के दासत्व में न रहें। क्योंकि जो मर गया, वह पाप से छूटकर धर्मी ठहरा” (रोमि. 6:6–7)।
इस्राएलियों को पता था कि निर्गमन से आकार लेने वाले लोग कौन होते हैं। निर्गमन की पुस्तक में, परमेश्वर ने उनकी बंधुआई पर विजय प्राप्त करके उन्हें स्वतंत्र किया। पुराने नियम का वह खाका उस छुटकारे को आकार देता है, जिसका अनुभव पापी मसीह में करते हैं। एक बार पाप की बंधुआई में जाने के बाद, हम प्रभु यीशु के द्वारा स्वतंत्र हो जाते हैं। हम “पाप से छुड़ाए” गए हैं (रोमि. 6:18)।
एक समय पर पाप हमारा स्वामी था, और पाप की मजदूरी मृत्यु थी। परन्तु परमेश्वर अपनी महान् सामर्थ्य और असीम दया से हमें बंधुआई से बाहर निकालकर अपनी ज्योति और जीवन की स्वतंत्रता में ले आया है। आत्मा ने आपको “मसीह यीशु में पाप की और मृत्यु की व्यवस्था से स्वतंत्र कर दिया” (रोमि. 8:2)।
दोषी ठहराए जाने से धर्मी ठहराए जाने तक
जब हम आत्मिक मृत्यु और बंधन के अन्धकार में रहते थे, तो हम दोषी ठहराए जाने के योग्य थे, जो कि परमेश्वर का धर्मी न्याय था। हालाँकि, सुसमाचार का सन्देश यह है कि परमेश्वर मसीह में पापियों को क्षमा करता है और अपने अनुग्रह से उन्हें धर्मी ठहराता है।
यह धर्मी ठहराया जाना पापी व्यक्ति की योग्यता पर आधारित नहीं होता। पापी न्याय किए जाने के योग्य है, धर्मी ठहराए जाने के नहीं। क्रूस का मौलिक सुसमाचार यह है कि दोषियों के लिए क्षमा इसलिए उपलब्ध है, क्योंकि मसीह हमारे पापों के लिए प्रायश्चित वाला बलिदान है।
धर्मी ठहराया जाना उस समय होता है, जब परमेश्वर आगे को हमारे पापों को हमारे विरुद्ध न गिने। वह हमें सही घोषित करता है, इसलिए नहीं कि हम निर्दोष हैं, बल्कि इसलिए कि विश्वास के द्वारा मसीह हमारा शरणस्थान बन गया है। विश्वास के द्वारा अनुग्रह से, परमेश्वर अधर्मी को धर्मी ठहराता है। कोई भी पापी व्यक्ति अपने स्वयं के कार्यों, अपने स्वयं के प्रयत्नों या सुधारों से धर्मी नहीं ठहराया जा सकता। धर्मी ठहराया जाना केवल अनुग्रह से, केवल मसीह में, और केवल विश्वास के द्वारा होता है।
रोमियों 4:3 में पौलुस ने उत्पत्ति 15:6 को उद्धृत किया है, और रोमियों 4:7-8 में उसने भजन 32:1-2 को यह दिखाने के लिए उद्धृत किया है कि अनुग्रह से धर्मी ठहराया जाना पुराने नियम और नये नियम दोनों में पापियों के निमित्त सुसमाचार था। पापी लोग अपने स्वयं के कार्यों से धर्मी नहीं ठहराए जाते। बल्कि, पापी लोग विश्वास करके मसीह के पास आते हैं और अनुग्रह से उद्धार प्राप्त करते हैं, जो उन्हें परमेश्वर की दृष्टि में धर्मी ठहराता है। हमारे पापों को हमारे विरुद्ध इसलिए नहीं गिना जाता, क्योंकि वे क्रूस पर मसीह के लिए गिने गए थे। परमेश्वर अब अपने पुत्र में हमारे प्रति एक “धर्मी स्थिति” की गिनती करता है।
शत्रुता से मित्रता तक
उन लोगों के रूप में जो अन्धकार से ज्योति में और मृत्यु से जीवन में लाए गए हैं, जो पाप के बंधन से स्वतंत्र हो गए हैं और विश्वास के द्वारा अनुग्रह से धर्मी ठहराए गए हैं, हम अब क्रूस के बैरी नहीं हैं। सुसमाचार की मेल कराने वाली सामर्थ्य के द्वारा, परमेश्वर ने अपने बैरियों को अपना मित्र बना लिया है।
पौलुस ने लिखा कि “जब हम पापी ही थे, तभी मसीह हमारे लिए मरा” (रोमि. 5:8) और इससे पहले कि परमेश्वर ने मसीह के माध्यम से हमारा मेल कराया, हम उसके “बैरी” थे (5:10)। क्योंकि हमारी इच्छा को फिर से नया कर दिया गया है और हमारी आँखें खुल चुकी हैं, इसलिए हम परमेश्वर के साथ मेल न होने वाले रिश्ते की शत्रुता का नहीं, बल्कि मेल वाली मित्रता का अनुभव करते हैं। अब्राहम परमेश्वर का मित्र था (यशा. 41:8), और जिस व्यक्ति के पास अब्राहम का विश्वास है – वह ऐसा ही है, अर्थात् ऐसा विश्वास जो प्रभु पर भरोसा करे।
क्षमा का उद्देश्य यह है कि हम परमेश्वर के साथ सही रिश्ता रख सकें। परमेश्वर के दयालु उद्धार का उद्देश्य यह है कि वह हमारे उस पाप को ढाँप सके, जिसने हमें उसकी आशीष और अनुग्रह से दूर कर दिया है। पतरस इसे इस तरह से कहता है: “इसलिए कि मसीह ने भी, अर्थात् अधर्मियों के लिए धर्मी ने, पापों के कारण एक बार दु: ख उठाया, ताकि हमें परमेश्वर के पास पहुँचाए” (1 पत. 3:18)। अब परमेश्वर के पास लाए जाने पर, हम मसीह में उसके साथ संगति करते हैं।
यीशु के हमसे कहे गए ये शब्द सुनें: “अब से मैं तुम्हें दास न कहूँगा, क्योंकि दास नहीं जानता कि उसका स्वामी क्या करता है; परन्तु मैं ने तुम्हें मित्र कहा है…” (यूह. 15:15)।
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चर्चा एवं मनन:
- आपके उद्धार के सम्बन्ध में ऊपर दिए गए चित्रों में से क्या कोई भी आपके अनुभव का विशेष रूप से वर्णन करता है? जब आप अपनी गवाही साझा करते हैं, तो क्या आप बाइबल की इन छवियों को काम में लाते हैं?
- इन महिमामय चित्रों में वर्णन की गई सभी बातों को पूरा करने में आपके जीवन में उनके काम के लिए परमेश्वर की स्तुति और धन्यवाद करने के लिए कुछ समय निकालें।
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भाग III: विश्वास का फल
उद्धार के पहले वाले एक चित्र को याद करते हुए, ज्योति का क्षेत्र वह स्थान है, जहाँ हम रहते हैं। परमेश्वर ने हमें आत्मिक अन्धकार से बचाया है। जबकि परमेश्वर की आत्मा का दयालु कार्य कुछ ऐसा है, जो उसने हमारे लिए किया है, इसलिए शिष्य का जीवन निष्क्रिय नहीं है। अब “जैसा वह (अर्थात् मसीह) ज्योति में है, वैसे ही हम भी ज्योति में चलें” (1 यूह. 1:7)। ज्योति में चलने का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है कि हम आज्ञाकारिता में चलते हैं।
आज्ञा पालन करना सिखाया गया
यीशु ने स्वर्ग जाने से पहले, अपने शिष्यों को इन याद रखे जाने वाले शब्दों में आज्ञा दी: “इसलिए तुम जाओ, सब जातियों के लोगों को चेला बनाओ; और उन्हें पिता, और पुत्र, और पवित्र आत्मा के नाम से बपतिस्मा दो, और उन्हें सब बातें जो मैं ने तुम्हें आज्ञा दी है, मानना सिखाओ: और देखो, मैं जगत के अन्त तक सदा तुम्हारे संग हूँ” (मत्ती 28:19–20)।
मसीह का अनुसरण करने में सिखाया जाना शामिल है, और जो हमें सिखाया जाता है, उसमें मसीह की आज्ञाओं का पालन करना (आज्ञा मानना) शामिल है। सभी वस्तुओं पर मसीह का अधिकार होने के कारण आज्ञाकारिता मसीही जीवन के लिए उचित है। स्वर्ग और पृथ्वी का सारा अधिकार उसके पास है (मत्ती 28:18)। अधिकार के इस अभिप्राय को देखते हुए, जो हमारे जीवनों के हर पहलू पर लागू होता है, हमें मसीह का अनुसरण करते समय उसकी आज्ञाओं पर ध्यान देना चाहिए।
केवल मसीह की आज्ञा मानना ही हमारी जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि हमें दूसरों को भी आज्ञाकारिता के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। मत्ती 28:19-20 के अनुसार, चेले बनाने का एक भाग उन्हें यह सिखाना है कि मसीह अपने शिष्यों के जीवन के लिए क्या इच्छा रखता है। हम कैसे सीखते हैं? हम निर्देश और अनुकरण के माध्यम से सीखते हैं।
निर्देश और अनुकरण
सीखने वाले लोग ही शिष्य होते हैं, और सीखने वाले लोग निर्देशों की परवाह करते हैं। मसीह का अनुसरण करने के लिए जिन सब बातों को हमें जानना चाहिए, उन सब को पहले से ही जानकर हम मसीही नहीं बन जाते। एक शिष्य की सीखने की यात्रा आजीवन चलती रहती है। हमें बाइबल-का-प्रचार करने वाली, पवित्रशास्त्र-आधारित स्थानीय कलीसिया से निर्देश प्राप्त करना चाहिए, और हमें बुद्धिमानी से परमेश्वर के साथ चलने वाले विश्वासियों के साथ संगति करनी चाहिए, जिससे कि हम उनका अनुकरण कर सकें।
निर्देश में समय इसलिए लगता है, क्योंकि हम एक बार में सब कुछ नहीं सीख सकते। बाइबल आधारित विषय के बारे में जो मसीही शिक्षण होता है, उसे सिद्धान्त कहा जाता है। और सिद्धान्त तो सारे ही महत्वपूर्ण होते हैं, परन्तु हर सिद्धान्त एक समान रूप से महत्वपूर्ण नहीं होता। इस प्रक्रिया में जाने के प्राथमिक सिद्धान्त ये हैं, जैसे कि त्रिएकत्व, मसीह के व्यक्तित्व और स्वभाव और उद्धार के अनुग्रह के बारे में सिद्धान्त। हमें अन्य सिद्धान्तों के बारे में भी सीखना होगा, जो हमें दूसरे दर्जे के मुद्दों में ले जाते हैं, जैसे कलीसियाई प्रशासन व्यवस्था और अध्यादेशों का संचालन करना। कुछ सिद्धान्त तीसरे दर्जे की हैसियत रखते हैं, जैसे सहस्राब्दी या पृथ्वी की आयु का दृष्टिकोण।
जबकि हम मसीह के शिष्यों के रूप में सीखने को महत्व देते हैं, तो हमारी शिक्षा केवल दिमागी नहीं हो सकती। ज्ञान का लागू किया जाना इसलिए आवश्यक है, क्योंकि इस तरह के अनुप्रयोग से ही बुद्धिमानी से भरे जीवन का निर्माण होता है। बाइबल की शिक्षाओं को सीखना ही हमारे मनों में जीवन भर के लिए एक बाइबल आधारित सांसारिक दृष्टिकोण बनाने में सहायता करता है।
औपचारिक निर्देश के अतिरिक्त, हमारे आसपास के भक्त विश्वासियों के उदाहरण हमारे जीवन को प्रभावित कर सकते हैं। मसीही विश्वास सिखाया जाता है और इसे अपनाया जाता है। जब हम दूसरे लोगों के साथ जो ज्योति में चलने की खोज में हैं, जीवनों को साझा करते हैं, तो हमें सीधे-सीधे मालूम होता है कि वे अपने शब्दों का उपयोग कैसे करते हैं और वे कौन से कार्य करते हैं। निश्चित रूप से सभी चेले असिद्ध हैं, परन्तु हमें उदाहरण और अनुकरण की सामर्थ्य को कम नहीं समझना चाहिए।
क्रूस उठाना
यीशु हमें उसका अनुसरण करने वाले जीवन के लिए बुलाता है, और वह जीवन एक पवित्र जीवन है। निर्देश और अनुकरण के माध्यम से, हम सीख रहे हैं कि परमेश्वर की महिमा के लिए अलग होकर जीवन बिताने का क्या अर्थ है।
यीशु ने सिखाया, “जो कोई मेरे पीछे आना चाहे, वह अपने आपे से इन्कार करे और अपना क्रूस उठाकर, मेरे पीछे हो ले” (मर. 8:34)। यीशु का अनुसरण करने में पाप से फिरना शामिल है, और पाप से फिरने के लिए आत्म-त्याग की आवश्यकता होती है। हमारी पापी इच्छाएँ पूर्ति की लालसा करती हैं, इसलिए यीशु अपने आपे से इन्कार करने की बात करता है। यह अपने आपे से इन्कार हमारी अपमानजनक इच्छाओं के अनुसार चलने से इन्कार करना है।
जबकि यह संसार हमें कहता है, “अपने मन की करो”, तौभी यीशु हमें उसका अनुसरण करने और अपने आपे से इन्कार करने के लिए कहता है। “क्रूस” शब्द अमल में लाए जाने की एक छवि है। हमारे आधुनिक समय में, क्रूस को आभूषण के रूप में पहना जाता है और सजावट के रूप में दीवारों पर लगाया जाता है। यद्यपि, क्रूस की क्रूरता पर विचार किया जाना चाहिए। क्रूस एक यातना से भरी हुई मृत्यु को अमल में लाए जाने का एक तरीका था।
मरकुस 8:34 में यीशु के शब्द मृत्यु के माध्यम से जीवन के लिए एक बुलाहट हैं। डिट्रिच बोनहोफर सही कहते हैं: “जब मसीह किसी व्यक्ति को बुलाता है, तो वह उसे आकर मरने के लिए कहता है।”
चेला एक क्रूस के आकार वाले मार्ग पर चलता है। यह महंगे शिष्यत्व का मार्ग है।
मसीह के साथ हमारी एकता के कारण, पाप के साथ हमारा रिश्ता बदल गया है। पौलुस ने लिखा, “ऐसे ही तुम भी अपने आप को पाप के लिए तो मरा, परन्तु परमेश्वर के लिए मसीह यीशु में जीवित समझो। इसलिए पाप तुम्हारे नश्वर शरीर में राज्य न करे, कि तुम उसकी लालसाओं के अधीन रहो” (रोमि. 6:11-12)। क्रूस उठाना पाप के लिए मरा हुआ होने का चित्रण है। और जिस तरह मसीह का मार्ग क्रूस से होकर पुनरुत्थान के जीवन की ओर था, ठीक उसी तरह चेले का मार्ग मृत्यु के माध्यम से जीवन है। पाप के लिए मरा हुआ होने का अर्थ परमेश्वर के लिए जीवित होना है अर्थात् वह जीवन जो वास्तव में जीवन है।
कार्यों का महत्व
हमें ऐसे व्यक्ति से क्या कहना चाहिए, जो दावा करे कि हमें उस मसीह की आज्ञा नहीं माननी चाहिए, जिसका हम अंगीकार करते हैं? हमें स्पष्ट रूप से आज्ञा मानने के लिए पवित्रशास्त्र की बुलाहट को सिखाना होगा, और चेतावनी देनी होगी कि मसीह की आज्ञा मानने से इन्कार करना, आत्मिक जीवन की कमी का संकेत हो सकता है। आइए इन दो बातों पर चिन्तन करें।
इफिसियों 2 अध्याय में, पौलुस सभी मसीहियों की गवाही लिखता है: हम अपने अपराधों की मृत्यु से आत्मिक रूप से जिलाए गए हैं, और अब हम मसीह के साथ जीवित हैं (इफि. 2:4–6)। पौलुस कहता है कि हम “मसीह यीशु में उन भले कामों के लिए सृजे गए जिन्हें परमेश्वर ने पहले से हमारे करने के लिए तैयार किया” (2:10)। जैसे याकूब भी समझाता है, “अत: जैसे देह आत्मा बिना मरी हुई है, वैसा ही विश्वास भी कर्म बिना मरा हुआ है” (याकू. 2:26)। सच्चे विश्वास का आधार भले काम नहीं हैं, परन्तु वे सच्चे विश्वास की वास्तविकता की पुष्टि करते हैं।
जो लोग मसीह को जानने का दावा करते हैं, परन्तु उसकी आज्ञा मानने का प्रयत्न नहीं करते, उन्हें प्रेरित यूहन्ना की चेतावनी पर विचार करना चाहिए। वह कहता है कि, “यदि हम कहें कि उसके साथ हमारी सहभागिता है और फिर अन्धकार में चलें, तो हम झूठे हैं और सत्य पर नहीं चलते” (1 यूह. 1:6)। और, “जो कोई यह कहता है, “मैं उसे जान गया हूँ,” और उसकी आज्ञाओं को नहीं मानता, वह झूठा है और उसमें सत्य नहीं” (2:4)। 1 यूहन्ना की इन आयतों से विश्वासियों को स्वयं का निरीक्षण करने वाले ऐसे जुनूनी व्यक्ति नहीं बनना है, जो आश्वासन के लिए लगातार अपने कामों को देखते रहते हैं। परन्तु ये आयतें बेबाकी से सिखाती हैं कि जो लोग ज्योति में हैं, वे ज्योति में चलेंगे।
यदि आप किसी अग्निकुण्ड के पास जाएँ, जिसमें से आग की लपटें निकल रही हों, तो आप जानते हैं कि वे लपटें धुआँ और गर्मी उत्पन्न करेंगी। कल्पना कीजिए कि आप किसी व्यक्ति से यह पूछ रहे हैं, “क्या यह ऐसी आग है, जो धुआँ और गर्मी देती है, या यह ऐसी आग है, जो ये वाले काम नहीं करती?” ऐसे प्रश्न पर तो हँसी आ जाएगी! हर कोई जानता है कि असली आग, असली गर्मी और असली धुआँ उत्पन्न करती है।
जब पवित्रशास्त्र हमें बताता है कि सच्चे विश्वासी आज्ञाकारिता में होकर मसीह का अनुसरण करते हैं, तो हम विश्वास और कर्मों के रिश्ते को सम्बन्ध के रूप में आग और गर्मी के समान समझ सकते हैं। जिस तरह लपटें गर्मी उत्पन्न करती हैं, ठीक उसी तरह सच्चा विश्वास कर्म उत्पन्न करता है। यदि एक व्यक्ति मसीह को जानने का दावा करे, परन्तु प्रभु के विरुद्ध विद्रोह में रहे, तो बाइबल के लेखक उस व्यक्ति से आग्रह करते हैं कि वह विश्वास के उस दावे पर फिर से विचार करे।
आत्मा का फल
पाप के विरुद्ध युद्ध आत्मिक जीवन का संकेत है। पौलुस ने गलातियों से कहा, “क्योंकि शरीर आत्मा के विरोध में और आत्मा शरीर के विरोध में लालसा करता है, और ये एक दूसरे के विरोधी हैं, इसलिए कि जो तुम करना चाहते हो वह न करने पाओ” (गला. 5:17)। विश्वासी प्रतिस्पर्धी लालसाओं की उपस्थिति को पहचानता है। पाप का आकर्षण मौजूद है, और प्रभु को प्रसन्न करने की इच्छा भी मौजूद है।
पवित्रता की खोज और पाप के विरुद्ध लड़ाई को पवित्रीकरण के रूप में जाना जाता है। यह प्रक्रिया विश्वासी की मसीह की समानता में उन्नति है, और यह उन्नति वास्तविक उद्धार का परिणाम है। उद्धार की जड़ आज्ञाकारिता का फल उत्पन्न करती है। पौलुस ने आत्मा के फलों की सूची दी: “पर आत्मा का फल प्रेम, आनन्द, शान्ति, धीरज, कृपा, भलाई, विश्वास, नम्रता, और संयम है” (गला. 5:22–23)। ये गुण मसीह के चरित्र का सटीक रूप में वर्णन करते हैं, और ये विशेषताएँ उन लोगों के लिए इच्छित की गई हैं, जो उसके साथ एकता में हैं।
मसीह के साथ एक होने का अर्थ है कि हम उसमें बने रहते हैं। यीशु ने कहा, “तुम मुझ में बने रहो, और मैं तुम में। जैसे डाली यदि दाखलता में बनी न रहे तो अपने आप से नहीं फल सकती, वैसे ही तुम भी यदि मुझ में बने न रहो तो नहीं फल सकते। मैं दाखलता हूँ: तुम डालियाँ हो। जो मुझ में बना रहता है और मैं उसमें, वह बहुत फल फलता है, क्योंकि मुझ से अलग होकर तुम कुछ भी नहीं कर सकते” (यूह. 15:4–5)।
दाखलता की डालियों के रूप में, मसीह के चेले स्वयं मसीह से अपना आत्मिक जीवन प्राप्त करते हैं। चूँकि मसीह “उसमें बने रहने” के लिए हमें बुलाता है, इसलिए हमें उस आज्ञा को पालन किए जाने वाली किसी बात के रूप में ग्रहण करना चाहिए। बने रहना कुछ ऐसा काम है, जो हम करते हैं। बाद में यूहन्ना 15 अध्याय में, यीशु ने कहा, “मेरे प्रेम में बने रहो। यदि तुम मेरी आज्ञाओं को मानोगे, तो मेरे प्रेम में बने रहोगे” (15:9–10)। तो फिर, बने रहना, आज्ञाकारिता से जुड़ा हुआ है। मसीह की आज्ञाओं का पालन करने का अर्थ वैसे ही ज्योति में चलना है, जैसे वह ज्योति में है।
मृत्यु से जीवन में लाए गए लोगों के रूप में, हम अपने शब्दों और कार्यों में ऐसे जीवन के संकेतों के साथ जीवन बिताएँगे। हम शिष्यत्व को गम्भीरता से लेना चाहते हैं, और इसका अर्थ आज्ञाकारिता को गम्भीरता से लेना है। एक चेले के रूप में प्रभु की आज्ञा मानने का क्या अर्थ है, इसके बारे में पवित्रशास्त्र विभिन्न प्रकार के चित्र प्रदान करता है: ज्योति में चलना, आत्मा का फल लाना, मसीह में बने रहना।
एक और छवि: इफिसियों और कुलुस्सियों को लिखी गई पत्रियों में, पौलुस ने मसीही जीवन को कपड़े बदलने के रूप में दर्शाया है।
कपड़े बदलना
आदम में हमारा पुराना मनुष्यत्व एक वस्त्र की तरह है, जिसे हमें उतार देना चाहिए, और मसीह में हमारा नया मनुष्यत्व वह है, जिसे हमें पहन लेना चाहिए। उतारना और पहनना ही पवित्रता, अर्थात् पवित्र जीवन जीने की तस्वीरें हैं।
पौलुस ने कहा कि “तुम पिछले चालचलन के पुराने मनुष्यत्व को जो भरमानेवाली अभिलाषाओं के अनुसार भ्रष्ट होता जाता है, उतार डालो” (इफि. 4:22), और हमें इसे पहनना है, अर्थात् “नये मनुष्यत्व को पहन लो जो परमेश्वर के अनुरूप सत्य की धार्मिकता और पवित्रता में सृजा गया है” (4:24)।
हमें अपने जीवन को उन शब्दों और कार्यों से सजाना है, जो परमेश्वर से प्राप्त नये जन्म के अनुरूप हैं। मसीह में हम जो हैं, हमें वैसे ही जीवन बिताना है। हमें वही बनना है जो हम अभी हैं।
पौलुस ने कुलुस्सियों से कहा, “एक दूसरे से झूठ मत बोलो, क्योंकि तुम ने पुराने मनुष्यत्व को उसके कामों समेत उतार डाला है और नये मनुष्यत्व को पहन लिया है, जो अपने सृजनहार के स्वरूप के अनुसार ज्ञान प्राप्त करने के लिए नया बनता जाता है” (कुलु. 3:9–10)। फिर से हम उतारने और पहनने, जैसे त्यागने वाले वस्त्र बनाम अभी पहनने वाले वस्त्र की कल्पना को देखते हैं।
नये मनुष्यत्व को धारण करने में कौन सी बात शामिल है, इस बारे में पौलुस अस्पष्ट नहीं है। उसने कहा, “इसलिए परमेश्वर के चुने हुओं के समान जो पवित्र और प्रिय हैं, बड़ी करुणा, और भलाई, और दीनता, और नम्रता, और सहनशीलता धारण करो, और यदि किसी को किसी पर दोष देने का कोई कारण हो, तो एक दूसरे की सह लो और एक दूसरे के अपराध क्षमा करो; जैसे प्रभु ने तुम्हारे अपराध क्षमा किए, वैसे ही तुम भी करो। इन सब के ऊपर प्रेम को जो सिद्धता का कटिबन्ध है बाँध लो” (कुलु. 3:12-14)।
पवित्र जीवन जीने का अर्थ धार्मिकता के वस्त्र पहनना है, अर्थात् जीवन जीने के ऐसे तरीके जो मसीह में हमें मिले नये जीवन के अनुरूप हैं। मसीह में। अब यह एक महत्वपूर्ण वाक्यांश है।
मसीह के साथ एकता
मसीहियों के पास आत्मिक जीवन होने और अन्धकार से ज्योति में चले जाने का कारण यह है कि हमारे पास मसीह है। प्रभु यीशु हमारा उद्धारकर्ता है, और उसके उद्धार का कार्य हमारे हृदय परिवर्तन से आरम्भ होता है। वह ऐसा नहीं करता कि हमारा उद्धार करने के बाद हमें अपने आप से दूर भेज दे। वह हमारे साथ है और हमें कभी नहीं छोड़ता (मत्ती 28:20)। हम मसीह के साथ एक होते हैं।
मसीह के साथ एकता का अर्थ है कि हम विश्वास के द्वारा उसके व्यक्तित्व और जीवन से अविभाज्य रूप से जुड़े हुए हैं। जब हम हमारे “मसीह के साथ एक” होने की नये नियम की शिक्षाओं से परिचित होते हैं, तो हम हर जगह अवधारणा और भाषा पर ध्यान देंगे। रोमियों 6 अध्याय में, हम मसीह के साथ आत्मिक रूप से गाड़े गए हैं और मसीह के साथ जिलाए गए हैं (6:4)। और क्योंकि हम उसके साथ एक हैं, इसलिए हम शारीरिक रूप से भी उसके समान जिलाए जाएँगे (6:5)।
मसीह के साथ एकता ही मसीही जीवन है। सब कुछ इस अनुग्रहपूर्ण वास्तविकता से होकर बहता है। हम ज्ञान और पवित्रता में उन्नति कर सकते हैं, हम शरीर के विरुद्ध लड़ सकते हैं और पाप से दूर हो सकते हैं, हम सच्चाई के लिए हियाव के साथ खड़े हो सकते हैं और यहाँ तक कि शहीद की मृत्यु भी मर सकते हैं। यह सब मसीह के साथ हमारी एकता के कारण है।
चेले का जीवन इस एकता से होकर बहता है। यह नयी वाचा का प्रबन्धन ऐसी बात है, जिसे हम तोड़ नहीं सकते। वर्तमान या भविष्य की कोई भी बात, दृश्यमान या अदृश्य कोई भी बात हमें मसीह में हमारे लिए परमेश्वर के प्रेम से अलग नहीं कर सकती (रोमि. 8:38-39)। मसीह के साथ हमारी एकता के कारण, हम आश्वस्त हो सकते हैं कि उसने हमारे भीतर जो काम आरम्भ किया है, उसे पूरा किया जाएगा (फिलि. 1:6)। मसीह के साथ हमारी एकता के कारण, हम आश्वस्त हो सकते हैं कि जिसने हमें अपने अनुग्रह से धर्मी ठहराया है, वह भविष्य में उस निर्णय को कमजोर नहीं करेगा (रोमि. 8:33-34)। मसीह के साथ हमारी एकता के कारण, हमें महिमा के लिए शारीरिक पुनरुत्थान और नये आकाश और नयी पृथ्वी में परमेश्वर के साथ अनन्त संगति की एक निश्चित आशा है (रोमि. 8:18-25)।
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चर्चा एवं मनन:
- ऊपर दिए गए अनुभागों में से किसने यह स्पष्ट करने में सहायता की कि एक मसीही व्यक्ति के रूप में जीवन बिताने का क्या अर्थ है?
- एक अनुभाग ने मसीही जीवन में अनुकरण के मूल्य का वर्णन किया। आपके आसपास धर्मी जीवन जीने के कुछ अच्छे उदाहरण कौन हैं?
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भाग IV: अनुग्रह के साधन
मसीह को जानने और उसका अनुसरण करने की हमारी खोज में, प्रभु ने हमें वह दिया है, जिसे ईश-वैज्ञानिकों ने “अनुग्रह के साधन” कहा है। अनुग्रह के साधन वे तरीके हैं, जिनके द्वारा प्रभु अपने लोगों को आशीष देता है, उन्हें स्थिर करता है, उन्हें सहारा देता है और प्रोत्साहित करता है। पवित्रशास्त्र, प्रार्थना और अध्यादेशों के अभ्यास, इतिहास में पवित्र लोगों के लेखन-कार्य और गवाही में विशेष रूप से सर्वोपरि हैं।
पवित्रशास्त्र
परमेश्वर ने अपने वचन में, अर्थात् उत्पत्ति से लेकर प्रकाशितवाक्य तक के पवित्रशास्त्र में स्वयं को प्रकट किया है। क्योंकि परमेश्वर के बारे में और इस संसार के लिए परमेश्वर की योजना के बारे में जो हमें जानना चाहिए, वह यह विशेष प्रकाशन हमें बताता है, इसलिए हमें इसे पढ़ने और अध्ययन करने के लिए एक अनुशासन विकसित करना चाहिए। पवित्रशास्त्र की बड़ी कहानी से परिचित होने में समय और धीरज लगता है, फिर भी उन लोगों के लिए आनन्द और आशीषें सुरक्षित हैं, जो परमेश्वर के वचन का अध्ययन करने और उसे समझने के लिए स्वयं को समर्पित करते हैं (भजन 1:1–3; 19:7–11)।
मसीहियों को ई.एस.वी. या सी.एस.बी. या एन.ए.एस.बी. जैसे परमेश्वर के वचन का एक पठनीय और सटीक अनुवाद प्राप्त करना चाहिए। बाइबल को कहीं से भी खोलकर पढ़ने का खेल खेलने के बजाय, इसकी एक ऐसी योजना बनाना सबसे अच्छा है, जिसे आप पूरा करना चाहें। कई बार बैठकर पढ़ने के लिए पवित्रशास्त्र से एक पुस्तक का चुनाव करें। नये विश्वासियों को विशेष रूप से मरकुस रचित सुसमाचार, नीतिवचन की पुस्तक, इफिसियों की पत्री या उत्पत्ति की पुस्तक को पढ़ने से लाभ मिल सकता है।
पवित्रशास्त्र को सोच-समझकर और आसानी से पढ़ना हमारे अभ्यास में शामिल होना चाहिए। हो सकता है कि इसके लिए धीरे-धीरे पढ़ना, ऊँची आवाज में पढ़ना और एक खण्ड को कई बार पढ़ना आवश्यक हो। उस पाठ में से उभर कर सामने आने वाले विषयों या विचारों पर चिन्तन करें। एक अच्छी अध्ययन बाइबल या एक सुलभ बाइबल टीका से, अध्ययन नोट्स का उपयोग करना उस पर अधिक प्रकाश डाल सकता है, जो आपने पढ़ा है। अपने बाइबल पठ्न के साथ-साथ एक रोजनामचे को शामिल करने पर विचार करें। उस खण्ड के बारे में आने वाले विचारों या प्रश्नों को लिख लें। स्वयं से पूछें कि उस पाठ में परमेश्वर या दूसरों के बारे में कौन सी सच्चाई स्पष्ट की गई है।
व्यक्तिगत् बाइबल पठ्न के अतिरिक्त, हमें सामूहिक आराधना में परमेश्वर के वचन का प्रचार करना चाहिए और उसकी शिक्षा देनी चाहिए। परमेश्वर के वचन को सुनने के लिए पवित्र लोगों के साथ इकट्ठा होना अनुग्रह का एक साधन है। परमेश्वर के वचन को सामूहिक रूप से अपनाना हमें उन व्यक्तिगत् त्रुटियों और विधर्मों से बचा सकता है जिन्हें हमने स्वयं नहीं समझा होगा। हम पवित्रशास्त्र की व्याख्या करने वाले पहले व्यक्ति नहीं हैं, इसलिए हमें अपने समकालीनों और हमारे पहले के गवाहों के व्याख्यात्मक ज्ञान को दीनता के साथ ग्रहण करना चाहिए।
प्रार्थना
प्रार्थना करने का अनुशासन उत्पत्ति 4 अध्याय में स्पष्ट किया गया है, जिसमें बाइबल का लेखक कहता है, “उसी समय से लोग यहोवा से प्रार्थना करने लगे” (4:26)। प्रभु पर उनकी निर्भरता से ही परमेश्वर के लोगों की पहचान होती है, और वह निर्भरता प्रार्थना के माध्यम से स्वयं को व्यक्त करती है। एक प्रार्थनाहीन मसीही व्यक्ति एक विरोधाभास है।
जब पौलुस ने थिस्सलुनीकियों से कहा, “निरन्तर प्रार्थना में लगे रहो” (1 थिस्स. 5:17), तो वह चाहता था कि उनके पास प्रार्थना का एक ऐसा दृष्टिकोण और अभ्यास हो, जो उनके जीवनों को आकार दे। यीशु ने “गुप्त में” प्रार्थना करने को भी प्रोत्साहित किया (मत्ती 6:6), जो एक ऐसा अभ्यास है, जो धर्मी लोगों से प्रशंसा पाने के लिए अपनी भक्ति प्रदर्शित करने की प्रवृत्ति को कम करता है। स्पष्ट रूप से, यीशु ने सामूहिक प्रार्थना करने से मना नहीं किया, परन्तु उसने दूसरों को प्रभावित करने की इच्छा रखने वाले हृदय से उत्पन्न होने वाली मुखर प्रार्थनाओं के जोखिम के बारे में चेतावनी दी (6:5–8)।
हमें प्रार्थना इसलिए नहीं करनी है, क्योंकि परमेश्वर को जानकारी चाहिए, बल्कि इसलिए करनी है, क्योंकि हमें दीन और आश्रित होना है। हम क्षमा, सामर्थ्य, आशीष, न्याय और बुद्धि जैसी बातों के लिए प्रभु को पुकारते हैं। भजन संहिता की पुस्तक दर्शाती है कि कैसे प्रार्थना जीवन की सभी भावनाओं को चित्रित कर सकती है, जिसमें निराशा, आशा, आनन्द, दु: ख, भ्रम, हताशा, उत्सव और व्याकुलता शामिल हैं।
बाइबल पठ्न के साथ प्रार्थना का अनुशासन जोड़ना बहुत बढ़िया बात है। अनुग्रह के ये साधन हमारी भक्ति के समय को समृद्ध कर सकते हैं। आइए हम यह संकल्प लें कि प्रार्थना किए बिना कभी भी पवित्रशास्त्र नहीं पढ़ेंगे। समझ और आनन्द के लिए प्रार्थना करें, प्रोत्साहन और सहायता के लिए प्रार्थना करें। पवित्रशास्त्र के खण्ड के शब्दों को प्रार्थना के लिए कुछ निश्चित शब्द या वाक्यांश प्रदान करने की अनुमति दें तथा प्रार्थना के लिए विशेष विषयों को प्रेरित करने की अनुमति दें।
प्रार्थना युद्ध है। हो सकता है कि हम स्वयं को यह विश्वास दिला लें कि हमें प्रार्थना करने की आवश्यकता नहीं है या हमारे पास प्रार्थना करने का समय नहीं है। हो सकता है कि हम उन दूसरी बातों को प्राथमिकता दें, जो प्रार्थना में प्रभु पर हमारे हृदय के ध्यान को बाधित करती हैं। हमारी दुर्बलता और परमेश्वर की सामर्थ्य को देखते हुए, हमें प्रार्थना की तात्कालिकता और महत्व को याद रखने की आवश्यकता है। पौलुस चाहता है कि हम बुरे समय में परमेश्वर के साथ चलने के लिए तैयार हों, और इसका अर्थ आत्मिक युद्ध के लिए आत्मिक कवच के बारे में सोचना है।
इफिसियों 6:14-17 में आत्मिक कवच को सूचीबद्ध करने के बाद, वह आगे कहता है कि “हर समय और हर प्रकार से आत्मा में प्रार्थना, और विनती करते रहो, और इसी लिए जागते रहो कि सब पवित्र लोगों के लिए लगातार विनती किया करो” (6:18)। ध्यान दें कि पौलुस के अनुसार हमें कितनी बार प्रार्थना करनी चाहिए: “हर समय।” हमें न केवल अपने लिए प्रार्थना करनी है, बल्कि हमें दूसरों के लिए भी प्रार्थना करनी है। दूसरों के लिए प्रार्थना करना या मध्यस्थता करना, हमारे शिष्यत्व में एक सौभाग्य और जिम्मेदारी है, यह ऐसा अभ्यास है, जिसे पौलुस “सब पवित्र लोगों के लिए विनती करना” कहता है (6:18)।
बाइबल पढ़ने और प्रार्थना करने के अनुशासन हमारी आत्माओं के लिए आत्मिक रूप से लाभकारी हैं, और इस कारण शत्रु इन अभ्यासों को तुच्छ समझता है। आइए हम ऐसे शिष्य बनें, जो जानते हैं कि अनुग्रह के साधन आत्मिक जीवन-शक्ति और पोषण के साधन हैं। इन अनुशासनों के माध्यम से, हम मसीह में हमारे प्रति परमेश्वर के अनुग्रह और प्रेम में प्रसन्न होते हैं और उसका आनन्द लेते हैं।
अध्यादेश
नये नियम में बपतिस्मा और प्रभु भोज के दो अध्यादेश मिलते हैं। ये दोनों अध्यादेश स्थानीय कलीसिया के जीवन में कार्यरत हैं।
मत्ती 28:18-20 में यीशु बपतिस्मा के अध्यादेश का उल्लेख करता है। वह अपने शिष्यों को आज्ञा देता है कि वे चेले बनाएँ, “उन्हें पिता, और पुत्र, और पवित्र आत्मा के नाम से बपतिस्मा दो” (मत्ती 28:19)। बपतिस्मा उस नयी वाचा का संकेत है, जिसका शुभारम्भ मसीह ने किया है (यिर्म. 31:31-34; मर. 1:8 देखें), और इस प्रकार यह उन लोगों के लिए है, जो विश्वास के द्वारा नयी वाचा से जुड़े हुए हैं।
बपतिस्मा के पानी में डुबकी लगाना मसीह के साथ हमारी एकता का एक चित्र है (रोमि. 6:3-4), और यह प्रभु के सुसमाचार की बुलाहट के प्रति विश्वास में होकर प्रतिक्रिया करने के बाद आज्ञाकारिता का एक कदम है (मत्ती 28:19)। अपने बपतिस्मा को याद रखना कितनी अद्भुत बात है, जब आपने परमेश्वर के एकत्रित लोगों के सामने अपने विश्वास का सार्वजनिक रूप से अंगीकार किया था। बपतिस्मा लेना आत्मा को मजबूत करता है, और बपतिस्मा की गवाही देना आनन्ददायक होता है। वास्तव में, बपतिस्मा का अध्यादेश परमेश्वर के लोगों के लिए अनुग्रह का एक साधन है।
प्रभु भोज मसीहियों के लिए दूसरा अध्यादेश है। जिस रात यीशु ने अपने शिष्यों के साथ अन्तिम भोज किया, उसने रोटी के बारे में कहा, “यह मेरी देह है जो तुम्हारे लिए दी जाती है: मेरे स्मरण के लिए यही किया करो” (लूका 22:19)। और उसने कटोरे के बारे में कहा, “यह कटोरा मेरे उस लहू में जो तुम्हारे लिए बहाया जाता है नयी वाचा है” (22:20)। प्रेरित पौलुस ने परमेश्वर के लोगों के जीवन में इस अध्यादेश के महत्व की पुष्टि करते हुए कुरिन्थियों के लिए इन निर्देशों को दोहराया (1 कुरिं. 11:23-26)।
प्रभु भोज – जिसे पवित्र भोज या यूखारिस्ट भी कहा जाता है — अनुग्रह का एक साधन है। परमेश्वर के लोग अपने मन को क्रूस की उस सामर्थ्य पर केन्द्रित करते हैं, जिस पर प्रभु यीशु ने अपनी देह और लहू दिया था। नयी वाचा, मसीह की विजय और उसके वैकल्पिक कार्य को शिष्य याद करते हैं। जब हम जानबूझकर इन बातों पर मनन् करते हैं, तो आत्मा उन लोगों को मजबूत करता है, जो इसे स्मरण करने के लिए इकट्ठा होते हैं।
पवित्रशास्त्र की सामूहिक शिक्षा, प्रार्थना के अभ्यास और अध्यादेशों के संचालन में अनुग्रह के साधनों से लाभ उठाने के लिए, मसीहियों को एक कलीसिया से जुड़ने की आवश्यकता है।
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चर्चा एवं मनन:
- आपकी पढ़ने और प्रार्थना करने की आदतें कैसी हैं? क्या ऐसे तरीके मौजूद हैं, जिनसे आप अनुग्रह की इन आदतों में उन्नति कर सकते हैं?
- आपका गुरु आपको कैसे चुनौती दे सकता है और वचन एवं प्रार्थना में विश्वासयोग्य रहने के लिए आपको कैसे जवाबदेह ठहरा सकता है?
- ऊपर दी गई सामग्री बपतिस्मा और प्रभु भोज के बारे में आपकी समझ को कैसे समृद्ध करती है?
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भाग V: लोगों से जुड़ना
बाइबल के लेखक एक ऐसे आज्ञाकारी और समृद्ध शिष्य की कल्पना नहीं करते, जो प्रभु यीशु मसीह के कलीसिया से अलग हो। हमें एक स्थानीय कलीसिया से जुड़ने की आवश्यकता है, जिससे कि यीशु से जिनसे प्रेम करता है, हम उससे प्रेम करना सीख सकें। और यीशु कलीसिया से प्रेम करता है।
छुड़ाई गई दुल्हन
जब यीशु क्रूस पर मरा, तो वह अपनी दुल्हन, अर्थात् कलीसिया के लिए मरा (इफि. 5:25)। वह “कलीसिया का सिर है और स्वयं ही देह का उद्धारकर्ता है” (5:23)। परमेश्वर के लोग प्रभु यीशु की दुल्हन और देह हैं, और उसने क्रूस की विजय के द्वारा अपने लोगों के साथ अपनी वाचा को सुरक्षित किया है। उसने हर कुल, भाषा, लोगों और जाति में से लोगों को छुड़ाया है (प्रका. 5:9)।
यीशु के लोगों के सामूहिक स्वभाव को समझना इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि हमारे आसपास की संस्कृति बहुत ही अधिक व्यक्तिवादी है। फिर भी मन परिवर्तन में न केवल व्यक्तिगत्, बल्कि एक सामूहिक वास्तविकता शामिल होती है। पौलुस ने कुरिन्थियों से कहा, “इसी प्रकार तुम सब मिलकर मसीह की देह हो, और अलग अलग उसके अंग हो” (1 कुरिं. 12:27)। जिस तरह एक मानवीय शरीर को अपने विभिन्न अंगों की आवश्यकता होती है, ठीक उसी तरह कलीसिया को स्वयं के मसीही होने का दावा करने वाले लोगों की आवश्यकता होती है कि वे स्थानीय देह में शामिल हों, सेवा करें और उसे बढ़ावा दें।
प्रारम्भिक कलीसिया प्रभु के दिन गीत गाने, प्रार्थना करने, परमेश्वर का वचन सुनने, अपने संसाधनों से दान देने और अध्यादेशों को संचालित करने के लिए इकट्ठी हुई। मसीही होने का दावा करने वाले लोगों के पास स्थानीय समुदाय के विश्वासियों से जुड़ने की जिम्मेदारी और सौभाग्य है। साथी मसीही वे लोग हैं, जिनके लिए मसीह मरा (1 कुरिं. 8:11), और इस कारण प्रभु के प्रति हमारी प्रतिबद्धता हमें उसके लोगों के प्रति उदासीन नहीं छोड़ेगी। मसीहियों को मसीह की कलीसिया के प्रति एक विशेष प्रकार के स्वभाव के लिए बुलाया जाता है। इस स्वभाव में क्या शामिल है?
एक दूसरे वाले
बाइबल के लेखकों ने मसीहियों को जो करने का निर्देश दिया है, उसका पालन करने के लिए, इस तरह की आज्ञाकारिता के संदर्भ के रूप में स्थानीय विश्वासियों के एक समूह से एक अनुमानित रिश्ता मौजूद है। जब रोमियों की पत्री आई, तो इसे एक कलीसिया में पढ़ा गया। जब फिलिप्पियों की पत्री भेजी गई, तो एक कलीसिया ने इसे प्राप्त किया। जब पौलुस की थिस्सलुनीकियों की दो पत्रियों को पढ़ा गया, तो उन्हें कलीसियाओं में पढ़ा गया। जब यूहन्ना ने प्रकाशितवाक्य की पुस्तक अपने पाठकों को भेजी, तो उसने इसे आसिया की सात कलीसियाओं को भेजा।
नये नियम की पत्रियों ने उन स्थानीय कलीसियाई समुदायों की उपस्थिति और महत्व को ग्रहण किया, जो सुसमाचार को स्वीकार करते थे। ये कलीसियाएँ, जो आरम्भ में घरों में इकट्ठा होती थीं, समाज के विभिन्न क्षेत्रों के विश्वासियों से मिलकर बनी थीं। दास और स्वतंत्र एक साथ आराधना करते थे। स्त्री-पुरुष एक साथ आराधना करते थे। यहूदी और अन्यजाति एक साथ आराधना करते थे। जवान और बूढ़े एक साथ आराधना करते थे। मसीह में एक होने के लिए इन सभी को एक दूसरे से इस तरह से जुड़ने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है, जिससे उनके जीवन में परमेश्वर के छुटकारे के काम का फल दिखे।
पौलुस ने मसीहियों को एक दूसरे की सह लेने (इफि. 4:2), एक दूसरे के लिए सच्चाई से गीत गाने (इफि. 5:19), एक दूसरे को क्षमा करने (कुलु. 3:13), एक दूसरे को सिखाने और चिताने (कुलु. 3:16), एक दूसरे की चिन्ता करने (1 कुरिं. 12:25), एक दूसरे के दास बनने (गला. 5:13), एक दूसरे का अतिथि-सत्कार करने (1 पत. 4:9), और एक दूसरे से प्रेम रखने (1 पत. 4:8) के लिए बुलाया। इन “एक दूसरे” वाले खण्डों का पालन तभी किया जा सकता है, जब मसीही आज्ञाकारिता के लिए स्थानीय कलीसिया की महत्वपूर्णता को विश्वासी लोग पहचानते हैं।
परमेश्वर और उसके लोगों से प्रेम रखना
यदि कोई कहे, “मैं यीशु का अनुसरण तो कर सकता हूँ, परन्तु मुझे कलीसिया की आवश्यकता नहीं है,” तो पवित्रशास्त्र में जो कुछ भी एक साथ है, वे उसे अलग करने का प्रयत्न कर रहे हैं, और उनके पास ऐसा करने का कोई अधिकार नहीं है। 1 यूहन्ना के नाम से प्रसिद्ध पत्री में, परमेश्वर के लोगों से प्रेम रखने के बारे में इसके सभी अध्यायों में उपदेश मिलते हैं। निम्नलिखित उदाहरणों पर विचार करें।
1 यूहन्ना 1:7 में, ज्योति में चलना मसीही संगति से जुड़ा हुआ है। मसीह में अपने साथी “भाई” या “बहन” से प्रेम रखना ज्योति में बने रहने का संकेत है (1 यूह. 2:9–11)। मसीहियों के लिए प्रेम की कमी आत्मिक मृत्यु का संकेत है (1 यूह. 3:10)। 1 यूहन्ना 3:11 में, पाठकों को एक लम्बे समय से चलने वाला सन्देश यह जानना था कि “हम एक दूसरे से प्रेम रखें।” मसीह के द्वारा हमारे लिए अपना जीवन देने का उदाहरण, हमारे अपने प्रेम को बलिदानपूर्ण तरीके से आकार देना चाहिए, कि “हमें भी भाइयों के लिए अपना प्राण देना चाहिए” (1 यूह. 3:16)।
दूसरों से प्रेम रखना महंगा पड़ता है। इसमें अक्सर समय, धीरज, निवेश और संसाधन लगेंगे। ऐसे समाज में बाइबल का प्रेम संस्कृति-विरोधी है, जो सुविधा, दक्षता और स्वयं को महत्व देता है। और स्थानीय कलीसिया से जुड़ना उससे प्रेम रखना संस्कृति-विरोधी है। परन्तु यूहन्ना का तर्क स्पष्ट और सीधा है: “यदि कोई कहे, “मैं परमेश्वर से प्रेम रखता हूँ,” और अपने भाई से बैर रखे तो वह झूठा है; क्योंकि जो अपने भाई से जिसे उसने देखा है प्रेम नहीं रखता, तो वह परमेश्वर से भी जिसे उसने नहीं देखा प्रेम नहीं रख सकता” (1 यूह. 4:20)।
बाइबल के लेखकों के तर्क के अनुसार, परमेश्वर से प्रेम रखना और उसके लोगों से प्रेम रखना कोई एक दूसरे के विरोधी मार्ग नहीं है। बल्कि, परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारिता में परमेश्वर के वचन के अनुसार अपने जीवन को महत्वपूर्ण बातों की ओर उन्मुख करना शामिल है। और मसीह की कलीसिया महत्वपूर्ण है। परमेश्वर ने अपने लोगों को आज्ञा दी है कि सुसमाचार को संसार तक ले जाएँ।
खजाने वाले लोग
विश्वासियों के पास मसीह और सुसमाचार की ज्योति है (2 कुरिं. 4:6–7)। हम मिट्टी के बर्तन हैं, जिनमें एक महिमामय खजाना रखा हुआ है। प्रभु ने अपने मिट्टी के बर्तनों को मसीह की श्रेष्ठता की घोषणा करने के लिए ठहराया है (मत्ती 28:19-20; 1 पत. 2:9)। स्थानीय कलीसिया से जुड़ना संसार में परमेश्वर के इस बड़े मिशन के विषय में प्रतिबद्धता है।
बाइबल से भरपूर और वचन पर केन्द्रित कलीसियाओं में, विश्वासी (प्रचार, शिक्षण और प्रार्थना में) सुसमाचार सुनते हैं, (आराधना के लिए गीतों के सैद्धांतिक रूप से सही बोलों में) सुसमाचार के गीत गाते हैं, और (बपतिस्मा और प्रभु भोज के अध्यादेशों में) सुसमाचार को देखते हैं। मसीहियों के पास यह खजाना छिपाने के लिए नहीं है, बल्कि इसलिए है कि इसे प्रदर्शित करें, इसमें आनन्दित हों और इसका प्रचार करें। आत्मिक रूप से फलने-फूलने और जातियों के बीच परमेश्वर के मिशन को पूरा करने के लिए हमें स्थानीय कलीसिया की आवश्यकता है।
सामाजिक भ्रम और उलझनों के बीच, मसीही लोग सत्य को जानते हैं, सिखाते हैं और उसे थामे रहते हैं। मसीह और सुसमाचार का खजाना उत्पत्ति 3 अध्याय के संसार के अन्धकार के विरुद्ध चमकता है। वास्तव में, हम जगत की ज्योति इसलिए हैं, क्योंकि हमारे पास मसीह है (मत्ती 5:14; यूह. 8:12)। और मसीहियों के रूप में, हमें यह जिम्मेदारी मिली है कि “उस विश्वास के लिए पूरा यत्न करो जो पवित्र लोगों को एक ही बार सौंपा गया था” (यहूदा 3)। जो हमें दिया गया है, हम उसका प्रबंधन करते हैं, और इसे अगली पीढ़ी को सौंपकर विश्वासयोग्यता के साथ हम इसका प्रबंधन करते हैं।
सुसमाचार का खजाना हमसे पहले था, और यह हमसे भी अधिक समय तक बना रहेगा। तो फिर, परमेश्वर के लोगों का भाग बनना और संसार में परमेश्वर के विजयी उद्देश्यों में शामिल होना कितने सौभाग्य की बात है।
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चर्चा एवं मनन:
- अपनी कलीसिया में अपनी भागीदारी का वर्णन करें। क्या आप अपने आसपास के लोगों की सेवा करने के तरीके खोज रहे हैं?
- क्या आपने कलीसिया को ऐसे तरीकों से देखा है, जो अस्वस्थ हैं? उदाहरण के लिए, कलीसिया को केवल उपस्थित होने और उपभोग करने की वस्तु के रूप में देखना आसान हो सकता है। ऊपर दी गई सामग्री कलीसिया के बारे में हमारे सोचने के तरीके को कैसे बदलती है?
- आपकी कलीसिया में ऐसे कुछ लोग कौन हैं, जिनके लिए आप प्रार्थना कर सकते हैं और जिन्हें आप प्रेम रख सकते हैं? क्या ऐसे बोझ मौजूद हैं जिन्हें आप उठाने में सहायता कर सकते हैं?
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निष्कर्ष
मसीही होने का क्या अर्थ है? इसका अर्थ कई तरह की सच्ची बातें हैं। सुसमाचार के द्वारा आत्मा की सामर्थ्य से हमें क्षमा करके नया बनाया जाता है। हम जीवन के मार्ग पर यीशु का अनुसरण करने वाले चेले हैं। हम वे लोग हैं, जो मसीह की मृत्यु, पुनरुत्थान और स्वर्गारोहण की विजय को स्वीकार करते हैं। हम अपने हृदयों को ज्ञान की ओर तथा मूर्खता से दूर करने के लिए विश्वास और मन फिराने की लय के अनुसार चलते हैं।
मसीही होने का अर्थ परमेश्वर के अनुग्रह से उद्धार पाना और उसके द्वारा उद्धार में बने रहना है। इसका अर्थ विश्वास के द्वारा धर्मी ठहराया जाना, उसकी कलीसिया से जुड़ना और उसके आत्मा के द्वारा आज्ञा दिया जाना है। मसीही होना परमेश्वर की दया का परिणाम है, जो अन्धकार में एक मरे हुए हृदय पर काम करती है और उसे ज्योति में जीवन देती है।
मसीही जीवन मसीह में बने रहने, उसके वचन को मानने और उसके आत्मा का फल लाने का जीवन है। यह एक क्रूस उठाने वाला जीवन है, जो महिमा की ओर ले जाता है। यह मसीह के साथ एक होना है, जिसके माध्यम से हम पाप के लिए मर गए हैं और पाप की शक्ति और अधिकार से जिलाए गए हैं।
गलातियों 2:20 में पौलुस के याद रखे जाने वाले शब्दों में कहें तो “मैं मसीह के साथ क्रूस पर चढ़ाया गया हूँ, अब मैं जीवित न रहा, पर मसीह मुझ में जीवित है; और मैं शरीर में अब जो जीवित हूँ तो केवल उस विश्वास से जीवित हूँ जो परमेश्वर के पुत्र पर है, जिस ने मुझ से प्रेम किया और मेरे लिए अपने आप को दे दिया।”
यीशु मुझ से प्रेम रखता है, और मैं यह इसलिए जानता हूँ, क्योंकि बाइबल मुझे ऐसा बताती है।
लेखक के बारे में
मिच चेज़ लुइसविले में कोस्मोसडेल बैपटिस्ट कलीसिया (Kosmosdale Baptist Church in Louisville) में प्रचारक पास्टर हैं, और वह द सदर्न बैपटिस्ट थियोलॉजिकल सेमिनरी (The Southern Baptist Theological Seminary) में बाइबल अध्ययन के एसोसिएट प्रोफेसर हैं। वे कई पुस्तकों के लेखक हैं, जिनमें शॉर्ट ऑफ ग्लोरी (including Short of Glory) और रिसर्जेक्शन होप एंड द डेथ ऑफ डेथ (Resurrection Hope and the Death of Death) शामिल हैं। वह अपने सबस्टैक पर नियमित रूप से “बाइबल ईश-विज्ञान” नाम से लेख लिखते हैं।
विषयसूची
- भाग I: मसीही क्या विश्वास करते हैं
- यीशु के बारे में
- उद्धार के बारे में
- विश्वास के बारे में
- मन फिराने के बारे में
- चर्चा एवं मनन:
- भाग II: आपके उद्धार की तस्वीरें
- अन्धकार से ज्योति तक
- मृत्यु से जीवन तक
- दासत्व से स्वतंत्रता तक
- दोषी ठहराए जाने से धर्मी ठहराए जाने तक
- शत्रुता से मित्रता तक
- चर्चा एवं मनन:
- भाग III: विश्वास का फल
- आज्ञा पालन करना सिखाया गया
- निर्देश और अनुकरण
- क्रूस उठाना
- कार्यों का महत्व
- आत्मा का फल
- कपड़े बदलना
- मसीह के साथ एकता
- चर्चा एवं मनन:
- भाग IV: अनुग्रह के साधन
- पवित्रशास्त्र
- प्रार्थना
- अध्यादेश
- चर्चा एवं मनन:
- भाग V: लोगों से जुड़ना
- छुड़ाई गई दुल्हन
- एक दूसरे वाले
- परमेश्वर और उसके लोगों से प्रेम रखना
- खजाने वाले लोग
- चर्चा एवं मनन:
- निष्कर्ष
- लेखक के बारे में