#37 आप का आदर्श कौन है, और आप उस का अनुसरण क्यों करते हैं
परिचय
सभी किसी न किसी की सराहना करते हैं, वह चाहे कोई खिलाड़ी, या संगीतज्ञ, कोई अभिनेता, या परिवार का कोई सदस्य हो। लोग, औरों की सराहना विभिन्न कारणों से करते हैं, जिन में उनके कौशल, उपलब्धियाँ, और उनका व्यक्तित्व सम्मिलित हैं। परन्तु क्या आपने इस प्रश्न पर मनन करने में कभी समय लगाया है कि: मैं इस व्यक्ति की सराहना क्यों करता हूँ?
हम जिन लोगों को अपना आदर्श मानते हैं, वे हमारी कल्पना से भी बढ़कर हम पर प्रभाव डालते हैं। उनके सिद्धान्त, निर्णय, और कार्य भी हमारे सोचने, बात करने, या व्यवहार करने को निर्धारित करते हैं। इसीलिये हमें अपने आदर्शों को बहुत सावधानी पूर्वक चुनना चाहिये। समाज हमें सिखाता है कि प्रसिद्धि, सामर्थ्य, और सफलता ही प्राप्त करने के लिए चरम लक्ष्य हैं, और मसीही होने के नाते, हमें एक भिन्न प्रकार के उदाहरण का अनुसरण करना है।
सिद्ध प्रेरणा का एकमात्र स्रोत यीशु है। यद्यपि मार्गदर्शकों और प्रेरणा स्रोतों का होना ठीक है, परन्तु हमें स्वयं से कुछ पूछना चाहिये – मैं जिन लोगों की ओर देख रहा हूँ, क्या वे मुझे परमेश्वर के निकट ला रहे हैं, या मुझे उससे और भी दूर ले जा रहे हैं? चलिए, मिलकर इसके बारे में देखते हैं, और पता लगाते हैं कि सही आदर्शों का अनुसरण करने का अर्थ क्या होता है, और वे हमारे विश्वास पर क्या प्रभाव डालते हैं।
ऑडियो मार्गदर्शिका
ऑडियो#37 आप का आदर्श कौन है, और आप उस का अनुसरण क्यों करते हैं
भाग I: प्रेरणा स्रोतों का प्रभाव
मुख्य वचन: 1 कुरिन्थियों 11:1
“तुम मेरी सी चाल चलो जैसा मैं मसीह की सी चाल चलता हूँ।”
आदर्श हमारे चरित्र और निर्णयों को किस प्रकार से आकार देते हैं
इस विचार को स्वीकार या अस्वीकार करना हम पर है, परन्तु वास्तविकता यही है कि हमारे आदर्श हमारी जीवन शैली पर सीधा प्रभाव डालते हैं। हमारे माता-पिता, मार्गदर्शक, शिक्षक, इत्यादि हमारे मूल्यों और मान्यताओं को अनेकों प्रकार से प्रभावित करते हैं।
आप को याद है जब आप बच्चे थे? तब आप का कोई मन-पसन्द शिक्षक, या बड़ा भाई अथवा बहन, या कोई मित्र हुआ करता था, और मैं अंदाज़ा लगा रहा हूँ कि आप दबे पाँव उनके पीछे-पीछे चलते रहते थे। वे जिस तरह के वस्त्र पहनते थे, जैसे बोलते थे, और अपने खाली समय में जो किया करते थे, आप उन सभी बातों की सराहना करते थे। देखिये, इसके पीछे का कारण सहज है। हम जिन लोगों की सराहना करते हैं, वे हमारी जीवन शैली और चुनावों को प्रभावित करते हैं।
आप चाहे इसे मानें या न मानें, यह व्यवहार वयस्क होने पर भी रुक नहीं जाता है। हम जिस समाज को आदर देते हैं, कारण चाहे जो भी हो, वह अभी भी हमारी मान्यताओं और व्यवहार पर प्रभाव डालता है। कभी-कभी यह अनायास ही होता है, हमें इसका पता भी नहीं चलता है। इसी कारण हमें हमेशा स्वयं से ऐसे आलोचनात्मक प्रश्न पूछते रहना चाहिये जो यह विश्लेषण करें कि हम किस की सराहना करते हैं, और वे समाज के लिये क्या वास्तविक भिन्नता लाते हैं।
नमूने की शक्ति
पौलुस ने, 1 कुरिन्थियों 11:1 में कहा, “तुम मेरी सी चाल चलो जैसा मैं मसीह की सी चाल चलता हूँ।” उसने समझ लिया कि उसे लोगों को अपनी नहीं यीशु की ओर मोड़ना है। पौलुस पूर्णतः परमेश्वर के प्रति समर्पित था, जो उसकी जीवन शैली से प्रकट होता है, और वह हमें प्रेरणा देता है कि हम भी उसके समान बनें।
यह पद हमें बताता है कि यदि हम अन्य लोगों की सराहना करते हैं, तो हमें बहुत निश्चित होना चाहिये कि हम किस की सराहना करने का चुनाव करते हैं। ईमानदार लोग, हमें सही बातें करने के लिये प्रेरित करते हैं। दूसरी ओर, यदि हम लोगों की सराहना उनकी सम्पत्ति, सामर्थ्य, या प्रतिष्ठा के लिये करते हैं, तो हम भटकाए जा सकते हैं।
प्रत्येक प्रेरणा स्रोत एक छाप छोड़ता है। प्रश्न यह है कि हम अपने जीवन पर किस प्रकार की छाप चाहते हैं?
प्रेरणा स्रोत हमारे चुनावों को प्रभावित करते हैं
पीछे मुड़ कर अपने चुनावों को देखिये। आप ने किसी समस्या को किस तरह सुलझाया, वह बड़ी थी या छोटी, आप ने किसी व्यक्ति से किस प्रकार बातचीत की, या आपने स्वयं के लिये क्या पहचान निर्धारित की — ये सभी बातें सम्भवतः उस प्रभाव द्वारा निर्धारित हुईं, जो आप के आस-पास के लोगों ने आप पर डाला था।
यदि आप का कोई निकट मित्र या परिवार का सदस्य है, जिसका आप बहुत आदर करते हैं और वे भले, धीरजवन्त, और उदार रहते हैं, तो आप भी यथासम्भव प्रयास करेंगे कि इन्हीं गुणों को प्रदर्शित करें। इसके विपरीत, जिस व्यक्ति को आप बहुत आदर देते हैं, यदि वह स्वार्थी या बेईमान रहता है, तो आप भी उसी रवैये को अपनाने लग जाएँगे।
यही, नीतिवचन 13:20 का आधार है, जो कहता है, “बुद्धिमानों की संगति कर, तब तू भी बुद्धिमान हो जाएगा, परन्तु मूर्खों का साथी नष्ट हो जाएगा।” थोड़ा सा समय लगा कर विचार और मनन करें कि आप अपना समय किन के साथ व्यतीत करते हैं, क्योंकि वे सीधे से आपके चारित्र को नष्ट कर सकते हैं। सीधे शब्दों में, हम लोगों का अनुसरण उनके गुणों को अपनाने के लिये करते हैं। इसलिये, हमें यह प्रश्न पूछना चाहिये कि, जिन लोगों की हम सराहना करते हैं, क्या वे हमें बुद्धिमान बना रहे हैं, या क्या वे हमें बुद्धिमानी के व्यवहार से दूर धकेल रहे हैं?
संस्कृति किस प्रकार से वास्तविकता को बदलती है
हम सभी के पास यह नियन्त्रण है कि हम किन का तथा किस का अनुसरण करें। इस विषय पर, सोशल मीडिया, सिनेमा, संगीत, और टेलीविज़न ने कुछ लोगों को आदर्श नमूने बना दिया है, और उनमें से कुछ परमेश्वर के सत्य का खण्डन करते हैं।
संसार स्वयं का प्रचार करने, धन, प्रभावी होने, और सम्पत्ति को बहुत महत्व देता है। हमें सिखाया जाता है कि सफल होने के लिये हमें औरों से बढ़कर तथा औरों से आदर प्राप्त करने वाला होना चाहिये। परन्तु, यीशु ने हमें यह नहीं सिखाया है।
उसने मत्ती 20:26 में कहा, “परन्तु जो कोई तुम में बड़ा होना चाहे, वह तुम्हारा सेवक बने।”
सामान्यतः हम यह सन्देश तो नहीं सुनते हैं, है न? ओहदे के पीछे भागने की बजाए, यीशु ने हमें सेवा करने के लिये बुलाया। अनुमोदन प्राप्त करने के प्रयासों के स्थान पर, वह हमें विनम्र होकर जीवन जीने के लिये बुलाता है। सोशल मीडिया को अपना आदर्श परिभाषित कर लेने देना सहज होता है। अधिक सम्भावना यही है कि, किसी भीतरी उद्देश्य के साथ जीवन जीने की बजाए, लोग अपने व्यक्तित्व को औरों द्वारा स्वीकार्य बनाने पर आधारित रखेंगे। यह मान्यता मेरे इस कथन को रेखांकित करती है कि, प्राथमिक रीति से, परमेश्वर में विश्वास रखने वाले लोगों को ही अपना आदर्श बनाना चाहिये, न कि भौतिकतावादी विचारधारा रखने वालों को।
उन प्रेरणा स्रोतों का प्रभाव जो अपने जीवन मसीह के चारों ओर केन्द्रित करते हैं
आदर्श प्रेरणा स्रोत वे होते हैं जो मसीह के प्रेम, बुद्धि, और नम्रता को प्रदर्शित करते हैं। इसके उदाहरणों में ये हो सकते है:
– आप का मार्गदर्शक, आप के विश्वास को विकसित करने में आप की सहायता करता है।
– एक मित्र जो हमेशा बुद्धिमानी और नम्रता से बात करता है।
– एक पास्टर या शिक्षक जो बहुत नम्रता और बुद्धिमानी से अगुवाई करता है।
ये लोग, अपने उदाहरण के द्वारा, हमें विश्वासयोग्य, धीरजवन्त, और प्रेम करने वाले बनने में सहायता करने के द्वारा, हमें मसीह की समानता में बढ़ाते हैं। वे हमारी सहायता करते हैं कि हम उन बातों पर ध्यान दें जो महत्वपूर्ण हैं—न कि धन, प्रसिद्धि, और सामर्थ्य पर, बल्कि हर उस बात पर जो सर्वशक्तिमान परमेश्वर को आदर देती है।
परमेश्वर की आज्ञाकारिता के जीवन का नमूना होने के द्वारा, ये प्रेरणा स्रोत हमें परमेश्वर के और निकट आने के लिये भी प्रोत्साहित करते हैं। वे हमें आत्मिक जीवन में बढ़ने, औरों की सेवा करने, और कठिन समयों में भी परमेश्वर पर भरोसा करने के लिये प्रेरित करते हैं।
इसका यह अर्थ नहीं है कि वे सिद्ध होते हैं। कोई भी मानवीय प्रेरणा स्रोत कभी नहीं होगा। परन्तु जब उनके मन मसीह पर स्थिर हैं, उनके प्रभाव हमें परमेश्वर से दूर खींचने की बजाए, परमेश्वर के निकट लाते हैं।
गलत प्रेरणा स्रोतों से खतरे
यद्यपि कुछ नकारात्मक प्रभाव प्रत्यक्ष होते हैं, जैसे कि कोई ऐसा व्यक्ति जो झूठ बोलता है और परमेश्वर के अस्तित्व का इनकार करता है, परन्तु ऐसे भी होते हैं जो धूर्त होते हैं। उदाहरण के लिये कोई बेईमान या इधर की उधर लगाने वाला मित्र, एक भयानक प्रेरणा स्रोत हो सकता है।
बाइबल का एक अनुस्मारक कहता है, “धोखा न खाना, ‘बुरी संगति अच्छे चरित्र को बिगाड़ देती है।‘”
1 कुरिन्थियों 15:33. इसका अर्थ है कि नकारात्मक प्रभाव, मित्रों के द्वारा भी, हमें भलाई से दूर ले जा सकते हैं।
हम जिनकी सराहना करते हैं, उनका हम पर गहरा प्रभाव आ सकता है, और हम जिन लोगों की ओर देखते हैं, वे हमारी आदतों, प्राथमिकताओं, और रवैये को निर्धारित करते हैं। साधारण शब्दों में,बुरे प्रेरणा स्रोत बुरे चरित्र की ओर ले जाते हैं। इससे, इस प्रकार के प्रश्न उठते हैं: क्या मेरे आदर्श मुझे और अधिक सांसारिक बनाते हैं? क्या वे मुझे विश्वास में बढ़ने में सहायक हैं, या समझौते करने में?
बहुत से लोग परमेश्वर के पीछे चलना चाहते हैं, परन्तु बुरे प्रेरणा स्रोतों के कारण, परिणामों का एहसास किये बिना, उससे दूर भटक जाते हैं। इस सब की वास्तविकता यही है कि हम वही बनते हैं, जो बनने के प्रयास करते हैं।
हमें नियन्त्रण रखना चाहिये कि हम किस की सराहना करते हैं। यदि हमारे प्रेरणा स्रोत निरन्तर भौतिक वस्तुओं, प्रसिद्धि, या ऐसा कुछ भी जो व्यक्तिगत लालसाओं को पूरा करता है, के पीछे जाते हैं, तो निश्चित है कि हम भटक कर, जिसे हम सबसे मूल्यवान समझते हैं, उससे दूर हो जाएँगे। परन्तु यदि हम उनका अनुसरण करेंगे जो परमेश्वर से प्रेम करते हैं, औरों की सेवा करते हैं, और ईमानदारी के साथ जीवन जीते हैं, तो ये गुण हममें भी जड़ पकड़ लेंगे।
प्रभावों के सांसारिक अथवा धर्मी होने की पहचान करना
हम जो कुछ भी करते हैं, लगभग सभी पर संसार का प्रभाव पड़ता है। सोशल मीडिया, टीवी के कार्यक्रम, और वे लोग भी जिनके साथ हम बात-चीत करते हैं, हमें प्रभावित कर सकते हैं। इससे फिर, अपनी लालसाओं की पूर्ति को बढ़ावा मिलता है, जिससे भौतिकतावादी होने और तुरन्त सन्तुष्टि पाने की प्रवृत्ति आती है।
संसार के दृष्टिकोण से सफल होने का अर्थ है सर्वाधिक धन, प्रसिद्धि, और सामर्थ्य रखना। वह उन लोगों को उत्तम समझता है जो अपनी व्यक्तिगत लालसाओं के आगे, तथा परमेश्वर के बारे में, नहीं सोच सकते हैं। इससे स्वयं में केन्द्रित रहने, एक घमण्डी रवैये, और सम्पत्ति तथा लोकप्रियता पर आधारित बातों से जुड़ी हुई प्रसन्नता का विचार प्रोत्साहित होता है।
1 यूहन्ना 2:15-16 हमें सचेत करता है कि, “तुम न तो संसार से और न संसार में की वस्तुओं से प्रेम रखो: यदि कोई संसार से प्रेम रखता है, तो उस में पिता का प्रेम नहीं है। क्योंकि जो कुछ संसार में है, अर्थात शरीर की अभिलाषा, और आंखों की अभिलाषा और जीविका का घमण्ड, वह पिता की ओर से नहीं, परन्तु संसार ही की ओर से है।”
इसका यह अर्थ नहीं है कि हम किसी प्रतिभाशाली व्यक्ति की, या किसी ऐसे व्यक्ति की जिसने हमारी सराहना प्राप्त करने के लिये कठिन परिश्रम किया है, सराहना नहीं कर सकते हैं। परन्तु इसका अर्थ यह है कि हमें सावधान रहना चाहिये कि हमें कौन प्रभावित कर रहा है। यदि हम जिनकी ओर देखते हैं, वे ऐसे लोग हैं जो विश्वास को प्रसिद्धि से, ईमानदारी को धन से, और पवित्रता को विलासिता से कम समझते हैं, तो हम गलत लोगों का अनुसरण कर रहे हैं।
धार्मिक प्रभाव: हमें किस का अनुसरण करना चाहिये
एक धार्मिक प्रभाव वह होता है जो हमेशा ही वापस मसीह की ओर संकेत करता है। हो सकता है कि वे धनी या प्रसिद्ध न हों, परन्तु उनके कार्य, शब्द, और चुनाव, उनके विश्वास, बुद्धिमानी, और नम्रता को दिखाते हैं। वे लोग ईमानदारी से जीते हैं, औरों की सेवा करते हैं, और जो कुछ भी वो करते हैं उसमें हमेशा परमेश्वर को प्राथमिकता देते हैं।
नीतिवचन 13:20 कहता है, “बुद्धिमानों की संगति कर, तब तू भी बुद्धिमान हो जाएगा, परन्तु मूर्खों का साथी नष्ट हो जाएगा।” जब हम स्वयं को परमेश्वर से प्रेम करने वाले लोगों से घेर लेते हैं, तो हम उनसे सीखते भी हैं। हमे देख पाते हैं कि धैर्य, दया, और विश्वासयोग्यता से जीवन जीना कैसा होता है।
धार्मिक प्रभाव डालने वाले सिद्ध नहीं होते हैं। अन्य सभी के समान, वे भी गलतियाँ करते हैं। परन्तु अन्तर यह होता है कि उनके मन मसीह का अनुसरण करने पर स्थिर बने रहते हैं। जब वे असफल होते हैं, तब वे क्षमा पाने का तरीका ढूँढ़ते हैं, और जब वे सफल होते हैं तो परमेश्वर की महिमा करते हैं। उनके जीवन व्यक्तिगत लक्ष्यों की प्राप्ति करना नहीं बल्कि उससे भी बढ़कर करने के बारे में होते हैं; वे परमेश्वर के राज्य की सेवा करने के लिये जीते हैं।
इस प्रकार के प्रेरणा स्रोत हमारे विश्वास में परिपक्व होने, तथा हमें वह बनने में सहायता करेंगे, जो परमेश्वर चाहता है कि हम हों।
अन्तर को कैसे पहचानें
कभी-कभी यह पहचान पाना कठिन होता है कि कौन सांसारिक प्रभाव डालने वाला है, और कौन धार्मिक। यदि कोई बहुत अधिक लालच, बेईमानी, या स्वार्थ को बढ़ावा देता है, तब तो हम स्पष्ट समझ लेते हैं कि उनके उदाहरण सहायक नहीं हैं।
परन्तु कभी-कभी यह कठिन होता है। एक व्यक्ति एक अद्भुत प्रेरणा स्रोत प्रतीत हो सकता है—वह भला, उदार, या कड़ा परिश्रम करने वाला भी हो सकता है। परन्तु यदि ऐसे लोगों में परमेश्वर के अनुसार प्राथमिकताएँ नहीं हैं, तो ये भी हमें मार्ग से भटका सकते हैं।
जब आप अपने आस-पास के उन लोगों के बारे में विचार करते हैं, जिनका प्रभाव आप पर पड़ रहा है, तब स्वयं से इन प्रश्नों को पूछिये:
– क्या यह व्यक्ति, परमेश्वर के साथ घनिष्ठता से चलने में, मेरी सहायता करता है?
– क्या उनकी कथनी और करनी में मसीही सिद्धान्त दिखाई देते हैं?
– कहीं वे नम्रता, ईमानदारी, और प्रेम के स्थान पर, स्वयं के लिये ओहदा, सामर्थ्य, और नियन्त्रण को प्राप्त करने पर केन्द्रित तो नहीं हैं?
– उनका अनुसरण करने से क्या मैं मसीह की समानता में और अधिक बढ़ूँगा, या सांसारिकता में?
जिन वस्तुओं की, या जिस व्यक्ति की भी हम सराहना करते हैं, उनसे हमारे व्यवहार और विचारों में एक प्रकार का परिवर्तन आता है। इसलिये जिनकी हम सराहना करते हैं, हमें उन लोगों का विश्लेषण करना चाहिये, और देखना चाहिये कि क्या वे बुद्धिमानी, सत्य, और धार्मिकता की ओर हमारी अगुवाई कर रहे हैं?
अपने ध्यान का केन्द्र मसीह की ओर परिवर्तित करना
अन्ततः, कोई भी मानवीय प्रेरणा स्रोत सिद्ध नहीं होगा। सर्वोत्तम अगुवे और मार्गदर्शक भी गलतियाँ करते हैं। इसीलिये, हमें यीशु को ही अपना चरम नमूना बनाना चाहिये।
इब्रानियों 12:2 कहता है, “विश्वास के कर्ता और सिद्ध करने वाले यीशु की ओर ताकते रहें।”
यीशु ने हमें, परमेश्वर को सर्वप्रथम रखते हुए प्रेम और सेवा का जीवन जीना सिखाया है। वह धन या प्रसिद्धि के पीछे नहीं गया; उसने अपने शत्रुओं की भी सेवा की और उन्हें क्षमा किया, और दुःख उठाते हुए भी दृढ़ बना रहा। जब हम मसीह पर ध्यान केन्द्रित रखना आरम्भ कर देते हैं, संसार के प्रति हमारा दृष्टिकोण पूर्णतः बदल जाता है। सफलता के खोजी होने की बजाए, हम जीवन के और भी गम्भीर उद्देश्य के खोजी हो जाते हैं। हम उसे समझने लगते हैं जो वास्तव मैं महान है, और हमें पता चल जाता है कि धन और उच्च ओहदे के पीछे जाना व्यर्थ है। सच्ची महानता परमेश्वर के प्रति समर्पित रहने से है।
सकारात्मक प्रभावों का चुनाव करने के लिये, यीशु और उसके तरीकों का अनुसरण करना सर्वप्रथम होना चाहिये।
—
चर्चा: आप सबसे अधिक किस की सराहना करते हैं, और क्यों?
- कौन है जो आप को प्रेरित करता है, और आप को उनके कौन से गुण पसन्द हैं?
- क्या उनके प्रभाव स्वर्गीय हैं, या, क्या वे केवल सांसारिक हैं?
- आपने जिन लोगों का अनुसरण करना चुना, आप के निर्णयों और व्यवहार पर उनका क्या प्रभाव रहा?
- अपने आस-पास के लोगों पर और भी अधिक धर्मी प्रभाव डालने के लिये आप क्या कार्य कर सकते हैं?
—
हम जिन लोगों का अनुसरण करते हैं और जिनकी सराहना करते हैं, वे हमारे जीवनों को सकारात्मक या नकारात्मक रीति से प्रभावित करने की सामर्थ्य रखते हैं। सच में, यह हम पर निर्भर है। इसलिये हमें हमेशा सचेत रहना चाहिये कि हम किन्हें स्वयं पर प्रभाव डालने देते हैं।
इस सप्ताह, उन लोगों पर जो आप को प्रेरित करते हैं, और उनके द्वारा आपके जीवन पर पड़ने वाले प्रभावों पर विचार कीजिये। क्या यह सम्भव है कि वे आपको मसीह से दूर ले जा रहे हैं? यदि हाँ, तो उनसे अलग हो जाएँ, और धार्मिक प्रेरणा स्रोतों को खोजें।
आखिरकार, एक आदर्श होने के लिये, किसी व्यक्ति को अपने सारे जीवन भर प्रसिद्ध रहने की आवश्यकता नहीं है। जिसका हम सभी को अनुसरण करना चाहिये, जिसकी सराहना करनी चाहिये, वह यीशु है, क्योंकि उसी ने हमारे लिये अपने जीवन को बलिदान किया है।
भाग II: यीशु—चरम आदर्श
मुख्य वचन: इब्रानियों 12:2
“और विश्वास के कर्ता और सिद्ध करने वाले यीशु की ओर ताकते रहें।”
यीशु सिद्ध प्रेरणा स्रोत क्यों है
सभी के प्रेरणा स्रोत होते हैं, वे जिनकी ओर देखने, और जिनके समान होने का प्रयास करते हैं। कुछ, उनके अनुशासन के लिये, खिलाड़ियों की, या प्रतिभा के लिये अभिनेताओं की, या बड़ी उपलब्धियों के लिये प्रसिद्ध उद्यमियों की, सराहना करते हैं। परन्तु उस प्रभाव के बावजूद, उन सभी में त्रुटियाँ होती हैं। वे संघर्ष करते हैं, गलतियाँ करते हैं, और हमारे ही समान असफल भी होते हैं; अन्ततः, वे भी तो मनुष्य ही हैं।
इसीलिये, विश्वासी होने के नाते, हमें यीशु की ओर अपना ध्यान लगाने के लिये प्रोत्साहित किया जाता है। किसी भी अन्य से भिन्न, जीवन जीने के लिये हमारा सिद्ध उदाहरण यीशु ही है। उसने निष्पाप, निःस्वार्थ, और उसके लिये परमेश्वर द्वारा निर्धारित उद्देश्यों से पीछे हटे बिना, अपना जीवन व्यतीत किया। वह प्रसिद्धि, संसार का ध्यान आकर्षित करने, सामर्थ्य, या सम्पत्ति के लिये नहीं, बल्कि, प्रेम, सत्य, और पिता की आज्ञाकारिता के लिये जिया।
यदि हम जानना चाहते हैं कि वास्तविक महानता कैसी दिखती है, तो हमें और कहीं देखने की आवश्यकता नहीं है। यीशु ही सबसे महान आदर्श है। उसका जीवन हमें सिखाता है कि परमेश्वर का आदर किस प्रकार किया जाता है, और उसका बलिदान सिखाता है कि हमें अपना जीवन किस प्रकार जीना चाहिये।
यीशु ने विनम्रता से अगुवाई की
संसार की दृष्टि में बहुधा आदर्श वे होते हैं जो सामर्थी, धनी, और अनेकों द्वारा सराहे जाते हैं। परन्तु यीशु ने हमें कुछ बिल्कुल ही भिन्न दिखाया। उसने कभी सामर्थी होना नहीं चाहा, बल्कि, वह नम्र हो गया तथा औरों की सेवा की।
फिलिप्पियों 2:5-7 कहता है, “जैसा मसीह यीशु का स्वभाव था वैसा ही तुम्हारा भी स्वभाव हो; जिसने परमेश्वर के स्वरूप में होकर भी परमेश्वर के तुल्य होने को अपने वश में रखने की वस्तु न समझा। वरन् अपने आप को ऐसा शून्य कर दिया, और दास का स्वरूप धारण किया, और मनुष्य की समानता में हो गया।”
यद्यपि यीशु माँग कर सकता था कि उसकी उपासना की जाए और उससे आदर के साथ व्यवहार किया जाए, परन्तु उसने नम्र बने रहना चुना। उसने समाज के तिरस्कृत लोगों के साथ समय बिताया, बीमारों को चँगा किया, और अपने शिष्यों तक के पाँव धोए। उसने कभी भी प्रतिष्ठा या ओहदे की कोई माँग नहीं की—उसने बस प्रेम किया और सेवा की।
ऐसा ही आदर्श अनुसरण करने के योग्य है। ऐसा अगुवा जो औरों को स्वयं से पहले रखता है।
यीशु प्रेम और सहानुभूति के साथ चला
बहुत से लोग यीशु से प्रेम करते थे, और इसका एक प्रमुख कारण था, मनुष्यों के प्रति उसका प्रेम। उसकी सहानुभूति केवल उन्हीं तक सीमित नहीं थी जिनकी देखभाल करना सहज था। वह तिरस्कृत, पापियों, और उनकी भी जो उसके विरोधी हो गए थे, देखभाल करता था।
जिन लोगों का औरों ने तिरस्कार कर दिया था, उनके प्रति उसके व्यवहार के बारे में विचार कीजिये। चुँगी लेने वालों के प्रति वह बहुत खुला और समझबूझ का व्यवहार करता था, तथा पापियों के साथ भोजन भी किया करता था। वह जानबूझकर कुएँ पर सामरी स्त्री से बात करने के लिये गया, यह जानते हुए भी कि अन्य लोग उस स्त्री की सहायता करने के प्रति बहुत निरुत्साहित रहते थे। उसका प्रेम अनुग्रहपूर्ण, क्षमा करने वाला, और अनन्त दयालुता के साथ था।
जब वह क्रूस पर ठट्ठा और पीड़ा सह रहा था, तब भी वह यह कहते हुए प्रार्थना करता रहा, “हे पिता, इन्हें क्षमा कर, क्योंकि ये जानते नहीं कि क्या कर रहे हैं” (लूका 23:34)।
यीशु ने हमें दिखाया कि एक मनुष्य कितना प्रेम दे सकता है, उन्हें भी जो इसके योग्य नहीं हैं। हमें सभी के लिये सही उदाहरण स्थापित करना है। इसलिये, सभी से उसी के समान प्रेम करने का प्रयास करें।
यीशु निर्भीक होकर सत्य बोलता था
प्रेम और देखभाल करने वाला होने के अतिरिक्त, वह सत्यवादी भी था, और बहुत साहस से ऐसा करता था। वह धार्मिक अगुवों का सीधा सामना करने, गलत कार्यों को सुधारने, और मुद्दे के मर्म तक पहुँचने के लिये तैयार रहता था।
यीशु तब अपने बारे में दृढ़ निश्चय था, जब उसने कहा, “मार्ग और सत्य और जीवन मैं ही हूँ; बिना मेरे द्वारा कोई पिता के पास नहीं पहुँच सकता,” यूहन्ना 14:6. परन्तु औरों के विपरीत, यीशु ने लोगों से अनुमोदन पाने के लिये अपने सिद्धान्तों में कोई चालाकी नहीं दिखाई। उसने सत्य को प्रेम और दृढ़ता के साथ प्रस्तुत किया, न बढ़ा कर और न घटा कर।
यीशु के अनुयायियों को सत्य के लिये संघर्ष करने का साहस दिखाना चाहिये, बैर और विरोध के बावजूद। इसका अर्थ है अनेकों के अनुमोदन की अनदेखी करते हुए, कठिनाइयों के मार्ग को चुनना। एक वास्तविक आदर्श व्याप्त मान्यताओं का आलोचनात्मक विश्लेषण करता है और सबसे कठिन/असुविधाजनक सत्य को घोषित करता है।
यीशु ने अटल विश्वास प्रदर्शित किया
यीशु ने विश्वास के बारे में केवल बात ही नहीं की—उसने उसे जी कर दिखाया। जो कुछ भी उसने किया वह पिता में पूर्ण विश्वास में स्थापित था।
अपने शिष्यों को चुनने से पहले उसने प्रार्थना के लिये समय निकाल। उसने गतसमनी की वाटिका में, क्रूस का सामना करने से पहले, यह कहकर प्रार्थना की, “तौभी मेरी नहीं परन्तु तेरी ही इच्छा पूरी हो” (लूका 22:42)। जंगल में, जब उसकी परीक्षा हुई, तब भी वह परमेश्वर के वचन के सत्य को थामे रहा।
सर्वाधिक कठिन समयों में भी, वह हमेशा ही परमेश्वर मे अपने भरोसे के प्रति स्थिर बना रहा। उसने हमेशा सत्य का पूर्ण अनुमोदन किया चाहे उसकी कोई कीमत चुकानी पड़ी, या नहीं।
यदि, परमेश्वर का पुत्र यीशु उस पर इतना अधिक निर्भर था, तो हमें और भी कितना अधिक प्रार्थना करने और विश्वास रखने वाला होना चाहिये? वह हमें सिखाता है कि वास्तविक सामर्थ्य वह नहीं है जो हमारे पास है, बल्कि हर प्रकार से और पूर्णतः परमेश्वर पर निर्भर रहने से है।
यीशु ने हमारे लिये सब कुछ बलिदान कर दिया
आदर्श होने का सबसे बड़ा कार्य बलिदान देना है। और यीशु से बढ़कर बलिदान किसी ने नहीं दिया।
उसने केवल चँगाई, शिक्षा, और प्रेरणा ही नहीं दी—उसने हमारे जीवनों के लिये स्वयं को पूर्णतः बलिदान कर दिया। उसने हमारे पापों के ऋण को चुका दिया ताकि हमारे जीवन स्वतन्त्र हो सकें। उसने पीड़ा सही जिससे कि हमें उद्धार मिल सके।
यूहन्ना 15:13 कहता है, “इससे बड़ा प्रेम किसी का नहीं कि कोई अपने मित्रों के लिये अपना प्राण दे।”
यीशु ने यही किया, ने केवल अपने घनिष्ठ मित्रों के लिये, परन्तु मेरे, आप के, और सारे संसार सहित – सभी के लिये।
इसीलिये वह चरम आदर्श है। इसलिये नहीं क्योंकि उसने आश्चर्यकर्म किये या भीड़ एकत्रित की, परन्तु क्योंकि उसने हमें बचाने के लिये सब कुछ दे दिया। कोई भी आदर्श, कोई भी प्रेरणा स्रोत इस प्रकार के प्रेम की तुलना में नहीं आ सकता है।
अपनी आँखों को यीशु पर लगाए रखना
हर व्यक्ति, जिस की हम सराहना करें, उसमें दुर्बलताएँ होती हैं। कोई भी मनुष्य कभी भी सिद्ध आदर्श बनकर कार्य नहीं कर सकता है। परन्तु यीशु के साथ? वही एकमात्र प्रेरणा स्रोत है जो हमें कभी निराश नहीं करेगा।
इसीलिये इब्रानियों 12:2 कहता है कि, “विश्वास के कर्ता और सिद्ध करनेवाले यीशु की ओर ताकते रहें।” न केवल वही वह एकमात्र और सच्चा अगुवा है, हमें जिसका अनुसरण करने की अनुमति है, परन्तु वही वह एकमात्र व्यक्ति है जो अनुसरणीय होने से भी बढ़कर योग्य है।
इसलिये, हम यीशु के समान होने का प्रयास करने वाले बनें। हम उसके नम्रता, प्रेम, विश्वास, बलिदान, और सत्य के उदाहरण का अनुसरण करें। उसने जैसा प्रेम किया, हम भी वैसा ही प्रेम करें और जिस प्रकार का जीवन उसने जिया, हम भी वैसा ही जीवन जियें।
क्योंकि, अन्ततः, केवल वही एकमात्र आदर्श है जो हमारे जीवन को बेहतर बना सकता है।
यीशु की नम्रता, प्रेम और आज्ञाकारिता से सीखना
यीशु का अनुसरण करने का अर्थ है केवल उसमें विश्वास ही नहीं करना, बल्कि, उसके समान बनने के लिए परिश्रम भी करना। उसके बारे में सब कुछ, जैसे कि, वह जैसा जीवन जीता था, जैसे लोगों के साथ व्यवहार करता था, और जिस प्रकार से परमेश्वर का आज्ञाकारी रहता था, विश्वास के उस कठोर वास्तविकता के प्रमाण हैं, जिन्हें हमें सच में स्वीकार करना है।
वास्तविकता में, यीशु के समान जीवन जीने का प्रयास करना अभी भी कठिन है। स्वार्थ ही जन-समूहों का मार्गदर्शन करता है, और प्राथमिकता इसी बात पर रहती है कि इससे उन्हें क्या मिलेगा, और सफलता तथा प्रसिद्धि हमेशा अन्तिम लक्ष्य रहते हैं। इसकी तुलना में, यीशु परमेश्वर की आज्ञाकारिता में जिया और उसने लोगों से प्रेम किया। यदि हमें उसके अनुयायी होना है, तो हमें उसकी ओर देखना भी पड़ेगा।
इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये, हमें क्या कार्य करने होंगे? हम उसके तरीकों की नकल किस तरह से कर सकते हैं, और उन्हें अपने जीवनों में कैसे लागू कर सकते हैं? प्रत्येक यात्रा का आरम्भ सीखने के साथ होता है, और इस विशेष यात्रा के लिये, हम तीन गुणों पर ध्यान केन्द्रित करेंगे, जो हैं, प्रेम, नम्रता, और आज्ञाकारिता।
मसीह की नम्रता: सच्ची महानता सेवा करने से आती है
आजकल, कोई भी नम्रता का पालन नहीं करता है। सभी को प्रशंसा, ऊँचे पर उठाया जाना, और सराहना चाहिये। सोशल मीडिया पर अनेकों लोग हैं, जो यह दिखाने का प्रयास कर रहे हैं कि वे कितने महत्वपूर्ण हैं। परन्तु यीशु ने हमें भिन्न तरह से जीवन जीना सिखाया है।
फिलिप्पियों 2:5-7 कहता है, “जैसा मसीह यीशु का स्वभाव था वैसा ही तुम्हारा भी स्वभाव हो; जिसने परमेश्वर के स्वरूप में होकर भी परमेश्वर के तुल्य होने को अपने वश में रखने की वस्तु न समझा।” यीशु के पास हर सम्भव कारण था कि उसके साथ एक राजसी सम्राट जैसा व्यवहार किया जाये, परन्तु, इसके स्थान पर, उसने अपने आप को दीन करके औरों की सेवा करने को चुना, उसने अपने शिष्यों के पाँव धोए। उसने निर्धनों और तिरस्कृत लोगों के साथ समय बिताया। उसने अपनी सामर्थ्य का प्रयोग कभी भी स्वयं को ऊँचा उठाने के लिये नहीं—केवल औरों की सहायता के लिये किया।
यही वास्तविक नम्रता है। यह स्वयं के मूल्याँकन को घटाना नहीं है; यह औरों को मूल्यवान समझना है। यह सेवा लेने की बजाए, सेवा करना है, आप के पास जो भी कौशल और अवसर हैं, उनका सर्वोत्तम प्रयोग करना।
यदि हमें यीशु का अनुसरण करने के लिये सेवा करने को अपनाना है, तो घमण्ड को एक ओर फेंकना होगा। वास्तविक सेवा लोगों की दृष्टि से ओझल रह कर और बिना कोई प्रतिफल मिले, की जाती है। क्योंकि परमेश्वर का राज्य विनम्र सेवा पर बना है, वास्तविक महानता भी वहीं से उत्पन्न होती है।
मसीह का प्रेम: एक असीम प्रेम
यीशु ने प्रेम का केवल प्रचार ही नहीं किया, बल्कि उसे व्यावहारिक रीति से जी कर दिखाया। उसके प्रत्येक शब्द से लेकर, उसके द्वारा किये गए प्रत्येक आश्चर्यकर्म और दिये गए प्रत्येक बलिदान का आधारभूत कारण प्रेम था।
परन्तु उसके प्रेम का विस्तृत दायरा केवल इतना ही नहीं था। उसने पापियों, टूटे हुए लोगों, तिरस्कृत लोगों, और उनसे भी जो उसके शत्रु थे, प्रेम किया।
जिन लोगों का औरों ने तिरस्कार कर दिया था, उनके प्रति उसके व्यवहार के बारे में सोचिये। उसने कोढ़ियों को चँगा किया, जिन्हें कोई छूता नहीं था। उसने व्यभिचार में पकड़ी गई स्त्री को, जिसे सभी दण्ड देना चाह रहे थे, क्षमा कर दिया। उसने चुँगी लेने वालों और पापियों का स्वागत किया, जबकि अन्य सभी उनसे दूर रहते थे।
क्रूस पर भी, जब उसका ठट्ठा उड़ाया जा रहा था, उसे यातनाएँ दी जा रही थीं, उसने तब भी प्रेम दिखाया। उसने लूका 23:34 में प्रार्थना की, “हे पिता, इन्हें क्षमा कर, क्योंकि ये जानते नहीं कि क्या कर रहे हैं।”
यीशु का प्रेम ऐसा था। ऐसा प्रेम जो हिसाब नहीं रखता है, द्वेष नहीं रखता है, और उनसे मुँह नहीं मोड़ता है, जिन्हें इसकी सर्वाधिक आवश्यकता होती है।
और यदि हमें यीशु का अनुसरण करना है, तो हमें भी ऐसा ही प्रेम रखना पड़ेगा। केवल अपने परिवार और मित्रों ही के प्रति नहीं, बल्कि सब के प्रति। उनके प्रति भी जो हमें हताश कर देते हैं। उनके प्रति भी जिन्होंने हमें आहत किया है। उनसे भी जो इसके योग्य नहीं हैं।
क्योंकि सत्य यही है कि हम में से कोई भी यीशु के प्रेम के योग्य नहीं था, परन्तु फिर भी उसने हमसे मुफ्त में प्रेम किया। और अब वह हमसे ऐसा ही करने के लिये कहता है।
मसीह की आज्ञाकारिता: हर कीमत पर परमेश्वर का अनुसरण
यीशु की सबसे सामर्थी बातों में से एक उसका परमेश्वर के प्रति पूर्णतः आज्ञाकारी रहना था। उसने अपने लाभ के लिये कभी कुछ नहीं किया—उसने जो भी किया, सब पिता की इच्छा को पूरा करने के लिये किया। तब भी जब आज्ञाकारिता का अर्थ पीड़ा सहना था, वह आज्ञाकारी बना रहा।
मत्ती 26:39 में, क्रूस पर चढ़ाए जाने से पहले की रात में, यीशु ने गतसमनी की वाटिका में प्रार्थना की, “हे मेरे पिता, यदि हो सके तो यह कटोरा मुझ से टल जाए, तौभी जैसा मैं चाहता हूँ वैसा नहीं, परन्तु जैसा तू चाहता है वैसा ही हो।”
वह जानता था कि पीड़ा आ रही है। जिस वेदना को उसे सहना था, उसके बारे में वह जानता था। परन्तु उसने अपने आराम से बढ़कर परमेश्वर की योजना को चुना।
यही सच्ची आज्ञाकारिता है। यह हर कठिनाई में भी परमेश्वर पर भरोसा रखना है। यह तब भी उसका अनुसरण करना है, जब हमें सब कुछ समझ में नहीं आ रहा हो। यह इस बात को कहना है कि, “परमेश्वर मैं स्वयं से अधिक, तुझ पर भरोसा रखता हूँ।”
कभी-कभी आज्ञाकारिता का अर्थ होता है अपने आराम के स्थान से बाहर निकलना। कभी इसका अर्थ बलिदान देना होता है। परन्तु जब हम परमेश्वर की आज्ञाकारिता करते हैं, तब हम यह भरोसा रख सकते हैं कि उसकी योजनाएँ हमारे अपने किसी भी चुनाव से हमेशा बढ़कर ही होंगी।
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चर्चा: यीशु का अनुसरण करना आप के जीवन को किस प्रकार से बदल सकता है?
- आप के विचार से, यदि आप यीशु के समान वास्तविक नम्रता का व्यवहार करने लगेंगे, तो आप का जीवन कैसे बदल जाएगा?
- यदि आप यीशु के प्रेम को अपना लेंगे, तो आप का जीवन और बेहतर किस प्रकार से हो जाएगा?
- आप के विचार से वह एक बात क्या है जिस के लिए परमेश्वर चाहता है कि आप उस पर और भी अधिक भरोसा रखें?
- नम्रता, औरों से अपने समान प्रेम रखने, और आज्ञाकारिता के यीशु के उदाहरणों का अनुसरण करने के लिये आप क्या कदम उठा सकते हैं?
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यीशु का अनुयायी होने का अर्थ उसमें विश्वास करने से भी बढ़कर है। यह उसकी नकल करना है: घमण्ड के स्थान पर नम्रता, स्वार्थ के स्थान पर प्रेम, और अपने आराम के स्थान पर आज्ञाकारिता का व्यवहार करते रहना।
समाज हम से बहुत अपेक्षाएँ रखता है। हमसे, बड़ी उपलब्धियों की, सबसे पहले स्वयं से प्रेम करने, और केवल उन्हीं से सम्बन्ध रखने की जो प्रत्युत्तर में हमें मूल्यवान समझते हैं, की माँग जाती है। यह प्रकट है कि ये बातें उनसे बहुत निम्न हैं, जिनकी अपेक्षा यीशु हमसे करता है।
जब अपेक्षा यीशु से प्रेम करना है, तो हमें उसके पद-चिन्हों पर चलना होगा, हर बात को उसके अनुरूप करना होगा।
भाग III: ध्यान भंग कर देने वाले संसार में मसीह का अनुसरण करना
मुख्य वचन: रोमियों 12:2
“इस संसार के सदृश न बनो; परन्तु तुम्हारे मन के नए हो जाने से तुम्हारा चाल–चलन भी बदलता जाए, जिससे तुम परमेश्वर की भली, और भावती, और सिद्ध इच्छा अनुभव से मालूम करते रहो।”
जब संसार हमें दूर खींचता है, तब हमें मसीह पर ध्यान केन्द्रित रखना चाहिये
हमारे जीवन ध्यान बँटाने वाली बातों से भरे हुए हैं, और हर मोड़ पर, कुछ न कुछ हमारा ध्यान आकर्षित करने का प्रयास करता रहता है। सोशल मीडिया से मनोरंजन तक, सफलता, सम्बन्ध, इत्यादि, संसार अवसरों से भरा पड़ा है। हम निरन्तर बीच में, किसी मूल्यवान वस्तु को खोजने, सराहना करने के लिये कोई बात ढूँढ़ने, और किन लक्ष्यों तक पहुँचने का प्रयास करें, में फँसे हुए होते हैं। परन्तु यदि हम लापरवाह हुए, तो हम बिना एहसास किये, गलत बातों के पीछे चल पड़ेंगे।
रोमियों 12:2 हम से कहता है, “इस संसार के सदृश न बनो।” हमें इस बात का ध्यान करते रहना होगा कि हम किन को या किस बात को स्वयं पर प्रभाव डालने दे रहे हैं। क्या हमें आकार देने वाला, परमेश्वर का भरोसा है, या क्या हम संसार को हमारी नियति निर्धारित करने दे रहे हैं?
चुनौती केवल पापों से बचकर रहने की नहीं है, बल्कि उन चिन्हों को पहचान पाने की है, जब हमारे मन मसीह से भटकने लगते हैं। जब हमारे मन आत्मिक वृद्धि के स्थान पर सांसारिक सफलता, प्रार्थना की बजाए मनोरंजन, और परमेश्वर के वचन के स्थान पर प्रभाव डालने वालों के दावों को चाहने लगते हैं, तब हमने उससे दूर भटकना आरम्भ कर दिया है।
यदि इस भौतिकतावादी संसार में आप मसीह पर ध्यान केन्द्रित रखना चाहते हैं, तो आप को पहचानना होगा कि कौन आपको खींच कर दूर ले जा रहा है, और अपने मन को सांसारिक बातों से बचाए रखना होगा।
झूठी मूर्तियाँ खतरनाक हो सकती हैं
जब हम “मूर्तियों” का विचार करते हैं तब हम प्रतिमाओं और प्राचीन देवताओं के बारे में सोचते हैं। परन्तु मूर्तियाँ आज भी विद्यमान हैं—केवल उनका रूप भिन्न है।
हमारे मनों में ऐसी कोई भी बात, जो परमेश्वर का स्थान ले, वह एक मूर्ति है। यह नौकरी हो सकती है, विवाह, धन, लोकप्रियता, या व्यक्तिगत रीति से भली-भाँति होने का विचार हो सकता है। जब कोई व्यक्ति अपनी पहचान, लक्ष्य, या भली-भाँति होने को मसीह से बाहर किसी भी अन्य बात पर रखता है, तो यह मूर्तिपूजा हो जाती है।
निर्गमन 20:3 कहता है, “तू मुझे छोड़ दूसरों को ईश्वर करके न मानना।” स्पष्ट है कि यह आज्ञा लोगों द्वारा मूर्तियों की उपासना करने से बढ़कर किसी बात के लिये है; यह इस बात को सुनिश्चित करने के लिये अति-महत्वपूर्ण है कि हमारे जीवनों में परमेश्वर का स्थान और कुछ भी न लेने पाए।
प्रत्येक मूर्ति या मूर्ति-समान चरित्र सन्तुष्टि प्रदान नहीं कर सकता है। धन खो सकता है। सफलता धूमिल पड़ सकती है। सम्बन्ध निराश कर सकते हैं। परन्तु परमेश्वर अपरिवर्तनीय है। जब हम उसे सर्वप्रथम रखेंगे, तब हम अपने जीवन ऐसी बात पर बनाएँगे हैं जो अटल है।
तो, हम कैसे पहचान सकते हैं कि कोई बात हमारे लिये एक मूर्ति बन गई है? इसके लिये पूछने का एक अच्छा प्रश्न है, “यदि इसे मुझ से ले लिया जाए, तब क्या मेरा आनन्द और विश्वास फिर भी बने रहेंगे?” यदि नहीं, तो फिर समय आ गया है कि जिस ने भी मसीह का स्थान ले लिया है, उसे छोड़ कर फिर से ध्यान को मसीह पर केन्द्रित किया जाए।
हमारा ध्यान बँटाने वाले सांसारिक प्रभाव
हमें संसार से निरन्तर सन्देश प्राप्त होते रहते हैं कि हमें किन बातों की इच्छा रखनी चाहिए और जीवन किस प्रकार जीना चाहिये। ये सफलता को परिभाषित करते हैं, और आनन्द को धन, प्रसिद्धि, और स्वयं को सन्तुष्टि देने वाली बातों के पीछे जाने के साथ जोड़ कर दिखाते हैं। परन्तु ये बातें कभी भी सच में सन्तुष्टि देने वाली नहीं होती हैं।
1 यूहन्ना 2:15 हमें चेतावनी देता है, “तुम न तो संसार से और न संसार में की वस्तुओं से प्रेम रखो: यदि कोई संसार से प्रेम रखता है, तो उस में पिता का प्रेम नहीं है।”
आप फिर भी जीवन का आनन्द ले सकते हैं, परन्तु इसका यह अर्थ अवश्य है कि आप को उन बातों का ध्यान रखना होगा, जिन्हें हम सबसे बढ़कर प्राथमिकता देते हैं।
ध्यान बँटाने वाली सबसे प्रमुख बातों में से कुछ ये हैं:
– सोशल मीडिया और मनोरंजन – अपने आप में, ये बुरे नहीं हैं। परन्तु जब ये हमारे जीवनों को निर्देश देने लगते हैं और वचन से भी बढ़कर हमारे विचारों को प्रभावित करने लगते हैं, तब वे समस्या बन जाते हैं।
– सफलता और पुष्टि प्राप्त करने के पीछे जाना – अधिकाँश लोगों को कड़े परिश्रम का प्रतिफल मिलता है, और यह गलत नहीं है, परन्तु जब हमारा मूल्य मसीह के स्थान पर हमारी उपलब्धियों के साथ सम्बन्धित हो जाता है, तब बहुधा हम भूल जाते हैं कि अधिक महत्वपूर्ण क्या है।
– सांस्कृतिक दबाव – संसार ऐसे मूल्यों को बढ़ावा देता है जो परमेश्वर के सत्य के विरुद्ध होते हैं। उसके निर्देशों के बिना, उसके वचन से विरोधाभास रखने वाले विचारों पर विश्वास करने लग जाना सम्भव हो जाता है।
सामान्यतः जो सभी लोग कर रहे हैं, उसी के साथ सहमत होकर, उसे करने लग जाने के फंदे में फँसना सहज होता है। परन्तु मसीही विश्वासी होने के नाते, आप से अपेक्षा रखी जाती है कि आप भिन्न जीवन जिएँगे, अर्थात लोकप्रिय के स्थान पर सही निर्णय को, और अस्थाई के स्थान पर चिर-स्थाई बात को प्राथमिकता देंगे।
यीशु के मार्ग का अनुसरण किस तरह से करें
ध्यान भंग करने वाले संसार में यीशु का अनुसरण करने के लिये एक उद्देश्यपूर्ण प्रयास की आवश्यकता होती है। यह नहीं हो सकता है कि हम जीवन में इधर-उधर बहते रहें, और यह आशा भी रखें कि उसके निकट बने रहेंगे। हमें उन चुनावों पर ध्यान केन्द्रित करना होगा जो हमारे विश्वास को दृढ़ करते हैं, और जिनका वास्तव में महत्व होता है।
यीशु के मार्ग का अनुसरण करने के कुछ तरीके ये हैं:
अपने सोचने को परमेश्वर के वचन से ताज़ा रखें
रोमियों 12:2 हमें बताता है, “तुम्हारे मन के नए हो जाने से तुम्हारा चाल–चलन भी बदलता जाए।”, व्यक्ति जिन बातों में अपना समय बिता सकता है, पवित्रशास्त्र के साथ समय बिताना, उन बातों में सबसे अधिक मूल्यवान है। और यदि हम परमेश्वर के सत्य के स्थान पर संसार के विचारों पर निर्भर रहते हैं, तो हम केवल संसार के तरीके ही सीख पाएँगे।
आप जो कुछ भी अपने अन्दर लेते हैं उसके प्रभाव पर ध्यान केन्द्रित करें
फिलिप्पियों 4:8 कहता है कि जो जो बातें सत्य, आदरणीय, उचित, पवित्र, सुहावनी, और मनभावनी हैं, हमें उन्हीं पर ध्यान केन्द्रित रखना चाहिये। यह कथन इस बात पर बल देता है कि जो कुछ हम अपने अन्दर लेते हैं, या सुनते हैं, वे सभी हमारे लिए अच्छी नहीं होती हैं। परामर्श: ऐसे मीडिया का चुनाव करें जो आप के विश्वास का समर्थन करता है, न कि उसे चुनौती देता है।
प्रार्थना के लिये समय उपलब्ध रखिये‘
दैनिक प्रार्थना के लिए कुछ समय अलग तय करके रखें। यह परमेश्वर के साथ जुड़े रहने को सक्रियता के साथ सुनिश्चित करने का एक ठोस तरीका है। प्रार्थना केवल बातों को माँगना ही नहीं है, बल्कि परमेश्वर को एक अवसर देना भी है, कि आप के मन और निर्णयों को आकार दे सके। परमेश्वर के साथ नियमित रूप से वार्तालाप करने का समय निर्धारित रखने से यह सुनिश्चित करने में सहायता होगी कि संसार की ध्यान भंग करने वाली बातें हमें बहका न दें।
समान-विचार वाले विश्वासियों के साथ समय बिताएँ
स्वयं को विश्वासियों की संगति में रखना, कुछ विश्वासियों के लिये विश्वास में और भी दृढ़ होने में सहायक रहा है। ऐसा करने से व्यक्ति को मसीह के साथ अपने सम्बन्ध पर अधिक ध्यान देने में सहायता मिलती है। हम जिन लोगों के साथ संगति रखते हैं, उन्हीं के समान बन भी जाते हैं, जैसा कि नीतिवचन 27:17 में कहा गया है “जैसे लोहा लोहे को चमका देता है,वैसे ही मनुष्य का मुख अपने मित्र की संगति से चमकदार हो जाता है।”
अपने ध्यान को पुनः स्वर्गीय वस्तुओं पर केन्द्रित करें
परमेश्वर को प्राथमिकता प्रदान करने से, उसे अवसर मिलता है कि आप के लिये हर बात को सही परिप्रेक्ष्य में ले आये। आप स्वयं को इन तीन बातों के पीछे, जो आकर्षक तो लगती हैं परन्तु कभी भी पूर्ण सन्तुष्टि प्रदान नहीं करती हैं, भागता हुआ पाएँगे। जैसा कि मत्ती 6:33 में लिखा है, “इसलिये पहले तुम परमेश्वर के राज्य और उसके धर्म की खोज करो तो ये सब वस्तुएँ भी तुम्हें मिल जाएँगी।” वास्तविक सन्तुष्टि, संसार के नहीं, बल्कि परमेश्वर के पीछे जाने से आती है।
मसीह को केन्द्र में रखने के व्यावहारिक तरीके
मसीह को अपने जीवनों के केन्द्र में रखना उतना सहज नहीं है, जितना इसे कह देना है। प्रत्येक के पास ज़िम्मेदारियाँ और ध्यान भंग करने वाली बातें होती हैं, जो परमेश्वर के बारे में लम्बे समय तक भूल जाने को अत्याधिक सरल बना देती हैं।
जैसा कि पहले कहा गया है, मसीह को अपने जीवन के केन्द्र में रखने के लिये हमें ध्यान रख कर प्रयास करते रहना पड़ता है। चाहे जीवन बहुत व्यस्त और सम्भालने में कठिन भी हो जाए, फिर भी छोटे-छोटे दैनिक निर्णय होते हैं जो हमें परमेश्वर से जुड़े रहने में सहायता प्रदान करते हैं। परन्तु प्रश्न यह है कि, हम परमेश्वर के साथ एक सक्रिय और स्वस्थ सम्बन्ध किस तरह से सुनिश्चित कर सकते हैं, जो न तो बहुत दबाव में हो, और न ही जिसके बारे में केवल इतवार को ही विचार किया जाए?
उत्तर आप के सोचने से कहीं अधिक सरल है। अपने दिन-प्रतिदिन के जीवन में ऐसे व्यावहारिक कदम उठाने के बारे में ध्यान केन्द्रित रखें, जो आप के ध्यान को परमेश्वर की ओर मोड़ने में सहायता करें।
दिन का आरम्भ परमेश्वर के साथ करें
प्रातः उठते ही जो पहला कार्य हम करते हैं, वह बहुत कुछ बयान कर देता है। प्रातः उठते ही अपने फोन को देखने के बारे में कल्पना कीजिए। सोशल मीडिया पर एक नज़र डालना, और अपनी ईमेल देख लेना, आप के दिमाग को कई बातों में उलझा देता है। इसके स्थान पर, यदि हम थोड़ा समय परमेश्वर पर ध्यान केन्द्रित करने में लगाएँ, तो कैसा रहेगा? अपने ध्यान के केन्द्र को अन्य हर बात से हटा कर परमेश्वर पर केन्द्रित करने से सभी बातों को सही परिप्रेक्ष्य में लाने में सहायता मिलती है।
यदि आप यह सोच रहें हैं कि इसका अर्थ है बिस्तर से बाहर निकलने से पहले आप को प्रार्थना में कई घण्टे बिताने पड़ेंगे, तो चिन्ता मत कीजिये। परमेश्वर के लिये एक सेकेण्ड का एक छोटा सा अंश भी लगाना, आपके दिन को बेहतर कर देने की क्षमता रखता है। नये दिन के लिये उसका धन्यवाद करने जैसी साधारण बात, या बाइबल का एक छोटा सा भाग पढ़ लेना, दिन का सही आरम्भ करने में आप का सहायक हो सकता है।
दिन का पहला विचार परमेश्वर को देना, हमें जीवन को दिन-प्रतिदिन की रीति से जीने के लिये प्रेरित करता है, बजाए केवल करने वाले कार्यों की सूची पर चिन्ह लगाते जाने के अनुसार जीने के।
परमेश्वर के वचन में बने रहें
परमेश्वर का वचन हमें इस का सार बताता है कि हम कौन हैं, और हम जो करते हैं, उसे क्यों करते हैं। जब कोई व्यक्ति अपने जीवन के सत्यों के बारे में सोचना बंद कर देता है, तब वह उद्देश्य के साथ, मसीह के सार से दूर भटकना आरम्भ कर देता है। सोशल मीडिया, समाचारों, और मनोरंजन के तरीके भी संसार में निरन्तर दोहराए जाते हैं, और यदि हम सावधान नहीं रहेंगे, तो हम इन आवाज़ों में भटक जाएंगे, और परमेश्वर की आवाज़ को भुला देंगे।
प्रभु ने मत्ती 4:4 में कहा, “मनुष्य केवल रोटी ही से नहीं, परन्तु हर एक वचन से जो परमेश्वर के मुख से निकलता है, जीवित रहेगा,” और उसने सही कहा है। जिस प्रकार से हमारे शरीरों को भोजन की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार से हमारी आत्मा को भी पोषण की आवश्यकता होती है।
बाइबल को पढ़ना ऐसे नहीं होना चाहिए मानो निर्धारित कार्यों की सूची की एक बात पर चिन्ह लगाने के लिए कर रहे हैं, वरन् परमेश्वर की आवाज़ सुनने के लक्ष्य के साथ होना चाहिए। परमेश्वर का मन, बुद्धि, और मार्गदर्शन हमारे जीवनों में केवल उसके वचन के द्वारा ही उण्डेले जाते हैं। उसके वचन में बने रहने से, चाहे पद कितना भी गौण क्यों न लगे, उससे हमारा ध्यान जीवन के उन महत्वपूर्ण भागों की ओर ध्यान निर्देशित होता है, जिनका वास्तव में महत्व है।
प्रार्थना को एक वार्तालाप बनाएँ, एक रीति नहीं
दिन के कुछ निश्चित समय होते हैं, जब मैं भी और अन्य लोग भी प्रार्थना करते ही हैं, भोजन से पहले, कलीसिया में, या परमेश्वर से कुछ सहायता माँगने के लिये। साधारण प्रतीत होते हुए भी, ये निर्धारित समय सुरक्षा का एक मिथ्या आभास प्रदान कर सकते हैं, कि प्रार्थनाएँ की जा रही हैं। इस यात्रा में व्यक्ति रीति-के-अनुसार चलने वाला बन सकता है, और परमेश्वर के साथ सम्बन्ध की मनोहरता के भाव को भुला सकता है।
कल्पना कीजिये कि आप अपने सबसे अच्छे मित्र से सप्ताह में केवल एक दिन, पाँच मिनट के लिये बात करते हैं। यह मित्रता में किसी घनिष्ठता का तो आभास नहीं देगा, है न? परमेश्वर के साथ भी यही सिद्धान्त लागू होता है। उसकी लालसा है कि हम सारा दिन उसके साथ वार्तालाप करते रहें, न कि केवल कुछ निर्धारितों पलों में।
धर्मी प्रभावों को चुनें
जिन लोगों के साथ हम अधिकाँश समय व्यतीत करते हैं, यदि वे हमारी जैसी बातों को मूल्यवान नहीं समझते हैं, तब परमेश्वर से दूर भटक जाना बहुत सरल होता है। यदि हम अपने भीतरी मनुष्यत्व पर ध्यान नहीं देंगे, तो परमेश्वर से भटक कर दूर हो जाने के लिये कोई प्रयास नहीं करना पड़ेगा।
हमें अविश्वासियों के साथ प्रत्युत्तरों को देते रहने में समय नहीं लगाना चाहिये, परन्तु जो लोग हमारे विश्वास में हमें बढ़ते रहने में सहायता कर सकते हैं, उनके साथ संगति के खोजी रहना अधिक महत्वपूर्ण है।
यह इस प्रकार से हो सकता है:
– एक छोटे समूह या बाइबल अध्ययन कक्षा में सम्मिलित होना।
– किसी ऐसे को खोजना जो आत्मिक बातों में आप की सहायता करने के लिये आपका मार्गदर्शक बने।
– ऐसे मित्रों के साथ समय बिताना जो मसीह में और भी अधिक बढ़ते रहने के लिए आप को प्रेरित करें।
– जो लोग यीशु से प्रेम करते हैं, वे हमारे विश्वास को दृढ़ करते हैं और हमें सही मार्ग पर बनाए रखते हैं।
कमज़ोरी: अत्यधिक ध्यान लगाना
ध्यान भंग करने वाली बातें, तटस्थ से आरम्भ होकर नकारात्मक तक जाती हैं और हमारे जीवनों में हस्तक्षेप करने वाली छोटी-छोटी बातों से आरम्भ कर के यीशु को एक किनारे करने वाली तक हो जाती हैं।
समय बिताने के लिये जो भी किया जाता है, उस पर विचार कीजिये: फोन पर सोशल मीडिया, कार्य/स्कूल या व्यक्तिगत लक्ष्य, या मनोरंजन के कुछ विशिष्ट तरीके। इन में से कोई भी पापमय नहीं हैं, परन्तु ये हमें परमेश्वर की निकटता में बढ़ने में सहायता नहीं करते हैं।
इब्रानियों 12:1 के अनुसार, “इस कारण जब कि गवाहों का ऐसा बड़ा बादल हम को घेरे हुए है, तो आओ, हर एक रोकने वाली वस्तु और उलझाने वाले पाप को दूर करके, वह दौड़ जिसमें हमें दौड़ना है धीरज से दौड़ें।”
इसके लिये हमें उन बातों को पहचानना है जो हमें मसीह से दूर खींचती हैं, और जो करना तथा बदलना आवश्यक है, उससे हमारे ध्यान को हटा देती हैं। यीशु के निकट बने रहने के लिये हमें कुछ ध्यान भटकाने वाली बातों को छोड़ना स्वेच्छा से स्वीकार करना पड़ सकता है।
उद्देश्य के साथ जिएँ
मसीह पर ध्यान केन्द्रित रखने के सबसे कारगर तरीकों में से एक है उद्देश्यपूर्ण होना, और अपने दिन-प्रतिदिन को परमेश्वर की विशाल योजना में योगदान देने वाला देखना निश्चय ही सहायता करता है।
कार्य केवल आमदनी कमाने का साधन नहीं है, जो भी हम करते हैं, यह उसके द्वारा परमेश्वर की सेवा करने का अवसर भी है।
सम्बन्ध केवल एक-दूसरे से सम्पर्क रखना नहीं है, बल्कि वे हमें अवसर प्रदान करते हैं कि हम परमेश्वर के प्रेम को प्रदर्शित कर सकें।
समस्याएँ और चुनौतियाँ, बाधाएँ या पिछड़ जाना नहीं हैं, बल्कि हमारे विश्वास को दृढ़ करने के अवसर हैं।
जैसा कि बाइबल में कहा गया है, कुलुस्सियों 3:17, “वचन में या काम में जो कुछ भी करो सब प्रभु यीशु के नाम से करो, और उसके द्वारा परमेश्वर पिता का धन्यवाद करो।”
जब हम अपने दिन-प्रतिदिन के जीवन के लिये यह मार्ग चुनते हैं, तब मसीह हमारे जीवनों का एक छोटा सा कक्ष बना हुआ नहीं रह जाता है, वरन् जो कुछ भी हम करते हैं उसका आधार बन जाता है।
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चर्चा: मसीह के साथ बने रहने में क्या बाधा बनता है?
- यीशु के साथ समय बिताने से आपका ध्यान कौन सी घटनाएँ या गतिविधियाँ भटकाती हैं?
- आप किस प्रकार यह सुनिश्चित करने का प्रयास सकते हैं कि मसीह आप की दैनिक गतिविधियों में प्राथमिकता रखे?
- आत्मिक रीति से स्वस्थ रहने के लिये आप को किस प्रकार के व्यवहार, लोगों, या बातों को कम करने या हटा देने की आवश्यकता है?
- इस सप्ताह आप एक कौन सा ऐसा छोटा कदम उठा सकते हैं, जो मसीह के और भी निकट अनुभव करने में आपका सहायक होगा?
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मसीह को केन्द्र में रखना और दैनिक निर्णय लेते हुए ध्यान को केन्द्रित रखना, सिद्ध होने के बारे में नहीं है – बल्कि यह, जो कुछ भी आप करते हैं, उससे सम्बन्धित चुनाव करने, और हर पल, और हर बात में उसे ही प्राथमिकता देने के बारे में है। सुनिश्चित करें कि आप इस सप्ताह स्वयं से प्रश्न करने में कुछ समय बिताएँगे कि वे क्या बातें हैं जो आप का ध्यान आकर्षित करने के प्रयास कर रही हैं। फिर, उसे संकुचित करके उस एक कदम पर लेकर आएँ जो आप के ध्यान को एक सबसे महत्वपूर्ण बात पर केन्द्रित करे। याद रखिये, हम मसीह के जितना निकट होंगे, उतने ही स्वतन्त्र होंगे कि वह बनें, जो वह चाहता कि है कि हम हों।
भाग IV: औरों के लिए एक प्रेरणा स्रोत बनना
मुख्य वचन: मत्ती 5:16
“उसी प्रकार तुम्हारा उजियाला मनुष्यों के सामने ऐसा चमके कि वे तुम्हारे
भले कामों को देखकर तुम्हारे पिता की, जो स्वर्ग में है, बड़ाई करें।”
अपने दिन-प्रतिदिन के कार्यों के द्वारा औरों का मसीह की ओर मार्गदर्शन करना
इसका एहसास किये बिना ही, हम में से प्रत्येक किसी न किसी को किसी तरह से प्रभावित करता है। हमारा व्यवहार, बोलचाल, और क्रियाएँ किसी को, यीशु की ओर या फिर उससे दूर जाने के निर्देश प्रदान करने के सबसे सहज तरीके होते हैं।
थोड़ा सा समय निकालकर उन भिन्न व्यक्तियों के बारे में सोचें, जिन्होंने आपके जीवन को बहुत प्रभावित किया है। सम्भावना है कि कोई घनिष्ठ मित्र, शिक्षक, या माता-पिता ध्यान में आएँगे। उन्होंने आप को कुछ निर्धारित नियमों का पालन करने के स्थान पर, सही क्या है को सिखाया। उन्होंने ऐसे तरीकों से व्यवहार किया जिनसे उनकी कही बातें प्रमाणित होती थीं।
हम भी उसी प्रकार के प्रेरणा स्रोत बन सकते हैं, और यीशु हमें ऐसा बनने के लिये बुलाता है। उसने मत्ती 5:16 में कहा, “उसी प्रकार तुम्हारा उजियाला मनुष्यों के सामने ऐसा चमके कि वे तुम्हारे भले कामों को देखकर तुम्हारे पिता की, जो स्वर्ग में है, बड़ाई करें।”
इस पद का अर्थ है कि हमारे दैनिक जीवन की गतिविधियों को, हमारे जीवनों से परमेश्वर के प्रेम को इस तरह से व्यक्त करना चाहिये, कि लोग उसके निकट आएँ।
अब प्रश्न यह है कि हम इसे कैसे करें? हम अपने जीवनों में क्या कदम उठाएँ जिन के कारण लोग यीशु के निकट आने के प्रयास करें?
अपने उजियाले को चमकने दें
लोगों के जीवन में सकारात्मक प्रभाव डालने वाला होने का यह अर्थ नहीं है कि आप को सिद्ध होना होगा। इसका सीधा अर्थ यह है कि आपको उपलब्ध होना होगा।
लोग इस बात पर ध्यान करते हैं कि हम चुनौतियों का सामना किस तरह से करते हैं, औरों के साथ किस तरह से व्यवहार करते हैं, और व्यवहारिक जीवन में क्या करते हैं। यदि हम कहें कि हम यीशु के अनुयायी हैं परन्तु हमारे जीवन संसार के अन्य लोगों से किसी भी तरह से भिन्न नहीं हैं, तो हमारी गतिविधियाँ व्यर्थ हो जाती हैं।
अपने उजियाले को चमकाने का अर्थ है:
– चाहे आस-पास कोई भी न हो, तब भी दृढ़ नैतिक सिद्धान्तों को बनाए रखना।
– स्वार्थी होने की बजाए, निःस्वार्थ रहने को चुनना।
– अपनी मान्यताओं के प्रति स्थिर बने रहना, चाहे वर्तमान में वे प्रचलित न भी हों।
चाहे लोग आप पर ध्यान न भी करें, परन्तु वे आप के जीवन पर ध्यान देंगे। आप के कार्य आप की गवाही हैं।
ईमानदारी के साथ जीना
ईमानदारी का अर्थ है अकेले में और सार्वजनिक रीति से एक ही व्यक्ति होना। यह सही करने को चुनना है, न कि सरल को।
नीतिवचन 11:3 में कहा गया है, “सीधे लोग अपनी खराई से अगुवाई पाते हैं, परन्तु विश्वासघाती अपने कपट से नष्ट होते हैं,” जिसका अर्थ है कि यदि आप ईमानदार होंगे तो फलवन्त होंगे, परन्तु यदि धोखेबाज़ होंगे तो दुःख उठाएँगे।
जब आप खरे, स्थिर, और विश्वासयोग्य बने रहते हैं, तब लोग आप पर भरोसा करने लगते हैं। उन्हें एहसास हो जाता है कि आप न केवल अपने धर्म के बारे में बातें करते हैं, बल्कि प्रतिदिन उसे जी कर भी दिखाते हैं। जब उस परमेश्वर के बारे में, जिसकी हम सेवा करते हैं, लोगों को विश्वास दिलाने की बात होती है, तब इस प्रकार की वास्तविकता जीवन-बदलने वाली हो सकती है।
बेईमानी, बकवाद करने, और अपने सद्गुणों के साथ समझौते करने का जीवन जीते हुए, यीशु का अनुसरण करना, हमारे आसपास के लोगों के मनों में, जो उसे देखते हैं, असमंजस उत्पन्न करता है। क्या वे हम पर भरोसा करना छोड़ देते हैं? हम नहीं जानते हैं, परन्तु खराई, नम्रता, और विश्वासयोग्यता से भरा हुआ जीवन जीना हमें मसीह का एक प्रतीक बना देता है।
यीशु के समान प्रेम करना
प्रेरणा स्रोत बनने का सबसे अच्छा तरीका है लोगों से उसी प्रकार प्रेम करना, जैसे यीशु ने किया था, तथा स्वयं को औरों की परिस्थितियों में रख कर देखना।
यीशु ने उनसे प्रेम किया, जिन से प्रेम करना सहज नहीं था; इसीलिये उसे पापियों, तिरस्कृत लोगों, और अपने शत्रुओं की भी परवाह रहती थी। उसका प्रेम न केवल क्षमा करने और सहानुभूति दिखाने वाला था, वरन् धीरजवन्त भी था।
जैसा कि यूहन्ना 13:34-35 में कहा गया है, “मैं तुम्हें एक नई आज्ञा देता हूँ कि एक दूसरे से प्रेम रखो; जैसा मैं ने तुम से प्रेम रखा है, वैसा ही तुम भी एक दूसरे से प्रेम रखो। यदि आपस में प्रेम रखोगे, तो इसी से सब जानेंगे कि तुम मेरे चेले हो।”
यदि आप औरों को मसीह की ओर लाना चाहते हैं, तो आप को उनसे वैसा ही प्रेम करना होगा जैसा वह करता है, जिसका अर्थ है सभी से बिना किसी शर्त के प्रेम करना, तब भी, जब वे इसके योग्य नहीं हैं। शब्द हमेशा हमारे प्रेम को व्यक्त नहीं कर पाते हैं, परन्तु व्यवहार व्यक्त करता है। औरों के प्रति दयालुता दिखाने से वे मसीह के प्रेम को समझने लगेंगे।
नम्रता के द्वारा अगुवाई करना
बहुत से लोग समझते हैं कि प्रेरणा स्रोत होने का अर्थ है नियन्त्रण करने वाले, सर्वोत्तम, या सभी प्रश्नों के उत्तर दे सकने वाले होना। परन्तु यीशु ने हमें कुछ भिन्न दिखाया है।
पौलुस ने फिलिप्पियों 2:3-4 में लिखा,“विरोध या झूठी बड़ाई के लिये कुछ न करो, पर दीनता से एक दूसरे को अपने से अच्छा समझो। हर एक अपने ही हित की नहीं, वरन् दूसरों के हित की भी चिन्ता करे।”
यीशु ने नम्रता के द्वारा अगुवाई की। उसने सत्कार या आदर की माँग नहीं की; उसने बस सेवा की। उसने अपने शिष्यों की भी सेवा की, और उनके भी पैर धोए। उसने हमेशा लोगों को स्वयं से अधिक महत्व दिया, और अन्त में उसने हमारे लिए अपने प्राण भी दे दिये।
मसीह की ओर लोगों का मार्गदर्शन करने के लिये एक नमूना स्थापित करना आवश्यक है। इसका अर्थ होता है कम बोलना और अधिक सुनना, स्वयं के महत्व को कम दिखाना, और जब भी अवसर आए तब सेवा करना, चाहे समय और स्थान कोई भी हो।
अपने विश्वास के अनुसार कार्य करना
हर कोई उपदेश को नहीं सुनेगा। सभी बाइबल को नहीं पढ़ेंगे। परन्तु आप जैसा जीवन जीते हैं, सब लोग उसे देखते हैं।
आप का जीवन यीशु का वह एकमात्र नमूना हो सकता है, जिसे कोई व्यक्ति देखने पाए।
इसका यह अर्थ नहीं है कि आप को सिद्ध होना है; इसका बस यही अर्थ है कि आपको वास्तविक होना है। लोग वास्तविक विश्वास की सराहना करते हैं, न कि दिखावे की। इस प्रकार के लोग जब भी किसी ऐसे व्यक्ति के संपर्क में आते हैं, जो परमेश्वर से खराई से प्रेम करता है, उस पर भरोसा रखता है, और उस का अनुसरण करता है, तो वे उसे बहुत ध्यान से देखते हैं।
1 पतरस 3:15 कहता है “पर मसीह को प्रभु जानकर अपने अपने मन में पवित्र समझो। जो कोई तुम से तुम्हारी आशा के विषय में कुछ पूछे, उसे उत्तर देने के लिये सर्वदा तैयार रहो, पर नम्रता और भय के साथ।”
जब आप आनन्द, शान्ति, और विश्वास से भरा हुआ जीवन जिएँगे, तब लोग प्रश्न करने लगेंगे कि वह क्या है जो आप को, आप बनाता है। वे लोग आप को यीशु के बारे में बात करने का अवसर देंगे, न केवल शब्दों से बल्कि आप के जीवन के द्वारा।
अगली पीढ़ी को परामर्श देना और प्रोत्साहित करना
चाहे हम इसका एहसास करें या न करें, हम सभी प्रभाव डालते हैं। कोई न कोई यह देखता है कि हम किस तरह से जीवन जीते हैं, संघर्षों का सामना करते हैं, तथा औरों के साथ बर्ताव करते हैं। बहुत से लोगों के लिये—विशेषकर युवा पीढ़ी के लिये—हमारे कार्य, हमारे शब्दों से बढ़कर बोलते हैं।
अगली पीढ़ी मार्गदर्शन की खोजी है। वे ऐसे प्रेरणा स्रोतों को ढूँढ़ रहे हैं जो विश्वास के बारे में केवल बोलते नहीं हैं वरन् उसे जी कर दिखाते हैं। उन्हें यह देखने की आवश्यकता है कि वास्तविक और व्यावहारिक तरीके से मसीह का अनुसरण करने का क्या अर्थ होता है। यहीं पर मार्गदर्शक होना आ जाता है।
मार्गदर्शक होने का अर्थ सभी उत्तरों को देने वाला या सिद्ध होना नहीं है। यह किसी के साथ-साथ चलना, अपने अनुभवों को साझा करना, और उसे यीशु की ओर संकेत करना है। यह वास्तविक होने, अनुग्रह दिखाने, और प्रोत्साहित करने के बारे में है। यह किसी अन्य के विश्वास की यात्रा में उन में निवेश करने के बारे में है।
इसलिये, हम अगली पीढ़ी को इस प्रकार से कैसे मार्गदर्शन दे सकते हैं, प्रोत्साहित कर सकते हैं, कि उससे वास्तव में उनके जीवनों एक अन्तर आए?
नमूना बनकर अगुवाई करना
औरों का मार्गदर्शक होने के सबसे सशक्त तरीकों में से एक है, बस अपने विश्वास को जी कर दिखाना। लोगों को चाहे आप की कही बात हमेशा याद न रहे, परन्तु आप की जीवन शैली उन्हें हमेशा याद रहेगी।
पौलुस ने 1 कुरिन्थियों 11:1 में कहा, “तुम मेरी सी चाल चलो जैसा मैं मसीह की सी चाल चलता हूँ।” मार्गदर्शक होना यही होता है—यह लोगों को स्वयं की ओर संकेत करना नहीं है, परन्तु अपने दैनिक जीवन के द्वारा यीशु की ओर संकेत करना है।
नमूना बनकर अगुवाई करने के लिये, आप को पास्टर या शिक्षक होने की आवश्यकता नहीं है। प्रत्येक वार्तालाप, दयालुता का प्रत्येक छोटा कार्य, अपने विश्वास में दृढ़ खड़े रहने का प्रत्येक निर्णय—सभी बातों का महत्व है। जब युवा विश्वासी आपको परमेश्वर-को-आदर देने वाले निर्णय करते हुए देखेंगे, तो वे भी ऐसा ही करने के लिये प्रोत्साहित होंगे, चाहे यह करना कठिन ही क्यों न हो।
उपलब्ध होना और सुनने के लिये इच्छुक रहना
कभी-कभी मार्गदर्शक होने का अर्थ केवल सही बोलना भर नहीं होता है—केवल साथ बने रहना ही पर्याप्त हो सकता है। लोगों को केवल मार्गदर्शन ही नहीं चाहिये; उन्हें कोई ऐसा भी चाहिये है जो सच में सुनता भी है।
युवा पीढ़ी ऐसी चुनौतियों का सामना कर रही है जो पहले विद्यमान नहीं थीं—सोशल मीडिया पर निरन्तर तुलना, पहचान को लेकर असमंजस, और असम्भव मानकों पर पूरा उतारने के दबाव। अनेकों लोग स्वयं को खोया हुआ, अकेला, या अपने विश्वास के बारे में अनिश्चित पाते हैं।
इसीलिये, केवल उपलब्ध होने से ही बहुत बड़ा अन्तर आ सकता है। जब कोई यह जानता है कि वह आप के पास आलोचना किये जाने के भय के बिना आ सकता है, तो बहुत सम्भव है कि वह खुलकर बातें करे। उन्हें एक सुरक्षित स्थान की आवश्यकता होती है जहाँ वे कठिन प्रश्न पूछ सकें, संदेहों के साथ संघर्ष कर सकें, और जीवन की चुनौतियों का विश्लेषण कर सकें।
सुनने का यह अर्थ नहीं है कि आप के पास सभी उत्तर उपलब्ध होंगे। कभी-कभी, केवल इतना जानना कि किसी को आपकी परवाह है, प्रोत्साहन और आशा देने के लिये पर्याप्त होता है।
विश्वास में बढ़ने को प्रोत्साहित करना
एक अच्छा मार्गदर्शक केवल परामर्श ही नहीं देता है—वह औरों की बढ़ोतरी में उनकी सहायता भी करता है। इसका अर्थ होता है आत्मिक आदतों, जैसे कि बाइबल पढ़ना, प्रार्थना में समय बिताना, और एक धर्मी समुदाय के साथ जुड़े रहना के लिये प्रोत्साहित करना।
इब्रानियों 10:24 कहता है, “और प्रेम, और भले कामों में उस्काने के लिये हम एक दूसरे की चिन्ता किया करें”
हमें विश्वास की इस यात्रा में अकेले ही नहीं चलना है। हमें चुनौतियाँ देने, आगे बढ़ने के लिए धक्का देने, और जब भी हम भूल जाएँ तब हमें याद दिलाने के लिये लोगों के साथ की आवश्यकता है। यही मार्गदर्शक होने का अर्थ है—औरों को मसीह में जड़ें जमाए हुए रहने में सहायता करना, ताकि वे अपने विश्वास में और दृढ़ होते जाएँ।
इसे जटिल होने की आवश्यकता नहीं है। कभी-कभी यह बहुत साधारण हो सकता है, जैसे कि:
– किसी ऐसे के साथ प्रार्थना करना जो संघर्ष कर रहा है।
– बाइबल के किसी ऐसे पद को, जिससे आप प्रोत्साहित हुए हों, औरों के साथ साझा करना।
– लोगों से यह जानने के लिये मिलते रहना कि वे परमेश्वर के साथ कैसे चल रहे हैं।
इन छोटे कार्यों का, उनके विश्वास पर बहुत बड़ा प्रभाव हो सकता है।
अपने संघर्षों और गवाहियों को बाँटना
प्रेरणा स्रोत होने के बारे में सबसे बड़ी गलतफहमियों में से एक यह समझना है कि आप को सिद्ध होना पड़ेगा। परन्तु सच तो यह है कि वास्तविक होना, सब कुछ जानने से कहीं बढ़कर प्रभावी होता है।
युवा विश्वासियों को यह दिखाना आवश्यक है कि, संघर्ष विश्वास के जीवन का एक सामान्य भाग हैं। उन्हें उन कहानियों को सुनना है कि कठिन समयों में परमेश्वर ने किस तरह से कार्य किये, उसने प्रावधान कैसे उपलब्ध करवाए, और वह किस प्रकार से चँगाई को लाया।
भजन 107:2 कहता है, “यहोवा के छुड़ाए हुए ऐसा ही कहें।”
आप की गवाही—चाहे वह भय पर जयवन्त होने के बारे में हो, परमेश्वर पर भरोसा रखने के बारे में हो, या विश्वास में बढ़ने के बारे में हो—उससे कोई अन्य प्रयास करते रहने के लिये प्रोत्साहित हो सकता है। उससे उन्हें स्मरण आता है कि परमेश्वर विश्वासयोग्य है, तब भी जब जीवन कठिन होता है।
अपने संघर्षों को साझा करना आप को कमज़ोर नहीं बनाता है—उससे लोग आप के साथ सम्बन्धित हो सकते हैं। इससे लोग यह देखने पाते हैं कि, मसीह का अनुसरण करना सिद्ध होने के बारे में नहीं है, बल्कि हर परिस्थिति में उस पर भरोसा बनाए रखने के बारे में है।
औरों को चुनौती देना और प्रोत्साहित करना कि वे आगे आएँ
एक अच्छा मार्गदर्शक केवल किसी को बढ़ने में ही सहायता नहीं करता है—वह उन्हें अपनी बुलाहट को पूरा करने के लिये कदम बढ़ाने के लिए चुनौती देता है।
युवा विश्वासियों को यह याद दिलाए जाने की आवश्यकता होती है कि उनका भी एक उद्देश्य है, उनके जीवनों के लिये भी परमेश्वर की एक योजना है, और वे भी अन्तर ला सकते हैं। कभी-कभी, बस इतनी ही आवश्यकता होती है कि कोई यह कहे, “मैं तुम पर विश्वास करता हूँ। मैं परमेश्वर को तुम्हारे साथ कार्य करते हुए देखता हूँ। लगे रहो।”
प्रोत्साहन में सामर्थ्य है। इससे लोगों को विश्वास के साथ कदम बढ़ाने की हिम्मत मिलती है, कि सेवा, अगुवाई, और उनके जीवनों के लिये परमेश्वर की योजनाओं पर भरोसा करें।
मार्गदर्शक होना इसी के बारे में है—यह देखने में किसी की सहायता करना कि परमेश्वर ने उन्हें क्या योग्यताएँ दी हैं, और फिर उन्हें उनकी ओर अग्रसर करना।
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चर्चा: आप औरों के लिये एक धर्मी नमूना किस प्रकार बन सकते हैं?
- आप के जीवन में एक धर्मी मार्गदर्शक कौन था, और आप पर उनका क्या प्रभाव पड़ा?
- आप के जीवन के किन भागों के द्वारा मसीह भली-भाँति दिखता है? किन भागों में अभी भी बढ़ोतरी की आवश्यकता है?
- किसी विश्वास में कमज़ोर जन में आप उद्देश्यपूर्ण होकर किस प्रकार से निवेश कर सकते हैं?
- इस सप्ताह आप कौन सा एक कदम उठा सकते हैं जिससे किसी को परमेश्वर के साथ चलने में प्रोत्साहन मिले, और वह उभारा जाए?
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अन्तिम विचार
यद्यपि हम अन्य लोगों की सराहना कर सकते हैं, परन्तु इससे इनकार नहीं किया जा सकता है कि कोई भी प्रेरणा स्रोत सिद्ध नहीं होता है। इसीलिये यीशु को प्रेरणा स्रोत बनाकर उसी का अनुसरण करना ही, हमेशा ही सबसे योग्य चुनाव होगा। आप इस सम्बन्ध से सच्चा उद्देश्य और बुद्धि प्राप्त कर सकेंगे, और साथ ही ऐसा जीवन भी, जो औरों की भी परमेश्वर की ओर अगुवाई करता है। संक्षेप में, सावधान रहें कि आप किस का अनुसरण करने का निर्णय लेते हैं, क्योंकि कार्यों के परिणाम होते हैं।
लेखक के बारे में
CHRISTIAN LINGUA टीम विश्व की सबसे बड़ी मसीही अनुवाद एजेंसी है, जो विश्वभर में वीडियो, ऑडियो और मीडिया परियोजनाओं के लिए अनुवाद और ओवरडब सेवाएँ प्रदान करती है।
विषयसूची
- भाग I: प्रेरणा स्रोतों का प्रभाव
- मुख्य वचन: 1 कुरिन्थियों 11:1
- आदर्श हमारे चरित्र और निर्णयों को किस प्रकार से आकार देते हैं
- नमूने की शक्ति
- प्रेरणा स्रोत हमारे चुनावों को प्रभावित करते हैं
- संस्कृति किस प्रकार से वास्तविकता को बदलती है
- उन प्रेरणा स्रोतों का प्रभाव जो अपने जीवन मसीह के चारों ओर केन्द्रित करते हैं
- गलत प्रेरणा स्रोतों से खतरे
- प्रभावों के सांसारिक अथवा धर्मी होने की पहचान करना
- धार्मिक प्रभाव: हमें किस का अनुसरण करना चाहिये
- अन्तर को कैसे पहचानें
- अपने ध्यान का केन्द्र मसीह की ओर परिवर्तित करना
- चर्चा: आप सबसे अधिक किस की सराहना करते हैं, और क्यों?
- भाग II: यीशु—चरम आदर्श
- मुख्य वचन: इब्रानियों 12:2
- यीशु सिद्ध प्रेरणा स्रोत क्यों है
- यीशु ने विनम्रता से अगुवाई की
- यीशु प्रेम और सहानुभूति के साथ चला
- यीशु निर्भीक होकर सत्य बोलता था
- यीशु ने अटल विश्वास प्रदर्शित किया
- यीशु ने हमारे लिये सब कुछ बलिदान कर दिया
- अपनी आँखों को यीशु पर लगाए रखना
- यीशु की नम्रता, प्रेम और आज्ञाकारिता से सीखना
- मसीह की नम्रता: सच्ची महानता सेवा करने से आती है
- मसीह का प्रेम: एक असीम प्रेम
- मसीह की आज्ञाकारिता: हर कीमत पर परमेश्वर का अनुसरण
- चर्चा: यीशु का अनुसरण करना आप के जीवन को किस प्रकार से बदल सकता है?
- भाग III: ध्यान भंग कर देने वाले संसार में मसीह का अनुसरण करना
- मुख्य वचन: रोमियों 12:2
- जब संसार हमें दूर खींचता है, तब हमें मसीह पर ध्यान केन्द्रित रखना चाहिये
- झूठी मूर्तियाँ खतरनाक हो सकती हैं
- हमारा ध्यान बँटाने वाले सांसारिक प्रभाव
- यीशु के मार्ग का अनुसरण किस तरह से करें
- अपने सोचने को परमेश्वर के वचन से ताज़ा रखें
- आप जो कुछ भी अपने अन्दर लेते हैं उसके प्रभाव पर ध्यान केन्द्रित करें
- प्रार्थना के लिये समय उपलब्ध रखिये‘
- समान-विचार वाले विश्वासियों के साथ समय बिताएँ
- अपने ध्यान को पुनः स्वर्गीय वस्तुओं पर केन्द्रित करें
- मसीह को केन्द्र में रखने के व्यावहारिक तरीके
- दिन का आरम्भ परमेश्वर के साथ करें
- परमेश्वर के वचन में बने रहें
- प्रार्थना को एक वार्तालाप बनाएँ, एक रीति नहीं
- धर्मी प्रभावों को चुनें
- कमज़ोरी: अत्यधिक ध्यान लगाना
- उद्देश्य के साथ जिएँ
- चर्चा: मसीह के साथ बने रहने में क्या बाधा बनता है?
- भाग IV: औरों के लिए एक प्रेरणा स्रोत बनना
- मुख्य वचन: मत्ती 5:16
- अपने दिन-प्रतिदिन के कार्यों के द्वारा औरों का मसीह की ओर मार्गदर्शन करना
- अपने उजियाले को चमकने दें
- ईमानदारी के साथ जीना
- यीशु के समान प्रेम करना
- नम्रता के द्वारा अगुवाई करना
- अपने विश्वास के अनुसार कार्य करना
- अगली पीढ़ी को परामर्श देना और प्रोत्साहित करना
- नमूना बनकर अगुवाई करना
- उपलब्ध होना और सुनने के लिये इच्छुक रहना
- विश्वास में बढ़ने को प्रोत्साहित करना
- अपने संघर्षों और गवाहियों को बाँटना
- औरों को चुनौती देना और प्रोत्साहित करना कि वे आगे आएँ
- चर्चा: आप औरों के लिये एक धर्मी नमूना किस प्रकार बन सकते हैं?
- अन्तिम विचार
- लेखक के बारे में