#18 परमेश्वर की इच्छा और निर्णय लेना
परिचय: निर्णय
कुछ शोधकर्ताओं का अनुमान है कि एक वयस्क प्रतिदिन लगभग 35,000 निर्णय लेता है। मुझे नहीं पता कि इस तरह की संख्या को कैसे सिद्ध किया जाए, परन्तु यह बात स्वयं ही अपनी गवाही देती है कि आप लगातार निर्णय ले रहे हैं कि क्या करना चाहिए। आप अधिकतर निर्णय तेजी से लेते हैं, जैसे कि इस तरफ देखना है, उस तरफ जाना है, इस विचार को सोचना है, या वह शब्द कहना है। आपके कई निर्णय अपेक्षाकृत छोटे होते हैं, जैसे कि क्या खाना है या क्या पहनना है। आपके कुछ निर्णय नैतिक होते हैं, जैसे कि किसी विशेष परिस्थिति में कैसे व्यवहार करना है। आपके सबसे दुर्लभ निर्णय बड़े होते हैं, जैसे कि किसी विशेष व्यक्ति से विवाह करना है या कोई विशेष पेशा चुनना है।
जब अधिक महत्वपूर्ण निर्णयों के लिए यह निर्धारित करने का समय आता है कि क्या करना चाहिए, तो कुछ लोग कार्यवाही करने में इतने अधिक उतावले हो जाते हैं कि वे “तैयारी करो, निशाना लगाओ, मार दो” के “तैयारी करो” और “निशाना लगाओ” वाले चरणों को ही छोड़ देते हैं। कुछ और लोग जो अधिक अनिर्णायक होते हैं, वे “तैयारी करो” और “निशाना लगाओ” वाले चरणों पर इतना समय लगा देते हैं कि अपनी अत्यधिक सावधानी के कारण हमेशा ही तीर छोड़ने से हिचकिचाते हैं। वे लकवा मारा हुआ महसूस करते हैं, कि मानो हैरी पॉटर के संसार के किसी जादूगर ने उन पर “पेट्रीफिकस टोटलस” जादू कर दिया हो — जो पूरे शरीर को जकड़ लेने वाला अभिशाप है।
कुछ लोग निर्णय लेने के समय क्यों ठिठक जाते हैं? इसका एक कारण विश्लेषण पक्षाघात है: “यहाँ कई सारे विकल्प हैं, और मैं निर्णय लेने से पहले और जानकारी चाहता हूँ।”
दूसरा कारण यह है कि वे प्रतिबद्ध होने से हिचकिचाते हैं, क्योंकि उन्हें विकल्प रखना अच्छा लगता है। मैं FOMO — the fear of missing out अर्थात् छूट जाने के डर — की बात नहीं कर रहा हूँ। मैं FOBO — the fear of better options अर्थात् बेहतर विकल्पों के डर — की बात कर रहा हूँ। कुछ लोगों की किसी निर्णय पर पहुँचने में टाल-मटोल करने की आदत होती है कि शायद कोई बेहतर विकल्प सामने आ जाए। उदाहरण के लिए, आप शनिवार रात के खाने के निमंत्रण का उत्तर देने में हिचकिचा सकते हैं, क्योंकि आप कुछ बेहतर पाने से चूकना नहीं चाहते। या आप किसी विशेष कॉलेज में दाखिला लेने में विलम्ब कर सकते हैं कि शायद अन्तिम समय में कुछ ऐसा सामने आ जाए, जिसकी अधिक इच्छा की गई हो। या आप किसी योग्य युवती के सामने अपना प्रस्ताव रखने के लिए कहने से बच सकते हैं कि शायद किसी दिन आपको कोई ऐसी युवती मिल जाए, जिसका रूप और चरित्र उससे भी बेहतर हो।
मसीही लोग निर्णय लेने के समय विशेष रूप से इसलिए ठिठक सकते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि परमेश्वर उनसे कुछ अत्यन्त विशेष कार्य करवाना चाहता है और वे गलत निर्णय लेने से डरते हैं। यदि वे गलत चुनाव करेंगे, तो फिर वे परमेश्वर की सिद्ध इच्छा से बाहर कर दिए जाएँगे। आइए पहले हम इस चिन्ता का समाधान करें और फिर विचार करें कि यह कैसे निर्धारित करें कि क्या करना चाहिए।
ऑडियो मार्गदर्शिका
ऑडियो#18 परमेश्वर की इच्छा और निर्णय लेना
1
हर परिस्थिति के लिए विशिष्ट मार्गदर्शन?
क्या बाइबल यह प्रतिज्ञा करती है कि परमेश्वर आपके ऊपर सटीकता के साथ यह प्रकट करेगा कि आपको हर विशेष परिस्थिति में क्या करना चाहिए?
इसका संक्षिप्त उत्तर है: नहीं। परन्तु नीतिवचन 3:5-6 के बारे में क्या कहेंगे?
“तू अपनी समझ का सहारा न लेना,
वरन् सम्पूर्ण मन से यहोवा पर भरोसा रखना।
उसी को स्मरण करके सब काम करना,
तब वह तेरे लिए सीधा मार्ग निकालेगा।”
क्या यह खण्ड इस बात की प्रतिज्ञा करता है कि जब आप किसी दोराहे पर खड़े होंगे, तो परमेश्वर आपको कोई विशेष चुनाव करने के लिए विशेष रूप से निर्देशित करेगा या आपका मार्गदर्शन करेगा? आमतौर पर मसीही लोग नीतिवचन 3:5–6 को किसी बड़े निर्णय के मामले में परमेश्वर की विशिष्ट इच्छा जानने के लिए बाइबल के अपने मुख्य खण्ड के रूप में उद्धृत करते हैं:
- आपको किस कॉलेज में जाना चाहिए? या क्या सच में आपको कॉलेज जाना चाहिए?
- आपको किससे विवाह करना चाहिए?
- आपको किस कलीसिया में शामिल होना चाहिए?
- आपको कौन सी नौकरी करनी चाहिए?
- आपको किस शहर या कस्बे में रहना चाहिए?
- आपको कौन सा घर खरीदना चाहिए (या किराए पर लेना चाहिए)?
- आपको कौन सी कार खरीदनी चाहिए?
- क्या आपको किसी दूसरी जगह जाना चाहिए?
- आपको अपना पैसा कैसे निवेश करना चाहिए?
- जब आप सेवानिवृत्त हो जाएँ, तो आपको अपना शेष जीवन कैसे निवेश करना चाहिए?
परमेश्वर की इच्छा जानने का व्यक्तिपरक दृष्टिकोण क्या है?
अपने जीवन के लिए परमेश्वर की व्यक्तिगत् इच्छा जानने के एक सामान्य दृष्टिकोण के अनुसार (जिसे मैं व्यक्तिपरक अर्थात् परोक्ष दृष्टिकोण कह रहा हूँ), यदि आप प्रभु पर भरोसा रखते हैं, तो वह आपको स्पष्ट रूप से बता देगा कि आपको ठीक-ठीक क्या चुनाव करना चाहिए। ऐसा कैसे होगा? ऐसा पवित्रशास्त्र, आत्मा की आंतरिक गवाही, परिस्थितियों, परामर्श, आपकी इच्छाओं, व्यावहारिक बुद्धि, और/या प्रभावों और शान्ति की अनुभूति जैसे अलौकिक मार्गदर्शन के माध्यम से होगा। इस दृष्टिकोण के अनुयायी अलौकिक मार्गदर्शन पर ध्यान केन्द्रित करते हैं और इसका परिणाम यह होता है: क्या करना चाहिए, इस बात को जानने की कुंजी यह नहीं है कि आप परमेश्वर के द्वारा बाइबल में प्रकट किए गए सिद्धान्तों के आधार पर किसी स्थिति का बुद्धिमानी से विश्लेषण करने के लिए अपने मन का सावधानीपूर्वक उपयोग करें। इसकी कुंजी यह है कि आप परमेश्वर की प्रतीक्षा करें कि वह आपको अगुवाई और प्रभावों और प्रेरणाओं और भावनाओं से भर दे। गैरी फ्राइसन चार कथनों के साथ इस व्यक्तिपरक दृष्टिकोण को संक्षिप्त रूप से सारांशित करते हैं:
- आधार: हमारे प्रत्येक निर्णय के लिए परमेश्वर की एक सिद्ध योजना या इच्छा होती है।
- उद्देश्य: हमारा लक्ष्य परमेश्वर की व्यक्तिगत् इच्छा को जानना और उसके अनुसार निर्णय लेना है।
- प्रक्रिया: हम उन आंतरिक प्रभावों और बाहरी संकेतों की व्याख्या करते हैं, जिनके माध्यम से पवित्र आत्मा अपनी अगुवाई प्रदान करता है।
- प्रमाण: हमने परमेश्वर की व्यक्तिगत् इच्छा को सही ढंग से समझ लिया है, इस बात की पुष्टि शान्ति की आंतरिक समझ और निर्णय के बाहरी (सफल) परिणामों से आती है।1
परमेश्वर की इच्छा को समझने या खोजने के बारे में यह व्यक्तिपरक दृष्टिकोण ऊरीम और तुम्मीम के संशोधित संस्करण जैसा है। मूसा की वाचा के अधीन, परमेश्वर की प्रजा के अगुवे किसी मामले में परमेश्वर से उसकी विशिष्ट इच्छा प्रकट करने के लिए विनती कर सकते थे तथा ऊरीम और तुम्मीम (उदाहरण के लिए, 1 शमू. 14:41-42) के साथ हाँ या न में प्रश्न का सीधा-सीधा उत्तर प्राप्त कर सकते थे। वह उत्तर सर्वोच्च और स्पष्ट रूप से ईश्वरीय होता था। इसमें किसी भावना की आवश्यकता नहीं थी। परन्तु अब हम मूसा की वाचा के अधीन नहीं हैं, और परमेश्वर की इच्छा जानने के बारे में यह व्यक्तिपरक दृष्टिकोण न तो सर्वोच्च है और न ही स्पष्ट रूप से ईश्वरीय।
यह व्यक्तिपरक दृष्टिकोण कम से कम छह कारणों से भ्रामक है:
1. परमेश्वर को जानने, उस पर भरोसा करने और उसकी आज्ञा मानने के लिए बाइबल पर्याप्त है।
एंड्रयू मुरे (1828-1917) जब यह कहते हैं, तो वे व्यक्तिपरक दृष्टिकोण का प्रतिनिधित्व करते हैं, “हमारे लिए केवल वचन को प्राप्त करना और जो हमें लगता है कि हमें करना चाहिए, उसे अपनाना और लागू करना ही पर्याप्त नहीं है। हमें मार्गदर्शन के लिए और यह जानने के लिए परमेश्वर की प्रतीक्षा करनी चाहिए, कि वह हमसे क्या करवाना चाहता है।”2
परन्तु परमेश्वर ने हमारा मार्गदर्शन करने के लिए हमें बाइबल दी है। व्यक्तिपरक दृष्टिकोण पवित्रशास्त्र की पर्याप्तता को कमजोर करता है। जो लोग व्यक्तिपरक दृष्टिकोण का पालन करते हैं, वे आवश्यक रूप से पवित्रशास्त्र की पर्याप्तता को अस्वीकार नहीं कर रहे हैं, बल्कि वे इसके विपरीत जीवन बिताते हैं। व्यक्तिपरक दृष्टिकोण यह अपेक्षा करता है कि परमेश्वर अगुवाई और प्रभावों और प्रेरणाओं और भावनाओं से भरकर विशिष्ट चुनाव करने के लिए आपका मार्गदर्शन करे, परन्तु परमेश्वर कभी भी आपके लिए ऐसा करने की प्रतिज्ञा नहीं करता। इसके बजाय, परमेश्वर ने आपको बुद्धिमानी से जीवन बिताने में सहायता करने के लिए बाइबल में अपनी इच्छा को पर्याप्त रूप से प्रकट किया है। पवित्रशास्त्र की पर्याप्तता का अर्थ है कि बाइबल अपने उद्देश्य के लिए पूरी तरह से पर्याप्त है — कि आप परमेश्वर को जानें, उस पर भरोसा करें और उसकी आज्ञा मानें (2 तीमु. 3:16-17 को देखें)। हर उस प्रश्न का सीधे-सीधे उत्तर देना, जिसे आप पूछ सकते हैं, बाइबल का उद्देश्य नहीं है। परमेश्वर को प्रकट करना बाइबल का मुख्य उद्देश्य है जिससे कि आप उसे जान सकें और उसका आदर कर सकें।3
नीतिवचन 3:5–6अ का प्रतिफल यह है कि परमेश्वर “तेरे लिए सीधा मार्ग निकालेगा” (नीति. 3:6ब)। इसका विचार यह है कि परमेश्वर आपके लिए बाधाओं को दूर करेगा, जिससे कि आप सही मार्ग पर सफलतापूर्वक आगे बढ़ सकें। आप केवल दो ही मार्गों पर चल सकते हैं: जो कि दुष्टों का मार्ग या धर्मियों का मार्ग है (नीति. 2:15; 11:3, 20; 12:8; 14:2; 21:8; 29:27)। गलत मार्ग नैतिक रूप से टेढ़ा है; सही मार्ग नैतिक रूप से सीधा है। सीधा मार्ग ही प्रतिफल देने वाला मार्ग है। परमेश्वर के द्वारा आपके मार्ग सीधे करने का अर्थ है कि वह आपको बुद्धिमानी से जीवन बिताने में सक्षम बनाता है और फिर बुद्धिमानी से जीवन बिताने के परिणामस्वरूप मिलने वाले प्रतिफलों का आनन्द लेने में सक्षम बनाता है। नीतिवचन 3:5-6 यह नहीं सिखाता कि परमेश्वर आपको बाइबल के बाहर किसी विशेष प्रकाशन से निर्देशित करेगा या आपका मार्गदर्शन करेगा। परमेश्वर को जानने, उस पर भरोसा करने और उसकी आज्ञा मानने के लिए बाइबल ही पर्याप्त है।
2. बाइबल के पास आपके विचारों और भावनाओं पर अधिकार है।
बाइबल में परमेश्वर के द्वारा असल में प्रकट की गई अपनी इच्छा की तुलना में परमेश्वर की इच्छा के बारे में आपकी अपनी समझ को अधिक महत्व देने में व्यक्तिपरक दृष्टिकोण आपकी अगुवाई करता है। इसका ध्यान आपकी व्यक्तिपरक समझ पर है — न कि इस पर कि परमेश्वर ने अपरोक्ष रूप से क्या कहा है।
आवश्यक नहीं कि यह निर्धारित करना गलत हो कि किसी स्थिति में अपनी आंतरिक भावना या अन्तर्ज्ञान के आधार पर क्या करना चाहिए। परन्तु इस बात की पुष्टि करने के लिए आपको किसी तीक्ष्ण बुद्धि की आवश्यकता नहीं है कि आप वही कर रहे हैं, जिसे परमेश्वर आपसे करवाना चाहता है। आपको यह निर्धारित करने से पहले किसी विशेष शान्ति की भावना को महसूस करने की आवश्यकता नहीं है कि क्या करना है। परमेश्वर ने बाइबल में जो प्रकट किया है, आपको उस पर आधारित बुद्धि की आवश्यकता है।
कुछ लोग सोचते हैं कि कुलुस्सियों 3:15 में पौलुस की आज्ञा व्यक्तिपरक दृष्टिकोण का समर्थन करती है: “मसीह की शान्ति… तुम्हारे हृदय में राज्य करे।” परन्तु (कुलु. 3:11-15 के) साहित्यिक संदर्भ में, पौलुस यह निर्देश नहीं दे रहा है कि एक व्यक्तिगत् मसीही के रूप में इस आधार पर कि आपको अपने हृदय में शान्ति महसूस होती है या नहीं, आपको यह निर्धारित करना चाहिए कि आपको क्या करना है। इफिसियों 4:3 में कलीसिया को दिए गए उसके उपदेश के समान कि “मेल के बन्धन में आत्मा की एकता रखने का यत्न करो” — पौलुस यह निर्देश दे रहा है कि विश्वासियों के समुदाय को एक-दूसरे के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए।
क्या होगा यदि जो आपको करना चाहिए, उसके बारे में आपकी व्यक्तिपरक भावना परमेश्वर के वचनों का खण्डन करे? उदाहरण के लिए, बाइबल स्पष्ट रूप से कहती है, “परमेश्वर की इच्छा यह है कि तुम पवित्र बनो: अर्थात् व्यभिचार से बचे रहो” (1 थिस्स. 4:3)। क्या होगा यदि आपको लगे कि, आपके विशेष मामले में, परमेश्वर चाहता है कि आप किसी ऐसे व्यक्ति के साथ यौन सम्बन्ध बनाएँ, जिससे आपका विवाह नहीं हुआ है (या यह कि परमेश्वर चाहता है कि आप किसी गैर-मसीही के साथ मिलें-जुलें और उससे विवाह करें)? क्या होगा यदि आपकी दृढ़ धारणा यह हो कि परमेश्वर ने आपको ऐसा करने के लिए कहा है? क्या होगा यदि आपका विवेक इसके बारे में स्पष्ट है? ऐसी स्थिति में, हो सकता है कि आपका विवेक स्पष्ट, परन्तु गलत तरीके से संतुलित हो।4 परमेश्वर के स्पष्ट और पर्याप्त वचन के पास आपके विचारों और भावनाओं पर अधिकार है।
क्या होगा यदि आप दो या उससे अधिक अच्छे विकल्पों में से चुन रहे हैं? आपको चिट्ठियाँ डालने, ऊन बिछाने, या किसी व्यक्तिपरक धारणा या स्वप्न या दर्शन या स्वर्गदूत की ओर से सन्देश या संकेत या स्थिर शान्त स्वर या भविष्यसूचक भविष्यद्वाणी की खोज करने की आवश्यकता नहीं है। बाइबल में परमेश्वर के द्वारा व्यक्तियों से अलग-अलग, स्पष्ट, विशिष्ट, अद्भुत, परमेश्वर-प्रेरित तरीकों से बात करने के उदाहरण दर्ज हैं — जैसे निर्गमन 3 अध्याय में मूसा और जलती हुई झाड़ी। परन्तु ये उदाहरण असामान्य हैं। ये इस बात का प्रतिमान नहीं हैं कि हमें कैसे निर्णय लेने चाहिए। स्पष्ट रूप से परमेश्वर जो चाहे कर सकता है, इसलिए मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि वह बाइबल के अतिरिक्त किसी भी माध्यम से हमसे बातचीत नहीं कर सकता। परन्तु यह बात सामान्य या आवश्यक नहीं है, अत: बाइबल के बाहर परमेश्वर की प्रत्यक्ष अगुवाई को प्राथमिकता देना भ्रामक है। और भले ही ऐसा लगे कि परमेश्वर आपको असाधारण मार्गदर्शन दे रहा हो, परन्तु उस मार्गदर्शन में पवित्रशास्त्र का अधिकार नहीं है। आपको ऐसी बातचीत के साथ वैसा व्यवहार नहीं करना चाहिए, जिस तरीके का व्यवहार आप पर्याप्त पवित्रशास्त्र के साथ करते हैं, क्योंकि आप इस बात में निश्चित नहीं हो सकते कि ऐसी बातचीत वास्तव में परमेश्वर की ओर से होती है, और न ही आप इस बात में निश्चित हो सकते हैं कि आप ऐसी बातचीत की सही व्याख्या कर रहे हैं। यदि आप निश्चित रूप से परमेश्वर की वाणी सुनना चाहते हैं, तो फिर बाइबल पढ़ें। बाइबल के पास आपके विचारों और भावनाओं पर अधिकार है।
3. बाइबल इस बात पर जोर देती है कि आपको परमेश्वर की उस बुद्धि पर भरोसा करना चाहिए, जिसे उसने पहले ही प्रकट कर दिया है।
व्यक्तिपरक दृष्टिकोण उस बुद्धि पर भरोसा करने के बजाय, जिसे परमेश्वर ने बाइबल में पहले ही प्रकट कर दिया है, किसी विशिष्ट परिस्थिति में क्या करना है, इस बारे में नये प्रकाशन के साथ परमेश्वर से निर्देश या मार्गदर्शन प्राप्त करने पर ध्यान केन्द्रित करने में आपकी अगुवाई करता है। परन्तु नीतिवचन 3:5-6 का साहित्यिक संदर्भ मेरे मस्तिष्क का उपयोग करने और रहस्यमयी तरीके से परमेश्वर के द्वारा मेरे मस्तिष्क को एक तरफ करने की प्रतीक्षा करने के बीच अन्तर नहीं करता है। यह अन्तर मेरी अपनी बुद्धि पर भरोसा करने और परमेश्वर की बुद्धि पर भरोसा करने के बीच है।
हमारी समस्या यह है कि हम पापी रूप से अपनी बुद्धि पर भरोसा करते हैं। यह ऐसा है कि मानो मैं अपनी पत्नी के विशेषज्ञ निर्देशों की अवहेलना करते हुए अहंकार से स्वयं खट्टी रोटी बनाने का प्रयत्न करूँ (मैं खट्टी रोटी खाने में तो माहिर हूँ, परन्तु बनाने में नहीं)। जब हम अपनी बुद्धि पर भरोसा करने पर जोर देते हैं, तो हम मूर्ख और विद्रोही बन रहे होते हैं। हमें परमेश्वर की बुद्धि पर भरोसा करना चाहिए। नीतिवचन की पुस्तक में, जिस तरीके से हम परमेश्वर की बुद्धि को जान सकते हैं, वह उसके निर्देशों को, उसकी शिक्षाओं को सुनना है। हम इसे बाइबल में पाते हैं। परमेश्वर ने जो कहा है, उसका अध्ययन करके और फिर उसी की सहायता से उस बात का पालन करके हम परमेश्वर पर भरोसा करते हैं। इसी कारण से मसीही लोग बाइबल को कंठस्थ करते हैं, और उसका अध्ययन करते हैं, और उसे गाते हैं, और उससे प्रार्थना करते हैं, और उसका पालन करते हैं; परमेश्वर की बुद्धि को जानने का हमारा मुख्य और अन्तिम स्रोत बाइबल है। हम परमेश्वर के वचनों पर भरोसा करते हैं। हम परमेश्वर के वचनों पर निर्भर रहते हैं। बाइबल भरोसा करने की प्रतिज्ञाओं और पालन करने की आज्ञाओं से भरी हुई है। उन पर ध्यान लगाएँ (उदाहरण के लिए, रोमि. 12:9–21; इफि. 4:17–5:20)।
व्यक्तिपरक दृष्टिकोण जो बातें परमेश्वर ने प्रकट की हैं, उन पर ध्यान लगाने के बजाय, जो बातें परमेश्वर ने प्रकट नहीं की हैं, उन पर ध्यान लगाने में आपकी अगुवाई करता है। दो या उससे अधिक अच्छे लगने वाले विकल्पों में से चुनने के जुनून की ओर यह आपकी अगुवाई करता है। आपको इस कलीसिया में शामिल होना चाहिए या उस कलीसिया में? आपको इस मसीही से मिलना-जुलना चाहिए या उस मसीही से? आपको इस विद्यालय में जाना चाहिए या उस विद्यालय में? आपको यह नौकरी करनी चाहिए या वह नौकरी? बाइबल सीधे-सीधे इन प्रश्नों का उत्तर नहीं देती। परमेश्वर इन सभी विवरणों की चिन्ता करता है, परन्तु वह इस बात की अधिक चिन्ता करता है कि आप उससे अपने सम्पूर्ण प्राण से प्रेम रखें और अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रखें और अपने जीवन और सिद्धान्तों पर कड़ी नजर रखें (1 तीमु. 4:16)। व्यक्तिपरक दृष्टिकोण बाइबल पर विश्वास करने और उसका पालन करने के बजाय, अच्छे विकल्पों (जैसे कि आपको इस घर में रहना चाहिए या उस घर में) के बीच चुनाव करने में व्यस्त रखने में आपकी अगुवाई करता है। व्यक्तिपरक दृष्टिकोण परमेश्वर की इच्छा को इस तरह प्रस्तुत करता है कि मानो परमेश्वर ने उसे आपसे छिपाया हो और आपको उसे खोजने तथा उसका पालन करने के लिए जिम्मेदार बनाया हो।
ईश-वैज्ञानिक यहाँ परमेश्वर की इच्छा के दो पहलुओं में अन्तर बताकर हमारी सहायता करते हैं। एक पहलू यह है कि परमेश्वर क्या घटित होते हुए देखना चाहेगा (उदाहरण के लिए, हत्या मत करो), और दूसरा पहलू यह है कि परमेश्वर वास्तव में किस बात के घटित होने की इच्छा रखता है (उदाहरण के लिए, परमेश्वर ने पहले से ठहराया था कि लोग यीशु की हत्या करेंगे — प्रेरि. 2:23; 4:28)। ईश-वैज्ञानिक इन दो तरीकों में जिनकी परमेश्वर इच्छा करता है, विभिन्न शब्दों से अन्तर करते हैं — चित्र 1 देखें।5
चित्र 1. उन दो तरीकों में अन्तर करने वाले शब्द जिनकी परमेश्वर इच्छा करता है
| परमेश्वर क्या घटित होते हुए देखना चाहेगा (यह हमेशा नहीं होता) | परमेश्वर वास्तव में किस बात के घटित होने की इच्छा रखता है (यह हमेशा होता है) |
| नैतिक इच्छा: हमें इसी का पालन करना चाहिए। परमेश्वर हमें बताता है कि क्या सही है और क्या गलत। | सर्वोच्च इच्छा: परमेश्वर इसी को निर्धारित करता है। |
| आज्ञाबद्ध इच्छा: परमेश्वर इसी की आज्ञा देता है। | आदेशित इच्छा: परमेश्वर इसी का आदेश देता है। |
| प्रकट इच्छा: परमेश्वर हमें बताता है कि हमें क्या करना चाहिए। | गुप्त या छिपी हुई इच्छा: परमेश्वर आमतौर पर अपनी विस्तृत योजना हम पर पहले से प्रकट नहीं करता है। (दानिय्येल 10 अध्याय जैसी भविष्यसूचक भविष्यद्वाणी एक अपवाद है।) |
परमेश्वर अपनी नैतिक इच्छा हम पर प्रकट करता है (मत्ती 7:21; इब्रा. 13:20-21; 1 यूह. 2:15-17), परन्तु वह आमतौर पर अपनी सर्वोच्च इच्छा हम पर प्रकट नहीं करता (इफि. 1:11)। अत: जब हम यह निर्धारित करने का प्रयत्न कर रहे हों कि क्या करना चाहिए, तो हमें परमेश्वर की सर्वोच्च या आदेशित या गुप्त/छिपी हुई इच्छा को खोजने पर नहीं, — बल्कि उसकी नैतिक या आज्ञाबद्ध या प्रकट इच्छा का पालन करने पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए। व्यवस्थाविवरण 29:29 परमेश्वर की इच्छा के इन दो पहलुओं को एक-दूसरे के ठीक बगल में रखता है: “गुप्त बातें हमारे परमेश्वर यहोवा के वश में हैं; परन्तु जो प्रकट की गई हैं वे सदा के लिए हमारे और हमारे वंश के वश में रहेंगी, इसलिए कि इस व्यवस्था की सब बातें पूरी की जाएँ।” निर्णय लेने से पहले आपको “गुप्त बातों” को खोजने में व्यस्त रहने की आवश्यकता नहीं है। इसके बजाय, “जो प्रकट की गई हैं” आप उन बातों का पालन करने के लिए जिम्मेदार हैं, जिसमें निर्णय लेने के लिए बुद्धि का उपयोग करना शामिल है। बाइबल इस बात पर जोर देती है कि आपको परमेश्वर की उस बुद्धि पर भरोसा करना चाहिए, जिसे उसने पहले ही प्रकट कर दिया है।6
- बाइबल इस बात पर जोर देती है कि निर्णय लेने की जिम्मेदारी आपकी है।
परमेश्वर की नैतिक इच्छा में न केवल यह शामिल है कि आपको बाहरी रूप में कैसा व्यवहार करना चाहिए, बल्कि यह भी शामिल है कि आंतरिक रूप से आपको किस बात से प्रेरित होना चाहिए। परन्तु यह आपके लिए सब कुछ स्पष्ट रूप से निर्दिष्ट नहीं करती। जब आपके पास व्यवहार्य विकल्प होते हैं, तो व्यक्तिपरक दृष्टिकोण आपको अधिक निष्क्रिय बना देता है — इसका अर्थ है कि परमेश्वर को सहज विचारों और भावनाओं के साथ मार्गदर्शन करने देना, जो अधिक प्रमाणों या सचेत विचारों पर आधारित नहीं होते। यह स्वयं पर से दोष हटाने और एक चुनौतीपूर्ण निर्णय की जिम्मेदारी लेने से बचने का एक सुविधाजनक तरीका हो सकता है। यह बुद्धि पाने के लिए प्रार्थना करने और फिर अपने मस्तिष्क का उपयोग करने के बजाय आलसी होने का एक अति-आत्मिक बहाना हो सकता है। परन्तु बाइबल में दी गई आज्ञाएँ यह पूर्वधारणा बनाती हैं कि निर्णय लेने की जिम्मेदारी आपकी है। और उन आज्ञाओं में से एक है “बुद्धि को प्राप्त कर” (नीति. 4:5, 7)।
जब मैं पाठशाला में पढ़ता था, तो मैं एक लड़के को जानता था, जो एक मसीही युवती से मिलता-जुलता था। वे दोनों प्रभु से प्रेम करते थे और अपने चरित्र में निंदनीय नहीं थे। जब उनका मिलना-जुलना अधिक गम्भीर हो गया, तो उस युवती ने वह रिश्ता समाप्त करने का निर्णय कर लिया। वह लड़का उलझन में पड़ गया, क्योंकि उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह रिश्ता क्यों समाप्त कर रही है। वह बस यही कहती थी कि उसे उसके साथ मिलने-जुलने में अब “सुकून नहीं मिलता” (जो यह कहने से बेहतर है कि परमेश्वर ने उसे वह रिश्ता समाप्त करने के लिए कहा था!)। उसने छद्म आत्मिक शब्दावली का उपयोग किया, जिसका अर्थ था, “अरे, मुझे दोष मत दो। मैं तो बस प्रभु के साथ चल रही हूँ और इस विषय पर उसके मार्ग पर जा रही हूँ।”7
हो सकता है कि कभी-कभी कोई पास्टर “परमेश्वर ने मुझे बताया” जैसे किसी संस्करण के साथ अपने दर्शन को सही ठहराकर व्यक्तिपरक दृष्टिकोण का अनुसरण करे। भले ही इस तरह की गवाही भली मंशा से दी गई हो, परन्तु यह लोगों को गलत तरीके से प्रभावित कर सकती है। यह कलीसिया के सदस्यों को यह सोचने पर विवश कर सकती है, “मैं कौन होता हूँ, जो परमेश्वर के मार्ग में खड़ा होऊँ? परमेश्वर ने स्वयं पास्टर से विशेष रूप से बात की थी, इसलिए यह स्पष्ट रूप से परमेश्वर की इच्छा है।” जब कोई व्यक्ति (विशेष रूप से कोई अगुवा) अपनी व्यक्तिपरक धारणाओं (जो प्रभु की ओर से हो भी सकती हैं और नहीं भी) को आलोचना या चुनौती से परे ले जाए, तो यह वास्तव में चालाकी भरा हो सकता है।
जब कलीसिया के अगुवे परमेश्वर के निजी और विशेष प्रकाशन को एक प्रारूप के जैसे प्रस्तुत करते हैं, तो दूसरे लोग भी उनका अनुकरण करेंगे। इससे एक पुरुष एक युवती से यह कहने के लिए प्रेरित होता है, “परमेश्वर ने मुझे तुमसे विवाह करने के लिए कहा है,” और युवती उत्तर देती है, “नहीं, उसने नहीं कहा। उसने मुझे तुमसे विवाह न करने के लिए कहा है।”
पौलुस अपने निर्णयों की व्याख्या जैसे करता है, उसमें अन्तर करें:
- “यदि मेरा भी जाना उचित [उपयुक्त (एन.ए.एस.बी., एन.एल.टी.), ठीक (एल.एस.बी.), शोभनीय (सी.एस.बी.)] हुआ, तो वे मेरे साथ जाएँगे” (1 कुरिं. 16:4)।
- “मैं ने इपफ्रुदीतुस को… तुम्हारे पास भेजना आवश्यक समझा” (फिलि. 2:25)।
- “इसलिए जब हम से और न रहा गया, तो हम ने यह ठहराया कि एथेन्स में अकेले रह जाएँ” (1 थिस्स. 3:1 एन.आई.वी.; इसकी एन.ए.एस.बी., सी.एस.बी. से तुलना करें)।
- “मैं ने वहीं जाड़ा काटने का निश्चय किया है” (तीतुस 3:12)।
पौलुस ने अपने निर्णयों में अपनी स्वयं की स्वतंत्रता को स्वीकार किया, और हमारे लिए भी अच्छा होगा कि हम उसके उदाहरण का अनुसरण करें। “परमेश्वर ने मुझे ऐसा करने के लिए कहा” या “परमेश्वर ने मेरे मन में यह बात डाली” या “मुझे लगा कि परमेश्वर ने मुझसे बात की है,” यह कहने के बजाय यह कहना बेहतर होगा कि “मैंने इसके बारे में सोचा और प्रार्थना की, और यह मुझे बुद्धिमानी भरा लगता है।” जो भी निर्णय आप लें, उसकी जिम्मेदारी लें।
5. व्यक्तिपरक दृष्टिकोण का लगातार पालन करना असम्भव है।
यदि आप हर दिन हजारों निर्णय लेते हैं, तो आप यह पुष्टि करने के लिए समय कैसे निकाल सकते हैं कि हर निर्णय ठीक वही है, जिसे परमेश्वर आपसे करवाना चाहता है? जब आप कपड़े पहन रहे हों, तो वही मोज़े क्यों चुनें? जब आप खरीदारी कर रहे हों, तो अण्डों का वही डिब्बा क्यों चुनें? जब आप खुली बैठक वाले कमरे में प्रवेश करें, तो वही कुर्सी क्यों चुनें? जब आप किसी सभा में पहुँचें, तो उस व्यक्ति से बातचीत क्यों आरम्भ करें?
ये ऐसे निर्णय हैं जिन पर आप जिम्मेदारी से पूरा दिन विचार नहीं कर सकते। व्यक्तिपरक दृष्टिकोण रखने वाले मसीहियों को व्यवहार में इसका असंगत रूप से पालन करना पड़ता है, और वे आमतौर पर इसका पालन सामान्य निर्णयों के लिए नहीं, बल्कि केवल उन निर्णयों के लिए करते हैं, जिन्हें वे सबसे महत्वपूर्ण मानते हैं। (परन्तु कभी-कभी हम जिन्हें साधारण निर्णय समझते हैं, वे हमारी समझ से कहीं अधिक महत्वपूर्ण होते हैं — जैसे कि ऐसी कुर्सी चुनना, जो अन्त में उस व्यक्ति के ठीक बगल में हो, जिससे आखिरकार आपका विवाह हो या किसी ऐसे अजनबी से बात करना, जो आपके पसन्द वाले काम से आपको जोड़े।)
6. व्यक्तिपरक दृष्टिकोण ऐतिहासिक रूप से नया है।
गैरी फ्राइसन ने पाया है कि व्यक्तिपरक दृष्टिकोण
वास्तव में एक ऐतिहासिक नवीनता है। अचूक निर्णयों का आश्वासन देने वाले निश्चित मार्गदर्शन का जुनून पिछले 150 वर्षों में आधुनिक मसीही विश्वास की एक विशिष्ट प्रवृत्ति जैसा दिखाई पड़ता है। जॉर्ज मुल्लर के लेखनों से पहले, कलीसिया के साहित्य में “अपने जीवन के लिए परमेश्वर की इच्छा कैसे खोजें” पर अपरोक्ष रूप से कोई चर्चा नहीं होती थी। जिसे मैं मार्गदर्शन का पारम्परिक दृष्टिकोण कहता हूँ, वह केसविक आंदोलन की ईश-वैज्ञानिक संस्कृति का एक अभिन्न अंग था, जो इंग्लैंड और अमेरिका में बहुत प्रभावशाली था।8
व्यक्तिपरक दृष्टिकोण की नवीनता निर्णायक रूप से यह साबित नहीं करती कि यह गलत है। परन्तु इसकी नवीनता के द्वारा आपको कम से कम इसे बिना आलोचना के स्वीकार करने के बारे में सोचने के लिए रुक जाना चाहिए।
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परमेश्वर ने आपके जीवन के लिए एक विशिष्ट योजना का आदेश दिया है, परन्तु वह आपसे उस पर भरोसा करने और निर्णय लेने से पहले यह जानने के बारे में कि उसकी आदेशित योजना क्या है, चिन्ता न करने के लिए कहता है। अत: यदि बाइबल यह प्रतिज्ञा नहीं करती कि परमेश्वर आप पर यह प्रकट करेगा कि आपको हर विशिष्ट परिस्थिति में क्या करना चाहिए, तो आप कैसे चुनाव करेंगे?
चर्चा एवं मनन:
- निर्णय लेने के व्यक्तिपरक दृष्टिकोण और परमेश्वर की इच्छा को अपने शब्दों में आप कैसे सारांशित करेंगे?
- व्यक्तिपरक दृष्टिकोण के इस मूल्यांकन में आपको क्या स्पष्ट और चुनौतीपूर्ण लगता है?
- निर्णय लेने के व्यक्तिपरक दृष्टिकोण ने आपको या आपके जानने वालों को कैसे प्रभावित किया है?
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निर्णय कैसे लें?
चार प्रश्न
ये चार निदानात्मक प्रश्न, सिद्धान्तों का एक समूह है, जो आपको यह निर्धारित करने में सहायता करेगा कि क्या करना है (ये सिद्धान्त ऐसे कदम नहीं हैं, जिन्हें किसी व्यक्ति को विशिष्ट क्रम में उठाना आवश्यक है):
- पवित्र इच्छा: आप क्या करना चाहते हैं?
- खुला द्वार: कौन से अवसर खुले हैं या बन्द हैं?
- बुद्धिमानी से भरी सलाह: जो बुद्धिमान लोग आपको और परिस्थिति को अच्छी तरह जानते और समझते हैं, वे आपको क्या करने की सलाह देते हैं?
- बाइबल आधारित ज्ञान: आपको क्या लगता है कि बाइबल से परिपूर्ण ज्ञान के आधार पर आपको क्या करना चाहिए?
1. पवित्र इच्छा: आप क्या करना चाहते हैं?
आप सोच रहे होंगे, “यह पूछना किस प्रकार का निदानात्मक प्रश्न है कि मैं क्या करना चाहता हूँ? क्या आप यह कह रहे हैं कि यदि मैं कोई पापी काम करना चाहूँ, तो मुझे वह करना चाहिए?” नहीं, इस निदानात्मक प्रश्न में एक महत्वपूर्ण चेतावनी है: यदि आप राजा के प्रति आनन्दपूर्वक वफादार हैं, तो वही करें, जिसे आप करना चाहते हैं। यदि आप परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह कर रहे हैं, तो जो आप चाहें, वह आपको नहीं करना चाहिए। यदि आप परमेश्वर के प्रति समर्पित हैं — अर्थात्, यदि आप हर्षित होकर उसके पीछे चल रहे हैं, यदि आप उसकी नैतिक इच्छा का, जिसे उसने बाइबल में प्रकट किया है, पालन कर रहे हैं — तो वही करें, जिसे आप करना चाहते हैं। परमेश्वर की इच्छा पर आधारित अपनी छोटी पुस्तक में जॉन मैकआर्थर के द्वारा दिए गए तर्क को कहने का यह एक और तरीका है: यदि आपने उद्धार पाया है, आत्मा से परिपूर्ण हैं, पवित्र हैं, अधीनता में हैं, और परमेश्वर की इच्छा के अनुसार कष्ट सह रहे हैं, तो जो आप चाहें, वह करें।9
परन्तु यदि आपके जीवन का लक्ष्य परमेश्वर की महिमा करना नहीं है, तो निश्चित रूप से आप जो चाहें, वह न करें। परमेश्वर आपको शिष्य बनाने वाली कलीसिया के एक विश्वासयोग्य सदस्य के रूप में उसका आदर करने के लिए बुलाता है। यदि आप पुरुष हैं, तो परमेश्वर आपको एक विश्वासयोग्य पुरुष — एक पुत्र, भाई, पति, पिता, और/या दादा-नाना — के रूप में उसका आदर करने के लिए बुलाता है। यदि आप स्त्री हैं, तो परमेश्वर आपको एक विश्वासयोग्य स्त्री — एक पुत्री, बहन, पत्नी, माता, और/या दादी-नानी — के रूप में उसका आदर करने के लिए बुलाता है।
यह “पवित्र अभिलाषा” का सिद्धान्त भजन संहिता 37:4
पर आधारित है: “यहोवा को अपने सुख का मूल जान,
और वह तेरे मनोरथों को पूरा करेगा।”
ऐसी अभिलाषाएँ पवित्र अभिलाषाएँ होती हैं। यदि आप परमेश्वर में आनन्दित हैं, तो आप जो करना चाहते हैं, वह उसके अनुरूप होगा, जो आपको करना चाहिए। यदि आप स्वार्थी हैं, तो आप जो करना चाहते हैं, वह उसके अनुरूप नहीं होगा, जो आपको करना चाहिए। इसी कारण से ऑगस्टीन कहते हैं, “प्रेम रखो, और जो चाहो वह करो।”10 अर्थात्, यदि आप परमेश्वर से अपने सम्पूर्ण प्राण से प्रेम रखते हैं और अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रखते हैं, तो वही करें, जो आप चाहते हैं।
उदाहरण के लिए, यदि आप किसी विशेष मसीही जन से विवाह करने के बारे में विचार कर रहे हैं, तो यह पूछना सहायक होगा, “क्या आप इस व्यक्ति से विवाह करना चाहते हैं?” यदि ऐसी सम्भावना आपको घृणास्पद लगे (और यदि आप परमेश्वर में आनन्दित हैं), तो यह एक अच्छा संकेत होगा कि आपको उस व्यक्ति से विवाह नहीं करना चाहिए! जो 1 कुरिन्थियों 7:39 में पौलुस कहता है, उस पर ध्यान दें: “जब तक किसी स्त्री का पति जीवित रहता है, तब तक वह उससे बन्धी हुई है; परन्तु यदि उसका पति मर जाए तो जिस से चाहे विवाह कर सकती है, परन्तु केवल प्रभु में।” इसका अर्थ है कि (1) एक मसीही विधवा के पास फिर से विवाह करने या विवाह न करने का विकल्प है, और (2) वह जिससे चाहे उससे विवाह कर सकती है, शर्त यह है कि वह पुरुष मसीही हो।
यह ध्यान देने योग्य बात है कि जब पौलुस एक पास्टर या अध्यक्ष की योग्यताएँ बताता है, तो वह इस तरह से आरम्भ करता है: “जो अध्यक्ष होना चाहता है, वह भले काम की इच्छा करता है” (1 तीमु. 3:1)। किसी पास्टर के लिए एक मानदण्ड यह है कि वह एक पास्टर11 बनना चाहता है। आप अपने सबसे पवित्र क्षणों में क्या इच्छा करते हैं?
2. खुला द्वार: कौन से अवसर खुले हैं या बन्द हैं?
जो लोग व्यक्तिपरक दृष्टिकोण रखते हैं, वे खुले द्वार के रूपक को बहाने के रूप में दो तरह से उपयोग कर सकते हैं। पहला, यह उस काम को करने का बहाना हो सकता है जो आपको नहीं करना चाहिए। उदाहरण के लिए, जब कोई प्रतिष्ठित विद्यालय आपको छात्रवृत्ति प्रदान करता है या कोई कम्पनी आपको उच्च वेतन वाली नौकरी प्रदान करती है, तो आप “खुले द्वार” से भीतर चले जाते हैं, भले ही ऐसा न करने के उचित कारण मौजूद हों। दूसरा, यह उस काम को न करने का बहाना हो सकता है जो आपको करना चाहिए। उदाहरण के लिए, यदि आप बेरोजगार हैं और अपने परिवार के भरण-पोषण के लिए आप नौकरी ढूँढ़ने का प्रयत्न कर रहे हैं, तो पूरी ऊर्जा और रचनात्मक होने के बजाय, आप अधूरे मन से नौकरी खोजते हैं और फिर इधर-उधर भटकते रहते हैं, क्योंकि परमेश्वर ने आपके लिए कोई द्वार नहीं खोला है।
“खुले द्वार” या “बन्द द्वार” से मेरा अर्थ केवल इतना है कि कोई अवसर वर्तमान में एक विकल्प है या नहीं। दूसरे शब्दों में कहें तो अपनी परिस्थितियों पर विचार करें। जब मेरा परिवार सन् 2018 की पहली छमाही में इंग्लैंड के कैम्ब्रिज में रहता था, तो हमने किंग्स कॉलेज जैसे कुछ सुन्दर परिसरों को देखा। परन्तु कभी-कभी हम किसी परिसर के मैदानों में प्रवेश नहीं कर पाते थे, क्योंकि द्वार बन्द होते थे। जब एक बन्द द्वार आपको वहाँ जाने से रोके, जहाँ आप जाना चाहते हैं तो यह निराश करने वाली बात है। बन्द द्वार उस समय पर आपके विकल्पों को सीमित कर देते हैं (मैं “उस समय पर” इसलिए कह रहा हूँ, क्योंकि जो द्वार अभी बन्द है वह शायद बाद में खुल जाए)।
बाइबल खुले द्वार के रूपक का उपयोग हमें यह निर्धारित करने में सहायता करने के लिए करती है कि हम क्या करें। पौलुस कुरिन्थियों की कलीसिया के साथ अपनी यात्रा की योजना इस प्रकार साझा करता है: “परन्तु मैं पिन्तेकुस्त तक इफिसुस में रहूँगा, क्योंकि मेरे लिए वहाँ एक बड़ा और उपयोगी द्वार खुला है” (1 कुरिं. 16:8–9अ)। पौलुस इफिसुस में रुकने की योजना इसलिए बना रहा है, क्योंकि परमेश्वर उसे परिश्रम वाले एक समृद्ध क्षेत्र में सेवा करने के बड़ा अवसर प्रदान कर रहा है। इसका तात्पर्य यह है कि यदि परमेश्वर ऐसा द्वार न खोल रहा होता, तो पौलुस की यात्रा की योजनाएँ बदल जातीं।
परन्तु केवल इसलिए कि एक द्वार खुला हुआ है, तो इसका अर्थ यह नहीं है कि आपको उसमें से होकर जाना ही चाहिए। पौलुस कुरिन्थियों को याद दिलाता है, “जब मैं मसीह का सुसमाचार सुनाने को त्रोआस आया, और प्रभु ने मेरे लिए एक द्वार खोल दिया, तो मेरे मन में चैन न मिला, इसलिए कि मैं ने अपने भाई तीतुस को नहीं पाया; इसलिए उनसे विदा होकर मैं मकिदुनिया को चला गया” (2 कुरिं. 2:12–13)। कभी-कभी आप यह विचार कर सकते हैं कि क्या आपको एक खुले द्वार से होकर जाना चाहिए और फिर ऐसा न करने का चुनाव कर सकते हैं। एक खुला द्वार एक ऐसा अवसर है, जिसे आप स्वीकार कर भी सकते हैं और नहीं भी। बन्द द्वार कोई विकल्प नहीं है — यद्यपि हम प्रार्थना कर सकते हैं कि परमेश्वर कोई विशेष द्वार खोल दे (कुलु. 4:3–4 को देखें)।
अत: यदि आपने कई नौकरियों के लिए लगनपूर्वक आवेदन किया है और वर्तमान में केवल तीन ही व्यवहार्य विकल्प उपलब्ध हैं और आपको तुरन्त नौकरी चाहिए, तो ये विकल्प अभी के लिए तीन खुले द्वार हैं। आप बन्द द्वार से होकर नहीं जा सकते। सभी बन्द द्वारों ने उस समय पर आपके विकल्पों को तीन खुले द्वारों तक सीमित करने में सहायता की है।
एक खुला द्वार इस बात का संकेत नहीं है कि आपको उससे होकर जाना ही चाहिए। न ही एक बन्द द्वार इस बात का संकेत है कि कोई विशेष अवसर आपके लिए हमेशा के लिए बन्द हो जाएगा। परन्तु जब आप सोच रहे हों कि क्या करना चाहिए, तो इस बात पर ध्यान देना सहायक होगा कि वर्तमान में कौन से अवसर व्यवहार्य विकल्प हैं और कौन से नहीं।
3. बुद्धिमानी से भरी सलाह: जो बुद्धिमान लोग आपको और परिस्थिति को अच्छी तरह जानते और समझते हैं, वे आपको क्या करने की सलाह देते हैं?
हो सकता है आपको बड़े निर्णय स्वयं लेना अच्छा लगता हो, परन्तु धर्मी और बुद्धिमान सलाहकारों से सलाह लेना विनम्रता और बुद्धिमत्ता का प्रतीक है:
- “जहाँ बुद्धि की युक्ति नहीं, वहाँ प्रजा विपत्ति में पड़ती है;
परन्तु सम्मति देनेवालों की बहुतायत के कारण बचाव होता है” (नीति. 11:14)।
- “मूढ़ को अपनी ही चाल सीधी जान पड़ती है, परन्तु जो सम्मति मानता, वह बुद्धिमान है” (नीति. 12:15)।
- “बुद्धिमानों की संगति कर, तब तू भी बुद्धिमान हो जाएगा, परन्तु मूर्खों का साथी नष्ट हो जाएगा” (नीति. 13:20)।
- “बिना सम्मति की कल्पनाएँ निष्फल हुआ करती हैं, परन्तु बहुत से मंत्रियों की सम्मति से बात ठहरती है” (नीति. 15:22)।
- “सम्मति को सुन ले, और शिक्षा को ग्रहण कर, कि तू अन्तकाल में बुद्धिमान ठहरे” (नीति. 19:20)।
- “सब कल्पनाएँ सम्मति ही से स्थिर होती हैं; और युक्ति के साथ युद्ध करना चाहिए” (नीति. 20:18)।
- “इसलिए जब तू युद्ध करे, तब युक्ति के साथ करना, विजय बहुत से मंत्रियों के द्वारा प्राप्त होती है” (नीति. 24:6)।
जो बुद्धिमान लोग आपको और परिस्थिति को अच्छी तरह जानते और समझते हैं, वे आपके और आपके लक्ष्यों के बारे में आपको क्या सलाह देते हैं? उनकी सलाह को ध्यानपूर्वक और विनम्रता से सुनें।
सलाह में हेराफेरी करने का एक चालाक तरीका है — चुनिंदा रूप से प्रासंगिक जानकारी का केवल एक हिस्सा साझा करना और केवल उन्हीं लोगों से सलाह माँगना, जिनके बारे में आपको लगता है कि जो आप करना चाहते हैं, उससे वे सहमत होंगे। ऊपर दिए गए नीतिवचनों का सार यह है कि जब आप बुद्धिमान लोगों से सलाह माँगें, तो आप ऐसा खुले मन से करें। एक विनम्र शिक्षार्थी बनें, जो बुद्धिमान लोगों के सुझावों के प्रति खुला हो। मूर्ख न बनें:
“मूढ़ को अपनी ही चाल सीधी जान पड़ती है, परन्तु जो सम्मति मानता, वह बुद्धिमान है” (नीति. 12:15अ)।
अत: यदि आप किसी विशेष मसीही जन से विवाह करने के बारे में विचार कर रहे हैं, और यदि आपके माता-पिता, आपके पास्टर और आपके सबसे करीबी मित्र आपको चेतावनी देते हैं कि उन्हें लगता है कि यह विभिन्न कारणों से एक बुरा विचार है, तो आपको क्या करना चाहिए? यदि सब की सलाह उस बात के विरोध में खड़ी है, जिसे आप करने का विचार बना रहे थे, तो सामान्य नियम के रूप में ऐसी सलाह आपको आगे बढ़ने के बारे में गम्भीरता से सोचने और पीछे हटने के लिए प्रेरित करेगी।
यह सिद्धान्त विशेष रूप से तब सहायक होता है, जब आपको मिलने वाली सारी सलाह एक जैसी हो तथा जो आप करना चाहते हैं और परमेश्वर के द्वारा प्रयोजन स्वरूप आपके लिए खोले गए द्वार, दोनों के अनुरूप हो। यह सिद्धान्त उस समय कम सहायक होता है, जब आप ऐसे बुद्धिमान लोगों से सलाह लेते हैं, जो आपको और परिस्थिति को अच्छी तरह जानते और समझते हैं, और फिर भी आपको अलग तरह से सलाह देते हैं। उदाहरण के लिए, यदि आप किसी विशेष मसीही जन से विवाह करने के बारे में विचार कर रहे हैं, और यदि सलाह लगभग आधी पक्ष में हो और आधी विपक्ष में हो, तो आपको क्या करना चाहिए? आपको चौथे निदानात्मक प्रश्न की ओर जाना होगा।
4. बाइबल आधारित ज्ञान: आपको क्या लगता है कि बाइबल से परिपूर्ण ज्ञान के आधार पर आपको क्या करना चाहिए?
यह निदानात्मक प्रश्न पहले तीन प्रश्नों के समान बिलकुल नहीं है, क्योंकि यह उन सभी को समाहित करता है। ज्ञान का मार्ग हर बात का लेखा-जोखा रखता है:
- आपकी पवित्र इच्छा
- खुले और बन्द द्वार
- बुद्धिमान सलाह
- बाइबल में प्रकट की गई परमेश्वर की नैतिक इच्छा
- अन्य प्रासंगिक जानकारी, जो आप अपने वरदानों पर विचार करके (कौन सी गतिविधियाँ फलवन्त साबित हुई हैं?) और शोध करके (विभिन्न विकल्पों के लाभ और हानि क्या हैं?) प्राप्त कर सकते हैं।
परमेश्वर आमतौर पर अपने लोगों के जीवन में प्रत्यक्ष और विशेष प्रकाशन के माध्यम से हस्तक्षेप नहीं करता। वह आपसे निर्णय लेने के लिए बाइबल आधारित ज्ञान का उपयोग करने की अपेक्षा करता है।
राजा यहोशापात ने प्रार्थना की, “हमें कुछ सूझता नहीं कि क्या करना चाहिए? परन्तु हमारी आँखें तेरी ओर लगी हैं” (2 इति. 20:12ब)। आपके जीवन में कई बार ऐसे समय आएँगे जब आपको नहीं पता होगा कि क्या करना चाहिए। परन्तु आप प्रार्थना कर सकते हैं! विशेष रूप से, आपको परमेश्वर से बुद्धि माँगनी चाहिए: “पर यदि तुम में से किसी को बुद्धि की घटी हो तो परमेश्वर से माँगे, जो बिना उलाहना दिए सब को उदारता से देता है, और उसको दी जाएगी” (याकू. 1:5)। जब आप किसी विशेष परिस्थिति में इस बारे में प्रार्थना कर रहे हों कि आपको क्या चुनाव करना चाहिए, तो आपको विशेष प्रकाशन या प्रभाव या अगुवाई प्राप्त करने पर ध्यान नहीं लगाना चाहिए। इसके बजाय, आपको बुद्धि प्राप्त करने पर ध्यान लगाना चाहिए।
परन्तु बुद्धि वास्तव में क्या है? बुद्धि का सार कौशल या क्षमता है। यहाँ चार उदाहरण दिए गए हैं:
- यूसुफ बुद्धिमान है, इसलिए वह मिस्र पर कुशलता से शासन कर सकता है (उत्प. 41:33)।
- बसलेल बुद्धिमान है, इसलिए वह शिल्पकला और कलात्मक वस्तुएँ तैयार करने में निपुण है (निर्ग. 31:2-5)।
- हीराम बुद्धिमान है, इसलिए वह कुशलता से काँसे से कोई भी वस्तु बना सकता है (1 राजा. 7:13-14)।
- इस्राएल के लोग बुद्धिमान हैं, इसलिए वे पाप करने में निपुण हैं! यिर्मयाह व्यंग्यात्मक रीति से कहता है,
“बुराई करने को तो वे बुद्धिमान हैं,
परन्तु भलाई करना वे नहीं जानते” (यिर्म. 4:22)।
नीतिवचन में एक व्यक्ति बुद्धिमान है, इसलिए वह कुशलता से जीवन जी सकता है। अत: हम बुद्धि को इस प्रकार परिभाषित कर सकते हैं: बुद्धि विवेकपूर्ण और चतुराई से जीवन जीने का कौशल है (विवेकपूर्ण का अर्थ है “भविष्य के लिए चिन्ता और विचार के साथ कार्य करना या चिन्ता और विचार का प्रदर्शन करना”, और चतुर का अर्थ है “परिस्थितियों या लोगों का सटीक आकलन करने और उसे अपने लाभ में बदलने की क्षमता रखना या दिखाना”12)।
उदाहरण के लिए, एक बुद्धिमान व्यक्ति केवल यह नहीं समझता कि पराई स्त्री के ओठों से मधु टपकता है, और उसकी बातें तेल से भी अधिक चिकनी होती हैं; परन्तु इसका परिणाम नागदौना सा कड़वा और दोधारी तलवार सा पैना होता है। उसके पाँव मृत्यु की ओर बढ़ते हैं, और उसके पग अधोलोक तक पहुँचते हैं। (नीति. 5:3-5)। परन्तु एक बुद्धिमान व्यक्ति उससे दूर रहकर (5:8) और अपने ही कुण्ड का पानी पीकर (5:15) उस ज्ञान को कुशलतापूर्वक लागू करता है। बुद्धि विवेकपूर्ण और चतुराई से जीवन जीने का कौशल है।
अत: जब आप यह निर्धारित करने का प्रयत्न कर रहे हों कि किसी विशेष परिस्थिति में क्या करना चाहिए, तो आपको बाइबल से परिपूर्ण बुद्धि की आवश्यकता है। आपको परमेश्वर की नैतिक इच्छा को समझने और लागू करने के लिए विवेक की आवश्यकता है।
- इसी कारण से पौलुस आपको आज्ञा देता है, “यह परखो कि प्रभु को क्या भाता है… निर्बुद्धि न हो, पर ध्यान से समझो कि प्रभु की इच्छा क्या है” (इफि. 5:10, 17)। “तुम्हारे मन के नये हो जाने से तुम्हारा चाल–चलन भी बदलता जाए, जिससे तुम परमेश्वर की भली, और भावती, और सिद्ध इच्छा अनुभव से मालूम करते रहो” (रोमि. 12:2)।
- इसी कारण से पौलुस इस प्रकार प्रार्थना करता है: “कि तुम्हारा प्रेम ज्ञान और सब प्रकार के विवेक सहित और भी बढ़ता जाए, यहाँ तक कि तुम उत्तम से उत्तम बातों को प्रिय जानो” (फिलि. 1:9–10; और कुलु. 1:9 से इसकी तुलना करें)।
जब बात मार्गदर्शन की होती है, तो बाइबल अस्पष्ट भावनाओं पर नहीं, बल्कि सही सोच पर जोर देती है। आपको यह समझने के लिए बुद्धि की आवश्यकता है कि बाइबल में परमेश्वर आपको क्या करने की आज्ञा देता है और फिर उसे विशिष्ट मामलों में लागू करें।
इसी कारण से यह बहुत आवश्यक है कि हम बाइबल को ध्यान से पढ़ें और उसका गलत उपयोग न करें। यदि आप मार्गदर्शन के लिए बाइबल को उठाकर और बेतरतीब ढंग से पलटकर उसके किसी एक खण्ड को संदर्भ से बाहर पढ़ते हैं, तो आप बाइबल की सावधानीपूर्वक व्याख्या नहीं कर रहे हैं और न ही उसे सावधानीपूर्वक लागू कर रहे हैं। इसके बजाय, आप जल्दबाजी वाला और मूर्खतापूर्ण कार्य कर रहे हैं।13
यह केवल बड़े निर्णयों का मामला नहीं है जैसे किससे विवाह करना है या कौन सी नौकरी करनी है। नैतिक निर्णय लेने का मामला भी है, जिसके लिए नैतिक तर्क की आवश्यकता होती है:
- विवाह से पहले अपनी प्रेमिका या प्रेमी को रूमानी रूप से छूने के बारे में आपको कैसे सोचना चाहिए?
- क्या आपको और आपके जीवनसाथी को विवाह में गर्भनिरोधक का उपयोग करना चाहिए?
- क्या आपको शरीर पर गोदना करवाना चाहिए?
- क्या मसीहियों को मतदान करना चाहिए? यदि हाँ, तो कैसे? क्या राष्ट्रपति, कांग्रेस या राज्यपाल के स्तर पर भारत का एक मसीही किसी प्रजातंत्रवादी को मतदान कर सकता है?
- क्या आपको विशेष तरह के कपड़े पहनने चाहिए या नहीं?
- क्या आपको अपनी खाली शाम कोई विशेष प्रदर्शनी या फिल्म देखकर बितानी चाहिए?
वॉगन रॉबर्ट्स के द्वारा नीचे दी गई सारणी इस बात को सारांशित करती है कि मसीहियों को 1 कुरिन्थियों 8-10 अध्यायों में पाए जाने वाले सिद्धान्तों के आधार पर नैतिक निर्णय कैसे लेने चाहिए (चित्र 2 देखें):14

चित्र 2. निर्णय लेने की सारणी
इसका प्रारम्भिक प्रश्न है, “क्या बाइबल इसकी अनुमति देती है?” यदि बाइबल विवाह के बाहर यौन सम्बन्ध बनाने जैसी किसी विशेष गतिविधि के लिए मना करती है, तो ऐसा न करें। यह कठोरता से मना किया गया है। और यह बहस किए जाने योग्य बात नहीं है।
अगला प्रश्न है, “क्या मेरा विवेक इसकी अनुमति देता है?” दूसरे शब्दों में कहें तो “क्या मैं इसके लिए परमेश्वर का धन्यवाद कर सकता हूँ?” यदि आपका उत्तर हाँ है, तो हम उस सारणी में एक और प्रश्न जोड़ सकते हैं: क्या आपको परमेश्वर के वचन के अनुरूप अपने विवेक को समायोजित करने की आवश्यकता है? आपका विवेक आपकी चेतना या आपके द्वारा सही और गलत के प्रति आपके विश्वास का बोध है।15 आपका विवेक किसी पापी गतिविधि (जैसे नशे में धुत होना) को स्वीकार्य नहीं ठहरा सकता, परन्तु यदि आपका विवेक आपको ऐसा करने के लिए दोषी ठहराए, तो यह किसी स्वीकार्य गतिविधि (जैसे संयमित मात्रा में शराब पीना) को पापी ठहरा सकता है।
अन्तिम तीन प्रश्न स्वतंत्रता के क्षेत्रों की खोज करते हैं। वे इस बात पर जोर देते हैं कि केवल आप और आपकी व्यक्तिगत् स्वतंत्रताएँ ही विचारणीय कारक नहीं हैं। परिपक्वता और भक्ति का एक लक्षण यह है कि आप न केवल इस आधार पर चुनाव करते हैं कि यह आपको कैसे प्रभावित कर सकता है, बल्कि इस आधार पर भी कि यह दूसरों को कैसे प्रभावित कर सकता है।
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इसमें चार निदानात्मक प्रश्न हैं, जो आपको यह निर्धारित करने में सहायता कर सकते हैं कि क्या करना चाहिए:
- पवित्र इच्छा: आप क्या करना चाहते हैं?
- खुला द्वार: कौन से अवसर खुले हैं या बन्द हैं?
- बुद्धिमानी से भरी सलाह: जो बुद्धिमान लोग आपको और परिस्थिति को अच्छी तरह जानते और समझते हैं, वे आपको क्या करने की सलाह देते हैं?
- बाइबल आधारित ज्ञान: आपको क्या लगता है कि बाइबल से परिपूर्ण ज्ञान के आधार पर आपको क्या करना चाहिए?
जब आपने इन चारों प्रश्नों पर काम कर लिया और यह निर्धारित कर लिया कि क्या करना चाहिए, तो उसके बाद फिर क्या करें?
चर्चा एवं मनन:
- क्या आप इस समय ऐसे किसी निर्णय का सामना कर रहे हैं, जिसे इन चारों निदानात्मक प्रश्नों से लाभ मिलेगा?
- ऊपर दिया गया ज्ञान का वर्णन क्या आपके विचारों से मेल खाता है, या क्या यह आपके लिए ज्ञान प्राप्त करने का एक नया दृष्टिकोण है? आपके जीवन के वे कौन से क्षेत्र हैं, जिसमें आपको बाइबल आधारित ज्ञान का उपयोग करने की आवश्यकता है?
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निर्णय लें और आगे बढ़ते रहें
ठिठके नहीं। आवश्यकता से अधिक विश्लेषण न करें। चिन्तित होकर इस बात से न डरें कि आप परमेश्वर की इच्छा के केन्द्र से चूक सकते हैं। इस बात से पीड़ित न हों कि आपको कुछ अप्रिय अनुभव मिल सकता है। इसके बजाय, जैसे केविन डी यंग प्रोत्साहित करते हैं, “बस कुछ करें।” 16 निर्णय लें, और आगे बढ़ते रहें। ऐसा न करें कि “छोड़ दो और परमेश्वर को करने दो”। इसके बजाय, जैसे जे. आई. पैकर कहते हैं, “परमेश्वर पर भरोसा रखो और चलते रहो।”17
जब आप कोई निर्णय लेते हैं, तो हो सकता है कि आप चिन्तित, उदास, अड़ियल, अधिक सोचने और कायर हो जाने की परीक्षा में पड़ जाएँ। यहाँ बताया गया है कि उसके बजाय क्या करें।
1. चिन्ता न करें। परमेश्वर पर भरोसा रखें।
यीशु आपको आज्ञा देता है, “अपने प्राण के लिए यह चिन्ता न करना कि हम क्या खाएँगे और क्या पीएँगे; और न अपने शरीर के लिए कि क्या पहनेंगे” (मत्ती 6:25)। परमेश्वर पक्षियों को खिलाता है, और आप उनसे अधिक मूल्यवान हैं (मत्ती 6:26)। चिन्ता करने से आपको लम्बा जीवन जीने में सहायता नहीं मिलेगी (मत्ती 6:27), और यह वास्तव में आपको कम पवित्र और कम प्रसन्न बनाएगी। चिन्ता प्रतिकूल परिणाम देती है। परमेश्वर सोसन के फूलों को भव्य वस्त्र पहनाता है, और वह आपको भी वस्त्र पहनाएगा (मत्ती 6:28-30)। अत: इस बात की चिन्ता करने के बजाय कि आप क्या खाएँगे या क्या पिएँगे या क्या पहनेंगे (या आप किस व्यक्ति से विवाह करेंगे या आप किस विद्यालय में जाएँगे या आप कौन सी नौकरी करेंगे या आपके बच्चे कैसे होंगे या आप कहाँ रहेंगे या आपकी मृत्यु कब होगी), पहले परमेश्वर के राज्य और धार्मिकता की खोज करें, और बाकी सब बातों का ध्यान परमेश्वर रखेगा (मत्ती 6:31-33)। भविष्य की चिन्ता न करें, क्योंकि “आज के लिए आज ही का दु: ख बहुत है” (मत्ती 6:34 बी.एस.आई.)।
घमण्डी लोग चिन्ता करते हैं। विनम्र लोग चिन्ता नहीं करते। और अपनी सारी चिन्ताएँ परमेश्वर पर डाल देना, स्वयं को विनम्र बनाने का तरीका है: “इसलिए परमेश्वर के बलवन्त हाथ के नीचे दीनता से रहो, जिस से वह तुम्हें उचित समय पर बढ़ाए। अपनी सारी चिन्ता उसी पर डाल दो, क्योंकि उसको तुम्हारा ध्यान है” (1 पत. 5:6–7)।
चिन्तित होने के विपरीत परमेश्वर पर भरोसा करना है। क्या आप उस पर भरोसा करते हैं? क्या आप परमेश्वर पर तब भी भरोसा करते हैं, जब वह जो करता है, उसके सभी कारण आपको नहीं बताता? क्या आप परमेश्वर के चरित्र पर उस आधार पर भरोसा करते हैं, जैसे उसने स्वयं को पवित्रशास्त्र में आपके सामने कैसे प्रकट किया है? परमेश्वर के वचन आपको बुद्धिमान बनाते हैं।
यह आपके लिए कठिन इसलिए हो सकता है, क्योंकि आप भविष्य जानना चाहते हैं। आप भविष्य नहीं जानते, और यह ठीक इसलिए है, क्योंकि परमेश्वर भविष्य जानता है। उसने सब कुछ निर्धारित किया हुआ है। और वह आपकी देखभाल कर रहा है। वह आपका ध्यान रख रहा है, और उसने आपको ठीक वही दिया है, जो उसे प्रसन्न करने के लिए आपको चाहिए। “हम जानते हैं कि जो लोग परमेश्वर से प्रेम रखते हैं, उनके लिए सब बातें मिलकर भलाई ही को उत्पन्न करती हैं; अर्थात् उन्हीं के लिए जो उसकी इच्छा के अनुसार बुलाए हुए हैं” (रोमि. 8:28)। “सब बातों” में आपके बुद्धिमानी भरे और नासमझी भरे —अर्थात् सभी निर्णय शामिल हैं।
जब आप भविष्य के बारे में चिन्ता करते हैं, तो आप परमेश्वर पर भरोसा नहीं कर रहे होते हैं और इस प्रकार आप परमेश्वर का अपमान कर रहे होते हैं। आपको आने वाली घटनाओं के बारे में हर एक विवरण जानने की आवश्यकता नहीं है। आपको परमेश्वर पर भरोसा रखने की और उसकी आज्ञा का पालन करने की आवश्यकता है। और आने वाले कल की चिन्ता न करना भी इसमें शामिल है।
2. उदास न रहें। पवित्र और प्रसन्न रहें।
किसी विशेष निर्णय (जैसे नौकरी का प्रस्ताव स्वीकार करना है या नहीं) के लिए परमेश्वर की इच्छा क्या है, यह समझने में आप इतने व्यस्त हो सकते हैं कि आप पवित्रशास्त्र में परमेश्वर की इच्छा के बारे में स्पष्ट रूप से कही गई बातों को कमतर आँकते हैं। उदाहरण के लिए, बाइबल के दो खण्ड स्पष्ट रूप से कहते हैं, “परमेश्वर की इच्छा यही है”:
- “परमेश्वर की इच्छा यह है कि तुम पवित्र बनो [परमेश्वर की इच्छा है कि आप शुद्ध रहें (एन.एल.टी.)]: अर्थात् व्यभिचार से बचे रहो” (1 थिस्स. 4:3)।
- “सदा आनन्दित रहो। निरन्तर प्रार्थना में लगे रहो। हर बात में धन्यवाद करो; क्योंकि तुम्हारे लिए मसीह यीशु में परमेश्वर की यही इच्छा है” (1 थिस्स. 5:16–18)।
आपके लिए परमेश्वर की इच्छा यह नहीं है कि आप उदास रहें। आपके लिए उसकी इच्छा है कि आप पवित्र और प्रसन्न रहें।
सी. एस. लुईस की पुस्तक द वॉयेज ऑफ द डॉन ट्रीडर (The Voyage of the Dawn Treader) में, क्या आपको याद है कि असलान के द्वारा यूस्टेस को ड्रैगन से छुड़ाने से पहले वह कितना चिड़चिड़ा था? यूस्टेस की तरह उदास न रहें। परमेश्वर की इच्छा आपके लिए ठीक इसके विपरीत है। वह चाहता है कि आप पवित्र और प्रसन्न रहो। परमेश्वर की आज्ञा मानकर आप उसे प्रसन्न करते हो,18 और आप सबसे अधिक प्रसन्न तब होते हैं, जब आप परमेश्वर की योजना के अनुसार जीवन बिताते हैं — जब आप परमेश्वर का और उसके वरदानों का आनन्द लेते हैं।19
3. अड़ियल न बनें। अपनी योजनाओं में बदलाव करने के लिए तैयार रहें।
आपको निर्णय लेने होंगे — जिनमें से कुछ निर्णय अड़ियल होने चाहिए, जैसे व्यभिचार न करने का नैतिक निर्णय। परन्तु कई अन्य क्षेत्रों में, आपके पास यह या वह चुनकर परमेश्वर का सम्मान करने की स्वतंत्रता है — चाहे चिपोटल में या चिक-फिला में खाना हो, चाहे मसीही मुसाफिर अर्थात् द पिलग्रिम्स प्रोग्रेस (Pilgrim’s Progress) पढ़ें या द लॉर्ड ऑफ द रिंग्स (The Lord of the Rings), चाहे घर पर रहें या यात्रा करें, चाहे पूरे समय विद्यालय जाएँ या पूरे समय काम करें। जब आप कुछ करने की योजना बनाएँ, तो याद रखें कि आप परमेश्वर नहीं हैं:
तुम जो यह कहते हो, “आज या कल हम किसी और नगर में जाकर वहाँ एक वर्ष बिताएँगे, और व्यापार करके लाभ कमाएँगे।” और यह नहीं जानते कि कल क्या होगा। सुन तो लो, तुम्हारा जीवन है ही क्या? तुम तो भाप के समान हो, जो थोड़ी देर दिखाई देती है फिर लोप हो जाती है। इसके विपरीत तुम्हें यह कहना चाहिए, “यदि प्रभु चाहे तो हम जीवित रहेंगे, और यह या वह काम भी करेंगे।” पर अब तुम अपने डींग मारने पर घमण्ड करते हो; ऐसा सब घमण्ड बुरा होता है। (याकू. 4:13-16)
निर्णय लेने के बाद घमण्ड न करें। यदि आपने बुद्धिमानी से निर्णय लिया है, तो परमेश्वर ने आपको वह बुद्धि दी है। और कभी-कभी कोई निर्णय लेने के बाद, आपको उन परिस्थितियों के ध्यान में रखते हुए अपनी योजना में बदलाव करना पड़ता है, जिनकी आपने कल्पना भी नहीं की थी। आपके कई निर्णय बदले जा सकते हैं, अत: उन्हें बदलने के लिए तैयार रहें। आपकी योजनाएँ “परमेश्वर की इच्छा से” पूरी होंगी। अड़ियल मत बनो।
- पिछले निर्णयों के बारे में अधिक न सोचें। आगे जो रखा है, उसके लिए आगे बढ़ें।
अपने छोटे से जीवन को यह सोचने में न गँवाएँ, “परन्तु काश मैंने कुछ और चुना होता?” पौलुस की तरह बनें: “परन्तु केवल यह एक काम करता हूँ कि जो बातें पीछे रह गई हैं उनको भूल कर, आगे की बातों की ओर बढ़ता हुआ, निशाने की ओर दौड़ा चला जाता हूँ, ताकि वह इनाम पाऊँ जिसके लिए परमेश्वर ने मुझे मसीह यीशु में ऊपर बुलाया है” (फिलि. 3:13-14)। इसमें कोई सन्देह नहीं कि आपको अपनी गलतियों से सीखना चाहिए। बुद्धिमान लोग यही करते हैं। परन्तु आपको अतीत के बारे में अधिक नहीं सोचना चाहिए। पौलुस अतीत पर ध्यान न देकर लक्ष्य की ओर आगे बढ़ता है। इसमें पौलुस के मसीही बनने से पहले के पिछले जीवन के साथ-साथ एक मसीही के रूप में उसका पिछला जीवन शामिल है — अर्थात् एक मसीही के रूप में उसने जो अच्छी प्रगति की है। पिछले निर्णयों के बारे में अधिक न सोचने के लिए आप इस सिद्धान्त को जिम्मेदारी से लागू कर सकते हैं। इस बारे में सोचने में व्यस्त रहने के बजाय कि यदि आपने कुछ और चुना होता तो क्या होता, आपको एक-चित्त होकर आगे रखी हुई बातों के लिए आगे बढ़ना चाहिए। निर्णय लें, और आगे बढ़ते रहें।
5. कायर न बनें। साहसी बनें।
जब आप परमेश्वर का आदर करने वाला कोई निर्णय लेते हैं, तब भी हो सकता है कि उसमें जोखिम का एक तत्व शामिल हो — जैसा उस समय हुआ, जब एस्तेर रानी ने यह निश्चय किया था, “ऐसी ही दशा में मैं नियम के विरुद्ध राजा के पास भीतर जाऊँगी; और यदि नष्ट हो गई तो हो गई” (एस्ते. 4:16)। आपको आगे बढ़ने के लिए साहस की आवश्यकता पड़ती है।20
यदि आपको यह चुनने में कठिनाई हो रही है कि कौन से कॉलेज में जाना है, तो आपको प्रतिबद्ध होने के लिए साहस की आवश्यकता है और फिर इस बात की चिन्ता न करें कि आप किसी अन्य कॉलेज में क्या खो सकते हैं। बुद्धिमानी से चुनाव करें, और आगे बढ़ते रहें।
यदि आप एक पुरुष हैं और यह देखने के लिए कि क्या आप दोनों के लिए विवाह करना उचित होगा, किसी विशेष स्त्री के साथ रिश्ते को आगे बढ़ाने पर विचार कर रहे हैं, तो आपको साहस की आवश्यकता इसलिए पड़ती है, क्योंकि हो सकता है कि वह “न” कह दे। केविन डीयंग का विश्लेषण और सलाह यहाँ बिलकुल सटीक है:
जब विवाह करने के इच्छुक मसीही अविवाहितों की संख्या बहुत अधिक हो, तो यह एक समस्या होती है। और यह एक ऐसी समस्या है, जिसका जिम्मेदार मैं सीधे रूप में उन युवकों को ठहराता हूँ, जिनकी अपरिपक्वता, निष्क्रियता और अनिर्णय उनके हार्मोनों को आत्म-नियंत्रण की सीमा तक धकेल रहे हैं, उनके परिपक्व होने की प्रक्रिया में देरी कर रहे हैं, और अनगिनत युवतियों को अपना भविष्य बनाने में बहुत समय और पैसा खर्च करने के लिए विवश कर रहे हैं (जो आवश्यक नहीं है कि गलत हो), जबकि वे विवाह करके बच्चे उत्पन्न करना चाहती हैं। हे पुरुषों, यदि आप विवाह करना चाहते हैं, तो एक धर्मी लड़की ढूँढ़ें, उसके साथ अच्छा व्यवहार करें, उसके माता-पिता से बात करें, विवाह का प्रस्ताव रखें, विवाह के बन्धन में बन्ध जाएँ और बच्चे उत्पन्न करना आरम्भ करें।21
मेरा तात्पर्य यह अर्थ निकालना नहीं है कि केवल युवक ही पाप कर सकते हैं और युवतियाँ नहीं कर सकतीं, और मैं मानता हूँ कि इसके और भी शान्त करने वाले कारक हो सकते हैं — जैसे नारीवाद और सांस्कृतिक पतन। यहाँ मेरा बोझ इस बात का है कि कुछ मसीही विवाह के प्रति एक व्यक्तिपरक और आलसी दृष्टिकोण रखते हैं, और मुझे लगता है कि पुरुषों को साहसपूर्वक पहल करने और जिम्मेदार होने के लिए प्रोत्साहित करना बुद्धिमानी है।
जब आप यह निर्धारित कर लें कि क्या करना चाहिए, तो सुख-समृद्धि वाले सुसमाचार की मानसिकता से सावधान रहें। सुख-समृद्धि वाले सुसमाचार के अनुसार, परमेश्वर हमारे बढ़े हुए विश्वास का प्रतिफल स्वास्थ्य और/या धन-सम्पत्ति में वृद्धि के रूप में देता है। परन्तु यह सुसमाचार को विकृत करता है। सुसमाचार यह है कि यीशु पापियों के लिए जीया, मरा और जी उठा, और यदि आप अपने पापों से फिरकर यीशु पर विश्वास करते हैं, तो परमेश्वर आपका उद्धार करेगा। यह सच नहीं है कि परमेश्वर अपने आज्ञाकारी लोगों को हमेशा स्वास्थ्य और धन-सम्पत्ति की आशीष देता है।
जब आप परमेश्वर की आज्ञा मानते हैं, तो हो सकता है कि आप दु: ख उठाएँ। परमेश्वर यह प्रतिज्ञा नहीं करता कि आपका जीवन हमेशा संघर्ष, कठिनाई और परेशानी से मुक्त रहेगा। इसके विपरीत, बाइबल बताती है कि, “पर जितने मसीह यीशु में भक्ति के साथ जीवन बिताना चाहते हैं वे सब सताए जाएँगे” (2 तीमु. 3:12)। परमेश्वर के भले प्रावधान से, धर्मी लोगों का दु: ख उठाना सामान्य बात है — जो अय्यूब, यूसुफ, दानिय्येल, यिर्मयाह और पौलुस जैसे पुरुषों के साथ हुआ था। यदि आप दु: ख उठाते हैं, तो आवश्यक रूप से यह इस बात का संकेत नहीं है कि आपने कोई गलत निर्णय लिया है। परमेश्वर यह प्रतिज्ञा नहीं करता कि यदि आप उसकी इच्छा के केन्द्र में रहेंगे, तो आपके साथ कभी कुछ बुरा नहीं होगा। परन्तु हम परमेश्वर पर भरोसा रख सकते हैं कि मसीह हमेशा हमारे साथ रहेगा (मत्ती 28:20) और कोई भी व्यक्ति या वस्तु हमारे विरुद्ध सफल नहीं हो सकती (रोमि. 8:31-39)।
चर्चा एवं मनन:
- इन पाँचों में से कौन सी बात आपके लिए सबसे कठिन है? आपके विचार से ऐसा क्यों है? क्या उस कठिनाई के पीछे कोई हृदय सम्बन्धी समस्या या गलत धारणा है?
- यदि आप इसे किसी परामर्शदाता के साथ पढ़ रहे हैं, तो पूछें कि उन्होंने कौन से बड़े निर्णय लिए हैं और वह प्रक्रिया कैसे काम करती है। आपके परामर्शदाता ने क्या सबक सीखे, अब क्या अलग किया जाएगा, इत्यादि?
निष्कर्ष:
“वह सिंह मैं था”
आज से दो, पाँच, दस, पच्चीस वर्ष बाद अपने जीवन की झलकियाँ पाना कैसा होगा? आप शायद चाहते हों कि परमेश्वर आपके अतीत की व्याख्या करे और आपको आपका भविष्य दिखाए और समझाए कि अभी जो घटित हो रहा है, तो वह उस बड़ी तस्वीर में कैसे उपयुक्त बैठता है। परन्तु यह परमेश्वर का सामान्य तरीका नहीं है। परमेश्वर से आपका भविष्य दिखाने के लिए कहकर आपको निर्णय नहीं लेने चाहिए। समय आने पर सब कुछ समझ में आ जाएगा। अभी के लिए तो आपका काम स्वयं पर या किसी और पर भरोसा करना नहीं, बल्कि परमेश्वर पर भरोसा करना ही है।
मुझे सी. एस. लुईस के द्वारा “द हॉर्स एंड हिज़ बॉय” (The Horse and His Boy) में इस सत्य को चित्रित करने का तरीका बहुत अच्छा लगता है, जब वह सिंह असलान, उस लड़के शास्ता से बात करता है। जब शास्ता को लगता है कि वह बिलकुल अकेला है, तो वह शिकायत करता है, “मुझे लगता है कि इस सारे संसार का अब तक का सबसे बदकिस्मत लड़का मैं ही होऊँगा। मेरे अतिरिक्त सबके साथ सब कुछ ठीक चल रहा है।” लुईस आगे कहता है, “उसे अपने लिए इतना दुःख हुआ कि उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।”22 फिर शास्ता को अचानक एहसास होता है कि कोई उसके साथ घने अन्धियारे में चल रहा है। वह असलान है। जब शास्ता असलान को अपने दु: ख बताता है, तो असलान की प्रतिक्रिया हम कम विश्वास रखने वालों को झिड़कने और प्रोत्साहित करने वाली होनी चाहिए:
[शास्ता ने] बताया कि कैसे उसने अपने असली पिता या माता को कभी नहीं जाना और उस मछुआरे ने उसे बहुत कठोरता से पाला-पोसा। और फिर उसने अपने भागने की कहानी सुनाई और कैसे सिंहों ने उनका पीछा किया और उन्हें अपने प्राण बचाने के लिए तैरने पर विवश किया; और ताशबान में उनके सभी खतरों और कब्रों के बीच बिताई गई, उसकी रात के बारे में और कैसे वे पशु जंगल से बाहर निकलकर उस पर चिल्लाए। और उसने जंगल की उनकी यात्रा की गर्मी और प्यास के बारे में बताया और यह भी बताया कि कैसे वे लगभग अपने लक्ष्य पर पहुँच ही गए थे कि एक और सिंह ने उनका पीछा किया और अरविस को घायल कर दिया। और यह भी कि कितने समय से उसे कुछ खाने को नहीं मिला था।
उस बड़े स्वर ने कहा, “मैं तुम्हें बदकिस्मत नहीं कहता।”
शास्ता ने कहा, “क्या तुम्हें नहीं लगता कि इतने सारे सिंहों से मिलना दुर्भाग्य की बात थी?” उस स्वर ने कहा, “वहाँ केवल एक ही सिंह था।”
“तुम्हारे कहने का क्या अर्थ है? मैंने अभी तुम्हें बताया था कि पहली रात कम से कम दो सिंह थे, और — ”
“वहाँ केवल एक ही सिंह था: परन्तु वह तेज पैरों वाला था।”
“तुम्हें कैसे पता?”
“वह सिंह मैं था।” और जब शास्ता बिना कुछ बोले मुँह खोले देखता रहा, तो वह स्वर जारी रहा। “मैं ही वह सिंह था, जिसने तुम्हें अरविस के साथ जाने पर विवश किया था। मैं ही वह बिल्ली था, जिसने तुम्हें मरे हुओं के निवास में दिलासा दिया था। मैं ही वह सिंह था, जिसने सियारों को तुमसे उस समय दूर भगाया था, जब तुम सो गए थे। मैं ही वह सिंह था, जिसने घोड़ों को अन्तिम मील तक डर की नयी शक्ति दी, जिससे कि तुम राजा लून के पास समय पर पहुँच जाओ। और मैं ही वह सिंह था, जो तुम्हें याद नहीं है, जिसने उस नाव को धक्का दिया था, जिसमें तुम उस बच्चे की तरह लेटे हुए थे, जो मृत्यु के निकट था, जिससे कि वो किनारे पर आ जाए, जहाँ एक पुरुष आधी रात को जागकर तुम्हारा स्वागत करने को बैठा था।”
“तो क्या तुमने ही अरविस को घायल किया था?”
“वह मैं ही था।”
“परन्तु किस लिए?”
उस स्वर ने कहा, “बच्चे, मैं तुम्हें तुम्हारी कहानी सुना रहा हूँ, उसकी नहीं। मैं किसी को उसकी अपनी कहानी के अतिरिक्त कोई कहानी नहीं सुनाता।”
शास्ता ने पूछा, “तुम हो कौन?”
उस स्वर ने बहुत गहरी और धीमी आवाज में कहा, जिससे धरती हिल गई, “मैं स्वयं ही हूँ,”: और एक बार फिर उसने जोर से, साफ-साफ और उल्लासपूर्वक कहा, “मैं स्वयं ही हूँ,”: और फिर तीसरी बार वह इतनी धीमी आवाज में फुसफुसाया “मैं स्वयं ही हूँ,” कि आप कठिनता से सुन पाएँ, और फिर भी ऐसा लग रहा था, जैसे वह आवाज आपके चारों ओर से ऐसे आ रही हो कि मानो पत्ते उससे सरसरा रहे हों।
शास्ता को अब इस बात का डर नहीं था कि वह आवाज किसी ऐसी वस्तु की है, जो उसे खा जाएगी, और न ही इस बात का डर था कि यह किसी भूत की आवाज है। परन्तु एक नयी और अलग तरह की कंपकंपी ने उसे जकड़ लिया। फिर भी उसे प्रसन्नता भी हुई।
उस सिंह के मुख को एक झलक देखने के बाद वह काठी से फिसलकर उसके पाँवों पर गिर पड़ा। वह कुछ नहीं कह सका, परन्तु फिर वह कुछ भी नहीं कहना चाहता था, और वह जानता था कि उसे कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है।23
परमेश्वर से सीधा सामना होना — जैसे असलान ने शास्ता से बात की थी — सामान्य बात नहीं है। आपको उसे खोजने की आवश्यकता नहीं है। परमेश्वर ने आपको पहले ही वह सब दे दिया है, जो आपको विश्वासयोग्य और फलवन्त होने के लिए चाहिए। शास्ता और असलान के बीच ऊपर दी गई बातचीत आपको याद दिलाती है कि सर्वज्ञानी, सर्व-शक्तिमान, सर्वदा-भला परमेश्वर आपकी भलाई के लिए सभी वस्तुओं का पर्यवेक्षण कर रहा है, और इस जीवन में आप उन सभी तरीकों और कारणों को नहीं जान पाएँगे, जिनसे परमेश्वर आपके लिए अपनी योजना को साकार करता है। अत: शास्ता की तरह चिन्तित और उदास न होना। परमेश्वर पर भरोसा रखें, और चलते रहें। बुद्धिमानी से चुनाव करें, और आगे बढ़ते रहें।
आभार
इस छोटी सी पुस्तक के प्रालेखों पर अपनी अनुग्रहकारी प्रतिक्रिया देने वाले मित्रों का धन्यवाद, जिनमें जॉन बेकमैन, ब्रायन ब्लाजोस्की, टॉम डोड्स, अबीगैल डोड्स, बेट्सी हॉवर्ड, ट्रेंट हंटर, स्कॉट जैमिसन, जेरेमी किम्बल, सिंथिया मैकग्लोथलिन, चार्ल्स नासेली, जेनी नासेली, कारा नासेली, हड पीटर्स, जॉन पाइपर, जो रिग्नी, जेनी रिग्नी, एड्रियन सेगल, केटी सेम्पल, स्टीव स्टीन, एरिक ट्रू और जो टायरपैक शामिल हैं।
अन्तिम टिप्पणियाँ
- गैरी फ्राइज़न, जे. रॉबिन मैक्ससन के साथ, डिसिजन मेकिंग एंड द विल ऑफ गॉड: अ बिबलिकल अल्टरनेटिव टु द ट्रेडिशनल व्यू (Making and the Will of God: A Biblical Alternative to the Traditional View), दूसरा संस्करण (सिस्टर्स, ओरेगॉन: मल्टनोमाह, 2004), 35. व्यक्तिपरक दृष्टिकोण के सारांश के लिए, पृष्ठ 21-35 को देखें। फ्राइज़न ने अपना ThD शोध प्रबन्ध “परमेश्वर की इच्छा जो कि निर्णय लेने से सम्बन्धित है” (डॉल्लस थियोलॉजिकल सेमिनरी, 1978) पर लिखा है, और उन्होंने दशकों से इस मुद्दे पर विद्वानों का ध्यान आकर्षित किया है। जिसे मैं व्यक्तिपरक दृष्टिकोण कह रहा हूँ, फ्राइज़न उसे “पारम्परिक दृष्टिकोण” कहते हैं, क्योंकि बचपन में यही एकमात्र दृष्टिकोण था, जिसे उन्होंने लोगों को सिखाते हुए सुना था।
- एंड्रयू मरे, गॉड्स विल: आवर ड्वेलिंग प्लेस (God’s Will: Our Dwelling Place) (स्प्रिंगडेल, पी.ए.: व्हिटेकर हाउस, 1982), 76-77 (मूल रूप से तिरछे शब्द)।
- पवित्रशास्त्र की पर्याप्तता पर, स्टीफन जे. वेलम, सिस्टेमैटिक थियोलॉजी, वॉल्यूम 1: फ्रॉम कैनन टु कॉन्सेप्ट (Theology, Volume 1: From Canon to Concept) (ब्रेंटवुड, टी.एन.: बी. एंड एच. अकेडमिक, 2024), 338-49 को देखें।
- एंड्रयू डेविड नासेली और जे. डी. क्रॉली, कंसाइंस: वाट इट इज़, हाउ टु ट्रेन इट, एंट लविंग दोज़ हु डिफर (Conscience: What It Is, How to Train It, and Loving Those Who Differ) (व्हीटन, आई.एल.: क्रॉसवे, 2016), 55-83 को देखें।
- एंड्रयू डेविड नासेली, प्रीडेस्टिनेशन: एन इंट्रोडक्शन (Predestination: An Introduction), विधिवत ईश-विज्ञान में लघु अध्ययन (व्हीटन, आई.एल.: क्रॉसवे, 2024), अध्याय 7 (पृष्ठ 111- 20). परमेश्वर की सर्तकता भरी प्रभुता और मानवीय जिम्मेदारी पर, अध्याय 6 (पृष्ठ 79-110) को देखें।
- यह विवाह करने पर कैसे लागू होता है, इस पर सलाह के लिए, डगलस विल्सन, गेट द गर्ल: हाउ टु बी द काइंड ऑफ मैन द काइंड ऑफ वुमन यू वांट टु मैरी वुड वांट टु मैरी Get the Girl: How to Be the Kind of Man the Kind of Woman You Want to Marry Would Want to Marry (मॉस्को, आई.डी.: कैनन, 2022), 29-38 को देखें।
- मुझे बाद में पता चला कि उसकी प्रतिक्रिया थोड़ी भ्रामक थी। उसने वास्तव में इसे रद्द कर दिया था, क्योंकि उसे उस लड़के के चरित्र के बारे में चिन्ता थी, परन्तु वह उसे यह बताना नहीं चाहती थी। उसे उस व्यक्ति से यह कहने की कोई बाध्यता नहीं थी, परन्तु मैं समझ सकता हूँ कि वह व्यक्ति निराश और उलझन में क्यों था। वह किसी उचित कारण को स्वीकार करने के बजाय, पवित्र भावनाओं के एक रहस्यमयी आवरण के पीछे छिप गई — वह उससे मिलना-जुलना जारी नहीं रखना चाहती थी, क्योंकि उसे नहीं लगता था कि वह उस तरह का व्यक्ति है, जिसके प्रति वह समर्पण और सम्मान की शपथ लेना चाहती थी, जब तक कि मृत्यु उन्हें अलग न कर दे। यह एक स्त्री का परम-अधिकार है। यदि उसे लगता है कि कोई पुरुष घमण्डी या अक्षम या आलसी या अनाकर्षक या परेशान करने वाला या कमजोर या अविश्वसनीय या कुछ भी है, तो उसके पास उससे विवाह न करने के सारे अधिकार है। हो सकता है कि वह परमेश्वर की नैतिक इच्छा को परमेश्वर को आदर देने वाले तरीके से लागू कर रही हो, इसलिए उसने यह निष्कर्ष निकाला, “मुझे विश्वास नहीं है कि प्रभु मुझे तुमसे विवाह करने देगा।”
- गैरी फ्राइसन, “बुद्धि में चलना: बुद्धि का दृष्टिकोण,” हाउ देन शुड वी चूज़? थ्री व्यूज़ ऑन गाड्स विल एंड डिसिजन मेकिंग (How Then Should We Choose? Three Views on God’s Will and Decision Making), सम्पादक डगलस एस. हफमैन (ग्रैंड रैपिड्स: क्रेगल, 2009), 105. केसविक ईश-विज्ञान पर, एंड्रयू डेविड नासेली, नो क्विक फिक्स: वेयर हायर लाइफ थियोलॉजी केम फ्रॉम, वाट इट इज़, एंट वाय इट्स हार्मफुल (No Quick Fix: Where Higher Life Theology Came From, What It Is, and Why It’s Harmful) (बेलिंगहैम, डब्ल्यू.ए.: लेक्सहैम, 2017) को देखें।
- जॉन मैकआर्थर, फाउण्ड: गॉड्स विल; डायरेक्शन एंड पर्पस गॉड वांट्स फॉर योर लाइफ (Found: God’s Will; Find the Direction and Purpose God Wants for Your Life), तीसरा संस्करण (कोलोराडो स्प्रिंग्स, सी.ओ.: कुक, 2012).
- ऑगस्टाइन, टेन होमलीज़ ऑन द फर्स्ट एपिस्टल ऑफ जॉन (Ten Homilies on the First Epistle of John), होमली 7 (1 यूह. 4:4–12 पर आधारित), §8.
- यह कैसे जानें कि किसी व्यक्ति को पास्टर वाली सेवकाई के लिए बुलाया गया है या नहीं, इसके लिए देखें सी. एच. स्पर्जन, लेक्चर्स टु माई स्टुडेंट्स: अ सिलेक्शन फ्रॉम एडरेसेज़ डिलिवर्ड टु द स्टुडेंट्स ऑफ द पास्टर्स कॉलेज, मेट्रोपोलिटन टैबरनेकल (Lectures to My Students: A Selection from Addresses Delivered to the Students of the Pastors’ College, Metropolitan Tabernacle) में “व्याख्यान II: सेवकाई के लिए बुलाहट,” मेरे छात्रों के लिए व्याख्यान 1 (लंदन: पासमोर और अलबेस्टर, 1875), 35–65; जेम्स एम. जॉर्ज, रीडिस्कवरिंग पास्टरल मिनिस्ट्री: शेपिंग कंटेम्परेरी मिनिस्ट्री विद बिबलिकल मैंडेट्स (Rediscovering Pastoral Ministry: Shaping Contemporary Ministry with Biblical Mandates) में, “पास्टर वाली सेवकाई की बुलाहट,” सम्पादक जॉन मैकआर्थर (डलास: वर्ड, 1995), 102–105; जेसन के. एलन, डिसर्निंग योर कॉल टू मिनिस्ट्री: हाउ टू नो फॉर श्योर एंड व्हाट टू डू अबाउट इट (Discerning Your Call to Ministry: How to Know for Sure and What to Do about It) (शिकागो: मूडी, 2016); बॉबी जैमीसन, द पाथ टू बीइंग अ पास्टर: अ गाइड फॉर द एस्पायरिंग (The Path to Being a Pastor: A Guide for the Aspiring), 9मार्क्स (व्हीटन, आई.एल.: क्रॉसवे, 2021).
- नया ऑक्सफोर्ड अमेरिकन शब्दकोश।
- बाइबल की व्याख्या कैसे करें, इस पर सलाह के लिए एंड्रयू डेविड नासेली, हाउ टु अण्डरस्टैण्ड एंड अप्लाई द न्यू टेस्टामेंट: ट्वेल्व स्टेप्स फ्रॉम एक्सजेसिस टु थियोलॉजी (How to Understand and Apply the New Testament: Twelve Steps from Exegesis to Theology) (फिलिप्सबर्ग, न्यू जर्सी: पी. एंड आर. पब्लिशिंग, 2017); डी. ए. कार्सन और एंड्रयू डेविड नासेली, एक्सजेटिकल फेलासिस (Exegetical Fallacies), तीसरा संस्करण(ग्रैंड रैपिड्स: बेकर एकेडमिक, फोर्थकमिंग).
- वॉन रॉबर्ट्स, ऑथेंटिक चर्च: ट्रु स्प्रिचुएलिटी इन ए कल्चर ऑफ काउंटरफेट्स (Authentic Church: True Spirituality in a Culture of Counterfeits) (डाउनर्स ग्रोव, आई.एल.: इंटरवर्सिटी प्रेस, 2011), 133. अनुमति लेकर उपयोग किया गया है।
- नासेली और क्रॉले, कंसाइंस (Conscience), 32–44.
- केविन डीयंग, जस्ट डु समथिंग: अ लिबरेटिंग एप्रोच टु फाइंडिंग गॉड्स विल; ओर, हाउ टु मेक अ डिसिजन विदाउट ड्रीम्स, विजन्स, फ्लीसेस, ओपन डोर्स, रेंडम बाइबल वर्सेस, कास्टिंग लॉट्स, लिवर शिवर्स, राइटिंग इन द स्काई, एटसैट्रा (Just Do Something: A Liberating Approach to Finding God’s Will; or, How to Make a Decision without Dreams, Visions, Fleeces, Open Doors, Random Bible Verses, Casting Lots, Liver Shivers, Writing in the Sky, Etc.) (शिकागो: मूडी, 2009).
- जे. आई. पैकर, कीप इन स्टेप विद द स्पिरिट: फाइण्डिंग फुलनेस इन ऑवर वॉक विद गॉड (Keep in Step with the Spirit: Finding Fullness in Our Walk with God), दूसरा संस्करण (ग्रैंड रैपिड्स: बेकर बुक्स, 2005), 128. मसीही जीवनयापन के प्रतिमान के रूप में “छोड़ दें और परमेश्वर को करने दें” की आलोचना के लिए, नासेली, नो क्विक फिक्स (No Quick Fix) को देखें।
- वेन ग्रुडेम, “अपनी आज्ञाकारिता से परमेश्वर को प्रसन्न करना: नये नियम की एक उपेक्षित शिक्षा,” जो कि फॉर द फेम ऑफ गॉड्स नेम (For the Fame of God’s Name) में है: उसकी तुलना ऑनर ऑफ जॉन पाइपर (Honor of John Piper), सम्पादक सैम स्टॉर्म्स और जस्टिन टेलर (व्हीटन, आई.एल.: क्रॉसवे, 2010), 272–92 के निबन्ध से करें।
- जॉन पाइपर, डिज़ायरिंग गॉड: मेडिटेशन्स ऑफ अ क्रिश्चियन हेडोनिस्ट (Desiring God: Meditations of a Christian Hedonist), पाँचवाँ संस्करण (व्हीटन: क्रॉसवे, 2025) को; और जो रिग्नी, द थिंग्स ऑफ अर्थ: ट्रेज़रिंग गॉड बाए एन्जॉयिंग हिज़ गिफ्ट्स (The Things of Earth: Treasuring God by Enjoying His Gifts), दूसरा संस्करण (मॉस्को, आई.डी.: कैनन, 2024) को देखें।
- जॉन पाइपर, रिस्क इज़ राइट: बेटर टु लूज़ योर लाइफ देन टु वेस्ट इट (Risk Is Right: Better to Lose Your Life Than to Waste It) (व्हीटन, आई.एल.: क्रॉसवे, 2013); इसकी तुलना जो रिग्नी, करेज: हाउ द गॉस्पल क्रिएट्स क्रिस्चियन फॉर्टिट्यूड (Courage: How the Gospel Creates Christian Fortitude), यूनियन (व्हीटन, आई.एल.: क्रॉसवे, 2023) से करें।
- डीयंग, जस्ट डु समथिंग (Just Do Something), 108.
- सी. एस. लुईस, द हॉर्स एंड हिज़ बॉय (The Horse and His Boy), द क्रॉनिकल्स ऑफ नार्निया (The Chronicles of Narnia (नार्निया का इतिहास) (न्यू यॉर्क: हार्पर कॉलिन्स, 1954), 161–62.
- लुईस, द हॉर्स एंड हिज़ बॉय (The Horse and His Boy), 164–66.
विषयसूची
- 1
- परमेश्वर की इच्छा जानने का व्यक्तिपरक दृष्टिकोण क्या है?
- 1. परमेश्वर को जानने, उस पर भरोसा करने और उसकी आज्ञा मानने के लिए बाइबल पर्याप्त है।
- 2. बाइबल के पास आपके विचारों और भावनाओं पर अधिकार है।
- 3. बाइबल इस बात पर जोर देती है कि आपको परमेश्वर की उस बुद्धि पर भरोसा करना चाहिए, जिसे उसने पहले ही प्रकट कर दिया है।
- 5. व्यक्तिपरक दृष्टिकोण का लगातार पालन करना असम्भव है।
- 6. व्यक्तिपरक दृष्टिकोण ऐतिहासिक रूप से नया है।
- चर्चा एवं मनन:
- 2
- 1. पवित्र इच्छा: आप क्या करना चाहते हैं?
- 2. खुला द्वार: कौन से अवसर खुले हैं या बन्द हैं?
- 3. बुद्धिमानी से भरी सलाह: जो बुद्धिमान लोग आपको और परिस्थिति को अच्छी तरह जानते और समझते हैं, वे आपको क्या करने की सलाह देते हैं?
- 4. बाइबल आधारित ज्ञान: आपको क्या लगता है कि बाइबल से परिपूर्ण ज्ञान के आधार पर आपको क्या करना चाहिए?
- चर्चा एवं मनन:
- 3
- 1. चिन्ता न करें। परमेश्वर पर भरोसा रखें।
- 2. उदास न रहें। पवित्र और प्रसन्न रहें।
- 3. अड़ियल न बनें। अपनी योजनाओं में बदलाव करने के लिए तैयार रहें।
- 5. कायर न बनें। साहसी बनें।
- चर्चा एवं मनन: