#3 सम्बन्ध
परिचय
जीवन सम्बन्धों से मिलकर बनता है और सम्बन्ध जटिल होते हैं। इस बात को जितनी जल्दी समझ लें, उतना ही अच्छा है।
अमेरिका की अधिकतर पीढ़ियों में आपसी सम्बन्धों का महत्व कम होना एक प्रकार की सांस्कृतिक समस्या बन गई है। मुझे स्मरण नहीं है कि मैंने यह बात कब सुनी थी, परन्तु अब तो यह समस्या प्रत्येक स्थान में देखी जा सकती है: कई युवा, जो 20 वर्ष की आयु के आसपास हैं, वे काम-धन्धे के प्रति कमी होने की मानसिकता रखते हैं। हाई स्कूल और कॉलेज के समय, उनके कई सगे-सम्बन्धी होते थे। अधिकतर बच्चों के लिए मित्र ढूँढना कठिन नहीं होता है। परन्तु स्कूल के पश्चात् के वातावरण में आने वाले युवा पुरुष एवं महिलाओं के लिए जो बात सबसे कठिन होती है, वह है आजीविका की खोज करना। अभाव वाली मानसिकता कहती है कि पर्याप्त नौकरियाँ उपलब्ध नहीं हैं, इसलिए एक नौकरी पाना सर्वोच्च प्राथमिकता बन जाती है। परन्तु बड़े दुःख की बात यह है कि कई युवा, अच्छी नौकरी की खोज में अपने पुराने, गहरे सम्बन्धों को त्याग देते हैं और फिर वर्षों बाद उन्हें अनुभव होता है कि नौकरियाँ तो बहुत हैं, परन्तु अब अच्छे सगे-सम्बन्धी मिलना कठिन है।
इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि हमारे समाज में अकेलेपन की समस्या व्यापक रूप से फैली हुई है। यह बात हर कोई जानता है कि डिजिटल तकनीक के बढ़ते उपयोग के बावजूद, जो हमें पहले से कहीं अधिक ‘जुड़े हुए’ होने का दावा करती है, पश्चिमी देशों के लोग पहले इतने अकेले कभी नहीं थे। आनन्दमय जीवन के मूल तत्व को हमने महत्व देना छोड़ दिया है। इसलिए हमें अपनी सोच में परिवर्तन लाने की आवश्यकता है। क्योंकि जीवन सम्बन्धों पर ही टिका हुआ होता है।
सच्चाई तो यह है, कि अधिकाँश लोग इस बात को समझते हैं। सम्बन्ध ही तो जीवन का आधार हैं। हमारी मन पसन्द कहानियाँ, चाहे किताबें हों, फिल्में हों या गाने, सभी सम्बन्धों पर ही आधारित होते हैं। चाहे सम्बन्ध अच्छे हों, बिगड़े हों या टूटे हों (क्या आपने कभी कोई देशी गाना सुना है?), हम लोगों से नहीं, वरन् आपसी सम्बन्धों में बंधे हुए लोगों से आकर्षित होते हैं। यह बात हम अपने समाज में प्रसिद्ध व्यक्तियों के प्रति मोह में भी साफ देखते हैं। भले ही ऐसा लगता है कि हम उनकी प्रतिभा और उपलब्धियों के कारण उन्हें महत्व देते हैं, परन्तु वास्तव में इस सम्मान के पीछे उनका व्यक्तिगत जीवन और सम्बन्धों को जानने की उत्सुकता कार्य करती है। हम किसी व्यक्ति को उसके साथियों के माध्यम से जानते हैं, जो कि प्रसिद्ध व्यक्तियों के जीवन पर आधारित दूरदर्शन के कार्यक्रमों का उद्देश्य भी होता है, और साथ ही मनोरंजन समाचार पत्रों और किराने की दुकानों पर रखे समाचार पत्रों के शीर्षक भी इन्हीं से सम्बन्धित होते हैं। क्या ये मुख्य समाचार कभी किसी के कौशल के विषय में होते हैं? वे व्यक्तियों के आपसी सम्बन्धों के विषय में होते हैं, और नाटक जितना अधिक विचित्र होगा, उससे दृष्टि हटाना उतना ही कठिन होगा। हम जानते हैं कि किसी व्यक्ति का वास्तविक धन (या निर्धनता) उसके आस-पास के लोगों से उसके सम्बन्ध में होता है।
क्या मृत्यु के समय यही सबसे महत्वपूर्ण नहीं होता? हम चाहते हैं कि हमारी मृत्यु के पश्चात् कोई ऐसा व्यक्ति हो जो हमारी इतनी चिन्ता करे कि हमारे मरने के पश्चात् हमारी मृत्यु का शोक सन्देश लिख सके। जैसे शव वाहन बड़ी-बड़ी गाड़ियों या ट्रकों को नहीं खींचते, वैसे ही यह एक भद्दी (पर सच्ची) कहावत बन गई है कि अपने अन्तिम क्षणों में किसी ने भी ऐसा नहीं चाहा था, अर्थात् यह एक सामान्य बात है जो कार्य से अधिक सम्बन्धों और व्यक्तिगत अनुभवों को महत्व देने की आवश्यकता को दर्शाती है। जीवन के अन्तिम क्षणों में यदि हम भाग्यशाली रहे, तो मुझे लगता है कि हमारे दिमाग में उन लोगों के चेहरे और नाम होंगे, जिनसे हमारा सबसे घनिष्ठ सम्बन्ध रहा होगा, जिनके साथ हम और अधिक समय बिताना चाहते थे, और उनसे प्रेम करना चाहते थे। सम्बन्धों के महत्व को बढ़ा-चढ़ाकर बताना लगभग असम्भव सा लगता है।
क्या यही तो बात नहीं है उस प्रसिद्ध फ़िल्म की? यह जीवन अद्भुत है। अन्तिम दृश्य में, पड़ोसियों से भरे घर में, जहाँ हर कोई जॉर्ज की सहायता करने के लिए हाथ बढ़ा रहा होता है, और उसका भाई हैरी अचानक से वहाँ पहुँचता है, जिससे भीड़ अचम्भित हो जाती है। सन्नाटा छा गया और हैरी ने गिलास उठाकर कहा, “मेरे बड़े भाई जॉर्ज, शहर के सबसे धनी व्यक्ति के लिए!” जयकारे गूँज उठते हैं, और जॉर्ज स्वर्गदूत क्लेरेंस द्वारा छोड़ी गई टॉम सॉयर की एक प्रति उठाता है। दृश्य को बड़ा करके हम क्लेरेंस द्वारा जॉर्ज को लिखे गए सन्देश को पढ़ सकते हैं: इस बात को स्मरण रखना चाहिए कि जिसके पास सच्चे मित्र होते हैं, वे कभी असफल नहीं होते हैं! हाँ, फिल्म में स्वर्गदूतों की व्याख्या भले ही गलत हो, परन्तु मित्रता का सन्देश अत्यधिक सटीक और हृदय को छू लेने वाला है। जीवन सम्बन्धों से ही चलता है।
पर साथ ही, सम्बन्धों को आदर्शवादी होने के रूप में न देखें, क्योंकि ये जटिल भी हो सकते हैं। हमारे जीवन की कहानियों में सबसे बड़ी पीड़ा और अधिकाँश उलझनें, सम्बन्धों से ही जुड़ी हुई होती हैं। परिणामस्वरूप, हम दूसरों को ठेस पहुँचाते हैं और स्वयं भी दुखी होते हैं, विश्वास को नष्ट कर देते हैं और सन्देह उत्पन्न करते हैं। सम्बन्ध अधिकतर हमारे लिए सबसे बड़ी आशीष होती हैं परन्तु जब वे टूट जाते हैं तो वही सम्बन्ध हमारे लिए अभिशाप बन जाते हैं। सम्बन्धों को निभाना कठिन तो होता ही है।
इस क्षेत्रीय मार्गदर्शिका का उद्देश्य सामान्य रूप से सम्बन्धों के विषय में अधिक वास्तविक दृष्टिकोण प्रदान करना है, जो हमें यह समझने में सहायता करता है कि सम्बन्ध कैसे निभाए जाएँ।
ऑडियो मार्गदर्शिका
ऑडियो#3 सम्बन्ध
भाग I: सम्बन्धों की तीन श्रेणियाँ
जब आप सम्बन्धों के विषय में सोचते हैं, तो मेरा अनुमान है कि आप शीघ्र ही दूसरे लोगों के साथ समान स्तर वाले सम्बन्धों के विषय में सोचते हैं। यहीं से हमारी बहुत सी आशीषें और दुःख-दर्द सामने आते हैं। परन्तु समान स्तर वाले सम्बन्ध वास्तव में सम्बन्धों की एक तीसरी श्रेणी है, जो पहले की दो श्रेणियों से बनती है। इसे हम ऊपर से नीचे औरआन्तरिक कह सकते हैं। हमारे सम्बन्ध, सबसे पहले, परमेश्वर के साथ हमारे सम्बन्ध (ऊपर से नीचे) और फिर, स्वयं के साथ हमारे सम्बन्ध (आन्तरिक) से प्रभावित होते हैं। इन दोनों सम्बन्धों से ही वास्तविकता का आरम्भ होता है। अधिकाँश हमारे बराबर के सम्बन्धों में आने वाली समस्याएँ परमेश्वर और अपने आप से हमारे विकृत सम्बन्धों से उत्पन्न होती हैं। अतः अपने समान स्तर के सम्बन्धों के विषय में विस्तार से जानने से पहले, हमें यहीं से आरम्भ करना होगा।
ऊपर से नीचे वाले — परमेश्वर से हमारा सम्बन्ध
परमेश्वर के साथ हमारे सम्बन्ध की मूलभूत सच्चाई यह है कि हम उसके द्वारा और उसके लिए बनाए गए हैं। सच तो यह है कि अस्तित्व में विद्यमान प्रत्येक वस्तु के लिए भी यही बात लागू होती है। हर वस्तु का अस्तित्व परमेश्वर के ही कारण है और अंततः उसके उद्देश्यों को पूरा करने के लिए ही है। इस दृष्टि से, सम्पूर्ण सृष्टि को परस्पर सम्बन्धित माना जा सकता है, जो सृष्टिकर्ता परमेश्वर से जुड़ी हुई है, जो स्वयं पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा के रूप में अपने अस्तित्व में परस्पर सम्बन्ध से जुड़ा हुआ है। और यदि सम्पूर्ण सृष्टि एक-दूसरे से सम्बन्ध रखती है, तो यह बात निश्चित रूप से प्रत्येक मनुष्य के लिए सत्य है, जिसका अर्थ है कि प्रत्येक मनुष्य का परमेश्वर के साथ सम्बन्ध है। मनुष्य होने का यही अर्थ है। हम परमेश्वर की रचना हैं। और यही हमारी पहचान का आधार है, और यही हमारा सबसे महत्वपूर्ण सम्बन्ध है।
परन्तु हमें शीघ्र ही इस कठोर सच्चाई का सामना करना पड़ता है कि हमारे पापों के कारण प्रत्येक मनुष्य का परमेश्वर से सम्बन्ध टूट गया है। हमारे पूर्वजों के पतन से पीड़ित होकर, और उनके विद्रोह का अनुकरण करते हुए, अपने-अपने पापों से, हमने अपनी सृष्टि को तुच्छ समझा है और स्वयं ही अपना ईश्वर बनना चाहा है। अब परमेश्वर के साथ हमारे सम्बन्ध के विषय में मुख्य प्रश्न यह है कि क्या यह सम्बन्ध टूटा हुआ है या फिर पुनः स्थापित हो गया है। क्या परमेश्वर के विरुद्ध हमारे पाप अभी भी हमें उससे अलग किए हुए हैं, या क्या हम उसके साथ मेल-मिलाप कर चुके हैं?
यदि हम इसे अनदेखा करते हैं, तो सम्बन्धों में दरार बनी रहती है। यह निश्चित रूप से बहुत से लोगों के लिए एक सामान्य तरीका है। ऐसा लगता है कि परमेश्वर के साथ अपने टूटे हुए सम्बन्ध को सुधरने का सबसे सरल तरीका यही है कि हम यह दिखावा करें कि परमेश्वर का कोई अस्तित्व ही नहीं है। बाइबल कहती है कि नास्तिकता मूर्खता है (भजन संहिता 14:1 देखें), परन्तु साथ ही यह भी कहा जा सकता है कि यह एक बचाव तंत्र है। इसे “केवल मानवतावाद” अर्थात् दार्शनिक दृष्टिकोण भी कहा जाता है, जिसमें मनुष्य स्वयं से बाहर किसी भी वास्तविकता को अस्वीकार करते हुए, स्वयं ही आत्मिकता का निर्माण करता है। परमेश्वर को अस्वीकार करने के लिए परमेश्वर के प्रत्येक विचार को, या कम से कम उन विचारों को मिटा देना आवश्यक है जो हमारी स्वतंत्रता तथा सम्प्रभुता का उल्लंघन कर सकते हैं। यह व्यावहारिक स्तर पर परमेश्वर पर अविश्वास है। यह हमारे ऊपर से नीचे वाले टूटे सम्बन्धों के कष्ट को अनदेखा करने और भूल जाने का प्रयास है, इसे हमारे दैनिक जीवन से दूर छिपा दिया गया है। परन्तु यह एडगर एलन पो की भयानक कहानी के धड़कते हृदय के समान हमारे अपराध की पुकार और अधिक तीव्र होती जा रही होती है, जैसे-जैसे हम उसे दबाने का अधिक से अधिक प्रयास करते हैं, तो वह सामान्य बात होती हुई दिखाई देती है। इस बात को जानबूझकर अनदेखा करना ही सम्बन्धों में टूटेपन को बनाए रखने का एक तरीका है।
परमेश्वर के साथ हमारे टूटे हुए सम्बन्ध का एक कारण यह है कि हम स्वयं को ही समस्या का समाधान समझने लगते हैं। यह वह समय है जब हम टूटे हुए सम्बन्धों को पहचानते हैं परन्तु सोचते हैं कि समस्या का समाधान करना हमारे ही ऊपर निर्भर है। हम यह मान लेते हैं कि परमेश्वर और हमारे बीच की खाई तभी मिटेगी जब हम पापी और अपराधी उसकी ओर फिरेंगे, तथा आशा करेंगे कि हम अपनी धार्मिकता और अच्छे कार्यों से उसे प्रभावित कर लेंगे। क्योंकि हम समझते हैं कि सम्भवतः ऐसा करके हम उसका अनुग्रह प्राप्त कर लेंगे और हर एक परिस्थिति ठीक हो जाएगी।
सत्रहवीं सदी के लेखक और पास्टर जॉन बन्यन ने समझ लिया था कि यह कितना व्यर्थ है। जब उन्हें पहली बार अपने पाप का अनुभव हुआ, तो जीवनी लेखक फेथ कुक के अनुसार, “वे बड़ी कलीसियाओं के मोहजाल तथा उनके रीति-रिवाजों के जाल में फँस गए थे।”1 अपनी आत्मकथा में वे बताते हैं कि वे अन्धविश्वास से घिरे हुए थे और स्वयं को निखारने के लिए कई प्रकार के कार्यों में लगे हुए थे। और उन्होंने स्वीकार किया कि कुछ समय तक तो उनका प्रदर्शन अच्छा रहा, यहाँ तक कि उन्होंने दस आज्ञाओं का भी पूरी विश्वासयोग्यता से पालन किया और अपने पड़ोसियों से आदर भी पाया, जब तक कि उन्हें यह अनुभव नहीं हुआ कि यह इच्छानुसार परिणाम नहीं दे सकता है — अर्थात् कुछ-कुछ उस टिकाऊ कपड़े से बना चिपकने वाले फीते के समान जिसे मैं अपने बर्तन धोने के स्थान पर बार-बार लगाता रहता हूँ। लेखक बन्यन, अपने सारे प्रयासों और अपनी “धार्मिकता” पर गर्व होने के पश्चात् भी, अपनी अन्तरात्मा को सन्तुष्ट नहीं कर सके। उन्हें ऐसा लगा कि वह परमेश्वर के लिए कभी भी पर्याप्त कार्य नहीं कर सकते हैं, इसलिए कुछ ही समय में बन्यन ने स्वयं को पहले से भी अधिक निराशा में पाया। परमेश्वर से टूटे हुए सम्बन्ध के कारण सभी पापियों को एक प्रकार की निराशा का अनुभव होता है, परन्तु एक और प्रकार की निराशा उन पापियों को घेरे रहती है जो इस टूटेपन को पहचानकर उसे स्वयं ही सुधारने का प्रयास करते हैं। मुख्य रूप से सम्बन्धों में टूटा पन हमारी असफलता से और भी अधिक बढ़ जाता है — जब हम उसका समाधान नहीं पाते हैं। इसलिए वह टूटा पन तो बना रहता है, परन्तु और भी अधिक गहरा हो जाता है — चाहे वह एक बेचारा नैतिकता वादी हो या एक बेचारा नास्तिक। यही कहानी बन्यन की थी। और मेरी भी है।
हम परमेश्वर के साथ अपने सम्बन्ध को कैसे पुनः स्थापित करते हैं?
परमेश्वर स्वयं हमारे बीच की दूरी मिटाने का कार्य करता है।
कल्पना करें कि परमेश्वर बहुत ऊँचे पर विराजमान है, अर्थात् स्वर्ग से भी ऊपर, और हम यहाँ पृथ्वी पर हैं। हमारे बीच एक बहुत बड़ी दूरी है, यह एक ऐसी खाई है जो भौतिकता और नैतिकता दोनों प्रकार से है जो हमारी और इस संसार की सारी बुराइयों को दर्शाती है। यह दूरी केवल हमारी बुराइयों का परिणाम नहीं है, परन्तु यह सदैव बना रहने वाला अन्तर है जो हमें स्मरण कराता है कि ऐसा अन्तर होना आवश्यक है। हम उसके योग्य नहीं हैं। मनुष्य चाहे जितना भी प्रयास कर ले, उस अन्तर को भरने का या उसके योग्य होने का, परन्तु वह कभी सफल नहीं होता है। हम इस प्रयास को “धार्मिकता” कहते हैं। हम परमेश्वर तक पहुँचने के लिए प्रतीकात्मक सीढ़ी पर चढ़ने के प्रयास में स्वयं को मृत्यु के मुँह में झोंक देते हैं, परन्तु हम वहाँ तक नहीं पहुँच पाते हैं। इसलिए परमेश्वर स्वयं यहाँ पृथ्वी पर आया। हम परमेश्वर तक पहुँचने के लिए स्वयं को इतना योग्य नहीं बना सकते हैं, इसलिए परमेश्वर ने स्वयं को इतना दीन और नम्र किया कि वह हमारे पास आ गया। यही बात यीशु मसीह के सुसमाचार को इतना उत्तम बनाती है।
परमेश्वर पिता ने अपने पुत्र को इस संसार में भेजा ताकि वह हमारे समान मनुष्य बन जाए, हमारे लिए सच्चा मनुष्य बने, और हमारे स्थान पर अर्थात् अधर्मियों के स्थान पर धर्मी मरे। उसने ऐसा करके हमें परमेश्वर के समीप लाना चाह (देखें 1 पतरस 3:18)। यीशु हमारे पापों से हमें छुटकारा दिलाने के लिए देहधारी हुआ, और परमेश्वर के अनुग्रह को हमारे लिए साकार किया, और उस भयानक खाई के कारण को स्वयं ही अपने ऊपर पर ले लिया। वह सीधे परमेश्वर के साथ हमारे टूटे हुए सम्बन्ध की जड़ तक पहुँचा, तथा हमारी सबसे बड़ी आवश्यकता को पूरा किया, वह भी बड़ा भारी का मूल्य चुकाकर, यह सब उसने अपने महान प्रेम के कारण किया। इसलिए यीशु मसीह के सुसमाचार के द्वारा परमेश्वर से हमारा सम्बन्ध फिर से जुड़ जाता है। इस प्रकार परमेश्वर हमारा पिता बन जाता है, और हम उसकी सन्तान बन जाते हैं, और अब से लेकर सदा-सर्वदा तक हम उसकी संगति में रहेंगे।
बाइबल स्पष्ट रूप से बताती है कि पापियों के लिए यीशु की मृत्यु से परमेश्वर पापियों के प्रति अपने प्रेम को प्रदर्शित करता है (देखें रोमियों 5:8)। यीशु हमारे स्थान पर इसलिये नहीं मरा कि परमेश्वर हमसे प्रेम करे; परन्तु वह हमारे स्थान पर इसलिये मरा क्योंकि परमेश्वर हमसे प्रेम करता है। उसने हम से जगत की उत्पत्ति से पहले ही प्रेम किया। (देखें इफिसियों 1:4) परमेश्वर के साथ हमारे सम्बन्ध में यह सबसे महत्वपूर्ण सत्य स्मरण रखें: वह हमसे निरन्तर प्रेम करता है, जबकि हम उस प्रेम के योग्य नहीं हैं, और कभी हो भी नहीं सकते हैं। इसलिए, हमें इसके लिए प्रयास नहीं करना चाहिए। मेरे कहने का अभिप्राय है कि हमें प्रयास ही नहीं करना चाहिए।
अभी कुछ समय पहले मेरी भेंट एक तीर्थयात्री से हुई, जिसने मुझसे उसी प्रकार बात की, जैसे तीर्थयात्री पास्टर से बात करते हैं। उन्होंने मुझे अपने संघर्षों और परमेश्वर के प्रेम के प्रति उत्पन्न होने वाले सन्देह के विषय में बताया, और सहजता से कहा कि वह परमेश्वर का प्रेम पाने का प्रयास नहीं करना चाहता है। मैंने उसे बीच में टोका, इसलिए नहीं कि मैं असभ्य होना चाहता था (वैसे शुभ सन्देश के लिए समय-समय पर थोड़ी-बहुत असभ्यता क्षमा योग्य होती है), वरन् इसलिए कि उसके लिए यह जानना आवश्यक था कि यह कोई विकल्प नहीं था। मैंने उससे कहा कि उसे परमेश्वर का प्रेम पाने का प्रयास नहीं करना चाहिए, भला होता, कि कोई मुझे भी वर्षों पहले यह बात बता देता। परमेश्वर का प्रेम अद्भुत है जिसे हम विनम्रता और आनन्द के साथ प्राप्त करते हैं। यही बात लेखन बन्यन के लिए अन्तर उत्पन्न करती है।
एक दिन परमेश्वर के वचन का नियमित प्रचार सुनते हुए, जो कि एक साधारण से पास्टर के द्वारा साधारण सा प्रचार था, उस प्रचार को सुनकर, लेखक बन्यन का हृदय परमेश्वर के प्रेम की वास्तविकता से भर गया। वह समझ गए थे कि परमेश्वर उनके द्वारा पाप होने के पश्चात् भी उनसे प्रेम करता है, और कोई भी उसे इस प्रेम से अलग नहीं कर सकता है (देखें, रोमियों 8:35-39)। लेखक बन्यन ने स्वयं बताया कि वह इतने आनन्द से भर गए थे कि वह खेतों में कौओं के झुण्ड को भी परमेश्वर के प्रेम के विषय में बताना चाहते थे। लेखक बन्यन को धन का भण्डार मिल गया था, और वही भण्डार हमारे लिए भी उपलब्ध है, जिसे छिपाना कठिन है, यदि इस सम्बन्ध में हम सचेत हो जाते हैं, तो यह भण्डार हमारे लिए भी है।
हमारे प्रति परमेश्वर के प्रेम के कारण, यीशु ने परमेश्वर के साथ हमारे सम्बन्ध को पुनःस्थापित करने के लिए मृत्यु सही, और फिर मृतकों में से जी उठा। सुसमाचार में प्रकट ईश्वरीय प्रेम का ज्ञान, सम्बन्धों से जुड़ी सभी बातों की कुंजी है। हम यहीं से भिन्न-भिन्न स्तर के सम्बन्ध से आरम्भ करते हैं, और इसका परिवर्तनकारी महत्व सदैव हमारे साथ बना रहता है।
आन्तरिक — स्वयं के साथ हमारा सम्बन्ध
यह देखना कठिन नहीं है कि परमेश्वर के साथ हमारा सम्बन्ध (ऊपर से नीचे) दूसरों के साथ हमारे सम्बन्ध को कैसे प्रभावित कर सकता है (समान स्तर)। जब उससे सबसे बड़ी आज्ञा के विषय में पूछा गया, तो यीशु ने उत्तर दिया,
“तू परमेश्वर अपने प्रभु से अपने सारे मन और अपने सारे प्राण और अपनी सारी बुद्धि के साथ प्रेम रख। बड़ी और मुख्य आज्ञा तो यही है। और उसी के समान यह दूसरी भी है, कि तू अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रख। ये ही दो आज्ञाएँ सारी व्यवस्था एवं भविष्यद्वक्ताओं का आधार है।” (मत्ती 22:37-40)
समान स्तर और ऊपर से नीचे वाले सम्बन्धों को एक साथ रखा जाना चाहिए, जैसा कि यीशु ने स्पष्ट किया है, परन्तु एक और श्रेणी है जिसे हमें स्वीकार करने की आवश्यकता है: अर्थात् स्वयं के साथ हमारा सम्बन्ध।
इस “सम्बन्ध” को दूसरे ढँग से कहें, तो इसे हम स्वयं की समझ कह सकते हैं। यह वह विधि होती है जिससे हम अपनी कहानियों की व्याख्या करते हैं और यह स्वीकार करते हैं कि हम कौन हैं। शिष्यत्व के लिए यह इतना स्वाभाविक है कि मुझे लगता है कि नया नियम इसे आसानी से मान लेता है। पौलुस के पत्रों में आत्मकथा के कुछ हिस्सों पर विचार करें:
– “कि मैं परमेश्वर की कलीसिया को बहुत ही सताता और नाश करता था।” (गलातियों 1:13)
– “इब्रानियों का इब्रानी हूँ; व्यवस्था के विषय में यदि कहो तो फरीसी हूँ।” (फिलिप्पियों 3:5)
– “मैंने उन सब से बढ़कर परिश्रम किया…” (1 कुरिन्थियों 15:10)।
– “मसीह यीशु पापियों का उद्धार करने के लिये जगत में आया, जिनमें सबसे बड़ा मैं हूँ” (1 तीमुथियुस 1:15)।
–“परमेश्वर ने उस [इपफ्रुदीतुस] पर दया की है, और केवल उस पर ही नहीं, वरन् मुझ पर भी; ऐसा न हो कि मुझे शोक पर शोक हो” (फिलिप्पियों 2:27)।
– “मैंने इसके विषय में प्रभु से तीन बार विनती की, कि मुझसे दूर हो जाए” (2 कुरिन्थियों 12:8)।
– “मैं मसीह के साथ क्रूस पर चढ़ाया गया हूँ। और अब मैं जीवित न रहा…” (गलातियों 2:20)।
पौलुस एक ऐसा व्यक्ति था जो स्वयं बहुत अधिक स्पष्ट था, यह बात रिचर्ड प्लास और जेम्स कॉफ़ील्ड के द्वारा उनकी पुस्तक, द रिलेशनल सोल में उपयोग किए गए एक वाक्य में मिलती है।2 हम सबकी अपनी-अपनी बनावट है, जो हमारे जीवन के अनेक पहलुओं (बीते अनुभव, भावनाएँ और उनकी समझ) से प्रभावित होती है। प्लास और कोफील्ड कहते हैं कि इन तत्वों का सम्मिश्रण ही हमारी आत्म-समझ, या “आत्म-स्पष्टता” का निर्माण करता है, और यह इस बात पर सबसे गहरा प्रभाव डालता है कि हम सामान्य रूप से सम्बन्ध कैसे बनाए रखते हैं, चाहे वह परमेश्वर के साथ हो या दूसरों के साथ।
एक ही घटना के प्रति दस लोगों की प्रतिक्रिया अलग-अलग हो सकती है, और यह समझना आवश्यक है कि हमारी प्रतिक्रिया का कारण क्या होता है। वास्तव में, प्लास और कोफील्ड, जिन्होंने मसीहियों को उनके गलत निर्णयों के बुरे परिणामों से उबरने में सहायता करने के अपने मिले-जुले अनुभव के साथ यह चौंकाने वाला निष्कर्ष निकाला है कि, “हमारी सेवकाई के इतने वर्षों में हमने ऐसा एक भी व्यक्ति नहीं देखा जिसके सम्बन्ध सैद्धान्तिक सच्चाई की कमी के कारण बिगड़े हों।”3 दूसरे शब्दों में, किसी के ऊपर से नीचे वाले सम्बन्ध में कुछ बातें स्वीकार करने योग्य या सत्य प्रतीत होती हैं, परन्तु फिर भी कुछ अनिश्चितता बनी रहती है। संक्षेप में, अंगीकृत ईश्वर विज्ञान का यह सिद्धान्त और व्यवहार के बीच सम्भावित अन्तर को उजागर करता है।4 “परन्तु”, प्लास और कोफ़ील्ड आगे कहते हैं,
कई बार देखा गया है कि स्वयं को समझने में कमी के कारण सेवकाईयों का पतन, विवाहों में दरार, बच्चों से दूरी, मित्रता का टूटना और सहकर्मियों के बीच झगड़े होते हैं। हमारी आत्मा में क्या चल रहा है, यह न जानने से जो अन्धापन उत्पन्न होता है, वह वास्तव में विनाशकारी होता है। आत्म-स्पष्टता कोई खेल या मनोरंजन नहीं है। यह कोई आत्म-सहायता का कार्यक्रम भी नहीं है। वरन् यह हमारे हृदय की एक यात्रा है, जिसमें हम यह देखना चाहते हैं कि हमारे सम्बन्धों में कौन से उद्देश्य और गतिविधियाँ पूरी हो रही हैं।5
दूसरों के साथ, और यहाँ तक कि परमेश्वर के साथ भी अर्थपूर्ण सम्बन्ध बनाने के लिए आवश्यक है कि हम अपने जीवन-कथा का उत्तरदायित्व स्वयं अपने ऊपर लें। प्यूरीटन जॉन ओवेन ने कहा था, “पाप को मारो, नहीं तो पाप तुम्हें मार डालेगा।” प्लास और कोफील्ड इस पर यह जोड़ देते हैं कि, “अपनी कहानी को स्वीकार करो, नहीं तो तुम्हारी कहानी — जो छिपे हुए अर्थों और अचेतन स्मृतियों से भरी है — तुम्हें नियंत्रित करने लगेगी।”6
निस्संदेह, हम सब की कहानियों में कहीं न कहीं दुःख-दर्द का एक स्तर होता है। दुःख हमारे पतित संसार की एक दुखद और क्रोधित करने वाली वास्तविकता है। परन्तु चाहे कष्ट कितना भी गहरा क्यों न हो, अन्तिम निर्णय उस कष्ट का नहीं होगा।
यीशु के पुनरुत्थान से यह बात साफ हो जाती है।
जैसा कि लेखक फ्रेड ब्यूचनर ने कहा है कि, यीशु मसीह का मृतकों में से जी उठने का अर्थ है कि सबसे भयानक घटना सदैव अन्तिम नहीं होती है, यह हमारे अपने जीवन के लिए भी सत्य है। परमेश्वर के भले उद्देश्य सदैव बने रहेंगे, और वे सदैव उस क्षण में आगे बढ़ते हैं जिसमें हम स्वयं को पाते हैं या जिसे हम स्मरण करते हैं। मैं अपने आप को कोसता हूँ कि मैं इस बात को और अधिक गहराई से कहने का कोई दूसरा ढँग नहीं जानता हूँ, परन्तु यह अगला वाक्य मेरी पूरी भावना को व्यक्त करता है, अर्थात् जितना मनुष्य कर सकता है उतना ही सत्य है। यद्यपि आपका दुख वास्तविक है और उसने आप पर प्रभाव डाला है, परन्तु यह आपको परिभाषित नहीं करता है, क्योंकि यीशु के जीवन में आपको एक नया जीवन मिला है।
पोलुस का यही तात्पर्य है जब वह कहता है कि “क्योंकि न खतना, और न खतनारहित कुछ है, परन्तु नई सृष्टि महत्वपूर्ण है।” (गलातियों 6:15) और “इसलिए यदि कोई मसीह में है तो वह नई सृष्टि है: पुरानी बातें बीत गई हैं; देखो, वे सब नई हो गईं।” (2 कुरिन्थियों 5:17) मसीह में आप नई सृष्टि हो, यद्यपि अतीत के अनुभव कुछ छाप छोड़ सकते हैं, परन्तु वर्तमान क्षण और अन्तिम परिणाम ही वास्तविक रूप से मायने रखते हैं। हम सब मसीह में नई सृष्टि हैं, और हम सभी में भिन्न-भिन्न प्रकार की प्रवृत्तियाँ हैं। हम चाहे जो भी हों, चाहे वह हमारे व्यक्तित्व और परिवेश का मिलाजुला रूप क्यों न हो, चाहे हमने अतीत में पाप किए हों या किसी के विरुद्ध पा किया हो, हम सब भिन्न-भिन्न मनुष्य हैं और परमेश्वर हम सब से अर्थात् प्रत्येक मनुष्य से प्रेम करता है।
मैंने अपनी कलीसिया से कहा कि जब परमेश्वर हमें बचाता है, तो वह हम पर “बचाया गया होने” का ठप्पा नहीं लगाता और न ही हमें किसी अज्ञात झुण्ड में फेंकता है, परन्तु वह हमें हमारे विशेष प्रकार के दुखों को दूर करते हुए, अपने विशेष अनुग्रह के द्वारा बचाता है। इस प्रकार हम परमेश्वर के लोगों का हिस्सा बन जाते हैं — हम उसके परिवार में प्रवेश करते हैं — परन्तु वह अभी भी हमारे नाम और हमारे मनों को जानता है, क्योंकि यदि ऐसा नहीं होता तो यीशु ने हमें यह नहीं बताया होता कि परमेश्वर जानता है कि हमारे सिर के बाल भी गिने हुए हैं (देखें लूका 12:7)। वास्तव में, जैसा कि पास्टर डेन ऑर्टलंड बताते हैं कि, अपने विषय में जो बातें हमें सबसे अधिक अप्रिय लगती हैं, उन्हीं पर परमेश्वर का अनुग्रह बहुतायत से होता है। 7 हमारी आत्म-स्पष्टता के वे क्षेत्र जिनसे हम सबसे अधिक क्रोधित होते हैं, ये वह क्षेत्र होते हैं जो यीशु को सबसे अधिक आकर्षित करते हैं।
मैंने सुना है कि हम अपने विषय में जो कुछ भी जानते हैं, तथा परमेश्वर के विषय में भी हम जो कुछ जानते हैं, उसे उसके प्रति समर्पित कर सकते हैं। और तब अपने और परमेश्वर, दोनों के विषय में गहरा ज्ञान प्राप्त करने से समर्पण और गहरा हो जाता है। हम यह जानने के लिए और अधिक सीखते हैं कि हम कौन हैं ताकि हम परमेश्वर के प्रेम की वास्तविकता को अपना सकें। परमेश्वर हम से प्रेम करता है। और यही अन्तिम आकलन में हमारी पहचान होती है। हमारी अपनी पहचान बनाने वाली अन्य सभी बातों से बढ़कर, हमें यीशु के बपतिस्मे के समय परमेश्वर के द्वारा कहे गए वचन सुनने चाहिए, जो अब उसके साथ हमारी एकता के द्वारा हम पर लागू होते हैं, “यह मेरा प्रिय पुत्र है, जिससे मैं अत्यन्त प्रसन्न हूँ।” (मत्ती 3:17)
यहाँ तक कि मैं भी? सम्भवतः आप सोच रहे होंगे। यहाँ तक कि आप भी। आप और मैं दोनों। मुझे यह कहना ही होगा। क्योंकि यही वह स्थान है जहाँ आत्म-स्पष्टता हमें ले जाती है, भले ही मार्ग अलग-अलग हों। दूसरों के साथ सार्थक सम्बन्ध बनाने के लिए यह आन्तिरक सम्बन्ध बहुत महत्वपूर्ण है।
समान स्तर वाले — दूसरों के साथ हमारे सम्बन्ध
जब परमेश्वर के प्रेम की सच्चाई हमारे हृदय में इस प्रकार से भर जाती है कि हम भी लेखक बन्यन के समान कौवों के झुण्ड को सुसमाचार प्रचार करने के लिए आतुर हो जाते हैं, तब धार्मिकता के मार्ग में शेष सब वस्तुएँ फीकी पड़ जाती हैं। यह भजनकार ही था जिसने परमेश्वर से कहा कि, “स्वर्ग में मेरा और कौन है? तेरे संग रहते हुए मैं पृथ्वी पर और कुछ नहीं चाहता।” (भजन संहिता 73:25)
कुछ नहीं।
इस प्रकार की बातचीत पृथ्वी पर स्वर्ग का स्वाद चखने के समान है, और मैं भी कुछ ऐसा ही चाहता हूँ — क्या आप नहीं चाहते हैं? परन्तु क्या इस स्तर पर पहुँचकर हमें दूसरों के साथ सम्बन्ध रखने की आवश्यकता नहीं होती है? क्या हम परमेश्वर के प्रेम में इतने डूब सकते हैं कि हम एकान्त जीवन जीना पसन्द करने लगेंगे, इस भटकाव भरे संसार और इस संसार के मूर्ख लोगों के पागलपन से दूर, किसी तालाब के किनारे एक झोपड़ी में एकान्त जीवन बिताना अच्छा लगेगा, जब तक कि हम उस “उत्तम” स्थान पर नहीं पहुँच जाते हैं? क्या यह अच्छा जीवन जीने का “मैं और परमेश्वर” वाला तरीका सही है?
बिल्कुल नहीं। परन्तु यदि मैं सच कहूँ, तो जब मुझे किसी सगे सम्बन्धी की बहुत आवश्यकता होती है — जब मुझे किसी समान स्तर वाले सगे सम्बन्धी से सच में सहायता मिल सकती है, जैसे कि मेरी पत्नी का प्रेम या किसी मित्र का साथ — तो मैं अधिकतर इस बात के लिए स्वयं को दोषी ठहरता हूँ कि मैं परमेश्वर के प्रेम पर अपने लिए अधिक भरोसा क्यों नहीं रखता हूँ। यदि मुझे सच में पता होता कि परमेश्वर मुझ से प्रेम करता है, तो मुझे किसी और वस्तु की आवश्यकता नहीं होती, यह बात मैं अपने आप से कह सकता हूँ।
यह सही तो लगता है, परन्तु यह वास्तविकता नहीं है – कम से कम अभी तक तो नहीं।
बहुत से लोगों ने रेनहोल्ड नीबहर की “शान्ति प्रार्थना” को अपनाया है, परन्तु बहुत कम लोग ही उस पंक्ति को स्मरण करते हैं जब वह परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं कि वह उसे, यीशु के समान इस पापी संसार को वैसा ही स्वीकार करने में सहायता करे
जैसा वह है,
न कि जैसा मैं चाहता हूँ।
यह संसार जैसा भी है, या हम जैसे भी मनुष्य हैं, चाहे हम बहुत अधिक पापी हों या बहुत ही सीधे-सादे हों, परन्तु हमें दूसरों की आवश्यकता होती है। लोगों को लोगों की आवश्यकता होती है।
परामर्शदाता एड वेल्च ने अपनी पुस्तक ‘साइड बाय साइड’ में लिखा है कि सभी को सहायता की आवश्यकता होती है और सभी सहायता कर सकते हैं।8 हम सब सहायता लेने वाले और देने वाले दोनों हैं। प्रेरित पौलुस भी उस समय यही बात कहता है जब वह पूरी कलीसिया को आज्ञा देता है कि, “तुम एक दूसरे के भार उठाओ, और इस प्रकार मसीह की व्यवस्था को पूरी करो।” (गलातियों 6:2) जो बोझ उठाते हैं और जो एक-दूसरे का साथ देते हैं, वे एक ही हैं। हम सब एक हैं। हम लेते भी हैं और देते भी हैं, यही तो मानवता का हिस्सा है। इसीलिए जीवन सम्बन्धों से मिलकर बनता है।
परन्तु हमारे समान स्तर वाले सम्बन्धों में एक विशाल संसार समाया हुआ है जिसे समझना हमारे लिए कठिन होता है। यदि समान स्तर वाले सम्बन्ध एक श्रेणी है, तो उसके अन्तर्गत उप-श्रेणियाँ भी हैं। और पुस्तकों की दुकानों में इन उप-श्रेणीयों के लिए अलग-अलग स्थान निर्धारित होते हैं। कल्पना कीजिए कि विवाह के विषय पर कितनी पुस्तकें लिखी गई होंगी, और उनमें कितनी स्याही का उपयोग हुआ होगा? माता-पिता बनने का विषय इतना व्यापक है कि इसकी अपनी उप-श्रेणियाँ और विषय-वस्तुएँ हो सकती हैं, जैसे कि स्मार्टफोन के युग में किशोर बहनों का पालन-पोषण कैसे करें, जबकि एक बहन लगातार अपेक्षाओं से बढ़कर प्रदर्शन करती है, और अधिकतर अपने लिए बहुत ऊँचे लक्ष्य निर्धारित करती है, वहीं दूसरी ओर, दूसरी बहन असंगठित है जिसे किसी भी बात की चिन्ता नहीं है और वस्तुओं से लगाव होने के साथ-साथ उसे संचय करने जैसी गम्भीर समस्या है। इस विषय पर कहीं न कहीं कोई पुस्तक अवश्य होगी।
तो फिर हम सामान्य रूप से समान स्तर वाले सम्बन्धों के विषय में क्या समझ सकते हैं जो विशेष रूप से समान स्तर वाले सम्बन्धों पर ही लागू होता है?
आगे बढ़ने का यही उद्देश्य होता है। मैं समान स्तर वाले सम्बन्धों के विषय में व्यापक रूप से सोचने का एक उपाय प्रस्तुत करना चाहता हूँ।
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चर्चा एवं मनन:
- परमेश्वर के साथ हमारा सीधा सम्बन्ध हमारे जीवन के अन्य सभी सम्बन्धों को क्यों प्रभावित करता है?
- एक मसीही व्यक्ति होने के रूप में आपकी प्रगति में आत्म-स्पष्टता क्यों महत्वपूर्ण है?
- क्या आपके आन्तरिक सम्बन्ध के कुछ ऐसे पहलू हैं जिन्हें मसीह में आपके लिए परमेश्वर के प्रेम के प्रकाश में फिर से खोजने और समझने की आवश्यकता है?
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भाग II: सम्बन्धपरक बुलाहट और प्रकार
चलिए थोड़ी देर के लिए अपना दृष्टिकोण बड़ा करते हुए बुलाहट और प्रकार के विषय में सोचते हैं। सम्बन्धों में हमारी एक बुलाहट होती है, जो यह बताती है कि परमेश्वर हमसे क्या अपेक्षा करता है, और फिर एक ऐसा सम्बन्ध होता है जिसमें हमारी बुलाहट प्रकट होती है।
जब बुलाहट की बात आती है, तो यह अधिकार और उत्तरदायित्व का परस्पर सम्बन्ध और समावेश होता है। सरल शब्दों में कहें, तो अधिकार यह बताता है कि हम क्या कर सकते हैं, जबकि उत्तरदायित्व यह बताता है कि हमें क्या करना चाहिए। कभी-कभी सम्बन्धों में यह एक या दूसरा होता है, कभी-कभी दोनों होते हैं, तथा कभी-कभी कोई भी नहीं होता है — और यह परमेश्वर की ओर से होता है। हमारी सम्बन्धपरक बुलाहट अन्त में वह होती है जिसकी वह हमसे अपेक्षा करता है।
और ये दो बुलाहटें — अधिकार और उत्तरदायित्व — इस बात पर केन्द्रित होते हैं कि हम घर के सम्बन्धों से लिए गए तीन स्तरीय नमूने में दूसरों के साथ कैसे सम्बन्ध रखते हैं। जैसा कि पता चलता है, कि परमेश्वर ने घर को मानव समाज की आधारशिला के रूप में स्थापित किया था, जिसमें पिता (और माँ), भाई (और बहनें), और बेटे (और बेटियाँ) सम्मिलित थे। सबसे पहले, यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि इन अन्तरों को समझने के लिए पदानुक्रम की मूलभूत समझ होनी आवश्यक है। मुझे पता है कि यह शब्द लोगों को बेचैन करता है और हमारे आधुनिक संसार ने इस विचार को नष्ट करने के प्रयास में स्वयं को ही नष्ट कर दिया है, परन्तु पदानुक्रम के विरुद्ध लड़ना, सृष्टि के नियमों के विरुद्ध लड़ने के समान है। परमेश्वर तो परमेश्वर है, और उसने जगत की रचना इसी प्रकार से ही है, इसलिए आप जीत नहीं सकते हैं।
परिवार में कई प्रकार के सम्बन्ध होते हैं, जो कि सोच समझकर बनाए गए हैं और परमेश्वर की बनाई गई व्यवस्था का हिस्सा हैं। और वे घर के लिए परमेश्वर की रचना में दिखाई देते हैं। हम दूसरों के साथ कैसे सम्बन्ध रखते हैं, इसके सभी अन्य रूप इसी से निकले हैं। वेस्टमिन्स्टर का विस्तृत धार्मिक सिद्धान्त प्रश्नोत्तरी पाँचवीं आज्ञा की व्याख्या में इस बिन्दु को स्पष्ट करता है।
निर्गमन 20:12 में पाँचवीं आज्ञा कहती है: “तू अपने पिता और अपनी माता का आदर करना, जिससे जो देश तेरा परमेश्वर यहोवा तुझे देता है उसमें तू बहुत दिन तक रहने पाए।”
प्रश्नोत्तरी का प्रश्न संख्या 126 पूछता है कि, “पाँचवीं आज्ञा का सामान्य अर्थ क्या है?”
उत्तर: पाँचवीं आज्ञा का सामान्य अर्थ उन कर्तव्यों का पालन करना है जो हम अपने विभिन्न सम्बन्धों में, छोटे, बड़ों या बराबर वालों के साथ पारस्परिक रूप से निभाते हैं।9 (इस बात पर बल दिया गया है)
इन “कई सम्बन्धों” को— जिन्हें हम विभिन्न प्रकार कहते हैं — उन्हें माता-पिता, भाई-बहन और बच्चों के रूप में भी व्यक्त किया जा सकता है। हम दूसरों के साथ इन सम्बन्धों में या तो बड़े या छोटे या बराबर के सम्बन्धों से जुड़े होते हैं।

संक्षेप में, हमारे सम्बन्धपरक बुलाहटों में अधिकार या उत्तरदायित्व सम्मिलित होते है; हमारा सम्बन्धों के प्रकार या तो बड़े या छोटे या बराबर के होते हैं। प्रत्येक सम्बन्ध में, हम अधिकार या उत्तरदायित्व, परमेश्वर के द्वारा निर्धारित बुलाहट से एक विशेष प्रकार का सम्बन्ध स्थापित करते हैं। यहाँ एक उदाहरण दिया गया है:
बुलाहट एवं प्रकार को लागू करना
मैं आठ बच्चों का पिता हूँ, और मैं अपने बच्चों पर उनका पालन-पोषण करने का अधिकार रखता हूँ जो मुझे परमेश्वर ने दिया है। सम्बन्ध में बुलाहट एक अधिकार होता है; सम्बन्धों का प्रकार सम्बन्धों पर ही टिका होता है। कहने का अर्थ है कि मैं अपने बेटों से उनका कमरा साफ करने के लिए कह सकता हूँ।
मेरे पुत्र होने के नाते, उन पर आज्ञा मानने का उत्तरदायित्व है। (देखें, इफिसियों 6:1) वे मेरी आज्ञा का पालन करेंगे, और मेरे अधीन कार्य करते हुए अपने उत्तरदायित्व को पूरा करेंगे। अभी तक तो यह सरल सा उदाहरण है, पर आगे यह और अधिक जटिल होता जाएगा। एक पिता के होने के नाते मैं अपने बेटों को साफ-सफाई के सम्बन्ध में अधिकार के साथ आज्ञा दे सकता हूँ — मैं इस प्रकार से उनके साथ जुड़ जाता हूँ क्योंकि यह उनके व्यक्तिगत या रचनात्मक निर्माण के लिए उचित है। — पर क्या मेरा भी उन आज्ञाओं में कोई दायित्व है?
हाँ है, क्योंकि मेरे बेटों को प्रभु के अनुशासन और शिक्षा में बढ़ाना मेरा दायित्व है, और घर की साफ-सफाई इसी का एक हिस्सा है, जैसा कि परमेश्वर ने एक मसीही पिता होने के नाते मुझे करने के लिए कहा है (देखें, इफिसियों 6:4)। मसीही पिता सदैव स्थानीय कलीसिया के माध्यम से परमेश्वर के अधिकार के अधीन रहकर अपने अधिकार का प्रयोग करते हैं। हम एक साथ ऊपर वाले सम्बन्ध में (पिता-पुत्र) और नीचे वाले सम्बन्ध में (परमेश्वर-मनुष्य) हैं। पितृत्व, की बुलाहट में अधिकार और उत्तरदायित्व दोनों का मेल होता है। पिता का अपने बच्चों पर अधिकार रखना परमेश्वर के प्रति उसके उत्तरदायित्व का एक हिस्सा है, जिसके प्रति वह नीचे वाले सम्बन्ध में अर्थात् परमेश्वर और मनुष्य के सम्बन्ध में आज्ञाकारी रहता है।
अब तक तो सब ठीक है। परन्तु अधिकार रखने वाले व्यक्ति किसी दूसरे अधिकार के अधीन भी हो सकते हैं। यह हर स्थान पर देखने को मिलता है। परमेश्वर को छोड़कर, यह प्रत्येक के अधिकार के लिए सच है। इस बात पर विचार कीजिए:
क्या होगा यदि मेरे चार बेटों में से कोई एक शासक बनने का निर्णय करता है और अपने भाइयों को आदेश देने लगता है? क्या यह ठीक है? क्योंकि भाई आपस में एक हैं और एक जैसा सम्बन्ध रखते हैं और किसी का किसी पर कोई अधिकार नहीं है।
सामान्यतः नहीं, यह उचित नहीं है, क्योंकि भाइयों को एक दूसरे पर अधिकार तब तक नहीं होता जब तक कि उनके माता-पिता के द्वारा उन्हें यह अधिकार न दिया जाए। जो लोग एक-दूसरे के घनिष्ठ सम्बन्धी होते हैं, उनके ऊपर वही लोग अधिकार रखते हैं जो सम्बन्धों में उनसे बड़े होते हैं। उदाहरण के लिए, एक भाई दूसरे भाइयों को गन्दी गेंदें लाने का आदेश नहीं दे सकता है, परन्तु वह पिताजी का सन्दर्भ देते हुए दूसरों से उचित ढँग से कह सकता है कि, “मोज़े बिस्तर के नीचे मत छिपाओ।” और यदि उसके भाई फिर भी मोजे छिपाते हैं, तो वह अपने पिता से उनके इस गलत काम के विषय में बता सकता है। (मोजे छिपाने वाले इसे “चुगली” कह सकते हैं, परन्तु यह मुख्य रूप से अधिकार की स्वीकृति होती है)।
हमारे दैनिक जीवन में ऐसा अधिकतर होता है, कि हम इसमें सम्बन्धों की शक्ति को कभी-कभार ही पहचान पाते हैं। जब मैं अपने बेटों को कमरे में अकेला छोड़कर चले जाता हूँ, तो वे उस कमरे में बहुत गन्दगी फैला देता हैं, ऐसे लगता है मानो लॉर्ड ऑफ़ द फ्लाइज़’ उपन्यास कोई दृश्य हो। परन्तु रोचक बात यह है कि अधिकतर मैं उन्हें कहते हुए सुनता हूँ कि, “पिताजी ने कहा था…” पिताजी ने कपड़े धोने के लिए, कपड़े टोकरी में रखने के लिए कहा था, इसलिए, “मोजे बिस्तर के नीचे मत छिपाओ।” वे एक-दूसरे के निकट सम्बन्धी हैं, परन्तु वे इस सच्चाई को उजागर करते हैं कि वे एक-दूसरे के निकट सम्बन्धी के रूप में भाईचारा साझा करते हैं। वे एक दूसरे को अपने अधिकार के प्रति तथा अपने पिताजी के प्रति भी उत्तरदायी ठहराते हैं, जिसने उन्हें उस कमरे के विषय में बताया था।
क्या हम बुलाहट और सम्बन्धों के प्रकारों को अन्य सम्बन्धों पर भी लागू कर सकते हैं?
एक पिता होने के नाते, मैं अपने बेटों को कमरा साफ करने की आज्ञा देता हूँ, परन्तु अपने पड़ोसी स्टीव को नहीं दे सकता। स्टीव और मेरा सम्बन्ध भाई के समान है। बाइबल आधारित आज्ञाओं, मसीही साक्षी और शालीनता के अतिरिक्त, मेरा उस पर कोई अधिकार नहीं है, और न ही उसके प्रति मेरा कोई उत्तरदायित्व है। जब तक हमारी आपसी सहमति या समझौता न हो, तब तक मैं उसे कुछ भी करने के लिए नहीं कह सकता हूँ।
समझौता वह साधन है जिसके द्वारा लोग, भाई-बहनों के समान, भरोसेमन्द और शान्ति पूर्वक रहने का प्रयास करते हैं। क्योंकि एक-दूसरे पर अधिकार न होने के कारण, वे आपसी सहमति से अपने हितों की सुरक्षा के लिए स्वयं को एक अधिकृत अभिलेख के अधीन कर देते हैं। हस्ताक्षर किए हुए अभिलेख ही इन समझौतों को कानूनी मान्यता देते हैं, परन्तु हमारे समान स्तर के सम्बन्धों में अधिकाँश अनकहे, अस्पष्ट समझौते और आपसी अपेक्षाएँ भी सम्मिलित होती हैं। या कभी-कभी मौखिक प्रतिज्ञाएँ होती हैं, जिसे हम वचन देना कहते हैं। अब हम लोकतंत्र के इतिहास और “सामाजिक समझौते के सिद्धान्त पर चर्चा करने से केवल एक पायदान दूर हैं।” यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि संयुक्त राज्य अमेरिका की जड़ें मानवीय सम्बन्धों के दर्शन में समाहित हैं। अमेरिका के संस्थापक पिताओं के सामने, अठारहवीं सदी के अपने बुद्धिजीवी समकालीनों के समान, यह चुनौती थी कि एक ऐसी सरकार कैसे बनाई जाए जिसमें लोग केवल राजा के अधीन न हों, वरन् उसके साथ सहभागी हों। इस “समझौते” की मेरी मन पसन्द झलक एक कार्टून चित्रण है, जिसमें दो लोग यांकी-डूडल टोपी पहने हाथ मिला रहे हैं, और उनमें से एक कह रहा है, “तुम मुझे मत मारो, मैं भी तुम्हें नहीं मारूँगा।” दूसरा सहमति में सिर हिलाकर कहता है, “ठीक है।” जीवन तो सम्बन्धों से ही चलता है, और राष्ट्रों के सम्बन्ध भी मायने रखते हैं।
स्टीव और मैंने एक-दूसरे के साथ, घास काटने की मशीन के विषय में एक अनौपचारिक समझौता किया है। इस प्रकार हमने एक-दूसरे को वचन दे दिया। परन्तु घास काटने की मशीन में गैस भरने और उसे अपने ओसारे में रखने के अतिरिक्त, मैं उसे अपने कमरे की सफाई करने या पतझड़ में अपने घास के मैदान में अधिक बीज बोने के विषय में कुछ नहीं बता सकता हूँ। मैं सड़क के उस पार रहने वाले नए पड़ोसी को भी नहीं बता सकता, भले ही उसके घास के मैदान को इसकी अधिक आवश्यकता हो। क्या आप जानते हैं कि जब हम दूसरे लोगों की कुछ बातों को पसन्द नहीं करते हैं, जिन्हें सुधारने का हमें कोई अधिकार नहीं होता, तो इसे क्या कहते हैं? इसे आलोचना कहते हैं। इसलिए बहुत अधिक आलोचना करना थका देता है, इसके बहुत से क्षेत्र होते हैं, भाई। जब पौलुस हमें इस उद्देश्य के लिए प्रार्थना करने का निर्देश देता है कि हम शान्तिपूर्ण और निश्चिन्त जीवन जी सकें (देखें 1 तीमुथियुस 2:2), तो उसका अभिप्राय किसी आदर्श कृषि समाज से नहीं है, परन्तु वह सम्भवतः अपने कार्यों को ध्यान में रखना सकारात्मक मानता है।
परन्तु तब क्या होगा यदि सड़क के उस पार का नया पड़ोसी अपने तहखाने में मेथ (अत्यधिक विषैली दवा) बनाने का कारखाना लगा ले या काले बाजार में बेचने के लिए कोमोडो ड्रैगन (छिपकली की सबसे बड़ी प्रजाति) का अवैध निर्यात आरम्भ कर दे? क्या मुझे उसे इस कार्य को बन्द करने का आदेश देना चाहिए? नहीं, वास्तव में मैं ऐसा नहीं सकता हूँ, परन्तु मैं पुलिस को बुलाऊँगा। वहाँ से आगे की कार्यवाही पुलिस करेगी और कानून का पालन सुनिश्चित करेगी। हम जिस कानून के अधीन हैं, मेरे पड़ोसी ने स्वेच्छा से उसका पालन करने की सहमति दी, जब उसने उस नगर पालिका के क्षेत्र में मकान खरीदा जहाँ नशीली दवाओं और विदेशी पालतू पशुओं पर प्रतिबन्ध था। मेरे सभी पड़ोसी वास्तव में अच्छे लोग हैं, परन्तु आप मेरी बात समझ ही गए होंगे। पड़ोसी हमारे भाई-बहनों के समान हमारे निकट सम्बन्धी होते हैं, परन्तु जब कानून की बात आती है तो हमारे सभी सम्बन्ध क़ानून के अधीन होते हैं, जिसे हम सही मायने में “अधिकार” या “कानून प्रवर्तन” कहते हैं।
शालीनता की भूमिका
सम्बन्धपरक में बुलाहट और प्रकार हमें यह समझने में सहायता कर सकते हैं कि सम्बन्धों को कैसे बनाए रखा जा सकता है, परन्तु इसमें और भी बहुत कुछ है। यदि पड़ोसी आपकी की ही आयु के आसपास के हों तो उन्हें सगे सम्बन्धी मानना एक बात है, परन्तु यदि वे आपके दादा-दादी की आयु के आसपास के हों तो क्या होगा? मान लीजिए कि आप पुरुष हैं और आपकी एक पड़ोसन है। यदि आप उस पड़ोसन को यरीहो के मार्ग पर अधमरा पाते हैं, तो क्या होगा?
आयु, लिंग और तुरन्त दिखाई देने वाली आवश्यकताएँ सम्बन्ध के प्रकार को तय नहीं करती हैं। कुछ ही घर की दूरी पर रहने वाले एक अन्य पड़ोसी की आयु मेरे दादा जी के बराबर है, परन्तु उनकी आयु उन्हें मुझ पर अधिकार नहीं देती है। परन्तु यह फिर भी, पारस्परिक व्यवहार को प्रभावित करता है, जिसे हम शालीनता भी कह सकते हैं।
पौलुस तीमुथियुस से कहता है,
किसी बूढ़े को न डाँट; पर उसे पिता जानकर समझा दे, और जवानों को भाई जानकर; बूढ़ी स्त्रियों को माता जानकर; और जवान स्त्रियों को पूरी पवित्रता से बहिन जानकर, समझा दे। (1 तीमुथियुस 5:1-2 बी. एस. आई.)
भले ही चाहे समान सम्बन्धात्मक प्रकार एक जैसे हों, फिर भी हम एक दूसरे के साथ कैसा व्यवहार करते हैं, इसका उत्तरदायित्व हमारा ही है। हमारे अंग्रेजी अनुवादों में क्रिया “व्यवहार” शब्द को जोड़ा गया है, परन्तु इसका अर्थ एक-दूसरे के प्रति शालीनता भी होता है: इसलिए इस प्रकार से व्यवहार करें जो सामाजिक वास्तविकताओं के अनुकूल हों।10 इसलिए पहलवान लड़कों को पहलवान लड़कियों के साथ कुश्ती करने से मना कर देना चाहिए, भले ही हाई स्कूल स्तर के खेलकूद के आयोजक इतने मूर्ख हों कि वे कुश्ती को लड़के और लड़कियों का मिला-जुला खेल बना देते हैं। हमारे आपसी सम्बन्धों में शालीनता दिखाने का उत्तरदायित्व हमारा है। यही कारण है कि हमारे देश के कुछ हिस्सों में यह चलन है, कि कम आयु के पुरुष बड़ी आयु की महिलाओं को “सुश्री” जैसे सम्मान जनक शब्द के साथ सम्बोधित करते हैं। अमेरिका के दक्षिण क्षेत्र से बाहर लगभग बीस वर्ष बिताने के पश्चात्, आज तक मुझे किसी महिला को केवल उसके पहले नाम से सम्बोधित करना विचित्र सा लगता है, यदि उसकी आयु मेरी माँ के बराबर हो। वास्तव में, मैं अपनी सास को, जो मेरे परिवार के साथ रहती हैं, “सुश्री पाम” कहकर पुकारता हूँ। क्योंकि मैं कोई समाज विरोधी व्यक्ति नहीं हूँ।
पौलुस के पत्रों (जैसे, इफिसियों 5:22-6:9) में दिए गए पारिवारिक नियमों में बताया गया है कि बाइबल हमारे सम्बन्धों में उचित व्यवहार के विषय में साफ रीति से बताती है, विशेषकर बड़े-छोटों के सम्बन्धों में। विवाह, माता-पिता, और कार्यस्थल के सम्बन्ध पर — परमेश्वर का वचन इन सब के विषय में बताता है। परन्तु बाइबल इस विषय में और भी बहुत कुछ कहती है कि हम उन लोगों के साथ कैसा व्यवहार करते हैं जिनके साथ हमारा निकट सम्बन्ध होता है।
नये नियम में कम से कम 59 आज्ञाएँ हैं जो हमें एक दूसरे के प्रति व्यवहार करने के तरीके के विषय में बताते हैं – जिन्हें अधिकतर “एक दूसरे के प्रति” वाले अनुच्छेद कहा जाता है – और वे सम्बन्धों में शालीनता के लिए खाका तैयार करते हैं। ये आज्ञाएँ दस आज्ञाओं के दूसरे भाग में हैं, जिसका सारांश दूसरी सबसे बड़ी आज्ञा में मिलता है कि तू अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रख (देखें मत्ती 22:36-40; गलातियों 5:14; रोमियों 13:8-10)। मैं एक और आज्ञा के विषय में सोचता हूँ कि, “एक दूसरे पर कृपालु, और करुणामय हो” (इफिसियों 4:32)। “एक दूसरे से झूठ मत बोलो” (कुलुस्सियों 3:9)। “बिना कुड़कुड़ाए एक दूसरे का अतिथि-सत्कार करो।” (1 पतरस 4:9)। यह सम्बन्धों से सम्बन्धित शालीनता है।
यद्यपि ये आज्ञाएँ साफ रीति से बताती हैं कि शालीनता कैसी होनी चाहिए, और हमारी अधिकाँश सम्बन्धपरक शालीनता लिखित नहीं होती है, परन्तु यह हमारे सामाजिक अपेक्षाओं के ताने-बाने में बुनी होती है। यह संस्कृति का एक हिस्सा है, और इन अपेक्षाओं को पहचानना सबसे सरल तब होता है जब उनका विरोध किया जाता है। यहाँ तक कि आज भी अमेरिका में, जहाँ सांस्कृतिक गिरावट बहुत अधिक है, फिर भी अधिकाँश लोग इस बात को अपमानजनक मानते हैं कि कोई युवा पड़ोसी वृद्ध लोगों का अपमान करे या कोई पड़ोसी आस-पास के किसी निर्धन व्यक्ति को अनदेखा करे। इस विषय में कुछ राज्यों में तो “दयालु सामरी” नामक कानून भी बन चुका है। सरल शब्दों में कहें तो, इन कानूनों के अनुसार यदि कोई व्यक्ति जानता है कि कोई व्यक्ति गम्भीर समस्या में है और फिर भी वह हस्तक्षेप करने या आपातकालीन सेवाओं से सम्पर्क करने से मना कर देता है तो यह एक अपराध की श्रेणी में आता है।
एक बार मुझे ठीक ऐसी हे स्थिति का सामना करना पड़ा जिसके लिए यह कानून बनाया गया था।
मैं मिनियापोलिस के अपने क्षेत्र से सुबह-सुबह गाड़ी चला रहा था, उस समय चारों ओर सन्नाटा था, परन्तु बहुत उजियाला था। रुकने के चिन्ह वाले स्थान पर मैंने अचानक एक महिला को चिल्लाते हुए सुना, “बचाओ! बचाओ!” मैंने बाईं ओर देखा और एक महिला भागते हुए मेरी ओर आ रही थी, एक पुरुष आक्रामक तरीके से उसका पीछा कर रहा था। “911 पर कॉल करो!” उसने घबराहट में कहा, जैसे ही वह मेरी ओर अर्थात् वाहन चालक खिड़की के पास आयी तो उसकी आवश्यकता साफ दिखाई दे रही थी और उसे तुरन्त सहायता चाहिए थी। वह व्यक्ति पीछे हट गया, परन्तु अभी भी दिखाई दे रहा था, और मैंने तुरन्त ही फोन करके सूचना प्राप्तकर्ता को बताया कि वह व्यक्ति अपने सिर पर टोबोगन पहने हुए है, जिससे मेरा अभिप्राय छोटी टोपी से था। जहाँ मैं पला-बढ़ा वहाँ हम उस टोपी को टोबोगन कहते थे। सूचना पाने वाले व्यक्ति को समझ में नहीं आया और उसने बताया कि महिला का पीछा करने वाला व्यक्ति दौड़ते समय सिर पर बिना पहिये की गाड़ी रखे हुआ था। मुझे पूरी उम्मीद थी कि पुलिस उस व्यक्ति को ढूँढ लेगी। विस्तार से बात करने के पश्चात्, मैंने सूचना पाने वाले व्यक्ति को बताया कि महिला को कोई चोट नहीं आयी है और पुलिस के आने तक मैं उसी रुकने के संकेत वाले स्थान पर ही रुका रहा, क्योंकि ऐसा करना उचित था। और यहाँ का कानून भी यही कहता है, जो कि अच्छा कानून है।
पड़ोसी होने के नाते हम एक-दूसरे के निकट हैं, पर एक-दूसरे पर हमारा कोई अधिकार नहीं है, परन्तु शालीनता हमारा उत्तरदायित्व है। और यह उत्तरदायित्व आयु लिंग, और निकट व प्रकट दिखने वाली आवश्यकता के अनुसार विभिन्न रूप लेती है।
निकट और दूर की शालीनता
विशेषण “निकटतम” इक्कीसवीं सदी में विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। अधिकाँश इतिहास में, आवश्यक वस्तुएँ हमेशा भौगोलिक रूप से आसपास ही मिल जाती थीं। आवश्यकताओं की अनुभूति केवल उन्हीं वस्तुओं तक सीमित थी जो लोगों ने स्वयं देखी या अनुभव की थीं। परन्तु आज तकनीक और संचार माध्यम के कारण स्थिति भिन्न है। किसी भी समय हम पूरे संसार में अनगिनत आवश्यकताओं के बारे में जागरूक हो सकते हैं। लोगों ने पहले कभी इतने भयानक घटनाओं के विषय में एक साथ इतनी जानकारी नहीं रखी थी — और वह भी ऐसी घटनाओं के विषय में जिनके लिए वे कुछ कर नहीं सकते थे।
मुझे अपने पड़ोसी के प्रति अपने उत्तरदायित्व की अनुभूति हुई क्योंकि मैंने उसे सहायता पाने के लिए चिल्लाते हुए सुना और देखा था, — परन्तु मैंने ऐसे लोगों के बारे में भी पढ़ा है जिनकी आवश्यकताएँ मेरे सामने प्रत्यक्ष रूप से नहीं आईं, न मैंने उन्हें सुना, न देखा। तो ऐसे लोगों के प्रति मेरा उत्तरदायित्व क्या है? क्या अलग-अलग समय और क्षेत्रों में पीड़ितों को बचाना और भूखों को खाना खिलाना मेरा दायित्व है? क्या इसमें वे सभी 82.8 करोड़ लोग सम्मिलित हैं जो भूखे हैं? क्या निर्धनों के प्रति शालीनता दिखाने की मेरे उत्तरदायित्व की कोई सीमा है?
सबसे पहले, यह स्पष्ट कर दें कि जब भी कोई व्यक्ति अभावग्रस्त लोगों के प्रति शालीनता दिखाता है तो यह अच्छी बात है, चाहे उनकी आवश्यकताएँ कितनी भी निकट क्यों न हों। यद्यपि, इस प्रकार की भागीदारी एक अनोखी बुलाहट है परन्तु यह हर किसी का उत्तरदायित्व नहीं है। जब कोई व्यक्ति इस प्रकार की सेवकाई में सम्मिलित होता है तो हम कह सकते हैं कि उस व्यक्ति पर उस विशेष आवश्यकता के लिए बोझ है। उदाहरण के लिए, आपको कांगो में बच्चों के लिए स्वच्छ जल समाधान में निवेश करने के लिए बोझ की आवश्यकता हो सकती है, परन्तु जब कोई पड़ोसी घोर संकट में हो और आपकी कार की ओर दौड़ रहा हो, तो आपको पुलिस को बुलाने के लिए बोझ की आवश्यकता नहीं होती है। यह आपका उत्तरदायित्व होगा, आपका कर्तव्य होगा, आपकी बुलाहट होगी। इसके लिए प्रार्थना करने की आवश्यकता नहीं है। करुणा जगाने के लिए आपको “यह वीडियो देखने” की आवश्यकता नहीं है। शालीनता दिखाने का यह उत्तरदायित्व इस बात पर निर्भर करता है कि आवश्यकता कितनी तात्कालिक है।
यही बात यीशु हमें लूका 10 में सिखाता है, जो कि दयालु सामरी का एक प्रसिद्ध दृष्टान्त है (देखें, लूका 10:29-37)। जिस व्यक्ति को मरने के लिए छोड़ दिया गया था, उसे वास्तव में सहायता चाहिए थी, और उसकी सहायता करने में जोखिम भी कम था, परन्तु याजक और लेवी दोनों ने उसको अनदेखा कर दिया। उन्होंने समाचार पत्र या वीडियो बन्द करके उसे अनदेखा नहीं किया, परन्तु उससे दूर होने के लिए वे सड़क के दूसरी ओर चले गए। अर्थात् अधमरे व्यक्ति से मुँह मोड़कर वे दूसरी ओर चले गए।
यद्यपि सामरी व्यक्ति पिछले यात्रियों की तुलना में धार्मिक व्यक्ति नहीं था, फिर भी उसे घायल व्यक्ति पर तरस आया। यीशु ने कहा कि वह दयालु सामरी व्यक्ति ही सच्चा पड़ोसी प्रमाणित हुआ। सामरी पूरे फिलिस्तीन में हर डकैती के शिकार लोगों की खोज में नहीं निकला था, लेकिन उसने उस व्यक्ति की सहायता की जो उसके सामने पड़ा था — इसलिए हम उसे “दयालु सामरी” कहते हैं। यह शुद्ध और सरल सम्बन्धपरक शालीनता थी, और ऐसी शालीनता हर उस व्यक्ति के प्रति हमारा उत्तरदायित्व है जिसके साथ हम सम्बन्ध में होते हैं। परमेश्वर हमसे यही अपेक्षा करता है, जिसे हम आयु, लिंग और सामने दिख रही आवश्यकता के अनुसार समझदारी से दूसरों पर लागू करते हैं।
यह उत्तरदायित्व ही सम्बन्धों में हमारी आपसी अपेक्षाओं का स्तर भी निर्धारित करता है। यदि हम सभी देने वाले और लेने वाले लोग हैं, जैसा कि सम्बन्धपरक सम्बन्धों के विषय में कहा गया है, तो सामान्य परिस्थितियों में विशेष सम्बन्धों में यह वास्तव में कैसा दिखना चाहिए? जब कोई अत्यंत आवश्यकता न हो, तब सम्बन्धों में हमसे क्या उम्मीद की जाती है?
अब जब हमने सम्बन्धों को व्यापक रूप से समझने के लिए एक ढाँचा तैयार कर लिया है, तो यह आवश्यक है कि हम उस ढाँचे को व्यवहार में उतारने के लिए गहराई से विचार करें — विशेषकर तब, जब सम्बन्धों में उलझनें, टकराव, या अस्पष्टताएँ सामने आती हैं।
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चर्चा एवं मनन:
- “शालीनता” की श्रेणी आपके कुछ सम्बन्धों को कैसे प्रभावित करती है?
- बिना लिखित सम्बन्धात्मक शालीनता का विरोध करने के कुछ उदाहरण क्या हैं?
- आपके जीवन में ‘ऊपर’, ‘साथ में’, और ‘नीचे’ प्रकार के सम्बन्धों के कुछ उदाहरण क्या हैं?
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भाग III: सम्बन्धों की जटिलता को समझना और सम्भालना
जीवन सम्बन्धों से मिलकर बनता है, और सम्बन्ध सरल नहीं होते हैं। यदि हमें किसी एक बात को चुनना हो जो सम्बन्धों को जटिल बनाते हैं, तो वह हमारी और दूसरों की उम्मीदों पर खरा न उतर पाना होता है। ये उम्मीदें सम्भवतः आवश्यकताओं से जुड़ी होती हैं। हम सभी सहायता करते हैं, परन्तु कभी-कभी हम ऐसा करने में अच्छे नहीं होते हैं। और जब हमें सहायता की आवश्यकता होती है, तो हमारी उम्मीदें वास्तविक नहीं लगती हैं।
समय के साथ, यदि किसी व्यक्ति की आवश्यकताएँ पूरी नहीं होती हैं, तो धीरे-धीरे उसका सम्बन्धों पर से भरोसा उठने लगता है, जिससे सम्बन्धों में तनाव बढ़ने लगता है जिस कारण वह व्यक्ति अपनी आवश्यकता ही बताना छोड़ देता है या फिर उन्हें बताने के ढँग में कुछ परिवर्तन करता है। आप कल्पना कर सकते हैं कि सम्बन्धों में इस प्रकार का अविश्वास तथा अपनी आवश्यकताओं को व्यक्त करने में संकोच करना कैसे समस्या उत्पन्न कर सकता है।
सबसे दुःख की बात यह है कि आवश्यकताएँ लगातार पूरी न होने से निराशा होती है, और यही नशे का मूल कारण है। सरल शब्दों में कहें, तो व्यसन निराशा से बचने का एक प्रयास है। यह “हमारे भावनात्मक संसार को सुकून देने वाला और समस्या से निश्चिन्त रहने के लिए एक गम्भीर प्रयास है।”11 और मानवीय असुविधा और समस्या की इतनी अधिक निराशा का कारण, लगातार पूरी न होने वाली आवश्यकताएँ होती हैं। दुःख-दर्द से छुटकारा पाने के लिए लोग बहुत अधिक बेचैन हो जाते हैं — परन्तु क्या हम कल्पना कर सकते हैं कि हमारे संसार में कितना दुःख और पीड़ा सम्बन्धों के टूटने के कारण उत्पन्न होते हैं?
निसन्देह, यह गम्भीर सच्चाई परिवार में हमारे आधारभूत सम्बन्धों के महत्व को बढ़ाता है, साथ ही यह प्रत्येक स्थान पर सम्बन्धों की शक्ति की ओर भी संकेत करता है। “सम्बन्धपरक बुद्धिमानी” कहे जाने वाले विकास से अधिक उच्च प्राथमिकता की कल्पना करना कठिन है। संक्षेप में, हम सहायता पाने वाले और सहायता करने वालों के रूप में अपनी भूमिका को समझने के लिए अपनी सम्बन्धपरक अपेक्षाओं को समझना चाहते हैं।
जब भी आप किसी सम्बन्ध में कठिन परिस्थिति का सामना कर रहे होते हैं, और आप साफ रीति से समझ नहीं पाते हैं, तो आपका पहला कदम, परमेश्वर के सामने तथा परमेश्वर की ओर उठना चाहिए, ताकि आप इन तीन क्षेत्रों में सही समझ प्राप्त कर सकें: अर्थात् बुलाहट, प्रकार और शालीनता में।
– सबसे पहले, इस बात पर विचार करें कि आपकी बुलाहट अधिकार की है या उत्तरदायित्व की, या दोनों की है, या दोनों में से किसी की भी नहीं है।
– दूसरे चरण में, यह पहचानें कि यह किस प्रकार का सम्बन्ध है — क्या आप ‘ऊपर’, ‘साथ में’, या ‘नीचे’ की भूमिका निभा रहे हैं — और किन “समझौतों” का इसमें प्रभाव हो सकता है।
– तीसरे चरण में, सम्बन्धों में उन लोगों के साथ शालीनता लागू करें, जिनके साथ हम सम्बन्धों से जुड़े हुए हैं, दूसरों की आयु, लिंग या निकटता, के द्वारा स्पष्ट आवश्यकता निर्धारित होती है।
एक बार जब हम इन भागों को ढँग से समझ लेते हैं, तो एक तरीका है जो हमें देने और लेने की अपेक्षाओं को समझने में सहायता कर सकता है, वह सम्बन्ध चक्र है। इन चक्रों को विभिन्न नामों से पुकारे जाने के अनेक उदाहरण हैं, परन्तु मूल विचार यह है कि प्रत्येक व्यक्ति (सम्बन्ध-में-व्यक्ति के रूप में) के पास एक ही केन्द्र वाले चक्र होते हैं जो सम्बन्धों के विभिन्न स्तरों की पहचान करते हैं। इन विभिन्न गोल घेरों या स्तरों को भरोसे के उच्च स्तर से निम्न स्तर के आधार पर पहचाना जाता है।

आन्तरिक चक्र बिल्कुल वैसा ही होता है जैसा आप उम्मीद करते हैं। यह स्तर संख्या 1 है। ये ऐसे सम्बन्ध होते हैं जिनमें आपके बीच भरोसा, आपसी प्रेम और देने और लेने की स्पष्ट अपेक्षाएँ सबसे अधिक होती हैं। आप इन लोगों को “घनिष्ठ मित्र” कह सकते हैं, जिसमें आपका अपना परिवार भी सम्मिलित होना चाहिए, परन्तु यह बात इन्हीं लोगों तक सीमित नहीं होती है। ये लोग आपके प्रति विश्वासयोग्य होते हैं और संकट के समय सबसे पहले आपकी सहायता करते हैं, इसलिए भौगोलिक निकटता आवश्यक है।12
दूसरा घेरा, स्तर संख्या 2, वह है जिसे आप “अच्छे मित्र” कह सकते हैं। ये वे लोग होते हैं जिनके साथ आप आनन्द करते हैं और जिन पर आप भरोसा करते हैं, परन्तु वे विभिन्न कारणों से आपके आन्तरिक चक्र से बाहर होते हैं, जो अधिकाँश रूप से नैतिक होने के बजाय अधिक व्यावहारिक होते हैं। इस स्तर में अभी भी उच्च स्तर का भरोसा सम्मिलित होता है।
तीसरा घेरा, स्तर संख्या 3, यह उन लोगों का एक बहुत बड़ा चक्र होता है जिन्हें आप जानते हैं, और जिनके साथ आप अधिकतर अपनी रुचियाँ साझा करते हैं, इन लोगों को आप सही मायने में “मित्र” कह सकते हैं। आप इन लोगों से प्रेम करते हैं और इन पर भरोसा भी करते हैं, परन्तु इन सम्बन्धों में पाया जाने वाला भरोसा उतना नहीं होता है जितना कि चक्र के केंद्र के निकट रहने वाले सम्बन्धों में होता है। जब आप इन लोगों का उल्लेख करते हैं तो आप उन्हें “मित्र” कह सकते हैं या “हम एक ही कलीसिया में जाते हैं” या “हम साथ मिलकर मनोरंजन बेसबॉल का प्रशिक्षण देते हैं।”
अगला घेरा, स्तर संख्या 4, इस स्तर में आप लोगों को “परिचित” मान सकते हैं। ये वे लोग होते हैं जिन्हें आप जानते हैं, परन्तु उनसे आपका अधिक सम्पर्क न रहा हो, भले ही यह सम्भव है कि आप दोनों आपसी मित्र हों। ये वे लोग नहीं हैं जिन पर आप निश्चित रूप से भरोसा नहीं करते हैं, वरन् आप यह भी नहीं कह सकते कि आप उन पर भरोसा करते हैं। यदि आप इन लोगों से कहें कि आप उनसे प्रेम करते हैं तो यह बड़ी विचित्र सी बात होगी।
इन चार घेरों के बाहर जो लोग होते हैं, उन्हें आप “अपरिचित” मानेंगे। ये वे लोग होते हैं जिन्हें आप नहीं जानते हैं और जिन पर आपको भरोसा भी नहीं करना चाहिए, और यदि आप ऐसा करते हैं तो यह बड़ी विचित्र बात होगी।13

कुछ ही दिन पहले, मैं और मेरी पत्नी एक हवाई यात्रा में थे, हम एक यात्री के सामने बैठे थे जो अपने बगल में बैठे व्यक्ति से ऊँची आवाज में बात कर रही थी, वह अपने पूर्व पति, अपनी छोटी सौतेली बहन की न्यायिक सुरक्षा की लड़ाई, कुछ शारीरिक चोटों और दिव्यता के विषय में अपनी सोच-विचार आदि के बारे में बता रही थी। कई यात्री उसकी आवाज सुन सकते थे और अन्त में मुझे कान में सुनाने वाला यंत्र लगाना पड़ा। कुछ घण्टों के पश्चात्, जब हम विमान से उतरने की प्रतीक्षा कर रहे थे और वह यात्री बात करना जारी रखे हुए थे, तो एक अन्य यात्री, जो अधिक आयु का और समझदार था, उसने उसे बीच में टोकते हुए कहा, “मित्र, आपको अपरिचितों के साथ इतनी अधिक बातें साझा नहीं करनी चाहिए!” यह घटना सच में घटी थी। और यह एक ऐसी घटना थी जिसे दस में से दस लोग सामाजिक रूप से “असामान्य” मानेंगे – जो कि उम्मीदों के मापदण्ड से बाहर है।
वैसे तो हम अपरिचितों के साथ अधिक बातें साझा नहीं करना चाहते हैं, परन्तु हमें यह भी सावधानी रखनी चाहिए कि हमें अपरिचित लोगों से भयभीत भी नहीं होना चाहिए। “अपरचितों से जोखिम” के विषय में छोटे बच्चों के लिए यह अच्छी सलाह है, परन्तु वयस्कों को इस बारे में अच्छे ढँग से पता होना चाहिए। इस बात से मैं बहुत अचम्भित हो जाता हूँ कि कई लोग एक-दूसरे के साथ बहुत निकटता से चलते हैं यहाँ तक कि उनके कन्धे भी आपस में टकराते रहते हैं, इसके बावजूद भी कोई एक-दूसरे के साथ बातचीत नहीं करता है, ऐसा लगता है कि मानो दूसरे व्यक्ति का अस्तित्व ही नहीं है। यह हमारे लिए उतनी ही विचित्र बात होनी चाहिए जितना कि विमान में बैठी कोई महिला अपने बढ़े हुए नाखूनों के विषय में बहुत देर तक तथा बार-बार बता रही होती है। जो कि श्रोताओं के लिए ऊबाऊ हो जाता है। परन्तु हम हर अपरिचित व्यक्ति के साथ एक महिमा से भरी हुई सच्चाई साझा करते हैं क्योंकि हम दोनों ही परमेश्वर का स्वरूप हैं। कोई भी यह अपेक्षा नहीं करता कि कोई अपरिचित उसके साथ घनिष्ठ मित्र जैसा व्यवहार करे, परन्तु मुझे लगता है कि मनुष्य होने के नाते “सुप्रभात” कहना या मुस्कुराहट के साथ सिर हिलाना ही पर्याप्त होता है, जो यह सुझाव देता है कि, “मैं आपके अस्तित्व को समझता हूँ।”
विवेक के स्तर
ये चार सम्बन्धपरक स्तर — अर्थात् घनिष्ठ मित्र, अच्छे मित्र, मित्र और परिचित — ये सब हमें व्यावहारिक रूप से दूसरों को देने तथा स्वयं प्राप्त करने में सहायता एवं मार्गदर्शन करते हैं। यदि शीर्षक आपको भ्रमित कर रहे हैं, तो आप स्तर संख्या 1, 2, 3 और 4 का उल्लेख देख सकते हैं। शीघ्र दिखाई देने वाली आवश्यकता के अतिरिक्त — जैसे कि कोई महिला सहायता पाने के लिए चिल्लाती हुई आपके पास दौड़ती हुई आती है — इन विभिन्न स्तरों के आधार पर हमारी अलग-अलग सम्बन्धात्मक अपेक्षाएँ होती हैं। क्योंकि हम सभी के विभिन्न प्रकार के सम्बन्ध होते हैं, इसलिए सम्बन्धों का चक्र शीघ्र ही व्यक्तिगत और व्यावहारिक हो जाता है। हमारे जीवन में वास्तविक लोग होते हैं जो इन चार चक्रों के अन्तर्गत आते हैं, परन्तु इन विभिन्न लोगों के प्रति हमारा क्या उत्तरदायित्व है?
उदाहरण के लिए, कुछ ही समय पहले, मेरा एक घनिष्ठ मित्र पश्चिम की ओर कुछ राज्यों की यात्रा पर चला गया। उसने रॉकी पर्वत के एक भाग से होकर 26 फुट लम्बे ट्रक को अकेले 24 घंटे तक चलाने की योजना बनाई। उसने मुझ से सहायता नहीं माँगी, परन्तु मुझे विश्वास था कि उसे सहायता की आवश्यकता है। मैंने उसे यात्रा पर साथ चलने और गाड़ी चलाने का प्रस्ताव दिया। क्या मुझे उसके साथ यात्रा करने के लिए विवश होना पड़ा? बिल्कुल नहीं। मुझ पर किसी अधिकारी का कोई नियंत्रण नहीं था। और न ही मैं किसी समझौते के अधीन था। परन्तु मैंने सहायता करने का अपना दायित्व समझा — एक ऐसा दायित्व जिसे मैं किसी “मित्र” स्तर (स्तर 3) पर किसी के लिए नहीं समझता हूँ, सम्भवतः “अच्छे मित्र” स्तर (स्तर 2) पर भी नहीं समझता हूँ।14
यह तो निश्चित है कि हम में से कोई भी अपनी जेब में सम्बन्धों की सूची नहीं रखेगा, और न ही इसे कोई उनके बारे में देखने के लिए बार-बार निकलेगा — जैसे कि इन दिनों बेसबॉल में जब बहारी क्षेत्र रक्षक सपाट सतह पर कदम रखने वाले प्रत्येक खिलाड़ी की जाँच-पड़ताल करते हुए विश्लेषण करते हैं। परन्तु हम कम से कम अवचेतन रूप से इन शर्तों के साथ सोचते हैं। जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूँ तो पाता हूँ कि मैंने अपने घनिष्ठ मित्र की सहायता करने का निर्णय लिया क्योंकि वह मेरा सच्चा और घनिष्ठ मित्र था, यह सम्बन्ध के भीतर आपसी समझ और पारस्परिक कार्य करने के विचार को व्यक्त करता है, वह उन लोगों में से एक है जिनके साथ मैं लगातार 36 घंटे तक रहना चाहता हूँ, और वह उन लोगों की सूची में है जिनसे मैं कभी दूर नहीं होना चाहता हूँ। आप इसे आपसी लगाव, आनन्द और प्रेम का सम्बन्ध कह सकते हैं। हम सुरक्षित और समय पर पहुँच गए, और शीघ्रता से उसे उसके नए घर के प्रवेश द्वार पर ले आए, सामान उतारने में सहायता करने के लिए स्वयं सेवकों की एक पूरी सेना, अर्थात् लगभग सभी मित्रगण उपस्थित थे, और उन्होंने हमारा स्वागत किया। परन्तु जब किसी को विदा करना होता है, तो असली साथ केवल घनिष्ठ मित्र ही निभाते हैं।
एक मिनट के लिए अपने सम्बन्धों के चक्र के विषय सोचिए। क्या आप पहले कुछ घेरों में चेहरे पहचान सकते हैं? किन सम्बन्धों के विषय में आप अनिश्चित हैं कि उन्हें चक्र के कौन से हिस्से में रखें?
ध्यान रखें कि इनमें से कोई भी स्तर स्थिर एवं अचल नहीं है। हमारे जीवन के विभिन्न चरणों में, विशेषकर जब हमारी सम्बन्धपरक बुलाहटें परिवर्तित होती रहती हैं, तो लोग इन स्तरों के अन्तर्गत आते-जाते रहते हैं। हमारा मूलभूत उत्तरदायित्व सदैव “शालीनता” ही होना चाहिए, परन्तु यह उत्तरदायित्व अलग-अलग समय पर एक ही व्यक्ति के प्रति अलग-अलग दृष्टिकोण से देखा जा सकता है।
उदाहरण के लिए, मेरा एक जैविक भाई है। अधिकाँश मानकों के अनुसार, मैं उससे किसी और के जितना ही प्रेम करता हूँ और उस पर भरोसा करता हूँ, परन्तु हम देश के दो अलग-अलग क्षेत्रों में रहते हुए भी एक-दूसरे के सम्पर्क में रहते हैं, और यदि उसे कोई अति आवश्यकता होती है, तो मैं उसकी हर सम्भव सहायता करने पर विचार करता हूँ। परन्तु मैं अपने जीवन के इस मोड़ पर उसे “घनिष्ठ मित्र” (स्तर 1) नहीं मानता हूँ, जबकि अतीत में जब हम एक ही शहर में रहते थे, तब मैं उसे ऐसा मानता था। हमारा जैविक भाईचारा इस बात को तय नहीं करता कि हम “अच्छे मित्र” (स्तर 2) भी हों, परन्तु हम एक-दूसरे के प्रति अपने प्रेम और जीवन में समान प्राथमिकताओं के कारण अच्छे मित्र हैं — कुछ समान हितों का उल्लेख नहीं करना चाहिए, जैसे कि सन्त लुइस कार्डिनल्स ने किया था।
सम्भवतः आप अपने जीवन में भी ऐसे ही लोगों के उदाहरण के विषय में सोच सकते हैं, अर्थात् बदलते हुए सम्बन्धों और मित्रों के आने और चले जाने के विषय में। इन परिवर्तनों के कारण हुई हानि पर शोक व्यक्त करना उचित होगा। सच में, आपको इस हानि का शोक मनाना चाहिए, अन्यथा समय के साथ कई प्रकार हानि आपके हृदय को संकुचित कर देंगी और आपके सम्बन्धों को भी नष्ट कर देंगी। क्या इस प्रकार की हानि का होना सम्बन्धों को जटिल बनाने का एक बड़ा हिस्सा नहीं हैं?
आरम्भिक प्रेम सम्बन्धों में युवा पुरुषों और महिलाओं के बीच कभी-कभार रोमांटिक स्थिति में “सम्बन्धों को परिभाषित करना” और बातचीत असामान्य नहीं होती है, परन्तु किसी और के साथ इस प्रकार की बातचीत करना बहुत असामान्य सी लगती है। परन्तु यह विनम्र सहमति या स्वीकृति का एक रूप है। आप अपनी घनिष्ठ सहेली और उसके पति के साथ बैठकर कह सकते हैं कि, “ठीक है, अब हम घोषणा करते हैं कि हम घनिष्ठ मित्र हैं और हमेशा रहेंगे, यानी हमारा कोई भी परिवार एक-दूसरे के बिना कहीं नहीं जाएगा।” जीवन भर विवाहित जीवन जीने तथा एक-दूसरे के साथ बनें रहना बहुत अधिक चुनौतीपूर्ण होता है, क्योंकि जीवन भर की घनिष्ठ मित्रताएँ मूलतः समाप्त हो जाती हैं।
कई वर्ष पहले, मैं और मेरी पत्नी, रैले-डरहम से मिनियापोलिस-सेंट पॉल तक एक नए शहर में जाने के विचार से घबरा गए थे। हम दो परिचित लोगों से सम्पर्क करने के प्रयास में (स्तर 4) की ओर आगे बढ़ रहे थे, परन्तु कोई मित्र नहीं मिला। हमारे जाने से कुछ दिन पहले, कलीसिया में आराधना सभा के पश्चात् एक सामान्य बातचीत के दौरान हमारे पास्टर की पत्नी ने हमारी घबराहट को भाँपते हुए हमें बताया कि परमेश्वर पर हमारे लिए मित्र बनाने का कोई दायित्व नहीं है, परन्तु वे मित्र हमारे लिए आशीष के रूप में होते हैं जो परमेश्वर हमें देता है। यह लगभग दो दशक पहले की बात है, और यह सचमुच अद्भुत सत्य है। परमेश्वर ने अपनी बड़ी दया के द्वारा हमें ऐसे लोग दिए हैं जिनसे हम कुछ लेते हैं और जिन्हें हम कुछ देते हैं, भले ही चाहे यह बात थोड़े ही समय के लिए क्यों न हो। हमने उन मण्डलियों के विषय में जितना सोचा था उससे कहीं अधिक सम्बन्धपरक गतिविधियाँ देखी हैं, जिसमें बहुत अधिक आनन्द और दुःख सम्मिलित था। सम्बन्धों से ही जीवन चलता है, सम्बन्धों में भले ही थोड़ी कठिनाइयाँ होती हैं, परन्तु परमेश्वर भला है।
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चर्चा एवं मनन:
- क्या आप अपने जीवन में लोगों की पहचान सभी चार स्तरों पर कर सकते हैं?
- आप किस स्तर को अपनी सबसे बड़ी सम्बन्धपरक आवश्यकता मानते हैं?
- क्या आप ऐसे लोगों को जानते हैं जो आपको स्तर 1 पर घनिष्ठ मित्रों के रूप में सूचीबद्ध करेंगे? क्या ऐसे तरीके हैं जिन के द्वारा आप अपने घनिष्ठ मित्रों की सहायता कर सकते हैं?
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भाग IV: सम्बन्धों का उद्देश्य
सम्बन्धों की तीन श्रेणियाँ: परमेश्वर के साथ हमारा सम्बन्ध (ऊपर से नीचे वाला) सबसे महत्वपूर्ण है, उसके पश्चात् स्वयं के साथ हमारा सम्बन्ध (आन्तरिक) आता है। ये दोनों दूसरों के साथ हमारे सम्बन्धों को आकार देते हैं (समान स्तर वाले)।
हमारे समान स्तर के सम्बन्धों में, हम सब सहायता पाने वाले और सहायता करने वाले होते हैं। सामान्यतः सम्बन्धों के विषय में सोचने का एक व्यापक तरीका उन सम्बन्धों की बुलाहट और प्रकार पर निर्भर करता है। सम्बन्धों में हमारी बुलाहट क्या है? ये किस प्रकार के सम्बन्ध हैं? प्रत्येक सम्बन्ध में या तो हमारे पास अधिकार होता है या उत्तरदायित्व होता है, या दोनों होते हैं, या दोनों में से कोई भी नहीं होता है। वह बुलाहट चाहे जो भी हो, परन्तु तीन प्रकार के सम्बन्धों में निभायी जाता है: अपने से बड़ों के साथ-सम्बन्ध (जैसे माता-पिता), समान-सम्बन्ध (जैसे भाई-बहन), और छोटों के साथ-सम्बन्ध (जैसे बच्चे)।
इन सभी प्रकार के सम्बन्धों में हम जिस प्रकार से व्यवहार करते हैं, वह हमारी सम्बन्धपरक शालीनता है। इसका अर्थ है कि हम उस प्रकार से कार्य करें जो सम्बन्धपरक बुलाहट और प्रकार के अनुरूप हो। यह बात अधिकाँश अधिक और कम सम्बन्धों में स्पष्ट होती है, परन्तु जिनके साथ हम समान सम्बन्धों में होते हैं, उनके साथ अधिक बुद्धिमानी की आवश्यकता होती है। इन सम्बन्धों में, शालीनता के प्रति हमारा उत्तरदायित्व दूसरे की आयु, लिंग और घनिष्ठता की स्पष्ट आवश्यकता से निर्धारित होती है।
सामान्य परिस्थितियों में जैसे कि यरीहो के मार्ग के अनुभव के विपरीत, यह अधिकतर स्पष्ट नहीं होता कि सम्बन्धों में हमारी क्या अपेक्षाएँ हो सकती हैं। इन अपेक्षाओं को पूरा करने के लिए एक साधन है जिसे सम्बन्ध चक्र कहते हैं, यह हमारे सम्बन्धों को उच्चतम से निम्नतम, भरोसे के चार स्तरों में वर्गीकृत करता है।
यदि हम इन सबको एक साथ रखकर जैसे कि — बुलाहट और प्रकार, सम्बन्धपरक शालीनता, सम्बन्ध चक्र के प्रकाश में अपनी भिन्न-भिन्न अपेक्षाओं को देखें — तो यह हमारी सम्बन्धपरक बुद्धिमानी को नया स्वरूप देगा… यह एक कठिन कार्य प्रतीत हो सकता है, परन्तु हमारे प्रयास करने के योग्य है, विशेषकर जब हम विचार करते हैं कि इस सब बातों का उद्देश्य क्या है।
उद्देश्य पर ध्यान देना
हमारे समान स्तर वाले सम्बन्धों काउद्देश्य क्या है? इस बात को समझते हुए कि हम में से यहाँ कोई भी विशेषज्ञ नहीं है, हमने अपने सम्बन्धों में बहुत सी गलतियाँ की हैं और अभी भी करते रहते हैं, तो फिर सम्बन्धों का उद्देश्य क्या है?
ठीक है, यदि हमारा सबसे महत्वपूर्ण सम्बन्ध परमेश्वर के साथ है — यदि परमेश्वर को पाना हमारे लिए अच्छा है और हमारी सबसे बड़ी आवश्यकता उसके साथ मेल-मिलाप करना है — तो क्या हमारे समान स्तर वाले सम्बन्धों को इससे कुछ लेना-देना नहीं होना चाहिए?
यूहन्ना हमें बताता है कि नए यरूशलेम में सूर्य की कोई आवश्यकता नहीं होगी, क्योंकि परमेश्वर के तेज से उस में उजियाला हो रहा है। (प्रकाशितवाक्य 21:23) जैसे कि हम कल्पना कर सकते हैं कि जिस प्रकार से सूर्य के उजियाले की आवश्यकता आज है, परन्तु तब न होगी, ठीक उसी प्रकार से समान स्तर वाले सम्बन्धों की भी आवश्यकता नहीं होगी। हम पहले से ही जानते हैं कि स्वर्ग में विवाह नहीं होगा। (देखें, मत्ती 22:30), परन्तु घनिष्ठ मित्रों का क्या होगा? क्या वहाँ सब ही घनिष्ठ मित्र होंगे? हम नहीं जानते हैं, परन्तु यह कहना उचित होगा कि वहाँ सब कुछ अलग ही होगा, और एक बात जो अलग होगी वह यह कि हम वहाँ पहुँच जाएँगे जहाँ पहुँचने की हम सब तैयारी कर रहे हैं। और अन्त में हम सब आकाशीय नगर में होंगे, जिसे जॉन बन्यन ने मसीही मुसाफिर नामक पुस्तक में स्वर्ग कहा है।
लेखक बन्यन की यह उत्कृष्ट पुस्तक, जो पहली बार 1678 में प्रकाशित हुई थी, बाइबल के बाद संसार में अन्य पुस्तक की तुलना में सबसे अधिक बिकी है। मसीही जीवन के रूप में यह पुस्तक एक मसीही यात्री की कहानी के रूप में लिखी गई थी, लेखक बन्यन के द्वारा एक व्यक्ति की मसीही यात्रा के विषय में वर्णन किया गया है जिसमें मुख्य पात्र, विनाश के नगर से स्वर्गीय नगर की ओर यात्रा पर है। मसीही मुसाफिर नामक पुस्तक ने, अपने उतार-चढ़ावों और लगभग दुर्गम चुनौतियों के बावजूद भी सदियों से अनगिनत मसीही लोगों को उत्साहित किया है। और सम्भवतः कहानी की एक अनकही आश्चर्यजनक बात यह है कि यह सम्बन्धों के मूल्य को किस प्रकार से चित्रित करती है। हर नए दृश्य में तथा हर संवाद में, मसीही व्यक्ति स्वयं को एक सम्बन्ध में पाता है, कभी अच्छे और कभी बुरे सम्बन्ध में। अंततः, ये सम्बन्ध ही होते हैं जो उसके लिए अन्तर उत्पन्न करते हैं, तथा उसे परमेश्वर की उपस्थिति में सुरक्षित तरीके से पहुँचने में सहायता करते हैं।
मसीही नामक व्यक्ति की यात्रा का अन्तिम दृश्य इसे सबसे अधिक स्पष्ट करता है। मसीही और उसका मित्र दीवार से घिरे नगर के प्रवेश द्वार के पास पहुँचते हैं, परन्तु “उनके और प्रवेश द्वार के बीच एक नदी थी, और उस पर जाने के लिए कोई पुल नहीं था, और नदी बहुत गहरी थी।” प्रवेश द्वार तक पहुँचने का एकमात्र मार्ग नदी से होकर ही जाना था, और नदी पार करने का तरीका केवल यह था कि आपका जितना अधिक विश्वास होगा, पानी उतना ही कम होगा। यदि आपका विश्वास डगमगाने लगेगा, तो पानी गहरा होता चला जाएगा और आप डूबने लगेंगे। परन्तु मसीही और उसका मित्र जो कि आशावादी है एक साथ नदी में प्रवेश करते हैं।
फिर वे पानी में उतरे परन्तु मसीही डूबने लगा, और अपने भले आशावादी मित्र को पुकारते हुए बोला, मैं गहरे पानी में डूब रहा हूँ; लहरें मेरे सिर के ऊपर से बह रही हैं, सब लहरें मेरे ऊपर से बह रही हैं। सेला।
तब दूसरे ने कहा, हे मेरे भाई, ढाढ़स बान्ध, मैं नदी की गहराई और तली का अनुभव कर रहा हूँ और यह अच्छा है।15
परन्तु मसीही संघर्ष करता रहा। और उसका आशावादी मित्र उसे ढाढस बंधवाता रहा।
तब उसके मित्र ने कहा, ढाढस बाँधो, यीशु मसीह तुम्हें चंगा करता है: और इसके साथ ही मसीही व्यक्ति ने ऊँची आवाज में कहा, अरे, मैं उसे फिर से देख रहा हूँ! और वह मुझ से कहता है, जब तू जल में होकर चले, मैं तेरे संग संग रहूँगा; और जब तू नदियों में होकर जाए, तब वे तुझे न डुबा सकेंगी। फिर दोनों ने मिलकर साहस किया, और उसके बाद शत्रु एक पत्थर के समान स्थिर हो गया, जब तक कि वे पार नहीं हो गए।16
जिस प्रकार मसीही ने पहले अपनी यात्रा में आशावादी मित्र की सहायता की थी, उसी प्रकार इस आशावादी व्यक्ति ने यहाँ मसीही व्यक्ति की सहायता की। सहायता पाने वाले और सहायता देने वाले — और सबसे बड़ी सहायता जिसकी हम सब को आवश्यकता है और जो हम दूसरों को दे सकते हैं, वह परमेश्वर को पाना है। अन्त में, प्रत्येक समान स्तर वाले सम्बन्ध का उद्देश्य — चाहे वह किसी भी प्रकार का हो, किसी भी बुलाहट या अपेक्षा से जुड़ा होता है — और यह होना चाहिए कि हम दूसरों की सहायता करें कि वे भी परमेश्वर को पाएँ। हम जो आपसी सम्बन्धों में जीते हैं, यह चाहते हैं कि हम दूसरों के लिए दिशा-सूचक, स्मरण दिलाने वाले, उत्साहित करने वाले, और इससे भी बढ़कर बनें — ताकि हम उन्हें बता सकें कि परमेश्वर कौन है और उसने मसीह में हमारे लिए क्या किया है, जिससे वह हमें अपने घर (स्वर्ग) में पहुँचा सकें।
हमारी यात्रा उस अन्तिम नदी की ओर है — जो चाहे जितनी भी गहरी और भयानक क्यों न हो — परन्तु अपने सम्बन्धों में हम एक-दूसरे का साहस बढ़ाएँ और मिलकर आगे बढ़ें। और उस दिन तक जब हम प्रभु से मिलेंगे, एक काल्पनिक स्वर्गदूत हमें यह स्मरण करा सकता है कि — जिसके पास मित्र हैं, वह कभी असफल नहीं होता। सम्बन्ध निभाना कठिन है, परन्तु जीवन सम्बन्धों का ही नाम है।
अन्त टिप्पणीयाँ
- फेथ कुक, अ पिलग्रिम पाथ: जॉन बन्यन की यात्रा, (इवेंजेलिकल प्रेस, 2017), पृष्ठ 39–43। देखें: जॉन बुनियन, ग्रेस अबाउंडिंग टू द चीफ ऑफ सिनर्स (1666), (कार्लिस्ल, पी ए: बैनर ऑफ ट्रुथ, 2018)।
- रिचर्ड प्लास और जेम्स कोफील्ड, द रिलेशनल सोल: मूविंग फ्रॉम फॉल्स सेल्फ टू डीप कनेक्शन, (डाउनर्स ग्रोव: इंटरवर्सिटी प्रेस, 2014)।
- प्लास और कोफील्ड, 109।
- “अंगीकृत ईश्वर विज्ञानं” (बनाम “अनुभूत ईश्वर विज्ञान”) यह वह वाक्यांश है जिसका उपयोग मेरे मेंटर, वॉरेन वाटसन द्वारा किया जाता है। वॉरेन से और अधिक जानने के लिए देखें: “परिवर्तन वास्तव में सम्भव है: चालीस वर्षों की परामर्श सेवा से आशा”, 14 मई, 2019, https://www.desiringgod.org/articles/change-is-truly-possible; और देखें: ‘अब भी पवित्र जन: व्यक्तित्व विकारों वाले मसीहियों की देखभाल’, 3 जनवरी 2019, https://www.desiringgod.org/articles/still-saints.
- पूर्वोक्त, पृष्ठ 109, पर बल दिया गया है। आत्म-स्पष्टता और उसके महत्व का एक उत्कृष्ट उदाहरण देखने के लिए, पीटर स्कैज़ेरो की पुस्तक इमोशनली हेल्दी स्पिरिचुअलिटी: इट्स इम्पॉसिबल टू बी स्पिरिचुअली मैच्योर व्हाइल रीमेनिंग इमोशनली इममैच्योर (ग्रैंड रैपिड्स: ज़ोंडरवैन, 2017) भी देखें।
- “पूर्वोक्त, पृष्ठ 100। इस बात को स्पष्ट रूप से समझाने के लिए सामान्यतः उद्धृत किया जाने वाला कथन जॉन कैल्विन की इंस्टीट्यूट्स की शुरुआत है: ‘हमारे पास जो भी ज्ञान है—सच्चा और स्थिर ज्ञान—वह दो भागों में बँटा हुआ है: परमेश्वर का ज्ञान और स्वयं का ज्ञान। (कैल्विन, इंस्टीट्यूट्स ऑफ द क्रिश्चियन रिलिजन, खंड 1, अनुवादक: फोर्ड लुईस बैटल्स, (लुइसविल: वेस्टमिंस्टर जॉन नॉक्स प्रेस, 1960), पृष्ठ 35।
- डेन ऑर्टलंड, और गहराई में: वास्तविक पापियों के लिए वास्तविक परिवर्तन (व्हीटन: क्रॉसवे, 2021)।
- एडवर्ड टी. वेल्च, साथ-साथ: दूसरों के साथ प्रेम और बुद्धि से चलना, (व्हीटन: क्रॉसवे, 2015)।
- वेस्टमिंस्टर लार्जर कैटेचिज़्म (https://www.ligonier.org/learn/articles/ westminster-larger-catechism); साथ ही देखें: जॉन फ्रेम, मसीही जीवन का सिद्धांत (The Doctrine of the Christian Life), (फिलिप्सबर्ग: पी एंड आर पब्लिशिंग, 2008), पृष्ठ 586।
- जिस “शालीनता” शब्द का प्रयोग मैं कर रहा हूँ, अर्थ उपयुक्तता या अनुकूलता है। “शालीनता” शब्द का यह अर्थ उस सामान्य, बोलचाल के अर्थ से भिन्न है, जहाँ इसका प्रयोग केवल न्यूनतम स्वीकार्यता या सामान्य स्तर की वस्तुओं को व्यक्त करने के लिए किया जाता है। उदाहरण के तौर पर, कोई पूछे, ‘कॉफी कैसी है?’ और उसका मित्र कहे कि, ‘ठीक-ठाक है। यहाँ ‘ठीक-ठाक है’ कहने का अभिप्राय यह है कि कॉफी वास्तव में अच्छी नहीं है — बल्कि खराब है — परन्तु जितनी खराब हो सकती थी, उससे कुछ कम है। “शालीनता” शब्द का उपयोग यहाँ इस अर्थ में किया गया है — ‘मैं इसे थूकूँगा नहीं, “परन्तु यह मुझे पसन्द भी नहीं है।” मैं इस शब्द का प्रयोग इस अर्थ में नहीं कर रहा हूँ। मैं “शालीनता” को उसी अर्थ में प्रयोग कर रहा हूँ जैसा मेरी माँ ने मुझे बचपन में पहली बार सिखाया था।जब हम भाई-बहन छोटे थे, तो माँ ने हमें बन्द दरवाज़ों को अचानक खोलकर अन्दर आने से रोकने के लिए एक बात सिखायी थी कि — पहले दरवाज़ा खटखटाओ, फिर पूछो: “क्या आप ठीक हैं?” अर्थात् क्या आपकी स्थिति और दिखावट इस बात के अनुकूल है कि मैं आपका हाल-चाल अभी पूछ सकता हूँ? यहाँ “शालीनता” का अर्थ — उपयुक्तता से है। सम्बन्धों में “शालीनता” का तात्पर्य एक ऐसा व्यवहार होता है जो बुद्धिमानी के साथ हमारे विभिन्न सम्बन्धों में अपनाया जाता है अर्थात् — आयु, लिंग और निकट, प्रत्यक्ष आवश्यकता जैसे पहलुओं को ध्यान में रखते हुए अपनाया जाता है।
- चिप डॉड और स्टीफन जेम्स, “नशे के युग में आशा: स्वतंत्रता पाने और अपने सम्बन्धों को पुनर्स्थापित करने का मार्ग” (ग्रैंड रैपिड्स: रेवेल, 2020), पृष्ठ 73।
- जेन रिगनी, जो मेरी पत्नी और मेरी एक घनिष्ठ मित्र है, उन्होंने ने इस मार्गदर्शिका के आरम्भिक लेख को पढ़ा और इस विचार पर पुरुषों और महिलाओं के बीच एक अन्तर की ओर ध्यान दिलाया। उन्होंने और मेरी पत्नी ने कहा कि महिलाओं के लिए भौगोलिक निकटता के बिना भी घनिष्ठ मित्रता बनाए रखना आसान होता है, जबकि पुरुषों के लिए यह अधिक कठिन होता है। मुझे लगता है कि पुरुषों के बीच स्थायी घनिष्ठता अधिकतर एक साझा उद्देश्य पर निर्भर करती है, जो प्रायः भौगोलिक निकटता की माँग करता है। सी. एस. लुईस ने इन विषयों पर अपनी पुस्तक द फोर लव्स में चर्चा की है। देखें: सी. एस. लुईस, द फोर लव्स: एन एक्सप्लोरेशन ऑफ़ द नेचर ऑफ़ लव, 1960 (बोस्टन: फ़र्स्ट मैरिनर बुक्स, 2012 संस्करण)।
- यह तो स्वीकार करना ही होगा कि किसी न किसी स्तर पर हमें अपरचित लोगों पर भरोसा करना पड़ता है। संसार की कार्य व्यवस्था इसी पर निर्भर होती है। इसे ‘सत्य-पूर्वग्रह सिद्धान्त कहा जाता है। मैल्कम ग्लैडवेल ने इस अवधारणा को अपनी पुस्तक टॉकिंग टू स्ट्रेंजर्स: व्हाट वी शुड नो अबाउट पीपल वी डोंट नो (बोस्टन: लिटिल, ब्राउन एंड कंपनी, 2019) में समझाया है।
- इसका यह अर्थ नहीं है कि आप ऐसे किसी यात्रा पर किसी मित्र (स्तर 3) के साथ नहीं जाएँगे, परन्तु उस स्थिति में आपके अन्दर कुछ अन्य रुचियाँ भी सक्रिय होंगी — जैसे कि आपको सड़क यात्रा पसन्द हो, या आप रॉकी पर्वतों की यात्रा करना चाहते हों, या आप कोई श्रृंखलाबद्ध कार्य को पूरा करने के लिए उत्साहित हों। सम्बन्धपरक उत्तरदायित्व की वास्तविक कसौटी यह है कि हम दूसरे के हित में कितना मूल्य चुकाने को तैयार हैं। जहाँ भरोसा अधिक होता है, वहाँ हम अधिक मूल्य चुकाने के लिए तैयार होते हैं।
- जॉन बन्यन, पिलग्रिम्स प्रोग्रेस, 1678, (कार्लाइल, पेनसिल्वेनिया: बैनर ऑफ ट्रुथ, 2009), पृष्ठ 182।
- बन्यन, पिलग्रिम्स प्रोग्रेस, पृष्ठ 184।
लेखक के बारे में
जोनाथन पार्नेल मिनियापोलिस-सेंट पॉल स्थित सिटीज़ कलीसिया के मुख्य पास्टर हैं। वे मर्सी फॉर टुडे: ए डेली प्रेयर फ्रॉम संयुक्त भजन संहिता 51 और नेवर सेटल फॉर नॉर्मल: द प्रूवन पाथ ऑफ सिग्निफिकेंस एंड हैप्पीनेस के लेखक हैं। वे अपनी पत्नी और आठ बच्चों के साथ ट्विन सिटीज़ के बीच में रहते हैं।
विषयसूची
- भाग I: सम्बन्धों की तीन श्रेणियाँ
- ऊपर से नीचे वाले — परमेश्वर से हमारा सम्बन्ध
- आन्तरिक — स्वयं के साथ हमारा सम्बन्ध
- समान स्तर वाले — दूसरों के साथ हमारे सम्बन्ध
- कुछ नहीं।
- चर्चा एवं मनन:
- भाग II: सम्बन्धपरक बुलाहट और प्रकार
- बुलाहट एवं प्रकार को लागू करना
- शालीनता की भूमिका
- निकट और दूर की शालीनता
- चर्चा एवं मनन:
- भाग III: सम्बन्धों की जटिलता को समझना और सम्भालना
- विवेक के स्तर
- चर्चा एवं मनन:
- भाग IV: सम्बन्धों का उद्देश्य
- उद्देश्य पर ध्यान देना
- अन्त टिप्पणीयाँ
- लेखक के बारे में