#16 बाइबल और इसे कैसे पढ़ें
परिचय: बाइबल पढ़ना आसान नहीं है
“मैं यीशु से मिलने के लिए इस पुस्तक को खोलता हूँ।”
ये सुनहरे अक्षरों में लिखे गए शब्द हैं, जो मेरी पहली बाइबल — एक एन.आई.वी. अनुप्रयोग अध्ययन बाइबल — के ऊपर अंकित हैं। जब मैं हाई स्कूल में था, तो मुझे यह बाइबल उपहार में मिली थी, और यह उन कई बाइबलों में से पहली बाइबल बन गई, जिन्हें मैंने पढ़ा, रेखांकित किया, समझा और गलत समझा। असल में, मैंने बाइबल पढ़ने की प्रतिदिन की आदत को आरम्भ करने के कुछ वर्ष बाद, उसके मुख-पृष्ठ पर यह छोटा सा वाक्यांश लिखा था। और मैंने इसे वहाँ इसलिए उकेरा, क्योंकि कॉलेज में, मुझे स्वयं को यह याद दिलाने की आवश्यकता थी कि बाइबल पढ़ना केवल एक शैक्षणिक अभ्यास नहीं है; यह ज्ञान की खोज में विश्वास का एक अभ्यास है। इस कारण, बाइबल पढ़ना महिमागान (प्रशंसा) और शिष्यत्व (अभ्यास) के लिए है।
या कम से कम, पवित्रशास्त्र को हमें इसी तरह पढ़ना चाहिए।
बाइबल के पूरा होने के बाद की शताब्दियों में (जिस पर हम नीचे विचार करेंगे), पवित्रशास्त्र को पढ़ने के कई तरीके सामने आए हैं। उनमें से कई विश्वास से आए हैं, जो गहरी समझ की ओर अगुवाई करते हैं। जैसा कि भजन संहिता 111:2 हमें याद दिलाता है, “यहोवा के काम बड़े हैं, जितने उनसे प्रसन्न रहते हैं, वे उन पर ध्यान लगाते हैं।” और इस प्रकार, परमेश्वर के वचन का अध्ययन हमेशा से सच्चे विश्वास का एक भाग रहा है। फिर भी, बाइबल पढ़ने के सभी तरीके समान रूप से मान्य या समान रूप से मूल्यवान नहीं हैं।
जैसा कि इतिहास दर्शाता है, कुछ सच्चे मसीहियों ने बाइबल का अनुसरण सच्चे तरीकों से नहीं किया है। कभी-कभी विभिन्न मसीही रहस्यवाद की पराकाष्ठा तक पहुँच गए हैं, रूपकवाद में उलझ गए हैं, या पारम्परिक तरीकों से पवित्रशास्त्र के अधिकार को कमजोर कर दिया है। प्रोटेस्टेंट सुधार जैसे संशोधन इसलिए आवश्यक थे, क्योंकि लूथर, केल्विन और उनके उत्तराधिकारियों जैसे लोगों ने परमेश्वर के वचन
को कलीसिया में उसके उचित स्थान पर लौटाया, जिससे कि कलीसिया के लोग बाइबल को सही तरीके से पढ़ सकें। क्योंकि यह तथ्य बना हुआ है कि हर स्वस्थ कलीसिया का स्रोत और सार बाइबल है और वही परमेश्वर को जानने तथा उसके मार्गों पर चलने का एकमात्र तरीका है। और यही कारण है कि बाइबल पढ़ना और उसे अच्छी तरह से पढ़ना इतना अधिक महत्व रखता है।
इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि बाइबल पर अक्सर आक्रमण हुए हैं। आरम्भिक कलीसिया में, कुछ आक्रमण कलीसिया के भीतरी अगुवों की ओर से भी हुए। एरियस (250-336 ईस्वी) जैसे बिशपों ने मसीह के ईश्वरत्व को नकार दिया, और पेलागियुस (लगभग 354-418 ईस्वी) जैसे अन्य लोगों ने सुसमाचार के अनुग्रह को ही नकार दिया। हाल की शताब्दियों में, बाइबल पर संशयवादियों के द्वारा आक्रमण किया गया है, जो कहते हैं कि, “बाइबल मनुष्यों की रचना है,” या उत्तर-आधुनिक लोगों के द्वारा इसे अप्रचलित कर दिया गया है, जो पवित्रशास्त्र को “परमेश्वर तक पहुँचने के अनेक मार्गों में से एक” मानते हैं। शैक्षणिक जगत में, बाइबल के विद्वान अक्सर पवित्रशास्त्र के इतिहास और सत्यता को नकार देते हैं। और लोकप्रिय मनोरंजन में, इस संसार की और उसमें उपस्थित हर वस्तु की व्याख्या करने के बजाय बाइबल का, या संदर्भ से बाहर की आयतों का उपयोग टैटू बनवाने या आत्मिक नारे के लिए अधिक किया जाता है।
इन सब बातों को मिलाकर, यह समझ में आता है कि बाइबल पढ़ना इतना कठिन क्यों है। ज्ञानोदय-के-बाद के हमारे संसार में, जो व्यक्ति बाइबल की अलौकिकता को नकारता है और उसके साथ किसी अन्य पुस्तक की तरह व्यवहार करता है, तो हमें बाइबल की आलोचनात्मक दृष्टि से समीक्षा करने और उसकी बातों पर प्रश्न उठाने के लिए आमंत्रित किया जाता है। ठीक उसी तरह, हमारी यौन-के लिए विचलित संस्कृति में, बाइबल पुरानी पड़ चुकी है, और यहाँ तक कि उससे घृणा भी की जाती है, क्योंकि यह एलजीबीटी+ सुमदाय के स्वीकरण, जैसे आधुनिक धर्मों के विरुद्ध खड़ी है। यहाँ तक कि जब बाइबल के साथ सकारात्मक रूप से व्यवहार किया जाता है, तब भी जॉर्डन पीटरसन जैसे व्यक्ति इसे विकासवादी मनोविज्ञान के चश्मे से पढ़ते हैं। इस प्रकार, केवल बाइबल पढ़ना और यीशु से मिलना कठिन है।
जब मैंने अपनी बाइबल के मुख-पृष्ठ पर स्वयं के लिए यह अनुस्मारक लिखा, तब मैं एक कॉलेज का छात्र था और धर्म के ऐसे प्रोफेसरों से कक्षाएँ ले रहा था, जो पवित्रशास्त्र की दिव्य प्रेरणा को नकारते थे। इसके बजाय, उन्होंने बाइबल को मिथकों से मुक्त करके उसकी अलौकिकता को समझाने का प्रयत्न किया। इसके उत्तर में, मैंने यह सीखना आरम्भ किया कि बाइबल कहाँ से आई है, बाइबल में क्या है, बाइबल को कैसे पढ़ा जाए, और बाइबल को जीवन के हर क्षेत्र की जानकारी कैसे देनी चाहिए। धन्यवाद कि मैं एक ऐसे कॉलेज में था, जिसका उद्देश्य विश्वास को मिटाना था, जब मैंने परमेश्वर के वचन को उसकी अपनी शर्तों पर समझने का प्रयत्न किया, तो परमेश्वर ने मुझमें उसके प्रति मेरे भरोसे को बढ़ाया।
ईश-विज्ञान और बाइबल की व्याख्या (जिसे अक्सर “हेर्मेनेयुटिक्स” कहा जाता है) के शैक्षणिक विषयों मेंगहराई से उतरकर, मुझे स्वयं को यह याद दिलाने की आवश्यकता थी कि त्रिएक परमेश्वर के साथ बातचीत करना बाइबल पढ़ने का मुख्य लक्ष्य है। परमेश्वर ने एक पुस्तक इसलिए लिखी, जिससे कि हम उसे जानें।
और आगे की बातों में, मेरी प्रार्थना है कि परमेश्वर आपको इस बारे में एक सच्ची समझ प्रदान करे कि बाइबल क्या है, यह कहाँ से आई, इसमें क्या है, और इसे कैसे पढ़ा जाए। असल में, जब हम उसके जीवन के वचनों में आनन्दित होते हैं, तो वह हम सभी को अपने बारे में एक गहरा ज्ञान प्रदान करे।
बाइबल के परमेश्वर को जानने की खोज में, यह क्षेत्रीय मार्गदर्शिका इन चार प्रश्नों के उत्तर देगी।
- बाइबल क्या है?
- बाइबल कहाँ से आई है?
- बाइबल में क्या है?
- हम बाइबल कैसे पढ़ते हैं?
प्रत्येक भाग में, केवल ऐतिहासिक या ईश-वैज्ञानिक जानकारी देने के बजाय, मैं इस प्रश्न का उत्तर आपके विश्वास को मजबूत करने के उद्देश्य से दूँगा। और अन्त में, मैं आपको यह दिखाने के लिए इन भागों को एक साथ जोड़ूँगा कि परमेश्वर को जानने और उसके मार्गों पर चलने के लिए प्रतिदिन बाइबल पढ़ना इतना अधिक महत्वपूर्ण क्यों है। क्योंकि असल में, बाइबल इसी कारण से अस्तित्व में है कि: वचनों में पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा को प्रकट करे। यदि आप उन्हें और अधिक जानने के लिए तैयार हैं, तो हम बाइबल के बारे में बात करने के लिए तैयार हैं।
ऑडियो मार्गदर्शिका
ऑडियो#16 बाइबल और इसे कैसे पढ़ें
1 बाइबल क्या है?
इस प्रश्न का उत्तर बहुआयामी इसलिए है, क्योंकि बाइबल ने संसार को आकार देने में बहुमुखी भूमिका निभाई है। “परमेश्वर का लिखित वचन” (WCF 1.2) होने के अतिरिक्त, बाइबल एक सांस्कृतिक कलाकृति, सभ्यता का एक गढ़, एक साहित्यिक उत्कृष्ट कृति, ऐतिहासिक जाँच का विषय और कभी-कभी उपहास का पात्र भी है। फिर भी, जो लोग बाइबल को एक अमूल्य निधि मानते हैं, और जिन कलीसियाओं ने इसकी सलाह की सम्पूर्णता पर पर अपने आप का निर्माण किया है, उनके लिए बाइबल प्रेरणा या धार्मिक भक्ति की एक पुस्तक से कहीं बढ़कर है।
जैसा इब्रानियों 1:1 में आरम्भ होता है, बाइबल परमेश्वर के ही ऐसे वचन हैं, जो “पूर्व युग में… बापदादों से थोड़ा थोड़ा करके और भाँति–भाँति से भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा बातें कर” कहे गए थे। असल में, परमेश्वर ने प्राचीन काल में अपने लोगों से बात की थी, परन्तु आग में से इस्राएल से बात करने के सैकड़ों वर्ष बाद (व्यव. 4:12, 15, 33, 36), इब्रानियों की पत्री का लेखक कह सका, “इन अन्तिम दिनों में हम से पुत्र के द्वारा बातें कीं।”
इस रीति से, बाइबल केवल एक साथ एकत्र की गई कोई धार्मिक पुस्तक नहीं है। और न ही यह कोई साहित्यिक कृति है, जिसका इतिहास से कोई सम्बन्ध नहीं है। इसके बजाय, बाइबल परमेश्वर का प्रगतिशील प्रकाशन है, जिसने संसार में उसके उद्धार और न्याय के कार्यों की सिद्ध रीति से व्याख्या की है। और तो और, पुराने नियम की उन्तालीस पुस्तकों ने अनन्त वचन के देहधारी होने और हमारे बीच निवास करने के लिए मार्ग तैयार करने में एक अनूठी भूमिका निभाई (यूह. 1:1–3, 14), और मसीह के स्वर्गारोहण के बाद लिखी गईं सत्ताईस पुस्तकों ने उसके जीवन, मृत्यु, पुनरुत्थान और महिमान्वित होने की गवाही दी। आज के समय में भी, परमेश्वर का वचन छुटकारे के अपने उद्देश्यों को पूरा करता रहता है, जबकि परमेश्वर के वचन का प्रकाशन यूहन्ना के प्रकाशितवाक्य के अन्त में समाप्त हो गया (प्रका, 22:18–19 को देखें)।1
इस क्षेत्रीय मार्गदर्शिका को लिए, हम उन सभी तरीकों पर गहराई से विचार नहीं करेंगे, जिनसे बाइबल ने संसार को आकार दिया है और स्वयं संसार के द्वारा आकार लिया गया है।2 इसके बजाय, हम अपना समय इस धार्मिक प्रश्न का उत्तर देने में व्यतीत करेंगे: बाइबल क्या है, जैसा कलीसिया ने इसे ग्रहण किया है? इस प्रश्न के लिए, मैं तीन उत्तर प्रस्तुत करूँगा — एक जो प्रोटेस्टेंट अंगीकार से आता है, एक जो बाइबल की ग्रंथ-सूची से आता है, और एक जो पवित्र आत्मा की गवाही से आता है, जिसने बाइबल को प्रेरणा दी।
अंगीकारों के अनुसार
सन् 1517 में, एक जर्मन भिक्षु ने विट्टनबर्ग किले के द्वार पर एक हथौड़े से 95 सिद्धान्तों को कीलों से ठोंक दिया।3 एक प्रशिक्षित ईश-वैज्ञानिक और अध्ययनशील पास्टर, मार्टिन लूथर इस बात से चिन्तित थे कि कैसे रोमन कैथोलिक कलीसिया ने उन्हें और अन्य लोगों को यह विश्वास दिलाने के लिए पथभ्रष्ट किया था कि धार्मिकता केवल मसीह के पूरे किए गए कार्य में विश्वास करने — जो कि केवल परमेश्वर के अनुग्रह से होता है, के बजाय संस्कारों की अन्तहीन भूलभुलैया के माध्यम से प्राप्त होती है। असल में, पवित्रशास्त्र के अपने अध्ययन के द्वारा, लूथर को यह विश्वास हो गया था कि रोमन कैथोलिक कलीसिया ने सुसमाचार और केवल विश्वास के द्वारा धर्मी ठहराए जाने के उसके सन्देश को खो दिया है।4 इसी के अनुसार, उन्होंने अपने 95 सिद्धान्तों के साथ प्रोटेस्टेंट सुधार को प्रज्वलित किया।
इसके बाद के दशकों में, प्रोटेस्टेंट सुधार ने सुसमाचार और उसके स्रोत, अर्थात् बाइबल को फिर से प्राप्त किया। रोमन कैथोलिक कलीसिया के विपरीत, जिसने बाइबल की दिव्य उत्पत्ति और अधिकार की पुष्टि की, परन्तु कलीसिया की परम्परा को भी बाइबल के समान स्तर पर रखा, लूथर, जॉन कैल्विन और उलरिच ज़्विंगली जैसे लोगों ने यह सिखाना आरम्भ कर दिया कि बाइबल ही प्रेरित प्रकाशन का एकमात्र स्रोत है। जबकि रोमन कैथोलिक कलीसिया ने सिखाया कि परमेश्वर दो स्रोतों से, अर्थात् बाइबल और कलीसिया के माध्यम से बात करता है, सुधारकों ने सही ढंग से पवित्रशास्त्र की विशेष प्रकाशन के एकमात्र स्रोत के रूप में पुष्टि की। जैसा कि लूथर ने प्रसिद्ध रूप से कहा था,
जब तक मैं पवित्रशास्त्र की गवाही या स्पष्ट कारण से आश्वस्त नहीं हो जाता — क्योंकि मैं न तो पोप और न ही महासभाओं पर अकेले विश्वास कर सकता हूँ, जैसा कि यह स्पष्ट है कि उन्होंने बार-बार गलतियाँ की हैं और स्वयं का खण्डन किया है — तब तक मैं स्वयं को मेरे द्वारा प्रस्तुत किए गए पवित्रशास्त्र से पराजित मानता हूँ और मेरा विवेक परमेश्वर के वचन का बन्दी है।5
असल में, बाइबल को परमेश्वर का वचन मानने के लूथर के समर्थन को सभी सुधारकों ने दोहराया। और आज के समय में, उस सुधार के उत्तराधिकारी पवित्रशास्त्र को परमेश्वर के प्रेरित और आधिकारिक वचन के रूप में मानते हैं। और इस दृढ़ विश्वास को देखने का सबसे अच्छा स्थान प्रोटेस्टेंट सुधार से आए अंगीकारों में मिलता है। उदाहरण के लिए, बेल्जिक अंगीकार (सुधारित), उन्तालीस लेख (एंग्लिकन), और वेस्टमिंस्टर विश्वास का अंगीकार (प्रेस्बिटेरियन), ये सभी उस सुधार: सोला स्क्रिप्चरा के औपचारिक सिद्धान्त की पुष्टि करते हैं। फिर भी, केवल एक अंगीकार की परम्परा का उल्लेख करते हुए, मैं अपनी स्वयं की परम्परा प्रस्तुत करूँगा: द्वितीय लंदन बैपटिस्ट अंगीकार (1689)।
पहले अध्याय के आरम्भिक अनुच्छेद में, लंदन के बैपटिस्ट पास्टरों ने परमेश्वर के वचन में अपने विश्वास की घोषणा की।
1. पवित्रशास्त्र ही समस्त उद्धारकारी ज्ञान, विश्वास और आज्ञाकारिता का एकमात्र पर्याप्त, निश्चित और अचूक मानक है। प्रकृति का प्रकाश और सृष्टि तथा प्रावधान के कार्य परमेश्वर की भलाई, बुद्धि और सामर्थ्य को इतनी स्पष्टता से प्रदर्शित करते हैं कि लोगों के पास कोई बहाना नहीं बचता; हालाँकि, ये प्रदर्शन परमेश्वर और उसकी इच्छा का ज्ञान देने के लिए पर्याप्त नहीं हैं, जो उद्धार के लिए आवश्यक है। इस कारण, प्रभु अलग-अलग समय पर और विभिन्न तरीकों से स्वयं को प्रकट करने और अपनी कलीसिया के सामने अपनी इच्छा की घोषणा करने के लिए प्रसन्न हुआ। सत्य को बेहतर ढंग से संरक्षित और प्रचारित करने तथा देह के भ्रष्टाचार और शैतान तथा संसार के द्वेष के विरुद्ध कलीसिया को अधिक निश्चितता के साथ स्थापित करने और सांत्वना देने के लिए, प्रभु ने इस प्रकाशन को पूरी तरह से लिखित रूप में प्रस्तुत किया। इस कारण, पवित्रशास्त्र अत्यन्त आवश्यक है, क्योंकि परमेश्वर के द्वारा अपनी इच्छा को अपने लोगों के सामने प्रकट करने के पूर्व तरीके अब समाप्त हो गए हैं।
इस कथन में, उन्होंने पवित्रशास्त्र की पर्याप्तता, आवश्यकता, स्पष्टता और अधिकार की पुष्टि की। पवित्रशास्त्र के ये चार गुण सभी प्रोटेस्टेंट लोगों के द्वारा बाइबल के बारे में सोचने के तरीके को इसलिए स्पष्ट करते हैं, क्योंकि असल में बाइबल स्वयं अपने बारे में इसी तरह से बोलती है। और इस प्रकार, बाइबल कलीसिया की पुस्तक, धार्मिक पुस्तकों का संग्रह, या फिर परमेश्वर के बारे में प्रेरक साहित्य का पुस्तकालय मात्र नहीं है। बाइबल “परमेश्वर का लिखित वचन” (WCF 1.2) है, और कलीसिया के इतिहास में जिन लोगों ने परमेश्वर के वचन को गम्भीरता से लिया है, उन्होंने इसके साथ ऐसा व्यवहार किया है कि मानो यह मानवीय शब्दों में परमेश्वर का वचन है। और उन्होंने ऐसा इसलिए किया, क्योंकि वे स्वयं पवित्रशास्त्र की गवाही पर विश्वास करते हैं।
ग्रंथ-सूची के अनुसार
द्वितीय लंदन जैसे अंगीकार चाहे जितने भी सहायक हों, प्रोटेस्टेंट लोग केवल कलीसिया की परम्पराओं या मनुष्यों की गवाही को ही बाइबल के बारे में कोई भी विश्वास विकसित करने के लिए पर्याप्त नहीं मानते। इसके बजाय, हम विश्वास करते हैं कि पवित्रशास्त्र स्वयं अपने बारे में गवाही देता है। उदाहरण के लिए, 2 तीमुथियुस 3:16 कहता है कि सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र “परमेश्वर की प्रेरणा से रचा गया है” (थियोप्न्यूस्टोस)। इसी प्रकार, 2 पतरस 1:19-21 भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा लिखी गई हर बात का स्रोत पवित्र आत्मा को बताता है। इसके संदर्भ में, पतरस यहाँ तक सुझाव देता है कि भविष्यद्वक्ताओं के वचन तो रूपांतरण के पर्वत पर उसके अपने अनुभव से भी अधिक निश्चित हैं, जब उसने परमेश्वर की बोलने वाली आवाज सुनी थी (2 पत. 1:13-18)। रोमियों 15:4 में पौलुस भी कहता है, “जितनी बातें पहले से लिखी गईं, वे हमारी ही शिक्षा के लिए लिखी गईं हैं कि हम धीरज और पवित्रशास्त्र के प्रोत्साहन द्वारा आशा रखें।” थोड़े शब्दों में कहें तो पवित्रशास्त्र स्वयं परमेश्वर के प्रेरित वचन के रूप में गवाही देता है।
ठीक उसी तरह से, जैसे नया नियम यीशु मसीह की गवाही देता है और यह प्रकट करता है कि कैसे परमेश्वर की सभी प्रतिज्ञाएँ उनमें अपना उत्तर पाती हैं (2 कुरिं. 1:20)। कहने का अर्थ यह है कि पवित्रशास्त्र अपने आप में एक अन्त नहीं है। इसके बजाय, यह “मसीह की गवाही है, जो स्वयं ईश्वरीय प्रकाशन का केन्द्र-बिंदु हैं” (BFM 2000)। बाइबल का मसीह-केन्द्रित स्वभाव बताता है कि नये नियम का एक भी अनुच्छेद पुराने नियम के संदर्भ के बिना क्यों नहीं पढ़ा जा सकता। व्यवस्था, भविष्यद्वक्ता और लेखन — इब्रानी भाषा की बाइबल के तीन भाग — ये सभी मसीह की ओर संकेत करते हैं। और मसीह स्वयं को पुराने नियम का विषय (यूह. 5:39) और वह व्यक्ति बताता है, जिसकी ओर सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र संकेत करता है (लूका 24:27, 44-49)।
इसी के तुल्य, यीशु उस तरीके का पूर्वाभास करता है, जिसमें उसके जाने के बाद आत्मा आएगा और उसके बारे में गवाही देगा (यूह. 15:26; 16:13 को देखें)। अपनी मृत्यु से एक रात पहले, यीशु ने अपने शिष्यों को कई निर्देश दिए कि वह चला जाएगा, परन्तु वह पवित्र आत्मा को भेजेगा (यूह. 16:7)। वह सत्य का आत्मा उन्हें उसकी कही हर बात याद दिलाएगा और उसके गवाहों को उसके बारे में सच्चाई बताने में सक्षम करेगा। इसी रीति से, हम विश्वास करते हैं कि बाइबल परमेश्वर का वचन है, क्योंकि बाइबल हमें ऐसा बताती है।
आत्मा की गवाही के अनुसार
परन्तु इतनी जल्दी नहीं! यदि बाइबल अपने आप में अधिकार और प्रामाणिकता का स्रोत है, तो हम कैसे जानेंगे कि यह किसी प्रकार का पूर्व-आधुनिक प्रचार नहीं है? क्या यह तर्क-वितर्क की यह पंक्ति चक्रीय तर्क-वितर्क की भ्रांति में नहीं जाती? और क्या यही कारण नहीं है कि लोग और कलीसियाएँ बाइबल के बाहर किसी अधिकार की खोज में रहते हैं? ये सारे प्रश्न महत्वपूर्ण हैं, परन्तु सबसे अच्छा उत्तर हमें परमेश्वर के प्रकाशन के स्रोत, अर्थात् उसकी आत्मा की ओर वापस ले जाता है, जिसने उसके वचन से बात की है।
थोड़े शब्दों में कहें तो बाइबल से बाइबल के लिए तर्क-वितर्क चक्रीय तर्क-वितर्क का एक उदाहरण है। परन्तु इस तर्क-वितर्क का अर्थ यह नहीं है कि यह भ्रांति है। क्योंकि असल में, अधिकार के सभी दावे विस्तारित रूप में चक्रीय होते हैं। यदि बाइबल आधिकारिक होने का दावा करे और साथ ही बाइबल से बाहर की किसी बात से अपनी प्रामाणिकता सिद्ध भी करे, तो वह व्यक्ति, संस्था या सत्ता जिस पर बाइबल निर्भर करती है, वह बाइबल पर अधिकार प्राप्त कर लेता है। और इसलिए, बाइबल आखिरकार आधिकारिक नहीं है। इसके बजाय, यह उस सीमा तक आधिकारिक है, जिस सीमा तक का बड़ा अधिकार इसे अधिकार रखने की अनुमति देता है। यह रोमन कैथोलिक कलीसिया की गलती थी, जिसने कलीसिया को यह निर्धारित करने का अधिकार दिया कि बाइबल में कौन सी पुस्तकें होंगी और अपनी दीर्घकालिक परम्पराओं के आधार पर बाइबल की व्याख्या करने का अधिकार दिया।
इसके विपरीत, जॉन कैल्विन और बाकी के सुधारकों ने बाइबल के “स्व-प्रमाणन” की बात की।6 बाइबल परमेश्वर का वचन इसलिए है, क्योंकि बाइबल स्वयं को ऐसा घोषित करती है, और इसकी वैधता इस बात में पाई जाती है कि जो कुछ भी वह बाकी सभी बातों के बारे में कहती है, उससे उसकी गवाही सिद्ध होती है। इसी तरह, क्योंकि जिस पवित्र आत्मा ने बाइबल को प्रेरित किया और आज भी इसे सुनने वालों पर इसकी सत्यता का प्रभाव डालता रहता है, उससे हम जान सकते हैं कि बाइबल परमेश्वर का वचन है। दूसरे शब्दों में कहें तो क्योंकि बाइबल का मूल (एक बाह्य वास्तविकता) और बाइबल की प्रामाणिकता में व्यक्ति का विश्वास (एक महसूस की जाने वाली मान्यता) दोनों एक ही स्रोत (पवित्र आत्मा) से आते हैं, इसलिए हम इस बात पर सच्चा विश्वास कर सकते हैं कि बाइबल परमेश्वर का वचन है। जैसा कि सुधारक हेनरिक बुलिंगर ने कहा था,
इस कारण यदि परमेश्वर का वचन हमारे कानों में गूँजे, और वहाँ परमेश्वर का आत्मा हमारे हृदयों में अपनी सामर्थ्य प्रकट करे, और हम विश्वास में होकर परमेश्वर का वचन सचमुच ग्रहण करें, तो परमेश्वर का वचन हमारे भीतर एक प्रबल जोर और अद्भुत प्रभाव डालता है। क्योंकि यह गलतियों के धुंधले अंधकार को दूर भगाता है, हमारी आँखें खोलता है, हमारे मनों को परिवर्तित और प्रज्ज्वलित करता है, तथा हमें सत्य और भक्ति में पूर्ण रूप से और भरपूरी से निर्देश देता है।7
जो लोग पवित्रशास्त्र के लेखकों को सुनने के इच्छुक हैं, उन्हें चौदह सौ वर्षों की अवधि में तीन अलग-अलग भाषाओं (इब्रानी, यूनानी और कुछ अरामी) में लिखने वाले लगभग चालीस मनुष्यों की एकीकृत गवाही मिलेगी। यह सम्भावना असम्भव है कि ऐसी रचना केवल मानवीय लेखकों के द्वारा ही सुस्पष्ट रूप से रची जा सके। फिर भी, साहित्यिक एकता के दृश्यमान प्रमाण शक्तिशाली हैं, परन्तु हम जीवित परमेश्वर पर निर्भर बने रहते हैं कि वह स्वयं को हम पर प्रकट करे। और इस कारण, आत्मा की गवाही ही अन्त में हमें बाइबल पर विश्वास करने के लिए प्रेरित करती है (यूह. 16:13)।
संक्षेप में कहें तो परमेश्वर ने बात की है और उसकी बातें बाइबल की छियासठ पुस्तकों में मिलती हैं। या कम से कम, ये वही पुस्तकें हैं, जिन्हें प्रोटेस्टेंट अपनी बाइबल में मानते हैं।
चर्चा एवं मनन:
- “बाइबल क्या है?” इस प्रश्न का उत्तर आप कैसे देंगे? ऊपर दी गई सामग्री को आप अपने शब्दों में कैसे प्रस्तुत करेंगे?
- आपने अभी जो कुछ पढ़ा, क्या वह आपके लिए नया या आश्चर्यजनक था? किस बात ने आपको चुनौती दी?
- बाइबल परमेश्वर का वचन है, यह सत्य आपके इसे पढ़ने के तरीके को कैसे प्रभावित करता है?
2
बाइबल कहाँ से आई है?
जब हम बाइबल की बात करते हैं, तो हम बाइबल की ग्रंथ-सूची की पुस्तकों की बात कर रहे होते हैं। जैसा कि आर. एन. सौलेन ने इस शब्द को परिभाषित किया है, ग्रंथ-सूची “विश्वास और अभ्यास के एक आधिकारिक नियम के रूप में स्वीकृत पुस्तकों का संग्रह” है।8 इब्नानी भाषा में, ग्रंथ-सूची शब्द कनेह शब्द से आया है, जिसका अर्थ “सरकण्डा” या “डण्ठल” हो सकता है। यूनानी भाषा में, कानोन शब्द का अर्थ अक्सर एक नियम या
सिद्धान्त का विचार होता है (गला. 6:16 को देखें)। दोनों भाषाओं को जोड़ते हुए, पीटर वेगनर लिखते हैं, “कुछ सरकण्डों का उपयोग मापने की छड़ियों के रूप में भी किया जाता था, और इस प्रकार [कनेह, कानोन] शब्द का एक व्युत्पन्न अर्थ ‘नियम’ बन गया।”9
और इस प्रकार यह इस शब्द की पृष्ठभूमि की व्याख्या करता है। परन्तु इसकी प्रमाणिकता के बारे में क्या कहें? किसी पुस्तक को “मान्यता प्राप्त” कैसे होती है, या ऐसे कैसे कहा जाता है? बाइबल, कलीसिया और कौन किसे अधिकृत करता है, इन सब बातों को समझने के लिए यह प्रश्न अत्यन्त महत्वपूर्ण है।
इन प्रश्नों के इस समूह के उत्तर में, यह सोचना परीक्षा में डालता है कि कलीसिया बाइबल को अधिकृत करती है और यह निर्धारित करता है कि कौन सी पुस्तकें ग्रंथ-सूची में होनी चाहिए। ट्रेंट की महासभा के चौथे सत्र में अपोक्रिफा की पुस्तकों को मान्यता देते हुए यही किया गया था, और यही डैन ब्राउन ने भी किया था, जब उन्होंने अपने सर्वाधिक बिकने वाले उपन्यास, द दाविंची कोड में यह कल्पना की थी कि सम्राट कॉन्सटेंटाइन ने चार सुसमाचारों को चुना और बाकी को छिपा दिया। अपोक्रिफा (छिपी हुई बातों) की भाषा भी इस प्रकार की सोच की ओर संकेत करती है, परन्तु वास्तव में यह भ्रामक बात है।
जैसा कि हमने ऊपर ध्यान दिया है, बाइबल का स्रोत स्वयं परमेश्वर है, और आत्मा ही वह व्यक्ति है, जिसने लेखकों को वह लिखने के लिए प्रेरित किया, जो उन्होंने लिखा है, जिससे कि पिन्तेकुस्त के समय से आगे (प्रेरि. 2 अध्याय), पवित्र आत्मा बाइबल के पाठकों के मन को प्रकाशित करे। एक बार ग्रंथ-सूची से हटा देने से पहले दो बार उसकी प्रमाणिकता के लिए, कलीसिया ने उन पुस्तकों को अधिकृत नहीं किया, जिनसे ग्रंथ-सूची की रचना होगी, कलीसियाओं ने (आत्मा के नेतृत्व में) बाइबल की पुस्तकों को परमेश्वर के द्वारा प्रेरित और उन पर अधिकार रखने वाला माना। दूसरे शब्दों में कहें तो कलीसिया ने बाइबल की रचना नहीं की; परमेश्वर के वचन के रूप में, बाइबल ने कलीसिया की रचना की। यह एक सरल अन्तर है, परन्तु इसके निहितार्थ व्यापक हैं।
बाइबल के ग्रंथ-सूची के बारे में हम जो सोचते हैं, वह काफी हद तक इस बात को निर्धारित करेगा कि हम बाइबल को कैसे पढ़ते हैं। क्या बाइबल की पुस्तकें परमेश्वर का काम है, जिन्हें मनुष्यों ने मान्यता दी है? या क्या यह ग्रंथ-सूची (अर्थात् बाइबल) परमेश्वर के प्रति समर्पित मनुष्यों का काम है? रोमन कैथोलिक इसका एक अलग उत्तर देते हैं, और प्रोटेस्टेंट कोई दूसरा उत्तर देते हैं। और वे इस प्रश्न का उत्तर अलग-अलग इसलिए देते हैं, क्योंकि वे कलीसिया के अधिकार को अलग तरह से समझते हैं।
इसे संक्षेप में बताया जाए तो कलीसिया की पहली शताब्दियों में, अलग-अलग सभाओं को यह निर्धारित करना होता था कि कौन सी पत्री, सुसमाचार और भविष्यद्वाणियाँ परमेश्वर के द्वारा प्रेरित हैं और कौन सी नहीं। और उन निर्णयों से एक मान्यता प्राप्त ग्रंथ-सूची का जन्म हुआ। असल में, ऐसे निर्णय स्वयं पवित्रशास्त्र में भी देखे जाते हैं। क्योंकि पौलुस स्वयं कह सकता था, “यदि कोई मनुष्य अपने आप को भविष्यद्वक्ता या आत्मिक जन समझे, तो यह जान ले कि जो बातें मैं तुम्हें लिखता हूँ, वे प्रभु की आज्ञाएँ हैं” (1 कुरिं. 14:37)। इसके विपरीत, जो कोई उसके वचनों को नहीं मानता, उसे स्वयं को आत्मिक (अर्थात्, आत्मा से भरा हुआ) नहीं समझना चाहिए।
ठीक इसी प्रकार, पौलुस थिस्सलुनीके की कलीसिया को चुनौती देता है कि वह उसके वचनों को ऐसा समझें कि जैसे प्रभु की ओर से आए हों (2 थिस्स. 3:6, 14)। और पतरस, अपनी समझ से, पौलुस के वचनों को परमेश्वर की ओर से आने वाले वचन मानता है (2 पत. 3:15-16), ठीक वैसे ही जैसे उसने पहले घोषणा की थी कि प्रभु यीशु की आज्ञा “प्रेरितों के द्वारा” आती है (2 पत. 3:2)। यूहन्ना भी इसी बात का अनुसरण करता है, जब वह घोषणा करता है कि, “हम परमेश्वर के हैं। जो परमेश्वर को जानता है, वह हमारी सुनता है; जो परमेश्वर को नहीं जानता वह हमारी नहीं सुनता। इस प्रकार हम सत्य की आत्मा और भ्रम की आत्मा को पहचान लेते हैं” (1 यूह. 4:6)। यूहन्ना झूठे शिक्षकों के विरुद्ध संघर्ष कर रहा है, और वह कहता है कि जो आत्मा वाले हैं, वे आत्मा की वाणी सुनना जानते हैं (यूह. 10:27 से तुलना करें)।
कुल मिलाकर, नया नियम हमें सिखाता है कि परमेश्वर का वचन कलीसिया के द्वारा सक्रिय रूप से निर्धारित किया गया कोई कार्य नहीं था। इसके बजाय, परमेश्वर का वचन कलीसिया के द्वारा निष्क्रिय रूप से स्वीकार किया गया था। और यही कारण है कि प्रेरितों और भविष्यद्वक्ताओं के वचनों की पुष्टि पवित्र आत्मा के कार्यों के द्वारा हुई (इब्रा. 2:4)। वास्तव में, 2 कुरिन्थियों 12:12 में पौलुस यह कह सकता था कि लोगों के बीच किए गए चिन्ह और अद्भुत कार्य परमेश्वर की ओर से हुए थे, जिससे कि लोग जान लें कि उसे प्रभु की ओर से भेजा गया था और वह सत्य वचन कहता था।
सच कहूँ तो प्रेरितों और उनकी शिक्षाओं की सत्यता को समझना ही आरम्भिक कलीसिया का कार्य था। और तीन शताब्दियों के दौरान, यीशु मसीह के पुनरुत्थान से लेकर सन् 367 ईस्वी में अथेनासियुस की पुनरुत्थान की पत्री तक, प्रत्येक स्थानीय कलीसिया, और एक-दूसरे के साथ संवाद करने वाली कलीसियाओं को, बड़ी संख्या में पाण्डुलिपियों को या तो स्वीकार करना पड़ा या अस्वीकार करना पड़ा। परन्तु महत्वपूर्ण बात यह है कि उस काल में, जब नये नियम की ग्रंथ-सूची की रचना हो रही थी, तो उसकी रचना सृजन की नहीं, बल्कि ग्रहण करने की प्रक्रिया थी। और इससे भी बढ़कर, क्योंकि मसीह के दिनों में पुराने नियम की ग्रंथ-सूची पर कोई विवाद नहीं था, इसलिए इसने उस ठोस आधार का काम किया, जिस पर नये नियम की ग्रंथ-सूची का निर्माण हुआ।
इस बाकी के भाग में, मैं प्रत्येक नियम के लिए तीन कारण बताऊँगा कि आज हम जिस बाइबल को हमारे हाथों में थामे हुए हैं, उस पर हम भरोसा क्यों कर सकता है।
पुराना नियम
नया नियम इस बात की लगातार गवाही देता है कि मूसा की पुस्तकें (तोरह), भविष्यद्वक्ताओं के वचन (नवीम), और भजन संहिता या लेखन (केतुवीम) पुराने नियम की ग्रंथ-सूची की पुस्तकें थीं।10 इस कारण से, “पुराने नियम के मूल तत्व के बारे में [विद्वानों का] बहुत कम विवाद है या कोई विवाद नहीं है, जिसका हम नये नियम में उपयोग होते हुए देखते हैं।”11 इतने पर भी, मैं तीन कारण बताता हूँ कि हमें यह विश्वास क्यों होना चाहिए कि अपोक्रिफा की ये अतिरिक्त चौदह पुस्तकें ग्रंथ-सूची से हटा दी गई हैं।
- पहला कारण, जब तक अपोक्रिफा की पुस्तकें लिखी गईं, तब तक परमेश्वर के आत्मा ने बोलना बन्द कर दिया था।
जैसा कि बहुत से स्रोतों के द्वारा ध्यान दिया गया है, मलाकी के बाद परमेश्वर के आत्मा ने फिर कभी बात नहीं की। उदाहरण के लिए, बेबीलोन का तालमुद इस बात की घोषणा करता है, “हाग्गै, जकर्याह और मलाकी भविष्यद्वक्ताओं की मृत्यु के बाद, पवित्र आत्मा इस्राएल से चला गया, परन्तु फिर भी उन्होंने स्वर्ग से आने वाली वाणी का लाभ उठाया” (योमाह 9ब)। इसी रीति से, इतिहासकार जोसेफुस ने अगेंस्ट एपियन में लिखा है, “अर्तक्षत्र से लेकर हमारे समय तक एक सम्पूर्ण इतिहास लिखा गया है, परन्तु भविष्यद्वक्ताओं के सटीक क्रम की विफलता के कारण, इसे पहले के अभिलेखों के तुल्य श्रेय देने योग्य नहीं माना गया है” (1.41)। इसी तरह, अपोक्रिफा वाली पुस्तकों में से एक, 1 मक्काबियों, अपने समय को भविष्यद्वक्ताओं से रहित मानती है (4:45-46)। इस प्रकार, यह स्पष्ट है कि मलाकी और मत्ती के बीच लिखी गई बातों में, प्रेरणा वाला पवित्रशास्त्र नहीं था।
- दूसरा कारण, आरम्भिक कलीसिया ने ग्रंथ-सूची वाली और बिना ग्रंथ-सूची वाली पुस्तकों के बीच स्पष्ट अन्तर किया।
सन् 382-404 ईस्वी तक, जेरोम ने बाइबल का अनुवाद लातीनी भाषा में किया। और समय के साथ-साथ, उसके अनुवाद को लातीनी वुलगेट के रूप में जाना जाने लगा, जो लोगों की आम भाषा का प्रतीक के रूप में उपयोग होने वाला शब्द है।12 अपने अनुवाद कार्य में, उसे “सेप्टुआजेंटल प्लस” मिले, जो पुराने नियम के यूनानी भाषा के अनुवाद में शामिल अतिरिक्त पुस्तकें थीं।13 मूल इब्रानी भाषा से अनुवाद करने की आवश्यकता को समझते हुए, और केवल यूनानी भाषा के अनुवाद पर निर्भर न रहकर, उसने शीघ्र ही समझ लिया कि सेप्टुआजेंट में पाई जाने वाली सभी पुस्तकें एक समान महत्व की नहीं थीं। इस प्रकार, उसने ग्रंथ-सूची की पुस्तकों को उनतालीस तक सीमित कर दिया जो आज के समय की प्रोटेस्टेंट बाइबलों में पाई जाती हैं।14 इसके बदले में, अपोक्रिफा वाली पुस्तकों को उसने ऐतिहासिक निर्देश के लिए स्थान रखने के रूप में तो स्वीकार किया, परन्तु सिद्धान्त निर्धारण के लिए नहीं।15 ऐसा अधिकार केवल ग्रंथ-सूची की पुस्तकों के पास ही था।
धर्मसुधार तक आने वाली शताब्दियों में, जेरोम के द्वारा ग्रंथ-सूची वाली और बिना ग्रंथ-सूची वाली पुस्तकों के बीच का अन्तर काफी हद तक लुप्त हो गया था। और जब उसका लातीनी भाषा का अनुवाद जन-पुस्तक बन गया, तो अपोक्रिफा वाली पुस्तकों को अक्सर इसमें शामिल किया जाने लगा।16 इसके अनुसार, इस माध्यम ने एक सन्देश का निर्माण किया, और अपोक्रिफा स्वीकृत ग्रंथ-सूची का हिस्सा बन गया। इस समावेशन ने रोमन कैथोलिक कलीसिया में गलत सिद्धान्तों को बढ़ावा दिया, जैसे मरे हुओं के लिए प्रार्थना करना (2 मक्का. 12:44-45) और दान देने के द्वारा उद्धार पाना (तोबि. 4:11; 12:9)। हम देख सकते हैं कि आरम्भिक कलीसिया ने ग्रंथ-सूची वाली और बिना ग्रंथ-सूची वाली पुस्तकों के बीच स्पष्ट अन्तर क्यों किया।
- तीसरा कारण, इस धर्मसुधार ने इब्रानी भाषा की बाइबल को फिर से प्राप्त किया।
जब मार्टिन लूथर जैसे सुधारकों ने “सोला स्क्रिप्चरा” (“केवल पवित्रशास्त्र”) का समर्थन करना आरम्भ किया, तो ग्रंथ-सूची का प्रश्न फिर से उठा। और प्रोटेस्टेंट लोगों के बीच, अपोक्रिफा को उसके उचित स्थान पर लौटा दिया गया — अर्थात् ऐसी पुस्तकों का चयन किया गया, जो उनके इतिहास के लिए तो उपयोगी थीं, परन्तु आधिकारिक सिद्धान्त के लिए उपयोगी नहीं थीं। यह इस बात से स्पष्ट है कि लूथर, टिंडेल, कवरडेल और अन्य प्रोटेस्टेंट बाइबल अनुवादकों ने जेरोम के भेद का पालन किया, और अपोक्रिफा वाली पुस्तकों को अपने-अपने बाइबल अनुवादों में परिशिष्टों में स्थानांतरित कर दिया।17
इसके विपरीत, ट्रेंट की महासभा (सन् 1545-63) ने इन पुस्तकों को सिद्धान्त के लिए प्रामाणिक माना और उनकी प्रमाणिकता के लिए प्रश्न उठाने वाले किसी भी व्यक्ति को दोषी ठहराया। इसके अतिरिक्त, वेटिकन की पहली महासभा (सन् 1869-70) ने इस बात की पुष्टि की और तर्क दिया कि ये पुस्तकें “पवित्र आत्मा से प्रेरित थीं और उसके बाद उन्हें कलीसिया को सौंप दिया गया।”18 यह विभाजन अभी भी प्रोटेस्टेंट और रोमन कैथोलिक लोगों के बीच बना हुआ है। फिर भी, ऊपर बताए गए कारणों से, जेरोम के इस भेद को मानना सबसे अच्छा है कि अपोक्रिफा की पुस्तकें सिद्धान्त स्थापित करने के लिए न तो आवश्यक हैं और न ही उपयुक्त हैं। इसके बजाय, वे केवल इस्राएली लोगों के बीच परमेश्वर के कार्य की कहानी को ऐतिहासिक पृष्ठभूमि प्रदान करने में सहायक हैं।19
नया नियम
यदि नया नियम पुराने नियम की पुस्तकों की पुष्टि करता है, तो नये नियम की पुस्तकों की पुष्टि कौन करता है? पहली बार देखने पर, यह प्रश्न अधिक चुनौतीपूर्ण प्रतीत होता है। परन्तु जिस तरह यीशु और आरम्भिक कलीसिया उन पुस्तकों के विपरीत जो आत्मा की ओर से नहीं आई थी, यह पहचान कर पाई कि पवित्रशास्त्र पवित्र आत्मा की ओर से आया है (2 पत. 1:19-21; और 2 तीमु. 3:16 से तुलना करें), ठीक उसी तरह आरम्भिक कलीसिया भी उन सुसमाचारों और पत्रियों की पहचान कर पाई जो प्रेरितों ने लिखी थीं और जो उन्होंने नहीं लिखी थी।
- सबसे पहली बात, ग्रंथ-सूची की उत्पत्ति नये नियम में ही देखी जा सकती है।
उदाहरण के लिए, 1 तीमुथियुस 5:18 में मूसा और लूका का उल्लेख करते हुए, पौलुस दोनों को पवित्रशास्त्र के रूप में संदर्भित करता है: “क्योंकि पवित्रशास्त्र कहता है, “दाँवनेवाले बैल का मुँह न बाँधना,” [व्यव. 25:4] क्योंकि “मजदूर अपनी मजदूरी का हक्कदार है [लूका 10:7]।” ठीक इसी तरह, पतरस पौलुस की पत्रियों को पवित्रशास्त्र से जोड़ता है (2 पत. 3:15-16)। और यह संदर्भ पतरस के इस कथन के ठीक बाद आता है, “कि तुम उन बातों को जो पवित्र भविष्यद्वक्ताओं ने पहले से कही हैं, और प्रभु और उद्धारकर्ता की उस आज्ञा को स्मरण करो जो तुम्हारे प्रेरितों के द्वारा दी गई थी” (2 पत. 3:2)। दूसरे शब्दों में कहें तो पतरस प्रेरितों को मसीह के वचनों को धारण करने वाला समझता है, और वह प्रेरितों को पवित्र भविष्यद्वक्ताओं के साथ जोड़ता है। संक्षेप में कहें तो नया नियम स्वयं प्रेरितों के लेखनों की गवाही परमेश्वर के वचन के रूप में देता है।
- दूसरी बात, अपोक्रिफा की तरह, मसीह के बाद की शताब्दियों में लिखी गई अन्य पुस्तकें भी इस स्तर की नहीं हैं।
जैसा कॉस्टेनबर्गर, बॉक और चत्रो ने उल्लेख किया है कि टॉलेमी की पत्री, बरनबास की पत्री, और थोमा, फिलिप्पुस, मरियम और नीकुदेमुस रचित सुसमाचार, ये सभी स्वयं को प्रेरित पवित्रशास्त्र से “एकदम अलग” दर्शाते हैं।20 उदाहरण के लिए, सबसे प्रसिद्ध अतिरिक्त-बाइबल-आधारित सुसमाचार का उल्लेख करते हुए, वे थोमा रचित सुसमाचार के बारे में लिखते हैं:
यह पुस्तक पवित्रशास्त्र के चार सुसमाचारों के अनुरूप एक सुसमाचार नहीं है। इसमें कोई कथानक नहीं है, कोई आख्यान नहीं है, और यीशु के जन्म, मृत्यु या पुनरुत्थान का कोई विवरण नहीं है। इसमें 114 कथन मिलते हैं, जो कथित रूप में यीशु से सम्बन्धित हैं, और यद्यपि उनमें से कुछ ऐसे सुनाई पड़ते हैं, जो आपको मत्ती, मरकुस, लूका या यूहन्ना में सुनने को मिल सकते हैं, उनमें से कई विचित्र और बेतुके हैं। एक व्यापक सर्वसम्मति इसे दूसरी शताब्दी के आरम्भ से लेकर अन्त तक का लेखन मानती है, परन्तु यह कभी भी किसी भी समय ग्रंथ-सूची वाली चर्चाओं का हिस्सा नहीं बना। वास्तव में, यरूशलेम के सिरिल ने इसे कलीसियाओं में पढ़े जाने के विरुद्ध विशेष रूप से चेतावनी दी थी, और ओरिग्न ने इसे एक अपोक्रिफा वाला सुसमाचार बताया था। [माइकल क्रूगर का] निम्नलिखित कथन इसका सार प्रस्तुत करता है: “यदि थोमा वास्तव में प्रामाणिक, मूल मसीही विश्वास का प्रतिनिधित्व करता है, तो उसने उस तथ्य का बहुत कम ऐतिहासिक प्रमाण छोड़ा है।”21
- तीसरा कारण, प्रारम्भिक कलीसिया जल्दी ही एक ग्रंथ-सूची वाली सर्वसम्मति पर पहुँच गई।
असल में, बहुत से कारकों के द्वारा आरम्भिक कलीसिया कई पीढ़ियों के दौरान ग्रंथ-सूची पर एक साझा सर्वसम्मति पर पहुँच गई। जबकि बरनबास की पत्री और हर्मस का चरवाहा जैसी मसीही पुस्तकों की सराहना की जाती थी और कुछ कलीसियाओं में कभी-कभी उन्हें पढ़ा भी जाता था, फिर भी उन्हें पवित्रशास्त्र के साथ भ्रमित नहीं किया जाता था। अपोक्रिफा की तरह, जेरोम ने लिखा कि ये “कलीसिया से सम्बन्धित” रचनाएँ “लोगों के उत्थान के लिए तो अच्छी थीं, परन्तु कलीसिया से सम्बन्धित सिद्धान्तों का अधिकार स्थापित करने के लिए नहीं थीं।”22
मसीह के बाद की पहली कुछ शताब्दियों में, मान्यता प्राप्त पुस्तकों की सूची बढ़ती गई। असल में, जैसा यहाँ सूचीबद्ध किया गया है, कलीसिया ने न केवल अपने उपदेशों, पत्रियों और पुस्तकों में प्रेरितों का उल्लेख किया, बल्कि वे कभी-कभी पुस्तकों को भी सूचीबद्ध करते थे (उदाहरण के लिए, मुराटोरियन ग्रंथ-सूची)।23 और इस प्रकार, “नये नियम की पुस्तकों को (चुनी हुई नहीं परन्तु) सर्वश्रेष्ठ के रूप में पहचाना गया, जो शीर्ष पर पहुँच गई थीं, और कलीसियाओं के द्वारा इसलिए उपयोग की गईं, क्योंकि उन्हें अनूठी और विशेष महत्व वाला माना जाता था।”24 एक बार फिर जेरोम का उल्लेख करते हुए,
मत्ती, मरकुस, लूका और यूहन्ना प्रभु के चार सदस्यों का दल हैं, सच्चे करूब (जिसका अर्थ ‘ज्ञान की प्रचुरता’ है), जिनके पूरे शरीर में आँखें ही आँखें हैं; वे अंगारों की तरह जगमगाते हैं, वे बिजली की तरह इधर-उधर चमकते हैं, उनके पाँव सीधे और ऊपर की ओर उठे हुए हैं, उनकी पीठ पर सभी दिशाओं में उड़ने के लिए पंख लगे हुए हैं। वे एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं और एक-दूसरे को थामे हुए हैं, वे पहियों के भीतर पहियों की तरह घूमते हैं, वे उस बिंदु तक जाते हैं, जहाँ पवित्र आत्मा की साँस उन्हें ले जाती है।
प्रेरित पौलुस सात कलीसियाओं को पत्रियाँ लिखता है (क्योंकि इब्रानियों को लिखी गई ऐसी आठवीं पत्री अधिकांश लोगों के द्वारा उस सूची से बाहर रखी गई है); वह तीमुथियुस और तीतुस को निर्देश देता है; वह फिलेमोन से उसके भगोड़े दास के लिए विनती करता है। पौलुस के बारे में थोड़ी सी बातें लिखने के बजाय मैं चुप रहना पसन्द करता हूँ।
प्रेरितों के काम की पुस्तक एक साधारण इतिहास से सम्बन्धित और नवजात कलीसिया के बचपन का वर्णन करती प्रतीत होती है; परन्तु यदि हम जानते हैं कि उसका लेखक वैद्य लूका था, ‘जिसकी प्रशंसा सुसमाचार में की गई है’, तो हम इस बात पर भी ध्यान देंगे कि उनके सभी वचन बीमार आत्मा के लिए औषधि हैं। प्रेरित याकूब, पतरस, यूहन्ना और यहूदा ने सात पत्रियाँ लिखीं, जो रहस्यमयी और संक्षिप्त, छोटी और लम्बी दोनों थीं — अर्थात्, शब्दों में छोटी परन्तु विचारों में लम्बी, इसलिए बहुत कम लोग होंगे, जो उन्हें पढ़कर गहराई से प्रभावित न हों।
यूहन्ना के प्रकाशन में जितने वचन हैं, उतने ही रहस्य भी हैं। उस पुस्तक के लिए जो योग्य है, मैंने उसकी तुलना में बहुत कम बोला है; उसकी सारी प्रशंसा अपर्याप्त है, क्योंकि उसके प्रत्येक वचन में अनेकों अर्थ छिपे हैं।25
इस सूची में, जेरोम हमें नये नियम की सत्ताईस पुस्तकों का विवरण देता है, परन्तु साथ ही वह उनके योग्य महिमा का भी संकेत देता है। और इस प्रकार, यह हमें इस बात पर विचार करने के लिए प्रेरित करता है कि यह ग्रंथ-सूची महत्वपूर्ण क्यों है।
ग्रंथ-सूची महत्वपूर्ण क्यों है
“बाइबल कहाँ से आई?” हमने इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए जो परिश्रम किया है, उसका एक बहुत ही बुनियादी कारण यह है: अर्थात्, किसी व्यक्ति को बाइबल का निर्माण, स्रोत और विषय-वस्तु जैसे समझ में आता है, उसी से यह निर्धारित होता है कि वह बाइबल के सन्देश को कैसे पढ़ता है — या नहीं पढ़ता है! — बाइबल के जो पाठक परमेश्वर को जानने के लिए गम्भीर हैं, वे पवित्रशास्त्र के द्वारा बताई गई बातों पर विश्वास करने या उसकी आज्ञाओं को मानने का दृढ़ विश्वास तब तक नहीं रख सकते, जब तक वे यह न जान लें कि बाइबल धार्मिक लोगों की मनगढ़ंत रचना नहीं, बल्कि परमेश्वर का प्रेरित और आधिकारिक वचन है। इस पड़ाव पर, बाइबल की ग्रंथ-सूची अत्यन्त महत्व रखती है। और इस खण्ड को समाप्त करते हुए, आइए हम तीन अनुप्रयोगों के साथ ग्रंथ-सूची के महत्व पर विस्तार से चर्चा करें।
- सबसे पहले, ग्रंथ-सूची का निर्माण परमेश्वर के वचन की एकता को मजबूत करता है।
आश्चर्यजनक रूप से, पवित्रशास्त्र लगभग 1,400 वर्षों की अवधि में लगभग चालीस मानवीय लेखकों के द्वारा लिखा गया था। परन्तु इन सभी के पीछे एक ही दिव्य लेखक है, जिसने प्रत्येक वचन को अपनी प्रेरणा से रचा है (2 तीमु. 3:16; 2 पत. 1:19-21)। असल में, पवित्रशास्त्र की एकता किसी सूचना के भण्डार या साहित्यिक तनाव से रहित किसी पाठ में नहीं पाई जाती। इसके बजाय, पवित्रशास्त्र की एकता इस तथ्य से आती है कि बाइबल “परमेश्वर की रचना है, और उसका उद्देश्य उद्धार है, और बिना किसी त्रुटि की मिलावट वाला सत्य उसका विषय है” (BFM 2000)। कहने का अर्थ यह है कि समय के साथ परमेश्वर ने आपस में जुड़ी हुई पुस्तकों की एक श्रृंखला को प्रेरित किया, जिन्होंने एकीकृत-परन्तु-विविध प्रकाशन का रूप ले लिया।
इस कारण, ग्रंथ-सूची का निर्माण परमेश्वर के वचन की एकता को मजबूत करता है, जिससे इस पुस्तक के पाठक जान सकते हैं कि वे छुटकारे का एक नाटक पढ़ रहे हैं। जब परमेश्वर ने स्वयं को मूसा के सामने, और फिर मसीह के मार्ग पर आने वाले भविष्यद्वक्ताओं के सामने, और प्रेरितों की सेवकाई में प्रकट किया, तो ऐसे तनाव, घटनाएँ और निर्देश सामने आए, जो विरोधाभासी लग सकते हैं। एक जगह, परमेश्वर कहता है कि कोई भी अशुद्ध वस्तु न खाओ (लैव्य. 11 अध्याय); दूसरी जगह, वह इसके ठीक विपरीत बात कहता है (प्रेरि. 10 अध्याय)। अशुद्ध वस्तुएँ फिर से सूची में आ गई हैं! यदि यह बात असम्बद्ध या विरोधाभासी लगे, तो ऐसा केवल इसलिए है, क्योंकि किसी ने अभी तक यह नहीं समझा है कि कहानी का यह भाग कैसे आगे बढ़ता है।
सच तो यह है कि बाइबल कालातीत कल्पनाओं के समूह से नहीं, बल्कि एक कहानी से मिलकर बनती है। और इस प्रकार, यह समझना पवित्रशास्त्र की एकता में विश्वास की पुष्टि करता है कि छुटकारे के युगों के दौरान ग्रंथ-सूची कैसे बनी, और इसी के साथ, यह हमें पवित्रशास्त्र के प्रकट होते आख्यान के साथ बाइबल को पढ़कर उसमें उपस्थित वैध तनावों का समाधान निकालने का प्रशिक्षण देता है — जो एक ऐसी बात है, जिस पर हम नीचे विचार करेंगे।
- दूसरा, ग्रंथ-सूची का स्रोत परमेश्वर के वचन के अधिकार को मजबूत करता है।
यदि ग्रंथ-सूची को समय के साथ रचा गया था, जब परमेश्वर ने कई बार और कई तरीकों से भविष्यद्वक्ताओं के माध्यम से पूर्वजों से बात की थी (इब्रा. 1:1), और यदि ग्रंथ-सूची को इसलिए बन्द कर दिया गया था, क्योंकि परमेश्वर का पूर्ण और अन्तिम प्रकाशन यीशु मसीह में आ चुका है (इब्रा. 1:2; और प्रका. 22:18–19 से तुलना करें), तो हमें यह स्वीकार करना होगा कि यह पुस्तक किसी भी अन्य पुस्तक की तरह नहीं है। असल में, ग्रंथ-सूची पर बहस करना इसलिए महत्व रखता है, क्योंकि पवित्रशास्त्र वही कहता है, जो परमेश्वर कहता है। यही वह बात थी, जिसे बी. बी. वारफील्ड ने एक प्रसिद्ध निबन्ध में उठाया था, जिसका शीर्षक था, “‘यह कहता है:’ ‘पवित्रशास्त्र कहता है:’ ‘परमेश्वर कहता है,’“26 और इसे सम्पूर्ण नये नियम में देखा जा सकता है, जहाँ यीशु और उसके प्रेरित पवित्रशास्त्र को परमेश्वर के आधिकारिक वचन के रूप में उद्धृत करते हैं।
इस कारण से, यह जानना महत्व रखता है कि बाइबल में क्या है और बाइबल में क्या नहीं है। क्योंकि, जब हम देखें, और जब हम पवित्रशास्त्र को पवित्रशास्त्र की व्याख्या करने देने के सुधार सिद्धान्त (अर्थात्, पवित्रशास्त्र की उपमा) का पालन करें, तो हमें पवित्रशास्त्र को उन दूसरे खण्डों के द्वारा परिभाषित करना चाहिए और उसकी व्याख्या करनी चाहिए, जो वास्तव में परमेश्वर के द्वारा प्रेरित हैं। बाइबल आधारित ईश-विज्ञान, “पवित्रशास्त्र को पवित्रशास्त्र की व्याख्या करने देने और सम्पूर्ण बाइबल को उसकी अपनी साहित्यिक संरचनाओं और प्रकट होने वाली वाचाओं के अनुसार पढ़ने का अनुशासन,” निश्चित सीमाओं वाली बाइबल पर निर्भर करता है।27 इस कारण, ग्रंथ-सूची को नकारना, या ग्रंथ-सूची वाली और बिना ग्रंथ-सूची वाली पुस्तकों को एक ही स्तर पर रखना गलत व्याख्याओं और ईश-वैज्ञानिक निष्कर्षों की ओर ले जाता है। जिसे मैंने “बाइबल आधारित ईश-विज्ञान का तितली वाला प्रभाव” नाम दिया है।
- तीसरा, ग्रंथ-सूची की व्यवस्था परमेश्वर के वचन के सन्देश को प्रकट करती है।
यदि ग्रंथ-सूची का स्रोत परमेश्वर है और इसकी विषय-वस्तु का निर्माण उसकी दिव्य कृपा के अधीन हुआ था, तो हमें परमेश्वर के वचन की व्यवस्था को अनदेखा नहीं करना चाहिए। दूसरे शब्दों में कहें तो जिस प्रकार पौलुस केवल इस बात को स्वीकार करके कि मूसा की व्यवस्था अब्राहम के साथ की गई वाचा में 430 वर्ष बाद जोड़ी गई थी (गला. 3:17), केवल अनुग्रह के द्वारा धर्मी ठहराए जाने के लिए एक ईश-वैज्ञानिक तर्क दे सकता है, ठीक उसी प्रकार हमें भी यह स्वीकार करना चाहिए कि बाइबल की ग्रंथ-सूची साहित्यिक और ऐतिहासिक व्यवस्था का व्याख्यात्मक महत्व रखती है। दूसरे शब्दों में कहें तो बाइबल को संयोगवश व्यवस्थित पुस्तकों के संग्रह के रूप में देखने के बजाय, हमें यह देखना चाहिए कि सम्पूर्ण ग्रंथ-सूची एक सन्देश को कैसे प्रकट करती है।
यह बात भजन संहिता और उन बारहों जैसी पुस्तकों के लिए सत्य है, जो अन्यथा छोटे भविष्यद्वक्ताओं के रूप में प्रसिद्ध हैं, परन्तु यह सम्पूर्ण बाइबल के लिए भी सत्य है। जैसा कि पुराने नियम के विद्वान स्टीफन डेम्पस्टर ने कहा है, “विभिन्न व्यवस्थाएँ अलग-अलग अर्थ उत्पन्न करती हैं।” और इस प्रकार, “इब्रानी तनाख और मसीही पुराने नियम की विभिन्न व्यवस्थाओं के व्याख्यात्मक अनुप्रयोगों पर बड़े पैमाने पर ध्यान दिया गया है।”28 डेम्पस्टर का अवलोकन बाइबल पढ़ने के लिए महत्वपूर्ण है, भले ही यह एक ऐसी उलझन प्रस्तुत करता है, जो इस क्षेत्रीय मार्गदर्शिका की सीमाओं से परे है।
डेम्पस्टर के साथ, अन्य लोगों ने इस बात पर ध्यान दिया है कि इब्रानी बाइबल को मानक अंग्रेजी बाइबल से अलग तरीके से व्यवस्थित किया गया था। पहले इसमें बाईस पुस्तकें थीं, बाद में इसमें उनतालीस पुस्तकें हो गईं। आज के समय तक, ऐसे कोई प्रकाशक नहीं हैं, जिन्होंने इब्रानी बाइबल की तरह व्यवस्थित अंग्रेज़ी बाइबल प्रस्तुत की हो। फिर भी, इस अन्तर की जानकारी रखना लाभकारी है। क्योंकि इब्रानी व्यवस्था न केवल अंग्रेजी व्यवस्था से पहले की है, बल्कि यह साहित्यिक व्यवस्था एक ईश-वैज्ञानिक कहानी कहती है और एक “व्याख्यात्मक दृष्टिकोण प्रदान करती है, जिसके माध्यम से इसकी विषय-वस्तु को देखा जा सकता है।”29
अन्त में, यह कहा जाना चाहिए कि ग्रंथ-सूची वाली व्यवस्थाओं में यह अन्तर पवित्रशास्त्र में हमारे विश्वास के लिए चुनौती नहीं बनना चाहिए, बल्कि इससे हमें पवित्रशास्त्र के एक होने के तरीके की याद आनी चाहिए। जब हम एक खण्ड की तुलना दूसरे खण्ड से, और बाइबल के एक भाग की तुलना दूसरे भाग से करते हैं, तो व्यवस्था मायने रखती है। और यह बात उस समय एकदम स्पष्ट हो जाएगी, जब हम भाग 4 (हमें बाइबल कैसे पढ़नी चाहिए?) पर आएँगे, परन्तु वहाँ जाने से पहले, हमें एक और प्रश्न का उत्तर देना है: बाइबल में क्या (नहीं) है?
चर्चा एवं मनन:
- इस भाग ने परमेश्वर के वचन में आपके विश्वास को कैसे मजबूत किया?
- आप उस मित्र को कैसे उत्तर देंगे जो सोचता है कि अपोक्रिफा की पुस्तकें भी ग्रंथ-सूची वाली छियासठ पुस्तकों के समान अधिकार रखती हैं?
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बाइबल में क्या (नहीं) है?
मैं यहाँ इस प्रश्न “बाइबल में क्या है?” का सकारात्मक उत्तर देने का प्रयत्न नहीं करूँगा, क्योंकि इसका उत्तर देने के लिए सभी छियासठ पुस्तकों के साथ पूर्ण जुड़ाव की आवश्यकता होगी। असल में, इस तरह के जुड़ाव की आवश्यकता है भी और इस विषय पर कई उपयोगी संसाधन उपलब्ध हैं, जिनमें अध्ययन वाली बाइबल, 30 बाइबल के सर्वेक्षण, 31 और सबसे अधिक लाभदायक, बाइबल आधारित ईश-विज्ञान की पुस्तकें शामिल हैं। मैं बाइबल आधारित ईश-विज्ञान की पुस्तकों को सबसे अधिक उपयोगी क्यों मानता हूँ, इसका कारण है कि वे केवल इस बात का सर्वेक्षण करने से कहीं अधिक बातें बताती हैं कि उस पाठ में क्या है; वे एक ऐसा दृष्टिकोण प्रदान करती हैं, जिसके द्वारा हम पवित्रशास्त्र को पढ़ सकते हैं और उसके व्यापक सन्देश को समझ सकते हैं। इस विषय पर सभी अच्छी पुस्तकों में से, मैं इन तीन से आरम्भ करूँगा।
- ग्रीम गोल्ड्सवर्थी, अकोर्डिंग टु प्लान: द अनफोल्डिंग रेवलेशन ऑफ गॉड इन द बाइबल (According to Plan: The Unfolding Revelation of God in the Bible) (2002)
- जिम हैमिल्टन, गॉड्स ग्लोरी इन सेल्वेशन थ्रू जजमेंट: अ बिबलिकल थियोलॉजी (God’s Glory in Salvation through Judgment: A Biblical Theology) (2010)
- पीटर जेंट्री और स्टीफन वेलम, गॉड्स किंगडम थ्रू गॉड्स कवनेंट: अ कंसाइस बिबलिकल थियोलॉजी (God’s Kingdom through God’s Cov- enants: A Concise Biblical Theology) (2015)
बाइबल आधारित एक सकारात्मक ईश-विज्ञान किसी को भी यह जानने में सहायता करेगा कि बाइबल में क्या है और यह कैसे एक साथ जुड़ता है, परन्तु यह जानना भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि बाइबल में क्या नहीं है। कहने का तात्पर्य यह है कि यदि हम गलत अपेक्षाओं के साथ बाइबल के पास आते हैं, तो हम पवित्रशास्त्र को गलत तरीके से पढ़ने के लिए या पवित्रशास्त्र पढ़ना पूरी तरह से छोड़ देने के लिए अतिसंवेदनशील इसलिए हो जाते हैं, क्योंकि यह हमारे पूर्वधारणा वाले विचारों से मेल नहीं खाता। हालाँकि, यदि हम पवित्रशास्त्र की कुछ गलत अपेक्षाओं को दूर कर सकते हैं, तो यह हमें बाइबल को अच्छी तरह से पढ़ने के लिए तैयार करेगा।
और बाइबल को गलत तरीके से पढ़ने से बचने में हमारी सहायता के लिए, मैं केविन वैनहूज़र के पाँच विचार प्रस्तुत करूँगा। अपनी ज्ञानवर्धक पुस्तक, “पिक्चर्स एट अ थियोलॉजिकल एक्ज़िबिशन: सीन्स ऑफ द चर्च्स वर्शिप, विटनेस एंड विज़डम” (Pictures at a Theological Ex- hibition: Scenes of the Church’s Worship, Witness, and Wisdom) में, वैनहूज़र हमें याद दिलाते हैं कि बाइबल, परमेश्वर, पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा की ओर से, उसके स्वरूप में रचे गए मनुष्यों के लिए एक सन्देश है। दूसरे शब्दों में कहें तो यह केवल एक धार्मिक ग्रंथ या आत्मिक जीवन जीने की हस्तपुस्तिका नहीं है। इसके बजाय, जे. आई. पैकर का उल्लेख करते हुए, वे एक वाक्य में बाइबल का सारांश प्रस्तुत करते हैं: “परमेश्वर पिता, परमेश्वर पवित्र आत्मा की सामर्थ्य में होकर परमेश्वर पुत्र का प्रचार कर रहा है।” और इस सकारात्मक कथन को साथ में रखकर, वे पाँच ऐसी बातें बताते हैं, जो बाइबल नहीं बताती।32
- पवित्रशास्त्र बाहरी अन्तरिक्ष से आया कोई शब्द या अतीत से आया कोई समय-यान नहीं है, बल्कि आज की कलीसिया के लिए परमेश्वर का एक जीवंत और सक्रिय वचन है।
- बाइबल हर दूसरी पुस्तक की तरह भी है और उससे अलग भी है: यह एक मानवीय, प्रासंगिक प्रवचन और एक पवित्र प्रवचन दोनों है, जो अन्त में परमेश्वर के द्वारा रची गई है और जिसके लिए यह मंशा की गई है कि इसे ग्रंथ-सूची वाले संदर्भ में पढ़ा जाए।
- बाइबल पवित्र शब्दों का शब्दकोश नहीं, बल्कि एक लिखित प्रवचन है: कोई व्यक्ति किसी उद्देश्य से किसी व्यक्ति के लिए किसी विषय पर कुछ कहता है।
- पवित्रशास्त्र को बनाने वाले मानवीय प्रवचन के साथ परमेश्वर कई तरह के कार्य करता है, परन्तु सबसे बढ़कर वह यीशु मसीह के लिए मार्ग तैयार करता है, जो एक लम्बी, वाचा वाली कहानी का अन्त है।
- मसीह को प्रस्तुत करने और हम में मसीह का निर्माण करने, अर्थात् इन दोनों कार्यों के लिए परमेश्वर बाइबल का उपयोग करता है।
असल में, अच्छी व्याख्या या अभ्यास बाइबल को सही ढंग से समझने से सुनिश्चित नहीं होता, बल्कि बाइबल को गलत समझने से बड़ी और छोटी गलतियाँ हो सकती हैं। अत: इस बात को सही रीति से समझना हमारा लक्ष्य होना चाहिए कि पवित्रशास्त्र क्या है और इसका उद्देश्य क्या है — अर्थात्, हमें मसीह तक ले जाना और हमें उसके समान बनाना। इसका अर्थ है कि हमें बाइबल को विश्वास, आशा और प्रेम के साथ पढ़ना चाहिए। या तार्किक अनुप्रयोग निकालने के लिए, हम बाइबल को इस आशा के साथ पढ़ते हैं कि जिस परमेश्वर ने अपने वचन में बात की है, वह हम में ऐसा विश्वास उत्पन्न करेगा, जो प्रेम की अगुवाई करता है।
सच कहूँ तो संसार की कोई भी दूसरी पुस्तक ऐसा नहीं कर सकती। और यदि हम किसी भी दूसरी पुस्तक की तरह बाइबल के साथ व्यवहार करेंगे, तो हम उसे गलत समझेंगे। हो सकता है कि ज्ञान तो बढ़ जाए, परन्तु विश्वास, आशा और प्रेम नहीं बढ़ेगा। इसी के साथ, यदि हम बाइबल के व्याकरण वाले और ऐतिहासिक स्वभाव पर ध्यान नहीं देते, तो उसकी विषय-वस्तु को गलत समझने के लिए हम ही उत्तरदायी ठहरेंगे। इसी के अनुसार, हमें बाइबल को समझदारी से पढ़ने की आवश्यकता है, परन्तु यह समझदारी इस बात को जानने पर निर्भर करती है कि बाइबल क्या है और बाइबल क्या नहीं है।
पैकर की पवित्रशास्त्र की परिभाषा पर लौटते हुए, बाइबल हमारे लिए आत्मा से प्रेरित पिता का वचन है, जो हमें पुत्र के पास लाता है, जिससे कि मानवीय शब्दों में परमेश्वर के वचन के द्वारा हम उसे जान सकें और उसके स्वरूप में ढल सकें। इस रीति से, बाइबल त्रिएक परमेश्वर की प्रशंसा (महिमागान) करने के लिए और परमेश्वर के लोगों में विश्वास, आशा और प्रेम (शिष्यत्व) विकसित करने के लिए दी गई एक पुस्तक है। और इन दो दिशाओं के साथ, अब हम इस पर विचार करने के लिए तैयार हैं कि बाइबल को कैसे पढ़ा जाए।
चर्चा एवं मनन:
- बाइबल क्या है, क्या आप कभी इस बारे में गलत सोचने की परीक्षा में पड़े हैं? क्या ऊपर सूचीबद्ध पाँच बातों में से कोई भी ऐसी बातों का वर्णन करती है जो आप सोचते हैं या पहले सोच चुके हैं?
- क्या आप बाइबल को “इस आशा के साथ पढ़ते हैं कि परमेश्वर जिसने अपने वचन में बोला है, वही प्रेम की ओर ले जाने वाला विश्वास हम में उत्पन्न करेगा”? इससे पवित्रशास्त्र के साथ आपके जुड़ाव का तरीका कैसे बदल सकता है?
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हमें बाइबल कैसे
पढ़नी चाहिए?
पहले के तीन भागों की तरह, — हमें बाइबल कैसे पढ़नी चाहिए? — इस प्रश्न के लिए यहाँ दी गई बातों से कहीं अधिक करने की आवश्यकता है। फिर भी, मैं बाइबल को परमेश्वर के वचन के रूप में पढ़ने के लिए तीन व्यावहारिक चरण प्रस्तुत करूँगा।
उस खण्ड के व्याकरण वाले और ऐतिहासिक संदर्भ की खोज करें।
समझें कि वह खण्ड बाइबल के वाचा वाले इतिहास में कहाँ पाया जाता है। इस बात का आनन्द मनाएँ कि वह खण्ड आपको यीशु मसीह के बारे में पूर्ण ज्ञान कैसे प्रदान करता है।
इन तीनों “चरणों” को किसी भी दिए गए खण्ड के पाठ्य, वाचा और मसीह-विज्ञान वाले क्षितिज के रूप में वर्णित किया जा सकता है।33 क्रमानुसार, एक पाठ के अर्थ को उजागर करने, छुटकारे के इतिहास में इसके स्थान और मसीह में प्रकट परमेश्वर के साथ इसके सम्बन्ध की दिशा में इनमें से प्रत्येक एक कदम के रूप में कार्य करता है। और एक साथ मिलकर, वे उन लोगों के लिए बाइबल के किसी भी भाग को पढ़ने के लिए एक सुसंगत दृष्टिकोण प्रदान करते हैं, जो परमेश्वर के वचन में प्रकट कार्यों का “अध्ययन” करने के लिए इच्छुक हैं (भज. 111:2)।
ऐसा सुसंगत दृष्टिकोण इसलिए सहायक होता है, क्योंकि बाइबल को उसके अपने संदर्भ में समझने के लिए परिश्रम करना पड़ता है। क्योंकि बाइबल का प्रत्येक पाठक अपनी पूर्वधारणाओं को पवित्रशास्त्र में लाता है, इसलिए पढ़ने का कोई भी उचित तरीका हमें यह देखने में सहायता करेगा कि बाइबल में क्या है और इसके बजाय अपने विचारों एवं रुचियों को बाइबल में डालने से बचने में सहायता करेगा। ऐसा करने के लिए, मैंने इस तीन-स्तरीय दृष्टिकोण को उल्लेखनीय रूप से सहायक पाया है।34 अत:, हम इनमें से प्रत्येक को देखेंगे। फिर भी, पहला कदम उठाने से पहले, मैं उन लोगों के लिए प्रोत्साहन की बात कहना चाहूँगा, जो पहली बार बाइबल पढ़ने जा रहे हैं।
बाइबल पढ़ने की तैयारी करना: परमेश्वर के वचन के लिए हृदय विकसित करना
जबकि बाइबल को अच्छी तरह पढ़ने के लिए अनुशासन और कौशल की आवश्यकता पड़ती है, परन्तु इसका आरम्भ कहीं अधिक बुनियादी बात से — बस बाइबल पढ़ने से होता है। जैसे अच्छी तरह दौड़ने से पहले दौड़ना आवश्यक होता है, और दूसरों के लिए पियानो बजाने से पहले घर पर पियानो बजाना होता है, वैसे ही बाइबल को अच्छी तरह पढ़ने का आरम्भ पढ़ने की एक साधारण क्रिया से होता है।
इस कारण, मैं उन सभी लोगों को प्रोत्साहित करूँगा, जो अभी-अभी बाइबल पढ़ना आरम्भ कर रहे हैं, कि वे परमेश्वर पर भरोसा रखें, उससे सहायता माँगें और विश्वास के साथ पढ़ें। परमेश्वर उन सभी पर स्वयं को प्रकट करने की प्रतिज्ञा करता है जो सच्चे हृदय से उसे खोजते हैं (नीति. 8:17; यिर्म. 29:13)। यदि आप पवित्रशास्त्र पढ़ेंगे, तो आप सीखेंगे कि हम परमेश्वर की सहायता के बिना उसे नहीं खोज सकते (रोमि. 3:10-19), परन्तु आप यह भी जानेंगे कि परमेश्वर उन लोगों पर स्वयं को प्रकट करने में प्रसन्न होता है, जो विश्वास के साथ उसके पास आते हैं (मत्ती 7:7-11; यूह. 6:37)। परमेश्वर उन लोगों के प्रति कंजूस नहीं है, जो उसे विश्वास के साथ खोजते हैं।
जो लोग यह जानते हुए बाइबल पढ़ते हैं, उन्हें प्रार्थना करके परमेश्वर से स्वयं को उन पर प्रकट करने के लिए कहना चाहिए। आत्मा ही जीवन और ज्योति देता है, और क्योंकि बाइबल पढ़ना एक आत्मिक प्रयास है, इसलिए नये पाठकों को उसकी दिव्य सहायता माँगनी चाहिए। और फिर, इस विश्वास के साथ उन्हें पढ़ना चाहिए, पढ़ते रहना चाहिए और कुछ न कुछ पढ़ना चाहिए कि वह ऐसी प्रार्थना सुनता है और उसका उत्तर देता है। जिस तरह शारीरिक विकास के लिए शरीर में आकार और शक्ति इकट्ठी होने से पहले बार-बार भोजन करने और शारीरिक गतिविधि की आवश्यकता होती है, ठीक उसी तरह आत्मिक विकास और बाइबल की समझ में भी समय लगता है। इस प्रकार, बाइबल पढ़ने के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात परमेश्वर के वचन के लिए हृदय विकसित करने की इच्छा है। और भजन संहिता 119 अध्याय से बेहतर ऐसा करने का कोई स्थान नहीं है। यदि बाइबल पढ़ना आपके लिए नया है, तो भजन संहिता 119 अध्याय का एक अनुच्छेद (आठ आयतें) लें, उसे पढ़ें, उस पर विश्वास करें, उसके लिए प्रार्थना करें, और फिर बाइबल पढ़ना आरम्भ करें।
इसके अतिरिक्त, एक सुसंगत समय, स्थान और बाइबल पढ़ने का कार्यक्रम होने से पढ़ना अधिक आनन्दमयी हो जाएगा।35 बीते वर्षों में, मैंने सीखा है कि बाइबल पढ़ना कोई ऐसी आदत नहीं है, जिसे विकसित किया जाए; यह एक स्वर्गीय भोजन है, जिसका आनन्द लेना चाहिए। जिस तरह हम शारीरिक शक्ति और आनन्द के लिए भोजन करते हैं, ठीक उसी तरह हमें भी पवित्रशास्त्र का आनन्द लेना चाहिए। जैसा भजन संहिता 19:10-11 में कहा गया है, “वे तो सोने से और बहुत कुन्दन से भी बढ़कर मनोहर हैं; वे मधु से और टपकनेवाले छत्ते से भी बढ़कर मधुर हैं। उन्हीं से तेरा दास चिताया जाता है; उनके पालन करने से बड़ा ही प्रतिफल मिलता है।” इस प्रतिज्ञा को ध्यान में रखते हुए, मैं आपको प्रोत्साहित करता हूँ कि आप पवित्रशास्त्र का स्वाद चखकर देखें कि वह कितना उत्तम है। और जब आप पढ़ते हैं, तो मैं आपको बाइबल को अच्छी तरह पढ़ने का पूरा लाभ उठाने में सहायता करने के लिए ये अगले तीन चरण सुझाता हूँ।
पाठ वाला क्षितिज: पाठ के अर्थ की खोज करना
बाइबल का हर अच्छा पठन एक पाठ से आरम्भ होता है। और बाइबल की व्याख्या को व्यवहार में देखने के लिए एक महत्वपूर्ण पाठ नहेम्याह 8 अध्याय है। इस्राएल के लोगों को सिखाने के लिए नियुक्त किए गए याजकों के कार्य का वर्णन करते हुए (लैव्य. 10:11), नहेम्याह 8:8 में लिखा है, “उन्होंने परमेश्वर की व्यवस्था की पुस्तक से पढ़कर अर्थ समझा दिया; और लोगों ने पाठ को समझ लिया।” ऐतिहासिक संदर्भ में, निर्वासन
से लौटने पर लोगों को फिर से परमेश्वर के मार्गों की शिक्षा दिए जाने की आवश्यकता थी। निर्वासन से पहले के समय में व्यवस्था पर ध्यान दिया जाना लुप्त हो गया था (2 इति. 34:8–21 से तुलना करें), और अब बन्धुआई से छुटकारा पाने के बाद, इस्राएली सन्तानों की स्थिति बहुत बेहतर नहीं थी। निर्वासन के समय में इब्रानी भाषा लुप्त हो गई थी; अरामी नयी आम भाषा थी, और इसलिए नहेम्याह ने व्यवस्था पढ़वाई और याजकों को उसका “अर्थ समझा दिया”।
स्वयं एज़्रा की तरह (एज़्रा 7:10), इन लेवीय अगुवों ने लोगों की सहायता की कि वे परमेश्वर की व्यवस्था को समझें और उसे लागू करें। व्यवस्था ने उन्हें जैसा करने की आज्ञा दी थी (लैव्य. 10:11), वे व्यवस्था का अर्थ समझा रहे थे। और इस प्रकार हमें बाइबल की व्याख्या का एक सच्चा उदाहरण मिलता है, जहाँ एक-एक पंक्ति करके, पाठ की व्याख्या की गई है। विशेष रूप से, किसी खण्ड का अर्थ गद्य, पद्य और वाक्यों, अनुच्छेदों और पंक्तियों में पाए जाने वाले प्रस्तावों में पाया जाता है। संक्षेप में कहें तो बाइबल को पढ़ना किसी दिए गए खण्ड के साहित्यिक और ऐतिहासिक संदर्भ पर ध्यान देने से आरम्भ होता है।
और महत्वपूर्ण बात यह है कि पढ़ने का यह तरीका केवल बाइबल के बाहर ही उत्पन्न नहीं होता है; यह वास्तव में बाइबल के भीतर मिलता है। व्यवस्थाविवरण की पुस्तक और इब्रानियों की पत्री दोनों ही बाइबल की व्याख्या को प्रदर्शित करती हैं, जो बाइबल को उसकी सटीकता और अनुप्रयोग के साथ पढ़ने का वर्णन करने का एक और तरीका है। उदाहरण के लिए, व्यवस्थाविवरण 6-25 अध्याय दस आज्ञाओं की व्याख्या करते हैं (निर्ग. 20 अध्याय; व्यव. 5 अध्याय), और इब्रानियों की पत्री एक ऐसा उपदेश है, जो पुराने नियम के कई खण्डों की व्याख्या करती है और उनका आपस में जुड़ा हुआ होना बताती है।36
इस आधार पर, हम पवित्रशास्त्र से सीख सकते हैं कि बाइबल को कैसे पढ़ना है। और जब हम बाइबल पढ़ते हैं, तो हमें इसे पाठ वाले क्षितिज से आरम्भ करना चाहिए, जहाँ हम सावधानीपूर्वक लेखक की मंशाओं, पाठकों के ऐतिहासिक संदर्भ और लेखक के द्वारा पाठकों के लिए लिखी गई पुस्तक के उद्देश्य पर ध्यान देते हैं। इस रीति से, हमें पहले इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि लेखक क्या कहता है (पाठ वाला क्षितिज) और फिर इस बात पर कि वह इसे कब कहता है (वाचा वाला क्षितिज)।
वाचा वाला क्षितिज: परमेश्वर के वाचा वाले इतिहास के कथानक को समझना
पाठ वाले क्षितिज से दूर जाकर हम वाचा वाले क्षितिज पर आते हैं, या जिसे अन्य लोगों ने युगारम्भिक क्षितिज कहा है।37 यह क्षितिज मानता है कि बाइबल केवल कालातीत सत्यों की सूची नहीं है। इसके बजाय, यह इतिहास में परमेश्वर के छुटकारे के बारे में उत्तरोत्तर प्रकट की गई गवाही है। इसे वैचारिक रूप से मसीह में पूरी हुई एक बहुआयामी प्रतिज्ञा के अनुरूप लिखा गया है। जैसा कि प्रेरितों 13:32–33 बताता है, “हम तुम्हें उस प्रतिज्ञा के विषय में जो बापदादों से की गई थी, यह सुसमाचार सुनाते हैं, कि परमेश्वर ने यीशु को जिलाकर, वही प्रतिज्ञा हमारी सन्तान के लिए पूरी की।”
हाल की शताब्दियों में इस प्रगतिशील प्रकाशन का वर्णन विभिन्न रूप से व्यवस्थाओं या वाचाओं की एक श्रृंखला के रूप में किया गया है। और जबकि विभिन्न परम्पराओं ने बाइबल की वाचाओं को अलग-अलग तरीके से समझा है, इसलिए बाइबल निश्चित रूप से एक वाचा सम्बन्धी दस्तावेज है, जिसमें दो नियम (लातीनी भाषा में “वाचा”) शामिल हैं, और इसका केन्द्र यीशु मसीह की नयी वाचा है। इस कारण, इसे वाचाओं की एक श्रृंखला के रूप में समझना बाइबल के कथानक में उपयुक्त बैठता है। असल में, बाइबल के अवलोकन से, हम छह वाचाओं के माध्यम से छुटकारे के इतिहास की रूपरेखा बना सकते हैं, जो सभी मसीह की नयी वाचा की ओर ले जाती हैं।
- आदम के साथ बान्धी गई वाचा
- नूह के साथ बान्धी गई वाचा
- अब्राहम के साथ बान्धी गई वाचा
- इस्राएल के साथ बान्धी गई वाचा (जिसमें मूसा के द्वारा मध्यस्थता की गई थी)
- लेवी के साथ बान्धी गई वाचा (अर्थात्, याजकीय वाचा) दाऊद के साथ बान्धी गई वाचा
- नयी वाचा (जिसमें यीशु मसीह के द्वारा मध्यस्थता की गई थी)
ये वाचाएँ कालानुक्रमिक क्रम में सूचीबद्ध की गई हैं और इससे यह दर्शाया जा सकता है कि इनमें जैविक एकता है, साथ ही इनमें समय के साथ ईश-वैज्ञानिक विकास भी हुआ है। बाइबल पढ़ने की घटनाओं में, यह पूछना आवश्यक है, “यह पाठ कब घटित हो रहा है, और इसमें कौन सी वाचाएँ लागू हैं?”
इस प्रश्न पर, पाठक को वाचाओं, उनकी संरचना, शर्तों, और आशीषों व श्रापों की प्रतिज्ञाओं की अपनी समझ को बढ़ाने की आवश्यकता है। इस रीति से, ये वाचाएँ पवित्रशास्त्र की टेकटोनिक प्लेटों अर्थात् प्लेट विवर्तनिकी के रूप में कार्य करती हैं। और उनकी विषय-वस्तु को जानने से बाइबल के सन्देश के बारे में और यह यीशु मसीह की ओर कैसे ले जाता है, इस बारे में बढ़ती हुई जागरूकता मिलती है।
मसीह-विज्ञान वाला क्षितिज: मसीह के व्यक्तित्व और कार्य के माध्यम से परमेश्वर में आनन्दित होना
पवित्रशास्त्र में आरम्भ से ही एक भविष्य की ओर देखने वाला अभिविन्यास मिलता है, जो मसीह की ओर देखने में पाठक की अगुवाई करता है। कहने अर्थ यह है कि उत्पत्ति 3:15 से आरम्भ होकर, जहाँ परमेश्वर स्त्री के वंश के माध्यम से उद्धार की प्रतिज्ञा करता है, सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र तिरछे अक्षरों में लिखा गया है — अर्थात्, यह आने वाले पुत्र की तरफ आगे की ओर झुका हुआ है। जैसा यीशु ने अपने शिष्यों को सिखाया, सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र उसी की ओर संकेत करता है (यूह. 5:39) और इसलिए बाइबल के किसी भी भाग की सही तरीके से व्याख्या करने के लिए, हमें यह देखना होगा कि यह स्वाभाविक रूप से मसीह के साथ कैसे जुड़ा हुआ है। इम्माऊस के मार्ग पर (लूका 24:27), और ऊपरी कोठरी में (लूका 24:44-49), यीशु ने यही किया था, और उसके सभी प्रेरित यही करते और सिखाते रहे।
पुराने नियम को मसीह-वैज्ञानिक रूप से पढ़ने की इस पद्धति को समझने के लिए, कोई व्यक्ति प्रेरितों के काम की पुस्तक के उपदेशों को देख सकता है। उदाहरण के लिए, पिन्तेकुस्त के दिन पतरस समझाता है कि कैसे आत्मा का उण्डेला जाना योएल 2 अध्याय (प्रेरि. 2:16-21), मसीह के पुनरुत्थान (भज. 16 अध्याय) (प्रेरि. 2:25-28), और मसीह के स्वर्गारोहण (भज. 110) (प्रेरि. 2:34-35) को पूरा करता है। ठीक इसी तरह, जब पतरस प्रेरितों के काम 3 अध्याय में सुलैमान के ओसारे में प्रचार करता है, तो वह यीशु की पहचान मूसा के समान भविष्यद्वक्ता के रूप में करता है, जिसकी भविष्यद्वाणी व्यवस्थाविवरण 18:15-22 में की गई है (प्रेरि. 3:22-26 को देखें)। अधिक विस्तार से बताएँ, तो जब पौलुस को रोम में उसके घर में बन्द कर दिया गया, तो प्रेरितों के काम 28:23 में लिखा है कि कैसे उस बन्दी प्रेरित ने पवित्रशास्त्र की व्याख्या की, “और वह परमेश्वर के राज्य की गवाही देता हुआ, और मूसा की व्यवस्था और भविष्यद्वक्ताओं की पुस्तकों से यीशु के विषय में समझा समझाकर भोर से साँझ तक वर्णन करता रहा।” इस बड़ी कहानी को छोटा करते हुए कहें तो प्रेरितों के काम की पुस्तक के उपदेश कई उदाहरण देते हैं कि प्रेरितों ने पुराने नियम को मसीह-वैज्ञानिक रूप से कैसे पढ़ा था।
यह माना गया है कि व्याख्या के इस मसीह-केन्द्रित दृष्टिकोण का गलत उपयोग या गलत व्याख्या की जा सकती है। परन्तु सही ढंग से समझा जाने पर यह दर्शाता है कि कैसे छियासठ विभिन्न पुस्तकें यीशु मसीह के सुसमाचार में अपनी एकता को प्राप्त करती हैं। बाइबल एकता में इसलिए है, क्योंकि यह एक ही परमेश्वर की ओर से आती है, परन्तु इससे भी बढ़कर यह एकता में इसलिए है, क्योंकि यह सभी एक ही परमेश्वर-मनुष्य, यीशु मसीह की ओर संकेत करती हैं। और क्योंकि यह एक मानवीय पुस्तक है, जिसमें सम्पूर्ण मानवता के लिए अनुग्रहपूर्ण प्रतिज्ञाएँ मिलती हैं, इसलिए सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र उस बहुप्रतीक्षित मसीह की ओर संकेत करता है, जो परमेश्वर और मनुष्य के बीच मध्यस्थ है।
तो फिर इन तीनों क्षितिजों को जोड़ने के लिए, प्रत्येक पाठ का बाइबल के वाचा वाले ढाँचे में एक स्थान है, जो हमें मसीह तक ले जाता है। इसलिए, प्रत्येक पाठ पवित्रशास्त्र के वाचा वाले आधार से जैविक रूप से जुड़ा हुआ है, और प्रत्येक पाठ बाइबल की वाचाओं के विकास के माध्यम से मसीह में अपना अन्तिम लक्ष्य प्राप्त करता है। और जब तक हम इन तीनों क्षितिजों को एक साथ नहीं लाते, तब तक हम यह समझने में असफल रहते हैं कि बाइबल को कैसे पढ़ना है। इसी के साथ, इन क्षितिजों का क्रम भी मायने रखता है। मसीह को समय में पीछे इस्राएल में नहीं ले जाया जाता, और न ही हमें राहाब की खिड़की में लाल रंग के धागे के बीच केवल सतही सम्बन्ध जोड़ना चाहिए (यहो. 2:18)। इसके बजाय, हमें राहाब (यहो. 2 अध्याय) के पूरे प्रकरण को फसह (निर्ग. 12 अध्याय) के प्रकाश में समझना चाहिए, और फिर हम फसह से मसीह की ओर बढ़ सकते हैं।
यह अन्त-में-मसीह (क्रिस्टोटेलिक) की पूर्वधारणा इस व्याख्यात्मक विश्वास पर आधारित है कि सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र, सारी वाचाएँ, सारा प्ररूप-विज्ञान यीशु की ओर ले जाता है। और, इसी के अनुसार, इसमें व्यापक व्याख्यात्मक अनुप्रयोग मिलते हैं। यह कहता है कि कोई भी व्याख्या तब तक पूर्ण नहीं होती, जब तक वह मसीह तक न पहुँच जाए। पुराने नियम से हमें जो भी अनुप्रयोग मिलता है, जो मसीह के व्यक्तित्व और कार्य को अनदेखा करता है, वह मौलिक रूप से निराधार है। इसी के तुल्य, नये नियम के सभी अनुप्रयोग अपनी शक्ति का स्रोत मसीह में, और उस वाचा में जिसकी वह मध्यस्थता करता है, और उस आत्मा में प्राप्त करते हैं, जिसे वह भेजता है। इस कारण, बाइबल की सभी सच्ची व्याख्याएँ पाठ से ली जानी चाहिए और वे वाचाओं से जुड़ी होनी चाहिए, जिससे कि वे हमें यीशु मसीह को देखने और उसका स्वाद चखने के लिए प्रेरित करें।
हमें बाइबल को इसी तरह — बार-बार, और फिर से बार-बार पढ़ना चाहिए!
डर लगे और डर न लगे, परन्तु उस उठाएँ और पढ़ें
जब हम इस क्षेत्रीय मार्गदर्शिका को समाप्त करते हैं, तो मैं कल्पना कर सकता हूँ कि मसीह का एक ईमानदार अनुयायी या मसीह के दावों पर विचार करने वाला व्यक्ति बाइबल पढ़ने के कार्य के लिए स्वयं को अपर्याप्त महसूस कर सकता है। और, एक सहज ज्ञान के विपरीत तरीके से, मैं ऐसी भावनाओं की पुष्टि करना चाहता हूँ। सीनै पर्वत पर परमेश्वर के पास जाना एक कठिन वास्तविकता थी। और यद्यपि आज के समय में हमारे पास यीशु मसीह के रूप में एक मध्यस्थ उपलब्ध है, फिर भी परमेश्वर के वचन (इब्रा. 12:18-29) में उसके पास जाना एक अनुग्रहपूर्ण और भयपूर्ण बात है। इस रीति से, हमें परमेश्वर के वचन के पास श्रद्धा और विस्मय के साथ जाना चाहिए।
इसी के साथ, मसीह उन लोगों के लिए मध्यस्थता करने के लिए जीवित है, जिन्हें वह अपने पास बुला रहा है, तो हमें डरना नहीं चाहिए। परमेश्वर उन पापियों के साथ दयापूर्वक व्यवहार करता है, जो उन पर भरोसा करते हैं और उसके वचन में उसे खोजते हैं। इस प्रकार, बाइबल पढ़ना कोई भयपूर्ण गतिविधि नहीं है। जब तक हम विनम्रतापूर्वक परमेश्वर के सामने आते हैं, तो यह अनुग्रह, आशा, जीवन और शान्ति से भरपूर होता है।
सच कहूँ तो कोई भी व्यक्ति, अपने आप में और अपने आप से, बाइबल पढ़ने के लिए पर्याप्त नहीं है। बाइबल का सारा सच्चा पठ्न, त्रिएक परमेश्वर के स्वयं हमसे बातचीत करने और उसका वचन सही ढंग से पढ़ने के निमित्त अनुग्रह के लिए हमारी प्रार्थना पर निर्भर करता है।
अन्तहीन भटकावों और प्रतिस्पर्धी आवाजों से भरे इस संसार में, परमेश्वर का वचन पढ़ने का अवसर और विकल्प पाना भी कठिन है। और इस प्रकार, जब हम पढ़ने के लिए बाइबल उठाने का प्रयास करें, तो हमें इस विश्वास के साथ ऐसा करना चाहिए कि परमेश्वर इस कोलाहल के बीच से भी बोल सकता है और हमें प्रार्थना के साथ परमेश्वर से सहायता माँगते हुए ऐसा करना चाहिए। इसी उद्देश्य से, मैं थॉमस क्रैनमर (1489-1556) के बाइबल पठ्न के बारे में यह अन्तिम शब्द प्रस्तुत करता हूँ।
पवित्रशास्त्र पढ़ने के स्थान को प्रोत्साहित करते हुए एक उपदेश में, उन्होंने पवित्रशास्त्र को बार-बार पढ़ने के साथ-साथ उसे विनम्रतापूर्वक पढ़ने की आवश्यकता के लिए प्रोत्साहित किया। जब हम बाइबल पढ़ते हैं, तो ऐसा हो कि ये शब्द हमें बाइबल को समझने और धीरज, विनम्रता और आज्ञाकारिता के साथ ऐसा करने के लिए प्रोत्साहित करें, जिससे कि बाइबल से हमारा लाभ उस जीवित परमेश्वर की स्तुति में परिणाम स्वरूप हमें मिले, जिन्हें अभी भी परमेश्वर बाइबल के माध्यम से बोलता है।
यदि हम एक बार, दो बार या तीन बार पढ़ें, और समझ न पाएँ, तो हम ऐसा करना बन्द न करें, बल्कि अब भी पढ़ना, प्रार्थना करना, दूसरों से पूछना जारी रखें और इस प्रकार लगातार खटखटाते रहें, और जैसा कि संत ऑगस्टाइन कहते हैं, अन्त में द्वार खुल ही जाएगा। यद्यपि पवित्रशास्त्र में बहुत सी बातें अस्पष्ट रहस्यों में कही गई हैं, फिर भी एक स्थान पर कोई भी बात जटिल रहस्यों के अन्तर्गत नहीं कही गई है, परन्तु अन्य स्थानों पर वही बात अधिक परिचित और स्पष्ट रूप से विद्वानों और अशिक्षितों, दोनों के लिए कही गई है। और पवित्रशास्त्र की जो बातें समझने में स्पष्ट हैं और उद्धार के लिए आवश्यक हैं, उनके लिए प्रत्येक मनुष्य का कर्तव्य है कि वह उन्हें सीखे, उन्हें स्मरण में अंकित कर ले, और प्रभावी ढंग से उनका अभ्यास करे; और जहाँ तक अस्पष्ट रहस्यों का प्रश्न है, उनसे अनभिज्ञ रहने में तब तक संतुष्ट रहे, जब तक कि परमेश्वर उन बातों को उस पर खोलने के लिए प्रसन्न न हो जाए।
. . . और यदि आप पवित्रशास्त्र को पढ़कर भूल में पड़ने से डरते हैं, तो मैं आपको दिखाऊँगा कि आप इसे बिना भूल वाले खतरे के कैसे पढ़ सकते हैं। इसे नम्र और दीन हृदय से विनम्रतापूर्वक पढ़ें, और यह सोचें कि आप इसके ज्ञान से स्वयं को नहीं, बल्कि परमेश्वर को महिमा प्रदान कर सकते हैं; और इसे परमेश्वर से प्रतिदिन प्रार्थना किए बिना न पढ़ें, कि वह आपके पढ़ने को अच्छे प्रभाव की ओर निर्देशित करे; तथा इसे और अधिक स्पष्ट रूप से समझाने का प्रयत्न न करें, कि आप इसे स्पष्ट रूप से समझ सकें. . .
अभिमान और अहंकार सभी गलतियों की जननी हैं: और विनम्रता को किसी गलती से डरने की आवश्यकता नहीं है। क्योंकि विनम्रता केवल सत्य को जानने की खोज करेगी; वह खोज करके एक स्थान को दूसरे स्थान से जोड़ेगी: और जहाँ उसे अर्थ नहीं मिलेगा, वह प्रार्थना करेगी, वह दूसरों से पूछताछ करेगी, जो जानते हैं, और जो कुछ वह नहीं जानता, उसकी अभिमानपूर्वक और जल्दबाजी में व्याख्या नहीं करेगी। इस कारण, विनम्र व्यक्ति बिना किसी गलती के खतरे के, पवित्रशास्त्र में किसी भी सत्य की साहसपूर्वक खोज कर सकता है।38
चर्चा एवं मनन:
- क्या इस भाग में से किसी ने आपकी यह जानने में सहायता की कि पवित्रशास्त्र को अधिक विश्वासयोग्यता के साथ कैसे पढ़ना है?
- तीनों क्षितिजों में से कौन सा आपके लिए सबसे अधिक सहायक रहा?
- बाइबल को नियमित रूप से पढ़ने के लिए आपकी क्या योजना है?
अन्तिम टिप्पणियाँ
- कभी-कभी प्रेरितों के युग के अन्त में परमेश्वर के प्रकाशन के समाप्त हो जाने के इस दृष्टिकोण को समाप्तिवाद कहा जाता है। इस दृष्टिकोण पर उपयोगी चर्चा के लिए, थॉमस आर. श्राइनर, स्पिरिचुअल गिफ्ट्स: वाट आर दे एंड वाए दे मैटर (Spiritual Gifts: What They Are and Why They Matter) (नैशविले: बी. एंड एच., 2018), 155–69 को देखें।
- जो लोग अमेरिका में बाइबल के स्थान और साथ ही साथ इस राष्ट्र के नागरिकों पर इसके प्रभाव पर विचार करने में रुचि रखते हैं, उनके लिए मार्क नोल की पुस्तक, अमेरिकाज़ बुक: द राइज़ एंड डिक्लाइन ऑफ अ बाइबल सिविलाइज़ेशन, 1794–1911 (America’s Book: The Rise and Decline of a Bible Civilization,1794–1911) (न्यूयॉर्क: ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 2022), पढ़ने का प्रयास किए जाने के योग्य है।
- स्टीफन जे. निकोल्स, द रिफॉर्मेशन: हाउ अ मॉन्क एंड अ मैलेट चेंज्ड द वर्ल्ड (The Reformation: How a Monk and a Mallet Changed the World) (व्हीटन, आई.एल.: क्रॉसवेज, 2007).
- माना गया है कि सन् 1517 में उनका अपना ईश-विज्ञान ठोस रूप नहीं ले पाया था। परन्तु सन् 1520 तक, वे धर्म-सुधार के पाँच सिद्धान्तों को समझने और उनकी पुष्टि करने की स्थिति में पहुँच गए थे: उद्धार केवल अनुग्रह से, केवल विश्वास करने से, केवल मसीह में, केवल पवित्रशास्त्र के अनुसार मिलता है, और यह सब केवल परमेश्वर की महिमा के लिए है। इसलिए, सोला ग्राटिया, सोला फिडा, सोलस क्राइस्टस, सोला स्क्रिप्चरा, और सोली देओ ग्लोरिया।
- एल.डब्ल्यू. 32:112. मैथ्यू बैरेट, सम्पादक, रिफॉर्मेशन थियोलॉजी: ए सिस्टमैटिक सर्वे (Reformation Theology: A Systematic Survey) (व्हीटन, आई.एल.: क्रॉसवे, 2017), में उद्धृत ##.
- जॉन कैल्विन, इंस्टीट्यूट्स ऑफ द क्रिश्चियन रिलिजन (Institutes of the Christian Religion), सम्पादक जॉन टी. मैकनील, अनुवादक फोर्ड लुईस बैटल्स (लुइसविले: वेस्टमिंस्टर जॉन नॉक्स, 1960), 1.7.5.
- बैरेट, रिफॉर्मेशन थियोलॉजी (Reformation Theology), 172 में उद्धृत।
- रिचर्ड एन. सोलेन, हैंडबुक ऑफ बिबलिकल क्रिटिसिज़्म (Handbook of Biblical Criticism), द्वितीय संस्करण (लुइसविले, के.वाई.: वेस्टमिंस्टर जॉन नॉक्स, 2011), 37.
- पौलुस वेगनर, द जर्नी फ्रॉम टेक्स्ट्स टू ट्रांसलेशन्स: द ओरिजिन एंड डेवलपमेंट ऑफ द बाइबल (The Journey from Texts to Translations: The Origin and Development of the Bible) (ग्रैंड रैपिड्स: बेकर एकेडमिक, 2004), 101.
- तोरह, नवीम और केतुवीम मिलकर तनाख या इब्रानी बाइबल बनाते हैं।
- एंड्रियास कोस्टेनबर्गर, डेरेल बॉक और जोश चत्रॉ, ट्रुथ मैटर्स: कॉन्फिडेंट फेथ इन अ कन्फ्यूजिंग वर्ल्ड (Truth Matters: Confident Faith in a Confusing World) (नैशविले: बी. एंड एच. एकेडमिक, 2014), 45.
- आज के समय में, “वल्गर” शब्द अशिष्ट या आपत्तिजनक भाषा से जुड़ा है, परन्तु लातीनी भाषा में “वल्गेरिस” शब्द का सम्बन्ध सामान्य बात, या आम जनता से था। इसलिए, वुल्गेट आम बोलचाल की भाषा में लिखी गई बाइबल थी।
- एफ. एफ. ब्रूस, द केनन ऑफ स्क्रिप्चर (The Canon of Scripture) (डाउनर्स ग्रोव, आई.एल.: इंटरवर्सिटी, 1988), 87-93.
- अधिक सटीक रूप से, उन्होंने इब्रानी बाइबल की बाईस पुस्तकों को क्रमांकित किया, जिसमें छोटे भविष्यद्वक्ताओं को एक पुस्तक के रूप में लिया गया, और अन्य अंग्रेजी पुस्तकों (जैसे, 1-2 इतिहास और एज़्रा-नहेम्याह) को भी एक पुस्तक के रूप में लिया गया। हम नीचे क्रमांकित करने के इस तरीके पर फिर से विचार करेंगे।
- अधिक सटीक रूप से कहें तो जेरोम ने वास्तव में दो प्रकार की पुस्तकों को पवित्रशास्त्र के बाहर देखा — वे जिनका कलीसिया के लिए शिक्षाप्रद प्रभाव था और अन्य जिन्हें पूरी तरह से अनदेखा किया जाना था (ब्रूस, द केनन ऑफ स्क्रिप्चर (The Canon of Scripture), 90)। इस प्रकार, वह नीतिवचन, सभोपदेशक और श्रेष्ठगीत पर अपनी टिप्पणी की प्रस्तावना में लिखते हैं: “जैसे कलीसिया जूडिथ, तोबित और मक्काबियों की पुस्तकों को तो पढ़ती है, परन्तु उन्हें ग्रंथ-सूची वाली पुस्तकों के बीच में स्वीकार नहीं करती, ठीक वैसे ही उसे इन दो खण्डों को आधिकारिक कलीसियाई सिद्धान्तों [अर्थात्, कलीसिया सिद्धान्त] को स्थापित करने के लिए नहीं, बल्कि लोगों के ज्ञानवर्धन के लिए पढ़ना चाहिए” (ब्रूस, द केनन ऑफ स्क्रिप्चर (The Canon of Scripture), 91-92 में उद्धृत)।
- ब्रूस, द केनन ऑफ स्क्रिप्चर (The Canon of Scripture), 98-100.
- ब्रूस, द केनन ऑफ स्क्रिप्चर (The Canon of Scripture), 101-04.
- ब्रूस, द केनन ऑफ स्क्रिप्चर (The Canon of Scripture), 105.
- रोचक बात यह है कि ब्रूस इस बात की ओर संकेत करते हैं कि बहुत से रोमन कैथोलिक विद्वान अपोक्रिफा की पुस्तकों को द्वितीय प्रमाणिक पुस्तकों अर्थात् “ड्यूटेरोकैनोनिकल” (“deuterocanonical”) स्वभाव को पहचानते हैं (ब्रूस, द केनन ऑफ स्क्रिप्चर (The Canon of Scripture), 105)। फिर भी, पवित्रशास्त्र और परम्परा के बारे में रोम की समझ, सिद्धान्त निर्धारित करने के लिए अपोक्रिफा को पवित्रशास्त्र के समान स्तर पर रखती है।
- ब्रूस, द केनन ऑफ स्क्रिप्चर (The Canon of Scripture), 51–54.
- कोस्टेनबर्गर, एट एल, ट्रुथ मैटर्स (Truth Matters), 52–53.
- ब्रूस, द केनन ऑफ स्क्रिप्चर (The Canon of Scripture), 228 में उद्धृत।
- मुराटोरियन ग्रंथ-सूची (लगभग 190 ईस्वी) में नये नियम की इक्कीस पुस्तकें सूचीबद्ध हैं। ब्रूस, द केनन ऑफ स्क्रिप्चर (The Canon of Scripture), 158–69.
- ब्रूस, द केनन ऑफ स्क्रिप्चर (The Canon of Scripture), 50
- जेरोम, पत्री 53.9. ब्रूस, द केनन ऑफ स्क्रिप्चर (The Canon of Scripture), 225 में उद्धृत।
- बी. बी. वारफील्ड, “‘यह कहता है:’ ‘पवित्रशास्त्र कहता है:’ ‘परमेश्वर कहता है,’“ द इंस्पिरेशन एंड अथॉरिटी ऑफ द बाइबल (The Inspiration and Authority of the Bible) में, और (फिलिप्सबर्ग, न्यू जर्सी: पी. एंड आर., 1948), 299–348.
- बाइबल आधारित पवित्रशास्त्र को “पवित्रशास्त्र को पवित्रशास्त्र की व्याख्या करने देने और सम्पूर्ण बाइबल को उसकी अपनी साहित्यिक संरचनाओं और प्रकट होने वाली वाचाओं के अनुसार पढ़ने का अनुशासन” के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। https://christoverall.com/article/concise/the-butterfly-effect-how-biblical-theology-makes-systematic-theology-more-or-less-biblical/
- स्टीफन डेम्पस्टर, डोमिनियन एंड डायनेस्टी: ए थियोलॉजी ऑफ द हिब्रू बाइबल (Dominion and Dynasty: A Theology of the Hebrew Bible) (डाउनर्स ग्रोव, आई.एल.: इंटरवर्सिटी, 2003), 35.
- रोजर बेकविथ, द ओल्ड टेस्टामेंट केनन ऑफ द न्यू टेस्टामेंट (The Old Testament Canon of the New Testament) (ग्रैंड रैपिड्स, एम.आई.: एर्डमैन्स, 1984) के बाद, डेम्पस्टर, डोमिनियन एंड डायनेस्टी (Dominion and Dynasty), 35, में लिखते हैं, “सबसे पुराना क्रम स्पष्ट रूप से इब्रानी ग्रंथ-सूची का था, और इस बात के दृढ़ प्रमाण मिलते हैं कि यह यीशु मसीह की बाइबल थी।”
- मेरी पसन्द वाली अध्ययन बाइबल ई.एस.वी. अध्ययन बाइबल होगी।
- बाइबल सर्वेक्षण बाइबल की प्रत्येक पुस्तक के लेखक, पाठकों और उद्देश्य के बारे में जानकारी प्रदान करते हैं। दो उत्कृष्ट बाइबल सर्वेक्षण हैं: ट्रेम्पर लॉन्गमैन तृतीय और रेमंड डिलार्ड, एन इंट्रोडक्शन टू द ओल्ड टेस्टामेंट (An Introduction to the Old Testament) (ग्रैंड रैपिड्स: ज़ोंडरवन एकेडमिक, 2006), और डी. ए. कार्सन और डगलस जे. मू, एन इंट्रोडक्शन टू द न्यू टेस्टामेंट (An Introduction to the New Testament) (ग्रैंड रैपिड्स: ज़ोंडरवन एकेडमिक, 2005).
- केविन जे. वैनहूज़र, पिक्चर्स एट अ थियोलॉजिकल एग्ज़िबिशन: सीन्स ऑफ द चर्च्स वर्शिप, विटनेस, एंड विज़डम (Pictures at a Theological Exhibition: Scenes of the Church’s Worship, Witness, and Wisdom) (डाउनर्स ग्रोव, आई.एल.: आई.वी.पी. एकेडमिक, 2016), 79-80.
- इन “तीनों क्षितिजों” को वैकल्पिक रूप से पाठ वाले, युगारम्भिक और ग्रंथ-सूची वाले नाम दिए गए हैं।
- डेविड श्रॉक, द थ्री मोस्ट इम्पोर्टेंट वर्ड्स आई लर्न्ड इन सेमिनरी: “टेक्टुअल, इपोकल, केनोनिकल”, (The Three Most Important Words I Learned in Seminary: “Textual, Epochal, Canonical”) 9मार्क्स https://www.9marks.org/article/ the-three-most-important-words-i-learned-in-seminary-textual-epochal-canonical/.
- अच्छी बाइबल पठन योजनाओं के चयन के लिए, ई.एस.वी. बाइबल अनुवाद के द्वारा प्रस्तुत की गई विविध पठन योजनाएँ देखें। इसके अतिरिक्त, मैंने पाया है कि पवित्रशास्त्र की एकता की E-100 (आवश्यक 100 चुनौती) पठन योजना किसी को सम्पूर्ण बाइबल से परिचित कराने के लिए सबसे उपयुक्त स्थान है। बाइबल के 100 चयनों में, यह पाठक को सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र के माध्यम से लेकर जाती है।
- स्कॉट रेड, “ड्युटेरोनोमी,” ए बिबलिकल-थियोलॉजिकल इंट्रोडक्शन टु द ओल्ड टेस्टामेंट (“Deuteronomy,” in A Biblical-Theological Introduction to the Old Testament) में, सम्पादक माइल्स वैन पेल्ट (व्हीटन, आई.एल.: क्रॉसवे, 2016), 141; डेनिस जॉनसन, हिम वी प्रोक्लेम: प्रीचिंग क्राइस्ट फ्रॉम ऑल द स्क्रिप्चर्स (Him We Proclaim: Preaching Christ from All the Scriptures) (फिलिप्सबर्ग, न्यू जर्सी: पी. एंड आर., 2007), 167-97.
- मैं वाचा-सम्बन्धी बातों को प्राथमिकता देता हूँ, क्योंकि यह बाइबल की अपनी शर्तों, अर्थात् युगों के बजाय वाचाओं पर केन्द्रित है।
- बैरेट, रिफॉर्मेशन थियोलॉजी (Reformation Theology), 184 में उद्धृत।
विषयसूची
- 1 बाइबल क्या है?
- अंगीकारों के अनुसार
- ग्रंथ-सूची के अनुसार
- आत्मा की गवाही के अनुसार
- चर्चा एवं मनन:
- 2
- पुराना नियम
- नया नियम
- ग्रंथ-सूची महत्वपूर्ण क्यों है
- चर्चा एवं मनन:
- 3
- चर्चा एवं मनन:
- 4
- बाइबल पढ़ने की तैयारी करना: परमेश्वर के वचन के लिए हृदय विकसित करना
- पाठ वाला क्षितिज: पाठ के अर्थ की खोज करना
- वाचा वाला क्षितिज: परमेश्वर के वाचा वाले इतिहास के कथानक को समझना
- मसीह-विज्ञान वाला क्षितिज: मसीह के व्यक्तित्व और कार्य के माध्यम से परमेश्वर में आनन्दित होना
- डर लगे और डर न लगे, परन्तु उस उठाएँ और पढ़ें
- चर्चा एवं मनन: