#29 अधिक गहन प्रार्थना की खोज
परिचय
प्रार्थना इतनी रोमांचक क्यों है — या यूँ कहें कि यह इतनी रोमांचक क्यों होनी चाहिए? खैर, सबसे पहले तो यह कि परमेश्वर वास्तव में हमारी प्रार्थनाओं का उत्तर देता है। आइए इस सच्चाई को समझें कि परमेश्वर की असीम बुद्धि और संप्रभु योजना के अनुसार, पवित्रशास्त्र में बार-बार हमें प्रार्थना करने के लिए प्रोत्साहित किया गया है, क्योंकि किसी न किसी प्रकार से. . . परमेश्वर हमारी प्रार्थनाओं का उत्तर देता है।
यह तथ्य है कि हमारे द्वारा परमेश्वर से कहे गए शब्द किसी न किसी प्रकार से उसकी बड़ी योजना में महत्व रखते हैं, वह अद्भुत है। इस पर विचार करें: क्या परमेश्वर ने मनुष्य को अनुग्रह का कोई अन्य साधन दिया है जो यही बात कह सके? मसीहियों को परमेश्वर द्वारा कई कार्यों को करने के लिए निर्देश दिया गया है — जैसे बाइबल पढ़ना, जानबूझकर अन्य लोगों के जीवन में निवेश करना, स्वयं को उसकी सेवा में समर्पित करना। और जब हम इनमें से किसी भी क्षेत्र में आज्ञाकारिता से चलते हैं, तो हम परमेश्वर की आशीष अनुभव कर सकते हैं और उसकी ईश्वरीय उपस्थिति को हमारा मार्गदर्शन और सामर्थ्य प्रदान करते हुए महसूस कर सकते हैं। किन्तु प्रार्थना एकमात्र अनुग्रह का साधन है जो उसने दिया है, जहाँ उसे कार्य करने के लिए बुलाया जाता है और हम उसकी सामर्थ्य को प्रदर्शित होते हुए देखते हैं। प्रार्थना परमेश्वर का एक अद्भुत उपहार है क्योंकि हम परमेश्वर को कार्य करते हुए देख सकते हैं।
किन्तु यह सच्चाई को और अधिक दु:खद बना देता है — अर्थात्, प्रार्थना के प्रति उत्साहित होना आसान तो है, परन्तु उसे करना कठिन है। जब हम यह सोचते हैं कि हम सम्पूर्ण जगत के परमेश्वर को काम करते हुए देख सकते हैं, तो हमारे दैनिक जीवन में, प्रार्थना कभी-कभी महत्वहीन, अनावश्यक और यहाँ तक कि उबाऊ सी लग सकती है। यदि आप मेरे समान हैं, तो आप प्रार्थना के विचार और उसकी संभावना के बारे में बहुत उत्साहित हो सकते हैं, परन्तु फिर भी लगातार प्रार्थना करना मुश्किल हो सकता है।
जब यह विचार किया जाए कि प्रार्थना इतनी कठिन क्यों हो सकती है, तो हम प्रार्थना के प्रति कुछ कुछ संभावित रुकावटों को देख सकते हैं जो इस समस्या में योगदान देती हैं। शायद यह हमारी इक्कीसवीं सदी की और विकसित देश में हमारी तेज गति वाली जीवनशैली के कारण है। या शायद इस कारण कि हमें प्रार्थना से उसी प्रकार शीघ्र सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं मिलती है जैसी अन्य आत्मिक गतिविधियों से मिलती है। या हो सकता है कि यह केवल इसलिए हो कि प्रार्थना हमें ऐसा महसूस कराती है जैसे हम स्वयं से बात कर रहे हैं और कोई सुनता ही नहीं है। किन्तु मुद्दे के मूल में, लगभग हर मामले में, जहाँ प्रार्थना नहीं होती है वहाँ अविश्वास की जड़ होती है। प्रार्थना न करना, विश्वास न रखने के समान ही है।
इसलिए, यह बहुत अधिक प्रोत्साहित करने वाला है, है ना? इस तथ्य को देखते हुए हम सभी इस बात से सहमत हो सकते हैं कि हम सभी प्रार्थना में बढ़ सकते हैं, प्रश्न यह है कि, “अब हम क्या करें?” इस क्षेत्रीय मार्गदर्शिका का उद्देश्य उस परमेश्वर में आपके विश्वास का निर्माण करना है जो प्रार्थनाओं का उत्तर देता है। साथ ही, मैं आपको अधिक प्रभावी ढंग से प्रार्थना करने के कुछ व्यावहारिक सुझाव देकर आपके प्रार्थना जीवन को सुदृढ़ बनाने में सहायता करना चाहता हूँ। फिर मैं आपको प्रार्थना के बारे में उत्तम गुप्त रहस्यों में से एक बताना चाहता हूँ जिसके बारे में कोई बात नहीं करता है। यही इस मार्गदर्शिका में है और हमारा अंतिम लक्ष्य है। क्या आप तैयार हैं? किन्तु इससे पहले कि हम उस लक्ष्य की ओर बढ़ें, हमें पहले यह बेहतर ढंग से समझना होगा कि परमेश्वर हमें किस काम के लिए बुला रहा है, और प्रार्थना करना इतना कठिन क्यों है।
ऑडियो मार्गदर्शिका
ऑडियो#29 अधिक गहन प्रार्थना की खोज
1 पालन करने के लिए
सबसे कठिन आज्ञा
प्रार्थना रोमांचक है क्योंकि परमेश्वर हमारी प्रार्थनाओं का उत्तर देता है, परन्तु यह इसलिए भी रोमाचंक है क्योंकि यह वह स्थान है जहाँ हम परमेश्वर से मिलते हैं। मूसा परमेश्वर से आमने-सामने बात करता था, और यहोशू “वह तम्बू में से न निकलता था” जहाँ वह परमेश्वर से मिलता था (निर्गमन 33:11)। ठीक उसी प्रकार, आज हम स्वर्ग के सिंहासन कक्ष में प्रवेश कर सकते हैं और प्रभु की सेना के सेनापति से बात कर सकते हैं। फिर भी, परमेश्वर द्वारा इसके लिए निर्धारित सभी रोमांच और गंभीरता के बावजूद, प्रार्थना आज भी कलीसिया में बहुत से लोगों के विश्वास की सबसे कमजोर कड़ी बनी हुई है।
तो प्रार्थना की कठिनाई की गुत्थी खोलने का प्रयास करते हुए, आइए कुछ प्रश्न पूछें और उत्तर दें जिससे कि हम यह जान सकें कि ऐसा बहुत से लोगों के साथ क्यों होता है।
1. प्रार्थना क्या है?
प्रार्थना की क्षमता के बारे में सभी उत्साह के साथ, सबसे पहले यह पूछना महत्वपूर्ण है, “यह क्या है?” सीधे शब्दों में कहें तो, प्रार्थना का सबसे मूल अर्थ परमेश्वर से बात करना है। जैसा कि एक धर्म-सुधारक ने कहा है, “प्रार्थना और कुछ नहीं, बल्कि परमेश्वर के सामने अपना हृदय खोल देना है।”1 परमेश्वर के साथ बातचीत में इस प्रकार के खुलेपन में परमेश्वर की आराधना शामिल हो सकती है कि वह कौन है, हमारे जीवन में उसके प्रावधान और आशीष के लिए परमेश्वर को धन्यवाद देना, क्षमा के लिए परमेश्वर के सामने पापों का अंगीकार करना, और परमेश्वर से सहायता पाने के लिए विनती करना — चाहे वह उसकी सामर्थ्य या सांत्वना के माध्यम से हो। समस्त रूप से, यह आसानी से कहा जा सकता है कि प्रार्थना मसीहियों के जीवन में सभी अनुग्रह के नियमों में सबसे सरल है।
हमारी समझ को सहारा देने के लिए इस मूल परिभाषा को जानना महत्वपूर्ण है कि परमेश्वर की इच्छा है कि हम प्रार्थना करें—और अक्सर प्रार्थना करें। वह नहीं चाहता है कि हम कभी-कभी या जब हमारा मन हो, या जब हम वास्तव में मुसीबत में हों तब प्रार्थना करें। किन्तु परमेश्वर चाहता है कि हम “निरन्तर प्रार्थना में लगे रहो” (1 थिस्सलुनीकियों 5:17)। वह उन लोगों के साथ निरंतर बातचीत करना चाहता है जिन्हें उसने अपने स्वरूप में बनाया है, अर्थात् हम लोगों के साथ। परमेश्वर चाहता है कि हम प्रार्थना करें।
2. निरन्तर प्रार्थना में लगे रहो का क्या अर्थ है?
इस पद को देखना, “निरन्तर प्रार्थना में लगे रहो” ठंडे दिन में ठंडे पानी में डुबकी लगाने के आत्मिक रूप जैसा है — जो शरीर को झटका देता है! किन्तु वास्तव में निरन्तर प्रार्थना में लगे रहो का क्या अर्थ है? यदि आपने कभी बिना रुके प्रार्थना करने का प्रयास किया है, तो संभवतः आपने स्वयं को हतोत्साहित पाया होगा और दोपहर तक प्रार्थना छोड़ने के लिए तैयार हो गए होंगे। विशेषकर, कुछ और काम करते समय, यह अधिक समय नहीं लेता है कि आपके दिमाग में कोई गीत आ जाता है, या कोई और बात ध्यान भटका देती है, और फिर आप प्रार्थना करना ही भूल जाते हैं। आखिरकार, एक साथ कई काम करना एक झूठ है (विज्ञान देखिए, यह सत्य है!)। जिस रचना में परमेश्वर ने हमें बनाया है, हम वास्तव में एक समय में केवल एक ही कार्य कर सकते हैं। कुछ लोग दो चीजों के बीच झूलने में कुशल हो सकते हैं, परन्तु हम मनुष्यों की बनावट की अद्भुत सरलता को देखते हुए, हम एक समय में केवल एक ही काम कर सकते हैं। ऐसी स्थिति में, बातचीत करते समय, ईमेल भेजते समय, या किसी अन्य आवश्यक कार्य पर ध्यान केंद्रित करते समय हम प्रार्थना कैसे करें? या तो हम सभी लगातार विफल हो रहे हैं और यह आज्ञा पूरी नहीं हो सकती है — या फिर हम समझ नहीं पा रहे हैं कि परमेश्वर ने क्या कहा है।
साधारण बुद्धि और यीशु के जीवन का अध्ययन करके यह तर्क दिया जा सकता है कि, यद्यपि कोई व्यक्ति हर समय परमेश्वर के साथ मौखिक संचार में न रहे, फिर भी सभी परिस्थितियों में और सम्पूर्ण दिन प्रार्थना के मनोभाव को बनाए रखना संभव है। दूसरे शब्दों में, ऐसा कोई समय, स्थान या परिस्थिति नहीं है जहाँ प्रार्थना करना उचित न हो। ऐसा प्रतीत होता है कि शायद यह आज्ञा प्रार्थना की निरन्तर गतिविधि के बारे में कम और प्रार्थना की सर्वव्यापी मनोवृत्ति के बारे में अधिक है। सरल शब्दों में, निरन्तर प्रार्थना में लगे रहो, इसका अर्थ प्रार्थना का स्वभाव और प्रवृत्ति विकास करना है।
सबसे आश्चर्यजनक पशु प्रवृत्तियों में से एक मोनार्क तितलियों का प्रवास करना है। ये छोटे जीव कनाडा और अमेरिका से मेक्सिको में अपने सर्दियों के ठिकाने तक लगभग 3,000 मील की अद्भुत यात्रा करते हैं। इस प्रवृत्ति को और भी अधिक अद्भुत बनाने वाली बात यह है कि यह प्रवासन केवल एक पीढ़ी का प्रयास नहीं है, बल्कि यह प्रायः कई पीढ़ियों तक चलता है। ये तितलियाँ इस अद्भुत यात्रा के दौरान सूर्य की स्थिति और पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र जैसे पर्यावरणीय संकेतों का उपयोग करती हैं। और वे ऐसा कैसे करती हैं? सृष्टिकर्ता ने उनमें जो जन्मजात प्रवृत्तियाँ डाली हैं, यह उसी के माध्यम से होता है।
ठीक उसी प्रकार, परमेश्वर चाहता है कि हम प्रार्थना के नियमित स्वभाव और प्रवृत्ति को विकसित करें। इस प्रकार की स्वाभाविक, निरंतर प्रार्थना ऐसी होती है कि हम किसी भी समय में, किसी भी स्थान पर, किसी भी विषय पर प्रार्थना करने के लिए तत्पर और इच्छुक रहें।
किसी भी समय। दाऊद सुबह प्रार्थना करता था (भजन. 5:3), दानिय्येल प्रत्येक भोजन के समय प्रार्थना करता था (दानि. 6:10)। पतरस और यूहन्ना दोपहर में प्रार्थना करते थे (प्रेरि. 3:1), भजनकार आधी रात में प्रार्थना करता था (भजन. 119:62)। यीशु दिन के किसी भी समय और अनेक परिस्थितियों में प्रार्थना करता पाया गया (लूका 6:12 13)। निरन्तर प्रार्थना करने की प्रेरणा यह है कि परमेश्वर हमेशा कार्य करता रहता है और कभी भी परमेश्वर होने से पीछे नहीं हटता है। इसका अर्थ यह है, प्रिय मित्र, कि आप किसी भी समय प्रार्थना कर सकते हैं! जब आप पहली बार जागें, या जब आप कार्यस्थल में किसी बैठक में हों (जैसे नहेम्याह, नहे. 2:4-5)। यदि आप सो नहीं पा रहे हों, प्रार्थना करें! यदि आप प्रसन्न हों, प्रार्थना करें! यदि आप चिंतित हों, अकेले हों, या दुःखी हों — प्रार्थना करें! किसी भी समय, दिन हो या रात, हमारा स्वर्गीय पिता हमारी प्रार्थनाएँ सुनने के लिए तैयार है।
किसी भी स्थान पर। बाइबल के कुछ उदाहरणों का सर्वेक्षण करने पर, हम यह भी पाते हैं कि निरन्तर प्रार्थना करने के लिए प्रार्थना का कोई निश्चित स्थान होना आवश्यक है। हाँ, कई लोगों ने मंदिर में प्रार्थना की, और परमेश्वर ने कहा कि उसका घर “प्रार्थना का घर” होगा (यशा. 56:7-8)। इसके अलावा, कलीसिया को सामूहिक रूप से प्रार्थना करने का आदेश दिया गया है, जैसा कि “प्रार्थनाओं” के लिए एकत्रित होने वाली आरंभिक कलीसिया में देखा गया है (प्रेरि. 2:42)। किन्तु पवित्रशास्त्र में ऐसे कई उदाहरण भी हैं जब लोग अलग-अलग स्थानों पर प्रार्थना करते थे। इसहाक ने मरुस्थल में प्रार्थना की (उत्प. 24:63)। दाऊद ने नगर में प्रार्थना की (2 शमू.2:1-7)। नहेम्याह ने राजा के शाही दरबार में प्रार्थना की, जब वह राजा के सामने एक ऐसा अनुरोध कर रहा था जिसका उसके जीवन या मृत्यु पर बहुत बड़ा असर पड़ सकता था: “उसने परमेश्वर से प्रार्थना की और राजा से कहा” (नहे. 2:4-5)। और हम यीशु के पृथ्वी पर बिताए अंतिम चौबीस घंटे न भूलें जहाँ उसने एक बगीचे में प्रार्थना की (मत्ती 26:36-56) और क्रूस पर लटके हुए प्रार्थना की (लूका 23:34)। व्यक्तिगत रूप से, मेरी सबसे अच्छी प्रार्थनाओं में से कुछ तब हुई हैं, जब मैं खड़ी पहाड़ी पर चढ़ाई कर रहा था और पसीने से भीगा हुआ था, और प्रार्थना में लीन था। प्रभु की स्तुति हो कि किसी भी स्थान से स्वर्ग तक पहुँचने का स्वागत है!
ये पद केवल यह नहीं सिखाते हैं कि प्रार्थना कहीं भी हो सकती है — बल्कि वे यह भी सिखाते हैं कि प्रार्थना हर जगह होनी चाहिए। दरअसल, कहा जा सकता है कि यदि थिस्सलुनीकियों 5:17 में बताए अनुसार परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने के लिए प्रार्थना हर जगह होनी ही चाहिए।
किसी भी विषय पर। अंततः, निरन्तर प्रार्थना का अर्थ यह है कि हमारी प्रार्थनाओं के विषयों का दायरा और विस्तार वास्तव में असीमित है। पतरस हमें यह बताता है कि अपनी सारी चिंताओं को प्रभु पर डाल दो (अर्थात्: “चाहे वे कुछ भी हों”) क्योंकि वह हमारी परवाह करता है (1 पत. 5:7)। निरन्तर प्रार्थना का अर्थ यह है कि पवित्र और सांसारिक के बीच कोई सतही विभाजन नहीं होना चाहिए, बल्कि हमारे जीवन की सामान्य बातें भी प्रार्थना के विषय बन सकती हैं। प्रेरित यूहन्ना एक व्यक्ति की शारीरिक बीमारी के लिए प्रार्थना करता है (3 यूह. 1:2)। पौलुस अपनी यात्रा की योजना और अपने शरीर में चुभने वाले कांटे के लिए प्रार्थना करता है (2 कुरि. 12:8)। दानिय्येल यरूशलेम के लिए प्रार्थना करता है (दानि. 9:19)। यीशु ने अपने लोगों के साथ अंतिम फसह भोज से पहले प्रार्थना की, और भी बहुत बातों के लिए प्रार्थना की! ऐसा प्रतीत होता है कि व्यापक प्रार्थना की एकमात्र सीमा या शर्त यह है कि वह ऐसी रीति से की जाए जो परमेश्वर को नापसंद न हो या उसकी इच्छा के विरुद्ध न जाए। संभवतः यही वह बात है जिसे यीशु ने तब कहा जब उसने चेलों को आदर्श प्रार्थना सिखाई थी: “तेरा राज्य आए, तेरी इच्छा जैसी स्वर्ग में पूरी होती है, वैसे पृथ्वी पर भी हो” (मत्ती 6:10)। दूसरों के लिए हम किस रीति से प्रार्थना करें, इस बात में भी विविधता है, जैसा कि पौलुस द्वारा तीमुथियुस को दिए गए उपदेश में देखा जा सकता है कि “विनती, और प्रार्थना, और निवेदन, और धन्यवाद सब मनुष्यों के लिए किए जाएँ” (1 तीमु. 2:1)। जब हम परमेश्वर के वचन के अनुसार प्रार्थना करते हैं, तो हम संसार की किसी भी बात और हर चीज़ के लिए प्रार्थना करने के लिए स्वतंत्र हो जाते हैं।
परमेश्वर चाहता है कि हम इसी प्रकार प्रार्थना करें। किसी भी समय, किसी भी स्थान पर, किसी भी विषय पर उससे बात करने का दृष्टिकोण, स्वभाव और सहज प्रवृत्ति रखें।
प्रार्थना करने के लिए परमेश्वर की मंशा की स्पष्ट समझ प्राप्त करने का अर्थ है कि अब हमारे पास कोई बहाना नहीं है। हम यह कहकर नहीं छिप सकते हैं कि यह बहुत जटिल है, यह बहुत पुराना हो गया है, या मैं प्रार्थना करने के योग्य नहीं हूँ। हममें से कुछ लोग भजन संहिता 34:6 के शब्दों से संबंधित हो सकते हैं: “इस दीन जन ने पुकारा तब यहोवा ने सुन लिया।” और संभव है कि आपके लिए भी आरम्भ यहीं से होना चाहिए। आप चाहे जो भी हों और आप ने चाहे जो भी किया हो, आप प्रार्थना कर सकते हैं। और अच्छा समाचार यह है कि यद्यपि प्रार्थनामयी जीवन जीना एक बड़ा कार्य प्रतीत होता है, परन्तु यह परमेश्वर की सहायता से संभव है।
3. प्रार्थना परमेश्वर को कैसे प्रेरित करती है?
जब हमने यह मूल बात समझ ली है कि प्रार्थना केवल परमेश्वर से बातचीत है, और वह चाहता है कि हम अपने जीवन में इसे एक स्वाभाविक प्रवृत्ति अर्थात् स्वभाव को बनाएँ, अब हमें यह विचार करना चाहिए कि प्रार्थनाओं की गुणवत्ता या प्रभावशीलता में क्या अंतर होता है। दूसरे शब्दों में, किस प्रकार की प्रार्थनाएँ सच में कार्य करती हैं, और किससे? याकूब यह संकेत देता है कि “धर्मी जन” की प्रभावशाली प्रार्थना बहुत कुछ कर सकती है (याकूब 5:16)। वह यह भी कहता है कि तुम माँगते हो और पाते नहीं, क्योंकि तुम विश्वास के साथ नहीं माँगते हो (याकूब 4:3-5)। यीशु ने कहा कि परमेश्वर के सामने थोड़ा-सा विश्वास भी पहाड़ हटाने के लिए काफी है (मत्ती 17:20)। किन्तु उसी पद में वह यह भी प्रश्न करता है कि क्या वह जब लौटेगा तब पृथ्वी पर विश्वास पाएगा? ये पद हमें दिखाते हैं कि उदासीन, अधूरे मन से व स्वार्थी प्रार्थनाओं और प्रभावशाली व सामर्थी प्रार्थनाओं में बहुत अंतर होता है। यदि हम सावधान न रहें, तो प्रार्थना परमेश्वर और मनुष्य के बीच संबंध के भाव को व्यक्त करने के अपने मूल उद्देश्य से भटककर एक मृत और दिखावटी धर्म बन सकती है। और आइए हम अभी इस बात पर सहमत हो जाएँ — किसी को भी और धर्म नहीं चाहिए! यदि हम सावधान न रहें, तो प्रार्थना ऐसी वस्तु बन सकती है जो परमेश्वर की इच्छा, परमेश्वर की महिमा, और परमेश्वर के राज्य के उद्देश्यों के स्थान पर हमारे स्वार्थ, हमारी महिमा, और हमारे उद्देश्यों के चारों ओर केंद्रित हो।
वह प्रार्थना जो परमेश्वर चाहता है और जो उसे प्रेरित करती है, वह वही प्रार्थना है जो परमेश्वर के साथ घनिष्ठ संबंध पर आधारित होती है और जो उसी पर केंद्रित होती है। इसी विचारधारा के आधार पर भजनकार हमें “परमेश्वर के दर्शन के खोजी” (भजन 27:8) होने के लिए विवश करता है। जब यीशु ने चेलों को प्रार्थना की आदर्श रीति सिखाई, तो उसने उन्हें इस बात से आरम्भ करने को कहा कि पहले परमेश्वर के नाम को पवित्र माना जाए, फिर परमेश्वर के राज्य की उन्नति के लिए और उसकी इच्छा के अनुसार प्रार्थना की जाए। यीशु के अनुसार प्रभावशाली प्रार्थना की विधि है, परमेश्वर की महिमा को पहचानना, उसकी इच्छा को जानना, और उसके राज्य के लिए उसके उद्देश्यों को खोजना — और इन सब बातों के लिए परमेश्वर के साथ संबंध आवश्यक है। यदि परमेश्वर एक सवारी रेलगाड़ी है और हम उसमें सवारी कर रहे हैं, तो हमारी प्रार्थनाएँ भी उसी दिशा में हों जहाँ वह अपनी सामर्थ्य से आगे बढ़ रहा है! सामर्थी प्रार्थना वह है जो परमेश्वर की इच्छा और परमेश्वर के कार्य के साथ जुड़ती है।
हम उस प्रकार की प्रार्थना चाहते हैं जो परमेश्वर को प्रसन्न करे! ऐसी प्रार्थनाएँ जो प्रभावशाली हों, जो आकाश को हिला दें और पृथ्वी को प्रभावित करें — ऐसी प्रार्थनाएँ जो हमारे हृदयों को सामर्थी रूप से प्रभावित करें, और समुदायों को भी जहाँ हम रहते हैं, ऐसी प्रार्थना जो केवल औपचारिक न हो, बल्कि ऊपर से आई सामर्थ्य से भरी हो।
प्रार्थना क्या है और प्रभावशाली प्रार्थना कैसी होती है, इस दृष्टिकोण के साथ, मैं इस प्रश्न पर वापस आना चाहता हूँ: “प्रार्थना करना इतना कठिन क्यों है?”
4. प्रार्थना करना इतना कठिन क्यों है?
जब हमने यह जाना है कि यदि प्रार्थना परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप हो, तो यह कितनी अद्भुत बातें कर सकती है, परन्तु इस बात पर विचार करते हुए हमें यह भी सोचना चाहिए: प्रार्थना का पालन करना सबसे कठिन आज्ञाओं में से एक क्यों है? 1 थिस्सलुनीकियों 5:17 के तीन सरल शब्द समझने में कठिन नहीं हैं। स्थिति को और कठिन बनाने वाली बात यह है कि प्रार्थना करना इतना आसान है कि मेरा चार वर्षीय बच्चा भी इसे सुंदर रीति से कर सकता है। किन्तु दैनिक जीवन में, बिना रुके प्रार्थना की भावना को बनाए रखना अत्यंत कठिन, बल्कि असंभव सा कार्य प्रतीत होता है।
और यद्यपि मुझे यकीन है कि हर युग ने किसी न किसी कारण से अपने युग को सबसे कठिन माना हो, परन्तु इस समय और इस स्थान पर इस पीढ़ी के सामने कुछ खास और कठिन प्रलोभन भी हैं। उन सभी पर विचार करें जो स्थायी प्रार्थनामयी जीवन के विकास के विरुद्ध कार्य कर रहे हैं। तकनीकी प्रगति और अमेरिकी पूंजीवाद के कारण, जो भागदौड़ और जल्दबाजी को बढ़ावा देता है, जीवन की गति बहुत तेज हो गई है। कठोर परिश्रम, भाग-दौड़ और अत्यधिक व्यस्तता को धन, पहचान और अधिक अवसरों से पुरस्कृत किया जाता है — जिससे यह संसार अवसरों की भूमि तो बना है, परन्तु साथ ही काम में डूबे लोगों का संसार भी बना है। हम काम के इतने आदी हो गए हैं कि कई लोगों के लिए उत्पादकता और कार्य-क्षमता ही नया लक्ष्य बन गया है, जिसका वे पीछा कर रहे हैं। धीमी और दीर्घकालिक परियोजनाओं के बजाय, आजकल हर कोई कुछ नया, तेज और उन्नतिशील चीज़ों की तलाश में है – ऐसी चीज़ें जिनसे शीघ्र प्रतिक्रिया मिले। समाज प्रगतिशील और आक्रामक है। कार्यस्थल का संबंध आपके बायोडाटा और प्रमाण-पत्रों से है, अर्थात् आप क्या जानते हैं और उससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह कि आप किसे जानते हैं।
अब, हमारे सांस्कृतिक संदर्भ को लें और उसके भीतर धीमी, लम्बी, चिंतनशील, ध्यानपूर्ण प्रार्थना का अभ्यास रखें। क्या आप कह सकते हैं: यह बिलकुल ऐसा है जैसे वर्गाकार खूंटी को गोल छेद में फिट करना।
फिर भी, अपनी सांस्कृतिक परेशानियों के कारण प्रार्थना करना बंद करने या इसे कम महत्व देने के बारे में सोचते हैं, तो यह उस अंतिम जीवन-रक्षक नाव में छेद करने के समान होगा जो डूबते हुए जहाज को बचा सकती है। तेज गति वाली संस्कृति के प्रकोप में मसीहियों को धीमे होने की अधिक आवश्यकता है, कम नहीं। हमें अधिक एकांत और मनन समय की आवश्यकता है, कम नहीं। हमें अधिक प्रार्थना की आवश्यकता है, कम नहीं। मार्टिन लूथर ने कहा था, “मेरे पास आज करने के लिए बहुत कुछ है, इसलिए मैं पहले तीन घंटे प्रार्थना में बिताऊँगा।”
प्रार्थना की कमी के कारण बहुत लोग मसीह के साथ घनिष्ठ संबंध से दूर हो जाते हैं। कुछ ऐसे हैं जो प्रार्थना करना नहीं जानते हैं, और संभवतः उन्हें कभी सिखाया ही नहीं गया। कुछ लोग जानते हैं कि प्रार्थना कैसे करें, परन्तु उनके पास करने की इच्छा नहीं है। कुछ अन्य प्रार्थना करने की इच्छा रखते हैं, और कुछ समय तक करते भी हैं — परन्तु फिर समय के साथ अन्य इच्छाओं द्वारा आकर्षित हो जाते हैं। यह दु:खद स्थिति, जिससे हर मसीही को सावधान रहना चाहिए, जो ध्यान भटकने, गलत दिशा में चलने या परिणामों की कमी से ऊब जाने के कारण हो सकती है। संभवतः इसी कारण एच. मैक्ग्रेगर ने कहा, “मैं हजार प्रचारकों को प्रशिक्षित करने की अपेक्षा बीस लोगों को प्रार्थना सिखाना अधिक पसंद करूँगा, एक सेवक का सबसे बड़ा कार्य यह होना चाहिए कि वह अपने लोगों को प्रार्थना करना सिखाए।” ऐसा प्रतीत होता है कि यदि शत्रु मसीहियों को प्रार्थना से दूर कर दे, तो शेष सब काम अपने आप हो जाएगा।
अतः, प्रार्थना में अधिक गहराई और निरंतरता बनाए रखने में हमारी सहायता करने के लिए, मेरा विश्वास है कि ये अगले दस सुझाव किसी भी मसीही को बहुत सहायता करेंगे जो प्रभु के साथ अपने चलने को जीवंत बनाए रखना चाहता है और प्रार्थना के एक अद्भुत जीवन का अनुसरण करना चाहता है।
चर्चा एवं मनन:
- अपने प्रार्थना जीवन का ईमानदारी से मूल्यांकन करें। प्रार्थना के माध्यम से परमेश्वर के साथ अपने संबंध को और मजबूत करने के लिए आप किन तरीकों से आगे बढ़ सकते हैं?
- आप अपने दैनिक जीवन में प्रार्थना को किस प्रकार व्यवहारिक रीति से शामिल कर सकते हैं, जिससे कि आप “निरन्तर प्रार्थना में लगे रहो” (1 थिस्स. 5:17) की आज्ञा का पालन कर सकें?
- यह जानकर कि परमेश्वर हमारी प्रार्थनाओं के द्वारा चीज़ों को बदल सकता है, इससे आपकी प्रार्थना करने की इच्छा पर कोई असर पड़ता है?
2 निरंतर और प्रभावशाली
प्रार्थना के दस तरीके
प्रार्थना के लिए एक निरन्तर, स्वाभाविक प्रकार की बुलाहट का यह कठिन काम, एक तरह से एवरेस्ट को चढ़ने जैसा है, इससे कोई भी व्यक्ति कुछ हद तक विनम्र महसूस किए बिना नहीं रह सकता है। निस्संदेह, यह आरम्भ से ही एक विरोधाभासी प्रयास है, और जब कोई कहता है कि वह अपने प्रार्थना-जीवन में “पहुँच गया” है, तो यह बात शीघ्र ही इस तथ्य को उजागर कर देती है कि यह व्यक्ति अपने प्रार्थना-जीवन में पहुँचने से बहुत दूर है! हालाँकि, अधिकांश लोगों के लिए प्रार्थना केवल विनम्रता लाने वाली होती है, और कभी-कभी पराजित करने वाली भी होती है।
तो मेरा उद्देश्य सिद्धांत से व्यवहारिक रूप में आगे बढ़ना है। आगे दिए गए दस आसान “तरीके” हैं, जिनका उद्देश्य परमेश्वर के साथ दैनिक प्रार्थना की वास्तविक गतिविधि में आपकी सहायता करना है।
1. परमेश्वर के निकट होने के लिए प्रार्थना करें।
परमेश्वर को और भली-भाँति जानने के लिए प्रार्थना करें। उसके विषय में, संसार के विषय में, अपने हृदय के विषय में उससे बात करें। सच्चे और निःस्वार्थ रहें, प्रार्थना को सरल, महत्वपूर्ण सत्यों पर लौटा ले आएँ लौटाएँ, यह स्मरण रखते हुए कि परमेश्वर आपको आपके सिर के बालों तक जानता है (मत्ती 10:30) — और वह आपकी परवाह करता है (1 पत. 5:7)। इसी प्रकार दाऊद हमें यह उपदेश देता कि “मेरे दर्शन के खोजी हो।” (भजन. 27:8)।
प्रार्थना पर अपने बेहतरीन लेखन के लिए जाने जाने वाले ई. एम. बाउंड्स ने कहा, “जो लोग परमेश्वर को सबसे अधिक जानते हैं, वे प्रार्थना में सबसे धनी और सामर्थी होते हैं। परमेश्वर से थोड़ी पहचान, और उसके प्रति अपरिचय और ठण्डापन, प्रार्थना को एक दुर्लभ और निर्बल चीज़ बना देती है।” 2
इसलिए, परमेश्वर के निकट आने के लिए और अधिक प्रार्थना करें, और देखें कि उसके बाद वह क्या करता है।
2. पाप से दूर रहने के लिए प्रार्थना करें।
जॉन बन्यान ने कहा, “प्रार्थना मनुष्य को पाप से रोक देगी, या पाप मनुष्य को प्रार्थना से रोकने के लिए लुभाएगा।” 3 शैतान की रणनीतिक योजना यह है कि दोष व लज्जा का उपयोग करके वह एक मसीही को प्रार्थना करने से हतोत्साहित करे, और केवल दोष व लज्जा को और बढ़ा दे, और अंततः हमें परमेश्वर के साथ निकटता से दूर कर दे। यह चाल उतनी ही पुरानी है जितनी अदन की वाटिका, परन्तु हमारे जीवन में उतनी ही प्रासंगिक है, जितनी शायद पिछले सप्ताह थी। पाप हमें पाप के उपचार से दूर रखता है, और वह उपचार प्रार्थना है।
परमेश्वर चाहता है कि प्रार्थना का उद्देश्य आंशिक रूप से उसके सामने हमारे हृदयों को नम्र करना हो। मत्ती 6 में प्रभु की प्रार्थना हमें अपने पापों को अंगीकार करने और परीक्षा से बचने में परमेश्वर से सहायता माँगने की शिक्षा देती है। भजनों में दाऊद की प्रार्थनाएँ भरी पड़ी हैं, जो उसने अपने पाप, क्षमा और प्रभु के साथ अपने चालचलन के संबंध में परमेश्वर से की थीं (भजन. 22, 32, 51)। पौलुस दूसरों से अपने लिए प्रार्थना करने के लिए कहने में लज्जित नहीं था, क्योंकि वह स्वयं भी प्रार्थना की आत्मिक आवश्यकता को समझता था (कुलु. 4:2-4)। और शायद सबसे स्पष्ट, शिक्षात्मक उपदेश में, 1 कुरिन्थियों 10:13 कहता है, “तुम किसी ऐसी परीक्षा में नहीं पड़े, जो मनुष्य के सहने से बाहर है। परमेश्वर सच्चा है और वह तुम्हें सामर्थ्य से बाहर परीक्षा में न पड़ने देगा, वरन् परीक्षा के साथ निकास भी करेगा कि तुम सह सको।”
इसका अर्थ केवल इतना है कि एक मसीही के प्रार्थना-जीवन का एक नियमित भाग यह होना चाहिए कि वह परमेश्वर से सहायता माँगे कि वह पाप के लगातार होने वाले इस प्रलोभन से दूर रह सके।
3. बाइबल के माध्यम से परमेश्वर से प्रार्थना करें।
डोनाल्ड व्हिटनी लिखते हैं, “जब आप प्रार्थना करें, तो पवित्रशास्त्र के किसी गद्यांश के माध्यम से प्रार्थना करें, विशेषकर किसी भजन के माध्यम से।”4 व्हिटनी की विधि, यद्यपि सरल है, परन्तु अत्यंत गहरी है। अक्सर कई मसीहियों का अनुभव यह होता है कि वे कुछ ही बातें बार-बार दोहराते रहते हैं, और फिर अपने विचारों में खो जाते हैं और प्रार्थना का समय समाप्त कर देते हैं। इसके अलावा, उन्हें यह भी चिंता होती है कि उनकी प्रार्थनाएँ बाइबल के अनुसार हैं या नहीं, और क्या वे परमेश्वर को पसंद भी हैं। साथ ही, यह रेंगता हुआ विचार कि, “मैंने यह प्रार्थना तो कल ही की थी,” प्रार्थना करने वाले को इतना हतोत्साहित कर देता है कि वह अंततः पूरी तरह प्रार्थना करना बंद कर देता है। बाइबल के आधार पर परमेश्वर से प्रार्थना करने की सुन्दरता यह है कि यह इस सम्पूर्ण पतनशील चक्र को संबोधित करती है। जहाँ प्रार्थना में पहले नीरसता और दोहराव था, अब वहाँ प्रार्थना के लिए नई और ताज़ा सामग्री है। जहाँ पहले यह अनिश्चितता थी कि क्या पिछली प्रार्थनाएँ परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप हैं, अब वहाँ पूर्ण निश्चितता है। संक्षेप में, बाइबल को प्रार्थना में उपयोग करना एक मसीही को प्रार्थना करते रहने में और अच्छी रीति से प्रार्थना करने में बनाए रखता है।
व्हिटनी यह तर्क देते हैं कि भजन इस प्रकार की प्रार्थना के लिए विशेष रूप से सहायक हैं क्योंकि वे प्रार्थना किए जाने के लिए ही बनाए गए थे। उन्होंने लिखा, “परमेश्वर ने हमें भजन दिए ताकि हम भजनों को परमेश्वर की ओर लौटा दें।” यद्यपि पत्रों और व्याख्याओं के द्वारा परमेश्वर से सत्य की प्रार्थना करना निश्चित रूप से लाभदायक है, परन्तु भजन संहिता की प्रार्थना करते समय शायद कम चुनौतियाँ आती हैं।
इस विषय पर मैं जो अंतिम बात कहूँगा, वह डेनियल हैन्डरसन के 6:4 फेलोशिप प्रार्थना सेवकाई के “चार दिशाओं वाली प्रार्थना” से प्रभावित है। किसी भी पवित्रशास्त्र के गद्यांश को लेते हुए, प्रार्थना की पहली गति ऊपर की ओर (ऊर्ध्वगामी) होती है। इसके द्वारा उस गद्यांश में परमेश्वर के किसी पहलू को ढूँढना शामिल है जिसके लिए उसकी स्तुति की जा सके। दूसरी गति स्वर्ग से हमारे पास नीचे की ओर (अधोमुखी) आती है। इसमें पतित मनुष्य की दशा, हमारी पापी होने की दशा, अंगीकार करने योग्य कुछ ढूँढना शामिल है। तीसरी गति आत्मा का हमारे भीतर (अंतरमुखी) कार्य करना है। इसमें परमेश्वर से सहायता माँगना होता है जिससे कि पश्चाताप और वृद्धि में स्थिरता आ सके। प्रार्थना की अंतिम गति मिशन के लिए बाहर की ओर (बहिर्मुखी) होती है। इसमें यह प्रार्थना शामिल है कि मिशन मेरे द्वारा आगे बढ़े। ऊपर की ओर, नीचे की ओर, भीतर की ओर, बाहर की ओर; बाइबल के किसी भी पाठ से प्रार्थना की ये चार गतियाँ हैं।
4. अन्य लोगों के लिए प्रार्थना करें।
पौलुस की लगभग सारी प्रार्थनाएँ अन्य लोगों के लिए (अपने लिए नहीं) होती हैं और उनकी आत्माओं के लिए (भौतिक जीवन के लिए नहीं) होती हैं। आत्माओं के लिए प्रार्थना करें — चाहे वे खोए हुई हों या उद्धार पाई हुई हों। धर्म-सुधारक और पूर्व पादरी विलियम लॉ, यद्यपि उनके कई विरोधी थे और उनके प्रति करुणा न रखने का अच्छा कारण था, उन्होंने कहा, “किसी मनुष्य के लिए प्रार्थना करने से अधिक कुछ भी हमें उससे प्रेम नहीं कराता है।” 5 बहुत से लोग यह जानकर चकित होते हैं कि बाइबल में अपने लिए प्रार्थनाएँ अपेक्षाकृत कम हैं जबकि दूसरों के लिए अधिक हैं। दरअसल, कई गद्यांशों में जहाँ अपने लिए प्रार्थना दिखाई देती है, वह सामूहिक संदर्भ में ही होती है (जैसे मत्ती 6 में प्रभु की प्रार्थना: “हमारे अपराधों को क्षमा कर. . . हमें परीक्षा में न ला)। यह संकेत करता है कि मसीहियों को दूसरों की आवश्यकताओं को अपनी आवश्यकताओं के समान महत्त्वपूर्ण समझना चाहिए। परमेश्वर चाहता है कि हम दूसरों के लिए प्रार्थना करें।
मसीहियों को अन्य मसीहियों के लिए प्रार्थना करने की आवश्यकता यीशु और प्रेरित पौलुस के उदाहरणों पर विचार करते समय और अधिक स्पष्ट हो जाती है। यीशु ने अक्सर दूसरों के लिए बड़ी गम्भीरता से प्रार्थना की, शायद सबसे मार्मिक रूप से यूहन्ना 17 में महायाजक की प्रार्थना में ऐसा किया। इसी प्रकार, प्रेरित पौलुस ने अपने पत्रों के प्राप्तकर्ताओं के लिए प्रार्थना की, जिनसे आज हमारे प्रार्थना-जीवन के लिए बहुत कुछ सीखा जा सकता है। पौलुस को नियमित रूप से उद्धार, पवित्र किए जाने, अंतिम महिमा पाने और बहुत कुछ के लिए प्रार्थना करते देखा जाता है। वह अपनी प्रार्थनाओं में कभी अस्पष्ट, सामान्य या सतही बातें नहीं रखते था, बल्कि वह अक्सर लोगों की पवित्रता के विशिष्ट पहलुओं के लिए प्रार्थना करता था। इसके अतिरिक्त, वह केवल उनकी ओर से विनती ही नहीं करता था, बल्कि उनके जीवन में पहले की तुलना में हो चुकी उन्नति के लिए परमेश्वर को धन्यवाद करने का समय भी निकालता है। हमें भी दूसरों के जीवन में होने वाली उन्नति और अच्छे कामों के लिए परमेश्वर का अधिक धन्यवाद करना चाहिए!
अब, एक छोटी सी चेतावनी: जब मैं हम सबको दूसरों के लिए प्रार्थना करने का उपदेश देता हूँ, तो मेरा यह अर्थ नहीं है कि हम दूसरों के विरुद्ध प्रार्थना करें। “हे प्रभु. . . मैं बस यही प्रार्थना करता हूँ कि आप मेरे दाएँ बैठे बिली को उसके पाप के विषय में दोषी ठहराएँ। और वहाँ बैठी सैली को कलीसिया के प्रति और उदार बनने में सहायता दें।” इसे दूसरों के लिए नहीं, बल्कि दूसरों पर प्रार्थना करना कहा जाएगा। किन्तु दूसरों के लिए प्रार्थना करना उन्हें सहायक, उत्साहवर्धक रीति से ऊँचा उठाना है, जो उन्हें प्रेरित करे और परमेश्वर की ओर आगे बढ़ाए।
दूसरों के लिए प्रार्थनाओं के विशिष्ट अनुप्रयोग बहुत से हैं और यह व्यक्ति के अनुसार अलग-अलग हो सकता है। जैसा पहले ही कहा गया है, माता-पिता से अपेक्षा की जाती है कि वे अपने बच्चों के लिए प्रार्थना करें, जो प्रभु के मार्गों में उन्हें पालने में उनकी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी का भाग है (इफि. 6:1-4)। पास्टर से अपेक्षा की जाती है कि वे उस झुंड के लिए प्रार्थना करें जो उनकी देखभाल के लिए उन्हें सौंपा गया है (1 पत. 5:2-4)। कलीसिया को समग्र रूप से अपने पास्टरों और अपने सहायक मिशनरियों के लिए प्रार्थना करनी चाहिए जो सुसमाचार के श्रमिक हैं (लूका 10:2; इब्रा. 13:7)। मसीहियों को अपने संबंध और प्रभाव के घेरे में आने वालों के लिए (याकू. 5:15, गला. 6:2), साथ ही अपने आस-पास की खोई हुई और मरते हुए संसार के लिए भी प्रार्थना करनी चाहिए (मत्ती 5:13-16, 2 पत. 3:9)। समय के साथ, परमेश्वर के वचन में परिश्रमपूर्वक और अनुशासित समय बिताने के माध्यम से, एक मसीही का विवेक दूसरों की आवश्यकताओं और उनके लिए की जाने वाली प्रार्थनाओं की बाइबल आधारित अपेक्षा के प्रति अधिकाधिक जागरूक होता जाएगा। किन्तु यदि आप अभी आरम्भ ही कर रहे हैं, तो कुछ लोगों की एक छोटी सूची बनाएँ और उनके लिए प्रार्थना करना प्रारंभ करें।
5. राज्य के लिए प्रार्थना करें।
यदि हम जिस बात के लिए प्रार्थना करते हैं उसके पीछे दृढ़ विश्वास नहीं है, तो प्रवृत्ति अक्सर शारीरिक इच्छाओं व आवश्यकताओं और मुख्यतः स्थानीय, आंतरिक चिंताओं की ओर बहक जाती है। किन्तु पवित्रशास्त्र हमें उन प्रार्थनाओं के साथ चुनौती और सामना कराता है जो शारीरिक क्षेत्र से आगे आत्मिक क्षेत्र तक पहुँचती हैं, और स्थानीय, आंतरिक चिंताओं से वैश्विक दायरे और पैमाने तक विस्तृत होती हैं। दृढ़ विश्वास के साथ बाइबल आधारित प्रार्थनाएँ परमेश्वर के राज्य की उन्नति के विषय में होती हैं।
लियोनार्ड रेवनहिल ने यह कहा:
इस पाप-के-लिए-भूखे युग के लिए हमें एक प्रार्थना-के-लिए-भूखी कलीसिया की आवश्यकता है। हमें “परमेश्वर की अत्यन्त महान और बहुमूल्य प्रतिज्ञाओं” को फिर से खोजने की आवश्यकता है। “उस महान दिन” में न्याय की आग हमारे द्वारा किए गए कार्य के आकार की नहीं, बल्कि उसके प्रकार की परीक्षा लेगी। वह जो प्रार्थना में जन्मा है, वही परीक्षा में टिकेगा। प्रार्थना परमेश्वर के साथ लेन-देन करती है। प्रार्थना आत्माओं के लिए भूख उत्पन्न करती है; आत्माओं के लिए भूख प्रार्थना उत्पन्न करती है।6
यह लियोनार्ड की आत्माओं के विषय में टिप्पणी ही थी जिसने यहाँ मेरा ध्यान सबसे अधिक खींचा: प्रार्थना आत्माओं के लिए भूख उत्पन्न करती है; आत्माओं के लिए भूख प्रार्थना उत्पन्न करती है। हम जिस विषय पर यहाँ चर्चा कर रहे हैं, वह ऐसा हृदय है जो महान आज्ञा के द्वारा परमेश्वर के राज्य की उन्नति को देखने की लालसा करता है। और जब किसी हृदय में उस दिशा में लालसा उत्पन्न होने लगती है, तो उसके पास प्रार्थना से बढ़कर अधिक महान साधन और संसाधन कुछ नहीं होता है।
इसलिए हे मित्रों, परमेश्वर के राज्य की उन्नति के लिए प्रार्थना करें। प्रार्थना करें कि ज्योति चमके और अंधकार को पीछे धकेले। प्रार्थना करें कि परमेश्वर लोगों को ऐसे तरीकों से रूपांतरित करे जो केवल उसी के द्वारा हो सकें। प्रार्थना करें कि उसका राज्य विश्वविद्यालयों और अस्पतालों में, ऊँची इमारतों से लेकर बेघरों के आश्रय स्थलों तक हर जगह स्थापित हो। विशेष स्थानों में विशेष लोगों के समूहों के लिए प्रार्थना करें। सौ गुना फल पाने के लिए निडर होकर विशिष्ट प्रार्थनाएँ करें (मत्ती 13:8)। प्रार्थना करें कि उसका प्रावधान और रक्षा उन तरीकों से प्रकट हों जो केवल परमेश्वर ही कर सकता है और जो केवल परमेश्वर की महिमा के लिए हों। प्रार्थना करें कि इस समय और इस स्थान पर परमेश्वर का राज्य और अधिक स्पष्ट रूप से स्थापित हो, जब तक कि यीशु आकर और इसे पूर्ण रूप से स्थापित न कर दे।
6. एकांत में प्रार्थना करें।
जोनाथन एडवर्ड्स को अमेरिकी भूमि पर अब तक का सबसे प्रतिभाशाली मस्तिष्क कहा गया है, और उन्होंने प्रार्थना के विषय में यह कहा: “कोई भी मसीही, व्यक्तिगत रूप से, परमेश्वर के कार्य को बढ़ावा देने और मसीह के राज्य को आगे बढ़ाने में उतना नहीं कर सकता है जितना प्रार्थना के द्वारा कर सकता है।” चलते-फिरते, सामूहिक और सार्वजनिक प्रार्थनाओं के अलावा, निजी प्रार्थना के लिए भी समय निकालना चाहिए। फरीसियों के कपट के विषय में बोलते हुए, जो सार्वजनिक रूप से प्रार्थना करना पसंद करते थे, यीशु ने निर्देश दिया, “परन्तु जब तू प्रार्थना करे, तो अपनी कोठरी में जा; और द्वार बन्द कर के अपने पिता से जो गुप्त में है प्रार्थना कर” (मत्ती 6:6)। यहाँ बात बहुत स्पष्ट रूप से कही गई है।
इस प्रकार की प्रार्थना का सर्वोत्तम उदाहरण स्वयं यीशु से बढ़कर और कोई नहीं है। लूका 5 में, यीशु को केवल एक या दो बार एकांत में जाकर प्रार्थना करते हुए ही नहीं देखा जाता, बल्कि पद 16 कहता है कि यीशु “अक्सर जंगल में जाकर प्रार्थना किया करता था।” यह ध्यान में रखते हुए कि मसीहियों को इसलिए बुलाया गया है कि “वैसा ही चले जैसा वह चलता था” (1 यूह. 2:6), यह उदाहरण आज विश्वासियों के प्रार्थना-जीवन पर भी लागू होता है।
इस एकांत प्रार्थना के समय को हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए। यदि हम एकांत में प्रार्थना करने के बजाय केवल चलते-फिरते प्रार्थना करने तक ही सीमित रहते हैं, तो इसका अंत में बहुत बुरा परिणाम होगा। जोएल बीक, प्यूरीटन अर्थात् शुद्धतावादी मसीहियों के प्रार्थना-जीवन पर अपने विचार साझा करते हुए कहते हैं,
धीरे-धीरे आपका प्रार्थना-जीवन बिखरने लगा। आपको पता भी नहीं चला कि आपकी प्रार्थनाएँ परमेश्वर के साथ हृदय से हृदय की संगति की अपेक्षा केवल शब्दों तक ही सीमित रह गईं हैं। दिखावे और ठण्डेपन ने पवित्र आवश्यकता का स्थान ले लिया। शीघ्र ही, आप ने अपनी सुबह की प्रार्थना छोड़ दी। अब यह महत्वपूर्ण नहीं लगा कि लोगों से मिलने से पहले परमेश्वर से मिलना आवश्यक है। फिर आप ने सोने से पहले की प्रार्थना को छोटा कर दिया। अन्य चिंताएँ आपके परमेश्वर के साथ बिताए जाने वाले समय में दखल देने लगीं। सारे दिन, प्रार्थना लगभग गायब हो गई।7
मसीहियों को अवश्य ही एकांत में प्रार्थना के लिए विशेष समय अलग रखना चाहिए, अन्यथा वे उसी जाल में फँस सकते हैं।
7. अन्य लोगों के साथ प्रार्थना करें।
मैं आपको यह नहीं बता सकता कि मैं कितनी सभाओं में गया हूँ जहाँ समापन पर, कोई व्यक्ति शर्म से मेरी ओर देखता है और कहता है, “पास्टर, मैं ऊँची आवाज़ में प्रार्थना करने में बहुत अच्छा नहीं हूँ।” मेरे द्वारा थोड़ा-सा प्रोत्साहन दिए जाने पर, वे आमतौर पर विश्वास के साथ आगे बढ़ने के लिए तैयार हो जाते हैं और संभवतः किसी अन्य व्यक्ति के साथ मिलकर पहली बार सार्वजनिक रूप से परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं। और जैसे ही वे “आमीन” कहते हैं, मैं आमतौर पर उत्साह में अपनी कुर्सी से उठ खड़ा होता हूँ और परमेश्वर से सार्वजनिक प्रार्थना करने के उनके पहले कदम के प्रति समर्थन प्रकट करता हूँ।
प्रिय मित्र, अन्य लोगों के साथ प्रार्थना करना अच्छा है, और ऊँची आवाज़ में प्रार्थना करना भी अच्छा है।
मैं यहाँ एक कदम आगे जाकर यह कहना चाहता हूँ कि बाइबल की अधिकांश प्रार्थनाएँ (दोनों, जो दर्ज हैं और प्रार्थना करने के लिए प्रोत्साहन हैं) अपने स्वभाव में सार्वजनिक हैं। मेरे साथ इस पर विचार करें: प्रभु की प्रार्थना में बहुवचन सर्वनाम (हमारा, हम, हमें) का प्रयोग किया गया है; दानिय्येल की प्रसिद्ध प्रार्थना दानिय्येल 9 में सामूहिक है (दानि. 9:3-19); नहेम्याह ने दूसरों के सामने प्रार्थना की (नहे. 2:4); मूसा ने सारे इस्राएल के सामने प्रार्थना की (व्यव. 9:19); और ध्यान रखें, यह एक ऐसा व्यक्ति था जो बोलने में कठिनाई के कारण किसी के सामने बोलने से डरता था (निर्ग. 4:10)। प्रेरितों के काम 2 में जो आरंभिक कलीसिया को विशेष बनाता था वह था “प्रेरितों से शिक्षा पाना, और संगति रखना, और रोटी तोड़ना, और प्रार्थना करने में लौलीन रहना” (प्रेरि. 2:42)। अधिकांश विश्वास करते हैं कि “प्रार्थना” उन औपचारिक, सामूहिक प्रार्थनाओं का संदर्भ है जो कलीसिया इकट्ठा होकर कहती थी। यहाँ इतना कहना पर्याप्त है कि प्रभु हमसे अपेक्षा करते हैं कि हम दूसरों के साथ ऊँची आवाज़ में प्रार्थना करें।
इसलिए, अब आरम्भ करने का सर्वोत्तम स्थान कहाँ है? घर पर। यदि आप विवाहित हैं, तो अपने जीवनसाथी के साथ। यदि आपके बच्चे हैं, तो अपने परिवार के साथ। यदि आप अविवाहित हैं, तो किसी साथ रहने वाले के साथ। यदि आप अकेले रहते हैं, तो कलीसिया के किसी व्यक्ति के साथ प्रार्थना का समय तय करें। किन्तु दूसरों के साथ प्रार्थना करना आरम्भ करें, क्योंकि जब आप ऐसा करेंगे, तो न केवल आपको किसी के साथ प्रार्थना करने और संभवतः उनके द्वारा आपके लिए प्रार्थना किए जाने की आशीष मिलेगी, बल्कि आप अपनी प्रार्थना में भी बढ़ेंगे और साथ ही आपको अपने ठीक पास बैठे किसी व्यक्ति के लिए प्रार्थना करने का विशेषाधिकार मिलेगा।
8. तत्परता के साथ प्रार्थना करें।
याकूब 5:16 कहता है, “धर्मी जन की प्रार्थना के प्रभाव से बहुत कुछ हो सकता है।” शायद इसी कारण से विलियम काउपर ने फिर कहा, “जब शैतान सबसे निर्बल मसीही को घुटनों पर देखता है, तो वह काँप उठता है।”8 क्योंकि आत्मिक युद्ध में प्रार्थना प्रभावकारी है, पौलुस सभी मसीहियों को हर जगह युद्धकालीन प्रार्थना के लिए बुलाता है। इफिसियों 6:18 में वह पवित्र लोगों को कहता है, “हर समय और हर प्रकार से आत्मा में प्रार्थना, और विनती करते रहो, और इसीलिए जागते रहो कि सब पवित्र लोगों के लिए लगातार विनती किया करो।” सरल शब्दों में: परमेश्वर चाहता है कि हम इस रीति से प्रार्थना करें मानो यह सचमुच महत्त्वपूर्ण हो — क्योंकि यह महत्त्वपूर्ण है।
इस छोटे से गद्यांश से, मैं बतान चाहता हूँ कि युद्धकालीन की अत्यावश्यक प्रार्थना कैसी होती है।
- युद्धकालीन प्रार्थना का अर्थ है कि मैं हर समय प्रार्थना करता हूँ (“हर समय”)।
- युद्धकालीन प्रार्थना का अर्थ है कि मैं निर्भर होकर प्रार्थना करता हूँ (“आत्मा में”)।
- युद्धकालीन प्रार्थना का अर्थ है कि मैं बहुत-सी बातों के लिए प्रार्थना करता हूँ (“सब प्रकार की प्रार्थना और विनती”)।
- युद्धकालीन प्रार्थना का अर्थ है कि मैं तब भी प्रार्थना करता हूँ जब मैं नहीं करना चाहता (“सब धीरज धरते हुए”)।
- युद्धकालीन प्रार्थना का अर्थ है कि मैं दूसरों के लिए प्रार्थना करता हूँ (“सब पवित्र लोगों के लिए”)।
इनमें से प्रत्येक के पीछे प्रार्थना की एक तत्परता निहित है, जो “जागते रहो” की आज्ञा में देखी जा सकती है। पौलुस द्वारा यह आज्ञा देने का अर्थ है कि यह सम्भव है कि मसीही लोग संसार के प्रति दृष्टिकोण के कारण नींद में पड़ जाएँ। आत्मिक ऊँघ सबसे पहले जहाँ प्रकट होगी, वह हमारा प्रार्थना-जीवन है।
इसलिए हे मसीही लोगों, हिम्मत रखो। हमारे चारों ओर लड़ाई जारी है, इसलिए इस बात की गंभीरता को समझें कि दांव पर क्या है और युद्ध जैसी स्थिति में प्रार्थना करें, जिससे आपकी प्रार्थना में गहराई और तीव्रता आए।
9. सरलता के साथ प्रार्थना करें।
संक्षिप्ताक्षर (Acronyms) सहायक हो सकते हैं; वे अत्यधिक उपयोग भी किए जा सकते हैं। इस मामले में, यह संक्षिप्ताक्षर इतना अच्छा है कि प्रार्थना करने के लिए एक सरल ढाँचा सोचने में सहायता करने के लिए इसका इस्तेमाल न किया जाए, ऐसा नहीं हो सकता है। शायद आपने पहले “A.C.T.S.” का संक्षिप्ताक्षर सुना होगा, परन्तु यह शायद और भी अच्छा हो सकता है। यह है “P.R.A.Y.”:
Praise God for who he is. (परमेश्वर की स्तुति करें कि वह कौन है।)
Repent of your sin. (अपने पाप से पश्चाताप करें।)
Ask God for what you need. (जो आपको चाहिए उसके लिए परमेश्वर से प्रार्थना करें।)
Yield yourself to God to change and use as he sees fit today. (अपने आप को परमेश्वर को समर्पित करें जिससे कि वह आपको आज जैसा उचित समझे बदल सके और उपयोग कर सके।)
मुख्य बात यह है कि प्रार्थना के लिए कोई जादुई सूत्र नहीं है। इन चारों घटकों में सरलता है और वे आसानी से अपनाए जा सकते हैं। एक चार-वर्षीय बच्चा इसी रीति से प्रार्थना कर सकता है, और एक प्रोफेसर भी कर सकता है।
सरलता के साथ प्रार्थना करने से यह कम शैक्षणिक और अधिक संबंध स्थापित करने वाली बनेगी। जब मैं प्रार्थना करता हूँ, तो मैं बड़े शब्दों से परमेश्वर को प्रभावित करने का प्रयास नहीं करता हूँ। मैं लम्बे मिश्रित वाक्यों का प्रयोग नहीं करता हूँ। मैं उससे संवेदनशीलता, स्पष्टता और सरलता के साथ बात करता हूँ — उसके लिए नहीं, बल्कि अपने लिए। अपने सृष्टिकर्ता के सामने अपनी आत्मा को शांत करते हुए, सरलता में कुछ ऐसा है जो अव्यवस्था को साफ करता है और सीधे मुद्दे पर पहुँचाता है।
इसलिए, इसे जैसा है वैसा ही समझें, परन्तु मैं प्रार्थना करने वाले मसीही लोगों को सलाह देता हूँ कि सरल प्रार्थनाओं में सरल शब्दों का उपयोग करें।
10. आपके हृदय को परमेश्वर के हृदय के अनुरूप करने के लिए प्रार्थना करें।
मुझे यह बात बहुत पसंद है जो बाउंड्स ने इस पर कही:
प्रार्थना केवल परमेश्वर से चीज़ें प्राप्त करना नहीं है, यह प्रार्थना का सबसे आरंभिक रूप है; प्रार्थना परमेश्वर के साथ परिपूर्ण संगति में आना है। यदि परमेश्वर के पुत्र ने हमारे भीतर नए जन्म के द्वारा आकार लिया है, तो वह हमारी सामान्य समझ से आगे बढ़कर, जिस चीज़ के लिए हम प्रार्थना करते हैं, उसके प्रति हमारे दृष्टिकोण को बदल देगा।9
मैं इसे केवल इस रीति से कहूँगा: प्रार्थना परमेश्वर द्वारा ठहराई गई है क्योंकि यह आत्मा के लिए अच्छी है।
प्रार्थना आत्मा के लिए बहुत से तरीकों से अच्छी है, सबसे पहले इसलिए कि यह मनुष्य की अपनी इच्छा और लालसाओं को परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप बनाती है। दरअसल, यही वह बात है जिसे यीशु सम्भवतः अपने के मन में रखता था जब उसने चेलों से कहा कि वे प्रार्थना करें, “तेरा राज्य आए। तेरी इच्छा जैसी स्वर्ग में पूरी होती है, वैसे पृथ्वी पर भी हो।” इसका अर्थ है कि हम अपनी प्रतिष्ठा और अपने नाम के बजाय परमेश्वर की प्रतिष्ठा और उसके नाम के प्रति अधिक चिंतित हैं। इस प्रकार, प्रार्थना ध्यान को अपने से हटाकर परमेश्वर पर, अपने राज्य से हटाकर उसके राज्य पर, और भौतिक इच्छाओं से हटाकर आत्मिक इच्छाओं पर केंद्रित करने का एक अवसर है। प्रार्थना का मुख्य उद्देश्य मनुष्य की प्राथमिकताओं को परमेश्वर की प्राथमिकताओं से मिलाना नहीं है, बल्कि यह प्रार्थना का एक उप-परिणाम है।
प्रार्थना केवल इच्छाओं के इस मेल के कारण ही आत्मा के लिए अच्छी नहीं है। यह इसलिए भी अच्छी है क्योंकि यह हमें परमेश्वर के साथ घनिष्ठ संबंध में लाती है। वचन के साथ-साथ, यह वह माध्यम है जिसके द्वारा परमेश्वर मनुष्य के साथ संबंध बनाना चाहता है। जैसा वेन ग्रुडेम कहते हैं, “प्रार्थना हमें परमेश्वर के साथ गहरी संगति में लाती है, और वह हमसे प्रेम करता है और हमारे साथ संगति में आनन्दित होता है।”10
इसलिए जब आप किसी बात में उलझे हों, जब आप महसूस करें कि आपका हृदय कुछ विचलित हो रहा है, जब आप परमेश्वर से दूर या गलत बातों पर केंद्रित महसूस करें — तब प्रार्थना करें कि आपका हृदय परमेश्वर के साथ फिर से जुड़ जाए।
चर्चा एवं मनन:
- परमेश्वर के निकट आने और पाप से दूर रहने के लिए प्रार्थना करना क्यों महत्वपूर्ण है? क्या प्रार्थना करते समय आपके हृदय में यह विचार आया है?
- आप अपने प्रार्थना-जीवन में परमेश्वर के वचन को और अधिक कैसे शामिल कर सकते हैं?
- क्या आप इस रीति से प्रार्थना करते हैं जैसे आप युद्ध में हैं? इफिसियों 6:18 किस रीति से आपको यह मार्गदर्शन कर सकता है कि आप परमेश्वर से कैसे बातें करें?
3 प्रार्थना के बारे में
उत्तम गुप्त रहस्य
क्या आपने कभी इस बात पर विचार किया है कि प्रार्थना से आपको जो मिलता है वह वास्तव में उससे भी अधिक है जितना आप देते हैं? संभवतः प्रार्थना वास्तव में आपके हृदय को परमेश्वर द्वारा रूपांतरित करने और आपके जीवन को आकार देने के विषय में है, न कि परमेश्वर के लिए किसी लाभ या आशीष के बारे में? प्रार्थना का स्वभाव और प्रार्थना को बेहतर तरीके से करने के कुछ सुझावों को देखने के बाद, मैं प्रोत्साहन के शब्द के साथ अंत करना चाहता हूँ— प्रार्थना के बारे में उत्तम गुप्त रहस्य। बाइबल के एक प्रसिद्ध अध्याय में, हमें एक ऐसा रहस्य दिया गया है जिसमें आपके जीवन को सदा के लिए बदलने की सामर्थ्य है, और यह सब आपके प्रार्थना-जीवन पर टिका है। इस अध्याय में, पौलुस मानो हमें आंतरिक मंडली में खींच लाता है जहाँ हमें मसीही जीवन का गुप्त सार मिलता है, और जैसे-जैसे हम उस आशीष को अधिक और अधिक खोजते जाते हैं जो हमारी हो सकती है, यह और भी उत्तम होता चला जाता है।
फिलिप्पियों 4 में इन आरंभिक शब्दों पर विचार करें: “किसी भी बात की चिन्ता मत करो; परन्तु हर एक बात में तुम्हारे निवेदन, प्रार्थना और विनती के द्वारा धन्यवाद के साथ परमेश्वर के सम्मुख उपस्थित किए जाएँ” (फिलि. 4:6)। यहाँ, पौलुस चिन्ता की उस अत्यन्त सामान्य समस्या को संबोधित करता है। चिन्ता मन और शरीर के अन्दर छिपे हुए भय के प्रति प्रतिक्रिया है। अक्सर, यह किसी वस्तु या किसी विशेष परिणाम को पाने का भय है जो आपके पास अभी नहीं है, या किसी वस्तु को खोने का भय है जो आपके पास है। कोई व्यक्ति आनेवाली सभा, भावी चुनाव, या बिल चुकाने को लेकर चिंतित हो सकता है— इन सभी चिंताओं के पीछे भय का अपना अलग कारण होता है। किन्तु यहाँ, पौलुस कहता हैं, “चिन्ता न करो।”
किन्तु लोगों के बदलने के विषय में परमेश्वर की योजना में, केवल “चिन्ता न करें” कहना कभी पर्याप्त नहीं होता है। इसके बजाय, वह कहता है कि हमें चिंता नहीं करनी चाहिए, बल्कि प्रार्थना में परमेश्वर के पास जाना चाहिए। और जब हम परमेश्वर के पास प्रार्थना में जाते हैं, तो हमें उसके पास “धन्यवाद के साथ” जाना चाहिए। मित्रों, इस सत्य से मैं आपको प्रोत्साहित करना चाहता हूँ: कृतज्ञता चिन्ता का सबसे अच्छा उपचार है। इसलिए, प्रार्थना के बारे में सबसे पहला और महत्वपूर्ण रहस्य यह है कि प्रार्थना के साथ कृतज्ञता का भाव चिन्ता को कम करता है और परमेश्वर को प्रसन्न करता है।
किन्तु प्रार्थना के बारे में उत्तम गुप्त रहस्य जो अब तक छिपा था, उसका पहला खुलासा आगे आने वाले शब्दों में होता है। अगले वाक्यांश में, परमेश्वर एक ऐसी प्रतिज्ञा करता है जो सप्ताह के सातों दिन उत्तम है। यह ठीक वैसे ही है, जैसे आप बैंक के अधिकारी के पास किसी चैक को किसी भी समय ले जाकर नक़दी प्राप्त कर सकते हैं, और यह बार-बार चैक में लिखी राशि की तरह नक़दी में प्राप्त की जा सकती है। यह प्रतिज्ञा क्या है? यह शान्ति की प्रतिज्ञा है: “तब परमेश्वर की शान्ति, जो सारी समझ से परे है, तुम्हारे हृदय और तुम्हारे विचारों को मसीह यीशु में सुरिक्षत रखेगी” (फिलि. 4:7)। परमेश्वर का आत्मा कहता है कि यदि आप कृतज्ञता के मनोभाव से प्रार्थना करेंगे, तो परमेश्वर आपको वह वस्तु देगा जिसकी वास्तव में पृथ्वी पर हर कोई खोज कर रहा है — अर्थात् शान्ति। इस पद के अनुसार, यह ईश्वरीय मूल की शान्ति होगी। यह ऐसी शान्ति होगी जिसे समझाया नहीं जा सकता है और जिसका कोई अर्थ नहीं बनता है। यह वह शान्ति होगी जो आत्मा को शांत करती है, भावनाओं को स्थिर करती है, और मन को स्थिर करती है। यह शान्ति मसीह यीशु में मिलती है और यह प्रार्थना के सरल साधन के द्वारा प्राप्त की जाती है।
असल में, परमेश्वर की कहानी हमेशा से यही रही है, है ना? वाटिका में शान्ति थी। वह शान्ति पाप के कारण भंग और नष्ट हो गई। शेष कहानी परमेश्वर की उद्धार योजना है जो शान्ति और व्यवस्था को फिर से बहाल करता है जिससे कि रचनात्मकता और उन्नति फिर से बहुतायत के साथ हो सके। वह अपनी राजधानी नगर को यरूशलेम कहेगा (शाब्दिक रूप से, “शान्ति का नगर”), और परमेश्वर का पुत्र क्या करने के लिए प्रकट होगा? यूहन्ना 14:27 में, यीशु ने कहा, “मैं तुम्हें शान्ति दिए जाता हूँ; अपनी शान्ति तुम्हें देता हूँ।” भविष्य की अंतिम अवस्था में, नए यरूशलेम से शान्ति प्रवाहित होगी क्योंकि पुनरुत्थित पुत्र ने शान्ति के हर अन्तिम शत्रु पर विजय प्राप्त कर ली है और परमेश्वर के साथ पूर्ण घनिष्ठता स्थापित कर ली है। किन्तु इस बीच, जब हम प्रार्थना में परमेश्वर से जुड़ते हैं, तो हमें स्वर्ग की शान्ति का कुछ भाग अनुभव होता है।
प्रार्थना का उत्तम गुप्त रहस्य यह है कि यह चिन्ता से लड़ती है और यह हमारे जीवन में शान्ति को बढ़ावा देती है—और फिर भी, यह अभी भी पूरा रहस्य नहीं है। फिलिप्पियों 4 में इस खण्ड के तुरन्त बाद के पद जीवन को बचाने के लिए एक चेतावनी देते हैं, और पद 8 पद के अंत में अंतिम चेतावनी यह है: “उन पर ध्यान लगाया करो।” पद 9 में यह संक्षिप्त आज्ञा दी गई है कि आप जो उपदेश देते हैं (और सोचते हैं!) उसका अभ्यास करें, और अंत में, परमेश्वर की शान्ति को एक आशीष के रूप में दोहराया गया है।
किन्तु पद 10-13 प्रार्थना के विषय में अगली उत्तम आशीष को बताते हैं जिसे पौलुस स्वयं एक “रहस्य” कहता है। फिलिप्पी की कलीसिया के द्वारा उसके प्रति की गई चिन्ता के लिए धन्यवाद प्रकट करने के बाद, पौलुस अब अपने भीतर की ओर जाता है और प्रभु के साथ अपने विश्वास की यात्रा के बीच अपने आन्तरिक अनुभव की गवाही साझा करता है:
यह नहीं कि मैं अपनी घटी के कारण यह कहता हूँ; क्योंकि मैं ने यह सीखा है कि जिस दशा में हूँ; उसी में सन्तोष करूँ। मैं दीन होना भी जानता हूँ और बढ़ना भी जानता हूँ; हर एक बात और सब दशाओं में मैं ने तृप्त होना, भूखा रहना, और बढ़ना-घटना सीखा है। जो मुझे सामर्थ्य देता है उसमें मैं सब कुछ कर सकता हूँ। (फिलि. 4:11-13)
पौलुस ने भूख और भयंकर गरीबी के समय का सामना किया था, परन्तु साथ ही बहुतायत और प्रचुरता के समय का भी सामना किया था। किन्तु यहाँ जिस “रहस्य” का वह उल्लेख करता है, वह सन्तोष का रहस्य है। और यह ऐसा रहस्य था जिसे उसे सीखना पड़ा था।
पौलुस ने सन्तोष का यह रहस्य कैसे सीखा? इस अनुच्छेद से ठीक पहले के संदर्भ को देखते हुए, ऐसा प्रतीत होता है कि उसने जो उपदेश दिया है, उसका अभ्यास करके ही यह सीखा है! पौलुस ने प्रार्थना में अपनी चिंताएँ प्रभु के सामने रखी थीं। पौलुस ने लालच के मनोभाव को कृतज्ञता के मनोभाव से बदल दिया। पौलुस ने अपने मन को इस बात पर लगाकर कि जो सत्य, आदरणीय, उचित, पवित्र, सुहावनी, मनभावनी और प्रशंसा के योग्य है, परमेश्वर की वह शान्ति प्राप्त की थी जो सारी समझ से परे है। पौलुस ने सीखा कि कैसे प्रार्थना करनी है।
निश्चय ही, सच्चा सन्तोष पाना जो परिस्थिति से परे हो, मानवीय रीति से सम्भव नहीं है। इसी कारण पौलुस वैसे ही समापन करता है: “जो मुझे सामर्थ्य देता है उसमें मैं सब कुछ कर सकता हूँ।” उसे प्रभु से जिस सामर्थ्य की आवश्यकता थी, वह यह थी कि अपनी बेचैन आत्मा को स्थिर करे और इसके स्थान पर, सन्तोष पाए। और सिक्के का दूसरा पहलू भी उतना ही सच था—पौलुस की अपनी इच्छा-शक्ति, मनन व अनुशासन सच्चे और स्थायी सन्तोष को पैदा करने के लिए अपर्याप्त था। उसे सन्तोष पाने के लिए ईश्वरीय सामर्थ्य की आवश्यकता थी, और यह सामर्थ्य केवल प्रार्थना के द्वारा ही प्राप्त होती है।
मित्रों, प्रार्थना—अर्थात् सच्ची प्रार्थना का उत्तम गुप्त रहस्य—यह है कि उसमें दो छिपे हुए रत्न: शान्ति और सन्तोष खोजे जाते हैं, जो कहीं और नहीं मिलते। जहाँ शान्ति और सन्तोष है, वहाँ न भय है और न चिन्ता है। चिन्ता को किनारे कर दिया जाता है और बेचैनी विश्राम में बदल जाती है। साथ ही, शान्ति और सन्तोष गहरे बसे हुए आनन्द हैं जिन्हें हिलाया नहीं जा सकता है।
इस सत्य के अनुप्रयोग हमारे लिए बहुत व्यापक हैं। आप जीवन के किसी भी तूफान के बीच शान्ति और सन्तोष रख सकते हैं जिससे आप होकर गुजर रहे हों। आप अपनी नौकरी में असफल हो सकते हैं या अपना घर खोने के कगार पर हो सकते हैं। आपके परिवार में ऐसा झगड़ा हो सकता है जो आपको पागलपन की ओर ले जाए, या आपका जीवनसाथी प्रभु के साथ न चल रहा हो। आप गंभीर खतरे, अपने परिवार पर धमकी, और यहाँ तक कि मृत्यु का सामना कर सकते हैं। पौलुस ने ये प्रतिज्ञाएँ उस समय लिखीं जब उसने अत्यन्त भयानक परिस्थितियों का सामना किया था, और प्रतिज्ञाएँ आज भी सत्य हैं। परमेश्वर हमें जो बताना चाहता है, वह यह है कि जो कुछ हमें संपूर्ण होने के लिए चाहिए, वह उसी में मिलता है और प्रार्थना के सरल साधन के द्वारा उपलब्ध है।
निष्कर्ष
प्रार्थना के विषय में आपके मन में रखने वाली अंतिम बात यह है कि हमें प्रार्थना करनी चाहिए क्योंकि परमेश्वर प्रार्थनाओं का उत्तर देता है। एक दृष्टान्त है जो विशेष रूप से यह प्रदर्शित करता है कि प्रार्थना का वास्तव में परिणामों पर प्रभाव होता है (कम से कम मानवीय दृष्टिकोण से), जो लूका 18:1-8 में पाया जाता है। यहाँ, एक विधवा बार-बार एक न्यायी के पास सुरक्षा के लिए जाती है, और लगातार विनती करने के बाद, न्यायी आखिरकार उसकी बात मान लेता है। उसके बाद, पद 6-7 में, न्यायी (जो दुष्ट था) और परमेश्वर (जो धर्मी और दयालु है) के बीच कम व अधिक वाली तुलना की जाती है। यीशु का जो मुद्दा है वह यह है कि परमेश्वर हमारी निरन्तर प्रार्थना से प्रसन्न होता है, और वह उन प्रार्थनाओं का उत्तर देगा जो उसकी इच्छा के अनुसार हैं। मित्रों, एक मिनट का समय निकालकर इस सरल सत्य को अपने लिए प्रेरणा मानें: परमेश्वर चाहता है कि आप प्रार्थना करें, और वह आपकी प्रार्थनाओं का उत्तर देना चाहता है।
संभवतः, यदि प्रार्थना से इस जीवन में वास्तविक परिवर्तन लाने में कोई लाभ न भी हो, तो भी यह एक सार्थक आत्मिक अभ्यास होगा क्योंकि यह परमेश्वर की सेवा का एक सुखद कार्य है। इसके अलावा, भले ही प्रार्थना कभी “बाहर” किसी परिवर्तन का कारण न बनती हो, फिर भी यह मूल्यवान होती है क्योंकि वह ईश्वरीय शान्ति और सन्तोष की व्यक्तिगत आशीष देती है जो कहीं और नहीं मिलती है। हालाँकि, यह तथ्य कि पवित्रशास्त्र स्पष्ट करता है कि परमेश्वर वास्तव में प्रार्थना का उत्तर देता है और प्रार्थना के कारण वास्तविक समय में कार्य करता है, यह बात हमें र भी अधिक प्रार्थना करने के लिए प्रेरित करती है। न केवल वह प्रार्थनाएँ सुनता है, बल्कि वह इतना संप्रभु है कि जो कुछ उसे प्रसन्न करता है उसे पूरा कर सकता है (इफि. 3:20)। न केवल वह संप्रभु है, बल्कि वह मनुष्य जाति की गहराई से चिन्ता भी करता है (मत्ती 6:26)। और न केवल वह संप्रभु है और हमारी गहराई से चिन्ता करता है, बल्कि उसने हमारे लिए उससे संगति करने का मार्ग भी बनाया है। सत्य के इस त्रिगुण का अर्थ है कि जब हम प्रार्थना करते हैं, और जब वह प्रार्थना परमेश्वर की इच्छा के अनुसार होती है, तो हमारे पास यह आशा करने और विश्वास करने का पूरा कारण है कि हमारी प्रार्थना पूरी होगी। यीशु प्रार्थना में ऐसे साहसी और दृढ़ विश्वास के लिए प्रोत्साहित करता है कि वह इसे पहाड़ हटाने के बराबर बताता है – और फिर कहता है कि परमेश्वर ऐसा कर सकता है! मुद्दा बस इतना ही है: प्रार्थना करें, क्योंकि परमेश्वर प्रार्थना का उत्तर देता है।
इसलिए मित्रों, यह हमारी यात्रा का अन्त है, परन्तु आशा है कि आपके लिए एक नई यात्रा का आरम्भ है। इस क्षेत्रीय मार्गदर्शिका का उद्देश्य उस परमेश्वर में आपके विश्वास का निर्माण करना है जो प्रार्थनाओं का उत्तर देता है। हम ने साथ में यह विचार करके सहायता पाई है कि प्रार्थना क्या है और यह इतनी कठिन क्यों है। हम ने देखा है कि अधिक प्रभावी रूप से प्रार्थना करने के कुछ व्यावहारिक सुझाव क्या हैं। फिर हम ने प्रार्थना के कुछ उत्तम गुप्त रहस्यों को उजागर किया। यदि आप यहाँ तक पहुँचे हैं, तो मुझे विश्वास है और मैं प्रार्थना करता हूँ कि परमेश्वर पर आपका विश्वास और मज़बूत हुआ होगा और आप अधिक प्रार्थना करने लगे होंगे। जब आप ऐसा करना आरम्भ करते हैं, तो यह ज़रूरी नहीं कि आपकी प्रार्थना एकदम सही हो। प्रार्थना करने के लिए अपने जीवन को पहले शुद्ध करने की प्रतीक्षा न करें। बस प्रार्थना करना आरम्भ करें, और देखें कि परमेश्वर क्या करेंगे!
चर्चा एवं मनन:
- इस क्षेत्रीय मार्गदर्शिका में आपने जो पढ़ा है, उसके माध्यम से प्रार्थनाओं का उत्तर देने वाले परमेश्वर में आपका विश्वास कैसे बढ़ा है?
- शान्ति और सन्तोष, अतीत में आपके प्रार्थना जीवन को प्रेरित करने वाली बातों से किस प्रकार भिन्न हैं?
- अपने दैनिक जीवन में अधिक प्रार्थना को शामिल करने के लिए आप कौन सा सरल कदम उठा सकते हैं?
- अन्तिम टिप्पणियाँ जॉन कैल्विन, कमेन्ट्री ऑन द बुक ऑफ द प्रोफेट इसायाह, खंड 4, पृ. 353.
- ई.एम. बाउन्ड्स, पावर थ्रू प्रेयर.
- जॉन बुनियन, डाइंग सेइंग्स.
- डोनाल्ड व्हिटनी, प्रेइंग द बाइबल (क्रॉसवे, 2015), पृ. 27.
- विलियम लॉ, ए सीरियस कॉल टू अ डिवाउट एंड होली लाइफ.
- लियोनार्ड रैवेनहिल, व्हाय रिवाइवल टैरीज़.
- जोएल बीके, टेकिंग होल्ड ऑफ गॉड: रिफॉर्म्ड एंड प्यूरिटन पर्सपेक्टिव्स ऑन प्रेयर (रीफॉर्मेशन हेरिटेज बुक्स, 2011).
- विलियम कूपर, द पोएटिक वर्क्स ऑफ विलियम कूपर.
- ई.एम. बाउन्ड्स, द नेसेसिटी ऑफ प्रेयर.
- वेन ग्रुडेम, सिस्टमैटिक थियोलॉजी: एन इंट्रोडक्शन टू बाइब्लीकल डॉक्ट्रिन (ज़ॉन्डरवन अकादमिक, 1995), पृ. 377.
विषयसूची
- 1 पालन करने के लिएसबसे कठिन आज्ञा
- 1. प्रार्थना क्या है?
- 2. निरन्तर प्रार्थना में लगे रहो का क्या अर्थ है?
- 3. प्रार्थना परमेश्वर को कैसे प्रेरित करती है?
- 4. प्रार्थना करना इतना कठिन क्यों है?
- चर्चा एवं मनन:
- 2 निरंतर और प्रभावशालीप्रार्थना के दस तरीके
- 1. परमेश्वर के निकट होने के लिए प्रार्थना करें।
- 2. पाप से दूर रहने के लिए प्रार्थना करें।
- 3. बाइबल के माध्यम से परमेश्वर से प्रार्थना करें।
- 4. अन्य लोगों के लिए प्रार्थना करें।
- 5. राज्य के लिए प्रार्थना करें।
- 6. एकांत में प्रार्थना करें।
- 7. अन्य लोगों के साथ प्रार्थना करें।
- 8. तत्परता के साथ प्रार्थना करें।
- 9. सरलता के साथ प्रार्थना करें।
- 10. आपके हृदय को परमेश्वर के हृदय के अनुरूप करने के लिए प्रार्थना करें।
- चर्चा एवं मनन:
- 3 प्रार्थना के बारे मेंउत्तम गुप्त रहस्य
- निष्कर्ष
- चर्चा एवं मनन: