#17 पहाड़ी उपदेश

By जोनाथन पेनिंगटन

परिचय

यीशु का जूआ — मार्गदर्शन जीवन देने वाले के रूप में मसीहियत

पिछले दो हज़ार वर्षों में, क्रूस एक ऐसा चिन्ह रहा है जो मसीही कला, ईश्वर विज्ञान, आभूषण, वास्तुकला, झण्डों और यहाँ तक कि त्वचा में कलाकृति गोदने तक का मुख्य केंद्र रहा है। मसीही समाज में सभी छवियों और मूर्तियों में यीशु के क्रूस को प्रमुखता से दर्शाया गया है। अनगिनत उपदेश और पुस्तकें क्रूस के महत्व के विषय में बताती हैं। कलीसियाओं और सेवकाईयों के नाम में प्रायः “क्रूस” सम्मिलित होती है। और हाल के समय में अधिकाँश कलीसियाओं के भवन क्रूस के आकार में बनाए जाते थे, जिनमें वेदी बीच केन्द्र में होती थी।

 

इस क्रूस का बीच में आना समझ में आता है, क्योंकि यीशु ने स्वेच्छा से क्रूस पर बलिदान दिया है (मत्ती 26:33-50)। यीशु ने अपने शिष्यों से बार-बार कहा कि उन्हें अपना क्रूस उठाकर उसके पीछे चलना चाहिए (मत्ती 10:38; 16:24; मरकुस 8:34; लूका 14:27)। प्रेरित पौलुस ने मसीही जीवन के विषय में अधिकाँश बातें इस प्रकार से कही कि यह मसीह के क्रूस को, उसके दर्द को, और उसकी लज्जा को अपनाने का जीवन है (1 कुरिन्थियों 1:17–28; गलातियों 6:14; कुलुस्सियों 1:19–23)।

 

फिर भी, एक और महत्वपूर्ण चिन्ह है जिसका प्रयोग यीशु ने किया, जो मसीही विचारधारा में क्रूस के जितना प्रमुख नहीं रहा, परन्तु मेरा मानना है कि उसे होना चाहिए: और वह यीशु का जूआ है। मत्ती रचित सुसमाचार का गहन अध्ययन यह दर्शाता है कि यद्यपि यह केवल एक ही पाठ में पाया जाता है, फिर भी जूआ मत्ती रचित सुसमाचार के ईश्वर विज्ञान और उद्देश्य तथा यीशु की सम्पूर्ण सेवकाई का मुख्य केन्द्र रहा है। मत्ती 11:28–30 में, परमेश्वर को प्रकट करने वाले के रूप में अपनी अनोखी भूमिका का साहसपूर्वक दावा करने (11:25–27) के पश्चात्, यीशु लोगों को अपने जीवन में उसका जूआ उठाने के लिए आमंत्रित करता है।

 

हे सब परिश्रम करनेवालों और बोझ से दबे लोगों, मेरे पास आओ; मैं तुम्हें विश्राम दूँगा। मेरा जूआ अपने ऊपर उठा लो; और मुझसे सीखो; क्योंकि मैं नम्र और मन में दीन हूँ: और तुम अपने मन में विश्राम पाओगे। (मत्ती 11:28-30)

 

जूआ और क्रूस दोनों ही लकड़ी के बने होते हैं, परन्तु जूआ फाँसी का प्रतीक न होकर एक कृषि सम्बन्धी यंत्र होता है। जूआ एक किसान को धैर्यपूर्वक एक पशु को खेत की लम्बी कतार में ले जाते हुए, तथा बैल या गाय को दिशा-निर्देश देते हुए चित्रित करता है, क्योंकि वह भूमि को जोतता है और बुवाई के लिए खेत तैयार करता है।

 

यीशु ने अपने जुए को हमारी गर्दन पर रखने के निमंत्रण का अर्थ शीघ्र ही स्पष्ट कर दिया —जिसका अर्थ है कि “मुझसे सीखो” (मत्ती 11:29)। यहाँ “सीखना” शब्द का अनुवाद “शिष्य बनना” के लिए किया गया है, अर्थात्, एक ऐसा व्यक्ति जो एक कुशल शिक्षक का छात्र बनता है, जो एक विशेषज्ञ के वचनों तथा उदाहरण से सीखता है। और जहाँ क्रूस आत्म-बलिदान की बात करता है, वहीं जुआ शिष्यत्व या मार्गदर्शन की बात करता है। यही मसीहियत है: यीशु का निमंत्रण है कि हम उससे सच्ची शान्ति पाने का तरीका सीखें, और वह बहुतायत का जीवन भी पाएँ जिसके लिए हम बनाए गए हैं और जिसकी हम लालसा भी करते हैं। यीशु कह रहा है कि ऐसा सच्चा विश्राम केवल तभी मिलेगा जब हम अपने जीवन में उसका जूआ उठाएँगे और उसके शिष्य बनेंगे तथा उसे अपना सच्चा मार्गदर्शक मानकर उसके अधीन हो जाएँगे।

ऑडियो मार्गदर्शिका

ऑडियो ऑडियो
album-art

00:00

#17 पहाड़ी उपदेश

PDF PDF

विषयसूची

हमारे समाचार पत्र की सदस्यता लें और साप्ताहिक बाइबल और शिष्यत्व सुझाव प्राप्त करें।