#48 लत से छुटकारा पाना: मसीह की सामर्थ्य से विजय
परिचय
उसने कभी नहीं सोचा था कि उसकी वैवाहिक स्थिति ऐसी हो जाएगी…
जॉर्ज और स्टेसी के विवाह को चार वर्ष हो गए थे। उनका एक-दूसरे से मिलना और हनीमून एक स्वप्न के समान थे। उनका विवाह उनके जीवनों का सबसे अच्छा दिन था। परन्तु स्टेसी के सामान्य जीवन में स्थापित होते हुए, जॉर्ज ने शराब पीना आरम्भ कर दिया। यद्यपि स्टेसी ने कई बार इसके लिये उसे टोका, परन्तु समस्या का समाधान कभी हुआ ही नहीं। वह केवल एक खतरनाक लत में बदलती चली गई।
उनके मिलने से पहले जॉर्ज बहुत कम पिया करता था। परन्तु उसके और स्टेसी के विवाह के बाद, जीवन व्यस्त तथा कार्य कठिन होता चला गया। जॉर्ज ने अपने होने वाले पहले पुत्र के लिये प्रबन्ध करने के लिए, बहुत परिश्रम किया। कार्य-स्थल में उसका अधिकारी उस पर बहुत दबाव डालने तथा उससे अत्यधिक उच्च अपेक्षा रखने में अनोखी रीति से निपुण था। कार्य पर एक तनावपूर्ण दिन के बाद, जॉर्ज घर आता, और कुछ ऐसा चाहता था जिससे उसे आराम मिले।
पहले तो एक लम्बे दिन की थकान दूर करने के लिये जॉर्ज केवल एक ही ड्रिंक लेता था। परन्तु शीघ्र ही रात में एक ड्रिंक, चार या पाँच हो गईं।
आरम्भ में, जब तक कि जॉर्ज पहली बार उस पर चिल्लाया नहीं था, उसे अपशब्द नहीं कहे थे, तब तक स्टेसी इसके लिये बहुत चिन्तित नहीं थी। न केवल यह, परन्तु जॉर्ज में एक नई प्रवृत्ति भी आने लगी, जिसमें उसने कितनी पी थी, उसके बारे में झूठ बोलना भी सम्मिलित हो गया था। वह बोतलों को भी छुपाने लगा और बिस्तर में घुस जाने से पहले, अपने मुँह से आने वाली गन्ध को छिपाने के प्रयास भी करने लगा।
स्टेसी सहायता चाहती है। आप मानें या न मानें, जॉर्ज भी सहायता चाहता है। वे दोनों मसीही विश्वासी हैं, जो नियमित रीति से एक अच्छे बाइबल का पालन करने वाली कलीसिया में जाते हैं। वे जानते हैं कि जीवन को ऐसा नहीं होना चाहिये। वे लत से छुटकारा और मसीह में एक नया जीवन चाहते हैं। इसके लिये, जॉर्ज और स्टेसी अकेले नहीं हैं…
चाहे वह शराब, अश्लीलता, गोलियाँ, जुआ, सोशल मीडिया, मनोरंजन, व्यायाम, खाना, यौन सम्बन्ध, कार्य, या हजारों अन्य सम्भावनाओं में से कुछ भी हो, लत लगना एक ऐसा विषय है जो लगभग सभी के जीवनों को प्रभावित करता है।
जैसा कि बाइबल के अनुसार परामर्श देने के प्रोफेसर और पास्टर, जॉन हेंडर्सन ने इसके बारे में कहा, “ऐसा बहुत ही कम होता है कि लोग किसी सृजी हुई वस्तु की लत में पड़ना चुनते हैं। बल्कि हम सृजी हुई वस्तुओं में अपनी आशा, आनन्द, और शान्ति को रखना चुनते हैं, और फिर हमें लत लग जाती है। हम, सृजी गई वस्तुओं की ओर, झूठे शरण-स्थान और झूठे ईश्वरों के रूप में, भागते हैं। और फिर लत जाना एक अपरिहार्य परिणाम होता है।”1
यदि हम लत से छुटकारा चाहता हैं, या किसी अन्य को ऐसा करने के लिये सहायता देना चाहते हैं, तो हमें बाइबल के अनुसार लत लगने के बारे में समझना होगा। हमें लत लगने के आत्मिक पक्ष के मूल कारणों को समझना होगा। लत लगने की जड़ खोदने के लिये, हमें पहले बाइबल के अनुसार मानवीय अनुभव को समझना पड़ेगा। मसीही दृष्टिकोण से, “लत लगना” कह देना एक विवरण देना है, कोई स्पष्टीकरण नहीं। आप इससे केवल क्या हो रहा है को ही जान पाते हैं, न कि ऐसा क्यों हो रहा है। यह एक जड़ का फल है—उस जड़ को जानना आवश्यक है।
मनन और चर्चा के लिये प्रश्न
- जब आप पढ़ना आरम्भ करें, तब अपने जीवन पर भी मनन करें। इस समय आप अपने जीवन के किन पक्षों में जॉर्ज और स्टेसी की कहानी से सबसे अधिक सम्बन्धित हैं?
- इस समय, इस पृष्ठ पर ऊपर दी गई सृजी गई वस्तुओं की सूची में से आप किस की ओर सबसे अधिक आकर्षित अनुभव करते हैं?
ऑडियो मार्गदर्शिका
ऑडियो#48 लत से छुटकारा पाना: मसीह की सामर्थ्य से विजय
भाग I: लत को परिभाषित करना: वह क्या है
जब हम लत लगने के बारे में चर्चा आरम्भ करते हैं, तब हमें इस पर विचार करना है कि वह क्या है। चित्रण हमारी सहायता तभी कर सकते हैं, जब हम पहले परिभाषाओं को समझ लें। अब आगे जो आने वाला है, उसमें मैं लत लगने के बारे में बाइबल के अनुसार समझ की एक रूपरेखा को स्वेच्छा से दास बन जाने के द्वारा समझाऊँगा, जो मूर्तिपूजा और आत्मिक व्यभिचार का एक मिश्रण है। उन कुछ बातों से आरम्भ करना सबसे सहायक होगा, जो लत लगना नहीं है।
एक चिकित्सीय नमूना
आज लत लगने को समझने का सबसे प्रभावी नमूना, चिकित्सीय नमूना है। इस विचारधारा के अनुसार, लत लगना बीमारियाँ हैं। हाल ही के नेटफ्लिक्स के एक कार्यक्रम में शराब के अत्यधिक सेवन की समस्या, तथा कोकेन की लत, इनके निदान के बारे में बताया गया। एक बहुत खराब कार दुर्घटना के बाद, एक व्यक्ति के भाई ने सहानुभूति दिखाते हुए अस्पताल के कमरे में कहा, “उसे लत लगी हुई है—ठीक है? यह एक बीमारी है। यह एड्स के समान है!” चोटिल भाई बोला, “नहीं, नहीं, यह एड्स के समान नहीं है; यह कैंसर के समान है।” अर्थात्, किसी के भी दृष्टिकोण से देखें, लत एक बीमारी है।
परन्तु, हम बीमारी के लिये दोषी नहीं हो सकते हैं, क्योंकि बीमारी हम पर हमारे किसी दोष के बिना ही आ जाती है। लत को बीमारी के समान देखने का अर्थ है कि उसका चिकित्सीय इलाज होना चाहिये, जो कि दवाओं, नशे से छुटकारा, और बहाल किये जाने, तथा लत लगने के प्रतिरोधक इलाज की सही व्यवस्था-प्रणाली के पालन के द्वारा होता है। तीव्र लालसा होने को मुख्यतः शारीरिक क्रिया के एक ऐसे स्वचालित, आवेग के कारण माना जाता है जो लत लगाने वाली वस्तु के द्वारा उठते हैं। इस विचारधारा का एक लोकप्रिय होता जा रहा उदाहरण है अल्कोहॉलिक्स अनोनिमस का सामूहिक बैठकों तथा 12-कदम वाला कार्यक्रम। और नि:सन्देह, लत से सम्बन्धित महत्वपूर्ण जीव-विज्ञान से सम्बन्धित तथा सामाजिक अंश हैं जिन्हें ध्यान पूर्वक देखना चाहिये।
उपासना का एक विकार
परन्तु, बाइबल के अनुसार की विचार-धारा में, बीमारी का नमूना, लत लगने के अनुभव के कुछ पक्षों का ही वर्णन करता है। परन्तु बीमारी का यह नमूना, न तो मनुष्यों की उन प्राथमिक उत्तेजनाओं के उत्पन्न होने को समझा पाता है, और न ही उनका पर्याप्त कारण बता पाता है। बीमारियाँ नहीं, बल्कि लालसाएँ गहराई से अन्दर बसी हुई, जीवन पर नियन्त्रण रखने वाली लालसाएँ—जिन पर, यदि हमें लत लगने को समझना है, तो बड़े ध्यान से विचार करना आवश्यक है। बाइबल के दृष्टिकोण से “लालसाएँ” आत्मिक होती हैं, केवल शारीरिक, शारीरिक कार्य-प्रणाली से सम्बन्धित, या रासायनिक क्रियाएँ मात्र नहीं हैं। उसी तरह से, यद्यपि लत के पदार्थ को छोड़ने के लक्षण शारीरिक रूप में प्रकट होते हैं, परन्तु उनकी जड़ आत्मिक, धार्मिक, और धर्म-विज्ञान से सम्बन्धित होती है। इसी कारण, लत लगना केवल शरीर को ही प्रभावित नहीं करता है, बल्कि आत्मा को भी करता है।
यदि सभी ओर से देखें, तो लत लगना केवल एक मानसिक विकार नहीं है, बल्कि उपासना का विकार है। इसे समझने के लिये हमें मानवीय अनुभवों का अनुवाद धार्मिक बातों में करना होगा। जैसा कि जॉन हेंडर्सन हमें याद दिलाते हैं कि, “बाइबल में शब्द लत लगना या वस्तु का दुरुपयोग होना, के रूप में नहीं आया है। इसकी बजाए पवित्रशास्त्र व्यक्ति के पाप के दासत्व में होने (यूहन्ना 8:34, रोमियों 6:6-20), निरन्तर बुराई करने की प्रवृत्ति रखने (उत्पत्ति 6:5; भजन 140:2; नहूम 3:19) और मन की भ्रष्टता के कारण अनियन्त्रित पापी आवेशों के उत्पन्न होने (रोमियों 1:18-32) की बात करता है। पवित्रशास्त्र में, लोगों के शारीरिक और आत्मिक आवेशों के नियन्त्रण में होने की, एक के बाद एक कहानियाँ मिलती हैं। पवित्रशास्त्र बहुधा मनुष्य के मन की मूर्तिपूजा और उसके परिणामों (व्यवस्थाविवरण 5-6; यहेजकेल 14) की बात करता है। लत लगना इन परिणामों में से एक के समान देखा जा सकता है, अर्थात् एक व्यक्ति के जीवन पर शरीर की अभिलाषाओं के हावी होने का परिणाम।”2
लत लगना मनुष्य के मन में तब जड़ पकड़ता है, जब लोग परमेश्वर के अतिरिक्त, किसी अन्य में अपनी आशा, भरोसा, और आनन्द रखते हैं, जिसे बाइबल मूर्तिपूजा कहती है। परन्तु बाइबल में मूर्तिपूजा स्वाभाविक भी है और अर्जित की हुई भी, प्राकृतिक भी है और सीखी हुई भी। यह स्वभाव और देखरेख दोनों से है। हम जन्म से मूर्तिपूजा करते रहते हैं, विशेषकर अपने सृष्टिकर्ता के अतिरिक्त किसी अन्य से प्रेम करने के द्वारा। साथ ही, हम जिन्हें अपने लिये उदाहरण के समान देखते हैं, उनकी जीवन शैली से, उनके मूर्तिपूजक तरीकों का भी अनुसरण करने लगते हैं, विशेषकर अपने माता-पिता, अपने भाई-बहन, और अन्य प्रभावी सामाजिक समूहों से। लत तब लगती है जब झूठे देवता (या मूर्तियाँ) हम पर राज्य करने लगते हैं। हम विचारों, शब्दों, और कार्यों के द्वारा उनकी उपासना और सेवा करने लगते हैं। हमारी लालसाएँ और व्यवहार, हम पर उनकी प्रभुता के अनुरूप होते हैं।
बाइबल के अनुसार एक परिभाषा
इन सभी बातों को ध्यान में रखते हुए, हम लत लगने की एक और परिपूर्ण परिभाषा पर विचार कर सकते हैं: लत तब होती है जब अनुचित और मूर्तिपूजक अभिलाषाएँ, समय के साथ सन्तुष्टि प्राप्त या असन्तुष्ट छूटी हुई, निर्भरता का आभास तथा विनाशक व्यवहार के नमूने उत्पन्न करती हैं।
इन लतों से छुटकारा पाने के लिये, सबसे पहले हम इस परिभाषा के अंशों को समझते हैं। अनुचित लालसाएँ वे होती हैं जो अनावश्यक रीति से प्रबल होती हैं। वे हमारी पसन्द की बातों के क्रम में अनुचित स्थान पर होती हैं, और जिससे हमें अधिक प्रेम करना चाहिये, वे उस से भी ऊपर का स्थान ले लेती हैं। आप के जीवन में अनुचित लालसाएँ इस प्रकार की हो सकती हैं, परिवार की अवहेलना करते हुए भी केवल धन अर्जित करने में लगे रहने की लालसा, अपने दैनिक कार्य की अवहेलना करते हुए सोशल मीडिया पर समय बिताना, अपने तत्कालीन भोजन और व्यायाम नियमों की अनदेखी करते हुए अत्यधिक तथा मीठी वस्तुओं को खाते रहना, परिवार के बजट की उपेक्षा करते हुए आदत के कारण खरीददारी करते रहना, अपने व्यवसाय के लिये अत्यधिक कार्य करना, एक विशिष्ट शारीरिक आकार या भौतिक स्वरूप के पीछे भागना, सभी नए कार्यक्रमों को निरन्तर देखते रहना, उचित नींद लेने का ध्यान किये बिना अत्यधिक घण्टों तक खेलते रहना या यू ट्यूब देखते रहना, तथा और बहुत कुछ।
मूर्तिपूजक होने की लालसा के लिये, उसे परमेश्वर का स्थान ले लेने वाला होना चाहिये, परमेश्वर के स्थान पर उसकी सृजी हुई किसी वस्तु को ले आना, जो एक झूठी उपासना के जीवन से व्यक्त होती है। अपने इस जटिल और वैज्ञानिक युग में हम यह सोच सकते हैं कि मूर्तिपूजा से हमें कोई खतरा नहीं है, परन्तु बाइबल के अनुसार, यह हमारी बहुत बड़ी गलती होगी। प्राचीन इस्राएल में भी, मूर्तियाँ मन से सम्बन्ध रखती थीं (यहेजकेल 14:3)। मन की मूर्तिपूजा का अर्थ हमेशा ही किसी मन्दिर में जाना या किसी काठ के टुकड़े के सामने दण्डवत करना नहीं होता है। यह किसी खेल-कूद के प्रति, या चर्चा करने के कक्ष में भी हो सकता है। मूर्तिपूजा का अर्थ होता है, हमारा परमेश्वर से विमुख होकर अपनी आशा और भरोसे को, और भय तथा सपनों को, उस के अतिरिक्त किसी अन्य में देखना।
लालसाएँ लत तब बन जाती हैं, जब वे बहुत समय तक सन्तुष्टि और असन्तुष्टि के मध्य झूलती रहती है। सन्तुष्टि और असन्तुष्टि के अनुभवों का नमूना मानवीय मन को लत में गिर जाने की ओर ले जाता है। ऐसे नमूने अपने साथ लत लगने के अनुभव को लिये हुए चलते हैं। इन्हें सामान्यतः “तीव्र लालसा” कहा जाता है, परन्तु ये अनुभव वास्तविक होते हैं। ये उस खुजली के समान होते हैं, जो खुजाते रहने पर भी जाती नहीं है, चाहे आप उस स्थान को कितना भी खुजाते रहें। चाहे उस पहली ड्रिंक को लेने की तीव्र लालसा से बचना सहज प्रतीत हो सकता है, परन्तु यदि उस में गिर गए, तो फिर उसके बाद उठने वाली तीव्र लालसाएँ और अधिक जटिल तथा कठिन हो जाती हैं।
यद्यपि बाइबल के दृष्टिकोण से, भौतिक शरीर हमें पाप करने के लिये बाध्य नहीं कर सकता है, परन्तु प्रभाव कभी-कभी निर्णायक प्रतीत हो सकते हैं। जिस प्रकार आग में और लकड़ी फेंकना होता है, तीसरी ड्रिंक, चौथी के लिये बहुधा ईंधन का कार्य करती है। क्योंकि तीव्र लालसा केवल एक पल के लिये ही दबती है, इसलिये इस प्रकार की असन्तुष्टि फिर से सन्तुष्टि पाने की खोज करने को बढ़ावा देती है, और यह एक अन्त हीन चक्र बन जाता है। इसी कारण से लत के अनुभव में निर्भर हो जाने की एक व्यक्तिगत भावना भी साथ जुड़ जाती है। ऐसा लगने लगता है कि उस वस्तु, ड्रिंक, स्वादिष्ट भोजन वस्तु, या अन्य किसी भी लालसा की हुई वस्तु के बिना जीवन चल ही नहीं पाएगा।
उस लालसा की हुई वस्तु की रक्षा करने के लिये, विनाशक व्यवहार के नमूने उभरने लगते हैं। झूठ, धोखा, औरों पर दोष मढ़ना, चालाकी करना, सताने का व्यवहार, भरोसे की क्षति, और टूटे हुए सम्बन्ध लत में पड़े लोगों को घेरे रहते हैं। आप जिस से प्रेम करने लगते हैं, उसे खो देने से बचने के लिये, आप का जीवन कई प्रकार के टेढ़े-मेढ़े आकार ले सकता है। जैसे कि बच्चों के स्कूल में सशस्त्र पहरेदार या सामर्थ्य के छल्ले के लिये गोल्लम, जिसे बहुमूल्य समझ लिया जाता है, उसे बचाने के लिये कोई भी कीमत चुकाना अधिक नहीं लगता है।
एक नैतिक नमूना
कुल मिलाकर, एक बार फिर से, लत तब होती है जब अनुचित और मूर्तिपूजक अभिलाषाएँ, समय के साथ सन्तुष्टि प्राप्त या असन्तुष्ट छूटी हुई, निर्भरता का आभास तथा विनाशक व्यवहार के नमूने उत्पन्न करती हैं।
चिकित्सीय नमूने के सीमाओं को देखते हुए, हमें लत को समझने के लिये एक नैतिक नमूने की आवश्यकता है। क्योंकि, बाइबल के अनुसार, मनुष्य का पाप एक परिस्थिति भी है और क्रमशः किये गये कार्यों की श्रृंखला भी। पाप केवल बाहरी क्रियाएँ मात्र ही नहीं है, बल्कि भ्रष्ट भीतरी लालसाएँ भी है (रोमियों 7:7-25, इफिसियों 4:17-24, कुलुस्सियों 3:5-10, याकूब 1:13-15, गलातियों 5:16-24)। इसका अर्थ यह है कि शब्द “लत” मानवीय अनुभव का वर्णन तो करता है, परन्तु उसे समझाता नहीं है। जबकि लत फल है, मूर्तिपूजा और आत्मिक व्यभिचार उसकी जड़ें हैं।
इसी कारण, बाइबल के अनुसार सलाह देने वाला सलाहकार, एड वेलच लत की यह परिभाषा देता है, “लत किसी वस्तु, गतिविधि, या मानसिक दशा के नियम का दासत्व है, जो फिर जीवन का केंद्र बन जाता है, और स्वयं को सत्य से बचाता रहता है यहाँ तक कि बुरे परिणाम भी पश्चाताप उत्पन्न नहीं करते हैं, तथा परमेश्वर से दूरी बढ़ती चली जाती है।”3 बाइबल के इस विरोधाभास में, लत हमारे द्वारा तथा हमारे ही साथ होती है। लेखक वेलच सहायता करने के लिये स्पष्ट करता है कि, “पाप में तो हम दोनों, पूर्णतः नियन्त्रण से बाहर होते हैं और चालाकी के साथ हिसाब लगाते हैं; सताए हुए, और ज़िम्मेदार होते हैं। समस्त पाप एक दयनीय दासत्व तथा प्रकट विद्रोह या स्वार्थ होता है।”4
जिस प्रकार से कोई बन्दी जो भगोड़ा हो जाए, हम सताए हुए भी हैं और ज़िम्मेदार भी। अगले अध्याय में हम चर्चा करेंगे कि लत किस प्रकार से कार्य करती है और यह ज़िम्मेदार-सताई-हुई-क्रियाशीलता कैसी दिखती है।
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मनन और चर्चा के लिये प्रश्न
- लत को समझने के लिये चिकित्सीय नमूने की सीमाएँ क्या हैं? बाइबल के अनुसार हमारी परिभाषा में, नैतिक नमूना हमारे अनुभव पर किस तरह से और प्रकाश डालता है?
- आप एक साथ दोनों, सताए हुए और ज़िम्मेदार कैसे हो सकते हैं? यदि यह क्रियाशीलता आप के अनुभव के साथ मेल खाती है तो अपनी कहानी को किसी घनिष्ठ मसीही मित्र के साथ साझा करें।
- पाप के बारे में बाइबल का सिद्धान्त, जैसा कि ऊपर अन्तिम भाग में वर्णन किया गया है, लत से जूझने में औरों की सहायता करने के हमारे तरीके को आकार देने के लिये किस प्रकार से सहायक है?
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भाग II: लत का वर्णन: वह किस प्रकार कार्य करती है
पैट्रिशिया हर्स्ट को 1974 में अगुवा किया गया था। वह कैलिफोर्निया में रहती थी, प्रसिद्ध प्रकाशक विलियम रैंडोल्फ हर्स्ट की पोती थी। शीघ्र ही उसे अगुवा करने की जिम्मेदारी सिमबायोनीज़ लिब्रेशन आर्मी (एसएलए) ने ली, जो एक आतंकवादी वामपंथी संगठन था, और शहरी छापामार युद्ध में लगा हुआ था। एसएलए ने उन्नीस महीनों तक हर्स्ट को बन्दी बनाए रखा।
अगुवा किये जाने के दो महीनों के बाद, हर्स्ट ने उसे बन्धक बनाने वालों के लक्ष्यों के प्रति अपनी नई सहानुभूति घोषित की। मीडिया को अपनी निष्ठा में परिवर्तन के बारे में बताने के लिये उपलब्ध करवाए गए औडियो टेप में, उसने एक नया नाम, टानिया, ले लिया। इसके कुछ दिन बाद एक निगरानी करने वाली वीडियो रिकॉर्डिंग से पता चला कि हर्स्ट ने एसएलए के साथ मिल कर एक बैंक को लूटा था। वहाँ उसने बैंक के ग्राहकों को, चिल्लाकर गालियों से भरे हुए निर्देश दिए थे। लूट के दौरान, बैंक में आने वाले दो व्यक्ति एसएलए की बंदूकों की गोलियों से घायल हुए। केवल एक महीने के बाद, हर्स्ट ने स्वयं, एक स्थानीय खेल-कूद के सामान की दुकान के प्रबन्धक को धमकाते हुए, एक छोटी चोरी के लिये, बंदूक की ढेरों गोलियाँ चलाईं थी।
यह कैसे हो गया कि 19 वर्षीय पैट्रिशिया हर्स्ट कुछ ही महीनों में बन्दी से भगोड़ी बन गई? स्टॉकहोम सिंड्रोम—या कम से कम इसी नाम के करण अधिकाँश लोग इस कहानी को जानते हैं। बहुत से लोगों के लिये हर्स्ट वास्तविकता से बिलकुल विच्छेदित स्नेह भावनाओं का एक बहुत स्पष्ट उदाहरण है, भावनाएँ जो इतनी विकृत हो गईं कि वह उसे बन्दी बनाने वालों से ही प्रेम करने लगी, इसे स्टॉकहोम सिंड्रोम के नाम से भी जाना जाता है।
यह मानने वाली बात है कि, इस प्रकार के आहत करने वाले अनुभवों से जुड़े हुए जटिल सम्बन्धों के कारण, यह नाम विवादास्पद बना हुआ है। परन्तु फिर भी, यह अत्याचार, लत लगने की जटिलताओं में से कुछ को भली भाँति प्रकट करता है। विचार कीजिये कि आप जिससे प्रेम करने लगे हैं उसे छोड़ देने की सोचना कितना कठिन होगा, फिर भी, आप के वहीं रहने की लालसा दिखाती है कि आप कितने बदल गए हैं!
बन्दी बनाने वालों के प्रति इस प्रकार के विकृत स्नेह भाव की कहानियाँ, लत लगने के मानवीय अनुभव को बाइबल के अनुसार परखने और समझने में सहायता प्रदान करती हैं। यह उसका एक सुस्पष्ट चित्र है जब हमें किसी ऐसी बात की लत लग जाती है, जो फिर हमारे सृष्टिकर्ता, और जिसे हमारा एकमात्र स्वामी होना है, उस का स्थान ले लेती है, तब कैसा दिखाई देता है। किसी वस्तु, गतिविधि, या मानसिक स्थिति की लत लग जाना, बहुत कुछ पैट्रिशिया हर्स्ट के एसएलए की सदस्य, टानिया, में परिवर्तित हो जाने के समान दिखता है।
लत लगने का मार्ग: मूर्तिपूजा-व्यभिचार का उदाहरण
लत लगना स्वेच्छा से दासत्व है। यह दासत्व में जाने को चुनना है। हम, किसी निम्न स्तर के स्वामी के प्रति प्रेम के मार्ग पर, स्वयं को कहीं खो देते हैं। किसी की लत लगना उसी से प्रेम करने लगना है जो आप को मार रहा है, और साथ ही उसी के द्वारा मौलिक रीति से परिवर्तित भी हो रहे हैं। बाइबल के दृष्टिकोण से, लत एक ऐसे जीवन का वर्णन करती है जिस पर एक झूठे देवता (या मूर्ति) का शासन है, जिसे आत्मिक व्यभिचार में एक (झूठा) प्रेमी स्वीकार कर लिया गया है। लत, मानवीय मन में जड़ पकड़े हुए मूर्तिपूजा और आत्मिक व्यभिचार के मिश्रण से आती है। आइये, लत का वर्णन करने के साधन के रूप में बाइबल में बताए गए मूर्तिपूजा-व्यभिचार के इस उदाहरण का संक्षिप्त खुलासा करें।
मूर्तिपूजा
मूर्तिपूजा, परमेश्वर के स्थान पर किसी अन्य को रख देना है, जिससे कि जीवन उस झूठे स्वामी के अधीन हो जाता है। मूर्तिपूजा में सृष्टिकर्ता के स्थान पर सृष्टि की उपासना की जाती है (रोमियों 1:18-23)। और फिर भी, यह उपासना, विचारों, शब्दों, और कार्यों में व्यक्त होती है (रोमियों 1:24-32; गलातियों 5:19-21)। क्योंकि जितने भी मूर्तियों की उपासना करते हैं, वे उन्हीं के समान हो जाते हैं (भजन 115:8, 135:15-18)। बाइबल में सभी मूर्तियाँ लकड़ी के लट्ठों से नहीं बनती हैं; कुछ मन में अन्दर स्थापित मूर्तियाँ होती हैं (यहेजकेल 14:1-7)।
परन्तु हमारा मूर्तियों की ओर आकर्षित होना और उनके प्रति समर्पित हो जाना, एक प्रक्रिया है। बाइबल, परमेश्वर से मूर्तियों की ओर मुड़ने को व्यभिचार दिखाती है (नीतिवचन 7, याकूब 4:1-6)। आत्मिक व्यभिचार, मूर्तिपूजा को आरम्भ और निर्देशित करता है। इसी कारण लेखक एड वेलच ने लत लगने का चित्रण “कब्र में दावत देना”5 कहकर किया। इसीलिये आत्मिक व्यभिचार के चरण, लत लगने के चरणों को चित्रित करने को प्रकाशमान करते हैं। हम लत लगने के मार्ग पर विचार करते हैं, जो जान-पहचान होने से मित्रता, फिर मोह, फिर जुनून, और फिर (झूठी) उपासना तक क्रमवार बढ़ता चला जाता है।6
परिचित होना
मूर्तिपूजा का आरम्भ क्रमशः होता है। उसे केवल एक परिचय की आवश्यकता होती है। यह सोशल मीडिया पर एक पसन्द मिलने या पुनः पोस्ट करने के द्वारा आरम्भ हो सकता है। इसका आरम्भ एक घूँट वाले गिलास से होता है। इसका आरम्भ बेतहाशा खाने में पड़ जाने से पहले लिये गये पहले कौर से होता है। वह कहता है, “ठीक है, मैं उसे चख कर देखता हूँ!” आरम्भ में तो यह एक छोटा सा टुकड़ा लेना मात्र ही होता है, या, वह पहला लम्बा सा कक्ष खींचना हो सकता है।
मित्रता
मूर्तिपूजा, सृजी गई वस्तुओं के साथ मित्रता करने से आरम्भ होती है। वह कहती है, “इसका सेवन करने से मेरी रात हमेशा बेहतर रहती है!” वह सोचती है, “नियन्त्रण तो अभी भी मेरा ही है।” यह प्रति रात्रि दो ड्रिंक्स के पहले दो सप्ताहान्त होता है। यह इसे तीसरी बार करने के लिये निःसंकोच हो जाना होता है। यह तब होता है जब एक सिगार का स्थान कई सिगरेटें ले लेती हैं। यह तब होता है जब किसी अन्य के द्वारा लिए जा रहे गाँजे के धुएँ से होने वाला नशा इतना हो जाता है कि वह स्वयं का अपना अनुभव बन जाता है। अन्ततः, यह वह चरण होता है जब सत्य और अनुभव दो भिन्न मार्ग हो जाते हैं।
मोह
अन्ततः, मूर्तिपूजा मोह में बदल जाती है। चाहे वह वस्तु दूर ही क्यों न हो, परन्तु उसकी सराहना की भावनाएँ उठने लगती हैं। जीवन उससे मिलने वाले मज़े के चारों ओर नियोजित होने लगता है––उसके एक से दूसरी बार सेवन के अन्तराल में, जीवन का अस्तित्व लगता ही नहीं है। इस चरण में औरों पर दोष मढ़ना बहुत बढ़ जाता है। हर बात उनकी गलती के कारण होती है; अपनी कोई गलती नहीं होती है। बहाने बनाना ही कार्यविधि बन जाती है। वायदे उतनी ही शीघ्रता से किये जाते हैं, जितनी शीघ्रता से वे तोड़े जाते हैं; और वे वार्तालाप में भरे हुए होते हैं। इस स्तर पर पहुँचने पर, बुरे परिणाम भी लत लगे हुए को उसकी आदतों से पलट नहीं सकते हैं। क्योंकि वह कहती है, “उसके बिना मैं अपनी रात की कल्पना भी नहीं कर सकती हूँ!”
जुनून
मोह शीघ्र ही जुनून बन सकता है। यहाँ पर हम पूरी तरह से निर्भर हो जाने की भावना को देखते हैं। अब यह “मैं इसके बिना नहीं जी सकता” हो जाता है। लत लगी हुई वस्तु के सेवन की घटनाएँ बहुत बढ़ जाती है, सम्भवतः प्रतिदिन हो जाती हैं। उनकी माँग की आवाज़ इतनी ऊँची होती है कि उसमें फिर और कुछ सुनाई ही नहीं देता है, और किसी की लालसा भी नहीं होती है। लत लगने में कभी प्रतिबद्धता की कमी नहीं होती है। उदाहरण के लिये, इस चरण पर आकर प्रयोग करने के लिये बेचना भी आ जाता है।
व्यभिचार
क्योंकि लत लगने का पतन आत्मिक व्यभिचार की राह पर चलता है, इसलिये इस अन्तिम चरण के गुण प्रेम, विश्वासघात, ईर्ष्या, और उन्माद भी होते हैं। विवेक दाग़ दिए जाते हैं (1 तीमुथियुस 4:1-2)। लत के अँधियारे मार्ग का अन्त जीवन पर एक झूठे देवता की उपासना के हावी हो जाने के साथ होता है, सृष्टिकर्ता का स्थान, सृजी हुई वस्तु ले लेती है। इस स्थिति में आने पर आप अपनी परिस्थितियों के दास बन जाते हैं। आप ने अपनी स्वतन्त्रता को त्याग दिया है तथा किसी अन्य स्वामी की सेवा करना चुन लिया है (यूहन्ना 8:34)। एक चित्रण के रूप में यह स्वेच्छा का दासत्व या इच्छित बंधुवाई है। एक शब्द में, यह मूर्तिपूजा है।
लत लगने में पतन
इस प्रकार से समझने के द्वारा, हम में से प्रत्येक लत में पतन को व्यक्तिगत रीति से समझ सकता है। क्योंकि सभी को अनुचित और मूर्तिपूजक लालसाओं का कुछ न कुछ अनुभव तो है। वास्तव में, यदि शराब का नशा, हर प्रकार की लत का एक नमूना है, तो यह बाइबल में सीधे से अन्य प्रकार के पापों की सूची में सम्मिलित है (गलातियों 5:21)। याद रखिये, हमारे हाथों में कोई भी गतिविधि, वस्तु, या मानसिक दशा एक लत बन सकती है, वह चाहे शराब, मादक पदार्थ, भोजन, यौन सम्बन्ध, मनोरंजन, खरीददारी करना, खेल-कूद, खेलों में शर्त लगाना, किसी चीज को एकत्रित करके रखना, प्रतिशोध, सामर्थ्य और नियन्त्रण रखना, या महिमा और प्रतिष्ठा, जो भी हो।
जो लत लगने के कारण दुःखी हैं, यद्यपि उन्हें प्रतीत हो सकता है कि उनका संघर्ष अनोखा है, परन्तु बाइबल के इस दृष्टिकोण में बहुत सान्त्वना मिलती है कि हम सभी समान रीति से ही दुःखी होते और संघर्ष करते हैं (1 कुरिन्थियों 10:13)। आखिरकार, एक महत्वपूर्ण समझ के अनुसार, हम सभी को लत लगी हुई है। क्योंकि हम सभी जन्म और व्यवहार से मूर्तिपूजक हैं।
यदि लत लगने का मार्ग परिचित होने से व्यभिचार तक जाता है, तो लत का चक्र आनन्द का अनुभाव करने और पीड़ा से बचने में घूमता रहता है। एक क्रूर स्वामी हमारे ध्यान को अपनी ओर आकर्षित करके, हमारे स्नेह को पकड़ लेता है और फिर हमारे व्यवहार को आकार देता है। यहाँ तक कि हमारी अभिलाषाएँ भी हमारी नई निष्ठा के अनुसार खींची जाने से बिगड़ जाती हैं। यद्यपि आरम्भ में तीव्र लालसाएँ दूर की बात लगती हैं, तथापि बिना परिश्रम किये उनका इनकार किया जा सकता है, परन्तु बारम्बार प्रयोग के कारण वे कभी तृप्त न हो सकने वाली हो जाती हैं।
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मनन और चर्चा के लिये प्रश्न
- यदि लत में पतन एक बन्दी-भगोड़ा होने की क्रिया है, तो आप किस पर अधिक जोर देंगे, और क्यों? इन दोनों के मध्य संतुलन बनाए रखने से आप को स्थिति को समझने में कैसे सहायता मिलती है? इससे एक व्यावहारिक सहायता और आशा किस तरह मिलती है?
- ऊपर लत लगने के मार्ग की जो रूपरेखा दी गई है, शराब या मादक पदार्थों के सेवन के बारे में, आप स्वयं को उस में कहाँ पर पाते हैं? कम्प्यूटर खेलों या जुआ खेलने के बारे में? अश्लीलता या अन्य यौन अनैतिकता के लिये? सृजी हुई कौन सी अन्य वस्तुएँ आप को सबसे अधिक खतरा लगती हैं, आप ठीक इसी समय, उनके साथ अपने संघर्ष का विवरण किस प्रकार देंगे?
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भाग III: लत लगने को रोकना: लड़ाई आरम्भ करने के लिये स्थान तैयार करना
लत लगने के मार्ग को समझ लेने के बाद, अब हम इलाज के बारे विचार कर सकते हैं। संक्षेप में, यह स्कॉटिश प्रेसबिटेरियन प्रचारक थॉमस चलमर्स का कहा गया “नए अनुराग की धक्का दे कर बाहर निकाल देने वाली सामर्थ्य है।”7 दूसरे शब्दों में, नई तथा सशक्त लालसाएँ, पुरानी लालसाओं को धक्का दे कर बाहर भगा देती हैं। केवल इस तरह से मन पर रखे गए ध्यान के द्वारा ही अन्ततः लत को पूरी रीति से पराजित किया जा सकता है। क्योंकि जो भी मन पर राज्य करता है, वही जीवन पर भी राज्य करता है (नीतिवचन 4:23)। यदि आप लत लगने को हराना चाहते हैं, तो आप को अपने मन के साथ व्यवहार करना होगा।
साधारण “इसे बन्द करो” वाली कार्य विधियाँ, इस संघर्ष की गम्भीरता को हल्का कर देती हैं। केवल मन परिवर्तन ही लत लगने से सच्ची स्वतन्त्रता देता है। फिर भी, बहुत से लोगों को अस्थाई, व्यावहारिक कार्य करने होते हैं, ताकि मन की देखभाल के लिये मार्ग तैयार हो सके। इसलिये, आरंभ में थोड़े समय के लिये कुछ काम चलाऊ कार्य करने आवश्यक हो सकते हैं। मैं आप से आग्रह करूँगा कि अपने मन की देखभाल के लिये, नीचे दिये गये तीन काम चलाऊ कार्यों पर विचार करें।
परन्तु, ये केवल काम चलाऊ हैं। ये केवल अस्थाई हैं। ये एक अन्य, अधिक महत्वपूर्ण निष्कर्ष: अपने मन की देखभाल करना, के लिये एक तरीका हैं। यदि आप अपने घर के बगीचे में कुछ जड़ी-बूटियाँ, मसाले उगाना चाहते हैं, तो पहले आप को खर-पतवार को उखाड़ कर फेंकना होता है। यदि आप अपने घर से बाहर साफ देखना चाहते हैं, तो आप को खिड़कियाँ साफ करनी पड़ती हैं। यदि आप ठीक से सोचना चाहते हैं, तो अपने सिरदर्द को दूर करने के लिये, पहले दवा लेनी होती है।
इसका अर्थ है कि ये अगले तीनों तरीके अपने आप में लत लगने का पूरा समाधान नहीं हैं। कभी-कभी वे आवश्यक होते हैं, परन्तु वे कभी पर्याप्त नहीं होते हैं। सीधे शब्दों में कहें, जिन लोगों की समस्या अश्लील सामग्रियाँ देखना है, वे यदि अपने उपकरणों पर अश्लीलता दिखाने को रोकने वाली एप्पस को लगा लें, तो इससे उनकी मूल समस्या का समाधान नहीं होगा। इतनी ही आशा रखी जा सकती है कि उन्होंने स्वयं में, और अपने पाप में कुछ दूरी बना ली है। बहुधा या आवश्यक पहला कदम होता है, क्योंकि इसके द्वारा मन से व्यवहार करने के लिये स्थान बन सकता है (इब्रानियों 12:12-13)। परन्तु फिर भी सबसे महत्वपूर्ण कार्य तो अभी किया जाना शेष है! इसलिये, अगला और अन्तिम अध्याय मन को लक्ष्य बनाता है, परन्तु पहले कुछ काम चलाऊ बातें जान लें।
इसका अर्थ है कि ये अगले तीनों तरीके अपने आप में लत लगने का पूरा समाधान नहीं हैं। कभी-कभी वे आवश्यक होते हैं, परन्तु वे कभी पर्याप्त नहीं होते हैं। सीधे शब्दों में कहें, जिन लोगों की समस्या अश्लील सामग्रियाँ देखना है, वे यदि अपने उपकरणों पर अश्लीलता दिखाने को रोकने वाली एप्पस को लगा लें, तो इससे उनकी मूल समस्या का समाधान नहीं होगा। इतनी ही आशा रखी जा सकती है कि उन्होंने स्वयं में, और अपने पाप में कुछ दूरी बना ली है। बहुधा या आवश्यक पहला कदम होता है, क्योंकि इसके द्वारा मन से व्यवहार करने के लिये स्थान बन सकता है (इब्रानियों 12:12-13)। परन्तु फिर भी सबसे महत्वपूर्ण कार्य तो अभी किया जाना शेष है! इसलिये, अगला और अन्तिम अध्याय मन को लक्ष्य बनाता है, परन्तु पहले कुछ काम चलाऊ बातें जान लें।
काम चलाऊ #1: जवाबदेही
सबसे पहले, जहाँ भी उपलब्ध हो, वहाँ जवाबदेही को स्थापित करें। यदि आप के लिये लत लगाने वाली बातों तक पहुँचना सम्भव है, तो सुनिश्चित करें कि आप जवाबदेह भी हों। आप को अपने संघर्ष की परिस्थितियों पर भी विचार करना चाहिये। नमूनों के खोजी हों। क्या आप के जीवन का स्वरूप, कुछ बारम्बार दोहराई जाने वाली प्रवृत्तियों को दिखाता है? इस काम चलाऊ में वे स्थान भी सम्मिलित हैं जहाँ आप दिन बिताने के लिये जाते हैं, आप के जीवन के प्रत्येक भाग से सम्बन्धित आप के सम्बन्ध, वे समय जब आप सबसे अधिक प्रलोभन अनुभव करते हैं, इत्यादि। इसमें आप का कार्य से वापस घर आना भी सम्मिलित हो सकता है…
जिम ने अश्लीलता से अपने जीवन को बर्बाद करने के लिए खतरा पैदा किया। एक दिन, कार्य से वापस घर आते समय बातें बहुत बढ़ गईं। उसने एक स्थानीय अश्लीलता के स्थान पर कार रोकी, और बाहर निकलने लगा। जैसे ही जिम ने कार के दरवाज़े के ताले के खुलने की आवाज़ सुनी, साथ ही उसका फोन भी बजने लगा। कालेब उसे फोन कर रहा था।
कालेब उसका सहकर्मी था। उसे पता था कि कार्य से घर लौटने का जिम का मार्ग उस भ्रष्ट और दूषित स्थान के पास से जाता था। उसे यह भी पता था कि जिम अश्लीलता के साथ संघर्ष कर रहा था। वे दोनों एक ही कलीसिया के सदस्य थे, और वे पाप के साथ संघर्ष में एक दूसरे के प्रति पूर्णतः ईमानदार और खुले रहने के लिये प्रतिबद्ध थे। जिम प्रकाश में चलना चाहता था। उसने एक सप्ताह पहले कालेब को सब कुछ बताया था। दुःख की बात यह थी कि उस स्थान पर रुकने के लिये यह जिम का पहला प्रलोभन नहीं था। दोनों ने एक व्यावहारिक कदम उठाया था कि मार्ग पर अपने चलने की सक्रिय स्थिति दूसरे के साथ साझा रखेंगे, और जब भी कहीं कोई अनुचित कार्यवाही होगी, वे एक दूसरे को फोन करेंगे। कालेब ने इसीलिये जिम को फोन किया था।
पाप में कदम रखना कठिन बनाने के लिये जो भी सम्भव हो सके, वह कीजिये। आप को जो भी आहत करे, चाहे कोई गतिविधि हो या कोई मादक पदार्थ, वह कहीं भी उपलब्ध हो, आप को उसके प्रति जवाबदेही के कदम उठाने अनिवार्य हैं। कभी-कभी किसी घनिष्ठ मित्र के साथ सम्बन्ध आपका जीवन बचा सकता है।
अन्य समयों पर, तकनीकी हमारी सहायता करती है कि पाप की बजाए पवित्रता का अनुसरण करना अधिक सहज रहे। हाल ही में मेरे दो मित्रों ने, यह देखते हुए कि वे मनोरंजन के साथ बहुत अधिक समय बर्बाद कर रहे हैं, ब्रिक डिवाइस को लगवाया। यह, उनके फ्रिज के साथ चिपका हुआ एक छोटा सा धूसर रंग का उपकरण है, और फोन के द्वारा उस पर एक थपकी देने पर यह कुछ समय के लिये उनके द्वारा निर्धारित एप्पस को निष्क्रिय कर देता है।
कुछ अन्य मित्रों ने सोशल मीडिया के अपने खातों को बंद कर दिया है, क्योंकि बिना सोशल मीडिया के स्वर्ग जाना, अपने सभी डिजिटल मित्रों के साथ सोशल मीडिया की नवीनतम जानकारी साझा करते हुए नरक जाने से उत्तम है (मत्ती 5:29-30)। मेरे कहने का यह अर्थ नहीं है कि सारा सोशल मीडिया हमें पाप में डाल देता है। मेरे पास सोशल मीडिया के कुछ खाते हैं। समस्या सोशल मीडिया नहीं है; समस्या मेरा पापी मन है। पाप इतना धोखेबाज़ है कि उससे संघर्ष करने के लिये कुछ उग्र तरीकों की आवश्यकता होती है। जहाँ भी उपलब्ध हो, जवाबदेही को स्थापित कर लीजिये।
काम चलाऊ #2: योजना
दूसरा, बचाव की एक योजना बनाएँ। दूसरा व्यावहारिक काम चलाऊ, इससे पहले वाले के विपरीत, किसी अन्य की तुरन्त सहायता के बिना, स्वयं को जवाबदेह बनाता है। यदि आप को लत से स्वतन्त्र होना है, तो आप को अपने सम्पूर्ण जीवन को एक नई दिशा देनी होगी। क्योंकि लत बहुत गहरी, लंबे समय से चली आ रही, जीवन पर हावी-रहने वाली लालसाओं में जड़ें जमाए हुए होती हैं, इसलिये आप को अपने पूरे जीवन के आकार के बारे में विचार करना होगा। हो सकता है कि आप को अपने सारे जीवन की संरचना ही बदलनी पड़ जाए।
यह बहुधा कहा जाता है कि, “समय सब घाव भर देता है।” परन्तु यह सच नहीं है। केवल समय के परिवर्तन से मनुष्य का मन नहीं बदल जाता है। बिना बहुत शारीरिक उद्यम, बौद्धिक ऊर्जा, और दृढ़ अनुशासन के हमें भलाई के लिये किसी भी परिवर्तन के होने की आशा नहीं रखनी चाहिये। कोई भी आकस्मिक रीति से पवित्र नहीं बन जाता है। आत्मिक बढ़ोतरी के लिये परमेश्वर द्वारा दिये गये अनुग्रह के साधनों का परिश्रम के साथ उपयोग करना होता है, इन में पवित्रशास्त्र, मनन, अपनी जाँच करना, स्वतः ही कुछ बातों का इनकार करना, ध्यान रखना, और प्रार्थना भी सम्मिलित हैं।
रेचल, कभी स्वयं को पोषण के लिये आवश्यक पर्याप्त भोजन से भी वंचित रखने से लेकर बहुत अधिक खा लेने और फिर अपनी तीव्र लालसा के अनुसार अपने शरीर का आकर बनाए रखने के लिये, उसे मल के रूप में शरीर से बाहर निकालने के प्रयासों में इधर से उधर होती रहती थी। उसे यह एहसास भी था कि समस्या उसके सहन कर पाने से बाहर हो गई थी। परमेश्वर ने अपने दयालु प्रबन्ध में, उसे एक स्वस्थ कलीसिया में रखा था। रेचल ने अपने पास्टरों में से एक कि पत्नी से, कलीसिया की मण्डली की एक भक्त वृद्ध महिला से, तथा उस युवती से जो पिछले कुछ वर्षों से रेचल की शिष्य थी, उसकी सहायता करने का निवेदन किया। उन चारों ने साथ मिलकर रेचल के लिये भोजन वस्तुओं और पोषण की एक विशिष्ट योजना बनाई। उस योजना की पुष्टि करवाने के लिये वे चारों रेचल के साथ डॉक्टर के पास गये। पहले 21 दिनों तक रेचल को, जो कुछ भी वह खाती थी, उसे अपने स्मार्ट फोन की एक एप्प के माध्यम से, दर्ज करते रहना था। उसके विश्वासयोग्य मित्र भी समय-समय पर प्रार्थना के लिए लिखित सन्देश भेजते रहने, पवित्रशास्त्र से प्रोत्साहन, और जवाबदेही के द्वारा उस पर नज़र बनाए रखते थे। इस संघर्ष के लिये केवल इतवार के दिन मिलना ही पर्याप्त नहीं था।
हम सभी को आत्मिक बढ़ोतरी के लिये एक योजना की आवश्यकता होती है। आप स्वयं की आत्मिक वृद्धि के लिये विशिष्ट, नापे जा सकने, और पूरे किये जा सकने वाले, लक्ष्य निर्धारित कर सकते हैं। अपने व्यवसायों में बढ़ोतरी की इच्छा रखने वाले लोग, अपने कार्य के लिये यह करते हैं—तो सबसे महत्वपूर्ण बातों के लिये इसे क्यों न करें? इसे, अपनी कलीसिया में किसी घनिष्ठ मित्र के साथ, या बेहतर हो कि अपने पास्टर के साथ मिलकर करें। बहुत सलाहकारों को साथ लेने में बुद्धिमानी होती है (नीतिवचन 11:14, 15:22)। और भी महत्वपूर्ण बात है कि जब हम माँगते हैं, तब परमेश्वर बुद्धि देता है (याकूब 1:5)। यदि हम उसकी असीम सामर्थ्य से लेना चाहेंगे, तो परमेश्वर पवित्र बनने में हमारी सहायता करेगा।
जब आप प्रार्थना के साथ अपने जीवन का आँकलन करते हैं, तो लत लगने के अपने मार्ग पर विचार करें। पिछले अध्याय में लत के मार्ग के बारे में फिर से पढ़ें और फिर विचार करें कि: आप लत लगाने वाले मादक पदार्थों के साथ कहाँ परिचित हुए थे? आप ने लत बन जाने वाली गतिविधियों और मानसिक दशा के साथ कहाँ पर मित्रता की? यह कब होता है कि आप स्वयं को मन में बसी हुई मूर्तियों के प्रति मोहित या अभिभूत पाते हैं?
अपनी योजना में, लत लगने के अपने मार्ग के विभिन्न चरणों के मध्य बाधाएँ उत्पन्न करें। उदाहरण के लिये, आप को मादक पदार्थ उपलब्ध कराने वाले व्यक्ति का फोन नम्बर मिटा दें। साथ ही, यदि आप अपने भीतरी जीवन के प्रति सचेत रहते हैं, तो आप स्वयं को, विचार से योजना बनाते हुए और फिर उसे कार्यान्वित करते हुए पाएँगे। तो, लत के प्रत्येक चरण पर, स्वयं के लिये उस से अगले चरण को जाना व्यावहारिक रीति से कठिन करते चले जाएँ।
काम चलाऊ #3: दवा
अपनी परिस्थिति की गम्भीरता के अनुसार, आप को चिकित्सीय सहायता एक व्यावहारिक अनिवार्यता अनुभव हो सकती है। विभिन्न प्रकार की लत, जैसा कि हमने यहाँ पर उनके बारे में देखा है (उदाहरण के लिये, सोशल मीडिया से ले कर कोकेन तक) प्रकट है कि यह अन्तिम काम चलाऊ बात हर किसी पर समान रीति से लागू नहीं होती है। मैं यहाँ पर आपको चिकित्सीय सहायता लेने पर विचार करने के लिए कुछ सिद्धान्त देता हूँ।
पहला, दवाई परमेश्वर का एक अच्छा उपहार हो सकती है। यीशु ने कहा कि बीमारों को चिकित्सकों की आवश्यकता होती है (मत्ती 9:12)। पौलुस ने तीमुथियुस को प्रोत्साहित किया कि अपनी शारीरिक समस्या के लिये भोजन सम्बन्धी एक नई व्यवस्था का पालन करे (1 तीमुथियुस 5:23)। बाइबल के दृष्टिकोण से, मसीहियों को हर प्रकार की दवाइयों को त्याग देने की कोई आवश्यकता नहीं है।
दूसरा, दवाओं को उनके उपयुक्त स्थान पर रखना चाहिये। यद्यपि डॉक्टर अपने विशिष्ट प्रशिक्षण के अनुसार शारीरिक लक्षणों का इलाज करते हैं, बहुत ही कम होते हैं, जो मनुष्यों की आत्माओं की विस्तृत देखभाल भी करते हैं। वास्तव में, उनके कार्य क्षेत्र के कारण, कभी-कभी डॉक्टर बात को बिगाड़ भी देते हैं (मरकुस 5:25-26)। जैसा कि हमने ऊपर चर्चा की है, लत से सम्बन्धित चिकित्सीय नमूनों का ध्यान रखें।
तीसरा, कलीसियाएँ उचित सीमाओं से बाहर नहीं जा सकती हैं। एक पास्टर होने के नाते, दवाएँ मेरे कार्य क्षेत्र से बाहर हैं। यह मेरे पास्टर होने के दायित्वों से बाहर होगा कि मैं दवाओं को बढ़ाने या घटाने के बारे में कहूँ, विभिन्न चिकित्सीय समस्याओं के निदान करूँ और उपचार बताऊँ। सबसे उचित कार्य विधि, विशेषकर चरम स्थितियों में यही होगी कि एक पास्टर और एक चिकित्सा विशेषज्ञ (या और भी बेहतर, दोनों ही प्रकार के लोगों की एक टीम), साथ मिलकर उस बीमार व्यक्ति की समग्र रूप से देखभाल करें।
इन तीन सिद्धान्तों को ध्यान में रखते हुए, सम्भवतः एक चित्र उभर कर आया होगा कि हमारे उद्देश्यों के लिये, मैंने चिकित्सीय सहायता को काम चलाऊ क्यों कहा है। एक टूटी हुई टाँग के बारे में विचार कीजिये। टूटी हुई टाँग पर चलने से बात और बिगड़ जाती है। कुछ समय के लिये पलस्तर लगाना, बैसाखियों का सहारा लेना, या पहिये वाली कुर्सी प्रयोग करना, टाँग को सही करने में सहायक होता है। परन्तु हमें लक्ष्य की अनदेखी नहीं करनी चाहिये कि—टाँग फिर से चलने फिरने के योग्य हो सके! आप को कुछ समय के लिये सामान्य रीति से चलना बन्द करना पड़ेगा, ताकि शीघ्र ही आप फिर से सामान्य रीति से चल सकें! यही वह नमूना है जो चिकित्सीय सहायता के साथ लागू होना चाहिए। इस प्रकार की सहायता से बचकर रहने के स्थान पर, उसे सही दृष्टिकोण के साथ उपयोग करना चाहिये। चिकित्सीय सहायता मन के साथ सही व्यवहार करने के लिये भूमि तैयार करती है। उससे दीर्घ-कालीन का मार्ग बनाने के लिये अस्थाई राहत मिलती है।
इसका अर्थ है कि अकेला संयम अपने आप में अपर्याप्त उद्देश्य है। केवल “शुद्ध हो जाना” मन की अनदेखी करता है! इसलिये संयम लक्ष्य तक पहुँचने का एक माध्यम है; लक्ष्य है मन की ऐसी देखभाल करना कि वह केवल मसीह में विश्वास करने के द्वारा परमेश्वर की महिमा करे, और इस बात पर हम अगले खण्ड में आएँगे।
इन कारणों से, लत में पड़ने के बहुत बढ़ी हुई स्थिति में पड़े हुए लोगों को, उनकी लत के अनुसार विशिष्ट इलाज के लिए, 30 दिन के आश्रय के या पुनःस्थापन के कार्यक्रमों में भाग लेने से सहायता मिल सकती है। यह कहने के साथ ही, यदि आप ऐसे किसी कार्यक्रम में भाग लेने की सोच रहे हैं, तो साथ ही यह भी देख लें कि उन लोगों का विश्वास क्या है और वे परमेश्वर, बाइबल, और मानव जाति के बारे में क्या सिखाते हैं। आप को स्वयं को किसी ऐसे कार्यक्रम के अधीन नहीं करना चाहिए जो सच्ची स्वतन्त्रता के मार्ग को झूठी शिक्षाओं के द्वारा बिगाड़ता है (गलातियों 1:6-10)।
चिकित्सीय इलाज और लत वाले पदार्थ को छोड़ने के प्रभावों के बारे में सचेत रहने के लिये एक बात: यदि आप शराब या बेन्ज़ोडायाज़िपीन श्रेणी के पदार्थों (जैसे कि वेलियम, जैनेक्स, आदि) की लत में पड़े हुए हैं, तो बिना व्यावसायिक चिकित्सीय सहायता के, स्वयं से ही इलाज करने के प्रयासों के बहुत गम्भीर परिणाम हो सकते हैं, जो घातक भी हो सकते हैं। इसलिये आप को अवश्य ही किसी चिकित्सक से या आप के लक्षणों के अनुसार के विशेषज्ञों की संस्था से परामर्श लेना चाहिये।
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मनन और चर्चा के लिये प्रश्न
- क्या इस अध्याय ने आप को जवाबदेही और/या दवाओं के बारे में कोई चुनौती दी है? यदि हाँ, तो कैसे? यदि नहीं, तो इससे आपकी मान्यताएँ किस प्रकार से दृढ़ तथा बाइबल में और अधिक सीधे से स्थापित हुईं?
- उपरोक्त के प्रकाश में, यदि आप स्वयं के बचाये जाने के लिये कोई योजना बनाते हैं, तो उसका स्वरूप क्या होगा?
- जब आप इस पुस्तक में उल्लेखित लोगों के बारे में पढ़ रहे थे, तब क्या कोई विशेष व्यक्ति आप के ध्यान में आया? आप उसकी सहायता के लिये किस प्रकार आगे बढ़ सकते हैं या उन्हें कैसे प्रोत्साहित कर सकते हैं?
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भाग IV: लत को हराना: स्वतन्त्रता कहाँ मिलेगी
लत से छूटने का एकमात्र निश्चित तरीका है मसीह की विजय में सामर्थ्य प्राप्त करना। उपरोक्त काम चलाऊ उपाय (और उनके समान अन्य उपाय) केवल स्थान बनाने के लिये हैं कि आप अपने मन की दीर्घ-कालीन देखभाल के लिये प्रभु को जानें और उसका भय मानें। याद रखिये कि लत तो केवल एक फल है, जबकि मूर्तिपूजा और आत्मिक व्यभिचार उसकी जड़ें हैं। इसलिये हमें अपने जीवनों में से बुरी जड़ों को खोद कर निकालना होगा ताकि बुरे फल हमारे जीवनों से हट सकें। उसके बाद, मन की देखभाल के लिये, मसीह में होकर परमेश्वर के अनुग्रह के द्वारा उनके स्थान पर अच्छी जड़ें लगाई जा सकती हैं।
लत को निकाल बाहर करने की सामर्थ्य रखने वाला एकमात्र स्नेह यीशु मसीह को देखने और उसका स्वाद चखने के द्वारा ही आता है। जब हम यीशु को मधुर जानेंगे, तब हम वह जो कहता है, वही करेंगे। केवल प्रभु यीशु मसीह के अनुग्रह और ज्ञान में बढ़ने के द्वारा ही हम लत से छूट कर निकलने की आशा रख सकते हैं (2 पतरस 3:18)। यद्यपि पाप और स्वार्थी लालसाएँ हम पर प्रभुता रखती हैं, तथापि हमें प्रभु यीशु मसीह को पहनने की और शरीर को कोई भी अवसर नहीं देने की आवश्यकता है (रोमियों 13:14; तथा साथ ही 6:1-23; 8:13) इस अध्याय का शेष भाग एक रूपरेखा देता है कि हम, परमेश्वर के अनुग्रह से, इसे किस तरह से कर सकते हैं। एक अति अनिवार्य पूर्वापेक्षा के बाद, पवित्रशास्त्र पर आधारित सात कार्य विधियाँ दी गई हैं।
पूर्वापेक्षा: केवल मसीह
इस पूरे विषय की पूर्वधारणा यही है कि हमने पाप किया है और स्वयं को अनाज्ञाकारिता तथा विद्रोह के द्वारा परमेश्वर से अलग कर लिया है। इसीलिये हम लत से पीड़ित होते हैं और पाप से संघर्ष करते हैं। परन्तु मसीही सुसमाचार का अच्छा समाचार यह है कि यीशु के जीवन, मृत्यु, और पुनरुत्थान के द्वारा, हमारे पाप क्षमा हो सकते हैं, हम परमेश्वर के साथ सम्बन्ध में बहाल किये जा सकते हैं, और अनन्त जीवन प्राप्त कर सकते हैं।
हम केवल मसीह में विश्वास के द्वारा ही परमेश्वर से अनुग्रह को प्राप्त करते हैं। इस शुभ समाचार को जान लेने, उस के सत्य होने से सहमत होने, और क्षमा, धार्मिकता, उद्धार, और बुद्धिमानी के लिये केवल मसीह में विश्वास करने के द्वारा हम मसीह को थाम लेते हैं। मसीह के हमारे उद्धारकर्ता और प्रभु, नबी, महायाजक, और राजा होने से हम लाभान्वित होते हैं। वही हमारे लिये परमेश्वर का वचन है। वही हमारे लिये परमेश्वर को चढ़ाया गया बलिदान है। वही हम पर परमेश्वर का अधिकार है। वही हमारे लिये परमेश्वर की आशीष है।
इससे पहले कि हम यीशु के लिये कुछ कर सकें, हमें उसे अपने लिये सब कुछ स्वीकार करना होगा। उसके बिना हम कुछ नहीं कर सकते हैं (यूहन्ना 15:5)। जैसा बाइबल के सभी लोगों (यीशु के अतिरिक्त) के साथ है, आदम से नूह से अब्राहम से मूसा से दाऊद और अन्य सभी तक, हमने भी परमेश्वर की आज्ञाओं का पालन करने में असफलता पाई है। हमने पाप किया है। परमेश्वर ने सृष्टि के समय हमारे साथ जो वाचा बाँधी थी, हमने उसका उल्लंघन किया है। यदि हमें पाप और संघर्ष से स्वतन्त्र होना है, तो उसका केवल एक ही मार्ग है।
यदि मसीह उस परीक्षा में सफल रहता है जिस में हम सभी असफल रहे, यदि वह विजय प्राप्त करता है, केवल तब ही हम विश्वास के द्वारा उसके अनुग्रह से अपने संघर्षों पर जयवन्त हो सकते हैं।
इसलिये, यदि आप विश्वास के द्वारा प्रभु यीशु को नहीं जानते हैं, तो अपने पापों के लिये पश्चाताप कीजिये और केवल मसीह में भरोसा रखिये। या तो मसीही बनिये, अन्यथा लत से स्वतन्त्र होने की आशा मत रखिये। मसीह में सच्चे विश्वास के बिना, हम केवल एक मूर्ति के स्थान पर दूसरी बैठा लेंगे। परिणामस्वरूप, दुःख की बात है कि लत से “स्वतन्त्र” हुए लोग, स्वयं को फिर से किसी अन्य बात के दास बना लेते हैं! यदि आप एक मसीही हैं तो पवित्रशास्त्र से सात कार्य विधियों का पालन करें, जिन से मसीह की विजय के द्वारा लत से स्वतन्त्रता प्राप्त होती है।
1. गम्भीरता से अपनी स्थिति पर विचार कीजिये
यहाँ पर गम्भीरता का अर्थ, बाइबल में दिये हुए “सचेत रहकर” (1 पतरस 1:13) से अधिक के लिये है। हम इस विचार को मादक पदार्थों और शराब से स्वच्छ हो जाने के लिये विस्तृत कर सकते हैं। प्रकट है कि यदि आप अपने पिछले अत्यधिक सेवन के प्रभावों से बाहर नहीं निकल रहे होंगे, तो आप अधिक स्पष्टता से विचार कर पाएँगे। परन्तु लत से वास्तव में स्वतन्त्र होने के लिये, आप को अपनी स्थिति के बारे में, गम्भीरता और गहराई से विचार करना पड़ेगा।
संघर्ष कर रहे पवित्र लोगों के विरुद्ध शैतान की कार्य विधियों में से एक है, उन्हें यह मानने के लिये कायल करना कि उनका पाप न तो क्षमा हो सकता है और न ही उस पर विजय पाई जा सकती है (2 कुरिन्थियों 2:11)। इस धूर्तता का केन्द्र यह धारणा है कि हम अनोखे हैं। यदि आप जिस समस्या से होकर निकल रहे हैं, वह पूरी तरह से किसी भी अन्य या और सभी लोगों से बिलकुल भिन्न है, तो फिर आप के बदल पाने की कोई विशेष सम्भावना नहीं है। दुःख की बात है कि जो लोग लत से पीड़ित होते हैं, वे इस प्रकार के विचारों से, औरों से अधिक ग्रस्त रहते हैं।
परन्तु संघर्ष कर रहे पवित्र लोगों के लिये परमेश्वर के वचन में बहुत सान्त्वना है। “तुम किसी ऐसी परीक्षा में नहीं पड़े, जो मनुष्य के सहने से बाहर है। परमेश्वर सच्चा है और वह तुम्हें सामर्थ्य से बाहर परीक्षा में न पड़ने देगा, वरन् परीक्षा के साथ निकास भी करेगा कि तुम सह सको” (1 कुरिन्थियों 10:13)। हम अनोखे नहीं हैं। हमारे संघर्ष अनोखे नहीं हैं। इस वास्तविकता में शान्ति है। हमारे भाइयों और बहनों के विजयी होने के उदाहरणों के द्वारा हमें भरोसा होना चाहिये कि परमेश्वर हमें भी छुड़ा लेगा। बच निकलने का एक मार्ग है। इसे स्वयं परमेश्वर उपलब्ध करवाता है।
अपनी स्थिति पर गम्भीरता से विचार करने का एक भाग इस वास्तविकता का एहसास करना है। एक अन्य भाग यह स्वीकार करना है कि संसार से प्रेम करना और परमेश्वर से प्रेम करना, दोनों साथ नहीं चल सकते हैं (1 यूहन्ना 2:15-17)। आप को लत के विरुद्ध अपने संघर्ष को एक आत्मिक संघर्ष के समान देखना पड़ेगा जिसमें दाँव पर सर्वाधिक सम्भव लगा हुआ है।
दुःख की बात है कि अनेकों, जो लत से संघर्ष कर रहे हैं, वे सहायता लेने से इसलिये मना कर देते हैं, क्योंकि वे इस झूठ पर विश्वास करते हैं कि केवल जिन्हें उनके समान अनुभव हैं, वे ही उनकी स्थिति समझ सकते हैं। परन्तु परमेश्वर जानता है, और उसका वचन सत्य है। बहुधा, वह हमारी सहायता ऐसे लोगों के द्वारा करता है जो किसी अन्य तरह से संघर्ष कर रहे हैं। इन बातों के अनुसार, न केवल अपने प्रकट पापों का, बल्कि भीतरी प्रलोभनों का भी अंगीकार कर लेना लाभदायक होता है। बाइबल के अनुसार, हमारे पाप उन प्रलोभनों के कारण होते हैं, जो बुरी लालसाओं से उत्पन्न होते हैं (याकूब 1:13-15)। जैसा कि लेखक एड वेलच ने लिखा है, “याकूब यह स्पष्ट कर देता है कि ऐसी कोई भी लालसा, पवित्रशास्त्र जिसे वर्जित करता है, एक बुरी लालसा है जो हमारे अपने मन से निकलती है।”8 इसलिये, हमें अपने प्रलोभनों को एक दूसरे के सामने मान लेना चाहिए ताकि हम पाप को गम्भीरता से देख सकें और अपने जीवनों में से उसे जड़ से उखाड़ फेंकने के लिये परिश्रम करें।
2. पवित्रशास्त्र के माध्यम से और दृढ़ लालसाएँ विकसित करें
हम पवित्रशास्त्र के माध्यम से, मसीह में होकर परमेश्वर से मिलते हैं (यूहन्ना 5:39)। हम परमेश्वर के वचन से जीवित हैं (मत्ती 4:4)। पवित्रशास्त्र स्वयं जीवित है, परमेश्वर का जीवित वचन है (इब्रानियों 4:12)। हमें कभी भी पवित्रशास्त्र को निष्क्रिय, उबाऊ, और निर्जीव शब्द नहीं समझना चाहिये। वह जीवित है। वह हमें जीवन देता है। परमेश्वर बाइबल के द्वारा हमारी रीढ़ की हड्डी में आत्मिक सामर्थ्य डालता है। पवित्रशास्त्र में होकर हम परमेश्वर की असीम सामर्थ्य से ले पाते हैं। पवित्रशास्त्र पर मनन करने से उसके सत्य हमारे मनों में समा जाते हैं, हमारे अन्दर सामर्थी लालसाएँ उत्पन्न और विकसित करते हैं, जो फिर संसार की बातों के प्रति दुर्बल लालसाओं को बाहर निकाल देती हैं।
परमेश्वर के वचन पर ध्यान कीजिए, भजन 84 में: “क्योंकि तेरे आँगनों में का एक दिन और कहीं के हज़ार दिन से उत्तम है। दुष्टों के डेरों में वास करने से अपने परमेश्वर के भवन की डेवढ़ी पर खड़ा रहना ही मुझे अधिक भावता है। क्योंकि यहोवा परमेश्वर सूर्य और ढाल है; यहोवा अनुग्रह करेगा, और महिमा देगा; और जो लोग खरी चाल चलते हैं, उनसे वह कोई अच्छी वस्तु रख न छोड़ेगा” (84:10-11)।
यही सत्य वह आशा है जिसकी हमें आवश्यकता है। यही वह सहायता है जिस की लत लगे हुए व्यक्तियों को आवश्यकता है। केवल यह भरोसा कि परमेश्वर का वचन सत्य है, एक ऐसी लालसा उत्पन्न करता है जो किसी भी अन्य से अधिक सामर्थी होती है। परमेश्वर इतना आनन्ददायक है कि उसके साथ का एक दिन, उसके किसी भी विकल्प से हजार गुना अधिक चाहने योग्य होता है। परमेश्वर की सेवा करना इतनी सन्तुष्टि प्रदान करता है कि परमेश्वर के साथ सबसे निम्न आदर का स्थान (द्वार को खोलने और बन्द करने का कार्य – प्राचीन काल के द्वारपाल का कार्य) भी, किसी अन्य राज्य में राज करने से बेहतर है।
न केवल यह, परन्तु, “यहोवा परमेश्वर सूर्य और ढाल है।” वह प्रकाश और सुरक्षा प्रदान करता है। और निश्चित है कि यह बात उनके लिये नहीं कही जा सकती है, जिन पदार्थों की लत हमें लगी हुई है। शराब का दुरुपयोग हमारे अनुग्रह को चुरा लेता है, और अनादर लाता है, परन्तु यहोवा अनुग्रह करता है और महिमा देता है। वास्तव में, परमेश्वर भला है और भलाई करता है। अपने अनुग्रह के कारण, जो उससे प्रेम करते हैं, उसकी उपासना करते हैं, उनसे वह कोई भी भली वस्तु रख नहीं छोड़ता है।
स्वेच्छा से ली गई लत की दासता से निकलने और आत्मिक बढ़ोतरी के लिये पवित्रशास्त्र अनिवार्य है। क्यों? क्योंकि जवान परमेश्वर के वचन के द्वारा सावधान रहने से स्वयं को शुद्ध रखता है (भजन 119:9)। यदि हम परमेश्वर के विरुद्ध पाप करने से बचकर रहना चाहते हैं, तो हमें परमेश्वर के वचन को अपने मन में भर कर रखना है (भजन 119:11)। मसीह में होकर परमेश्वर के लिये और भी अधिक दृढ़ लालसाओं को विकसित करने के लिये पवित्रशास्त्र को स्मरण करना, बोलते रहना, और उस पर मनन करते रहना बहुमूल्य तरीके हैं। आप परमेश्वर के वचन को अपने मन में किस प्रकार भर कर रख छोड़ेंगे?
3. परमेश्वर की महानता की एक झलक प्राप्त कीजिये
केवल परमेश्वर ही मनुष्य के हृदय की लालसाओं को सन्तुष्ट कर सकता है। क्योंकि केवल परमेश्वर ने ही हमें सृजा है। हम सृष्टि करने के उसके कार्य का अंगीकार करने के द्वारा परमेश्वर के प्रति प्रेम को विकसित करते हैं। प्रभु परमेश्वर की सभी वस्तुओं की सृष्टि करने की सामर्थ्य के कारण बाइबल उसे आदर और महिमा के योग्य बताती है (प्रकाशितवाक्य 4:11)। हमारी समस्याओं की जड़ सृष्टिकर्ता और उसकी सृष्टि के मध्य असमंजस रखना है।
जब सम्पूर्ण इतिहास में मसीहियों ने परमेश्वर को पर्याप्त या पूर्णतः पर्याप्त कहा, तब उनके मनों में यह विचार था कि परमेश्वर किस प्रकार अपनी बनाई हुई प्रत्येक वस्तु से भिन्न है। परमेश्वर पवित्र, पवित्र, पवित्र है (यशायाह 6:3; प्रकाशितवाक्य 4:8)। किसी भी वस्तु की उससे तुलना नहीं की जा सकती है (यशायाह 40:18)। उसके समान कोई नहीं है (1 शमूएल 2:2)।
केवल परमेश्वर ही शाश्वत है (भजन 90:2)। उसका कोई आरम्भ नहीं है। उसका कोई अन्त नहीं है। वह हमारे समान क्रमशः एक से दूसरे पल का बदलना अनुभव नहीं करता है। समय रचा गया है। इसलिये, परमेश्वर समय से बाहर है।
केवल परमेश्वर ही अपरिवर्तनीय है (मलाकी 3:6)। वह कभी बदलता नहीं है (याकूब 1:17)। वह और अधिक बेहतर नहीं हो सकता है। वह ज़रा भी बिगड़ नहीं सकता है। वह सिद्ध है (मत्ती 5:48)। उसकी सिद्धताओं में उसकी शुद्धता, एकता, न्याय, धार्मिकता, पवित्रता, दया, भलाई, अनुग्रह, और प्रेम भी सम्मिलित हैं। क्योंकि परमेश्वर, परमेश्वर की तरह होना या व्यवहार करना रोक नहीं सकता है, इसलिये वह बदल भी नहीं सकता है। परमेश्वर हमारी स्थिति को सुधार सकता है, क्योंकि यह उसकी दया है कि हम परिवर्तनीय हैं। परन्तु परमेश्वर स्वयं नहीं बदल सकता है, क्योंकि बदलना सृजे हुओं का गुण है।
केवल परमेश्वर ही सर्वज्ञानी है (यशायाह 40:28; भजन 147:5; इब्रानियों 4:13; 1 यूहन्ना 3:20)। वह कुछ सीख नहीं सकता है क्योंकि वह सब बातें जानता है। और इसी कारण वह किसी भी बात से अचंभित नहीं होता है, न ही उसके लिये कुछ भी आकस्मिक होता है। वह कभी भी अनभिज्ञ नहीं होता है। वह कभी किसी बात से अनजान नहीं होता है। वह सर्वज्ञानी है।
केवल परमेश्वर ही किसी पर निर्भर नहीं रहता है (प्रेरितों 17:24-25)। उसे स्वयं से बाहर कुछ भी अन्य की कोई आवश्यकता नहीं है। न तो कोई व्यक्ति और न कोई वस्तु उसकी आवश्यकता पूरी कर सकता है। वास्तव में, हम यह कह सकते हैं कि परमेश्वर की कोई आवश्यकताएँ हैं ही नहीं। वह किसी व्यक्ति या वस्तु पर निर्भर नहीं है। वह स्वयं से, और स्वयं के द्वारा है, और स्वयं से सन्तुष्ट होता है। वह पर्याप्त है। इसीलिये, केवल परमेश्वर ही सन्तुष्ट करता है।
यही परमेश्वर, एकमात्र जीवित और सच्चा परमेश्वर, आप को भी सन्तुष्ट कर सकता है। आप को वह एक आवश्यक बात पूरी करनी है (लूका 10:42)। आप को मसीह में होकर परमेश्वर को, संसार द्वारा दिये जाने वाले किसी भी खज़ाने से अधिक सन्तुष्ट करने वाला मानना होगा (इब्रानियों 11:26)। आप को प्रभु से कहना होगा कि वह अपने निवास स्थान में आ कर बसे, और आप को उसकी मनोहरता को निहारते रहना होगा (भजन 27:4)। केवल तब ही आप की लत पराजित हो सकती है।
4. प्रकाश में चलें
यदि हम परमेश्वर के साथ संगति रखेंगे, तो हम उसके लोगों––मसीह की देह, कलीसिया के साथ भी संगति रखेंगे। प्रेरित यूहन्ना ने यही बात कही है: “पर यदि जैसा वह ज्योति में है, वैसे ही हम भी ज्योति में चलें, तो एक दूसरे से सहभागिता रखते हैं; और उसके पुत्र यीशु का लहू हमें सब पापों से शुद्ध करता है” (1 यूहन्ना 1:7)।
इस समय पर मुझे बिलकुल स्पष्ट यह कह लेने दीजिये, यदि आप किसी स्थानीय कलीसिया के सदस्य नहीं हैं, तो लत से युद्ध के लिये जो सबसे व्यावहारिक सहायता है, वह आप को उपलब्ध नहीं है। लेखक वेलच हमें याद दिलाता है कि सामूहिक उपासना “हर तरह की लत से लड़ने का सबसे सामर्थी हथियार है।”9 यह सामूहिक उपासना में ही होता है कि हमारी पसन्द सुधारी जाती हैं, पुनः प्रशिक्षित होती हैं, गहरी होती हैं, और उसे आकार मिलता है। क्योंकि यहीं पर हम परमेश्वर की स्तुति करते हैं, उसके सामने अपने पापों को मानते हैं, पवित्रशास्त्र के सार्वजनिक पाठ के द्वारा उसकी क्षमा को प्राप्त करते हैं, उसकी दया, अनुग्रह, और प्रेम के कार्यों के लिये उसका धन्यवाद करते हैं, प्रचार किये गए परमेश्वर के वचन से उसके निर्देशों को सुनते हैं, और परमेश्वर तथा अपने पड़ोसियों की सेवा के लिये तितर-बितर होने से पहले आशीष या मंगल-कामना प्राप्त करते हैं।
यह स्पष्ट कर दूँ कि कोई भी कलीसिया नहीं चलेगी। आप को एक स्वस्थ स्थानीय कलीसिया की आवश्यकता होगी। आप को एक ऐसी कलीसिया की आवश्यकता होगी जो सदस्यता को गम्भीरता से लेती है। आप को ऐसी कलीसिया की आवश्यकता होगी जो पाप को गम्भीरता से लेती है। आप को एक ऐसी कलीसिया की आवश्यकता होगी जो परमेश्वर के वचन को गम्भीरता से लेती है।
किसी ऐसी कलीसिया को खोजिये जहाँ पर प्रति सप्ताह परमेश्वर का वचन विश्वासयोग्यता से प्रचार किया जाता है, जहाँ प्रचार-मँच से “पाप” और “पश्चाताप” जैसे शब्द बहुधा प्रयोग किये जाते हैं, जहाँ के पास्टर मण्डली के सदस्यों को जानते हैं, जहाँ अन्धकार में चलने वालों को हमेशा ही छिपे रहने का सुरक्षित स्थान प्रदान नहीं किया जाता है।
हल्का प्रचार और दुर्बल संगति, लत से युद्ध करने में आप के सहायक नहीं होंगे। आप को स्वयं को ऐसे लोगों से घेर लेना है जो प्रेम के साथ सच को बोलते हैं (इफिसियों 4:15-16)। किसी ऐसे स्थान का पता लगाइये जहाँ आप को भली-भाँति जाना जाए और आप से भली-भाँति प्रेम भी किया जाये। इस बारे में, कलीसिया को खोजने का एक व्यावहारिक साधन है 9Marks.org.
5. सम्बन्धों को बहाल करें
यदि आप किसी लत में पड़ गये हैं, तो टूटे हुए सम्बन्ध आप के जीवन में हर जगह बिखरे हुए होंगे। आप ने जिन्हें दुःख दिया है, आप को उनके साथ मेल-मिलाप करना होगा (मत्ती 5:23-24; कुलुस्सियों 3:13; इफिसियों 4:32)। आप यह कार्य, आप ने जो हानि की है, उसकी व्यक्तिगत ज़िम्मेदारी लेने के द्वारा करेंगे।
क्षमा माँगिये। सुस्पष्ट रहिये। कुछ इस तरह की बात कहिये “मुझे आप से झूठ नहीं बोलना चाहिये था। मुझे आप से सच कहना है। परमेश्वर सत्य है, इसलिये आज से आरम्भ करके मैं बिलकुल ईमानदार रहूँगा। ईमानदारी से चलने में मेरी सहायता कीजिये।” दुःख की बात है कि झूठ और धोखा आप के जीवन का गुण रहा है, इसलिये अब सत्य और पारदर्शिता को उनका स्थान ले लेने दीजिये (इफिसियों 4:25)। वही कहिये जो आप की बात का अर्थ है, और जो आप कहते हैं, उसे पूरा भी कीजिये (मत्ती 5:37)। आप ने औरों पर दोष डाले हैं, अब समय है कि व्यक्तिगत ज़िम्मेदारी लें। आप को मेल-मिलाप के इस कदम के लिये पहल करनी होगी। यह उद्देश्यपूर्ण कार्यवाही के बिना नहीं होगा।
आप यह भी देखेंगे कि इस विशिष्ट कदम में समय लगेगा। मेल-मिलाप जटिल होता है। भरोसे को बहाल करना धीमा और कठिन हो सकता है। व्यावहारिक बुद्धिमानी और इस महत्वपूर्ण प्रयास में सहायता के लिये, द मेंटरिंग प्रोजेक्ट में गैरेट केल की पुस्तक फॉरगिवनेस (क्षमा) देखिये।
6. स्वयं पर नियन्त्रण करना सीखिये
यह उल्लेखनीय है कि तीतुस 2 में पौलुस कलीसिया के सभी लोगों के लिये कोई न कोई कार्य देता है: वृद्ध पुरुषों, वृद्ध स्त्रियों, जवान स्त्रियों, और जवान व्यक्तियों को। हर प्रकार के लोगों को करने के लिये अनेकों कार्य दिये गए हैं, आशा रखिये कि एक प्रकार के समूह को ध्यान केन्द्रित रखने के लिये एक ही बात दी गई है। “ऐसे ही जवान पुरुषों को भी समझाया कर कि संयमी हों” (2:6)। और वास्तव में पौलुस के चारों समूहों को, किसी न किसी तरह से संयम रखना सीखने के लिये कहा गया है। वृद्ध स्त्रियों को “पियक्कड़ नहीं” (2:3) हों। वृद्ध पुरुष “संयमी हों” (2:2)। जवान स्त्रियों को वृद्धों से सीखना है कि कैसे “संयमी” (2:5) हों। मसीह के प्रत्येक अनुयायी को आत्म-संयम सीखना है।
संयमी होने का अर्थ है स्वार्थी लालसाओं और आवेगों को “ना” कहना सीखना। संयमी होने का चित्र, समुद्र में उफनती लहरों में एक स्थिर नाव है। परमेश्वर का अनुग्रह हमें चिताता है कि “हम अभक्ति और सांसारिक अभिलाषाओं से मन फेरकर इस युग में संयम और धर्म और भक्ति से जीवन बिताएँ” (तीतुस 2:12)।
स्वयं ही ‘न’ कहने का अभ्यास करना हमें संयमी बनना सीखने में सहायता करता है। साधु बनने की कोई आवश्यकता नहीं है और बैरागी होने से हमें कोई सहायता नहीं मिलेगी (कुलुस्सियों 2:18)। परन्तु छोटी बातों के लिये न कहने की योग्यता हमें बड़ी बातों के लिये न कहने के लिये प्रशिक्षित करती है। पसन्द की वैकल्पिक बातों को न रखना हमें पापी शरीर को भूखा रखना सीखने में भी सहायता करता है। संयमी होना, समय के साथ और दृढ़ होता जाता है।
7. सृजी हुई वस्तुओं को परमेश्वर के उपहारों के समान ग्रहण करें
लत पर जयवन्त होना सीखना, सृजी हुई वस्तुओं में अपनी आशा, भरोसा, और आनन्द को नहीं रखना सीखना है। हमें सिक्के के दूसरे पहलू पर भी विचार करना चाहिये। अर्थात्, हमें सृजी हुई वस्तुओं को परमेश्वर के उपहारों के रूप में लेना चाहिये।
सृष्टि के प्रति मसीही दृष्टिकोण में यह सत्य भी सम्मिलित है कि परमेश्वर व्यर्थ की वस्तुएँ नहीं बनाता है! सृष्टि हम से पाप नहीं करवा सकती है। क्योंकि परमेश्वर अच्छा है, सृष्टि भी अच्छी है (उत्पत्ति 1:31; 1 तीमुथियुस 4:4)। सृष्टि परमेश्वर नहीं है, परन्तु परमेश्वर से है। सभी वस्तुएँ परमेश्वर से हैं, परमेश्वर के द्वारा हैं, और परमेश्वर के लिये हैं (रोमियों 11:36)।
इसलिये, जैसा कि पौलुस प्रेरित ने सिखाया है, “परमेश्वर की सृजी हुई हर एक वस्तु अच्छी है, और कोई वस्तु अस्वीकार करने के योग्य नहीं; पर यह कि धन्यवाद के साथ खाई जाए, क्योंकि परमेश्वर के वचन और प्रार्थना के द्वारा शुद्ध हो जाती है” (1 तीमुथियुस 4:4-5)। हम सब वस्तुओं को पवित्रशास्त्र और प्रार्थना के द्वारा शुद्ध (या पवित्र) करते हैं। परमेश्वर के अनुग्रह से हम उसकी रची हुई प्रत्येक वस्तु को धन्यवाद के साथ ग्रहण कर सकते हैं (सभोपदेशक 5:19)। इसका अर्थ है कि हमें शराब या भोजन या दवाओं या अन्य किसी भी वस्तु के कभी भी सेवन न करने की शपथ खाने की आवश्यकता नहीं है! हमेशा के लिये बच कर अलग रहने से हमें स्वतन्त्रता नहीं मिलेगी, परन्तु मसीह में भरोसा रखने और सृष्टि को परमेश्वर के उपहार के रूप में लेकर उसका आनन्द लेने से मिलेगी; इसका अर्थ है हर बात को नियन्त्रित, उपयुक्त, और उचित रीति से करना (1 कुरिन्थियों 9:27, 10:23-33; फिलिप्पियों 4:5-9)।
जैसा हम ऊपर कह चुके हैं, ऐसा होगा कि हम, कुछ समय के लिये, उससे दूरी बनाकर रख सकते हैं, जो हमारे विश्वास पर, सृजी हुई वस्तुओं की झूठी उपासना करने के द्वारा, खतरे को ला सकता है।
वास्तव में, अपनी विशिष्ट स्थिति के अनुसार, आप यह दूरी सारी उम्र बना कर रखने में बुद्धिमानी समझ सकते हैं। पवित्रता के लिये प्रत्येक प्रयास करना उपयुक्त है!
परन्तु, प्रिय मित्र, याद रखना, जीवन सदा काल का नहीं है। अनन्तकाल की तुलना में, यह जीवन केवल एक ऋतु के समान है। एक महिमामय दिन आ रहा है जब मसीह लौट कर आएगा या हमें घर बुला लेगा। तब हम उसके साथ खाएँगे और पीएँगे, हमारे वर्तमान के संघर्ष चाहे जैसे भी क्यों न हों (यशायाह 25:6; लूका 22:18; रोमियों 8:18)। वह दिन शीघ्र, बहुत शीघ्र आने वाला है (प्रकाशितवाक्य 22:20)।
हम जितना अधिक उस दिन और मसीह पर मनन करेंगे, हम इस दिन में, तब तक के लिये उतना ही बेहतर जी सकेंगे।
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मनन और चर्चा के लिये प्रश्न
- क्या आप मसीह में विश्वास के द्वारा परमेश्वर को जानते हैं? दूसरे शब्दों में, क्या आप मसीही विश्वासी हैं? आप यह कैसे जानते हैं?
- लत के विरुद्ध संघर्ष को आप का मसीही विश्वास किस तरह से बदल देता है?.
- उपरोक्त सात पवित्रशास्त्र के अनुसार की कार्य विधियों में से आप के लिये सर्वाधिक चुनौतीपूर्ण कौन सी थी? कौन सी सबसे प्रोत्साहक थी? इस सप्ताह आप इन में से एक किस तरह से व्यावहारिक रीति से लागू कर सकते हैं?
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निष्कर्ष
हो सकता है कि आपने इस झूठ पर विश्वास किया हो कि आप इस जीवन में बदल नहीं सकते हैं, कि आप आजीवन लत लगे हुए या शराबी ही रहेंगे। मैंने ये बातें आप को एक बार फिर से एक आशा देने के लिये लिखी हैं। क्योंकि परमेश्वर के वचन में आशा के साथ, आप बदल सकेंगे। पौलुस ने पियक्कड़पन––सभी प्रकार की लत का प्रारूप––के बारे में एक बात लिखी, कि “न पियक्कड़…परमेश्वर के राज्य के वारिस होंगे” (1 कुरिन्थियों 6:10)।
परन्तु सन्दर्भ के लिये, उसके द्वारा कही गई सभी बातों को देखिये, “धोखा न खाओ; न वेश्यागामी, न मूर्तिपूजक, न परस्त्रीगामी, न लुच्चे, न पुरुषगामी, न चोर, न लोभी, न पियक्कड़, न गाली देनेवाले, न अन्धेर करनेवाले परमेश्वर के राज्य के वारिस होंगे। और तुम में से कितने ऐसे ही थे, परन्तु तुम प्रभु यीशु मसीह के नाम से और हमारे परमेश्वर के आत्मा से धोए गए और पवित्र हुए और धर्मी ठहरे” (1 कुरिन्थियों 6:9-11)।
यदि प्रभु यीशु मसीह कुरिन्थियों को हमारे परमेश्वर की आत्मा के द्वारा धो सकता है, पवित्र कर सकता है, तो प्रिय मित्र, वह आप को भी बदल सकता है। परमेश्वर के सामर्थी वचन के अनुसार, एक दिन आप की गवाही भी यही हो सकती है कि, “तुम में से कितने ऐसे ही थे।” आप को हमेशा ही “लत में पड़े हुए” या एक “पियक्कड़” नहीं रहना है। परमेश्वर के अनुग्रह से, आप सृजी हुई वस्तुओं पर नहीं, केवल मसीह में भरोसा और आशा रख सकते हैं।
समापन नोट्स
- जॉन हेंडर्सन, एक्विप्ड टू काउँस्ल: ए ट्रेनिंग कोर्स इन बिबलिकल काउँस्लिंग (द एससोसिएशन ऑफ बिबलिकल काउँस्लर्स, 2019), 260.
- हेंडर्सन, एक्विप्ड टू काउँस्ल, 256.
- एडवर्ड टी. वेलच, एडिकशन्स: ए बैनक्वेट इन द ग्रेव (फिलिप्सबर्ग, एनजे: पी & आर, 2001), 35.
- वेलच, एडिकशन्स: ए बैनक्वेट इन द ग्रेव, 34.
- वेलच, एडिकशन्स, 57.
- यहाँ पर मैंने एड वेलच के उदाहरण को कुछ संशोधित करके उसका अनुसरण किया है। और अधिक के लिये वेलच, एडिकशन्स, 65–83. देखिये।
- थॉमस चलमर्स, द एक्सपलसिव पॉवर ऑफ ए न्यू अफेक्शन (व्हीटन, ईल: क्रॉसवे, 2020).
- वेलच, एडिकशन्स, 230.
- वेलच, एडिकशन्स, 86.
लेखक के बारे में
बेन रॉबिन टेक्सास के फोर्ट वर्थ स्थित ट्रिनिटी रिवर बैपटिस्ट चर्च में पास्टर के रूप में सेवा करते हैं। वे अपनी पत्नी अन्ना से विवाहित हैं, और उनके दो बच्चे हैं।
विषयसूची
- भाग I: लत को परिभाषित करना: वह क्या है
- एक चिकित्सीय नमूना
- उपासना का एक विकार
- बाइबल के अनुसार एक परिभाषा
- एक नैतिक नमूना
- मनन और चर्चा के लिये प्रश्न
- भाग II: लत का वर्णन: वह किस प्रकार कार्य करती है
- लत लगने का मार्ग: मूर्तिपूजा-व्यभिचार का उदाहरण
- मूर्तिपूजा
- परिचित होना
- मित्रता
- मोह
- जुनून
- व्यभिचार
- लत लगने में पतन
- मनन और चर्चा के लिये प्रश्न
- भाग III: लत लगने को रोकना: लड़ाई आरम्भ करने के लिये स्थान तैयार करना
- काम चलाऊ #1: जवाबदेही
- काम चलाऊ #2: योजना
- काम चलाऊ #3: दवा
- मनन और चर्चा के लिये प्रश्न
- भाग IV: लत को हराना: स्वतन्त्रता कहाँ मिलेगी
- पूर्वापेक्षा: केवल मसीह
- 1. गम्भीरता से अपनी स्थिति पर विचार कीजिये
- 2. पवित्रशास्त्र के माध्यम से और दृढ़ लालसाएँ विकसित करें
- 3. परमेश्वर की महानता की एक झलक प्राप्त कीजिये
- 4. प्रकाश में चलें
- 5. सम्बन्धों को बहाल करें
- 6. स्वयं पर नियन्त्रण करना सीखिये
- 7. सृजी हुई वस्तुओं को परमेश्वर के उपहारों के समान ग्रहण करें
- मनन और चर्चा के लिये प्रश्न
- निष्कर्ष
- समापन नोट्स
- लेखक के बारे में