#31 मसीह में बने रहना
परिचय
“जैसा पिता ने मुझ से प्रेम रखा, वैसा ही मैं ने तुम से प्रेम रखा; मेरे प्रेम में बने रहो” (यूहन्ना 15:9)
परमेश्वर आप से क्या चाहता है?
कुछ लोग कहते हैं – धर्म। मैं ऐसा नहीं मानता हूँ। मेरा मानना है कि हम इससे बेहतर तर्क दे सकते हैं कि यीशु धर्म को स्थापित करने नहीं, बल्कि उसे नष्ट करने आया।
अन्य लोग कहते हैं कि यह धर्म नहीं है; परमेश्वर संबंध चाहता है। मैं मानता हूँ कि यह सत्य है। किन्तु मुझे नहीं लगता कि यह पर्याप्त है।
एक बार यीशु ने कहा,
मैं दाखलता हूँ: तुम डालियाँ हो। जो मुझ में बना रहता है और मैं उसमें, वह बहुत फल फलता है, क्योंकि मुझ से अलग होकर तुम कुछ भी नहीं कर सकते। यदि कोई मुझ में बना न रहे, तो वह डाली के समान फेंक दिया जाता, और सूख जाता है; और लोग उन्हें बटोरकर आग में झोंक देते हैं, और वे जल जाती हैं। यदि तुम मुझ में बने रहो और मेरा वचन तुम में बना रहे, तो जो चाहो माँगो और वह तुम्हारे लिए हो जाएगा। मेरे पिता की महिमा इसी से होती है कि तुम बहुत सा फल लाओ, तब ही तुम मेरे चेले ठहरोगे। जैसा पिता ने मुझ से प्रेम रखा, वैसा ही मैं ने तुम से प्रेम रखा; मेरे प्रेम में बने रहो। (यूहन्ना 15:5-9)
“बने रहने” का अर्थ है भीतर निवास करना। यीशु कहता है कि वह चाहता है कि आप उसमें निवास करें, और वह आप में निवास करे। यह मेरे लिए मात्र संबंध से कहीं अधिक प्रतीत होता है।
मान लीजिए कि आप गर्भ में एक शिशु का साक्षात्कार करें और पूछें, “क्या आपका अपनी माता के साथ संबंध है?”
मुझे पूरा विश्वास है कि शिशु आपको उलझन-भरी दृष्टि से देखेगा। गर्भ में बच्चे कुछ हद तक अजनबी जैसे दिखाई देते हैं, इसलिए हो सकता है कि आपको उनकी उलझन का भाव न समझ में आए, परन्तु वह ऐसा करेगा।
ऑडियो मार्गदर्शिका
ऑडियो#31 मसीह में बने रहना
भाग I: गर्भ में
“जैसा पिता ने मुझ से प्रेम रखा, वैसा ही मैं ने तुम से प्रेम रखा; मेरे प्रेम में बने रहो” (यूहन्ना 15:9)
परमेश्वर आप से क्या चाहता है?
कुछ लोग कहते हैं — धर्म। मैं ऐसा नहीं मानता हूँ। मेरा मानना है कि हम इससे बेहतर तर्क दे सकते हैं कि यीशु धर्म को स्थापित करने नहीं, बल्कि उसे नष्ट करने आया।
अन्य लोग कहते हैं कि यह धर्म नहीं है; परमेश्वर संबंध चाहता है। मैं मानता हूँ कि यह सत्य है। किन्तु मुझे नहीं लगता कि यह पर्याप्त है।
एक बार यीशु ने कहा,
मैं दाखलता हूँ: तुम डालियाँ हो। जो मुझ में बना रहता है और मैं उसमें, वह बहुत फल फलता है, क्योंकि मुझ से अलग होकर तुम कुछ भी नहीं कर सकते। यदि कोई मुझ में बना न रहे, तो वह डाली के समान फेंक दिया जाता, और सूख जाता है; और लोग उन्हें बटोरकर आग में झोंक देते हैं, और वे जल जाती हैं। यदि तुम मुझ में बने रहो और मेरा वचन तुम में बना रहे, तो जो चाहो माँगो और वह तुम्हारे लिए हो जाएगा। मेरे पिता की महिमा इसी से होती है कि तुम बहुत सा फल लाओ, तब ही तुम मेरे चेले ठहरोगे। जैसा पिता ने मुझ से प्रेम रखा, वैसा ही मैं ने तुम से प्रेम रखा; मेरे प्रेम में बने रहो। (यूहन्ना 15:5-9)
“बने रहने” का अर्थ है भीतर निवास करना। यीशु कहता है कि वह चाहता है कि आप उसमें निवास करें, और वह आप में निवास करे। यह मेरे लिए मात्र संबंध से कहीं अधिक प्रतीत होता है।
मान लीजिए कि आप गर्भ में एक शिशु का साक्षात्कार करें और पूछें, “क्या आपका अपनी माता के साथ संबंध है?”
मुझे पूरा विश्वास है कि शिशु आपको उलझन-भरी दृष्टि से देखेगा। गर्भ में बच्चे कुछ हद तक अजनबी जैसे दिखाई देते हैं, इसलिए हो सकता है कि आपको उनकी उलझन का भाव न समझ में आए, परन्तु वह ऐसा करेगा।
वह शिशु कहेगा, “हाँ, हमारा संबंध है, परन्तु यह उससे कहीं अधिक है। आप ने देखा होगा कि मैं उसके भीतर रहता हूँ। आप शायद न समझ पाएँ, परन्तु मैं वास्तव में उसके बिना जीवित नहीं रह सकता हूँ। मेरा सम्पूर्ण जीवन उसी पर निर्भर है।
इसलिए, शिशु कहेगा, “हाँ, हमारा संबंध है, परन्तु केवल इसे ‘संबंध’ कहना बहुत बड़ा कम आँकना होगा।”
यदि आप परमेश्वर से पूछें कि क्या वह वास्तव में आप से मात्र संबंध ही चाहता है, तो मैं कल्पना कर सकता हूँ कि वह कहेगा, “उसे चाहे जो भी कहो, परन्तु जिसके लिए मैं आपको आमंत्रित कर रहा हूँ वह मात्र संबंध से कहीं अधिक है। मैं आपको यह अवसर दे रहा हूँ कि मैं वह गर्भ बन जाऊँ जिसमें आप अस्तित्व रखते हैं, और वह लहू जो आपकी नसों में बहता है। मैं वह नाभि-रज्जू अर्थात् नाडू बनना चाहता हूँ जो आपको जीवनदायी भोजन पहुँचाता है, और वह द्रव्य भी बनना चाहता हूँ। मैं वह श्वास बनना चाहता हूँ जो आपके फेफड़ों में प्रवेश करती है, और स्वयं आपके फेफड़े बनना चाहता हूँ। मैं चाहता हूँ कि आप अपना जीवन मुझ में पाएँ। मेरी इच्छा है कि हम एक हो जाएँ।”
संबंध अच्छे होते हैं, परन्तु वे कभी स्थिर रहते हैं, कभी टूटते हैं। हमें परमेश्वर के साथ इससे गहरा, अधिक स्थायी कुछ चाहिए।
हमें उसकी आवश्यकता है क्योंकि हम उसी के लिए बनाए गए हैं। उसके बिना हमें खालीपन का अनुभव होता है।
हमें इसकी आवश्यकता इसलिए भी है क्योंकि यही एकमात्र मार्ग है जिससे हम वही जीवन जी सकते हैं जिसके लिए हमें बनाया गया है। हमें यीशु के समान होना है, पवित्र और फलवन्त जीवन जीना है। यह हम अपने दम पर नहीं कर सकते हैं, परन्तु हमारे भीतर परमेश्वर निवास करता है (और साथ ही हम उसके भीतर निवास करते हैं)। परमेश्वर का हम में बने रहना ही हमें उसके समान जीवन जीने योग्य बनाता है।
परमेश्वर ने हम में बने रहने का प्रस्ताव दिया है। हमें यह सुनिश्चित करना है कि हम भी उसमें बने रहें। यीशु ने नहीं कहा, “जैसा तुम मुझ में बने रहते हैं,” उसने कहा, “यदि तुम मुझ में बने रहो।” हमारे पास चुनाव है। और उसने हमें सही चुनाव करने की आज्ञा दी: “मेरे प्रेम में बने रहो।”
यीशु में बने रहना कैसा दिखता है?
मेरा विचार है कि यह इस प्रकार है:
अन्य बातों को किनारे करना ताकि मैं परमेश्वर को अपने भीतर उसकी इच्छा पूरी करने दूँ।
अपना हृदय परमेश्वर के सामने उँडेल देना और उसके प्रेम को अपने भीतर भरने देना।
इस पर भरोसा करना कि यदि मेरे पास यीशु है और कुछ नहीं है, तो भी मेरे पास वह सब कुछ है जिसकी मुझे आवश्यकता है।
परमेश्वर को सर्वोच्च स्थान देना और अन्य बातों को त्याग देना।
नियंत्रण छोड़ देना और नियंत्रण परमेश्वर को सौंप देना।
किन्तु हम उस स्थान तक कैसे पहुँच सकते हैं?
यीशु वास्तव में दाख की बारी के पास खड़ा था जब उसने दाखलता की उपमा दी। यदि आपने कभी दाख की बारी को निकट से देखा हो, तो आप देखेंगे कि दाखलता ज़मीन से ऊपर उठती है, डालियाँ दाखलता से निकलती हैं, और अंगूर डालियों पर उगते हैं। दाखलता से डाली का जीवनदायी संबंध होता है। यदि वह दाखलता से जुड़ी रहती है, तो डाली वह सारे पोषक तत्त्व पाती है जो फल लाने के लिए आवश्यक हैं। यदि वह दाखलता से जुड़ी नहीं रहती, तो डाली कुछ नहीं कर सकती है। उसे पोषण नहीं मिलेगा। वह फल नहीं लाएगी। डाली…मृत हो जाएगी।
जैसा मैंने कहा, “बने रहने” का अर्थ है भीतर निवास करना। आप अपने घर या अपार्टमेंट में बने रहते हैं। यीशु यूहन्ना 15:4 में कहता है, “तुम मुझ में बने रहो, और मैं तुम में।” तो यीशु कह रहा है, “मैं चाहता हूँ कि तुम मेरे भीतर निवास करें, और मैं तुम्हारे भीतर।” यीशु हमें बता रहा है कि वही जीवन का स्रोत है। यदि हमें जीवन चाहिए, तो हमें उसी से जुड़े रहना है।
इसलिए हमें यीशु से जुड़े रहने को हर बात से ऊपर प्राथमिकता देनी होगी। हमें उन आत्मिक आदतों या नियमों को प्राथमिकता देनी होगी जो हमें यीशु से जोड़ती हैं, जो हमें उसमें बने रहने देती हैं।
हमें ऐसा करने में सहायता करने का एक मार्ग है “जीवन का नियम” रखना।
मैंने नहीं कहा कि हमें जीवन के लिए नियम चाहिए। जीवन के लिए “नियम” होते हैं। कुछ सहायक होते हैं। (“उधार लिया हुआ वाहन वापस करो तो टंकी पूरी भरकर लौटाओ।” “अक्सर कृपया और धन्यवाद कहना चाहिए।” “शौचालय की सीट नीचे करना” — यह तो मेरी पत्नी का सबसे पसंदीदा विषय लगता है।) मैंने जीवन के कुछ अन्य नियम भी सुने हैं जो…सहायक नहीं हैं। (“यदि आपका पीछा कोई पशु कर रहा है, तो ज़मीन पर पाँच सेकंड लेट जाओ। पाँच सेकंड का नियम उस पशु को आपको खाने से रोक देगा” — मुझे पूरा विश्वास है कि यह सत्य नहीं है।)
ये तो जीवन के लिए नियम हैं, परन्तु क्या आपने कभी “जीवन का नियम” सुना है? जब 397 ईस्वी में ऑगस्टीन ने मसीही लोगों के लिए एक प्रसिद्ध “जीवन का नियम” लिखा, तब से बहुत से यीशु के अनुयायियों ने इसका अनुसरण किया। तो जीवन का नियम क्या है? यह नियमों के बारे में नहीं है। हमें यह शब्द “रूल अर्थात् नियम” अधिक “रूलर अर्थात् शासक” से मिला है, न कि “रूल अर्थात् नियम” से मिला है।
जीवन का नियम वास्तव में जानबूझकर बनाई गई आत्मिक आदतों या नियमों का एक समूह है, जो हमें यीशु से जुड़े रहने में सहायता करता है। ये आत्मिक, संबंधी, या पेशेवर अभ्यास हो सकते हैं। ये अभ्यास हमें हमारी गहरी प्राथमिकताओं, मूल्यों और उत्साहों को हमारे वास्तविक जीवन-व्यवहार के साथ जोड़ने में सहायता करते हैं। “नियम” होना हमें ध्यान भटकाने वाली बातों पर विजय पाने में सहायता करता है — ताकि हम बिखरे, जल्दी में, प्रतिक्रिया-प्रधान और थके हुए न रहें।
ये वे आदतें हैं जिन्हें आप प्राथमिकता देंगे और बार-बार करेंगे क्योंकि आप जानते हैं कि ये आपको यीशु से जुड़े रहने में सहायता करेंगी।
आपका नियम संभवतः उन अभ्यासों को शामिल करेगा जो परमेश्वर के साथ आपके संबंध का निर्माण करते हैं, जैसे वचन पढ़ना, प्रार्थना, दान, और उपवास। इसमें कुछ अभ्यास आपके शारीरिक जीवन को पोषित करने वाले भी हो सकते हैं, जैसे नींद, विश्राम दिन, या व्यायाम। इसमें कुछ संबंधी तत्व भी हो सकते हैं जो आपकी मित्रता और परिवार पर केंद्रित हों। इसमें आपकी कलीसिया की सहभागिता से जुड़े अभ्यास भी अवश्य होने चाहिए।
यदि आप जानते हैं कि आप डाली हैं और यीशु दाखलता है — आपके जीवन का स्रोत — तो आप इन आत्मिक आदतों को वैकल्पिक नहीं मानेंगे। आपको इन से जुड़े रहना ही होगा।
क्या आप कुछ रोचक सुनना चाहते हैं?
स्मरण करें कि यीशु ने कहा कि वह दाखलता है और हम डालियाँ हैं? यदि आप दाख की बारी देखें तो आप दाखलता और डालियाँ देखेंगे, और आप एक जाली अर्थात् सहारा भी देखेंगे। बिना जाली अर्थात् सहारे के, डालियाँ ज़मीन पर बेतरतीबी से फैल जाएँगी। ज़मीन पर वे रोगों की अधिक शिकार होंगी और कीटों के लिए आसान शिकार बनेंगी जो फल को नष्ट करना चाहते हैं। किन्तु जब वे ज़मीन से ऊपर सहारे पर बढ़ती हैं, तो डालियाँ अधिक स्वस्थ होंगी और अधिक फल लाएँगी। जाली अर्थात् सहारा दाख की बारी को अधिक सुंदर भी बनाता है — ज़मीन पर बेतरतीबी से फैलने के बजाय दाखलता और डालियाँ एक-दूसरे से जुड़ी हुई और सीधी बढ़ती हैं।
यदि आप स्वस्थ डालियाँ और उत्तम फल चाहते हैं, तो आपको एक मजबूत जाली अर्थात् सहारा चाहिए।
तो, रोचक क्या है?
“जीवन का नियम” में “नियम” शब्द लैटिन शब्द “रेगुला” से आया है, जिसका अर्थ है जाली अर्थात् सहारा।1 जाली अर्थात् सहारे के समान, जीवन का नियम आत्मिक अभ्यासों की एक संरचना तैयार करता है। अस्त-व्यस्त जीवन के बजाय आप आत्मिक नियम में जीते हैं। आप कम असुरक्षित, अधिक स्वस्थ, और अधिक फलवन्त होते हैं। आप एक अधिक सुंदर, परमेश्वर का आदर करने वाला और लोगों से प्रेम करने वाला जीवन जीते हैं।
हम सभी को जीवन का नियम चाहिए। आत्मिक अभ्यासों के एक ढाँचे को हम प्राथमिकता दें, क्योंकि यह हमें यीशु से जोड़े रखता है। और हमें यीशु से जुड़े रहना है, क्योंकि वही जीवन का स्रोत है।
तो, कैसे? हम उस स्थान तक कैसे पहुँचें जहाँ हम यीशु में बने रहें?
हम उत्साहपूर्वक परमेश्वर का अनुसरण करें, जो कि अगले भाग में हमारा विचार होगा।
हम समर्पण करें कि हम नियमित रूप से उन विशेष आत्मिक अभ्यासों को प्राथमिकता देंगे जो हमें यीशु से जोड़े रखते हैं। हम भाग तीन से पाँच तक में तीन महत्वपूर्ण बातों पर विचार करेंगे।
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चर्चा एवं मनन:
- परमेश्वर हमें अपने साथ एक “जुए” वाले संबंध में आने के लिए आमंत्रित करता है, और हमें अपने पास आने के लिए बुलाता है ताकि हम अपने बोझ उतारकर विश्राम पा सकें। आपके जीवन में कौन-से बोझ हैं, जो आपको दबा रहे हैं? यह कैसा रहेगा यदि आप वे बोझ परमेश्वर को सौंप दें?
- आप किस समय कुछ मिनट निकालकर प्रार्थना में परमेश्वर के पास जाकर अपने बोझ को उसे सौंप सकते हैं? इसे करके देखें।
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भाग II: परमेश्वर के खोजी
“स्वर्ग में मेरा और कौन है? तेरे संग रहते हुए मैं पृथ्वी पर और कुछ नहीं चाहता” (भजन. 73:25)
मैं आपको प्रोत्साहित करना चाहता हूँ कि आप एक खोजी अर्थात् पीछा करने वाले बनें।
यह सुनने में अजीब लग सकता है, क्योंकि हम सब ने डरावनी कहानियाँ सुनी हैं जैसे जॉन हिनक्ली जूनियर की, जिसने अपने जुनून के कारण अभिनेत्री जोडी फोस्टर का पीछा किया और फिर उसे प्रभावित करने के लिए राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन की हत्या का प्रयास किया।
ऐसी और भी डरावनी और अजीब कहानियाँ हैं। क्रिस्टिन केलेहर पूर्व बीटल जॉर्ज हैरिसन के प्रति पागलपन की हद जुनूनी हो गई थी, वह उसके घर में घुस गई,2 और उसके आने की प्रतीक्षा करते हुए स्वयं के लिए उसके फ्रिज से पिज़्ज़ा निकाला, उसे पकाया।3
विलियम लेपेस्का टेनिस स्टार अन्ना कोर्निकोवा से मिलने के लिए इतना बेताब था कि वह बिस्केन खाड़ी को तैरकर पार कर गया ताकि उसके घर पहुँच सके।4 दुर्भाग्य से, वह गलत घर में चला गया, जहाँ उसे गिरफ्तार कर लिया गया।
ऐसा पीछा करने के कई डरावने प्रकार होते हैं, परन्तु एक कम खतरनाक प्रकार भी है। मैं उस तेरह वर्ष की लड़की के बारे में सोच रहा हूँ जो स्कूल में एक लड़के के प्रति प्रेम में पागल हो जाती है। वह हर समय उसी के बारे में सोचती है। वह अपनी नोटबुक्स में उसका नाम लिखती रहती है। वह लड़का यह भी नहीं जानता होगा कि ऐसी कोई लड़की है, परन्तु उस लड़की ने उनके बच्चों के नाम तक चुन रखे थे।
वह अपना पूरा दिन — कक्षा तक कैसे पहुँचना है, कब शौचालय जाना है — इस तरह तय करती है ताकि उसे अधिक से अधिक बार देख सके। यह लड़की उस लड़के के प्रति प्रेम में पागल है, उसके बारे में सोचना बंद नहीं कर सकती है, उसे देखना ही चाहती है, और महसूस करती है कि उसके बिना जी नहीं सकती है। और इस प्रकार वह उसका पीछा करती है।
परमेश्वर का खोजी
बहुत से लोग अपने जीवन में परमेश्वर को चाहते हैं। अधिकांश लोग परमेश्वर की आशीषें चाहते हैं। किन्तु जो हमें वास्तव में चाहना चाहिए वह स्वयं परमेश्वर है।
परमेश्वर का खोजी वह व्यक्ति है जो परमेश्वर को किसी भी अन्य बात से अधिक चाहता है, जो उसको अधिक से अधिक चाहता है, जो यह समझता है कि परमेश्वर ही उसकी वास्तविक आवश्यकता है, इसलिए वह उसकी ओर दौड़ता है। परमेश्वर का खोजी कोई ऐसा व्यक्ति नहीं है जो “सुपर मसीही” का दर्जा प्राप्त कर चुका हो। परमेश्वर के वचन के अनुसार प्रत्येक मसीही को परमेश्वर का खोजी होना चाहिए। उदाहरण के लिए, “तुम मुझे ढूँढ़ोगे और पाओगे भी; क्योंकि तुम अपने सम्पूर्ण मन से मेरे पास आओगे। मैं तुम्हें मिलूँगा, यहोवा की यह वाणी है” (यिर्म. 29:13-14), और “और तू प्रभु अपने परमेश्वर से अपने सारे मन से, और अपने सारे प्राण से, और अपनी सारी बुद्धि से, और अपनी सारी शक्ति से प्रेम रखना” (मर. 12:30)।
प्रत्येक मसीही को परमेश्वर का खोजी होना चाहिए, और यदि हम नहीं हैं, तो हम कभी वास्तव में यीशु में बने नहीं रहेंगे।
शायद बाइबल में परमेश्वर का खोजी होने का सबसे अच्छा उदाहरण पुराना नियम का एक व्यक्ति है जिसका नाम दाऊद है। वही जिसने गोलियत का सामना किया और बाद में राजा बना। दाऊद परमेश्वर का खोजी था। वह सिद्ध नहीं था। वह हमारे समान ही पाप में गिरता और गलती करता था, परन्तु वह जानता था कि परमेश्वर उसका सबसे बड़ा खजाना है, इसलिए वह फिर उठकर उसकी खोज करता था।
दाऊद द्वारा परमेश्वर के बारे में लिखी गई एक प्रेम कविता को देखें।
“हे परमेश्वर, तू मेरा परमेश्वर है, मैं तुझे यत्न से ढूँढ़ूँगा;
सूखी और निर्जल ऊसर भूमि पर,
मेरा मन तेरा प्यासा है,
मेरा शरीर तेरा अति अभिलाषी है।
इस प्रकार से मैं ने पवित्रस्थान में तुझ पर दृष्टि की,
कि तेरी सामर्थ्य और महिमा को देखूँ।
क्योंकि तेरी करुणा जीवन से भी उत्तम है, मैं तेरी प्रशंसा करूँगा।
इसी प्रकार मैं जीवन भर तुझे धन्य कहता रहूँगा;
और तेरा नाम लेकर अपने हाथ उठाऊँगा।
मेरा जीव मानो चर्बी और चिकने भोजन से तृप्त होगा,
और मैं जयजयकार करके तेरी स्तुति करूँगा।
जब मैं बिछौने पर पड़ा तेरा स्मरण करूँगा,
तब रात के एक एक पहर में तुझ पर ध्यान करूँगा;
क्योंकि तू मेरा सहायक बना है,
इसलिए मैं तेरे पंखों की छाया में जयजयकार करूँगा।
मेरा मन तेरे पीछे पीछे लगा चलता है;
और मुझे तो तू अपने दाहिने हाथ से थाम रखता है।” (भजन. 63:1-8)
क्या आप समझ रहे हैं मैं क्या कह रहा हूँ?
मसीही लोग अक्सर परमेश्वर के साथ मित्रता की बात करते हैं, और यह सत्य है कि परमेश्वर हमें मित्रता प्रदान करता है। किन्तु मेरे पास बहुत से मित्र हैं, और मैं किसी से भी इस प्रकार नहीं कहता! मैंने कभी किसी मित्र से यह नहीं कहा, “मित्र, मैं तुझे यत्न से ढूँढ़ता हूँ; मेरा मन तेरा प्यासा है। क्योंकि तू महिमामय है। वास्तव में, पिछली रात जब मैं बिस्तर पर था और तेरे विषय में सोच रहा था, तो मैंने गाना शुरू कर दिया. . .”
यह मित्रता की भाषा नहीं है; यह खोजी की भाषा है। और यह यहीं समाप्त नहीं होती है। दाऊद ने यह भी लिखा,
हे यहोवा, फुर्ती करके मेरी सुन ले;
क्योंकि मेरे प्राण निकलने ही पर हैं!
मुझ से अपना मुँह न छिपा,
ऐसा न हो कि मैं कबर में पड़े हुओं के समान हो जाऊँ (भजन. 143:7)।
क्या आप समझ रहे हैं कि मैं दाऊद को “परमेश्वर का खोजी” क्यों कहता हूँ? और परमेश्वर ने दाऊद को “मेरे मन के अनुसार व्यक्ति” कहा है” (प्रेरि. 13:22)।
यही मैं अपने लिए और आपके लिए चाहता हूँ।
यहाँ एक सुसमाचार है: परमेश्वर हम से बच नहीं रहा है। वास्तव में, परमेश्वर प्रतिज्ञा करता है कि वह हर समय हमारे साथ रहेगा (उदाहरण के लिए, यूह. 14:16-17 और मत्ती 28:20 को देखें)। इसलिए हमें बाहर जाकर उसकी खोज करने की आवश्यकता नहीं है — हमें बस ध्यान देने की आवश्यकता है। लोगों ने इसे “परमेश्वर की उपस्थिति का अभ्यास करना” कहा है। हम स्मरण करते हैं कि वह हमारे साथ है, हम अपने मन को उस पर स्थिर करते हैं, और हम निरंतर संपर्क में रहने का प्रयास करते हैं। हम बने रहते हैं।
कैसे? मुझे मैक्स लुकेडो की पुस्तक जस्ट लाइक जीसस अर्थात् यीशु के जैसे में दिया गया परामर्श बहुत प्रिय है।5 वह सुझाव देता है कि आप सबसे पहले अपने जागने के समय की सोच परमेश्वर को दें। जब आप सुबह उठें, अपनी आरंभिक सोच उस पर केंद्रित करें। फिर, दूसरा, अपने प्रतीक्षा करने के समय की सोच परमेश्वर को दें। परमेश्वर के साथ मनन का कुछ समय बिताएँ, अपना हृदय उसके सामने रखें, और उसकी वाणी सुनें। तीसरा, अपने फुसफुसाने के समय की सोच परमेश्वर को दें। सारे दिन बार-बार छोटी प्रार्थनाएँ करते रहें। आप वही छोटी प्रार्थना दोहरा सकते हैं: “परमेश्वर, क्या मैं तुझे प्रसन्न कर रहा हूँ?” “क्या मैं तेरी इच्छा में हूँ, प्रभु?” “मैं तुझसे प्रेम करता हूँ और तेरा अनुसरण करना चाहता हूँ, हे यीशु।” और अंत में, अपने सोने से पहले की सोच परमेश्वर को दें। जब आप सोने जा रहे हों, तो परमेश्वर से बातें करें। उसके साथ अपने दिन की समीक्षा करें। अपने दिन का अंत यह कहकर करें कि आप उससे प्रेम करते हैं।
यह कुछ ऐसा है जो आप कर सकते हैं। आप परमेश्वर के मन की खोज कर सकते हैं। आप परमेश्वर के खोजी बन सकते हैं। यदि आप ऐसा करेंगे, तो आप बने रहेंगे।
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चर्चा एवं मनन:
- मत्ती 13:44-46 को पढ़ें। यीशु कहता है कि यदि आपको अपने जीवन में परमेश्वर को पाने के लिए सब कुछ त्यागना पड़े, तो यह आपका सबसे अच्छा लेन-देन होगा। आपने अपने जीवन में परमेश्वर को पाने के लिए क्या त्यागा है? आप क्या त्याग सकते हैं? त्यागने के लिए सबसे कठिन क्या होगा? आप क्यों सोचते हैं कि परमेश्वर के लिए सब कुछ त्यागना उचित है?
- सामान्यतया, हम अपने हृदय से अपने ही शब्दों में प्रार्थना करना चाहते हैं। किन्तु कुछ लोग कभी-कभी किसी और द्वारा लिखी गई प्रार्थना को भी उपयोगी पाते हैं। लोगों ने विशेषकर बाइबल के भजनों के साथ ऐसा किया है। आज भजन संहिता 63:1-8 और/या भजन संहिता 40 को प्रार्थना करें, उनके शब्दों को अपना बनाकर अपने हृदय से उन्हें प्रार्थना करें।
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भाग III: अपना सिर टिका दो
“हर समय और हर प्रकार से आत्मा में प्रार्थना, और विनती करते रहो, और इसी लिए जागते रहो कि सब पवित्र लोगों के लिए लगातार विनती किया करो” (इफि. 6:18)।
एक मसीही वह है जिसने यीशु के मार्गों पर चलने का निश्चय किया है। आप चुनते हैं कि जिस रीति से यीशु ने जीवन जिया, उसी रीति से आप जीवन जिएँ। तो, यीशु ने कैसे जीवन जिया?
जब आप उसके जीवन का अध्ययन करते हैं, तो ऐसा प्रतीत होता है कि उसके लिए अपने स्वर्गीय पिता से जुड़ने से महत्वपूर्ण अधिक कुछ भी नहीं था। रिचर्ड फॉस्टर लिखते हैं, “यीशु के जीवन में सबसे अद्भुत बात उसका पिता के साथ गहरा संबंध है. . . जैसे रजाई में बार-बार आने वाली बुनाई पद्धति, ठीक वैसे ही प्रार्थना उसके जीवन में हर जगह गुंथी हुई है।”
जैसा कि हमने पहले ही बताया है कि, यीशु ने इसे “बने रहना” या “अंदर रहना” कहा है। यीशु ने ऐसा जीवन जिया जिसमें वह अपने पिता से घनिष्ठ और निरंतर संबंध में रहा, मानो उसने अपना जीवन उसी में जिया। यीशु अपने पिता में बना रहा, और वह हमें उसमें बने रहने के लिए आमंत्रित करता है।
यीशु हमें आमंत्रित करता है कि हम ऐसा जीवन नियम बनाएँ जिसमें हम भटकाने वाली बातों को दूर करके मौन में प्रवेश करें, जिससे कि हम परमेश्वर पर ध्यान केंद्रित कर सकें। जिससे कि हम उससे बातें कर सकें और उसे सुन सकें। जिससे कि हम उसके साथ जीवन जी सकें। इसका अर्थ यह नहीं है कि हम अपने जीवन की बाकी बातें जीना छोड़ दें, परन्तु हम बने रहना सीखते हैं। हम प्रार्थना का नियम रखते हैं, जो भटकाने वाली बातों से अलग होकर परमेश्वर के निकट होने की आदत है।
हम यह नियम यीशु में देखते हैं। मैं आपको एक उदाहरण दिखाता हूँ।
हम उसके पृथ्वी पर पहले तीस वर्षों के बारे में बहुत नहीं जानते हैं, परन्तु फिर वह सार्वजनिक मंच पर आता है और घोषणा करता है कि वह कौन है और क्या करने आया है।
फिर यीशु बपतिस्मा लेता है। उसके बपतिस्मा के समय, परमेश्वर स्वर्ग से बोलता है और पुष्टि करता है कि यीशु उसका पुत्र है।
और फिर. . . यीशु बाहर निकलता है और चालीस दिन तक प्रार्थना करता है।
वह जंगल में अकेला चला जाता है, और चालीस दिन तक प्रार्थना करता है। आमतौर पर कोई भी काम आरम्भ करने और उसे सफल बनाने का तरीका यह नहीं होता है कि आप अकेले चले जाएँ। विशेषकर यदि आप एक विश्वव्यापी आंदोलन शुरू करना चाहते हों और आपने पहले तीस वर्ष गुमनामी में बिताए हों। तब आप फिर से छह सप्ताह के लिए गुमनामी में नहीं जाते हैं! किन्तु यीशु ने ऐसा ही किया। उसने प्रार्थना से शुरुआत की। वह एक मौन स्थान पर गया ताकि परमेश्वर की उपस्थिति का अनुभव कर सके और प्रार्थना कर सके। जिससे कि वह अपने पिता के साथ संगति कर सके।
यीशु ने अपने पिता के साथ समय बिताया ताकि वह मानसिक, भावनात्मक और आत्मिक रूप से उस कार्य के लिए तैयार हो सके जो उसे करना था। बिना घुटनों पर झुके आरम्भ करने के लिए बहुत अधिक दाँव पर लगा हुआ था।
फिर वह लौटता है, और मरकुस के पहले अध्याय में हमें उसकी सेवा के पहले दिन का वर्णन मिलता है। वह लोगों को परमेश्वर के बारे में सिखाता है। वह लोगों को चंगा करता है।
फिर वह सुबह उठता है और. . . क्या यह फिर से काम पर लौटना है? नहीं। वह उठता है और “भोर को दिन निकलने से बहुत पहले, वह उठकर निकला, और एक जंगली स्थान में गया और वहाँ प्रार्थना करने लगा” (मर. 1:35)।
स्पष्ट करने के लिए: यीशु डेढ़ महीने तक मौन वाले स्थान में गया, फिर लौटा, एक दिन सेवा की, और फिर सीधे मौन वाले स्थान में चला गया — ताकि वह बना रहे, ताकि वह परमेश्वर की उपस्थिति का अनुभव कर सके और प्रार्थना कर सके, ताकि वह अपने पिता के साथ संगति कर सके। यीशु की सेवा की तीव्रता, पिता के साथ उसकी घनिष्ठता से उत्पन्न हुई।
हम यीशु को बार-बार यही करते हुए देखते हैं। यह उसके जीवन का नियम था। हम कह सकते हैं कि यह यीशु के जीवन का नियम था।
यह एक कार के समान है। यदि आप कारों के बारे में कुछ नहीं जानते हैं और किसी को उसमें पेट्रोल भरते हुए देखें, तो आप सोच सकते हैं कि यह एक बार की बात है। “ओह, इसमें पेट्रोल भर दो और फिर यह चलती रहती है।” किन्तु यदि आप लगातार देखते रहें तो आपको समझ आएगा, “ओह। नहीं। आप पेट्रोल भरते हैं। आप चलाते हैं। आप पेट्रोल भरते हैं। आप चलाते हैं. . . बार-बार पेट्रोल भरने के बिना, यह चल नहीं सकती है।” यदि आप यीशु के जीवन को देखें, तो आप समझेंगे, “ओह। वह थोड़ा जीता था। फिर मौन वाले स्थान को ढूँढ़कर परमेश्वर की उपस्थिति का अनुभव करता था और प्रार्थना करता था; वह भर जाता था। फिर थोड़ा जीता था। फिर मौन वाले स्थान को ढूँढ़कर परमेश्वर की उपस्थिति का अनुभव करता था और प्रार्थना करता था; वह भर जाता था। फिर थोड़ा जीता था। मौन वाले स्थान को ढूँढ़कर परमेश्वर की उपस्थिति का अनुभव करता था, प्रार्थना करता था और भर जाता था।”
यह उसका नियम था। और यही उसके अनुयायियों का नियम होना चाहिए।
वास्तव में, हम प्रेरितों के काम की पुस्तक में देखते हैं कि यीशु के मूल अनुयायियों ने उसका उदाहरण अपनाया। प्रेरितों के काम 2:42: “और वे. . . प्रार्थना करने में लौलीन रहे।” प्रेरितों के काम में, विश्वासियों ने इन बातों के लिए प्रार्थना की — निर्णय लेने में मार्गदर्शन के लिए (1:15-26), अविश्वासियों के साथ यीशु को साझा करने के साहस के लिए (4:23-31), अपने दैनिक जीवन और सेवकाई के नियमित भाग के रूप में (2:42-47; 3:1; 6:4), जब वे सताए गए (7:55-60), जब उन्हें किसी आश्चर्यकर्म की आवश्यकता हुई (9:36-43), जब कोई संकट में था (12:1-11), सेवा के लिए लोगों को भेजने से पहले (13:1-3, 16:25 और आगे), एक-दूसरे के लिए (20:36, 21:5), और परमेश्वर की आशीष के लिए (27:35)। उन्होंने प्रार्थना की, और परमेश्वर ने उनके मध्य में अपनी उपस्थिति और सामर्थ्य प्रकट की।
प्रार्थना उनके “जीवन के नियम” का भाग थी। उन्होंने परमेश्वर की खोज की, और प्रार्थना ने उन्हें उसमें जीवन जीने दिया।
प्रार्थना है
प्रचारक और लेखक ब्रेनन मैनिंग अक्सर एक महिला की कहानी सुनाया करते थे, जिसने उनसे अपने पिता से मिलने का निवेदन किया, जो मृत्यु-शैय्या पर थे। मैनिंग सहमत हुए और तुरंत वहाँ पहुँचे।
उस बेटी ने मैनिंग को भीतर आने दिया और बताया कि उसके पिता अपने शयनकक्ष में हैं। जब मैनिंग अंदर गए तो उन्होंने बिस्तर के पास एक खाली कुर्सी देखी। उन्होंने कहा, “मुझे लग रहा है कि आप मेरी प्रतीक्षा कर रहे थे।”
बिस्तर पर पड़े व्यक्ति ने कहा, “नहीं, आप कौन हैं?” मैनिंग ने बताया कि उनकी बेटी ने उन्हें आमंत्रित किया है ताकि वह परमेश्वर के बारे में उनसे बात करें।
उस व्यक्ति ने सिर हिलाया और कहा, “मेरे पास आपसे एक प्रश्न है।” उसने बताया कि वह हमेशा से परमेश्वर और यीशु पर विश्वास करता था, परन्तु कभी नहीं जान पाया कि कैसे प्रार्थना करनी है। एक बार उसने कलीसिया में एक उपदेशक से पूछा, जिसने उसे पढ़ने के लिए एक पुस्तक दी। पहले ही पन्ने पर दो-तीन शब्द ऐसे थे जो वह नहीं जानता था। उसने कुछ पन्नों के बाद पढ़ना छोड़ दिया और प्रार्थना करना बंद कर दिया।
कुछ वर्ष बाद वह काम पर अपने मसीही मित्र जोए से बात कर रहा था। उसने जोए से बताया कि वह प्रार्थना करना नहीं जानता है। जोए कुछ उलझन में दिखा। उसने कहा, “क्या आप मज़ाक कर रहे हैं? देखें, आप ऐसा करें। एक खाली कुर्सी लें, उसे अपने पास रखें। कल्पना करें कि यीशु उस कुर्सी पर बैठे हैं और उनसे बातें करें। उन्हें बताएँ कि आप उनके बारे में कैसा महसूस करते हैं, अपने जीवन के बारे में बताएँ, अपनी आवश्यकताओं के बारे में बताएँ।”
उस व्यक्ति ने बिस्तर के पास उस खाली कुर्सी की ओर इशारा किया और कहा, “मैं यह वर्षों से करता चला आ रहा हूँ। क्या यह गलत है?”
“नहीं।” मैनिंग मुस्कुराए। “यह बहुत अच्छा है। आप ऐसा ही करते रहें।”
दोनों ने थोड़ी देर और बातें कीं, और फिर मैनिंग चले गए।
लगभग एक सप्ताह बाद उस व्यक्ति की बेटी ने उन्हें फोन किया। उसने बताया, “मैं आपको यह बताना चाहती थी कि कल मेरे पिता का देहांत हो गया। उनसे मिलने के लिए आपका एक बार फिर से धन्यवाद; उन्हें आपसे बातें करके बहुत आनंद आया।”
मैनिंग ने कहा, “मुझे आशा है कि उनकी मृत्यु शांति से हुई।”
“खैर, यह कुछ अलग था,” बेटी ने कहा। “मुझे कल दुकान जाना पड़ा, इसलिए मैंने निकलने से पहले अपने पिताजी के कमरे में जाकर उन्हें देखा। वे ठीक थे। उन्होंने एक मज़ाक किया, और मैं निकल गई। जब मैं लौटी, तो वे नहीं रहे। किन्तु यहाँ अजीब बात यह है — मरने से ठीक पहले, वे बिस्तर से रेंगकर नीचे उतरे, और उन्होंने अपना सिर उस खाली कुर्सी पर रखकर प्राण त्यागे।”
संबंध प्रेम पर आधारित होते हैं और संवाद पर टिके होते हैं। यदि हमें परमेश्वर के साथ वास्तविक संबंध रखना है, यदि हमें बने रहना है, तो यह प्रेम पर आधारित होगा और वार्तालाप अर्थात् संवाद पर निर्भर करेगा।
प्रार्थना परमेश्वर से संवाद है। किन्तु यह उससे भी अधिक है। प्रार्थना प्रेम है। परमेश्वर हमसे प्रेम करता है, और उसका यह प्रेम हमसे प्रतिक्रिया चाहता है। प्रार्थना दाँत भींचकर किसी “अनुशासन” में भाग लेने से नहीं आती है — प्रार्थना प्रेम में पड़ने से आती है। प्रार्थना परमेश्वर के साथ साझा की गई घनिष्ठता है। प्रार्थना अपने प्रेमी पिता पर अपना सिर टिकाना है। यह यीशु में बने रहना है।
एक ओर, प्रार्थना बहुत ही सरल है। आपको भारी-भरकम शब्दों वाली पुस्तक पढ़ने की आवश्यकता नहीं है; आपको बस एक खाली कुर्सी खींचनी है। आपको ढेर सारे सेमिनारों की आवश्यकता नहीं; आपको बस एक खुला हृदय चाहिए।
दूसरी ओर, कुछ मायनों में प्रार्थना एक अप्राकृतिक कार्य है। यह परमेश्वर से बातें करना है, परन्तु हम उस से बातें करने के अभ्यस्त नहीं हैं जिसे हम देख नहीं सकते हैं। यह परमेश्वर को सुनना है, परन्तु हम उस को सुनने के अभ्यस्त नहीं हैं जिसे हम स्पष्ट रूप से सुन नहीं सकते हैं। मैं प्रार्थना को उससे अधिक जटिल नहीं बनाना चाहता हूँ जो यह है, परन्तु यदि आप प्रार्थना में नए हैं या प्रार्थना के मामले में संघर्ष करते हैं, तो प्रार्थना कुछ उलझन से भरी हुई लग सकती है। तो मैं आपको कुछ विचार बताता हूँ जिन्होंने मेरे प्रार्थना जीवन को सहायता दी।
प्रार्थना में बढ़ना
प्रार्थना केवल हमारे दिन का एक हिस्सा नहीं है — यह वह वायु होनी चाहिए जिसे हम साँस लेते हैं। बाइबल कहती है, “निरन्तर प्रार्थना में लगे रहो” (1 थिस्स. 5:17) और “हर समय. . . प्रार्थना करते रहो” (इफि. 6:18)। प्रार्थना हमारा जीवन परमेश्वर के साथ साझा करना है, अपने विचारों और क्षणों को परमेश्वर के साथ साझा करना है, इसलिए यह कुछ ऐसा है जो हम हर समय कर सकते हैं और करना चाहिए।
फिर भी, हमें प्रतिदिन प्रार्थना के लिए विशेष समय अलग रखना चाहिए। क्यों? क्योंकि परमेश्वर पर अपना ध्यान स्थिर करना हमें दिन भर उस पर ध्यान केंद्रित करने में सहायता करेगा। क्योंकि हम उस विशेष मनन के समय में दिन की भाग-दौड़ की तुलना में अधिक गहराई में जा पाएँगे। यह विवाह के समान है। मेरी पत्नी और मैं शायद पूरा दिन एक साथ बिताएँ और हज़ार बातें कर लें, परन्तु जब तक हम अन्य काम छोड़कर बैठकर एक-दूसरे को नहीं देखते हैं, तो हम कोई गहरी बात नहीं करेंगे।
अब, आपको यह प्रार्थना समय कब करना चाहिए? खैर, यह आपके दिन का सबसे महत्वपूर्ण भाग है, इसलिए आपको इसे अपने दिन का सबसे अच्छा समय देना चाहिए। क्या आप सुबह जल्दी उठने वाले व्यक्ति हैं? तो जब आप सुबह उठें, तो परमेश्वर के साथ समय बिताएँ। या क्या आपका मस्तिष्क बारह कप कॉफी पीने के बाद ही चलना शुरू करता है? तो शायद दोपहर का समय आपके लिए बेहतर होगा। कुछ लोग दिन के अंतिम हिस्से को परमेश्वर पर प्रार्थना में केंद्रित करना पसंद करते हैं।
और आप उस समय में रचनात्मक हो सकते हैं। कभी-कभी मैं अपनी प्रार्थनाएँ सोचता हूँ। अन्य समय मैं ऊँची आवाज़ में बातें करता हूँ। अधिकतर मैं अपनी प्रार्थनाएँ डायरी में लिखता हूँ। मैंने प्रार्थना भ्रमण भी किए हैं। और मैं यह भी करता रहा हूँ कि आराधना के गीत बजाकर परमेश्वर के साथ समय बिताया है, उसके लिए गाते हुए। सबसे महत्वपूर्ण प्रेम है — कि हम वास्तव में परमेश्वर से जुड़ें।
प्रयोग करें और देखें कि कौन-सी बात आपको वास्तव में परमेश्वर से जुड़ने में सहायता करती है।
और यदि इनमें से कोई भी तरीका काम न करे, तो आप हमेशा एक खाली कुर्सी खींच सकते हैं।
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चर्चा एवं मनन:
- मत्ती 6:5-13 पढ़ें। यीशु हमें प्रार्थना का एक नमूना या रूपरेखा देता है, न कि वही शब्द जो हमें बोलने चाहिए। हमारे शब्द रटे-रटाए नहीं होने चाहिए, बल्कि हमारे हृदय से आने चाहिए। यीशु की नमूना प्रार्थना को फिर से पढ़ें। वह किस प्रकार की बातों के बारे में कह रहा है कि हमें प्रार्थना करनी चाहिए?
- मत्ती 6:7-13 में दी गई यीशु की नमूना प्रार्थना को अपनी प्रार्थना के लिए रूपरेखा के रूप में उपयोग करें। एक विचार (जैसे “हे पिता, तेरा नाम पवित्र माना जाए”) प्रार्थनापूर्वक पढ़ें और फिर कुछ समय लें ताकि आप अपने ही शब्दों में उसी विचार के बारे में प्रार्थना कर सकें।
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भाग IV: जीवन भर के लिए भोजन
“समय के विचार से तो तुम्हें गुरु हो जाना चाहिए था, तौभी यह आवश्यक हो गया है कि कोई तुम्हें परमेश्वर के वचनों की आदि शिक्षा फिर से सिखाए। तुम तो ऐसे हो गए हो कि तुम्हें अन्न के बदले अब तक दूध ही चाहिए” (इब्रा. 5:12)।
जब मेरे मन में यह विचार आया था, तब मैंने कभी यह नहीं सोचा था कि एक मजबूत नेवी सील अर्थात् अत्याधिक प्रशिक्षित और विशिष्ट विशेष सैन्य बल से कोई व्यक्ति मेरी गोद में बैठेगा, पर ऐसा ही हुआ। और आप जानते हैं लोग क्या कहते हैं: “जब जीवन आपको एक नेवी सील दे, तो उसे एक छोटे बच्चे के समान खिलाओ।”6
लगभग हर कलीसिया में कुछ लोग होते हैं जो शिकायत करते हैं, “मुझे इस कलीसिया में आत्मिक भोजन नहीं मिल रहा है।” मेरा एक मित्र इस पर उत्तर देता है, “केवल दो प्रकार के लोग हैं जो स्वयं को भोजन नहीं खिला सकते हैं — मूर्ख और शिशु। आप इनमें से कौन हैं?” यह उत्तर थोड़ा कठोर है, परन्तु उसका कहना उचित है। बच्चे जल्दी सीख लेते हैं कि स्वयं को भोजन कैसे कराना है, और मसीही लोगों को भी आत्मिक भोजन करना सीख लेना चाहिए।
यही बात मैं उन नेवी सील के लोगों को दिखाना चाहता था। मैं एक उपदेश दे रहा था और एक शिशु को गोद में लेकर उसे खिला रहा था। सभी ने, “ओह, कितना प्यारा है” जैसी प्रतिक्रिया दी, और कहा, “हमारे पास्टर की गोद में यह बच्चा कितना सुंदर लग रहा है।” मैंने शिशु को उसकी माता को लौटा दिया और फिर इस बात पर संदेश शुरू किया कि प्रतिदिन बाइबल पढ़ना कितना महत्वपूर्ण है। मैंने सबको बताया, “किसी व्यक्ति को मछली दो, तो उसे एक दिन का भोजन मिलेगा। किसी को मछली पकड़ना सिखाओ, तो उसे जीवन भर का भोजन मिलेगा।” मैंने संदेश का अंत यह दिखाने की कोशिश से किया कि जब लोग आत्मिक शिशु नहीं रहे हैं तब भी लोग दूसरों पर निर्भर रहते हैं कि वे उन्हें भोजन दें, तो यह कितना गलत है। मैंने एक स्वयंसेवक को बुलाया और एक मिस्टर नेवी सील ने हाथ उठा दिया। वर्जीनिया बीच में जिस कलीसिया में मैं पास्टर था, वहाँ बहुत से सील सैनिक थे, परन्तु मैंने कभी नहीं सोचा था कि उनमें से कोई स्वयंसेवक के रूप में काम करेगा। वह आगे आया, और मैंने उससे कहा कि वह मेरी गोद में बैठे। मेरे पास शिशुओं का भोजन था, और मैंने उससे पूछा कि क्या मैं उसे खिला सकता हूँ। और तब सभी ने “ओह, यह कितना अजीब है” जैसी प्रतिक्रिया दी, और कहा, “यह बलिष्ठ पुरुष हमारे पास्टर की गोद में कितना अजीब लग रहा है।”
क्या यह इतना महत्वपूर्ण है?
क्या वास्तव में बाइबल को स्वयं पढ़ना इतना महत्वपूर्ण है? हाँ, यह है।
यदि आप प्रति सप्ताह कलीसिया जाते हैं, तो क्या उपदेश सुन लेना पर्याप्त बाइबल है? नहीं, यह पर्याप्त नहीं है। यदि आप बने रहना चाहते हैं, तो केवल यही पर्याप्त नहीं है।
यह अत्यंत आवश्यक है कि हम बाइबल पढ़ें, उसका अध्ययन करें, उसे जानें और अपने जीवन में लागू करें। क्यों?
– सबसे पहले, क्योंकि हम परमेश्वर से प्रेम करते हैं और उसके प्रेम का और अधिक अनुभव करना चाहते हैं। बाइबल उस पत्र के समान है जो परमेश्वर ने हमें लिखा है। क्या आप सोच सकते हैं कि आपको किसी से प्रेम पत्र मिले और आप उसे कभी खोलें ही नहीं? बाइबल कहती है कि परमेश्वर प्रेम है, और जब हम पढ़ते हैं कि उसने हमें क्या लिखा है, तब हम उसके प्रेम में बढ़ते हैं।
– बाइबल हमें जीवन में मार्गदर्शन भी देती है। खोया हुआ महसूस करना या दिशा खो देना बहुत आसान है। परमेश्वर ने हमें बाइबल में बुद्धि दी है जो हमें आवश्यक दिशा प्रदान करती है।
– यह भी महत्वपूर्ण है कि हम नियमित रूप से बाइबल पढ़ें क्योंकि यह हमें जानने में सहायता करती है कि क्या सत्य है और क्या नहीं है।
– बाइबल का अध्ययन करने का एक और कारण यह है कि यह आत्मिक परिपक्वता की कुंजी है। यदि आप परमेश्वर के वचन का गहराई से अध्ययन नहीं करेंगे, तो आप अपनी आत्मिक वृद्धि को रोक देंगे।
यह अत्यंत महत्वपूर्ण है, परन्तु शोध बताता है कि एक-तिहाई मसीही कभी बाइबल नहीं पढ़ते हैं, और एक-तिहाई केवल एक से तीन बार प्रति सप्ताह पढ़ते हैं। किन्तु जो लोग कम से कम सप्ताह में चार बार बाइबल पढ़ते हैं, वे वास्तव में आत्मिक रूप से बढ़ते हैं। वर्षों के शोध के बाद सेंटर फॉर बाइबल एंगेजमेंट का यही निष्कर्ष है। उदाहरण के लिए, जो व्यक्ति सप्ताह में कम से कम चार बार बाइबल पढ़ता है, वह:
– 228% अधिक संभावना रखता है कि दूसरों के साथ अपना विश्वास साझा करेगा।
– 231% अधिक संभावना रखता है कि दूसरों को शिष्य बनाएगा।
– 407% अधिक संभावना रखता है कि वचनों को कंठस्थ करेगा।
– 59% कम संभावना रखता है कि अश्लील सामग्री देखे।
– 68% कम संभावना रखता है कि विवाह के बाहर यौन संबंध रखे।
– 30% कम संभावना रखता है कि अकेलेपन से जूझे।7
मैं क्या करूँ?
बाइबल एक बड़ी पुस्तक है। आप कहाँ से आरम्भ करते हैं, और इसे कैसे पढ़ते हैं?
मैंने हमेशा पूरी-की-पूरी पुस्तकों को पढ़ना पसंद किया है। कुछ लोग इधर-उधर से पढ़ते हैं, परन्तु जब आप बाइबल की किसी पुस्तक को पूरी पढ़ते हैं, तो आपको जो आप पढ़ रहे हैं उसका पूरा संदर्भ मिलता है। आप समझ पाते हैं कि इसे किसने लिखा है, किसको लिखा है, और किन मुद्दों को संबोधित किया गया है।
मैं यह भी सुझाव देता हूँ कि पुराने नियम से पहले नए नियम को पढ़ें। पुराना नियम कालक्रम में पहले आता है, परन्तु इसे समझना अधिक कठिन है क्योंकि यह हमसे अधिक दूर के समय का वर्णन करता है। जब हम नए नियम को जानते हैं, तो यह हमें पुराने नियम को समझने में सहायता करता है। और नया नियम वही है जहाँ हम यीशु से मिलते हैं, और यह सब कुछ यीशु के बारे में है।
पढ़ने से पहले, मैं परमेश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि वह अपने वचन के माध्यम से मुझ से बात करे। मैं चाहता हूँ कि मैं बाइबल को एक विनम्र आत्मा के साथ पढूँ और उससे जितना अधिक संभव हो सीख सकूँ।
जब मैं पढ़ता हूँ, तो मैं तीन प्रश्न पूछता हूँ।
पहला, क्या कहा गया? मेरी समस्या यह है कि मैं अक्सर जल्दी में रहता हूँ और बाइबल का एक अध्याय पढ़ सकता हूँ, और फिर मुझे यह भी याद नहीं रहता है कि मैंने क्या पढ़ा है। किन्तु बाइबल इतनी महत्वपूर्ण है कि मैं इसे सतही रूप से नहीं पढ़ सकता हूँ। इसलिए मैं स्वयं को धीमा करता हूँ और “क्या कहा?” जैसे प्रश्न पूछता हूँ, जैसे “बाइबल ने क्या कहा?” “मैंने परमेश्वर के बारे में क्या सीखा?” “मैंने अपने बारे में क्या सीखा?”
दूसरा, तो क्या? कल्पना करें कि किसी ने वही बाइबल का गद्यांश पढ़ा जो आपने पढ़ा और फिर आपसे पूछा, “तो क्या? इसका आज के जीवन से क्या संबंध है?” आप क्या उत्तर देंगे? इस गद्यांश में जीवन का क्या सिद्धांत है?
कभी यह आसान होता है। आप एक पद पढ़ते हैं जिसमें लिखा है, “दूसरों का न्याय न करो।” इसका आज के लिए क्या अर्थ है? इसका अर्थ है कि न्याय न करो। अन्य समय यह इतना आसान नहीं होता है। उदाहरण के लिए, बाइबल में एक पद है जो कहता है कि मूर्तियों पर चढ़ाए गए माँस को न खाओ (प्रेरि. 15:20 देखें)। मुझे नहीं लगता है कि मेरे किराने की दुकान में ऐसा माँस बिकता है, तो क्या मैं इस पद को छोड़ सकता हूँ? वास्तव में, नहीं। संदर्भ को देखकर और थोड़ा अध्ययन करके, आप जानेंगे कि मसीहियत के आरंभिक दिनों में दो समूहों के बीच विवाद था। एक समूह को दूसरे धर्म के देवता को चढ़ाए गए माँस को खरीदना और खाना कोई बड़ी बात नहीं लगती थी। दूसरे समूह को लगता था कि ऐसा करना उस अन्य धर्म में भाग लेने के बराबर है। यह मुद्दा कलीसिया के अगुवों के पास लाया गया, जिन्होंने अंततः निर्णय दिया। उन्होंने मूल रूप से कहा कि मूर्तियों पर चढ़ाया गया माँस उस चीज़ बर्गर में डाले गए माँस से अलग नहीं है। क्यों? क्योंकि मूर्तियाँ वास्तविक नहीं हैं; वे केवल झूठे देवताओं का प्रतिनिधित्व करती हैं। इसलिए, उस माँस को खाने से परमेश्वर अप्रसन्न नहीं होता है। किन्तु यह कुछ लोगों को ठेस पहुँचाता है। ऐसा माँस खाकर आप उनकी आत्मिक यात्रा में बाधा डाल रहे हैं। इसलिए इसे मत खाओ। दूसरों की सहायता करने के लिए अपनी स्वतंत्रता का त्याग करने के लिए तैयार रहो (1 कुरि 8:4-9 देखें)।
तो, क्या “मूर्तियों पर चढ़ाए गए माँस न खाने” में कोई सिद्धांत है? बिल्कुल। और यह मुझे अंतिम प्रश्न की ओर ले जाता है जो मैं बाइबल पढ़ते समय पूछता हूँ।
तीसरा, अब क्या? यह सार्वभौमिक पाठ से आगे बढ़कर आपके व्यक्तिगत अनुप्रयोग तक पहुँचता है। आपने जो पढ़ा, उसके आधार पर आपके जीवन में क्या परिवर्तन होना चाहिए? उस पद के साथ जिसमें मूर्तियों पर चढ़ाए माँस को न खाने की बात है, मान लीजिए कि आपको लगता है कि भोजन के साथ एक गिलास शराब लेना आपके लिए ठीक है, परन्तु आप एक ऐसे मित्र के साथ भोजन कर रहे हैं जो शराब की लत से उबर रहा है। यह पद कहेगा कि आप शराब न पिएँ क्योंकि इससे वह ठोकर खा सकता है। या मान लीजिए आपके पास एक खुला-सा वस्त्र है जिसे आप आँगन में धूप सेंकते समय पहनना पसंद करती हैं। किन्तु आप बहुत से लड़कों के साथ एक पूल पार्टी में जा रही हैं। यह पद कहेगा कि आप वह वस्त्र न पहनें ताकि आप पर अनावश्यक ध्यान न आकर्षित हो। “अब क्या?” का प्रश्न हमें यह लागू करने में सहायता करता है कि हमने क्या पढ़ा है, क्योंकि बाइबल को लागू करके परमेश्वर की आज्ञा का पालन करना परमेश्वर से प्रेम करने की कुंजी है (यूह. 14:15 देखें) और उसकी आशीष पाने की कुंजी है (याकू. 1:25 देखें)।
यदि आपके पास बाइबल है, तो आप स्वयं को आत्मिक भोजन करा सकते हैं, और यदि आप ऐसा करेंगे तो आपका जीवन बदल जाएगा।
या. . . मैं आपको मंच पर बुलाकर आपके मुँह में शिशु-भोजन का चम्मच ठूँस सकता हूँ, परन्तु मुझ पर विश्वास करें, आपको वह पसंद नहीं आएगा।
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चर्चा एवं मनन:
- याकूब 1:22-25 पढ़ें।
- क्या कहा? यह गद्यांश क्या कहता है, यह केवल बाइबल को पढ़ने के बारे में नहीं है, बल्कि उसे अपने जीवन में लागू करने के बारे में क्या कहता है?
- तो क्या? आपको क्यों लगता है कि बाइबल को लागू करना वास्तव में परमेश्वर के लिए जीने में इतना आवश्यक है?
- अब क्या? क्या चीज़ आपको “अब क्या?” देखने और उसे अपने जीवन में लागू करने में अधिक स्थिर होने में सहायता कर सकती है?
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भाग V: जहाँ आपका हृदय है
“अपने लिए पृथ्वी पर धन इकट्ठा न करो, जहाँ कीड़ा और काई बिगाड़ते हैं, और जहाँ चोर सेंध लगाते और चुराते हैं। परन्तु अपने लिए स्वर्ग में धन इकट्ठा करो, जहाँ न तो कीड़ा और न काई बिगाड़ते हैं, और जहाँ चोर न सेंध लगाते और न चुराते हैं। क्योंकि जहाँ तेरा धन है वहाँ तेरा मन भी लगा रहेगा” (मत्ती 6:19-21)।
बच्चे होने के बाद, मेरी पत्नी और मैं अब क्रिसमस पर एक-दूसरे को उपहार नहीं देते हैं। मैं बहुत कंजूस हो गया हूँ। किन्तु बच्चे होने से पहले, हम क्रिसमस पर एक-दूसरे पर सौ डॉलर तक खर्च करते थे। एक बार जेन ने मुझसे कहा कि वह एक डायमंड टेनिस ब्रैसलेट चाहती है। मैं स्टोर गया और सेल्समैन ने मुझे सौ डॉलर में डायमंड टेनिस ब्रेसलेट दिखाया। मैंने उसे देखा और पूछा, “क्या तुम निश्चित हो कि ये डायमंड हैं? यह तो अधिकतर. . . चकमक के टुकड़ों जैसा दिखता है।”
मैंने वह खरीदा और क्रिसमस की सुबह जेनिफर को दे दिया। उसने खुशी से कहा, “मुझे तो यही चाहिए था, एक चमकदार टेनिस ब्रेसलेट!”
कुछ दिनों बाद उसका लॉकेट टूट गया। मुझे हैरानी नहीं हुई। मैंने उसे ठीक करवाने के लिए वापस ले गया। उससे एक दिन पहले, जेन की दादी ने हम में से हर एक को सौ डॉलर दिया था। यह उनका वार्षिक उपहार था, और वह अकेला पैसा था जो हम दोनों के पास हर साल अपने लिए इधर-उधर खर्च करने के लिए होता था। लॉकेट ठीक होने का इंतज़ार करते हुए, मैंने 200 डॉलर वाले टेनिस ब्रेसलेट देखे। उनमें असली डायमंड थे!
कुछ घंटों बाद मैं जेन को उसका टेनिस ब्रैसलेट सौंपा। वह उसे देखकर बोली, “रुको? क्या चकमक बढ़ गया?”
मैं मुस्कुराया, “असल में, मैंने तुम्हारे लिए एक बेहतर वाला लिया है।”
वह उलझन में पड़ी, “तुमने पैसे कहाँ से लिए? रुको, तुमने मेरी दादी के पैसे का इस्तेमाल किया, है ना? क्यों? ऐसा करने का क्या कारण था? ”
मैंने उसे सच्चाई बताई। “प्रेम ने मुझे यह करने पर मजबूर किया।”
कई प्रकार के कारण
मैं चाहता हूँ कि आप दान के बारे में सोचें। जैसे कि कलीसिया के माध्यम से. . . परमेश्वर को. . . पैसे देना। लोग दान के बारे में सुनना पसंद नहीं करते हैं, परन्तु परमेश्वर इसके बारे में. . . बहुत बात करता है। वास्तव में, नीचे देखें कि ये महत्वपूर्ण शब्द बाइबल में कितनी बार आते हैं:
विश्वास: 272 बार।
प्रार्थना: 374 बार।
प्रेम: 714 बार।
देना: 2,162 बार।8
और यह शब्द देना है। बाइबल में आप अक्सर दशमांश शब्द देखेंगे। दशमांश शब्द का अर्थ है “दसवाँ हिस्सा”; दशमांश देने का अर्थ है कि आप जो कुछ भी लाते हैं उसका पहला दसवाँ हिस्सा परमेश्वर को देना। आपको भेंट शब्द भी दिखाई देगा। भेंट का अर्थ है कि आप परमेश्वर को दस प्रतिशत से अधिक जो भी देते हैं।
हमें उदारता से परमेश्वर को देना चाहिए, और ऐसा करने के अनेक कारण हैं। उदाहरण के लिए:
यह परमेश्वर का धन है, हमारा नहीं। हम इसे अपना धन समझते हैं, परन्तु परमेश्वर कहता है कि यह उसका है।9 हमारे पास पैसा होने का एकमात्र कारण यह है कि उसने हमें कमाने की क्षमता दी है। अतः वास्तव में, हम परमेश्वर को कुछ हमारा पैसा नहीं दे रहे; परमेश्वर हमें अपना अधिकांश धन रखने देता है, और हम उसे उसका थोड़ा-सा वापस देते हैं।
परमेश्वर ने हमें उसका धन वापस देने की आज्ञा दी है। सम्पूर्ण पुराना नियम में वह लोगों से कहता है कि वे उसे दस प्रतिशत दें।10 नए नियम में उसने अपने पुत्र यीशु को भेजा ताकि वह हमारे लिए जिये और मरे11 और फिर हमें उदारतापूर्वक देने का आज्ञा देता है।12 पहले से ही लोगों के पास परमेश्वर को उदारता से देने के बहुत कारण थे, परन्तु अब हमारे पास और भी बड़ा कारण है।
परमेश्वर आपको देने के लिए आशीष देगा।13 यदि मेरे पास परमेश्वर की आशीष और मेरे धन का कोई हिस्सा चुनने का विकल्प हो, तो मैं हर दिन परमेश्वर की आशीष चुनूँगा!
देना मेरे विश्वास को बढ़ाता है। यह मुझे स्वयं पर कम और परमेश्वर पर अधिक भरोसा करना सिखाता है। आरम्भ में कम आय पर जीने का निर्णय लेना भयावह होता है, परन्तु यह केवल विश्वास को ही नहीं दिखाता, बल्कि जब आप देखते हैं कि परमेश्वर आपकी व्यवस्था करता है तो आपका विश्वास बढ़ता है।
देना मुझे अपनी नश्वरता का सामना करने में सहायता करता है। केवल इस जीवन और इस संसार की चीज़ों के लिए जीना बहुत आसान है, परन्तु हमें अनंतकाल के लिए जीवित रहना है। और केवल वही चीज़ें जो हमेशा रहती हैं, सच में महत्वपूर्ण हैं। जब मैं देता हूँ, मैं यह स्वीकार कर रहा हूँ कि मेरे अस्थायी जीवन से अधिक महत्वपूर्ण कुछ है और मैं अपना धन ऐसी बात में निवेश कर रहा हूँ जिसका प्रभाव मेरी पृथ्वी पर की आयु से आगे चलेगा।
देना मेरी प्राथमिकताओं को स्थापित करने में सहायता करता है। परमेश्वर ने प्राचीन इस्राएल से कहा कि वे उसे पहला दसवाँ हिस्सा दें।14 हमारा बचा हुआ हिस्सा नहीं, बल्कि वह पहला चेक जो हम लिखते हैं। जब हम ऐसा करते हैं, तो यह स्पष्ट करता है कि परमेश्वर हमारे जीवन में सबसे महत्वपूर्ण है।
परमेश्वर को देना मुझे अपने धन के साथ अनंतकालीन प्रभाव करने देता है। मेरे पास अपने धन खर्च करने के बहुत विकल्प हैं। अधिकांश जिन चीज़ों पर मैं खर्च करता हूँ वे अंततः शौचालय या कूड़ेदान में जाकर खत्म हो जाती हैं। जो मैं परमेश्वर को कलीसिया के माध्यम से देता हूँ, वह उसके मिशन की ओर जाता है — उसके खोए हुए बच्चों को उसके पास, स्वर्ग की अनन्तता की ओर लाने के काम में उपयोग होता है। मैं अपना पैसा इसी पर खर्च करना चाहता हूँ!
प्रेम के कारण
उदारतापूर्वक परमेश्वर को देने के अनेक कारण हैं, परन्तु अभी मैं आपका ध्यान एक ऐसे कारण पर केंद्रित करना चाहता हूँ जो मैंने अभी तक नहीं बताया: प्रेम। देना मेरे प्रेम को परमेश्वर के प्रति अभिव्यक्त करता है, यह मुझे परमेश्वर के प्रेम का अनुभव कराता है, और यह परमेश्वर के प्रति मेरे प्रेम को बढ़ाता है।
यह आपको अजीब लग सकता है, परन्तु यह सीधे यीशु से आया है।
वह कहता है, “जिस के पास मेरी आज्ञाएँ हैं और वह उन्हें मानता है, वही मुझ से प्रेम रखता है; और जो मुझ से प्रेम रखता है उससे मेरा पिता प्रेम रखेगा, और मैं उससे प्रेम रखूँगा और अपने आप को उस पर प्रगट करूँगा” (यूह. 14:21)। हमें अपने धन के मामले में परमेश्वर के प्रति उदार होने की आज्ञा दी गई है। जो यीशु से प्रेम रखते हैं वे उस आज्ञा को “स्वीकार” और “पालन” करेंगे। और क्योंकि वे परमेश्वर को इस प्रकार प्रेम करते हैं, परमेश्वर का प्रेम उनके लिए प्रकट होगा। जो लोग ऐसा करते हैं वे परमेश्वर के प्रेम का अनुभव करते हैं।
यीशु यह भी कहता है, “क्योंकि जहाँ तेरा धन है वहाँ तेरा मन भी लगा रहेगा” (मत्ती 6:21)। दूसरे शब्दों में, आप अपना धन उसी में लगाते हैं जिसकी आपको परवाह है, और आप उस चीज़ की परवाह करते हैं जिसमें आपने धन लगाया है।
क्या यह सत्य नहीं है कि आप अपना धन उसी में लगाते हैं जिसकी आप परवाह करते हैं? असल में, मैं आपकी चेकबुक और क्रेडिट कार्ड स्टेटमेंट देखकर आपके बारे में बहुत कुछ जान सकता हूँ।
और क्या यह भी सत्य नहीं है कि जब आप किसी चीज़ में धन लगाते हैं तो आप उसके बारे में अधिक परवाह करने लगते हैं? जैसे यदि आपकी एक पुरानी जर्जर-सी कार है, तो आप उसकी परवाह नहीं करते हैं। यदि आप अपने मित्र को लेने जाते हैं जिसके पास कुछ खाने के लिए है और वह पूछता है, “क्या मैं आपकी कार में ये फ्राइज़ खा सकता हूँ?” तो आप हँसकर कहेंगे, “आप चम्मच से मकरोनी भी खा सकते हैं, मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता है।” किन्तु यदि आप बाहर जाकर एक नई कार पर गंभीर पैसा खर्च करते हैं, तो आप अपने मित्र से कहेंगे, “नहीं, तुम मेरी कार में नहीं खा सकते! सचमुच, मैं नहीं चाहता हूँ कि तुम मेरी कार में साँस तक लो!” जब आपका धन परमेश्वर की ओर जाता है, तो आप उसके बारे में और अधिक परवाह करने लगते हैं।
इसका विपरीत भी सत्य है। यदि हम अपने धन के इतने पीछे पड़े हों कि हम उसे देने को तैयार न हों, तो हम परमेश्वर से जुड़ने और बढ़ने का एक महत्वपूर्ण अवसर खो देते हैं। दरअसल, यह हमें परमेश्वर से विपरीत दिशा में ले जाता है। यीशु कहता है, “कोई दास दो स्वामियों की सेवा नहीं कर सकता: क्योंकि वह तो एक से बैर और दूसरे से प्रेम रखेगा; या एक से मिला रहेगा और दूसरे को तुच्छ जानेगा। तुम परमेश्वर और धन दोनों की सेवा नहीं कर सकते” (लूका 16:13)। बाइबल तो यह भी कहती है कि धन का प्रेम हमें हमारे विश्वास से दूर खींच सकता है: “क्योंकि रुपये का लोभ सब प्रकार की बुराइयों की जड़ है, जिसे प्राप्त करने का प्रयत्न करते हुए बहुतों ने विश्वास से भटककर अपने आप को नाना प्रकार के दु:खों से छलनी बना लिया है” (1 तीमु. 6:10)।
यीशु ने कहा, “क्योंकि जहाँ तेरा धन है, वहाँ तेरा हृदय भी होगा,” और मुझे नहीं लगता कि इसे इस तरह कहना गलत होगा: “क्योंकि जहाँ तुम अपना धन रखते हो, वहीं तुम बने रहोगे।”
परमेश्वर को उदारतापूर्वक दो। यह निकालने का प्रयास मत करो कि उसे देने के लिए न्यूनतम आप कितना दे सकते हो; यह देखो कि आप उसे कितना अधिक दे सकते हो। आप बहुत खुश हो जाओगे कि आपने ऐसा किया। दूसरे लोग आपको पागल समझ सकते हैं, परन्तु जब वे आपको अजीब नज़र से देखें और पूछें कि क्यों, तो बस मुस्कुराओ और कहो, “प्रेम ने मुझे ऐसा करने पर मजबूर किया।”
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चर्चा एवं मनन:
- 2 कुरिन्थियों 9:1-15 पढ़ें। आप इस गद्यांश से दान के बारे में क्या सीखते हैं? कुछ समय निकालकर दान देने की एक योजना बनाएँ। आप परमेश्वर को कितना देंगे? उदारता क्या है? आप अपना दान कब और कैसे बढ़ाएँगे?
- धन अक्सर हमारी आराधना में परमेश्वर के साथ सबसे बड़ी प्रतिस्पर्धा करता है, और लोग अक्सर परमेश्वर को देने के लिए धन को ही सबसे आखिर में देते हैं। अपने धन के बारे में प्रार्थना करने के लिए कुछ समय निकालें। परमेश्वर से प्रार्थना करें कि वह आपको बताए कि आपके हृदय में धन के मामले में आपको कहाँ परिवर्तन करने की आवश्यकता है। उससे प्रार्थना करें कि वह आपकी सहायता करे ताकि आप धन और उससे खरीदी जाने वाली चीज़ों की तुलना में उसे अधिक प्राथमिकता दें।
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निष्कर्ष
आप चिंता से ऊपर, शांति, धैर्य और जोश के साथ, बिना किसी परेशानी के, बल्कि भरे, न कि खाली, बल्कि मार्गदर्शन प्राप्त, न कि भ्रमित, बल्कि उद्देश्यपूर्ण, न कि ऊब महसूस करते हुए जीने के लिए बनाए गए थे।
यदि आप वह जीवन नहीं जी रहे हैं, तो समस्या यह है कि आप बने नहीं रह रहे हैं।
बने रहना आपके संघर्षों का समाधान है। यह वही जीवन है जिसे आप जीने के लिए बने थे।
आपका वह जीवन जीना और वही बनना जिसके लिए आप बने थे, इससे अधिक महत्वपूर्ण कुछ भी नहीं है। यही आपको इस जीवन में वास्तविक जीवन देगा और वही आप अनन्तकाल में लेकर जाएँगे।
यीशु आपको बेहतर में आने के लिए आमंत्रित कर रहा है। वह आपको अपने भीतर आमंत्रित कर रहा है। यह अब तक का दिया गया सबसे आश्चर्यजनक आमंत्रण है। हाँ कहें। आज यीशु में बने रहने का चुनाव करें, और फिर जीवन के हर अगले दिन उसे फिर से चुनें।
अन्तिम टिप्पणियाँ
- https://biblegeeks.fm/podcast/daily-43
- http://news.bbc.co.uk/2/hi/entertainment/6224725.stm
- मेरे लिए सबसे अजीब बात यह है कि एक पूर्व बीटल ने फ्रोजन पिज्जा खरीदा या खाया।
- http://www.cbsnews.com/news/kournikova-stalker-given-warning/
- मैक्स लुकेडो, जस्ट लाइक जीसस, (नैशविल: वर्ड पब्लिशिंग, 1998), 70–73.
- हो सकता है मैंने यह बात खुद ही बना ली हो।
- https://bttbfiles.com/web/docs/cbe/Scientific_Evidence_for_the_Power_ of_4.pdf
- ये संख्याएँ एक अनुवाद से दूसरे अनुवाद में थोड़ी भिन्न हो सकती हैं, परन्तु आप मुख्य बात समझ
गए होंगे। - उदाहरण के लिए, भजन. 24:1 और 1 कुरि. 4:2 को देखें।
- उदाहरण के लिए, लैव्य. 27:30 को देखें।
- वैसे, यीशु ने दशमांश की पुष्टि की है। लूका 11:42 और मत्ती 23:23 को देखें।
- 2 कुरि. 9 इसका एक उदाहरण है।
- उदाहरण के लिए, व्यव. 12:6-7; मला. 3:10-12; और 2 कुरि. 9:6 को देखें।
- उदाहरण के लिए, नीति. 3:9 और व्यव. 18:4 को देखें।
लेखक के बारे में
विन्स ऐन्टोनुची विरजीनिया बीच, विरजीनिया में स्थित फोरफ्रन्ट कलीसिया के संस्थापक पास्टर हैं, तथा सिन सिटी के मध्य में, वेगास हवाई अड्डे के निकट स्थित वर्व कलीसिया (vivalaverve.org),के भी। विन्स, आई बिकेम ए क्रिश्चियन एण्ड ऑल आई गॉट वाज़ दिस लाउज़ी टी-शर्ट (Became a Christian and All I Got Was This Lousy T-Shirt), गुरिल्ला लवर्स (Guerrilla Lovers), रेनेगेड (Renegade), गॉड फॉर द रेस्ट ऑफ अस (God For The Rest Of Us), और रेस्टोर (Restore) पुस्तकों के लेखक हैं। वे एक सह-लेखक के रूप में भी कार्य करते हैं, लेखकों को विवश करने वाली सामग्री लिखने में सहायता करते हैं, जिससे उनके पाठक प्रोत्साहित होते हैं। वे अपने घनिष्ठ मित्रों — उनकी पत्नी जेनिफर और बच्चों डॉसन और मरिस्सा के साथ समय बिताना बहुत पसंद करते हैं।
विषयसूची
- भाग I: गर्भ में
- चर्चा एवं मनन:
- भाग II: परमेश्वर के खोजी
- परमेश्वर का खोजी
- चर्चा एवं मनन:
- भाग III: अपना सिर टिका दो
- प्रार्थना है
- प्रार्थना में बढ़ना
- चर्चा एवं मनन:
- भाग IV: जीवन भर के लिए भोजन
- क्या यह इतना महत्वपूर्ण है?
- मैं क्या करूँ?
- चर्चा एवं मनन:
- भाग V: जहाँ आपका हृदय है
- कई प्रकार के कारण
- प्रेम के कारण
- चर्चा एवं मनन:
- निष्कर्ष
- अन्तिम टिप्पणियाँ
- लेखक के बारे में