#21 मनुष्य का भय: यह क्या है और इस पर विजय कैसे पाएँ
परिचय
बहुत कम चीजें ऐसी होती हैं जो ओलंपिक खेलों के उत्साह के समान सम्पूर्ण संसार का ध्यान आकर्षित करती हैं। संसार भर के खिलाड़ी अपने शरीर को अनुशासित करते हुए उत्तम स्वास्थ्य बनाए रखते हैं और पूरी क्षमता के साथ प्रतिस्पर्धा में भाग लेते हैं ताकि अपने प्रतिद्वंद्वियों को पराजित कर सकें और ओलंपिक स्वर्ण पदक जीतकर मिलने वाली प्रशंसा, सम्मान और गौरव अर्जित कर सकें — अर्थात् वह प्रतीक जो उस समय उन्हें संसार का सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी घोषित करता है।
सम्भवतः आपने स्वर्ण पदक विजेता एरिक लिडेल के विषय में सुना होगा, जो स्कॉटिश धावक थे और जिन्हें फिल्म ‘चैरियट्स ऑफ फायर’ में दिखाया गया है। एरिक का जन्म चीन में एक सुसमाचार प्रचार-प्रसार करने वाले परिवार में हुआ था और परमेश्वर के अनुग्रह से वह 1900 के दशक के आरम्भ में बॉक्सर विद्रोह से बच गये थे। बचपन में ही एरिक को पता चल गया था कि दौड़ने के प्रति उनके भीतर असाधारण प्रेम और प्रतिभा है। उन्होंने कई वर्षों तक अपने शरीर को प्रशिक्षित किया और अंततः 1924 के पेरिस ओलंपिक खेलों में अपना स्थान बना लिया। परन्तु जब उनकी 100 मीटर दौड़ को रविवार को आयोजित करने की घोषणा की गई, तो उन्होंने उस प्रतियोगिता से अपना नाम वापस ले लिया। एरिक के सामने केवल दो ही विकल्प थे: या तो सब्त के विषय में अपने विश्वास से समझौता करे या दौड़ में अपना स्थान छोड़ दे।
एरिक को समूह के साथियों, देशवासियों और स्थानीय तथा अंतर्राष्ट्रीय समाचार पत्रों से आलोचना भी मिली। यहाँ तक कि उनके भावी राजा, वेल्स के राजकुमार ने भी सार्वजनिक रूप से उसे दौड़ में भाग लेने के लिए आग्रह किया। परन्तु एरिक टस से मस नहीं हुए। भारी दबाव और मीडिया के आक्रमणों के होते हुए भी एरिक ने मनुष्य के भय के सामने झुकने के विपरीत परमेश्वर का सम्मान किया।
सम्भवतः उसकी प्रसिद्धि या अद्भुत प्रतिभा के कारण, ओलंपिक समिति ने अंततः उसे एक विकल्प दिया। यह कि वह 400 मीटर की दौड़ में भाग ले सकते थे, एक ऐसी दौड़ जिसके लिए उसे केवल कुछ ही सप्ताह का प्रशिक्षण लेना था, परन्तु यह दौड़ रविवार को आयोजित नहीं हो रही थी। परन्तु सभी को अत्यधिक चकित करते हुए, वह सफल रहे और अन्तिम प्रतिस्पर्धा तक पहुँच गया। पदक दौड़ की सुबह जब वह होटल से बाहर निकला तो समूह के प्रशिक्षक ने उसे एक छोटी कागज की पर्ची दी, जिस पर लिखा था “जो परमेश्वर का आदर करता है, परमेश्वर भी उसका आदर करता है।” उन्होंने न केवल स्वर्ण पदक जीता, वरन् एक नया ओलंपिक रिकॉर्ड भी बनाया — जो 47.6 सेकंड में बनाया गया था। फिल्म चैरियट्स ऑफ फायर में लिडेल निम्नलिखित वाक्य कहता है, “परमेश्वर ने मुझे तेज बनाया है, और जब मैं दौड़ता हूँ तो मुझे उसके आनन्द का अनुभव होता है।”
जीवन भर हम सभी को एरिक लिडेल जैसे क्षणों का सामना करना पड़ेगा। हर किसी को ऐसे समय का सामना करना पड़ता है जब हम मनुष्य के भय के आगे घुटने टेक देते हैं और अपने ईश्वर विज्ञान के विश्वास से समझौता करने के लिए परीक्षा में पड़ जाते हैं। मनुष्य का भय एक दमघोंटू और अपंग करने वाला दबाव हो सकता है, जो हमें पापपूर्ण पराजय के बन्दीगृह में डाल देता है और जीवन के प्रति हमारे प्रेम को समाप्त कर देता है। मनुष्य का भय इस विश्वास से उत्पन्न होता है कि किसी प्रकार कोई व्यक्ति या लोगों का समूह हमें वह वस्तु दे सकता है जिसकी हमें आवश्यकता है या जिसे हम चाहते हैं, जिसे परमेश्वर या तो नहीं दे सकता है या देगा नहीं। मनुष्य का भय एक झूठ पर विश्वास करने के समान है और इसके परिणाम स्वरूप हम सृष्टि की आराधना करते हैं, सृष्टिकर्ता की नहीं। धर्मनिरपेक्ष पुस्तकें मनुष्य के भय से उत्पन्न होने वाले रक्तस्राव की मनोदशा स्वयं की सहायता करने से रोकने का प्रयास करती हैं, परन्तु कोई लाभ नहीं होता है। मनुष्य के भय को जीतने का एकमात्र साधन विरोधाभासी रूप से समर्पण करना है — अर्थात् उस एक के प्रति समर्पण करना, जिसने पहले ही विजय प्राप्त कर ली है।
यह क्षेत्रीय मार्गदर्शिका आपको मनुष्य के भय को पहचानने और उससे लड़ने में सहायता करने के लिए तैयार की गई है, तथा यीशु मसीह के प्रभुत्व के प्रति सम्पूर्ण समर्पण के द्वारा आपके जीवन में आनन्द को समृद्ध करने के लिए तैयार की गई है। पहले दो भाग पापपूर्ण और भक्ति के साथ भय के बीच के अन्तर की जाँच करने के लिए बाइबल आधारित दृष्टिकोण का प्रयोग करते हैं। पहले भाग में, आप अपने भय का विश्लेषण करेंगे। और दूसरे भाग में, आप उस भय की जाँच करेंगे जो भय को दूर करता है। तीसरे और अन्तिम भाग में आप जानेंगे कि कैसे मसीह के प्रति आपका समर्पण और एकता आपको मनुष्य के भय पर विजय पाने में योग्य बनाती है।
ऑडियो मार्गदर्शिका
ऑडियो#21 मनुष्य का भय: यह क्या है और इस पर विजय कैसे पाएँ
1 मनुष्य का भय
कैम्ब्रिज शब्दकोश भय को एक “अप्रिय भावना या विचार” के रूप में परिभाषित करता है, जो आपके मन में तब आता है जब आप किसी खतरनाक, दर्दनाक या बुरी घटना से भयभीत या चिन्तित होते हैं जो घटित हो रही है या हो सकती है।” ध्यान दें कि इस परिभाषा में, भय या तो एक भावना (एक अनुभूति) या एक विचार (एक विश्वास) है। परन्तु मेरा तर्क यह है कि अधिकाँश भय न तो सही होते हैं और न ही सरलता से उन्हें वर्गीकृत किए जा सकता है, वरन् वे जटिल होते हैं। विभिन्न स्तरों पर प्रत्येक भय इस बात से प्रभावित होता है कि हम क्या सोचते और क्या विश्वास करते हैं।
मुझे स्मरण है, एक दिन जब मैं काम से घर लौटा और गैराज का दरवाज़ा खोला तो देखा कि मेरी दो वर्ष की बेटी रसोई की मेज़ पर खड़ी है और भोजन कक्ष के झूमर को पकड़कर उससे झूलने का प्रयास कर रही है। तुरन्त ही मेरी आँखें फैल गईं और मेरा हृदय तेज़ी से धड़कने लगा जब मैं दौड़कर उसे पकड़ने के लिए पहुँचा, तो इससे पहले कि वह या तो झूमर को अपने ऊपर गिरा लेती या मेज़ से नीचे गिर जाती। परन्तु मैं इस बात से आश्चर्यचकित था कि उस समय उसे बिल्कुल भी डर नहीं लग रहा था। उसके पास यह समझने की कोई सोच ही नहीं थी कि झूमर से लटकने का प्रयास दर्द, चोट और विनाश का कारण बन सकता है। परन्तु मुझे इसका पता था! मेरे मन ने तुरन्त ही खतरे का अनुमान लगा लिया, और उसकी सुरक्षा के लिए मेरे भय ने मुझे शीघ्रता से उसे बचाने की कार्यवाही करने के लिए प्रेरित किया।
मैंने भी इसी भय की अनुभूति का अनुभव किया था — अर्थात् भावना और विश्वास का मिला-जुला अनुभव — जब मैं पहली बार एक उत्तम किस्म के विमान से कूद रहा था। मुझे अब भी वह अनुभव स्मरण है कि जैसे ही SC.7 स्काईवैन विमान का पिछ्ला हिस्सा नीचे हुआ तो हवा का तेज झोंका विमान के अन्दर और बाहर टकराया। मैं खड़ा था और मेरे पैर काँप रहे थे, और मैं 1,500 फीट नीचे पृथ्वी की ओर घूर रहा था। यह बिना किसी अवरोध के उस अस्पष्ट तेज़ी जैसा अनुभव नहीं था, जहाँ कम से कम अनुभव का आनन्द लेने के लिए आपके पास पैराशूट खोलने से पहले एक या दो मिनट का समय होता है। दूसरे विश्व युद्ध की शैली में यह स्थिर रेखा पैराशूटिंग थी — अर्थात् यदि पैराशूट नहीं खुलता, तो मेरा शरीर 12 सेकंड से भी कम समय में भूमि से टकरा जाता। निश्चित रूप से मुझे डर लग रहा था। परन्तु मुझे जोखिम से भी अधिक किसी और बात का डर था। बिजली की तारों से करंट लगने से मृत्यु के भय से अधिक (जैसा कि सुरक्षा विवरण में चेतावनी दी गई थी), मुझे कार्यक्रम में असफल होने तथा अपने परिवार, मित्रों और समूह के साथियों को निराश करने का भय था। मनुष्य का भय निश्चित रूप से जटिल एवं बहुस्तरीय होता है।
जब हम मनुष्य के भय के विषय में सोचते हैं, तो यह स्मरण रखना महत्वपूर्ण होता है कि हम जो शारीरिक संवेदनाएँ अनुभव करते हैं, जैसे घुटनों का काँपना और हृदय की धड़कन का तेज होना, वे मूलतः हमारे विश्वास से जुड़ी होती हैं। परन्तु भय अधिकाँश केवल एक भावना के रूप में नहीं रह पाता है। भय का स्वाभाविक परिणाम कार्यवाही करना होता है। सामान्यतः इस कार्यवाही को “लड़ाई या भागने” के रूप में जाना जाता है। किसी भी स्थिति में, हमारी कार्यवाही इस बात से प्रभावित होती है कि हम उस स्थिति में सम्भावित परिणामों के विषय में क्या विश्वास करते हैं।
इस प्रकार, मनुष्य का भय उस भावना के रूप में परिभाषित किया जा सकता है जो इस विश्वास से उत्पन्न होती है कि कोई व्यक्ति या किसी समूह के पास वह शक्ति है कि वह आपको वह दे सकता है या छीन सकता है जो आप सोचते हैं कि आपको चाहिए या जो आप चाहते हैं, और यह भावना अनुकूल परिणाम पाने के लिए की जाने वाली कार्यवाहियों को प्रभावित करती है।
दूसरे शब्दों में, एडवर्ड वेल्च कहते हैं कि “मनुष्य का डर तब उत्पन्न होता है जब लोग बड़े और परमेश्वर छोटा लगने लगता है।”1
पवित्रशास्त्र और जीवन के अनुभव हमें सिखाते हैं कि मनुष्य के प्रति हमारा भय अधिकाँश पाँच अलग-अलग श्रेणियों में होता है। मैं उन्हें स्मरण रखने में सहायता करने के लिए भय के संक्षिप्त नाम के लिए ध.ल.त.अ.प. का उपयोग करूँगा: (ध) धन, (ल) लज्जा, (त) तर्क, (अ) अस्वीकृति, और (प) पीड़ा। प्रत्येक श्रेणी में, हम उस विशेष भय से सम्बन्धित बाइबल आधारित शिक्षाओं और उदाहरणों का सामना करेंगे और हमें अपने भय पर विचार करने की चुनौती दी जाएगी। पढ़ते समय, पवित्रशास्त्र में किए गए वर्णनों और उदाहरणों पर विचार करें, फिर अपनी स्थिति और जीवन के अनुभवों के विषय में सोचें कि वे भय से सम्बन्धित आपके विश्वास के विषय में क्या प्रकट कर सकते हैं।
धन का भय
प्रेरित पौलुस ने लिखा कि, “रुपये का लोभ सब प्रकार की बुराइयों की जड़ है” (1 तीमुथियुस 6:10)। हम उन लोगों से बहुत अधिक डर सकते हैं जिनके विषय में हम सोचते हैं कि वे हमारी वित्तीय सुरक्षा पर नियंत्रण रखते हैं। इन लोगों से हमारा भय हमारे कार्य प्रदर्शन को सकारात्मक रूप से प्रेरित कर सकता है, और साथ ही यह हमें काम के प्रति प्रोत्साहित भी कर सकता है और किसी वरिष्ठ को प्रसन्न करने के लिए अपनी सच्चाई से समझौता करने के लिए परीक्षा में भी डाल सकता है। इसके अतिरिक्त हम उन लोगों को आदर्श मानने लगते हैं जिनके विषय में हम सोचते हैं कि वे हमारी वित्तीय सुरक्षा पर नियंत्रण रखते हैं या जिनके पास वह वित्तीय स्वतंत्रता होती है जिसकी इच्छा हमें भी है। इस प्रकार के भय में इस बात का भय कम हो जाता है कि लोग क्या ले लेंगे, वरन् इस बात का भय अधिक होता है कि लोगों के पास क्या है। चाहे वह व्यक्ति हमारा तत्कालीन अधिकारी हो, कोई संगठन हो, निवेशक हो, या प्रभावशाली सगा- सम्बन्धी हो, यह सरल है कि हम अपनी कार्यवाही को इस विश्वास के अनुसार ढालना आरम्भ करें कि हमारे धन सम्बन्धी भविष्य को सबसे अच्छे ढँग से कौन आगे बढ़ाएगा या सुरक्षित रखेगा।
परमेश्वर जानता है कि हम अपने धन के विषय को लेकर भय, चिन्ता और मानसिक तनाव के साथ संघर्ष करेंगे। इसीलिए यीशु ने इसे पहाड़ी उपदेश में कुछ इस प्रकार से सम्बोधित किया, “इसलिए तुम चिन्ता करके यह न कहना, कि हम क्या खाएँगे, या क्या पीएँगे, या क्या पहनेंगे? क्योंकि अन्यजाति इन सब वस्तुओं की खोज में रहते हैं, और तुम्हारा स्वर्गीय पिता जानता है, कि तुम्हें ये सब वस्तुएँ चाहिए।इसलिए पहले तुम परमेश्वर के राज्य और धार्मिकता की खोज करो तो ये सब वस्तुएँ तुम्हें मिल जाएँगी।” (मत्ती 6:31-33) जब हम परमेश्वर की प्रदान करने वाली सामर्थ्य को देखना बन्द कर देते हैं, तो सबसे पहले हमारा ध्यान उन लोगों पर जाता है जो वह प्रदान कर सकते हैं जिसकी हमें अत्यंत आवश्यकता है या जिसकी हम इच्छा रखते हैं।
मनुष्य के प्रति इस प्रकार का भय हमें दूसरों के पास जो कुछ है, उसके प्रति लालच और लालसा की ओर ले जा सकता है। लूका 12:13–21 में, यीशु का सामना एक ऐसे व्यक्ति से होता है जो चाहता है कि यीशु उसके परिवारिक विवाद में हस्तक्षेप करे और उसके भाई को उसकी सम्पत्ति उसके साथ बाँटने की आज्ञा दे। यीशु ने उत्तर दिया “क्योंकि किसी का जीवन उसकी सम्पत्ति की बहुतायत से नहीं होता।” (लूका 12:15 आयत का दूसरा भाग) यीशु आगे एक ऐसे व्यक्ति की कहानी सुनाता है जिसकी इतनी उपज हुई कि उसके खलिहान लबालब भर गए। अपनी उपज को बाँटने के विपरीत, वह अपनी सारी उपज को रखने के लिए बड़े-बड़े खलिहान बनवाता है ताकि उसके पास कई वर्षों तक अन्न रहे और वह आराम कर सके, खा-पी सके और मौज-मस्ती कर सके—अर्थात् एक अमेरिकी शैली की सेवानिवृत्ति के समान (लूका 12:16-19)। परन्तु परमेश्वर ने इस मनुष्य को मूर्ख कहा, क्योंकि उसी रात उसका प्राण उससे ले लिया गया, और जो कुछ उसने सम्भाल कर रखा है, वह दूसरे का हो जाएगा (लूका 12:20-21)।
आर्थिक सुरक्षा उस प्रकार की स्वतंत्रता नहीं दे सकती है जिस प्रकार से हमारे हृदय उसकी लालसा करते हैं। इसके विपरीत, यह उपलब्धि एक ऐसी बाधा के रूप में कार्य कर सकती है जो परमेश्वर पर निर्भर होने और भरोसा रखने के के स्थान पर सांसारिक सम्पत्ति पर भरोसा रखती है। जब वह धनी युवक यीशु के पास आया, तो उसने पूछा कि अनन्त जीवन पाने के लिए मैं क्या करूँ (मत्ती 19:16)। यीशु ने उसे यह कहकर उत्तर दिया कि तू आज्ञाओं को माना कर, जिस पर उस युवक ने गर्व से उत्तर दिया कि वह तो बचपन से ही इनका पालन करता आया है (मत्ती 19:17-20)। परन्तु यीशु ने उससे कहा, जाकर अपना सब कुछ बेचकर कंगालों को दे दे, और मेरे पीछे हो ले (मत्ती 19:21)। यह सुनकर वह युवक दुःखी होकर चला गया। यीशु ने उसे बताया कि उसने अपना सच्चा भरोसा किस पर रखा था: क्या अपने धन पर रखा था। हमारी आर्थिक सुरक्षा का भय हमें भौतिक सम्पत्तियों में डूबो सकता है — अर्थात् दूसरों के पास जो है उसकी लालसा करने में — और यही भय परमेश्वर की अद्भुत आशीषों को खो देने का कारण बन जाता है, वह आशीष जो हमारे सामने रखी हुई है।
लज्जित होने का भय
हम बचपन से ही लज्जित होने का भय सीख जाते हैं। चाहे लाक्षणिक रूप से हो या वास्तविक रूप से, हर किसी के पास ऐसी कहानी होती है जब वह दूसरों की हँसी या उपहास का कारण बना हो, जैसे पैंट उतर जाने पर पकड़े जाना। लज्जा हमें अकेला, असहाय, असुरक्षित और महत्वहीन होने का अनुभव कराती है। लज्जा के अपने अनुभवों के आधार पर हम महत्वपूर्ण अवरोध और सुरक्षा उपाय विकसित कर सकते हैं ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि हमें फिर से उन्हीं भावनाओं का अनुभव न करने पड़े। मनुष्य का भय हमें कायरता की ओर ले जा सकता है, कठोर रक्षात्मक भाषा का उपयोग करने के लिए विवश कर सकता है, हमें स्वयं को अलग-थलग कर सकता है, या हमें उन लोगों को प्रसन्न करने के लिए अपनी सच्चाई/ खराई से समझौता करने के लिए प्रेरित कर सकता है, जिन्हें हम अपने सामाजिक परिपेक्ष में शक्तिशाली मानते हैं।
लज्जित होने का भय अधिकाँश इस बात से आरम्भ होता है कि हमारे समाज में क्या स्वीकार किया जाता है और क्या अस्वीकार किया जाता है। प्रथम शताब्दी में, जब मरियम और यूसुफ की सगाई हुई, तो विवाह से पूर्व मरियम का गर्भवती होना अत्यंत लज्जाजनक बात थी। यही कारण है कि जब यूसुफ को उसकी गर्भावस्था के विषय में पता चला तो उसने चुपचाप उसे त्याग देने का विचार किया (मत्ती 1:19)। यूसुफ विश्वासघात के आरोपों से नहीं जुड़ना चाहता था, परन्तु वह यह भी सुनिश्चित करना चाहता था कि वह मरियम को चुपचाप त्याग दे ताकि मरियम को सार्वजनिक रूप से लज्जित न होना पड़े। इसी कारण प्रभु के स्वर्गदूत ने उससे कहा है कि: “मरियम को अपनी पत्नी बनाने से मत डर” (मत्ती 1:20)। परमेश्वर की आज्ञाकारिता में, मरियम और यूसुफ दोनों ने यह निर्णय लिया कि वे मंगेतर ही बने रहेंगे जबकि मरियम यीशु को गर्भ में धारण किए हुई थी, ऐसा करके उन्होंने अपने ऊपर गम्भीर सामाजिक बहिष्कार होने का जोखिम उठाया।
जब हम लज्जा के भय के आगे झुक जाते हैं, तो हम उन सभी को भ्रष्ट कर देते हैं जिनकी हम अगुवाई करते हैं। पौलुस ने गलातियों 2:11-14 में पतरस के साथ अपने टकराव का वर्णन किया। अन्ताकिया में रहते हुए, पतरस अन्यजातियों के मध्य सेवकाई करता था और उनके साथ खाता-पीता था, यह एक ऐसी प्रथा थी जो पहली सदी के यहूदियों के लिए लज्जाजनक बात थी। जब याकूब की ओर से कुछ यहूदी आए, तो पतरस “खतना किए हुए लोगों के डर के मारे” पीछे हट गया (गलातियों 2:12)। पतरस के भय के परिणामस्वरूप, अन्य यहूदी विश्वासियों ने भी ऐसा ही किया, जिनमें बरनबास भी सम्मिलित था (गलातियों 2:13)। हमें यह पता होना चाहिए कि हमारा भय हमारे आस-पास के लोगों को भी गहराई से प्रभावित करता है — अर्थात् अधिकतर वे लोग प्रभावित होते हैं जो हमारे सबसे निकट होते हैं।
कुछ लज्जाजनक बात कहने या करने का भय न केवल हमें आज्ञा उल्लंघन और पाप की ओर ले जा सकता है, वरन् हमें महत्वपूर्ण आनन्द से भी वंचित कर सकता है। हम अधिकाँश अपने विश्वास को साझा करने या लोगों को सुसमाचार में विश्वास करने के लिए बुलाने में असफल हो जाते हैं क्योंकि हमें भय रहता है कि लोग हमारे विषय में क्या सोचेंगे या क्या कहेंगे। परन्तु इसके परिणामों के विषय में सोचिए। हम अपने मित्रों और परिवार के अनन्तकाल के विनाश का जोखिम उठाने को तैयार रहते हैं, विपरीत इसके कि उन्हें अप्रसन्न करने की लज्जा का सामना करें। परन्तु ऐसे समय में हम परमेश्वर के दृष्टिकोण और आज्ञाओं की अपेक्षा लोगों के दृष्टिकोण को देख रहे होते हैं।
तर्क-वितर्क का भय
कुछ लोगों के लिए, सम्बन्धों में तर्क-वितर्क, असहमति और टकराव का विचार अत्यधिक चिन्ता उत्पन्न करता है। जो लोग सम्बन्धों में टकराव से डरते हैं, वे दूसरों के साथ संघर्ष करने से बचने, उन्हें शान्त कराने या अनदेखा करने का प्रयास करते हैं। परिवार के सदस्यों, पड़ोसियों, कलीसिया के सदस्यों या कार्य सम्बन्धों के साथ संघर्ष इन लोगों के विचारों, समय और ध्यान को नष्ट कर सकता है। और यदि उनकी अस्वीकार करने की योजना समस्या को छिपाने में सफल नहीं होती है, तो जो लोग तर्क-वितर्क करने से डरते हैं, वे समस्या का समाधान करने के विपरीत सम्भवतः सम्बन्ध ही समाप्त कर देते हैं। इस भय का संकट यह है कि यह परमेश्वर की आज्ञाओं से समझौता करने, गलती से पाप करने, और बचाव करने में आत्मिक पतन की ओर ले जाता है।
इस्राएल के लोगों के तर्क के डर के मारे शाऊल ने परमेश्वर की आज्ञा से समझौता कर लिया और अंततः परमेश्वर ने उसे राजा के रूप में अस्वीकार कर दिया। 1 शमूएल 15 में, शाऊल को समस्त अमालेकियों को नष्ट करने की आज्ञा दी गई थी, जिसमें सभी लोग और पशु सम्मिलित थे (1 शमूएल 15:3)। इस आज्ञा का महत्व किसी अन्य समय के लिए है; परन्तु विषय यह है कि जब शाऊल ने आमालेकियों को पराजित करने के लिए लोगों की अगुवाई की, तो उन्होंने राजा आगाग और अच्छ-अच्छे पशुओं और अच्छी वस्तुओं को छोड़ दिया (1 शमूएल 15:9)। जब शमूएल ने शाऊल से पूछा कि उसने परमेश्वर के वचन की आज्ञा का उल्लंघन क्यों किया, तो शाऊल ने उत्तर दिया, “मैंने पाप किया है; मैंने तो अपनी प्रजा के लोगों का भय मानकर और उनकी बात सुनकर यहोवा की आज्ञा और तेरी बातों का उल्लंघन किया है” (1 शमूएल 15:24)। शाऊल नहीं चाहता था कि उन लोगों से किसी प्रकार का तर्क-वितर्क या उपद्रव का सामना करना पड़े जो अपनी जीत से लूट की इच्छा रखते थे। परमेश्वर की आज्ञा का पूरी रीति से पालन करने के विपरीत उसने बहुत कम आज्ञापालन किया, और यहाँ तक कि अपनी कम आज्ञाकारिता के पीछे छिपने का प्रयास भी किया (1 शमूएल 15:20-21)। तर्क-वितर्क और टकराव के भय से हम परमेश्वर की आज्ञाओं के प्रति अपनी आज्ञाकारिता से समझौता कर सकते हैं।
जब हम किसी तर्क- वितर्क या कठिन टकरावपूर्ण वार्तालाप में पड़ने से डरते हैं तो हम सरलता से गलती से पाप में फँस सकते हैं — अर्थात् वह कार्य नहीं करते हैं जिसे परमेश्वर ने हमें करने की आज्ञा दी है। इसके विपरीत, जानबूझकर किया गया पाप वह होता है जिसमें हम सक्रिय रूप से वह कार्य करते हैं जिसे करने के लिए परमेश्वर ने मना किया है। यीशु ने आज्ञा दी कि, “यदि तेरा भाई तेरे विरुद्ध अपराध करे, तो जा और अकेले में बातचीत करके उसे समझा; यदि वह तेरी सुने तो तूने अपने भाई को पा लिया” (मत्ती 18:15)। यह आज्ञा सरल है। यदि आपके विरुद्ध कोई अपराध किया गया है, तो यह आपका उत्तरदायित्व कि आप अपने भाई का सामना करें और उसे उसकी गलती बताएँ। कुछ लोगों के लिए पाप के सम्बन्ध में किसी से भिड़ने के विषय में सोचना भी — जहाँ कोई तर्क-वितर्क या असहमति उत्पन्न हो सकती है — भयानक होता है। परन्तु इस टकराव को अनदेखा करना केवल पाप करने वाले भाई के प्रति प्रेम नहीं होगा, वरन् यह गलती से पाप करने के समान होगा — अर्थात् यीशु की आज्ञा का उल्लंघन करना होगा। पौलुस ने कुरिन्थियों की कलीसिया के सामने इस बात को उस समय दोहराया जब उसने पाप की गम्भीरता पर बल दिया (1 कुरि. 5:9-13)। पौलुस लिखता है कि, “क्या तुम भीतरवालों का न्याय नहीं करते?परन्तु बाहरवालों का न्याय परमेश्वर करता है: इसलिए उस कुकर्मी को अपने बीच में से निकाल दो” (1 कुरिन्थियों 5:12 आयत का दूसरा भाग-13)। ऐसी असुविधा जनक बातचीत का भय, जिसे हम जानते हैं कि यह तर्क को भड़का सकता है, हमें सरलता से गलती के द्वारा पाप करने की ओर ले जा सकता है।
यद्यपि तर्क-वितर्क से डरने के और भी परिणाम हैं, जिन्हें हम यहाँ सूचीबद्ध कर सकते हैं, परन्तु एक अन्य परिणाम औपचारिक या मौखिक बचाव में आत्मिक कमी का होना है। पतरस उन बिखरे हुए लोगों को लिखा, “पर मसीह को प्रभु जानकर अपने-अपने मन में पवित्र समझो, और जो कोई तुम से तुम्हारी आशा के विषय में कुछ पूछे, तो उसे उत्तर देने के लिये सर्वदा तैयार रहो, पर नम्रता और भय के साथ” (1 पतरस 3:15) पतरस मसीहीयों के द्वारा झेली जा रही गहरी पीड़ाओं का उत्तर दे रहा है — यह एक अलग प्रकार का भय है, जिस पर हम शीघ्र ही चर्चा करेंगे। फिर भी, पीड़ा सहते हुए भी, पतरस उस क्षेत्र में बिखरे हुए मसीहियों से निवेदन करता है कि वे सदैव मसीह में अपने विश्वास की रक्षा करने के लिए तैयार रहें। जब हम तर्क-वितर्क, टकराव या असहमति से डरते हैं, तो हमारा स्वाभाविक झुकाव अपने विश्वास की रक्षा करने से बचने का ही होता है। मनुष्य के भय के आगे झुकने से हमारी आत्मिक उन्नति रुक सकती है और तब हम अपने भीतर की आशा की रक्षा करने के लिए तैयार नहीं हो पाते हैं।
अस्वीकार किए जाने का भय
यदि लज्जा का भय मुख्यतः सामाजिक परिपेक्ष से सम्बन्धित होता है, तो अस्वीकृति का भय व्यावसायिक और व्यक्तिगत दोनों क्षेत्रों को सम्मिलित करता है। ये जीवन के वे क्षेत्र हैं जहाँ आप अपना अधिकाँश समय, ऊर्जा, प्रयास और विचार करने में लगाते हैं—चाहे आप एक कर्मचारी हों, या अभी पढ़ाई कर रहे हों, उद्यमी हों, सेवानिवृत्त हों, शौक़ीन हों या घर पर रहने वाली माँ हों। चाहे वह क्षेत्र कोई भी हो, परन्तु कोई भी असफल नहीं होना चाहता है और न ही अस्वीकार किया जाना चाहता है। यदि आप ऐसा करेंगे, तो सम्भवतः आप सफल होंगे! हम सफल होना चाहते हैं और हम अपना कार्य योग्यता एवं गुणवत्ता के आधार पर करते हैं। जिसे समय के साथ केवल शब्दों के माध्यम से नहीं, वरन् कार्यों के माध्यम से सामूहिक रूप से मान्यता प्राप्त होती है। इस प्रकार का भय कि लोग आपकी प्रतिष्ठा को धूमिल कर देंगे या आपको कमतर आँकेंगे, और साथ ही यह भय आपको अनुकूल मान्यता पाने के लिए पाप के साथ आज्ञा का उल्लंघन करने या लोगों को प्रसन्न करने के लिए दबाव डाल सकता है।
अस्वीकार किए जाने का भय अधिकाँश उतना ही साधारण होता है जितना कि समकक्ष लोगों का या व्यावसायिक दबाव होता है, जो हमें परमेश्वर की आज्ञा मानने से रोक देता है। झोपड़ियों के पर्व के समय लोग यीशु के विषय में बातें कर रहे थे (यूहन्ना 7:11–13)। कुछ लोग कह रहे थे कि वह एक भला मनुष्य है, जबकि अन्य लोग कह रहे थे कि वह लोगों को भरमाता है (यूहन्ना 7:12) परन्तु उन सभी के विषय में एक बात समान थी — कि वे “यहूदियों के डर के कारण” खुलकर बात नहीं कर रहे थे (यूहन्ना 7:13)। बाद में यूहन्ना बताता है कि लोग क्यों डरे हुए थे: “ये बातें उसके माता-पिता ने इसलिए कहीं क्योंकि वे यहूदियों से डरते थे; क्योंकि यहूदी एकमत हो चुके थे, कि यदि कोई कहे कि वह मसीह है, तो आराधनालय से निकाला जाए” (यूहन्ना 9:22)। धार्मिक अगुवे सामूहिक आराधना और संगति से व्यक्तिगत अस्वीकृति को एक साधन के रूप में उपयोग कर रहे थे ताकि लोग यीशु के विषय में जानने, उसका अनुसरण करने और उस पर विश्वास करने से रुक जाएँ। यरूशलेम में उसके अन्तिम सप्ताह के समय, “तो भी सरदारों में से भी बहुतों ने उस पर विश्वास किया, परन्तु फरीसियों के कारण प्रगट में नहीं मानते थे, ऐसा न हो कि आराधनालय में से निकाले जाएँ” (यूहन्ना 12:42)। यह उसी प्रकार का सामूहिक या व्यावसायिक दबाव है जो आज भी लोगों को यीशु का अनुसरण करने से रोकता है।
लोगों को प्रसन्न करना, व्यक्तिगत या व्यावसायिक रूप से अस्वीकार होने के भय की एक और अभिव्यक्ति है। हम पहले ही देख चुके हैं कि कैसे राजा शाऊल को इस्राएलियों के प्रति भय था, जिसके कारण उसने उनकी इच्छाओं को पूरा करने का प्रयास किया (1 शमूएल 15:24-25)। सुसमाचार के विषय में अपने दृष्टिकोण का बचाव करते हुए, पौलुस गलातियों को चुनौती देता है, “अब मैं क्या मनुष्यों को मानता हूँ या परमेश्वर को? क्या मैं मनुष्यों को प्रसन्न करना चाहता हूँ? यदि मैं अब तक मनुष्यों को ही प्रसन्न करता रहता, तो मसीह का दास न होता” (गलातियों 1:10)। जब पौलुस प्रभु के दासों को मसीह की महिमा करने के लिए अपने पद का उपयोग करने की चुनौती देता है, तो वह कहता है कि सेवकाई लोगों को प्रसन्न करने के लिए न करें, जैसा कि कुछ लोग करते हैं, वरन् इस प्रकार से कार्य करें ताकि मन से परमेश्वर की महिमा हो (इफिसियों 6:6, कुलुस्सियों 3:22-23)। लोगों को प्रसन्न करना तब होता है जब हमारी गतिविधियों, कार्यों और शब्दों के पीछे की धारणा अपने लाभ के लिए किसी बड़े या छोटे व्यक्ति को प्रसन्न करने की इच्छा से उत्पन्न होती है। अस्वीकृति का भय हमें इतनी चिन्ता से भर सकता है कि, इससे पहले कि हम इसे समझें, हम परमेश्वर के बदले अपने आस-पास के लोगों की इच्छाओं के दास बन जाते हैं, अर्थात् उस परमेश्वर के जो हम से प्रेम करता है।
पीड़ा का भय
पीड़ा या दुःख का भय सबसे व्यापक भय है क्योंकि इसमें शारीरिक और मानसिक दोनों प्रकार के दुःख सम्मिलित होते हैं। लोग पापी हैं और एक-दूसरे के विरुद्ध अनेक प्रकार के बुरे कार्य करते हैं। इसमें दुःख और पीड़ा में मौखिक अपमान से लेकर शारीरिक पीड़ा तक सम्मिलित हो सकती है। निर्दयी लोग दूसरों को अपनी इच्छानुसार कार्य करने के लिए शारीरिक पीड़ा या क्रूर शब्दों का उपयोग करते हैं। यद्यपि दुःख या मृत्यु का भय हमेशा पापपूर्ण नहीं होता, परन्तु लोगों के द्वारा हमें हानि पहुँचाने का भय हमारी प्रसन्नता को दबा सकता है, डर की भावना उत्पन्न कर सकता है, आत्मविश्वास को नष्ट कर सकता है, और हमें चुपचाप रहने की निराशा में फँसा सकता है।
अब्राहम ने मिस्र की यात्रा करते समय शारीरिक पीड़ा के भय का अनुभव किया था। वह जानता था कि सारै अति सुन्दर है इसलिए उसने सोचा कि मिस्री लोग उसे मार डालने का प्रयास करेंगे, क्योंकि वह उसका पति था (उत्पत्ति 12:10-12)। मनुष्य का भय हमारे निर्णयों को प्रभावित करता है और यह बताता है कि हम क्या विश्वास करते हैं। भय के कारण अब्राहम झूठ बोलने पर विवश हो गया कि वह सारै का भाई है। उसकी सुन्दरता के विषय में सुनकर, फ़िरौन ने अब्राहम को उपहार दिए और सारै को अपनी पत्नियों में से एक बना लिया। परिणामस्वरूप, परमेश्वर ने फिरौन पर बड़ी-बड़ी विपत्तियाँ डालीं (उत्पत्ति 12:13-17)। परमेश्वर के हस्तक्षेप के बिना अब्राहम के भय के कारण सारै हमेशा के लिए फिरौन की पत्नी बन सकती थी।
मृत्यु का भय और शारीरिक पीड़ा कोई छोटी बात नहीं है। जैतून के पहाड़ पर, यीशु ने अपने साथ विश्वासघात होने से पहले की अन्तिम रात पिता से प्रार्थना करते हुए बिताई और कहा, “हे पिता यदि तू चाहे तो इस कटोरे को मेरे पास से हटा ले, फिर भी मेरी नहीं परन्तु तेरी ही इच्छा पूरी हो” (लूका 22:42)। निश्चित रूप से, यीशु पाप के लिए परमेश्वर के न्याय और क्रोध को सहने के विषय में सोच रहा था, परन्तु मानवीय रूप से भी कहें तो, वह सम्भवतः उस शारीरिक पीड़ा के विषय में भी सोच रहा था जो उसे क्रूस पर सहनी थी — अर्थात् वह रोमी दण्ड प्रक्रिया जिसने हमारे शब्द कष्टदायक का निर्माण किया है। एक चिकित्सक होने के नाते लूका कहता है कि “और वह अत्यन्त संकट में व्याकुल होकर और भी हार्दिक वेदना से प्रार्थना करने लगा; और उसका पसीना मानो लहू की बड़ी-बड़ी बूँदों के समान भूमि पर गिर रहा था” (लूका 22:44)। यह एक शारीरिक स्थिति है जिसे यूनानी में हेमेटोहाइड्रोसिस के नाम से जाना जाता है, इसमें पसीने की ग्रंथियों से लहू भी निकलता है। लियोनार्ड दा विंची ने कथित रूप से एक ऐसी ही स्थिति का वर्णन किया था जो युद्ध में जाने से पहले एक सैनिक के सामने उत्पन्न हुई थी। यद्यपि यीशु की पीड़ा शारीरिक पीड़ा के भय से बढ़कर थी, फिर भी इसमें शारीरिक पीड़ा भी सम्मिलित थी।
शारीरिक पीड़ा के ही समान, मौखिक दुर्व्यवहार, धमकियाँ और द्वेष भी भयानक भय उत्पन्न कर सकते हैं और इसके परिणामस्वरूप लोग लज्जित होने का अनुभव करते हैं, एकाकी जीवन जीने लगते हैं, तथा लोगों पर से उनका विश्वास या भरोसा उठ हो जाता है। ये मौखिक घाव हमारे द्वारा किये गए पाप या हमारे विरुद्ध किये गए अपराध के कारण उत्पन्न हो सकते हैं। जब हम पाप में गिरते हैं, तो क्रूर और प्रेम न करने वाले लोग हमारे कार्यों के कारण हमें लज्जित और उपहास करके हमारी असफलताओं का लाभ उठाने का प्रयास कर सकते हैं। इसी कारण याकूब लिखता है कि, “देखो कैसे, थोड़ी सी आग से कितने बड़े वन में आग लग जाती है।जीभ भी एक आग है; जीभ हमारे अंगों में अधर्म का एक लोक है” (याकूब 3:5 आयत का दूसरा भाग -6)। शैतान, जो दोष लगाने वाला है, वह इससे अधिक कुछ नहीं चाहता कि हम अपने पापों के कारण लज्जित और निराश होने का अनुभव करें (प्रकाशितवाक्य 12:10)। इसके अतिरिक्त, दुःख का भय हमारे विरुद्ध किए गए अपराधों के कारण भी उत्पन्न हो सकता है। हो सकता है कि आपके माता-पिता में से कोई हमेशा क्रोधित रहता रह हो, या चिल्लाता और चीखता था, या लगातार निराश करता और आपसे क्रूर बातें कहता था। या हो सकता है कि आपका अधिकारी अत्याचारी हो जो कभी प्रसन्न नहीं रहता था। हो सकता है कि कार्यालय में जाना ही डरावना लगता था और आप हमेशा यह सोचते रहे कि अगली बार कब विस्फोट होगा। या हो सकता है कि यह आपका जीवनसाथी हो, भले ही वह क्रूर नहीं है, परन्तु आपको कई वर्षों तक कोई प्रशंसा नहीं मिली। परिवर्तन के बिना, दुःख का भय हमें अकेलेपन, लोगों को प्रसन्न करने और निराशा के बन्दीगृह में धकेल सकता है।
चर्चा एवं मनन:
- आपके धन सम्बन्धी उद्देशय क्या हैं? जो कुछ भी आपके मन में है, उसे लिखें। धन के विषय में अपने सभी भय को लिखें। ये आपके धन से सम्बन्धित उद्देश्यों से कैसे भिन्न या समान हैं? क्या ये चिन्ताएँ परमेश्वर पर भरोसा रखने को दर्शाती हैं या मनुष्य पर?
- लज्जित होने का भय आपको कैसे पाप की ओर ले जा सकता है? लज्जित होने का भय आपके जीवन का आनन्द कैसे छीन सकता है? यदि आपको लज्जित होने का भय न होता, तो आप क्या करते या क्या करने का प्रयास करते?
- आप किन कारणों से सहकर्मियों या व्यावसायिक दबाव के साथ संघर्ष करते हैं? इस दबाव के स्रोत कौन हैं और आपको क्या लगता है जिस कारण आप उन्हें इस दृष्टिकोण से देखते हैं?
- आप कितनी बार स्वयं को अपनी उपलब्धियों या सफलताओं के विषय में बात करते हुए सुनते हैं? क्या आपको लगता है कि पहचान बनाने की चाहत में आप घमण्ड में डूब जाते हैं? आप इस बात को कैसे समझ सकते हैं?
- लोगों को प्रसन्न करने के लिए आप किस प्रकार से संघर्ष करते हैं? कौन से लोग तुरन्त ही आपके दिमाग में आते हैं और आपके जीवन में उनकी क्या भूमिका है?
2 परमेश्वर का भय
भय ही भय को दूर भगाता है।
मुझे आज भी स्मरण है कि एक शहीद योद्धा और समूह के साथी का नौ सेना में पहली बार मेरे सामने अन्तिम संस्कार किया गया था। यह हमेशा धूप खिली रहने वाले सैन डिएगो, कैलिफ़ोर्निया के लिए असामान्य रूप से घूल और बादलों से घिरा हुआ दिन था। मेरे एक साथी ने अपनी साफ-सुथरी नौसेना की सफेद वर्दी में एक छोटे से मंच पर कदम रखा और एक विशाल अमेरिकी ध्वज के सामने खड़ा हुआ, जो समुद्री हवा में श्रद्धापूर्वक लहरा रहा था। मुझे उनके सारे शब्द स्मरण तो नहीं हैं, परन्तु उनकी समापन प्रार्थना आज भी मेरे मन में हरी-भरी है। दुर्भाग्य से, यह एक ऐसी प्रार्थना थी जिसे मैं अधिकतर ऐसे स्मारकों पर से सुनता आया हूँ और जिसे मैंने न चाहते हुए भी स्मरण कर लिया है। एक सरल परन्तु प्रभावशाली प्रार्थना:
“हे प्रभु, मुझे अपने भाइयों के सामने अयोग्य न ठहराना।”
स्टीवन प्रेसफ़ील्ड ने अपनी छोटी पुस्तक “द वॉरियर एथोस” में यही प्रार्थना दोहराई है। स्पार्टन योद्धा संस्कृति के अपने विश्लेषण में, वे तर्क देते हैं कि युद्ध में पीड़ा और मृत्यु का भय अपने साथी योद्धा के प्रति प्रेम से दूर हो जाता है। वह कहते हैं कि थर्मोपाइली के युद्ध में, जब अन्तिम स्पार्टन के योद्धाओं को यह पता चला कि वे सब मारे जाने वाले हैं, तब डाइनीकिस ने अपने साथी योद्धाओं को यह निर्देश दिया: कि “केवल इसी के लिए लड़ो — अर्थात् उस व्यक्ति के लिए जो तुम्हारे कन्धे के पास खड़ा है। वही सब कुछ है, और सब कुछ उसी के भीतर समाया हुआ है।” प्रेसफील्ड इस भावना और विश्वास को “प्रेम” कहते हैं,, जो भय को दूर करता है, —- और हम पवित्रशास्त्र से जानते हैं कि प्रेसफील्ड सही था, परन्तु सम्भवतः उस प्रकार से नहीं जैसा वह सोचते थे। यूनानी संस्कृति में, शहर या पोलिस सुरक्षा और संरक्षा का केंद्र था। जीवन शहर के आसपास घूमता था और लोग उतने ही शक्तिशाली थे जितना कि उनका शहर था। कौशल के साथ युद्ध करने वाले पुरुषों के लिए, शहर की रक्षा करना ही उनकी पहचान थी। कायरता पूर्ण व्यवहार करते हुए या लड़ने तथा अपने प्राण न्यौछावर करने से पीछे हटना सबसे लज्जाजनक और अपमानजनक बात मानी जाती थी—अर्थात् मृत्यु से भी बहुत अधिक बुरी। योद्धा की प्रार्थना इस बात पर प्रकाश डालती है कि जहाँ प्रेम निश्चित रूप से सम्मिलित होता है, वहीं एक ऐसा भय भी है जो अन्य सभी भय को दूर कर देता है। इस स्थिति में, अपने भाइयों के सामने अयोग्य होने का भय है।
प्रेसफ़ील्ड का तर्क है कि पवित्रशास्त्र सिखाता है कि प्रेम भय को दूर भगाता है। 1 यूहन्ना 4:18 कहता है, “प्रेम में भय नहीं होता, वरन् सिद्ध प्रेम भय को दूर कर देता है, क्योंकि भय का सम्बन्ध दण्ड से होता है, और जो भय करता है, वह प्रेम में सिद्ध नहीं हुआ।” यूहन्ना की पत्री के द्वारा परमेश्वर ने स्पष्ट किया है कि सिद्ध प्रेम भय को दूर कर देता है। परन्तु पत्र के सन्दर्भ में, यह एक विशेष प्रकार का भय है। इसी आयत से ठीक पहले, यूहन्ना लिखता है कि, “इसी से प्रेम हम में सिद्ध हुआ, कि हमें न्याय के दिन साहस हो; क्योंकि जैसा वह है, वैसे ही संसार में हम भी हैं” (1 यूहन्ना 4:17)। रोमी दण्ड की प्रक्रिया से ही हमारे शब्द “अत्यंत पीड़ादायक” प्राप्त हुए हैं। मसीह के सिद्ध प्रेम में हमारी स्थिति हमारे भविष्य की आशा को, जो उसके साथ अनन्तकाल तक है, दृढ़ करती है और इस प्रकार न्याय के भय को दूर कर देती है। इस पाठ का यह अर्थ नहीं है कि मसीहियों को अब किसी भी प्रकार के भय का अनुभव नहीं करना होगा। इसके बदले, पवित्रशास्त्र की सलाह यह है कि भय ही भय को दूर करता है। विशेष रूप से, परमेश्वर की सही समझ होने के लिए एक निश्चित प्रकार का भय आवश्यक है, जो उसके स्वभाव और उसके प्रेम दोनों से प्रेरित होता है।
भय के बीच अन्तर
मनुष्य के विभिन्न भय को सही ढँग से समझने और उसका समाधान करने के लिए हमें वहीं से आरम्भ करना होगा जहाँ से भय आरम्भ होता है। बाइबल में भय का पहला उल्लेख आदम से आता है जब उसने और हव्वा ने पाप किया और परमेश्वर से छिपने का प्रयास किया (उत्पत्ति 3:10)। जब आदम और हव्वा ने पाप किया, तो उन्होंने कुछ ऐसा अनुभव किया जो उन्होंने पहले कभी नहीं किया था — अर्थात् परमेश्वर का कठोर एवं दण्डात्मक भय का अनुभव। परमेश्वर की भलाई और पवित्रता के कारण, पापी मनुष्य अब परमेश्वर से अलग हो गया है और उसे मेल-मिलाप की अति आवश्यकता है। परमेश्वर का भय तब उत्पन्न होता है जब एक अपूर्ण और पापी प्राणी अपने सिद्ध और पवित्र सृष्टिकर्ता को देखता है। एडवर्ड वेल्च कहते हैं कि मनुष्य का भय तब होता है जब लोग बड़े और परमेश्वर छोटा दिखाई देता है।2 इसके विपरीत, परमेश्वर का भय तब होता है जब परमेश्वर बड़ा और लोग छोटे दिखाई देते हैं। क्योंकि भय भावनाओं और विश्वास का संयोजन है, इसलिए हम परमेश्वर के सामने अपनी स्थिति के विषय में जो विश्वास करते हैं, वह सीधे परमेश्वर के प्रति हमारे अनुभव किए जाने वाली संवेदनाओं को प्रभावित करता है।
परमेश्वर का भय परमेश्वर की भलाई और पवित्रता पर आधारित है, और यह देखने में अद्भुत और भयानक बात है। नीतिवचन 1:7 कहता है, “यहोवा का भय मानना बुद्धि का मूल है; बुद्धि और शिक्षा को मूर्ख लोग ही तुच्छ जानते हैं।” ज्ञान और बुद्धि दोनों ही अच्छे हैं जो परमेश्वर के प्रति सही भय से आरम्भ होते हैं क्योंकि वह सिद्ध और आन्तरिक रूप से भला है। 1 इतिहास 16:34 कहता है, “यहोवा का धन्यवाद करो, क्योंकि वह भला है; उसकी करुणा सदा की है।” भजन संहिता 86:11 परमेश्वर की भलाई और हमारे भय के बीच के सम्बन्ध को और अधिक स्पष्ट करता है: “हे यहोवा, अपना मार्ग मुझे सिखा, तब मैं तेरे सत्य मार्ग पर चलूँगा, मुझ को एक चित्त कर कि मैं तेरे नाम का भय मानूँ।” इस भाग में शिक्षा, सत्य और भय—तीनों को अच्छे तत्वों के रूप में जोड़ा गया है, जो परमेश्वर पर केन्द्रित हैं। भजन संहिता 33:18 में परमेश्वर के प्रेम को उन लोगों के साथ जोड़ा गया है जो उसका भय मानते हैं: “देखो, यहोवा की दृष्टि उसके डरवैयों पर और उन पर जो उसकी करुणा की आशा रखते हैं, बनी रहती है।” यद्यपि हम बहुत अच्छे हैं, फिर भी हम परमेश्वर से डरते हैं क्योंकि यह “भय” मात्र भय नहीं है, वरन् परमेश्वर की पवित्रता के प्रति गहरा सम्मान है।
जब मनुष्य का सामना परमेश्वर से होता है तो सामान्य प्रतिक्रिया भय और काँपना होती है। भविष्यद्वक्ता यशायाह ने स्वर्गीय सेना में प्रवेश और परमेश्वर के सामने खड़े होने का वर्णन किया है। यशायाह अपने अनुभव के विषय में इस प्रकार लिखता है; “हाय है मुझ पर। “तब मैंने कहा, “हाय! हाय! मैं नाश हुआ; क्योंकि मैं अशुद्ध होंठवाला मनुष्य हूँ, और अशुद्ध होंठवाले मनुष्यों के बीच में रहता हूँ; क्योंकि मैंने सेनाओं के यहोवा महाराजाधिराज को अपनी आँखों से देखा है!” (यशायाह 6:5)। जब मूसा ने परमेश्वर की महिमा देखने के लिए कहा, तो प्रभु ने उत्तर दिया, “तू मेरे मुख का दर्शन नहीं कर सकता; क्योंकि मनुष्य मेरे मुख का दर्शन करके जीवित नहीं रह सकता” (निर्गमन 33:20)। यहेजकेल लिखता है कि जब उसने दर्शन में प्रभु की महिमा देखी तो वह तुरन्त मुँह के बल गिर गया (यहेजकेल 1:28 आयत का दूसरा भाग)। परमेश्वर का भय, जो उसके सिद्ध होने की तुलना में हमारे पापी स्वभाव के कारण उत्पन्न होता है, तब और भी अधिक बढ़ जाता है जब हम परमेश्वर के असीमित ज्ञान, उपस्थिति और सामर्थ्य के क्षेत्र में विचार करते हैं।
परमेश्वर के प्रभुता सम्पन्न स्वभाव में ही उसका सम्पूर्ण ज्ञान समाया हुआ है —परमेश्वर सब कुछ जानता है — यहाँ तक कि पूर्ण रूप से स्वयं के विषय में भी (1 कुरिन्थियों 2:11)। वह सब वास्तविक बातों को और आगे होने वाली सब सम्भावित बातों को जानता है, और वह उन्हें समय से पहले ही शीघ्र जान लेता है (1 शमूएल 23:11–13; 2 राजा 13:19; यशायाह 42:8–9, 46:9–10; मत्ती 11:21)। 1 यूहन्ना 3:20 कहता है कि “परमेश्वर सब कुछ जानता है।” दाऊद परमेश्वर की बुद्धि का वर्णन करते हुए लिखता है: “हे यहोवा, तूने मुझे जाँच कर जान लिया है। तू मेरा उठना और बैठना जानता है; और मेरे विचारों को दूर ही से समझ लेता है” (भजन संहिता 139:1-2)। जब यीशु ने काना में विवाह में आश्चर्यकर्म किया, तो यूहन्ना का सुसमाचार पवित्र आत्मा के वास करने से प्राप्त ज्ञान का वर्णन करता है: “तो बहुतों ने उन चिन्हों को जो वह दिखाता था देखकर उसके नाम पर विश्वास किया।परन्तु यीशु ने अपने आप को उनके भरोसे पर नहीं छोड़ा, क्योंकि वह सब को जानता था” (यूहन्ना 2:23-24) परमेश्वर की प्रभुता में वह सभी बातों को भली-भाँति जानता है, यही कारण है कि यीशु कहता है कि तुम्हारा पिता तुम्हारे माँगने से पहले ही जानता है, कि तुम्हारी क्या-क्या आवश्यकताएँ है (मत्ती 6:8)। परमेश्वर का भय उसके सिद्ध सर्वज्ञता और उसकी सर्वव्यापकता के साथ और भी गहरा हो जाता है।
परमेश्वर न केवल वास्तविक और सम्भावित सभी लोकों का सर्वज्ञानी है, वरन् वह सर्वव्यापी भी है — अर्थात् वह हर स्थान पर उपस्थित है। परमेश्वर भौतिक आयामों तक ही सीमित नहीं है, क्योंकि “परमेश्वर आत्मा है।” (यूहन्ना 4:24)। सृष्टि का रचयिता होने के नाते, वह इससे बंधा हुआ नहीं है। व्यवस्थाविवरण 10:14 कहता है, “सुन, स्वर्ग और सबसे ऊँचा स्वर्ग भी, और पृथ्वी और उसमें जो कुछ है, वह सब तेरे परमेश्वर यहोवा ही का है।” परन्तु परमेश्वर की उपस्थिति का अर्थ यह नहीं है कि वह सभी स्थानों पर एक जैसा व्यवहार करता है। यूहन्ना 14:23 जैसी आयत और यशायाह 59:2 जैसी आयत के बीच के अन्तर पर विचार कीजिए, जहाँ यूहन्ना में कहा गया है कि परमेश्वर मनुष्य के साथ अपना निवास स्थान बनाता है, वहीं यशायाह में इस्राएल के पाप के कारण परमेश्वर अपने आप को अलग कर लेता है। यद्यपि वह समान रूप से प्रत्येक स्थान पर उपस्थित है, फिर भी उसकी उपस्थिति कभी आशीष तो कभी न्याय लेकर आती है। परमेश्वर के निकट या दूर होने का विचार तब उसकी अपनी सृष्टि और प्राणियों के प्रति उसके स्वभाव का विषय है, जो स्थान, परिस्थिति और समय में प्रकट होता है (यिर्म. 23:23–25)। फिर भी, परमेश्वर सदैव सभी स्थानों और हर समय पूर्ण रूप से उपस्थित रहता है।
परमेश्वर सर्वज्ञानी और सर्वव्यापी है, जो उसकी असीमित सर्वशक्ति की सामर्थ्य से पूर्ण होती है — क्योंकि वह सर्वशक्तिमान है। परमेश्वर जो कुछ करना चाहता है, वह कर सकता है; उसके लिए कुछ भी कठिन नहीं है (उत्पत्ति 18:14; यिर्मयाह 32:17)। पौलुस लिखता है कि “अब जो ऐसा सामर्थी है, कि हमारी विनती और समझ से कहीं अधिक काम कर सकता है, उस सामर्थ्य के अनुसार जो हम में कार्य करता है।” (इफिसियों 3:20) जब स्वर्गदूत जिब्राईल मरियम से मिलने आया, तो उसने उससे कहा, “परमेश्वर के लिये कुछ भी असम्भव नहीं है” (लूका 1:37)। परमेश्वर के लिए केवल एक असम्भव कार्य यह है कि वह अपने स्वभाव के विपरीत कार्य करे। इसी कारण इब्रानियों का लेखक कहता है कि “परमेश्वर के लिए झूठ बोलना असम्भव है” (इब्रानियों 6:18)। जब अपने उद्देश्यों को पूरा करने और सिद्ध करने की बात आती है, तो कोई भी उसे रोक नहीं सकता; वह सफल होगा (यशायाह 40:8, 55:11)। परमेश्वर की सर्वशक्तिमानता, सर्वव्यापकता और सम्पूर्ण ज्ञान हमारे अपूर्ण और उसकी सिद्धता के बीच की दूरी को और बढ़ा देती है।
जितना अधिक हम परमेश्वर की श्रेष्ठता के विषय में सोचेंगे, उतना ही अधिक हम अपनी भिन्नता पर वास्तविक भय का अनुभव करेंगे, और साथ ही उसकी दयालुता पर आदर सहित और आश्चर्यचकित होने का भी अनुभव करेंगे। इस आश्चर्य को हमें परमेश्वर के प्रेम के साथ दया, अनुग्रह, सहनशीलता और क्षमा के लिए उसकी आराधना करने के लिए प्रेरित करना चाहिए। जब मूसा सीनै पर्वत पर गया, तो यहोवा ने उसका नाम लेकर कहा, “यहोवा, यहोवा, परमेश्वर दयालु और अनुग्रहकारी, कोप करने में धीरजवन्त, और अति करुणामय और सत्य,हजारों पीढ़ियों तक निरन्तर करुणा करनेवाला, अधर्म और अपराध और पाप को क्षमा करनेवाला है” (निर्गमन 34:6–7)। इस्राएल के अधर्म और पापों को गिनाने के बाद, भविष्यद्वक्ता कहता है, “तो भी यहोवा इसलिए विलम्ब करता है कि तुम पर अनुग्रह करे, और इसलिए ऊँचे उठेगा कि तुम पर दया करे। क्योंकि यहोवा न्यायी परमेश्वर है; क्या ही धन्य हैं वे जो उस पर आशा लगाए रहते हैं” (यशायाह 30:18)। और इस प्रेम पूर्वक दया और न्याय की चरम अभिव्यक्ति यीशु मसीह के क्रूस पर चढ़ने पर समाप्त होती है। यहाँ क्रूस पर, “परन्तु परमेश्वर हम पर अपने प्रेम की भलाई इस रीति से प्रगट करता है, कि जब हम पापी ही थे तभी मसीह हमारे लिये मरा” (रोमियों 5:8)। इसलिए जो लोग यीशु मसीह को प्रभु मानकर विश्वास करते हैं, उन पर दण्ड की आज्ञा नहीं है (रोमियों 8:1)।
परमेश्वर के भय का अनुभव करने का अर्थ है कि उसकी सर्वश्रेष्ठ महिमा को देखकर काँप उठना और उसके पवित्र भय और भलाई के सामने आदर के साथ उसकी आराधना करना।
हमने “मनुष्य का भय” को इस प्रकार परिभाषित किया है कि यह वह भावना है जो तब उत्पन्न होती है जब हम यह मानते हैं कि कोई व्यक्ति या लोगों का समूह हमारे जीवन से वह वस्तु छीनने या देने की शक्ति रखता है जिसे हम आवश्यक या चाहने योग्य समझते हैं। यह भावना हमें ऐसे कार्य करने के लिए प्रेरित करती है जिससे हमें अनुकूल परिणाम प्राप्त हो सके। संक्षेप में, मनुष्य का भय लोगों से डरना होता है।
इसकी तुलना में, परमेश्वर का उचित भय वह भावना है जो इस विश्वास से उत्पन्न होती है कि परमेश्वर अनन्तकाल से ही सर्वशेष्ठ है, जिनके पास आपको हमेशा-हमेशा के लिए नाश करने की असीमित और उचित न्याय के साथ सामर्थ्य है; फिर भी वह अनुग्रह के साथ क्षमा करने, सम्भालने, सामर्थ्य देने और यीशु के बलिदान के द्वारा अनन्त जीवन की विरासत प्रदान करने का अवसर देता है। यह एक विरोधाभास प्रस्तुत करता है जहाँ भय, जिसे अधिकतर भय से जोड़ा जाता है, जो परमेश्वर की महिमा के प्रति गहरे आश्चर्य और विश्वास के रूप में समझा जाता है, जो आगे चलकर परमेश्वर के प्रति एक आनन्दमय, पूर्ण समर्पण और मुग्धता की ओर ले जाता है।
जब हम परमेश्वर का भय मानने लगते हैं तो हम लोगों से डरना बन्द कर देते हैं। क्योंकि भय ही भय को दूर करता है। परमेश्वर के प्रति सही भय हमें मनुष्य के प्रति अपने भय को त्यागने के लिए प्रेरित करता है, क्योंकि तब हम किसी सम्पूर्ण भिन्न बात पर विश्वास कर रहे होते हैं। जब हम सही रूप से यह समझ जाते हैं कि केवल परमेश्वर ही वह सब कुछ दे सकता है जिसकी हमें अन्यंत आवश्यकता है और जिसे हम चाहते हैं, तब हम लोगों की सामर्थ्य नहीं, वरन् परमेश्वर की सामर्थ्य को समझते हैं। इस प्रकार, जहाँ एक व्यक्ति परमेश्वर की महानता और पवित्रता से पूरी रीति से जुड़ा हुआ होता है उसका भय मानने में, हम उसकी इच्छा को पूरा करने की अभिलाषा करना सीखते हैं — अर्थात् यह विश्वास करते हुए कि यही वास्तव में हमारे लिए उत्तम है।
“परमेश्वर का भय हमें उसकी इच्छा को चाहने के लिए प्रेरित करता है।”
परमेश्वर का सही भय हमें विश्वासयोग्य जीवन के लिए तथा समर्पित रहने के लिए प्रेरित करता है। जब हम जानते हैं कि परमेश्वर कौन है, तब हम उसकी व्यवस्था को स्वीकार करने या अस्वीकार करने के निर्णय लेने के लिए तैयार होते हैं। परन्तु अब कोई विकल्प नहीं है। या तो मैं परमेश्वर की व्यवस्था को अस्वीकार करें या उसके चरणों में गिरकर उसकी इच्छा के आगे समर्पण करें। हममें से जो लोग सही रीति से परमेश्वर का भय मानते हैं, उनके लिए उसकी महिमा और उसकी करुणा मिलकर हमें बुलाती और प्रेरित करती है कि हम अपने जीवन को उसकी इच्छाओं के अनुरूप ढालें, क्योंकि हम विश्वास करते हैं कि ऐसा करने से हमारा भला होगा। और यह भलाई हमारे लिए भले ही इस जीवन में न भी हो, परन्तु आने वाले अनन्त जीवन में अवश्य होगी। हम इस बात को पवित्रशास्त्र में प्रेरित करने वाले अनेकों पवित्र लोगों की कहानियों में देखते हैं।
यद्यपि दानिय्येल कम आयु में ही बेबीलोन में बन्दी बना लिया गया था, फिर भी वह परमेश्वर के प्रति विश्वासयोग्य बना रहा। दानिय्येल ने राजा नबूकदनेस्सर का भोजन खाने या उसका दाखमधु पीने से मना कर दिया क्योंकि वह परमेश्वर के वचन का पालन करने के लिए दृढ़ था (दानिय्येल 1:8)। प्रधान खोजे ने दानिय्येल के अनुरोध को अस्वीकार करना चाहा, क्योंकि उसे डर था कि यदि दानिय्येल की स्थिति बिगड़ गई तो राजा उसे दण्ड देगा या मार डालेगा (दानिय्येल 1:10)। परन्तु परमेश्वर ने दानिय्येल को आशीष दी और उस पर अनुग्रह किया।
बाद में, दानिय्येल के देशवासी, शद्रक, मेशक और अबेदनगो भी इसी प्रकार परमेश्वर के विश्वासयोग्य जन थे, और अपने विश्वास के कारण उन्होंने राजा नबूकदनेस्सर की सोने की मूर्ति को दण्डवत् करने से मना कर दिया तब उन्हें भट्ठी में जिन्दा जलाने का दण्ड दिया गया (दानिय्येल 3:8-15)। जब राजा ने उनसे पूछा तो उन्होंने इस प्रकार उत्तर दिया, “यदि ऐसी बात हो, तो हमारा परमेश्वर जिसकी हम उपासना करते हैं, वह हमको उस धधकते हुए भट्ठे की आँच से बचाने की शक्ति रखता है, वरन् हे राजा, वह हमें तेरे हाथ से भी छुड़ा सकता है। परन्तु, यदि नहीं, तो हे राजा तुझे मालूम हो, कि हम लोग तेरे देवता की उपासना नहीं करेंगे, और न तेरी खड़ी कराई हुई सोने की मूरत को दण्डवत् करेंगे” (दानिय्येल 3:16-18)। ध्यान दें कि कैसे परमेश्वर के प्रति समर्पण ने उनके दुःख और मृत्यु के भय को दूर कर दिया। वे स्वीकार करते हैं कि उनके जीवन पर सच्चा अधिकार परमेश्वर का ही है, और भले ही चाहे वह उन्हें न भी बचाए, फिर भी वह दूसरों से अधिक योग्य है — परन्तु परमेश्वर वास्तव में उन्हें बचाता है (दानिय्येल 3:24-30)।
यही कहानी कई वर्षों बाद दानिय्येल के जीवन में भी दोहराई जाती है जब उसे परमेश्वर से प्रार्थना करते रहने के कारण सिंहों की माँद में फेंक दिया गया था, परन्तु परमेश्वर अद्भुत रीति से उसे बचा लेता है (दानिय्येल 6:1-28)। जब हम परमेश्वर के अधीन हो जाते हैं, तो हम परमेश्वर की इच्छा के आगे समर्पण कर देते हैं।
जब दाऊद का सामना गोलियत से हुआ तो दोनों पक्षों ने सोचा कि उसकी स्थिति प्रतिकूल है। दाऊद से पहले, इस्राएल के सभी लोग जिन्होंने गोलियत को देखा था, उस पुरुष को देखकर सब इस्राएली अत्यन्त भय खाकर उसके सामने से भाग गए (1 शमूएल 17:24)। परन्तु दाऊद ने कहा, “वह खतनारहित पलिश्ती क्या है कि जीवित परमेश्वर की सेना को ललकारे?” (1 शमूएल 17:26 आयत का दूसरा भाग) जब शाऊल को दाऊद मिला, तब उसने शाऊल से कहा, “किसी मनुष्य का मन उसके कारण कच्चा न हो; तेरा दास जाकर उस पलिश्ती से लड़ेगा… यहोवा जिसने मुझे सिंह और भालू दोनों के पंजे से बचाया, वह मुझे उस पलिश्ती के हाथ से भी बचाएगा” (1 शमूएल 17:32-37)। दाऊद को मनुष्य की सामर्थ्य से अधिक परमेश्वर की सामर्थ्य का भय था, यहाँ तक कि गोलियत जैसे भयानक व्यक्ति की सामर्थ्य से भी अधिक परमेश्वर की सामर्थ्य का भय था। परमेश्वर ने इस युवा लड़के को, जो परमेश्वर से प्रेम करता था, “यह घोषणा करने के लिए चुना कि “युद्ध यहोवा का है” (1 शमूएल 17:47)। परमेश्वर की सामर्थ्य मनुष्य की सामर्थ्य से इतनी अधिक है कि वह एक दानव जैसे योद्धा को हराने के लिए एक चरवाहे जैसे लड़के का भी उपयोग कर सकता है।
स्तिफनुस को पत्थरवाह किए जाने से पहले, जब स्तिफनुस यहूदी भीड़ को यीशु मसीह का सुसमाचार सुना रहा था, तो उसने उस भीड़ के चेहरे पर क्रोध भड़कते हुए देखा होगा। परन्तु जब वे ख़तरनाक रूप से क्रोधित हो गए, तो स्तिफनुस परमेश्वर के प्रेम में और भी अधिक खो गया, तब परमेश्वर ने उसे दर्शन दिखाया और दर्शन में उसने यीशु को परमेश्वर के दाहिने हाथ खड़े हुए देखा (प्रेरितों के काम 7:54-56)। यह सुनकर भीड़ चिल्ला उठी, कान बन्द कर लिए और उस पर टूट पड़ी (प्रेरितों 7:58)। और स्तिफनुस को नगर से बाहर ले जाकर उस पर पत्थरवाह करने लगे, और मार डाला। यहाँ तक कि इस समय भी स्तिफनुस ने परमेश्वर की इच्छा के प्रति समर्पण दिखाना जारी रखा और ऊँचे शब्द से पुकार कर कहा, “हे प्रभु, यह पाप उन पर मत लगा” (प्रेरितों के काम 7:60)। परमेश्वर का सही भय परमेश्वर की इच्छा पूरी करने के लिए हमें प्रेरित करता है, भले ही इसके लिए हमें कष्ट और पीड़ा ही क्यों न सहनी पड़े।
इब्रानियों की पुस्तक हमारे लिए विश्वासयोग्य गवाहों के उस बड़े बादल का उल्लेख करती है जो परमेश्वर में लीन एवं आनन्दित था। हम इसहाक की बलि चढ़ाकर परमेश्वर की इच्छा के प्रति अब्राहम के समर्पण के विषय में विस्तार से बात कर सकते हैं। या अपने भाइयों के विश्वासघात के कारण यूसुफ के 20 वर्ष तक बन्दी बनाए जाने के विषय में भी बात कर सकते हैं। या फिर मिस्र में मूसा और हारून का परमेश्वर की इच्छा के आगे समर्पण। या किसी भी भविष्यद्वक्ता और मनुष्य के भय के विपरीत परमेश्वर के भय के आगे समर्पण की उनकी अनोखी कहानियों के विषय में बात कर सकते हैं। परन्तु इन कहानियों में से कोई भी हमें उस प्रकार का उत्साह और सामर्थ्य नहीं देती कि हम भय पर विजय प्राप्त करें, जैसा कि यीशु मसीह का सुसमाचार देता है। भाग 3 में, हम यह विचार करेंगे कि मसीह के साथ हमारी एकता हमें किस प्रकार परमेश्वर की इच्छा के प्रति समर्पित होने और मनुष्य के भय पर विजय पाने में सामर्थी बनाती है।
चर्चा एवं मनन:
- जब आप परमेश्वर के विषय में सोचते हैं, तो आपके मन में सबसे पहले क्या आता है? क्या आप कह सकते हैं कि आप परमेश्वर का भय मानते हैं? यदि हाँ, तो क्यों? यदि नहीं, तो क्यों नहीं?
- आपको क्या लगता है आप अधिकतर किस से अधिक डरते हैं, मनुष्य से या परमेश्वर से? आपको क्यों लगता है कि ऐसा होता है?
- अन्तिम बार कौन सी बात आपको इतना तनाव, चिन्तित या बेचैन कर रही थी? क्या इसका कारण मनुष्य का भय था? यदि हाँ, तो कौन सा भय था? परमेश्वर का सच्चा भय आपके हृदय को सच्चाई की ओर कैसे प्रेरित कर सकता है?
- परमेश्वर का भय आपको परमेश्वर की इच्छा के प्रति समर्पण करने के लिए कैसे प्रेरित कर रहा है? यदि ऐसा नहीं है, तो आपको क्या लगता है कि आपको समर्पण करने से कौन रोक रहा है? क्या आपके जीवन का कोई ऐसा विशेष क्षेत्र है जो आपको कठिन लगता है या जिसे आप परमेश्वर के प्रति समर्पण करने के लिए तैयार नहीं हैं?
3 समर्पण के द्वारा विजय
परमेश्वर का सच्चा भय मनुष्य के सभी भय को दूर कर देता है क्योंकि यह हमें परमेश्वर की इच्छा की ओर प्रेरित करता है। परन्तु परमेश्वर की इच्छा क्या है? सबसे पहले महत्वपूर्ण बात यह है कि परमेश्वर चाहता है कि सभी लोगों का उद्धार हो (1 तीमुथियुस 2:4)। जब हम यीशु मसीह को अपने जीवन का प्रभु मानते हैं, तो पवित्रशास्त्र कहता है कि हम पवित्र आत्मा के वास करने के द्वारा उसके साथ जुड़ जाते हैं। यीशु मसीह ने इस प्रकार इसका वर्णन किया कि: “यदि कोई मुझ से प्रेम रखे, तो वह मेरे वचन को मानेगा, और मेरा पिता उससे प्रेम रखेगा, और हम उसके पास आएँगे और उसके साथ वास करेंगे… पवित्र आत्मा जिसे पिता मेरे नाम से भेजेगा, वह तुम्हें सब बातें सिखाएगा, और जो कुछ मैं ने तुम से कहा है, वह सब तुम्हें स्मरण कराएगा” (यूहन्ना 14:23, 26)। जब हम अपने पापों को स्वीकार करते हैं और यीशु मसीह को प्रभु मान लेते हैं, तो परमेश्वर हमें क्षमा करता है और हमें अपने पुत्र के साथ एकता में मिला देता है (रोमियों 10:9)। मनुष्य के भय पर विजय पाने के लिए हमें उसी के प्रति समर्पित होना होगा जिसने पहले ही विजय प्राप्त कर ली है।
यह कहना साधारण-सा प्रतीत हो सकता है कि मनुष्य का भय, यीशु के प्रति समर्पण के द्वारा पराजित किया जा सकता है। आप सोच सकते हैं, “यह तो बहुत सरल है। क्या कोई इससे अच्छा मनोवैज्ञानिक उत्तर या आत्म-सम्मान बढ़ाने वाला कार्य नहीं है जो मुझे मनुष्य के भय पर विजय पाने में सहायता कर सके? क्या मैं अधिक आत्मविश्वास और साहस का अनुभव नहीं करूँगा यदि मैं अच्छा दिखने लगूँ, किसी प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में पढ़ूँ या नए वस्त्र खरीदूँ, या किसी सुन्दर व्यक्ति के साथ प्रेम के साथ भेंट करूँ, या कोई प्रतिष्ठित और उच्च वेतन वाली नौकरी पा लूँ?” नहीं, ऐसा नहीं होगा। क्योंकि आप मनुष्य के भय में और भी अधिक डूब जाएँगे। परन्तु हाँ, इसका सीधा सा उत्तर यह है कि केवल मसीह के सामने समर्पण करके ही हम मनुष्य के भय पर विजय पा सकते हैं।
पौलुस आगे वर्णन करता है कि कैसे पवित्र आत्मा हमें मसीह के साथ एकता में लाता है। अतः वह लिखता है,
यदि उसी का आत्मा जिस ने यीशु को मरे हुओं में से जिलाया तुम में बसा हुआ है; तो जिस ने मसीह यीशु को मरे हुओं में से जिलाया, वह तुम्हारी मरनहार देहों को भी अपने आत्मा के द्वारा जो तुम में बसा हुआ है, जिलाएगा… क्योंकि तुम को दासत्व की आत्मा नहीं मिली कि फिर भयभीत हो, परन्तु लेपालकपन की आत्मा मिली है, जिस से हम “हे अब्बा! हे पिता” कहकर पुकारते हैं (रोमियों 8:11 और 15)।
गलातियों की कलीसियाओं को एक अलग पत्र में पौलुस लिखता है कि, “मैं मसीह के साथ क्रूस पर चढ़ाया गया हूँ, और अब मैं जीवित न रहा, पर मसीह मुझ में जीवित है” (गलातियों 2:20)। मसीह के साथ एकता में हम मसीह की सामर्थ्य को प्राप्त करते हैं, जिसने मनुष्य के भय का सामना किया जा सके और उस पर विजय भी प्राप्त की जा सके।
मसीह के साथ एकता में रहकर हम मसीह के प्रति निरन्तर समर्पण के द्वारा विजयी होते हैं। यहाँ तक कि बन्दीगृह से भी पौलुस लिखता है, “पवित्र आत्मा आप ही हमारी आत्मा के साथ गवाही देता है, कि हम परमेश्वर की सन्तान हैं” (रोमियों 8:16)। हम किसी भी परिस्थिति का सामना इस विश्वास के साथ कर सकते हैं कि, “और हम जानते हैं, कि जो लोग परमेश्वर से प्रेम रखते हैं, उनके लिये सब बातें मिलकर भलाई ही को उत्पन्न करती है; कौन हमको मसीह के प्रेम से अलग करेगा? क्या क्लेश, या संकट, या उपद्रव, या अकाल, या नंगाई, या जोखिम, या तलवार?” (रोमियों 8:28, 35)। इसका अर्थ है कि कोई भी हमें मसीह के प्रेम से अलग नहीं कर सकता है! कोई भी वस्तु हमें मसीह के साथ हमारी एकता से, हमारे भीतर वास करने वाले पवित्र आत्मा से, तथा परमेश्वर के साथ हमारे अनन्तकाल के निवास से अलग नहीं कर सकती है। इसलिए, “इन सब बातों में हम उसके द्वारा जिस ने हम से प्रेम किया है, जयवन्त से भी बढ़कर हैं” (रोमियों 8:37)। हम मसीह के प्रति समर्पण के द्वारा विजयी होते हैं।
व्यवहारिक रूप में यह कैसा होता है? जब मैं मनुष्य के भय का सामना करता हूँ, तो यीशु के प्रति समर्पण मुझे अपने भय पर विजय पाने में कैसे सहायता करता है? अगले कुछ अनुच्छेदों में, हम संक्षेप में बताएँगे कि मसीह के प्रति समर्पण करने से हमारी आवश्यकताओं और इच्छाओं में किस प्रकार से परिवर्तन होता है। यह केवल दृष्टिकोण या मानसिकता में परिवर्तन होने से कहीं बढ़कर है। एक नया मनुष्य बनना है—अर्थात् मसीह के समान और अधिक बनना है। स्मरण रहे, कि हमारा भय उन लोगों के विषय में हमारी धारणाओं से उत्पन्न होता है जिनके विषय में हम सोचते हैं कि वे हमारी आवश्यकताएँ और इच्छाएँ पूरी कर सकते हैं। अतः अपने भय पर विजय पाने के लिए हमें मसीह की इच्छा के अनुसार परिवर्तित होने की आवश्यकता है।
धन सम्बन्धी भय पर विजय पाना
जब हम मसीह के सामने समर्पण करते हैं, तो वह हमारी आर्थिक आवश्यकताओं और इच्छाओं के विषय में हमारी सोच बदल देता है। यीशु हमें स्मरण कराता है कि,
अपने लिये पृथ्वी पर धन इकट्ठा न करो; जहाँ कीड़ा और काई बिगाड़ते हैं, और जहाँ चोर सेंध लगाते और चुराते हैं।परन्तु अपने लिये स्वर्ग में धन इकट्ठा करो, जहाँ न तो कीड़ा, और न काई बिगाड़ते हैं, और जहाँ चोर न सेंध लगाते और न चुराते हैं। क्योंकि जहाँ तेरा धन है वहाँ तेरा मन भी लगा रहेगा। (मत्ती 6:19-21)
वह आगे अपने श्रोताओं को परमेश्वर के स्वभाव से शान्ति देता है कि वह सर्वज्ञानी है और भली-भाँति जानता है कि हमें क्या चाहिए, और सर्वशक्तिमान है जो कुछ भी दे सकता है (मत्ती 6:25–33)। परन्तु आर्थिक असुरक्षा के प्रति हमारे भय की समस्या अधिकतर इस बात से कम जुड़ी हुई होती है कि हमें क्या चाहिए, और इस बात से अधिक जुड़ी हुई होती है कि हम क्या चाहते हैं।
यीशु के प्रति समर्पण करना, हमारी इच्छाओं को सांसारिक लालसाओं से स्वर्गीय लालसाओं की ओर मोड़ देता है। इसका यह अर्थ नहीं है कि हमें अपने धन सम्बन्धी स्थिति के प्रति असावधान रहना चाहिए या फिर बचत करना और परिश्रम पूर्वक तथा उचित रूप से निवेश करना बन्द कर देना चाहिए। परन्तु इसका अर्थ यह है कि हम धन सम्बन्धी विषय में जो विश्वास करते हैं उसे यीशु के साथ जोड़ने के लिए पुनः व्यवस्थित करें, जिसने कहा कि लेने से देना धन्य है (प्रेरितों के काम 20:35) और यह भी कि तुम परमेश्वर और धन दोनों की सेवा नहीं कर सकते (मत्ती 6:24)। हमारी आर्थिक स्थिति, चाहे बड़ी हो या छोटी, परन्तु यह परमेश्वर का दिया हुआ एक दान है जिसके द्वारा हमें उसका सम्मान करना है। जब हम अपने धन सम्बन्धी विश्वास को मसीह के साथ जोड़ते हैं, तो उन लोगों के प्रति हमारा भय समाप्त हो जाता है जो हमारी आर्थिक स्थिति को प्रभावित कर सकते हैं।
सरल शब्दों में कहें तो, यीशु आपकी इच्छाओं को बदल देता है। अब आप यह विश्वास नहीं करेंगे कि आनन्द का अनुभव करने के लिए आपको कई एकड़ भूमि पर बहुत बड़ा घर और तरणताल (स्विमिंग पूल) चाहिए। और न ही आपको आनन्दित होने के लिए नई और सबसे अच्छी सेडान कार, ट्रक या एसयूवी कार की आवश्यकता है। न ही आपको चिन्ता या कष्ट से स्वतंत्र होकर सेवानिवृत्ति के बात जीने के लिए भरपूर 401K या व्यक्तिगत सेवानिवृत्ति खाता की आवश्यकता है। इस प्रकार आप उस झूठ से स्वतंत्र हो जाते हैं जो कहता है कि सम्पत्ति आपको आनन्द दिलाएगी। आप इस भय से स्वतंत्र हो जाते हैं कि केवल कुछ लोग आपको धन दे सकते हैं। क्योंकि आप जानते और विश्वास करते हैं कि आपका सच्चा धन यीशु मसीह में है, जो आपके लिए अनन्त सम्पत्ति अर्थात आपका अनन्त घर तैयार करने के लिए गया है। ऐसा विश्वास करना मात्र सन्तुष्ट होने से कहीं अधिक बढ़कर है। यह इस विश्वास के प्रति समर्पण है कि यीशु ने जो कहा वह सत्य है और परमेश्वर के पास जो अनन्त सामर्थ्य और ज्ञान है — वह मनुष्य के पास नहीं है — और हम जो कुछ भी चाहते हैं वह सब कुछ दे सकता है।
लज्जा के भय पर विजयी होना
जब हम मसीह के प्रति समर्पित हो जाते हैं, तो वह हमारे जीवन में सबसे महत्वपूर्ण सम्बन्ध बन जाता है। यीशु ने कहा, “यदि कोई मेरे पास आए, और अपने पिता और माता और पत्नी और बच्चों और भाइयों और बहनों वरन् अपने प्राण को भी अप्रिय न जाने, तो वह मेरा चेला नहीं हो सकता” (लूका 14:26)। मसीह के साथ एकता का अर्थ है कि प्रत्येक अन्य सम्बन्ध से, यहाँ तक कि हमारे अपने जीवन से भी बढकर, प्रभु को स्वीकार करके स्वयं को समर्पित करना है। मसीह के द्वारा विजय पाने के लिए आवश्यक है कि हम मसीह में बनें रहें—अर्थात् हमें उसके लिए अपना सब कुछ त्यागने के लिए तैयार रहना चाहिए (लूका 14:33)। लोग हमारे विषय में क्या सोचते हैं, इसका भय उस बड़ी चिन्ता को दूर कर देता है और प्रभावी हो जाता है कि यीशु हमारे विषय में क्या सोचता है।
जब मसीह हमारे हृदय के सिंहासन पर विराजमान होता है, तो हम दूसरों की स्वीकृति पाने के विपरीत परमेश्वर को प्रसन्न करने वाले जीवन पर ध्यान देते हैं। तब हम भी पौलुस के समान कह सकते हैं कि, “मैं सुसमाचार से नहीं लज्जाता,” क्योंकि यीशु हमारा जीवन हैं (रोमियों 1:16)! हो सकता है कि लोग ठेस पहुँचाने वाली बातें कहें। वे हमारा उपहास उड़ा सकते हैं। हो सकता है कि हमारे मित्र भी कम हो जाएँ। परन्तु यीशु मसीह में हमारी स्थिति हमें बताती है कि हमें पूरी रीति से प्रेम किया गया है और परमेश्वर के परिवार में हम लेपालक हो चुके हैं। और अपनी अपार दया में परमेश्वर ने हमारे पापों को अनदेखा किया और मसीह में हमें क्षमा करने का निर्णय लिया है। हमारे लिए एक सुरक्षित अनन्त सम्पत्ति रखी गई है और वहाँ यीशु ने हमारे लिए घर तैयार किया है। इस विश्वास को ध्यान में रखते हुए, अब हम इस बात से नहीं डरते कि लोग हमारे विषय में क्या सोचेंगे या कहेंगे — अर्थात् हमारे मुँह के सामने या पीठ पीछे — क्योंकि हम राजा यीशु के लिए जीवन जीते हैं।
तर्क-वितर्क के भय पर विजय पाना
जब हम यीशु के प्रति समर्पण करते हैं, तो हम प्रेम और आत्मविश्वास से भरे हृदय के साथ तर्क-वितर्क, मतभेद और टकराव का सामना कर सकते हैं। जब हमारे विश्वास के विषय में टकराव की बात आती है, तो यीशु ने शिष्यों को आज्ञा दी कि, “जब वे तुम्हें पकड़वाएँगे तो यह चिन्ता न करना, कि तुम कैसे बोलोगे और क्या कहोगे; क्योंकि जो कुछ तुम को कहना होगा, वह उसी समय तुम्हें बता दिया जाएगा। क्योंकि बोलनेवाले तुम नहीं हो परन्तु तुम्हारे पिता का आत्मा तुम्हारे द्वारा बोलेगा” (मत्ती 10:19-20)। जब हमें आवश्यकता हो, तो परमेश्वर हमें ठीक वही दे सकता है जिसकी हमें आवश्यकता है। हमारा कार्य केवल इतना है कि हम यीशु पर ध्यान केंद्रित करें और उसके लिए बिना किसी लज्जा के जीएँ।
विश्वास सम्बन्धी चर्चाओं के बाहर सभी सांसारिक विषयों में, किसी तर्क, असहमति या टकराव में विश्वासी की सफलता परिणाम से नहीं, वरन् प्रक्रिया से निर्धारित होती है। हमारा उद्देश्य प्रेम से बात करना, दूसरे व्यक्ति के दृष्टिकोण पर विचार करना, उनके प्रति भलाई की इच्छा रखना, स्वयं की सेवा करवाने से पहले उनकी सेवा करना, और अंततः अपने पड़ोसी से प्रेम करने के द्वारा यीशु की महिमा करना है। यीशु ने इसे व्यक्त करते हुए कहा, “और जो कोई तुझे कोस भर बेगार में ले जाए तो उसके साथ दो कोस चला जा” (मत्ती 5:41)। इसका अर्थ यह नहीं कि मसीहियों को अपनी राय दूसरों की इच्छाओं के आगे झुकाकर कुचले जाने के लिए कहा जाता है। परन्तु इसका अर्थ यह अवशय है कि हमें संघर्ष को अलग दृष्टिकोण से देखना चाहिए। हम मसीही होने का दावा करने वालों को पापपूर्ण व्यवहार के कारण नहीं छोड़ सकते हैं क्योंकि हम उनसे प्रेम करते हैं। हम जीवन, परमेश्वर और पवित्रशास्त्र के विषय में अविश्वासियों के किसी भी कठिन प्रश्न पर चर्चा करना इसलिए चाहते हैं क्योंकि हम उनसे प्रेम करते हैं। मसीह के साथ हमारी एकता और उसके नाम को महिमा और सम्मान देने की हमारी इच्छा से, हमारे तर्क-वितर्क के भय पर विजय प्राप्त होती है।
अस्वीकार किए जाने के भय पर विजय
जब हम मसीह के प्रति समर्पित हो जाते हैं, तो परमेश्वर हमें अपने सिद्ध परिवार का सदस्य स्वीकार करता है। जैसा कि यीशु ने मरकुस 3:35 में कहा है, “क्योंकि जो कोई परमेश्वर की इच्छा पर चले, वही मेरा भाई, और बहन और माता है।” जब आप मसीह के साथ एक हो जाते हैं, तो परमेश्वर आपका पिता बन जाता है, स्वर्ग आपका घर होता है, और कलीसिया आपका परिवार होती है। मसीह यीशु में परमेश्वर के प्रेम से हमें कोई भी अलग नहीं कर सकता है। जब हमारा ध्यान अपने उद्धारकर्ता को प्रसन्न करने पर होता है, तब हम लोगों को प्रसन्न करने या उन्हें शान्त करने के प्रलोभन पर विजय पा लेते हैं। यह हमें इस योग्य भी बनाता है कि हम लोगों से उसी प्रकार प्रेम करें जैसे मसीह ने हमसे किया है — अर्थात् बहुतायत के साथ बिना किसी शर्त के।
संसार के लोगों के द्वारा अस्वीकार किया जाना कोई नई बात नहीं है जिससे आपको डरना पड़े — वरन् यह तो मानकर चलना ही होगा कि ऐसी घटनाएँ पहले भी घट चुकी हैं! जैसा कि यीशु अपनी महायाजकीय प्रार्थना में कहता है, “मैंने तेरा वचन उन्हें पहुँचा दिया है, और संसार ने उनसे बैर किया, क्योंकि जैसा मैं संसार का नहीं, वैसे ही वे भी संसार के नहीं” (यूहन्ना 17:14)। जब हम यीशु के साथ एक हो जाते हैं, तो हम संसार के पुराने पापी जीवन से अलग हो जाते हैं, “क्योंकि जो कुछ संसार में है, अर्थात् शरीर की अभिलाषा, और आँखों की अभिलाषा और जीविका का घमण्ड, वह पिता की ओर से नहीं, परन्तु संसार ही की ओर से है” (1 यूहन्ना 2:16)। कलीसिया वह स्थान है जहाँ हम दूसरों के साथ सम्बन्धों में होते हैं, क्योंकि हम समझते हैं कि संसार के साथ हमारा कुछ भी साझा नहीं है। जब हम मसीह के प्रति समर्पित हो जाते हैं और उसमें अपनी स्वीकार किए जाने की लालसा पूरी होते हुए देखते हैं, तो साथियों या व्यावसायिक सहकर्मियों का दबाव समाप्त हो जाता है।
कष्ट एवं पीड़ा पर विजय पाना
जब हम मसीह के प्रति समर्पित होते हैं, तो हम दुःख और कष्ट को इस दृष्टि से स्वीकार करते हैं कि यह हमें मसीह के समान बनने का माध्यम है। पौलुस इस सम्बन्ध में अधिकाँश यह कहता है, “वरन् मैं अपने प्रभु मसीह यीशु की पहचान की उत्तमता के कारण सब बातों को हानि समझता हूँ। जिसके कारण मैंने सब वस्तुओं की हानि उठाई, और उन्हें कूड़ा समझता हूँ, ताकि मैं मसीह को प्राप्त करुँ” (फिलिप्पियों 3:8)। पतरस तो हमें दुःख की आशा करने के लिए भी कहता है: “हे प्रियों, जो दुःख रूपी अग्नि तुम्हारे परखने के लिये तुम में भड़की है, इससे यह समझकर अचम्भा न करो कि कोई अनोखी बात तुम पर बीत रही है।पर जैसे-जैसे मसीह के दुःखों में सहभागी होते हो, आनन्द करो, जिससे उसकी महिमा के प्रगट होते समय भी तुम आनन्दित और मगन हो” (1 पतरस 4:12-13)। यदि यीशु ने दुःख उठाया है, तो हमें भी दुःख उठाने की उम्मीद करनी चाहिए। इससे दुःख उठाना सुखद नहीं, वरन् सहने योग्य हो जाता है क्योंकि हम जानते हैं कि हम मसीह के समान बनते जा रहे हैं। मसीह के साथ हमारी एकता हमारी इच्छाओं को इस प्रकार परिवर्तित कर देती है कि अब हम केवल आराम की चाह नहीं, वरन् मसीह के समान बनने की अभिलाषा करते हैं।
हमें दुःख और कष्ट की खोज नहीं करनी चाहिए, परन्तु इसके आने से हमें आश्चर्य भी नहीं करना चाहिए। यह स्मरण रखना महत्वपूर्ण है कि पौलुस और पतरस मसीह के साथ एकता के कारण होने वाले दुःखों के विषय में बात कर रहे हैं। जब हम पाप में होने, व्यवस्था तोड़ने या विवेकहीन निर्णय लेने के कारण पीड़ा का अनुभव करते हैं, तो हमें उसे सच्चे अर्थ में पीड़ा नहीं मानना चाहिए — वरन् इसे अनुशासन के रूप में देखना अधिक उचित होता है। परन्तु इस दुःख के भय को हमें मसीह की आज्ञाकारिता में चलने से नहीं रोकना चाहिए। क्योंकि यदि हम अपनी इच्छाओं, महत्वाकांक्षाओं और जीवन को मसीह के हाथों समर्पित कर रहे हैं, तो हम एक सीमा तक दुःख और कष्ट उठाएँगे, जैसे कि उसने स्वयं उठाए हैं।
चर्चा एवं मनन:
- भाग 1 से अपने धन सम्बन्धी उद्देश्यों को स्मरण कीजिए। क्या आपको लगता है कि ये उद्देश्य उस हृदय को दर्शाते हैं जो मसीह के प्रति समर्पित है और स्वर्ग में धन की इच्छा रखता है? यदि हाँ, तो क्यों? यदि नहीं, तो क्यों नहीं?
- भाग 1 से लज्जित होने के अपने भय को स्मरण करें। मसीह के साथ आपकी एकता आपको इस भय पर विजय पाने में कैसे सहायता करती है? क्या लज्जित होने के भय ने आपको किसी के साथ सुसमाचार बाँटने से रोका है? प्रार्थना करें कि परमेश्वर आपको उस भय पर विजय पाने का अवसर प्रदान करे।
- क्या अभी कोई ऐसा व्यक्ति है जिससे आप इसलिए बच रहे हैं क्योंकि आप उसके साथ तर्क -वितर्क करने या असहमति में नहीं पड़ना चाहते हैं? आपको क्या लगता है कि आप उसे वह प्रेम कैसे दिखा सकते हैं जो मसीह ने आपको दिखाया है?
- यीशु के द्वारा आपको स्वीकार किए जाने से उन लोगों से प्रेम करने की आपकी योग्यता पर क्या प्रभाव पड़ता है जिन्हें आप प्रसन्न करने के लिए प्रलोभित होते हैं? उन्हें प्रेम करना और उन्हें प्रसन्न करने का प्रयास करने से कैसे भिन्न है?
- क्या आप अपने जीवन में किसी प्रकार का दुःख या कष्ट का अनुभव कर रहे हैं? आपको क्या लगता है कि इस दुःख का कारण क्या है? यदि यह इसलिए है क्योंकि आप मसीही हैं, तो यह आपको किस प्रकार से मसीह के समान बना रहा है? क्या आपने कष्ट या पीड़ा के भय से कुछ न करने का निर्णय लिया है? मसीह के प्रति समर्पण करने से उस कार्य के प्रति आपके दृष्टिकोण में क्या बदलाव आया है?
निष्कर्ष
एरिक लिडेल ने यीशु मसीह के प्रति समर्पण के द्वारा मनुष्य के प्रति अपने भय पर विजय प्राप्त की — और फिर भी उन्होंने ओलम्पिक दौड़ जीत ली। परन्तु मनुष्य के भय पर विजय प्राप्त करने का अर्थ हमेशा सुन्दर पुष्पमालाएँ और स्वर्ण पदक प्राप्त करना नहीं होता है।
1937 में, एरिक की प्रसिद्ध दौड़ के कुछ ही वर्ष पश्चात्, एक युवा जर्मन पास्टर ने जर्मन भाषा में “नचफॉल्गे” नामक एक पुस्तक प्रकाशित की, जिसका अर्थ है “अनुसरण का कार्य।” इस पुस्तक में युवा पास्टर ने सस्ते अनुग्रह और बहुमूल्य अनुग्रह के बीच के अन्तर पर चर्चा की।
सस्ता अनुग्रह पश्चाताप की आवश्यकता के बिना ही क्षमा का उपदेश है, कलीसिया के अनुशासन के बिना बपतिस्मा, तथा अंगीकार के बिना प्रभु भोज दिया जाना हैं। सस्ता अनुग्रह शिष्यत्व के बिना अनुग्रह है, क्रूस के बिना अनुग्रह है, जीवित और देहधारी यीशु मसीह के बिना अनुग्रह है… वहीं बहुमूल्य अनुग्रह वह धन है जो खेत में छिपा हुआ है; जिसके कारण कोई व्यक्ति आनन्द के साथ जाकर अपनी सारी वस्तुएँ बेच देता है…यह यीशु मसीह का बुलावा है, जिस पर शिष्य अपने जाल छोड़कर उसका अनुसरण करते हैं।
डिट्रिच बोनहेफ़र की पुस्तक उस समय प्रकाशित हुई जब उन्हें बर्लिन विश्वविद्यालय में विधिवत् ईश्वर विज्ञान पढ़ाने से हटा दिया गया था। कुछ ही समय बाद, जर्मनी में कॉन्फ़ेसिंग कलीसिया के लिए उनके भूमिगत सेमिनरी का पता हिटलर की गुप्तचर पुलिस को चल गया, जिन्होंने सेमिनरी को बन्द कर दिया और लगभग 27 पास्टर और छात्रों को गिरफ़्तार कर लिया। जैसे-जैसे दबाव बढ़ता गया, 1939 में न्यूयॉर्क के यूनियन थियोलॉजिकल सेमिनरी में पढ़ाने का अवसर मिला और यूरोप में मण्डरा रहे खतरों से बच निकलने का मार्ग खुला। बोनहेफ़र ने यह अवसर स्वीकार किया — परन्तु तुरन्त ही पछतावा किया। मसीह के सामने समर्पण करने के बुलावे ने उन्हें दृढ़ निश्चयी बना दिया, और इसलिए उन्हें लगा कि उन्हें मसीह के समान कष्ट सहने के लिए बुलाया गया है। दो हफ़्ते बाद वह जर्मनी लौट गए।
बोनहेफ़र की पुस्तक आज भी “द कोस्ट ऑफ डिसाइपलशिप” के नाम से सबसे अधिक जानी जाती है, और यह उनके कथन के लिए प्रसिद्ध है: “जब मसीह किसी व्यक्ति को बुलाता है, तो वह उसे अपने आप का इनकार करने और मरने के लिए बुलाता है।”
5 अप्रैल 1943 को बोन्होफ़र को अंततः गिरफ्तार कर लिया गया। अपना अन्तिम उपदेश देने के बाद, बोन्होफ़र एक अन्य कैदी की ओर झुके और बोले, “यह अन्त है। परन्तु मेरे लिए, यह जीवन का आरम्भ है।”
कई वर्षों के बाद, एक जर्मन चिकित्सक, जो फाँसी देने की कार्यवाही का प्रभारी था, उसने इस प्रकार लिखा: “लगभग पचास वर्षों तक चिकित्सक के रूप में कार्य करते हुए मैंने कदाचित् ही कभी किसी मनुष्य को परमेश्वर की इच्छा के प्रति इस प्रकार पूर्ण रीति से इतना समर्पित होकर मरते हुए देखा है।”
बोन्होफ़र परमेश्वर के प्रति अति प्रेम से भर गए थे और यीशु के प्रति समर्पण के द्वारा उन्होंने मनुष्य के प्रति अपने भय पर विजय पा ली थी। वह अपनी शारीरिक मृत्यु की ओर शान्ति और आत्मविश्वास के साथ चलने में योग्य रहे, क्योंकि वह पहले से ही स्वयं के लिए मर चुके थे, वह मसीह के साथ क्रूस पर चढ़ाया गया था, और उसका जीवन अब उसका नहीं, वरन् मसीह का था।
अन्तिम टिप्पणियाँ
- एडवर्ड टी. वेल्च, व्हेन पीपल आर बिग एंड गॉड इज़ स्मॉल: ओवरकमिंग पीयर प्रेशर, कोडिपेंडेंसी, एंड द फ़ियर ऑफ़ मैन (P&R पब्लिशिंग), 1997.
- एडवर्ड टी. वेल्च, व्हेन पीपल आर बिग एंड गॉड इज़ स्मॉल: ओवरकमिंग पीयर प्रेशर, कोडिपेंडेंसी, एंड द फ़ियर ऑफ़ मैन (P&R पब्लिशिंग), 1997.
विषयसूची
- 1 मनुष्य का भय
- धन का भय
- लज्जित होने का भय
- तर्क-वितर्क का भय
- अस्वीकार किए जाने का भय
- पीड़ा का भय
- चर्चा एवं मनन:
- 2 परमेश्वर का भय
- भय के बीच अन्तर
- “परमेश्वर का भय हमें उसकी इच्छा को चाहने के लिए प्रेरित करता है।”
- चर्चा एवं मनन:
- 3 समर्पण के द्वारा विजय
- धन सम्बन्धी भय पर विजय पाना
- लज्जा के भय पर विजयी होना
- तर्क-वितर्क के भय पर विजय पाना
- अस्वीकार किए जाने के भय पर विजय
- कष्ट एवं पीड़ा पर विजय पाना
- चर्चा एवं मनन:
- निष्कर्ष
- अन्तिम टिप्पणियाँ