#7 यौन शुद्धता
परिचय: परमेश्वर की “हाँ”
मैंने मसीही यौन नैतिकता के विषय में सिखाने के लिए जितना लम्बी हवाई यात्रा के दौरान सीखा है, उतना कहीं और नहीं सीखा। यह बात थोड़ी विचित्र लग सकती है, इसलिए मुझे समझाने दीजिए। “लम्बी हवाई यात्रा” से मेरा अभिप्राय यह है कि दो घंटे से अधिक समय की यात्रा — अर्थात् इतनी लम्बी यात्रा कि मेरे बगल में बैठे यात्री से विस्तार से बातचीत की जा सके। और तब अपने बगल में बैठे यात्री से बातचीत करने के पश्चात्, मैंने इस बात पर ध्यान देना आरम्भ किया कि वह एक निर्धारित ढर्रे पर चल रहा था: मेरे समीप बैठे यात्री ने मुझ से पूछा कि मेरा व्यवसाय क्या है, मैंने उसे उत्तर दिया कि मैं एक मसीही लेखक और सुनाने और देखने के लिए वीडियो रिकार्डिंग करता हूँ, यह सुनते ही वह तुरन्त मुझ से कुछ इस प्रकार का प्रश्न करता है: “तो क्या इसका अर्थ यह है कि आप विवाह के अतिरिक्त यौन सम्बन्ध बनाने के विरोध में हैं? और साथ ही, क्या आप समलैंगिक विवाह, गर्भपात, आकस्मिक यौन सम्बन्ध, समलैंगिक लोगों के विरोध में हैं?”
सर्व प्रथम, मैं सीधे इन प्रश्नों के उत्तर देने का प्रयास करूँगा — यह समझाते हुए कि बाइबल के आधार पर मैं विवाह के बाहर एक पुरुष और एक स्त्री के बीच यौन सम्बन्ध, समलैंगिक व्यवहार, अजन्मे शिशुओं की हत्या, वैकल्पिक लिंग पहचान, और इस प्रकार की अन्य बातों के विरोध में क्यों हूँ। परन्तु कुछ बातचीत करने के पश्चात्, जो बात बार-बार दोहराई हुई सी लगीं और जिनसे अधिक लाभ नहीं हुआ, इस कारण मैंने अपने उत्तर पर फिर से विचार करना आरम्भ कर दिया। और तब मैं समझ गया कि अपने सह यात्रियों के “क्या आप इसके विरोध में हैं…” प्रश्नों का उत्तर देकर, मैं एक छिपी हुई धारणा को स्वीकार कर रहा था: कि मसीहियत एक ऐसा विश्वास है जो मुख्य रूप से इसके “नहीं” से परिभाषित होता है – अर्थात् उन कार्यों को करने लिए जिन्हें यह मना करता है।
मैंने स्वयं से एक प्रश्न पूछा: क्या यह सच है? क्या मेरा विश्वास परमेश्वर के द्वारा मना किए गए कार्यों की एक लम्बी सूची से अधिक कुछ नहीं है? क्या मैंने अपना जीवन सृष्टि से सम्बन्धित आनन्द में विघ्न डालने वाले आदेशों की रक्षा और उन्हें लागू करने के लिए समर्पित कर दिया है? क्या सही और गलत को लेकर मसीही समझ वास्तव में एक छोटे से कठोर शब्द “ना” में ही जुड़ी हुई है? यदि ऐसा है, तो क्या मसीही विश्वास ग्रहण करने योग्य है?
यह कोई संयोग नहीं है कि ये उच्च-स्तरीय बातचीत हमेशा यौन सम्बन्ध पर ही आकर टिक जाती है। हमारी संस्कृति इससे मुग्ध है, और यौन आकर्षण, अनुभवों और इसके प्रति झुकाव को एक मनुष्य की पहचान तथा सर्वोच्च मूल्य मानती है। और जब तक सहमति बनी रहती है, तब तक सब कुछ ठीक चलता रहता है! परन्तु अब कल्पना कीजिए कि जो लोग स्वयं को यौन रूप से स्वतंत्र मानते हैं, उनकी दृष्टि में मसीही लोग कैसे दिखाई देते होंगे। 1990 के दशक में वापस जाए, और यौन सम्बन्ध पर कोई भी मसीही पुस्तक पढ़ें, तो एक शब्द प्रमुखता से सामने आता है: “नहीं।”
जिस समय को सुसमाचारवादी अधिकाँश “शुद्ध संस्कृति” कहते थे, उस स्वर्णकाल में, लेखक, पास्टर, सम्मेलन और शिक्षक लगातार इस छोटे से शब्द का उपयोग करते थे: “विवाह-पूर्व यौन सम्बन्ध नहीं,” “मनोरंजक मुलाकात नहीं,” “अँगूठी से पहले चुम्बन नहीं,” “अश्लील कपड़े नहीं,” “वासना नहीं,” “अश्लील साहित्य या पिक्चर नहीं,” “विपरीत लिंग के साथ अकेले में समय नहीं।” नहीं। नहीं। नहीं।
परन्तु अब मैं यह नहीं मानता कि “शुद्ध संस्कृति” उतनी भद्दी या विपरीत थी जितना कि आज के आलोचक उसके विषय में सुझाव देते हैं। मैंने अभी उपरोक्त जो “ना” गिनाए हैं, उनमें से कुछ तो अच्छे और ईश्वरीय सलाह हैं! परन्तु कहीं न कहीं, यह धारणा बन गई है कि मसीही नैतिकता — विशेषकर यौन नैतिकता — पूरी रीति से “ना” से बनी है। यह विचार साधारण लोगों की सोच में घर कर गया और बस गया है। मुझे लगता है कि इस धारणा ने मसीहियों के रूप में हमारी छवि को वास्तव में हानि पहुँचायी है, और सुसमाचार साझा करने के हमारे अवसरों को भी कम कर दिया है।
शब्द “शुद्धता” जिसे मेरी किशोरावस्था के वर्षों में सुसमाचारवादी लेखकों के द्वारा बार-बार प्रयोग किया जाता था, जिसका तात्पर्य साफ-सफाई, और किसी “गन्दी” वस्तु से अलग होने की भावना को जगाना होता था। हम पानी को “शुद्ध” तब कहते हैं जब उसमें कोई दूषित पदार्थ न हो। परन्तु यदि उसमें थोड़ा सी भी गन्दगी मिला दें, तो वह अशुद्ध हो जाता है! यह समझना कठिन नहीं है कि जब पाठक इस शब्द से सामना करते हैं, तो वे आसानी से यह गलत निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि यौन सम्बन्ध ही अपने आप में वह “गन्दगी” है जिससे मसीही लोग स्वयं को बचाना चाहते हैं और इसलिए मसीही लोग न केवल “नहीं” शब्द से पीड़ित हैं, वरन् यौन सम्बन्ध के विरोध में भी हैं!
यह आवश्यक नहीं है कि समस्या “शुद्धता” शब्द में ही हो (परन्तु यह शब्द इस मार्गदर्शिका के शीर्षक में भी है!)। और न ही समस्या “ना” शब्द में है, यह तो वास्तव में एक बहुत उपयोगी शब्द है। “नहीं” कहने से जीवन भी बच सकता है! मैं एक पिता हूँ, और अपने बच्चे को सामने से आती हुई गाड़ी के सामने दौड़ने से रोकने के लिए “नहीं!” चिल्लाने से अधिक प्रभावशाली तरीका सम्भवतः ही कोई दूसरा नहीं हो सकता है। मैं निश्चित रूप से अपने छह वर्षीय बेटे को न्यूटन सम्बन्धी भौतिकी पर विस्तृत व्याख्यान नहीं दूँगा, जिससे कि वह अमेरिकी ऑटोमोबाइल कम्पनी को चुनौती देने के विषय में अपना मन बदल सके। “नहीं” एक उत्तम शब्द है। यह बच्चों और बड़ों दोनों को लगातार मूर्खतापूर्ण, खतरनाक, अनैतिक और आत्म-विनाशकारी व्यवहार से बचाता है। और धन्यवाद हो कि यह छोटा सा चिल्लाने का कार्य सरल है!
परमेश्वर भी कई बार “नहीं” कहता है। अपने चुने हुए लोगों को उसने जो व्यवस्था दी थी, जो सीनै पर्वत पर गरज और तूफ़ानी बादलों के बीच मूसा को दी गई थी, उसके मूल में दस आज्ञाओं की एक सूची है जो इतिहास में गूँजती है और आज भी यहूदी और मसीही नैतिकता का आधार है। हम इस सत्य की अनदेखी नहीं कर सकते कि इन दस आज्ञाओं में “नहीं” (या पुराने अंग्रेज़ी संस्करण में कहें तो “तू यह न करना”) का बोलबाला है।
अधिकाँश मसीही इतिहास में, इन आठ निषेधात्मक आज्ञाओं को परमेश्वर की नैतिक व्यवस्था का सार माना गया है — या यूँ कहें कि ये उसकी स्वाभाविक विशेषताओं पर आधारित सही और गलत के अनन्तकाल के सिद्धान्त हैं। “तू अपने लिए कोई मूर्ति खोदकर न बनाना,” “तू व्यभिचार न करना,” “तू हत्या न करना,” और शेष सभी अच्छी नैतिक आज्ञाएँ हैं। इन आज्ञाओं का पालन करना इस्राएल के लिए प्रतिज्ञा किए गए देश में बने रहने की एक शर्त थी, और यीशु ने स्वयं इन्हें दोहराया है। (मरकुस 10:19) ये आज्ञाएँ खरी हैं, “वह प्राण को बहाल कर देती है।” बाइबल परमेश्वर के “नहीं” कहने का उत्सव मनाती हैं (भज. 19:7)।
फिर भी, जब इन आज्ञाओं को पवित्रशास्त्र के शेष भागों से अलग करके देखा जाता है, तो ऐसा आभास हो सकता है कि बाइबल की नैतिकता मुख्यतः पाप का विरोध करने के विषय में है, न कि किसी के धर्मी होने का विकल्प देने के विषय में है। यह एक ऐसे माता-पिता के समान है जो अपने बच्चों से हमेशा यही कहते हैं कि, “नहीं!” “इसे बन्द करो!” या “ऐसा मत करो!”, परन्तु उन्हें कभी यह नहीं बताते कि उन्हें क्या करना चाहिए। यह कितनी निराशाजनक बात है! ऐसे बच्चे मानसिक रूप से पंगु हो जाते हैं, और हमेशा इस डर में रहकर काम करते हैं कि कहीं वे अपने पिता के नियमों का उल्लंघन तो नहीं कर रहे हैं।
इससे भी अधिक बुरी बात यह है कि जिन बच्चों को हमेशा केवल “नहीं” कहा जाता है, उनके भीतर यह सन्देह उत्पन्न हो जाता है कि उनके पिता वास्तव में उनके भले के विषय में नहीं सोचते हैं। इसलिए वे यह विश्वास कर सकते हैं कि जो कुछ उनके पिता उन्हें देने से मना कर रहे हैं, वह वास्तव में अच्छा और आनन्दमय है, अर्थात् यह कि जिस फल को उन्होंने खाने से मना किया है, वह वास्तव में मीठा है। अतः वे मानते हैं कि उनके पिता की आज्ञा, ज्ञान और बहुतायत वाले जीवन के मार्ग में एक रुकावट है। वे यहाँ तक सन्देह कर सकते हैं कि उनके पिता यह सब बातें जानते हैं इसलिए जानबूझकर उन्हें इससे वंचित रखना चाहते हैं।
यदि आप इस बात से परिचित हैं, तो इसका कारण यह है कि यही वह झूठ था जिस पर आदम और हव्वा ने उत्पत्ति अध्याय 3 में साँप की बातों पर विश्वास किया था। वह साँप, जिसे हम बाइबल के अन्य भागों में शैतान के रूप में जानते हैं, प्रथम मनुष्यों को यह विश्वास दिलाने में सफल हो गया कि परमेश्वर वास्तव में उनके पक्ष में नहीं है —वह जानबूझकर उनसे कोई भली और पोषण देने वाली वस्तु छिपा रहा है, और उसने उन्हें उस भलाई में सहभागी होने से रोकने के लिए उनसे झूठ बोला है।
भले ही अन्त में आदम और हव्वा को यह पता चल गया था कि वास्तविक झूठा तो साँप ही था। अपने बच्चों से कुछ भी अच्छा छिपाने के बजाय, परमेश्वर ने उन्हें वह सब कुछ दिया जो वे सम्पूर्ण और आनन्दमय जीवन जीने के लिए चाहते थे: जैसे कि स्वादिष्ट भोजन, एक हरा-भरा और सुन्दर घर, भाँति- भाँति के पशु साथी और प्राकृतिक संसाधन – यहाँ तक कि एक दोषरहित यौन साथी जिसके साथ वे प्रेम बाँट सकें और सन्तान उत्पन्न कर सकें! परन्तु परमेश्वर की “हाँ” से भरे इस अद्भुत संसार के बीच, उन्होंने उसकी एक “नहीं” पर ध्यान दिया—अर्थात् भले या बुरे के ज्ञान का जो वृक्ष है, उसका फल तू कभी न खाना। परन्तु उन्होंने कभी यह नहीं सोचा कि परमेश्वर की “नहीं” उसके सभी सकारात्मक वरदानों की रक्षा के लिए थी। इसलिए उस दिन से लेकर आज तक, हम उनकी इस अयोग्यता के कारण दुःख उठा रहे हैं और मरते जा रहे हैं क्योंकि वे परमेश्वर की सबसे बड़ी “हाँ” को समझ नहीं पाए थे।
इस क्षेत्र मार्गदर्शिका में, मैं यह समझाना चाहता हूँ कि मसीही यौन नैतिकता — जिसे हम अधिकतर “यौन शुद्धता” भी कहते हैं— अदन की वाटिका में उस “नहीं” के समान दिखाई दे सकती है। हाँ, यह कुछ ऐसे कामों को करने से मना करती है जो हम कभी-कभी करना चाहते हैं। परन्तु हम कभी भी इस बात को नहीं समझ पाते हैं कि परमेश्वर हमें उन कार्यों को करने से क्यों रोकता है। परन्तु यह समझना महत्वपूर्ण है। (और साथ ही अविश्वासियों को भी समझाने में सहायता करें) कि जब यौन सम्बन्ध की बात आती है तो मसीही लोग जो “नहीं” पर बल देते हैं, वे वास्तव में एक सुन्दर, गहरी, जीवन देने वाली “हाँ” की रक्षा करते हैं।
परमेश्वर के पास एक वरदान है जिसे वह सच्चे हृदय से हमें देना चाहता है। और वह वरदान बहुतायत का जीवन है — अर्थात् एक मनुष्य के रूप में, और एक यौन प्राणी के रूप में! वह हमें यह वरदान देना चाहता है, चाहे हम कभी यौन सम्बन्ध का अनुभव करें या न करें (मैं इस बात को बाद में समझाऊँगा)। परन्तु यह समझने के लिए कि वह उन बहुत सी बातों के लिए “नहीं” क्यों कहता है जिन्हें हमारे अविश्वासी पड़ोसी या हवाई सहयात्री उत्सव के समान मनाते हैं, हमें पहले उसके वरदान का अध्ययन करना होगा, और यह जानना होगा कि हमारी संस्कृति ने इसे इतने दुखद रूप से कैसे गलत समझा है।
ऑडियो मार्गदर्शिका
ऑडियो#7 यौन शुद्धता
भाग I: वह कोई भी भली वस्तु नहीं रोकता है
आप किसी भी भली वस्तु से वंचित नहीं हैं
जैसे अदन की वाटिका में हुआ था, वैसे ही परमेश्वर की “नहीं” की आज्ञा का उल्लंघन करने का आकर्षण हमेशा इसी झूठ से आरम्भ होता है कि वह हमसे कोई भली वस्तु छिपा रहा है। सर्प ने हव्वा से यही कहा था। और यही बात वह आज भी हर उस व्यक्ति से कहता है जो ऐसे काम करना चाहता है जिन्हें करने के लिए परमेश्वर मना करता है, विशेषकर यौन सम्बन्धी व्यवहार के विषय में।
इस विषय में सोचिए: हर वह व्यक्ति जो अपनी प्रेमिका या प्रेमी के साथ शारीरिक सम्बन्ध बनाता है, अश्लील सामग्री देखते है, केवल एक रात का सम्बन्ध बनाते है, समलैंगिक सम्बन्धों में लिप्त होते है, या किसी अनचाही गर्भावस्था को समाप्त करते है — वह किसी ऐसी वस्तु की खोज में रहते हैं जिसे वे अच्छा या लाभकारी समझते हैं। इस प्रकार का आनन्द, भावनात्मक जुड़ाव, अकेलेपन से राहत, वह प्रेम जो उन्हें कभी नहीं मिला, शक्ति या नियंत्रण की भावना, या पिछले गलत निर्णय के परिणामों का बचाव हो सकता है। परन्तु इन सभी लोगों को वह वस्तु जो वे चाह रहे हैं, अच्छी और चाहने योग्य लगती है — ठीक वैसे ही जैसे हव्वा ने वह वर्जित फल खाया जो देखने में अच्छा और मनभाऊ था (उत्पत्ति 3:6)।
मसीही लोग कोई विशेष नहीं हैं। भले ही हम परमेश्वर की व्यवस्था को जानते हैं, फिर भी हम इस प्रकार के तथा अन्य पापों की परीक्षाओं में पड़ जाते हैं। अविश्वासियों के यौन आकर्षणों को देखकर, हमें यह बेचैनी हो सकती है कि हम इस आनन्द से वंचित रह गए हैं। आप समझ रहे हैं कि मैं क्या कह रहा हूँ: हमारे भीतर कहीं गहराई में यह सन्देह उत्पन्न होता है कि हमारी संस्कृति जिस जीवनशैली का उत्सव मनाती है, वह वास्तव में अधिक रोमांचक, स्वतंत्र और सन्तोष जनक है, उस जीवनशैली की तुलना में जो परमेश्वर हमारे लिए चाहता है।
और अधिक कुछ कहने से पहले एक बात स्पष्ट कर लें: हम परमेश्वर की व्यवस्था का पालन मुख्य रूप से इस आशा से नहीं करते कि हमें पृथ्वी पर कोई प्रतिफल मिलेगा। परन्तु हम उसकी आज्ञा का पालन इसलिए करते हैं क्योंकि वह परमेश्वर है और हम उसके हैं।
उसने हमें बनाया है, और (यदि हम मसीही हैं) तो उसने मसीह के लहू के द्वारा भारी दाम चुकाकर हमें नए सिरे से खरीदा है। हम आज्ञा पालन करते हैं क्योंकि यह सही है। कोई वस्तु जो अच्छी दिखती है, वह वास्तव में अच्छी है या नहीं, उसे समझने का एक तरीका यह है कि उसके परिणामों को देख लिया जाए। जब हम अपनी संस्कृति में यौन सम्बन्धों के व्यवहारिक परिणामों का सर्वेक्षण करते हैं, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि उत्तेजना, स्वतंत्रता और सन्तुष्टि की प्रतिज्ञाएँ सब झूठी हैं।
एक उदाहरण से समझिए: एक साथ रहना, जो अब अमेरिका में दीर्घकालिक सम्बन्ध स्थापित करने का सबसे सामान्य तरीका बन गया है। क्या इसका परिणाम आनन्द और स्थायी प्रेम होता है (जिसके लिए अभी भी अधिकाँश लोग कहते हैं कि वे ऐसा ही चाहते हैं)?1 निश्चित रूप से, बहुत से लोग यही मानते हैं कि इसका परिणाम ऐसा ही होगा। प्यू शोध के अनुसार, 18 से 44 वर्ष की आयु के लगभग साठ प्रतिशत अमेरिकी वयस्क किसी न किसी समय वैवाहिक जीवन साथी के अतिरिक्त भी अन्य साथी के साथ रह चुके हैं। केवल पचास प्रतिशत लोगों ने कभी विवाह किया होगा।2 दूसरे शब्दों में कहें तो अब विवाह से पूर्व एक साथ रहना अधिक लोकप्रिय हो गया है। तो इसके परिणाम कैसे होंगे? क्या इस प्रकार से एक साथ रहना आनन्द और स्थायी प्रेम की ओर ले जाता है?
इंस्टिट्यूट फॉर फैमिली स्टडीज़ के ब्रैडफोर्ड विलकॉक्स की रिपोर्ट के अनुसार, जो जोड़े एक साथ रहते हैं, उनमें से केवल तैंतीस प्रतिशत ही अन्त में विवाह कर पाते हैं। चौवन प्रतिशत लोग बिना विवाह किए ही एक-दूसरे को छोड़ देते हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो, साथ रहने का अन्त “हमेशा आनन्दित रहने” की तुलना में, एक-दूसरे से सम्बन्ध टूटने की सम्भावना अधिक बनी रहती है। तब स्थिति और भी अधिक बुरी हो जाती है। सगाई से पहले एक साथ रहने वाले 34 प्रतिशत विवाहित दम्पति पहले दस वर्षों के भीतर ही तलाक ले लेते हैं, जबकि विवाह के पश्चात् साथ रहने की प्रतीक्षा करने वाले दम्पतियों की यह संख्या केवल 20 प्रतिशत है।3
और बात केवल एक साथ रहने तक ही सीमित नहीं है। शोध के अनुसार यह बात स्पष्ट हुई है कि सभी प्रकार के तथाकथित पूर्व वैवाहिक “यौन अनुभव” आपके विवाह करने, वैवाहिक जीवन में बने रहने, और एक-दूसरे के साथ आनन्दमय जीवन बिताने की सम्भावनाओं को हानि पहुँचाते हैं। इंस्टिट्यूट फॉर फैमिली स्टडीज़ के जेसन कैरोल और ब्रायन विलौघबी ने कई अलग-अलग सर्वेक्षणों के निष्कर्षों को संक्षेप में प्रस्तुत करते हुए पाया कि “आरम्भिक वैवाहिक जीवन में तलाक की सबसे कम दर उन विवाहित दम्पतियों में पाई जाती है जिन्होंने केवल एक-दूसरे के साथ ही यौन सम्बन्ध बनाए हैं।”4
विशेष रूप से, उन्होंने लिखा कि, “…वे महिलाएँ जो विवाह तक यौन सम्बन्ध बनाने के लिए प्रतीक्षा करती हैं, उनकी विवाह के पहले पाँच वर्षों में तलाक की सम्भावना केवल 5% होती है, जबकि वे महिलाएँ जो विवाह से पहले दो या अधिक यौन साथी होने की बात स्वीकार करती हैं, उनकी तलाक की सम्भावना 25% से 35% के बीच होती है…”5
अपने नवीनतम शोध में, कैरोल और विलोबी ने पाया कि “यौन रूप से अनुभवहीन” लोग आपसी सम्बन्धों में सन्तुष्टि, स्थिरता और — साथ ही — वे लोग यौन सन्तुष्टि के उच्चतम स्तर का भी आनन्द लेते हैं!6 दूसरे शब्दों में कहें तो, यदि आप एक स्थायी, स्थिर और भरपूर यौन सम्बन्ध चाहते हैं, तो विवाह के पश्चात् यौन सम्बन्ध बनाने की प्रतीक्षा करने से अच्छा कोई दूसरा तरीका नहीं है, जो कि परमेश्वर का तरीका है। इसके विपरीत, विवाह से पहले कई साथियों के साथ यौन “अनुभव” प्राप्त करना — जो कि इस समाज का तरीका है — इस प्रकार के स्थायी और आपसी सम्बन्ध को पाने की सम्भावना को सबसे अधिक हानि पहुँचाता है। ये निष्कर्ष कोई रहस्य नहीं हैं। इन्हें अटलांटिक जैसे धर्मनिरपेक्ष और मुख्यधारा की पत्रिकाओं में व्यापक रूप से प्रकाशित किया गया है।7
आप सोचेंगे कि हमारी संस्कृति यौन सम्बन्धों के प्रति कितनी जुनूनी है, यह बात बार-बार यौन सम्बन्ध बनाने की इच्छा का संकेत देती है। परन्तु आप गलत हैं। यौन स्वतंत्रता तो दूर की बात है, आज अमेरिका के लोग पहले की तुलना में बहुत कम यौन सम्बन्ध बना रहे हैं! वाशिंगटन पोस्ट ने 2019 में बताया कि लगभग एक चौथाई अमेरिकी वयस्क लोगों ने पिछले वर्ष यौन सम्बन्ध नहीं बनाए। बीस वर्ष की आयु के आसपास वाले युवा, अर्थात् वह समूह जिसके बारे में आप अपेक्षा करते हैं कि वह यौन रूप से सबसे अधिक सक्रिय होगा, 1980 और 1990 के दशक में वे युवा लोग अपने माता-पिता की तुलना में अचानक ही बहुत कम यौन सम्बन्ध बनाते थे।8 ऑनलाइन बातचीत, आकस्मिक सम्बन्धों की बढ़ती माँग, और अश्लील सामग्री में असीमित प्रेरणा की उपलब्धता के बावजूद भी इतनी अधिक “स्वतंत्रता” का परिणाम कम सक्रिय यौन जनसंख्या के रूप में सामने आया है।
कौन सा जनसमूह सबसे अधिक यौन सम्बन्ध बनाता है? सम्भवतः अब तक आपको यह जानकर आश्चर्य नहीं हुआ होगा, परन्तु साधारण सामाजिक सर्वे के अनुसार, सबसे अधिक यौन सम्बन्ध बनाने वाला समूह विवाहित जोड़े ही होते हैं!9
संक्षेप में, हमारी संस्कृति में कई लोग आपको यह विश्वास दिलाना चाहेंगे कि शुद्धता एक बोझ है। वे चाहते हैं कि आप मसीही यौन नैतिकता को जीवन जीने का एक प्रतिबन्धित, उबाऊ और असन्तोष जनक तरीका समझें, और पुराने युग के यौन नियमों से स्वतंत्रता को रोमांचक, आनन्दमय और प्रेम सम्बन्धों से भरपूर समझें। वे चाहते हैं कि आप परमेश्वर के नियमों की अवज्ञा को अच्छे जीवन तक पहुँचने के एक छोटे दृष्टिकोण के रूप में देखें। परन्तु सच्चाई यह है कि यदि आप एक स्थायी, स्थिर, भरपूर, सक्रिय यौन सम्बन्ध चाहते हैं, तो परमेश्वर के बताए गए तरीके से काम करने से अधिक विश्वसनीय मार्ग कोई और नहीं हो सकता है। यौन स्वतंत्रता का वर्जित फल उतना मीठा नहीं होता है जितना कि बताया जाता है। यह केवल एक झूठ है। आप किसी भी भली वस्तु से वंचित नहीं हैं। संस्कृति की “हाँ” करना अन्त में मृत्यु लाती है, परन्तु परमेश्वर की “ना” प्रत्येक भली वस्तु की रक्षा करती है — वह सुन्दर वरदान जो वह आपको और मुझे देना चाहता है। हम आगे उसी “हाँ” पर विचार करेंगे।
शुद्धता क्या है?
जब हम “यौन शुद्धता” की बात करते हैं, तो हमारे मन में मलिनता से दूर रहने का एक चित्र बनाना सरल हो जाता है। निश्चित रूप से, हमारी भाषा में “शुद्धता” का अधिकतर यही अर्थ होता है, और कुछ मायनों में यह एक अच्छी समानता भी है। परन्तु इससे यौन सम्बन्ध बनाने में गलती करने वाले लोग भी अपने आप को स्थायी रूप से गन्दा या कलंकित समझते हैं, मानो उन पर कुछ गन्दगी लग गई हो और उस गन्दगी को धोने के लिए उन्हें अच्छे साबुन की आवश्यकता है। मैं उन बेचारे समुद्री जीवों के विषय में सोचता हूँ जो तेल रिसाव के पश्चात् कीचड़ में लिपट जाते हैं। उनकी समस्या यह नहीं होती कि उनमें कुछ कमी है, वरन् समस्या यह होती है कि उन पर बहुत अधिक ऐसी गन्दगी भरी सामग्री चिपक जाती है जिससे उन्हें छुटकारा पाना होता है!
सच कहें तो पाप ऐसा नहीं है।
आइए सृष्टि के आरम्भ में वापस चलते हैं। जब परमेश्वर ने संसार की रचना की, जैसा कि उत्पत्ति अध्याय 1 में वर्णन मिलता है, तो उसने इसे छह बार “अच्छा” कहा। सातवीं बार, जब उसने मनुष्यों की रचना कर दी, तो उसने अपने कार्य को “बहुत अच्छा” कहा (उत्पत्ति 1:31)। यह परमेश्वर का मूल्याँकन सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र की नैतिक पृष्ठभूमि बनाता है। परमेश्वर को अपनी बनाई हुई सृष्टि पसन्द है। इसमें हमारे यौन सम्बन्धों से जुड़े हुए शरीर भी सम्मिलित हैं।
पाँचवीं शताब्दी के कलीसिया के धर्माचार्य हिप्पो के अगस्टीन पहले व्यक्ति थे जिन्होंने पवित्रशास्त्र के अध्ययन के आधार पर यह विचार स्पष्ट रूप से व्यक्त किया कि बुराई का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं होता है। परन्तु यह उस भलाई का भ्रष्ट रूप, विकृति या “अभाव” है जिसे परमेश्वर ने रचा था।10 बुराई तेल की चिकनाई के सामान कम है और प्रकाश के अभाव में अन्धकार के समान अधिक है — या जैसे कोई गड्ढा खोद दे तो वहाँ खालीपन रह जाता है, या जब कोई मारा जाता है तो शव के समान है। हम “अन्धकार”, “खालीपन” और “मृत शरीरों” की बात करते हैं क्योंकि हमारी भाषा हमें ऐसा कहने के लिए विवश करती है, परन्तु वास्तव में ये सब केवल ऐसे खाली स्थान हैं जहाँ प्रकाश, पृथ्वी और जीवन होना चाहिए। बुराई ऐसी ही होती है। हम इसके अस्तित्व के बारे में तभी कह सकते हैं जब यह अच्छी वस्तुओं से ऊर्जा चूसती है। जैसा कि सी. एस. लुईस ने कहा था कि, बुराई एक “परजीवी” है।11 बुराई का अपना कोई अस्तित्व नहीं होता है। उत्पत्ति अध्याय 1 के दृष्टिकोण से, जो कुछ भी अस्तित्व में है, वह “अच्छा” है। यदि कोई वस्तु अच्छी नहीं है, तो वह बाइबल के अर्थ में अस्तित्व ही नहीं रखती है — वह केवल अन्धकार, खालीपन और मृत्यु है।
जब हम पाप करते हैं, तो हम परमेश्वर की बनाई हुई अच्छी वस्तुओं को लेकर उनमें छेद करना चाहते हैं। इस प्रकार हम उजियाले को बुझा रहे होते हैं। हम जीवन को समाप्त कर रहे होते हैं। हम सृष्टि के उद्देश्य को बिगाड़ रहे होते हैं और उस “बहुत अच्छा” कहे गए परमेश्वर के कार्य के विरुद्ध युद्ध छेड़ देते हैं, जिसे उसने सृष्टि के आरम्भ में घोषित किया था। यह बात तब और भी सच हो जाती है जब हम अपने शरीर के साथ पाप करते हैं। यह बात अपने मन में स्पष्ट रूप से बैठा लें कि यौन अनैतिकता केवल गन्दा होना ही नहीं है, वरन् यह आत्मिक रूप से स्वयं को हानि पहुँचाने का कार्य है। यह उस व्यक्ति की धीमी और जानबूझकर की गई हत्या है जिसे परमेश्वर ने आपको बनने के लिए रचा था (यह एक ऐसी स्थिति को बताता है जहाँ आपसी सम्बन्ध में एक व्यक्ति दूसरे को नियंत्रित करने या हेराफेरी करने का प्रयास करता है, जिससे सम्भवतः दुर्व्यवहार की प्रवृत्ति उत्पन्न हो सकती है।)। इसीलिए नीतिवचन 5:5 कहता है कि व्यभिचारी व्यक्ति के पाँव मृत्यु की ओर बढ़ते हैं, और उसके पग अधोलोक तक पहुँचते हैं।
यदि पाप किसी ऐसी वस्तु की अनुपस्थिति है जो वहाँ होनी चाहिए, न कि कोई ऐसा पदार्थ जो आप पर सरलता से लग जाए, जैसे मिट्टी या तेल, तो इसका अर्थ है कि यदि आपने यौन पाप किया है, तो आपको शुद्ध होने के लिए सांसारिक प्रयास करने की आवश्यकता नहीं है। परन्तु आपको चंगाई की आवश्यकता है। आपको पूर्ण रूप से चंगा होने की आवश्यकता है, जैसा कि परमेश्वर ने चाहा था।
हम कैसे जानते हैं कि चंगाई और परिपूर्णता कैसी होती है? हम कैसे जानते हैं कि परमेश्वर ने यौन सम्बन्ध के लिए क्या उद्देश्य रखा है? केवल पवित्रशास्त्र में दी गई उसकी आज्ञाओं से समझ सकते हैं। परन्तु अब तक हमने जो सीखा है, उसके आधार पर अब हम कह सकते हैं कि परमेश्वर की नकारात्मक आज्ञाएँ वास्तव में इस बात का सकारात्मक वर्णन हैं कि उसने हमें कैसे बनाया, जो उलटे क्रम में लिखा गया है। (अर्थात् उलटे क्रम में सुनाई गई कहानी, जहाँ घटनाएँ उनके घटित होने के विपरीत क्रम में प्रस्तुत की जाती हैं)।
उसने कहा “तू ऐसा न करना” वाली आज्ञा वास्तव में एक प्रकार से “तू ऐसा करना” वाली सकारात्मक आज्ञा भी है! जब उसने मूसा से कहा, “तू व्यभिचार न करना” (निर्गमन 20:14), तो वास्तव में वह यह कह रहा था: “तू यौन सम्बन्ध के प्रति पूरी रीति से शुद्ध रहना —अर्थात् मेरे द्वारा तेरे शरीर और सम्बन्धों के लिए बनायी गई उत्तम योजना के अनुसार शुद्ध रहेगा।” या और भी सरल शब्दों में कहें तो, “तू वही बना रहेगा जैसा मैंने तुझे बनाया है।”
क्या आपको यौन शुद्धता, या परमेश्वर की नैतिक आज्ञाओं का यह कोई विचित्र वर्णन लगता है? परन्तु ऐसा नहीं लगना चाहिए। जब यीशु से परमेश्वर के सम्पूर्ण नैतिक व्यवस्था—हर एक आज्ञा—का सारांश देने के लिए कहा गया, तो उसने सभी “ना” शब्दों को हटाकर उसे दो सकारात्मक कथनों में बदल दिया: “तू परमेश्वर अपने प्रभु से अपने सारे मन और अपने सारे प्राण और अपनी सारी बुद्धि के साथ प्रेम रख।””बड़ी और मुख्य आज्ञा तो यही है।” (मत्ती 22:37-40)और उसी के समान यह दूसरी भी है, कि तू अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रख। ये ही दो आज्ञाएँ सारी व्यवस्था एवं भविष्यद्वक्ताओं का आधार है।” ये दोनों सकारात्मक आज्ञाएँ पहले से ही पुराने नियम में विद्यमान थीं (लैव्यव्यवस्था 19:18 और व्यवस्थाविवरण 6:5)। और प्रेरित पौलुस ने भी इस में सहमति जताई, इसे और भी सरल करते हुए यह कहा कि “प्रेम ही व्यवस्था को पूरा करता है” (रोमियों 13:8)।
हम प्रेम करने के लिए बनाए गए हैं। यही मनुष्य होने का अर्थ है, क्योंकि हम उस परमेश्वर के स्वरूप में रचे गए हैं जो स्वयं प्रेम है (1 यूहन्ना 4:16)। आदम के पाप में गिरने से संसार में आया प्रत्येक यौन पाप परमेश्वर के उस सिद्ध प्रेम को दर्शाने में असफल रहा है। और इसका अर्थ है कि यह पूरी रीति से मनुष्य होने में — या स्वयं के सच्चे रूप में होने में असफलता है।
हम कौन हैं? पवित्रशास्त्र और मानव स्वभाव पर मसीही चिन्तन (जिसे धर्मशास्त्री “प्राकृतिक नियम” कहते हैं) के अनुसार, हम एक स्त्री से विवाह करने वाले यौन सम्बन्ध बनाने वाले प्राणी हैं। हम एक पत्नी के साथ यौन सम्बन्ध रखने वाले प्राणी हैं। हम ऐसे प्राणी हैं जो विपरीत लिंग के किसी सदस्य के साथ स्थायी और केवल एक ही प्रेम सम्बन्ध में ही यौन प्रेम व्यक्त करने के लिए बनाए गए हैं।
क्या आप सच में विश्वास करते हैं कि आपको यौन शुद्धता के लिए बनाया गया है? क्या आप यह विश्वास करते हैं कि परमेश्वर के द्वारा यौन सम्बन्धों के लिए दिए गए नियम कोई बाहरी और मनमाने कानून नहीं हैं, वरन् आपके अस्तित्व और भलाई के लिए सच्चे विचार हैं? क्योंकि बाइबल के अनुसार, वे वास्तव में ऐसे ही हैं।
यहाँ एक और उदाहरण है जो मुझे उपयोगी लगा: सी. एस. लुईस ने मनुष्य को ऐसी मशीन बताया है जिसका आविष्कार परमेश्वर ने किया है, ठीक वैसे ही जैसे एक मनुष्य इंजन का आविष्कार करता है।12 जब इंजन के स्वामी की नियमावली आपको बताती है कि टैंक में किस प्रकार का ईंधन डालना है और इंजन का रखरखाव कैसे करना है, तो ये इंजन की स्वतंत्रता पर प्रतिबन्ध नहीं होता हैं। वे नियम इंजन के कार्य करने के तरीकों का सटीक वर्णन करते हैं, क्योंकि नियम लिखने वाला वही व्यक्ति है जिसने इंजन को बनाता है!
यौन सम्बन्धों के विषय में परमेश्वर के द्वारा दिए गए निर्देश भी ठीक वैसे ही हैं। हम वास्तव में एक पत्नी के लिए बनाए गए हैं। हमें या तो विवाह के लिए, या फिर अविवाहित जीवन बिताने के लिए रचा गया है। पाप ने हमारी इच्छाओं और इच्छाशक्ति में जो भ्रष्ट सोच डाल दी हैं, वे वास्तव में गड़बड़ियाँ हैं, जैसे किसी मशीन में गड़बड़ी हो जाना, या कोई पुर्जा खो जाना, या उसमें गलत ईंधन डाला जाना। यही कारण है कि यह मनुष्य रूपी इंजन को बिगाड़ देते हैं। क्योंकि हम इस प्रकार से चलने के लिए नहीं बनाए गए हैं। इसका अर्थ यह भी है कि यौन सम्बन्धों के क्षेत्र में परमेश्वर की “हाँ” ही वह नियमावली है जो उसने हमें रचने के बाद लिखी थी। यह सटीक रूप से बताती है कि यौन प्राणियों के रूप में हमें कैसे सुधार करना है तथा कैसे इस क्षेत्र में आगे बढ़ना है।
इसलिए यह वास्तव में कैसी होनी चाहिए? परमेश्वर ने यौन प्राणी के रूप में मनुष्य को किस कार्य के लिए रचा? क्यों उसकी “बहुत अच्छा” कहकर प्रशंसा की गई सृष्टि में यह विचित्र, अद्भुत और रोमांचक प्रकार का सम्बन्ध भी सम्मिलित है, जिसे साँप ने भ्रष्ट करने में इतनी उतावली क्यों की? इसके दो उत्तर हैं।
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चर्चा एवं मनन:
- इस खण्ड के आँकड़ों और जानकारियों के होने पर आप किस बात से आश्चर्यचकित हुए? क्या आपकी प्रतिक्रिया ने यह प्रकट किया कि आप कहीं न कहीं उन झूठी बातों पर विश्वास करने लगे हैं जो हमारी संस्कृति लगातार हमें बता रही है?
- क्या आपको कभी ऐसा लगता है कि यौन शुद्धता से सम्बन्धित परमेश्वर की कुछ आज्ञाएँ कठोर या अनुचित हैं? क्या आप उनके प्रति भीतर ही भीतर विरोध या असन्तोष होने का अनुभव करते हैं?
- यहाँ बताया गया शुद्धता का वर्णन आपकी सोच के साथ कितना मेल खाता है? क्या इससे आपके मन में पहले से बनी कुछ धारणाओं को सुधारने या पूरा करने में सहायता मिली है?
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भाग II: यौन सम्बन्ध किस लिए है?
सन्तान उत्पत्ति के लिए है
यहाँ आपके लिए एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है: मनुष्य जाति दो लिंगों में क्यों बनी है? पुरुषों और महिलाओं के शरीर इतने भिन्न क्यों होते हैं, जिनमें भिन्न अस्थि संरचनाएँ, मांसपेशियाँ, चेहरे की विशेषताएँ, लम्बाई, आकार, छाती का क्षेत्र, बाहरी तथा आन्तरिक दोनों यौन अंग, और यहाँ तक कि उनके शरीर की प्रत्येक कोशिका में लिंग गुण सूत्र भी भिन्न होते हैं? पुरुषों और स्त्रियों के पास ऐसे प्रमुख शारीरिक तंत्र क्यों होते हैं जो अकेले अपने आप में पूर्ण रूप से कार्य नहीं करते हैं, परन्तु जब वे दोनों एक साथ मिलते हैं तो एक पहेली के टुकड़ों के समान एक-दूसरे में पूरी रीति से कार्य करते हैं? जब नासा ने 1970 के दशक में प्रथम यान को हमारे सौर मण्डल की सीमाओं से बाहर भेजा, तो उसने उसमें एक धातु की पट्टिका क्यों लगाई थी, जिस पर एक नग्न पुरुष और स्त्री की आकृति एक साथ उकेरी गई थी, वह इसलिए बनाई गई थी ताकि यदि कोई काल्पनिक एलियन प्रजाति उसे देखे, तो वह समझ सके कि हमारी मनुष्य जाति कैसी दिखाई देती है?13
इसका उत्तर निश्चित रूप से सन्तान उत्पन्न करना है। हमें इसलिए रचा गया कि हम सन्तान उत्पन्न करें, अर्थात जीवन को आगे बढ़ाएँ। मैंने जो भी विशेषताएँ अभी तक बताई हैं, वे सभी उन दो अलग-अलग रूपों के अद्भुत कार्य का हिस्सा हैं, जो मनुष्य जाति को दो भागों में विभाजित करता है। और जब ये दो हिस्से एक साथ मिलते हैं, तो परिणामस्वरूप वे गर्भधारण या गर्भवती होने, जन्म देने, और नवजात शिशु को पोषण देने की अद्भुत योग्यता रखते हैं।
एक ऐसा संसार जहाँ उपभोक्ता वाद, गर्भनिरोधक और क्षणिक यौन सम्बन्ध प्रभावी होते हैं, हमारे यौन शरीरों के इस स्पष्ट उद्देश्य को भूल जाना सरल है। परन्तु कोई भी व्यक्ति जिसने कभी खेत में कार्य किया हो या जीव विज्ञान की कक्षा में पढ़ाई की हो, तो वह इस सच्चाई को अनदेखा नहीं कर सकता है। पशुओं में भी नर और मादा के दो अलग-अलग रूप होते हैं, और वे भी सन्तान उत्पन्न करने के लिए आपस में मिलते हैं— जिनमें से बहुतों का प्रजनन का तरीका मनुष्यों के प्रजनन के तरीके के समान ही होता है। मध्यकालीन मसीही विचारधारा के अनुसार मनुष्य “तार्किक प्राणी” हैं, जो अपनी प्रकृति का बहुत बड़ा हिस्सा परमेश्वर की अन्य सजीव रचनाओं के साथ साझा करते हैं।14 हाँ, यह सच है कि कई अन्य क्षेत्रों में हम पशुओं से भिन्न हैं, परन्तु यौन सम्बन्ध के क्षेत्र में हम उनके ही समान हैं: हम यौन सम्बन्ध के द्वारा सन्तान उत्पन्न करते हैं। पुरुषों और महिलाओं के बीच जो यौन भिन्नताएँ हैं, और स्वयं यौन सम्बन्ध भी, यह सब कुछ सन्तान उत्पन्न करने के लिए ही बनाया गया है।
यदि यह कथन आपको विचित्र सा लगता है, तो उसका कारण केवल यह है कि हमें यौन सम्बन्ध और सन्तान के बीच के सम्बन्ध को अनदेखा करना सिखाया गया है। दूरदर्शन के कार्यक्रमों और संगीत से लेकर शारीरिक रूप से स्वस्थ रहने की संस्कृति और अश्लील सामग्री तक, हर बात ने हमें यह सिखाया है कि यौन सम्बन्ध केवल आनन्द लेने के लिए किया जाने वाला कार्य है, जिसका वास्तविक संसार पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता या कोई उत्तरदायित्व नहीं होता है। यह वास्तविक उद्देश्य, उत्तरदायित्व या सार्थक प्रभाव के अभाव को दर्शाता है। मानव इतिहास में अभी कुछ समय पहले तक भी, यौन सम्बन्ध बनाने का अर्थ सामान्यतः एक नए मनुष्य के जीवन की उत्पत्ति से जुड़ा हुआ होता था। और जैविक दृष्टि से यही इसका उद्देश्य है! इस वास्तविकता के कारण समाज ने यौन सम्बन्धों को लेकर कई प्रकार के प्रतिबन्ध लगा दिए। और व्यापक स्तर पर गर्भ निरोधक के प्रचलन ने इस स्थिति को बदल ही दिया है। यह पहली बार सम्भव हुआ कि लोग सन्तान उत्पन्न किए बिना ही यौन सम्बन्धों की कल्पना करने लगे — इन दोनों गहराई से जुड़ी वास्तविकताओं को एक भरोसेमन्द तरीके से अलग कर दिया गया है।
अपनी पुस्तक ‘जेनेसिस ऑफ जेंडर में, एबिगेल फावले ने इस बात को संक्षेप में बताया है कि कैसे “गर्भनिरोधक गोली” ने यौन सम्बन्ध को मुख्य रूप से प्रजनन के कार्य को बदलकर एक मनोरंजन का कार्य बना दिया है — अर्थात् कुछ ऐसा बना दिया है जिसे हम केवल आनन्द लेने या अपनी अभिव्यक्ति दर्शाने के लिए करते हैं:
हमारी कल्पना में प्रजनन पृष्ठभूमि में चला गया है। हमारी सन्तान उत्पन्न करने की क्षमता को अब पुरुषत्व और नारीत्व से जुड़ी एक मूलभूत विशेषता के रूप में नहीं, परन्तु एक संयोग मात्र के रूप में देखा जाता है — जबकि वास्तव में यही योग्यता इन पहचानो की परिभाषित करने वाली विशेषता है। हम एक गर्भनिरोधक समाज में जीते हैं, चलते-फिरते हैं, और यौन सम्बन्ध बनाते हैं, यह बात हमारे शरीर के अर्थ और उद्देश्य को समझने के तरीके में परिवर्तन को दर्शाता है, विशेषकर यौन सम्बन्ध और प्रजनन के विषय में, और साथ ही बाँझपन के सुख की सम्भावना को भी दर्शाता है।15
मसीही लोग इस बात पर असहमत हैं कि क्या गर्भनिरोधक नैतिक रूप से स्वीकार करने योग्य है, और यदि है, तो इसका उपयोग कब किया जाना चाहिए? हम इस मार्गदर्शिका में इस प्रश्न पर चर्चा नहीं करेंगे। इसलिए मैं जो बात कहना चाहता हूँ वह यह है कि सांस्कृतिक स्तर पर, विश्वसनीय और व्यापक रूप से उपलब्ध गर्भनिरोधक ने यौन सम्बन्धों के प्रति हमारी सोच को परिवर्तित कर दिया है — जिस के कारण यह एक सम्भावित रूप से जीवन परिवर्तित करने वाले और जीवन उत्पन्न करने वाले कार्य से हटकर एक निरर्थक मनोरंजन में परिवर्तित हो गया है। परन्तु परमेश्वर का ऐसा उद्देश्य नहीं था।
जब परमेश्वर ने हमें बनाया, तो वह हमें अनेक प्रकार से प्रजनन करने के योग्य बना सकता था। हम सूक्ष्म जीवों के समान विभाजित हो सकते थे। हम पौधों के समान बीज उत्पन्न कर सकते थे। हम स्वयं का प्रतिरूप बना सकते थे। परन्तु इन सब तरीकों के बदले परमेश्वर ने यह ठहराया कि मनुष्य जाति यौन सम्बन्ध के द्वारा “फलवन्त हों और आगे बढ़ें।” जब उत्पत्ति 2:18 में परमेश्वर ने आदम को एक “उपयुक्त सहायक” के रूप में हव्वा दी, जो पति की सहायता करने के साथ-साथ सन्तान उत्पन्न करना भी था। वास्तव में, कई शताब्दियों के बाद भविष्यद्वक्ता मलाकी कहता है कि यही वह कारण था जिसके लिए परमेश्वर ने विवाह की रचना की: “क्या उसने एक ही को नहीं बनाया जब कि और आत्माएँ उसके पास थीं? और एक ही को क्यों बनाया? इसलिए कि वह परमेश्वर के योग्य सन्तान चाहता है। इसलिए तुम अपनी आत्मा के विषय में चौकस रहो, और तुम में से कोई अपनी जवानी की स्त्री से विश्वासघात न करे।” (मलाकी 2:15)
पशुओं के लिए स्वाभाविक रूप से, प्रजनन केवल प्रजाति को बनाए रखने और अपने वंशाणु फैलाने का एक माध्यम मात्र है। परन्तु मनुष्य पशुओं से कहीं अधिक बढ़कर है। हमारे लिए प्रजनन का महत्व हमारी जनसंख्या को बढ़ाने से कहीं अधिक है। इसका सामाजिक और आत्मिक महत्व है, यहाँ तक कि उन लोगों के लिए भी है, जिनकी कभी सन्तान उत्पन्न नहीं हुई है।
थोड़ा सा विचार कीजिए: हम में से कोई भी न तो स्वयं-अस्तित्व में आया है और न ही वास्तव में अकेला रहना चाहता है। जैसे कि कुछ पशुओं के समान, जो केवल प्रजनन करने या लड़ाई करने के लिए एक-दूसरे से मिलते हैं, परन्तु मनुष्य समाज में साथ-साथ रहते हैं। हम जानते हैं कि हम कहाँ से आए हैं और हम कौन हैं, इसका एक कारण यह भी है कि हम किसके हैं। हम एक ही प्रजाति के सदस्य मात्र नहीं हैं जो जंगल में सावधानी से चल रहे हों। परन्तु हम मनुष्य आपस में माता, पिता, पुत्र, पुत्रियां, भाई, बहन, चाची, चाचा, चचेरे भाई, दादा-दादी, पति और पत्नी हैं। हम सम्बन्धों में रहते हैं, सम्बन्धों के कारण ही अस्तित्व में हैं, और सम्बन्धों के लिए ही बनाए गए हैं। जिस क्षण हम जन्म लेते हैं, ठीक उसी क्षण हम ऐसे लोगों की बाहों में चले जाते हैं जिन्हें हमने नहीं चुना था, परन्तु उनसे हम ऐसी देखभाल पाते हैं जिसे पाने के लिए हमने कुछ नहीं किया था।
मनुष्यों का यह सम्बन्धों में रहने वाला स्वभाव प्रजनन से ही आरम्भ होता है। और इसी प्रकार परमेश्वर ने यौन सम्बन्ध को रचा कि वह हमें बता सके कि हम वास्तव में कौन हैं: अर्थात् हम बड़ी घनिष्ठता से एक-दूसरे पर निर्भर रहने वाले प्राणी हैं, जिनके पास कुछ भी अपना नहीं है, सिवाय उन वस्तुओं के जो हमने पहले अन्य मनुष्यों से, और अन्त में उससे प्राप्त की हैं। व्यक्तिवादी संस्कृति (अर्थात् वह व्यक्ति जो व्यक्तिगत स्वतंत्र रूप से तथा किसी के दबाव में न आकर आत्मनिर्भरता को महत्व देता है) में पले-बढ़े लोगों के लिए इसे स्वीकार करना कठिन होता है। हम अपने आप को किसी के दबाव से दूर होकर स्वतंत्र और आत्म-निर्भर होना पसन्द करते हैं। फिर भी परमेश्वर के द्वारा बनाए गए यौन सम्बन्ध के द्वारा प्रजनन करने का स्वभाव मनुष्यों की एक पुरानी, व्यापक और गूढ़ चित्रण को प्रकट करता है — जो हमें अलग-थलग इकाइयों के रूप में नहीं, वरन् एक वृक्ष की शाखाओं के समान दिखाता है। हम अपने जीवन के लिए बड़ी शाखाओं और तने पर निर्भर रहते हैं, और बदले में हमसे निकलने वाली नई कोपलों और टहनियों को जीवन देते हैं। यही हमारी सच्ची पहचान है, चाहे हम परमेश्वर के नियमों के अनुसार जीवन जिएँ या न जिएँ।
यौन सम्बन्ध के प्रजनन वाले उद्देश्य को अपने मन में सबसे आगे रखना ही हमें हमारी संस्कृति की कई गलतियों से बचने में सहायता करेगा। जब बात यौन सम्बन्धों की आती है, तो सन्तान परमेश्वर की ओर से “हाँ” का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होते हैं, और यौन नैतिकता के लिए कोई भी दृष्टिकोण जो उन्हें अनदेखा करता है वह अधूरा है। परमेश्वर ने मानव जाति के जैविक स्वभाव में ही आत्म-त्याग करने वाले प्रेम को लिख दिया है। परमेश्वर की रचना में नए लोग प्रेम के द्वारा अस्तित्व में आते हैं, और अपनी पहचान उसी प्रेम से पाते हैं। जैसा कि परमेश्वर ने योजना बनाई थी, पीढ़ियों के क्रम में हममें से प्रत्येक अपने माता-पिता के लिए दान है, और हमें जीवन भी दान के रूप में ही मिला है। हममें से जिनकी सन्तान है, वे उन्हें जीवन का दान देंगे और उन्हें ऊपर से मिले परमेश्वर के दान के रूप में ग्रहण करेंगे। हममें से कोई भी — चाहे हमारा परिवार कितना भी बिखरा हुआ क्यों न हो — मानव जीवन रूपी वृक्ष के पोषक रस से कटे हुए नहीं हैं। इसीलिए तो हम अस्तित्व में हैं!
हमारी संस्कृति इस सच्चाई को आपसे छिपाना चाहती है। परन्तु यह सच्चाई आपको यह विश्वास दिलाना चाहती है कि आपका शरीर केवल एक खिलौना है— न कि परमेश्वर का दिया हुआ एक अद्भुत दान, जो जीवन को आगे बढ़ाने की योग्यता के आधार पर रचा गया है (और यह बात तब भी सत्य है, जब आपकी सन्तान नहीं है या आप सन्तान उत्पन्न करने में असमर्थ हों)। परन्तु यह झूठ है। हमारा शरीर हमारा नहीं है परन्तु परमेश्वर का है। और यौन शुद्धता का अर्थ, इस अद्भुत सत्य के प्रकाश में जीवन जीना है। मसीही लोगों के लिए यह बात स्मरण रखना दोगुना महत्वपूर्ण होनी चाहिए कि हमारा स्वामी कौन है। हमें केवल परमेश्वर ने रचा ही नहीं, वरन् मसीह के लहू के द्वारा पापों का “मूल्य चुकाकर खरीदा” भी गया है। “इसलिए,” प्रेरित पौलुस यौन नैतिकता की बात करते हुए लिखता है कि, “अपनी देह के द्वारा परमेश्वर की महिमा करो” (1 कुरिन्थियों 6:20)।
मनुष्य जीवन के लिए परमेश्वर की निर्देश पुस्तिका में, यौन सम्बन्ध सदा प्रजनन की चेतना के साथ जुड़े होते हैं, और उस मिलन से उत्पन्न होने वाले किसी भी बच्चे की भलाई की दिशा में व्यवस्थित होते हैं। परन्तु इसका यह भी अर्थ है कि ये अनिवार्य रूप से अपने जीवनसाथी के प्रति समर्पित, स्थायी, और आत्म-त्याग करने वाले प्रेम पर आधारित होते हैं। और यही यौन सम्बन्ध का दूसरा उद्देश्य है।
एकता
सृष्टि के मूल में एक सिद्धान्त है: एकता में अनेकता। बैतलहम में यीशु मसीह के जन्म से बहुत पहले, प्राचीन यूनानी दार्शनिक “एक और अनेक” की समस्या पर उलझे हुए थे। वे यह जानना चाहते थे कि संसार में परम सत्य क्या है: सभी वस्तुओं की एकता या उनकी अनेकता। परन्तु जब मसीही लोग आए, तो उन्होंने इस प्रश्न का उत्तर एक चौंकाने वाले तरीक़े “हाँ” से देना आरम्भ किया।
मसीहियों के लिए, एकता और अनेकता दोनों की उत्पत्ति स्वयं परमेश्वर के अस्तित्व में है, जो पवित्रशास्त्र के अनुसार (और जैसा कि निकिया की परिषद के द्वारा व्याख्या की गई है), सार में एक हैं, परन्तु व्यक्तित्व में तीन है — अर्थात् त्रिएक परमेश्वर। अनेकता-में-एकता-का यह सिद्धान्त, आश्चर्य की बात नहीं है, सम्पूर्ण सृष्टि में आंशिक रूप से दिखाए देता है। जैसा कि जोशुआ बटलर ने अपनी पुस्तक ब्यूटीफुल यूनियन में लिखा कि, यह सिद्धान्त उन विपरीतताओं के मेल में प्रकट होता है, जो हमारे संसार के सबसे मनमोहक दृश्य रचते हैं: जैसे आकाश और पृथ्वी का मिलन पर्वतों में होता है, समुद्र और भूमि का मिलन तट पर होता है, तथा दिन और रात का मिलन सूर्योदय और सूर्यास्त में होता है।16 परमाणु तीन कणों (प्रोटॉन, न्यूट्रॉन, इलेक्ट्रॉन) से मिलकर बना है, समय तीन कालों (भूत, वर्तमान, भविष्य) से बना है, और स्थान तीन आयामों से मिलकर बना है — ऊँचाई, चौड़ाई और गहराई। मानव व्यक्ति स्वयं भौतिक और अभौतिक पहलुओं का एक मिलन है जो मिलकर एक एकल प्राणी का निर्माण करते हैं। और यौन सम्बन्ध भी अनेक तत्वों के एक होने का उदाहरण है, जहाँ उनका मिलन कुछ और भी अधिक अद्भुत और गहन चीज़ को जन्म देता है। जैसा कि बटलर लिखते हैं:
यौन सम्बन्ध भी अनेकता में एकता का उदाहरण है, जो सृष्टि की संरचना पर आधारित है… परमेश्वर दोनों को लेकर उन्हें एक बनाना पसन्द करता है। यह हमारे शरीर की बनावट में ही नहीं, परन्तु हमारे चारों ओर के संसार की बनावट में भी उपस्थित है — जो इतनी निकटता से है कि हम इसे अधिकाँश सामान्य मान लेते हैं। यह सब एक बड़ी बुद्धि, एक बड़े जीवन की ओर संकेत करता है, जो परमेश्वर की ओर से दिया गया है। मेरा विश्वास है कि परमेश्वर को ऐसा करना पसन्द है, क्योंकि परमेश्वर स्वयं ही “एकता में अनेकता” का प्रतीक है।17
जब हम त्रिएकता के रहस्य की बात करते हैं, तो हमें इन समानताओं पर बहुत अधिक बल नहीं देना चाहिए। परन्तु पति और पत्नी के बीच की यौन एकता वास्तव में मसीही नैतिकता के मूल को दर्शाती है, जिसे पवित्रशास्त्र भी परमेश्वर के मुख्य गुण के रूप में वर्णित करता है (1 यूहन्ना 4:8)। यही कारण है कि हम प्रेम के माध्यम से अस्तित्व में आने के लिए बनाए गए हैं। और इसी कारण स्थायी और एक ही विवाह में विश्वासयोग्य बने रहना मात्र ऐसा तरीका है जिसमें यौन प्रेम परमेश्वर के द्वारा निर्धारित अपने उद्देश्य को पूरा कर सकता है, क्योंकि वह दो लोगों को पूरी रीति से एक करके उन्हें “एक तन” बना देता है (उत्पत्ति 2:24)।
यहाँ हम उस सबसे मूलभूत कारणों में से एक कारण पर आते हैं कि क्यों परमेश्वर की “हाँ” यौन सम्बन्धों में केवल उसी विवाह तक सीमित है, जो एक पुरुष और एक स्त्री के बीच होता है? और क्यों उस “हाँ” से विवाह के अतिरिक्त अन्य यौन गतिविधियों को बाहर कर दिया जाता है। परमेश्वर ने यौन सम्बन्ध को इस तरह रचा कि वह ऊँची आवाज में यह कह सके: “मैं तुम्हें चाहता हूँ, और पूरी रीति से हमेशा-हमेशा के लिए चाहता हूँ।” परन्तु केवल विवाहित जोड़े ही इन शब्दों को विश्वास के साथ कह सकते हैं। शेष अन्य सम्बन्धों में इन शब्दों को योग्यताओं और शर्तों के साथ बोला जाता है। अश्लीलता एवं क्षणिक अवैध यौन सम्बन्धों में हम एक-दूसरे से यह कहते हैं: “मैं तुम्हें केवल उतना ही चाहता हूँ जितना मेरी क्षणिक इच्छाओं को सन्तुष्ट करने के लिए पर्याप्त हो, और उसके बाद मैं तुम्हारे साथ कोई सम्बन्ध नहीं रखना चाहता हूँ।” अविवाहित यौन सम्बन्धों में एक साथ रहते हुए हम एक-दूसरे से कहते हैं: “मैं तुम्हें तब तक चाहता हूँ जब तक यह मेरे लिए आरामदायक है और जब तक तुम मेरी आवश्यकताओं को पूरा करते हो, या जब तक मुझे कोई दूसरा और अधिक अच्छा साथी नहीं मिल जाता।” परन्तु मैं यह प्रतिज्ञा नहीं कर रहा/रही हूँ कि मैं तुम्हारे साथ हमेशा बना रहूँगा या बनी रहूँगी। और गर्भनिरोध और गर्भपात की संस्कृति में हम एक-दूसरे से कहते हैं: “मैं तुम्हारे शरीर से मिलने वाले कुछ सुखों को तो चाहता हूँ, परन्तु मैं तुम्हारे साथ हमेशा नहीं बना रहना चाहता हूँ और न ही तुम से सन्तान उत्पन्न करना चाहता हूँ।”
विवाह का स्थायी बन्धन ही एकमात्र ऐसा स्थान है जहाँ दो व्यक्ति एक-दूसरे को यौन साथी के रूप में पूरी रीति से बिना किसी शर्त के स्वीकार करते हैं। यही एकमात्र ऐसा स्थान है जहाँ प्रेमी एक-दूसरे से कहते हैं: “मैं तुम्हें स्वीकार करता हूँ, अर्थात् तुम्हें तुम्हारी परिपूर्णता के साथ पूरी रीति से जीवन साथी के रूप में अब से लेकर हमेशा-हमेशा के लिए स्वीकार करता हूँ, केवल इसलिए नहीं कि तुम मुझे कुछ दे सकते हो, परन्तु इसलिए कि वह सब कुछ मैं भी तुम्हें दूँ जिसकी तुम्हें मुझ से आवश्यकता है।” मैं तुम्हारी भावनाओं और अपनेपन की गहराई तथा मित्रता और प्रजनन की योग्यता को स्वीकार करता हूँ। मैं यह भी स्वीकार करता हूँ कि तुम्हें प्रेम की आवश्यकता तब भी होगी जब मैं स्वयं प्रेम महसूस नहीं कर रहा होऊँगा; तुम्हें रहने के लिए स्थान चाहिए, कोई ऐसा साथी जो तुम्हारी देखभाल तब भी करे जब तुम बीमार या असहाय हो जाओ; कोई ऐसा साथी जो बच्चों के लालन-पालन करने में तुम्हारी सहायता करे; एक ऐसा साथी जो वृद्धावस्था में तुम्हारे साथ चले; और तुम्हें उस समय भी थामे रहे जब तुम मृत्यु की ओर बढ़ रहे होंगे।”
परन्तु विवाह में जो एकता परमेश्वर स्थापित करता है, वह केवल एक विवाहित जोड़े की एकता से कहीं अधिक बढ़कर होती है। यह जीवन, परिवार, भविष्य और नामों की एकता होती है। यह दो परिवारों को आपस में जोड़कर एक कर देता है। यह मानव समाज की सबसे मूलभूत इकाई है यहीं से पड़ोस, कलीसियाओं, व्यवसायों, मित्र समूहों और अतिथि सत्कार करने वाले परिवारों का आरम्भ होता है। वे सभी जो विवाह में प्रवेश करते हैं, एक ऐसी प्रक्रिया का आरम्भ करते हैं जो वेदी के सामने खड़े व्यक्ति के अलावा अन्य सभी मनुष्यों के जीवन को गहराई से प्रभावित करती है।
विवाह एक सार्वजनिक कार्य है, और यही कारण है कि इसे क़ानून में मान्यता देना उचित है। यौन सम्बन्धों के लिए परमेश्वर की “हाँ” व्यक्तिगत सन्तुष्टि या संगति से कहीं अधिक बढ़कर है। यह मानव सभ्यता के मूल में स्थित उनके अपने स्वभाव — प्रेम — को दर्शाने के विषय में है।
परन्तु यह और भी अधिक अद्भुत और रहस्यपूर्ण हो जाता है। इफिसियों 5 में प्रेरित पौलुस हमें बताता है कि पति-पत्नी के बीच की “एक तन” की एकता मसीह और उसकी कलीसिया के बीच की एकता का संकेत देती है। बटलर इसे एक “प्रतीक” कहते हैं,18 जो इस ओर संकेत करता है कि कैसे देहधारी परमेश्वर यीशु ने अपनी दुल्हन को क्रूस पर अपना माँस और लहू दिया। प्रभु के भोज में भी वह इसे अपनी दुल्हन को देता है, और वह इसे सिद्ध तरीके से तब देगा जब वह फिर से वापिस आएगा, उस समय वह मसीहियों की दीन-हीन देह का रूप बदलकर, अपनी महिमा की देह के अनुकूल बना देगा। (फिलिप्पियों 3:21)।
दूसरे शब्दों में, विवाह एक जीवित दृष्टान्त है, जिसमें एक पुरुष और एक स्त्री के बीच शारीरिक, आत्मिक, सम्बन्धात्मक और आजीवन एकता के रूप में मसीह के अपने लोगों के प्रति छुटकारा देने वाले प्रेम को दर्शाती है। यह पूर्ण रीति से कही गई “हाँ” है। परन्तु यह फिर से इस बात को स्पष्ट करता है कि परमेश्वर की “नहीं” किसकी रक्षा के लिए है: जब हम अपने यौन शरीरों की जीवन भर की एकता के लिए परमेश्वर की बनाई गई योजना का उल्लंघन करते हैं, तो चाहे हम मसीही हों या न हों, तौभी हम स्वयं परमेश्वर के प्रेम और सृष्टि की मूल संरचना के विषय में झूठ बोल रहे होते हैं। और सबसे बुरी बात यह है कि हम उस पवित्र स्वरूप को बिगाड़ रहे होते हैं जिसे परमेश्वर ने उद्धार का प्रतिनिधित्व करने के लिए चुना है, हम यीशु को एक अविश्वासी पति के रूप में दर्शा रहे होते हैं, और कलीसिया में उसके कार्य को व्यर्थ और असफल दिखा रहे होते हैं। हम केवल परमेश्वर की व्यवस्था को ही नहीं तोड़ रहे होते हैं, वरन् हम उसमें बसाए गए स्वरूप को अपने भीतर तथा अपने सम्बन्धों में भी बिगाड़ रहे होते हैं।
हमने यहाँ जो कुछ भी खोजा है, उसमें से अधिकाँश बातों को गैर-मसीही लोग अस्वीकार कर देंगे। परन्तु मसीहियों के लिए यौन सम्बन्ध में परमेश्वर के द्वारा निर्धारित एकता अत्यन्त गम्भीर विषय है। पौलुस चेतावनी देते हुए कहता है कि क्योंकि हमारी देह “मसीह के अंग” हैं, इसलिए जब हम अपनी देह का दुरुपयोग करते हैं, तो हम मसीह का ही दुरुपयोग कर रहे होते हैं (1 कुरिन्थियों 6:15)। चाहे हम कभी विवाह करें या न करें, परन्तु सभी मसीही लोग प्रभु यीशु और उसकी दुल्हन, अर्थात् कलीसिया के बीच एक महान विवाह की वाचा में भागीदार हैं। हम पवित्रशास्त्र की माँग के अनुसार यौन सम्बन्धों की शुद्धता के साथ व्यवहार करते हुए, या तो भक्ति के साथ विवाह या भक्ति के साथ अविवाहित जीवन (अकेले) के द्वारा अपने सम्पूर्ण जीवन में उस विवाह का सम्मान करने के लिए बंधे हुए हैं। परन्तु हमें सदा यह स्मरण रखना चाहिए कि उद्देश्य केवल कुछ नियमों का पालन करना नहीं है। उद्देश्य यह है कि हम अपने नैतिक जीवन के सिंहासन पर प्रेम को विराजमान करें — और ऐसा करके उस परमेश्वर के विषय में सत्य को प्रकट करें जिसने हमारी रचना करके हमें स्वयं के विनाश से छुटकारा दिलाकर अपना सिद्ध प्रेम दिखाया है।
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चर्चा एवं मनन:
- इस अनुभाग ने परमेश्वर के द्वारा यौन सम्बन्धों की योजना को समझने में किस प्रकार से आपकी समझ को और गहरा किया है? क्या आपके प्रजनन या एकता के दृष्टिकोण में किसी प्रकार की उन्नति हुई है?
- हमारी संस्कृति — और दुष्ट (शैतान) — प्रजनन और एकता के उद्देश्यों के विरुद्ध किस प्रकार से युद्ध करते हैं?
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भाग III: किस विषय में?
यदि मैंने गलतियाँ की हैं, तो क्या मैं शुद्ध हो सकता हूँ?
“शुद्धता संस्कृति” (यह नाम 1990 के दशक से यौन विषय पर सुसमाचार सम्बन्धी पुस्तकों, सम्मेलनों और सन्देशों में दिया जाता रहा है) की हमेशा से होने वाली आलोचनाओं में से एक यह है कि इससे युवाओं में यह धारणा बनी कि यदि वे यौन पाप करते हैं, तो वे हमेशा-हमेशा के लिए “नाश” हो जाएँगे। विशेष रूप से, आलोचक जोशुआ हैरिस की सबसे अधिक बिकने वाली पुस्तक ‘आई किस्ड डेटिंग गुडबाय’ के आरम्भिक अध्याय से एक डरावने स्वप्न का उल्लेख करते हैं, जिसमें एक व्यक्ति अपने विवाह के दिन वेदी पर उन युवतियों के समूह के द्वारा स्वागत किया जाता है, जिनके साथ उसने पहले यौन सम्बन्ध बनाए थे, और वे सभी उसके हृदय का एक टुकड़ा होने का दावा करती हैं।19
प्रतिक्रिया स्वरूप, “शुद्धता संस्कृति” की आलोचना करने वाले चिट्ठाकार और लेखकों ने सुसमाचार में परमेश्वर के अनुग्रह पर बल दिया है, और इस सच्चाई पर भी कि मसीह का कार्य हमारे पिछले जीवन के लिए प्रायश्चित करता है और हमें “नई सृष्टि” बनाता है (2 कुरिन्थियों. 5:17)। यह बात निस्संदेह सत्य है — और वह भी गौरवशाली रूप से सत्य है! परमेश्वर के सामने हमारी उपस्थिति, उत्तरदायित्व, और सेवकाई की स्थिति से अधिक महत्वपूर्ण कुछ भी नहीं है। विश्वास के द्वारा प्राप्त मसीह के लहू के द्वारा, हम सच में अपने सारे पापों से धुलकर शुद्ध हो जाते हैं और हमें एक ऐसी धार्मिकता दी जाती है जो हमारी अपनी ओर से नहीं बनाई गई होती है (फिलिप्पियों 1:9)।
परन्तु मुझे नहीं लगता कि आलोचक यह ठीक से समझते हैं कि पहले के “शुद्धता संस्कृति” के लेखकों ने यौन अनैतिकता के विरुद्ध इतने अनोखे शब्दों में अपने पाठकों को चेतावनी क्यों दी थी। मुझे नहीं लगता कि मेरे युवावस्था के समय के सुसमाचारवादी माता-पिता, पास्टर या लेखक इस बात पर प्रश्न उठा रहे थे कि सुसमाचार में यह सामर्थ्य है कि वह हमें परमेश्वर के सामने एक नया आरम्भ दे सकता है या हमारे पापों को क्षमा कर सकता है — चाहे वे पाप कितने भी गम्भीर क्यों न हों। परन्तु मुझे सन्देह है कि “शुद्धता संस्कृति” से जुड़े लोगों ने अपने चारों ओर देखा, और व्यापक संस्कृति में यौन क्रांति के विनाशकारी परिणामों का अनुभव किया, इसलिए वे परमेश्वर के द्वारा स्थापित यौन सम्बन्ध और हमारे शरीरों की रूपरेखा को विकृत करने के स्वाभाविक परिणामों को उजागर करना चाहते थे — ऐसे परिणाम जो वास्तव में केवल हमारे पापों के प्रति पश्चाताप करने और यीशु पर विश्वास करने से पूरी रीति से समाप्त नहीं होते हैं।
और ऐसे पापों के दीर्घकालिक परिणाम होते हैं। चाहे वह पिछले यौन साथियों की स्मृति हो, यौन संक्रामक रोग हों, अलग हुए माता-पिता के बीच साझा की गई सन्तान की सुरक्षा हो, दुर्व्यवहार से उत्पन्न मानसिक आघात हो, या गर्भपात के निर्णय पर पछतावा हो, यौन पाप न केवल उस पाप को करने वालों पर, वरन् निर्दोष लोगों को भी गहरे और स्थायी घाव देता है। सुसमाचार निश्चित रूप से क्षमा प्रदान करता है और यह पूर्णतः सत्य है! परन्तु यह हमारे बुरे निर्णयों के सभी परिणामों को नहीं मिटाता है, अर्थात् किसी व्यक्ति के वर्तमान जीवनकाल में या पृथ्वी पर उनके सीमित अस्तित्व की अवधि के भीतर यह बात पूरी नहीं होगी। यही कारण है कि यौन पाप को इतना गम्भीर माना जाता है, और क्यों वे लोग जिन्होंने परमेश्वर की आज्ञाओं का उल्लंघन किया है और फिर पश्चाताप किया है, अपने पिछले निर्णयों पर पछतावा करना उचित समझते हैं। क्योंकि यौन सम्बन्ध परमेश्वर की मनुष्य जाति के लिए बनाई गई योजना में बहुत अधिक विशेष और मुख्य स्थान रखते हैं, क्योंकि यह हमें दूसरों के जीवन से बहुत गहराई से जोड़ता है, इसलिए इस क्षेत्र में परमेश्वर की योजना के विरुद्ध जाना स्थायी पीड़ा का कारण बन जाता है।
परन्तु इसका यह अर्थ नहीं है कि जो लोग यौन पाप को पीछे छोड़ चुके हैं, वे शुद्ध और पवित्र जीवन नहीं जी सकते है। यहीं पर हमें शुद्धता के विषय में सोचने के तरीके पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है, तथा अशुद्ध पक्षियों पर तेल के रिसाव जैसी पाप की छवियों को त्यागने की आवश्यकता है, तथा इसके स्थान पर पूर्ण रूप से चंगाई, और परमेश्वर के द्वारा अपनी मानवीय सृष्टि के लिए बनाए गए स्वरूप की पुनर्स्थापना के विषय में सोचना चाहिए। हम सभी को इस चंगाई की आवश्यकता है, न केवल इसलिए कि हमने व्यक्तिगत पाप किए हैं, परन्तु इसलिए कि हम आदम के विद्रोह की दशा में जन्मे हैं, इसलिए हम निराश होते हैं क्योंकि अपनी पहली साँस लेते ही हम परमेश्वर के विरुद्ध युद्ध करने के लिए तैयार रहते हैं।
यह सत्य है कि जो कोई कुछ विशेष यौन पापों से बचा रहता है, वह उन पापों से उत्पन्न होने वाले परिणामों से भी बचा रहता है। परन्तु यौन रूप से शुद्ध होना, या जैसा कि पुराने मसीही विचारकों ने इसे “शुद्धता” कहा, केवल परिणामों से बचने से कहीं अधिक गहरा अर्थ रखता है। यह हमारे जीवन को — चाहे हमारा जीवन अतीत में जैसा भी रहा हो, मसीह की हमारे लिए हुई मृत्यु के प्रकाश में जीने और पवित्र आत्मा की सामर्थ्य के द्वारा धार्मिकता की खोज में जीने के विषय में है। संसार का सबसे बड़ा पापी भी पश्चाताप कर सकता है, परमेश्वर की क्षमा पा सकता है, और उत्तम नैतिक शुद्धता और पवित्रता का जीवन जी सकता है। वास्तव में, प्रेरित पौलुस ने अपने हृदय परिवर्तन के बाद के जीवन का सारांश इसी प्रकार दिया है (1 तीमुथियुस 1:15)।
यदि आपने अतीत में यौन पाप किए हैं और परिणाम स्वरूप स्वयं पर तथा दूसरों पर पीड़ादायक परिणाम आए हैं, तो परमेश्वर आपको क्षमा करना चाहता है। वह इसी क्षण ऐसा कर सकता है। यदि आप पश्चाताप करते हैं और मसीह पर भरोसा करते हैं, तो वह आपको न्याय के दिन अपने अनन्तकाल के न्याय सिंहासन के सामने “दोषी नहीं” ठहराएगा, परन्तु वह आपका अपने परिवार में स्वागत करेगा, आपको “प्रिय पुत्र” या “प्रिय पुत्री” कहकर पुकारेगा और साथ ही आपको यीशु के साथ परिवार की सम्पत्ति का संगी वारिस भी बनाएगा (रोमियों 8:17)।
यदि आपको यौन पापों तथा अन्य सभी प्रकार के पापों के लिए परमेश्वर से क्षमा मिल गई है, फिर भी आप स्वयं को “शुद्ध” समझने में संघर्ष करते हैं, तो उस बात पर विचार करें जिस पर हमने पहले चर्चा की थी कि बुराई परमेश्वर की अच्छी रचना का बिगड़ा हुआ रूप है, जिसका अपना कोई अस्तित्व नहीं है। आप कोई सफेद कागज़ नहीं हैं जिस पर काली स्याही के धब्बे पड़ गए हों, और न ही आप कोई समुद्री पक्षी हैं जिसके पंख तेल से सने होने के कारण क्षतिग्रस्त हो गए हैं और अब उसे उड़ने में समस्या हो रही है। आप तो अद्भुत हैं परन्तु क्षतिग्रस्त रचना हैं जिसका एक उद्देश्य है, एक बनावट है, और एक महिमामय अन्त है परन्तु वह रचना भयानक रूप से घायल है और उसे फिर से पूर्व स्थिति में आने के लिए अपने सृजनहार की आवश्यकता है। आपको सम्पूर्ण बनाए जाने की आवश्यकता है, और वास्तव में यही “शुद्धता” का अर्थ होना चाहिए — उस परमेश्वर की योजना के अनुरूप और आज्ञाकारिता में जीना, जिसने आपको रचा है, जो आपसे प्रेम करता है, और जो आपके जीवन को पूरी रीति से बदलने के लिए तैयार है।
पहले के समान अब और भी अच्छा हो रहा है। जो परमेश्वर आपसे प्रेम करता है और यह सब प्रतिज्ञाएँ करता है, वह बुराई को भलाई में बदलने का काम कर रहा है। ये वही शब्द हैं जो यूसुफ़ ने अपने भाइयों से उत्पत्ति 50:20 में कहे थे, जब उन्होंने उसे धोखा दिया और मिस्र में दास के रूप में बेच दिया था। परमेश्वर ने उनके भयानक पाप और हत्यारे हृदय का उपयोग इस्राएल राष्ट्र को एक भीषण अकाल से बचाने के लिए किया। वह निःसंदेह यौन पाप के परिणामों का भी उपयोग बड़े-बड़े और रहस्यमयी आशीषों को लाने के लिए भी कर सकता है, अर्थात् ऐसी आशीषें जो मनुष्य की समझ से परे हैं। वह एक सामर्थी परमेश्वर है — इतना सामर्थी कि उसने अब तक की सबसे क्रूर घटना, अर्थात अपने पुत्र की हत्या को प्रायश्चित में बदल दिया जिसने संसार के लिए उद्धार सम्भव किया (प्रेरितों के काम 4:27)। अतः उस पर भरोसा कीजिए, वह आपके जीवन की कहानी का उपयोग भलाई के लिए कर सकता है, चाहे आपने कुछ भी किया हो। वह आपको शुद्ध कर सकता है।
क्या मैं अविवाहित रहते हुए भी शुद्ध रह सकता हूँ?
अन्त में हम उस प्रश्न पर आते हैं जो कई लोग आज कलीसिया में पूछते हैं, परन्तु बहुत कम लोग ही सही ढँग से उस प्रश्न का उत्तर दे पाते हैं: जो लोग अविवाहित हैं और जिनकी निकट भविष्य में विवाह करने की कोई उम्मीद नहीं है, वे परमेश्वर के द्वारा यौन सम्बन्धों के लिए दिए गए “हाँ” को कैसे अपनाएँ? क्या उनके लिए “शुद्धता” का अर्थ केवल “ना” ही कहना है?
यहीं पर हमें परमेश्वर की मानव यौन सम्बन्धों के लिए दी गई सकारात्मक योजना पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है न कि केवल उसकी निषेधात्मक आज्ञाओं पर। यह सत्य है कि मसीही विश्वास हमारे सामने एक स्पष्ट विकल्प रखता है: या तो जीवन भर एक ही जीवनसाथी के प्रति विश्वासयोग्य बने रहें, या फिर जीवन भर अविवाहित रहें। ये ही वे विकल्प हैं और दोनों ही परमेश्वर को भाते हैं। परन्तु इनमें से कोई भी विकल्प अपूर्ण या अधूरा मानवीय जीवन नहीं है। वरन् दोनों ही विकल्प मनुष्य के लिए परमेश्वर की यौन सम्बन्धी योजना का पूर्ण रीति से आदर करने और उस पर दृढ़ बने रहने के तरीके हैं। दोनों ही विकल्प उस शारीरिक जीवन के दान से समझौता करने से मना करते हैं जो उसने हमें दिया है, या फिर उसके स्वरूप में बने अन्य लोगों से आधे मन से प्रेम करके उन्हें नीचा दिखाने से भी मना करते हैं। विवाहित और अविवाहित दोनों ही अत्यंत स्वाभाविक हैं और मनुष्य जाति के लिए उसकी योजना के अनुरूप हैं; दोनों ही यौन शुद्धता में जीवन जीने के तरीके हैं।
मसीहियों के द्वारा इन दो विकल्पों पर इतनी कड़ाई से बल देने का एक कारण यह था कि पहली सदी में अविश्वासियों के लिए यौन सुख पाने के लिए दूसरों का शोषण करना सामान्य बात थी। मसीहियत ने यूनानी-रोमन समाज में यौन नैतिकता में एक क्रांतिकारी सुधार प्रस्तुत किया, “जिसे केविन डी यंग ने “पहली यौन क्रांति” कहा है।”20 एक ऐसी संस्कृति में, जिसमें उच्च-स्तर वाले पुरुषों को अपनी यौन इच्छाओं को जब चाहें और जिस के साथ चाहें, सन्तुष्ट करने की अनुमति थी, वहीं यीशु के अनुयायियों ने विश्वासयोग्यता के साथ विवाहित या अविवाहित रहने की माँग की, और आरम्भिक मसीही अगुवों ने स्वयं इन दोनों विकल्पों का नमूना प्रस्तुत किया।21
उदाहरण के लिए हम सब जानते हैं कि, प्रेरित पतरस विवाहित था, जैसे “प्रभु के भाई” और अन्य प्रेरित भी विवाहित थे (1 कुरिन्थियों 9:3-5)। ऐसे ही अक्विला और प्रिस्किल्ला थे, जो एक सुसमाचार प्रचार-प्रसारक दम्पति थे और प्रेरित पौलुस के साथ रहते थे, काम करते थे और यात्रा करते थे (प्रेरितों के काम 18:18-28)। नए नियम में कई प्रेरित और अन्य प्रमुख व्यक्ति अविवाहित थे। 1 कुरिन्थियों 7 में, पौलुस अपने पाठकों को “वर्तमान के क्लेशों” को ध्यान में रखते हुए अविवाहित रहने को विवाह से उत्तम विकल्प के रूप में बताता है, क्योंकि यह मसीही लोगों को पूरी रीति से इस पर ध्यान लगाने की अनुमति देता है कि वह “प्रभु को कैसे प्रसन्न करे” (1 कुरिन्थियों 7:26–32)। मानवीय दृष्टि से देखें तो यीशु स्वयं जीवन भर अविवाहित रहा उसने ऐसा परमेश्वर की आशीषों से बचने के लिए नहीं किया, वरन् इसलिए किया क्योंकि पृथ्वी पर अविवाहित रहना एक ऐसा माध्यम था जिसके द्वारा वह अपनी अनन्त दुल्हन, अर्थात् कलीसिया को पा सकता था। दूसरे शब्दों में, नया नियम लगातार यह बताता है कि अविवाहित रहना किसी महिमामय वस्तु से दूर भागने का लक्ष्य नहीं है, वरन् किसी महिमामय उद्देश्य की ओर लक्ष्य निर्धारित करना होता है।
आपके अविवाहित रहने का उद्देश्य क्या होगा? यदि आपको यह विश्वास है कि परमेश्वर ने आपको आजीवन अविवाहित रहने के द्वारा पवित्र होने के लिए बुलाया है, तो यह सबसे महत्वपूर्ण प्रश्नों में से एक है जो आप पूछ सकते हैं। बाइबल आधारित दृष्टिकोण से, अविवाहित रहना एक मसीही व्यक्ति का ध्यान भटकाने के बजाय समर्पण के साथ परमेश्वर के राज्य की सेवा करने के लिए योग्य बनाता है। संकट भरी परिस्थितियों में काम करने वाले सुसमाचार प्रचार-प्रसारक, तथा कुछ पास्टर, निर्धनों और बीमारों की सेवा करने वाले लोग, और ऐसे मसीही जो किसी भी प्रकार की अत्यधिक आवश्यक सेवाओं में लगे हुए हैं उन्हें यह अपेक्षा करनी चाहिए कि परमेश्वर उनकी अविवाहित स्थिति का उपयोग बड़े प्रभावशाली ढँग से करेगा, जैसा कि पौलुस ने वर्णन किया है। अविवाहित मसीही लोग, विवाहित लोगों के समान “इस संसार की बातों” की चिन्ता नहीं करते, और वे अपना पूरा ध्यान परमेश्वर की सेवा में लगा सकते हैं (1 कुरिन्थियों 7:33)। अविवाहित व्यक्ति स्वयं को प्रसन्न करने का अवसर नहीं ढूँढता है, वरन् यह प्रभु की ओर से उसके लिए एक बड़ी बुलाहट होती है।
जैसा कि हमने पहले देखा, कि अविवाहित होना यह नहीं दर्शाता कि विवाह और परिवार आपके लिए मायने नहीं रखते हैं। हम सभी यौन सम्बन्धों की देन हैं, लहू के बन्धनों के द्वारा अपने आस-पास के लोगों से बंधे हुए हैं, और परिवारों के द्वारा बनाए गए समुदायों में गहराई से जुड़े रहते हैं। परिवार आज भी समाज की मूल इकाई है, और किसी भी कलीसिया, समुदाय या राष्ट्र का भविष्य अंततः इस बात पर निर्भर करता है कि दम्पति सन्तान उत्पन्न करें। हर बार जब आप बच्चों के साथ बातचीत करते हैं, उनकी देखभाल करते हैं, या उन्हें शिष्यत्व सिखाते हैं, तो आप परिवारों के जीवन में भाग ले रहे होते हैं। एक अविवाहित मसीही जन के रूप में आपकी सेवा असंख्य लोगों को यह प्रेरणा दे सकती है कि वे अपनी यौनिकता का उपयोग परमेश्वर की योजना के अनुसार करें। आप भले ही विवाहित न हों, परन्तु आप अपने आस-पास के विवाहित लोगों से गहराई से जुड़े हुए हो सकते हैं।
अन्त में, इस बात पर विचार करें: संयुक्त राज्य अमेरिका में विवाह दर अब तक सबसे निचले स्तर पर पहुँच चुकी है। इसके कई कारण हैं, जैसे निम्न स्तर की यौन नैतिकता और धर्म के पतन से लेकर आर्थिक कारणों तक, और एक ऐसी संस्कृति तक जो परिवार की तुलना में स्वतंत्रता और उपलब्धियों को अधिक महत्व देती है। इसका अर्थ यह है कि ऐतिहासिक दृष्टि से देखा जाए तो आपका वर्तमान में अविवाहित होना सामान्य बात नहीं हो सकती है, और यह भी सम्भव है कि यह आपके जीवन के लिए परमेश्वर की दीर्घकालिक इच्छा न हो। संसार के अधिकाँश हिस्सों में जन्म दर गिर रही है, और कई देशों में स्थिति ऐसी हो गई है कि जितने लोग मर रहे हैं, उनकी भरपाई के लिए पर्याप्त बच्चों का जन्म नहीं हो रहा है। यह स्पष्ट है कि यह स्थिति लम्बे समय तक नहीं चलेगी। और यह हमें बताता है कि कुछ तो गड़बड़ अवश्य हुई है।
मसीही पत्रिका ‘फर्स्ट थिंग्स’ में लिखते हुए केविन डीयंग ने इस समस्या को एक आत्मिक समस्या के रूप में चिन्हित किया है:
निस्संदेह, प्रजनन दर में गिरावट के कारण अनेक और विभिन्न हैं। परन्तु निश्चित रूप से कुछ दम्पति अधिक सन्तान चाहते हैं परन्तु वे ऐसा करने में असमर्थ होते हैं। अन्य लोग आर्थिक दबाव या स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं से जूझते रहते हैं। परन्तु वैश्विक स्तर पर प्रजनन दर यूँ ही तेजी से नहीं गिरती, जब तक इसके पीछे कुछ गहरी समस्याएँ न हों — विशेष रूप से तब, जब आज के समय में लोग विश्व भर में पहले की तुलना में अधिक सम्पन्न, स्वस्थ और सुविधाओं से भरपूर हैं जितना कि मानव इतिहास में कभी नहीं रहे हैं। यद्यपि व्यक्ति अनेक कारणों से अपने निर्णय स्वयं लेते हैं, परन्तु एक प्रजाति के रूप में हम एक गहरी आत्मिक बीमारी से पीड़ित हैं, एक आत्मिक उदासी, जिसमें बच्चे हमें बोझ लगते हैं तथा साथ ही हमारे आनन्द लेने में रुकावट भी लगते हैं। यह बीमारी हमारे विश्वास की कमी है, और यह अविश्वास सबसे अधिक चौंकाने वाला उन देशों में है जो कभी मसीही समाज का हिस्सा हुआ करते थे। और ‘मैं तेरे वंश को आकाश के तारागण के समान करूँगा,’ परमेश्वर ने प्रसन्न होकर अब्राहम से यह प्रतिज्ञा की (उत्पत्ति 26:4)। आज अब्राहम की सन्तानों की भूमि में वही आशीष अधिकाँश लोगों को एक श्राप के समान दिखाई देती है।22
संक्षेप में कहें तो आज बहुत से लोग — करोड़ों की संख्या में — जिन्हें विवाह करके सन्तान उत्पन्न करनी चाहिए, और जो इतिहास में कभी सामान्य रूप से ऐसा किया करते थे, परन्तु अब नहीं कर रहे हैं। ऐसा मुख्य रूप से इसलिए हो रहा है क्योंकि आधुनिक समाज ने यौन सम्बन्धों के प्रजनन उद्देश्य को अनदेखा करने का प्रयास किया है, और जीवन में अन्य उद्देश्यों को प्राथमिकता दी है, जिसके कारण अब बच्चों को एक बोझ माना जाने लगा है परन्तु हमें इस सोच से बचना चाहिए। यह उचित है कि आप उस परिपेक्ष पर विचार करें जिसमें आप जीवन व्यतीत कर रहे हैं, और यह पूछें कि क्या हमारे समाज का विवाह और बच्चों के प्रति बढ़ता हुआ नकारात्मक दृष्टिकोण आपके निर्णयों को प्रभावित कर रहा है।
आप कैसे जानेंगे कि आपको विवाह करना चाहिए या नहीं? बहुत ही सरल शब्दों में कहें तो, यदि आपके भीतर यौन सम्बन्ध की इच्छा है और आप परमेश्वर के नियमों का पालन करने के लिए समर्पित हैं, तो आपको विवाह के विषय पर गम्भीरता से विचार करना चाहिए। बाइबल जीवन भर अविवाहित रहने को एक अनुग्रह बताती है जो हर किसी को नहीं मिलता है (मत्ती 19:11), और विवाह को आंशिक रूप से यौन प्रलोभनों से बचने का एक उपाय बताती है (1 कुरिन्थियों 7:2–9)। यदि आप यह नहीं मानते कि आपको जीवन भर अविवाहित रहने के लिए विशेष रूप से आत्मिक वरदान प्राप्त है, तो आपको स्वयं को विवाह के लिए तैयार करना चाहिए और एक जीवनसाथी की खोज में आगे बढ़ना चाहिए। वास्तव में, यह हमेशा सरल नहीं होता है, और यह पुरुषों और महिलाओं के लिए विभिन्न परिस्थितियों में अलग-अलग हो सकता है। अभिलेखों के अनुसार निचले स्तर पर पहुँची विवाह दरें इस बात का संकेत हैं कि हमारे समाज में कुछ बहुत गम्भीर रूप से गलत हो गया है। इसलिए, इससे पहले कि आप यह निष्कर्ष निकालें कि परमेश्वर आपको अविवाहित रहने के लिए बुला रहा है, तो यह भी विचार करें कि कहीं वह आपको किसी जीवनसाथी के साथ पवित्रता से जीने के लिए तो नहीं बुला रहा है।
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चर्चा एवं मनन:
- “प्रिय पुत्र” एवं “प्रिय पुत्री” के रूप में मसीही के लहू के द्वारा मूल्य चुकाकर आपको खरीदा गया है इसलिए आपके पिछले पाप चाहे कैसे भी रहे हों, यौन सम्बन्धित रहे हों या अन्य प्रकार के रहे हों, अब इन्हें देखने का आपका दृष्टिकोण पूरी रीति से कैसे बदला है? सम्भवतः यह एक उत्तम समय है कि हम मसीह की महिमा पर मनन करें, उस मसीह की महिमा पर जिसने अपने सभी शिष्यों को हिम के समान श्वेत बना दिया है।
- क्या अविवाहित रहने के विषय में आपके विचार इस अनुभाग में वर्णित बातों से मेल खाते हैं?
- बाइबल कहती है कि “विवाह सब में आदर की बात समझी जाए” (इब्रानियों 13:4)। यह बात आपके जीवन में कैसे दिखाई देती है, भले ही आप विवाहित हों या अविवाहित हों?
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निष्कर्ष: परमेश्वर आपके लिए है
अपने अद्भुत उपदेश द वेट ऑफ़ ग्लोरी में, सी. एस. लुईस इस बात की आलोचना करते हैं कि कैसे आधुनिक मसीही लोग प्रेम जैसी सकारात्मक गुणों के स्थान पर “उदासीनता” जैसी नकारात्मक गुणों को रख देते हैं।23 वह इस प्रकार नकारात्मक रूप में बात करने की आदत को एक समस्या के रूप में देखते हैं: यह आदत एक खतरनाक संकेत है — कि नैतिक व्यवहार का मुख्य उद्देश्य दूसरों के साथ अच्छा व्यवहार करना नहीं, वरन् अपने साथ बुरा व्यवहार करना है; कि दूसरों की भलाई करना नहीं, वरन् अपने आप को उन भलाईयों से वंचित रखना ही सच्ची धार्मिकता है। परन्तु लुईस इस विचार से सहमत नहीं हैं।
वह बताते हैं कि नए नियम में स्वयं का इनकार करना कभी भी अपने आप में अन्त नहीं होता है। परन्तु पाप और उन वस्तुओं को “ना” कहना है जो हमारे विश्वास में बाधा उत्पन्न करती हैं (इब्रानियों 12:1), यह किसी बड़ी और उत्तम वस्तु की खोज का हिस्सा है, अर्थात मसीह में बहुतायत का जीवन होना। पवित्रशास्त्र इस बहुतायत के जीवन का वर्णन बार-बार प्रतिफल, आनन्द और सुख के रूप में करता है — और न केवल इस संसार के लिए, वरन् अनन्तकाल के लिए भी करता है। यह प्रतिज्ञा करता है कि जब हम मसीह का अनुसरण करते हैं और उसकी आज्ञाओं का पालन करते हैं, तो हम अंततः अपने सर्वोच्च भले की ओर बढ़ रहे होते हैं — जो इस संसार की किसी भी वस्तु से कहीं अधिक बढ़कर है। इस सम्बन्ध में पौलुस कहता है कि यह इस पृथ्वी पर होने वाले किसी भी दुःख या स्वयं के इनकार से कहीं अधिक मूल्यवान है (2 कुरिन्थियों 4:17–18)।
लुईस का कहना है कि परमेश्वर हमें सच में सबसे उत्तम देना चाहता है। वह हमें सर्व श्रेष्ठ आनन्द देना चाहता है, जो केवल उसी समय पाया जा सकता है जब हम उससे प्रेम करें और साथ ही दूसरों से भी वैसे ही प्रेम करें, जैसे वह करता है। वह सच में हमारे पक्ष में है, हमारे विरुद्ध नहीं है। इस सच्चाई को समझने का अर्थ यह सीखना है कि हम भी बड़ी अभिलाषा के साथ वही चाहें जो परमेश्वर हमारे लिए चाहता है, क्योंकि हम इसी उद्देश्य के लिए बनाए गए हैं, और इसके अतिरिक्त शेष वस्तुएँ केवल सस्ते विकल्प हैं। लुईस आगे लिखते हैं:
…ऐसा लगता है कि हमारे प्रभु को हमारी इच्छाएँ बहुत प्रबल नहीं दिखाई देती हैं, वरन् बहुत निर्बल सी दिखाई देती हैं। हम अधूरे मन के प्राणी हैं, जो अनन्तकाल के आनन्द मिलने पर भी शराब, यौन सम्बन्ध और महत्वाकांक्षाओं में मग्न रहते हैं, जैसे कोई नासमझ बच्चा किसी झुग्गी-झोपड़ी में मिट्टी के पकौड़े बनाता रहना चाहता है क्योंकि उसे समझ नहीं है कि समुद्र के किनारे छुट्टियाँ बिताने का क्या अर्थ होता है।
क्योंकि हम बहुत आसानी से आनन्दित हो जाते हैं।24
परमेश्वर ने हमें बहुत ही अच्छा बनाया है, जो कि एक वरदान है और यौन शुद्धता भी इसी वरदान का एक हिस्सा है। वह हमारी भ्रष्ट यौन इच्छाओं को बार-बार “नहीं” इसलिए कहता है क्योंकि वह हमें कुछ और अधिक उत्तम वस्तु देना चाहता है। हमारी समस्या यह नहीं है कि हम बहुत अधिक यौन सम्बन्धों की इच्छा रखते हैं। एक बहुत महत्वपूर्ण अर्थ में, समस्या यह है कि हम उसे पर्याप्त रूप से चाहते ही नहीं हैं! हम तो इधर-उधर उसका थोड़ा-थोड़ा हिस्सा चाहते हैं, परमेश्वर के वरदान के साथ इधर-उधर मुँह मारते हुए हम अपने स्वार्थी और क्षणिक इच्छाओं की ओर मुड़ जाते हैं।
जब बात यौन सम्बन्ध की आती है, तो हमारी संस्कृति जो प्रस्तुत करती है, वह मिट्टी से बने केक के बराबर है। हमारे शरीरों के लिए परमेश्वर के द्वारा रची गई रचना को अलग-अलग तरीके से तोड़ा-मरोड़ा गया है, वे कभी भी अपनी प्रतिज्ञाओं को पूरा नहीं कर सकते हैं, क्योंकि वे उस रचना के विपरीत हैं जो हमारे भीतर परमेश्वर के स्वरूपधारी के रूप में पहले से ही रची गई है। यौन शुद्धता के सम्बन्ध में परमेश्वर के नियम सुनने में ऐसे लग सकते हैं जैसे वे आनन्द, अभिव्यक्ति, अपनी आवश्यकताओं को पूरा करना, सुख, स्वतंत्रता, संगति या यहाँ तक कि वे प्रेम लीला आदि के लिए ना कह रहे हों। परन्तु वास्तविकता में, ये “ना” इसलिए हैं ताकि एक ऐसे “हाँ” की रक्षा की जा सके जो इतना गौरवशाली है कि यह वर्तमान युग उसे पूरी रीति से समाहित भी नहीं कर सकता है। यदि आप विश्वास में जीने और परमेश्वर के नियमों के अनुसार चलते हैं, तो आप उस महिमामय सत्य को पाएँगे। और जब कोई अविश्वासी (संभवतः किसी लम्बी हवाई यात्रा के दौरान) आपसे पूछे कि आप किसके विरुद्ध हैं, तो आप उन्हें इसके बजाय यह बता सकते हैं कि आप किसके पक्ष में हैं, और वे स्वयं किस उद्देश्य के लिए बनाए गए हैं।
अन्त टिप्पणीयाँ
- जिस रिपोर्ट का उल्लेख किया है — National Center for Family & Marriage Research (NCFMR) द्वारा NSFG 2017–2019 में डेटा का विश्लेषण यह दर्शाता है कि 95.5% किशोर अभी भी विवाह की उम्मीद रखते हैं। https://mastresearchcenter.org/mast-center-research/teens-self-reported-expectations-and-intentions-for-marriage-cohabitation-and-childbearing/
- “अमेरिका में विवाह और एक साथ रहना,” प्यू रिसर्च, 6 नवम्बर, 2019: https://www.pewresearch.org/social-trends/2019/11/06/marriage- and-cohabitation-in-the-u-s/
- “दृष्टिकोण: विवाह से पूर्व साथ रहना वैवाहिक जीवन के सफल होने की सम्भावनाओं में सहायता नहीं करता है,” ब्रैड विलकॉक्स और एलिस एलहेज, डेज़रेट न्यूज़, 26 अप्रैल, 2023: https:// www.deseret.com/2023/4/26/23697625/cohabitation-happy-marriage- living-together-taylor-swift?utm_source=twitter&utm_medium=dn- social&utm_campaign=twitter&utm_content=deseretnews
- “यौन अनुभव का भ्रम,” जेसन एस. कैरोल और ब्रायन जे. विलोबी, इंस्टीट्यूट फॉर फैमिली स्टडीज, 18 अप्रैल, 2023: https://ifstudies.org/blog/the- myth-of-sexual-experience-
- पूर्वोक्त
- पूर्वोक्त
- “कम यौन साथी का अर्थ है अधिक सुखी विवाह,” ओल्गा खज़ान, द अटलांटिक, 22 अक्टूबर, 2018: https://www.theatlantic.com/health/archive/2018/10/ sexual-partners-and-marital-happiness/573493/
- (अमेरिकियों में यौन गतिविधि न करने वालों की संख्या एक ऊँचे स्तर पर पहुँच गई है) क्रिस्टोफर इंग्राहम, द वाशिंगटन पोस्ट, 29 मार्च, 2019: https:// www.washingtonpost.com/business/2019/03/29/share-americans-not- having-sex-has-reached-record-high/
- “विवाहित लोग ज़्यादा यौन सम्बन्ध बनाते हैं,” नाथन याउ, फ्लोइंग डेटा, 7 मार्च, 2017: https://flowingdata.com/2017/07/03/married-people-sex/
- कन्फेशन, हिप्पो के ऑगस्टाइन, पुस्तक 7, अध्याय 12, अनुच्छेद 18
- मेअर क्रिश्चियनिटी, सी. एस. लुईस, अध्याय 2: आक्रमण, पृष्ठ 28: https:// www.dacc.edu/assets/pdfs/PCM/merechristianitylewis.pdf
- मेअर क्रिश्चियनिटी, C. S. Lewis, Chapter 3: The Shocking Alternate, pg. 30: https://www.dacc.edu/assets/pdfs/PCM/merechristianitylewis.pdf
- “पायनियर पलेक्यू,” सौर मंडल अन्वेषण, 13 फरवरी, 2018: https://solarsystem.nasa.gov/resources/706/pioneer-plaque/
- सुम्मा थियोलोजिया, थॉमस एक्विनास, पहला भाग, प्रश्न 29. दिव्य व्यक्ति, अनुच्छेद 4, आपत्ति 2 का उत्तर: https://www.newadvent.org/ summa/1029.htm
- जेनसिस ऑप जेंडर, अबीगैल फावली, 2022 इग्नाटियस प्रेस, 143.
- ब्यूटीफूल यूनीअन, जोशुआ बटलर, मल्टनोमा पुस्तकें, 2023 पृष्ठ 21
- ब्यूटीफूल यूनीअन, जोशुआ बटलर, मल्टनोमा पुस्तकें, 2023 पृष्ठ 31
- ब्यूटीफूल यूनीअन, जोशुआ बटलर, मल्टनोमा पुस्तकें, 2023 पृष्ठ 4
- आई किस्ड डेटिंग गुडबाय, जोशुआ हैरिस, मल्टनोमा बुक्स, 1997, पृष्ठ 13
- “पहली यौन क्रांति: रोमन साम्राज्य में मसीही नैतिकता की विजय,” केविन डी यंग, द गॉस्पेल कोएलिशन, 9 सितंबर, 2019: https://www.thegospelcoalition.org/blogs/kevin-deyoung/first- sexual-revolution-triumph-christian-morality-roman-empire/
- हम पुनः “मसीही नैतिकता के मूल्य त्याग रहे हैं,” लुईस पेरी, फ़र्स्ट थिंग्स, अक्टूबर 2023: https:// www.firstthings.com/article/2023/10/we-are-repaganizing?fbclid=IwAR0 0JGZUPxs3VrIfpTOED_3n1FMOtD9sBwCPNWLk4mrnLB0iB-U1Hd4hUBE
- “The Case for Kids,” Kevin DeYoung, First Things, November 2022: https:// www.firstthings.com/article/2022/11/the-case-for-kids
- वेट ऑफ ग्लोरी, सी. एस. लुईस, पृष्ठ 1: https://www.wheelersburg.net/ Downloads/Lewis%20Glory.pdf
- वेट ऑफ ग्लोरी, सी. एस. लुईस, पृष्ठ 1: https://www.wheelersburg.net/ Downloads/Lewis%20Glory.pdf
लेखक के बारे में
शेन मॉरिस कोलसन सेंटर में एक वरिष्ठ लेखक और अपस्ट्रीम पॉडकास्ट के संचालक हैं, साथ ही ब्रेकपॉइंट पॉडकास्ट के
सह-संचालक भी हैं। “वह 2010 से मसीही वैश्विक दृष्टिकोण, संस्कृति और वर्तमान घटनाओं पर सैकड़ों ब्रेकपॉइंट टीकाओं
के सह-लेखक के रूप में कोल्सन सेंटर के वक्ता रहे हैं।” उन्होंने वर्ल्ड, द गॉस्पेल कोएलिशन, द फ़ेडरलिस्ट, द काउंसिल ऑन बाइबिलिकल मैनहुड एंड वुमनहुड और समिट मिनिस्ट्रीज़ के लिए भी लिखा है। वह और उनकी पत्नी गैब्रिएला अपने चार बच्चों के साथ लेकलैंड, फ़्लोरिडा में रहते हैं।
विषयसूची
- भाग I: वह कोई भी भली वस्तु नहीं रोकता है
- आप किसी भी भली वस्तु से वंचित नहीं हैं
- शुद्धता क्या है?
- चर्चा एवं मनन:
- भाग II: यौन सम्बन्ध किस लिए है?
- सन्तान उत्पत्ति के लिए है
- एकता
- चर्चा एवं मनन:
- भाग III: किस विषय में?
- यदि मैंने गलतियाँ की हैं, तो क्या मैं शुद्ध हो सकता हूँ?
- क्या मैं अविवाहित रहते हुए भी शुद्ध रह सकता हूँ?
- चर्चा एवं मनन:
- निष्कर्ष: परमेश्वर आपके लिए है
- अन्त टिप्पणीयाँ
- लेखक के बारे में