#7 यौन शुद्धता

By Shane Morris

परिचय: परमेश्वर की “हाँ”

 

मैंने मसीही यौन नैतिकता के विषय में सिखाने के लिए जितना लम्बी हवाई यात्रा के दौरान सीखा है, उतना कहीं और नहीं सीखा। यह बात थोड़ी विचित्र लग सकती है, इसलिए मुझे समझाने दीजिए। “लम्बी हवाई यात्रा” से मेरा अभिप्राय यह है कि दो घंटे से अधिक समय की यात्रा — अर्थात् इतनी लम्बी यात्रा कि मेरे बगल में बैठे यात्री से विस्तार से बातचीत की जा सके। और तब अपने बगल में बैठे यात्री से बातचीत करने के पश्चात्, मैंने इस बात पर ध्यान देना आरम्भ किया कि वह एक निर्धारित ढर्रे पर चल रहा था: मेरे समीप बैठे यात्री ने मुझ से पूछा कि मेरा व्यवसाय क्या है, मैंने उसे उत्तर दिया कि मैं एक मसीही लेखक और सुनाने और देखने के लिए वीडियो रिकार्डिंग करता हूँ, यह सुनते ही वह तुरन्त मुझ से कुछ इस प्रकार का प्रश्न करता है: “तो क्या इसका अर्थ यह है कि आप विवाह के अतिरिक्त यौन सम्बन्ध बनाने के विरोध में हैं? और साथ ही, क्या आप समलैंगिक विवाह, गर्भपात, आकस्मिक यौन सम्बन्ध, समलैंगिक लोगों के विरोध में हैं?”

सर्व प्रथम, मैं सीधे इन प्रश्नों के उत्तर देने का प्रयास करूँगा — यह समझाते हुए कि बाइबल के आधार पर मैं विवाह के बाहर एक पुरुष और एक स्त्री के बीच यौन सम्बन्ध, समलैंगिक व्यवहार, अजन्मे शिशुओं की हत्या, वैकल्पिक लिंग पहचान, और इस प्रकार की अन्य बातों के विरोध में क्यों हूँ। परन्तु कुछ बातचीत करने के पश्चात्, जो बात बार-बार दोहराई हुई सी लगीं और जिनसे अधिक लाभ नहीं हुआ, इस कारण मैंने अपने उत्तर पर फिर से विचार करना आरम्भ कर दिया। और तब मैं समझ गया कि अपने सह यात्रियों के “क्या आप इसके विरोध में हैं…” प्रश्नों का उत्तर देकर, मैं एक छिपी हुई धारणा को स्वीकार कर रहा था: कि मसीहियत एक ऐसा विश्वास है जो मुख्य रूप से इसके “नहीं” से परिभाषित होता है – अर्थात् उन कार्यों को करने लिए जिन्हें यह मना करता है।

मैंने स्वयं से एक प्रश्न पूछा: क्या यह सच है? क्या मेरा विश्वास परमेश्वर के द्वारा मना किए गए कार्यों की एक लम्बी सूची से अधिक कुछ नहीं है? क्या मैंने अपना जीवन सृष्टि से सम्बन्धित आनन्द में विघ्न डालने वाले आदेशों की रक्षा और उन्हें लागू करने के लिए समर्पित कर दिया है? क्या सही और गलत को लेकर मसीही समझ वास्तव में एक छोटे से कठोर शब्द “ना” में ही जुड़ी हुई है? यदि ऐसा है, तो क्या मसीही विश्वास ग्रहण करने योग्य है?

यह कोई संयोग नहीं है कि ये उच्च-स्तरीय बातचीत हमेशा यौन सम्बन्ध पर ही आकर टिक जाती है। हमारी संस्कृति इससे मुग्ध है, और यौन आकर्षण, अनुभवों और इसके प्रति झुकाव को एक मनुष्य की पहचान तथा सर्वोच्च मूल्य मानती है। और जब तक सहमति बनी रहती है, तब तक सब कुछ ठीक चलता रहता है! परन्तु अब कल्पना कीजिए कि जो लोग स्वयं को यौन रूप से स्वतंत्र मानते हैं, उनकी दृष्टि में मसीही लोग कैसे दिखाई देते होंगे। 1990 के दशक में वापस जाए, और यौन सम्बन्ध पर कोई भी मसीही पुस्तक पढ़ें, तो एक शब्द प्रमुखता से सामने आता है: “नहीं।”

जिस समय को सुसमाचारवादी अधिकाँश “शुद्ध संस्कृति” कहते थे, उस स्वर्णकाल में, लेखक, पास्टर, सम्मेलन और शिक्षक लगातार इस छोटे से शब्द का उपयोग करते थे: “विवाह-पूर्व यौन सम्बन्ध नहीं,” “मनोरंजक मुलाकात नहीं,” “अँगूठी से पहले चुम्बन नहीं,” “अश्लील कपड़े नहीं,” “वासना नहीं,” “अश्लील साहित्य या पिक्चर नहीं,” “विपरीत लिंग के साथ अकेले में समय नहीं।” नहीं। नहीं। नहीं।

परन्तु अब मैं यह नहीं मानता कि “शुद्ध संस्कृति” उतनी भद्दी या विपरीत थी जितना कि आज के आलोचक उसके विषय में सुझाव देते हैं। मैंने अभी उपरोक्त जो “ना” गिनाए हैं, उनमें से कुछ तो अच्छे और ईश्वरीय सलाह हैं! परन्तु कहीं न कहीं, यह धारणा बन गई है कि मसीही नैतिकता — विशेषकर यौन नैतिकता — पूरी रीति से “ना” से बनी है। यह विचार साधारण लोगों की सोच में घर कर गया और बस गया है। मुझे लगता है कि इस धारणा ने मसीहियों के रूप में हमारी छवि को वास्तव में हानि पहुँचायी है, और सुसमाचार साझा करने के हमारे अवसरों को भी कम कर दिया है।

शब्द “शुद्धता” जिसे मेरी किशोरावस्था के वर्षों में सुसमाचारवादी लेखकों के द्वारा बार-बार प्रयोग किया जाता था, जिसका तात्पर्य साफ-सफाई, और किसी “गन्दी” वस्तु से अलग होने की भावना को जगाना होता था। हम पानी को “शुद्ध” तब कहते हैं जब उसमें कोई दूषित पदार्थ न हो। परन्तु यदि उसमें थोड़ा सी भी गन्दगी मिला दें, तो वह अशुद्ध हो जाता है! यह समझना कठिन नहीं है कि जब पाठक इस शब्द से सामना करते हैं, तो वे आसानी से यह गलत निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि यौन सम्बन्ध ही अपने आप में वह “गन्दगी” है जिससे मसीही लोग स्वयं को बचाना चाहते हैं और इसलिए मसीही लोग न केवल “नहीं” शब्द से पीड़ित हैं, वरन् यौन सम्बन्ध के विरोध में भी हैं!

यह आवश्यक नहीं है कि समस्या “शुद्धता” शब्द में ही हो (परन्तु यह शब्द इस मार्गदर्शिका के शीर्षक में भी है!)। और न ही समस्या “ना” शब्द में है, यह तो वास्तव में एक बहुत उपयोगी शब्द है। “नहीं” कहने से जीवन भी बच सकता है! मैं एक पिता हूँ, और अपने बच्चे को सामने से आती हुई गाड़ी के सामने दौड़ने से रोकने के लिए “नहीं!” चिल्लाने से अधिक प्रभावशाली तरीका सम्भवतः ही कोई दूसरा नहीं हो सकता है। मैं निश्चित रूप से अपने छह वर्षीय बेटे को न्यूटन सम्बन्धी भौतिकी पर विस्तृत व्याख्यान नहीं दूँगा, जिससे कि वह अमेरिकी ऑटोमोबाइल कम्पनी को चुनौती देने के विषय में अपना मन बदल सके। “नहीं” एक उत्तम शब्द है। यह बच्चों और बड़ों दोनों को लगातार मूर्खतापूर्ण, खतरनाक, अनैतिक और आत्म-विनाशकारी व्यवहार से बचाता है। और धन्यवाद हो कि यह छोटा सा चिल्लाने का कार्य सरल है!

परमेश्वर भी कई बार “नहीं” कहता है। अपने चुने हुए लोगों को उसने जो व्यवस्था दी थी, जो सीनै पर्वत पर गरज और तूफ़ानी बादलों के बीच मूसा को दी गई थी, उसके मूल में दस आज्ञाओं की एक सूची है जो इतिहास में गूँजती है और आज भी यहूदी और मसीही नैतिकता का आधार है। हम इस सत्य की अनदेखी नहीं कर सकते कि इन दस आज्ञाओं में “नहीं” (या पुराने अंग्रेज़ी संस्करण में कहें तो “तू यह न करना”) का बोलबाला है।

अधिकाँश मसीही इतिहास में, इन आठ निषेधात्मक आज्ञाओं को परमेश्वर की नैतिक व्यवस्था का सार माना गया है — या यूँ कहें कि ये उसकी स्वाभाविक विशेषताओं पर आधारित सही और गलत के अनन्तकाल के सिद्धान्त हैं। “तू अपने लिए कोई मूर्ति खोदकर न बनाना,” “तू व्यभिचार न करना,” “तू हत्या न करना,” और शेष सभी अच्छी नैतिक आज्ञाएँ हैं। इन आज्ञाओं का पालन करना इस्राएल के लिए प्रतिज्ञा किए गए देश में बने रहने की एक शर्त थी, और यीशु ने स्वयं इन्हें दोहराया है। (मरकुस 10:19) ये आज्ञाएँ खरी हैं, “वह प्राण को बहाल कर देती है।” बाइबल परमेश्वर के “नहीं” कहने का उत्सव मनाती हैं (भज. 19:7)।

फिर भी, जब इन आज्ञाओं को पवित्रशास्त्र के शेष भागों से अलग करके देखा जाता है, तो ऐसा आभास हो सकता है कि बाइबल की नैतिकता मुख्यतः पाप का विरोध करने के विषय में है, न कि किसी के धर्मी होने का विकल्प देने के विषय में है। यह एक ऐसे माता-पिता के समान है जो अपने बच्चों से हमेशा यही कहते हैं कि, “नहीं!” “इसे बन्द करो!” या “ऐसा मत करो!”, परन्तु उन्हें कभी यह नहीं बताते कि उन्हें क्या करना चाहिए। यह कितनी निराशाजनक बात है! ऐसे बच्चे मानसिक रूप से पंगु हो जाते हैं, और हमेशा इस डर में रहकर काम करते हैं कि कहीं वे अपने पिता के नियमों का उल्लंघन तो नहीं कर रहे हैं।

इससे भी अधिक बुरी बात यह है कि जिन बच्चों को हमेशा केवल “नहीं” कहा जाता है, उनके भीतर यह सन्देह उत्पन्न हो जाता है कि उनके पिता वास्तव में उनके भले के विषय में नहीं सोचते हैं। इसलिए वे यह विश्वास कर सकते हैं कि जो कुछ उनके पिता उन्हें देने से मना कर रहे हैं, वह वास्तव में अच्छा और आनन्दमय है, अर्थात् यह कि जिस फल को उन्होंने खाने से मना किया है, वह वास्तव में मीठा है। अतः वे मानते हैं कि उनके पिता की आज्ञा, ज्ञान और बहुतायत वाले जीवन के मार्ग में एक रुकावट है। वे यहाँ तक सन्देह कर सकते हैं कि उनके पिता यह सब बातें जानते हैं इसलिए जानबूझकर उन्हें इससे वंचित रखना चाहते हैं।

यदि आप इस बात से परिचित हैं, तो इसका कारण यह है कि यही वह झूठ था जिस पर आदम और हव्वा ने उत्पत्ति अध्याय 3 में साँप की बातों पर विश्वास किया था। वह साँप, जिसे हम बाइबल के अन्य भागों में शैतान के रूप में जानते हैं, प्रथम मनुष्यों को यह विश्वास दिलाने में सफल हो गया कि परमेश्वर वास्तव में उनके पक्ष में नहीं है —वह जानबूझकर उनसे कोई भली और पोषण देने वाली वस्तु छिपा रहा है, और उसने उन्हें उस भलाई में सहभागी होने से रोकने के लिए उनसे झूठ बोला है।

भले ही अन्त में आदम और हव्वा को यह पता चल गया था कि वास्तविक झूठा तो साँप ही था। अपने बच्चों से कुछ भी अच्छा छिपाने के बजाय, परमेश्वर ने उन्हें वह सब कुछ दिया जो वे सम्पूर्ण और आनन्दमय जीवन जीने के लिए चाहते थे: जैसे कि स्वादिष्ट भोजन, एक हरा-भरा और सुन्दर घर, भाँति- भाँति के पशु साथी और प्राकृतिक संसाधन – यहाँ तक कि एक दोषरहित यौन साथी जिसके साथ वे प्रेम बाँट सकें और सन्तान उत्पन्न कर सकें! परन्तु परमेश्वर की “हाँ” से भरे इस अद्भुत संसार के बीच, उन्होंने उसकी एक “नहीं” पर ध्यान दिया—अर्थात् भले या बुरे के ज्ञान का जो वृक्ष है, उसका फल तू कभी न खाना। परन्तु उन्होंने कभी यह नहीं सोचा कि परमेश्वर की “नहीं” उसके सभी सकारात्मक वरदानों की रक्षा के लिए थी। इसलिए उस दिन से लेकर आज तक, हम उनकी इस अयोग्यता के कारण दुःख उठा रहे हैं और मरते जा रहे हैं क्योंकि वे परमेश्वर की सबसे बड़ी “हाँ” को समझ नहीं पाए थे।

इस क्षेत्र मार्गदर्शिका में, मैं यह समझाना चाहता हूँ कि मसीही यौन नैतिकता — जिसे हम अधिकतर “यौन शुद्धता” भी कहते हैं— अदन की वाटिका में उस “नहीं” के समान दिखाई दे सकती है। हाँ, यह कुछ ऐसे कामों को करने से मना करती है जो हम कभी-कभी करना चाहते हैं। परन्तु हम कभी भी इस बात को नहीं समझ पाते हैं कि परमेश्वर हमें उन कार्यों को करने से क्यों रोकता है। परन्तु यह समझना महत्वपूर्ण है। (और साथ ही अविश्वासियों को भी समझाने में सहायता करें) कि जब यौन सम्बन्ध की बात आती है तो मसीही लोग जो “नहीं” पर बल देते हैं, वे वास्तव में एक सुन्दर, गहरी, जीवन देने वाली “हाँ” की रक्षा करते हैं।

परमेश्वर के पास एक वरदान है जिसे वह सच्चे हृदय से हमें देना चाहता है। और वह वरदान बहुतायत का जीवन है — अर्थात् एक मनुष्य के रूप में, और एक यौन प्राणी के रूप में! वह हमें यह वरदान देना चाहता है, चाहे हम कभी यौन सम्बन्ध का अनुभव करें या न करें (मैं इस बात को बाद में समझाऊँगा)। परन्तु यह समझने के लिए कि वह उन बहुत सी बातों के लिए “नहीं” क्यों कहता है जिन्हें हमारे अविश्वासी पड़ोसी या हवाई सहयात्री उत्सव के समान मनाते हैं, हमें पहले उसके वरदान का अध्ययन करना होगा, और यह जानना होगा कि हमारी संस्कृति ने इसे इतने दुखद रूप से कैसे गलत समझा है।

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