#10 बाइबल, कार्य और आप
परिचय
कार्य किस लिए होता है? लोग
किस लिए होते हैं? यह संसार
किस लिए है?
कार्य या काम को समझने के लिए, हमें इस संसार को समझना होगा, और इसमें मनुष्य के स्थान को भी समझना होगा। यह क्षेत्रीय मार्गदर्शिका यह दर्शाने का प्रयत्न करती है कि बाइबल की शिक्षा के अनुसार परमेश्वर ने एक वैश्विक मन्दिर के रूप में इस संसार को बनाया, और उसने मनुष्य को अपने जीवित स्वरूप में, अपने पुरोहितीय-राजा के रूप में, इस वैश्विक मन्दिर में स्थापित किया, जिसे उसने अधिकार का उपयोग करने और इस जगत को परमेश्वर के स्वरूपधारियों से भरने का कार्य दिया, जिससे कि वह उसकी महिमा से भर जाए। इस बड़े कार्य के लिए एक आशीषित कार्य-जीवन संतुलन की अर्थात् विवाह, परिवार और बड़े प्रयत्न के लिए एक सामंजस्यपूर्ण समझ की आवश्यकता होती है, क्योंकि फलवन्त होने और संख्या में बढ़ने के लिए, विवाह को फलना-फूलना होगा, और संसार को परमेश्वर की महिमा से भरने के लिए, बच्चों का पालन-पोषण प्रभु के भय में और उपदेश देते हुए करना होगा। यदि किसी व्यक्ति को अपना काम सही रीति से करना है, तो वह न तो काम का आदी हो सकता है और न ही आलसी। सफलता के लिए एक संतुलित जीवन, घर पर फलने-फूलने और कार्यक्षेत्र में फलवन्त होने की आवश्यक पड़ेगी।
इस बात को प्रदर्शित करना कि बाइबल वास्तव में ये बातें सिखाती है, हमें बाइबल की पूरी कहानी से परिचित कराएगा। हम इस बात पर विचार करेंगे कि इस अति उत्तम सृष्टि में सब कुछ कैसे आरम्भ हुआ, और उस कार्य पर विचार करेंगे जो परमेश्वर ने मनुष्य को करने के लिए दिया था। इसके बाद हम जाँच करेंगे कि जब मनुष्य पाप में गिरा, तो सब बातें कैसे बदल गईं, फिर बाइबल सब बातों की बहाली में कार्य के बारे में क्या संकेत देती है, उस पर विचार करने से पहले हम परमेश्वर के छुटकारे के कार्यक्रम में कार्य के स्थान की जाँच करेंगे।
इस परियोजना का दायरा हमें पूरी तरह से विस्तृत होने की अनुमति नहीं देगा, अत: हम अपनी चर्चा पाँच मुख्य पात्रों पर केन्द्रित करेंगे, और ये स्वयं भी प्रभु यीशु पर केन्द्रित हैं। हम आदम से आरम्भ करते हैं, जो वाटिका में है, और उसके बाद यरूशलेम के राजा, दाऊद के पुत्र, सुलैमान की ओर बढ़ते हैं, जिसके पास कार्य के बारे में कहने के लिए बहुत कुछ था, और फिर यीशु की ओर बढ़ते हैं, जिसमें सब कुछ पूरा होता है। अन्त में अदन की वाटिका की पूर्ति में नये आदम के साथ अपने विचारों का समापन करने से पहले, हम यीशु से पहले सुलैमान की शिक्षाओं को आधार बनाने के विपरीत, हम यीशु के बाद पौलुस की शिक्षाओं पर अपना ध्यान केन्द्रित करते हैं। इस प्रस्तुति के लिए परिवर्तनीय शैली वाली1 संरचना को निम्नलिखित रूप में दर्शाया जा सकता है:
आदम
सुलैमान
यीशु
पौलुस
नया आदम
ऑडियो मार्गदर्शिका
ऑडियो#10 बाइबल, कार्य और आप
भाग I: सृष्टि
सृष्टि के समय, परमेश्वर ने अपने लिए एक वैश्विक मन्दिर बनाया।2 इस वैश्विक मन्दिर में परमेश्वर ने अपने स्वरूप और समानता को, अर्थात् मानवजाति को स्थापित किया। उसने उन्हें अपने स्वरूप में नर और नारी करके बनाया (उत्प. 1:27), और परमेश्वर ने उन्हें आशीष दी और उन्हें उनकी जिम्मेदारी सौंपी: जो अदृश्य परमेश्वर के स्वरूप में थे, उन पर यह जिम्मेदारी थी कि वे फल-फूलें और संख्या में बढ़ें, जिससे कि वे इस पृथ्वी को भर दें और उसे अपने वश में कर लें, और पशु जगत पर परमेश्वर के द्वारा दिए गए अधिकार का उपयोग करें (1:28)। इस प्रकार वे पृथ्वी को परमेश्वर की महिमा से ऐसे भर देते जैसे जल समुद्रों को ढक लेता है (यशा. 11:9; हब. 2:14; भज. 72:19), जिससे उदयाचल से लेकर अस्ताचल तक, यहोवा के नाम की स्तुति होती रहे (मला. 1:11; भज. 113:3)। परमेश्वर ने आरम्भ से ही मनुष्य को कार्य करने के लिए दिया, जिससे कि उसकी महिमा बढ़े।
उत्पत्ति 1:28 में परमेश्वर की आशीष एक बड़ी ही उत्तम, मौलिक सृष्टि, पतन-पूर्व, कार्य-जीवन संतुलन की ओर संकेत करती है (उत्प. 1:31 को देखें)। अपतित मनुष्य अपनी पत्नी के साथ सामंजस्यपूर्ण रिश्तों का आनन्द उठाएगा, और एक साथ मिलकर वे परमेश्वर की आशीष का आनन्द इसलिए उठाएँगे, क्योंकि वे अपनी सन्तानों के रूप में स्वयं को पुनरुत्पादित करेंगे, जो अपने माता-पिता के साथ मिलकर पृथ्वी को अपनी सन्तानों से भरने, उसे अपने वश में करने और पशुओं पर अधिकार रखने के बड़े कार्य में शामिल होंगे। इसका परिणाम यह होगा कि सृष्टि के हर कोने में, अदृश्य परमेश्वर के दृश्य प्रतिरूप, अर्थात् जो उसके स्वरूप और समानता में हैं, उसे प्रकट करते हुए उसके चरित्र, उपस्थिति, अधिकार और शासन को धारण करने के लिए सामने लाएँगे।
उत्पत्ति 1 अध्याय में परमेश्वर ने जो कुछ किया, जब हम उसकी तुलना उससे करते हैं, जो उत्पत्ति 2 अध्याय में वह मनुष्य से करवाना चाहता है, तो हमें परमेश्वर के कार्यक्रम के बारे में अधिक जानकारी मिलती है। जब परमेश्वर ने संसार की रचना की, तो जो कुछ उसने बनाया उसे उत्पत्ति 1 अध्याय में उसने नाम दिया। वह अपने आदेश के वचन से किसी भी वस्तु को अस्तित्व में लाता (उदाहरण के लिए, “उजियाला हो!” [उत्प. 1:3]), और फिर वह उसका नाम रखता (उदाहरण के लिए, “और परमेश्वर ने उजियाले को दिन… कहा” [1:5])। यह क्रम बार-बार चलता रहता है (उत्पत्ति 1 अध्याय में हम दस बार “फिर परमेश्वर ने कहा” पढ़ते हैं, और सात बार यहोवा “ऐसा हो जाए” कहता है), इस कारण जब हम उत्पत्ति 2 अध्याय में पहुँचते हैं, तो हम इसके दोहराए जाने को पहचानते हैं। यहाँ परमेश्वर पशुओं को बनाता है, परन्तु उन्हें स्वयं नाम देने के बजाय, वह यह देखने के लिए उन्हें मनुष्य के पास लाता है कि वह उन्हें क्या नाम देगा (2:19)। यह ऐसा है कि मानो परमेश्वर अपने शिष्य को उप-शासन के कार्य में साथ ला रहा हो।
आदम का बड़ा कार्य
परमेश्वर ने मनुष्य को पशुओं पर अधिकार दिया (1:26, 28), और फिर परमेश्वर ने मनुष्य को अपनी सृष्टि के साथ वही करने का, अर्थात् उसका नाम रखने का अवसर दिया, जिसे परमेश्वर स्वयं कर रहा था (2:19-20)। इससे यह मालूम होता है कि अदृश्य परमेश्वर के दृश्य प्रतिनिधि के रूप में, उसके अदृश्य अधिकार, शासन, उपस्थिति और चरित्र को समस्त सृष्टि पर लागू करना ही मनुष्य का कार्य है।
परमेश्वर ने संसार को रचा और भरा है, और इस कार्य को पूरा करना मनुष्य का काम है। नाम रखने के कार्य के अतिरिक्त, यहोवा ने मनुष्य को वाटिका में काम करने और उसकी रक्षा करने के लिए रखा (उत्प. 2:15)। इन “काम” और “रक्षा” शब्दों का अनुवाद “सेवा करना” और “रखवाली करना” भी किया जा सकता है, और पंचग्रन्थ में इनका एक साथ उपयोग किसी और जगह केवल तम्बू में लेवियों की जिम्मेदारियों का वर्णन करने के लिए किया गया है (गिन. 3:8)। यह इस बात की ओर संकेत करता है कि मूसा अपने पाठकों को यह समझाना चाहता था कि जो काम लेवी तम्बू में कर रहे थे, वही आदम वाटिका में कर रहा था।
इस प्रकार, परमेश्वर के उप-शासक के रूप में, उसकी सृष्टि पर अधिकार रखते हुए, उस अदृश्य का प्रतिनिधित्व करने वाले दृश्यमान राजा के रूप में (1:27) आदम शासन करता है (“अधिकार रखता है,” [उत्प. 1:26, 28])। इसके अतिरिक्त, एक प्रकार के पूर्व-लेवी (2:15) के रूप में, उस स्थान पर जहाँ परमेश्वर दिन के ठण्डे समय में फिरता है (उत्प. 3:8), सृष्टि को सृष्टिकर्ता का ज्ञान पहुँचाते हुए, आदम परम पवित्र स्थान में एक याजक के रूप में सेवा करता है।
उत्पत्ति 2 अध्याय में, परमेश्वर ने स्त्री की सृष्टि (2:18-23) से पहले ही भले और बुरे के ज्ञान के वृक्ष का फल खाने पर प्रतिबन्ध लगा दिया था (उत्प. 2:17)। स्त्री को इस प्रतिबन्ध का ज्ञान होना (3:1-4) इस बात को दर्शाता है कि पुरुष ने उसे यह बात बताई थी। इस प्रकार, उसने एक भविष्यसूचक व्यक्ति के रूप में कार्य किया, जो परमेश्वर के प्रकाशन का वचन दूसरों तक पहुँचाता है।
परमेश्वर के संसार में आदम ने जो किया, उससे हम निम्नलिखित निष्कर्ष निकाल सकते हैं: यद्यपि आदम को विशिष्ट रूप से “राजा”, “याजक” या “भविष्यद्वक्ता” नहीं कहा गया है, फिर भी वह वे सभी कार्य करता है: सृष्टि पर शासन करना, परमेश्वर के पवित्र निवासस्थान में कार्य करना और उसकी देखभाल करना, और परमेश्वर के प्रकट वचन को दूसरों तक पहुँचाना।
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चर्चा एवं मनन:
- सृष्टि के वृत्तांत का यह पुनर्कथन आपके पहले के विचार से भिन्न कैसे है?
- आदम को दिए गए कार्य आपके कार्य के दृष्टिकोण को किन तरीकों से आकार दे सकते हैं?
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भाग II: पतन
और फिर मंच पर उपस्थित सभी लोगों ने विद्रोह कर दिया। एक जंगली जन्तु होने के कारण सर्प को, पुरुष के अधिकार के अधीन होना था, और उसने स्त्री को धोखा देकर पुरुष को पाप करने के लिए प्रेरित किया (उत्प. 3:1-7)। जिस पुरुष की वाटिका की रखवाली करने की भूमिका में शायद अशुद्ध साँपों को दूर रखना था, परन्तु इसी के साथ निश्चित रूप से उस वृक्ष से खाने पर परमेश्वर के निषेध का पालन करना और स्त्री की रक्षा करना था, उसने सर्प को अपने नाश करने वाले झूठ को बोलने और स्त्री को धोखा देने दिया। इससे पहले कि पुरुष स्वयं उस वृक्ष में से खाए, उस समय वह चुपचाप खड़ा रहा, जब स्त्री ने उस वृक्ष का फल खाया (3:8)। जो स्त्री कम से कम उस सर्प के विषय में पुरुष को बता सकती थी, उसने सर्पवाणी के आरोपों, बदनामी और सुझावों को सहा, उस वृक्ष का फल खाया, और वह मना किया हुआ फल सीधे पुरुष को दे दिया।
आदम का दु:खद अपराध
पशुओं पर परमेश्वर के उप-शासक के रूप में अधिकार रखने वाले (राजा) ने इसलिए पाप किया, क्योंकि सर्प ने उसे परीक्षा में डाल दिया था। सेवा और रखवाली करने वाले याजक की भूमिका निभाने वाले व्यक्ति ने अपने अपराध से उस पवित्र स्थान को अपवित्र कर दिया। जिस व्यक्ति ने आज्ञा का प्रकट वचन प्राप्त करने और बताने का भविष्यसूचक कार्य किया था, उसने स्वयं उसी मनाही का उल्लंघन किया।
और पाप ने सभी का काम कठिन बना दिया।
स्त्री को पुरुष के साथ फलने-फूलने और संख्या में बढ़ने के लिए बनाया गया था (उत्प. 1:28)। पाप के परिणामस्वरूप, अब उसे प्रसव पीड़ा होगी (3:16अ)। उसे पुरुष की सहायता करने के लिए भी बनाया गया था (2:18), परन्तु अब उसकी लालसा अपने पति के लिए इस अर्थ में होगी कि वह उसे नियंत्रित करना चाहेगी, और वह अनावश्यक बल से उस पर प्रभुता करेगा (3:16b; और 4:7 को देखें)।
पुरुष को उस वाटिका में काम करने के लिए बनाया गया था, परन्तु पाप के कारण भूमि शापित हो गई (3:17) और अब उसमें काँटे और ऊँटकटारे उगने लगे (3:18)। परमेश्वर ने मनुष्य से कहा कि वह कष्टदायी परिश्रम और पसीने से भीगे हुए माथे के साथ भोजन करेगा (3:19), फिर उसे वाटिका से निकाल दिया (3:23-24)।
इस दु: खद विनाश को शब्दों में नहीं बताया जा सकता। जीवन के शुद्ध क्षेत्र की रक्षा करने का दायित्व जिस याजकीय व्यक्ति को सौंपा गया था, उसने एक अशुद्ध सर्प को प्रवेश करने, परीक्षा में डालने और पाप करने की अनुमति दी, जिसके परिणामस्वरूप मृत्यु आई। परमेश्वर का प्रत्यक्ष प्रकाशन प्राप्त वह भविष्यसूचक व्यक्ति न केवल यह आग्रह करने में विफल रहा कि परमेश्वर का वचन माना जाए, बल्कि स्वयं उसका उल्लंघन भी किया। पशुओं पर अधिकार रखने वाले राजकीय व्यक्ति ने अपना शासन एक झूठ बोलने वाले सर्प को सौंप दिया।
पाप को द्वारा सब कुछ कठिन बना देने वाली कहानी उत्पत्ति 4 अध्याय में जारी रहती है, जहाँ “भूमि पर खेती करने वाला किसान” कैन (उत्प. 4:2, “काम करने वाला” या “किसान” वही शब्द है, जिसका उपयोग 2:15 में वाटिका में “काम” करने वाले आदम के लिए किया गया है), अपने भाई “भेड़-बकरियों के चरवाहे” हाबिल की हत्या कर देता है (4:2)। जब कैन से हिसाब माँगा गया, तो उसने पूछा कि क्या उसे अपने भाई का “रखवाला” है (4:9, 2:15 में आदम के द्वारा वाटिका की रखवाली के लिए भी यही शब्द उपयोग किया गया है)। फिर भूमि पर खेती करने वाले किसान/सेवक, कैन से यहोवा कहता है कि वह “भूमि की ओर से शापित है” (4:11), और आगे यह भी कहता है कि जब वह भूमि पर खेती करेगा/काम करेगा, तो भूमि उसे अपनी पूरी उपज नहीं देगी (4:12)।
इस संसार को परमेश्वर के स्वरूप और समानता से भरने के बजाय, जो अपने चरित्र के अनुसार अधिकार का उपयोग करेगा, आरम्भिक दम्पत्ति ने पाप करके इस संसार को हिंसा से भर दिया, जैसा कि उत्पत्ति 1:27-28 से संकेत मिलता है, (6:11)। हालाँकि, परमेश्वर ने अपना कार्यक्रम सर्प के अधीन नहीं किया।
स्त्री के वंश की प्रतिज्ञा
यहोवा सर्प से कहता है कि वह स्त्री से शत्रुता उत्पन्न करेगा (उत्पत्ति 3:15अ), जिससे तीन बातें निकाली जा सकती हैं:
- पहली बात, यद्यपि स्त्री का परमेश्वर से छिपना इस बात की ओर संकेत करता है कि वह आत्मिक रूप से मरी हुई है, और यद्यपि अदन से उसे निकाले जाने का अर्थ है कि उसे जीवन के शुद्ध क्षेत्र से मरे हुओं के अशुद्ध क्षेत्र में धकेल दिया गया है, और शत्रुता होगी वाले तथ्य का अर्थ है कि निरंतर संघर्ष चलता रहेगा, अत: वह शारीरिक रूप से अभी नहीं मरने वाली है।
- दूसरी बात, बैर रखने का अर्थ है कि वह सर्प के साथ नहीं जुड़ रही है, बल्कि उसके विरुद्ध खड़ी है। जब यहोवा सर्प से कहता है कि यह बैर उसके वंश और स्त्री के वंश तक फैलेगा (3:15ब), तो हम सीखते हैं कि पुरुष भी जीवित रहेगा और सर्प का विरोध करेगा, क्योंकि स्त्री के वंश या सन्तान के लिए उसका होना आवश्यक है।
- अन्त में, यद्यपि इब्रानी भाषा के शब्द “वंश” का उपयोग किसी व्यक्ति या समूह के लिए किया जा सकता है (जैसे अंग्रेजी भाषा में आप एक बीज या बीज की पूरी थैली के बारे में बात कर सकते हैं), स्त्री के वंश की पहचान एक ऐसे पुरुष के रूप में की गई है, जो सर्प के सिर को कुचल देगा, जिससे उसे एड़ी पर घाव हो जाएगा (3:15ग)। क्योंकि एड़ी के घाव से प्राण बच सकते हैं, जबकि सिर का घाव घातक हो सकता है, इसलिए यह सर्प पर विजय का संकेत देता है।
सृष्टि के समय, पृथ्वी को भरने के कार्य (उत्प. 1:28) के लिए स्त्री-पुरुष का फलना-फूलना और संख्या में बढ़ना आवश्यक था। उत्पत्ति 3:15 में की गई छुटकारे के प्रतिज्ञा में भी यही सच्चाई पाई जाती है: सर्प का सिर कुचले जाने के लिए, स्त्री-पुरुष का फलना-फूलना और संख्या में बढ़ना आवश्यक है। परमेश्वर की सृष्टि की परियोजना और छुटकारे की परियोजना, दोनों के लिए यह आवश्यक है कि स्त्री-पुरुष विवाह में एक साथ जुड़ें (2:24) जिससे कि वे धर्मी सन्तानों को जन्म देने और उनका पालन-पोषण करने का कार्य करें।
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चर्चा एवं मनन:
- आदम का पाप परमेश्वर के द्वारा दिए गए उसके तीनों कार्यों (राजा, याजक और भविष्यद्वक्ता) के विरुद्ध विद्रोह कैसे था?
- आप अपने रिश्तों और कार्य में पाप के प्रभाव को किन तरीकों से देख सकते हैं?
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भाग III: छुटकारा
परमेश्वर का छुटकारे का कार्यक्रम उत्पत्ति 3:15 में की गई इस प्रतिज्ञा से आरम्भ होता है कि स्त्री का वंश सर्प के सिर को कुचल देगा। यह प्रतिज्ञा अब्राहम की ओर ले जाती है। उत्पत्ति 12:1-3 में अब्राहम से की गई परमेश्वर की प्रतिज्ञा, उत्पत्ति 3:15 में निहित छुटकारे की आरम्भिक प्रतिज्ञा को और विस्तार देती है, और ये प्रतिज्ञाएँ अब्राहम के जीवन के दौरान (उत्प. 22:15-18) और विस्तार से दोहराई जाती हैं। फिर ये प्रतिज्ञाएँ इसहाक (26:2-5) और याकूब (28:3-4) को दी जाती हैं। याकूब के द्वारा यहूदा को दी गई आशीष (49:8-12) भी इन प्रतिज्ञाओं को और बढ़ाती तथा विस्तारित करती है।
यह वंशक्रम दाऊद तक जाता है, और परमेश्वर दाऊद के वंश को जिलाने और उसके राज्य के सिंहासन को सदा के लिए स्थापित करने की प्रतिज्ञा करता है (2 शमू. 7 अध्याय)। उत्पत्ति 5:28-29 में नूह के जन्म के समय, उसके पिता लेमेक ने आशा व्यक्त की थी कि उसका यह वंश शापित भूमि पर काम और कष्टदायी परिश्रम से राहत लेकर आएगा। उत्पत्ति 5:29 की भाषा, यह सुझाव देते हुए उत्पत्ति 3:17 की भाषा की याद दिलाती है कि लेमेक जैसे लोग स्त्री के वंश की खोज में हैं, जो न केवल सर्प पर विजय प्राप्त करेगा, बल्कि उन दण्डों को भी हटा देगा, जो काम को कठिन बनाते हैं।
उस परीक्षा करने वाले पर विजय प्राप्त की जाएगी। पाप प्रबल नहीं होगा।
पाप का परिणाम — मृत्यु — अन्तिम शब्द नहीं होगा। हनोक नहीं मरा (उत्पत्ति 5:21-24) यह तथ्य इस बात की ओर संकेत करता है कि स्त्री का वंश परमेश्वर से मृत्यु और उसके कारण होने वाली हर बात पर विजय पाने की अपेक्षा करता है।
पुराने नियम में विश्वास करने वाले बाकी लोग इस बात को समझते और विश्वास करते थे कि परमेश्वर स्त्री के एक वंश, अब्राहम के वंश, यहूदा के वंश, दाऊद के वंश को जिलाएगा, जो सर्प को पराजित करेगा और इस प्रकार सब बातों को वापस पटरी पर लाएगा, और परमेश्वर के उद्देश्यों की पूर्ति की ओर ले जाने वाला मार्ग तैयार किया जाएगा।
स्त्री का वंश और इस संसार में आदम का कार्य
वे कौन से उद्देश्य थे? जैसा कि ऊपर बताया गया है, परमेश्वर ने इस संसार को एक वैश्विक मन्दिर के रूप में बनाया। जब उसने इस्राएल को मिस्र से छुड़ाया और सीनै पर्वत पर उनके साथ वाचा बाँधी, तब उसने उन्हें वैश्विक मन्दिर की एक छोटी प्रतिकृति या नकल, अर्थात् तम्बू प्रदान किया। यह बताता है कि दाऊद अपने चारों ओर के सभी शत्रुओं से विश्राम पाने के बाद प्रभु के लिए एक मन्दिर क्यों बनाना चाहता था (2 शमू. 7:1)।
सीधे शब्दों में कहें तो, दाऊद आदम के कार्य को समझ गया था, और वह समझ गया था कि वह प्रतिज्ञा किए गए कुल की वंशावली में था, और वह इस्राएल के राजा के रूप में अपनी भूमिका को समझ गया था, और इसलिए उसने परमेश्वर के द्वारा आदम को दिए गए कार्य को पूरा करने का प्रयत्न किया। उसने 2 शमूएल 7 अध्याय में प्रतिज्ञाएँ प्राप्त कीं, और फिर 2 शमूएल 8-10 अध्यायों में हर दिशा में विजय प्राप्त करना आरम्भ किया। यहोवा के लिए एक मन्दिर बनाने की दाऊद की इच्छा, इस्राएल में यहोवा के शासन को स्थापित करने की उसकी इच्छा को दर्शाती है, जो इस्राएल के राजा के लिए यहोवा के निमित्त सब जातियों पर शासन करने के आरम्भिक बिंदु के रूप में है (भज. 2:7-9 को देखें)।
दाऊद ने इस बड़े कार्य को पूरा करने की अपनी इच्छा नातान भविष्यद्वक्ता को बताई (2 शमू. 7:2), और उस रात यहोवा ने नातान पर यह प्रकट किया कि यद्यपि दाऊद ने जीवन के शुद्ध क्षेत्र का निर्माण करने के लिए बहुत अधिक लहू बहाया था (1 इति. 22:8, और यह सारी मृत्यु उसे अशुद्ध कर रही थी), फिर भी परमेश्वर दाऊद के लिए एक घराना बनाएगा (2 शमू. 7:11), दाऊद के वंश को जिलाएगा (7:12), उसका राज्य और सिंहासन स्थापित करेगा (7:13), और उसका पिता होगा (7:14)।
नये आदम के रूप में सुलैमान
यहोवा के द्वारा दाऊद से की गई एक घराने की प्रतिज्ञा (2 शमू. 7:11) एक राजवंशीय घराने, अर्थात् दाऊद के वंशज राजाओं के एक कुल को संदर्भित करती प्रतीत होती है। साथ ही, यहोवा के द्वारा की गई एक विशेष वंश की प्रतिज्ञा जिसका सिंहासन सदा के लिए बना रहेगा (7:12-13) उस राजा की ओर संकेत करती है, जिसके साथ वह कुल समाप्त होता है। इन कथनों में पाई जाने वाली अस्पष्टता यह अनुमान लगाती है कि दाऊद के कुल का प्रत्येक नया राजा वह व्यक्ति हो सकता है। और 2 शमूएल 7:13 में की गई यह प्रतिज्ञा जिसमें बताया गया है कि दाऊद का वंश परमेश्वर के नाम के लिए एक भवन बनाएगा, और सुलैमान के द्वारा उस कार्य को पूरा करना, की व्याख्या एक पूर्ति के रूप में की जाएगी (1 राजा. 5-9) जब तक कि उसकी अपनी मूर्तिपूजा सम्बन्धी विफलता प्रकट न हो जाए (1 राजा. 11:1-13)। 1 राजाओं 4 अध्याय सुलैमान को एक नये आदम के रूप में चित्रित करता है, जो अधिकार का उपयोग करके आदम का कार्य करता है (4:24), और आदम के द्वारा पशुओं के नाम रखे जाने की तरह, सुलैमान ने “पेड़ों की चर्चा की और पशुओं, पक्षियों और रेंगनेवाले जन्तुओं और मछलियों की चर्चा की” (4:33)।
सभोपदेशक की पुस्तक में सुलैमान ने जो कार्य पूरा करने का बीड़ा उठाया, उस पर उसके अपने विचार विशेष रूप से परमेश्वर के लोगों के द्वारा किए जाने वाले कार्य पर हमारे विचार के लिए प्रासंगिक हैं। सुलैमान ने परमेश्वर के द्वारा आदम को दिए गए बड़े कार्य को अपने हाथ में ले लिया, और उसने पाया कि पाप और मृत्यु के कारण, यह प्रयत्न व्यर्थ था।
सुलैमान बताता है कि उसका उद्देश्य “यह देखना था कि आदम की सन्तानों के लिए अपने जीवनकाल के दिनों की संख्या के अनुसार आकाश के नीचे क्या-क्या करना अच्छा होगा” (सभो. 2:3, लेखक का अनुवाद)। जब सुलैमान अपने हाथ में लिए हुए कार्य का विस्तार से वर्णन करता है, तो उसकी परियोजनाएँ हमें उस कार्य की याद दिलाती हैं, जिसे परमेश्वर ने संसार की रचना करते समय किया था। ऐसा प्रतीत होता है कि सुलैमान समझ गया था कि अपने कार्यों में परमेश्वर के चरित्र को चित्रित करना ही उसका काम था, और इस प्रकार वह अपने किए गए कार्यों का वर्णन ऐसे शब्दों में करता है, जो परमेश्वर द्वारा किए गए कार्यों की याद दिलाते हैं।
मूल इब्रानी भाषा में और अंग्रेजी अनुवाद में सभोपदेशक 2:4-8 की शब्दावली उत्पत्ति के सृष्टि के वृत्तांत (और पुराने नियम के अन्य भागों) में वर्णित शब्दों और वाक्यांशों और घटनाओं के क्रम से मेल खाती है। सुलैमान सबसे पहले 2:4 में कहता है कि “मैं ने बड़े बड़े काम किए।” सृष्टि में परमेश्वर के कार्य निश्चित रूप से बड़े हैं, और पुराने नियम में किसी और जगह भी उनका वर्णन इसी प्रकार किया गया है (उदाहरण के लिए, भज. 104:1)। हमने ध्यान दिया है कि सृष्टि के समय परमेश्वर ने अपने लिए एक वैश्विक मन्दिर, या एक घर बनाया (यशा. 66:1; भज. 78:69 को देखें), और सुलैमान आगे कहता है, “मैं ने अपने लिए घर बनवा लिए” (सभो. 2:4)।
यहाँ यह शब्दावली पूरी तरह से एक समान हो जाती है। उत्पत्ति 2:8 में उपयोग की गई भाषा, “और यहोवा परमेश्वर ने पूर्व में अदन में एक वाटिका लगाई,” सुलैमान द्वारा अपनाई गई है, जब वह कहता है, “मैं ने अपने लिए दाख की बारियाँ लगवाईं; मैं ने अपने लिए बारियाँ और बाग लगवा लिए” (2:4ब–5अ)। उत्पत्ति 2:9 बताता है कि कैसे “यहोवा परमेश्वर ने भूमि से सब भाँति के वृक्ष, जो देखने में मनोहर और जिनके फल खाने में अच्छे हैं, उगाए, और वाटिका के बीच में जीवन के वृक्ष को और भले या बुरे के ज्ञान के वृक्ष को भी लगाया।” और सुलैमान ने भी यही कहा: “मैं ने उनमें भाँति भाँति के फलदाई वृक्ष लगाए” (2:5ब)।
उत्पत्ति 2:10 बताता है कि “उस वाटिका को सींचने के लिए एक महानदी अदन से निकली।” सुलैमान ने भी सिंचाई का प्रबन्ध किया: “मैं ने अपने लिए कुण्ड खुदवा लिए कि उन से वह वन सींचा जाए जिसमें पौधे लगाए जाते थे” (सभो. 2:6)। उत्पत्ति की पुस्तक में पाया जाने वाला विचारों का प्रवाह सभोपदेशक के इस खण्ड में सुलैमान के विचारों के प्रवाह से एक-एक चरण करके मेल खाता है। उत्पत्ति 2:11-14 उन चार नदियों का वर्णन करता है, जो 2:10 में अदन से निकलकर वाटिका को सींचने वाली नदी में से बहती हैं, और फिर उत्पत्ति 2:15 में, “यहोवा परमेश्वर ने आदम को लेकर अदन की वाटिका में रख दिया, कि वह उसमें काम करे और उसकी रक्षा करे।” इसे पवित्रशास्त्र के अन्य कथनों से मेल खाते हुए कहें तो वाटिका को तैयार करने के बाद, “यहोवा के सेवक” को उस वाटिका में “काम” करने के लिए रखा गया है। जबकि उत्पत्ति 2:15 में इब्रानी भाषा के मूल क्रियात्मक रूप का उपयोग किया गया है, जिसका अनुवाद “सेवा करना/काम करना” किया जा सकता है, सभोपदेशक 2:7 में सुलैमान उसी मूल के संज्ञा रूप का उपयोग करता है, जिसका अनुवाद “सेवक/दास” किया जा सकता है, जब वह कहता है, “मैं ने दास और दासियाँ मोल लीं, और मेरे घर में दास भी उत्पन्न हुए; और जितने मुझ से पहले यरूशलेम में थे, उन से कहीं अधिक गाय–बैल और भेड़–बकरियों का मैं स्वामी था।” जिस प्रकार परमेश्वर ने मनुष्य को अपनी वाटिका की सेवा करने के लिए बनाया था, ठीक उसी प्रकार सुलैमान ने अदन में अपने प्रयत्न के लिए दासों को मोल ले लिया।
उत्पत्ति 2:12 की चार नदियों में से एक के वर्णन के बीच, सोने, मोती और सुलैमानी पत्थर का उल्लेख मिलता है, और वैसे ही सभोपदेशक 2:8 में भी सुलैमान दावा करता है, “मैं ने अपने लिए चाँदी और सोना… का भी संग्रह किया…” और 2:9 में सुलैमान फिर से दावा करता है कि कैसे उसने यरूशलेम में अपने से पहले के सभी लोगों को पीछे छोड़ दिया, जिसमें न केवल उसके पिता दाऊद, बल्कि सम्मानित याजक-राजा मलिकिसिदक भी शामिल है (उत्प. 14:18-20; भज. 110:4)। फिर वह दावा करता है, “और जितनी वस्तुओं को देखने की मैं ने लालसा की, उन सभों को देखने से मैं न रुका; मैं ने अपना मन किसी प्रकार का आनन्द भोगने से न रोका क्योंकि मेरा मन मेरे सब परिश्रम के कारण आनन्दित हुआ; और मेरे सब परिश्रम से मुझे यही भाग मिला” (सभो. 2:10)। इस प्रकार, सुलैमान अपने द्वारा किए गए बड़े-बड़े कार्यों से अपनी अत्यन्त संतुष्टि और आनन्द की पुष्टि करता है। और फिर भी वह 2:11 में आगे कहता है, “तब मैं ने फिर से अपने हाथों के सब कामों को, और अपने सब परिश्रम को देखा, तो क्या देखा कि सब कुछ व्यर्थ और वायु को पकड़ना है, और संसार में कोई लाभ नहीं।”
सुलैमान को इस कार्य को करने में जो भी महत्व और संतुष्टि मिली, उन सब में उसने पाया कि वह आदम के कार्य को पूरा नहीं कर सका। ऐसा करने का प्रयत्न उन सभी कारणों से व्यर्थ था, जिनका वर्णन वह सभोपदेशक की पुस्तक के शेष भाग में करता है। परमेश्वर ने आदम को जो कार्य सौंपा था, उसे पूरा करने का प्रयत्न करना, बहती हुई हवा को पकड़ने के समान है — क्योंकि हवा तो मनुष्य की उँगलियों के बीच से फिसल जाती है। उस पर कोई हत्थे नहीं लगे हुए, और कोई भी मनुष्य उसे पकड़ नहीं सकता। सुलैमान के शब्द पतित मनुष्य की दशा की निरर्थकता को व्यक्त करने के लिए टटोल रहे हैं। पाप हर बात को टेढ़ा कर देता है, और जो टेढ़ा है, वह आसानी से सीधा नहीं होता (सभो. 1:15अ)। पाप सभी प्रयत्नों में किसी आवश्यक बात की कमी का कारण भी बनता है, और जिस बात की कमी है, उसकी गणना नहीं की जा सकती (1:15ब)। और जो नश्वरता हर मानवीय जीवन का अन्त करती है, वह किसी भी मानवीय उपलब्धि की व्यर्थता और संक्षिप्तता को और बढ़ा देती है।
ऐसा लगता है कि सभोपदेशक 2:12 इसी विचारधारा को आगे बढ़ाता है: “फिर मैं ने अपने मन को मोड़ा कि बुद्धि और बावलेपन और मूर्खता के कार्यों को देखूँ; क्योंकि जो मनुष्य राजा के पीछे आएगा, वह क्या करेगा? केवल वही जो होता चला आया है।”3 डुआने गैरेट तर्क देते हैं कि “यह ‘राजा’ किसी और को नहीं, बल्कि उत्पत्ति 2-4 अध्यायों वाले ‘आदम’ को संदर्भित करता है,” और इस बहुवचन “वही जो होता चला आया है” को उत्पत्ति 1:26 के बहुवचन “हम मनुष्य को… बनाएँ” से मेल खाते हुए समझाते हैं, और वे सभोपदेशक 2:12 का इस प्रकार अर्थ निकालते हैं: “क्या कोई ऐसा मनुष्य आ सकता है जो राजा — आदम — से बेहतर हो, जिसे परमेश्वर ने बहुत समय पहले बनाया था?”4
इस प्रकार सुलैमान परमेश्वर के स्वरूप और समानता में इस्राएल के राजा के रूप में शासन करने की बड़ी परियोजना का प्रयत्न करता प्रतीत होता है। उसने एक नया आदम बनने का प्रयास करते हुए, स्त्री के वंश के कुल में दाऊद के वंश के रूप में अपनी जिम्मेदारी पूरी करने का प्रयत्न किया। उसने देखा कि परमेश्वर ने उसे चारों ओर से बुद्धि, धन और सर्वश्रेष्ठता से भरपूर वरदान दिया था (1 राजा. 3:10-14; सभो. 1:16; 2:9), और आदम के कर्मों के कारण उसे सफलता की राह में एक अटूट बाधा, अर्थात् मृत्यु का सामना करना पड़ा। मृत्यु सब को आती है — चाहे बुद्धिमान हो या मूर्ख, — यह तथ्य सभोपदेशक 2:14-17 में व्यर्थ ठहरता है। आदम का पाप संसार में मृत्यु लेकर आया। सुलैमान की मृत्यु होगी इस तथ्य का अर्थ है कि उसकी परियोजनाओं का अन्त होगा और उसकी कोई स्थायी स्मृति नहीं रहेगी (सभो. 2:16; 1:11)। सुलैमान न केवल यह जानता है कि उसकी मृत्यु उसके अपने प्रयासों के अन्त का आश्वासन होगी, बल्कि वह यह भी देखता है कि उसका सारा काम किसी और के हाथ में चला जाएगा, जो बुद्धिमान या मूर्ख हो सकता है, जो केवल व्यर्थता की भावना को बढ़ाता है (सभो. 2:18-19)।
इन वास्तविकताओं से अत्यन्त निराश होकर (सभो. 2:20), सुलैमान इस तथ्य पर दुःख व्यक्त करता है कि जिन कुशल कारीगरों ने वस्तुएँ अर्जित की हैं, उन्हें वे वस्तुएँ उन लोगों के लिए छोड़ देनी होंगी, जिन्होंने उनके लिए काम नहीं किया (2:21)। सभोपदेशक 2:3 के इस विचार को लेकर, जहाँ उसने यह जानने की अपनी मंशा प्रकट की थी कि मनुष्य के लिए क्या करना सही है, और इस तथ्य को देखते हुए कि जीवन दुःखों से भरा है, काम करना कष्टदायी है, और नींद अक्सर क्षणभंगुर होती है (2:23), सुलैमान पूछता है कि मनुष्य को उसके परिश्रम और प्रयत्न से क्या मिलता है (2:22)। अपनी उत्कृष्ट पुस्तक के इस पड़ाव पर, सुलैमान उन विचारों का परिचय देता है, जिनकी वह अपने श्रोताओं से सराहना करता है, और उसकी भावनाएँ उन सभी के लिए प्रासंगिक हैं, जो आदम के पतन और मसीह की वापसी के बीच रहते और काम करते हैं।
सुलैमान उन लोगों को क्या सलाह देता है, जो परमेश्वर के स्वरूप और समानता में मानवीय रूप में अपने भाग्य को पूरा करके परमेश्वर को आदर देने का प्रयत्न केवल यह समझने के लिए करते हैं कि मृत्यु उनके प्रयत्नों को व्यर्थ कर देती है? इसका उत्तर सबसे पहले सभोपदेशक 2:24-25 में मिलता है, और सुलैमान अपनी पुस्तक में बार-बार इस उत्तर का सार दोहराता है (सभो. 3:12-13; 3:22; 5:18; 8:15; और 9:7-10 को देखें, और 11:8-10 भी इसी के समान है)। इसका मुख्य विचार यह है कि
(1) मनुष्य के लिए इससे बेहतर कुछ नहीं है
(2) कि वह खाए-पीए और
(3) अपने काम का आनन्द ले, क्योंकि
(4) यदि वह ऐसा कर सकता है तो यह परमेश्वर की ओर से उसे दिया गया वरदान है, और परमेश्वर यह वरदान हर किसी को नहीं देता (2:26; 6:1-2 को देखें)।
निम्नलिखित तालिका इंग्लिश स्टैण्डर्ड वर्जन से इस मूलपाठ को दिखाती है:
| सभोपदेशक का संदर्भ | कुछ भी इससे बेहतर नहीं है | खाओ और पियो | काम का आनन्द लो | परमेश्वर का वरदान |
| 2:24-25 | मनुष्य के लिए खाने–पीने और परिश्रम करते हुए | अपने जीव को सुखी रखने के सिवाय | और कुछ भी अच्छा नहीं। | मैं ने देखा कि यह भी परमेश्वर की ओर से मिलता है; क्योंकि खाने–पीने और सुख भोगने में मुझ से अधिक समर्थ कौन है? |
| 2:24-25 | मनुष्य के लिए खाने–पीने और परिश्रम करते हुए अपने जीव को सुखी रखने के सिवाय और कुछ भी अच्छा नहीं। | मैं ने देखा कि यह भी परमेश्वर की ओर से मिलता है; | क्योंकि खाने–पीने और सुख भोगने में | मुझ से अधिक समर्थ कौन है? |
| 3:22 | अत: मैं ने यह देखा कि इससे अधिक कुछ अच्छा नहीं | कि मनुष्य अपने कामों में आनन्दित रहे क्योंकि उसका भाग यही है; | कौन उसके पीछे होने वाली बातों को देखने के लिए उसको लौटा लाएगा? | |
| 5:18 | सुन, जो भली बात मैं ने देखी है, वरन् जो उचित है, | वह यह कि मनुष्य खाए और पीए | और अपने परिश्रम से जो वह धरती पर करता है, | अपनी सारी आयु भर जो परमेश्वर ने उसे दी है, सुखी रहे; क्योंकि उसका भाग यही है। |
| 8:15 | तब मैं ने आनन्द को सराहा, क्योंकि सूर्य के नीचे मनुष्य के लिए | खाने–पीने और आनन्द करने को छोड़ और कुछ भी अच्छा नहीं, | क्योंकि यही उसके जीवन भर जो परमेश्वर उसके लिए धरती पर ठहराए, | उसके परिश्रम में उसके संग बना रहेगा। |
| 9:7–10 | अपने मार्ग पर चला जा, अपनी रोटी आनन्द से खाया कर, और मन में सुख मानकर अपना दाखमधु पिया कर; क्योंकि परमेश्वर तेरे कामों से प्रसन्न हो चुका है। तेरे वस्त्र सदा उजले रहें, और तेरे सिर पर तेल की घटी न हो। | अपने व्यर्थ जीवन के सारे दिन जो उसने सूर्य के नीचे तेरे लिए ठहराए हैं, अपनी प्यारी पत्नी के संग में बिताना, | क्योंकि तेरे जीवन और तेरे परिश्रम में जो तू सूर्य के नीचे करता है तेरा यही भाग है। जो काम तुझे मिले उसे अपनी शक्ति भर करना, क्योंकि अधोलोक में जहाँ तू जाने वाला है, न काम न युक्ति न ज्ञान और न बुद्धि है। |
सुलैमान का सकारात्मक निष्कर्ष
ये कथन मूल रूप से आशा से भरे हुए हैं। ये इस बात की पुष्टि करते हैं कि यद्यपि नश्वर मनुष्य का अनुभव व्यर्थ है, फिर भी परमेश्वर से अच्छे वरदान के रूप में जीवन, मजदूरी और भोजन प्राप्त करने का बड़ा महत्व है।
कौन सी बात इस विचार को उचित ठहराएगी कि भले ही यह परियोजना इस जीवन में पूरी नहीं हो सकती, क्योंकि मृत्यु इसे हमेशा के लिए एक व्यर्थ प्रयत्न बना देती है, फिर भी इसका महत्व बना रहता है और इसका आनन्द प्रयत्न, मजदूरी, परिश्रम और कष्ट में मनाना चाहिए? यह सभोपदेशक में मरे हुओं के शारीरिक पुनरुत्थान में विश्वास के और इस विश्वास के संकेत हो सकते हैं कि परमेश्वर के सभी उद्देश्य और प्रतिज्ञाएँ एक नये आकाश और नयी पृथ्वी में पूरे होंगे, परन्तु भले ही सुलैमान इस पुस्तक में इन्हें सीधे तौर पर स्पष्ट नहीं करता, फिर भी ये निश्चित रूप से उसकी परम्परा का हिस्सा हैं, जो उत्पत्ति से आरम्भ होकर मूसा के तोरह तक जारी है, जिसकी घोषणा यशायाह से लेकर दानिय्येल तक सब भविष्यद्वक्ताओं ने की है।5 हम यह बात मान सकते हैं कि सुलैमान इन विचारों पर विश्वास करता था और अपने श्रोताओं से यह जानने की अपेक्षा करता था कि नीतिवचन में उसने स्वयं जो भविष्य की आशा व्यक्त की है, वह उस महत्व की सूचना देगी जिसकी पुष्टि वह व्यर्थ कार्य के लिए भी करता है (नीति. 2:21; 3:18; 12:28; 13:12, 14; 15:24; 19:23; 23:17–18; 24:14, 20; 28:13, 16 को देखें)।6
सुलैमान मानता है कि कोई भी मनुष्य परमेश्वर के उद्देश्यों को पूरा नहीं कर सकता (भज. 127 अध्याय को देखें), और फिर भी क्योंकि वे परमेश्वर के उद्देश्य हैं, और क्योंकि परमेश्वर उन लोगों को प्रतिफल देता है, जो भविष्य के आनन्द की प्रतिज्ञा के साथ उनका अनुसरण करते हैं, इसलिए वे पूरी सामर्थ्य के साथ उसे पूरा करने का प्रयत्न करने के योग्य हैं, और परमेश्वर की इच्छा पूरी करने का प्रयत्न करते हुए व्यक्ति को आनन्दित होना चाहिए। इस प्रकार आलसी व्यक्ति को चींटियों की परिश्रम के साथ की गई तैयारियों से सीखने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है (नीति. 6:6-11), परिश्रम करने से धन और सम्मान मिलता है, उसके विपरीत आलसी और सुस्त को केवल लज्जा मिलती है (10:4-5; 12:27; 13:4; 18:9; 20:4, 13; 21:5; 24:30-34), और आलसी व्यक्ति आँखों में लगने वाले धुएँ के समान है (10:26)। “परिश्रम से सदा लाभ होता है” (14:23)। आलसी लोगों में बिना कारण वाला डर होता है (22:13; 26:13-16), परन्तु परिश्रमी लोग साहसपूर्वक आगे बढ़ते हैं। मितव्ययिता और विलासिता से संयमित परहेज भी कठोर परिश्रम का हिस्सा है (21:17, 20; 28:19)। कुशल कारीगरों को आदर मिलेगा (22:29) और वे अपने परिश्रम के फल का आनन्द मनाएँगे (27:18; 28:19)।
इससे पहले कि हम नये नियम की इस घोषणा पर विचार करें कि पुनरुत्थान इस बात को सुनिश्चित करता है कि प्रभु में हमारा परिश्रम व्यर्थ नहीं है, हम अपना ध्यान सुलैमान से भी बड़े और नये आदम, अर्थात् यीशु नासरी पर केन्द्रित करते हैं।
जो सुलैमान से भी बड़ा है
माइकल एंजेलो अपने काम के लिए प्रसिद्ध हैं। उनकी सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक सिस्टिन चैपल की छत के केन्द्र में सुशोभित है और इसमें परमेश्वर और आदम की उंगलियाँ लगभग एक-दूसरे को छूती हुई दिखाई गई हैं। हालाँकि, उस प्रसिद्ध चित्रण का एक संदर्भ भी है। उस चैपल की छत 130 फुट से अधिक लम्बी और 40 फुट से अधिक चौड़ी है, और लगभग 5,000 वर्ग फुट के भित्तिचित्रों से ढकी हुई है। उस छत पर बाइबल की कहानियों को दर्शाने वाली 300 से अधिक आकृतियाँ चित्रित की गई हैं, और दृश्यमान रूप में सृष्टि और छुटकारे की कहानी को दोहराती हैं। मैं जिस बात पर जोर दे रहा हूँ, वह यह है कि मनुष्य की रचना के समय परमेश्वर और आदम की उंगलियों के चित्रण में एक व्यापक संदर्भ मिलता है, जिसमें होकर इसे समझा जाना चाहिए, और वैसा ही यह प्रभु यीशु के कार्य के साथ भी है।
हम निश्चय ही इस बात पर टिप्पणी कर सकते हैं कि एक बढ़ई/राजमिस्त्री के पुत्र के रूप में नि: सन्देह यीशु ने किस तरह उत्कृष्ट कार्य किया, और हम इस बात पर भी टिप्पणी कर सकते हैं कि उसकी शिक्षाएँ किस तरह अच्छे भण्डारीपन की सराहना करती हैं (मर. 12:1-12 में दुष्ट किसानों का दृष्टान्त, लूका 16:1-13 में बेईमान भण्डारी का दृष्टान्त, और लूका 17:7-10 में निकम्मे दासों का दृष्टान्त देखें) साथ ही काम-काज, महत्वाकांक्षा, सरलता और परिश्रम (विशेष रूप से मत्ती 25:14-30 में तोड़ों के दृष्टान्त) पर भी टिप्पणी कर सकते हैं, परन्तु हमें उस बाइबल आधारित ईश-वैज्ञानिक संदर्भ को देखने से नहीं चूकना चाहिए, जिसमें होकर यीशु अपना कार्य करता है। वह नये आदम, प्रतिनिधित्व करने वाले इस्राएली, दाऊद के वंश, इस्राएल के राजा के रूप में आया है। इस प्रकार, उसके पास करने के लिए ऐसा कार्य है, जिसे बाइबल की पूरी कहानी की पृष्ठभूमि में समझा जाना चाहिए।
दूसरे आदम के रूप में, जहाँ पहला वाला असफल रहा था, उसे वहाँ सफल होना होगा। पहला वाला परमेश्वर के वैश्विक मन्दिर पर अधिकार स्थापित करने वाला, उसकी सेवा और रखवाली करने वाला, उसे भर देने और उसे अपने वश में कर लेने वाला था। परन्तु वह असफल हो गया। फिर यरूशलेम का राजा, दाऊद का पुत्र सुलैमान, जिसने स्वयं इस परियोजना के लिए प्रयत्न किया था, भजन संहिता 127 अध्याय में दृढ़तापूर्वक कहता है कि घर को यहोवा बनाएगा — सम्भवत: वह दाऊद के घराने और यहोवा के भवन को संदर्भित कर रहा था — और वही नगर की रक्षा करेगा, अन्यथा सब कुछ व्यर्थ है (भज. 127:1–2)। यीशु, जो आश्चर्यों का आश्चर्य, स्वयं प्रभु (मर. 1:1–3), देहधारी यहोवा (यूह. 1:14), परमेश्वर के पुत्र और दाऊद के पुत्र (मत्ती 1:1–23; लूका 3:23–38) के रूप में, घर बनाने (मत्ती 16:18) और नगर की रक्षा करने (यूह. 18:4–9) के लिए आया।
इस यात्रा में, उसे उस पाप और मृत्यु (1 कुरिं. 15:21-22, 45-49) पर विजय पाने के लिए जीवन भर धार्मिकता स्थापित करनी पड़ी (रोमि. 3:24-26), जिसे पहले आदम ने संसार में फैलाया था (रोमि. 5:12-21)। यीशु ने, अपने हाथों से कोई हिंसा न करते हुए, अपने मुँह से कोई छल की बात न बोलते हुए (यशा. 53:9), और हमारे समान हर प्रकार से परखे जाते हुए, तौभी निष्पाप रहने वाला (इब्रा. 4:15) धार्मिक जीवन जिया। यह तथ्य कि उसने कोई पाप नहीं किया था, इस कारण उसने उसकी मजदूरी, अर्थात् मृत्यु नहीं कमाई (रोमि. 4:23), और इसलिए यद्यपि वह दूसरों को मिला हुआ दण्ड चुकाने के लिए मरा, फिर भी मृत्यु में उसे थामे रखने की कोई शक्ति नहीं थी (प्रेरि. 2:24)।
यीशु ने न केवल आदम की विनाशकारी पराजय को पलट दिया, बल्कि अपने पूरे जीवनकाल में इस्राएल के इतिहास का सार भी दोहराया (मत्ती 1-4 अध्यायों को देखें)। उसका अद्भुत जन्म इसहाक से लेकर यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले तक के अद्भुत जन्मों के तरीके को दोहराता है और उससे भी आगे बढ़ जाता है। हेरोदेस के द्वारा इस्राएल के पुत्रों को मार डालने का प्रयत्न करना, फ़िरौन के द्वारा इस्राएल के पुत्रों को मार डालने का प्रयत्न करने के समान है। यूसुफ मरियम और यीशु को मिस्र ले जाता है, और फिर प्रतिज्ञा के देश में लौट आता है, जहाँ यीशु का यरदन नदी में बपतिस्मा होता है, इससे पहले कि वह चालीस दिनों तक जंगल में रहे, जहाँ उसने परीक्षाओं का सामना किया था। फिर यीशु अपनी महान् सामर्थ्य के दस गुना प्रदर्शन (मत्ती 8-10 अध्याय) से पहले, प्रकाशन का एक नया भण्डार देने के लिए पहाड़ पर चढ़ जाता है (मत्ती 5-7 अध्याय)।
यीशु के शेष जीवन के साथ-साथ, यह सब बातें, यूहन्ना 17:4 में की गई उसकी प्रार्थना के पीछे है, “जो कार्य तू ने मुझे करने को दिया था, उसे पूरा करके मैं ने पृथ्वी पर तेरी महिमा की है।” यीशु ने अपने जीवन में पिता के द्वारा करने के लिए दिए गए उस कार्य को पूरा किया, और अपनी मृत्यु में भी पिता के द्वारा करने के लिए दिए गए उस कार्य को पूरा किया।
यीशु ने जो कुछ भी किया, वह दाऊद के घराने और यहोवा के भवन, दोनों के निर्माण की व्यापक परियोजना के अनुसरण में था, जिससे कि वह नयी वाचा का मलिकिसिदक महायाजक बन सके (इब्रा. 2:9-10, 17; 5:8-10)। यीशु ने स्वयं को तोरह को जानने और उसे लागू करने के कार्य में समर्पित करके दाऊद के घराने की स्थापना की। मूसा की तोरह का पालन करके शैतान और सर्प के वंश का विरोध करते हुए यीशु ने नीतिवचन 28:4 को जीया: “जो लोग व्यवस्था को छोड़ देते हैं, वे दुष्ट की प्रशंसा करते हैं, परन्तु व्यवस्था पर चलने वाले उन का विरोध करते हैं।” उसकी प्रत्यक्ष धार्मिकता उसके विरुद्ध खड़े साँप के बच्चों के लिए एक फटकार थी: “परन्तु जो लोग दुष्ट को डाँटते हैं उनका भला होता है, और उत्तम से उत्तम आशीर्वाद उन पर आता है” (नीति. 24:25)। व्यवस्था के अनुसार अपना मार्ग लेकर, यीशु ने स्वयं को व्यवस्थाविवरण 17 अध्याय का योग्य राजा, भजन संहिता 1 अध्याय का धन्य पुरुष, अर्थात् वह राजा सिद्ध किया जिसका सिंहासन यहोवा सदा के लिए स्थिर रखेगा (2 शमू. 7:14)।
यीशु ने वह कार्य पूरा किया, जो पिता ने उसे धार्मिकता से जीवन बिताने, परोक्ष रूप से मरने और विजयी होकर जी उठने के लिए दिया था, और उसने पवित्र आत्मा के मन्दिर, अर्थात् कलीसिया के निर्माण का कार्य भी पूरा किया (मत्ती 16:18)। कलीसिया केवल प्रभु यीशु के धार्मिक जीवन, उद्धारक मृत्यु और धर्मी पुनरुत्थान के कारण ही अस्तित्व में है (रोमि. 4:25)। फिर उसने स्वर्ग पर चढ़कर पवित्र आत्मा उण्डेल दिया (प्रेरि. 2:33), और कलीसिया को यह वरदान दिया कि वह इस संसार को परमेश्वर की महिमा से भरने का कार्य कर सके (इफि. 4:7-16)।
यीशु ने केवल तोरह में निपुण होने के कार्यों को पूरा नहीं किया, बल्कि उसे जीया, और अपने शिष्यों से अन्त तक प्रेम किया (यूह. 13:1), क्रूस पर चढ़कर और आत्मा के मन्दिर के रूप में कलीसिया का निर्माण करके, उसने अपने जाने से पहले अपने शिष्यों को यह भी समझाया कि वह पिता के घर में उनके लिए जगह तैयार करने जा रहा है (यूह. 14:1-2)। बाइबल की कहानी और प्रतीकात्मकता के संदर्भ में समझा जाए, तो पिता का घर वैश्विक मन्दिर, अर्थात् नये आकाश और नयी पृथ्वी की पूर्ति को दर्शाता है, जिसका परम पवित्र स्थान नया यरूशलेम है, जो सब बातों के पूर्ण होने पर परमेश्वर के पास से स्वर्ग से उतरेगा (प्रका. 21:1-2, 15-27; 22:1-5)।
यीशु ही वह वचन है, जिसके द्वारा आदि में जगत की रचना हुई (यूह. 1:3; इब्रा. 1:2), और उस कार्य को करने के बाद, अपने शिष्यों के लिए लौटने की भी प्रतिज्ञा करते हुए वह अन्त में जगत को नया बनाने के लिए आवश्यक कार्य भी करता है (यूह. 14:1-3; इब्रा. 1:10-12; 9:27-28)। उसने इतना कुछ किया है और करता चला जा रहा है कि यूहन्ना दावा करता है कि यदि सब कुछ लिखा गया होता, तो उसकी उपलब्धियों का विवरण देने वाली पुस्तकें इस संसार में नहीं समातीं (यूह. 21:25)।
कलीसिया का निर्माण यीशु करता है, और वही नये आकाश और नयी पृथ्वी के वैश्विक मन्दिर का निर्माण करता है। वही अपने लोगों का आत्मा देकर उनका निर्माण भी करता है (यूह. 20:21-23), और उन्हें उससे भी बड़े-बड़े कार्य करने के लिए भेजता है (14:12) कि सब जातियों के लोगों को शिष्य बनाने के लिए सुसमाचार का प्रसार करें (मत्ती 28:18-20)।
पौलुस के निर्देश
मसीही कौन हैं और उनके द्वारा किए जाने वाले कार्य का क्या महत्व है, इसके बारे में पौलुस के विचारों का नियंत्रक ढाँचा क्या है? नये नियम के लेखक मसीह और कलीसिया में पुराने नियम को पूर्ण होते हुए समझते हैं, और पौलुस दो बार दावा करता है कि पुराने नियम का पवित्रशास्त्र मसीहियों के लिए लिखा गया था (रोमि. 15:4; 1 कुरिं. 9:9)। इसका अर्थ है कि पौलुस पुराने नियम की सम्पूर्ण सामग्री को धारण करके उस पर निर्माण करता है, जो उत्पत्ति में सृष्टि के वृत्तांत से लेकर व्यवस्थाविवरण में की गई वाचा और सभोपदेशक और नीतिवचन में सुलैमान की शिक्षाओं तक है।
फिर कार्य पर चर्चा के लिए पौलुस के नियंत्रक ढाँचे में वे बातें शामिल होंगी, जिन पर हमने पुराने नियम और यीशु नासरी में उसकी पूर्ति के बारे में चर्चा की है। पौलुस मसीहियों को मसीह, अर्थात् नये आदम में बना हुआ देखता है, और इस कारण मसीहियों के द्वारा किए जाने वाले कार्य को बाइबल की मुख्य कहानी में समझा जाना चाहिए। परमेश्वर ने आदम को वाटिका में काम करने और उसकी रक्षा करने के लिए रखा था। उसके पाप के कारण उसे बाहर निकाल दिया गया था। इसके बाद परमेश्वर ने इस्राएल को तम्बू और बाद में मन्दिर दिया, जिसमें लेवियों और हारून के याजकीय वंशजों को परमेश्वर के निवास के भण्डारियों के रूप में नियुक्त किया गया, और मन्दिर का निर्माण करने वाले दाऊद के कुल से आने वाले वंशज थे। जैसे आदम को अदन से निकाला गया, वैसे ही इस्राएल को भी उस देश से निर्वासित कर दिया गया था। यीशु मन्दिर की पूर्ति (यूह. 2:19-21) और दाऊद के कुल से मन्दिर का निर्माण करने वाले राजा (मत्ती 16:18; यूह. 14:2) के रूप में आया, और उसने परमेश्वर और उसके लोगों के बीच नयी वाचा का शुभारम्भ किया (लूका 22:20), और मलिकिसिदक की रीति पर महायाजक ठहरा (इब्रा. 1:3; 5:6-10)।
हालाँकि, नयी वाचा में आने वाले बदलावों के साथ, यीशु यरूशलेम में एक वास्तविक मन्दिर नहीं बनाता। इसके बजाय, वह अपनी कलीसिया बनाता है (मत्ती 16:18)। यह बात नये नियम के इस आग्रह की व्याख्या करती है कि कलीसिया पवित्र आत्मा का मन्दिर है (उदाहरण के लिए, 1 कुरिं. 3:16; 1 पत. 2:4-5)। यीशु कलीसिया का निर्माण कर रहा है, और उसके लोगों को कुछ विशेष स्थानों पर आराधना करने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि वहीं आराधना करनी है, जहाँ कहीं भी वे उसके नाम पर इकट्ठे होते हैं (यूह. 4:21-24; मत्ती 18:20)।
इसका अर्थ यह है कि मसीहियों के रूप में, हमें स्वयं को मसीह, अर्थात् नये आदम में बने हुए मानना चाहिए (रोमि. 5:12-21 को देखें)। हम मसीह के स्वरूप के अनुरूप बन रहे हैं (2 कुरिं. 3:18), जो स्वयं परमेश्वर का स्वरूप है (कुलु. 1:15)। जो लोग मसीह में हैं, वे नयी सृष्टि का भाग हैं (2 कुरिं. 5:17), और जब सुसमाचार फल लाता है, तो ऐसा लगता है कि मानो नया आदम फलदायी हो रहा है और संख्या में बढ़ रहा है (कुलु. 1:6, और उत्प. 1:28 के यूनानी भाषा के अनुवाद से तुलना करें)। यीशु अपने लोगों को “एक राज्य, और अपने परमेश्वर पिता के लिए याजक” बनाता है (प्रका. 1:6; और 1 पत. 2:9 को भी देखें)।
यह ढाँचा हमारी पहचान और हमारे कार्य के महत्व की समझ को कैसे प्रभावित करता है? अपने विचारों को मसीह के ज्ञान में बन्दी बनाने में निम्नलिखित प्रकार की सोच शामिल है: परमेश्वर ने इस संसार को एक वैश्विक मन्दिर के रूप में रचा। परमेश्वर ने मनुष्य को अपनी अदृश्य उपस्थिति, सामर्थ्य, शासन, अधिकार और चरित्र का दृश्यमान स्वरूप और समानता बनने के लिए रचा। अर्थात्, मनुष्य को इस संसार में परमेश्वर के राजा-याजक के रूप में परमेश्वर के अधिकार का उपयोग करने के लिए बनाया गया था। जहाँ आदम असफल हुआ, वहाँ मसीह सफल हुआ, और जो लोग मसीह के हैं, वे उसके स्वरूप में फिर से नये हो रहे हैं। विश्वासियों के पास अब कलीसिया, अर्थात् पवित्र आत्मा के मन्दिर में एक-दूसरे का निर्माण करने का अवसर है, जब तक कि मसीह सब कुछ नया बनाने के लिए वापस न आ जाए।
नये आदम मसीह में राजा-याजक के रूप में, पौलुस विश्वासियों से आग्रह करता है कि वे अपने शरीरों को जीवित बलिदानों के रूप में, पवित्र आत्मा के मन्दिर, अर्थात् कलीसिया में उचित सेवा के रूप में अर्पित करें (रोमि. 12:1)। “एक दूसरे के सुधार” (14:19) की भाषा और पौलुस की प्रत्येक व्यक्ति को दी गई “अपने पड़ोसी को उसकी भलाई के लिए प्रसन्न करे कि उसकी उन्नति हो” (15:2) की बुलाहट, मसीह के द्वारा अपनी कलीसिया के निर्माण में योगदान देने वाले विश्वासियों की कल्पना को दर्शाती है।
इन शब्दों में अपने जीवनों की कल्पना करने से हमें पौलुस की इस चेतावनी को अपनाने में सहायता मिलती है कि हम सब कुछ परमेश्वर की महिमा के लिए करें (1 कुरिं. 10:31), और यह बताता है कि उसने स्वयं इतना परिश्रम क्यों किया (15:10), और उसके इस दावे की पुष्टि करता है कि प्रभु में हमारा परिश्रम व्यर्थ नहीं है (15:58), और, जिस तरह आदम सर्प को वाटिका से बाहर रखने और स्त्री को उससे बचाने में विफल रहा (उत्प. 2:15; 3:1-7 को देखें), वह बात पौलुस के निर्देशों को समझने के लिए एक प्रासंगिक पृष्ठभूमि प्रदान करती है, जब वह लिखता है, “जागते रहो, विश्वास में स्थिर रहो, पुरुषार्थ करो, बलवन्त होओ। जो कुछ करते हो प्रेम से करो” (1 कुरिं. 16:13-14; और रोमियों 16:17-20 को भी देखें)।
कलीसिया के बारे में पौलुस की अवधारणा सीधे तौर पर इफिसियों 4:28 में चोरों के बारे में कही गई उसकी बातों की जानकारी देती है कि अब वे चोरी नहीं करते बल्कि ईमानदारी से काम करते हैं, जिससे कि उनके पास “जिसे प्रयोजन हो उसे देने को उसके पास कुछ हो”, और इन टिप्पणियों से ठीक पहले 4:25 में यह कथन आता है, “क्योंकि हम आपस में एक दूसरे के अंग हैं।” इफिसियों के विश्वासियों के लिए पौलुस की चिन्ता कि वे इस तरह काम करें कि वे सुसमाचार की सराहना कर सकें, इफिसियों 6:5-9 में दासों और स्वामियों पर उसकी टिप्पणियों में भी देखी जा सकती है। विश्वासी स्वयं को जिस भी आर्थिक रिश्ते में पाते हैं, उन्हें यीशु की सेवा करते हुए (6:5, 7) और यह विश्वास करते हुए कि वह प्रतिफल देगा और न्याय करेगा (6:8-9, और कुलु. 3:22-4:1 को भी देखें) उन लोगों के साथ जिनके साथ वे काम करते हैं, इस तरह से व्यवहार करना चाहिए, जो मसीह का आदर करे और सुसमाचार की गवाही दे। पौलुस कुलुस्सियों 3:17 में दिए गए स्तुति-सूचक लक्ष्य के साथ परिश्रम के लिए सुलैमान की बुलाहट को दोहराता है, “वचन में या काम में जो कुछ भी करो सब प्रभु यीशु के नाम से करो, और उसके द्वारा परमेश्वर पिता का धन्यवाद करो” (साथ ही 3:23 को भी देखें)। और इन्हीं सब कारणों से पौलुस विश्वासियों को निर्देश देता है: “और जैसी हम ने तुम्हें आज्ञा दी है, वैसे ही चुपचाप रहने और अपना–अपना काम–काज करने और अपने अपने हाथों से कमाने का प्रयत्न करो; ताकि बाहर वालों से आदर प्राप्त करो, और तुम्हें किसी वस्तु की घटी न हो” (1 थिस्स. 4:11-12)। आलसी लोगों को इस प्रकार चेतावनी दी जानी चाहिए (5:11), और जो लोग प्रतिक्रिया नहीं देते उन्हें कलीसिया की ओर से अनुशासित किया जाना चाहिए (2 थिस्स. 3:6-15):
हे भाइयों, हम तुम्हें अपने प्रभु यीशु मसीह के नाम से आज्ञा देते हैं कि तुम हर एक ऐसे भाई से अलग रहो जो अनुचित चाल चलता और जो शिक्षा उसने हम से पाई उसके अनुसार नहीं करता। 7 क्योंकि तुम आप जानते हो कि किस रीति से हमारी सी चाल चलनी चाहिए, क्योंकि हम तुम्हारे बीच में अनुचित चाल न चले, 8 और किसी की रोटी मुफ्त में न खाई; पर परिश्रम और कष्ट से रात दिन काम धन्धा करते थे कि तुम में से किसी पर भार न हो। 9 यह नहीं कि हमें अधिकार नहीं, पर इसलिए कि अपने आप को तुम्हारे लिए आदर्श ठहराएँ कि तुम हमारी सी चाल चलो। 10 क्योंकि जब हम तुम्हारे यहाँ थे, तब भी यह आज्ञा तुम्हें देते थे कि यदि कोई काम करना न चाहे तो खाने भी न पाए। 11 हम सुनते हैं कि कुछ लोग तुम्हारे बीच में अनुचित चाल चलते हैं, और कुछ काम नहीं करते पर दूसरों के काम में हाथ डाला करते हैं। 12 ऐसों को हम प्रभु यीशु मसीह में आज्ञा देते और समझाते हैं कि चुपचाप काम करके अपनी ही रोटी खाया करें। 13 तुम, हे भाइयों, भलाई करने में साहस न छोड़ो। 14 यदि कोई हमारी इस पत्री की बात को न माने तो उस पर दृष्टि रखो, और उसकी संगति न करो, जिससे वह लज्जित हो। 15 तौभी उसे बैरी मत समझो, पर भाई जानकर चिताओ।
इस अंश पर पाँच टिप्पणियाँ:
- पौलुस से प्राप्त परम्परा (2 थिस्स. 3:6) यह है कि विश्वासियों को दूसरों से सहायता की अपेक्षा करने के बजाय स्वयं और दूसरों की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए काम करना चाहिए।
- पौलुस ने भी स्वयं का संचालन इसी प्रकार से किया, अर्थात् दूसरों से अपने भोजन की व्यवस्था करने की अपेक्षा करके उन पर बोझ डालने के बजाय अपने भोजन के लिए काम किया (3:7–8)।
- पौलुस का नियम है कि जो लोग काम करने से इन्कार करते हैं, उन्हें दूसरों द्वारा भोजन न दिया जाए (3:10)।
- जो लोग उपयोगी, ईमानदार और उत्पादक कार्य में शामिल नहीं होते, वे विनाशकारी व्यवहार में लिप्त होने की सम्भावना रखते हैं (3:11)।
- पौलुस कलीसिया से उन लोगों को लज्जित करने और उनसे कोई सम्बन्ध नहीं रखने के लिए कहता है, जो काम करने से इन्कार करते हैं (4:14)।
परमेश्वर ने आदम को अदन की वाटिका में इसलिए नहीं रखा था कि उसे झपकी लेने और आलस्य के दोष में लिप्त होने के लिए एक अच्छी जगह मिल जाए। इसके बजाय, परमेश्वर ने आदम को संसार को अपने वश में करने, उस पर अधिकार रखने, उसमें काम करने और उसकी देखभाल करने के लिए वाटिका में रखा (उत्प. 1:26, 28; 2:15)। यीशु पर विश्वास करने वाले लोग, जो नये आदम के साथ विश्वास से जुड़े हुए हैं और इस प्रकार उसमें पाए जाते हैं, अपनी नयी सृष्टि की पहचान को जीने का प्रयत्न करते हैं (2 कुरिं. 5:17; गला. 6:15) और विश्वासयोग्य भण्डारियों के रूप में राज्य के लिए अपनी सारी सम्पत्ति और अपना सब कुछ लगा देते हैं।
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चर्चा एवं मनन:
- बहुत अधिक काम करने और बहुत कम काम करने के बीच आप संतुलन कैसे बनाए रख सकते हैं? काम के बारे में आपके दृष्टिकोण को सभोपदेशक 2:24-25 के शब्दों से कौन सी बात के लिए आकार लेने की आवश्यकता है: “मनुष्य के लिए खाने–पीने और परिश्रम करते हुए अपने जीव को सुखी रखने के सिवाय और कुछ भी अच्छा नहीं। मैं ने देखा कि यह भी परमेश्वर की ओर से मिलता है; क्योंकि खाने–पीने और सुख भोगने में मुझ से अधिक समर्थ कौन है?”
- परमेश्वर के नये मन्दिर के रूप में, हमें, अर्थात् कलीसिया को, अपने काम के माध्यम से किस बात को अपना अन्तिम लक्ष्य बनाना चाहिए?
- इसकी एक सूची बनाएँ कि कार्य के लिए ये बाइबल के आधार, इनके सांसारिक दृष्टिकोणों से किस प्रकार भिन्न हैं।
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भाग IV: बहाली
इबल इस बात की विशिष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं कराती कि नये आकाश और नयी पृथ्वी में पुनरुत्थान का जीवन वास्तव में कैसा दिखेगा। हमारे पास जो कुछ है, वह पुराने और नये नियम की अपेक्षाओं से उत्पन्न होने वाले धुमावदार पथ हैं। हम इन बातों को अधिक प्रत्यक्ष कथनों में दी गई जानकारी के साथ जोड़ सकते हैं कि हम कुछ सुझाव दे सकें कि पुनरुत्थित विश्वासियों के द्वारा सभी वस्तुओं की बहाली में किए जाने वाले कार्य के विषय में हम क्या अपेक्षा कर सकते हैं। पुराने और नये नियम की व्यापक शिक्षा के आधार पर हम निम्नलिखित बात कह सकते हैं:
परमेश्वर अपनी प्रतिज्ञाओं को निभाएगा और उन उद्देश्यों को पूरा करेगा, जिन्हें उसने सृष्टि के समय प्राप्त करने के लिए स्थापित किया था।
इसका अर्थ है कि पाप और मृत्यु से दूषित वैश्विक मन्दिर शुद्ध और नया बनाया जाएगा, और नये आकाश और नयी पृथ्वी की नयी सृष्टि में जीवन मृत्यु पर विजय होगा।
मसीह को मरे हुओं में से जिलाया गया और उसे महिमा दी गई, और जो उसके लोग हैं, वे भी उसी तरह जिलाए जाएँगे, जैसे वह जी उठा था (उसके शत्रुओं को नरक में भेज दिया जाएगा)। मसीह देहधारी और पहचानने योग्य था, जिसका अर्थ है कि हम भी वैसे ही होंगे।
पौलुस दावा करता है कि पुनरुत्थान का अर्थ यह है कि हमारा परिश्रम व्यर्थ नहीं है (1 कुरिं. 15:58)। हमारे द्वारा अभी किए जा रहे कार्य का निरंतर मूल्य नयी सृष्टि में कुछ निरंतर प्रभाव डाल सकता है, यद्यपि इस संसार की बहाली का शुद्धि वाला न्याय सब कुछ निगल सकता है, जिसके परिणामस्वरूप स्थायी मूल्य हमारे द्वारा किए गए कार्य द्वारा प्राप्त चरित्र विकास से उत्पन्न होता है।
मसीह के लोग सभी वस्तुओं की बहाली में उसके साथ शासन करेंगे, और पूरे वैश्विक मन्दिर में आदम का अधिकार स्थापित करेंगे।
बहुत सारे कथन इस बात को स्पष्ट करते हैं कि सृष्टि और छुटकारे में अपनी महिमा प्रकट करना ही परमेश्वर की मंशा थी।7 इनमें से कुछ उदाहरण इस बात को स्पष्ट करेंगे:
– “परन्तु मेरे जीवन की शपथ सचमुच सारी पृथ्वी यहोवा की महिमा से परिपूर्ण हो जाएगी” (गिन. 14:21)।”
– “उदयाचल से लेकर अस्ताचल तक, यहोवा का नाम स्तुति के योग्य है” (भज. 113:3)।
– “वे एक दूसरे से पुकार पुकारकर कह रहे थे: “सेनाओं का यहोवा पवित्र, पवित्र, पवित्र है; सारी पृथ्वी उसके तेज से भरपूर है” (यशा. 6:3)।
– “क्योंकि पृथ्वी यहोवा की महिमा के ज्ञान से ऐसी भर जाएगी जैसे समुद्र जल से भर जाता है” (हब 2:14)।
– “क्योंकि उदयाचल से लेकर अस्ताचल तक जाति–जाति में मेरा नाम महान् है, और हर कहीं मेरे नाम पर धूप… चढ़ाई जाती है…” (मला. 1:11)।
– “हे पिता, अपने नाम की महिमा कर।” तब यह आकाशवाणी हुई, “मैं ने उसकी महिमा की है, और फिर भी करूँगा” (यूह. 12:28)।
– “क्योंकि उसी की ओर से, और उसी के द्वारा, और उसी के लिए सब कुछ है। उसकी महिमा युगानुयुग होती रहे: आमीन” (रोमि. 11:36)।
– “फिर मैं ने स्वर्ग में और पृथ्वी पर और पृथ्वी के नीचे और समुद्र की सब सृजी हुई वस्तुओं को, और सब कुछ को जो उनमें हैं, यह कहते सुना, “जो सिंहासन पर बैठा है उसका और मेम्ने का धन्यवाद और आदर और महिमा और राज्य युगानुयुग रहे!” (प्रका. 5:13)।
परमेश्वर ने अपनी महिमा के प्रदर्शन के लिए एक रंगशाला के रूप में वैश्विक मन्दिर का निर्माण किया, और उस वैश्विक मन्दिर को उसका प्रतिनिधित्व करने वाले लोगों से भरने के लिए उसने मनुष्य को उसमें रख दिया। छुटकारे का इतिहास बताता है कि कैसे परमेश्वर के वैश्विक मन्दिर को मनुष्य ने पाप और मृत्यु से अपवित्र किया, परन्तु परमेश्वर ने मनुष्यों को पाप और भ्रष्टाचार के बन्धन से छुड़ाकर उसका उद्धार किया। जब परमेश्वर सभी वस्तुओं को उनकी उचित पूर्णता तक पहुँचाएगा, तो यह संसार उसकी महिमा के ज्ञान से भरपूर हो जाएगा। और सृष्टि के समय पर परमेश्वर के जो उद्देश्य थे, वे पूरे होंगे।
बाइबल इस बात का भी संकेत करती है कि जब परमेश्वर नया आकाश और नयी पृथ्वी बनाएगा तो नयी सृष्टि में न्याय और शाप हटा दिए जाएँगे (यशा. 65:17; 66:22)। इस विषय में यशायाह 11 अध्याय बहुत रोचक है, क्योंकि यिशै के ठूँठ में से निकली डाली के राज्य के चित्रण में (यशा. 11:1-5) भेड़िये को भेड़ के बच्चे के साथ, चीते को बकरी के बच्चे के साथ, बछड़े और सिंह को एक साथ, और एक छोटे लड़के को उनकी अगुवाई करते हुए दिखाया गया है, जब गाय और रीछनी साथ-साथ चरते हैं और सिंह बैल की तरह भूसा खाता है (11:6–7)। चूँकि इस दृश्य में दूध पीते बच्चे को करैत के बिल के पास खेलते हुए दिखाया गया है (11:8), तो यह ऐसा लगता है कि उत्पत्ति 3:15 में स्त्री के वंश और सर्प के वंश के बीच की शत्रुता समाप्त हो गई है।
यशायाह इस बात का संकेत करता है कि जब स्त्री का वंश सर्प के सिर को पूरी तरह कुचल देगा (उत्प. 3:15), तो दोनों के बीच की शत्रुता समाप्त हो जाएगी, और भूखे, द्वेषी, मांसाहारी पशु भी, शाकाहारी पशुओं की तरह चरने में संतुष्ट होंगे। यह उस समय की ओर संकेत करता प्रतीत होता है, जब प्रभु ने मांस खाने की अनुमति नहीं दी थी (उत्प. 9:1–4), जब पाप ने इस संसार में प्रवेश नहीं किया था (3:6–19), और जब “जितने पृथ्वी के पशु… हैं, … उन सब के खाने के लिए … सब हरे हरे छोटे पेड़ दिए” गए थे (1:30)। यशायाह 11 अध्याय उस समय की ओर संकेत करता है जब बड़े अच्छे आरम्भ में (1:31) सब कुछ जैसा था वैसा ही होगा, या उससे भी बेहतर होगा। यशायाह 65:17 भविष्य की इस स्थिति का वर्णन करता है: “क्योंकि देखो, मैं नया आकाश और नयी पृथ्वी उत्पन्न करता हूँ; और पहली बातें स्मरण न रहेंगी और सोच विचार में भी न आएँगी” (साथ ही यशा. 66:22; 2 कुरिं. 5:17; गला. 6:15; 2 पत. 3:4–10, 13; प्रका. 21:1 को भी देखें)।
सुसमाचार के वृत्तांत और पौलुस के वचन मसीह की पुनरुत्थित देह के स्वभाव पर कुछ प्रकाश डालते हैं। उसने एक ऐसे कमरे में प्रवेश किया, जिसके दरवाजे बन्द थे (यूह. 20:19)। उसके भौतिक शरीर को छुआ जा सकता था (20:27)। वह भोजन कर सकता था (21:15; और साथ ही लूका 24:41–43 को भी देखें)। पौलुस कहता है कि पुनरुत्थित देह अविनाशी (1 कुरिं. 15:42), महिमा और सामर्थ्य (15:43), और आत्मिक (15:44) रूप में, स्वर्ग से (15:47) जी उठती है, और वह दावा करता है कि जो उसके विश्वासी हैं (15:23) वे “स्वर्गीय पुरुष का स्वरूप धारण करेंगे” (15:49)। किसी दूसरी जगह पौलुस कहता है कि वह मृत्यु में मसीह के समान बनने की आशा करता है, जिससे कि वह मरे हुओं में से जी उठने के पद तक पहुँच सके (फिलि. 3:10-11), और वह आगे कहता है कि मसीह “हमारी दीन-हीन देह का रूप बदलकर, अपनी महिमा की देह के अनुकूल बना देगा” (3:21)। यद्यपि हमें कई विशिष्ट बातें मालूम नहीं हैं, फिर भी हम आश्वस्त हो सकते हैं कि यीशु पर विश्वास करने वाले लोग वैसी ही पुनरुत्थित देह का आनन्द उठाएँगे, जैसी स्वयं मसीह के पास थी (रोमि. 8:21-23, 29-30 को भी देखें)।
1 कुरिन्थियों 15 अध्याय में पुनरुत्थान पर पौलुस की लम्बी चर्चा धन्यवाद देने के साथ समाप्त होती है, “परन्तु परमेश्वर का धन्यवाद हो, जो हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा हमें जयवन्त करता है” (1 कुरिं. 15:57)। अपने अगले वचनों में, पौलुस पुनरुत्थान और इस आश्वासन के बीच एक कड़ी जोड़ता है कि हम जो कुछ भी करते हैं, वह व्यर्थ नहीं है: “इसलिए, हे मेरे प्रिय भाइयों, दृढ़ और अटल रहो, और प्रभु के काम में सर्वदा बढ़ते जाओ, क्योंकि यह जानते हो कि तुम्हारा परिश्रम प्रभु में व्यर्थ नहीं है” (15:58)। यह आकर्षक कथन हमें हमारे कर्मों के मूल्य का आश्वासन देता है, हालाँकि यह हमें और अधिक जानकारी पाने की इच्छा के साथ भी छोड़ता है। जैसा कि ऊपर बताया गया है, और हो सकता है कि जिस प्रकार पुनरुत्थान से पहले और बाद की देह के बीच कुछ सीमा तक निरंतरता होगी, जिसमें यीशु को पहचाना जा सकता है, परन्तु साथ ही वह महिमान्वित और रूपांतरित भी होगा, तो वैसे ही यह संसार जैसा अभी है और जैसा भविष्य में होगा, उसके बीच भी कुछ सीमा तक निरंतरता हो सकती है। क्या “उस नींव पर बना हुआ” कार्य जो “स्थिर रहेगा” (1 कुरिं. 3:14), वह नयी सृष्टि में भी बना रहेगा? हम कल्पना भी नहीं कर सकते कि वह कैसा दिखेगा। यह कल्पना करना शायद आसान है कि मसीह के समान बनने की दिशा में हमने जो प्रगति की है, वह पुनरुत्थान में कैसे प्रकट होगी, परन्तु फिर से यहाँ हम उस होने वाले प्रकटीकरण की प्रतीक्षा कर रहे हैं। हालाँकि, हम विश्वास करते हैं कि हमारा कार्य निरर्थक, बेतुका और व्यर्थ इसलिए नहीं है, क्योंकि हम यह कार्य प्रभु में होकर करते हैं।
लूका का दस मुहरों का दृष्टान्त (लूका 19:11-27) इस बात पर कुछ प्रकाश डाल सकता है कि विश्वासी लोग किस प्रकार सब बातों की पूर्णता में मसीह के साथ राज्य करेंगे। परमेश्वर का राज्य तुरन्त प्रकट होने वाला है (लूका 19:11), इस अपेक्षा को दर्शाने वाले इस दृष्टान्त में यीशु एक धनी व्यक्ति की कहानी बताता है, जिसने अपने सेवकों को मुहरें सौंपी थीं कि वे उनके भण्डारी बन सकें (19:12-13)। जो लोग अच्छा करते हैं, उन्हें नगरों पर अधिकार दिया जाता है (19:17, 19), और यह इस ओर संकेत करता है कि मसीह के वरदानों के वर्तमान अच्छे भण्डारियों को भविष्य में भी उससे अधिकार प्राप्त होगा। इसी प्रकार, पौलुस कुरिन्थियों को बताता है कि विश्वासी लोग इस संसार का और स्वर्गदूतों का न्याय करेंगे (1 कुरिं. 6:2-3)। ऐसा प्रतीत होता है कि जिस राजकीय याजकवर्ग को मसीह ने कलीसिया बनाया था (प्रका. 1:6), वे नयी सृष्टि में याजक-राजा होंगे, जो शासन और न्याय करेंगे, कार्य करेंगे और रक्षा करेंगे, इसमें भर जाएँगे और इस अपने वश में कर लेंगे, जैसा कि आरम्भ में था (उत्प. 1:28; 2:15)।
प्रकाशितवाक्य में कई कथन इस बात की ओर संकेत करते हैं कि जब मसीह पृथ्वी पर अपना शासन स्थापित करेगा, तो उसके लोग उसके साथ शासन करेंगे (प्रका. 3:20; 5:10; 20:4)। परमेश्वर की सृष्टि, अर्थात् वैश्विक मन्दिर पर अधिकार स्थापित करने का कार्य, परमेश्वर की उस योजना को साकार करेगा, जिसमें उसके उप-शासक को उसके स्वरूप और समानता में नियुक्त किया जाएगा, जिससे कि वह सारी पृथ्वी पर अपना अधिकार स्थापित करे। प्रकाशितवाक्य 2:26-27 में, यूहन्ना यीशु को भजन संहिता 2 अध्याय से विजयी होने वालों के लिए निम्नलिखित प्रतिज्ञा करते हुए प्रस्तुत करता है: “जो जय पाए और मेरे कामों के अनुसार अन्त तक करता रहे, मैं उसे जाति जाति के लोगों पर अधिकार दूँगा, और वह लोहे का राजदण्ड लिए हुए उन पर राज्य करेगा, जिस प्रकार कुम्हार के मिट्टी के बर्तन चकनाचूर हो जाते हैं: मैं ने भी ऐसा ही अधिकार अपने पिता से पाया है।” जय पाए हुए लोग उस अधिकार का उपयोग करेंगे जो पिता ने स्वयं मसीह को दिया था।
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चर्चा एवं मनन:
- इस खण्ड में भविष्य के बारे में आपके दृष्टिकोण को किस प्रकार चुनौती दी गई है या उसकी पुष्टि की गई है?
- परमेश्वर की महिमा के प्रसार में आपका कार्य किस प्रकार सहायक हो सकता है (हब. 2:14)?
- जब हम काम पर जाते हैं, तो हमें परमेश्वर के उद्देश्यों की पूर्णता को ध्यान में क्यों रखना चाहिए?
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निष्कर्ष
हम सभी एक व्यापक कहानी के संदर्भ में अपने जीवन की व्याख्या करते हैं, जिसे हम इस संसार के बारे में, परमेश्वर के बारे में और स्वयं के बारे में सत्य मानते हैं। यीशु पर विश्वास करने वाले लोग उस कहानी को समझना और अपनाना चाहते हैं, जिस पर बाइबल के लेखक विश्वास करते थे। यह कहानी हमें समझाती है कि हम पूर्णता की लालसा क्यों करते हैं — क्योंकि मनुष्य को एक पापरहित संसार और एक बड़ी अच्छी सृष्टि के लिए बनाया गया था। यह बताती है कि क्या गलत घटित हुआ और हम क्यों मरते हैं — क्योंकि आदम ने पाप किया और इस संसार में मृत्यु लाया, और हम अपने प्रथम पिता का अनुसरण करते हुए विद्रोह करते हैं। यह कहानी इस बात को भी बताती है कि काम करना निराशाजनक, कठिन, यहाँ तक कि निरर्थक क्यों है — क्योंकि पाप ने सभी का काम और कठिन बना दिया है। फिर भी परमेश्वर शैतान को विजयी नहीं होने देगा। उस प्राचीन अजगर पर विजय प्राप्त की जा चुकी है और उस पर विजय प्राप्त की जाएगी (यूह. 12:31; प्रका. 20:1–3, 10)। परमेश्वर के उद्देश्य प्रबल होंगे। विजय के द्वारा मृत्यु निगल लिया जाएगा (1 कुरिं. 15:54)।
बाइबल की यह कहानी उस कार्य के बारे में भी बताती है, जो हम वैश्विक मन्दिर में परमेश्वर के स्वरूप को धारण करने वाले के रूप में करते हैं। प्रत्येक कार्य जिसमें लोग शामिल होते हैं, वह उत्पत्ति 1:28, 2:15, और 2:18 में परमेश्वर के द्वारा मनुष्य को दिए गए कार्यों से जुड़ा हुआ हो सकता है। पाप करने के अतिरिक्त, और कुछ भी भर देने और अपने वश में करने, अधिकार का उपयोग करने, काम करने और रखवाली करने, और सहायता करने जैसे बड़े-बड़े कार्यों से अलग नहीं है। अब जबकि नये आदम मसीह ने परमेश्वर की विजय स्थापित कर दी है, तो विश्वासी उसमें पाए जाते हैं, और हम कलीसिया का निर्माण करने (मत्ती 28:18-20; 1 कुरिं. 12-14), सब मनुष्यों की भलाई करने (गला. 6:10), और जो भी कार्य हमें मिले, उसमें आदरणीय, उत्कृष्ट कार्य करके सुसमाचार को सुशोभित करने का प्रयत्न करते हैं (तीतु. 2:1-10)।
अन्तिम टिप्पणियाँ
- “परिवर्तनीय शैली” शब्द यूनानी भाषा के अक्षर “ची” से लिया गया है, जिसका आकार हमारे “x” अक्षर जैसा है, और यह उस तरीके को संदर्भित करता है, जिस तरह पहला तत्व अन्तिम से, दूसरा उसके बाद वाले अन्तिम से मेल खाता है, और इसी तरह वह एक केन्द्रीय मोड़ से मेल खाता है। परिवर्तनीय शैली वाली संरचनाएँ साहित्यिक संसाधन हैं, जो समान्तरता के विस्तार, कलात्मक सौंदर्य के वाहक, स्मृति के उपकरण, संरचना और सीमाएँ प्रदान करने वाले रूप और परिवर्तनवाद के संगत भागों के बीच सहजीवी सम्बन्धों के जनक हैं। जेम्स एम. हैमिल्टन जूनियर की पुस्तक, टाइपोलॉजी—अण्डरस्टैण्डिंग द बाइबल्स प्रोमिस-शेप्ड पैटर्न्स: हाउ ओल्ड टेस्टामेण्ट एक्सपेक्टेशन्स आर फुलफिल्ड इन क्राइस्ट (Typology—Understanding the Bible’s Promise- Shaped Patterns: How Old Testament Expectations Are Fulfilled in Christ) (ज़ोंडरवान, 2022) के अध्याय 11 में आगे की चर्चाएँ देखें।
- जी. के. बील, द टेम्पल एंड द चर्च्स मिशन: ए बिबलिकल थियोलॉजी ऑफ द ड्वलिंग प्लेस ऑफ गॉड, (The Temple and the Church’s Mission: A Biblical Theology of the Dwelling Place of God), बाइबल आधारित ईश-विज्ञान पर नये अध्ययन (डाउनर्स ग्रोव: इंटरवर्सिटी, 2004); और हैमिल्टन, टाइपोलॉजी, 221–253 को देखें।
- यह अनुवाद डुआने ए. गैरेट, नीतिवचन, सभोपदेशक, श्रेष्ठगीत, न्यू अमेरिकन कमेंट्री (नैशविले: ब्रॉडमैन एंड होल्मन, 1993), 293 के प्रस्ताव का अनुसरण करता है।
- गैरेट, 294.
- जॉन डी. लेवेन्सन, रिसरक्शन एंड द रिस्टोरेशन ऑफ इस्राएल: द अल्टिमेट विक्ट्री ऑफ द गॉड ऑफ लाइफ (Resurrection and the Restoration of Israel: The Ultimate Victory of the God of Life) (न्यू हेवन: येल यूनिवर्सिटी प्रेस, 2008); मिशेल एल. चेज़, “फ्रॉम डस्ट यू शैल अराइज़: रिसरक्शन होप इन द ओल्ड टेस्टामेण्ट,” (“From Dust You Shall Arise: Resurrection Hope in the Old Testament,”) सदर्न बैपटिस्ट जर्नल ऑफ थियोलॉजी 18, अंक 4 (2014): 9-29; मिशेल एल. चेज़, “द जेनेसिस ऑफ रिसरक्शन होप: एक्सप्लोरिंग इट्स अर्ली प्रेसेंस एंड डीप रूट्स,” (“The Genesis of Resurrection Hope: Exploring Its Early Presence and Deep Roots,”) जर्नल ऑफ द इवेंजेलिकल थियोलॉजिकल सोसाइटी (Journal of the Evangelical Theological Society) 57 (2014): 467-80; मिशेल एल. चेज़, “रिसरक्शन होप इन डैनियल 12:2: एन एक्सरसाइज़ इन बिबलिकल थियोलॉजी” (“Resurrection Hope in Daniel 12:2: An Exercise in Biblical Theology”) (पी.एच.डी. शोध प्रबन्ध, लुइसविले, के.वाई., द सदर्न बैपटिस्ट थियोलॉजिकल सेमिनरी, 2013) को देखें।
- देखें जोनाथन डेविड अकिन, “अ थियोलॉजी ऑफ फ्यूचर होप इन द बुक ऑफ प्रोवर्ब्स” (“A Theology of Future Hope in the Book of Proverbs”) (पी.एच.डी. शोध प्रबन्ध, लुइसविले, द सदर्न बैपटिस्ट थियोलॉजिकल सेमिनरी, 2012).
- और देखें जेम्स एम. हैमिल्टन जूनियर, गॉड्स ग्लोरी इन सैलवेशन थ्रू जजमेंट: अ बिबलिकल थियोलॉजी (God’s Glory in Salvation through Judgment: A Biblical Theology) (व्हीटन: क्रॉसवे, 2010).
लेखक के बारे में
जेम्स एम. हैमिल्टन जूनियर लुइसविले, के.वाई. में सदर्न सेमिनरी में बाइबल आधारित ईश-विज्ञान के प्रोफेसर और विक्ट्री मेमोरियल स्थित केनवुड बैपटिस्ट चर्च में वरिष्ठ पास्टर हैं, जहाँ वे अपनी पत्नी और अपने पाँच बच्चों के साथ रहते हैं। अपने बाइबल आधारित ईश-विज्ञान, गॉड्स ग्लोरी इन सैलवेशन थ्रू जजमेंट (God’s Glory in Salvation through Judgment) के अतिरिक्त, जिम ने टाइपोलॉजी—अण्डरस्टैण्डिंग द बाइबल्स प्रोमिस-शेप्ड पैटर्न्स (Typology—Understanding the Bible’s Promise- Shaped Patterns) को भी लिखा है, और उनकी सबसे नवीन टीका ई.बी.टी.सी. श्रृंखला में भजन संहिता पर दो-खण्डों वाली रचना है। एलेक्स ड्यूक और सैम एमादी के साथ, जिम बाइबल-टॉक पॉडकास्ट दल का हिस्सा हैं।
विषयसूची
- भाग I: सृष्टि
- आदम का बड़ा कार्य
- चर्चा एवं मनन:
- भाग II: पतन
- आदम का दु:खद अपराध
- स्त्री के वंश की प्रतिज्ञा
- चर्चा एवं मनन:
- भाग III: छुटकारा
- स्त्री का वंश और इस संसार में आदम का कार्य
- नये आदम के रूप में सुलैमान
- सुलैमान का सकारात्मक निष्कर्ष
- जो सुलैमान से भी बड़ा है
- पौलुस के निर्देश
- इस अंश पर पाँच टिप्पणियाँ:
- चर्चा एवं मनन:
- भाग IV: बहाली
- चर्चा एवं मनन:
- निष्कर्ष
- अन्तिम टिप्पणियाँ
- लेखक के बारे में