#20 अन्याय के बीच चलनाऔर आराधना करना

By अन्याय के बीच चलना और आराधना करना

परिचय

ऊज़ नामक देश का एक व्यक्ति था। वह व्यक्ति बाइबल के अनुसार व्यक्तिगत् अन्याय को सम्भालने का सर्वोत्तम उदाहरण था। वह दिन एक दुःस्वप्न जैसा था। उसका चरित्र दृढ़ था। वह परमेश्वर से प्रेम रखता था और उसका भय मानता था। वह अपने व्यवसाय के शिखर पर था। इतना कहना ही पर्याप्त है कि ऊज़ में जीवन अच्छा था।

 

फिर एक दिन ऐसा आया, जब शैतान और परमेश्वर के बीच, स्वर्गलोक के स्वर्गीय दरबार में, एक अलौकिक वार्तालाप हुआ और उसमें अय्यूब को निशाने पर खड़ा कर दिया गया। केवल एक ही दिन में उसने अपना परिवहन व्यवसाय, कपड़ा व्यवसाय, कृषि व्यवसाय, कॉफी व्यवसाय, और अपने कामगारों को काम पर रखने, उन्हें खिलाने और उनकी देखभाल करने की क्षमता खो दी। इस दिग्गज के लिए फिर कौन काम करेगा? उसके कृषि व्यवसाय और अन्य नये व्यवसायों के आसपास की संस्कृति शत्रुतापूर्ण हो गई और सबियन आतंकवादियों ने उस पर धावा बोल दिया। अब अय्यूब के उद्यमों के लिए काम करना “सुरक्षित” नहीं माना जाता था। अय्यूब ने केवल एक ही दिन में सब कुछ खो दिया। ओह, वह शक्तिशाली व्यक्ति कैसे गिर गया।

 

सफलता की ओर उसकी तीव्र वृद्धि और अचानक विस्तृत तौर पर हुए पतन को कुछ स्पष्टीकरण की आवश्यकता है। कभी-कभी, हम ऐसी विपत्तियों का अनुभव इसलिए करते हैं, क्योंकि हम अपने पापों और/या गलत निर्णयों के कारण उसे स्वयं पर लाते हैं। हम सिद्ध नहीं हैं और समय-समय पर गलत चुनाव करने के लिए झुकाव रखते हैं, और परमेश्वर जिनसे प्रेम रखता है, उनकी ताड़ना भी करता है (इब्रा. 12:7-8)। कभी-कभी हमें कठिन वरदानों का अनुभव होता है, जिससे कि हम दूसरों की उनके कठिन दिनों में देखभाल करना और उन्हें सलाह देना सीखें। हालाँकि, अय्यूब के मामले में ऐसा नहीं था। इन दोनों में से कोई भी व्याख्या सटीक नहीं है। असल में, वह सब कुछ सही कर रहा था! अय्यूब 1:1 बताता है कि परमेश्वर में उसका विश्वास अद्भुत था। वह परमेश्वर का भय मानता था और पापों का छोटा-मोटा हिसाब रखा करता था। उसका चरित्र दोषरहित था। वह एक कर्तव्यनिष्ठ अगुवा था — वह एक उत्तम पिता और एक विश्वस्तरीय व्यवसायी था, जिसके पास कई सारे व्यवसाय थे। बाद में पहले अध्याय में, परमेश्वर स्वयं भी इन सब बातों के सच होने की पुष्टि करता है। परमेश्वर शैतान से पूछता है: “क्या तू ने मेरे दास अय्यूब पर ध्यान दिया है? क्योंकि उसके तुल्य खरा और सीधा और मेरा भय माननेवाला और बुराई से दूर रहनेवाला मनुष्य और कोई नहीं है?” (अय्यू. 1:8)। इसके अतिरिक्त, 2:10 में, उसकी प्रिय पत्नी भी (हमारे जीवनसाथी हमें सबसे अच्छी तरह जानते हैं), उसके निष्कलंक और उत्कृष्ट चरित्र की पुष्टि करती है। अत: यह विपत्ति उसके अपने कर्मों या उसके द्वारा छिपाए गए किसी पाप के कारण नहीं आई थी। यह उसकी अपनी बनाई हुई कोई परीक्षा नहीं थी। यह बात उसके नियंत्रण, ज्ञान और प्रभाव से बाहर थी। ऊज़ में जीवन तब तक अच्छा था, जब तक कि वह अच्छा नहीं रहा। इससे यह समझने में सहायता मिलती है कि धर्मी लोगों के साथ बुरा क्यों होता है। इन सबका कारण परमेश्वर है। परमेश्वर जानता था कि अय्यूब इस अन्याय को सम्भाल सकता है।

 

अय्यूब की पुस्तक का पहला अध्याय हमारे लिए शैतान के द्वारा परमेश्वर को दी गई चुनौती का विवरण प्रदान करता है। उसने दावा किया कि अय्यूब केवल परमेश्वर की सेवा इसलिए करता है, क्योंकि वह उसे आशीष देता है और वह उसके चारों ओर एक आत्मिक बाड़ा लगाए हुए है (1:10)। शैतान ने तर्क दिया कि अय्यूब के लिए जीवन बहुत आसान है। अपने चारों ओर के इस विशाल बाड़े और निरन्तर आशीष के साथ, कौन परमेश्वर की खोज में नहीं जाएगा? परमेश्वर कहता है कि ऐसा बिलकुल नहीं है, तूने अय्यूब के धार्मिकता पर खड़े रहने का गलत आकलन किया है और इसे सिद्ध करने के लिए तू उस पर आक्रमण कर सकता है। परन्तु तू उसके शारीरिक स्वास्थ्य को नहीं छू सकता। अत: अय्यूब एक अलौकिक वार्तालाप के निशाने पर खड़ा हो जाता है। इसके बाद जो होता है, वह आश्चर्यजनक और अविश्वसनीय है।

 

शैतान परमेश्वर की उपस्थिति से भाग जाता है (यह विचार वास्तव में अजीब सा है कि वह मलिन पतित शैतान असल में परमेश्वर की उपस्थिति में है [अय्यू. 1:6]) और व्यवस्थित रूप से बाजार में अय्यूब की प्रतिष्ठा को नष्ट कर देता है। यह कितना भी बुरा क्यों न हो, मुझे पूरा आश्वासन है कि अय्यूब हियाव रखेगा, डटकर खड़ा होगा, और मन ही मन सोचेगा, “हम फिर से निर्माण कर सकते हैं।” उसने एक बार ऐसा किया था; वह इसे फिर से कर सकता है। यह उसके व्यवसाय को खड़ा करने के बारे में सच हो सकता है, परन्तु उसके बच्चों का क्या होगा? इसके बाद जो होता है, वह साँसों को रोक देने वाला है। अय्यूब अपना सबसे अच्छा जीवन व्यतीत कर रहा है और उसे एक पारिवारिक सन्देशवाहक से सूचना मिलती है कि एक भयानक बवण्डर ने उसके सबसे बड़े पुत्र का घर नष्ट कर दिया है। उस विशेष दिन पर उसके सभी बच्चे इकट्ठा होकर आनन्द मना रहे थे। बवण्डर की चपेट में आकर घर ढह गया और उसके सभी दस बच्चे मारे गए। अय्यूब के पहले अध्याय में लिखा यह दिन कितना भयानक था। निश्चित रूप से अय्यूब यह प्रश्न पूछ रहा होगा कि “ऐसा क्यों हुआ?” उसका व्यक्तिगत् दुःस्वप्न और अविरल अंधकार शायद सन्देह में बदल गया होगा, है न? एक धर्मी व्यक्ति के जीवन में यह एक व्यापक अन्याय है। जब आप अय्यूब के पहले अध्याय को पूरा पढ़ते हैं, तो आप स्वयं को शैतान और उसकी चालों के प्रति क्रोध करने से रोक नहीं पाते। अय्यूब को बिलकुल भी खबर नहीं थी और उस दिन सुबह उठते ही उसने सामान्य रूप से सोचा कि ऊज़ में जीवन अच्छा है। वह एक व्यापारी, पति और पिता के रूप में अपना जीवन सफल बिता रहा था।

 

पहला अध्याय दुःख और आराधना दोनों के साथ समाप्त होता है। अय्यूब ने स्वयं को भूमि पर से उठाया (इसमें कोई सन्देह नहीं कि इस भयानक समाचार ने उसे जकड़ लिया था और वह घुटनों के बल गिर पड़ा था), अपने दुःख की याद में उसने अपना सिर मुण्डवाकर आराधना की (1:20)। इस क्षण में आराधना करना कैसे सम्भव हो सकता है? वह इतने लम्बे समय तक परमेश्वर के साथ चला था कि व्यापक अन्याय के प्रति यही एकमात्र उचित और बाइबल आधारित प्रतिक्रिया थी। दिन के अन्त में, पवित्रशास्त्र जोर देकर यह बताता है कि “अय्यूब ने… कोई पाप नहीं किया” (1:22; 2:10)। यद्यपि यह एक वर्णन से बाहर वाला दिन था, फिर भी उसका ईश-विज्ञान यथावत्, सुदृढ़ और जीवंत बना रहा। यहाँ तक कि उसने कहा, “यहोवा ने दिया और यहोवा ही ने लिया; यहोवा का नाम धन्य है” (1:21)।

क्या अब आप देख पा रहे हैं कि गहरे, वर्णन से बाहर, व्यापक व्यक्तिगत् अन्याय के बीच से होकर गुजरते हुए आराधना करने का यह हमारा सर्वोत्तम उदाहरण क्यों है? उसकी अपनी कोई गलती न होने के बावजूद इस धर्मी व्यक्ति के साथ बुरा होता है। अय्यूब अपनी प्रतिक्रिया, ईश-विज्ञान और जीवन के कौशलों में इस अन्याय से होकर गुजरने में वीर है। यीशु के सौतेले भाई, याकूब ने नये नियम की अपनी पत्री में कहा है कि, “तुम ने अय्यूब के धीरज के विषय में तो सुना ही है” (याकूब 5:11)। इससे पहले याकूब ने अपनी पत्री में अपने पाठकों से कहा था, “जब तुम नाना प्रकार की परीक्षाओं में पड़ो, तो इसको पूरे आनन्द की बात समझो, यह जानकर कि तुम्हारे विश्वास के परखे जाने से धीरज उत्पन्न होता है” (याकूब 1:2-3)। हमें व्यक्तिगत् अन्याय के बीच से होकर गुजरना और उसकी आराधना करना सीखना चाहिए। या बाइबल के लेखकों के शब्दों में कहें तो हमें व्यक्तिगत् अन्याय के संदर्भ में धीरज धरना सीखना चाहिए। जीवन अन्याय से भरा हुआ है। क्या आप इसके लिए तैयार हैं? मुद्दा यह नहीं कि यह आपके साथ होगा या नहीं, बल्कि मुद्दा यह है कि यह कब होगा।

 

व्यक्तिगत् अन्याय से निपटना इसलिए सबसे कठिन होता है, क्योंकि इस जीवन में कभी भी हमें यह स्पष्ट नहीं हो पाता कि ऐसा क्यों हो रहा है। हो सकता है कि परमेश्वर का सर्वोच्च हाथ हमें कभी कोई स्पष्टीकरण न दे, और लोग अक्सर असली कारण समझे बिना ही कब्र में चले जाते हैं। मेरे अनुभव से, बहुत कम लोग इसे साफ कर पाते हैं और जिसके साथ उन्होंने अन्याय किया था, उसके पास लौटकर स्वीकार करते हैं कि उन्होंने क्या किया है और इसे कैसे किया है। कई अन्य लोगों की तरह, मेरे मन में भी अन्याय के मुद्दे पर कई अनसुलझे प्रश्न हैं, जिन्हें मैं स्वर्ग पहुँचने पर पूछना चाहूँगा। जैसा कि एक लेखक ने कहा, परमेश्वर के कठोर वरदान हमें पवित्र करते हैं, जिससे कि हम धीरज प्राप्त कर सकें। 2 कुरिन्थियों 1 अध्याय में पौलुस कहता है कि परमेश्वर हमें कुछ बातों से होकर गुजरने की अनुमति देता है, जिससे कि हम अपने ईश-विज्ञान और जीवन के अनुभवों, दोनों के माध्यम से दूसरों की बेहतर सेवा कर पाने में सक्षम हों।

 

फिर भी, हम भविष्य में, चाहे इस जीवन में हो या अगले जीवन में, स्पष्टता की प्रतीक्षा में डटे रहते हैं। हम अपनी योजनाएँ बनाते हैं, परन्तु परमेश्वर हमारे कदमों को चलने के लिए आदेश देता है। या, आधुनिक शब्दों में कहें तो हम अपनी योजनाएँ पेंसिल से लिखते हैं, परन्तु परमेश्वर के पास एक अलौकिक रबड़ है तथा उसके पास हमारे भले और अपनी महिमा के लिए हमारी योजनाओं में संशोधन करने का विशेषाधिकार है।

 

मैं स्वीकार करता हूँ कि मेरी मसीही यात्रा में अन्याय से निपटना सबसे कठिन कामों में से एक रहा है और शायद आपका भी यही अनुभव रहा होगा। मैं कोई कमजोर चमड़ी वाला मनुष्य नहीं हूँ, और मेरे साथ भी कई तरह के अन्याय हुए हैं — और मैं अति संवेदनशील होने के कारण छोटी-मोटी गलतियों की बात नहीं कर रहा हूँ। मैं चाहता हूँ कि कुछ लोग ईमानदार और खरे हों, परन्तु उत्पत्ति 3 अध्याय के इस संसार में मेरा अनुभव रहा है कि समाधान हमेशा सम्भव नहीं होता। सच कहूँ तो कुछ लोग प्रभुता सम्पन्न गोपनीयता की इस एक बाधा को कभी पार नहीं कर पाते और यह उनकी आत्माओं में तबाही मचा देता है, और उनके आत्मिक जीवन को अक्षम करते हुए उन्हें आत्मिक रूप से असंतुलित कर देता है। हमें उस अज्ञात को हमारे ज्ञात जीवन को नष्ट करने देने की प्रवृत्ति का विरोध करना चाहिए। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि हमें परमेश्वर के उस प्रभुता भरे हाथ पर भरोसा करना होगा, जिसने पहले से हमारे साथ ऐसा होने दिया। अन्याय का मूल कारण परमेश्वर के उच्च दृष्टिकोण में विश्वास और यह भरोसा है कि उसने एक ऐसी योजना बनाई है, जो मेरे लिए भली होगी और उसकी महिमा करेगी।

 

अय्यूब का उदाहरण बहुत बड़ा है, परन्तु यह अकेला उदाहरण नहीं है। पवित्रशास्त्र व्यक्तिगत् अन्याय के उदाहरणों से भरा पड़ा है। उत्पत्ति की पुस्तक अन्याय के लेखे-जोखे के रूप में कुछ सीमा तक भरी हुई है। भाई-भाई के रूप में कैन और हाबिल का विवाद, हाबिल की अन्तिम श्वास के साथ समाप्त होता है। यूसुफ को उसके अपने भाइयों के द्वारा दासत्व में बेचकर मिस्र भेज दिया जाता है (इस पर बाद में और अधिक बात करेंगे)। व्यक्तिगत् अन्याय उत्पत्ति 3 अध्याय के खण्डित संसार में जीवन बिताने का एक भाग है, जहाँ पाप भ्रष्ट करता है और अनेक प्रकार के अन्यायों में स्वयं को प्रकट होता है। आप पवित्रशास्त्र को पढ़ते हुए आश्चर्य करते हैं कि लोग कैसे अपने विभिन्न कष्टों को सहते हैं, जीवित रहते हैं और यहाँ तक कि उनमें फलते-फूलते हैं। यही इस क्षेत्रीय मार्गदर्शिका का मूल उद्देश्य है। आगे जो कुछ भी आएगा, उसमें मैं आपकी सहायता करने का प्रयत्न करूँगा, जिससे कि आप व्यक्तिगत् अन्याय को एक स्वस्थ, परमेश्वर का आदर करने वाले तरीके से समझ सकें।

 

व्यक्तिगत् अन्याय मेरे जीवन में बना रहा है। कई अगुवों के लिए यह सामान्य रूप से एक सीमा के साथ आता है। यही एक कारण है कि आप नेतृत्व के इस वाक्यांश को सुनते हैं: “शीर्ष पर अकेलापन होता है।” शीर्ष पर तोड़फोड़ होती है, नीचे ईर्ष्या होती है, और बीच में कमजोरी होती है। संघर्ष वास्तविक होता है। मैंने अपने पूरे जीवन और सेवकाई में व्यक्तिगत् रूप से इसका अनुभव किया है। परमेश्वर के अनुग्रह से, मैं कड़वाहट से भरा हुआ नहीं हूँ, मैं हार मानने से इन्कार करता हूँ, और मैं निराश नहीं हूँ। मुझे मालूम है कि यह शायद बुराई के लिए था, परन्तु परमेश्वर ने इसे मेरी भलाई के लिए उपयोग किया। जहाँ तक इस लिखे जाने की बात है, तो इसने मुझे एक बेहतर अगुवा बनाया है, जिसमें अधिक सहनशक्ति और दृढ़ निश्चय है। जब मेरे विरोधियों को अपने दु: खद निर्णयों और टूटे हुए विवेक से जूझना पड़ता है, तो मुझे उन पर दया भी आती है।

 

मेरी चिन्ता यह है कि कई लोगों के लिए, व्यक्तिगत् अन्याय परमेश्वर पर उनके विश्वास को नष्ट कर देता है, उनके विश्वास का पथ से विचलित कर देता है, उनके नेतृत्व को दिशाहीन कर देता है, और उन्हें एक बुरे मानसिक संतुलन में छोड़ देता है। इस क्षेत्रीय मार्गदर्शिका का लक्ष्य आपको व्यक्तिगत् अन्याय के माध्यम से यीशु के साथ चलने और उसकी आराधना करने के लिए एक नया दृष्टिकोण प्रदान करना है। आइए इस जीवन में व्यक्तिगत् अन्याय से निपटने और अक्सर व्यक्तिगत् अन्याय के साथ आने वाली आत्मिक सिकुड़न से लड़ने के लिए कुछ आवश्यक सिद्धान्तों पर ध्यान दें। मेरा मानना है कि ऐसे पाँच प्रमुख सिद्धान्त हैं, जो आपके काम आएँगे।

ऑडियो मार्गदर्शिका

ऑडियो ऑडियो
album-art

00:00

#20 अन्याय के बीच चलनाऔर आराधना करना

हमारे समाचार पत्र की सदस्यता लें और साप्ताहिक बाइबल और शिष्यत्व सुझाव प्राप्त करें।