#20 अन्याय के बीच चलनाऔर आराधना करना
परिचय
ऊज़ नामक देश का एक व्यक्ति था। वह व्यक्ति बाइबल के अनुसार व्यक्तिगत् अन्याय को सम्भालने का सर्वोत्तम उदाहरण था। वह दिन एक दुःस्वप्न जैसा था। उसका चरित्र दृढ़ था। वह परमेश्वर से प्रेम रखता था और उसका भय मानता था। वह अपने व्यवसाय के शिखर पर था। इतना कहना ही पर्याप्त है कि ऊज़ में जीवन अच्छा था।
फिर एक दिन ऐसा आया, जब शैतान और परमेश्वर के बीच, स्वर्गलोक के स्वर्गीय दरबार में, एक अलौकिक वार्तालाप हुआ और उसमें अय्यूब को निशाने पर खड़ा कर दिया गया। केवल एक ही दिन में उसने अपना परिवहन व्यवसाय, कपड़ा व्यवसाय, कृषि व्यवसाय, कॉफी व्यवसाय, और अपने कामगारों को काम पर रखने, उन्हें खिलाने और उनकी देखभाल करने की क्षमता खो दी। इस दिग्गज के लिए फिर कौन काम करेगा? उसके कृषि व्यवसाय और अन्य नये व्यवसायों के आसपास की संस्कृति शत्रुतापूर्ण हो गई और सबियन आतंकवादियों ने उस पर धावा बोल दिया। अब अय्यूब के उद्यमों के लिए काम करना “सुरक्षित” नहीं माना जाता था। अय्यूब ने केवल एक ही दिन में सब कुछ खो दिया। ओह, वह शक्तिशाली व्यक्ति कैसे गिर गया।
सफलता की ओर उसकी तीव्र वृद्धि और अचानक विस्तृत तौर पर हुए पतन को कुछ स्पष्टीकरण की आवश्यकता है। कभी-कभी, हम ऐसी विपत्तियों का अनुभव इसलिए करते हैं, क्योंकि हम अपने पापों और/या गलत निर्णयों के कारण उसे स्वयं पर लाते हैं। हम सिद्ध नहीं हैं और समय-समय पर गलत चुनाव करने के लिए झुकाव रखते हैं, और परमेश्वर जिनसे प्रेम रखता है, उनकी ताड़ना भी करता है (इब्रा. 12:7-8)। कभी-कभी हमें कठिन वरदानों का अनुभव होता है, जिससे कि हम दूसरों की उनके कठिन दिनों में देखभाल करना और उन्हें सलाह देना सीखें। हालाँकि, अय्यूब के मामले में ऐसा नहीं था। इन दोनों में से कोई भी व्याख्या सटीक नहीं है। असल में, वह सब कुछ सही कर रहा था! अय्यूब 1:1 बताता है कि परमेश्वर में उसका विश्वास अद्भुत था। वह परमेश्वर का भय मानता था और पापों का छोटा-मोटा हिसाब रखा करता था। उसका चरित्र दोषरहित था। वह एक कर्तव्यनिष्ठ अगुवा था — वह एक उत्तम पिता और एक विश्वस्तरीय व्यवसायी था, जिसके पास कई सारे व्यवसाय थे। बाद में पहले अध्याय में, परमेश्वर स्वयं भी इन सब बातों के सच होने की पुष्टि करता है। परमेश्वर शैतान से पूछता है: “क्या तू ने मेरे दास अय्यूब पर ध्यान दिया है? क्योंकि उसके तुल्य खरा और सीधा और मेरा भय माननेवाला और बुराई से दूर रहनेवाला मनुष्य और कोई नहीं है?” (अय्यू. 1:8)। इसके अतिरिक्त, 2:10 में, उसकी प्रिय पत्नी भी (हमारे जीवनसाथी हमें सबसे अच्छी तरह जानते हैं), उसके निष्कलंक और उत्कृष्ट चरित्र की पुष्टि करती है। अत: यह विपत्ति उसके अपने कर्मों या उसके द्वारा छिपाए गए किसी पाप के कारण नहीं आई थी। यह उसकी अपनी बनाई हुई कोई परीक्षा नहीं थी। यह बात उसके नियंत्रण, ज्ञान और प्रभाव से बाहर थी। ऊज़ में जीवन तब तक अच्छा था, जब तक कि वह अच्छा नहीं रहा। इससे यह समझने में सहायता मिलती है कि धर्मी लोगों के साथ बुरा क्यों होता है। इन सबका कारण परमेश्वर है। परमेश्वर जानता था कि अय्यूब इस अन्याय को सम्भाल सकता है।
अय्यूब की पुस्तक का पहला अध्याय हमारे लिए शैतान के द्वारा परमेश्वर को दी गई चुनौती का विवरण प्रदान करता है। उसने दावा किया कि अय्यूब केवल परमेश्वर की सेवा इसलिए करता है, क्योंकि वह उसे आशीष देता है और वह उसके चारों ओर एक आत्मिक बाड़ा लगाए हुए है (1:10)। शैतान ने तर्क दिया कि अय्यूब के लिए जीवन बहुत आसान है। अपने चारों ओर के इस विशाल बाड़े और निरन्तर आशीष के साथ, कौन परमेश्वर की खोज में नहीं जाएगा? परमेश्वर कहता है कि ऐसा बिलकुल नहीं है, तूने अय्यूब के धार्मिकता पर खड़े रहने का गलत आकलन किया है और इसे सिद्ध करने के लिए तू उस पर आक्रमण कर सकता है। परन्तु तू उसके शारीरिक स्वास्थ्य को नहीं छू सकता। अत: अय्यूब एक अलौकिक वार्तालाप के निशाने पर खड़ा हो जाता है। इसके बाद जो होता है, वह आश्चर्यजनक और अविश्वसनीय है।
शैतान परमेश्वर की उपस्थिति से भाग जाता है (यह विचार वास्तव में अजीब सा है कि वह मलिन पतित शैतान असल में परमेश्वर की उपस्थिति में है [अय्यू. 1:6]) और व्यवस्थित रूप से बाजार में अय्यूब की प्रतिष्ठा को नष्ट कर देता है। यह कितना भी बुरा क्यों न हो, मुझे पूरा आश्वासन है कि अय्यूब हियाव रखेगा, डटकर खड़ा होगा, और मन ही मन सोचेगा, “हम फिर से निर्माण कर सकते हैं।” उसने एक बार ऐसा किया था; वह इसे फिर से कर सकता है। यह उसके व्यवसाय को खड़ा करने के बारे में सच हो सकता है, परन्तु उसके बच्चों का क्या होगा? इसके बाद जो होता है, वह साँसों को रोक देने वाला है। अय्यूब अपना सबसे अच्छा जीवन व्यतीत कर रहा है और उसे एक पारिवारिक सन्देशवाहक से सूचना मिलती है कि एक भयानक बवण्डर ने उसके सबसे बड़े पुत्र का घर नष्ट कर दिया है। उस विशेष दिन पर उसके सभी बच्चे इकट्ठा होकर आनन्द मना रहे थे। बवण्डर की चपेट में आकर घर ढह गया और उसके सभी दस बच्चे मारे गए। अय्यूब के पहले अध्याय में लिखा यह दिन कितना भयानक था। निश्चित रूप से अय्यूब यह प्रश्न पूछ रहा होगा कि “ऐसा क्यों हुआ?” उसका व्यक्तिगत् दुःस्वप्न और अविरल अंधकार शायद सन्देह में बदल गया होगा, है न? एक धर्मी व्यक्ति के जीवन में यह एक व्यापक अन्याय है। जब आप अय्यूब के पहले अध्याय को पूरा पढ़ते हैं, तो आप स्वयं को शैतान और उसकी चालों के प्रति क्रोध करने से रोक नहीं पाते। अय्यूब को बिलकुल भी खबर नहीं थी और उस दिन सुबह उठते ही उसने सामान्य रूप से सोचा कि ऊज़ में जीवन अच्छा है। वह एक व्यापारी, पति और पिता के रूप में अपना जीवन सफल बिता रहा था।
पहला अध्याय दुःख और आराधना दोनों के साथ समाप्त होता है। अय्यूब ने स्वयं को भूमि पर से उठाया (इसमें कोई सन्देह नहीं कि इस भयानक समाचार ने उसे जकड़ लिया था और वह घुटनों के बल गिर पड़ा था), अपने दुःख की याद में उसने अपना सिर मुण्डवाकर आराधना की (1:20)। इस क्षण में आराधना करना कैसे सम्भव हो सकता है? वह इतने लम्बे समय तक परमेश्वर के साथ चला था कि व्यापक अन्याय के प्रति यही एकमात्र उचित और बाइबल आधारित प्रतिक्रिया थी। दिन के अन्त में, पवित्रशास्त्र जोर देकर यह बताता है कि “अय्यूब ने… कोई पाप नहीं किया” (1:22; 2:10)। यद्यपि यह एक वर्णन से बाहर वाला दिन था, फिर भी उसका ईश-विज्ञान यथावत्, सुदृढ़ और जीवंत बना रहा। यहाँ तक कि उसने कहा, “यहोवा ने दिया और यहोवा ही ने लिया; यहोवा का नाम धन्य है” (1:21)।
क्या अब आप देख पा रहे हैं कि गहरे, वर्णन से बाहर, व्यापक व्यक्तिगत् अन्याय के बीच से होकर गुजरते हुए आराधना करने का यह हमारा सर्वोत्तम उदाहरण क्यों है? उसकी अपनी कोई गलती न होने के बावजूद इस धर्मी व्यक्ति के साथ बुरा होता है। अय्यूब अपनी प्रतिक्रिया, ईश-विज्ञान और जीवन के कौशलों में इस अन्याय से होकर गुजरने में वीर है। यीशु के सौतेले भाई, याकूब ने नये नियम की अपनी पत्री में कहा है कि, “तुम ने अय्यूब के धीरज के विषय में तो सुना ही है” (याकूब 5:11)। इससे पहले याकूब ने अपनी पत्री में अपने पाठकों से कहा था, “जब तुम नाना प्रकार की परीक्षाओं में पड़ो, तो इसको पूरे आनन्द की बात समझो, यह जानकर कि तुम्हारे विश्वास के परखे जाने से धीरज उत्पन्न होता है” (याकूब 1:2-3)। हमें व्यक्तिगत् अन्याय के बीच से होकर गुजरना और उसकी आराधना करना सीखना चाहिए। या बाइबल के लेखकों के शब्दों में कहें तो हमें व्यक्तिगत् अन्याय के संदर्भ में धीरज धरना सीखना चाहिए। जीवन अन्याय से भरा हुआ है। क्या आप इसके लिए तैयार हैं? मुद्दा यह नहीं कि यह आपके साथ होगा या नहीं, बल्कि मुद्दा यह है कि यह कब होगा।
व्यक्तिगत् अन्याय से निपटना इसलिए सबसे कठिन होता है, क्योंकि इस जीवन में कभी भी हमें यह स्पष्ट नहीं हो पाता कि ऐसा क्यों हो रहा है। हो सकता है कि परमेश्वर का सर्वोच्च हाथ हमें कभी कोई स्पष्टीकरण न दे, और लोग अक्सर असली कारण समझे बिना ही कब्र में चले जाते हैं। मेरे अनुभव से, बहुत कम लोग इसे साफ कर पाते हैं और जिसके साथ उन्होंने अन्याय किया था, उसके पास लौटकर स्वीकार करते हैं कि उन्होंने क्या किया है और इसे कैसे किया है। कई अन्य लोगों की तरह, मेरे मन में भी अन्याय के मुद्दे पर कई अनसुलझे प्रश्न हैं, जिन्हें मैं स्वर्ग पहुँचने पर पूछना चाहूँगा। जैसा कि एक लेखक ने कहा, परमेश्वर के कठोर वरदान हमें पवित्र करते हैं, जिससे कि हम धीरज प्राप्त कर सकें। 2 कुरिन्थियों 1 अध्याय में पौलुस कहता है कि परमेश्वर हमें कुछ बातों से होकर गुजरने की अनुमति देता है, जिससे कि हम अपने ईश-विज्ञान और जीवन के अनुभवों, दोनों के माध्यम से दूसरों की बेहतर सेवा कर पाने में सक्षम हों।
फिर भी, हम भविष्य में, चाहे इस जीवन में हो या अगले जीवन में, स्पष्टता की प्रतीक्षा में डटे रहते हैं। हम अपनी योजनाएँ बनाते हैं, परन्तु परमेश्वर हमारे कदमों को चलने के लिए आदेश देता है। या, आधुनिक शब्दों में कहें तो हम अपनी योजनाएँ पेंसिल से लिखते हैं, परन्तु परमेश्वर के पास एक अलौकिक रबड़ है तथा उसके पास हमारे भले और अपनी महिमा के लिए हमारी योजनाओं में संशोधन करने का विशेषाधिकार है।
मैं स्वीकार करता हूँ कि मेरी मसीही यात्रा में अन्याय से निपटना सबसे कठिन कामों में से एक रहा है और शायद आपका भी यही अनुभव रहा होगा। मैं कोई कमजोर चमड़ी वाला मनुष्य नहीं हूँ, और मेरे साथ भी कई तरह के अन्याय हुए हैं — और मैं अति संवेदनशील होने के कारण छोटी-मोटी गलतियों की बात नहीं कर रहा हूँ। मैं चाहता हूँ कि कुछ लोग ईमानदार और खरे हों, परन्तु उत्पत्ति 3 अध्याय के इस संसार में मेरा अनुभव रहा है कि समाधान हमेशा सम्भव नहीं होता। सच कहूँ तो कुछ लोग प्रभुता सम्पन्न गोपनीयता की इस एक बाधा को कभी पार नहीं कर पाते और यह उनकी आत्माओं में तबाही मचा देता है, और उनके आत्मिक जीवन को अक्षम करते हुए उन्हें आत्मिक रूप से असंतुलित कर देता है। हमें उस अज्ञात को हमारे ज्ञात जीवन को नष्ट करने देने की प्रवृत्ति का विरोध करना चाहिए। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि हमें परमेश्वर के उस प्रभुता भरे हाथ पर भरोसा करना होगा, जिसने पहले से हमारे साथ ऐसा होने दिया। अन्याय का मूल कारण परमेश्वर के उच्च दृष्टिकोण में विश्वास और यह भरोसा है कि उसने एक ऐसी योजना बनाई है, जो मेरे लिए भली होगी और उसकी महिमा करेगी।
अय्यूब का उदाहरण बहुत बड़ा है, परन्तु यह अकेला उदाहरण नहीं है। पवित्रशास्त्र व्यक्तिगत् अन्याय के उदाहरणों से भरा पड़ा है। उत्पत्ति की पुस्तक अन्याय के लेखे-जोखे के रूप में कुछ सीमा तक भरी हुई है। भाई-भाई के रूप में कैन और हाबिल का विवाद, हाबिल की अन्तिम श्वास के साथ समाप्त होता है। यूसुफ को उसके अपने भाइयों के द्वारा दासत्व में बेचकर मिस्र भेज दिया जाता है (इस पर बाद में और अधिक बात करेंगे)। व्यक्तिगत् अन्याय उत्पत्ति 3 अध्याय के खण्डित संसार में जीवन बिताने का एक भाग है, जहाँ पाप भ्रष्ट करता है और अनेक प्रकार के अन्यायों में स्वयं को प्रकट होता है। आप पवित्रशास्त्र को पढ़ते हुए आश्चर्य करते हैं कि लोग कैसे अपने विभिन्न कष्टों को सहते हैं, जीवित रहते हैं और यहाँ तक कि उनमें फलते-फूलते हैं। यही इस क्षेत्रीय मार्गदर्शिका का मूल उद्देश्य है। आगे जो कुछ भी आएगा, उसमें मैं आपकी सहायता करने का प्रयत्न करूँगा, जिससे कि आप व्यक्तिगत् अन्याय को एक स्वस्थ, परमेश्वर का आदर करने वाले तरीके से समझ सकें।
व्यक्तिगत् अन्याय मेरे जीवन में बना रहा है। कई अगुवों के लिए यह सामान्य रूप से एक सीमा के साथ आता है। यही एक कारण है कि आप नेतृत्व के इस वाक्यांश को सुनते हैं: “शीर्ष पर अकेलापन होता है।” शीर्ष पर तोड़फोड़ होती है, नीचे ईर्ष्या होती है, और बीच में कमजोरी होती है। संघर्ष वास्तविक होता है। मैंने अपने पूरे जीवन और सेवकाई में व्यक्तिगत् रूप से इसका अनुभव किया है। परमेश्वर के अनुग्रह से, मैं कड़वाहट से भरा हुआ नहीं हूँ, मैं हार मानने से इन्कार करता हूँ, और मैं निराश नहीं हूँ। मुझे मालूम है कि यह शायद बुराई के लिए था, परन्तु परमेश्वर ने इसे मेरी भलाई के लिए उपयोग किया। जहाँ तक इस लिखे जाने की बात है, तो इसने मुझे एक बेहतर अगुवा बनाया है, जिसमें अधिक सहनशक्ति और दृढ़ निश्चय है। जब मेरे विरोधियों को अपने दु: खद निर्णयों और टूटे हुए विवेक से जूझना पड़ता है, तो मुझे उन पर दया भी आती है।
मेरी चिन्ता यह है कि कई लोगों के लिए, व्यक्तिगत् अन्याय परमेश्वर पर उनके विश्वास को नष्ट कर देता है, उनके विश्वास का पथ से विचलित कर देता है, उनके नेतृत्व को दिशाहीन कर देता है, और उन्हें एक बुरे मानसिक संतुलन में छोड़ देता है। इस क्षेत्रीय मार्गदर्शिका का लक्ष्य आपको व्यक्तिगत् अन्याय के माध्यम से यीशु के साथ चलने और उसकी आराधना करने के लिए एक नया दृष्टिकोण प्रदान करना है। आइए इस जीवन में व्यक्तिगत् अन्याय से निपटने और अक्सर व्यक्तिगत् अन्याय के साथ आने वाली आत्मिक सिकुड़न से लड़ने के लिए कुछ आवश्यक सिद्धान्तों पर ध्यान दें। मेरा मानना है कि ऐसे पाँच प्रमुख सिद्धान्त हैं, जो आपके काम आएँगे।
ऑडियो मार्गदर्शिका
ऑडियो#20 अन्याय के बीच चलनाऔर आराधना करना
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लोग आपको निराश करेंगे
जीवन के सबसे बड़े दु: खों में से एक यह वास्तविकता है कि आपके आसपास के लोग और यहाँ तक कि आपके करीबी लोग भी आपको निराश कर सकते हैं। जब हमारे अपने घर में कुछ होता है, तो हमारा छोटा सा परिवार मेरा मजाक उड़ाता है, और छोटे-छोटे लड़के कहेंगे, “मैं पागल नहीं हूँ, मैं बस आपसे निराश हूँ।” मुझे लगता है कि मैंने यह बात काफी कह दी है कि जब मैं कोई गड़बड़ी करूँ या एक पिता के रूप में उनके विरुद्ध पाप करूँ, तो इसका बदला मुझ पर फेंकना उचित है।
सच कहूँ तो हमारे जीवन के अधिकांश पहलुओं में हमें गहरी निराशा का अनुभव होता है। लोग हमें निराश करते हैं। लोग धीरे-धीरे धूमिल हो जाते हैं। हमारा अपना परिवार हमें निराश कर सकता है; संयुक्त अमेरिका हमें निराश कर सकता है; सहकर्मी हमें निराश कर सकते हैं; स्थानीय कलीसिया हमें निराश कर सकती है; और खिलाड़ियों के दल हमें निराश कर सकते हैं। मेरी बात सरल सी है: जीवन व्यक्तिगत् अन्याय और टूट से भरा हुआ है। समुदाय में रहना अव्यवस्थित है। फिर भी, समुदाय में रहना हमारे लिए परमेश्वर की योजना का हिस्सा है। अलगाव कोई बाइबल की अवधारणा नहीं है और निश्चित रूप से ऐसा करना बुद्धिमानी नहीं है। आरम्भ से ही, परमेश्वर ने कहा कि मनुष्य के लिए अकेला रहना अच्छा नहीं है। उसने आदम को हव्वा दी जो उसकी एक सहायक साथी थी, जो सार में तो समान थी, परन्तु कार्य में भिन्न थी। मेरे पसन्द वाली आयतों में से एक नीतिवचन 18:1 है, जो बताती है कि इस जीवन को अकेले जीवन बिताने का प्रयत्न करना हमारे लिए मूर्खता है। यदि हम ऐसा करने का प्रयत्न करते हैं, तो हम “खरी बुद्धि से बैर” करते हैं। इसलिए हम साथ-साथ चलने के लिए —साथ-साथ जीवन जीने के लिए — बने हैं और इस साथ में रहने के बीच कई निराशाएँ और अन्याय भी आते हैं। यद्यपि कोई भी रिश्ता सिद्ध नहीं होता, क्योंकि हम सब ने पाप किया है और परमेश्वर की महिमा से रहित हैं, फिर भी कई अद्भुत असिद्ध रिश्ते होते हैं। हमें एक-दूसरे से बहुत कुछ सीखना है और एक-दूसरे में निवेश करना अच्छी, सही और सुन्दर बात है। यद्यपि कभी-कभी निराशा होती है, परन्तु हमें यह स्वीकार करना होगा कि हम अलग होने से बेहतर साथ में होते हैं।
इसलिए, आइए उन असिद्ध लोगों पर चर्चा करें, जिन्हें परमेश्वर हमारे जीवनों में लाता है। यह दोहराना आवश्यक है कि जब विशेष रूप से रिश्तों की बात होती है, तो जीवन अस्त-व्यस्त होता है, परन्तु मैं आप से आग्रह करूँगा कि आप उन सभी रिश्तों को निभाते रहें, जिन्हें परमेश्वर आपके जीवन में लाया है। आपकी आत्मिक उन्नति और जीवन के विकास के लिए मार्गदर्शकों और मित्रों की खोज आवश्यक है। नीतिवचन 27:6 कहता है कि “जो घाव मित्र के हाथ से लगें वह विश्वास योग्य हैं।” ऐसा क्यों है? क्योंकि मित्र आप के पीछे से नहीं, बल्कि आगे से छुरा घोंपते हैं। मुझे आपके बारे में तो नहीं पता, परन्तु मैं छुरा आते हुए देखना चाहता हूँ और जानना चाहता हूँ कि कौन मुझे वह छुरा घोंप रहा है। इसके अतिरिक्त, चूँकि मित्रों का होना आवश्यक है, तो इसका अर्थ यह है कि यह सब कुछ पहले एक अच्छा मित्र बनने से आरम्भ होता है (यह एक अधिलाभ वाला सिद्धान्त था, परन्तु सच था)। यदि आप बढ़िया मित्र चाहते हैं, तो आपको एक बढ़िया मित्र बनना पड़ेगा। मार्गदर्शक पाने के लिए आपको मार्गदर्शन के लिए तैयार रहना होगा। एक अच्छा मार्गदर्शक ढूँढ़ना कभी-कभी एक चुनौती होती है, और एक सीखने योग्य शिष्य बनना भी एक चुनौती है (डॉ. ब्यू ह्यूजेस की क्षेत्रीय मार्गदर्शिका को देखें)। कभी भी हार न मानें तथा मित्रों और मार्गदर्शकों की खोज करना न छोड़ें। यदि आप जोखिम उठाने और जीवन-पर्यन्त वाले मित्र और मार्गदर्शक बनाने को तैयार नहीं हैं, तो आप अपने आत्मिक विकास में बाधा डालेंगे।
मुझे याद है कि नये नियम में फिलिप्पियों की पुस्तक पर काम करते हुए और उसके पहले अध्याय को पढ़ते हुए मैं थोड़ा स्तब्ध रह गया था। प्रेरित पौलुस अपने आसपास के उन लोगों पर टिप्पणी कर रहा है, जो उसके कैद में होने का लाभ उठा रहे थे। कुछ लोग तो फिलिप्पी में स्वयं को बेहतर बनाने के लिए उसके कैद में होने का उपयोग कर रहे थे। जब वह निराश था, तो वे उसे लात मार रहे थे। उन्होंने पौलुस के बारे में सबसे अच्छी बातों पर नहीं, बल्कि सबसे बुरी बातों पर विश्वास कर लिया था। शायद वे अश्लील सुर्खियाँ पढ़ रहे थे। वे उस योद्धा को बस के नीचे फेंक रहे थे। इसलिए जब मैंने यह पढ़ा, तो मैं आश्वस्त हो गया कि प्रेरित पौलुस सच्चाई सामने लाएगा, उन्हें खरी-खोटी सुनाएगा, और उन्हें फटकार लगाएगा, परन्तु जो मैंने पढ़ा वह ऐसा नहीं था। उसने असल में कहा कि कुछ लोगों के लिए, उसके कैद में होने ने उन्हें मसीह के लिए और भी निडरता से बोलने का साहस दिया। इसने उन्हें वास्तव में और भी मजबूत गवाह बनाया। हालाँकि, कुछ लोगों ने ईर्ष्या और आत्म-महत्वाकांक्षा के कारण मसीह का प्रचार किया था। यह पौलुस की दुर्दशा का लाभ उठाने और उसके कैद में होने की पीड़ा और कठिनाई को बढ़ाने का उनका प्रयत्न था। पौलुस उत्तर देता है: “तो क्या हुआ?” उसे निराश करने वाले इन लोगों का उसे क्या उत्तर देना चाहिए? फिर वह नेतृत्व को आकार देने वाली यह आयत लिखता है: “केवल यह कि हर प्रकार से, चाहे बहाने से चाहे सच्चाई से, मसीह की कथा सुनाई जाती है, और मैं इससे आनन्दित हूँ और आनन्दित रहूँगा भी” (फिलि. 1:18)। वह ऐसा कैसे कह सकता है? उनका व्यक्तिगत् अन्याय इस तरह प्रदर्शित है कि वह उन्हें बाहर बुलाता है। हे मित्र, सुसमाचार हमारे बारे में नहीं है। यह हमें प्रसिद्ध बनाने के बारे में नहीं, बल्कि यीशु को प्रसिद्ध बनाने के बारे में है। यह हमसे दीन बनने और दीन बने रहने की माँग करता है। यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले की भावना में कहें तो: अवश्य है कि वह बढ़े और मैं घटूँ (यूह. 3:30)।
पौलुस दूसरों के प्रति इतना विचारशील था कि उसने अपने या अपनी प्रतिष्ठा के बारे में इस मुद्दे को उठाने से इन्कार कर दिया। जैसा कि उसने कुलुस्सियों 3:1 में कहा कि हमें अपना ध्यान स्वर्गीय वस्तुओं पर लगाना चाहिए, न कि उन वस्तुओं पर, जिन्हें हम यहाँ बदल नहीं सकते। यदि यह सैद्धांतिक विभाजन और मिथ्याबोध का मामला होता, तो पौलुस इस अवसर पर आगे आकर स्थिति को स्पष्ट कर देता। परन्तु ऐसा नहीं था। यह सीधा-सीधा उसके साथ हुआ एक व्यक्तिगत् अन्याय था। उसने अपनी कमर को सीधा किया, अपने अहंकार को निगला और आगे बढ़ता रहा। सुसमाचार के प्रति उसके दृष्टिकोण ने उसे सुसमाचार की उचित प्रेरणा में स्थिर रखा। परमेश्वर की आत्मा ने उसे आत्मा में चलते रहने के लिए प्रेरित किया (गला. 5:16-26 को देखें)। वह अच्छी तरह जानता था कि लोग उसे निराश करेंगे। जब मैंने पहली बार यह पढ़ा, तो मैंने अपने हृदय में अन्याय की भावना को उठते हुए महसूस किया। वे उस व्यक्ति के साथ ऐसा व्यवहार कैसे कर सकते हैं, जो इस तरीके से सबसे अधिक त्याग कर रहा था? कुछ समय पहले ही में मुझसे कहा गया था कि, “कलीसिया पापियों के लिए सुरक्षित नहीं है।” कितना दु: खद कथन है। क्या हम पवित्र लोगों के लिए एक विश्राम-स्थल बन गए हैं, और पापियों के लिए अस्पताल नहीं रहे? यीशु भले-चंगे और स्वस्थ लोगों के लिए नहीं, बल्कि उन लोगों के लिए आया था, जिन्हें चिकित्सक की आवश्यकता थी। यीशु बीमारों और टूटे हृदय वालों के लिए आया था, परन्तु कभी-कभी उसके अनुयायी यह भूल जाते हैं।
मैं उस खण्ड से रूपांतरित होकर और इस स्मरण के साथ निकला कि इस जीवन में कई कठिनाइयाँ और निराशाएँ आएँगी, और उनमें से कई “मित्रता” में घटित होंगी — कभी-कभी तो उन लोगों के साथ भी होंगी, जिनकी सेवा करने के लिए आपने अपना समय दिया है और ऊर्जा लगाई है। अक्सर, लोग दूसरों की तुलना में अपने बारे में अधिक चिन्ता करते हैं। वे आत्म-रक्षा के मामले में गलत चुनाव करते हैं और अन्त में आप नीतिवचन वाली एक बस के नीचे फेंक दिए जाते हैं। सुसमाचार यह है कि एक दिन, परमेश्वर उन सभी गलतियों को सुधार देगा, जो उन तथाकथित “मित्रों” ने भी आपके साथ की थीं। प्रभु कहता है, बदला लेना मेरा काम है (रोमि. 12:19)।
जब मैंने फिलिप्पियों की पुस्तक को आगे पढ़ा, तो मैंने यह पढ़ा: “सब काम बिना कुड़कुड़ाए और बिना विवाद के किया करो” (2:14)। यह सुसमाचार का ज्ञान और एक दृढ़ आज्ञा है। पढ़ने में आसान और लागू करने में कठिन, है न? उन बातों के बारे में शिकायत न करें, जिन्हें आप बदल नहीं सकते। लोग वही करते हैं, जो लोग करते हैं; “जो है सो है।” फिर मुझे ये मुक्ति देने वाले कथन मिले: “मुझे प्रभु यीशु में आशा है कि मैं तीमुथियुस को तुम्हारे पास तुरन्त भेजूँगा, ताकि तुम्हारी दशा सुनकर मुझे शान्ति मिले। क्योंकि मेरे पास ऐसे स्वभाव का कोई नहीं जो शुद्ध मन से तुम्हारी चिन्ता करे। क्योंकि सब अपने स्वार्थ की खोज में रहते हैं, न कि यीशु मसीह की” (2:19-21)।
प्रेरित पौलुस के लिए तीमुथियुस एक अनुपम साथी था। यह कल्पना करना कठिन है कि पौलुस के पास रिश्तों की इतनी कमी थी। वह केवल एक ही व्यक्ति, तीमुथियुस के बारे में सोच सकता था। हम भाग्यशाली हैं कि हमारे एक, या शायद दो, आजीवन के मित्र होते हैं, जो हमें हर समय प्रेम करते हैं (नीति. 17:17)। “विपत्ति के दिन” के मित्र सबसे अच्छे होते हैं और इनका मिलना दुर्लभ होता है। पौलुस एक घुमक्कड़ मशीन था, वह सबको जानता था, वह विलक्षण रूप से लोकप्रिय था, उसके पास एक अद्भुत मंच था, और वह पहली शताब्दी का एक चमकता हुआ सितारा था। क्या वह केवल एक ही ऐसे व्यक्ति के बारे में सोच सकता है, जिसके हृदय में स्वार्थी महत्वाकांक्षा न रही हो? यह हम सभी के लिए एक चेतावनी है कि मित्रता आती-जाती रहती है। परन्तु यदि आपके एक या दो आजीवन के मित्र हों, तो स्वयं को धन्य और भाग्यशाली समझिए। या जैसा कि सुलैमान ने कहा, “ऐसा मित्र होता है, जो भाई से भी अधिक मिला रहता है” (नीति. 18:24)।
प्रेरित पौलुस ने अपनी सभी पत्रियों में उल्लेख किया है कि कुछ लोगों ने (यहाँ तक कि उसने उनके नाम भी लिए थे) विश्वास को छोड़ दिया था, अपनी आत्मा को बर्बाद कर लिया था, और उसे निराश किया था। हम सभी को रिश्तों को पवित्र बनाए रखने की आवश्यकता होती है, परन्तु इसके लिए एक दाम चुकाना पड़ता है। यह समय-समय पर जोखिम भरा भी हो सकता है। कोई भी मित्र सस्ता नहीं होता। कुछ मित्र सच्चे होते हैं और फिर कुछ अच्छे मित्र भी होते हैं। मैं आशा करता हूँ कि आपके पास सच्चे मित्रों का एक समूह होगा और आप उन लोगों से दूर रहते हैं, जो केवल कुछ पाना चाहते हैं और केवल लेने वाले लोग हैं, देने वाले नहीं। भले ही लोग आपको निराश करें, आपको अपने जीवन में बात करने के लिए मार्गदर्शकों और मित्रों को रखने की आज्ञा दी गई है। आपको अकेले रहने या उस तंत्र से दूर रहने के लिए नहीं कहा गया है। सुसमाचार के प्रसार और दूसरों की भलाई के निमित्त हम प्रयत्न करते रहते हैं। हम सभी अतीत में टूटी मित्रता के कारण लंगड़ाकर चलते हैं। हो सकता है कि हम थोड़ा धीमे चलें, परन्तु फिर भी हम चलते रहते हैं। हम ऐसे जीवन को कैसे बिताते हैं? आइए आगे बढ़ते रहें तथा थोड़ी और गहरी खुदाई करें।
चर्चा एवं मनन:
- आपके जीवन में किस व्यक्ति ने आपको बुरी तरह से निराश किया है? उन्हें क्षमा करने के लिए आपको कौन से कदम उठाने की आवश्यकता है?
- जब आप व्यक्तिगत् अन्याय का सामना करते हैं, तो यह अपेक्षा करना सहायक क्यों होता है कि लोग अक्सर आपको निराश करेंगे?
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स्वयं से बेहतर दूसरों
का सम्मान करना
मुझे यह बात बहुत ही मनोहर लगती है कि रिश्तों और कठिनाइयों को सम्भालने के ये सभी सिद्धान्त हम एक ऐसी पत्री में सीखते हैं, जो स्पष्ट रूप से आनन्द और प्रसन्नता के बारे में है। इस छोटी और गहन पत्री में “हर्षित”, “आनन्दित” और “आनन्द” जैसे शब्दों का बत्तीस बार उपयोग किया गया है। सांसारिक मित्रता के लिए अथक प्रयास और दीनता की आवश्यकता होती है। जैसा कि पहले उल्लेख किया गया है, निराश होने के लिए हमें अपने आप को भूल जाना और अपने आप का इन्कार करना सीखना होगा (फिलि. 2:3)। परन्तु यह पर्याप्त नहीं है। अगला वाक्य वास्तव में हमें बताता है कि हमें दूसरों को अपने आप से बेहतर समझना होगा। मुझे मालूम है कि यह कहना आसान है, परन्तु इसे करना कठिन है। इसलिए हाँ, हमें अपना बचाव करते हुए अपने अहंकार को कुचलना होगा, परन्तु हमें आक्रामक रहते हुए दूसरों को स्वयं से बेहतर भी समझना होगा। और केवल उन लोगों के प्रति ही नहीं जो हमसे प्रेम रखते हैं और हमारी तरह सोचते हैं। फिलिप्पियों 2:4 में ध्यान दें, यह केवल कुछ लोगों को स्वयं से अधिक महत्वपूर्ण समझने के लिए नहीं कहता, बल्कि सरल रूप से यह कहता है कि “एक दूसरे को अपने से अच्छा समझो” (फिलि. 2:3)। मेरा मानना है कि यह तभी सम्भव है, जब आप जानते हैं कि आप उस कमरे में सबसे बड़े पापी हैं। जब मैं सुबह जागने का प्रयत्न करता हूँ, तो मैं अपना पहला विचार यह बनाता हूँ कि मैं “पापियों का सेनापति” हूँ। प्रेरित पौलुस ने ठीक यही कहा था: “यह बात सच और हर प्रकार से मानने के योग्य है कि मसीह यीशु पापियों का उद्धार करने के लिए जगत में आया, जिनमें सबसे बड़ा मैं हूँ” (1 तीमु. 1:15)। आप कैसे जानेंगे कि आपकी मनोवृत्ति और मानसिकता ऐसी है या नहीं? जब लोग आपके साथ ऐसा व्यवहार करते हैं, जैसे कि आप पापी हैं, तो आप कैसी प्रतिक्रिया देते हैं? क्या आप ऐसा कहते हैं: “हाँ, वह मैं ही हूँ। आपको आलू मिल गया”? या आप बचाव करने और इन्कार करने की मुद्रा में आ जाते हैं?
याकूब 4:6 कहता है कि परमेश्वर अभिमानियों का विरोध करता है, पर दीनों पर अनुग्रह करता है। ऐसे बहुत से लोग हैं, जो आपका और आपके नेतृत्व का विरोध करेंगे, परन्तु एक व्यक्ति ऐसा भी है, जिसका विरोध आपको सक्रिय रूप से नहीं करना चाहिए, और वह व्यक्ति परमेश्वर है। जब आप बाइबल आधारित वैश्विक दृष्टिकोण अपनाते हैं, तो आप अपने बारे में एक सही दृष्टिकोण भी विकसित करेंगे। आपको स्वयं को बहुत बढ़कर नहीं समझना चाहिए। अभिमान को दूर करना होगा।
दीनता से स्वयं को सुसज्जित करने की क्षमता वास्तव में अत्यन्त महत्वपूर्ण है। इस तथ्य के बारे में, यशायाह 66:2 कहता है कि परमेश्वर उस व्यक्ति की ओर दृष्टि करता है, “जो दीन और खेदित मन का हो, और मेरा वचन सुनकर थरथराता हो।” इस दीनता का हिस्सा एक प्रबल आत्म-जागरूकता है — कि मैं अपने पापों की गहराई और चौड़ाई को वास्तव में जानता हूँ। यिर्मयाह 17:9 हमें याद दिलाता है कि हमारे मन में असाध्य रोग लगा है; उसका भेद कौन समझ सकता है? इसका सार बताऊँ तो हमारे मन अविश्वसनीय, विकृत और कभी-कभी दुष्ट भी होते हैं। मसीह में हमारी पहचान के साथ मन छल करता है। हमें लगता है कि हम अपने मनों को जानते हैं, परन्तु वास्तव में हम नहीं जानते। यह सत्य थोड़ा चौंकाने वाला, परन्तु महत्वपूर्ण है।
अन्याय और मन का अविश्वास, दोनों ही हमारे अभिमान को तोड़ने और हमें नीचा दिखाने का एक तरीका है। क्या आप दूसरों को अपने आप से बेहतर समझने में और यह पहचान कर पाने में सक्षम हैं कि आपके मन आपके साथ कैसे छल कर सकते हैं? यहाँ तक कि जब दूसरे लोग आपको निराश करते हैं, जैसे हुमिनयुस और सिकन्दर ने पौलुस को निराश किया था (1 तीमु. 1:19-20)। पौलुस कहता है कि उन लोगों ने अपने जीवन का जहाज डुबो दिया है। लोग अव्यवस्थित होते हैं। लोग बुरी तरह से असफल होते हैं। लोग अक्सर उस काम को करते हैं, जिसे वे नहीं करना चाहते और वह काम नहीं करते, जिसे उन्हें करना चाहिए (रोमि. 7:15 में पौलुस की टिप्पणी देखें)।
कुछ लोग सक्रिय रूप से सोचते हैं कि वे हमें रोक रहे हैं या हमें व्यक्तिगत् हानि पहुँचा रहे हैं। क्या आपको उत्पत्ति 37-50 अध्याय में यूसुफ का जीवन याद है? उसके अपने भाई उसे गम्भीर हानि पहुँचाते हैं। वे उसके कपड़े छीन लेते हैं, उसे गड्ढे में फेंक देते हैं, और उसे विदेशियों को बेच देते हैं। उन्होंने बुराई का विचार किया था; परन्तु परमेश्वर ने उसी बात में भलाई का विचार किया (उत्प. 50:20)। परमेश्वर की प्रभुता सम्पन्न योजना में ही यूसुफ को भारी व्यक्तिगत् अन्याय सहना पड़ा। परमेश्वर ने इस्राएली जाति को दशकों और शताब्दियों तक सुरक्षित रखने और एक सम्पूर्ण देश को आकार देने के लिए यह सब होने दिया। परमेश्वर व्यक्तिगत् अन्याय को भी हमें अपमान का पात्र न बनाकर, सम्मान का पात्र बनाने की अनुमति देता है (2 तीमु. 2:20-22)।
यूसुफ अन्याय पर विजय पाने का आदर्श उदाहरण है। कई वर्ष बाद जब तक कि यूसुफ प्रमुख नेतृत्व के पद पर नहीं पहुँच गया, तब तक उसने जिस वस्तु को छुआ, वह सोने में बदल गई। उत्पत्ति 39:23 में लिखा है कि जब उसने अपनी ईमानदारी से फ़िरौन की पत्नी को अपमानित किया और इस कारण उसे जेल में डाल दिया गया, तो “यूसुफ के वश में जो कुछ था उसमें से बन्दीगृह के दारोगा को कोई भी वस्तु देखनी न पड़ती थी; क्योंकि यहोवा यूसुफ के साथ था; और जो कुछ वह करता था, यहोवा उसको उसमें सफलता देता था।” परमेश्वर ने यूसुफ के चरित्र निर्माण के लिए अन्याय का उपयोग किया। उस चरित्र के प्रदर्शन के रूप में, जब देश में भयंकर अकाल पड़ा और उसके भाई फ़िरौन के दरबार में आकर याचना करते हुए हताश हो गए, तो यूसुफ ने अपने भाइयों से पूछताछ की। उन्होंने उसे नहीं पहचाना। यूसुफ उन्हें देखकर भावुक हो गया और वह पाठ बताता है कि, “तब अपने भाई के स्नेह से मन भर आने के कारण और यह सोचकर कि मैं कहाँ जाकर रोऊँ, यूसुफ तुरन्त अपनी कोठरी में गया, और वहाँ रो पड़ा” (उत्प. 43:30)। उन्होंने यूसुफ पर बिलकुल भी दया नहीं दिखाई, फिर भी उसने उन पर बड़ी दया की। अन्याय से निपटने के निमित्त यह हमारे लिए कितना बढ़िया उदाहरण है।
अन्याय के आपके अपने अनुभवों के माध्यम से भी परमेश्वर बहुत कुछ कर सकता है। यूसुफ ने एक बार कहा था, “यद्यपि तुम लोगों ने मेरे लिए बुराई का विचार किया था; परन्तु परमेश्वर ने उसी बात में भलाई का विचार किया” (उत्प. 50:20)। यूसुफ ने अपने भाइयों और अपने पिता, याकूब की जीवन भर देखभाल की। वह आसानी से बदला ले सकता था, परन्तु उसने उन्हें अपने से बेहतर समझा। गम्भीर व्यक्तिगत् अन्याय से निपटने के तरीके को गहराई से समझने के लिए उत्पत्ति 37-50 अध्याय पढ़ने में कुछ समय बिताएँ।
चर्चा एवं मनन:
- फिलिप्पियों 2:1-11 को पढ़ें। हमारी दीनता किस बात से प्रेरित होनी चाहिए? यीशु ने दूसरों के साथ अपने से अधिक महत्वपूर्ण व्यवहार क्यों किया और कैसे किया?
- आप अपने से बेहतर दूसरों का सम्मान कैसे करते हैं? आपको अपने जीवन में किसके साथ अधिक सम्मान और गरिमा से पेश आने की आवश्यकता है?
3
क्रोधित होने का विरोध करना
क्या यह सम्भव है कि अन्याय के प्रति आपकी पहली स्वाभाविक प्रतिक्रिया क्रोधित होना हो? और आप चुपके से इस बारे में विचार करने में भी समय बिताएँगे कि आप कैसे हिसाब बराबर कर सकते हैं — अर्थात् उस मामले को अपने हाथ में कैसे ले सकते हैं? क्रोधित होना एक गहरी भावना है, परन्तु इसे नियंत्रित किया जा सकता है। मैं हमेशा इस बात से हैरान होता हूँ कि काम पर अगुवे कितने शान्त हो सकते हैं, परन्तु फिर वे अपने घरों में कितने अत्याचारी होते हैं। वे जानते हैं कि यदि वे काम पर क्रोधित हो गए, तो उन्हें गम्भीर दुष्परिणामों का सामना करना पड़ेगा। हम अक्सर लोगों को अपने सबसे करीबी जनों को दु: ख पहुँचाते और दूर रहने वालों के साथ सम्मानजनक व्यवहार करते हुए इसलिए देखते हैं, क्योंकि उन्हें अपनी नौकरी खो देने का डर होता है। इसके बजाय, हमें उन लोगों के प्रति सम्मान और अनुग्रह दिखाना चाहिए, जो प्रेम के साथ आपके अन्तिम संस्कार में शामिल होंगे। हम अक्सर स्वयं को गलत लोगों को प्रसन्न करते हुए पाते हैं। यह दु: खद बात है परन्तु सच है, है न?
क्रोध हमें भीतर से बाहर तक नष्ट कर देता है। नीतिवचन 19:11 कहता है कि जो मनुष्य बुद्धि से चलता है वह विलम्ब से क्रोध करता है, और अपराध को भुलाना उसको शोभा देता है। याकूब 1:19 भी कहता है कि हमें क्रोध करने में धीमा होना चाहिए — अर्थात् क्रोध के सामने देर तक टिके रहना चाहिए। जो लोग क्रोध करने में जल्दबाजी करते हैं, वे मूढ़ता को बढ़ावा देते हैं (नीति. 14:29 को देखें)। आपको यह समझना होगा कि क्रोध सर्वभक्षी होता है और जो इसे धारण करता है, यह उसे ही नष्ट कर देता है। क्रोधित होने का विरोध करने के लिए, आपको क्रोध के नशीले प्रभावों से स्वयं को शान्त करना होगा। सबसे पहले, आपको स्वयं के लिए यह प्रचार करना होगा कि जीवन निराशाओं का एक बड़ा वाहक है। इसी कारण हमें अपने विश्वास के कर्ता और सिद्ध करने वाले, यीशु की ओर ताकते रहना चाहिए। इब्रानियों 12:3 का लेखक कहता है: “इसलिए उस पर ध्यान करो, जिसने अपने विरोध में पापियों का इतना विरोध सह लिया कि तुम निराश होकर साहस न छोड़ दो।” यीशु से अधिक अन्याय किसी ने नहीं सहा। वह परमेश्वर है। वह सिद्ध है। वह मानवता के क्रोध और अन्याय के लिए मरा, फिर भी उन्होंने उससे बैर रखा, और जब उन्हें इस बात को ठीक करने का विकल्प दिया गया, तो वे यीशु की नहीं, बल्कि बरअब्बा की रिहाई के लिए चिल्लाए। अन्त में, अधर्मियों के लिए जो मरा, वह एक धर्मी जन था। जीवन व्यक्तिगत् अन्यायों से भरा पड़ा है। अत: यीशु की ओर ताकते रहें, अपने क्रोध को शान्त करें, तथा एक बाइबल आधारित और स्वस्थ ईश-वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखें।
जीवन न केवल अन्यायों का वाहक है, बल्कि वे परमेश्वर के सर्वोच्च हाथों से हमारे पास आते हैं। जैसा कि जॉन पाइपर ने एक बार कहा था कि वे परमेश्वर के कठिन वरदान हैं, परन्तु फिर भी वास्तव में वरदान ही हैं। हमारे पास ऐसा कुछ भी नहीं आता, जो पहले परमेश्वर के हाथों से होकर न गुजरा हो। जाँच और परीक्षा के बीच के अन्तर पर ध्यान देना आवश्यक है। परीक्षाएँ हमारे भीतर से आती हैं और वे हम सभी के लिए सामान्य होती हैं (1 कुरिं. 10:13)। जाँच या परख हमारे बाहर से आती हैं, जो पहले परमेश्वर के सर्वोच्च हाथों से होकर गुजरती हैं। वे हमारे प्रति और हमारे लिए अनुकूलित होती हैं।
इसके चारों ओर अपने मनों को लगाना कठिन हो सकता है, अत: इस पड़ाव पर एक उदाहरण हमारे काम आ सकता है। प्रेरित पौलुस ने 2 कुरिन्थियों 12:7-10 में विस्तार से बताया है कि परमेश्वर ने उसके “शरीर में एक काँटा” चुभाया था — अर्थात् शैतान का एक दूत उसे घूँसे मारता था और उसे स्वयं को ऊँचा उठाने से अर्थात् फूलने से रोकता था। पौलुस ने तीन बार परमेश्वर से इसे दूर करने की विनती की। यह पौलुस के लिए बहुत कमजोर करने वाला था। परमेश्वर ने कहा, “मेरा अनुग्रह तेरे लिए बहुत है; क्योंकि मेरी सामर्थ्य निर्बलता में सिद्ध होती है” (2 कुरि. 12:9)। अन्त में पौलुस नरम पड़कर कहता है, “इस कारण मैं मसीह के लिए निर्बलताओं में, और निन्दाओं में, और दरिद्रता में, और उपद्रवों में, और संकटों में प्रसन्न हूँ; क्योंकि जब मैं निर्बल होता हूँ, तभी बलवन्त होता हूँ” (2 कुरि. 12:10)। अब यह एक क्रांतिकारी वचन है, जिसका समापन एक वृद्ध योद्धा अन्याय पर सम्भावित क्रोध का मुकाबला करने के लिए इतने गहन ईश-विज्ञान के साथ कर सका। यदि हम अपने हृदयों को समृद्ध ईश-विज्ञान से भर लें, तो अन्याय के लिए कोई जगह नहीं बचेगी। हम क्रोध को इस बात को याद करके दूर कर सकते हैं कि कैसे परमेश्वर हमारे जीवनों को आकार देने और हमें दूसरों की बेहतर देखभाल करने हेतु सक्षम बनाने के लिए अन्याय का उपयोग करता है। अगुवों को अपमान न करने योग्य बनना सीखना होगा। यह वास्तव में आत्मिक परिपक्वता और यीशु के समान होने का प्रतीक है। क्या आप याकूब 1:2 के अनुसार कह सकते हैं कि जब आप नाना प्रकार की परीक्षाओं से होकर गुजरते हैं, तो आप इसे पूरे आनन्द की बात समझते हैं, क्योंकि यह विश्वास की दौड़ के लिए आवश्यक धीरज उत्पन्न करेगा?
विश्वासी जन विपत्ति के लिए बना है। केवल हम ही हैं, जो इसका सामना कर सकते हैं, अत: वह हमें व्यक्तिगत् अन्याय का अनुभव क्यों नहीं करने देगा? यह संसार हमारा घर नहीं है। जब हम दूर होते हैं, तो परीक्षाएँ और क्लेश इस यात्रा में हमारे साथ होती हैं।
विश्वासी होने के रूप में, हमें दूसरों के साथ हिसाब बराबर करने से इन्कार करना चाहिए और यीशु के आचरण का अनुसरण करना चाहिए, जिसने असंख्य अन्यायों को विश्वासयोग्यता के साथ सह लिया। यदि हमारा छुटकारा मोल लेने के लिए हमारे उद्धारकर्त्ता के साथ क्रूस पर चढ़ते समय ऐसा हुआ, तो आप हमारे जीवनों में भी ऐसा होने की आशा कर सकते हैं। हम अन्याय से मुक्त नहीं हैं। मसीहियों के लिए “अन्याय-से-स्वतंत्र-होने” का कोई रास्ता नहीं है। उत्साहित रहें: क्योंकि कोई भी इससे मुक्त नहीं है।
चर्चा एवं मनन:
- आप किन परिस्थितियों में स्वयं को सबसे अधिक क्रोधित पाते हैं? आप उस क्रोध का सामना कैसे करते हैं?
- यीशु के जीवन, मृत्यु और पुनरुत्थान में से कौन सी बात आपको क्रोध जैसे पापों से लड़ने की सामर्थ्य और आशा प्रदान करती है?
4
परमेश्वर आपको
निराश नहीं करेगा
सही बात के अतिरिक्त किसी और वस्तु पर अपना भरोसा रखना बहुत आसान है। “किसी को रथों का, और किसी को घोड़ों का भरोसा है, परन्तु हम तो अपने परमेश्वर यहोवा ही का नाम लेंगे” (भज. 20:7)। दूसरे मनुष्यों पर अपना भरोसा रखना — अर्थात् लोगों को ऊँचा स्थान देना — परीक्षा में डालने वाला होता है। हालाँकि, जैसा कि पहले कहा गया है, मनुष्य आपको निराश करेगा। दूसरी ओर, परमेश्वर ऐसा नहीं करेगा। परमेश्वर ने आप में एक कार्य आरम्भ किया है और वह उसे पूरा होते हुए देखेगा (फिलि. 1:6)। इसके अतिरिक्त, उसने प्रतिज्ञा की है कि सब बातें मिलकर हमारी भलाई और उसकी महिमा के लिए काम करेंगी (रोमि. 8:28)। व्यक्तिगत् अन्याय के समय में केवल परमेश्वर ही हमारा शरणस्थान है। भजन 91:2 कहता है कि यहोवा “मेरा शरणस्थान और मेरा गढ़ है, वह मेरा परमेश्वर है, मैं उस पर भरोसा रखूँगा।”
इब्रानियों की पत्री के लेखक ने हमें यह सिद्धान्त दिया है कि समय-समय पर पवित्र लोगों की ओर देखना ठीक है, परन्तु हमें अपना ध्यान यीशु पर केन्द्रित रखना चाहिए (इब्रा. 12:1-2)। यदि यीशु के अतिरिक्त कोई अन्य व्यक्ति ध्यान का केन्द्र बन जाए, तो इससे एक बड़ी निराशा आने में बहुत अधिक समय नहीं लगेगा। मैं बहुत आभारी हूँ कि परमेश्वर हमारे सर्वोत्तम हित का ध्यान रखता है, और वह हमारी पवित्रता की प्रक्रिया में सक्रिय है, तथा हमारे प्रति अटूट और अटल प्रेम रखता है। हमें मनुष्य के भय पर अपनी ऊर्जा खर्च करने की आवश्यकता नहीं है। इस तथ्य के मामले में, अब तक के सबसे बुद्धिमान व्यक्ति, सुलैमान ने कहा था: “मनुष्य का भय खाना फन्दा हो जाता है, परन्तु जो यहोवा पर भरोसा रखता है उसका स्थान ऊँचा किया जाएगा” (नीति. 29:25)। हम सभी जानते हैं कि यह सच है, परन्तु हम परमेश्वर के प्रति अनन्य प्रेम के अनुशासन का पालन करने में असफल रहते हैं, अर्थात् हम यीशु को अपने पूरे हृदय, मन, प्राण और शक्ति से प्रेम करते हैं। हम अपने जीवन में परमेश्वर की निरन्तर और सुधारात्मक देखभाल से आसानी से विचलित हो जाते हैं। यदि हम अनुशासित नहीं हैं, तो हम इसे गलत समझकर परमेश्वर को नहीं, बल्कि मनुष्य को प्रसन्न करने का प्रयत्न करेंगे। इस प्रकार, मनुष्यों को प्रसन्न करना एक मूर्ति बन जाएगा। यूहन्ना हमें “अपने आप को मूरतों से बचाए रखो” की चेतावनी देता है (1 यूह. 5:21)। हमारे हृदय मूर्तियों के कारखाने हैं, और यह विशेष रूप से तब सच होता है, जब हम अन्याय का अनुभव करते हैं — जब आप निश्चित रूप से यह जानते हैं कि आपने कुछ नहीं किया, या कुछ नहीं कहा, या फिर कुछ गलत भी नहीं सोचा, तौभी लोग सोचते हैं कि आपने ऐसा किया। यही वह समय है, जब आपको अपनी गवाही और प्रतिष्ठा की रक्षा के लिए पूरी तरह से परमेश्वर पर निर्भर रहना होगा।
बदला लेने, सच्चाई को सीधा-सीधा सामने रखने और व्यक्तिगत् अन्याय के विरुद्ध लड़ने की इच्छा रखना परीक्षा में डालने वाला लगता है। रोमियों 12:14 में हमें न केवल अपने शत्रुओं से प्रेम करने के लिए कहा गया है, बल्कि हमें “अपने सतानेवालों को आशीष दो; आशीष दो, श्राप न दो” कहा गया है। उसी अनुच्छेद में आगे, पौलुस कहता है,
बुराई के बदले किसी से बुराई न करो; जो बातें सब लोगों के निकट भली हैं, उनकी चिन्ता किया करो। जहाँ तक हो सके, तुम भरसक सब मनुष्यों के साथ मेल मिलाप रखो। हे प्रियों, बदला न लेना, परन्तु परमेश्वर के क्रोध को अवसर दो, क्योंकि लिखा है, “बदला लेना मेरा काम है, प्रभु कहता है मैं ही बदला दूँगा।” (रोमि. 12:17-19)
मैं बहुत धन्यवादी हूँ कि बदला लेने वाला या रक्षा करने वाला बनना मुझ पर निर्भर नहीं करता। परमेश्वर हमारा रक्षक, हमारी ढाल और हमारा सहायक है (भज. 33:20)। मुझे एस्तेर की पुस्तक में हामान की याद आती है, जिसने मोर्दकै को लटकाने के लिए फाँसी का खम्भा बनवाया था। मोर्दकै के प्रति उसकी अन्यायपूर्ण घृणा ने उसे उस सीमा तक पागलपन दिखा दिया था कि वह उसे मिटा ही देना चाहता था। परन्तु इसके बजाय, परमेश्वर ने मोर्दकै की रक्षा की और 7:10 में यह बताया गया है कि “तब हामान उसी खम्भे पर जो उसने मोर्दकै के लिए तैयार कराया था, लटका दिया गया। इस पर राजा का गुस्सा ठण्डा पड़ गया।” परमेश्वर सर्वोच्चता से अपने लोगों की रक्षा करता है और की गई बुराई को सही करता है। कभी ऐसा इस जीवन में होता है, तो कभी अगले जीवन में होता है। कभी वह अविश्वासी राजाओं का उपयोग करता है, तो कभी वह हमारा उपयोग करने का चुनाव करता है। मुझे भरोसा करता हूँ कि आप अपने जीवन पर परमेश्वर की सर्वोच्च निगरानी के लिए उसके प्रति धन्यवादी हैं। यदि परमेश्वर हमारी ओर है, तो हमारा विरोधी कौन हो सकता है? एक व्यक्ति और परमेश्वर के योग का अर्थ बहुमत होता है!
चर्चा एवं मनन:
- परमेश्वर के अतिरिक्त आप किन बातों की ओर जाने की परीक्षा में पड़ते हैं (जैसे सुखविलास, शारीरिक शक्ति या नये अनुभव) और आप किन बातों पर अपना भरोसा रखते हैं, जो आपको परीक्षाओं से होकर गुजरने में सहायता करती हैं?
- परमेश्वर आपके व्यक्तिगत् अन्यायों को सम्भालेगा (चाहें वे इस जीवन में हों या अगले जीवन में हों), इस बात को जानना आपके द्वारा उनके विषय में की जाने वाली प्रतिक्रिया को कैसे बदलता है?
5
उनके लिए प्रार्थना करें
जो अन्याय करते हैं
कड़वाहट रखना और प्रतिशोधी होना बहुत आसान है। और यह बात फिर से दोहराए जाने के योग्य है: कड़वाहट केवल उसी व्यक्ति को नष्ट करती है, जो उसे थामे रहता है। अपराधी (या अपराधियों) को क्षमा करना वह स्वतंत्रता है, जिसकी आपको आवश्यकता है और जिसकी आप खोज में हैं। जब आप क्षमा करते हैं, तो आप बेहतर मनुष्य हो जाते हैं। “अपने सतानेवालों को आशीष दो” (रोमि. 12:14)। यीशु ने कहा कि हमें अपने शत्रुओं से प्रेम रखना है, उनसे घृणा नहीं करनी है। फिर वह कहता है: “अपने सतानेवालों के लिए प्रार्थना करो” (मत्ती 5:44)। यीशु ने कहा, “धन्य हैं वे, जो मेल करानेवाले हैं, क्योंकि वे परमेश्वर के पुत्र कहलाएँगे” (मत्ती 5:9)। फिर वह अपने दस धन्य वचनों को इन मौलिक कथनों के साथ समाप्त करता है, “धन्य हो तुम, जब मनुष्य मेरे कारण तुम्हारी निन्दा करें, और सताएँ और झूठ बोल बोलकर तुम्हारे विरोध में सब प्रकार की बुरी बात कहें। तब आनन्दित और मगन होना, क्योंकि तुम्हारे लिए स्वर्ग में बड़ा फल है। इसलिए कि उन्होंने उन भविष्यद्वक्ताओं को जो तुम से पहले थे इसी रीति से सताया था” (मत्ती 5:11–12)। क्या आपने देखा कि आपका फल बड़ा होगा? पौलुस इन अन्यायों को 2 कुरिन्थियों 4:17 में “पल भर का हल्का सा क्लेश” कहता है।
मुझे घुटने टिकाए बैठकर लोगों को तुच्छ जानना कठिन लगता है। एक दृढ़ प्रार्थना वाला जीवन व्यक्तिगत् अन्याय के प्रभावों से लड़ने का सबसे अच्छा तोड़ है। यीशु कहता है, “अपने शत्रुओं के लिए प्रार्थना करो।” दूसरों के लिए पागलों के समान प्रार्थना करें। एक गम्भीर प्रार्थना वाले जीवन के साथ-साथ, हम मत्ती 18:21-35 में देखते हैं कि जब दूसरे लोग हमारे विरुद्ध इस प्रकार पाप करते हैं, तो हमें उन्हें क्षमा करने के लिए कहा गया है। हमें क्षमा करना इसलिए सिखाया जाता है, क्योंकि हमें भी क्षमा किया गया है। पतरस ने यीशु से पूछा कि अन्याय के लिए क्षमा करने की हमारी सीमाएँ क्या हैं — यहाँ तक कि उसने सुझाव दिया कि क्या एक दिन में अधिकतम सात बार तक क्षमा किया जा सकता है (उसे लगा कि वह उदारता दिखा रहा है)। यीशु ने उसे यह कहकर अचम्भित कर दिया, “मैं तुझ से यह नहीं कहता कि सात बार तक वरन् सात बार के सत्तर गुने तक” (मत्ती 18:22)। फिर यीशु ने एक ऐसे व्यक्ति का दृष्टान्त सुनाया, जिसका बहुत बड़ा कर्जा क्षमा कर दिया गया था, और फिर उसने एक ऐसे मजदूर को जिम्मेदार ठहराया, जिसका कर्जा बहुत कम था। यहाँ तक कि उसने लगभग उसके प्राण ही उसमें से निकाल दिए थे। इसे स्वयं के लिए पढ़ें, यह पागलपन है (मत्ती 18:23-35)। वैसे तो इस दृष्टांत का निष्कर्ष यह है कि यदि आपको हर पाप के लिए — जो अतीत के, वर्तमान के और भविष्य के हैं — क्षमा कर दिया गया है, तो फिर जब कोई आपके विरुद्ध व्यक्तिगत् अन्याय का पाप करता है, तो आप इस संसार में उसे क्षमा किए बिना कैसे रह सकते है? यह परमेश्वर के उस अनुग्रह, दया और क्षमा के विपरीत है, जिसका आपने अनुभव किया है। हममें से जिन्हें बहुत क्षमा किया गया है उन्हें बहुत क्षमा करना सीखने की आवश्यकता है। वापस प्रार्थना पर आते हैं। हमें हर उस बात के बारे में और हर उस व्यक्ति हेतु जो मन में आए प्रार्थना करने के लिए कहा जाता है (फिलि. 4:6)। क्रूस के आगे घुटने टिकाते समय आपे से बाहर होना कठिन बात है। मुझे इवान क्राफ्ट के गीत के बोल याद आ रहे हैं, “हे परमेश्वर, जब मैं आत्मसमर्पण करता हूँ, तो मुझे वह सब मिल जाता है, जिसकी मुझे आवश्यकता होती है / यीशु के नाम से हर निर्बलता में सामर्थ्य मिलती ही / ओह, यह कोई रहस्य नहीं है कि मैं अपने घुटने टिकाकर युद्ध लड़ता हूँ।”1 विश्वासियों के रूप में प्रार्थना हमारे पास ऐसी सम्पत्ति है, जिसका हम सबसे कम उपयोग करते हैं। इफिसियों 6:10-20 में परमेश्वर के कवच का उल्लेख किया गया है, जिसके निष्कर्ष के अनुसार मसीह के सैनिकों के रूप में हम से कहा गया है कि “हर समय और हर प्रकार से आत्मा में प्रार्थना, और विनती करते रहो, और इसी लिए जागते रहो कि सब पवित्र लोगों के लिए लगातार विनती किया करो” (6:18)। अत: घुटने टिकाए हुए पिता के पास जाकर व्यक्तिगत् अन्याय से लड़ें।
मुझे एक विशेष समय याद है, जब मैं केंटुकी में पालन-पोषण की व्यवस्था को तोड़ने के लिए संघर्ष कर रहा था। मैं फ्रैंकफुर्त में स्थित स्टेट कैपिटल बिल्डिंग तक के पूरे मार्ग में प्रार्थना करता था। मुझे मालूम था कि मैं उन प्रधानताओं और शक्तियों के विरुद्ध लड़ रहा हूँ, जिन्हें मैं देख नहीं सकता था — और जिस सक्रिय प्रतिरोध को मैं देख सकता था, उसका उल्लेख नहीं करना चाहता। मैं वहाँ तक की यात्रा को प्रार्थना करते हुए बिताता था और घर तक की यात्रा को अक्सर रोते हुए बिताता था। रात को घर में जाने के लिए स्वयं को शान्त करने हेतु मैं अपने इलाके का चक्कर लगाता था। यह एक चुनौतीपूर्ण समय था। लोग बच्चों के साथ इतने भयानक तरीके से दुर्व्यवहार कैसे कर सकते हैं? सरकार इन नन्हे-मुन्नों को स्थायी आश्रय गृहों में पहुँचाने के लिए तेजी से कदम क्यों नहीं उठाती? वह अन्धकारमय समय था, और लड़ना कठिन था। मुझे मालूम था कि मुझे घुटने टिकाकर लड़ना होगा। शैतान जानता है कि यदि वह एक छोटे बच्चे का जीवन बर्बाद कर सकता है, तो वह उन्हें सम्पूर्ण विनाश के मार्ग पर भी डाल सकता है। उसने इस आबादी पर उनके बचपन में ही आक्रमण किया और उनकी आत्माओं को हानि पहुँचाई, और राज्य इन बच्चों की सहायता करने में अयोग्य है। मुझे अपने घुटने टिकाकर अंधकार को पीछे धकेलना पड़ा।
मैं आपसे विनती करता हूँ कि कड़वाहट रखने वाला या प्रतिशोध लेने वाला न बनें; अपने घुटने टिकाकर लड़ें और यीशु की तरह उत्तर दें, कि जब उसे गाली दी गई, तो उसने पलटकर गाली नहीं दी। प्रार्थना हमारे आत्मिक संसाधनों के सबसे बड़े हथियारों में से एक है। मैं मानता हूँ कि आमतौर पर यह पहली बात नहीं होती जो मन में आती है, परन्तु यह पहली बात होनी चाहिए।
शैतान को छोटे और बड़े, दोनों तरह के अन्यायों में विजयी न होने दें। हमारे प्रभु यीशु मसीह के अनुग्रह में दृढ़ रहें (2 तीमु. 2:1)। बाइबल के अनुसार सोचें। ऐसे मित्र चुनें, जो आपके लिए सुसमाचार का प्रचार करें, न कि सुसमाचार के लिए बोझ बनें। याद रखें कि: परमेश्वर सब बातों में सर्वोच्च है। परमेश्वर की सर्वोच्चता पर अपना सिर टिकाएँ। याद रखें कि धर्मी और अधर्मी दोनों पर मेंह बरसता है। कड़वाहट रखने वाला होने से इन्कार करें। उतावली के साथ प्रार्थना करें। दीन बनें और दीन बने रहें। जो आपको पीड़ा पहुँचाते हैं, उन्हें क्षमा करें। यीशु के साथ चलते रहें और व्यक्तिगत् अन्याय से होकर गुजरते हुए परमेश्वर की आराधना करते रहें। उन पर दया करें, जिन्होंने आपको चोट पहुँचाई है। परमेश्वर हमारे दुःख के आँसू पोंछ डालेगा और अनन्त काल तक सभी गलतियों को सुधार देगा।
और अन्त में, याद रखें कि परमेश्वर आपको जानता और समझता है (भज. 139:17)। यीशु एक सिद्ध महायाजक है, और आप परम पवित्र स्थान में जाकर पिता से उसके पुत्र, यीशु के माध्यम से प्रार्थना कर सकते हैं। इब्रानियों 4:15-16 हमें अपनी भावनाओं और पीड़ा पर विजय पाने के लिए आवश्यक आत्मविश्वास प्रदान करता है, “क्योंकि हमारा ऐसा महायाजक नहीं जो हमारी निर्बलताओं में हमारे साथ दु: खी न हो सके; वरन् वह सब बातों में हमारे समान परखा तो गया, तौभी निष्पाप निकला। इसलिए आओ, हम अनुग्रह के सिंहासन के निकट हियाव बाँधकर चलें कि हम पर दया हो, और वह अनुग्रह पाएँ जो आवश्यकता के समय हमारी सहायता करे।” जब अन्याय आपके लिए घात लगाए, तो मैं आपको प्रोत्साहित करूँगा कि आप अपनी बाइबल में इन खण्डों को देखें और उन सभी पर अपनी दृष्टि लगाएँ। इसके अतिरिक्त, मार्क व्रोगोप द्वारा लिखित “डार्क क्लाउड्स, डीप मर्सी” (Dark Clouds, Deep Mercy) को पढ़ें। जब आप विलाप करने का अनुग्रह खोज लेंगे, तो यह आपको परमेश्वर के बारे में गहराई से सोचने और उन लोगों को क्षमा करने के लिए प्रेरित करेगा जिन्होंने आपके विरुद्ध अन्याय किया है।
चर्चा एवं मनन:
- आपकी दिनचर्या में प्रार्थना क्या भूमिका निभाती है? कष्ट और परीक्षा के समय में आप प्रार्थना के साथ कैसा व्यवहार करते हैं?
- व्यक्तिगत् अन्याय के प्रति प्रार्थना सबसे अच्छी प्रतिक्रिया क्यों है? इससे क्या सहायता मिलती है?
अन्तिम टिप्पणियाँ
- इवान क्राफ्ट, “फाइट ऑन माई नीज़” (Fight On My Knees) का विमोचन, सन् 2022 में यूनिवर्सल म्यूजिक ग्रुप के आई बिलीव (जिसका सीधा प्रसारण शेपर्ड चर्च से हुआ था) में हुआ था।