#14 परमेश्वर की महिमा के लिए पितृत्व
परिचय
“अब मैं आपको पति-पत्नी घोषित करता हूँ।”
एक अनुभवी पास्टर होने के रूप में, मैंने ये शब्द पहले भी कई बार कहे थे। परन्तु इस बार बात कुछ अलग ही थी। मैंने ये शब्द केवल एक पास्टर के रूप में किसी कलीसिया के सदस्य से नहीं कहे थे। मैंने ये शब्द एक पिता के रूप में अपने पुत्र और उस प्यारी सी स्त्री से कहे थे, जो उस पल मेरी पुत्र-वधु बन गई थी।
उस पल कुछ अद्भुत घटित हुआ, जो मेरे लिए अत्यन्त निजी था। एक नये सिर अर्थात् मुखिया के साथ एक नये घराने का निर्माण हुआ। उस पल तक मेरा पुत्र अपने पूरे जीवन में मेरे घराने का सदस्य रहा था, और उस घर में वह मेरी प्रधानता के अधीन, मेरे अधिकार के अधीन था। अब, वह एक और घराने का मुखिया है। मूसा ने उत्पत्ति 2:24 में लिखा है, “पुरुष अपने माता–पिता को छोड़कर अपनी पत्नी से मिला रहेगा, और वे एक ही तन बने रहेंगे।” इस आयत के एक पुराने अनुवाद पर आधारित यह पुरानी लोकोक्ति कहती है, “छोड़ना और एक तन हो जाना।” उस पल ने मुझे कैसा महसूस कराया, उसे बताने के लिए मेरी जानकारी में सबसे अच्छा तरीका यह है कि मुझे अपार प्रसन्नता हुई। इस घटना की गहराई और इस अहसास के कारण मेरी भावनाएँ बहुत भारी थीं कि इस पल तक पहुँचने से पहले पितृत्व के वर्षों में ऐसा कोई और अवसर नहीं मिलता। मुझे प्रसन्नता इसलिए हुई, क्योंकि मेरा पुत्र एक धर्मी पुरुष बन रहा है
— जो अपने स्वयं के घराने का एक विश्वासयोग्य मुखिया होगा — और यह उन बड़े-बड़े लक्ष्यों में से एक है, जिसकी ओर मेरे सभी पितृत्व के प्रयत्न कई वर्षों से निर्देशित थे। उस घटना के आसपास के दिनों में, मैंने पितृत्व पर बहुत अधिक चिन्तन किया। क्या मैं अपने सबसे बड़े पुत्र के लिए वैसा पिता था, जैसा मुझे होना चाहिए था? क्या मैंने भक्ति, दीनता, विश्वासयोग्यता, पवित्रता और प्रेम का ऐसा उदाहरण प्रस्तुत किया था कि मेरा पुत्र पवित्र जीवन जीने में आगे बढ़ते हुए मेरे जीवन को एक उदाहरण के रूप में देखे? इस पड़ाव पर पहुँचकर, मैं अपने दूसरे बच्चों की देखभाल और नेतृत्व में क्या अलग कर सकता हूँ?
मेरे चिन्तन ने कुछ ऐसी बातें सामने ला दीं, जिन्हें मैं पछतावे की श्रेणी में डाल दूँगा और कुछ बातें ऐसी थीं, जिनके लिए मैं विश्वास करता हूँ कि मैंने सही किया। परन्तु सब बातों से बढ़कर, इस चिन्तन ने मुझे मसीह के सुसमाचार की आशा की ओर प्रेरित किया है। मैं मसीही इसलिए नहीं हूँ, क्योंकि मैं विश्वास करता हूँ कि मैं सिद्ध पितृत्व (या किसी और सिद्ध बात) के सूत्र का पालन कर पाने में सक्षम हूँ। मैं सही रीति से मसीही इसलिए हूँ, क्योंकि मैं सिद्धता के सूत्र, अर्थात् परमेश्वर की व्यवस्था का पालन नहीं कर सकता हूँ। मेरे सारे बेहतरीन प्रयत्न परमेश्वर की पवित्रता के मानक से बहुत कम हैं: “सब ने पाप किया है, और परमेश्वर की महिमा से रहित हैं” (रोमि. 3:23)। परन्तु जबकि मैं एक पिता के रूप में पापी होकर परमेश्वर की महिमा से रहित हूँ, तो मैं इस ज्ञान में विश्राम पाता हूँ कि परमेश्वर, अर्थात् महिमामय रूप से सिद्ध पिता ने मेरे लिए अपना एकलौता पुत्र दे दिया (यूह. 3:16)। क्योंकि यीशु ने मेरे पापों के लिए क्रूस पर दुःख सहा और तीसरे दिन फिर से जी उठा, इसलिए मुझे पापों की क्षमा और अनन्त जीवन की आशा मिलती है। एक तरफ तो मसीह का सुसमाचार मुझे स्वयं की-घृणा से बचाता है, क्योंकि मैं व्यवस्था के कार्यों से नहीं, बल्कि मसीह पर विश्वास करने के द्वारा धर्मी ठहराया गया हूँ, जिसमें एक पिता के रूप में मेरे परिश्रम भी शामिल हैं (रोमि. 3:28 और गला. 2:16)। और दूसरी तरफ, सुसमाचार मुझे एक विश्वासयोग्य पिता के रूप में अपनी बुलाहट और कर्तव्य को पूरा करने के लिए बाध्य करता है, क्योंकि मैं जानता हूँ कि परमेश्वर ने मुझे अपने उद्धार की दैनिक वास्तविकता को कार्यान्वित करने के लिए अपना पवित्र आत्मा दिया है, जिसमें एक पिता के रूप में मेरे परिश्रम भी शामिल हैं (फिलि. 2:12-13)।
इस क्षेत्रीय मार्गदर्शिका में, मैं यह देखने में आपकी सहायता करना चाहता हूँ कि एक पिता होने का कार्य किस प्रकार परमेश्वर की अपनी वाचा के लोगों के प्रति पितृत्व देखभाल के अनुरूप है, जिससे कि जब आप अपने बच्चों के लिए एक अच्छे पिता बनने का प्रयत्न करें, तो परमेश्वर के पुत्र, यीशु मसीह में दिखाए गए छुटकारे के प्रेम में सांत्वना, आत्मविश्वास और सामर्थ्य प्राप्त करने में पवित्र आत्मा आपकी सहायता करे।
ऑडियो मार्गदर्शिका
ऑडियो#14 परमेश्वर की महिमा के लिए पितृत्व
“हे बच्चेवालों, अपने बच्चों को रिस न दिलाओ, परन्तु प्रभु की शिक्षा और चेतावनी देते हुए उनका पालन–पोषण करो।”
– प्रेरित पौलुस
(इफि. 6:4)
1 सबसे पहले परमेश्वर का पितृत्व
ईश्वरीय पितृत्व के बाद मानवीय पितृत्व का आदर्श
पुराने और नये, दोनों नियमों के कई पाठों में परमेश्वर को पिता कहा गया है। यशायाह प्रार्थना करता है, “हे यहोवा, तू हमारा पिता है” (यशा. 64:8)। एक टूटे हुए संसार की वास्तविकता को सम्बोधित करते हुए, जहाँ कुछ लोग एक अच्छे मानवीय पिता की सहायता के बिना जीवन का सामना करते हैं, दाऊद हमें याद दिलाता है कि “परमेश्वर अपने पवित्र धाम में अनाथों का पिता है” (भज. 68:5)। यीशु ने अपने अनुयायियों को परमेश्वर को “हे हमारे पिता, तू जो स्वर्ग में है” कहकर सम्बोधित करना सिखाया (मत्ती 6:9)। पौलुस ने कहा कि जिन मसीहियों में परमेश्वर का आत्मा है, वे उसे “हे अब्बा, हे पिता” कहते हैं (रोमि. 8:14-17 और गला. 4:4-6)। यीशु ने भी क्रूस पर चढ़ाए जाने से पहले वाली रात गतसमनी की वाटिका में परमेश्वर को इसी रीति से सम्बोधित किया था (मर. 14:46)। अब्बा अरामी भाषा का एक शब्द है, जिसका उच्चारण करना आसान है, और अंग्रेजी भाषा के शब्द डैडी की तरह, यह शब्द बच्चों के बोलने के विकास के आरम्भिक दौर में ही सीखा जाता था। एक मसीही के लिए परमेश्वर को पिता के प्रकट नाम से पुकारने से अधिक घनिष्ठ या बुनियादी स्वभाव की कल्पना करना कठिन है।
हमारे लिए यह विचार करना स्वाभाविक होगा कि परमेश्वर के लिए पिता नाम उस आत्मीयता, देखभाल, निर्देशन और व्यवस्था के रूपक के रूप में लागू होता है, जो भले सांसारिक पिता अपने बच्चों के लिए प्रदान करते हैं। इस धारणा के अनुसार, पितृत्व का विचार सबसे पहले और अधिक उचित रूप से मानवीय प्राणियों के लिए सत्य होगा। पिता नाम केवल एक उपयुक्त अलंकार के रूप में परमेश्वर के लिए सत्य होगा। कुछ लोगों ने सिखाया है कि परमेश्वर के संदर्भ में हमें पितृत्व को इसी तरह समझना चाहिए। हालाँकि, पवित्रशास्त्र स्पष्ट रूप से बताता है कि ईश्वरीय पितृत्व और मानवीय पितृत्व के बीच की समानता वास्तव में दूसरी दिशा में जाती है।
इफिसियों 3:14-15 में, पौलुस कहता है, “मैं इसी कारण उस पिता के सामने घुटने टेकता हूँ, जिस से स्वर्ग और पृथ्वी पर, हर एक घराने का नाम रखा जाता है।” ई.एस.वी. बाइबल के द्वारा “घराने” के रूप में अनुवाद किया गया शब्द यूनानी भाषा का पैट्रिया शब्द है, जिसका अर्थ “पितृत्व” होता है। यहाँ तक कि ई.एस.वी. बाइबल में एक पाद-टिप्पणी भी दी गई है, जो बताती है कि “हर एक घराने” वाक्यांश का अनुवाद “सारे पितृत्व” के रूप में किया जा सकता है। इस खण्ड पर फिर से विचार करें, और इस बार वैकल्पिक अनुवाद के साथ विचार करें: “मैं इसी कारण उस पिता के सामने घुटने टेकता हूँ, जिस से स्वर्ग और पृथ्वी पर, सारे पितृत्व का नाम रखा जाता है।” पौलुस इस तथ्य को प्रदर्शित कर रहा है कि परमेश्वर स्वयं को पिता के रूप में इसलिए प्रकट नहीं करता, क्योंकि उसके और मानवीय पिताओं के बीच कोई समानता है। बल्कि, परमेश्वर मनुष्यों को पिता नाम एक सादृश्य, एक प्रतिबिम्ब के रूप में देता है कि वह कौन है। मानवीय पितृत्व को ईश्वरीय पितृत्व के विपरीत नहीं होना चाहिए, बल्कि उसके अनुसार सीखा और अपनाया जाना चाहिए।
यदि सारे पितृत्व का नाम “हमारे पिता से जो स्वर्ग में है” लिया गया है, तो जब हम इस बात पर विचार करते हैं कि सच्चे और अनन्त पिता के नाम पर रखे गए लोगों के रूप में हम कैसे विश्वासयोग्य रहें, तो परमेश्वर के एक नाम के रूप में पिता के महत्व पर एक संक्षिप्त विचार शिक्षाप्रद हो सकता है।
परमेश्वर किन तरीकों से एक पिता है?
ऐसे दो तरीके हैं, जिनसे बाइबल परमेश्वर के लिए पिता नाम को लागू करती है: (1) पवित्र त्रिएकत्व का पहला व्यक्ति, त्रिएकत्व के दूसरे व्यक्ति, अर्थात् पुत्र के सम्बन्ध में अनन्त पिता है, और (2) एकमात्र त्रिएक परमेश्वर को उन प्राणियों के सम्बन्ध में पिता कहा गया है, जिनके साथ उसने वाचा बाँधी है। तो आइए, हम परमेश्वर को पिता कहने के इन दोनों तरीकों पर संक्षेप में विचार करें।
- परमेश्वर पिता और परमेश्वर पुत्र के बीच अनन्त सम्बन्ध है।
यह अनन्त सम्बन्ध हमें त्रिएकत्व के एकदम मूल में ले जाता है। इससे घबराएँ या परेशान न हों। क्या त्रिएकत्व के गौरवशाली सिद्धान्त को समझना कठिन है और यह अन्त में पूरी तरह से समझने की हमारी क्षमता से परे है? हाँ, बिलकुल ऐसा ही है। परन्तु यह हमें परमेश्वर के बारे में अधिक ज्ञान प्राप्त करने से न रोके। इसके बजाय, इससे हमें प्रसन्न होना चाहिए! जिस परमेश्वर को हम जानना और समझना चाहते हैं, वह हमारे सीमित मनों की सीमा और पहुँच से परे है। यही कारण है कि सर्वप्रथम उसे जानना ही आवश्यक है। परमेश्वर के ज्ञान की अथाह गहराई पर चिन्तन करते हुए, पौलुस कहता है, “आहा! परमेश्वर का धन और बुद्धि और ज्ञान क्या ही गम्भीर है! उसके विचार कैसे अथाह, और उसके मार्ग कैसे अगम हैं” (रोमि. 11:33)!
त्रिएकत्व के दूसरे व्यक्ति को परमेश्वर का पुत्र इसलिए कहा गया है, क्योंकि वह पिता से उत्पन्न हुआ है। प्रेरित यूहन्ना के पुस्तकों में, पुत्र और पिता के सम्बन्ध को दर्शाने के लिए बाइबल आधारित “एकलौता पुत्र” शब्द का उपयोग पाँच बार किया गया है (यूह. 1:14, 1:18, 3:16, 3:18, और 1 यूह. 4:9 — ई.एस.वी. बाइबल इन आयतों में इस शब्द को “एकलौते” के रूप में प्रस्तुत करती है, परन्तु एन.ए.एस.बी. बाइबल और के.जे.वी. बाइबल इसका अधिक सटीक अनुवाद “एकलौता पुत्र” देती हैं)। जब एक बच्चा अपने पिता से उत्पन्न होता है, तो वह बच्चा स्वभाव से ही पिता के समान होता है। मानवीय पिता मानवीय बच्चों को जन्म देते हैं। इसी समरूपता के द्वारा, परमेश्वर पिता ने परमेश्वर पुत्र को जन्म दिया। दूसरे शब्दों में कहें तो परमेश्वर के पुत्र को “एकलौता पुत्र” कहा गया है, और यह तथ्य हमें आश्वस्त करता है कि पुत्र बिलकुल वही है, जो पिता है, अर्थात् सच्चा परमेश्वर। क्योंकि पिता और पुत्र दोनों ही सच्चे और पूर्ण रूप से परमेश्वर हैं, इसलिए परमेश्वर पिता के पितृत्व का न कोई पूर्व है और न ही पश्चात् है, और इसका न कोई आरम्भ है और न ही इसका अन्त हो सकता है। यह सत्य जो समझने-में-कठिन है, हमें याद दिलाता है कि पितृत्व परमेश्वर के लिए उस समय से पहले भी सत्य था, जब उसने संसार की रचना की थी और संसार के साथ उसके चाहे जो भी सम्बन्ध हों, यह उसके लिए सत्य बना रहता है।
परमेश्वर पिता और परमेश्वर पुत्र के बीच का अनन्त सम्बन्ध, कुछ सीमित तरीकों से सांसारिक पिताओं और उनकी सन्तानों के जैसा ही है। इस पड़ाव पर, ये असमानताएँ कहीं अधिक गहरी हो जाती हैं। मनुष्यों के बीच का पिता-सन्तान वाला सम्बन्ध, और इसकी कई विशेषताएँ परमेश्वर में अनन्त पिता-पुत्र के सम्बन्ध से जुड़ी हुई नहीं हैं। अधिकार और अधीनता, प्रावधान और आवश्यकता, अनुशासन और पाप, तथा निर्देश और शिक्षा जैसी बातों का अनन्त पिता-पुत्र के सम्बन्ध में कोई स्थान नहीं है। इसी कारण से, परमेश्वर पर पिता नाम को लागू किया गया है और वास्तव में यह दूसरा तरीका ही इस क्षेत्रीय मार्गदर्शिका का केन्द्र बिंदु होगा।
- परमेश्वर अपनी वाचा वाले लोगों का स्वर्गीय पिता है।
इसी अर्थ में हम परमेश्वर से “हे हमारे पिता” कहकर प्रार्थना करते हैं। यदि त्रिएकत्व के प्रथम पुरुष को पिता इसलिए कहा जाता है, क्योंकि वह अनन्त रूप से पुत्र को जन्म देता है, तो त्रिएक परमेश्वर को पिता इसलिए कहा जाता है, क्योंकि वह अपने साथ वाचा वाले सम्बन्ध में अपने लोगों को पुत्रों के रूप में गोद लेता है। हमारे उद्धार को पूरा करने के लिए यीशु मसीह के संसार में आने के कारण और हमारे हृदयों में छुटकारे को लागू करने के लिए पवित्र आत्मा के इस संसार में भेजे जाने के कारण, मसीही स्थायी रूप से परमेश्वर की गोद ली गई सन्तानें हैं। गलातियों 4:4–7 में, पौलुस समझाता है
“परन्तु जब समय पूरा हुआ, तो परमेश्वर ने अपने पुत्र को भेजा जो स्त्री से जन्मा, और व्यवस्था के अधीन उत्पन्न हुआ, ताकि व्यवस्था के अधीनों को मोल लेकर छुड़ा ले, और हम को लेपालक होने का पद मिले। और तुम जो पुत्र हो, इसलिए परमेश्वर ने अपने पुत्र के आत्मा को, जो ‘हे अब्बा, हे पिता’ कहकर पुकारता है, हमारे हृदयों में भेजा है। इसलिए तू अब दास नहीं, परन्तु पुत्र है; और जब पुत्र हुआ, तो परमेश्वर के द्वारा वारिस भी हुआ।”
इसी वाचा वाले अर्थ में पिता का दिव्य नाम मानवीय पितृत्व से सबसे अधिक समानता रखता है। परमेश्वर अपने लोगों के सम्बन्ध में वाचा के सिर अर्थात् मुखिया के रूप में पिता है। इसी रीति से, यद्यपि बिलकुल उन्हीं तरीकों से नहीं, तौभी परमेश्वर मानवीय पिताओं को अपने घराने के सदस्यों के सम्बन्ध में वाचा वाली प्रधानता के पद पर बुलाता है। इस क्षेत्रीय मार्गदर्शिका के अगले भाग में, हम उन तरीकों की पहचान करेंगे, जिनसे परमेश्वर का पितृत्व हम पर प्रकट होता है, जिससे कि उन प्रमुख भूमिकाओं और जिम्मेदारियों की पहचान में हमारी सहायता हो, जो मानवीय पिताओं के द्वारा निभाई जानी चाहिए।
चर्चा एवं मनन:
- यह समझना आवश्यक क्यों है कि मानवीय पितृत्व, परमेश्वर के पितृत्व के विपरीत होने के बजाय इसके अनुरूप है?
- इस अनुभाग ने परमेश्वर के पितृत्व और उसके साथ आपके सम्बन्ध के बारे में आपकी समझ को कैसे बढ़ाया?
2 अपनी वाचा वाली सन्तानों के पिता के रूप में परमेश्वर
इफिसियों 3:14-15 के उदाहरण का अनुसरण करते हुए — सारे पितृत्व का नाम परमेश्वर के पितृत्व से लिया गया है — हम उन तरीकों की पहचान करने का प्रयत्न करेंगे, जिनसे परमेश्वर का अपने लोगों के साथ पिता के रूप में वाचा वाला सम्बन्ध, एक मानवीय पिता के अपने बच्चों के साथ सम्बन्ध के समान है। यह दिव्य नाम “पिता” हम पर परमेश्वर और उसकी वाचा वाली सन्तानों के साथ उसके सम्बन्ध के बारे में कम से कम चार सत्य प्रकट करता है:
- हमारे प्रभु के रूप में उसका अधिकार (2 यूह. 4 अध्याय)।
- हमारे भरण-पोषण करने वाले के रूप में उसकी देखभाल (मत्ती 26:25-34)।
- हमें धार्मिकता का प्रशिक्षण देने वाले के रूप में उसकी शिक्षा और चेतावनी (इब्रा. 12:5-11)।
- बहुत से पुत्रों को महिमा में लाकर, जो उसने आरम्भ किया था, उसे पूरा करने वाले के रूप में उसकी विश्वासयोग्यता (इब्रा. 2:10)।
आइए हम इन चारों सत्यों में से प्रत्येक की यह देखते हुए संक्षेप में खोज करें कि प्रत्येक सत्य हमें मानवीय पितृत्व के बारे में कैसे सिखाता है।
परमेश्वर का पितृत्व वाला अधिकार
परमेश्वर ने सम्पूर्ण जगत की रचना की, अर्थात् जो सब कुछ अस्तित्व में है, वह परमेश्वर नहीं है। बाइबल अपनी आरम्भिक आयत में इसे स्पष्ट रूप से बताती है: “आदि में परमेश्वर ने आकाश और पृथ्वी की सृष्टि की” (उत्प. 1:1)। स्वयं परमेश्वर को किसी के द्वारा रचा नहीं गया है। उसका अस्तित्व आवश्यक, अनन्त और पूर्णत: स्वतंत्र है। सब वस्तुओं के अनिर्मित सृष्टिकर्ता के रूप में, परमेश्वर के पास सभी प्राणियों पर पूर्ण अधिकार है। हम जैसे विवेकशील प्राणी (जिनके पास विचारशील मन और आत्म-चेतना है) परमेश्वर की सच्ची आराधना और पूर्ण आज्ञाकारिता के कर्जदार हैं। मसीहियों को न केवल परमेश्वर ने रचा है, बल्कि, जैसा कि हमने देखा है, उन्हें परमेश्वर के द्वारा अपने परिवार में गोद लिया गया है। परमेश्वर उनका पिता है, और वे उसकी सन्तान हैं। वाचा वाला यह रिश्ता बहुत सारे लाभ प्रदान करता है और परमेश्वर के साथ हमारे रिश्ते में एक सुन्दर जटिलता जोड़ता है। परन्तु हमारा उद्धार और गोद लिया जाना परमेश्वर के साथ हमारे रिश्ते में जो कुछ भी जोड़ता है, वह परमेश्वर के अधिकार की मूलभूत वास्तविकता को नहीं छीनता।
प्रेरित यूहन्ना ने एक कलीसिया और उसके सदस्यों को अर्थात् — “उस चुनी हुई महिला और उसके बच्चों के नाम” (आ. 1) —एक बहुत छोटी सी पत्री (2 यूहन्ना) लिखी, कि मसीह में उनके विश्वास की सराहना करे और उन्हें मसीह के प्रति विश्वासयोग्य बने रहने के लिए प्रोत्साहित करे। उसने कहा, “मैं बहुत आनन्दित हुआ कि मैं ने तेरे कुछ बच्चों को उस आज्ञा के अनुसार, जो हमें पिता की ओर से मिली थी, सत्य पर चलते हुए पाया” (आ. 4)। यूहन्ना इस बात को समझता है कि मसीहियों का परमेश्वर के साथ, जो कि उनका पिता है, वाचा वाला एक विशेष सम्बन्ध है। इस कारण, वह उन्हें अपने पिता की आज्ञाओं का पालन करते रहने के लिए प्रोत्साहित करता है। वह आगे कहता है कि मसीहियों की परमेश्वर के प्रति अपने पिता के रूप में आज्ञाकारिता केवल कर्तव्य वाला मामला नहीं है; यह प्रेम का मामला है: “और प्रेम यह है कि हम उसकी आज्ञाओं के अनुसार चलें” (आ. 6)।
जिस प्रकार परमेश्वर अपने बच्चों पर प्रेम से भरे हुए पितृत्वपूर्ण अधिकार का उपयोग करता है, ठीक उसी प्रकार परमेश्वर ने मानवीय पिताओं को भी अपने बच्चों पर अधिकार के पद पर रखा है। हम एक ऐसे संसार में रहते हैं, जहाँ अधिकार रखने की अवधारणा को ही तुच्छ समझा जाता है। और ऐसा लगता है कि कोई भी अधिकार के अधीन नहीं रहना चाहता, और कोई भी अधिकारी नहीं बनना चाहता। अधिकार रखने और आज्ञाएँ जारी करने की सारी बातें आधुनिक कानों को अहंकार और उत्पीड़न की दुर्गन्ध लगती हैं। हमारे युग की प्रचलित सत्ता-विरोधी मानसिकता शैतान के द्वारा मनुष्यों के बीच फैलाए गए सबसे सफल झूठों में से एक है। यदि हम पवित्रशास्त्र पर ध्यान दें, तो हम देखेंगे कि अधिकार रखना वास्तव में अच्छा होता है। परमेश्वर ने मानवीय सामाजिक व्यवस्था के लिए एक पदानुक्रमित और अधिकारपूर्ण संरचना निर्धारित की है। संसार में मानवीय जीवन और सम्पूर्ण समाजों के फलने-फूलने के लिए, न केवल परमेश्वर के अधिकार को, बल्कि परमेश्वर के द्वारा निर्धारित मानवीय अधिकार की संरचनाओं को भी अपनाना आवश्यक है। इनमें सबसे बुनियादी घर में अधिकार रखने की संरचना है।
पवित्रशास्त्र इस बात में स्पष्ट है कि सबसे पहले, पति-पत्नी के बीच अधिकार रखने (सिर) और अधीन होने का सम्बन्ध है (इफि. 5:22-33)। इसी से माता-पिता और उनके बच्चों के बीच का रिश्ता प्रवाहित होता है (इफि. 6:1-4)। परमेश्वर के अधिकार के अधीन, एक मानवीय पिता को अपनी पत्नी पर एक आत्म-त्यागी और प्रेमी सिर के रूप में अधिकार का उपयोग करना चाहिए। उसे परमेश्वर के सामने अपने बच्चों की भलाई के लिए उन पर भी अधिकार का उपयोग करना चाहिए। घर में अधिकार रखने का पद पाने की कल्पना करना आसान नहीं होता, परन्तु परमेश्वर की मंशा के अनुसार पितृत्व निभाने के लिए यह आवश्यक है।
परमेश्वर का पितृत्वपूर्ण प्रावधान
अपने प्रसिद्ध पहाड़ी उपदेश में, यीशु भीड़ को उनकी दैनिक आवश्यकताओं के लिए परमेश्वर के उदार प्रावधान के बारे में निर्देश देता है। वह कहता है,
इसलिए मैं तुम से कहता हूँ कि अपने प्राण के लिए यह चिन्ता न करना कि हम क्या खाएँगे और क्या पीएँगे; और न अपने शरीर के लिए कि क्या पहनेंगे। क्या प्राण भोजन से, और शरीर वस्त्र से बढ़कर नहीं? आकाश के पक्षियों को देखो! वे न बोते हैं, न काटते हैं, और न खत्तों में बटोरते हैं; फिर भी तुम्हारा स्वर्गीय पिता उनको खिलाता है। क्या तुम उनसे अधिक मूल्य नहीं रखते? तुम में कौन है, जो चिन्ता करके अपनी आयु में एक घड़ी भी बढ़ा सकता है? और वस्त्र के लिए क्यों चिन्ता करते हो? जंगली सोसनों पर ध्यान करो कि वे कैसे बढ़ते हैं; वे न तो परिश्रम करते, न कातते हैं। तौभी मैं तुम से कहता हूँ कि सुलैमान भी, अपने सारे वैभव में उनमें से किसी के समान वस्त्र पहने हुए न था। इसलिए जब परमेश्वर मैदान की घास को, जो आज है और कल भाड़ में झोंकी जाएगी, ऐसा वस्त्र पहनाता है, तो हे अल्पविश्वासियों, तुम को वह इनसे बढ़कर क्यों न पहनाएगा? इसलिए तुम चिन्ता करके यह न कहना कि हम क्या खाएँगे, या क्या पीएँगे, या क्या पहनेंगे। क्योंकि अन्यजातीय इन सब वस्तुओं की खोज में रहते हैं, पर तुम्हारा स्वर्गीय पिता जानता है कि तुम्हें इन सब वस्तुओं की आवश्यकता है। इसलिए पहले तुम परमेश्वर के राज्य और उसके धर्म की खोज करो तो ये सब वस्तुएँ भी तुम्हें मिल जाएँगी। अत: कल की चिन्ता न करो, क्योंकि कल का दिन अपनी चिन्ता आप कर लेगा; आज के लिए आज ही का दु:ख बहुत है (मत्ती 6:25-34, इसमें इस बात पर जोर दिया गया है)।
ये निर्देश देते हुए, यीशु सामान्य से लेकर अधिक गहनता तक तर्क करता है। परमेश्वर समस्त सृष्टि की सामान्य रूप से चिन्ता करता है। पक्षियों और फूलों के लिए परमेश्वर के प्रावधान वाला यीशु का उदाहरण, भजन संहिता 104:10-18 की याद दिलाता है। भजनकार घाटियों में बहने वाली नदियों पर विचार करता है, जहाँ गदहे पानी पीते हैं और पक्षी गाते हैं (आ. 10-13), जहाँ मैदान की घास में भेड़-बकरियाँ चरती हैं (आ. 14), और जहाँ भूमि के पेड़ों पर पक्षी अपने घोंसले बनाते हैं (आ. 16-17)। ये सभी परमेश्वर के द्वारा ऐसे जीवों की देखभाल के लिए दिए गए हैं। परन्तु यीशु चाहता है कि हम यह समझें कि हमारे लिए परमेश्वर की देखभाल, छोटी सृष्टि के लिए उसकी देखभाल से कहीं बढ़कर है। वह जो सृष्टि की सभी वस्तुओं के लिए सामान्य रूप से प्रावधान करता है, वही है, जिसे पिता कहने का सौभाग्य मुझे और आपको प्राप्त हुआ है। पक्षियों को “तुम्हारा स्वर्गीय पिता… खिलाता है” (आ. 26)! तुम्हारा स्वर्गीय पिता तुम्हारी सारी आवश्यकताओं को जानता है (आ. 32)!
बाद में उसी उपदेश में, यीशु उस प्रावधान के बीच जो हमारा स्वर्गीय पिता हमें देता है और उस प्रावधान के बीच जो सांसारिक पिता अपने बच्चों को देते हैं, समानता स्पष्ट करता है। मत्ती 7:7–11 में, यीशु कहता है,
“माँगो, तो तुम्हें दिया जाएगा; ढूँढ़ो तो तुम पाओगे; खटखटाओ, तो तुम्हारे लिए खोला जाएगा। क्योंकि जो कोई माँगता है, उसे मिलता है; और जो ढूँढ़ता है, वह पाता है; और जो खटखटाता है, उसके लिए खोला जाएगा। तुम में से ऐसा कौन मनुष्य है, कि यदि उसका पुत्र उससे रोटी माँगे, तो वह उसे पत्थर दे? या मछली माँगे, तो उसे साँप दे? अत: जब तुम बुरे होकर, अपने बच्चों को अच्छी वस्तुएँ देना जानते हो, तो तुम्हारा स्वर्गीय पिता अपने माँगने वालों को अच्छी वस्तुएँ क्यों न देगा?”
हम अपने स्वर्गीय पिता से सीखते हैं कि एक अच्छा पिता अपने बच्चों की आवश्यकताओं को पूरा करता है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि परमेश्वर के पास ऐसी कोई सीमाएँ नहीं हैं, जो उसकी सन्तानों के लिए उसकी आवश्यकताओं को पूरा करने में बाधा बन सके। दूसरी ओर, मानवीय पिताओं को अपने बच्चों की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए लगन से काम करना चाहिए। इस तरह की निरन्तर व्यवस्था आत्म-त्याग, देर से मिलने वाले सुख, कड़े परिश्रम और दृढ़ता की आदतों का परिणाम है। हालाँकि, यहाँ इस बात को ध्यान में रखना आवश्यक है कि कोई भी अनुशासन, आदत का निर्माण या कड़ा परिश्रम एक पिता के रूप में आपके परिवार की आवश्यकताओं को पूरा करने की आपकी क्षमता को पक्का नहीं कर सकता। आपका कड़ा परिश्रम और उनकी देखभाल हमेशा आपके स्वर्गीय पिता, परमेश्वर पर धीरज के साथ विश्वास रखने और निर्भर होने के साथ की जानी चाहिए, जो अकेले ही यीशु मसीह में अपनी महिमा के धन के अनुसार आपकी सभी आवश्यकताओं को पूरा करने में सक्षम है (फिलि. 2:19)।
परमेश्वर की पितृत्व वाली ताड़ना
क्योंकि मसीहियों को परमेश्वर ने पुत्रों के रूप में गोद लिया है, इसलिए हमें उससे यह अपेक्षा करनी चाहिए कि वह हमारे लाभ के लिए हमारी ताड़ना करे। ताड़ना के बारे में हमारी समझ को दण्ड वाले परिणामों तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए। यह सच है कि अच्छी ताड़ना में दण्ड वाले परिणाम शामिल होते हैं, परन्तु ताड़ना केवल दण्ड वाली नहीं होती। दण्ड वाले परिणामों और ताड़ना वाले परिणामों के बीच का अन्तर केवल मंशा किए गए परिणाम में मिलता है। दण्ड देने का मंशा किया हुआ परिणाम केवल प्रतिशोध — अर्थात् हिसाब बराबर करना है। ताड़ना देने का मंशा किया हुआ परिणाम ताड़ना दिए जाने वाले व्यक्ति को शिक्षा देना है। ताड़ना देने की मंशा उसे प्राप्त करने वाले के लाभ के लिए होती है।
इब्रानियों की पत्री का लेखक 12:5-11 में मसीहियों को इस सत्य की याद दिलाता है:
तुम ने पाप से लड़ते हुए उससे ऐसी मुठभेड़ नहीं की कि तुम्हारा लहू बहा हो; और तुम उस उपदेश को, जो तुम को पुत्रों के समान दिया जाता है, भूल गए हो:
“हे मेरे पुत्र, प्रभु की ताड़ना को हलकी बात न जान,
और जब वह तुझे घुड़के तो साहस न छोड़।
क्योंकि प्रभु जिससे प्रेम करता है,
उसकी ताड़ना भी करता है, और जिसे पुत्र बना लेता है, उसको कोड़े भी लगाता है।”
तुम दु:ख को ताड़ना समझकर सह लो; परमेश्वर तुम्हें पुत्र जानकर तुम्हारे साथ बर्ताव करता है। वह कौन सा पुत्र है जिसकी ताड़ना पिता नहीं करता? यदि वह ताड़ना जिसके भागी सब होते हैं, तुम्हारी नहीं हुई तो तुम पुत्र नहीं, पर व्यभिचार की सन्तान ठहरे। फिर जब कि हमारे शारीरिक पिता भी हमारी ताड़ना किया करते थे और हमने उनका आदर किया, तो क्या आत्माओं के पिता के और भी अधीन न रहें जिससे हम जीवित रहें। वे तो अपनी–अपनी समझ के अनुसार थोड़े दिनों के लिए ताड़ना करते थे, पर वह तो हमारे लाभ के लिए करता है, कि हम भी उसकी पवित्रता के भागी हो जाएँ। वर्तमान में हर प्रकार की ताड़ना आनन्द की नहीं, पर शोक ही की बात दिखाई पड़ती है; तौभी जो उसको सहते–सहते पक्के हो गए हैं, बाद में उन्हें चैन के साथ धर्म का प्रतिफल मिलता है।
इब्रानियों की पत्री का लेखक चाहता है कि ये मसीही अपनी कठिनाई को प्रभु की प्रेमपूर्ण, यद्यपि प्राय: कष्टदायक, ताड़ना के रूप में देखें, जो उनके साथ पुत्रों के समान व्यवहार इसलिए कर रहा है, क्योंकि वह एक प्रेमी पिता है। इस खण्ड से प्रभु की पितृत्व वाली ताड़ना के बारे में मिलने वाली कुछ बातों पर ध्यान दें। पहली बात, प्रभु केवल अपनी सन्तानों की ताड़ना करता है। सब लोगों को कष्ट का सामना करना पड़ता है। और सब लोग उस ईश्वरीय न्याय के अधीन है, जो एक दिन पूरा होगा। परन्तु परमेश्वर के द्वारा केवल उन्हीं लोगों की ताड़ना हो रही है, जो उसकी सन्तान हैं। जो उसकी सन्तान नहीं हैं, वे उसकी ताड़ना के लाभार्थी नहीं होंगे, बल्कि उसका दण्ड भुगतेंगे। यह पाठ हमें स्पष्ट रूप से बताता है कि “प्रभु जिससे प्रेम करता है, उसकी ताड़ना भी करता है” (आ. 6) और जिनकी ताड़ना नहीं हुई, वे “पुत्र नहीं, पर व्यभिचार की सन्तान ठहरे” (आ. 8)। यह खण्ड उन खण्डों में से एक है, जो हमें यह समझने में सहायता करता है कि पिता नाम केवल परमेश्वर को सृष्टिकर्ता के रूप में नाम देना नहीं है। इसके बजाय, एक महत्वपूर्ण अर्थ में पिता नाम उन लोगों के लिए आरक्षित है, जो परमेश्वर के साथ वाचा वाले रिश्ते में हैं, जो केवल उन लोगों के लिए सत्य है, जो विश्वास के द्वारा मसीह में मिलते हैं।
दूसरी बात, यह पाठ हमें याद दिलाता है कि हमारा स्वर्गीय पिता हमारी ताड़ना “हमारे लाभ के लिए करता है, कि हम भी उसकी पवित्रता के भागी हो जाएँ” (आ. 10)। यह बात अल्पकालिक रूप से “आनन्द की नहीं, पर शोक ही की बात” है, परन्तु जब हम “उसको सहते–सहते पक्के हो गए हैं” तो इसका परिणाम “चैन के साथ धर्म का प्रतिफल” होता है (आ. 11)। फिर से कहूँ तो ताड़ना केवल दण्डात्मक नहीं, बल्कि रचनात्मक होती है। यह उन लोगों को पक्का कर देती है, जो इसे प्राप्त करते हैं, क्योंकि इसकी मंशा हमारे लाभ की होती है, जिसे यह पाठ पवित्रता की कटनी के रूप में परिभाषित करता है।
तीसरी बात, यह पाठ स्पष्ट रूप से मानवीय पिताओं के ताड़ना वाले कार्य और स्वर्गीय पिता की ताड़ना के बीच की समानता को दर्शाता है। लेखक प्रश्न पूछता है, “वह कौन सा पुत्र है, जिसकी ताड़ना पिता नहीं करता?” वह आगे कहता है, “फिर जब कि हमारे शारीरिक पिता भी हमारी ताड़ना किया करते थे और हमने उनका आदर किया… वे तो अपनी–अपनी समझ के अनुसार थोड़े दिनों के लिए ताड़ना करते थे, पर वह तो हमारे लाभ के लिए करता है, कि हम भी उसकी पवित्रता के भागी हो जाएँ” (आ. 9-10)। शारीरिक पिताओं की ताड़ना हमारे स्वर्गीय पिता की प्रेमपूर्ण ताड़ना के अनुरूप है। ध्यान दें कि लेखक कैसे कहता है कि शारीरिक पिता “अपनी-अपनी समझ के अनुसार” ताड़ना करते थे, और वह इसकी तुलना स्वर्गीय पिता से करता है, जो “हमारे लाभ के लिए” हमारी ताड़ना करता है। इस तुलना का उद्देश्य मानवीय पितृत्व वाली ताड़ना के त्रुटिपूर्ण स्वभाव को उजागर करना है। मानवीय पिताओं के लिए ताड़ना करने का लक्ष्य हमारे स्वर्गीय पिता की ओर से होने वाली ताड़ना के लक्ष्य के समान होना चाहिए। परन्तु कभी-कभी मानवीय पिता इस लक्ष्य से चूक जाते हैं। अत: पवित्रशास्त्र यहाँ फिर से, मानवीय पिताओं को याद दिला रहा है कि उन्हें हमेशा सहायता के लिए स्वर्ग की ओर देखना चाहिए, और पितृत्व के कार्य में अनुग्रह के लिए हमेशा अपने सच्चे पिता पर निर्भर रहना चाहिए।
परमेश्वर की पितृत्व वाली विश्वासयोग्यता
आपका स्वर्गीय पिता इस बारे में प्रतिबद्ध है कि अपनी सन्तानों में आरम्भ किए गए भले कार्य को पूरा करे (फिलि. 1:6 को देखें)। वह विश्वासयोग्य है। इब्रानियों 2:10 कहता है, “क्योंकि जिसके लिए सब कुछ है और जिसके द्वारा सब कुछ है, उसे यही अच्छा लगा कि जब वह बहुत से पुत्रों को महिमा में पहुँचाए, तो उनके उद्धार के कर्ता को दु:ख उठाने के द्वारा सिद्ध करे।” इस आयत में, इब्रानियों की पत्री का लेखक हमें बताता है कि परमेश्वर प्रभु यीशु के मानवीय जीवन को — अर्थात् हमारे उद्धार के “मूल” को — दु:ख उठाने के द्वारा सिद्ध कर रहा था। हमें इस सिद्ध किए जाने को किसी दोषपूर्ण वस्तु को ठीक करने के रूप में नहीं सोचना चाहिए। इसके बजाय, सिद्धता शब्द यूनानी भाषा के “पूर्ण” शब्द से लिया गया है। मुख्य बात यह है कि अपने लोगों को बचाने के लिए परमेश्वर की सनातन योजना के द्वारा और उसके लिए निर्धारित लक्ष्य को पूरा करने के निमित्त, परमेश्वर के पुत्र को ऐसी मानवीय सीमाओं का अनुभव करना पड़ा, जिसमें शरीर और मन दोनों में उन्नति की आवश्यकता (लूका 2:42 से तुलना करें), परीक्षा की पीड़ा (इब्रा. 4:15 से तुलना करें), और मृत्यु में समाप्त होने वाले नश्वर जीवन के शारीरिक कष्ट, पीड़ा और लज्जा शामिल है (इब्रा. 12:1-3 से तुलना करें)। परमेश्वर ने दु:ख उठाने के माध्यम से यीशु को सिद्ध किया। परन्तु इसका कारण न भूलें! यीशु के लिए दु:ख उठाने के माध्यम से सिद्ध होना उपयुक्त क्यों था? इब्रानियों की पत्री का लेखक कहता है कि यह “बहुत से पुत्रों को महिमा में पहुँचाने” के लिए था।
प्रभु यीशु का देहधारण, जीवन, मृत्यु और पुनरुत्थान व्यर्थ नहीं थे। “उनके उद्धार के कर्ता” के दु:ख उठाने के कारण, हमारा स्वर्गीय पिता बहुत से पुत्रों को महिमा में पहुँचा रहा है। वह आपको आपके संसाधनों पर नहीं छोड़ देता है। वह आपको आपकी पीड़ा में नहीं छोड़ता। आपका स्वर्गीय पिता, जिसने उद्धार के कर्ता को दु:ख उठाने के माध्यम से सिद्ध किया, आपको भी दु:ख उठाने के माध्यम से सिद्ध करेगा। वह विश्वासयोग्य रहकर आपको सुरक्षित रूप से महिमा में पहुँचाएगा।
आदि से लेकर अन्त तक हमारे प्रति हमारे स्वर्गीय पिता की विश्वासयोग्यता मानवीय पितृत्व में एक उपयुक्त सादृश्यता मिलती है। सबसे पहली बात, अपनी सन्तानों के प्रति परमेश्वर की विश्वासयोग्यता में एक लक्ष्य, अर्थात् उनके प्रति उसके सभी प्रेमपूर्ण कार्यों और देखभाल में एक उद्देश्य शामिल है। इसी रीति से, मानवीय पिताओं को भी अपने बच्चों के लिए एक लक्ष्य रखना चाहिए, जिसकी ओर वे उनका नेतृत्व कर रहे हैं और उनकी सेवा कर रहे हैं। मेरे कहने का अर्थ यह नहीं है कि मानवीय पिताओं को अपने बच्चों के जीवनों के सांसारिक विवरणों की योजना बनानी चाहिए, जैसे कि वे कौन सी प्रतिभाएँ विकसित करेंगे और कौन से व्यवसाय अपनाएँगे। इसके बजाय, मेरे कहने का अर्थ यह है कि मानवीय पिताओं को अपने बच्चों के लिए परमेश्वर के लक्ष्य को अपने बच्चों के लिए अपने लक्ष्य के रूप में अपनाना चाहिए। मानवीय पिताओं को लक्ष्य-उन्मुख होना चाहिए, और इसका लक्ष्य उनके बच्चों का समग्र आत्मिक कल्याण, अर्थात् उनकी पवित्रता और अन्त में महिमा में प्रवेश करना होना चाहिए। दूसरी बात परमेश्वर बिना रुके तब तक कार्य करता है, जब तक कि लक्ष्य पूरा न हो जाए। ठीक उसी रीति से, विश्वासयोग्य मानवीय पिता अपने बच्चों के उद्धार और महिमा के मार्ग पर पवित्रता में उनके आजीवन वृद्धि और विकास के लिए संघर्ष करना, कार्य करना, अनुनय करना, उपवास रखना और प्रार्थना करना नहीं छोड़ेंगे।
परमेश्वर के साथ आरम्भ करने का महत्व
मुझे आशा है कि परमेश्वर के पितृत्व से सीखने के संदर्भ में इस चर्चा को प्रस्तुत करने से आपको मानवीय पितृत्व के महत्व और महिमा का अनुभव करने में सहायता मिलेगी। पितृत्व एक योग्यता है — अर्थात् एक बुलाहट है — जो न केवल कोरम देओ, अर्थात् परमेश्वर की उपस्थिति में, और सब देई, अर्थात् परमेश्वर के अधिकार के अधीन, बल्कि इमिटाटियो देई, अर्थात् परमेश्वर का अनुकरण करके भी किया जाता है। वह परमेश्वर ही है, जिसने मनुष्यों को अपने स्वरूप के रूप में रचा और मनुष्यों को उस योग्यता को उस तरीके से पूरा करने की विशेष सम्भावना दी, जो सम्भवत: उस सबसे बुनियादी और घनिष्ठ नाम — पिता — से मेल खाता है, जिससे विश्वासी परमेश्वर को सम्बोधित करते हैं।
चर्चा एवं मनन:
- परमेश्वर का पितृत्व वाला अधिकार, प्रावधान, शिक्षा और चेतावनी, और विश्वासयोग्यता मानवीय पितृत्व को किन तरीकों से प्रभावित करती है?
- क्या आप कुछ ऐसे मानवीय पिताओं के बारे में सोच सकते हैं, जो इनके अच्छे उदाहरण हैं?
3 भक्ति में प्रगति के द्वारा पितृत्व की तैयारी करना
सही प्रकार का पिता होना, सही प्रकार का पुरुष होने से अलग बात है। चाहे आप एक ऐसे जवान हों, जो एक दिन पिता बनने की आशा रखता है, या वर्तमान समय में एक ऐसे पिता हों, जो इस मार्ग पर चलने के लिए प्रोत्साहित और निर्देशित होने की आशा रखता है, तो मुझे आशा है कि यह अगला भाग आपको उन गुणों के कुछ विचार प्रदान करेगा, जो एक भक्त पुरुष की विशेषताएँ हैं।
भक्ति क्या है?
हिन्दी भाषा के एक शब्द के रूप में, भक्ति, दो शब्दों से, अर्थात् परमेश्वर और उसके समान होने से मिलकर बना है। इस प्रकार, कोई व्यक्ति यह निष्कर्ष निकाल सकता है कि भक्ति का अर्थ “परमेश्वर के समान होना” है। एक सीमित तरीके से, यह विचार निश्चित रूप से इसके अर्थ में मिल जाता है। यद्यपि, भक्ति शब्द केवल उन सीमित तरीकों से कहीं अधिक बड़ी बातों को समाहित करता है, जिनसे हम “परमेश्वर के समान” होते हैं। इसमें वे सभी तरीके शामिल हैं, जिनसे हमें पवित्र आत्मा की सहायता से परमेश्वर के वचन का आनन्दपूर्वक पालन करते हुए एक आदर्श व्यक्ति के रूप में जीवन बिताना है। संक्षेप में कहें तो भक्ति को पवित्रशास्त्र की शिक्षा के अनुसार विश्वासयोग्यता के साथ मसीही जीवन जीने के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। सिद्ध भक्ति एक ऐसा लक्ष्य है, जिसे हम इस जीवन में कभी पूरी तरह प्राप्त नहीं कर पाएँगे, परन्तु यह एक ऐसी बात है, जिसके लिए हम निरन्तर प्रयत्न करते रहते हैं।
भक्ति में साधना की आवश्यकता
प्रेरित पौलुस ने तीमुथियुस से कहा,
“पर अशुद्ध और बूढ़ियों की सी कहानियों से अलग रह; और भक्ति की साधना कर। क्योंकि देह की साधना से कम लाभ होता है, पर भक्ति सब बातों के लिए लाभदायक है, क्योंकि इस समय के और आनेवाले जीवन की भी प्रतिज्ञा इसी के लिए है। यह बात सच और हर प्रकार से मानने के योग्य है। क्योंकि हम परिश्रम और यत्न इसी लिए करते हैं कि हमारी आशा उस जीवते परमेश्वर पर है, जो सब मनुष्यों का और निज करके विश्वासियों का उद्धारकर्ता है। इन बातों की आज्ञा दे और सिखाता रह।” (1 तीमु. 4:7-11) इस खण्ड में पाए जाने वाले केवल दो मुख्य बिंदुओं पर ध्यान दें। पहला बिंदु यह है कि भक्ति में प्रगति करना कोई ऐसी बात नहीं है, जो अपने आप ही हो जाती है। आपको “भक्ति की साधना” करनी होगी (आ. 7)। “साधना” के लिए जिस यूनानी भाषा के शब्द का अनुवाद किया गया है, वह मुख्य रूप से उन धावकों के लिए उपयोग किया जाता था, जो गहन खेलकूद की प्रतियोगिताओं के लिए प्रशिक्षण लेते थे। खेलकूद का प्रदर्शन और कौशल अपने आप ही विकसित और बेहतर नहीं होता। इसके बजाय, प्रतियोगिता में उत्कृष्टता प्राप्त करने के लिए धावक अपने कौशल को विकसित करने और अपनी शक्ति बढ़ाने पर समय लगाते हैं और ध्यान देते हैं। यदि कोई खिलाड़ी प्रशिक्षण लेना बन्द कर देता है, और कच्ची प्रतिभा या पिछले प्रशिक्षण के प्रयासों पर भरोसा करने का चुनाव करता है, तो ऐसा होगा कि वह सुधरेगा भी नहीं, बल्कि असल में और भी बुरा हो जाएगा। उसकी शक्ति, धीरज और कौशल, सभी समय के साथ कम होते जाएँगे। एक खिलाड़ी के लिए स्थिर रहकर टिके रहना सम्भव नहीं होता। जैसा खिलाड़ी के लिए होता है, वैसा ही एक मसीही के लिए भी होता है। भक्ति एक ऐसी बात है, जिसका सक्रिय रूप से और सोच-समझकर, यहाँ तक कि कभी-कभी त्याग के साथ और कष्ट सहते हुए भी अनुसरण किया जाना चाहिए, यही कारण है कि पौलुस कहता है कि “हम परिश्रम (कड़ी मेहनत) और यत्न (पीड़ा) इसी लिए (भक्ति के लिए) करते हैं” (आ. 10)।
दूसरा बिंदु यह है कि दूसरों को भक्ति करना सिखाने हेतु स्वयं के लिए भक्ति की साधना करना एक पूर्वापेक्षा है। पौलुस तीमुथियुस से कहता है कि बताने से पहले वह स्वयं साधना करे (आ. 7) अर्थात् “इन बातों की आज्ञा दे और सिखाता रह” (आ. 11)। केवल इतना ही नहीं, बल्कि पौलुस तीमुथियुस को याद दिलाता है कि वह उसे सिखाने से पहले स्वयं इन बातों का अभ्यास करता है। पौलुस लिखता है कि “हम परिश्रम और यत्न इसी लिए करते हैं” (आ. 10)। पितृत्व के लिए इस अवलोकन की प्रासंगिकता स्पष्ट है। पिताओं को अपने बच्चों को प्रभु के मार्गों की शिक्षा देनी चाहिए (इफि. 6:4)। इसका अर्थ है कि पिताओं को भक्ति की “आज्ञा देनी है और सिखाना है”, परन्तु भक्ति करना सिखाने के लिए भक्ति की साधना एक पूर्वापेक्षा है।
भक्ति की साधना के लिए व्यावहारिक कदम
आप सोच रहे होंगे, “स्वयं को सक्रिय रूप से भक्ति की साधना में लगाने के लिए मैं कौन से व्यावहारिक कदम उठा सकता हूँ?” आगे व्यावहारिक प्रशिक्षण अभ्यासों की एक सूची दी गई है। उनमें से प्रत्येक अभ्यास एक आदत है, जिसे भक्ति में प्रगति करने के लिए आपके जीवन में विकसित करने की आवश्यकता है। यह सूची सम्पूर्ण नहीं है, बल्कि प्रतिनिधि है। भक्ति की साधना में इस सूची से अधिक बातें शामिल हैं, परन्तु इसमें भी कम बातें नहीं मिलतीं। प्रत्येक बात के बाद की चर्चा व्यापक नहीं है, और नीचे सूचीबद्ध प्रत्येक बात के सम्बन्ध में अधिक विवरण देने के लिए द मेंटरिंग प्रोजेक्ट अर्थात् परामर्श परियोजना से लिए गए अन्य संसाधन उपलब्ध हैं।
- भक्ति की साधना में परमेश्वर के वचन का नियमित सेवन करना शामिल होता है।
भजन संहिता 119:9 में, भजनकार पूछता है, “जवान अपनी चाल को किस उपाय से शुद्ध रखे?” और वह उत्तर में कहता है, “तेरे वचन के अनुसार सावधान रहने से।” वह आगे 11 वीं आयत में कहता है, “मैंने तेरे वचन को अपने हृदय में रख छोड़ा है, कि मैं तेरे विरुद्ध पाप न करूँ।” क्या आप एक धर्मी पुरुष बनना चाहते हैं, जिससे कि आप एक धर्मी पिता के रूप में प्रभु और अपने परिवार की सेवा कर सकें? तो आपको वचन का पालन करने वाला पुरुष होना होगा!
हर दिन आपके मन में सूचनाओं, अपीलों, विज्ञापनों और दार्शनिकताओं की बाढ़ विभिन्न माध्यमों से आती है — और उस बाढ़ के फाटक सोशल मीडिया, प्रमुख मीडिया, संगीत, फिल्में, पुस्तकें, बातचीत, ई-मेल, सूचनापट्ट और तस्वीरें हैं। यह बाढ़, अधिकांश रूप से, ईश्वरीय रूप से प्रकट सत्य को प्रतिबिम्बित नहीं करती, बल्कि उसके विपरीत होती है। बाढ़ उस भूमि को आकार देती है, जिस पर वह बहती है। यह भविष्य में पानी के प्रवाह के लिए नाले बनाती है; यह खेती वाली भूमि का क्षरण करती है; यह संरचनाओं को ध्वस्त कर देती है। चाहे आपको इसका एहसास हो या न हो (और शायद विशेष रूप से यदि आपको इसका एहसास ही न हो), सन्देशों की यह बाढ़ आपके मन को आकार दे रही है। यदि आप सांसारिक सन्देशों का ईश्वरीय सन्देशों से सक्रिय रूप से विरोध नहीं कर रहे हैं, तो भक्ति की साधना करने की आपकी क्या आशा है? केवल पवित्रशास्त्र ही आपके मन को, आपके सम्पूर्ण व्यक्तित्व को, परमेश्वर के वचन से भर सकता है (2 तीमु. 3:16-17 को देखें)। प्रतिदिन पवित्रशास्त्र पर समय और ध्यान देकर, आप सत्य के अनुसार प्रभावों के प्रवाह को निर्देशित करने के लिए सही प्रकार की नालियाँ, यहाँ तक कि नदियाँ भी बना रहे हैं।
पवित्रशास्त्र का सेवन करना कई तरीकों से हो सकता है। इसका सबसे आसान तरीका है, बाइबल उठाकर उसे पढ़ना। क्या आपने कभी पूरी बाइबल पढ़ी है? औसत पढ़ने की गति से, अधिकतर लोग प्रतिदिन बीस मिनट से भी कम समय में पढ़ने के द्वारा एक वर्ष में पूरी बाइबल को पढ़ सकते हैं। मैं सिफारिश करूँगा कि आप एक अच्छी पठन योजना बनाएँ, जो आपको प्रतिदिन पूरी बाइबल पढ़ने के लिए निर्देशित करे। पवित्रशास्त्र का सेवन करने का एक और तरीका है, उसे सुनना। मोबाइल ऐप्स में अक्सर पवित्रशास्त्र के ऑडियो संस्करण मिलते हैं। यह एक ऐसा तरीका है, जिससे आप गाड़ी चलाते समय, सोने जाते समय, या और कहीं भी, जहाँ आप सुनना चाहें, पवित्रशास्त्र को अपने मन में भर सकते हैं। पवित्रशास्त्र के किसी खण्ड को कण्ठस्थ करते समय यह तरीका विशेष रूप से उपयोगी होता है। पवित्रशास्त्र का सेवन करने का एक और तरीका है, उसके खण्डों को कण्ठस्थ करना और उन्हें सोच-समझकर और ध्यान से स्वयं के लिए दोहराना। अन्त में, आप सार्वजनिक रूप से आराधना सभाओं में पवित्रशास्त्र के पाठ और उपदेश के माध्यम से उसका सेवन कर सकते हैं और आपको ऐसा करना चाहिए।
- भक्ति की साधना में आपकी स्थानीय कलीसिया की सामूहिक आराधना में नियमित रूप से उपस्थित होना शामिल है।
इब्रानियों 10:24-25 कहता है, “और प्रेम, और भले कामों में उस्काने के लिए हम एक दूसरे की चिन्ता किया करें, और एक दूसरे के साथ इकट्ठा होना न छोड़ें, जैसे कि कितनों की रीति है, पर एक दूसरे को समझाते रहें; और ज्यों ज्यों उस दिन को निकट आते देखो त्यों–त्यों और भी अधिक यह किया करो।” इब्रानियों की पत्री का लेखक मसीहियों को बताता है कि एक-दूसरे को प्रोत्साहित करने और एक-दूसरे को भक्ति की ओर प्रेरित करने के उद्देश्य से इकट्ठा होना परमेश्वर के लोगों का एक अनिवार्य अभ्यास है। किसी स्थानीय कलीसिया में नियमित रूप से आराधना में उपस्थित होना निश्चित रूप से आपको मसीही नहीं बनाता। परन्तु एक धर्मी मसीही निश्चित रूप से किसी स्थानीय कलीसिया की आराधना में उपस्थित होता है।
यदि आप किसी ऐसी स्थानीय कलीसिया के सदस्य नहीं हैं, जो बाइबल में विश्वास करती है, उसकी शिक्षा देती है और उसका पालन करती है, तो यह आपके मसीही जीवन में एक बड़ी कमी है और आपकी भक्ति में प्रगति में बाधा है। इस प्रकार, यह एक पिता के रूप में आपकी विश्वासयोग्यता में बाधा बनेगी। एक विश्वासयोग्य कलीसिया खोजें, और उसका सदस्य बनने के लिए उनके पदचिन्हों का अनुसरण करें। यदि आप किसी स्थानीय कलीसिया के भाग हैं, तो अपने मसीही जीवन के लिए उस सम्बन्ध के महत्व को कम न आँकें। प्रभु यीशु मसीह, अपने नाम पर परमेश्वर के लोगों के इकट्ठे होने में एक विशेष तरीके से अपनी उपस्थिति प्रकट करता है (मत्ती 18:20)। यदि आप भक्ति (और पितृत्व) को गम्भीरता से लेना चाहते हैं, तो किसी स्थानीय कलीसिया के प्रति समर्पित हो जाएँ।
- भक्ति की साधना में नियमित प्रार्थना करना शामिल है।
जब पौलुस ने थिस्सलुनीकियों से “निरन्तर प्रार्थना में लगे रहो” कहा (1 थिस्स. 5:17), तो वह यह सलाह नहीं दे रहा था कि वे हर समय प्रार्थना करने की अवस्था में रहें। इसके बजाय, वह उन्हें नियमित प्रार्थना करते रहने की सलाह दे रहा था। हम उसके शब्दों को इस प्रकार समझ सकते हैं कि “कभी भी प्रार्थना करना न छोड़ें।” पौलुस जानता था कि वह दुष्ट जन, परमेश्वर के लोगों को इस सीमा तक घेरना चाहता है कि वे थक जाएँ और सांसारिक हो जाएँ, जिससे उनकी सतर्कता समाप्त हो जाए। भक्ति के क्षीण होने के आरम्भिक लक्षणों में से एक प्रार्थना न करना है, और यह निश्चित रूप से सेवा में प्रभावहीनता का अग्रदूत है। यदि आप स्वयं को भक्ति की साधना में लगाना चाहते हैं, तो आपको अनुशासित और नियमित प्रार्थना करने वाला व्यक्ति होना होगा।
प्रार्थनाशील व्यक्ति होने का अर्थ स्वर्गीय महिमा की वास्तविकता और वर्तमान युग की बुराई के बारे में, जिसमें हम रहते हैं, एक योद्धा की मानसिकता रखना है। इस बात में पवित्रशास्त्र बहुत स्पष्ट है कि हमारे विनाश पर तुली दुष्ट शक्तियों के विरुद्ध युद्ध वाला जीवन ही मसीही जीवन है (इफि. 6:10-18 और 1 पत. 5:8 को देखें)। प्रभावी और सार्थक प्रार्थनाएँ वे लोग ही करते हैं, जो इस युद्ध की तात्कालिकता को समझते हैं। याकूब 4:2ब-3 कहता है, “तुम्हें इसलिए नहीं मिलता कि माँगते नहीं। तुम माँगते हो और पाते नहीं, इसलिए कि बुरी इच्छा से माँगते हो, ताकि अपने भोग–विलास में उड़ा दो।” इस खण्ड पर टिप्पणी करते हुए, जॉन पाइपर कहते हैं:
एक विश्वासी के हाथों में प्रार्थना के विफल होने का सबसे बड़ा कारण यह है कि वे युद्ध के समय वाले वॉकी-टॉकी को घरेलू इंटरकॉम में बदलने का प्रयत्न करते हैं। जब तक आप यह नहीं मान लेते कि जीवन युद्ध है, तब तक आप यह नहीं जान सकते कि किस लिए प्रार्थना करनी है। प्रार्थना युद्ध के समय वाले मिशन की पूर्ति के लिए है।1
एक धर्मी पुरुष और पिता होने के लिए आपको एक ऐसा व्यक्ति बनने की आवश्यकता पड़ेगी जो तत्पर होकर और बिना रुके प्रार्थना करे।
- पुरुषों के रूप में भक्ति की साधना में बाइबल के द्वारा आकार दिए गए पुरुषत्व का विकास शामिल है।
लिंग और कामुकता के सम्बन्ध में भारी भ्रम और भ्रांति के युग में, “बाइबल के द्वारा आकार दिया गया पुरुषत्व” जैसे शब्द को कुछ परिभाषा की आवश्यकता है। इस शब्द से मेरा तात्पर्य उन चारित्रिक गुणों और व्यवहार के प्रतिमानों से है, जो विशेष रूप से पुरुषों के लिए उपयुक्त हैं, जैसा पवित्रशास्त्र में सिखाया गया है। जो पुरुष भक्ति के उद्देश्य से स्वयं को साधना में लगाता है, वह जानबूझकर उन चारित्रिक गुणों और व्यवहार के आदर्शों को विकसित करने का प्रयत्न करेगा, जो एक पुरुष के रूप में उसे सौंपी गई भूमिकाओं के लिए उपयुक्त हों।
नेतृत्व करना एक ऐसा ही गुण/प्रतिरूप है। क्योंकि पवित्रशास्त्र सिखाता है कि पुरुषों के लिए परमेश्वर की आदर्श रचना यह है कि वे पति और पिता बनें (उत्प. 1:28 और 2:24), और क्योंकि परमेश्वर चाहता है कि विवाहित पुरुष अपनी पत्नियों (इफि. 5:22-23) और बच्चों (इफि. 6:1-4) का नेतृत्व उन रिश्तों के लिए उपयुक्त तरीकों से करें, इसलिए सभी पुरुषों को नेतृत्व करने का कौशल विकसित करना चाहिए, जिससे कि वे अपने घरों में व्यवहार के उस आदर्श का प्रभावी रूप से अभ्यास कर सकें। इसके अतिरिक्त, क्योंकि परमेश्वर ने पुरुषों को सृष्टि की देखभाल और संवर्धन में प्रधानता का उपयोग करने के लिए रचा है (उत्प. 2:15-16), इसलिए पुरुषों के लिए विभिन्न तरीकों से नेतृत्व करने के कौशल विकसित करना और उनका उपयोग करना सही और अच्छा है।
इसके अतिरिक्त, धर्मी पुरुषों को अपनी नेतृत्व सम्बन्धी जिम्मेदारियों को पूरा करने में आत्म-संयम और सौम्यता के अनुशासन विकसित करने चाहिए। इस पतित संसार में रहने वाले सभी पुरुषों का स्वभाव भ्रष्ट है, जो उन्हें दबंग प्रभुता की ओर ले जाता है — जो कि व्यक्तिगत् लाभ के लिए दूसरों पर नियंत्रण पाने के लिए अपनी अधिक शक्ति का उपयोग करना है। नेतृत्व करने का यह बाइबल आधारित तरीका नहीं है। यीशु चेतावनी देता है कि अन्यजाति राष्ट्रों के अगुवे अपने अधीन लोगों पर “प्रभुता” करते हैं। हालाँकि, परमेश्वर के राज्य के नागरिक अपने अधीन लोगों के सर्वोत्तम हितों का पालन करते हुए, स्वयं भारी मूल्य चुकाकर भी, नेतृत्व करते हैं। सभी मसीहियों में संयम और नम्रता के गुण होने चाहिए (गला. 5:22-23), परन्तु विशेष रूप से पुरुषों को अपने अधिकार का उपयोग करते समय आत्मा के इन फलों का उपयोग करना चाहिए, जिससे कि उनका नेतृत्व करना सांसारिक प्रभुता न हो, बल्कि भक्ति से भरी हुई, लक्ष्य-उन्मुख, सेवकाई वाला हो।
- भक्ति की साधना में नियमित रूप से अंगीकार करना और पश्चाताप करना शामिल है।
हमें सिद्धता के लिए बुलाया गया है (मत्ती 5:48)। हम इस वर्तमान युग में सिद्धता इसलिए प्राप्त नहीं कर सकते, क्योंकि जब तक हम यीशु के आगमन् पर महिमा नहीं पा लेते, तब तक हमारे हृदयों से पाप पूरी तरह से समाप्त नहीं होगा। वर्तमान समय में, हमें धार्मिकता की ओर निर्देशित करने वाले आत्मा के कार्य, और हमारी पापी देह की शक्ति, जो हमें दुष्टता की ओर धकेलती है, इनके बीच हमारे भीतर एक युद्ध चल रहा है (रोमि. 7:22-23 और गला. 5:16-23 को देखें)।
यद्यपि हम जानते हैं कि हम वर्तमान युग में सिद्धता प्राप्त नहीं कर सकते, फिर भी हमें इसकी लालसा करनी चाहिए और इसके लिए प्रयत्न करना चाहिए। फिलिप्पियों 3:12-14 कहता है:
“यह मतलब नहीं कि मैं पा चुका हूँ, या सिद्ध हो चुका हूँ; पर उस पदार्थ को पकड़ने के लिए दौड़ा चला जाता हूँ, जिसके लिए मसीह यीशु ने मुझे पकड़ा था। हे भाइयों, मेरी भावना यह नहीं कि मैं पकड़ चुका हूँ; परन्तु केवल यह एक काम करता हूँ कि जो बातें पीछे रह गई हैं उनको भूल कर, आगे की बातों की ओर बढ़ता हुआ, निशाने की ओर दौड़ा चला जाता हूँ, ताकि वह इनाम पाऊँ जिसके लिए परमेश्वर ने मुझे मसीह यीशु में ऊपर बुलाया है।”
आपके आत्मिक विकास और प्रगति की सिद्धता की ओर “दौड़ने” और “आगे की ओर बढ़ने” का एक बड़ा हिस्सा पाप के प्रति उचित प्रतिक्रिया शामिल करता है। मसीही पाप करते हैं। परन्तु सच्चे मसीही पवित्र आत्मा के दयालु, यद्यपि कष्टदायी, दृढ़ विश्वास का अनुभव करते हैं, जो हमें हमारे पापों के बारे में सच्चाई बताता है और हमें पश्चाताप की ओर ले जाता है। पहला यूहन्ना 1:8-9 इस सम्बन्ध में शिक्षाप्रद है: “यदि हम कहें कि हम में कुछ भी पाप नहीं, तो अपने आप को धोखा देते हैं, और हम में सत्य नहीं। यदि हम अपने पापों को मान लें, तो वह हमारे पापों को क्षमा करने और हमें सब अधर्म से शुद्ध करने में विश्वासयोग्य और धर्मी है।” जो व्यक्ति स्वयं को भक्ति की साधना में लगा रहा है, वह पाप स्वीकार करने की आदत बना लेता है।
युवावस्था में जब मैंने पहली बार नार्निया का इतिहास पुस्तक पढ़ी, तो मुझ पर उसका जो सबसे गहरा प्रभाव पड़ा, उसे मैं कभी नहीं भूलूँगा। कई अवसरों पर, वह विशाल सिंह असलान, पेवेन्सी के बच्चों में से किसी एक को उसके किसी गलत काम के लिए कोमलता के साथ, परन्तु दृढ़ता से डाँटता था। अनिवार्य रूप से वह बच्चा कोई न कोई बहाना बना देता था, कि मानो वह पापी कार्य उसकी गलती नहीं थी। या शायद, कहानी से कोई विवरण हटा दिया जाता था, जिससे कि पाप वास्तविकता से अधिक सभ्य और कम स्वार्थी लगे। असलान हमेशा धीमी गर्जन के साथ उत्तर देता था। वह— एडमण्ड, लूसी, सुज़ैन, पीटर — चाहे कोई भी हो, वे हमेशा सन्देश समझेंगे। अपने पाप के बारे में पूरी सच्चाई बताएँ। उसे वही कहें, जो वह है। तभी आप अपनी क्षमा में सच्चा आनन्द पा सकते हैं।
भक्ति की साधना की आदतों को विकसित करने वाला एक धर्मी व्यक्ति बनना, भविष्य में पिता बनने या अभी एक बेहतर पिता बनने की तैयारी का एक ऐसा सबसे महत्वपूर्ण काम है, जो आप कर सकते हैं। हे पुरुषों, स्वयं को भक्ति की साधना में लगाओ।
चर्चा एवं मनन:
- क्या आत्मिक अनुशासन आपके जीवन का एक नियमित भाग हैं? किन तरीकों से आप इन आदतों में उन्नति कर सकते हैं?
- शिष्यत्व में उन्नति करने का एक सहायक तरीका जवाबदेही के माध्यम से होता है। वह कौन है, जिसे आप इन बातों के लिए आपको जवाबदेह बनाए रखने में सहायता करने हेतु आमंत्रित कर सकते हैं?
4 विश्वासयोग्य पिता के रूप में प्रधानता का अभ्यास करना
घर के भीतर पारिवारिक रिश्तों के बारे में सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र में सबसे विस्तृत निर्देश इफिसियों 5:18–6:4 में मिलता है। 5:18 में, पौलुस इफिसियों की कलीसिया को “आत्मा से परिपूर्ण” होने का निर्देश देता है। यह— आत्मा से परिपूर्ण — वाक्यांश लूका और प्रेरितों के काम में पाए जाने वाले समान वाक्यांशों की तरह, एक ऐसी स्थिति को संदर्भित करता है, जिसमें एक मसीही पवित्र आत्मा के प्रति समर्पित होता है और हर बात में मसीह के ऊँचे पर उठाए जाने के लिए पवित्रशास्त्र की स्पष्ट शिक्षा के अनुसार अपने जीवन को व्यवस्थित करता है। पौलुस के लिए, “आत्मा से परिपूर्ण” होने की आज्ञा, गलातियों 5:16–23 में पाई जाने वाली “आत्मा के अनुसार चलो” की आज्ञा की पर्यायवाची प्रतीत होती है। मसीहियों को आत्मा से परिपूर्ण होने की आज्ञा देने के बाद, पौलुस इस प्रकार से परिपूर्ण होने के प्रभाव की कई व्याख्याएँ देता है। जो लोग आत्मा से परिपूर्ण हैं, वे परमेश्वर के प्रति आराधना के भाव में रहते हैं (आ. 19), उसके प्रति कृतज्ञ होते हैं (आ. 20), तथा अधिकार और अधीनता के उस ढाँचागत सम्बन्धों के अनुसार दूसरों के अधीन रहने को तत्पर रहते हैं, जिसे परमेश्वर ने मानवीय सामाजिक व्यवस्था में, विशेष रूप से घराने में बनाया है (आ. 21)। आयत 22 से आरम्भ करते हुए, पौलुस घरानों के लिए अपने विशिष्ट निर्देश देता है। वह पति-पत्नी के सम्बन्ध (आ. 22-33) के निर्देशों से आरम्भ करता है और उसके तुरन्त बाद माता-पिता-सन्तान के सम्बन्ध (आ. 6:1-4) का वर्णन करता है। पुरुष को जिस प्राथमिक उपाधि से प्रेरित पौलुस सम्बोधित करता है, वह “सिर” अर्थात् मुखिया है। पौलुस कहता है, “पति पत्नी का सिर है, जैसे कि मसीह कलीसिया का सिर है” (आ. 23)। बाद में, पौलुस घराने के सिर को उसके विशिष्ट कार्य में बच्चेवाले के रूप में सम्बोधित करता है (आ. 6:4), परन्तु प्रधानता के सम्बन्ध में इस खण्ड में पौलुस के सभी निर्देश पितृत्व के लिए प्रासंगिक हैं।
प्रेमपूर्ण सेवकाई के रूप में पितृत्व वाली प्रधानता
पौलुस पत्नियों को निर्देश देता है कि “अपने अपने पति के ऐसे अधीन रहो जैसे प्रभु के” (इफि. 5:22) क्योंकि पति पत्नी का सिर है (आ. 23)। अधीनता के सम्बन्ध में पत्नियों को दिया गया निर्देश स्पष्ट करता है कि प्रधानता का पद अधिकार रखने और नेतृत्व करने का पद है। हालाँकि, घराने के सिर के रूप में एक अगुवे होने के कार्य के बारे में बात करने से पहले, हमें इस खण्ड में पौलुस के द्वारा पतियों को दिए गए सटीक आदेश पर विचार करने की आवश्यकता है।
यह पढ़ने के बाद कि पत्नी को अपने पति के, जो सिर है, अधीन रहना है, हम शायद यह पढ़ने की अपेक्षा करें, “हे पतियों, अपनी अपनी पत्नियों का नेतृत्व करो” या कोई अन्य शब्दावली जो प्रधानता के अधिकार को स्पष्ट करती हो। परन्तु हमें ऐसा कुछ नहीं मिलता! इसके बजाय, पौलुस कहता है, “हे पतियों, अपनी अपनी पत्नी से प्रेम रखो।” जबकि अधिकार को मान लिया गया है, तो प्रेम रखने का यह निर्देश पतियों को दिए गए पौलुस के आदेश का केन्द्र बिंदु है। कुछ लोगों ने इससे यह तर्क देने का प्रयत्न किया है कि प्रधानता का अर्थ, अधिकार रखना या नेतृत्व करना नहीं होना चाहिए। परन्तु यह इस खण्ड और पति-पत्नी के बीच के रिश्ते पर बाइबल की बाकी की शिक्षाओं को समझने में विफलता है।
पौलुस पतियों को प्रेम रखने का आदेश इसलिए नहीं देता, क्योंकि वह पति की भूमिका में अधिकार रखने और नेतृत्व करने की धारणा को अस्वीकार कर रहा है (अन्यथा, वह पत्नियों को अधीन रहने और बच्चों को आज्ञा मानने के लिए क्यों कहता?), बल्कि इसलिए देता है, क्योंकि उसने यीशु से सीखा है कि सच्चा, ईश्वरीय नेतृत्व कैसा होता है। ईश्वरीय नेतृत्व का अर्थ यह नहीं है कि आदेश दे-देकर वह अगुवे से अपनी बात मनवाए। ईश्वरीय नेतृत्व का अर्थ सेवकाई करना है, जिससे एक विश्वासयोग्य अगुवा हमेशा अपने अधीन लोगों के सर्वोत्तम हित के लिए निर्णय लेगा और निर्देश जारी करेगा।
यीशु का उदाहरण सबसे स्पष्ट रूप से आयत 25 में बताया गया है, जहाँ पौलुस कहता है कि पतियों को अपनी पत्नियों से वैसे ही प्रेम रखना चाहिए, “जैसा मसीह ने भी कलीसिया से प्रेम करके अपने आप को उसके लिए दे दिया।” मसीह ने अपने शिष्यों के लिए अपना जीवन देकर प्रभु और उन पर सर्वोच्च अधिकारी होना बन्द नहीं किया। परन्तु उसने उन्हें यह अवश्य दिखाया कि कैसे — अपना प्राण देकर — विश्वासयोग्यता के साथ अधिकार का उपयोग किया जाए। यीशु “इसलिए नहीं आया कि उसकी सेवा टहल की जाए, परन्तु इसलिए आया कि आप सेवा टहल करे, और बहुतों की छुड़ौती के लिए अपने प्राण दे” (मत्ती 20:28)।
घर के सिर अर्थात् मुखिया का प्रेमपूर्ण नेतृत्व बच्चों के साथ पिता के रिश्ते पर भी लागू होता है। इफिसियों 6:1 में, पौलुस बच्चों से कहता है कि, “प्रभु में अपने माता-पिता के आज्ञाकारी बनो।” ध्यान दें कि बच्चों को माता और पिता दोनों की आज्ञा मानने का आदेश दिया गया है, जो इस बात को दर्शाता है कि पालन-पोषण के कार्य को पति-पत्नी दोनों के संयुक्त प्रयत्न के रूप में बनाया गया है। फिर भी, पिताओं को ही सकारात्मक निर्देश दिया गया है कि माता-पिता बच्चों का नेतृत्व कैसे करें। पौलुस लिखता है, “हे बच्चेवालों, अपने बच्चों को रिस न दिलाओ, परन्तु प्रभु की शिक्षा और चेतावनी देते हुए उनका पालन-पोषण करो” (इफि. 6:4)। इससे हम सीखते हैं कि पालन-पोषण में एक माता की भूमिका बच्चों का नेतृत्व करने और अधिकार रखने की है और एक सहायक होने की है, जो अपने पति, अर्थात् बच्चों के पिता, के मार्गदर्शन का पालन करती है।
यह उत्पत्ति 1:26-28 और 2:18-24 में दिखाई देने वाले आदर्श का अनुसरण करता है, जिसे पौलुस ने इन घरेलू निर्देशों को देते समय ध्यान में रखा है (इफि. 5:31 में पौलुस उत्प. 2:24 का उद्धरण देता है)। पुरुष और उसकी पत्नी दोनों को सृजित व्यवस्था पर स्वरूप धारण किए हुओं के रूप में शासन करने के लिए कहा गया है (उत्प. 1:28)। उत्पत्ति 2 अध्याय के सृष्टि के वृत्तांत में, हम सीखते हैं कि स्त्री को पुरुष के “सहायक” के रूप में स्वरूप धारण करने के लिए रचा गया है, जबकि पुरुष को यहोवा से वाटिका में काम करने और उसकी रक्षा करने तथा भले-बुरे के ज्ञान के वृक्ष का फल न खाने की वाचा वाली जिम्मेदारियों के बारे में निर्देश प्राप्त होते हैं। जिस प्रकार अदन की वाटिका में आदम को सिर और हव्वा को उसकी सहायिका के रूप में चित्रित किया गया है, ठीक उसी प्रकार पिताओं को बच्चों के नेतृत्व के लिए प्राथमिक निर्देश दिए गए हैं, और माताएँ उस भूमिका में सहायक हैं।
पिताओं को विशेष रूप से निर्देश देते हुए, पौलुस इस आज्ञा से आरम्भ करता है, “अपने बच्चों को रिस न दिलाओ” (इफि. 6:4)। यह आज्ञा दर्शाती है कि एक पिता को अपने बच्चों का नेतृत्व करना और उन पर अधिकार रखना उनके सर्वोत्तम हित में ही निभाना चाहिए। एक पिता अपने बच्चों की आवश्यकताओं और भलाई के प्रति उदासीनता की मनोवृत्ति अपनाकर, या अपनी सनक और सुख-सुविधाओं पर ध्यान केन्द्रित करके उनका नेतृत्व नहीं करता। जैसे पति अपनी पत्नी का मार्गदर्शन आत्म-त्याग से भरे प्रेम से करता है, ठीक वैसे ही पिता भी परमेश्वर के वचन के द्वारा परिभाषित अपने बच्चों के सर्वोत्तम हित का पालन करके अपने बच्चों का नेतृत्व करते हैं। बच्चों के हितों को पूरी तरह से ध्यान में रखते हुए ही पौलुस पिताओं को आज्ञा देता है, “प्रभु की शिक्षा और चेतावनी देते हुए उनका पालन-पोषण करो।”
“अपने बच्चों को रिस न दिलाओ” यह आज्ञा गूढ़ज्ञान से भरी हुई है। एक पिता के रूप में आपका लक्ष्य बच्चों पर “प्रभुता जताना” नहीं है (जैसे अन्यजातियों का था, मत्ती 20:23-28 को देखें)। आपका लक्ष्य केवल अधिकारपूर्ण दृढ़ता नहीं है। इसके बजाय, एक पिता के रूप में आपका लक्ष्य इस तरीके से नेतृत्व करना है कि आपके बच्चे आपके अनुशासन और निर्देश के द्वारा भक्ति की ओर निर्देशित हों। बच्चों को रिस दिलाए बिना उनका नेतृत्व करने के लिए, पिताओं को उनकी आवश्यकताओं, व्यक्तित्व, असुरक्षाओं, उनके पापों और विशेषताओं पर ध्यान देना होगा। अपने बच्चों को अच्छी तरह जानने से आप यह समझ पाते हैं कि उन्हें जिस अनुशासन और निर्देश की आवश्यकता है, वह कैसे प्रभावशाली हो सकता है।
यह एक सच्चाई है कि सभी बच्चों को अनुशासित और निर्देशित किया जाना चाहिए। यह भी एक सच्चाई है कि बच्चों को अपने माता-पिता के अधिकार का पालन करने का आदेश दिया जाता है। परन्तु पिता इन परिणामों को प्राप्त करने के लिए जिस तरह से आगे बढ़ते हैं, वह प्रेम के माध्यम से संचालित होने वाली बुद्धिमत्ता का विषय है। हो सकता है कि मेरी ग्यारह वर्ष की पुत्री के प्रति मेरा अनुशासन और निर्देश मेरे चौदह वर्ष के पुत्र के प्रति मेरे अनुशासन और निर्देश से बहुत अलग लगे, क्योंकि जो रणनीतियाँ मेरे पुत्र के साथ प्रभावी हैं, वही मेरी पुत्री को रिस दिला सकती हैं और इसके विपरीत काम कर सकती हैं। जैसे-जैसे हम प्रधानता के अगले पहलुओं — अधिकार, अनुशासन और निर्देश — की ओर बढ़ते हैं, इस पहले पहलू — सेवकाई और प्रेम की उपेक्षा न करें। पहले सिद्धान्त की उपेक्षा करने से बाकी सब सिद्धान्त समाप्त हो जाएँगे।
अधिकारपूर्ण नेतृत्व के रूप में पितृत्व वाली प्रधानता
परमेश्वर के द्वारा दिया गया सिर अर्थात् मुखिया का पद एक ऐसा पद है, जिसमें अधिकार निहित है। घराने के सिर के रूप में, एक पिता को अपने बच्चों पर अधिकार का उपयोग करना चाहिए। अपने कार्यस्थल, अपनी कलीसिया या अपने समुदाय में अधिकार के साथ एक अगुवा बनने के लिए हर पुरुष को बुलाया या तैयार नहीं किया जाता है। अलग-अलग पुरुषों को अलग-अलग तरीकों से प्रभावी रूप से काम करने और सेवा करने के लिए अलग-अलग वरदान और क्षमताएँ दी जाती हैं। जिन लोगों को नेतृत्व के क्षेत्रों में वरदान मिले हैं और घर के बाहर ऐसे पदों पर आसीन हैं, तो यह आवश्यक नहीं है कि वे उन लोगों से अधिक पुरुषत्व या अधिक भक्त हों, जो ऐसा नहीं करते। परन्तु जब घर की बात आती है, तो परमेश्वर उन सभी पुरुषों को, जो घराने के सिर अर्थात् मुखिया हैं, अगुवे बनने और अधिकार का उपयोग करने के लिए तैयार करता है। यदि आप एक विवाहित पुरुष हैं, तो आप अपनी पत्नी के सिर हैं। यदि आप एक बच्चेवाले पुरुष हैं, तो आप उन पर अधिकार के पद पर हैं।
यदि कोई पुरुष अपने घर में अधिकार का उपयोग करने से इन्कार करता है, तो वह परमेश्वर की आज्ञा का पालन करने से इन्कार कर रहा है। कुछ पुरुषों को यह याद दिलाने की आवश्यकता है कि ईश्वरीय अधिकार स्वार्थी प्रभुता के बजाय नि:स्वार्थ प्रेम से संचालित होता है। अन्य पुरुषों को वास्तव में उस अधिकार के पद को अपनाने के लिए प्रेरित करने की आवश्यकता है, जिसके लिए उन्हें बुलाया गया है। हे पुरुषों, अपने परिवार पर अधिकार का उपयोग करके परमेश्वर की आज्ञा मानने की अपनी जिम्मेदारी को अनदेखा न करें।
शिक्षा देने के रूप में पितृत्व वाली प्रधानता
जब पौलुस पिताओं को अपने बच्चों का “पालन-पोषण” करने का निर्देश देता है, तो वह इस लक्ष्य को प्राप्त करने के दो साधन बताता है: शिक्षा और चेतावनी देना (इफि. 6:4)। आइए हम बारी-बारी से दोनों पर विचार करें। मैंने इस क्षेत्रीय मार्गदर्शिका में पहले तर्क दिया था कि ताड़ना देना केवल दण्ड देने से कहीं बढ़कर है। इसका उद्देश्य ताड़ना दिए जाने वाले व्यक्ति के परम कल्याण और विकास को ध्यान में रखना है। परमेश्वर “हमारे लाभ के लिए” और “उसकी पवित्रता में भागी” होने के लिए हमारी ताड़ना करता है (इब्रा. 12:10)। इस प्रकार, शिक्षा देना एक विशेष प्रकार का निर्देश है। विशेष रूप से, शिक्षा देना वह निर्देश है, जो दण्ड वाले परिणामों का रूप लेता है। क्योंकि, जो खण्ड हमें बताता है कि ताड़ना हमारे लाभ के लिए है, उसी में हमें बताया गया है कि “वर्तमान में हर प्रकार की ताड़ना आनन्द की नहीं, पर शोक ही की बात दिखाई पड़ती है” (इब्रा. 12:11)।
नीतिवचन की पुस्तक में परमेश्वर के लोगों को पितृत्व के बारे में बहुत कुछ सिखाया गया है, क्योंकि इसकी अधिकांश विषय-वस्तु राजा सुलैमान के द्वारा अपने पुत्र के लिए लिखी गई थी। पवित्र आत्मा से प्रेरित ये वचन सभी पिताओं और पुत्रों के लिए शिक्षाप्रद हैं। नीतिवचन में पिता-पुत्र के रिश्ते में बार-बार दोहराए जाने वाले विषयों में से एक ताड़ना देना है। विशेष रूप से, नीतिवचन दो अलग-अलग प्रकार की ताड़ना की पहचान करता है: छड़ी और फटकार।
नीतिवचन में, “छड़ी” एक डण्डी या लाठी को संदर्भित करती है, जिसका उपयोग किसी को दण्ड के रूप में मारने-पीटने के लिए किया जाता है। सामान्य रूप से कहें तो नीतिवचन सिखाता है कि निर्बुद्धि की पीठ के लिए कोड़ा है, अर्थात्, ऐसे लोग जिनमें बुद्धि या समझ की कमी है (नीति. 10:13 और 26:3 को देखें)। नीतिवचन में, बुद्धि परमेश्वर के उचित भय और ज्ञान का फल है (नीति. 1:7, 9:10)। अत:, परमेश्वर को जानने और उसका भय मानने के विपरीत मूर्खता है। परमेश्वर के द्वारा प्रदान की गई बुद्धि के कारण, सुलैमान जानता था कि मूढ़ता (जिसे कभी-कभी मूर्खता भी कहा जाता है) बच्चों में आरम्भ से ही समाहित होती है। सुलैमान के पिता दाऊद ने एक बार विलाप करते हुए कहा था, “देख, मैं अधर्म के साथ उत्पन्न हुआ, और पाप के साथ अपनी माता के गर्भ में पड़ा” (भज. 51:5)। अदन की वाटिका में आदम के पाप के बाद से, सभी बच्चे इस संसार में “अपराधों और पापों के कारण मरे हुए” आए हैं (इफि. 2:1-3)। इसी कारण, सुलैमान समझ गया कि छड़ी, जो सामान्यत: मूर्खों को उनकी मूढ़ता के लिए दण्ड देने का एक अच्छा साधन है, बच्चों को शिक्षा देने के लिए भी एक उपयुक्त साधन है। उसने लिखा, “लड़के के मन में मूढ़ता की गाँठ बन्धी रहती है, परन्तु अनुशासन की छड़ी के द्वारा वह खोलकर उससे दूर की जाती है” (नीति. 22:15)। एक अन्य नीतिवचन में हम पढ़ते हैं, “लड़के की ताड़ना न छोड़ना; क्योंकि यदि तू उसको छड़ी से मारे, तो वह न मरेगा। तू उसको छड़ी से मारकर उसका प्राण अधोलोक से बचाएगा” (नीति. 23:13-14)।
इन खण्डों में, परमेश्वर का वचन पिताओं को अपने बच्चों को अनुशासित करने के लिए शारीरिक दण्ड (या पिटाई) का उपयोग करने का निर्देश दे रहा है। आज के समय संसार के अधिकांश सलाहकारों की मूर्खता के विपरीत, परमेश्वर का वचन सिखाता है कि बच्चे को पीटने से उसकी कोई हानि नहीं होती, बल्कि अन्त में उसका भला ही होता है, और सम्भवत: उसके प्राण को बचाने के आश्चर्यकर्म में सहायक होता है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि यदि माता-पिता आत्म-संयम के अभाव में और प्रतिशोध की भावना से शारीरिक दण्ड का उपयोग करें, तो यह हानिकारक हो सकता है। परन्तु एक पिता जो जानबूझकर अपने बच्चों के लिए परमेश्वर की पितृत्व से भरी देखभाल का अनुकरण कर रहा है, वह पवित्रता में दीर्घकालिक विकास के लक्ष्य को ध्यान में रखकर अपने बच्चे को उसकी भलाई के लिए अनुशासित करेगा। किसी बच्चे की पीठ पर जानबूझकर मारा जाना ईश्वरीय अनुशासन का एक तरीका है, जो उस समय तो कष्टदायी लगता है, परन्तु लम्बे समय में, “जो उसको सहते–सहते पक्के हो गए हैं, बाद में उन्हें चैन के साथ धर्म का प्रतिफल मिलता है” (इब्रा. 12:11)।
नीतिवचन में पहचाने गए अनुशासन का दूसरा रूप फटकार है। जहाँ एक ओर छड़ी शारीरिक दण्ड है, वहीं दूसरी ओर फटकार मौखिक दण्ड है। फटकार किसी गलत काम के उत्तर में की गई अस्वीकृति के लिए बोली गई बात है। फटकार पापी व्यवहार की पहचान कराती है और उसे वह बताती है, जो वह वास्तव में है — अर्थात् परमेश्वर की दृष्टि में घृणित और मनुष्य की दृष्टि में शर्मनाक। फटकार तभी प्रभावशाली होती है, जब वह उस व्यक्ति से कही जाए, जो अनुमोदन की चिन्ता करता है, जिसका विवेक इतना संवेदनशील हो कि वह उचित शर्म महसूस कर सके। दूसरे शब्दों में कहें तो फटकार उस व्यक्ति के हृदय में जिसे फटकार लगाई जाती है, कुछ हद तक ज्ञान का संचार कर देती है। नीतिवचन 13:1 कहता है, “बुद्धिमान पुत्र पिता की शिक्षा सुनता है, परन्तु ठट्ठा करने वाला (मूर्ख के लिए दूसरा शब्द) घुड़की को भी नहीं सुनता।” या नीतिवचन 17:10 पर विचार करें, जो बताता है, “एक घुड़की समझनेवाले के मन में जितनी गड़ जाती है, उतना सौ बार मार खाना मूर्ख के मन में नहीं गड़ता।” इसी कारण, जैसे-जैसे बच्चे बड़े होते हैं, वैसे-वैसे फटकार का प्रभाव अधिक होता जाता है। आदर्श रूप से, जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता है, वैसे-वैसे अनुशासनात्मक उपाय के रूप में “फटकार” का उपयोग अधिक प्रभावी होता जाता है, जिससे अनुशासनात्मक साधन के रूप में “छड़ी” का उपयोग उसी अनुपात में कम हो सकता है।
चेतावनी के रूप में पितृत्व वाली प्रधानता
शिक्षा देने के अतिरिक्त, पौलुस “चेतावनी” की पहचान प्रभु में होकर बच्चों का पालन-पोषण करने के एक साधन के रूप में भी करता है (इफि. 6:4)। जबकि शिक्षा देना एक प्रकार का निर्देश है, जिसमें दण्ड वाले अनुपात अपनाए जाते हैं, इस आयत में “चेतावनी” शब्द का अनुवाद विशेष रूप से बातों के उपयोग से शिक्षा देने के लिए किया गया है। शिक्षा देना पाप के विषय में प्रतिक्रिया के रूप में होता है, परन्तु चेतावनी देना किसी भी समय किया जा सकता है। इस प्रक्रिया की देखरेख करना पिताओं की विशेष जिम्मेदारी है।
पवित्रशास्त्र माता-पिता को अपने बच्चों को शिक्षा देने के लिए कई चेतावनियाँ देता है। माता-पिता को अपने बच्चों को इस संसार में जीवन बिताने के ज्ञान की शिक्षा देनी है, और उससे भी आवश्यक बात यह है कि उन्हें अपने बच्चों को इस बात की शिक्षा देनी है कि परमेश्वर कौन है और उसके साथ उनका क्या रिश्ता है। पाँचवीं आज्ञा बच्चों को अपने माता-पिता का आदर करने के लिए कहती है (निर्ग. 20:12)। यह आज्ञा मानती है कि माता-पिता अपने बच्चों को परमेश्वर के बारे में और उसके संसार में सही तरीके से जीवन बिताने का तरीका सिखाएँगे। यही कारण है कि निर्गमन की पुस्तक में दी गई आज्ञा, धरती पर लम्बी आयु की प्रतिज्ञा से जुड़ी हुई है। इस आज्ञा और प्रतिज्ञा का तर्क समझना कठिन नहीं है। माता-पिता अपने बच्चों को यहोवा की व्यवस्था की शिक्षा देते हैं। जब बच्चे अपने माता-पिता की शिक्षाओं का पालन करते हैं, तो वे यहोवा की उन आज्ञाओं का पालन कर रहे होते हैं, जिनकी शिक्षा माता-पिता अपने बच्चों को देते हैं। यहोवा की आज्ञाओं का पालन करने का परिणाम पृथ्वी पर लम्बी आयु है।
व्यवस्थाविवरण 6:6–7 माता-पिता से अपने बच्चों को यहोवा की व्यवस्था की शिक्षा देने की बुलाहट बताकर इस तर्क को स्पष्ट करता है: “और ये आज्ञाएँ जो मैं आज तुझ को सुनाता हूँ वे तेरे मन में बनी रहें; और तू इन्हें अपने बाल–बच्चों को समझाकर सिखाया करना, और घर में बैठे, मार्ग पर चलते, लेटते, उठते, इनकी चर्चा किया करना।” ध्यान दें कि मूसा ने बच्चों को यहोवा का वचन कब और कैसे सिखाया जाए, इस बारे में विशिष्ट निर्देश दिए हैं। सबसे पहली बात, आयत 7 के अन्त में, वह कहता है, “लेटते, उठते।” ये वही गतिविधियाँ हैं, जो दिन का अन्त करती हैं। इस अभिव्यक्ति का तात्पर्य यह है कि बच्चों को शिक्षा देने का माता-पिता का कार्य दिन भर आरम्भ से लेकर अन्त तक चलता रहता है। यदि हम ध्यान दें और यहोवा के वचन को हमेशा अपने हृदय में रखें, तो माता-पिता के लिए अपने बच्चों को परमेश्वर के मार्ग की शिक्षा देने के अवसरों की कोई कमी नहीं होगी (आ. 6)।
दूसरी बात, मूसा कहता है कि यह निर्देश “घर में बैठे, मार्ग पर चलते” दिया जाना चाहिए। “घर में बैठे” वाक्यांश सम्भवत: घर में औपचारिक शिक्षा का संदर्भ देता है, जब सभी लोग इस उद्देश्य के लिए एकत्रित होते हैं। प्राचीन काल में, औपचारिक शिक्षा के समय शिक्षक अपने श्रोताओं को सम्बोधित करने के लिए बैठा करते थे (आज के समय की हमारी आदत से बिलकुल अलग, जिसमें औपचारिक वक्ता श्रोताओं के सामने खड़े होते हैं)। सम्भवत: मूसा के कहने का तात्पर्य ऐसे समय से है, जब परिवार परमेश्वर के वचन के पाठ के लिए और वचन से कुछ अनुपात तक निर्देश प्राप्त करने के उद्देश्य से एकत्रित होता है। आज के समय में कुछ लोग ऐसे समय को “पारिवारिक आराधना” के रूप में संदर्भित करते हैं। आप इसे चाहे जो भी कहें, परन्तु महत्वपूर्ण बात यह है कि आप इसे करते हैं। माता-पिता का यह कर्तव्य है कि वे यह सुनिश्चित करें कि उनके बच्चों में परमेश्वर के वचन की औपचारिक शिक्षा प्राप्त करने की आदत हो। “मार्ग पर चलते” वाक्यांश सम्भवत: उस प्रकार की शिक्षा को संदर्भित करता है जो दैनिक जीवन के बीच में होती है।
जब पौलुस मसीही पिताओं से कहता है कि वे अपने बच्चों का “प्रभु की शिक्षा और चेतावनी देते हुए पालन–पोषण” करें (इफि. 6:4), तो वह यह सिखा रहा है कि शिक्षा और चेतावनी देने की माता-पिता की यह जिम्मेदारी एक ऐसा बोझ है, जो किसी और की तुलना में पिताओं के कंधों पर अधिक पड़ती है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि माताएँ भी शिक्षा और चेतावनी देती हैं, परन्तु आदर्श रूप से, तथा उदाहरण और नेतृत्व के द्वारा, ऐसे परिवार का निर्माण करने के लिए, जिसमें ऐसी शिक्षा और चेतावनी आदर्श हो, पिता को ही जिम्मेदार होना चाहिए।
चर्चा एवं मनन:
- पितृत्व वाली प्रधानता के किस पहलू में — अर्थात् प्रेमपूर्ण सेवकाई, अधिकारपूर्ण नेतृत्व, शिक्षा और चेतावनी देने में — आप सबसे अधिक उन्नति कर सकते हैं? अपनी पत्नी (और शायद अपने बच्चों) के साथ मूल्यांकन करें कि आप इन क्षेत्रों में कैसा कर रहे हैं।
- आप अपने परिवार में व्यवस्थाविवरण 6:6-7 को लागू कर पाने में कैसे सक्षम हुए हैं?
निष्कर्ष
जैसे ही मेरा सबसे बड़ा पुत्र अपनी नयी दुल्हन के साथ गलियारे से वापस लौटा, तो एक पिता के रूप में मेरी भूमिका का गहन विश्लेषण जोरों पर था। इतने दिनों के आत्म-निरीक्षण के बाद यह मेरा गहरा निष्कर्ष था? मैं एक सिद्ध पिता नहीं हूँ। जबकि मेरी पितृत्व वाली कार्यवाही के रूप में मेरे द्वारा यहाँ दिए गए मार्गदर्शन के अनुरूप कई उदाहरण मिलते हैं, परन्तु इन बातों का पालन न करने की मेरी विफलता के भी असंख्य उदाहरण हैं। पिता होने के रूप में, और हर एक बात में, मैंने पाप किया है और मैं परमेश्वर की महिमा से रहित हूँ (रोमि. 3:23)। कभी-कभी मैंने प्रेम के बजाय स्वार्थी होकर अधिकार का उपयोग किया; कभी-कभी मैंने अधिकार को त्याग दिया, और उन क्षेत्रों की उपेक्षा करना पसन्द किया, जहाँ मेरे नेतृत्व की आवश्यकता थी। कभी-कभी मैंने पापमय क्रोध और स्वार्थ के कारण अपने बच्चों को अनुशासित किया; और कभी-कभी मैंने आलस्य के कारण उन्हें अनुशासित करने में लापरवाही बरती है। कभी-कभी मैंने अपने बच्चों के साथ चलते हुए उन्हें निर्देश देने के अवसर गँवा दिए; और कभी-कभी तो मैं घर में बैठा रहा और औपचारिक निर्देश के लिए उन्हें इकट्ठा करने की उपेक्षा की।
यदि एक मसीही पिता के रूप में आपका कोई अनुभव है, तो मुझे लगता है कि आप भी इसी बात का अंगीकार करने के लिए बाध्य महसूस करेंगे। शायद आपकी स्थिति और भी गम्भीर हो। और हो सकता है कि आपका परिवार इफिसियों 5-6 अध्याय में वर्णन किए गए ढाँचे में उपयुक्त न बैठता हो (जिसमें पति-पत्नी घर में अपने बच्चे के साथ रहते हैं)। हो सकता है कि आप कई कारणों से एकल पिता हों। हो सकता है कि आपके बच्चे वर्तमान में आपके साथ न रहते हों, परन्तु नियमित रूप से किसी और व्यक्ति के द्वारा उनकी देखभाल की जाती हो। चाहे वह एक सच्चे मसीही पिता की बार-बार वाली कमियाँ हों या घर टूटने का एक और स्पष्ट आदर्श हो, सच्चाई यही है कि: मसीही पिता होने के रूप में, हम वह नहीं बन पाते, जो हमें होना चाहिए।
इस तथ्य के आलोक में, मैं दो शब्दों की चेतावनी के साथ समाप्त करता हूँ। पहली बात, यद्यपि हम मानते हैं कि हम मसीही पितृत्व के आदर्श से चूक जाएँगे, तौभी हमें इसे एक लक्ष्य के रूप में प्राप्त करने का प्रयत्न करने से कभी नहीं थकना चाहिए। सिद्ध भक्ति के बारे में पौलुस ने जो कहा, वह पितृत्व के बारे में भी सत्य है, “जो बातें पीछे रह गई हैं उनको भूल कर, आगे की बातों की ओर बढ़ता हुआ, निशाने की ओर दौड़ा चला जाता हूँ, ताकि वह इनाम पाऊँ जिसके लिए परमेश्वर ने मुझे मसीह यीशु में ऊपर बुलाया है” (फिलि. 3:13ख-14)।
दूसरी बात, यीशु मसीह का सुसमाचार पापों की क्षमा का शुभ समाचार देता है और हमें बताता है कि हम एक विशेष, और वाचा वाली रीति से परमेश्वर को अपना पिता कहने में सक्षम क्यों हैं। जब आप परमेश्वर के वाचा वाले पितृत्व का अनुकरण करने का प्रयत्न करते हैं, तो आप एक ऐसे व्यक्ति के रूप में ऐसा करते हैं, जिसे परमेश्वर ने आपके सभी पापों के लिए क्षमा कर दिया है। आप परमेश्वर का अनुकरण एक ऐसे व्यक्ति के रूप में करने का प्रयत्न करते हैं, जो आपकी सीमाओं को जानता है और इस तथ्य को गहराई से महसूस करता है कि आप परमेश्वर नहीं हैं। अत:, एक पिता के रूप में अपनी दुर्बलता में, उस व्यक्ति की ओर देखें, जो एक पिता के रूप में दुर्बल नहीं है। अपनी विफलताओं में, उस पिता की ओर देखें, जो विफल नहीं होता। अपनी थकान में, उस पिता की ओर देखें, जो थकता या बोझिल नहीं होता। एकमात्र सच्चा और जीवित परमेश्वर आपको उस प्रकार का पिता बनने का अनुग्रह प्रदान करे, जिसकी आपकी सन्तान को आवश्यकता है, अर्थात् एक ऐसा पिता जो उन्हें पिता के पास ले जाए।
अन्तिम टिप्पणियाँ
काइल क्लांच ऐशले के पति और छह बच्चों के पिता हैं। उन्हें स्थानीय कलीसिया में पेशेवर पासबानी सेवकाई में बीस से अधिक वर्षों का अनुभव प्राप्त है। वह वर्तमान में केनवुड बैपटिस्ट चर्च में एक प्राचीन हैं, जहाँ वे नियमित रूप से रविवार की पाठशाला में पढ़ाते हैं और नवगठित केनवुड संस्थान में प्रशिक्षक के रूप में कार्य करते हैं। काइल लुइसविले, केंटकी स्थित सदर्न बैपटिस्ट थियोलॉजिकल सेमिनरी में मसीही ईश-विज्ञान के संयुक्त प्रोफेसर भी हैं, जहाँ वे सन् 2017 से कार्यरत हैं।
विषयसूची
- 1 सबसे पहले परमेश्वर का पितृत्व
- ईश्वरीय पितृत्व के बाद मानवीय पितृत्व का आदर्श
- परमेश्वर किन तरीकों से एक पिता है?
- चर्चा एवं मनन:
- 2 अपनी वाचा वाली सन्तानों के पिता के रूप में परमेश्वर
- परमेश्वर का पितृत्व वाला अधिकार
- परमेश्वर का पितृत्वपूर्ण प्रावधान
- परमेश्वर की पितृत्व वाली ताड़ना
- परमेश्वर की पितृत्व वाली विश्वासयोग्यता
- परमेश्वर के साथ आरम्भ करने का महत्व
- चर्चा एवं मनन:
- 3 भक्ति में प्रगति के द्वारा पितृत्व की तैयारी करना
- भक्ति क्या है?
- भक्ति में साधना की आवश्यकता
- भक्ति की साधना के लिए व्यावहारिक कदम
- चर्चा एवं मनन:
- 4 विश्वासयोग्य पिता के रूप में प्रधानता का अभ्यास करना
- प्रेमपूर्ण सेवकाई के रूप में पितृत्व वाली प्रधानता
- अधिकारपूर्ण नेतृत्व के रूप में पितृत्व वाली प्रधानता
- शिक्षा देने के रूप में पितृत्व वाली प्रधानता
- चेतावनी के रूप में पितृत्व वाली प्रधानता
- चर्चा एवं मनन:
- निष्कर्ष
- अन्तिम टिप्पणियाँ