#62 वित्तीय उत्तरदायित्व विवाह: अपने जीवनसाथी के साथ पैसे का तालमेल
परिचय
मैं एक टूटे हुए परिवार में पला-बड़ा हुआ हूँ। मेरे पिताजी भी हमारे आसपास नहीं थे, और हमें अपने आप ही अपनी आजीविका का निर्वाह करना पड़ता था। बचपन में मैंने अपनी माँ को एक नौकरानी के रूप में प्रतिदिन चौदह से सोलह घंटे काम करते हुए देखा है—केवल जीवन निर्वाह करने के लिए ही नहीं, वरन् सात से ग्यारह की अधिकारिक व्यापार व्यवस्था लेने के लिए पर्याप्त धन बचाने के उद्देश्य से भी देखा है। ऐसा करने के बाद भी, उन्होंने अपने व्यवसाय को बाजार में जमाने के लिए कई-कई घंटों तक काम करना जारी रखा। सबसे बड़ा खर्च वेतन देना था, इसलिए उसने अकेले ही काम करके पैसे बचाए।
तनाव और बोझ ने मेरी माँ को शारीरिक और भावनात्मक, दोनों ही तरह से थका दिया था। और वह तनाव परिवार के शेष सदस्यों तक भी फैल गया। ऐसी चिन्ता और अस्थिरता थी जिसने मेरी बहन को और मुझे गहराई से प्रभावित किया। उस प्रकार की कमी का अनुभव करने के बाद, मैंने निश्चय किया कि मैं अपने परिवार को कभी भी उस स्थिति से नहीं जाने दूँगा।
इसके विपरीत, मेरी पत्नी केटी एक स्थिर मसीही परिवार में पली-बढ़ी थी। वह छह बच्चों में से एक थी। यद्यपि यह कहना कि वह “बहुतायत” में पली-बढ़ी थी, कुछ बढ़ा-चढ़ाकर कहना होगा, फिर भी उसकी आवश्यकताएँ हमेशा पूरी होती थीं। उसके माता-पिता अपने पास उपलब्ध संसाधनों के साथ उदार थे। हमारे विवाह के बाद, केटी के पिता फिल डेविस ने अपनी निवेश-सम्बंधी सम्पत्ति हमें बाज़ार मूल्य से बहुत कम किराए पर दे दी, क्योंकि वे चाहते थे कि हम अपने स्वयं के घर के लिए बचत कर सकें। लगभग एक वर्ष तक बचत करने के बाद, हम कुछ गिरवी रखकर ऋण लेकर अपना पहला घर खरीदने में सक्षम हुए।
आप यह कह सकते हैं कि मेरी पत्नी और मैं दो बिल्कुल भिन्न परिवारिक पृष्ठभूमि से आए थे। अपने आरम्भिक वर्षों में अपनी वित्तीय व्यवस्था को व्यवस्थित करना कोई सरल कार्य नहीं था।
अंततः धन का प्रबंधन केवल रुपये-पैसे का ही विषय नहीं है। यह प्रायः मूल्यों, प्राथमिकताओं और पारिवारिक पृष्ठभूमि से भी जुड़ा हुआ होता है—कभी-कभी गहरे भावनात्मक घावों से भी जुड़ा हुआ होता है। भिन्न-भिन्न पृष्ठभूमि वाले दो लोगों के लिए वित्तीय योजना तैयार करना कैसा दिखाई देता है? हम खर्च और बचत को कैसे देखते हैं? हम विवाह में कितना ऋण लेकर आ रहे हैं—और हमने साथ मिलकर कितना ऋण लिया है? हम इन सबका प्रबंधन कैसे करते हैं? और हम अपने बच्चों को पैसे के विषय में क्या सिखाते हैं?
ये सभी उचित प्रश्न हैं। यह जीवन कौशल मार्गदर्शिका आपको और आपके जीवन साथी को व्यावहारिक बुद्धि और बाइबल आधारित सिद्धांतों के माध्यम से इन प्रश्नों का मिलकर सामना करने में सहायता करने के लिए है, ताकि आप न केवल अपने पैसे को, वरन् अपने हृदयों को भी एक-दूसरे के साथ जोड़ सकें।
धन को समझना
धन का विषय अक्सर कलीसिया के भीतर और मसीहियों के बीच एक वर्जित विषय माना जाता है। यह ऐसा विषय है जिसके बारे में बहुत कम ही बात की जाती है। यह वर्जित क्यों माना जाता है? मेरा मानना है कि वित्तीय उत्तरदायित्व के विषय में बात करने में मसीहियों की झिझक प्रायः उन टेलीविजन के प्रचारकों से जुड़ी हुई होती है—अर्थात् ऐसे धोखेबाज लोग जो अपने आत्मिक अधिकार का उपयोग करके लोगों को पैसा देने के लिए धूर्तता से प्रेरित करते हैं। इन बातों के अतिरिक्त, जब लोग कलीसिया में आते हैं और भेंट की थाली घुमाई जाती है, तो संसार के लोगों की अक्सर गलत धारणा बन जाती है। गैर-मसीहियों को ऐसा लगता है कि कलीसिया और मसीही लोग हमेशा पैसा ही माँगते रहते हैं।
मसीहियों को पैसे के विषय में झिझकने का एक और कारण समृद्धि की सुसमाचार नामक शिक्षा है। समृद्धि का सुसमाचार यह मानता है कि आर्थिक आशीष और शारीरिक कुशलता उसके अनुयायियों के जीवन के लिए हमेशा से परमेश्वर की इच्छा है। यह सत्य नहीं है। आप यीशु मसीह और उसके प्रेरितों के जीवन को देखकर समझ सकते हैं कि कष्ट सहना मसीही जीवन का एक सामान्य हिस्सा है। क्योंकि अधिकाँश मसीही लोग जानते हैं कि समृद्धि का सुसमाचार एक झूठा सुसमाचार है, इसलिए वे उन वचनों को जो समृद्धि का आश्वासन देते हैं, पढ़ते समय इस भय से कतराते हैं, कहीं वे भी उस धारा के प्रभाव में न आ जाएँ।
मसीहियों के लिए धन को वर्जित विषय मानने का एक कारण यह भी है कि सांस्कृतिक दृष्टि से हम धन को “व्यक्तिगत विषय” मानते हैं। यह हमारी अपनी ही दृढ़ व्यक्तिगत सोच होती है जो कहती है कि, “मेरे पैसे का मुझे क्या करना है, यह मुझे कोई नहीं बताएगा!” परन्तु यह विचार बाइबल आधारित विचार से अधिक अमेरिकन सोच को दर्शाता है।
परिणामस्वरूप, कलीसिया—और सामान्य रूप से मसीही लोग—धन के विषय पर बात करने से कतराते हैं। आप कितने उत्तरदायित्व समूहों में गए हैं जहाँ कभी यह पूछा गया हो, “अरे, आप धन का प्रबंध कैसे करते हैं?” मेरा अनुमान है कि ऐसे समूह अधिक नहीं होंगे।
धन के विषय में बात करने से यह परहेज़ अजीब है, क्योंकि बाइबल वास्तव में धन के विषय में बहुत अधिक बात करती है। इसका अर्थ है कि मसीही लोग अपनी बाइबल को खोल सकते हैं और खोलना भी चाहिए, ताकि वे धन का प्रबंध कैसे करें इसके लिए बुद्धि पाएँ। बुद्धि पाने का एक तरीका यह है कि हम आपस में इस विषय में बात करें कि बाइबल क्या कहती है।
और पवित्रशास्त्र स्वयं धन और सम्बन्ध के विषय में ऐसे उद्धरण देता है जो हमारी गलत चुप्पी को चुनौती देते हैं। यीशु मसीह स्पष्ट रूप से चेतावनी देता है, “क्योंकि जहाँ तेरा धन है वहाँ तेरा मन भी लगा रहेगा” (मत्ती 6:21)। यह कथन प्रकट करता है कि धन सम्बन्धों को इतनी गहराई से क्यों प्रभावित करता है—इसलिए नहीं कि धन अपने आप में बुरा है, वरन् इसलिए कि वह यह उजागर कर देता है कि हम सबसे अधिक महत्व किसको देते हैं।
आज के संसार में, हम सामान्यतः आर्थिक स्थिति को धन, गणित या संसाधनों के प्रबंधन से जोड़कर देखते हैं। बाइबल आधारित दृष्टिकोण से यह भण्डारीपन, भरोसे और आराधना के विषय में है। इसलिए सबसे अच्छा यही है कि आप अपने पैसे को केवल व्यक्तिगत संपत्ति आवंटन के रूप में न देखकर, आपसी दायित्व के रूप में देखें। अब यदि हम धन को सम्बन्धों के उत्तरदायित्व के रूप में देखें, तो एक दम्पति के रूप में, धन केवल आपकी जीवनशैली को सुरक्षित करने का साधन नहीं है— वरन् यह साथ मिलकर परमेश्वर का आदर करने के लिए एक साझा बुलाहट है।
—
चिन्तन के लिए प्रश्न:
- आपने बचपन में धन के विषय में कौन से सन्देश सुने थे, या सबक सीखें थे?
- आपके मूल परिवार ने धन से जुड़ी हुई आपकी वर्तमान आदतों को किस प्रकार से आकार दिया है?
- एक दम्पति के रूप में आपके वित्तीय निर्णयों को कौन-कौन से डर या अनकहे अनुमान प्रभावित कर सकते हैं?
—
ऑडियो मार्गदर्शिका
ऑडियो#62 वित्तीय उत्तरदायित्व विवाह: अपने जीवनसाथी के साथ पैसे का तालमेल
भाग I: बाइबल आधारित ढाँचा
सब कुछ उसी का है
भजनकार कहता है, “पृथ्वी और जो कुछ उसमें है यहोवा ही का है; जगत और उसमें निवास करनेवाले भी” (भजन संहिता 24:1)। पौलुस तीमुथियुस को बताता है, “क्योंकि न हम जगत में कुछ लाए हैं और न कुछ ले जा सकते हैं” (1 तीम. 6:7)। यह पहचानकर कि हर वस्तु का स्वामी परमेश्वर है, हमारी नियंत्रण करने की माँग, भौतिक लाभ के प्रति हमारी प्रबल इच्छा और असफलता के प्रति हमारा भय कम हो जाना चाहिए। यदि परमेश्वर सब कुछ का स्वामी है, तो हम परमेश्वर के द्वारा दी गई वस्तुओं के स्वामी होने के बजाय, उन वस्तुओं के प्रबन्धक के समान हैं। यही वह स्थान है जहाँ हमें विश्वासयोग्य भण्डारी (1 कुरिन्थियों 4:2) बनना है, और ऐसी वित्तीय व्यवस्था का अभ्यास करना है जो परमेश्वर को सब कुछ देने वाले के रूप में आदर दे सके।
धन की भलाई
(1) कभी-कभी धन परमेश्वर की आशीष का एक संकेत होता है। वास्तव में, परमेश्वर लोगों को धन के साथ आशीष देता है।धन और सम्मान मेरे पास हैं, अर्थात् स्थाई धन और धार्मिकता (नीतिवचन 8:18)।धन यहोवा की आशीष ही से मिलता है, और वह उसके साथ दुःख नहीं मिलाता (नीतिवचन 10:22)।
धन हमारे लिए परमेश्वर का वरदान है। यह हमारे प्रति परमेश्वर की भलाई को दर्शाता है, अन्य किसी भी वरदान के समान इसे भी बिगाड़ा तथा दुरुपयोग किया जा सकता है, और यह मूर्तिपूजा का कारण भी बन सकता है। वित्तीय उत्तरदायित्व का अर्थ यह समझना है कि, यद्यपि धन अच्छा है, फिर भी इसे सावधानी और ईमानदारी के साथ संभालना चाहिए। धन को मूर्ति न बनने देने का अर्थ है कि उसकी सीमाओं को पहचानना और हमारे जीवन के सभी क्षेत्रों में धन सम्बन्धी उत्तरदायी होने के महत्व को समझना।
धन की सीमाएँ
अनन्तकाल की ज्योति में, इस जीवन का धन गंभीर सीमाओं के साथ आता है। पवित्रशास्त्र हमें इनकी कुछ सीमाएँ इस प्रकार से बताता है।
1. धन किसी को भी परमेश्वर के प्रकोप से छुड़ा नहीं सकता है।
प्रकोप के दिन धन-सम्पत्ति काम नहीं आती, परन्तु धार्मिकता मृत्यु से बचाती है (नीतिवचन 11:4)।
यीशु लौदीकिया की कलीसिया से कहता है, “तू जो कहता है, कि मैं धनी हूँ, और धनवान हो गया हूँ, और मुझे किसी वस्तु की घटी नहीं, और यह नहीं जानता, कि तू अभागा और तुच्छ और कंगाल और अंधा, और नंगा है” (प्रकाशितवाक्य 3:17)।
2. धन अस्थायी है।
“धन-दौलत तो सदा नहीं रहते, और न राजमुकुट पीढ़ी से पीढ़ी तक बना रहता है?” (नीतिवचन 27:24)
“दीन भाई अपने ऊँचे पद पर घमण्ड करे। और धनवान अपनी नीच दशा पर; क्योंकि वह घास के फूल की तरह मिट जाएगा। क्योंकि सूर्य उदय होते ही कड़ी धूप पड़ती है और घास को सूखा देती है, और उसका फूल झड़ जाता है, और उसकी शोभा मिटती जाती है; उसी प्रकार धनवान भी अपने कार्यों के मध्य में ही लोप हो जाएँगे” (याकूब 1:9-11)।
(2) धन हमारा अन्तिम उद्देश्य नहीं है।
“जो अपने धन पर भरोसा रखता है वह सूखे पत्ते के समान गिर जाता है, परन्तु धर्मी लोग नये पत्ते के समान लहलहाते हैं” (नीतिवचन 11:28)।
“इसलिए पहले तुम परमेश्वर के राज्य और धार्मिकता की खोज करो तो ये सब वस्तुएँ तुम्हें मिल जाएँगी” (मत्ती 6:33)।
जब हम इन बाइबल आधारित सच्चाईयों पर विचार करते हैं, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि धन सम्बन्धी जिम्मेदारी में इन सीमाओं को भी समझना सम्मिलित है। धन सम्बन्धी प्राथमिकताएँ क्षणभंगुर भौतिक धन पर नहीं, वरन् अनन्त मूल्यों पर आधारित होनी चाहिए।
भण्डारीपन
“प्रबंधक” शब्द एक आधुनिक शब्द है। जब हम “प्रबंधक” के बारे में सोचते हैं, तो पवित्रशास्त्र “भण्डारी” होने (1 कुर. 4:2) की बात करता है। मूल रूप में, ये दोनों एक ही बात हैं। पर यदि मुझे “भण्डारीपन” की परिभाषा देनी हो, तो मैं कहूँगा कि यह उन संसाधनों का विश्वासयोग्य प्रबंधन है, जो परमेश्वर के उद्देश्यों के लिए हमें सौंपे गए हैं, ताकि उन्हें इस प्रकार उपयोग किया जाए कि दूसरों को आशीष मिले और उसके द्वारा परमेश्वर की महिमा हो। प्रभु हमें जो कुछ भी देता है, वह एक निश्चित समय के लिए हमें सौंपता है। सभी विश्वासियों को इस बात का बोझ तथा उत्तरदायित्व का अनुभव करन चाहिए, क्योंकि हमें उन संसाधनों के उपयोग के लिए उत्तर देना होगा जो उसने हमें दिए हैं (लूका 12:42–48; रोमियों 14:12)।
परमेश्वर हमें भण्डारी क्यों बनाता है? इसका एक कारण यह है कि संसाधनों का उचित प्रबंधन करना हमारे आत्मिक शिष्यत्व का एक महत्वपूर्ण भाग है। आरम्भ में, परमेश्वर ने मनुष्य को अपने स्वरूप में रचा और उसे अपने द्वारा बनाई गई सृष्टि पर अधिकार दिया (उत्पत्ति 1:26–28)। मनुष्य को परमेश्वर की बनाई गई प्रत्येक वस्तु का भण्डारी बनाया गया था। इतना ही नहीं, परन्तु मनुष्य को सृष्टि के प्रत्येक पहलू की देखभाल करके परमेश्वर की महिमा करनी थी। हमें अपनी सृष्टि का भण्डारी बनाकर, परमेश्वर हमें अपनी बुद्धि, देखभाल और उदारता को दर्शाने के लिए आमंत्रित करता है। उसने हमें अपने कार्य में सक्रिय सहभागी होने के लिए रचा है। इस कार्य में उसके साथ जुड़ना इस बात का एक हिस्सा है कि वह हमारे चरित्र का निर्माण करता है और हमें अपने समान बनाता है (लूका 16:10)।
स्मरण करें कि पहले हमने कहा था कि धन का सम्बन्ध आपसी उत्तरदायित्व से है। पैसे का सही प्रबंधन करना हमें यह सिखाता है कि यदि हमारे पास कम हो या अधिक, तब भी हम परमेश्वर पर कैसे भरोसा कर सकते हैं। यह हमें अपने हृदय को उसके उद्देश्यों और प्राथमिकताओं के साथ समरूप करना सिखाता है। यह प्रभु के साथ हमारे सम्बन्ध का एक पहलू है। परमेश्वर एक प्रेमी पिता है, जो अपनी सन्तान को छोटे-छोटे कार्य सौंपता है ताकि वे धन सम्बन्धी उत्तरदायित्व सीखें और उसके साथ निकटता में बढ़ें। परमेश्वर की प्रतिज्ञा क्या है? वह हमारा मार्गदर्शन करेगा और हमारी भलाई के लिए हमारी उन्नति की प्रक्रिया का संचालन करेगा। और जब वह ऐसा करता है, तब हमें अपने परिवार की देखभाल करनी चाहिए (1 तीम. 5:8), दूसरों को उदारता से देना चाहिए (2 कुर. 9:7), अपनी कलीसिया में सुसमाचार की सेवकाई के लिए सहयोग करना चाहिए (फिलि. 4:15–17), और अनन्तकाल के लिए निवेश करना चाहिए (मत. 6:19–21)।
—
चिन्तन के लिए प्रश्न:
- सब वस्तुओं के स्वामी के रूप में परमेश्वर को स्वीकार करने से आप उन वस्तुओं को किस दृष्टि से देखते हैं जिनके स्वामी आप हैं, इसमें क्या परिवर्तन आता है?
- आपको धन के विषय में किस प्रकार सोचने के लिए सिखाया गया है? क्या यह एक वर्जित विषय है?
- आपके लिए धन सम्बन्धी अच्छे भण्डारीपन का नमूना किसने प्रस्तुत किया है?
- क्या कभी आपको धन से अति प्रेम करने का प्रलोभन हुआ है?
—
भाग II: मसीही दम्पत्तियों के लिए धन सम्बन्धी उद्देश्य
“वही देह, अर्थात् कलीसिया का सिर है; वही आदि है और मरे हुओं में से जी उठनेवालों में पहलौठा कि सब बातों में वही प्रधान ठहरे।”—कुलुस्सियों 1:18
सबसे पहले परमेश्वर का भय मानना और आदर करना
एक विवाहित दम्पत्ति को अपने धन के लिए कौन-कौन से लक्ष्य रखने चाहिए? मेरा विचार है कि यह एक अत्यन्त उत्तम प्रश्न है। सबसे पहले और आवश्यक बात यह है कि हमें प्रभु के भय से प्रेरित होना चाहिए, और फिर हमें परमेश्वर का आदर करने की अभिलाषा होनी चाहिए। सुलैमान लिखता है, “अपनी सम्पत्ति के द्वारा और अपनी भूमि की सारी पहली उपज देकर यहोवा की प्रतिष्ठा करना;इस प्रकार तेरे खत्ते भरे और पूरे रहेंगे, और तेरे रसकुण्डों से नया दाखमधु उमण्डता रहेगा” (नीतिवचन 3:9-10)।
सबसे पहले हमें यह महसूस करना चाहिए कि हम अपने धन के द्वारा परमेश्वर का आदर तभी कर सकते हैं जब हम अपनी सभी आवश्यकताओं के लिए उस पर भरोसा करते हैं। पहिले फल के विषय में कहने से ठीक पहले, सुलैमान ने लिखा,
“तू अपनी समझ का सहारा न लेना, वरन् सम्पूर्ण मन से यहोवा पर भरोसा रखना। उसी को स्मरण करके सब काम करना, तब वह तेरे लिये सीधा मार्ग निकालेगा” (नीतिवचन 3:5–6)।
परमेश्वर पर “अपने सारे मन से” भरोसा रखने की आज्ञा का अर्थ है कि हम अपने आप को पूर्ण रूप से उसकी देखरेख में सौंप दें। दूसरे शब्दों में कहें तो, हम अपने धन के बजाय परमेश्वर पर भरोसा करते हैं। सुलैमान हमें बता रहा है कि हमें विश्वास करना चाहिए कि परमेश्वर वही है जो वह कहता है, और इसका अर्थ यह है कि वह हमारी प्रत्येक आवश्यकता को पूरा कर सकता है। हमें परमेश्वर के स्वभाव पर भरोसा करना है और उसकी प्रतिज्ञाओं पर विश्वास करना है। अतः उदाहरण के लिए, जब परमेश्वर कहता है कि वह हमें “कभी न छोड़ेगा और न त्यागेगा,” तो हमें विश्वास करना चाहिए कि यह वास्तव में सत्य है।
परमेश्वर के प्रति कृतज्ञता और उस पर अपने भरोसे को प्रकट करने के तरीकों में से एक यह है कि हम अपनी कलीसिया को और साथ ही दूसरों को भी उदारता से दें। हमें दोषी होने का एहसास या दबाव में आकर नहीं देना चाहिए। इसके स्थान पर, हमें प्रसन्नता, आनन्द और स्वतंत्रता के साथ, परमेश्वर और अपने पड़ोसी के प्रति प्रेम से देना चाहिए। हमारा देना इस बात को स्वीकार करते हुए होना चाहिए कि स्वयं परमेश्वर हमारे प्रति उदार है। प्रेरित पौलुस के इस वचन पर विचार करें:
“और केवल वही नहीं पर हम भी जिनके पास आत्मा का पहला फल है, आप ही अपने में कराहते हैं; और लेपालक होने की, अर्थात् अपनी देह के छुटकारे की प्रतीक्षा करते हैं। 24 आशा के द्वारा तो हमारा उद्धार हुआ है।” (रोमियों 8:23-24अ)
“आत्मा का पहिले फल” उद्धार का “पहला बयाना” है और वह प्रतिज्ञा है जो युग के अन्त में हमारे पूर्ण छुटकारे को सुनिश्चित करती है। पौलुस ने अन्य स्थान पर लिखा है:
“और उसी में तुम पर भी जब तुम ने सत्य का वचन सुना, जो तुम्हारे उद्धार का सुसमाचार है, और जिस पर तुम ने विश्वास किया, प्रतिज्ञा किए हुए पवित्र आत्मा की छाप लगी।,” वह उसके मोल लिए हुओं के छुटकारे के लिये हमारी विरासत का बयाना है, कि उसकी महिमा की स्तुति हो।” (इफिसियों 1:13–14)
“पहला बयाना” का अर्थ है कि अभी और भी बयाना आना शेष हैं। परमेश्वर ने हमें धर्मी ठहराया है और सुरक्षित रखा है, और आने वाले जगत में हमें महिमा देने की प्रतिज्ञा की है। हमारा धर्मी ठहराया जाना मसीह के बहाए गए लहू के द्वारा हमारे पापों की क्षमा पर आधारित है। हमारी सुरक्षा पवित्र आत्मा की छाप के द्वारा होती है। और जब हम परमेश्वर की उपस्थिति में होंगे, तब हमें भविष्य में महिमा प्राप्त होगी। परमेश्वर हमारे प्रति उदार और अनुग्रहकारी है। हम परमेश्वर की अपने प्रति उदारता को इस प्रकार स्वीकार करते हैं कि हम अपनी “पहिली उपज” के द्वारा सबसे पहले उसका आदर करते हैं। इसलिए, आपको जिस भी प्रकार की आय प्राप्त हो, उसके साथ सबसे पहले परमेश्वर का आदर करें।
कंजूसी समृद्धि को रोकती है
आइए परमेश्वर का सबसे पहले सम्मान करने की तुलना कंजूसी से करते हैं। परमेश्वर के स्वरूप में रचे जाने का एक हिस्सा नैतिक कार्य करने की क्षमता होना है। नैतिक कार्य करने की क्षमता से मेरा तात्पर्य है कि किसी व्यक्ति की अपनी क्षमता के अनुसार निर्णय लेने की सामर्थ्य, जिसके द्वारा वह संसार में कार्य कर सकता है और संसार में होने वाले परिवर्तनों को प्रभावित या रोक सकता है। परिभाषा के अनुसार उदारता, कार्य करने के क्षमता के रूप का प्रतिनिधित्व करती है। जब हम देते हैं, तो हम अपने संसाधनों के द्वारा किसी दूसरे व्यक्ति या परिस्थिति में हस्तक्षेप करते हैं ताकि भलाई हो सके। जब हम दम्पति के रूप में या व्यक्तिगत रूप से देते हैं, तो हम परमेश्वर की उदारता को दर्शाते हैं। और हम किस उद्देश्य से देते हैं? कुछ हद तक हम इसलिए देते हैं ताकि हम और अधिक फल-फूल सकें। हाँ, हम परमेश्वर की महिमा के लिए देते हैं। और हाँ, हम दूसरों की भलाई के लिए भी देते हैं। लेकिन इसमें इससे भी अधिक है। जब हम परमेश्वर की आज्ञा का पालन करते हैं और उसकी उदारता के उदाहरण का अनुसरण करते हैं, तो यह वास्तव में हमारे भले के लिए और हमारी उन्नति तथा समृद्धि के लिए कार्य करता है! संसार यह सोचता है कि दम्पतियों को अपना सारा धन अपने ही ऊपर खर्च करना चाहिए, यही सबसे अच्छा है और ऐसा करने से ही संपन्नता आती है है, परन्तु बाइबल का तर्क इसके ठीक विपरीत है! हम अपने वैवाहिक सम्बन्ध में तब आगे बढ़ते हैं जब हम देते रहते हैं!
इसकी तुलना उन लोगों के दृष्टिकोण से करें जो सोचते हैं कि, “मैं संसार में कोई बदलाव नहीं ला सकता,” या “मैं जो करता हूँ उसका कोई महत्व नहीं है।” ऐसी सोच में न तो कोई आशा होती है और न ही कोई उद्देश्य होता है। जो लोग अभाव, कमी और असुरक्षा से भरे हुए संसार में जीते हैं, वे अधिकाँश वस्तुओं को जमा करके रखने लगते हैं। और इसके परिणाम में एक अलग प्रकार की दरिद्रता सामने आती है, जैसे चिन्ता ग्रस्त रहना, स्वयं को असुरक्षित महसूस करना और असंतुष्ट बना रहना। परमेश्वर के लोगों को ऐसा नहीं होना चाहिए। क्योंकि परमेश्वर “दया का धनी” है (इफिसियों 2:4)। परमेश्वर के द्वारा छुटकारा पाए हुए और उसके स्वरुप को धारण करने वाले होने के नाते हमें उद्देश्य और अर्थ मिलता है। इसलिए हमारे निर्णय महत्वपूर्ण हैं, हमारी उदारता महत्वपूर्ण है, और हमारी उदारता अनन्तकाल को प्रभावित करती है।
मेरा बेटा, गेब्रियल, गोद लिया हुआ है। जैसा कि आप शायद जानते हैं, कि गोद लेना एक बहुत ही महँगी प्रक्रिया होती है। हमने खर्चे का एक हिस्सा स्वयं चुकाया, लेकिन दूसरों की उदारता के कारण वह आर्थिक बोझ बहुत कम हो गया था। दूसरों के द्वारा दिखाई गई उदारता के बिना शायद हमारे लिए गोद लेना संभव ही नहीं होता। गोद लेने से गेब्रियल का जीवन बदल गया। और इससे भी अधिक, उसने हमारे परिवार के जीवन को भी बदल दिया है। अब गेब्रियल एक ऐसे परिवार का सदस्य है जहाँ उससे प्रेम किया जाता है, उसकी देखभाल की जाती है, और अब वह प्रतिदिन सुसमाचार सुनता है। क्या आप देख सकते हैं कि उदारता कितनी आसानी से अनन्त प्रभाव डाल सकती है? मुझे आशा है कि हम इसकी गंभीरता को महसूस करेंगे। जब हम त्यागपूर्वक देते हैं, तो यह हमारे भीतर के लोभ और स्वार्थ को दूर कर देता है और दूसरों से अधिक प्रेम करने की हमारी क्षमता को और गहरा कर देता है। देना उपभोक्तावाद और स्वयं के आलस्य के विरुद्ध संघर्ष करता है।
बुद्धि और परिश्रम से बचत करें
लेकिन इससे पहले कि आप यह सोचें कि “मुझे और मेरे जीवनसाथी को सब कुछ दान कर देना चाहिए,” आइए हम धन और संपत्ति के प्रति अपने दृष्टिकोण में बुद्धिमानी अपनाएँ। हमें धन के विषय में अपनी सोच में संतुलित तथा सम्पूर्ण होना चाहिए। हम सब कुछ दान कर दें और अपने आप को “आत्मिक” या “भक्तिपूर्ण” महसूस करें, लेकिन यदि इससे हमारे अन्य उत्तरदायित्वों को हानि पहुँचती है, तो यह वास्तव में मूर्खता हो सकती है। पौलुस तीमुथियुस से कहता है कि “अपने परिवार का पालन-पोषण करो,” और यदि तुम ऐसा नहीं करते, तो तुमने “विश्वास का इनकार कर दिया है” और “एक अविश्वासी से भी बुरे हो” (2 तीमुथियुस 5:8)। क्या आप इससे भी गंभीर आरोप का विचार कर सकते हैं: “तुमने विश्वास का इनकार कर दिया है और तुम अविश्वासी से भी बुरे हो”? अपने परिवार के लिए धन का प्रबंधन करना स्वार्थी नहीं, वरन् बुद्धिमानी है। एक बार फिर सुलैमान लिखता है, “जो काम में ढिलाई करता है, वह निर्धन हो जाता है, परन्तु कामकाजी लोग अपने हाथों के द्वारा धनी होते हैं। बुद्धिमान सन्तान धूपकाल में फसल बटोरता है, परन्तु जो सन्तान कटनी के समय भारी नींद में पड़ा रहता है, वह लज्जा का कारण होता है” (नीतिवचन 10:4-5)।
धन प्रबंधन हमारे परिवारों की देखभाल करने में कैसे सहायता करता है? ठीक है, धन हमें सुरक्षा प्रदान कर सकता है: “धनी का धन उसका दृढ़ नगर है, परन्तु कंगाल की निर्धनता उसके विनाश का कारण हैं” (नीतिवचन 10:15)।
अचानक होने वाले खर्च तो हर समय होते रहते हैं। जैसे हमें नल सम्बन्धी समस्याएँ होती हैं, टायर घिस जाते हैं, और बहुत सी वस्तुएँ टूट-फूट जाती हैं। फिर भी, हममें से बहुत से लोग इन बातों के लिए योजना नहीं बनाते हैं, जबकि भीतर ही भीतर हम जानते हैं कि अचानक से होने वाले खर्चे स्वाभाविक है। कई बार संकट आ जाते हैं। आपको अचानक चिकित्सा का खर्च उठाना पड़ सकता है, नौकरी छूट सकती है, या फिर आप दिवालिया हो सकते हैं। आपको ऐसी परिस्थितियों से अपनी रक्षा करने और अपना “दृढ़ नगर” बनाने के लिए बचत करनी चाहिए। ऐसा करना आर्थिक उत्तरदायित्व का एक हिस्सा है। क्या आप जानते हैं कि आप और आपके जीवनसाथी, इन तरीकों से अपनी और अपने बच्चों का दायित्व निभाते हैं? क्योंकि यह आपका उत्तरदायित्व है, इसलिए आपको बुद्धिमानी से अपने धन का कुछ हिस्सा बचाना चाहिए। निश्चय ही, बचत करना एक काम है। परन्तु यह बुद्धिमानी का काम है!
बाइबल सृष्टि और बचत में विवेक के एक उदाहरण की ओर भी संकेत करती है। नीतिवचन 6:6-8 कहता है:
हे आलसी, चींटियों के पास जा;
उनके काम पर ध्यान दे, और बुद्धिमान हो जा।
उनके न तो कोई न्यायी होता है,
न प्रधान, और न प्रभुता करनेवाला,
फिर भी वे अपना आहार धूपकाल में संचय करती हैं,
और कटनी के समय अपनी भोजनवस्तु बटोरती हैं।
चींटी आर्थिक लक्ष्यों या सेवानिवृत्ति की योजना के बारे में नहीं सोचती है। वह केवल आने वाली परिस्थिति के लिए तैयारी करती है। नीतिवचन हमें उद्देश्य के साथ और लगातार तैयारी करने की बुद्धिमानी की ओर संकेत करता है। एक चींटी बिना किसी बहाने के आगे की तैयारी कर सकती है। तो फिर हम जो परमेश्वर के स्वरूप में रचे गए हैं, हमें कितना अधिक परिश्रम और विवेक के साथ तैयारी करनी चाहिए! संसाधनों का प्रबंधन करना ईश्वरीय अनुशासन है।
विवेक और खराई के साथ खर्च करें।
यद्यपि बचत करने के लिए परिश्रम और अनुशासन की आवश्यकता होती है, फिर भी वही अन्तिम उद्देश्य नहीं है। हम केवल धन का ढेर लगाने के लिए बचत नहीं करते—वरन् हम बचत इसलिए करते हैं कि बुद्धिमानी से जीवन बिताएँ, उदारता से दें, और विचार करके खर्च करें।
परन्तु हम जो कुछ बचाते हैं, उसे किस प्रकार खर्च करते हैं, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है। वास्तव में, हमारा खर्च प्रायः हमारी आय-व्यय की योजना से अधिक हमारे हृदय की दशा को प्रकट करता है। यदि बचत आत्म-संयम की परीक्षा है, तो खर्च चरित्र की परीक्षा है। अब आइए देखें कि नीतिवचन हमें किस प्रकार की बुद्धिमानी और उद्देश्य के साथ खर्च करने की चुनौती देता है।
सुलैमान लिखता है, “धन और प्रतिष्ठा, शाश्वत धन और धार्मिकता मेरे पास हैं” (नीतिवचन 8:18)। हमें बुद्धि की खोज करनी चाहिए, ताकि धन “स्थिर” बना रहे। बुद्धिमानी से खर्च करने के लिए आपको बुद्धि और समझ की आवश्यकता होगी। धन के प्रबन्ध के विषय में बुद्धिमान पत्नी का वर्णन किस प्रकार से किया गया है, इस पर ध्यान दें:
वह समझती है कि उसका व्यापार लाभदायक है। रात को उसका दीपक नहीं बुझता। वह अपने हाथों से चरखा चलाती है। और उसके हाथों में तकली है। वह निर्धन के लिए अपना हाथ खोलती है और दीन जनों की ओर अपने हाथ बढ़ाती है। (नीतिवचन 31:18-20)
वह विवेकशील है और बाज़ार तथा अपने उत्पादन के मूल्य को समझती है। इतना ही नहीं, वह केवल लाभ ही नहीं कमाती, वरन् “निर्धन के लिए अपने हाथ खोलती है।”
जहाँ बुद्धि स्थिर रहने वाले धन की ओर ले जाती है, वहीं आलस्य और मूर्खतापूर्ण व्यवहार निर्धनता की ओर ले जाता है। “जो काम में ढिलाई करता है, वह निर्धन हो जाता है, परन्तु कामकाजी लोग अपने हाथों के द्वारा धनी होते हैं” (नीतिवचन 10:4)।
मूर्खता या अविवेकपूर्ण खर्च में सामाजिक दिखावे को बनाए रखने का प्रयास करना, और मन बहलाने के लिए मनमाने ढँग से खर्च करना, पापमय आलस्य, अपनी सामर्थ्य से बढ़कर जीवन बिताना, या भौतिकवाद में इस प्रकार डूब जाना सम्मिलित हो सकता है कि उससे भारी ऋण का बोझ उत्पन्न हो जाए। और फिर भी, सुलैमान ने कहा, “जो रागरंग से प्रीति रखता है, वह कंगाल हो जाता है; और जो दाखमधु पीने और तेल लगाने से प्रीति रखता है, वह धनी नहीं होता” (नीतिवचन 21:17)।
इसका यह अर्थ नहीं कि हम अच्छी वस्तुएँ नहीं रख सकते, या किसी अच्छी यात्रा पर जाकर सुन्दर स्मृतियाँ नहीं बना सकते। परन्तु जब हम अपनी क्षमता से बढ़कर जीवन बिताने लगते हैं, तब हम बुद्धिमानी की सीमा पार करके मूर्खता में प्रवेश कर जाते हैं।
संक्षेप में कहें तो, धन के प्रति बाइबल आधारित दृष्टिकोण यह है कि हम पहले परमेश्वर का आदर करें, बुद्धिमानी से बचत करें, और विवेक के साथ खर्च करें। हम प्रभु का सम्मान अपनी पहली उपज अर्पित करके करते हैं—यह कोई बाद का विचार नहीं, वरन् हमारे भरोसे की एक घोषणा है। फिर हम भय या बचत की लालसा से नहीं, परन्तु बुद्धिमानी और उद्देश्य के साथ बचत करते हैं—क्योंकि हम केवल उपभोक्ता ही नहीं, वरन् भण्डारी भी हैं। और अन्त में, हम यह जानते हुए सोच-समझकर खर्च करते हैं, कि प्रत्येक रुपया उस वस्तु को दर्शाता है जिसे हम महत्व देते हैं। त्याग करना, बचत करना और खर्च करना केवल आर्थिक श्रेणियाँ नहीं हैं—वरन् ये आत्मिक अनुशासन हैं, जो यह प्रकट करते हैं कि हम वास्तव में किसकी या किस वस्तु की आराधना करते हैं।
—
चिन्तन के लिए प्रश्न:
- अपने धन के साथ परमेश्वर का भय मानना हमारे धन प्रबंधन के दृष्टिकोण को कैसे प्रभावित करता है?
- जब आप बड़े हो रहे थे तो उस समय संसाधनों के प्रबंधन के विषय में आपको क्या सन्देश और शिक्षा मिली है?
- क्या आपने अपने जीवनसाथी के साथ वित्तीय उत्तरदायित्व के विषय में चर्चा की है? आपने दम्पति के रूप में मिलकर वित्तीय मामलों को कैसे सम्भाला है?
—
भाग III: वैवाहिक जीवन में धन सम्बन्धी एकता
हमने अभी-अभी देखा है कि बाइबल के अनुसार, मसीही होने के नाते हमारे धन के लक्ष्यों को किन बातों से आकार मिलना चाहिए—पहले परमेश्वर का आदर करना, धन से अधिक उसका भय मानना, बुद्धिमानी से बचत करना, और विवेक के साथ खर्च करना। ये केवल व्यक्तिगत लक्ष्य नहीं हैं; वरन् ये साझा लक्ष्य हैं।
परन्तु सच्चाई यह है कि: धन के बारे में आपका सिद्धान्त कितना भी अच्छा क्यों न हो, परन्तु यदि आप और आपके जीवनसाथी की एक ही सोच नहीं होती है, तो उसका अधिक लाभ नहीं होता है।
आपके पास सबसे अच्छा बजट और अच्छी मंशा हो सकती है, लेकिन यदि आप दोनों विपरीत दिशाओं में चल रहे हैं, तो न केवल योजना ही सफल नहीं होगी, वरन् इससे तनाव और संघर्ष भी उत्पन्न होगा। विवाह और धन आपस में गहराई से जुड़े हुए हैं। वैवाहिक जीवन में धन केवल संख्याओं का विषय नहीं होता हैं। ये विश्वास, पारदर्शिता, एकता और मूल्यों से जुड़े हुए होते हैं। तो अब हम इस प्रश्न पर आते हैं: दम्पति अपने पैसे को किस प्रकार से बाँटें ताकि उसमें एकता और बाइबल आधारित भण्डारीपन झलक सके?
एक देह, एक बैंक खाता
उत्पत्ति 2:24 कहता है, “इस कारण पुरुष अपने माता-पिता को छोड़कर अपनी पत्नी से मिला रहेगा और वे एक ही तन बने रहेंगे।” यह पति-पत्नी के बीच बंधी गहरी वाचा पर आधारित सम्बन्ध का वर्णन करता है, जहाँ दो अलग-अलग व्यक्ति शारीरिक, भावनात्मक और आत्मिक रूप से नए, अटूट सम्बन्ध में जुड़ जाते हैं।
इसका अर्थ यह है कि वे अब दो प्रतिस्पर्धी व्यक्तियों के समान नहीं, वरन् एक आपस में जुड़े हुए जोड़े के रूप में कार्य करते हैं—अर्थात् परमेश्वर की योजना के अनुसार साझा उद्देश्य, साझा उत्तरदायित्व और साझा जीवन के साथ जुड़े हुए हैं। वैवाहिक जीवन में पैसे के विषय में, यह केवल धन के प्रबंधन की बात नहीं है, वरन् परमेश्वर की योजना के अंतर्गत एक साझा जीवन के प्रबंधन की बात है। मुझे नहीं लगता कि बाइबल यह स्पष्ट रूप से कहती है कि अलग-अलग बैंक खाते रखना पाप है। अलग-अलग खाते रखने के अच्छे कारण भी हो सकते हैं, जैसे कि यदि किसी एक जीवनसाथी का अपना व्यवसाय है और उसे लेखा-जोखा रखने के लिए एक अलग व्यावसायिक खाता रखने की आवश्यकता हो सकती है। हालाँकि, वैवाहिक जीवन में धन के संदर्भ में, मेरा मानना है कि आपके और आपके जीवनसाथी के लिए अलग-अलग खाते रखना बुद्धिमानी नहीं है।
यदि “एक तन” का मिलन इस बात पर आधारित है कि पति-पत्नी अविभाज्य साथी हैं, तो इसमें निश्चित रूप से हमारे पैसे भी सम्मिलित होने चाहिए। यह विशेष रूप से इसलिए भी सच है क्योंकि बाइबल अधिकाँश हमारे सम्बन्धों में धन को उन बातों से जोड़ती है जो हमारे लिए सबसे अधिक महत्वपूर्ण होती हैं। मैं समझता हूँ कि पारदर्शिता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच तनाव हो सकता है, लेकिन आइए कुछ आँकड़ों को देखते हैं।
गेट मारिड पुस्तक में ब्रैड विलकॉक्स यह तर्क देते हैं कि जिन दम्पतियों ने अपना पैसा साझा करके रखा था, उनके तलाक होने की संभावना उन दम्पतियों की तुलना में 20% से भी अधिक कम थी जो अपने पैसे को अलग-अलग रखते थे। इसके अतिरिक्त, कई स्रोत यह भी बताते हैं कि साझा चालू खाते का सम्बन्ध कम तलाक दर और अधिक वैवाहिक संतुष्टि में पाया गया है (जैसे परिवारिक अध्ययन संस्थान)। आँकड़े स्पष्ट रूप से दिखाते हैं कि मिलकर धन का प्रबंधन करने से दीर्घकालिक परिणाम उत्तम होते हैं।
अब किसी बैंक के चालू खाते में कोई जादुई बात नहीं है। यह वैवाहिक सुख का कोई जादुई समाधान नहीं है। फिर भी, संयुक्त खाते पारदर्शिता को बढ़ाते हैं और पैसे के प्रति साझा दृष्टिकोण विकसित करने के लिए प्रेरित करते हैं, जो सम्बन्धों को बेहतर बनाता और सुरक्षित रखता है। उत्पत्ति में वर्णित “एक तन” का सम्बन्ध भले ही वैवाहिक घनिष्ठता की बात करता हो, परन्तु संयुक्त चालू खाता उससे बहुत निकट सम्बन्ध रखता है!
यदि आप खातों को पूरी रीति से मिलाने को लेकर अनिश्चित हैं, तो यह बात ध्यान में रखें कि यह नियंत्रण करने के विषय में नहीं है, और न ही यह एक-दूसरे के कार्य में हस्तक्षेप करने के विषय में है। अभी भी व्यक्तिगत विवेक के लिए स्थान है—जैसे कि हर जीवनसाथी के पास अपनी इच्छा से खर्च करने के लिए एक तय धनराशि का होना। अन्त में, किसी सम्बन्ध में धन सम्बन्धी विषयों को कैसे संभालना है, इस प्रकार का प्रश्न प्रत्येक दम्पति के लिए अलग हो सकता है, लेकिन इसमें साझा पारदर्शिता भी होनी चाहिए। आपको हर खरीदारी के लिए अनुमति माँगने की आवश्यकता नहीं होती, लेकिन आपको किसी भी समय यह देखने की सुविधा होनी चाहिए कि क्या हो रहा है।
स्मरण रखें कि मसीही विवाह में एकता का अर्थ समानता नहीं होता है। इसका अर्थ है कि हम एक ही दर्शन की ओर मिलकर काम कर रहे हैं और सम्बन्धों में धन को ईमानदारी और देखभाल के साथ मिलकर सम्भाल रहे हैं।
संयुक्त खाता इस प्रकार के साझा भण्डारीपन के लिए एक वातावरण बनाता है—और शोध तथा पवित्रशास्त्र दोनों यह पुष्टि करते हैं कि इससे अधिक दृढ़ और बेहतरीन विवाह सम्बन्ध विकसित होते हैं।
धन सम्बन्धी वार्तालाप
संक्षेप में बात यह है: कि आपको एक-दूसरे से पैसों के विषय में बात करनी चाहिए। मुझे पता है कि यह बात सतही रूप से अनावश्यक लग सकता है, लेकिन कई दम्पति केवल इसलिए समस्याओं में पड़ जाते हैं क्योंकि वे एक-दूसरे से बातचीत नहीं करते हैं और न ही स्पष्ट लक्ष्य तथा उद्देश्य निर्धारित करते हैं।
आप एक ही बैंक खाता साझा कर सकते हैं, फिर भी पैसे से सम्बंधित एकता साझा नहीं करते है। आप “एक तन” हो सकते हैं, फिर भी अपने धन सम्बन्धी भय, आदतों और लक्ष्यों के विषय में एक-दूसरे को पूरी रीति से समझने से चूक सकते हैं। जब आप एक-दूसरे से बात करें, तब यह ध्यान में रखना महत्वपूर्ण है कि आपकी चिन्ताएँ क्या हैं। अपने जीवनसाथी को समझने के उद्देश्य से उनकी बात सुनिए। इसका यह अर्थ नहीं है कि आप उनसे हर बात में सहमत होंगे, परन्तु जब तक आप एक-दूसरे को समझेंगे नहीं, तब तक एकता तक नहीं पहुँच पाएँगे। यह आवश्यक नहीं है कि प्रेरित याकूब पैसे के ही विषय में सोच रहा हो, लेकिन उसके वचन विवाह और धन के विषय में सत्य हैं:
“हर एक मनुष्य सुनने के लिये तत्पर और बोलने में धीर और क्रोध में धीमा हो। क्योंकि मनुष्य का क्रोध परमेश्वर की धार्मिकता का निर्वाह नहीं कर सकता है” (याकूब 1:19)।
जब आप एक-दूसरे से बातचीत करेंगे, तब भय, आदतें और पारिवारिक पृष्ठभूमि से जुड़ी समस्याएँ सामने आएँगी। यह असहज लग सकता है और आरम्भ में आपको समझ नहीं आएगा कि कैसे प्रतिक्रिया करें। परन्तु यह समझ लें कि यह पूरी रीति से सामान्य बात है। इस विषय में एक-दूसरे के साथ मिलकर प्रार्थना करें। अपनी राय या उत्तर देने से पहले, अपने जीवनसाथी को वही बात दोहराकर सुनाएँ जो आपने उन्हें कहते हुए सुना है। इस बात का ध्यान रखें कि आप उनके भय और चिन्ताओं को उचित रूप से प्रस्तुत करें। इससे सुरक्षा की भावनाएँ बहुत कम होंगी और परिस्थिति में स्पष्टता आएगी। इस बातचीत में आपका उद्देश्य उत्तेजना नहीं, वरन् स्पष्टता होनी चाहिए। एक और सहायक बात यह है कि योजना बनाने के लिए एक निश्चित समय निर्धारित करें। कुछ दम्पतियों के लिए ऐसा बार-बार करने की आवश्यकता होगी। जैसे-जैसे आप किसी योजना का पालन करने में बेहतर होते जाएँगे, वैसे-वैसे आपको कम सभाओं की आवश्यकता पड़ेगी। परन्तु वहाँ तक पहुँचने के लिए परिश्रम करना पड़ता है।
मूल्यों और दर्शन का तालमेल
“जहाँ दर्शन की बात नहीं होती, वहाँ लोग निरंकुश हो जाते हैं।” (नीतिवचन 29:18)
धन से सम्बन्धित बातचीत केवल अंकों के विषय में नहीं होती, परन्तु वे मूल्यों के विषय में भी होती हैं। हम जो खर्च करते हैं, बचत करते हैं और देते हैं, उससे पता चलता है कि हम सबसे अधिक किस बात को महत्व देते हैं। इसलिए जब हम खुलकर बातचीत करने लगते हैं, तब अगला कदम यह पूछना है कि: क्या हम एक ही लक्ष्यों की ओर बढ़ रहे हैं? क्या हमारे मूल्य एक समान हैं? क्या हमारे पास अपने आपसी जीवन के लिए कोई साझा दर्शन है—या हम केवल एक वेतन से दूसरे वेतन तक किसी प्रकार से निर्वाह कर रहे हैं? यह इसलिए महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि जो दम्पति अपने मूल्यों में एकता बनाए रखते हैं, वे अपने दर्शन में भी एकता बनाए रख सकते हैं—और जो दम्पति दर्शन साझा करते हैं, वे एकता में आगे बढ़ सकते हैं।
सामान्यतः धन के विषय में दो प्रकार की प्रवृत्तियाँ होती हैं—आप उन्हें खर्च करने वाला और बचत करने वाला कह सकते हैं। अपने जीवनसाथी के साथ एक समान दर्शन की ओर बढ़ते हुए, यह बात ध्यान में रखना सहायता करती है कि आप कौन हैं और आपका जीवनसाथी कौन है। अर्थात्, किसी सम्बन्ध में प्रायः एक व्यक्ति खर्च करने की प्रवृत्ति वाला होता है और दूसरा बचत करने की प्रवृत्ति वाला होता है। आप और आपके जीवनसाथी के बीच का अन्तर सम्भवतः वही स्थान है जहाँ आपके बहुत से टकराव उत्पन्न होते हैं। डेव रैम्से “अत्यधिक बचत करने वाला” और “खुले हाथ से खर्च करने वाला” जैसे शब्दों का प्रयोग करते हैं।
मैं समझता हूँ कि यह सहायक है, लेकिन इस गतिशीलता को समझाने के लिए बाइबल आधारित प्रतीकों का उपयोग करें। बचत करने वाला व्यक्ति नीतिवचन की चींटी के समान है। “हे आलसी, चींटियों के पास जा, उनके काम पर ध्यान दे, और बुद्धिमान हो जा।उनके न तो कोई न्यायी होता है, न प्रधान, और न प्रभुता करनेवाला,फिर भी वे अपना आहार धूपकाल में संचय करती हैं, और कटनी के समय अपनी भोजनवस्तु बटोरती हैं” (नीतिवचन 6:6-8)। यहाँ शिक्षा यह है कि चींटी दूरदर्शिता, अनुशासन और तैयारी का प्रतीक है। यह धन के प्रबन्धन और बचाकर रखने वाले व्यक्ति की उस प्रवृत्ति को दर्शाता है, जिसमें वह बचत करता है, ऋण से बचता है, और कठिन समय के लिए तैयारी करता है। यद्यपि ये सभी गुण अच्छे हैं, तौभी बचाकर रखने वाले व्यक्ति की प्रवृत्ति यह हो सकती है कि वह बचत करने में अति करने लगे, या परमेश्वर के स्थान पर अपनी बचत में ही सुरक्षा ढूँढ़ने लगे।
खर्च करने वाले व्यक्ति के लिए बाइबल आधारित छवि “आकाश के पक्षी” के समान है। यीशु ने कहा, “आकाश के पक्षियों को देखो! वे न बोते हैं, न काटते हैं, और न खत्तों में बटोरते हैं; तो भी तुम्हारा स्वर्गीय पिता उनको खिलाता है। क्या तुम उनसे अधिक मूल्य नहीं रखते?” (मत्ती 6:26)। पक्षी परमेश्वर के प्रावधान पर भरोसा रखने और भौतिक आवश्यकताओं के विषय में चिन्ता से स्वतंत्र रहने का चित्र प्रस्तुत करता है। यह धन और वैवाहिक सन्दर्भ में उस व्यक्ति की प्रवृत्ति को दर्शाता है, जो परमेश्वर के द्वारा दी गई वस्तुओं का आनन्द लेना और वर्तमान में जीना जानता है। यद्यपि परमेश्वर के द्वारा दी गई वस्तुओं का आनन्द लेना उत्तम है, तौभी खर्च करने वाले व्यक्ति की प्रवृत्ति यह हो सकती है कि वह उतावलापन करने लगे या भविष्य की योजना बनाने की अनदेखी करे।
प्रत्येक वैवाहिक जीवन के कार्यों में एक कार्य यह है कि आप और आपका जीवनसाथी, दोनों में से कौन कितना बचत करने वाला और कौन कितना खर्च करने वाला है, इन दोनों के बीच संतुलन बनाए रखें। पक्षी के समान विश्वास के बिना चींटी चिन्ताग्रस्त, भींच के रखने वाली, और कंजूस बन सकती है। चींटी की बुद्धिमानी के बिना पक्षी उतावला हो सकता है और बिना तैयारी के जीवन बिता सकता है। एक बार फिर सुलैमान यहाँ सहायक सिद्ध होता है। वह लिखता है, “यह अच्छा है कि तू इस बात को पकड़े रहे; और उस बात पर से भी हाथ न उठाए; क्योंकि जो परमेश्वर का भय मानता है वह इन सब कठिनाइयों से पार हो जाएगा” (सभोपदेशक 7:18)।
वैवाहिक जीवन को लाभ तब मिलता है, जब बचत करने वाला आनन्दपूर्वक उदार होना सीखे और खर्च करने वाला बुद्धिमानी से संयम रखना सीखे—इस प्रकार वे मिलकर विवेक और विश्वास दोनों को दर्शाते हैं। अपने मूल्यों और दर्शन को एक-दूसरे के अनुरूप बनाने की प्रक्रिया में मुख्य बात यह समझना है कि आप दोनों को एक-दूसरे की आवश्यकता है।
कहाँ से आरम्भ करें?
पहले, लिखित बजट से आरम्भ कीजिए। प्रत्येक आर्थिक उत्तरदायित्व कार्यक्रम या योजना बनाने वाला आपको यही बताएगा। आप अपना बजट कागज़ पर, एक्सेल तालिका में, या अपने फ़ोन के किसी एप में रख सकते हैं। इससे वास्तव में कोई अन्तर नहीं पड़ता। मुख्य बात यह है कि आपके पास कुछ ऐसा हो जो स्पष्ट रूप से सामने दिखाई दे। आपको अपनी आय और व्यय स्पष्ट रूप से देखने चाहिए। यदि वैवाहिक जीवन में आर्थिक समस्याएँ हो रही हैं, तो बजट रखने से यह पहचानने में सहायता मिलती है कि समस्या आय की है या व्यय की। कभी-कभी दोनों ही समस्याएँ हो सकती हैं। परन्तु यदि आपको यह नहीं पता कि आपका धन कहाँ जा रहा है, तो आप उसे सही दिशा में नहीं ला सकते हैं।
जब आप यह देख लेते हैं कि आपका धन कहाँ जा रहा है, तो अब समय है कि आप अपने धन को उस दिशा में ले जाएँ जहाँ आप उसे ले जाना चाहते हैं। इसे “शून्य-आधारित बजट” कहा जाता है, जिसमें आप अपनी आय के हर रुपये को खर्च करने का स्थान (जैसे बचत, ऋण चुकाना आदि), देकर अपनी आय को शून्य कर देते हैं।
यदि आपकी समस्या अधिक खर्च करने की है (अर्थात आय से अधिक खर्च करना), तो बजट आपको यह देखने में सहायता करता है कि कहाँ कटौती की जा सकती है। परन्तु यह ध्यान रखना महत्त्वपूर्ण है कि अधिक खर्च करने की प्रवृत्ति आसानी से संघर्ष का कारण बन सकती है। आप अपने जीवनसाथी से उनके अधिक खर्च करने और लापरवाही के कारण नाराज़ हो सकते हैं। यहीं पर सुसमाचार अत्यन्त महत्वपूर्ण हो जाता है। “एक दूसरे पर कृपालु, और करुणामय हो, और जैसे परमेश्वर ने मसीह में तुम्हारे अपराध क्षमा किए, वैसे ही तुम भी एक दूसरे के अपराध क्षमा करो” (इफिसियों 4:32)। यदि आप दोनों मिलकर एक योजना के साथ आगे बढ़ने के लिए समर्पित हैं, तो यह एक-दूसरे के प्रति अनुग्रह दिखाने और अपने सम्बन्ध में विश्वास व तालमेल बढ़ाने का अवसर बन जाता है, साथ ही आप अपनी खर्च करने की आदतों को स्पष्ट रूप से समझ पाते हैं।
आपके परिवार की आय कितनी है और वह किस प्रकार खर्च हो रही है, इसे स्पष्टता से देखने के बाद आप एक दम्पति के रूप में अपने धन सम्बन्धी उद्देशय साझा करना आरम्भ कर सकते हैं। आप दान देने, सेवानिवृत्ति की योजना बनाने, या ऋण कम करने के बारे में बातचीत कर सकते हैं। यह वह समय है जब आप और आपके जीवनसाथी मिलकर यह सहमति बनाते हैं कि आपके जीवन में सबसे अधिक महत्त्व किस बात को दिया जाएगा। वैवाहिक जीवन में आर्थिक एकता की ओर एक कदम यह है कि आप साझा उद्देश्य और लक्ष्य विकसित करें। आप दोनों के साझा धन को उसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए बनाया गया है।
वैवाहिक जीवन में साझा आर्थिक उद्देश्यों के कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं:
— “हम साधारण जीवन जीना चाहते हैं ताकि हम उदारता से दे सकें।”
— “हम आर्थिक सुरक्षा बनाना चाहते हैं ताकि हम अपने बच्चों के साथ अधिक समय बिता सकें।”
— “हम ऋण से स्वतंत्र रहना चाहते हैं ताकि हम सुसमाचार-प्रचार या सेवकाई के लिए उपलब्ध हो सकें।”
— “हम अपने बच्चों के लिए भण्डारीपन और संतुष्ट होने का नमूना प्रस्तुत करना चाहते हैं।”
यदि आपके पास एक साझा उद्देश्य है, तो आप वैवाहिक जीवन में धन से जुड़े उन संघर्षों और समस्याओं से बच सकते हैं, जो अधिकतर ऐसे तर्कों में बदल जाते हैं, जैसे “तुम इतना अधिक क्यों बचा रहे हो?” “हम उस यात्रा पर क्यों नहीं जा सकते?” “हम ऐसा क्यों नहीं कर सकते [रिक्त स्थान भरें]?” परमेश्वर ने आपके वैवाहिक जीवन के लिए एक उद्देश्य रखा है, और आपका धन उस उद्देश्य की सेवा के लिए है।
—
चिन्तन के लिए प्रश्न:
- हम क्या चाहते हैं कि हमारा धन हमारे विषय में कहे?
- हमें किस प्रकार का जीवन जीने के लिए बुलाया जाना महसूस होता है?
- वैवाहिक जीवन में हमारे धन को राज्य की किन प्राथमिकताओं के द्वारा आकार मिलना चाहिए?
—
भाग IV: सामान्य चुनौतियाँ एवं बाइबल आधारित बुद्धि
हमने उन कुछ आर्थिक उद्देश्यों को प्रस्तुत किया है जिनके द्वारा प्रत्येक मसीही दम्पति के जीवन को आकार मिलना चाहिए—जैसे सबसे पहले परमेश्वर का आदर करना, बुद्धिमानी से बचत करना, और विवेक के साथ खर्च करना। ये अच्छे और बाइबल आधारित उद्देश्य हैं। परन्तु सच्चाई यह है कि केवल यह जान लेना कि हमें क्या करना चाहिए इसका अर्थ यह नहीं है कि हम उसे हमेशा करते भी हैं।
जीवन अव्यवस्थित है। हम अचानक से आने वाली आपात स्थितियों से चौंक जाते हैं। और तब ऋण लेते हैं। हम भय और स्वार्थ से संघर्ष करते हैं। कभी-कभी हमने यह सीखा ही नहीं होता है कि धन का बुद्धिमानी से प्रबन्ध कैसे किया जाए, और कभी-कभी हमने ऐसे निर्णय लिए होते हैं जिन पर अब हमें पछतावा होता है। हो सकता है कि आपको यह भी समझ न आ रहा हो कि आरम्भ कहाँ से करें। यह भारी पड़ सकता है। और इससे लज्जित होने का एहसास भी हो सकता है।
इन संघर्षों के मूल में आर्थिक उत्तरदायित्व और सम्बन्ध व धन की दैनिक वास्तविकताओं के बीच का तनाव होता है—एक ऐसा तनाव जिसका सामना हर दम्पति को किसी न किसी समय करना पड़ता है। यह अगला भाग लज्जा के विषय में नहीं है—यह अनुग्रह और वृद्धि के विषय में है। परमेश्वर हमारे जीवन में आर्थिक तनाव और असंतुलन के उन वास्तविक और कठिन स्थानों में भी बात करता है। नीतिवचन की—और सम्पूर्ण बाइबल की—सुन्दरता यह है कि यह केवल आदर्श ही नहीं है, वरन् यह हमें तब भी बुद्धि देती है जब हम लक्ष्य से चूक जाते हैं, और यह हमें आगे बढ़ने के लिए मार्गदर्शन भी प्रदान करती है।
आइए कुछ उन सामान्य आर्थिक चुनौतियों की बात करें जिनका दम्पति सामना करते हैं, और देखें कि परमेश्वर का वचन हमें उनका सामना करने के लिए कैसे बुद्धि देता है—दोषी ठहराकर नहीं, वरन् आशा के साथ।
आपातकालीन कोष बनाएँ
“चतुर मनुष्य विपत्ति को आते देखकर छिप जाता है; परन्तु भोले लोग आगे बढ़कर दण्ड भोगते हैं” (नीतिवचन 22:3)।
समस्याएँ बताकर नहीं आती हैं। कठिनाइयाँ हमेशा आती रहती हैं। परन्तु स्मरण रखें कि पैसे की बचत करना जमाखोरी या स्वार्थ नहीं, वरन् भण्डारीपन और तैयारी है। जब वित्तीय लक्ष्यों की बात आती है, तो आपको एक स्पष्ट उद्देश्य की आवश्यकता होती है। जब आप आपातकालीन कोष के उद्देश्य से बचत कर रहे हों, तो आपको यह समझना चाहिए कि यह पैसा आपकी छुट्टियों या “मनोरंजन” के लिए नहीं है। यह तो विशेष रूप से आपातकालीन स्थितियों के लिए रखा जाता है।
हमें कितनी बचत करनी चाहिए?
एक सामान्य सलाह यह है कि कम से कम ₹1,000/- की बचत से आरम्भ करें। आर्थिक रूप से सफल होने की कुंजी केवल एक निर्णय नहीं, वरन् निर्णयों की एक श्रृंखला होती है। समय के साथ आप अपने आपातकालीन कोष को बढ़ा सकते हो। आपका अगला लक्ष्य 3 से 6 महीनों के आवश्यक खर्चों के बराबर की बचत करना हो सकता है। संभवतः यह बहुत अधिक लगे, परन्तु छोटे से आरम्भ करें और लगातार करते रहें। “धोखे से कमाया धन जल्दी घटता है, परन्तु जो अपने परिश्रम से बटोरता, उसकी बढ़ती होती है” (नीतिवचन 13:11)। अपना आपातकालीन कोष बनाने के लिए, अपने सभी ऋणों की न्यूनतम किश्तें चुकाते रहे और अपनी सारी अतिरिक्त धनराशि की बचत करते रहें। जब आप उस आरम्भिक लक्ष्य, अर्थात् 1,000 रुपए तक पहुँच जाते हैं, तब आप ऋण कम करने पर ध्यान केंद्रित कर सकते हैं।
ऋण का भुगतान
जब मैं लोगों से पैसे के विषय में बात करता हूँ, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि अधिकाँश लोग ऋण में डूबे हुए हैं। यदि आप ऋण से स्वतंत्र हैं, तो आप पहले से ही दूसरों से आगे हैं।
“धनी निर्धन पर प्रभुता करता है, और उधार लेने वाला उधार देने वाले का दास होता है।” (नीतिवचन 22:7)
ऋण आपको असुरक्षा की स्थिति में डाल सकता है, आपकी स्वतंत्रता को सीमित कर सकता है, और चिन्ता बढ़ा सकता है। इसलिए जहाँ तक सम्भव हो, ऋण लेने से बचना चाहिए।
“जो लोग हाथ पर हाथ मारते हैं, और कर्जदार के उत्तरदायी होते हैं, उनमें तू न होना। यदि तेरे पास भुगतान करने के साधन की कमी हो, तो क्यों न साहूकार तेरे नीचे से खाट खींच ले जाए?” (नीतिवचन 22:26-27)
इस अंश में सुलैमान किसी दूसरे के ऋण पर जामिन बनने के विरुद्ध चेतावनी दे रहा है, क्योंकि वह नहीं चाहता कि आप अपनी सामर्थ्य से अधिक भार उठाओ। अब ऋण लेना पाप नहीं है, लेकिन यह एक गंभीर बोझ बन सकता है। आपको यह जाँचने की आवश्यकता है कि आपके पास किस प्रकार का ऋण है, या आप किस प्रकार का ऋण लेने के लिए तैयार हो सकते हैं।
विभिन्न प्रकार के ऋणों को देखने से पहले यह स्मरण रखना उचित है कि आर्थिक उत्तरदायित्व शिष्यत्व के केंद्र में है। पवित्रशास्त्र लगातार यह दिखाता है कि बुद्धिमानी से लिए गए आर्थिक निर्णय केवल व्यावहारिक ही नहीं, वरन् वे आज्ञाकारिता के आत्मिक कार्य भी होते हैं। और वैवाहिक जीवन में, वित्तीय विषयों की अनदेखी करना प्रायः केवल “वित्तीय” स्तर तक सीमित नहीं रहते हैं। कई दम्पतियों को यह पता चलता है कि सम्बन्धों में पैसों से जुड़ी समस्याएँ वास्तव में गहरे भय, असुरक्षाओं या अनकही अपेक्षाओं को प्रकट करती हैं। पैसे को बुद्धिमानी से संभालना सीखना, उन मुख्य तरीकों में से एक तरीका बन जाता है जिनके द्वारा आप अपने जीवनसाथी से अच्छे ढँग से प्रेम करना सीखते हैं।
आइए, सबसे पहले “अच्छे” प्रकार के ऋण से आरम्भ करते हैं। घर के लिए लिया गया गिरवी ऋण इसी प्रकार के ऋण में आता है। गिरवी ऋण आपको स्वामित्व में हिस्सा बनाने में सहायता करता है और यह एक अच्छा दीर्घकालिक संपत्ति का साधन है। शेयर और ऋणपत्रों के विपरीत, आपका निवेश एक भौतिक संपत्ति होता है। निश्चित ही, आप चाहेंगे कि वह गिरवी ऋण उचित सीमा के भीतर हो। वित्तीय विशेषज्ञ सामान्यतः यह सलाह देते हैं कि आपकी कुल मासिक आय का लगभग 25% ही आपके गृह ऋण की किस्त होनी चाहिए।
एक छोटा सा उदाहरण समझने में सहायक हो सकता है। जैसे कि यदि आपके परिवार की कुल मासिक आय ₹7,000/- है, तो इस आय का 25% ₹1,750/-होगा। इस नियम के अनुसार, आपको यह लक्ष्य रखना चाहिए कि आपका कुल गृह ऋण, कर और बीमा मिलाकर लगभग ₹1,750 के आसपास हो।
जिन गृह ऋणों में आपकी कुल आय का 35% से अधिक हिस्सा चला जाता है, वे इस बात का संकेत हो सकते हैं कि आप अपनी क्षमता से अधिक बोझ उठा रहे हैं। ये कठोर नियम नहीं हैं, वरन् ऐसे दिशा-निर्देश हैं जो आपको सावधान रहने के लिए संकेत देते हैं। यह किसी भी प्रतिबद्धता से पहले उसकी लागत का आकलन करने के बारे में है। अतः कम तनाव का अनुभव करने के लिए छोटे घर में रहना शायद अधिक उचित हो सकता है।
एक अन्य प्रकार का “अच्छा” ऋण एक सीमित वाहन ऋण हो सकता है। मैं कुछ वित्तीय विशेषज्ञों को जानता हूँ जो वाहन ऋण के पूरी तरह विरोध में हैं। आदर्श रूप से, यदि आप कार का नगद भुगतान कर सकते हैं, तो ऋण से बचने के लिए नकद भुगतान ही करें। हालाँकि, यदि आप ऐसी स्थिति में हैं जहाँ आप एक सीमित ऋण लेकर एक साधारण कार खरीद सकते हैं और उस पर उचित ब्याज दर मिल रही है, तो अपनी परिस्थिति के अनुसार ऐसा करना बुद्धिमानी हो सकती है। यदि आपको वास्तव में कार की आवश्यकता नहीं है, तो ऋण न लें।
अगला विषय—छात्र ऋण। यह मेरे लिए एक अस्पष्ट क्षेत्र है। सामान्यतः, शिक्षा में निवेश आपकी आय और अवसरों को बढ़ा सकता है। लेकिन यह हमेशा उस प्रकार से सफल नहीं होता है। यह सुनिश्चित करें कि आप ऐसी उपाधि प्राप्त करें जो बाज़ार में उपयोगी हो और आपको अवसर प्रदान कर सके। केवल कोई भी उपाधि इसलिए न लें क्योंकि आपको वह विषय “पसन्द” है। और आप अपने खाली समय में उस विषय की पढ़ाई निशुल्क कर सकें। यदि आप छात्र ऋण लेने जा रहे हैं, तो उसे एक स्पष्ट उद्देश्य के साथ लें।
अब हम “बुरे ऋण” पर चलते हैं। बुरा ऋण वह होता है जो किसी गैर-आवश्यक, अक्सर मूल्य घटने वाली वस्तु के लिए लिया जाता है और जिस पर उच्च ब्याज दर लगती है। इसमें क्रेडिट कार्ड का ऋण, अल्पकालिक उच्च-ब्याज ऋण, और प्रतिष्ठा दिखाने के लिए विलासिता की वस्तुओं को खरीदना सम्मिलित होता है। कई लोग बिना किसी योजना के आवेग में आकर खर्च करके अपने वर्तमान और भविष्य को जोखिम में डाल देते हैं। यह बात हमारी आत्मिक स्थिति से हुई जुड़ी है। यदि आपका खर्च नियंत्रण से बाहर है, तो उसके मूल कारण तक पहुँचें। क्या हम प्रभु में संतुष्ट हैं? क्या आप आत्म-संयम का अभ्यास कर रहे हैं? क्या आप बुद्धिमानी से काम कर रहे हैं?
मैं ऋण से कैसे बाहर निकलूँ?
“दुष्ट ऋण लेता है, और भरता नहीं, परन्तु धर्मी अनुग्रह करके दान देता है।”
—भजन संहिता 37:21
सबसे पहले, किसी भी प्रकार का गलत भण्डारीपन, मूर्तिपूजा, या आपके भीतर विद्यमान किसी भी असुरक्षा को स्वीकार करें। दूसरा, लज्जा में न रहें, परन्तु परमेश्वर से प्रार्थना करें, मन फिराएँ, और एक नयी सोच अपनाने के प्रति समर्पित हों। पवित्र आत्मा को आपके मन को बदलकर आपके हृदय में अपना कार्य करने दें।
अब कमर कसकर काम में लग जाइए। अपने सभी ऋणों की सूची बनाकर आरम्भ कीजिए और एक योजना तैयार कीजिए। ऋण को समाप्त करने का आरम्भ करने के कुछ तरीके होते हैं। इनमें सबसे लोकप्रिय “ऋण हिमगोला विधि” है (डेव रैम्सी विधि)। इस विधि में आप सबसे छोटे ऋण को पहले चुकाते हैं, जबकि शेष ऋणों पर न्यूनतम भुगतान करते रहते हैं। जैसे-जैसे प्रत्येक ऋण चुका दिया जाता है, उस राशि को अगले सबसे छोटे ऋण में जोड़ दिया जाता है। यह गति और उत्साह बढ़ाने के लिए बनाया गया है। जैसे-जैसे आप प्रत्येक ऋण चुकाते जाते हैं, वैसे-वैसे आपको आगे बढ़ते रहने की प्रेरणा मिलती रहती है।
दूसरी विधि “ऋण हिमस्खलन” है, जिसमें आप सबसे अधिक ब्याज दर वाले ऋण को पहले चुकाते हैं। यह विधि दीर्घकाल में आपको सबसे अधिक बचत कराती है। ऋण चुकाने की योजना चुनना इस बात का एक उदाहरण है कि विवाह में वित्तीय मामलों को कैसे संभाला जाए: इसके लिए सहमति, ईमानदारी और एक साझा योजना की आवश्यकता होती है।
आप जिस भी विधि को चुनें, परन्तु खर्च पर सीमाएँ निर्धारित करने और अपनी आवश्यकताओं को स्पष्ट रूप से परिभाषित करने के लिए आपसी सहमति बनाइए। स्मरण रखें कि आपको एक जोड़े के रूप में कार्य करना है। यह एक-दूसरे के प्रति अनुग्रह और धैर्य दिखाने का अवसर है। दूसरे व्यक्ति के भय और चिन्ताओं को समझने का प्रयास करें। अपने स्वयं के त्यागों को समझना आसान होता है क्योंकि आप ही उन्हें कर रहे होते हैं। यह भी देखें कि आपका जीवनसाथी किस प्रकार से त्याग कर रहा है और उसमें उसे प्रोत्साहित करें।
उद्देश्य के साथ निवेश करें
ऋण चुकाना, किसी लम्बी चढ़ाई वाली यात्रा के बाद पीठ से कोई भारी-भरकम बोझ उतारने के समान महसूस हो सकता है। पर उस सुखद हल्केपन को व्यर्थ मत जाने दो। अब भविष्य के विषय में सोचने के लिए आरम्भ करने का समय आ गया है। ऋण से स्वतंत्र होना केवल वित्तीय योजना का एक हिस्सा है। बुद्धिमानी के साथ भण्डारी होना केवल संकटों से बचने के विषय में ही नहीं, वरन् भविष्य का निर्माण करने के विषय में भी है। यह इस विषय में है कि आज बुद्धिमानी के साथ ऐसे बीज बोए जाएँ जो आपके परिवार, आपकी कलीसिया और आने वाली पीढ़ियों के लिए आशीष का कारण जाए। यहीं से वित्तीय उत्तरदायित्व अल्पकालिक जीवन-निर्वाह से आगे बढ़कर दीर्घकालिक स्थिरता की ओर बढ़ने लगता है। आइए, इस बारे में स्पष्टता, एकता और उस परमेश्वर पर भरोसे के साथ बात करें, जिसके हाथों में आपका आने वाला कल सुरक्षित है।
जब शेयर, ऋण-पत्र और म्यूचुअल फंड्स जैसे अलग-अलग निवेशों की बात आती है, तो मैं यह नहीं बता रहा हूँ कि ये कैसे काम करते हैं। यह इस जीवन-कौशल मार्गदर्शिका के क्षेत्र से बाहर है। जब मैं “निवेश” शब्द का प्रयोग करता हूँ, तो मैं उसे एक व्यापक शब्द के रूप में प्रयोग कर रहा हूँ, जिसमें सामान्य प्रकार के सभी निवेश सम्मिलित हैं। विभिन्न प्रकार के निवेश अवसरों में निवेश करने के विशेष विवरणों को समझने के लिए किसी वित्तीय सलाहकार से परामर्श लें। वित्तीय उत्तरदायित्व का पालन करने का अर्थ यह भी है कि आपको यह जानना चाहिए कि निर्णयों में अनुमान के सहारे चलने के बजाय कब बुद्धिमानी के साथ सलाह लेनी चाहिए।
संक्षेप में कहूँ तो, आपको किसी न किसी वस्तु में निवेश करना चाहिए—आदर्श रूप से ऐसी वस्तु जिसमें अच्छा प्रतिफल मिले (जैसे 15% या उससे अधिक)। जितना शीघ्र आप आरम्भ करेंगे, उतना ही अच्छा होगा। साथ ही, यदि आपका कार्यस्थल किसी प्रकार की सेवानिवृत्ति-अंशदान मिलान योजना प्रदान करता है, तो उसका लाभ उठाइए। यदि वहाँ अंशदान-मिलान योजना है और आप उसका लाभ नहीं उठा रहे, तो आप मानो “मुफ़्त धन” को “ना” कह रहे हैं। ऐसे कदम उठाना दैनिक जीवन में वित्तीय उत्तरदायित्व के सबसे सरल उदाहरणों में से एक है।
मुझसे कभी-कभी पूछा जाता है कि, “क्या मुझे निवेश करने से पहले अपना सारा ऋण चुका देना चाहिए?” संक्षेप में कहूँ तो, नहीं। लोग प्रायः अपनी सेवानिवृत्ति खातों में निवेश करते समय गृह-ऋण भी रखते हैं। परन्तु इस प्रश्न का उत्तर आपकी परिस्थिति के अनुसार भिन्न हो सकता है। आप निवेश आरम्भ करने से पहले अपने उपभोक्ता-ऋण का 75% चुकाने का लक्ष्य निर्धारित कर सकते हैं। आप कोई दूसरा प्रतिशत भी निर्धारित कर सकते हैं। यह बुद्धिमानी का विषय है, इसलिए इसमें परिस्थिति के अनुसार निर्णय लेना पड़ता है। परन्तु यदि आपके सभी ऋणों की न्यूनतम किश्तें आपके लिए बहुत कम आर्थिक गुंजाइश छोड़ती हैं, तो सम्भवतः अभी निवेश करने का समय नहीं है। इस वास्तविकता का उद्देश्य आपको लज्जित करना नहीं है, वरन् आपका ऐसे गहरे वित्तीय उत्तरदायित्व की ओर मार्गदर्शन करना है जो आपके भविष्य को सुरक्षित रखे।
विरासत छोड़ना
“भला मनुष्य अपने नाती-पोतों के लिये सम्पत्ति छोड़ जाता है, परन्तु पापी की सम्पत्ति धर्मी के लिये रखी जाती है।” (नीतिवचन 13:22)
हर दम्पति अपने पीछे कुछ न कुछ छोड़कर जाएगा। प्रश्न यह नहीं है कि हम कोई विरासत छोड़ेंगे या नहीं, वरन् पश्न यह है कि वह कैसी विरासत होगी। विरासत केवल धन या सम्पत्ति आगे छोड़ जाने के विषय में नहीं है—यह उन मूल्यों, विश्वास और जीवनशैली को आगे सौंपने के विषय में है जो परमेश्वर के हृदय को दर्शाता है। वित्तीय उत्तरदायित्व से बनी विरासत केवल आपकी योजना बनाने की क्षमता की ही नहीं, वरन् परमेश्वर की विश्वासयोग्यता की गवाही भी बन जाती है।
बाइबल आधारित विरासत केवल यह नहीं कहती कि, “मेरे पास अपने लिए पर्याप्त था।” परन्तु वह यह कहती है कि, “परमेश्वर ने जो मुझे सौंपा था, उसका मैंने इस प्रकार प्रबन्धन किया कि मेरे चले जाने के बहुत बाद भी वह दूसरों के लिए आशीष का कारण बने।” ये आशीष आपके अपने घर से आरम्भ होती है और फिर आपकी कलीसिया, आपके समुदाय, यहाँ तक कि उन पीढ़ियों तक भी पहुँचती चली जाती है जिनसे आप कभी नहीं मिलेंगे।
जब मेरा और मेरी पत्नी का नया-नया विवाह हुआ था, तब अधिकाँश दम्पत्तियों के समान हमारे पास भी अपना घर खरीदने के लिए पर्याप्त पैसे नहीं था। लेकिन मेरे ससुर, फिल डेविस, ने अपनी निवेश की हुई संपत्ति हमें बाज़ार मूल्य से बहुत कम किराए पर रहने के लिए दी, ताकि हम अपना घर खरीदने के लिए पैसे बचा सकें। एक वर्ष तक बहुत अधिक परिश्रम करने और लगन से बचत करने के बाद, हम उस क्षेत्र में एक घर खरीदने के लिए योग्य हो गए।
लगभग सोलह वर्ष बाद भी हम उसी घर में रह रहे हैं। अब हमारे चार बच्चे हैं। मेरी पत्नी काम करती है, पर वह काम करने के लिए बाध्य नहीं है—और यह उसके लिए एक राहत की बात है। मैं अधिकतर सोचता हूँ कि मेरे ससुर ने हमें जीवन की शुरुआत करने में सहायता देने के लिए अपनी किराए की सम्पत्ति में हर महीने घाटा सहा। और यह सब उन्होंने अपनी स्थानीय कलीसिया में विश्वासयोग्यता से दान देते हुए, आगन्तुकों को दोपहर का भोजन कराने ले जाते हुए, और सहायता-निधि में योगदान करते हुए किया।
दुःख की बात यह है कि मई 2020 में एक वाहन दुर्घटना में उनकी मृत्यु हो गई। परन्तु उन्होंने अच्छी तैयारी की थी, मेरी सास की आवश्यकताओं की पूर्ति होती रही है। मैं अधिकतर सोचता हूँ कि उन्होंने अपने परिवार की देखभाल करने के लिए कितना परिश्रम किया। मेरा और मेरी पत्नी के विवाह के बाद, वे आसानी से यह कह सकते थे कि, “अब वह मेरी ज़िम्मेदारी नहीं है।” परन्तु उन्होंने कभी ऐसा विचार नहीं किया। इसके विपरीत, वे हर अवसर पर उदारता दिखाते थे। उनका जीवन शान्त और स्थिर वित्तीय उत्तरदायित्व का एक जीता-जागता उदाहरण था, जिसकी जड़ें परमेश्वर और दूसरों के प्रति प्रेम में गहरी जमी हुई थीं।
उनकी उदारता का प्रभाव आने वाले सौ वर्षों तक अनुभव किया जाएगा। मैं ऐसा जीवन विरासत में छोड़ना कहीं अधिक पसन्द करूँगा, बजाय इसके कि बिना किसी योजना के अन्धकार में जीवन बिताऊँ—सदा निराशा में रहूँ, और यह सोचता रहूँ कि मैं “आगे क्यों नहीं बढ़ पा रहा हूँ।” आर्थिक उत्तरदायित्व पर निर्मित विरासत कभी संयोग से नहीं होती—यह दीर्घकालीन विश्वासयोग्यता और उद्देश्य के साथ भण्डारीपन का परिणाम होती है।
आपकी विरासत आपके बैंक खाते के आकार से नहीं, वरन् आपकी विश्वासयोग्यता की गहराई से आँकी जाती है। और मुख्य बात यह है: कि ऐसी विरासत संयोग से उत्पन्न नहीं होती है। वह उद्देश्य के साथ भडारीपन, दीर्घकालीन दर्शन, और ऐसे हृदय के द्वारा निर्मित होती है जो धन को केवल व्यक्तिगत सुख-सुविधा का साधन नहीं, वरन् आशीष देने के एक माध्यम के रूप में देखता है।
—
चिन्तन के लिए प्रश्न:
- पिछली बार ऐसा कब हुआ था, जब आप किसी आपातकालीन स्थिति में फँस गए थे और उससे बाहर निकलने के लिए आपके पास पैसे नहीं थे?
- अपने ऋण की स्थिति के विषय में अपने मार्गदर्शक से बात करें। मैं जानता हूँ कि यह भय उत्पन्न करने वाला हो सकता है, परन्तु पारदर्शी बने रहने का प्रयास करें। जब आप इसे प्रकाश में ले आएँगे, तब आप उसे समाप्त करने के कार्य में लग सकेंगे।
- क्या आपने कभी निवेश किया है? यदि हाँ, तो किसमें? क्या आप इस समय निवेश कर रहे हैं? निवेश के नए अवसरों के विषय में सीखने में आप किस प्रकार से आगे बढ़ रहे हैं?
- आप कैसी विरासत छोड़ना चाहते हैं?
—
निष्कर्ष
इस जीवन-कौशल मार्गदर्शिका को पढ़ने के लिए समय निकालने हेतु आपका धन्यवाद। मैं जानता हूँ कि आपका जीवन अनेक कार्यों से भरा हुआ है, आपके दिन व्यस्त रहते हैं, और आपका ध्यान सैकड़ों विभिन्न दिशाओं में खिंचा रहता है। यह तथ्य कि आपने अपने जीवनसाथी के साथ अपने पैसा को व्यवस्थित करने के विषय में सोचने, प्रार्थना करने, और बातचीत करने के लिए समय बिताया है, यह दर्शाता है कि आप किस प्रकार का भविष्य बनाना चाहते हैं; और यह आपके घर में वित्तीय उत्तरदायित्व के प्रति बढ़ती हुई प्रतिबद्धता को भी दर्शाता है।
मैं प्रार्थना करता हूँ कि यह जीवन-कौशल मार्गदर्शिका आपको आपके संयुक्त आर्थिक जीवन में एकता, शान्ति, और उद्देश्य की ओर व्यावहारिक कदम उठाने में सहायता करे। मेरी आशा केवल यह नहीं है कि आपके बैंक खाते में अधिक धन हो, परन्तु यह है कि आपका वैवाहिक जीवन अधिक दृढ़ हो, आपका विश्वास और गहरा हो, और परमेश्वर के प्रावधान में आपका आनन्द उदारता के रूप में उमड़ सके। जब आप इन सिद्धान्तों को अपने जीवन में लागू करें, तब स्मरण रखें कि आर्थिक उत्तरदायित्व केवल एक कौशल नहीं, वरन् परमेश्वर पर भरोसे और एक-दूसरे की देखभाल की अभिव्यक्ति है।
यदि आप इन पृष्ठों में से कुछ भी स्मरण रखें, तो यह भी स्मरण रखना: कि धन अस्थायी है, परन्तु जिस प्रकार आप उसका भण्डारीपन करते हैं, उसका प्रभाव अनन्तकाल तक हो सकता है। इसका प्रबन्ध मिलकर करें। इसका प्रबन्ध बुद्धिमानी से करें। इसका प्रबन्ध इस प्रकार से करें कि उस परमेश्वर का आदर हो, जिसने उसे सबसे पहले आपको प्रदान किया है। आर्थिक उत्तरदायित्व भरा जीवन बनाना, परमेश्वर से यह कहने का एक और तरीका है कि, “हमारे पास जो कुछ भी है, वह सब तेरा ही है।”
प्रभु आपको आशीष दे और आपकी रक्षा करें; आपके हर निर्णय के लिए आपको बुद्धि दे; और आपके घर को उस शान्ति से भर दे, जो केवल उसके द्वारा दिखाए गए मार्ग पर एक साथ—चलने से ही मिलती है।
लेखक के बारे में
जूनियर जीवियानिविद कैलिफोर्निया के ला मिराडा नगर स्थित ग्रेस ई.बी. जी चर्च में पुरुष सेवकाई के निदेशक के रूप में सेवकाई करते हैं।
विषयसूची
- भाग I: बाइबल आधारित ढाँचा
- सब कुछ उसी का है
- धन की भलाई
- (2) धन हमारा अन्तिम उद्देश्य नहीं है।
- भण्डारीपन
- चिन्तन के लिए प्रश्न:
- भाग II: मसीही दम्पत्तियों के लिए धन सम्बन्धी उद्देश्य
- सबसे पहले परमेश्वर का भय मानना और आदर करना
- कंजूसी समृद्धि को रोकती है
- बुद्धि और परिश्रम से बचत करें
- विवेक और खराई के साथ खर्च करें।
- चिन्तन के लिए प्रश्न:
- भाग III: वैवाहिक जीवन में धन सम्बन्धी एकता
- एक देह, एक बैंक खाता
- उत्पत्ति 2:24 कहता है, “इस कारण पुरुष अपने माता-पिता को छोड़कर अपनी पत्नी से मिला रहेगा और वे एक ही तन बने रहेंगे।” यह पति-पत्नी के बीच बंधी गहरी वाचा पर आधारित सम्बन्ध का वर्णन करता है, जहाँ दो अलग-अलग व्यक्ति शारीरिक, भावनात्मक और आत्मिक रूप से नए, अटूट सम्बन्ध में जुड़ जाते हैं।
- धन सम्बन्धी वार्तालाप
- संक्षेप में बात यह है: कि आपको एक-दूसरे से पैसों के विषय में बात करनी चाहिए। मुझे पता है कि यह बात सतही रूप से अनावश्यक लग सकता है, लेकिन कई दम्पति केवल इसलिए समस्याओं में पड़ जाते हैं क्योंकि वे एक-दूसरे से बातचीत नहीं करते हैं और न ही स्पष्ट लक्ष्य तथा उद्देश्य निर्धारित करते हैं।
- मूल्यों और दर्शन का तालमेल
- कहाँ से आरम्भ करें?
- चिन्तन के लिए प्रश्न:
- भाग IV: सामान्य चुनौतियाँ एवं बाइबल आधारित बुद्धि
- आपातकालीन कोष बनाएँ
- ऋण का भुगतान
- मैं ऋण से कैसे बाहर निकलूँ?
- उद्देश्य के साथ निवेश करें
- विरासत छोड़ना
- चिन्तन के लिए प्रश्न:
- निष्कर्ष
- लेखक के बारे में