#63 साथियों के दबाव का विरोध करना: विश्वास में दृढ़ बने रहना
प्रस्तावना: भीड़ का भार
जब मैं अपने मित्र से बात कर रहा था, तो मैं बता सकता हूँ कि उस अनुभव ने उसे पूरी तरह से बदल दिया था। उसने मुझसे कहा:
मुझे वह ऐसे याद है कि जैसे कल की बात हो। घर की हर वस्तु खड़खड़ाने लगी, फिर हिलने लगी और फिर अलमारियों से नीचे गिरने लगी। मैं कैलिफ़ोर्निया में रहता था और ‘वहाँ’ – एक बहुत बड़ा भूकम्प आया था। समुद्र में लहरों की तरह भूमि ऊपर-नीचे हो रही थी। पहले तो मैं सदमे में था, फिर जब मुझे वास्तविकता का एहसास हुआ, तब मैं घर से भागकर सड़क पर आ गया, परन्तु वहाँ बाहर हालात और भी बुरे थे। लगभग एक मिनट बाद, जो मुझे एक घण्टे जैसा लगा, सब कुछ एकदम शान्त हो गया। जैसे कि आप कल्पना कर सकते हैं, यह भूकम्प मेरे द्वारा कभी देखी गई, अब तक की सबसे डरावनी और शक्तिशाली बात थी।
मैं कल्पना भी नहीं कर सकता कि वह किन हालातों से होकर गुजरा था।
भूकम्प की तरह ही, साथियों का दबाव भी एक ऐसा शक्तिशाली बल है, जो हमारे जीवन को आकार देता है। भूकम्प के विपरीत, साथियों का दबाव आमतौर पर चिल्लाता नहीं है—बल्कि यह फुसफुसाता है। यह शायद ही कभी माँग करता है—बल्कि यह कोमलता से सुझाव देता है। परन्तु साथियों के दबाव के प्रभाव बहुत गहरे होते हैं। साथियों का दबाव हमें हमारे पाप की ओर खींच सकता है, हमारी मान्यताओं का मुँह बन्द कर सकता है, और हमें परमेश्वर के मार्ग से भटका सकता है। यह कक्षा में छात्रों को, कार्यस्थल पर वयस्कों को, और यहाँ तक कि सेवकाई में अगुवों को भी प्रभावित करता है। और जबकि हो सकता है कि समाज साथियों के दबाव को केवल किशोरों से जुड़ी एक समस्या मानकर अनदेखा कर दे, परन्तु पवित्रशास्त्र यह प्रकट करता है कि घुल-मिल जाने की इच्छा हमेशा से ही मनुष्य के हृदय के लिए एक परीक्षा रही है।
अत:, यहाँ इसकी एक परिभाषा दी गई है:
साथियों का दबाव वह परीक्षा है, जिसमें हम किसी विशेष तरीके से सोचने या व्यवहार करने लगते हैं, क्योंकि हमारे मित्र या हमारे आसपास के लोग हमसे ऐसी ही अपेक्षा करते हैं, या, कम से कम हमें ऐसा लगता है कि वे ऐसी अपेक्षा करते हैं।
हमारे भीतर दूसरों को प्रसन्न करने की इच्छा होती है और, इसी प्रक्रिया में हम अपनी मान्यताओं या नैतिक मूल्यों से समझौता कर लेते हैं। हम स्वीकार्य होना चाहते हैं। हम भीड़ से अलग-थलग नहीं दिखना चाहते। और इसलिए, हम दूसरों के साथ-साथ चलते हैं—भले ही हम बेहतर जानते हों।
आरम्भ से ही, परमेश्वर ने अपने लोगों को एक अलग तरीके से जीवन बिताने के लिए बुलाया है—कि वे संसार के दबाव का विरोध करें, और धार्मिकता के उस कठिन मार्ग पर चलें। नीतिवचन की पुस्तक में सुलैमान के इन शब्दों पर विचार करें: “हे मेरे पुत्र, यदि पापी लोग तुझे फुसलाएँ, तो उनकी बात न मानना।” वास्तविकता यह है कि पापी लोग आपको लुभाएँगे। प्रश्न यह नहीं है कि आपको साथियों का दबाव झेलना पड़ता है या नहीं, बल्कि प्रश्न यह है कि जब यह दबाव आए, तो आप उसका उत्तर कैसे देते हैं।
पवित्रशास्त्र में साथियों के दबाव के बारे में सबसे सीधी आज्ञाओं में से एक रोमि. 12:2 में मिलता है, जहाँ पौलुस लिखता है कि “इस संसार के सदृश न बनो; परन्तु तुम्हारे मन के नए हो जाने से तुम्हारा चाल–चलन भी बदलता जाए।”
पौलुस चेतावनी देता है कि यह संसार हमेशा हमें अपने साँचे में—अर्थात् अपने सोचने, काम करने, बोलने और जीवन बिताने के तरीके में ढालने का प्रयास करता है। इस संसार की आत्मा भौतिक क्षेत्र में हमारे विरुद्ध कई तरह से काम करती है, परन्तु इस बात का भरोसा रखें कि उसका लक्ष्य हमारा शरीर नहीं है। वह हमारी आत्माओं को चुराने, मारने और नष्ट करने के लिए उनके पीछे पड़ा है।
सदृश होने का दबाव केवल बाहरी व्यवहारों के बारे में ही नहीं है। यह हमारी आंतरिक निष्ठाओं के बारे में भी है। क्या हम उस परमेश्वर की सेवा करेंगे, जो हमें पवित्र होने के लिए बुलाता है, या हम उस संसार के पीछे चलेंगे, जो विनाश की ओर ले जाता है?
मैं कभी नहीं भूलूँगा कि साथियों के दबाव ने पैट्रिशिया को, जो मेरी (अब) पत्नी है, कैसे लगभग बर्बाद ही कर दिया था। यह तब की बात है, जब हम पहली बार मिले थे। हाई स्कूल के बाद मैं कोलोराडो चला गया, जहाँ मेरी मुलाकात पैट्रिशिया से हुई। हमारी आपस में खूब बनी। हमारे बीच बढ़ते हुए रिश्ते के कुछ महीनों बाद, मैं अपने गृहनगर बफैलो की यात्रा पर गया। घर पर रहते हुए, मैंने अपने बचपन के मित्रों के साथ कुछ समय बिताया। एक सप्ताह के दौरान, उन्होंने मुझे पैट्रिशिया से रिश्ता तोड़ने के लिए राजी कर लिया। जब मैं कोलोराडो लौटा, तो मैंने उससे वही घिसी-पिटी बात कही कि “हमें केवल मित्र बनकर रहना चाहिए।” उसे यह बात बिलकुल अच्छी नहीं लगी। वह पूरी तरह टूट गई थी। सच तो यह है कि मैं भी भीतर से टूट गया था। पैट्रिशिया से रिश्ता तोड़ने का निर्णय मेरा नहीं था। मेरे मित्रों ने मुझ पर इसके लिए दबाव डाला था। सबसे मूढ़ता वाली बात यह है कि मुझे अब उनके तर्क भी याद नहीं हैं! मैंने ऐसा इसलिए किया, क्योंकि मैं चाहता था कि वे मुझे अपना लें।
धन्यवाद हो कि परमेश्वर मेरे साथियों के दबाव से कहीं अधिक बड़ा है। पैट्रिशिया और मेरे विवाह को 43 वर्ष हो चुके हैं। हमारे चार बच्चे और दस नाती-पोते हैं। कभी-कभी वह अब भी मुझे याद दिलाती है कि मैं कितना मूर्ख था। शुभ समाचार यह है कि परमेश्वर हमारी कमजोरियों पर विजयी होने में और हमारी असफलताओं से छुटकारा देने में सक्षम है।
—
चर्चा के प्रश्न:
- जब साथियों के दबाव की बात आती है, तो आपके मन में क्या आता है?
- आपके जीवन में ऐसी कौन-सी ताकतें हैं, जिनसे आप सबसे अधिक दबाव महसूस होता है?
- वे कौन लोग हैं, जो आपको सबसे अधिक प्रभावित करते हैं?
बाइबल में ऐसे कई उदाहरण मिलते हैं, जहाँ भीड़ के दबाव ने परमेश्वर के लोगों को बहुत ही अधिक नुकसानदेह तरीकों से प्रभावित किया। शायद आप इनमें से कुछ परिस्थितियों से स्वयं को जोड़ पाने में सक्षम होंगे:
—
ऑडियो मार्गदर्शिका
ऑडियो#63 साथियों के दबाव का विरोध करना: विश्वास में दृढ़ बने रहना
भाग I: बाइबल में पाए जाने वाले साथियों के दबाव के उदाहरण
हारून और सोने का बछड़ा
निर्गमन 32 अध्याय में हारून और सोने के बछड़े की कहानी इस बात का सबसे स्पष्ट उदाहरण है कि जब नेतृत्व साथियों के दबाव के आगे झुक जाता है, तो क्या होता है। मूसा परमेश्वर से मिलने के लिए सीनै पर्वत पर गया था, और उसकी अनुपस्थिति में लोग बेचैन हो उठे। विश्वास रखकर प्रतीक्षा करने के बजाय, इस्राएलियों ने अपनी अधीरता को विद्रोह में परिवर्तित होने दिया। उन्होंने हारून के पास जाकर माँग की कि वह उनके लिए एक ऐसा देवता बनाए, जो उनकी अगुवाई करे—कुछ ऐसा, जिसे वे छू सकें और देख सकें।
जिस हारून ने परमेश्वर के सामर्थी कामों को अपनी आँखों से देखा था—जिसमें मिस्र में आई विपत्तियाँ, लाल समुद्र का दो भागों में बँटना, और प्रतिदिन मिलने वाला मन्ना शामिल था—उसने हार मान ली। उसने लोगों से कहा कि वे अपना सोना उसके पास ले आएँ, और उनकी भेटों से उसने एक सोने का बछड़ा बनाया। उसने लोगों से कहा, “हे इस्राएल, तेरा ईश्वर जो तुझे मिस्र देश से छुड़ा लाया है, वह यही है” (निर्ग. 32:4)। यह तो आत्मिक पतन के बारे में बात करता है! हारून जैसा व्यक्ति, जो परमेश्वर की सामर्थ्य से इतना भली-भाँति परिचित था, आखिर किस बात से प्रेरित होकर परमेश्वर की आज्ञाओं का उल्लंघन कर बैठा? इसका कारण अज्ञानता नहीं थी। इसका कारण दबाव था। भीड़ की आवाज हारून के अपने विश्वास से कहीं अधिक जोरदार साबित हुई।
यह क्षण सभी विश्वासियों के लिए एक गम्भीर चेतावनी है: परमेश्वर के निकट होने का अर्थ यह नहीं कि हम साथियों के दबाव से पूरी तरह सुरक्षित हो जाते हैं। हारून की असफलता का कारण ज्ञान की कमी नहीं थी; बल्कि यह साहस की कमी थी। परमेश्वर के भय से कहीं अधिक उसे मनुष्यों का भय था। और क्योंकि वह भयभीत था, इसलिए वह पूरी जाति को मूर्तिपूजा की ओर लेकर चल पड़ा। और इस समझ में, हम भी हारून से बहुत अलग नहीं हैं। जब हम हारून की तरह, अपने विश्वास पर दृढ़ रहने के बजाय भीड़ के आगे घुटने टेक देते हैं, तो हम अनजाने में ही दूसरों को भी गलत राह पर ले जाते हैं।
राजा शाऊल और अमालेकी
पवित्रशास्त्र में साथियों के दबाव का एक और दु:खद उदाहरण राजा शाऊल के जीवन में देखने को मिलता है। 1 शमूएल 15 अध्याय में, परमेश्वर ने शमूएल भविष्यद्वक्ता के माध्यम से शाऊल को एक स्पष्ट आज्ञा दी थी। शाऊल को अमालेकियों और उनकी समस्त सम्पत्ति को पूरी तरह से नष्ट कर देना चाहिए था। परन्तु शाऊल ने पूर्णरूप से आज्ञा नहीं मानी। उसने राजा अगाग को जीवित छोड़ दिया और लोगों को अनुमति दे दी कि वे उनके पशुओं में से सबसे उत्तम पशु अपने पास रख लें। जब शमूएल ने शाऊल का सामना किया, तो शाऊल ने पहले तो लोगों पर दोष मढ़कर और यह दावा करके कि वे पशु बलिदान चढ़ाने के लिए रखे गए थे, अपने कार्यों को सही ठहराने का प्रयास किया। परन्तु अन्त में, सच्चाई सामने आ ही गई। शाऊल ने स्पष्ट शब्दों में कहा,
“मैं ने तो अपनी प्रजा के लोगों का भय मानकर और उनकी बात सुनकर… उल्लंघन किया है” (1 शमू. 15:24)।
ये शब्द इसकी मूल समस्या को उजागर करते हैं: शाऊल को परमेश्वर की मंजूरी की तुलना में लोगों की मंजूरी की कहीं अधिक परवाह थी। वह चाहता था कि लोग उसे पसन्द करें, और यहाँ तक कि उसका सम्मान भी करें। वह अपनी लोकप्रियता को बनाए रखना चाहता था। परन्तु ऐसा करने में, उसने परमेश्वर के अनुग्रह और उसके राज्य जैसी कहीं अधिक बहुमूल्य बात को खो दिया। परमेश्वर के लिए अकेले खड़े होने की शाऊल की अनिच्छा ने उससे सब कुछ छीन लिया। और अन्त में, परमेश्वर ने शाऊल से उसका राज्य लेकर दाऊद को दे दिया, जो उसके मन के अनुसार व्यक्ति था।
शाऊल की कहानी हमें याद दिलाती है कि दूसरों की स्वीकृति पाने के निमित्त, परमेश्वर के द्वारा बताई गई सही बातों से समझौता करने से कभी भी लाभ नहीं होता। कई बार ऐसा होगा, जब परमेश्वर की आज्ञा मानने के लिए हमें बहुमत के विरुद्ध खड़ा होना पड़ेगा। उन क्षणों में, हमें यह निर्णय लेना होगा कि हम किससे अधिक डरते हैं, दूसरों से या परमेश्वर से?
पतरस ने यीशु का इन्कार किया
क्या आप विश्वास करेंगे कि जो पतरस यीशु के शिष्यों में सबसे साहसी था, उसने भी साथियों के दबाव का सामना किया और उसमें असफल रहा? तीन वर्षों तक यीशु के साथ-साथ चलने के बाद भी, पतरस ने इस बात से इन्कार कर दिया कि वह यीशु को कभी जानता भी था। यह तब हुआ, जब उसने कुछ ही देर पहले यीशु से कहा था, “हे प्रभु, मैं तेरे साथ बन्दीगृह जाने, वरन् मरने को भी तैयार हूँ” (लूका 22:33)। परन्तु जब परीक्षा की घड़ी आई—जब यीशु को पकड़कर महायाजक के घर ले जाया गया—तो पतरस का साहस डर में बदल गया। पतरस ने स्वयं को एक आँगन में चारों ओर से अजनबियों से घिरा हुआ पाया। तीन बार लोगों ने उसके पास आकर पूछा कि क्या वह यीशु के साथ था। हर बार पतरस ने उत्तर दिया, “मैं उसे नहीं जानता” (लूका 22:57)।
पतरस के तीन बार इन्कार करने के बाद, एक अत्यन्त मार्मिक क्षण आया, जब “प्रभु ने घूमकर पतरस की ओर देखा” (लूका 22:61)। अपनी असफलता के बोझ से टूटकर, पतरस नगर से बाहर चला गया और फूट-फूटकर रोया।
पतरस का इन्कार हमें दिखाता है कि साथियों का दबाव किसी में भेदभाव नहीं करता—उसे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप कितने समय से यीशु के साथ चल रहे हैं या उसके प्रति आपकी विश्वासयोग्यता की घोषणाएँ कितनी जोशीली रही हैं। साथियों का दबाव आपकी कमजोरी के क्षण में, डर भरे माहौल में, आपको तब घेर लेता है, जब दाँव पर बहुत कुछ लगा हुआ होता है और उसकी कीमत बहुत अधिक महसूस होती है।
पतरस की कहानी हमें याद दिलाती है कि साथियों का दबाव केवल किशोरों की समस्या नहीं है। हर मसीही को ऐसे क्षणों का सामना करना पड़ता है जहाँ मसीह के लिए खड़े होने के लिए साहस की आवश्यकता होती है। और उन क्षणों में, हमारी अगुवाई या तो मनुष्यों के डर द्वारा होती है या परमेश्वर पर विश्वास करने के द्वारा होती है। क्या पतरस की तरह कभी आपकी परीक्षा हुई है, और क्या आप भी उसकी तरह असफल रहे हैं? शुभ समाचार यह है कि पतरस की कहानी का अन्त उसके इन्कार पर नहीं हुआ, और न ही आपकी कहानी का अन्त ऐसा होगा। यीशु के मरे हुओं में से जी उठने के बाद, उसने पतरस को बहाल किया (यूहन्ना 21 अध्याय), और यह साबित किया कि जब हम अपने पापों का पश्चाताप करके यीशु की ओर फिरते हैं, तो हमारी सबसे बड़ी असफलताएँ भी सुधारी जा सकती हैं।
एक बार मैं जेम्स नाम के एक नौजवान को जानता था। जेम्स हाई-स्कूल में एक बेहतरीन खिलाड़ी था—वह एक स्वाभाविक अगुवा, फुटबॉल टीम का कप्तान, और यहाँ तक कि जवानों के समूह में भी नियमित रूप से शामिल होने वाला लड़का था। उसके प्रशिक्षक कहते थे कि कॉलेज में फुटबॉल खेलने के लिए उसका मौका पक्का है। परन्तु एक शुक्रवार की रात, उसके साथियों ने उसे एक पार्टी में बुलाया। वह जानता था कि वहाँ क्या होगा—वहाँ शराब थी, नशीले पदार्थ थे, और उनमें शामिल होने का दबाव था। आरम्भ में तो वह हिचकिचाया, और उसने मना भी कर दिया। परन्तु उसके मित्र उसे चिढ़ाने लगे, “अरे, आ ना यार। इतना कमजोर मत बन।” “क्या तू थोड़ा सा मजा करने से डरता है?” “तू हमें बीच में तो नहीं छोड़ देगा न?”
और अन्त में, उस दबाव के आगे वह झुक गया। वह एक रात, शराब, नशीले पदार्थों और महिलाओं से भरी कई और रातों में बदल गई। केवल एक पार्टी उसकी जीवनशैली बन गई। जेम्स अभ्यास छोड़ने लगा, अपनी पढ़ाई को अनदेखा करने लगा, और अपने विश्वास से दूर होता चला गया। उसके अंक कम आने लगे। उसकी प्रतिष्ठा बदल गई। मित्रों ने आना बन्द कर दिया। छात्रवृत्ति के प्रस्ताव भी गायब हो गए।
जेम्स ने हार मान ली—इसलिए नहीं कि उसे सही-गलत की समझ नहीं थी, बल्कि इसलिए कि स्वीकार किए जाने की उसकी आवश्यकता, सही काम करने की उसकी इच्छा पर भारी पड़ गई। कई वर्षों के बाद, वह अब उस दौर को गहरे पछतावे के साथ याद करता है—केवल इसलिए नहीं कि उसने मैदान पर क्या खोया, बल्कि इसलिए कि वह जानता है कि उसने लोकप्रियता के बदले अपने जीवन के उद्देश्य का सौदा कर लिया था।
क्या पाप करने के लिए साथियों के दबाव का कोई विकल्प है? इसका उत्तर है—हाँ! जिस तरह बुरे उदाहरण हमें प्रभु से दूर ले जाने का दबाव डालते हैं, उसी तरह धार्मिकता से भरे उदाहरण हमें उसके पीछे हो लेने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। बाइबल में दिए गए इन धार्मिकता से भरे उदाहरणों पर विचार करें:
तीमुथियुस और उसके जीवन में पाई जाने वाली धर्मी स्त्रियाँ
पौलुस की सेवकाई में उसके सबसे भरोसेमन्द साथियों में से एक के रूप में तीमुथियुस को जाना जाता है। वह आरम्भिक कलीसिया में एक विश्वासयोग्य सेवक, शिक्षक और अगुवा था। तीमुथियुस ने इफिसुस में पास्टर के तौर पर सेवा की, मिशनरी यात्राएँ कीं, और पौलुस से दो निजी पत्रियाँ प्राप्त कीं, जो अब पवित्रशास्त्र का हिस्सा हैं। रोचक बात यह है कि तीमुथियुस की आत्मिक यात्रा पौलुस के साथ आरम्भ नहीं हुई थी। इसका आरम्भ उसकी माता यूनीके, और नानी लोइस की शान्त विश्वासयोग्यता से हुआ था।
2 तीमु. 1:5 में, पौलुस ने तीमुथियुस के आत्मिक पालन-पोषण को स्वीकार करते हुए उसे लिखा, “मुझे तेरे उस निष्कपट विश्वास की सुधि आती है, जो पहले तेरी नानी लोइस और तेरी माता यूनीके में था, और मुझे निश्चय है कि तुझ में भी है।”
इन स्त्रियों ने विश्वास से कहीं बढ़कर बातों को आगे सौंपा—उन्होंने जीवित विश्वास को आगे सौंपा। उन्होंने शायद तीमुथियुस को बचपन से ही पुराने नियम की शिक्षा दी (2 तीमु. 3:15), उसे प्रार्थना करना सिखाया, और उदाहरणों से बताया कि दैनिक जीवन में परमेश्वर से प्रेम करने और उसकी सेवा करने का अर्थ क्या है। एक मिश्रित-विश्वास वाले परिवार में रहने के बावजूद (जबकि उसका पिता एक यूनानी था, और शायद विश्वासी नहीं था), यूनीके और लोइस ने तीमुथियुस को यह सिखाया कि यीशु के पीछे हो लेने का क्या अर्थ है।
जब प्रेरितों 16 अध्याय में पौलुस की भेंट तीमुथियुस से हुई, तब तक वह स्थानीय कलीसिया के “भाइयों में सुनाम था।” यह प्रतिष्ठा कोई गलती से नहीं मिली थी—यह उसके परिवार के द्वारा वर्षों तक जान-बूझकर डाले गए प्रभाव का ही परिणाम थी।
तीमुथियुस का जीवन हमें याद दिलाता है कि धार्मिकता से भरा प्रभाव अक्सर छिपे हुए, और देखने में बिलकुल साधारण से लगने वाले क्षणों में ही आता है। हो सकता है कि यूनीके और लोइस के पास कोई सार्वजनिक सेवकाई या कोई बड़ा मंच न रहा हो, परन्तु एक नौजवान के जीवन में उनके विश्वासयोग्य निवेश ने कलीसिया के भविष्य को आकार देने में सहायता की।
उनकी कहानी माता-पिता, दादा-दादी, प्रशिक्षकों और शिष्यों को प्रोत्साहित करती है कि वे अपने निजी विश्वास के प्रभाव को जिसे वे लगातार जीते हैं, कभी कम न आंकें। धार्मिकता से भरे उदाहरण ही पाप के लिए प्रेरित करने वाले साथियों के दबाव का सामना करने की साहस देते हैं। संसार की तरह जीवन बिताने की परीक्षा के आगे झुकने के बजाय, हम यीशु का अनुसरण करने वाले उन दूसरे लोगों को निहार सकते हैं और उसके दिखाए मार्ग पर चल सकते हैं। जब ईमानदारी से विश्वास की शिक्षा दी जाती है, तो वह दूसरों में भी फैल जाता है। जो बात लोइस से आरम्भ होकर यूनीके तक पहुँची, और फिर तीमुथियुस में जड़ें जमा लीं—अन्त में वह दूसरे अनगिनत लोगों में भी फलदायी हुई।
रूत और नाओमी
रूत की कहानी हृदय टूटने से आरम्भ होती है। मोआब देश की एक स्त्री रूत ने एक इस्राएली पुरुष से विवाह किया, जिसकी विवाह के कुछ ही समय बाद मृत्यु हो गई। रूत एक जवान विधवा थी, परन्तु वह अकेली नहीं थी। उसकी सास नाओमी भी हाल ही में विधवा हुई थी, जब उसके पति की मृत्यु हो गई थी। हालात तब और भी बुरे हो गए, जब रूत की जिठानी, ओर्पा भी विधवा हो गई। अपने पति और दो बेटों को खोने के दु:ख और कड़वाहट से भरी हुई नाओमी ने बैतलहम लौटने का निर्णय लिया। उसने अपनी बहुओं से अपने-अपने लोगों के पास लौट जाने और एक नया जीवन आरम्भ करने का आग्रह किया।
आखिरकार ओर्पा मान गई। परन्तु रूत ने कुछ ऐसा काम किया, जो हैरान कर देने वाला था। वह नाओमी से लिपट गई और उसने एक ऐसी बात बोली, जो पवित्रशास्त्र में पाई जाने वाली विश्वासयोग्यता और विश्वास की सबसे गहरी घोषणाओं में से एक है: “जिधर तू जाए उधर मैं भी जाऊँगी; जहाँ तू टिके वहाँ मैं भी टिकूँगी; तेरे लोग मेरे लोग होंगे, और तेरा परमेश्वर मेरा परमेश्वर होगा।” (रूत 1:16)
आखिर किस बात ने एक मूर्तिपूजक देश की जवान विधवा को अपनी मातृभूमि छोड़ने, एक बिलकुल अलग ही संस्कृति में जाने, और इस्राएल के परमेश्वर को अपनाने के लिए प्रेरित किया? वह नाओमी का जीवन था। रूत ने नाओमी की ईमानदारी, उसकी देखभाल, और दु:ख के समय में भी उसके लचीलेपन को देखा था। दु:ख में भी, नाओमी ने उसे कुछ ऐसा कर दिखाया था, जो बिलकुल वास्तविक था—कुछ ऐसा जिसे रूत अपने लिए चाहती थी।
रूत के इस निर्णय ने सब कुछ बदल दिया। वह खेतों में काम करने वाली एक मजदूर बन गई, और फिर उसकी मुलाकात एक धर्मी पुरुष बोअज़ से हुई, जिसने उस पर दया की। कई दिव्य घटनाओं के बाद, रूत ने बोअज़ से विवाह कर लिया और वह राजा दाऊद की परदादी बन गई, और इस तरह वह सीधे यीशु मसीह के वंश से जुड़ गई।
धार्मिकता से भरे प्रभाव डालने के लिए सिद्धता की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि इसके लिए सच्चाई और ईमानदारी की आवश्यकता होती है। नाओमी ने बहुत दु:ख उठाए थे। उसने अपने पति और दोनों बेटों को खो दिया था। उसने तो स्वयं को मारा अर्थात् कड़वाहट भी कहा था। परन्तु फिर भी, उसका जीवन परमेश्वर की उपस्थिति और विश्वासयोग्यता की गवाही देता रहा।
यही प्रभाव की सामर्थ्य है: रूत ने नाओमी में कुछ ऐसा देखा जो अनुसरण करने योग्य था, भले ही उसमें भारी निजी जोखिम उठाना पड़ा। और नाओमी के शान्त विश्वास के कारण, रूत एक ऐसे भविष्य में कदम रख पाई, जिसकी उसने कभी योजना भी नहीं बनाई थी।
नाओमी ने शायद कभी कल्पना भी नहीं की होगी कि उसकी कहानी सांसारिक इतिहास को आकार देगी। परन्तु परमेश्वर इसी तरह कार्य करता है। साधारण विश्वासयोग्यता असाधारण प्रभाव के द्वार खोल देती है।
अत: हम अपने अनुभवों से और बाइबल को पढ़कर यह सीखते हैं कि साथियों का दबाव एक ऐसी बात है, जिसका हर किसी को सामना करना पड़ता है। चाहे वह हारून हो, शाऊल हो, या पतरस—उनकी असफलताओं की जड़ में एक ही बात थी: परमेश्वर के बजाय मनुष्यों का डर। हम साथियों के दबाव के आगे दृढ़ता से कैसे खड़े रह सकते हैं? कुछ हद तक, हम धार्मिकता से भरे उदाहरणों को ढूँढ़कर और उनका अनुसरण करके साथियों के दबाव का विरोध करते हैं। चाहे वह माता-पिता हों, प्रशिक्षक हों, शिक्षक हों, पास्टर हों, या मित्र—अर्थात् ऐसे मार्गदर्शक रिश्ते, जिनमें भक्ति स्पष्ट दिखाई देती हो, ताकि उसकी नकल की जा सके, साथियों के दबाव पर काबू पाने के सबसे अच्छे तरीकों में से एक हैं। तीमुथियुस ने अपनी माता और नानी के उदाहरणों का अनुसरण किया। रूत ने नाओमी का अनुसरण किया।
तो प्रश्न यह है कि: आप किसका अनुसरण कर रहे हैं?
—
चर्चा के प्रश्न:
1. हारून, शाऊल, और पतरस ने दबाव के आगे हार क्यों मान ली, और उनकी कहानियाँ आज हमारे सामने आने वाले संघर्षों को कैसे दिखाती हैं? क्या आपने कभी डर के मारे या स्वीकृति पाने की इच्छा में समझौता किया है?
2. पतरस की बहाली हमें अपनी असफलताओं के बारे में सोचने में कैसे सहायता करती है? क्या आप यह मानने में संघर्ष करते हैं कि जब हम असफल होते हैं तो यीशु हमें क्षमा करता है?
3. वे कौन से आम तरीके हैं, जिनसे आप साथियों के दबाव का अनुभव करते हैं? किस बात ने आपको दृढ़ता से खड़े रहने में सहायता की है?
4. कौन सी बात ने तीमुथियुस के परिवार या नाओमी के प्रभाव को इतना शक्तिशाली बनाया? किस बात ने आपके विश्वास को उस तरह प्रभावित किया है, और कैसे आप दूसरों के लिए भी वैसा कर सकते हैं?
5. जब साथियों का दबाव हमें परमेश्वर की इच्छा से दूर खींचे तो हम कैसे इसकी पहचान कर सकते हैं? कौन सी आदतें या सहारा देने वाली व्यवस्थाएँ आपको अपने विश्वास में दृढ़ बने रहने में सहायता कर सकती हैं?
—
भाग II: कठिन मार्ग पर चलने की यीशु की बुलाहट
यीशु ने कभी भी मीठी-मीठी बातें करके यह नहीं बताया कि उसका अनुसरण करने का क्या अर्थ होगा। अपनी सेवा के आरम्भ से ही, उसने यह स्पष्ट कर दिया था कि शिष्यता कमजोर हृदय वालों के लिए नहीं है। यह कोई सामान्य यात्रा या केवल एक सांस्कृतिक शौक नहीं है। यीशु का अनुसरण करना एक बहुत बड़ी बुलाहट है, यह भीड़ से अलग होकर एक कठिन मार्ग पर चलने की बुलाहट है—यह विश्वास, हियाव, और भारी कीमत वाली आज्ञाकारिता का मार्ग है। यीशु ने अपने शिष्यों को अपने समय की धारा के विपरीत चलने के लिए बुलाया था, और वह आज भी हमें अपने समय में ऐसा ही करने के लिए बुला रहा है।
यूह. 15:18-19 में, यीशु ने अपने शिष्यों से कहा, “यदि संसार तुम से बैर रखता है, तो तुम जानते हो कि उसने तुम से पहले मुझ से बैर रखा। यदि तुम संसार के होते, तो संसार अपनों से प्रेम रखता।” ये बहुत ही गम्भीर शब्द हैं। यीशु कोई सबसे बुरी परिस्थिति के विषय में नहीं बता रहा—वह तो एक सामान्य मसीही जीवन का खाका खींच रहा है। उसके साथ कदम मिलाकर चलना, संसार से अलग होकर चलना है। अस्वीकृति, दबाव, बहिष्कार और विरोध इस बात के संकेत नहीं हैं कि हम असफल हो रहे हैं—ये अक्सर इस बात के संकेत होते हैं कि हम उसी मार्ग पर चल रहे हैं, जिस पर हमारा उद्धारकर्ता चला था। यीशु ने हमें लोगों की वाहवाही नहीं दी—उसने तो हमें क्रूस दिया। उसने हमसे संसार के साथ शान्ति का वादा नहीं किया—उसने तो हमसे परमेश्वर के साथ शान्ति का वादा किया।
मत्ती 7:13-14 में वह हमें फिर से चेतावनी देता है, “सकेत फाटक से प्रवेश करो, क्योंकि चौड़ा है वह फाटक और सरल है वह मार्ग जो विनाश को पहुँचाता है; और बहुत से हैं जो उस से प्रवेश करते हैं। क्योंकि सकेत है वह फाटक और कठिन है वह मार्ग जो जीवन को पहुँचाता है; और थोड़े हैं जो उसे पाते हैं।” हम इस—“थोड़े”—शब्द से हतोत्साहित न हों। बल्कि, यह हमें जगाने का काम करे। मार्ग का कठिन होना सुसमाचार की कोई असफलता नहीं है। इसके विपरीत, मार्ग का कठिन होना सच्ची शिष्यता के मोल की ओर संकेत करता है। यीशु के पीछे हो लेना सबसे आरामदायक या सबसे स्वीकार्य मार्ग की खोज के बारे में नहीं है। यह तो विश्वासयोग्यता के बारे में है, चाहे उसकी कोई भी कीमत चुकानी पड़े।
हम एक ऐसे संसार में रहते हैं जो आराम, लोकप्रियता और वाहवाही का आदी है। अक्सर, साथियों का दबाव हमें इन्हीं में से किसी एक बात की परीक्षा में डालता है। “ऐसा करो, तो तुम अपने साथियों के बीच लोकप्रिय माने जाओगे।” “बस एक बार यह करके देखो, तो तुम्हें तुम्हारे मित्रों का साथ मिलेगा।” “इस मामले पर ध्यान मत दो, तो काम में तुम्हें तरक्की मिलेगी।” इन सभी परिस्थितियों में, जिस बात से समझौता करने का प्रस्ताव दिया जा रहा होता है, वह स्वयं की उन्नति है।
परन्तु यीशु हमें हमसे भी किसी ऊँची बात की ओर बुलाता है। जिसका अर्थ है कि वह हमें हमारे अपने लिए नहीं, बल्कि स्वयं उसके लिए जीवन बिताने हेतु बुलाता है। यीशु के लिए जीने का अर्थ पवित्रता, विनम्रता और स्वर्गीय बातों पर ध्यान लगाते हुए जीवन बिताना है। यह जीवन हमेशा आसान नहीं होता। और सच तो यह है कि यह शायद ही कभी आसान होता है। परन्तु यीशु के लिए जीवन बिताना हमेशा सार्थक होता है। अलग खड़े होने का अर्थ यह नहीं है कि हम शारीरिक रूप से समाज से कट जाएँ। इसके विपरीत, साथियों के दबाव का विरोध करते हुए यीशु के पीछे हो लेने का अर्थ यह है कि हम नैतिक स्पष्टता, आत्मिक ईमानदारी और मसीह के प्रति अटूट निष्ठा के साथ जीवन बिताएँ, भले ही इसके लिए हमें अपने रिश्तों, अपनी प्रतिष्ठा या अपनी हैसियत की कीमत क्यों न चुकानी पड़े। साथियों का दबाव हमें उनमें घुल-मिल जाने के लिए उकसाता है। विडम्बना यह है कि साथियों का दबाव यह वादा करता है कि यदि हम दूसरों में घुल-मिल जाएँगे, तो अन्त में हम सबसे अलग दिखेंगे। हालाँकि, अन्त में ये वादे कभी पूरे नहीं होते। यीशु के पीछे हो लेना ऐसा नहीं है। यीशु की यह माँग है कि हम उसी के प्रति अपनी पूरी निष्ठा रखें, और स्वयं से आगे बढ़कर उसी को चुनें। और जब हम ऐसा करते हैं, तो यीशु कहता है कि वह हमें “जगत की ज्योति” बना देगा (मत्ती 5:14)। दूसरे शब्दों में कहें तो यीशु के पीछे हो लेने का सबसे पहला अर्थ यह है कि आप सबसे अलग दिखें, परन्तु ऐसा उसके लिए हो, आपके अपने लिए नहीं।
इसलिए, जब आपसे काम की जगह पर अपनी ईमानदारी, या विद्यालय में अपनी लोकप्रियता, या घर पर अपने निजी आराम से समझौता करने को कहा जाए, तो याद रखें कि यीशु चाहता है कि आप उसके लिए सबसे अलग दिखें। वह चाहता है कि आप अपनी बड़ाई के लिए नहीं, बल्कि उसकी महिमा के लिए सही काम करें। वह चाहता है कि आप पर दबाव बनाने वाले अपने उन साथियों के सामने आप एक ऐसा उदाहरण रखें, जिसका वे अनुसरण कर सकें, और ऐसा न हो कि आप उनके उस उदाहरण का अनुसरण करें, जो वे आपके और दूसरों के सामने रख रहे हैं।
यीशु के पीछे हो लेने का अर्थ है गलत समझा जाना। मजाक उड़ाया जाना। अलग होना। परन्तु इसका अर्थ यह भी है कि उस एक व्यक्ति के साथ चलना, जो पिलातुस के सामने अकेला खड़ा था, जिसे उसके सबसे करीबी मित्रों ने छोड़ दिया था, और जिसे उसी भीड़ ने क्रूस पर चढ़ा दिया था जो कभी उसकी जय-जयकार करती थी। उसने कभी समझौता नहीं किया। वह कभी झुका नहीं। वह कभी डिगा नहीं। और अब वह हमारी ओर फिरकर कहता है, “मेरे पीछे हो ले।”
धारा के विपरीत संघर्ष करना: घुल-मिल जाने के बारे में बाइबल की चेतावनियाँ
बाइबल हमें अनगिनत बार याद दिलाती है कि सदृश होने का दबाव एक वास्तविक और प्राणघाती आत्मिक संघर्ष है। यूहन्ना 15 अध्याय में, यीशु ने अपने शिष्यों से आग्रह किया कि “मुझ में बने रहो।” बने रहो शब्द का अर्थ है कि ऐसी शक्तिशाली ताकतें होंगी, जो हमें यीशु से दूर खींचने का प्रयास करेंगी। पौलुस 2 तीमु. 2:4 में चेतावनी देता है कि मसीह का एक अच्छा योद्धा “अपने आप को संसार के कामों में नहीं फँसाता।” संसार का शोर, भटकाव और दबाव दाखलताओं की तरह होते हैं, जो आपके प्राण को जकड़ने और आपकी बुलाहट का गला घोंटने का प्रयास करती हैं।
बीज बोने वाले के दृष्टान्त में, यीशु उस बीज के बारे में बात करता है, जिसे “संसार की चिन्ता, और धन का धोखा, और अन्य वस्तुओं का लोभ उनमें समाकर वचन को दबा देता है” (मर. 4:19)। यह असल में छिपा हुआ साथियों का दबाव है: यह प्रदर्शन करने का, सफल होने का, तालमेल बिठाने का, कदम मिलाकर चलने का, किसी को नाराज न करने का दबाव है। और यदि हम सावधान न रहें, तो ये लालसाएँ हमारे आत्मिक फल को दबाकर हमारे विश्वास का गला घोंट देंगी।
सेन्ट्रल ओहियो में स्थित एक बड़ी ऑटोमोबाइल कम्पनी में लैरी एक वारंटी अकाउंट मैनेजर था। वह एक पक्का मसीही भी है। लैरी की कम्पनी को इस बात की भनक भी नहीं थी कि कारों की एक हालिया खेप कारखाने से ही एक बड़ी खराबी के साथ बाहर निकली थी और वह खराबी ड्राइवर की तरफ वाले एयरबैग से जुड़ी थी। यदि ये कारें किसी दुर्घटना का शिकार होतीं, तो सम्भावना थी कि वह एयरबैग नहीं खुलता, जिससे ड्राइवर बिना किसी सुरक्षा के सीधे स्टीयरिंग व्हील और विंडशील्ड से भिड़ जाता। जैसे ही इस खराबी की खबरें आने लगीं, लैरी को पूरा विश्वास था कि कम्पनी तुरन्त एक वारंटी जारी करेगी, जिसका खर्च उसी अकाउंट से उठाया जाएगा, जिसे वह सम्भालता था। कुछ सप्ताहों के बाद भी, कोई वारंटी जारी नहीं की गई। लैरी ने इस मामले पर अपने सुपरवाइजरों पर जोर डाला, परन्तु वे उसके साथ कठोरता से पेश आए। उन्होंने कहा कि कम्पनी के हित में यही है कि तब तक प्रतीक्षा किया जाए, जब तक और खबरें न आ जाएँ। प्रतीक्षा करने का अर्थ पैसे बचाना था, और उनकी दृष्टि में, यह एक बहुत ही लाभकारी काम था।
लैरी को लगा कि अपनी अन्तरात्मा की आवाज सुनकर, वह कम्पनी की कायरता में अब और भागीदार नहीं बना रह सकता है। उसने अपने सुपरवाइजर के पास जाकर स्पष्ट शब्दों में कह दिया कि यदि कम्पनी अपने वाहनों का बचाव नहीं करती और अपने ग्राहकों की सुरक्षा नहीं करती, तो वह अब और अधिक इस कम्पनी में नहीं रह सकता। लैरी से कहा गया कि शायद उसके लिए यही बेहतर होगा कि वह कम्पनी छोड़कर चला जाए।
यदि आप लैरी की जगह होते, तो आपने क्या किया होता? क्या आप सही बात के लिए खड़े होते, या सुरक्षित रास्ता चुनकर चुप रहते? लैरी के लिए, चुनाव बहुत आसान था। यदि उसे यीशु का अनुसरण करना था, तो उसे सही बात के लिए खड़ा होना ही था, चाहे कोई भी कीमत चुकानी पड़े।
याकूब की चुनौती: खारे-मीठे मत बनो
यीशु के सौतेले भाई याकूब से अधिक व्यावहारिक और तीखी बात कहने वाले लोग पवित्रशास्त्र में बहुत कम हैं। याकूब 1 अध्याय में, वह हमें आत्मिक दृढ़ता का एक शक्तिशाली सूत्र देता है। वह कहता है, “हे मेरे भाइयो, जब तुम नाना प्रकार की परीक्षाओं में पड़ो, तो इसको पूरे आनन्द की बात समझो, यह जानकर कि तुम्हारे विश्वास के परखे जाने से धीरज उत्पन्न होता है।” परीक्षाएँ—जिनमें साथियों का दबाव भी शामिल है—आत्मिक विकास में रुकावट नहीं होतीं; बल्कि ये वही साधन हैं, जिनका उपयोग परमेश्वर हमें परिपक्व बनाने और हमारी भीतरी सामर्थ्य को बढ़ाने के लिए करता है।
याकूब आगे साहस और आत्मिक एकाग्रता के एक बड़े शत्रु “दुचित्ता” होने के बारे में बताता है। वह कहता है, “सन्देह करनेवाला समुद्र की लहर के समान है जो हवा से बहती और उछलती है… वह व्यक्ति दुचित्ता है और अपनी सारी बातों में चंचल है” (याकू. 1:6-8)। दुचित्ता होने का अर्थ एक ही समय में दो अलग-अलग संसारों के लिए जीवन बिताने का प्रयास करना है। यह ठीक वैसा ही है, जैसे कोई व्यक्ति बाड़ पर बैठा हो, या जिसका एक पैर संसार में हो और दूसरा परमेश्वर के वचन में हो। और याकूब यह स्पष्ट कर देता है कि—यीशु का अनुसरण करने और संसार के साथ चलने से काम नहीं बनेगा।
वह एक और उदाहरण देकर अपनी बात को और भी जोरदार तरीके से समझाता है: “क्या सोते के एक ही मुँह से मीठा और खारा जल दोनों निकलता है?” (याकू. 3:11)। मैं कई वर्षों तक नॉर्थ कैरोलिना के न्यू बर्न शहर में रहा, जो न्यूस नदी के किनारे पर ही बसा हुआ है। न्यू बर्न वह जगह है, जहाँ भूमि के भीतर बहने वाली नदी, खारे पानी वाले समुद्र से आकर मिलती है। इसका क्या परिणाम होता है? इसका परिणाम खारा-मीठा पानी—अर्थात् खारे पानी और मीठे पानी का एक मिश्रण होता है। यह पानी गदला होता है, और पीने योग्य नहीं होता, और देखने में चाय के किसी गन्दे प्याले जैसा लगता है। याकूब हमें एक दुचित्ते विश्वासी की यही तस्वीर दिखाता है। और ठीक इसी बात से परमेश्वर हमें स्वतंत्र करना चाहता है।
इसका अर्थ यह है कि साथियों के दबाव के साथ होने वाली हर छोटी-मोटी झड़प, असल में हमारी वफादारी की एक परीक्षा होती है। लैरी की तरह, यीशु का अनुसरण करने का अर्थ अक्सर यह होता है कि हम यीशु को हाँ कहें और संसार को न कहें। क्या आप यीशु को हाँ कहने के लिए तैयार हैं?
—
चर्चा के प्रश्न:
1. यीशु ने कहा था कि संसार उसके अनुयायियों से बैर रखेगा। क्या आपने कभी इस बैर का अनुभव किया है? आपने इसका सामना कैसे किया?
2. क्या आपने कभी स्वयं को ‘दुचित्ता’ जीवन जीते हुए पाया है? वह किस रूप में सामने आया? आपने उसे कैसे रोका?
3. आज आपके लिए “कठिन मार्ग” पर चलने का क्या अर्थ है?
4. क्या परमेश्वर का वचन आपको कुछ ऐसा करने के लिए बुला रहा है, जिसके लिए आपने अब तक इसलिए न कहा है, क्योंकि आपको चिन्ता थी कि आपके साथी उसके बारे में क्या सोचेंगे या क्या करेंगे? वह क्या है?
—
भाग III: साथियों के दबाव का विरोध करने के व्यावहारिक तरीके
आप जीवन के किसी भी पड़ाव पर क्यों न हों, आपको साथियों के दबाव का सामना करना ही पड़ेगा। सामाजिक माहौल से लेकर सोशल मीडिया तक, मित्रता से लेकर पारिवारिक मेलजोल तक, दूसरों की मंजूरी पाने के लिए अपने सिद्धान्तों से समझौता करने की परीक्षा लगातार बनी रहती है। परन्तु परमेश्वर का वचन हमें दृढ़ता से खड़े रहने, सच्चाई पर चलने, और मसीह की आज्ञाकारिता में निडर होकर जीने के सामर्थी साधनों से सुसज्जित करता है।
यहाँ पवित्रशास्त्र से निकले चार व्यावहारिक तरीके दिए गए हैं, जिनकी सहायता से आप अटूट विश्वास के साथ साथियों के दबाव का सामना कर सकते हैं।
1. पवित्रशास्त्र के द्वारा अपने मन को नया करें
साथियों के दबाव के विरुद्ध बचाव की पहली—और सबसे महत्वपूर्ण—कड़ी परमेश्वर का वचन है। जब हमारे आसपास की संस्कृति लगातार हमारे मन पर विलासिता, आत्म-प्रचार, नैतिक सापेक्षवाद, और समझौते के सन्देशों की बमबारी करती है, तो इसका सामना करने के लिए हमें केवल इच्छा-शक्ति से कहीं अधिक शक्तिशाली बात की आवश्यकता होती है। संसार की आवाजें—मनोरंजन, मीडिया, संगीत, विज्ञापनों और यहाँ तक कि बातचीत के माध्यम से भी लगातार गूंजती रहती हैं। वे मूल्यों और अपेक्षाओं को आकार देते हुए, हमें बताती हैं कि क्या पहनना है, कैसे सोचना है, और किस पर विश्वास करना है। बिना किसी वैचारिक आत्मिक अनुशासन के, हम अनजाने में ही इन सन्देशों को अपने भीतर समाहित करने लगते हैं। इसी कारण से पवित्रशास्त्र ही हमारा आधार होना चाहिए।
रोमि. 12:2 में पौलुस के शब्द स्पष्ट और प्रभावशाली हैं: “इस संसार के सदृश न बनो; परन्तु तुम्हारे मन के नए हो जाने से तुम्हारा चाल–चलन भी बदलता जाए।” ध्यान दें कि पौलुस सुझाव नहीं दे रहा है—बल्कि वह आज्ञा दे रहा है। परन्तु हम ऐसा कैसे कर सकते हैं? साथियों के दबाव का तो अर्थ ही हमें सदृश होने की परीक्षा में डालने के बारे में है! पौलुस इसका जो उत्तर देता है, वह यह है कि हमें परमेश्वर के वचन के द्वारा अपने मनों को नया करना होगा। यह बदलाव बाहर से आरम्भ नहीं होता—बल्कि यह हमारे अस्तित्व के सबसे गहरे हिस्सों से अर्थात्: हमारी मान्यताओं, विचारों और भीतरी दृढ़ विश्वास से आरम्भ होता है।
अपने मन को नया करने का अर्थ दिव्य सत्य के साथ अपनी सोच को इस तरह तब तक फिर से आकार देना है, जब तक कि आप संसार को, स्वयं को, और दूसरों को उसी तरीके से न देखने लगें, जैसे परमेश्वर देखता है। यह कोई एक बार किया जाने वाला कार्य नहीं है; बल्कि यह एक दैनिक निर्णय है। असल में, परमेश्वर के वचन के द्वारा अपने मन को नया करना, मसीही जीवन की सबसे मुख्य गतिविधियों में से एक है। जब परमेश्वर का वचन किसी भी अन्य बात की तुलना में हमसे अधिक ऊँची और अधिक अधिकारपूर्ण आवाज में बोलता है, तो हम पाएँगे कि साथियों का दबाव अपने आप ही नष्ट हो जाता है।
भज. 119:9 में, राजा दाऊद एक ऐसा प्रश्न पूछता है, जिस पर हर मसीही को रुककर विचार करना चाहिए। वह पूछता है, “जवान अपनी चाल को किस उपाय से शुद्ध रखे? तेरे वचन के अनुसार सावधान रहने से।”
परमेश्वर का वचन हमारे हृदयों को धोखे से बचाता है, हमारे विश्वास को मजबूत करता है, और परीक्षा का विरोध करने के लिए हमें तैयार करता है। इसके बिना, सबसे मजबूत मनुष्य भी गिर जाएगा। परन्तु जब वचन हमारे भीतर गहराई से बस जाता है, तो यह हमारा भीतरी दिशासूचक यंत्र बन जाता है—और जब कठिन निर्णय लेने होते हैं, तो यह हमारा मार्गदर्शन करता है, और हमें याद दिलाता है कि यीशु हमारे लिए मरा, इसलिए अब हम अपने नहीं रहे। इसके बजाय, हमारे जीवन उसके हैं, और हमें इन्हें उसकी महिमा के लिए जीना चाहिए।
पवित्रशास्त्र दर्पण और तलवार दोनों हैं। यह आपको स्पष्टता और साहस देता है। पवित्रशास्त्र हमें केवल जानकारी नहीं देता—यह हमें बदल देता है। इफि. 6:17 के अनुसार, बाइबल “आत्मा का तलवार” है। आत्मिक युद्ध में यह आपका आक्रमण करने वाला हथियार है। जब जंगल में यीशु की परीक्षा हुई, तो उसने शैतान को सांसारिक तर्क नहीं दिए। इसके बजाय, यीशु ने पवित्रशास्त्र को उद्धृत किया। जब हमारी परीक्षा होती है, तो हमें भी ऐसा ही करना चाहिए। परीक्षा के समय, हमें परमेश्वर के वचन की ओर दौड़ना चाहिए और उसका पालन करना चाहिए।
यहाँ एक सहायक तस्वीर दी गई है: अपने मन को एक स्पंज की तरह सोचिए। यह जो कुछ भी सोखता है, दबाव पड़ने पर वही बाहर निकालता है। यदि आपका मन संसार के मूल्यों से भरा हुआ है, तो जब साथियों का दबाव पड़ेगा, तो आप समझौता, भ्रम और डर ही बाहर निकालेंगे। परन्तु यदि आपका मन परमेश्वर के सत्य में डूबा हुआ है, तो जब दबाव बढ़ेगा, तो जो बाहर आएगा, वह साहस, स्पष्टता और दृढ़ विश्वास होगा। यह आपकी अपनी सामर्थ्य का परिणाम नहीं है—यह परमेश्वर की उपस्थिति और सत्य में बिताए गए समय का फल है।
2. ईश्वरीय लोगों के बीच में रहें
एक बार मैंने यह बात कहते सुना था कि आपका समुदाय आपके चरित्र को आकार देता है—चाहे आपको इसका एहसास हो या न हो। जिन लोगों के साथ आप नियमित रूप से उठते-बैठते हैं, वे आपके विचारों को प्रभावित करते हैं, आपकी बोली को आकार देते हैं, आपके निर्णयों का मार्गदर्शन करते हैं, और आपके आत्मिक विकास पर प्रभाव डालते हैं। कोई भी मनुष्य दूसरों के प्रभाव से पूरी तरह अछूता नहीं रह सकता। इसी कारण से पवित्रशास्त्र हमें यह आज्ञा देता है कि हमारे द्वारा बनाए गए रिश्तों के प्रति हमें सचेत रहना चाहिए। पौलुस 1 कुरि. 15:33 में लिखता है, “धोखा न खाना, “बुरी संगति अच्छे चरित्र को बिगाड़ देती है।“ यदि आप नकारात्मक, समझौता करने वाले, या आत्मिक रूप से उदासीन लोगों के साथ अधिक समय बिताते हैं, तो आखिरकार आप भी उन्हीं के मूल्यों को अपनाने लगेंगे। परन्तु यदि आप बुद्धिमान लोगों के साथ मिलकर चलते हैं, तो आप भी बुद्धि और पवित्रता में बढ़ते जाएँगे।
आप जिन लोगों के साथ रहते हैं, वे या तो आपके दृढ़ विश्वास को मजबूत करेंगे या उसे कमजोर कर देंगे। यदि आपके सबसे करीबी मित्र आपके विश्वास को कम करके आँकते हैं, पाप को मामूली समझते हैं, या लगातार आपको ऐसी स्थितियों में फँसाते हैं, जहाँ आपकी ईमानदारी की परीक्षा होती है, तो आपकी आत्मा भी धीरे-धीरे उनके सदृश होने लगेगी। प्रभाव बहुत ही अधिक शक्तिशाली होता है। जैसे लोहा लोहे को चमका देता है (नीति. 27:17), ठीक वैसे ही लोग—चाहे वह अच्छे के लिए हो या बुरे के लिए, एक दूसरे पर प्रभाव डालते हैं।
अब, इसका अर्थ यह नहीं है कि हमें अविश्वासियों से पूरी तरह से दूर हो जाना चाहिए या हर उस व्यक्ति को अनदेखा करना चाहिए, जो आत्मिक रूप से परिपक्व नहीं है। यीशु ने तो ऐसा नहीं किया था। उसने पापियों के साथ भोजन किया, चुंगी लेने वालों के साथ बातचीत की, और भटके हुए लोगों पर दया दिखाई। परन्तु उसने उन पर प्रभाव डाला—और यह करना बहुत आवश्यक है; उन्होंने यीशु पर प्रभाव नहीं डाला। वह अंधेरे से घिरे होने पर भी सच्चाई के मार्ग पर चला। जो प्रश्न आपको लगातार स्वयं से पूछना चाहिए, वह यह है कि: कौन किसे आकार दे रहा है?
सदृश होने के दबाव का सामना करते हुए किसी का भी कीर्तिमान पूरी तरह से पूर्ण नहीं होगा। यह पूर्णता के बारे में नहीं है—यह दिशा के बारे में है। क्या आपके सबसे करीबी साथी आपको यीशु के और करीब ला रहे हैं या चुपके से आपको दूर खींच रहे हैं? क्या आपकी मित्रता प्रार्थना, सच्चाई, जवाबदेही और प्रोत्साहन से भरी है—या फिर गपशप, समझौते और आत्मिक भटकाव से भरी है? इसका उत्तर आपकी सोच से कहीं अधिक महत्व रखता है। असल में, आपका आत्मिक कल्याण अक्सर आपके सबसे करीबी रिश्तों की आत्मिक दिशा से जुड़ा होता है।
एक बड़ी मशहूर कहावत है: “मुझे तुम्हारे पाँच सबसे करीबी मित्र दिखाओ, और मैं तुम्हें तुम्हारा भविष्य दिखाऊँगा।” यह केवल एक चालाक उद्धरण नहीं है—यह परमेश्वर के वचन में निहित एक सच्चाई है। यदि आप ऐसे लोगों के साथ चलते हैं, जो प्रभु से प्रेम करते हैं, जो आपको आगे बढ़ने की चुनौती देते हैं, और जो प्रेम में होकर सच्चाई बोलने से नहीं डरते, तो आप आत्मिक रूप से और मजबूत बनेंगे। परन्तु यदि आप लगातार स्वयं को ऐसे लोगों से घेरे रखते हैं, जो पाप को सामान्य मानते हैं, पवित्रशास्त्र को कम महत्व देते हैं, या विश्वास को एक वैकल्पिक बात मानते हैं, तो बस कुछ ही समय की बात है, जब मसीह के साथ आपकी अपनी यात्रा भी प्रभावित होगी।
इसी कारण से एक धार्मिकता से भरे समुदाय से जुड़ना बहुत आवश्यक है। किसी छोटे समूह में शामिल हों, किसी बाइबल अध्ययन को ढूँढ़ें, और ऐसी सभाओं में जाएँ, जहाँ लोग मसीह की खोज कर रहे हों। केवल शामिल न हों—बल्कि उसमें हिस्सा लें। अपना हृदय खोलें। दूसरों को आपके जीवन में अपनी बात कहने दें। आत्मिक मित्रता रातों-रात नहीं बनती, और न ही यह अचानक से होती है। यह जान-बूझकर किए गए प्रयासों, प्रार्थनापूर्ण खोज और सच्चाई के लिए साझा की गई भूख का परिणाम होती है।
परन्तु केवल धार्मिकता से भरे मित्रों की खोज ही न करें—बल्कि वैसे बनें। आखिरकार, आपके द्वारा यीशु का अनुसरण करने का एक हिस्सा यह भी है कि आप दूसरे लोगों को उसका अनुसरण करने में सहायता करें। इसलिए, एक ऐसा मित्र बनने का प्रयास करें, जो प्रोत्साहित करे, उत्थान करे, प्रेरणा दे, और विश्वास में दृढ़ता से खड़ा रहे। ऐसा व्यक्ति बनें, जो यह कहने से न डरे कि “आओ, इस बात के बारे में प्रार्थना करें,” या “आओ देखें कि पवित्रशास्त्र क्या कहता है।” ऐसा व्यक्ति बनें, जो दूसरों को ऊँचा उठाए, जो उनके बोझ उठाए, और जो तब भी सच्चाई पर चले, जब वहाँ से हट जाना अधिक आसान हो।
साथियों का दबाव तब अपना प्रभाव खो देता है, जब आप ऐसे लोगों के साथ चलते हैं, जो यीशु के साथ-साथ चलते हैं। अकेले में आप कमजोर पड़ सकते हैं। साथ मिलकर आप मजबूत होते हैं। सभो. 4:9-10 कहता है, “एक से दो अच्छे हैं… क्योंकि यदि उनमें से एक गिरे, तो दूसरा उसको उठाएगा।” यही ईश्वरीय मित्रता की सुन्दरता है: यह न केवल आपको पाप से बचाती है—बल्कि यह आपको अनुग्रह में बढ़ने में भी सहायता करती है।
इसलिए, अपने रिश्तों की सूची बनाएँ। स्वयं से कुछ कठिन प्रश्न पूछें। और यदि आवश्यकता हो, तो बदलाव लाएँ। अपनी आत्मिक बनावट में आपके समुदाय की भूमिका को कम न आँकें। क्योंकि सही लोग आपको मसीह जैसा बनने में सहायता करेंगे।
3. साहस और निडरता के लिए प्रार्थना करें
साथियों के दबाव के आगे हार मानने का एक सबसे आम कारण डर है। यह हमेशा शारीरिक खतरे का डर नहीं होता—अक्सर यह अस्वीकार किए जाने का एक शान्त, अधिक जटिल तरह का डर होता है। यह गलत समझे जाने का डर है। यह समूह में घुल-मिल न पाने का डर है। यह हँसी का पात्र बनने, कोई ठप्पा लगने, या अकेला छोड़ दिए जाने का डर है। यह डर बहुत ज्यादा शक्तिशाली होता है—और अक्सर यह सबसे सच्चे विश्वासियों को भी उस समय चुप रहने पर मजबूर कर देता है, जब उन्हें बोलना चाहिए, यह भीड़ में उस समय घुल-मिल जाने पर मजबूर कर देता है, जब उन्हें सबसे अलग खड़े होना चाहिए, और यह उस समय समझौता करने पर मजबूर कर देता है, जब उन्हें मजबूती से डटे रहना चाहिए।
परन्तु डर का उत्तर आत्मविश्वास नहीं—बल्कि परमेश्वर पर विश्वास है। इसका हल मजबूत होने का दिखावा करना नहीं—बल्कि अपनी कमजोरी को स्वीकार करना और सच्चे साहस के एकमात्र स्रोत—पवित्र आत्मा—की ओर मुड़ना है। पवित्रशास्त्र हमें अपने व्यक्तित्व या करिश्मे पर निर्भर रहने के लिए नहीं कहता—बल्कि यह हमें परमेश्वर से ऐसे साहस के लिए गुहार लगाने को कहता है जो हमसे कहीं बढ़कर हो।
नीति. 28:1 घोषणा करता है, “दुष्ट लोग जब कोई पीछा नहीं करता तब भी भागते हैं, परन्तु धर्मी लोग जवान सिंहों के समान निडर रहते हैं।” इस तरह का साहस भीतर से नहीं आता—यह इस बात को जानने से आता है कि आप मसीह में कौन हैं। एक सिंह इसलिए साहसी नहीं होता, क्योंकि वह वैसा बनने का प्रयास करता है। वह इसलिए साहसी होता है, क्योंकि वह जानता है कि वह कौन है। इसी तरह, जब हम यीशु में अपनी पहचान को समझ जाते हैं—कि हम चुने हुए, क्षमा किए हुए, प्रेम किए गए, सशक्त किए गए हैं, और हमें आज्ञा मिली है—तो हम एक अलग ही तरह के साहस के साथ आगे बढ़ने लगते हैं। यह अहंकार नहीं होता। यह घमण्ड नहीं होता। बल्कि यह आत्मा से भरा हुआ हियाव होता है।
इसके लिए आरम्भिक कलीसिया हमारा आदर्श है। प्रेरितों 4 अध्याय में, पतरस और यूहन्ना ने अभी-अभी एक व्यक्ति को चंगा किया था और बड़े साहस के साथ सुसमाचार का प्रचार किया था। उन्हें पकड़कर धमकाया गया और चेतावनी दी गई कि यीशु के नाम पर बोलना बन्द कर दें। हममें से अधिकांश लोग शायद पीछे हट जाते। परन्तु उन मसीहियों ने क्या किया? उन्होंने इकट्ठे होकर प्रार्थना की कि परमेश्वर उन्हें सामर्थ्य दे कि “तेरा वचन बड़े हियाव से सुनाएँ” (प्रेरि. 4:29)। उन्होंने सुरक्षा के लिए प्रार्थना नहीं की। उन्होंने बचने का कोई रास्ता नहीं माँगा। उन्होंने तो बस साहस के लिए प्रार्थना की। और परमेश्वर ने उत्तर दिया। पद 31 बताता है, “जब वे प्रार्थना कर चुके, तो वह स्थान जहाँ वे इकट्ठे थे हिल गया, और वे सब पवित्र आत्मा से परिपूर्ण हो गए, और परमेश्वर का वचन हियाव से सुनाते रहे।”
जब परमेश्वर हियाव के लिए की गई प्रार्थना का उत्तर देता है, तो यही होता है—पृथ्वी हिल जाती है और जीवन बदल जाते हैं। परन्तु इसका आरम्भ एक ऐसे हृदय से होता है, जो माँगने को तैयार हो।
यदि आप झुक जाने वाले संसार में मजबूती से खड़े रहना चाहते हैं, तो हियाव को अपनी दैनिक प्रार्थना बना लें। परमेश्वर से माँगें कि वह आपको प्रेम के साथ सच बोलने में सहायता करे। उससे वह साहस माँगें कि जब दूसरे लोग पाप के लिए हाँ कहें, तो आप न कह सकें। उससे आपको सशक्त करने के लिए कहें कि आप मसीह का विश्वासयोग्यता के साथ अनुसरण कर सकें, भले ही इसका अर्थ अकेले खड़ा रहना ही क्यों न हो।
याद रखें कि डर का न होना साहस नहीं है—बल्कि यह झुकने से इन्कार कर देने वाले एक गहरे दृढ़ विश्वास की उपस्थिति है। पतरस की कहानी इसका एक बेहतरीन उदाहरण है। एक बार डर के मारे उसने एक दासी के सामने यीशु का इन्कार कर दिया था। परन्तु कुछ ही सप्ताहों के बाद, पिन्तेकुस्त के दिन पवित्र आत्मा से भर जाने पर, पतरस ने हज़ारों लोगों के सामने खड़े होकर सामर्थ्य के साथ मसीह का प्रचार किया। उसने शासकों का, महासभाओं का और बन्दीगृह का सामना किया—और वह कभी नहीं झिझका। कौन सी बात बदल गई थी? पतरस का व्यक्तित्व नहीं—बल्कि उसकी सामर्थ्य का स्रोत बदल गया था। पवित्र आत्मा ने उसे भर दिया था, और अब डर उस पर राज नहीं करता था।
यही साहस आज हर विश्वासी के लिए उपलब्ध है। यह प्रेरितों या प्रचारकों के लिए आरक्षित नहीं है—यह हर उस व्यक्ति के लिए उपलब्ध है, जो एक ऐसे संसार में यीशु के लिए जीना चाहता है, जो हम पर चुप रहने का दबाव डालता है। साहसी बनने के लिए आपको किसी माइक की आवश्यकता नहीं है। आपको एक समर्पित हृदय और आत्मा से भरे जीवन की आवश्यकता है।
अत:, परमेश्वर से माँगें। उससे कहें कि वह आपके डर को दूर करे, आपके हृदय को भर दे, और आपको मसीह का गवाह बनाए। चाहे कक्षा का कमरा हो, काम की जगह हो, पारिवारिक मेल-जोल हो, या ऑनलाइन संसार हो—आप कभी भी दबाव के आगे झुकने के लिए नहीं बने थे। आप तो यीशु के सन्देश को साहस के साथ आगे बढ़ाने के लिए बने थे।
4. केवल एक श्रोता के लिए जीएँ
अक्सर इस बारे में साथियों का दबाव कम होता है कि दूसरे क्या कहते हैं, और इस बारे में अधिक होता है कि हमें क्या डर रहता है कि वे क्या सोचेंगे। यह हृदय के गहरे कोनों में उस समय पनपता है—जब हम दूसरों की राय को अपने निर्णयों को आकार देने देते हैं, अपनी प्राथमिकताओं पर हुक्म चलाने देते हैं, और यहाँ तक कि अपनी कीमत भी लगाने देते हैं। असल में, साथियों का दबाव केवल बाहरी ताकतों के बारे में नहीं है—बल्कि यह हमारी भीतरी निष्ठा के बारे में है। असली प्रश्न यही है कि: क्या आप लोगों की मंजूरी पाने के लिए जी रहे हैं, या परमेश्वर को प्रसन्न करने के लिए जी रहे हैं?
पौलुस गला. 1:10 में इस मामले को शक्तिशाली स्पष्टता के साथ उठाता है, “अब मैं क्या मनुष्यों को मनाता हूँ या परमेश्वर को? क्या मैं मनुष्यों को प्रसन्न करना चाहता हूँ? यदि मैं अब तक मनुष्यों को ही प्रसन्न करता रहता तो मसीह का दास न होता।” यह वचन हमें याद दिलाता है कि हम दो स्वामियों की सेवा नहीं कर सकते—आप या तो लोगों की वाहवाही के लिए जीवन बिताएँगे या मसीह की मंजूरी के लिए जीवन बिताएँगे। आप लोकप्रियता और पवित्रता, दोनों के पीछे नहीं भाग सकते। आखिरकार, एक को पाने के लिए दूसरे को छोड़ना ही पड़ेगा।
पूरी तरह से यीशु के पीछे हो लेने का अर्थ है, एक अलग तरह का जीवन चुनना—एक ऐसा जीवन जहाँ आप सफलता को ‘लाइक्स’, ‘शेयर्स’ या वाहवाही से नहीं, बल्कि विश्वासयोग्यता से मापते हैं। यह एक ऐसा जीवन है, जहाँ अपने उद्धारकर्ता को “धन्य, हे अच्छे और विश्वासयोग्य दास” कहते हुए सुनना ही आपका सबसे बड़ा आनन्द है।
मसीही परिपक्वता ऐसी ही दिखती है कि: आप पसन्द किए जाने से अधिक पवित्र होने की, स्वीकार किए जाने से अधिक आज्ञा मानने की, और अपनी स्वयं की पहचान से अधिक परमेश्वर की महिमा की परवाह करने लगते हैं। आप यह पूछना बन्द कर देते हैं कि “वे क्या सोचेंगे?” और यह पूछना आरम्भ कर देते हैं कि “परमेश्वर क्या सोचेगा?” और ऐसा करके, आपको एक अतुल्य स्वतंत्रता मिलती है—और यह स्वतंत्रता तुलना से, असुरक्षा से, और कुछ करके दिखाने की अन्तहीन आवश्यकता से होती है।
एक श्रोता के लिए जीना स्वतंत्र करने वाला इसलिए है, क्योंकि परमेश्वर सब कुछ देखता है—वह आपकी मंशाएँ, आपके संघर्ष, आपके गुप्त बलिदान देखता है—और वह उन बातों को महत्व देता है, जिन्हें संसार अनदेखा कर देता है। हो सकता है कि संसार कभी भी आपकी ईमानदारी के लिए तालियाँ न बजाए, परन्तु स्वर्ग अवश्य बजाएगा। और अन्त में, केवल एक ही राय महत्व रखेगी।
इसकी कल्पना करें कि: आप एक खचाखच भरे मैदान में खेल रहे हैं। और शोर से कान खराब हो रहे हैं। कुछ प्रशंसक हौसला बढ़ाते हैं। दूसरे हतोत्साहित करते हैं। आलोचकों की आवाज बहुत तेज है। परन्तु सबसे आगे वाली पंक्ति में आपका प्रशिक्षक—यीशु—बैठा है। उसकी दृष्टि आप पर है। आप उसकी मंजूरी की लालसा करते हैं। आपको उसके शब्द ही सुनने की आवश्यकता है। यदि वह प्रसन्न है, तो फिर और कुछ मायने नहीं रखता।
अत:, स्वयं से पूछिए: आप किसके लिए प्रदर्शन कर रहे हैं? आपके जीवन में किसकी आवाज का सबसे अधिक प्रभाव है? आपकी कीमत कौन निर्धारित करता है?
उसे यीशु ही रहने दें। वह केवल यीशु ही हो।
और जब दबाव आए—और वह तो अवश्य आएगा—तो यह याद रखें: आपको घुल-मिल जाने के लिए नहीं बनाया गया था। आपको सबसे अलग दिखने के लिए बनाया गया था। आपको ध्यान खींचने के लिए नहीं, बल्कि मसीह के लिए बनाया गया था।
—
चर्चा के प्रश्न:
1. पवित्रशास्त्र के द्वारा अपने मन को नया करने से आपको, सदृश होने के दबाव के सामने खड़े रहने में कैसे सहायता मिली है?2. आपके जीवन में ऐसे कौन लोग हैं जो आपकी आत्मिक यात्रा को—चाहे अच्छे के लिए या बुरे के लिए प्रभावित कर रहे हैं?
3. एक श्रोता के लिए जीने का क्या अर्थ है, और यह सोच आपके दैनिक चुनावों को कैसे बदल सकती है?
—
निष्कर्ष: प्रोत्साहन के कुछ अन्तिम शब्द
यीशु अकेला खड़ा रहा
जब साथियों के दबाव का विरोध करने की बात आती है, तो यीशु मसीह अडिग संकल्प, समझौता न करने वाले सत्य और पूर्ण आज्ञाकारिता का सर्वोत्तम उदाहरण है। अपनी सेवकाई के आरम्भ से लेकर क्रूस पर अपनी अन्तिम श्वास तक, यीशु को—धार्मिक अगुवों से, राजनीतिक हस्तियों से, भीड़ से, और यहाँ तक कि अपने ही अनुयायियों से भी लगातार दबाव का सामना करना पड़ा। फिर भी, एक बार भी उसने दूसरों की इच्छा के आगे घुटने नहीं टेके। एक बार भी उसने अपने उद्देश्य से अधिक लोकप्रियता को प्राथमिकता नहीं दी। वह पिता की इच्छा से दृढ़तापूर्वक जुड़ा हुआ था, और वह जुड़ाव—जनमत की आँधी और लोगों के द्वारा ठुकराए जाने के समय में भी मजबूती से कायम रहा।
उस समय के धार्मिक कुलीन लोग यीशु को अपने प्रश्नों में फँसाने का लगातार प्रयास इस आशा के साथ करते रहते थे कि वह या तो उनकी परम्पराओं के सदृश हो जाए या फिर पवित्रशास्त्र का विरोध करे। उन्होंने यीशु की शिक्षाओं का मजाक उड़ाया, उस पर परमेश्वर की निन्दा का आरोप लगाया, और उसे मार डालने का षड़्यंत्र रचा। फिर भी, यीशु ने अपने सन्देश को हल्का करने या सच्चाई से मुँह मोड़ने से इन्कार कर दिया। वह स्पष्ट रूप से, सीधे तौर पर और निडर होकर बोलता था—भले ही इससे शक्तिशाली लोगों को बुरा लगे।
भीड़ भी बड़ी चंचल थी। कभी-कभी, वे उससे बहुत प्रेम करते थे। वे आश्चर्यकर्मों, भोजन और तमाशों के लिए उसके पीछे हो लेते थे। परन्तु जब उसकी शिक्षाएँ कठिन लगने लगीं, तो वे उसे छोड़कर चले गए। यूहन्ना 6 अध्याय हमें बताता है कि उसके कई शिष्यों ने कहा, “यह कठोर बात है; इसे कौन सुन सकता है?”
यहाँ तक कि उसके सबसे करीबी शिष्य भी उसे समझने में विफल हो गए। पतरस ने यीशु को अपनी मृत्यु के बारे में बात करने पर फटकारा। थोमा ने सन्देह किया। यहूदा ने विश्वासघात किया। और उसके अन्तिम समय में, वे सब तितर-बितर हो गए। फिर भी, यूह. 8:29 में, यीशु ने यह अटल दावा किया: “मैं सर्वदा वही काम करता हूँ जिससे वह (अर्थात् परमेश्वर) प्रसन्न होता है।”
कितना बढ़िया आदर्श है! कितनी बढ़िया बात है! यीशु ने लोगों की वाहवाही के लिए जीवन नहीं जिया—उसने अपने पिता की मंजूरी पाने के लिए जीवन जिया। उसने भीड़ की स्वीकृति के आधार पर अपनी पहचान को आकार नहीं दिया—उसे परमेश्वर की इच्छा पूरी करने में अपनी वास्तविक कीमत मिली।
जब हम साथियों के दबाव का सामना करते हैं—चाहे वह चुप रहने का दबाव हो, अपने सिद्धान्तों से समझौता करने का दबाव हो, या संसार मेल-जोल करने का दबाव हो—तो हमें यीशु की ओर ताकना चाहिए। जब दूसरे डगमगाए, तब भी वह अडिग खड़ा रहा। जब दूसरों ने विद्रोह किया, तब भी उसने आज्ञापालन किया। और वह हमें भी उसी मार्ग पर चलने का निमंत्रण देता है—एक ऐसा मार्ग पर, जो लोकप्रियता की ओर नहीं, बल्कि क्रूस की ओर ले जाता है। “यदि कोई मेरे पीछे आना चाहे, तो अपने आपे से इन्कार करे और प्रतिदिन अपना क्रूस उठाए हुए मेरे पीछे हो ले।” (लूका 9:23)
यह आसान नहीं है। इसकी कीमत हमें अपने आराम, अपनी सुविधाओं, और कभी-कभी अपने रिश्तों के रूप में भी चुकानी पड़ेगी। परन्तु यही एकमात्र ऐसा मार्ग है, जो जीवन की ओर ले जाता है। भीड़ का विरोध करके यीशु के पीछे हो लेना, यह ऐसा सबसे अधिक लीक से हटकर और साहसी कार्य है, जो आप कर सकते हैं। और क्योंकि वह इस मार्ग पर सबसे पहले चला, इसलिए अब हम भी आत्मविश्वास के साथ उसके पीछे-पीछे चल सकते हैं।
सारा नाम की एक युवा मसीही गायिका थी। उसकी आवाज बहुत मधुर थी और उसमें आराधना के प्रति जुनून था। सोशल मीडिया पर उसके फॉलोअर्स की संख्या तेजी से बढ़ने लगी, और जल्द ही कई फिल्म-निर्माता उसके साथ काम करने में रूचि दिखाने लगे। परन्तु इसमें एक समस्या थी—वे चाहते थे कि वह अपने गानों में “यीशु से जुड़ी बातों” को थोड़ा कम कर दे। उन्होंने उससे कहा, “तुम थोड़ी-बहुत आत्मिकता रख सकती हो, परन्तु इतनी सीधी-सीधी बातें मत करो। यदि तुम्हें और अधिक श्रोता चाहिए, तो तुम्हें और अधिक आम लोगों की पसन्द के अनुसार बनना होगा।”
दबाव बहुत अधिक था। मित्रों ने उससे यह सौदा मान लेने की जिद की। “यह तुम्हारे लिए एक बड़ा मौका है! बस थोड़ा-सा समझौता कर लो—तुम पर्दे के पीछे तो मसीही बनी ही रह सकती हो।” एक पल के लिए, सारा दुविधा में पड़ गई। परन्तु फिर उसे यीशु के शब्द याद आए: “यदि मनुष्य सारे जगत को प्राप्त करे और अपने प्राण की हानि उठाए, तो उसे क्या लाभ होगा?” (मर. 8:36)
इसलिए, उसने मना कर दिया। उसने लोकप्रियता को छोड़कर विश्वासयोग्य बने रहना चुना। उसने चकाचौंध के बजाय क्रूस को चुना।
यीशु की तरह, सारा ने भी भीड़ के लिए जीवन नहीं जिया—उसने अपने स्वर्गीय पिता के लिए जीवन जिया। और जबकि उसने एक सौदा खो दिया, परन्तु उसे शान्ति, उद्देश्य और मसीह के साथ एक गहरा रिश्ता मिला।
यीशु के पीछे हो लेने का अर्थ दृढ़ बने रहना है
यीशु ने केवल साथियों के दबाव का ही विरोध नहीं किया—बल्कि उसने सच्चाई के साथ अकेले खड़े होकर महानता की नयी परिभाषा गढ़ी, भले ही इसका अर्थ क्रूस पर चढ़ना ही क्यों न हो। उसका मजाक उड़ाया गया, उसे ठुकराया गया, उसके साथ विश्वासघात हुआ और उसे क्रूस पर चढ़ा दिया गया—इसलिए नहीं कि उसमें लोकप्रियता पाने के कौशल की कमी थी, बल्कि इसलिए कि उसने लोगों की स्वीकार्यता पाने के लिए आज्ञाकारिता से मुँह नहीं मोड़ा।
और अब वह हमें भी ऐसा ही करने के लिए बुलाता है कि जब संसार किसी और रास्ते पर चल रहा हो, तो हम उसके पीछे हो लें। जब दूसरे गिर पड़ें, तो हम दृढ़ बने रहें। और हम परमेश्वर को प्रसन्न करें—भले ही यदि इसका अर्थ लोगों को निराश करना ही क्यों न हो।
वह हमारे लिए अकेला खड़ा रहा। अब हम उसके साथ खड़े हैं।
“और विश्वास के कर्ता और सिद्ध करनेवाले यीशु की ओर ताकते रहें, जिसने उस आनन्द के लिये जो उसके आगे धरा था, लज्जा की कुछ चिन्ता न करके क्रूस का दु:ख सहा, और परमेश्वर के सिंहासन की दाहिनी ओर जा बैठा।” (इब्रा. 12:2)
—
चर्चा के प्रश्न:
1. पवित्रशास्त्र पढ़ने से आपको दबाव के क्षणों में दृढ़ बने रहने में कैसे सहायता मिली है?
2. आपके जीवन में वह व्यक्ति कौन है, जो आपको आत्मिक रूप से बढ़ने में सहायता कर रहा है—और वह व्यक्ति कौन है, जो शायद आपको परमेश्वर से दूर खींच रहा है?
3. आपने कब परमेश्वर से अपने विश्वास के लिए खड़े होने का साहस माँगा है? उसका क्या परिणाम निकला?
4. केवल एक श्रोता के लिए जीवन बिताने का क्या अर्थ है, और यह सोच आपके दैनिक निर्णयों को कैसे प्रभावित कर सकती है?
—
लेखक के बारे में
जॉन नीपो ने चालीस से भी अधिक वर्षों तक पासबानी की सेवकाई की है। अब वे सेवानिवृत्त हो चुके हैं और अपनी पत्नी के साथ लुईसविल, केंटकी में रहते हैं।
विषयसूची
- भाग I: बाइबल में पाए जाने वाले साथियों के दबाव के उदाहरण
- हारून और सोने का बछड़ा
- राजा शाऊल और अमालेकी
- पतरस ने यीशु का इन्कार किया
- तीमुथियुस और उसके जीवन में पाई जाने वाली धर्मी स्त्रियाँ
- रूत और नाओमी
- चर्चा के प्रश्न:
- भाग II: कठिन मार्ग पर चलने की यीशु की बुलाहट
- धारा के विपरीत संघर्ष करना: घुल-मिल जाने के बारे में बाइबल की चेतावनियाँ
- याकूब की चुनौती: खारे-मीठे मत बनो
- चर्चा के प्रश्न:
- भाग III: साथियों के दबाव का विरोध करने के व्यावहारिक तरीके
- 1. पवित्रशास्त्र के द्वारा अपने मन को नया करें
- 2. ईश्वरीय लोगों के बीच में रहें
- 3. साहस और निडरता के लिए प्रार्थना करें
- 4. केवल एक श्रोता के लिए जीएँ
- चर्चा के प्रश्न:
- निष्कर्ष: प्रोत्साहन के कुछ अन्तिम शब्द
- यीशु अकेला खड़ा रहा
- यीशु के पीछे हो लेने का अर्थ दृढ़ बने रहना है
- चर्चा के प्रश्न: