#65 असफलता का भय: असफलता का सामनाकैसे करें और परमेश्वर की सामर्थ्य से फिर से उठ खड़े हों

By COLTON CORTER

भाग I: असफल प्राणी, और कभी असफल न होने वाला सृष्टिकर्ता

ठीक है, पहले यह बात स्पष्ट कर लें: कि यदि आप इसे पढ़ रहे हैं, तो आप एक असफल व्यक्ति हैं।

चिन्ता मत कीजिए—मैं भी एक असफल व्यक्ति हूँ! मानव इतिहास में कोई भी व्यक्ति ईमानदारी से यह नहीं कह सकता कि वह हर उस काम में सफल हुआ है, जिसे उसने कभी करने का प्रयास किया है (केवल एक विशेष व्यक्ति को छोड़कर उसके विषय में आगे बात करेंगे)। मुझे आश्चर्य हो रहा है कि शायद आज यह समाचार आपको कुछ विचित्र ढँग से राहत देने वाला है। क्या आपको लगता है कि यहाँ केवल आप ही असफल हो रहे हैं? ऐसा बिल्कुल नहीं है। असफलता उन सभी लोगों के बीच एक सामान्य बंधन है, जो परमेश्वर नहीं हैं। और जितनी अधिक ईमानदारी से हम असफलता के भय के विषय में बात करते हैं, उतना ही अधिक हमें ऐसा महसूस होता है कि हम सब एक ही नाव में सवार हैं।

दो प्रकार की असफलताएँ

इससे पहले कि हम बहुत आगे बढ़ें, हमें दो प्रकार की असफलताओं के बीच का अन्तर देख लेना चाहिए: प्राणीगत असफलता और आत्मिक असफलता। आत्मिक असफलता वह होती है जब हम परमेश्वर के द्वारा कही गई बातों को करने में असफल हो जाते हैं। इस मार्गदर्शिका का अधिकाँश भाग इसी प्रकार की असफलता पर चर्चा करेगा।

परन्तु सभी असफलताएँ एक समान नहीं होती हैं। सभी असफलताओं में हमारा दोष नहीं होता है—कम से कम एक ही प्रकार से तो बिलकुल भी नहीं। कभी-कभी हम इसलिए असफल होते हैं क्योंकि हम पापी हैं; और कभी इसलिए क्योंकि हम प्राणी हैं। हम परमेश्वर के स्वरूप में रचे गए हैं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि हम स्वयं परमेश्वर हैं। प्राणी की असफलता वह है जब आप प्रयास करते हैं और फिर भी असफल हो जाते हैं, भले ही आपने कठोर परिश्रम किया हो और सही कारणों से किया हो, परन्तु अंततः आप एक मनुष्य ही हैं। इस अन्तर को समझना, असफलता से टूट जाने के बजाय उससे सीखने की दिशा में पहला कदम है।

आत्मिक असफलता और प्राणी की असफलता के बीच का यह अन्तर आपको अपने जीवन में आने वाली असफलताओं के प्रति उचित रूप से प्रतिक्रिया देने में सहायता करने के लिए बनाया गया है। आप गलतियाँ करेंगे; क्योंकि सब कुछ हमेशा आपके अनुसार नहीं होगा। और यदि आप प्रत्येक असफलता को किसी पापपूर्ण दृष्टिकोण या कार्य से जोड़कर समझने का प्रयास करेंगे, तो आप स्वयं ही पूरी रीति से पागल हो जाएँगे। यह इतना सरल नहीं है। पतित संसार में, जीवन हमें बार-बार यह स्मरण दिलाता है कि हम परमेश्वर नहीं हैं। इसे समझना असफलता के भय पर विजय पाने का एक शान्त मार्ग है—यह महसूस करते हुए कि कुछ असफलता केवल मनुष्य होने के ही कारण आती है।

परमेश्वर का पुनः परिचय

परमेश्वर के विषय में बात करते हैं, तो चलिए थोड़ी देर के लिए उसी पर विचार करें। यदि आप मेरे ही समान हैं, तो संभवतः आप यह मान लेते हैं कि परमेश्वर आपका ही एक बड़ा एवं अधिक श्रेष्ठ रूप है। निस्संदेह आप इसे इस प्रकार से कभी कभी नहीं कहेंगे। लेकिन सच बताइए: क्या आप भी, अपने और परमेश्वर के बीच के अन्तर को विशेषता का नहीं, वरन् मात्रा का अन्तर मानने के प्रलोभन में पड़ जाते हैं? यह कितना सरल है कि हम अधिकाँश ऐसा व्यवहार करते हैं मानो सम्पूर्ण जगत में वेस्टमिंस्टर कुत्ता प्रदर्शनी कार्यकर्म चल रहा हो—और हम स्वयं को परमेश्वर की ही नस्ल के समान मान लेते हैं, भले ही हम यह मान लें कि “सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शनी” का पुरस्कार उसे ही मिलना चाहिए।

मित्र, यह बात बिलकुल ही गलत है। क्योंकि परमेश्वर हमारे जैसा नहीं हैं। वह एक ऐसी श्रेणी में आता है, जो पूरी रीति से उसकी अपनी है, जिसे केवल “परमेश्वर” कहा जाता है। यह सच है, कि हम उसके स्वरूप में बनाए गए हैं, लेकिन अधिक से अधिक हम उसकी बहुआयामी महिमा की एक धुंधली-सी छाया मात्र हैं। परमेश्वर जैसा कोई नहीं है। न आप हैं और न मैं हूँ। वह रचियता है और हम उसकी रचना हैं।

आप अपनी असफलता के कुछ कारणों को इस बात से जोड़ सकते हैं कि आप सृष्टिकर्ता और सृष्टि के बीच के अन्तर में सृष्टि पक्ष में हैं। परमेश्वर कभी असफल नहीं होता, क्योंकि वह परमेश्वर है —असफल होने का अर्थ होगा, कि उसका वह अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा जो वह है, और जो वह अनादिकाल से रहा है। आइए, उन कुछ कारणों पर विचार करें जिनके कारण हम असफल होते हैं, और यह भी देखें कि परमेश्वर, परमेश्वर होने के नाते इनसे कैसे स्वयं को जोड़कर नहीं देख सकता है।

इसके पाँच कारण हैं कि हम क्यों असफल होते है और परमेश्वर क्यों नहीं होता

पहला, परमेश्वर बिलकुल शुद्ध है। ठीक है, मुझे पता है यह थोड़ा गूड़ और जटिल सा लग सकता है, लेकिन थोड़ी देर मेरे साथ बने रहिए। अधूरी रह गई संभावनाओं से अधिक चुभने वाली बातें कम ही होती हैं। असफलता तब सबसे अधिक कष्ट देती है, जब आरम्भ में सब कुछ बहुत अधिक आशाजनक दिखाई देता है। दुर्भाग्य से, हमारी क्षमता के दो पहलू है। हम हमेशा उत्तम हो सकते हैं; या हम हमेशा निम्न कोटि के हो सकते हैं। हम जो आशा करते हैं और जो वास्तव में होता है, उसके बीच का यह अन्तर अधिकतर असफलता के भय को बढ़ा देता है, जिसके चलते हम यह भूल जाते हैं कि हमारी उन्नति के लिए असफल होना क्यों आवश्यक है।

यह लिखना जितना विचित्र लगता है, उतना ही यह सत्य भी है: कि परमेश्वर में कोई संभावना नहीं है कि वह कुछ बने, क्योंकि वह पहले से ही सब कुछ है। उसे न तो कोई नई पहल करने की आवश्यकता है, और न ही स्वयं का कोई उत्तम रूप बनाने की। परमेश्वर की अनन्त सिद्धता का प्रत्येक अंश हर समय और हर प्रकार से पूर्ण रूप में कार्य करता है। यदि वह चाहे भी, तब भी वह और अधिक उत्तम नहीं हो सकता, और न ही वह कभी बुरा हो सकता है। वह जैसा है केवल वैसा ही है।

दूसरा, परमेश्वर पवित्र है। मैं जानता हूँ कि मैंने कहा था कि इस भाग में हम प्राणियों की असफलता के विषय में विचार करेंगे, परन्तु परमेश्वर के विषय में उसकी पवित्रता का उल्लेख किए बिना बात नहीं की जा सकती है। परमेश्वर की पवित्रता क्या है? यह उसके भीतर की वह प्रतिबद्धता है जो हर उस बात के प्रति है जो सही है। अन्ततः, परमेश्वर की पवित्रता स्वयं अपने प्रति और अपनी महिमा के प्रति उसकी प्रतिबद्धता है, क्योंकि वही सम्पूर्ण सृष्टि में और सृष्टि से बाहर सबसे अद्भुत है।

परमेश्वर किसी भी वस्तु से उतना प्रेम नहीं करता जितना कि वह स्वयं से करता है। वह सिद्ध धर्मी है—वही धार्मिकता का सर्वोच्च मापदण्ड है। वह कभी भी नैतिक मूल्यों से समझौता नहीं करता। वह जो कुछ करता है, और जो कुछ सोचता है, तथा जिससे प्रेम रखता है, वह सब उसकी अपनी अनन्त, तेजोमय और सुन्दर पवित्रता के पूर्ण सामंजस्य में होता है।

तीसरा, परमेश्वर आत्मनिर्भर है। यदि हमें किसी भी वस्तु की आवश्यकता न होती, तो हम असफल भी न होते। यदि हमारी हर आवश्यकता (या इच्छा) हमारे ही भीतर पूरी हो जाती, तो पूरा करने के लिए हमें अपने बाहर किसी वस्तु की ओर जाने की आवश्यकता न होती। हम बुरी वस्तुओं के लिए प्रयास करते हैं। हम बुरे कारणों से अच्छी वस्तुओं के लिए प्रयास करते हैं। हमारी कमी हमें कार्य करने के लिए प्रेरित करती है, परन्तु उसका परिणाम हमेशा वैसा नहीं होता जैसा हम चाहते हैं। यहीं पर असफलता का सही रीति से प्रबंध करना महत्वपूर्ण है—यह पहचानते हुए हो जाता है कि हमारी सीमाएँ हमारे स्वभाव में ही निहित हैं, वे हमेशा नैतिक नहीं
होती हैं।

हम निर्भर रहने वाले प्राणी हैं। परन्तु दूसरी ओर, परमेश्वर पूरी रीति से आत्म निर्भर है। उसके भीतर ही वह सब कुछ है जिसकी उसे आवश्यकता है। जीवन के लिए वह अपने से बाहर किसी वस्तु या किसी व्यक्ति पर निर्भर नहीं है (प्रेरितों के काम 17:25)। बाहर ऐसी कोई वस्तु नहीं है जो उसे पूरा कर सके, और ऐसा कुछ भी नहीं है जिसके लिए वह प्रयास करे और उसे प्राप्त न कर सके।

चौथा, परमेश्वर सब कुछ जानता है। अच्छा होता यदि हम भी जान पाते! जब हमने उस निवेश में धन लगाया था, तभी हमें पता होता कि उसका परिणाम आगे चलकर क्या होने वाला है। यदि हमें पहले से पता होता कि जिस व्यक्ति पर हमने भरोसा किया, वही अन्त में हमें निराश कर देगा। जोखिम मानवीय निर्णय में स्वाभाविक रूप से निहित है, क्योंकि हम सभी बातों को नहीं जानते हैं, और परिणामों को तो बहुत ही कम जानते हैं। हमारे लिए ऐसी कोई चीज नहीं है जो पूर्ण रीति से निश्चित हो। यही अनिश्चितता प्रायः हमारी पराजय के भय को बढ़ाती है और दैनिक निर्णयों को वास्तविकता से अधिक बोझिल बना देती है।

परमेश्वर को कभी यह नहीं कहना पड़ता है कि, “यदि मुझे पता होता,” क्योंकि वह पहले से ही सब कुछ जानता है (यशायाह 46:10)। सम्पूर्ण जगत में एक भी ऐसी चीज नहीं है—यहाँ तक कि किसी अणु की अत्यन्त सूक्ष्म गति भी, जिसका ज्ञान परमेश्वर को न हो। वास्तव में, उसकी जानकारी के बिना कुछ भी नहीं होता, क्योंकि ऐसा कुछ भी नहीं घटित होता जिसकी उसने पहले से ही योजना न बनाई हो। कोई भी अप्रत्याशित कठिनाई या परिस्थिति परमेश्वर की “मूल योजना” को बदल नहीं सकती। सब कुछ ठीक उसी प्रकार पूरा होता है, जैसा वह ठहराता है।

पाँचवाँ, परमेश्वर सर्वशक्तिमान है। मेरा मानना ​​है कि आप यह कह सकते हैं कि परमेश्वर के लिए, ज्ञान ही वास्तव में सामर्थ्य है! हमें शायद ही कोई अनुमान होता है कि क्या चल रहा है, और परिणाम को किसी निर्णायक रीति से प्रभावित करने की सामर्थ्य तो हममें और भी कम होती है। संसार का समस्त प्रशिक्षण, शिक्षा, अनुभव या धन भी यह सुनिश्चित नहीं कर सकता कि परिणाम सफल ही होंगे।

परमेश्वर जो जानता है और जो करता है, ये दोनों कार्य साथ-साथ चलते हैं। वह अपनी सभी योजनाओं को पूर्ण सिद्धता के साथ पूरा करता है—कोई भी बाधा उसे रोक नहीं सकती है। परमेश्वर जो ठान लेता है, उसे वह अवश्य ही पूरा करता है। उसे केवल बोलना पड़ा, और आपकी खिड़की के बाहर जो कुछ भी दृश्य आप देखते हैं, उन सब की रचना एक ही क्षण में हो गई (उत. 1–2)। “प्रयत्न करना” परमेश्वर के शब्दकोश का शब्द नहीं है। परमेश्वर प्रयत्न नहीं करता—वह केवल करता है।

ऐसे परमेश्वर की उपयोगिता जो मनुष्य के समान नहीं है

परमेश्वर वास्तव में हम जैसे प्राणियों की सीमाओं से स्वयं को नहीं जोड़ सकता है। मुझे लगता है कि यह अच्छी बात है, बहुत ही अच्छी और आवश्यक बात है यदि उसे हमारे लिए वास्तव में सहायक होना है। जब हम असफलता के भय से जूझ रहे होते हैं, तब यह जानना वास्तव में सहायक होता है कि एक ऐसा भी है जो कभी असफल नहीं होता और न ही कभी भयभीत होता है।

केविन डीयंग ने बहुत पहले एक सभा में अपने सन्देश के दौरान इस तर्क को पूरी रीति से उलट दिया था, जिसका शीर्षक है “वह परमेश्वर जो हमारे समान नहीं है: हमें परमेश्वर के न बदलने वाले सिद्धांत की आवश्यकता क्यों है।” उन्होंने अपने छोटे पुत्र के साथ फर्श पर आयताकार खिलौनों से खेलने का उदाहरण दिया। उनका बेटा परेशान हो जाता है क्योंकि वह जोड़ने के निर्देशों का पालन नहीं कर रहा था; कुछ टुकड़े गायब हो गए थे—सब गड़बड़ हो गया था! उस समय उनके बेटे को किस बात की आवश्यकता थी? क्या उसे ऐसे पिता की आवश्यकता थी जो उतना ही निराश हो जितना वह स्वयं है, या ऐसे पिता की जो नीचे झुककर उसकी सहायता कर सके और उसे उसकी असफलता से बाहर निकाल सके?

मित्र, सबसे अधिक “हमारे समान” परमेश्वर आपके लिए कुछ नहीं कर सकता है, यदि परमेश्वर भी असफल हो जाए। और यदि वह असफल होगा तो उसकी सहायता कौन करेगा? इसके अतिरिक्त, यदि परमेश्वर स्वयं की भी सहायता नहीं कर सकता है, तो जब आप गिरेंगे तो वह आपकी सहायता कैसे करेगा? एक तथाकथित “परमेश्वर”, जिसे मेरी और आपकी उतनी ही आवश्यकता है जितनी हमें उसकी है, तो वह इस नाम के योग्य नहीं है।

परमेश्वर कभी असफल नहीं होता। उसकी अटल वाचा और विश्वासयोग्य स्वभाव हम जैसे असफल और अस्थिर लोगों को सच्ची आशा देता है। कोई ऐसा है जो यहाँ नीचे आकर हमें फिर से उठाकर ठोस भूमि पर खड़ा कर सकता है। यह असफलता के माध्यम से सफलता का आधार है, ऐसा नहीं कि हम इसलिए सफल होते हैं क्योंकि हम दोषरहित हैं, वरन् इसलिए होते हैं कि परमेश्वर हमारी दुर्बलता में हमसे मिलता है और हमें यह दिखाता है कि असफलता हमें आकार देने में कितनी महत्वपूर्ण है।

चर्चा के लिए प्रश्न:

  1. क्या आप हर “मानवीय असफलता” को “आत्मिक असफलता” मान लेने के लिए प्रलोभित होते हैं, या हर “आत्मिक असफलता” को “मानवीय असफलता” कहकर टाल देते हैं? आपको ऐसा क्यों
    लगता है?
  2. क्या आप परमेश्वर के स्वभाव के ऐसे और भी पहलुओं के विषय में सोच सकते हैं जो उसके लिए असफल होना असम्भव कर देते हैं?
  3. जब आप ऐसी असफलता का अनुभव करते हैं जिसमें आपकी गलती नहीं होती है, तो आप कैसे प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं? इस अध्याय में जो आपने पढ़ा है, उसके प्रकाशन में आप अपनी प्रतिक्रिया के किन पहलुओं को बदलना चाहेंगे?

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