#65 असफलता का भय: असफलता का सामनाकैसे करें और परमेश्वर की सामर्थ्य से फिर से उठ खड़े हों
भाग I: असफल प्राणी, और कभी असफल न होने वाला सृष्टिकर्ता
ठीक है, पहले यह बात स्पष्ट कर लें: कि यदि आप इसे पढ़ रहे हैं, तो आप एक असफल व्यक्ति हैं।
चिन्ता मत कीजिए—मैं भी एक असफल व्यक्ति हूँ! मानव इतिहास में कोई भी व्यक्ति ईमानदारी से यह नहीं कह सकता कि वह हर उस काम में सफल हुआ है, जिसे उसने कभी करने का प्रयास किया है (केवल एक विशेष व्यक्ति को छोड़कर उसके विषय में आगे बात करेंगे)। मुझे आश्चर्य हो रहा है कि शायद आज यह समाचार आपको कुछ विचित्र ढँग से राहत देने वाला है। क्या आपको लगता है कि यहाँ केवल आप ही असफल हो रहे हैं? ऐसा बिल्कुल नहीं है। असफलता उन सभी लोगों के बीच एक सामान्य बंधन है, जो परमेश्वर नहीं हैं। और जितनी अधिक ईमानदारी से हम असफलता के भय के विषय में बात करते हैं, उतना ही अधिक हमें ऐसा महसूस होता है कि हम सब एक ही नाव में सवार हैं।
दो प्रकार की असफलताएँ
इससे पहले कि हम बहुत आगे बढ़ें, हमें दो प्रकार की असफलताओं के बीच का अन्तर देख लेना चाहिए: प्राणीगत असफलता और आत्मिक असफलता। आत्मिक असफलता वह होती है जब हम परमेश्वर के द्वारा कही गई बातों को करने में असफल हो जाते हैं। इस मार्गदर्शिका का अधिकाँश भाग इसी प्रकार की असफलता पर चर्चा करेगा।
परन्तु सभी असफलताएँ एक समान नहीं होती हैं। सभी असफलताओं में हमारा दोष नहीं होता है—कम से कम एक ही प्रकार से तो बिलकुल भी नहीं। कभी-कभी हम इसलिए असफल होते हैं क्योंकि हम पापी हैं; और कभी इसलिए क्योंकि हम प्राणी हैं। हम परमेश्वर के स्वरूप में रचे गए हैं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि हम स्वयं परमेश्वर हैं। प्राणी की असफलता वह है जब आप प्रयास करते हैं और फिर भी असफल हो जाते हैं, भले ही आपने कठोर परिश्रम किया हो और सही कारणों से किया हो, परन्तु अंततः आप एक मनुष्य ही हैं। इस अन्तर को समझना, असफलता से टूट जाने के बजाय उससे सीखने की दिशा में पहला कदम है।
आत्मिक असफलता और प्राणी की असफलता के बीच का यह अन्तर आपको अपने जीवन में आने वाली असफलताओं के प्रति उचित रूप से प्रतिक्रिया देने में सहायता करने के लिए बनाया गया है। आप गलतियाँ करेंगे; क्योंकि सब कुछ हमेशा आपके अनुसार नहीं होगा। और यदि आप प्रत्येक असफलता को किसी पापपूर्ण दृष्टिकोण या कार्य से जोड़कर समझने का प्रयास करेंगे, तो आप स्वयं ही पूरी रीति से पागल हो जाएँगे। यह इतना सरल नहीं है। पतित संसार में, जीवन हमें बार-बार यह स्मरण दिलाता है कि हम परमेश्वर नहीं हैं। इसे समझना असफलता के भय पर विजय पाने का एक शान्त मार्ग है—यह महसूस करते हुए कि कुछ असफलता केवल मनुष्य होने के ही कारण आती है।
परमेश्वर का पुनः परिचय
परमेश्वर के विषय में बात करते हैं, तो चलिए थोड़ी देर के लिए उसी पर विचार करें। यदि आप मेरे ही समान हैं, तो संभवतः आप यह मान लेते हैं कि परमेश्वर आपका ही एक बड़ा एवं अधिक श्रेष्ठ रूप है। निस्संदेह आप इसे इस प्रकार से कभी कभी नहीं कहेंगे। लेकिन सच बताइए: क्या आप भी, अपने और परमेश्वर के बीच के अन्तर को विशेषता का नहीं, वरन् मात्रा का अन्तर मानने के प्रलोभन में पड़ जाते हैं? यह कितना सरल है कि हम अधिकाँश ऐसा व्यवहार करते हैं मानो सम्पूर्ण जगत में वेस्टमिंस्टर कुत्ता प्रदर्शनी कार्यकर्म चल रहा हो—और हम स्वयं को परमेश्वर की ही नस्ल के समान मान लेते हैं, भले ही हम यह मान लें कि “सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शनी” का पुरस्कार उसे ही मिलना चाहिए।
मित्र, यह बात बिलकुल ही गलत है। क्योंकि परमेश्वर हमारे जैसा नहीं हैं। वह एक ऐसी श्रेणी में आता है, जो पूरी रीति से उसकी अपनी है, जिसे केवल “परमेश्वर” कहा जाता है। यह सच है, कि हम उसके स्वरूप में बनाए गए हैं, लेकिन अधिक से अधिक हम उसकी बहुआयामी महिमा की एक धुंधली-सी छाया मात्र हैं। परमेश्वर जैसा कोई नहीं है। न आप हैं और न मैं हूँ। वह रचियता है और हम उसकी रचना हैं।
आप अपनी असफलता के कुछ कारणों को इस बात से जोड़ सकते हैं कि आप सृष्टिकर्ता और सृष्टि के बीच के अन्तर में सृष्टि पक्ष में हैं। परमेश्वर कभी असफल नहीं होता, क्योंकि वह परमेश्वर है —असफल होने का अर्थ होगा, कि उसका वह अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा जो वह है, और जो वह अनादिकाल से रहा है। आइए, उन कुछ कारणों पर विचार करें जिनके कारण हम असफल होते हैं, और यह भी देखें कि परमेश्वर, परमेश्वर होने के नाते इनसे कैसे स्वयं को जोड़कर नहीं देख सकता है।
इसके पाँच कारण हैं कि हम क्यों असफल होते है और परमेश्वर क्यों नहीं होता
पहला, परमेश्वर बिलकुल शुद्ध है। ठीक है, मुझे पता है यह थोड़ा गूड़ और जटिल सा लग सकता है, लेकिन थोड़ी देर मेरे साथ बने रहिए। अधूरी रह गई संभावनाओं से अधिक चुभने वाली बातें कम ही होती हैं। असफलता तब सबसे अधिक कष्ट देती है, जब आरम्भ में सब कुछ बहुत अधिक आशाजनक दिखाई देता है। दुर्भाग्य से, हमारी क्षमता के दो पहलू है। हम हमेशा उत्तम हो सकते हैं; या हम हमेशा निम्न कोटि के हो सकते हैं। हम जो आशा करते हैं और जो वास्तव में होता है, उसके बीच का यह अन्तर अधिकतर असफलता के भय को बढ़ा देता है, जिसके चलते हम यह भूल जाते हैं कि हमारी उन्नति के लिए असफल होना क्यों आवश्यक है।
यह लिखना जितना विचित्र लगता है, उतना ही यह सत्य भी है: कि परमेश्वर में कोई संभावना नहीं है कि वह कुछ बने, क्योंकि वह पहले से ही सब कुछ है। उसे न तो कोई नई पहल करने की आवश्यकता है, और न ही स्वयं का कोई उत्तम रूप बनाने की। परमेश्वर की अनन्त सिद्धता का प्रत्येक अंश हर समय और हर प्रकार से पूर्ण रूप में कार्य करता है। यदि वह चाहे भी, तब भी वह और अधिक उत्तम नहीं हो सकता, और न ही वह कभी बुरा हो सकता है। वह जैसा है केवल वैसा ही है।
दूसरा, परमेश्वर पवित्र है। मैं जानता हूँ कि मैंने कहा था कि इस भाग में हम प्राणियों की असफलता के विषय में विचार करेंगे, परन्तु परमेश्वर के विषय में उसकी पवित्रता का उल्लेख किए बिना बात नहीं की जा सकती है। परमेश्वर की पवित्रता क्या है? यह उसके भीतर की वह प्रतिबद्धता है जो हर उस बात के प्रति है जो सही है। अन्ततः, परमेश्वर की पवित्रता स्वयं अपने प्रति और अपनी महिमा के प्रति उसकी प्रतिबद्धता है, क्योंकि वही सम्पूर्ण सृष्टि में और सृष्टि से बाहर सबसे अद्भुत है।
परमेश्वर किसी भी वस्तु से उतना प्रेम नहीं करता जितना कि वह स्वयं से करता है। वह सिद्ध धर्मी है—वही धार्मिकता का सर्वोच्च मापदण्ड है। वह कभी भी नैतिक मूल्यों से समझौता नहीं करता। वह जो कुछ करता है, और जो कुछ सोचता है, तथा जिससे प्रेम रखता है, वह सब उसकी अपनी अनन्त, तेजोमय और सुन्दर पवित्रता के पूर्ण सामंजस्य में होता है।
तीसरा, परमेश्वर आत्मनिर्भर है। यदि हमें किसी भी वस्तु की आवश्यकता न होती, तो हम असफल भी न होते। यदि हमारी हर आवश्यकता (या इच्छा) हमारे ही भीतर पूरी हो जाती, तो पूरा करने के लिए हमें अपने बाहर किसी वस्तु की ओर जाने की आवश्यकता न होती। हम बुरी वस्तुओं के लिए प्रयास करते हैं। हम बुरे कारणों से अच्छी वस्तुओं के लिए प्रयास करते हैं। हमारी कमी हमें कार्य करने के लिए प्रेरित करती है, परन्तु उसका परिणाम हमेशा वैसा नहीं होता जैसा हम चाहते हैं। यहीं पर असफलता का सही रीति से प्रबंध करना महत्वपूर्ण है—यह पहचानते हुए हो जाता है कि हमारी सीमाएँ हमारे स्वभाव में ही निहित हैं, वे हमेशा नैतिक नहीं
होती हैं।
हम निर्भर रहने वाले प्राणी हैं। परन्तु दूसरी ओर, परमेश्वर पूरी रीति से आत्म निर्भर है। उसके भीतर ही वह सब कुछ है जिसकी उसे आवश्यकता है। जीवन के लिए वह अपने से बाहर किसी वस्तु या किसी व्यक्ति पर निर्भर नहीं है (प्रेरितों के काम 17:25)। बाहर ऐसी कोई वस्तु नहीं है जो उसे पूरा कर सके, और ऐसा कुछ भी नहीं है जिसके लिए वह प्रयास करे और उसे प्राप्त न कर सके।
चौथा, परमेश्वर सब कुछ जानता है। अच्छा होता यदि हम भी जान पाते! जब हमने उस निवेश में धन लगाया था, तभी हमें पता होता कि उसका परिणाम आगे चलकर क्या होने वाला है। यदि हमें पहले से पता होता कि जिस व्यक्ति पर हमने भरोसा किया, वही अन्त में हमें निराश कर देगा। जोखिम मानवीय निर्णय में स्वाभाविक रूप से निहित है, क्योंकि हम सभी बातों को नहीं जानते हैं, और परिणामों को तो बहुत ही कम जानते हैं। हमारे लिए ऐसी कोई चीज नहीं है जो पूर्ण रीति से निश्चित हो। यही अनिश्चितता प्रायः हमारी पराजय के भय को बढ़ाती है और दैनिक निर्णयों को वास्तविकता से अधिक बोझिल बना देती है।
परमेश्वर को कभी यह नहीं कहना पड़ता है कि, “यदि मुझे पता होता,” क्योंकि वह पहले से ही सब कुछ जानता है (यशायाह 46:10)। सम्पूर्ण जगत में एक भी ऐसी चीज नहीं है—यहाँ तक कि किसी अणु की अत्यन्त सूक्ष्म गति भी, जिसका ज्ञान परमेश्वर को न हो। वास्तव में, उसकी जानकारी के बिना कुछ भी नहीं होता, क्योंकि ऐसा कुछ भी नहीं घटित होता जिसकी उसने पहले से ही योजना न बनाई हो। कोई भी अप्रत्याशित कठिनाई या परिस्थिति परमेश्वर की “मूल योजना” को बदल नहीं सकती। सब कुछ ठीक उसी प्रकार पूरा होता है, जैसा वह ठहराता है।
पाँचवाँ, परमेश्वर सर्वशक्तिमान है। मेरा मानना है कि आप यह कह सकते हैं कि परमेश्वर के लिए, ज्ञान ही वास्तव में सामर्थ्य है! हमें शायद ही कोई अनुमान होता है कि क्या चल रहा है, और परिणाम को किसी निर्णायक रीति से प्रभावित करने की सामर्थ्य तो हममें और भी कम होती है। संसार का समस्त प्रशिक्षण, शिक्षा, अनुभव या धन भी यह सुनिश्चित नहीं कर सकता कि परिणाम सफल ही होंगे।
परमेश्वर जो जानता है और जो करता है, ये दोनों कार्य साथ-साथ चलते हैं। वह अपनी सभी योजनाओं को पूर्ण सिद्धता के साथ पूरा करता है—कोई भी बाधा उसे रोक नहीं सकती है। परमेश्वर जो ठान लेता है, उसे वह अवश्य ही पूरा करता है। उसे केवल बोलना पड़ा, और आपकी खिड़की के बाहर जो कुछ भी दृश्य आप देखते हैं, उन सब की रचना एक ही क्षण में हो गई (उत. 1–2)। “प्रयत्न करना” परमेश्वर के शब्दकोश का शब्द नहीं है। परमेश्वर प्रयत्न नहीं करता—वह केवल करता है।
ऐसे परमेश्वर की उपयोगिता जो मनुष्य के समान नहीं है
परमेश्वर वास्तव में हम जैसे प्राणियों की सीमाओं से स्वयं को नहीं जोड़ सकता है। मुझे लगता है कि यह अच्छी बात है, बहुत ही अच्छी और आवश्यक बात है यदि उसे हमारे लिए वास्तव में सहायक होना है। जब हम असफलता के भय से जूझ रहे होते हैं, तब यह जानना वास्तव में सहायक होता है कि एक ऐसा भी है जो कभी असफल नहीं होता और न ही कभी भयभीत होता है।
केविन डीयंग ने बहुत पहले एक सभा में अपने सन्देश के दौरान इस तर्क को पूरी रीति से उलट दिया था, जिसका शीर्षक है “वह परमेश्वर जो हमारे समान नहीं है: हमें परमेश्वर के न बदलने वाले सिद्धांत की आवश्यकता क्यों है।” उन्होंने अपने छोटे पुत्र के साथ फर्श पर आयताकार खिलौनों से खेलने का उदाहरण दिया। उनका बेटा परेशान हो जाता है क्योंकि वह जोड़ने के निर्देशों का पालन नहीं कर रहा था; कुछ टुकड़े गायब हो गए थे—सब गड़बड़ हो गया था! उस समय उनके बेटे को किस बात की आवश्यकता थी? क्या उसे ऐसे पिता की आवश्यकता थी जो उतना ही निराश हो जितना वह स्वयं है, या ऐसे पिता की जो नीचे झुककर उसकी सहायता कर सके और उसे उसकी असफलता से बाहर निकाल सके?
मित्र, सबसे अधिक “हमारे समान” परमेश्वर आपके लिए कुछ नहीं कर सकता है, यदि परमेश्वर भी असफल हो जाए। और यदि वह असफल होगा तो उसकी सहायता कौन करेगा? इसके अतिरिक्त, यदि परमेश्वर स्वयं की भी सहायता नहीं कर सकता है, तो जब आप गिरेंगे तो वह आपकी सहायता कैसे करेगा? एक तथाकथित “परमेश्वर”, जिसे मेरी और आपकी उतनी ही आवश्यकता है जितनी हमें उसकी है, तो वह इस नाम के योग्य नहीं है।
परमेश्वर कभी असफल नहीं होता। उसकी अटल वाचा और विश्वासयोग्य स्वभाव हम जैसे असफल और अस्थिर लोगों को सच्ची आशा देता है। कोई ऐसा है जो यहाँ नीचे आकर हमें फिर से उठाकर ठोस भूमि पर खड़ा कर सकता है। यह असफलता के माध्यम से सफलता का आधार है, ऐसा नहीं कि हम इसलिए सफल होते हैं क्योंकि हम दोषरहित हैं, वरन् इसलिए होते हैं कि परमेश्वर हमारी दुर्बलता में हमसे मिलता है और हमें यह दिखाता है कि असफलता हमें आकार देने में कितनी महत्वपूर्ण है।
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चर्चा के लिए प्रश्न:
- क्या आप हर “मानवीय असफलता” को “आत्मिक असफलता” मान लेने के लिए प्रलोभित होते हैं, या हर “आत्मिक असफलता” को “मानवीय असफलता” कहकर टाल देते हैं? आपको ऐसा क्यों
लगता है? - क्या आप परमेश्वर के स्वभाव के ऐसे और भी पहलुओं के विषय में सोच सकते हैं जो उसके लिए असफल होना असम्भव कर देते हैं?
- जब आप ऐसी असफलता का अनुभव करते हैं जिसमें आपकी गलती नहीं होती है, तो आप कैसे प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं? इस अध्याय में जो आपने पढ़ा है, उसके प्रकाशन में आप अपनी प्रतिक्रिया के किन पहलुओं को बदलना चाहेंगे?
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ऑडियो मार्गदर्शिका
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भाग II: असफलताओं की लम्बी कतार में खड़ा होना
पहले भाग में, हमने दो अलग-अलग प्रकार की असफलताओं के बीच का अन्तर देखा: आत्मिक असफलता और प्राणी सम्बन्धी असफलता। मानवीय असफलता वह है जो इस कारण होती है क्योंकि हम परमेश्वर नहीं हैं। असफल होने में सदैव हमारी गलती नहीं होती है। यह हमें असफलता का महत्व समझने में सहायता करती है कि असफलता हमारी रचना का एक भाग है, न कि हमेशा हमारे पतन का कारण।
बहुत बार ऐसा होता है, जिस प्रकार की असफलता हमारी अपनी गलती के कारण से होती है, उसे हम आत्मिक असफलता कहते हैं। आत्मिक असफलता तब होती है, जब हम किसी भी व्यक्ति या वस्तु से बढ़कर परमेश्वर से प्रेम नहीं करते और न ही उसकी आज्ञा का पालन करते हैं। आत्मिक असफलता को उसके दूसरे और अधिक प्रचलित नाम से भी पुकारा जा सकता है: अर्थात् पाप।
आत्मिक असफलता दो दिशाओं अर्थात् ऊपर परमेश्वर की ओर और एक दूसरे के साथ संबंध में में प्रकट होती है। जब हम आत्मिक रूप से असफल होते हैं, तब सबसे पहले और सबसे बढ़कर हम परमेश्वर के प्रति असफल होते हैं। हमारी मूल समस्या यह है कि हम परमेश्वर के स्वरूप में रचे गए प्राणियों के रूप में, अपने दायित्व को पूरा करने में असफल हो जाते हैं। हमारी असफलता परमेश्वर के पवित्र क्रोध के अनन्तकालीन दण्ड के योग्य है। अधिकतर यहीं पर असफलता का भय, पराजय के गहरे भय में बदल जाता है, क्योंकि हमें यह अनुभव होने लगता है कि हमारी असफलताएँ उतनी साधारण नहीं हैं जितना हमने पहले समझा था।
हमारी आत्मिक असफलता परमेश्वर के प्रति असफल होने से आरम्भ होती है, परन्तु प्रायः वह हमें दूसरों के प्रति भी असफल बना देती है। हम कार्यक्रम में इसलिए नहीं पहुँच पाए, क्योंकि काम के बाद हम मदिरा की बोतल को एक ओर नहीं रख सकते थे। हमारा व्यावसायिक साझेदार अपने घर का ऋण नहीं चुका पा रहा है, क्योंकि हम कम्पनी के पैसे से चुपके-चुपके अपने लिए पैसा जमा कर रहे थे। हम अपने फोन पर अन्य लोगों के चित्र देखने के इतने आदी हो चुके हैं कि अपने जीवनसाथी की देखभाल करना भूल जाते हैं। हम सबसे पहले परमेश्वर के प्रति असफल होते हैं, परन्तु आत्मिक असफलता प्रायः तब तक शान्त नहीं होती जब तक कि वह किसी दूसरे को ठेस न पहुँचा दे।
असफलताओं की लम्बी कतार
असफलता कोई नई बात नहीं है। मैं आपको असफलता की उत्पत्ति की कहानी बताना चाहता हूँ, ताकि हम सीख सकें कि आत्मिक असफलता संसार में कैसे आई और तब से लेकर अब तक उसने क्या-क्या किया है। ऐसा करते हुए हम देखेंगे कि हम भी असफल लोगों की एक लम्बी कतार का हिस्सा हैं। मेरी आशा है कि असफलता की इस कहानी को समझने से हम यह जान पाएँगे कि हम क्यों असफल होते हैं, इसके क्या परिणाम होते हैं, और यहाँ तक कि स्वयं को समझने तथा हमारे लिए अनुग्रह की आवश्यकता को समझने के लिए असफल होना क्यों महत्वपूर्ण है।
आदम
आदि में परमेश्वर ने …। बाइबल की कहानी इसी प्रकार आरम्भ होती है। परमेश्वर वहाँ था—वह अनादिकाल से ही अस्तित्व में है, और वह वहाँ पिता, पुत्र तथा पवित्र आत्मा के रूप में पूर्ण में सहभागिता का आनन्द ले रहा था। उस अनन्त आनन्द से परिपूर्ण परमेश्वर ने रचना करने का निर्णय लिया। जबकि उसे इसकी कोई आवश्यकता नहीं थी। उसने केवल अपनी महिमा को प्रकट करने के लिए ऐसा करना चाहा, और उसने वैसा ही किया। उत्पत्ति 1:1 के बाद जो कुछ भी अस्तित्व में आया, वह सब उसी के द्वारा और उसी के लिए सृजा गया है।
आदम और हव्वा भी इससे अछूते नहीं थे। वास्तव में मनुष्य ने परमेश्वर की सृष्टि में एक अद्वितीय भूमिका निभाई है (और आज भी निभा रहे हैं)। परमेश्वर ने जितनी भी वस्तुएँ बनाई थीं, उनमें केवल आदम और हव्वा ही उसके “स्वरूप में” बनाए गए थे (उत्पत्ति 1:27)। उन्हें इस संसार में परमेश्वर के साथ एक विशेष सम्बन्ध के साथ लाया गया था—एक ऐसा सम्बन्ध जो हमें एक स्तर और कार्य देता है। हम परमेश्वर का स्वरूप धारण करने वाले लोग हैं, जिन्हें उसका प्रतिनिधित्व करना है। आदम की रचना इस प्रकार से की गई थी कि वह परमेश्वर के पुत्र के समान हो और आत्मिक रूप से उसके परिवार की समानता को प्रकट करे।
इस प्रकार से परमेश्वर की कल्पना करने का क्या अर्थ है? हम परमेश्वर का स्वरूप तब बनाते हैं, जब हम उसके विषय में सच बोलते हैं, उससे सबसे अधिक प्रेम करते हैं, और वही करते हैं जो वह कहता है। आदम का काम अदन की वाटिका की रखवाली करते हुए परमेश्वर की महिमा के ज्ञान को सम्पूर्ण संसार में फैलाते हुए, अपने सृष्टिकर्ता की महिमा और भलाई को दर्शाना था (उत्पत्ति 1:28)। यही आदम का उत्तरदायित्व था, और वही हम सबका प्रतिनिधि है, इसलिए यह हमारा भी उत्तरदायित्व है।
दुःख की बात यह है कि कहानी यहीं समाप्त नहीं होती है। आदम ने साँप के झूठ को सुनकर और उस वृक्ष का फल खाकर, जिसका फल खाने के लिए परमेश्वर ने उसे मना किया था, परमेश्वर के विरुद्ध पाप किया। परमेश्वर की महिमा को दर्शाने के स्थान पर, आदम ने स्वयं अपनी महिमा प्रकट करने का प्रयास किया।
आदम असफल हो गया। उसके पास करने के लिए एक कार्य और निभाने के लिए उत्तरदायित्व थे, परन्तु वह असफल हो गया। आदम की असफलता हमें असफलता से जूझने वाले मनुष्य के गहरे संघर्ष से परिचित कराती है, क्योंकि आदम का पतन दिखाता है कि किस प्रकार अच्छी मंशा बहुत शीघ्र ही पाप में बदल सकती हैं। आदम की असफलता का प्रभाव प्रत्येक स्थान तक फैल गया। आदम के पाप के द्वारा शारीरिक और आत्मिक मृत्यु संसार में घुस गई, और कोई भी उसके प्रभाव से बच नहीं सकता है। आदम की असफलता केवल हमें प्रभावित ही नहीं करती, वरन् वह हमारी असफलता भी गिनी जाती है। आदम में हम दोषी और भ्रष्ट स्वभाव के साथ जन्म लेते हैं। जैसे आदम और हव्वा को वाटिका से निकाल दिया गया था, ठीक वैसे ही हमारे पाप हमें उस परमेश्वर से अलग कर देते हैं जिसने हमारी रचना की है।
नूह
आगे चलकर आदम और हव्वा की सन्तान उत्पन्न हुई, परन्तु आत्मिक असफलता परिवार में चलती रही। आदम के बाद आने वाला प्रत्येक मनुष्य परमेश्वर के स्वरूप में बना हुआ तो है, परन्तु वह पाप भी करता रहता है, और अपने पूरे मन, बुद्धि, प्राण और सामर्थ्य के साथ प्रभु से प्रेम करने में असफल होता है। सम्पूर्ण मानवजाति के सामूहिक पाप ने बाइबल की पहली पाँच पुस्तकों के लेखक मूसा को यह लिखने के लिए बाध्य कर दिया कि. “यहोवा ने देखा कि मनुष्यों की बुराई पृथ्वी पर बढ़ गई है, और उनके मन के विचार में जो कुछ उत्पन्न होता है वह निरन्तर बुरा ही होता है” (उत.6:5)।
यह तो पूर्ण रूप से स्पष्ट है कि पतन के बाद की इस दशा में हममें से कोई भी ऐसा अच्छा मनुष्य नहीं है, जो केवल कभी-कभार ही चूक जाता हो। हम पापी इसलिए नहीं हैं कि हम कभी-कभी पाप करते हैं, परन्तु हम पाप इसलिए करते हैं क्योंकि हम पापी हैं। आत्मिक दृष्टि से कहें तो हम असफल इसलिए होते हैं क्योंकि हम आत्मिक रूप से असफल हैं। हमारे पापमय कार्य वह फल हैं, जो हमारे भ्रष्ट हृदय को प्रकट करते हैं। यही कारण है कि असफलता के भय से निपटना सीखना अत्यन्त आवश्यक है—अन्यथा असफलता केवल लज्जा और दोषी होने का एक और चक्र बन जाती है।
उत्पत्ति 6 में परमेश्वर ने फिर से आरम्भ करने का निश्चय किया। उसने नूह और उसके परिवार को छोड़कर पृथ्वी पर से प्रत्येक जीवित प्राणी को जलप्रलय के द्वारा नष्ट कर दिया। जलप्रलय का पानी घट जाने के बाद, उत्पत्ति 9:1 में परमेश्वर ने नूह से फलवन्त होने और बढ़ने के लिए कहा—ठीक वही कार्य करने के लिए कहा जो परमेश्वर ने आदम से कहा था।
परन्तु यह “नया प्रारम्भ” लगभग तुरन्त ही एक असफल आरम्भ सिद्ध हुआ। असफलता निश्चित रूप से जलप्रलय से बच गई थी, क्योंकि उत्पत्ति 9 के समाप्त होने से पहले ही नूह अपने तम्बू में मतवाला होकर नग्न पड़ा था। यह एक और स्मरण दिलाता है कि असफलता क्यों महत्त्वपूर्ण है: क्योंकि वह नए सिरे से प्रारम्भ करने के बाद भी मनुष्य के अपरिवर्तित हृदय को प्रकट कर देती है।
इस्राएल
कुछ शताब्दियाँ बीत जाने के बाद, प्रतिज्ञा किया गया इस्राएल राष्ट्र स्वयं को मिस्र की दासता में पाता है। परमेश्वर ने मूसा को खड़ा किया कि वह अपने लोगों को फिरौन की दासता से छुड़ाए और उन्हें उस भूमि में ले जाए जिसके विषय में परमेश्वर ने उनके पुरखाओं से प्रतिज्ञा की थी।
प्रतिज्ञा की हुई भूमि की ओर जाते हुए, उन्हें सीनै पर्वत पर रुकना पड़ा। वहाँ परमेश्वर ने इस्राएल के साथ अपने सम्बन्ध को औपचारिक रूप दिया: कि वे उसके लोग होंगे और वह उनका परमेश्वर होगा (निर्गमन
19:7–11)। इस्राएल उस कार्य को ग्रहण करता है जिसे परमेश्वर ने आदम को अदन की वाटिका में दिया था, वे भिन्न-भिन्न राष्ट्रों के बीच परमेश्वर की महिमा को प्रदर्शित करने वाले बनकर जीवन जीने के लिए समर्पित होते हैं। निर्गमन 4:22 में उन्हें परमेश्वर का “पुत्र” भी कहा गया है।
परमेश्वर के लोग होकर उस भूमि में जीवन जीने की शर्तें और नियम उन्हें व्यवस्था के रूप में दिए गए, जिन्हें मूसा पत्थर की पट्टिकाओं पर लिखकर उनके लिए नीचे लाया था। यदि इस्राएल अपना कार्य करता है और आज्ञा मानता है, तो वह आशीष का अनुभव करेगा। यदि वह असफल होता है, तो उसे न्याय का सामना करना पड़ेगा।
यह कहना ही पर्याप्त होगा कि इस्राएल ने अधिकतर दूसरा ही कार्य किया। वे उन शर्तों और नियमों के अनुसार नहीं बने रहे और असफल हो गए। मेरा कहने का अर्थ यह है, कि उन्होंने तो मूसा के वापस लौटने की भी प्रतीक्षा नहीं की, जब वह उन पट्टियों को ला रहा था, और इससे पहले ही उन्होंने अपने गहनों को पिघलाकर एक सोने का बछड़ा बना दिया और उसकी उपासना करने लगे (निर्गमन 32)। उनके पास केवल एक ही कार्य था, परन्तु उन्होंने अपने आधिकारिक आरम्भ से पहले ही ऐसा गम्भीर अपराध कर डाला, जिसके लिए उन्हें तुरन्त दण्ड दिया जा सकता था।
यह तो आने वाली घटनाओं की केवल एक झलक थी। इस्राएल स्वयं ही अपने मार्ग का रोड़ा बन गया था। परमेश्वर ने उनके साथ वाचा बाँधी थी, लेकिन उन्होंने कभी भी अपनी ओर से उस वाचा का पालन नहीं किया। उनके बीच उसकी उपस्थिति—जो आनन्द का कारण होनी चाहिए थी, एक समस्या बन गई। एक पवित्र परमेश्वर पापी लोगों के बीच कैसे रह सकता है?
मूसा जैसे अगुवों और बलि प्रथा ने एक अस्थायी समाधान प्रदान किया। परन्तु प्रति वर्ष, एक बलि के बाद दूसरी बलि के बावजूद, इस्राएल वह करने में असफल रहा जिसके लिए परमेश्वर ने उन्हें नियुक्त किया था—उनके हृदय उनके चारों ओर के “देवताओं” के प्रति इतने आकर्षित थे कि वे परमेश्वर के अधीन वैसा आदर्श समुदाय नहीं बन सके, जिसका उन्हें नमूना बनना था। फिर भी, इसी में कहानी असफलता के माध्यम से सफलता की ओर संकेत करती है, क्योंकि उनकी कमियाँ उस एक की ओर संकेत करती हैं जो कभी असफल नहीं होता है।
दाऊद
इस्राएल को जिस चीज़ की आवश्यकता थी, वह अच्छी अगुवाई थी। न्यायियों के समय में हर कोई वही करता था जो उसकी अपनी दृष्टि में सही होता था, क्योंकि उन्हें नियंत्रित करने के लिए कोई राजा नहीं था (न्या. 21:25)। इस्राएल एक राजा होने की संभावना को लेकर उत्साहित था, भले ही वे एक संभावित अगुवे में उन्हीं गुणों को महत्व देते थे, जिन्हें उनके आस-पास के राष्ट्र महत्व देते थे। वे एक प्रभावशाली व्यक्ति चाहते थे, कोई ऐसा जो युद्ध में उनकी अगुवाई कर सके—कोई… लम्बा, चौड़ा और आकर्षक! उन्हें लगा कि ऐसा राजा निश्चित रूप से उनकी आत्मिक असफलता का अन्त कर देगा।
परन्तु परमेश्वर की योजना कुछ और ही थी: दाऊद नाम का एक साधारण-सा चरवाहा लड़का। वह परमेश्वर की महिमा के लिए पूरे उत्साह और अपने लोगों को छुड़ाने के लिए प्रभु पर पूरे भरोसे के साथ मैदान में उतरता है, फिर शत्रु चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो (1 शम. 17)। यह “परमेश्वर के मन के अनुसार” उज्ज्वल भविष्य वाला व्यक्ति प्रतीत होता था, क्योंकि परमेश्वर उसे एक के बाद एक सफलता देता गया (1 शमू. 13:14)। एक राजा के रूप में उसका कार्य इस्राएल के हितों का प्रतिनिधित्व करना था। दाऊद की सफलता ही उनकी सफलता होती, और उसकी असफलता उनकी असफलता होती।
यह दाऊद की असफलता को और भी अधिक हृदय विदारक बना देता है। आदम और उससे पहले इस्राएल के समान ही वह अपने कार्य में असफल रहा। बतशेबा के साथ उसका व्यभिचारी सम्बन्ध इसका “प्रमुख उदाहरण” है। अंततः वह उसे गर्भवती कर देता है और बात को छिपाने के लिए उसके पति की हत्या भी करवा देता है। बतशेबा के साथ दाऊद का पाप आत्मिक असफलता का एक स्पष्ट उदाहरण है—जो पहले परमेश्वर के साथ उसके सम्बन्ध में आरम्भ हुआ और फिर उसके मानवीय सम्बन्धों में टूटने का कारण बना (इस घटना के बाद उसकी पश्चाताप पूर्ण प्रतिक्रिया के लिए भजन संहिता 51 देखें)। हममें से बहुतों के लिए, दाऊद की कहानी यह भी उजागर करती है कि असफलता का भय इतना भारी क्यों होता है—हम देखते हैं कि पाप कितनी शीघ्रता से एक जीवन, एक बुलाहट, और यहाँ तक कि एक राज्य को भी बिखेर सकता है। उसका पश्चाताप यह भी दिखाता है कि असफलता ही सफलता की कुंजी बन सकती है, यदि वह हमें परमेश्वर से दूर ले जाने के बजाय उसकी ओर ले जाए।
पुराना नियम बहुत अधिक निराशाजनक स्वर में समाप्त होता है। इस्राएल की असफलता के कारण उन्हें कुछ समय के लिए प्रतिज्ञा किए गए देश से निकाल दिया गया। वे अंततः वापस लौट आते हैं, लेकिन अब स्थिति पहले जैसी नहीं है—अर्थात् अब वहाँ परमेश्वर की उपस्थिति नहीं है। अभी भी उनकी पाप की समस्या बनी हुई है। और परमेश्वर का क्रोध भी। जैसे ही हम पुराने और नए नियम के बीच, 400 वर्षों की उस ‘ईश्वरीय चुप्पी’ के दौर में प्रवेश करते हैं, तो वही प्रश्न अब भी बना हुआ है: कि एक पवित्र परमेश्वर अपवित्र लोगों को कैसे बचा सकता है? परमेश्वर आदम, नूह, इस्राएल, दाऊद और हम जैसे असफल लोगों के साथ क्या करेगा?
सूर्य के नीचे कुछ भी नया नहीं (इसमें असफलता भी सम्मिलित है)
असफलता की कहानी लगभग सचमुच “समय जितनी पुरानी कथा” जैसी है। आदम, नूह, इस्राएल और दाऊद सभी परमेश्वर की महिमा को पूर्ण रूप से दर्शाने में असफल रहे। हम अगले भाग में इस पर विचार करेंगे, हम भी ठीक उन्हीं के समान उन्हीं की नाव में सवार हैं। परन्तु उनकी कहानियाँ हमें यह भी स्मरण दिलाती हैं कि असफलता ही सफलता की कुंजी है, अर्थात् जब वह हमारी अयोग्यता को प्रकट करती है और परमेश्वर की विश्वासयोग्यता को और अधिक उजागर करती है। और इससे पहले कि हम आगे बढ़ें, थोड़ा रुककर इस बात पर ध्यान दें कि असफलता की कहानी के साथ-साथ एक और कहानी भी चल रही है, अर्थात् एक सफलता की कहानी, जिसकी प्रतिज्ञा बहुत पहले ही अदन की वाटिका में कर दी गई थी, और जिसके परिणाम स्वरूप वह परमेश्वर के लोगों के लिए उद्धार लाएगी (उत्पत्ति 3:15)।
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चिन्तन के लिए प्रश्न:
- अपने जीवन में उन पापों के बारे में सोचें। वे इस बात से कैसे जुड़े हुए हैं कि आप परमेश्वर से उस प्रकार से प्रेम करने में असफल रहे हैं जैसा आपको करना चाहिए था?
- असफलता की मूल कहानी हमें अपने बारे में और अपनी असफलताओं के बारे में क्या सिखाती है?
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भाग III: आपने जितना सोचा था उससे कहीं बड़ी असफलता
पिछले भाग में, हमने आत्मिक असफलता की जड़ का पता लगाते हुए, उसके मूल स्रोत तक पहुँचे थे: अर्थात् अदन की वाटिका में आदम का पतन। दुर्भाग्य से, आदम का परमेश्वर के स्वरूप को दर्शाने में असफल होना —जिसके लिए उसे रचा गया था, केवल उसकी अपनी व्यक्तिगत असफलता नहीं थी; वरन् उसकी इस असफलता का प्रभाव सम्पूर्ण सृष्टि पर पड़ा। हमारे लिए, ये प्रभाव अत्यंत व्यक्तिगत हैं, और वे इस बात को आकार देते हैं कि आज हम बाइबल में असफलता के विषय में कही गई बातों को किस प्रकार से समझते हैं।
हम असफल क्यों होते हैं
क्या आप जानते हैं कि बाइबल पाप को असफलता की भाषा में समझाती है? रोमियों 3:23 कहता है, “इसलिए कि सब ने पाप किया है और परमेश्वर की महिमा से रहित है।” पाप, अन्य बातों के साथ, लक्ष्य से चूक जाना है। बाइबल में असफलता के विषय में कई आयतें इसी चित्रात्मक भाषा में लिखी गई हैं। विद्वानों के अनुसार पौलुस संभवतः यहाँ तीरंदाजी की भाषा का उपयोग कर रहा है—परमेश्वर की महिमा लक्ष्य का केंद्र है, और हमारा जीवन उस लक्ष्य से चूक जाता है। परमेश्वर का मापदंड एकदम सिद्ध है, और स्पष्ट रूप से हम उस स्तर तक पहुँचने में बहुत पीछे रह जाते हैं। हम परमेश्वर की पवित्रता के द्वारा तय किए गए स्तर पर खरा उतरने में असफल हो जाते हैं।
मैं कॉलेज के समय गर्मियों में एक दिवसीय मसीही शिविर में परामर्शदाता था। मेरे दिन का एक सबसे मनोरंजक हिस्सा तीरंदाजी स्थल हुआ करता था। यह कहना कि शिविर में आए हुए बच्चे लक्ष्य के केंद्र को भेदने में ‘थोड़ा-सा चूक गए’ थे, बहुत ही उदारता होगी। हालाँकि, मुझे पता चला कि कुछ बच्चे जानबूझकर गलत निशाना लगा रहे थे। वे जंगल में घूमने का बहाना ढूँढ रहे थे, और खोए हुए तीर को ढूँढना उन्हें इसके लिए एकदम सही अवसर देता था।
हम सफल नहीं होना चाहते
मैं यह कहना चाह रहा हूँ कि हम आत्मिक लक्ष्य से इसलिए नहीं चूकते कि हम अभी सीख रहे हैं और हमें सुधार करने के लिए समय चाहिए। हम अपनी स्वाभाविक, पापमय दशा में सही नैतिक लक्ष्य से चूक जाते हैं—और दुःख की बात यह है कि हम ऐसा चाहते भी हैं। शायद आप कह सकते हैं कि हम आत्मिक रूप से असफल इसलिए होते हैं क्योंकि हम होना ही चाहते हैं, मानो हम जानबूझकर अपने तीर जंगल की ओर ही चला रहे हैं।
हमारी समस्या अज्ञानता नहीं है। कुछ पन्ने पीछे पलटकर देखें: रोमियों 1:21–23 में पौलुस कहता है:
क्योंकि यद्यपि उन्होंने परमेश्वर को जान लिया था, फिर भी उन्होंने उसे परमेश्वर के रूप में महिमा नहीं दी और न ही उसका धन्यवाद किया; वरन् उनकी सोच व्यर्थ हो गई और उनके निर्बुद्धि हृदय अन्धकारमय हो गए थे। यद्यपि वे अपने आप को बुद्धिमान कहते थे, परन्तु वे मूर्ख बन गए और उन्होंने अविनाशी परमेश्वर की महिमा को, नाशवान मनुष्य, पक्षियों, पशुओं और रेंगने वाले जीवों जैसी दिखने वाली मूर्तियों में बदल दिया।
क्या यह जानी-पहचानी सी बात लगती है? ठीक अदन की वाटिका के आदम के समान हमने भी सब कुछ के बदले कुछ भी नहीं पाया। हमने उस काम को, जो परमेश्वर ने हमें सौंपा था, इसलिए छोड़ दिया ताकि हम अपने स्वयं के स्वामी बन सकें, और इस प्रकार हमने परमेश्वर के बदले स्वयं को और अपने पापों को चुन लिया। हम परमेश्वर के मानकों पर खरे क्यों नहीं उतर पाते? इसका मूल कारण यह है कि हमें उसके मानकों की कोई चिन्ता नहीं है। हमें तो केवल अपने ही मानकों की चिन्ता है। इसी कारण हम हमेशा अपने आपको वैसे आत्मिक असफल नहीं महसूस करते जैसे हम वास्तव में हैं, हम नियमों को अपने अनुसार तोड़-मोड़ देते हैं, ताकि हम उन खेलों के विजेता जैसे दिखें जो हमारे अहंकार की सेवा करने के लिए बनाए गए हैं।
मित्र, आपको तब तक यह समझ नहीं आएगा कि असफलता के भय या बाइबल के दृष्टिकोण से आपको अपनी असफलता के साथ क्या करना है, जब तक आपका सामना इस कड़वी सच्चाई से नहीं हो जाता: कि आपका हृदय आत्मिक असफलता से प्रेम करता है। हम अन्धकार से पीड़ित नही हैं, परन्तु तो हम अन्धकार से प्रेम करते हैं। ज्योति यह प्रकट करती है कि हमें वास्तव में क्या बनना था और हम क्या बन गए हैं, इसीलिए हम इससे जितनी शीघ्रता से हो सके, उतनी शीघ्रता से दूर भागते हैं (यूहन्ना 3:19–20)।
हम अपनी असफलता पर विजयी नहीं हो सकते
बाइबल हमारे पाप का वर्णन करने के लिए सक्रिय रूपकों का प्रयोग करती है, जैसा कि पौलुस रोमियों 1 और 3 में करता है। हम बहुत अधिक दबाने, बदल डालने, और लक्ष्य से चूकने का काम करते हैं। पवित्रशास्त्र हमारी पापमय दशा का वर्णन करने के लिए निष्क्रिय रूपकों का भी प्रयोग करता है। पहला हमारे पाप के पीछे दौड़ने और परमेश्वर को अस्वीकार करने पर ध्यान आकर्षित करता है; जबकि दूसरा इस बात पर ध्यान आकर्षित करता है कि हम कुछ और करने में पूरी रीति से अयोग्य हैं।
मृत्यु से बढ़कर कोई और चित्र हमारी स्वयं के द्वारा लाई गई दुर्दशा को इतनी गहराई से नहीं प्रकट करता है। “और उसने तुम्हें भी जिलाया, जो अपने अपराधों और पापों के कारण मरे हुए थे…।” (इफ. 2:1) और उसने तुम्हें भी, जो अपने अपराधों, और अपने शरीर की खतनारहित दशा में मुर्दा थे…(कुल.2:13)। “शरीर पर मन लगाना तो मृत्यु है… क्योंकि शरीर पर मन लगाना तो परमेश्वर से बैर रखना है, क्योंकि न तो परमेश्वर की व्यवस्था के अधीन है, और न हो सकता है” (रो. 8:6-7)।
हमारी समस्या केवल यह नहीं है कि हम असफल हो रहे हैं, वरन् यह है कि हम असफल हो चुके हैं। असफलता के विषय में पवित्रशास्त्र यह नहीं कहता कि हम समुद्र में डूबते हुए व्यक्ति के समान हैं—परन्तु हम तो पहले ही डूब चुके हैं। और हमारे पास स्वयं में ऐसी कोई आशा नहीं है कि हम इस सम्बन्ध में कुछ कर सकें, चाहे हम ऐसा करना भी चाहें (परन्तु हम वास्तव में ऐसा चाहते ही नहीं हैं)।
हम आत्मिक रूप से असफल हैं, क्योंकि हम कुछ और बनने के लिए न तो इच्छुक हैं और न ही योग्य हैं।
आत्मिक असफलता के अनेक रूप
आपकी असफलताएँ और मेरी असफलताएँ एक ही स्रोत से निकलती हैं: अर्थात् हमारे पापमय हृदय से। फिर भी, आपकी असफलताएँ मेरी असफलताओं से पूरी रीति से भिन्न दिखाई दे सकती हैं। रोमियों की पुस्तक पर लौटते हुए, पौलुस रोमियों 1:29–32 में पापों की एक सूची देकर अध्याय समाप्त करता है। हो सकता है कि उनमें से कुछ आप जानते होंगे:
वे सब प्रकार के अधर्म, बुराई, लोभ और दुष्टता से भर गए थे। वे ईर्ष्या, हत्या, झगड़े, छल और कपट से भरे हुए हैं। वे चुगली करने वाले, निन्दा करने वाले, परमेश्वर से बैर रखने वाले, उद्दण्ड, घमण्डी, डींग मारने वाले, बुराइयों के गढ़ने वाले, माता-पिता की आज्ञा न मानने वाले, निर्बुद्धि, विश्वासघाती, कठोर हृदय वाले और निर्दयी हैं। हालाँकि वे परमेश्वर की उस धर्मी व्यवस्था को जानते हैं कि जो लोग ऐसे काम करते हैं, वे मृत्यु के योग्य हैं; फिर भी वे न केवल स्वयं ऐसे काम करते हैं, परन्तु जो लोग ऐसे काम करते हैं, वे उन्हें भी सही ठहराते हैं।
असफलता के विषय में बाइबल की आयतें, जैसे रोमियों 1:29–32 हमें यह दिखाती हैं कि असफलता हर व्यक्ति के लिए एक जैसी नहीं होती है। आत्मिक असफलता आपके जीवन में व्यसनों और टूटे हुए सम्बन्धों की एक श्रृंखला के रूप में दिखाई दे सकती है। आत्मिक असफलता असहनीय स्वयं की धार्मिकता या निष्क्रिय-आक्रामक दुष्टता के रूप में सामने आ सकती है। ये दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। हो सकता है कि हम एक ही प्रकार से असफल न हों, पर अन्ततः हमारी असफलता का कारण एक ही है: हमने परमेश्वर की महिमा के बदले झूठ को चुन लिया है, और अब उसके परिणामों के साथ जीना पड़ रहा है।
हमारी आत्मिक असफलता पर परमेश्वर की उचित प्रतिक्रिया
परमेश्वर से प्रेम करने और उसकी आज्ञा मानने में हमारी असफलता के प्रति उसकी क्या प्रतिक्रिया होती है? पाप की मजदूरी मृत्यु है (रो. 6:23)। परमेश्वर की आराधना करने में हमारी असफलता उसकी योग्यता पर प्रश्न चिन्ह लगा देती है, और यह किसी भी प्रकार से स्वीकार नहीं किया जाएगा। किसी-न-किसी को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी।
परमेश्वर का प्रकोप-हमारे पाप के विरुद्ध उसका धर्मी क्रोध-हमें तब तक अत्यधिक प्रतिक्रिया जैसा लगेगा, जब तक हम अपनी असफलता की गंभीरता को नहीं समझ लेते। सम्पूर्ण सृष्टि अपने रचियता के सामने झुकती है; सूर्य, चन्द्रमा और तारे उसकी आज्ञा का पालन करने के लिए ही अस्तित्व में हैं। और एक हम हैं, जो उसके मुख पर थूकते हैं और ऐसा व्यवहार करते हैं मानो हम ही समूर्ण सृष्टि का केंद्र हैं। यही तो बुराई की वास्तविक परिभाषा है। उसका क्रोध हमारे प्रति इसलिए इतना भड़कता है, क्योंकि वही सबसे उत्तम है, फिर भी हम उसके साथ ऐसा व्यवहार करते हैं, मानो वह कोई महत्वहीन जन हो; और हमारे लिए वह निम्न स्तर का हो।
प्रभु हमारी आत्मिक असफलता को बिना दण्ड दिए नहीं छोड़ सकता। हम नरक में अनन्त दण्ड के योग्य हैं। वह अनन्त और असीम रूप से भला परमेश्वर है, और इसलिए हम भी अनन्त तथा अत्यन्त भयानक (परन्तु उचित) दण्ड के योग्य ठहरते हैं। यदि वह हमें इससे कम दण्ड देता, तो मानो वह यह स्वीकार कर रहा है कि उसकी महिमा वास्तव में इतनी महान नहीं है। हमारे जीवन के लिए सुनाया गया निर्णय “दोषी” ठहराया जाना और “दण्डित” करना है। कोई भी भले काम या धार्मिक रीति-रिवाज इस स्थिति को नहीं बदल सकते हैं।
और यहीं पर असफलता का भय अत्यन्त वास्तविक और पीड़ादायक हो जाता है: हमने केवल किसी कार्य में असफलता नहीं पाई, वरन् हम एक पवित्र परमेश्वर के सामने असफल हुए हैं, और अपने बल पर इसे ठीक करने की हमारे भीतर कोई योग्यता नहीं है। परन्तु सुसमाचार की सुन्दरता यह है कि जहाँ हम असफल होते हैं, वहाँ यीशु कभी असफल नहीं होता है।
सही निदान, उचित उपचार
हम पाप के स्वभाव को समझाने में इतना समय क्यों लगाएँ? यह प्रसिद्ध कथन सत्य है: शुभ समाचार तभी समझ में आता है, जब उसे बुरे समाचार के उजियाले में देखा जाए। कल्पना कीजिए, यदि हम आरम्भ ही इस विषय से करते हैं कि अगली बार जब आप असफल हों, तब अपनाने योग्य “10 उपाय और युक्तियाँ” क्या होंगी। यदि हमारी आत्मिक असफलता हमारे अस्तित्व की जड़ में ही बसी हुई है, तो ऐसी बातें हमारे क्या काम आएँगी? आत्मिक रूप से असफल लोगों को केवल जीवन सम्बन्धी सुझाव देना ऐसा होगा, जैसे कोई चिकित्सक कैंसर का उपचार केवल पट्टी बाँधकर करे। वह कुछ समय के लिए उसे ढक तो सकता है, परन्तु अन्त में मृत्यु तो निश्चित ही है।
यदि आप अपनी समस्या को नहीं समझेंगे, तो सही समाधान में आप आनन्दित भी नहीं हो पाएँगे। मुझे आशा है कि अब तक यह स्पष्ट हो गया होगा कि हमारी असफलता की समस्या वास्तव में पाप की समस्या है—हम वह नहीं करते जो हमें करना चाहिए, क्योंकि यीशु से अलग होकर न तो हम ऐसा कर सकते हैं और न ही ऐसा करने की हमारे भीतर इच्छा होती है।
लेकिन यहीं पर, असफलता के भय को चीरकर आशा की किरण फूट पड़ती है: वह ‘एक’ जो कभी असफल नहीं होता, हमारी कहानी में प्रवेश करता है। यीशु कभी असफल नहीं होता—न आज्ञापालन में, न प्रेम में, न ही परमेश्वर की व्यवस्था को पूरा करने में, और न ही उन पापियों को बचाने में, जो उनके चरणों में आकर गिर जाते हैं।
क्या आप कुछ शुभ समाचार सुनने के लिए तैयार हैं? यदि हाँ, तो बहुत अच्छी बात है, क्योंकि हमारी आत्मिक असफलता के प्रति परमेश्वर की प्रतिक्रिया केवल दण्ड और क्रोध ही नहीं है—परन्तु इससे भी बढ़कर है।
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चिन्तन के लिए प्रश्न:
- जब आपको अपनी उस अयोग्यता और अनिच्छा का सामना करना पड़ता है, जिसके चलते आप परमेश्वर की महिमा के लिए नहीं जीते हैं, तो आपका हृदय इस पर कैसी प्रतिक्रिया करता है?
- यह समझना क्यों आवश्यक है कि आप परमेश्वर को प्रसन्न करने में क्यों असफल होते हैं? जब हम इस बात को नहीं समझते हैं, तब क्या होता है?
- इस सप्ताह आप अपने जीवन में किसी अविश्वासी व्यक्ति को प्रेम के साथ चुनौती देने के लिए इस अध्याय का उपयोग किस प्रकार से कर सकते हैं?
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भाग IV: बड़ी असफलताओं के लिए शुभ समाचार
मैंने इस मार्गदर्शिका के आरम्भ में ही कहा था कि अब तक जो भी कभी जीवित रहा है, वह एक व्यक्ति को छोड़कर असफल ही रहा है। अब अंततः उस व्यक्ति को प्रस्तुत करने का समय आ गया है। एक ऐसा भी जन है जो कभी असफल नहीं हुआ, और न ही परमेश्वर के पूर्ण मापदंड पर कभी कम हुआ है। वह व्यक्ति प्रभु यीशु मसीह है, हमारा उद्धारकर्ता, जो वहाँ सफल होने आया जहाँ हम सब असफल हुए हैं, और अपने नाम में हमारा उद्धार करने के लिए आया है। जब भी असफलता का भय हमारे हृदय को जकड़ लेता है, तो हम उसी की ओर देखते हैं, क्योंकि यीशु कभी असफल नहीं होता है।
असफलता की कहानी का मुख्य संदेश
ठीक है, मुझे पता है कि आपको बाइबल की स्मृतियों की ओर ले जाना थोड़ा अधिक हो गया है। लेकिन मेरे पास इसके अपने कारण हैं। पहला कारण यह है कि आप परमेश्वर की दृष्टि में आत्मिक सफलता पाने के लिए स्वयं को झाड़-पोंछकर, दाँत भींचकर और अधिक परिश्रम करने का किसी भी प्रयास के बारे में दो बार सोचें। लेकिन मैं आपको यह बताना चाहूँगा कि आत्मिक असफलता की मूल कहानी को फिर से सामने लाने का मेरा एक दूसरा कारण भी है: ताकि आप परमेश्वर की उन प्रतिज्ञाओं में आनन्दित हो सकें, जिनके अनुसार वह असफल लोगों का अपने सिद्ध आज्ञाकारी पुत्र के माध्यम से पूरी रीति से उद्धार करता है। जब हम अपनी असफलताओं को समझते हैं, तभी हम अनुग्रह का महत्व महसूस करते हैं—और तभी हम यह भी देख पाते हैं कि यीशु, जो कभी असफल नहीं होता, क्यों उस विश्वासी के लिए, एक दृढ़ आधार है, जो असफलता के भय का सामना कर रहा है।
आदम और हव्वा अभी उस वाटिका से बाहर भी नहीं निकल पाए थे, कि इससे पहले ही परमेश्वर ने उन्हें यह बता दिया कि वह पापी प्राणियों के साथ अभी पूरी रीति से नहीं निपटा है। उत्पत्ति 3:15 में, परमेश्वर उस शैतानी साँप से कहता है: ”और मैं तेरे और इस स्त्री के बीच में, और तेरे वंश और इसके वंश के बीच में बैर उत्पन्न करूँगा, वह तेरे सिर को कुचल डालेगा, और तू उसकी एड़ी को डसेगा।” आदम और हव्वा के पुत्रों में से एक आएगा जो इस संकट का समाधान करेगा, और वह वहाँ सफल होगा जहाँ वे असफल हुए थे।
पुराने नियम का शेष भाग इस सर्प को कुचलने वाले और श्राप को पलटने वाले पुत्र की खोज का विवरण देता है। हम अध्याय दो से ही जानते हैं कि वह नूह, इस्राएल या दाऊद नहीं था। वास्तव में, मलाकी जो कि बाइबल की अन्तिम पुस्तक है इस बात को बताए बिना समाप्त होती है कि वह कौन है। हमारे पास केवल अन्धकार समुद्र में आशा की एक झलक रह जाती है: दाऊद का एक पुत्र, मसीहा आएगा और सब कुछ ठीक कर देगा।
नए नियम की पहली ही आयत बल पूर्वक घोषणा करती है: कि “वह आ गया है!” मत्ती 1:1: “यीशु मसीह की वंशावली, अब्राहम की सन्तान, दाऊद की सन्तान।” यीशु वही पुत्र है जिसकी प्रतिज्ञा उत्पत्ति 3:15 में की गई थी। जब उसके बपतिस्मा के समय पवित्र आत्मा कबूतर की नाई उस पर उतरता है, तब वह सम्पूर्ण सृष्टि से कहता है, “यह मेरा प्रिय पुत्र है, जिससे मैं अत्यन्त प्रसन्न हूँ” (मत.3:17)।
जंगल में परीक्षा
इसके तुरन्त बाद यीशु की पहली बड़ी परीक्षा हुई। मत्ती 4:1–3 कहता है, “तब उस समय पवित्र आत्मा यीशु को एकांत में ले गया ताकि शैतान से उसकी परीक्षा हो। वह चालीस दिन, और चालीस रात, निराहार रहा, तब उसे भूख लगी। तब परखनेवाले ने पास आकर उससे कहा, “यदि तू परमेश्वर का पुत्र है, तो कह दे, कि ये पत्थर रोटियाँ बन जाएँ।”
हमने पहले यह कहाँ देखा? पहली बार जब शैतान ने परमेश्वर के वचन पर संदेह करने के लिए परमेश्वर के पुत्र को परीक्षा में डाला था, तब क्या हुआ था? आप लगभग उस प्राचीन सर्प की फुसफुसाहट सुन सकते हैं: “क्या परमेश्वर ने सच में ऐसा कहा है?” लेकिन यहाँ, अदन की वाटिका के विपरीत, परमेश्वर का पुत्र अपने पिता को प्रेमपूर्ण भरोसे के साथ उत्तर देता है। “तब उसने उत्तर दिया, “लिखा है, “‘मनुष्य केवल रोटी ही से नहीं, परन्तु हर एक वचन से जो परमेश्वर के मुख से निकलता है जीवित रहेगा।”
जंगल में यीशु की परीक्षा हमें इस्राएल के मरुस्थल में बिताए गए चालीस वर्षों का भी स्मरण दिलाता है। उनके भय ने उन्हें परमेश्वर की उस योग्यता पर भरोसा करने से रोक दिया था कि वह जो कहता है, उसे पूरा भी करता है; इसलिए वे तब तक चिलचिलाती धूप में भटकते रहे, जब तक कि वह पीढ़ी, जिसने उसे ठुकरा दिया था, मर नहीं गई। वे थके हुए और भूखे-प्यासे थे। इस्राएल ने परीक्षा के आगे झुककर कुड़कुड़ाना और शिकायत करना शुरू कर दिया कि प्रभु ने उनके लिए कैसा प्रबंध किया है।
आदम और इस्राएल अपनी परीक्षाओं में असफल हो गए थे। यीशु ने अपनी परीक्षा में सफलता पाई। जहाँ हम असफलता के भय के नीचे टूट जाते हैं, वहीं यीशु दृढ़ता से खड़ा रहता है—क्योंकि यीशु कभी असफल नहीं होता है। मत्ती जान-बूझकर ये तुलनाएँ कर रहा है—हमारी आत्मिक असफलता की कहानी और यीशु की आत्मिक जीत। यीशु एक अद्भुत आत्मिक रूप से सफल व्यक्ति था (और है), क्योंकि अपने सिद्ध मनुष्य जीवन के दौरान उसने हमेशा परमेश्वर और उसकी महिमा से सबसे अधिक प्रेम किया।
आदम और इस्राएल अपनी परीक्षाओं में असफल रहे। यीशु अपनी परीक्षा में सफल हुआ। मत्ती जान-बूझकर ये समानताएँ दिखा रहा है—हमारी आत्मिक असफलता की कहानी और यीशु की आत्मिक विजय की कहानी। यीशु एक अद्भुत आत्मिक रूप से सफल व्यक्ति था (और है), क्योंकि अपने पूर्ण मानवीय जीवन के दौरान उसने हमेशा परमेश्वर और उसकी महिमा से सबसे अधिक प्रेम किया।
यीशु अनादिकाल से ही परमेश्वर है। उसने हमारी मानवता को ग्रहण किया ताकि वह आज्ञाकारिता का वह जीवन जी सकें जिसकी अपेक्षा परमेश्वर हमसे करता है, परन्तु जिसे हम जीने में असफल रहे हैं। इब्रानियों का लेखक कहता है कि यीशु हर प्रकार से हमारे समान हैं—उसकी भी मानवीय इच्छा, देह, मन और आत्मा है—परन्तु उसमे पाप नहीं था (इब्रानियों 4:13)।
मृत्यु तक सफल
यीशु मृत्यु तक आज्ञाकारी रहा (फिलि. 2:8)। जब वह गतसमनी के बगीचे में था, तब उसने पिता से विनती की कि क्या कोई ऐसा तरीका है जिससे उसके ऊपर आने वाले दिव्य क्रोध के कटोरे से उसे बचाया जा सके (मत. 26:36–46)। परन्तु ऐसा कोई तरीका नहीं था, और उसने इस मृत्यु को अपने लहू की बूंदों के द्वारा स्वीकार किया—इसलिए नहीं कि उसे अपनी किसी असफलता का मूल्य चुकाना था, परन्तु इसलिए कि वह हमारी असफलताओं का मूल्य चुकाने वाला था। यीशु की आत्मिक सफलता उसे हमारे कारण रोमी क्रूस तक ले गई।
हमारी असफलता की कीमत इतनी अधिक थी कि हम उसे नहीं चुका सकते थे। यीशु ने वह पूरी कीमत चुका दी। और इसलिए क्रूस पर यीशु को हमारे स्थान पर दोषी ठहराया गया। हमारे पाप और दोष उस पर डाल दिए गए। परमेश्वर के क्रोध की हर उस बूँद को उसने शान्त किया, जिसके हम पात्र थे। स्मरण रखें, परमेश्वर हमारी आज्ञा-उल्लंघन और पाप को यूँ ही अनदेखा नहीं कर सकता था—यदि वह ऐसा करता, तो वह स्वयं अपने ही स्वभाव का इनकार कर देता। इसके बजाय, उसने एक सिद्ध बलिदान प्रदान किया, ताकि हमें हमारी आत्मिक असफलता के दण्ड से स्वतंत्र किया जा सके, और इस प्रकार वह स्वयं भी धर्मी ठहरा और उन लोगों को भी धर्मी ठहराने वाला बना जिनका यीशु पर विश्वास है (रो. 3:25–26)।
यही कारण है कि मसीहियों को असफलता के भय से घबराने की आवश्यकता नहीं है: हम उस पर भरोसा करते हैं, जिसने हमारी असफलताओं को क्रूस पर उठा लिया; और यीशु कभी असफल नहीं होता है।
उद्देश्य सफल हुआ
मुझे पूरा विश्वास है कि यीशु की मृत्यु के बाद वाले शनिवार को, सम्पूर्ण सृष्टि में एक पिन गिरने की आवाज़ भी सुनी जा सकती थी। परमेश्वर की सर्वोच्च सफलता की कहानी एक कब्र में मौन पड़ी थी। परमेश्वर की स्तुति हो, कि वह वहीं नहीं रहा! यीशु तीसरे दिन कब्र से जी उठा, और उसने प्रमाणित किया कि उसकी मृत्यु ने परमेश्वर और मनुष्य के बीच की दूरी को मिटाने के लिए हर आवश्यक काम को पूरा कर दिया है।
यीशु के विजयी पुनरुत्थान ने सृष्टि के सिंहासन पर उसके दावे को सही सिद्ध कर दिया। यह इस प्रकार से था मानो उसने जो चेक भुनाया था, वह सफलतापूर्वक पास हो गया। पुत्र ने क्रूस से ऊँची आवाज में पुकारकर कहा, “पूरा हुआ” और पिता ने उसे मृतकों में से जिलाकर कहा, “यह सचमुच पूरा हुआ।” इस विजय के कारण, असफलता का सबसे गहरा भय भी अपनी सामर्थ्य खो देता है—मसीह की सफलता अब हमारे आत्मविश्वास का आधार है।
आत्मिक असफलता को आत्मिक सफलता से बदलना
हम यीशु की सफलता में कैसे सहभागी हो सकते हैं? केवल पश्चाताप और विश्वास के द्वारा। हमें स्वीकार करना चाहिए कि हम आत्मिक रीति से पूरी तरह असफल हैं और अपने आप में भिन्न बनने की कोई आशा नहीं रखते हैं। परमेश्वर का अनुग्रह पाने के लिए हमारे सबसे अच्छे प्रयास भी हमें सीधे नरक की ओर ले जाएँगे। लेकिन जब हम स्वयं से मुँह मोड़कर, मसीह में परमेश्वर की दया पर स्वयं को सौंप देते हैं, तो हमें अनंत जीवन प्राप्त होता है। असफलता के भय को शान्त करने का एकमात्र तरीका यही है: कि उस परमेश्वर में विश्राम करें, जिसकी सफलता हमारी प्रत्येक कमी को ढक देती है।
हमारी आत्मिक असफलता की जड़ और उससे होने वाले सभी परिणामों का अन्त संघर्ष करके नहीं, वरन् भरोसा करके होता है। जब हम केवल मसीह पर भरोसा करते हैं, तो वह हमारी आत्मिक असफलता को अपनी बना लेता है, और हम उनकी सिद्ध आज्ञाकारिता को अपनी बना लेते हैं। पौलुस इस “मधुर आदान-प्रदान” को 2 कुरिन्थियों 5:21 में इस प्रकार व्यक्त करता है: “जो पाप से अज्ञात था, उसी को उसने हमारे लिये पाप ठहराया, कि हम उसमें होकर परमेश्वर की धार्मिकता बन जाएँ।”
मसीह में, जिस परमेश्वर को हमने ठेस पहुँचाई है, वह अब हमें देखकर “दोषी असफल” नहीं कहता। परन्तु वह हमें देखकर अपने पुत्र को देखता है, और “परमेश्वर की धर्मी सन्तान कहता है।” यही वह सत्य है जो विश्वासियों को असफलता के उस लकवा मार देने वाले भय से स्वतंत्र करता है—अब हम मसीह की धार्मिकता में खड़े हैं, न कि अपनी स्वयं की धार्मिकता में। मित्र, यदि आपने अभी तक पश्चताप नहीं किया है और इस शुभ समाचार पर भी विश्वास नहीं किया है, तो एक भी शब्द आगे पढ़ने से पहले ऐसा कर लें। आप अपनी आत्मिक असफलता पर स्वयं विजय नहीं पा सकते हैं। आप अपने पाप की कीमत नहीं चुका सकते हैं। केवल यीशु ही ऐसा कर सकता है, और उसने किया भी है, यदि आप उसे प्रभु, उद्धारकर्ता और अपने सर्वोच्च खजाने के रूप में स्वीकार करते हैं।
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चिन्तन के लिए प्रश्न:
- क्या आप नए नियम में ऐसे अन्य अंशों के बारे में सोच सकते हैं, जो यीशु की उस सफलता को दर्शाते हैं जहाँ हम असफल रहे हैं?
- परमेश्वर हमारी आत्मिक असफलता का उत्तर क्रूस पर कैसे देता है? और पुनरुत्थान में कैसे देता है?
- हमारी आत्मिक असफलता से बचाए जाने का सबसे अच्छा हिस्सा क्या है?
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भाग V: असफल, संघर्ष, असफल, संघर्ष
यह शायद वह अध्याय है जिसकी आप प्रतीक्षा कर रहे थे। अब हम अंततः यह बात करने के लिए तैयार हैं कि असफलता से कैसे निपटा जाए। विशेष रूप से, हम इस बात पर विचार करेंगे कि यीशु में हमारी नई पहचान और हमारे हृदयों के भीतर पवित्र आत्मा का कार्य हमें परमेश्वर को प्रसन्न करने वाला जीवन जीने में कैसे सहायता करता है, एक सिद्ध जीवन नहीं, परन्तु परमेश्वर को प्रसन्न करने वाला जीवन। सुसमाचार कुछ हद तक इसलिए शुभ समाचार है क्योंकि यह इस जीवन में हमारी आत्मिक असफलताओं पर धीरे-धीरे विजयी होने की प्रतिज्ञा करता है। और जैसे-जैसे हम बढ़ते चले जाते हैं, आत्मा हमें यह भी सिखाता है कि असफलता से ऐसे कैसे निपटा जाए जिससे असफलता का भय बढ़ने के बजाय कम हो जाए।
अब, मैंने ऊपर जान-बूझकर “पूरी तरह सही नहीं” और “धीरे-धीरे” जैसे शब्दों का उपयोग किया है। आत्मिक असफलता पर हमारी विजय निश्चित है, लेकिन संघर्ष तो अभी आरम्भ हुआ है। यदि आप मसीही जीवन को एक के बाद एक लगातार विजयी होने के समान देखने की अपेक्षा करते हैं, तो आप स्वयं को निराशा और हताशा के लिए तैयार कर रहे हैं। आत्मिक असफलता पर विजय पाना जीवनभर चलने वाली एक प्रक्रिया है, यह एक; लम्बी दौड़ है, छोटी दौड़ नहीं है। असफलता से जूझते हुए भी परमेश्वर के साथ चलते रहना सीखना मसीही जीवन का सामान्य हिस्सा है।
फिलिप्पियों 3:12 में पौलुस के इन वचनों पर ध्यान दें: “यह मतलब नहीं कि मैं पा चुका हूँ, या सिद्ध हो चुका हूँ; पर उस पदार्थ को पकड़ने के लिये दौड़ा चला जाता हूँ, जिसके लिये मसीह यीशु ने मुझे पकड़ा था।” यहाँ तक कि पौलुस जिसने नए नियम में सबसे अधिक पत्रियाँ लिखी थीं, वह भी आत्मिक दृष्टि से अभी तक सिद्धता तक नहीं पहुँचा था। पाप के विरुद्ध अपने संघर्ष में उसे अभी भी काम करना था। वह अब भी असफल होता था और उसे प्रतिदिन परमेश्वर की सहायता की आवश्यकता होती थी। यदि प्रेरित पौलुस को भी असफलता से निपटना सीखना पड़ा, तो हमें यह देखकर आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि हमें भी ऐसा ही करना पड़ता है।
बाइबल हमारी “देह” के विषय में बात करती है। “देह” का अर्थ हमारे भौतिक शरीर से नहीं है, वरन् यह हमारे पतित और पापमय स्वभाव को दर्शाता है। हमारी देह हमें धार्मिकता से दूर करके पाप की ओर धकेलना चाहती है। जब हम सुसमाचार पर विश्वास करते हैं, तब हमारी देह को घातक रूप से आघात पहुँचता है, पर वह हमारे भीतर बसी हुई आत्मा के विरुद्ध तब तक संघर्ष करती रहती है जब तक हम इस संसार में जीवित रहते हैं। आप एक मसीही विश्वासी होने के नाते भी लगातार असफल होते रहेंगे। प्रश्न यह नहीं है कि असफलता होगी या नहीं, परन्तु प्रश्न यह है कि जब असफलता हो, तब आप कैसी प्रतिक्रिया करते हैं, और सुसमाचार आपको असफलता के कुचल देने वाले भय से कैसे स्वतंत्र करता है।
एक मसीही व्यक्ति असफलता का सामना कैसे करता है
आपने फिर वही कर दिया। वह काम, जिसके बारे में आपने अपने आप से (और परमेश्वर से) कहा था कि अब कभी नहीं करेंगे। आपको इस बात का अनुमान भी नहीं था, फिर भी हो वह गया। उस पाप के विरुद्ध अपने इस संघर्ष में आप हार गए हो—आपके जीवन में वह पाप चाहे जो भी हो। एक बार फिर आप असफल हो गए हैं। अब आप आगे क्या करेंगे?
स्मरण रखें
पहला कदम यह है कि हम उस बात पर वापस जाएँ जो हमने पिछले अध्याय में सुसमाचार के विषय में सीखी थी। यीशु का यह सुसमाचार उसका सिद्ध जीवन, उसकी बलिदानी मृत्यु, और उसका विजयी पुनरुत्थान, जो मन-फिराव और विश्वास के द्वारा ग्रहण किया जाता है, जब आपने पहली बार विश्वास किया था तब भी यह शुभ समाचार था, और आज भी यह उतना ही शुभ समाचार है, चाहे आप कितने ही समय से यीशु का अनुसरण कर रहे हों। सुसमाचार को स्मरण करना असफलता से निपटने का पहला कदम है, यह आपको उस समय ठोस आधार देता है जब आपकी भावनाएँ असफलता के भय से दबाव में आ जाती हैं।
आत्मिक असफलता से लड़ने के लिए आपको अपने धर्मी ठहराए जाने को केवल स्मरण ही नहीं करना होगा—पर उससे कम भी नहीं करना चाहिए। आपकी अन्तिम आशा कभी भी आपकी आत्मिक सफलता नहीं हो सकती है, यहाँ तक कि आपके भीतर बदलाव आने के बाद भी नहीं। क्या आपने कभी लूका 18:9–14 में फरीसी और चुंगी लेने वाले की कहानी पढ़ी है?
उसने (यीशु ने) उनसे जो अपने ऊपर भरोसा रखते थे, कि हम धर्मी हैं, और दूसरों को तुच्छ जानते थे, यह दृष्टान्त कहा: कि “दो मनुष्य मन्दिर में प्रार्थना करने के लिये गए; एक फरीसी था और दूसरा चुंगी लेनेवाला। फरीसी खड़ा होकर अपने मन में यह प्रार्थना करने लगा, ‘हे परमेश्वर, मैं तेरा धन्यवाद करता हूँ, कि मैं और मनुष्यों के समान दुष्टता करनेवाला, अन्यायी और व्यभिचारी नहीं, और न इस चुंगी लेनेवाले के समान हूँ। मैं सप्ताह में दो बार उपवास करता हूँ; मैं अपनी सब कमाई का दसवाँ अंश भी देता हूँ। परन्तु चुंगी लेनेवाले ने दूर खड़े होकर, स्वर्ग की ओर आँख उठाना भी न चाहा, वरन् अपनी छाती पीट-पीट कर कहा, ‘हे परमेश्वर मुझ पापी पर दया कर!’ मैं तुम से कहता हूँ, कि वह दूसरा नहीं; परन्तु यही मनुष्य धर्मी ठहरा और अपने घर गया; क्योंकि जो कोई अपने आप को बड़ा बनाएगा, वह छोटा किया जाएगा; और जो अपने आप को छोटा बनाएगा, वह बड़ा किया जाएगा।”
फरीसी आत्मिक रूप से असफल था, लेकिन उसे इस बात का पता नहीं था। उसने अपनी स्वयं की धार्मिकता को ही भक्ति का रूप दे दिया था—”मैं तेरा धन्यवाद करता हूँ कि मैं उस मनुष्य के समान नहीं हूँ।” इसके विपरीत, चुंगी लेने वाला जानता था कि वह आत्मिक रूप से असफल है और केवल दया की ही आशा कर सकता था। इनमें से कौन धर्मी ठहराकर घर भेजा गया?
उन क्षणों में जब आप एक और असफलता के बाद भूमि पर औंधे मुँह गिर जाते हैं, तब यह स्मरण रखें कि आपकी आशा आपकी सफलता में नहीं, परन्तु यीशु की सफलता में है। उसकी धार्मिकता आपको एक नए, स्वच्छ वस्त्र की तरह ढक देती है; आपके पुराने, गंदे वस्त्र बहुत समय पहले ही फेंक दिए गए थे। किसी भी प्रकार की असफलता अब आपकी पहचान नहीं है। अब यीशु आपकी पहचान है। मसीही लोग असफलता से निपटना इसी प्रकार आरम्भ करते हैं, उसे नकारकर नहीं, और न ही अपनी पहचान को अपने कामों से करते हैं, वरन् मसीह में स्थिर रह कर करते हैं।
अंगीकार
अब आपके पास यह साहस है कि आप परमेश्वर के पास जाकर उससे कह सकें, कि “मुझे क्षमा कर।” यह बहाने बनाने का समय नहीं है। पश्चाताप करने का आरम्भ अपने दोष को स्वीकार करने से होता है; हमें अपने पाप के विरुद्ध परमेश्वर का पक्ष लेना चाहिए। यही कारण है कि यह समझना इतना महत्वपूर्ण है कि हम आत्मिक रूप से असफल क्यों होते हैं। अंततः इसमें किसी और की नहीं, परन्तु हमारी ही गलती होती है। हमारे हृदय में अभी भी अन्धकार की ओर खिंचाव महसूस होता है, और हमें इस बारे में ईमानदार रहना चाहिए।
क्या कभी आपको किसी से कोई बात करने में डर लगा है, क्योंकि आपको इस बात का डर था कि न जाने वे कैसी प्रतिक्रिया करेंगे? जब आप अपनी असफलता को लेकर परमेश्वर के पास आते हैं, तो आप क्या अपेक्षा करते हैं, झुँझलाहट, क्रोध, प्रकोप? नहीं। परन्तु आपको यह अपेक्षा करनी चाहिए: “यदि हम अपने पापों को मान लें, तो वह हमारे पापों को क्षमा करने, और हमें सब अधर्म से शुद्ध करने में विश्वासयोग्य और धर्मी है” (1 यूहन्ना 1:9)। अपनी असफलताओं को शीघ्र और बार-बार स्वीकार कीजिए, क्योंकि परमेश्वर आपसे अनुग्रह पर अनुग्रह करके मिलने वाला है। अंगीकार उस हृदय को चंगा करने के लिए परमेश्वर के मुख्य साधनों में से एक है, जो असफलता से जूझते-जूझते थक चुका है।
क्या आपने उस दूसरी बात पर ध्यान दिया जिसे यूहन्ना बताता है कि हमारे पापों का अंगीकार करने पर क्या होगा? परमेश्वर प्रतिज्ञा करता है कि वह हमें सब अधर्म से शुद्ध करेगा। क्षमा एक अद्भुत वरदान है जिसकी हमें अत्यन्त आवश्यकता है। हमें पाप को “नहीं” और परमेश्वर को “हाँ” कहने की अपनी सामर्थ्य में बढ़ने की आवश्यकता है, और होनी भी चाहिए। वही अनुग्रह हमें धर्मी ठहराता है और क्षमा करता है, हमारे हृदयों को भीतर से बदलना भी आरम्भ कर देता है। पश्चाताप कीजिए, अपनी आत्मिक असफलता से फिर जाइए, क्षमा ग्रहण कीजिए, और पाप के विरुद्ध संघर्ष करते रहने का निश्चय कीजिए। यही मसीही जीवन की लम्बी और सुन्दर रीति है: अर्थात् असफल होना, संघर्ष करना, अंगीकार करना, बढ़ना, और विश्वास बनाए रखना। और इन सबके द्वारा परमेश्वर हमें सिखाता है कि असफलता के भय से कुचले बिना असफलता का सामना कैसे करना है।
लड़ाई
इस जीवन में आत्मिक असफलता के विरुद्ध हमारी लड़ाई वास्तव में एक लड़ाई ही है। हम स्वयं को शुद्ध नहीं कर सकते हैं। केवल परमेश्वर की सामर्थ्य ही हमें मसीह के स्वरूप के और अधिक समीप ला सकती है। फिर भी, परमेश्वर हमें अनुग्रह में बढ़ाने के लिए हमारे प्रयासों का उपयोग करता है, भले ही वे कभी-कभी कितने ही दुर्बल क्यों न हों। और जब हम संघर्ष करते रहते हैं, तब परमेश्वर धीरे-धीरे असफलता के भय की पकड़ को ढीला करता है, विशेषकर तब जब यह भय हमारी मित्रता, सेवकाई, या यहाँ तक कि कार्यस्थल की असफलताओं में प्रकट होता है, जो हमें निरुत्साहित और स्वयं के विषय में अनिश्चित कर देता है।
फिलिप्पियों 2:12–13 कहता है, “इसलिए हे मेरे प्रियों, जिस प्रकार तुम सदा से आज्ञा मानते आए हो, वैसे ही अब भी न केवल मेरे साथ रहते हुए पर विशेष करके अब मेरे दूर रहने पर भी डरते और काँपते हुए अपने-अपने उद्धार का कार्य पूरा करते जाओ।क्योंकि परमेश्वर ही है, जिसने अपनी सुइच्छा निमित्त तुम्हारे मन में इच्छा और काम, दोनों बातों के करने का प्रभाव डाला है।” अपने उद्धार के लिए काम करो, लक्ष्य तक पहुँचने का प्रयास करो, क्योंकि परमेश्वर आपके भीतर काम कर रहा है।
दूसरा थिस्सलुनीकियों 1:11–12 में पौलुस इसी कार्य विधि को भिन्न दृष्टिकोण से व्यक्त करता है:
इसलिए हम सदा तुम्हारे निमित्त प्रार्थना भी करते हैं, कि हमारा परमेश्वर तुम्हें इस बुलाहट के योग्य समझे, और भलाई की हर एक इच्छा, और विश्वास के हर एक काम को सामर्थ्य सहित पूरा करे, कि हमारे परमेश्वर और प्रभु यीशु मसीह के अनुग्रह के अनुसार हमारे प्रभु यीशु का नाम तुम में महिमा पाए, और तुम उसमें।
हम परमेश्वर के लिए दृढ़ निश्चय करते हैं। हम विश्वास के कार्य करते हैं। हम आत्मिक सफलता के लिए परिश्रम करते हैं… परन्तु सदा उसकी सामर्थ्य के द्वारा, इस भरोसे के साथ करते हैं कि आज्ञाकारिता का प्रत्येक कदम इस बात का प्रमाण है कि वह हममें कार्य कर रहा है और हमें यीशु के समान और अधिक बना रहा है। इसलिए हम अपने महिमामय पिता की ओर छोटे-छोटे कदम बढ़ाते हैं- जब आपकी सामर्थ्य उसके अनुग्रह में होती है, तब डगमगाते हुए कदम भी महत्वपूर्ण हो जाते हैं।
इस सप्ताह आपके लिए वे छोटे-छोटे कदम कैसे दिखाई दे सकते हैं? यह कहा गया है कि यदि आप “योजना बनाने में असफल होते हैं,” तो आप “असफल होने की ही योजना बनाते हैं।” आप अपने प्रभु परमेश्वर से अपने सारे हृदय, सारे मन, सारे प्राण और सारी शक्ति के साथ प्रेम करने की कैसी योजना बना रहे हैं? आप में से कुछ लोगों के लिए इसका अर्थ किसी सम्बन्ध को समाप्त करना या अपने कम्प्यूटर को ऊपर की खिड़की से बाहर फेंक देना भी हो सकता है। सकारात्मक रूप से, इसका अर्थ यह हो सकता है कि आप हर सुबह अपनी बाइबल खोलकर (शायद अपना फ़ोन देखने से भी पहले) स्वयं को आत्मिक सफलता के लिए तैयार कर रहे हैं। परमेश्वर इन “अच्छे संकल्पों” का उपयोग हमें यीशु जैसा बनाने के लिए करता है—वे साधारण और व्यावहारिक वस्तुओं के माध्यम से अलौकिक रूप से कार्य करता है।
अन्ततः, हमारी सफलताओं का श्रेय परमेश्वर को मिलता है, और हमारी असफलताओं का दोष हम पर आता है। किसी भी कार्य को सही रीति से करने के लिए हम उसके अनुग्रह पर निर्भर रहते हैं, और यही उसकी उद्धार करने वाली सामर्थ्य तथा आत्मा को तृप्त करने वाली भलाई का प्रमाण है। यदि वह हमारे जैसे आत्मिक रूप से असफल लोगों को अपने पुत्र को जानने में थोड़ी-सी भी सच्ची आत्मिक विजय दे सकता है, तो सारी स्तुति और महिमा उसी को मिलनी चाहिए।
विश्राम
क्या आपको स्मरण है कि पहले अध्याय में हमने आत्मिक असफलता और प्राणी जगत की असफलता के बीच कैसे अन्तर किया था? मैं आपको इस विषय में कोई प्रोत्साहन दिए बिना नहीं छोड़ना चाहता कि उस असफलता का सामना कैसे करें जो हो जाती है। फिर से कहूँगा कि हर प्रकार की असफलता एक जैसी नहीं होती है। कभी-कभी जो कार्य आप करना चाहते थे, वह केवल इसलिए पूरा नहीं हो पाया क्योंकि आप परमेश्वर नहीं हैं। और कभी-कभी आपकी असफलता वास्तव में किसी और की असफलता का परिणाम होती है, चाहे वह आत्मिक हो या किसी अन्य प्रकार की हो।
यह भी जान लीजिए कि आपकी सांसारिक या मानवीय असफलताएँ भी आपको परिभाषित नहीं करती हैं। हो सकता है कि वे ऐसी पापमय बातें न हों जिनके लिए मन फिराव आवश्यक हो, फिर भी जब बातें आपकी इच्छा के अनुसार न हों, तभी सुसमाचार आपकी पहली बुलाहट होनी चाहिए। जब पतित संसार का जीवन आपको गिरा दे, तब आप फिर से उठ खड़े होने की सामर्थ्य पाएँगे, क्योंकि आप इस बात को समझ गए होंगे कि आपकी पहचान आपकी सफलताओं या असफलताओं से नहीं, वरन् यीशु के लहू और उसकी धार्मिकता से होती है। यह बात तब भी सत्य रहती है, जब ठोकर आत्मिक हो, भावनात्मक हो, या फिर उतनी साधारण ही क्यों न हो जितनी कार्यस्थल पर मिली कोई निराशाजनक असफलता हो, जिसने आपको छोटा या अयोग्य महसूस कराया हो। हर परिस्थिति में जब आपकी योजनाएँ स्थिर नहीं रहतीं, तब भी परमेश्वर का प्रेम अटल बना रहता है।
यह जानते हुए बुद्धिमानी से जोखिम उठाने की स्वतंत्रता महसूस करें, कि इसके परिणामों से आपके लिए परमेश्वर का प्रेम थोड़ा भी नहीं बदलेगा। वैसे भी परिणामों पर आपका कोई नियंत्रण तो है नहीं, ठीक है ना? नियंत्रण तो परमेश्वर का है। और वह आपसे कहीं अधिक उत्तम रीति से जानता है। वह नौकरी क्यों नहीं मिली? और कलीसिया में वह नई सेवकाई क्यों आरम्भ नहीं हुई? परमेश्वर के पास हर बात का कोई न कोई कारण होता है, भले ही वह कारण आपको विपरीत परिस्थितियों में भी उस पर भरोसा करने और उसकी महिमा करने का अवसर देना ही क्यों न हो।
अंततः, हम जानते हैं कि परमेश्वर सब बातों को—यहाँ तक कि हमारी असफलताओं को भी—हमारी भलाई के लिए कार्य करता है (रोमियों 8:28)। मानवीय असफलताएँ पीड़ा तो अवश्य देती हैं, पर वे भी उसी की जागरूक दृष्टि के अधीन हैं जिसने अपने एकलौते पुत्र को दे दिया। फिर “जिस ने अपने निज पुत्र को भी न रख छोड़ा, परन्तु उसे हम सब के लिए दे दिया, वह उसके साथ हमें और सब कुछ क्यों न देगा?” (रोमियों 8:32)। इस सत्य को अगली बार के लिए अपने पास संभालकर रखें (क्योंकि ये अगली बार अवश्य होंगी), जब कार्य आपकी आशा के अनुसार नहीं होंगे।
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चिन्तन के लिए प्रश्न:
- अपनी हाल की किसी आत्मिक असफलता के विषय में सोचिए। यह दृष्टिकोण उस असफलता को सही रीति से समझने और उससे इस प्रकार से निपटने में आपकी कैसे सहायता कर सकता था कि परमेश्वर का आदर हो और आपके मन को भी प्रोत्साहन मिले?
- क्या आप अपनी असफलता का परमेश्वर के सामने अंगीकार कर सकते हैं? यदि हाँ, तो क्यों? यदि नहीं, तो क्यों नहीं?
- जब हम ऐसे तरीकों से असफल होते हैं जिसमे सीधे हमारी गलती नहीं होती है, तब परमेश्वर पर भरोसा करना इतना कठिन क्यों हो जाता है?
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निष्कर्ष
मुझे आशा है कि आपने इस मार्गदर्शिका से यह सीखा होगा—एक असफलता से दूसरी असफलता तक।
हम असफल हैं। कभी-कभी हमारी असफलता हमारी अपनी गलती के कारण होती है; और कभी-कभी असफलता इसलिए होती है क्योंकि हम परमेश्वर नहीं हैं। हमारी असफलता की कहानी बहुत पीछे, उस अदन की वाटिका तक जाती है, जहाँ आदम ने पाप किया और वह उस काम को करने में असफल रहा जिसके लिए परमेश्वर ने उसकी रचना की थी: अर्थात् सबसे बढ़कर परमेश्वर की आराधना करना और उसकी आज्ञा का पालन करना था। हम भी आदम की ही नाव में सवार हैं। हमारी आत्मिक असफलता का मूल कारण परमेश्वर के विरुद्ध हमारा विद्रोह है; और इसका मूल कारण हमारे वे हृदय हैं जो परमेश्वर के पवित्र मानकों के अनुरूप जीवन जीने के लिए न तो इच्छुक हैं और न ही योग्य हैं। यदि आपने कभी सोचा है कि बाइबल में असफलता के विषय में क्या कहा गया है, तो इसका उत्तर यह है: कि पवित्रशास्त्र यह दिखाता है कि असफलता सब मनुष्यों में पाई जाती है, यह पाप से जुड़ी हुई है, और हम अपनी सामर्थ्य से इसे स्वयं ठीक करने में योग्य नहीं हैं।
परमेश्वर का धन्यवाद हो कि उसने हमारी असफलता और उसके परिणामों का समाधान कर दिया है। यीशु ने वहाँ सफलता पाई जहाँ हम सभी असफल हो जाते हैं—उसने हमेशा परमेश्वर से वैसे ही प्रेम किया जैसे हमें करना चाहिए था। उसने हमारे पापों का मूल्य चुकाने के लिए क्रूस पर प्राण दिए और फिर जी उठा। वह हमें अपनी सिद्ध आज्ञापालन का पूर्ण लेखा हमारी अनाज्ञाकारिता के बदले देने के लिए प्रस्तुत करता है, अर्थात् जब हम अपने पापों से मन फिराते हैं और उद्धार के लिए केवल उसी पर भरोसा करते हैं।
धर्मी ठहराया जाना ऐसा शुभ समाचार है कि, यद्यपि हम अब भी असफल होते हैं, फिर भी परमेश्वर हमें उसके सामने धर्मी ठहराया जाता है। पवित्रीकरण यह शुभ समाचार है कि, यद्यपि हम अनेक प्रकार से अब भी असफल होते हैं, फिर भी पवित्र आत्मा की सामर्थ्य से हम परमेश्वर की आज्ञाओं का पालन करने की अपनी योग्यता में बढ़ सकते हैं। वह हमें वह सब कुछ देता है जिसकी हमें आवश्यकता होती है, ताकि जब हम असफल हों या गिर जाएँ, तब भी फिर से उठते रहें। यहीं पर असफलताओं से सीखना वास्तव में मसीही जीवन का हिस्सा बन जाता है—यह कोई आत्मविश्वास बढ़ाने की युक्ति या स्वयं की सहायता का नारा नहीं है, वरन् यह पवित्र आत्मा की अगुवाई में धीरे-धीरे ऐसा बनने की प्रक्रिया है जिसमें ठोकर खाते हुए भी हम अधिकाधिक यीशु के समान बनते चले जाते हैं।
जब हम इस मार्गदर्शिका के अन्त पर पहुँचते हैं, तो यह जान लीजिए कि आपकी असफलता की भी एक समाप्ति-तिथि है। धर्मी ठहराया जाना हमें हमारी आत्मिक असफलता के दण्ड से स्वतंत्र करता है, पवित्रीकरण हमें हमारी आत्मिक असफलता की शक्ति से स्वतंत्र करता है, और महिमाकरण अंततः हमें हमारी आत्मिक असफलता की उपस्थिति से पूर्ण रूप से स्वतंत्र कर देगा। एक दिन, चाहे हम मृत्यु के द्वारा प्रभु के पास जाएँ या वह लौटकर हमें उस नए आकाश और नई पृथ्वी में ले जाए जिसे वह हमारे लिए तैयार कर रहा है, तब पाप फिर न रहेगा, और हम इस पतित संसार की अनिश्चितताओं और दुष्प्रभावों के अधीन नहीं छोड़े जाएँगे। असफलता के भय पर विजय पाने का यही वास्तविक आधार है: अपने कार्य के प्रदर्शन पर भरोसा न करें, परन्तु उस परमेश्वर पर भरोसा करें जिसने पहले से ही आपके भविष्य को सुनिश्चित कर दिया है।
2 कुरिन्थियों 3:18 में पौलुस कहता है, “परन्तु जब हम सब के उघाड़े चेहरे से प्रभु का प्रताप इस प्रकार प्रगट होता है, जिस प्रकार दर्पण में, तो प्रभु के द्वारा जो आत्मा है, हम उसी तेजस्वी रूप में अंश-अंश कर के बदलते जाते हैं।” जब हम सुसमाचार में यीशु की महिमा को निहारते हैं, तब हम और अधिक मसीह के स्वरूप में बदलते चले जाते हैं—पवित्रीकरण का स्रोत यीशु को और अधिक जानना और देखना है!
फिर, 1 यूहन्ना 3:2 में हम यह पढ़ते हैं: “हे प्रियों, अब हम परमेश्वर की सन्तान हैं, और अब तक यह प्रगट नहीं हुआ, कि हम क्या कुछ होंगे! इतना जानते हैं, कि जब यीशु मसीह प्रगट होगा तो हम भी उसके समान होंगे, क्योंकि हम उसको वैसा ही देखेंगे जैसा वह है।” यदि आप यीशु के हैं, तो चाहे आपने इस जीवन में उसे कितना ही निराश क्यों न किया हो, फिर भी आप उसे आमने-सामने देखेंगे, और तब उसके स्वरूप में आपका परिवर्तन पूर्ण हो जाएगा। हम परमेश्वर के अनन्त प्रकोप के योग्य थे, परन्तु उसके स्थान पर अब हम परमेश्वर के सिंहासन के चारों ओर अनन्त आनन्द की आशा कर सकते हैं—अर्थात् ऐसे क्षमा किए गए असफल लोग, जो फिर कभी असफल नहीं होंगे।
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चिन्तन के लिए प्रश्न:
- क्या आप धर्मी ठहराए जाने, महिमाकरण, और पवित्रीकरण के बीच का अन्तर बता सकते हैं?
यह आपको या आपके किसी मित्र को आत्मिक असफलता से निपटने में कैसे सहायता कर सकता है? - नए आकाश और नई पृथ्वी में आप किस बात का आनन्द सबसे अधिक लेने की आशा करते हैं?
- इस मार्गदर्शिका में आपने जो कुछ पढ़ा है, उसके प्रकाशन में आप अभी से अन्तिम दिन के लिए अपने आप को कैसे तैयार कर सकते हैं?
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कोल्टन कॉर्टेस रिचमंड, वर्जीनिया स्थित रिवर सिटी बैपटिस्ट चर्च में वरिष्ठ सहायक पास्टर के रूप में सेवकाई करते हैं। उनकी पत्नी का नाम लिंडसी है, और उनके पाँच बच्चे हैं: जॉन, कोनराड, थॉमस, मेरी केट, और जूलिया।
विषयसूची
- भाग II: असफलताओं की लम्बी कतार में खड़ा होना
- असफलताओं की लम्बी कतार
- सूर्य के नीचे कुछ भी नया नहीं (इसमें असफलता भी सम्मिलित है)
- चिन्तन के लिए प्रश्न:
- भाग III: आपने जितना सोचा था उससे कहीं बड़ी असफलता
- हम असफल क्यों होते हैं
- हम सफल नहीं होना चाहते
- हम अपनी असफलता पर विजयी नहीं हो सकते
- आत्मिक असफलता के अनेक रूप
- हमारी आत्मिक असफलता पर परमेश्वर की उचित प्रतिक्रिया
- सही निदान, उचित उपचार
- भाग IV: बड़ी असफलताओं के लिए शुभ समाचार
- असफलता की कहानी का मुख्य संदेश
- जंगल में परीक्षा
- मृत्यु तक सफल
- उद्देश्य सफल हुआ
- आत्मिक असफलता को आत्मिक सफलता से बदलना
- चिन्तन के लिए प्रश्न:
- भाग V: असफल, संघर्ष, असफल, संघर्ष
- एक मसीही व्यक्ति असफलता का सामना कैसे करता है
- स्मरण रखें
- अंगीकार
- लड़ाई
- विश्राम
- चिन्तन के लिए प्रश्न:
- निष्कर्ष
- चिन्तन के लिए प्रश्न: