#66 बुद्धिमानी से निवेश करना: परमेश्वर के अनुसार धन का निवेश कैसे करें और उसे कैसे बढ़ाएँ

By Dr. Richard Perhai, Dr. Larry Oats

परिचय

मुझे स्मरण है कि कई वर्ष पहले मैं एक पुराने घर के प्रवेश-मार्ग में खड़ा होकर अपनी कलीसिया के एक व्यक्ति से बात कर रहा था। उसने दशकों तक उसी कारखाने में काम किया था। वह सदैव वही जूते पहनता और अपनी नियमित दिनचर्या का पालन करता था। वह न तो दिखावा करने वाला था और न ही उतावलेपन से काम लेने वाला था। उसने वही सब किया था जो हमें सिखाया गया है, जैसे परिश्रम करना, बचत करना और सावधानी से जीवन जीना। परन्तु इतना सब करने के बाद भी वह भयभीत रहता था। यह उसके खड़े होने के ढँग और सामने देखने के स्थान पर नीचे दृष्टि करने से स्पष्ट दिखाई देता था। उसके भीतर एक मौन चिन्ता थी, जो उसके वर्षों के स्थिर कार्य के इतिहास से मेल नहीं खाती थी। रात के समय उसका हृदय तेज़ी से धड़कने लगता था, क्योंकि उसे यह चिन्ता सताती रहती थी कि यदि बाज़ार में एक भी बड़ा प्रतिकूल परिवर्तन आ जाए, तो वर्षों का उसका अनुशासित परिश्रम मिट सकता है। यद्यपि वह बाइबल के परिश्रम सम्बन्धी सिद्धांतों का पालन करता था, फिर भी इस संघर्ष में था कि आर्थिक चिन्ता पर बाइबल के अनुसार कैसे विजय प्राप्त की जाए।

बहुत से लोग इस प्रकार के तनाव को जानते हैं। यह तब भी प्रकट हो सकता है जब आपकी आर्थिक स्थिति अच्छी दिखाई देती हो, और कभी-कभी तो उसी समय यह और भी अधिक बढ़ जाता है। हमारा संसार निरन्तर यह सिखाता रहता है कि धन ही सब कुछ है, और वही यह निर्धारित करता है कि हम कितने सुरक्षित हैं या हमारा कितना मूल्य है। जब संसार का यह दबाव हमारे विश्वास के विपरीत खड़ा होता है, तब हम प्रायः सोचते हैं कि धन के विषय में बाइबल क्या कहती है। फिर कलीसिया में हम धन के विषय में ऐसी चेतावनियाँ सुनते हैं, जो सहायता से अधिक न्याय सुनाने जैसी प्रतीत होती हैं।

इन सबके बीच बहुत से लोग भ्रमित हो जाते हैं। जब उनके पास धन होता है, तो वे दोषी होना अनुभव करने लगते हैं, और जब धन नहीं होता, तो भयभीत हो जाते हैं। जिन अधिकाँश मसीहियों को मैं जानता हूँ, वे यह नहीं समझ पाते कि इस दबाव का सामना कैसे करें या बाइबल के अनुसार कितना पर्याप्त है। वे उत्तरदायित्व निभाने और परमेश्वर के प्रति विश्वासयोग्य बने रहने के बीच स्वयं को फँसा हुआ पाते हैं। वे यह भी सोचते हैं कि क्या ये दोनों बातें साथ-साथ चल सकती हैं, या बचत करने और धन का संचय करने में कोई स्पष्ट भेद है। बहुत से विश्वासी इन प्रश्नों के स्पष्ट उत्तर पाने के लिए बाइबल से आर्थिक मार्गदर्शन खोजते हैं, ताकि वे परमेश्वर के दिए हुए धन के अच्छे भण्डारी बनते हुए आर्थिक अनिश्चितताओं के बीच भी शान्ति प्राप्त कर सकें।

जब बात स्पष्ट हुई

मैंने भी अपने जीवन में वही गाँठ अपने हृदय में अनुभव की है। सचमुच, मैंने की है। एक समय ऐसा था जब कलीसिया का बजट बहुत सीमित था और उसी समय मेरी गाड़ी से एक अजीब सी आवाज़ आने लगी। आप समझते हैं न, वैसी आवाज जिसे सुनकर तुरन्त मन में यह विचार आता है कि इसे ठीक कराने का खर्च उठाना अभी आपके लिए सम्भव नहीं है। मुझे स्मरण है, कि मैं अपने बगीचे में खड़ा होकर छोटी सी बीज की एक पुड़िया को देख रहा था और सोच रहा था कि वास्तव में एक अकेला बीज कितना छोटा होता है।

मेरा आशय यह है कि आप उस बीज को उसी समय खा सकते हैं। उस क्षण के लिए समस्या का समाधान हो जाएगा। अथवा आप उसे भूमि में भी बो सकते हैं। वह मिट्टी में ओझल हो जाएगा, और फिर आपको प्रतीक्षा करनी होगी। उसी समय मेरे लिए यह बात स्पष्ट हुई कि धन भी कुछ उसी बीज के समान है। वह कोई ऐसा देवता नहीं है जिसकी उपासना की जाए, और न ही वह ऐसा विष है जिससे भयभीत रहा जाए। वह तो केवल एक साधन है। वह परमेश्वर की ओर से सौंपा गया एक उत्तरदायित्व है। उसका उपयोग तत्काल भी किया जा सकता है, या विचारपूर्वक भविष्य के लिए बोया भी जा सकता है। जब हम अनन्तकाल की दृष्टि से निवेश करना आरम्भ करते हैं, तब सब कुछ बदल जाता है। यह इस बात पर निर्भर करता है कि भविष्य के विषय में और अर्थव्यवस्था पर परमेश्वर के प्रभुत्व के विषय में हमारा विश्वास वास्तव में क्या है। जब हम धन के विषय में बाइबल के इन सिद्धान्तों को समझते हैं, तब हमें ज्ञात होता है कि हम केवल उन्हीं बातों में निवेश कर रहे हैं जो इस संसार के नष्ट हो जाने पर भी बनी रहेंगी, और साथ ही अपने भविष्य के लिए की गई बचत भी परमेश्वर को सौंपते हैं।

भण्डारीपन बनाम स्वामित्व

कलीसिया बहुत लम्बे समय से इस विषय का सामना करती हुई आ रही है। यह केवल आज की समस्या नहीं है। कई शताब्दियों पहले धर्म-सुधारकों ने भी व्यापारियों और शिल्पकारों की “बुलाहट” के विषय में खुलकर कहा। उनका विश्वास था कि व्यापार यदि उचित रीति से किया जाए, तो यह अपने पड़ोसी से प्रेम करने का एक वास्तविक उपाय हो सकता है। उनके लिए धन की वृद्धि हर बार लोभ का विषय नहीं था। वह वृद्धि नए काम के अवसर उत्पन्न कर सकती थी, वास्तविक आवश्यकताओं को पूरा कर सकती थी, और सुसमाचार के कार्य में सहायता कर सकती थी। उनके लिए यह विश्वासयोग्यता से साधनों का प्रबन्ध करने और स्वामी के लौटने की प्रतीक्षा करने का विषय था।

परन्तु वे जोखिमों के विषय में भी बहुत स्पष्ट थे। वास्तविक भण्डारीपन और केवल संचय करते रहने में बड़ा अन्तर होता है। “भण्डारीपन” एक शक्तिशाली शब्द है। उसका अर्थ है कि वास्तविक स्वामित्व किसी और का है। हम कहते हैं कि एक हजार पहाड़ों पर पशु परमेश्वर के हैं। पृथ्वी की गहराइयों में छिपा हुआ सोना भी उसका है। और चाहे हम इसे स्वीकार करें या न करें, इस समय हमारे बैंक खातों में जो धन रखा है, वह भी उसी का है।

समस्या यह है कि हममें से अधिकाँश लोग वास्तव में इस प्रकार से नहीं जीते हैं। हम तो मानो स्वामी के समान जीते हैं। और केवल स्वामी? वे सदा चिन्तित रहते हैं। स्वामी को परिणामों का सारा भारी बोझ उठाना पड़ता है। परन्तु भण्डारी को ऐसा नहीं करना पड़ता हैं। भण्डारी का उत्तरदायित्व केवल विश्वासयोग्य बने रहने का है, अन्तिम परिणामों का नहीं। सच तो यह है कि यही एक अन्तर बदल देता है कि रात को आप कितनी शान्ति से सोते हैं।

यह मार्गदर्शिका उस अन्तर को मिटाने के विषय में है जो हमारे कहे हुए विश्वास और अपने धन के प्रबन्ध के बीच है। और नहीं, यहाँ कोई सरल उपाय नहीं है। मैं ऐसे कोई प्रतिज्ञा के वचन नहीं बोल रहा हूँ, जिन्हें बाइबल कभी नहीं कहती। आत्मिक बुद्धि का रूप देकर प्रस्तुत की जाने वाली शीघ्र धनी बनने की योजनाओं के लिए पवित्रशास्त्र में कोई स्थान नहीं है। इसके स्थान पर वह जो प्रदान करता है, वह है—दृढ़ता, धैर्य, और ऐसे संसार में निरन्तर तथा स्थिर आज्ञाकारिता जो अब भी टूटी हुई है।

एक नई मनोवृत्ति

परमेश्वर की रीति के अनुसार धन की वृद्धि प्रायः वैसी तीव्रता से नहीं होती जैसे अधिकाँश लोग अपेक्षा करते हैं। इसका अर्थ है, उस समय भी सत्य के अनुसार चलने का चुनाव करना, जब असत्य का मार्ग अधिक लाभ पहुँचा सकता है। यह देने के विषय में है उस समय भी जब बचाकर रखना अधिक सुरक्षित प्रतीत होता है। हमें स्वीकार करना होगा कि जैसे वास्तविक खेत, वैसे ही बाज़ार भी उत्पत्ति 3 में दिए गए उसी श्राप के प्रभाव में हैं। जहाँ काँटे उगते हैं। फसलें नष्ट हो जाती हैं। उसी प्रकार निवेश खातों को भी ऐसे ही संघर्षों का सामना करना पड़ सकता है।

यह मार्गदर्शिका आपको धनी बनाने की कोई योजना नहीं है। इसका उद्देश्य केवल इतना है कि आप अन्ततः चैन की साँस ले सकें। यह आपको अपनी मुट्ठियाँ इतनी कसकर भिंचकर रखने की प्रवृत्ति छोड़ने में सहायता करने के लिए है। यह इस बात को सीखने के विषय में है कि वास्तव में “अपने” संसाधनों को खुले हाथों से थामने का क्या अर्थ है।

मैं व्यक्तिगत रूप से ऐसे लोगों को जानता हूँ जिनके पास उनकी आवश्यकता से कहीं अधिक बढ़कर धन था, फिर भी वे अत्यन्त अशान्त और चिन्ताग्रस्त जीवन जीते थे। और मैं ऐसी विधवाओं को भी जानता हूँ जिनके पास लगभग कुछ भी नहीं था, फिर भी वे उदारता के साथ देती थीं और निश्चिन्त होकर सो जाती थीं। अन्तर धन की मात्रा में कभी नहीं था। अन्तर स्वामित्व की समझ में था। वे भली-भाँति जानती थीं कि वह धन वास्तव में किसका है।

इस यात्रा में हम “कटनी के ईश्वर विज्ञान” पर विचार करेंगे। हम उन मूर्तियों की भी पहचान करेंगे जो प्रायः सबसे सम्मानजनक निवेशों के भीतर भी छिपी रहती हैं। और हाँ, हम इस विषय पर भी व्यावहारिक रूप से विचार करेंगे कि किस प्रकार निवेश किया जाए ताकि अन्ततः भीतर से खोखले न हो जाएँ।

यह यात्रा सरल या सुव्यवस्थित नहीं होगी। मैं अभी से आपको बता देता हूँ कि सम्भव है, इस दौरान आपको ऐसे अनेक क्षेत्र दिखाई देंगे जहाँ भय या लोभ ने आपकी अपेक्षा कहीं अधिक समय तक आपके जीवन का संचालन किया है। परन्तु सुनिए—यह असफलता नहीं है। यह तो केवल ईमानदारी है। वास्तविक विश्वास का मार्ग शायद ही कभी पूरी रीति से व्यवस्थित होता है, है न? परन्तु इस कार्य के लिए अनुग्रह उपलब्ध है। और इसके उस पार एक वास्तविक, गहरी शान्ति आपकी प्रतीक्षा कर रही है। आइए, यहीं से आरम्भ करते हैं।

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