#68 विश्वासघात से उबरना: जब लोग आपको असफल कर दें तब परमेश्वर पर भरोसा रखना
परिचय
मार्क ने 20 से अधिक वर्षों तक अपनी कंपनी के लिए अपना सब कुछ दे दिया, जिसमें उसकी पत्नी और बच्चों से दूर रहकर बिताई गई कई रातें और सप्ताह भी सम्मिलित थे। एक शुक्रवार की दोपहर में मार्क का अधिकारी उसके कार्यालय में आया और उसे बताया कि खर्चे कम करने के उनके उपायों के कारण उसको तत्काल प्रभाव से उसके पद से हटाया जा रहा है।
सारा अपने पास्टर से प्रेम और आदर करती थी। जब वह छोटी बच्ची थी तभी से वही उस कलीसिया की अगुवाई कर रहे थे जहाँ सारा जाती थी, और हाल ही में उन्होंने उसे बपतिस्मा भी दिया था। पिछले रविवार को कलीसिया के एक प्राचीन ने मण्डली के सामने खड़े होकर घोषणा की कि नैतिक पतन के कारण पास्टर ने अपना इस्तीफा दे दिया है और अब वह कलीसिया की सेवा नहीं करेंगे।
रायन अपनी पत्नी और अपने तीन बच्चों से प्रेम करता था। उसके मित्र अक्सर उससे कहा करते थे कि वे चाहते हैं कि उनका पारिवारिक जीवन भी उतना ही सुखी हो जितना उसका दिखाई देता है। कल, रायन की पत्नी ने स्वीकार किया कि पिछले नौ महीनों से उसका अपने एक सहकर्मी के साथ अनैतिक सम्बन्ध चल रहा था।
क्रिस्टीन के पास मानो सब कुछ था—एक उत्तम कार्यक्षेत्र, परिवार और मित्रों का बड़ा समूह, और एक उत्तम कलीसियाई संगति। बाहरी रूप से वह प्रसन्न और संतुष्ट दिखाई देती थी, परन्तु भीतर ही भीतर वह अपने माता-पिता के प्रति गहरी कड़वाहट रखती थी, क्योंकि वह कभी भी उनके मानकों पर खरी उतरती हुई प्रतीत नहीं हुई।
हो सकता है कि आपको मार्क, सारा, रायन, या क्रिस्टीन के समान उसी प्रकार से ठेस न पहुँची हो। लेकिन मेरा विश्वास है कि आपको कभी न कभी ठेस पहुँची होगी। मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि पतित लोगों से भरे इस पतित संसार में ठेस पहुँचाना जीवन का एक भाग है। यदि आप यीशु मसीह के अनुयायी हैं, तो आप जानते होंगे कि आपको हर समय परमेश्वर पर भरोसा करने के लिए बुलाया गया है। परन्तु जब आपको ठेस पहुँची हो, तब आप परमेश्वर पर कैसे भरोसा करेंगे? धोखा मिलने के बाद फिर से भरोसा करना सीखने की यह प्रक्रिया, लोगों द्वारा ठेस पहुँचाए जाने के बाद परमेश्वर पर भरोसा करने के तरीके को समझने से शुरू होती है।
पवित्रशास्त्र में ऐसे बहुत से उदाहरण मिलते हैं जिनमें लोगों को बहुत अधिक ठेस पहुँची है। केवल यीशु मसीह को छोड़ दें, तो सम्भवतः भविष्यद्वक्ता यिर्मयाह से अधिक बार या अधिक गहराई से किसी और को ठेस नहीं पहुँची। उसने अपने आप को वध होने के लिए ले जाने वाले अनजान मेम्ने के समान बताया (यिर्म. 11:19)। उसका जीवन लगभग निरन्तर दुःख से ही भरा हुआ था:
- उसे एक साथी धार्मिक अगुवे के द्वारा मारा-पीटा गया और काठ में डाल दिया गया
(यिर्म. 20:2)। यह उनकी कहानी में धोखे के बारे में बाइबल के कई दर्दनाक वचनों
में से एक है। - उसे गिरफ़्तार किया गया और जान से मारने की धमकी दी गई (यिर्म. 26:8-11)।
- उस पर झूठा आरोप लगाया गया कि वह शत्रु से जा मिला है, और उसे बंदीगृह में डाल दिया गया, जहाँ उसे लम्बे समय तक रखा गया (यिर्म. 37:14-16)।
- उस पर देशद्रोही होने का झूठा आरोप लगाया गया, उसे मल्कीय्याह के हौज़ में डाल दिया गया, और वहीं मरने के लिए छोड़ दिया गया (यिर्म. 38:1-6)। उनके दुःख में, हम एक स्पष्ट चित्र देखते हैं कि बाइबल धोखे के बारे में क्या कहती है।
मानो यह सब पर्याप्त न हो, यिर्मयाह का कोई परिवार भी नहीं था, जिसके साथ वह अपने दुःख को बाँट सके और अपनी अनेक परीक्षाओं के समय सांत्वना पा सके। एक समय ऐसा भी आया जब यिर्मयाह इतना अधिक दुःखी हुआ कि उसने परमेश्वर से पुकारकर कहा कि भला होता कि वह अपनी माता के गर्भ में ही मर गया होता (यिर्म. 20:13-18)। फिर भी, किसी रीति से यिर्मयाह ने अपने जीवन के अन्तिम समय तक परमेश्वर पर भरोसा बनाए रखा।
उसने ऐसा कैसे किया? कोई भी व्यक्ति ऐसा कैसे कर सकता है?
बहुत से लोग अपनी पीड़ा को स्वीकार करने से मना कर देते हैं, और ऐसा करने के बजाय अपनी भावनाओं को दबा देते हैं। वे कड़वे स्वभाव के हो जाते हैं, उनके साथ जो कुछ भी हुआ उसी के बारे में सोचते रहते हैं, और स्वयं को पीड़ित मानने वाली मानसिकता अपना लेते हैं। वे उन लोगों के साथ मेल-मिलाप करने का प्रयास नहीं करते जिन्होंने उन्हें ठेस पहुँचाई होती है, वरन् वे उनके पापों और असफलताओं को उनके विरुद्ध पकड़े रहते हैं। वे स्वयं को अच्छे सम्बन्धों से दूर कर लेते हैं, ताकि उन्हें दोबारा ठेस न पहुँचे।
आप भी ऐसा ही करना चुन कर सकते हैं। इस संसार में जीवन की समस्याओं के कई समाधानों के समान, यह भी आपको सबसे सुरक्षित और सबसे अच्छा चुनाव लग सकता है। कम समय के लिए यह अच्छा लग सकता है और कुछ हद तक ठीक भी प्रतीत हो सकता है। परन्तु दीर्घकाल में, अज्ञानता के मार्ग पर चलकर आप न तो प्रसन्न, न स्वस्थ, और न ही पवित्र बने रह सकते हैं, क्योंकि यह वह विश्वास का मार्ग नहीं है जो आशीष की ओर ले जाता है।
तो जब आपको ठेस पहुँची हो, तब आप परमेश्वर पर कैसे भरोसा कर सकते हैं? इस जीवन-कौशल मार्गदर्शिका में हम विश्वास पर आधारित चार सिद्धान्तों पर चर्चा करेंगे
- अपनी ठेस को स्वीकार करें
- कडवाहट से संघर्ष
- मेल-मिलाप का प्रयास करें
- फिर से प्रेम करने का चुनाव करें
इस पुस्तक का प्रत्येक भाग इन चार सिद्धान्तों में से किसी एक पर चर्चा करेगा और अन्त में ऐसे प्रश्न होंगे जिनका उपयोग मार्गदर्शन के सम्बन्ध में किए जा सकते हैं। जब आपको ठेस पँहुचती है, तब परमेश्वर पर भरोसा करना एक कठिन काम होता है। परन्तु परमेश्वर के अनुग्रह से यह एक ऐसा चुनाव है जिसे आप कर सकते हैं, और यह ऐसा चुनाव है जो आपको कडवाहट और अकेलेपन से स्वतंत्र कर देगा। आइए, आरम्भ करें।
ऑडियो मार्गदर्शिका
ऑडियो#68 विश्वासघात से उबरना: जब लोग आपको असफल कर दें तब परमेश्वर पर भरोसा रखना
भाग I: अपनी ठेस को स्वीकार करें
सम्भवतः आप बाइबल में दाऊद से परिचित होंगे। यदि आप कलीसिया में नहीं भी बड़े हुए हैं, तब भी दाऊद के द्वारा गोलियत को मारने की कहानी संसार की सबसे प्रसिद्ध कहानियों में से एक है। पर क्या आप जानते हैं कि दाऊद ने अपने जीवन में बहुत ठेस और पीड़ा का अनुभव किया था? शाऊल (उसका ससुर) ने वर्षों तक उसे ढूँढकर मार डालने का प्रयास किया था। दाऊद की पहली पत्नी मीकल ने परमेश्वर की आराधना करने के लिए उसका उपहास किया। और सम्भतः सबसे कठिन बात यह थी कि उसके अपने पुत्र अबशालोम ने उसके विरुद्ध विश्वासघाती विद्रोह का नेतृत्व किया।
उस कठिन समय में दाऊद ने प्रार्थना में परमेश्वर को पुकारा। उसने भजन संहिता 3:1-2 में लिखा: “हे यहोवा मेरे सतानेवाले कितने बढ़ गए हैं! वे जो मेरे विरुद्ध उठते हैं बहुत हैं। बहुत से मेरे विषय में कहते हैं, कि उसका बचाव परमेश्वर की ओर से नहीं हो सकता।”
दाऊद को ठेस पहुँची थी। उसी के समान आपको भी ठेस पहुँची होगी। हो सकता है कि आपको किसी अपरिचित व्यक्ति ने ठेस पहुँचाई हो, या किसी बहुत ही निकट के व्यक्ति ने। यह ठेस हाल ही में पहँची हो, या फिर कई वर्ष पहले पहुंची हो। आपको ऐसा महसूस हो सकता है (या किसी ने आपको ऐसा बताया हो) कि आपके साथ जो हुआ वह कोई बड़ी बात नहीं थी। या हो सकता है कि आप यह भी जानते हों कि वह वास्तव में एक बहुत बड़ी बात थी।
सच्चाई चाहे जो भी हो, परन्तु आपको ठेस पहुँची है, और आप इस कठिन समय में भी परमेश्वर पर भरोसा करना चाहते हैं। लेकिन आप उलझन और दुविधा महसूस कर रहे हैं। हो सकता है कि आपके मन में कुछ ऐसे विचार आए हों…
— मैं तिल का ताड़ बना रहा हूँ; मुझे बस इस बात को भूल जाना चाहिए।
— यदि मेरा विश्वास और अधिक होता, तो मुझे ऐसा महसूस नहीं होता।
— उनका मुझे ठेस पहुँचाने की कोई मंशा नहीं थी। आखिर, मैंने भी तो पहले लोगों को ठेस पहुँचायी है।
— जब मुझे बचपन में चोट लगती थी, तो मेरे माता-पिता मुझसे कहते थे कि, “तुम ठीक हो, इसे अनदेखा कर दो।”
— क्या बाइबल यह नहीं कहती कि मुझे क्षमा कर देना चाहिए और भूल जाना चाहिए?
इन कथनों के सत्य होने और यह देखने से पहले कि क्या वे आपकी विशेष परिस्थितियों पर लागू होते हैं, आपको पहले एक और काम करना होगा। आपको यह स्वीकार करना होगा कि आपको ठेस पहुँची है।
अपनी ठेस को स्वीकार करें
यह सुनने में कितना सरल लगता है, है ना? अपने आप से यह कहना कि, “इस व्यक्ति ने मेरे साथ यह किया या मुझसे यह कहा, और इससे मुझे ठेस पहुँची है।” लेकिन बहुत से लोगों के लिए यह स्वीकार करना कि उन्हें ठेस पहुँची है, सबसे कठिन काम लगता है। ऐसा क्यों होता है?
कुछ लोगों के लिए यह स्वीकार करना कि उन्हें ठेस पहुँची है, विश्वास की कमी जैसा प्रतीत होता है। वे यह तर्क दे सकते हैं कि परमेश्वर भला है (उत.18:25) और सब बातें मिलकर भलाई ही को उन्पन्न करती हैं (रो. 8:28)। चूँकि ये बातें सत्य हैं, इसलिए यह स्वीकार करना कि किसी ने उन्हें ठेस पहुँचाई है, उन्हें ऐसा महसूस हो सकता है मानो वे परमेश्वर की भलाई या उनके जीवन में उसके उत्तम उद्देश्यों पर प्रश्न उठा रहे हों।
दूसरों के लिए, यह घमण्ड का विषय होता है। वे स्वयं को दृढ़, अडिग, और दूसरों के शब्दों तथा कार्यों से नकारात्मक रूप से प्रभावित न होने वाला दिखावा करना चाहते हैं। उन्हें यह विचार पसन्द नहीं आता कि दूसरों का उनके विचारों और भावनाओं पर कोई प्रभाव हो; उन्हें लगता है कि इससे उनकी स्वतंत्रता और अपनी इच्छा से कार्य करने की योग्यता कम हो जाती है। इसलिए, जब दूसरे लोग उनसे पूछते हैं कि क्या उन्हें ठेस पहुँची है—यहाँ तक कि जब वही व्यक्ति पूछता है जिसने उन्हें ठेस पहुँचाई है—तब भी वे उस सत्य का इन्कार कर देते हैं जिसे वे भीतर से जानते हैं।
और कुछ लोगों को तो बाइबल से यह सिखाया ही नहीं गया है कि वे अपनी पीड़ा से कैसे निपटें। बचपन से ही, कई बड़े-बुजुर्ग लोगों ने बच्चों को यह सिखाया होता है कि वे अपनी पीड़ा को अनदेखा कर दें। किसी झगड़े के बाद, कई माता-पिता एक बच्चे को दूसरे के पास ले जाकर, गलती करने वाले बच्चे से कहते हैं कि, “तुमने जो किया है उसके लिए क्षमा माँगो।” फिर जब वह बच्चा क्षमा माँग लेता है, तो माता-पिता उन नाराज़ भाई-बहन से कहते हैं कि, “अब तुम कहो कि, ‘कोई बात नहीं। मैंने तुम्हें क्षमा कर दिया है।”
ये केवल कुछ कारण हैं जिसके कारण यह स्वीकार करना कठिन हो सकता है कि आपको ठेस पहुँची है। परन्तु यह स्वीकार करना अत्यन्त आवश्यक है, क्योंकि जिस बात के अस्तित्व को ही आप मानने से इन्कार कर देते हैं, उसे आप परमेश्वर को सौंपकर उस पर भरोसा नहीं कर सकते। भजन संहिता 6:6-7 में दाऊद हमारे लिए अपनी पीड़ा को स्वीकार करने का एक उदाहरण प्रस्तुत करता है:
मैं कराहते-कराहते थक गया;
मैं अपनी खाट आँसुओं से भिगोता हूँ;
प्रति रात मेरा बिछौना भीगता है।
मेरी आँखें शोक से बैठी जाती हैं,
और मेरे सब सतानेवालों के कारण वे धुँधला गई हैं।
दाऊद ने अपनी पीड़ा को स्वीकार करने को, परमेश्वर पर भरोसा न करने को असफलता नहीं माना। उसने घमण्ड में आकर यह दिखावा नहीं किया कि उसे कोई ठेस नहीं पहुँची है। और न ही उसने अपनी पीड़ा को खोखली बातों से छिपाया, न तो स्वयं से और न ही दूसरों से यह कहकर कि यह कोई बड़ी बात नहीं है।
इसके बजाय, दाऊद ने अपनी पीड़ा को स्वीकार किया। उसके विरोधियों ने उसके साथ जो कुछ किया था, उसके कारण वह प्रति रात रोते-रोते थक कर सो जाया करता था। उसने बैठकर ठीक-ठीक लिख डाला कि वह क्या अनुभव कर रहा था और वह ऐसा अनुभव क्यों कर रहा है।
आप भी ऐसा करने के विषय में विचार कर सकते हैं। चाहे आप सामान्यतः अपने विचारों और भावनाओं को लिखते न हों, फिर भी अपनी पीड़ा को स्वीकार करने का यह अक्सर सबसे अच्छा तरीका होता है। लिखना आपको स्पष्ट होने के लिए बाध्य करता है, ताकि आप गहराई में जाकर यह देख सकें कि किस बात ने आपको ठेस पहुँचाई है और क्यों पहुँचाई है।
अपनी पीड़ा को परमेश्वर के सामने स्वीकार करें
जब आप यह स्वीकार करते हैं कि आपको ठेस पहुँची है, तब आपको अपनी पीड़ा को परमेश्वर के सामने स्वीकार करना चाहिए। आप अपने मन में सोच सकते हैं, कि “परमेश्वर तो सब कुछ जानता है, इसलिए वह पहले से ही जानता है कि मैं दुःखी हूँ। फिर मुझे उसे यह बात बताने की क्या आवश्यकता है, जिसे वह पहले से ही जानता है?”
इसे इस प्रकार से समझिए—अच्छे सांसारिक पिता हमारे सिद्ध स्वर्गीय पिता का चित्र होते हैं। कई बार अच्छे पिता पहले से ही जान जाते हैं कि उनके बच्चे पीड़ा में हैं। वे इसे उनके चेहरों पर देख सकते हैं, उनकी बातों में सुन सकते हैं, और उनके शारीरिक हाव-भाव से समझ लेते हैं।
परन्तु अच्छे सांसारिक पिता चाहते हैं कि जब उनके बच्चे पीड़ा में हों, तब वे आकर उनसे बात करें, क्योंकि वे अपने बच्चों की चिन्ता करते हैं, क्योंकि वे समझते हैं कि पीड़ा सहना कैसा होता है, और वे सहायता कर सकते हैं। आपका स्वर्गीय पिता भी ऐसा ही है—केवल अन्तर इतना है कि वह
सिद्ध है।
पहला, आपका स्वर्गीय पिता आपकी चिन्ता करता है। प्रेरित पतरस हमें यह निर्देश देता है कि हम अपनी सारी चिन्ताएँ परमेश्वर पर डाल दें, “क्योंकि उसको तुम्हारा ध्यान है” (1 पत. 5:7)। यदि कोई बच्चा यह विश्वास न करे कि उसका पिता उसकी चिन्ता करता है, तो वह अपनी पीड़ा उसके साथ साझा नहीं करेगा। एक लापरवाह पिता किसी पीड़ित बच्चे को अनदेखा कर सकता है, या इससे भी बुरा यह कि वह उस दुःखी बच्चे का मज़ाक उड़ाए, जिससे उसका दुःख और अधिक बढ़ जाता है। लेकिन आपका स्वर्गीय पिता सिद्ध है। जब आप दुःखी होते हैं, तो वह आपको अनदेखा नहीं करता है और न ही आपका मज़ाक उड़ाता है, क्योंकि उसे आपकी चिन्ता है।
दूसरा, आपका स्वर्गीय पिता आपकी पीड़ा को समझता है। परमेश्वर आपकी पीड़ा को किसी भी अन्य व्यक्ति से अधिक भली-भाँति समझता है—यहाँ तक कि आपसे भी अधिक, क्योंकि वह सब कुछ जानता है। और परमेश्वर का सर्वज्ञानी होना ही एकमात्र कारण नहीं है कि वह आपकी पीड़ा को समझ सकता है। परन्तु वह आपकी पीड़ा को इसलिए समझता है क्योंकि मसीह में परमेश्वर ने देह धारण की और मानवीय पीड़ा का प्रत्यक्ष अनुभव किया। यीशु के शत्रुओं ने उसे गलत समझा, उसकी निन्दा की, उसका उपहास किया, और उस पर झूठे आरोप लगाए। उसके सभी घनिष्ट मित्र उसे छोड़कर भाग गए। उसके सबसे घनिष्ट मित्रों में से एक ने उसके साथ विश्वासघात किया। आपके परिवार के सदस्यों और मित्रों को भी ठेस पहुँची होगी, और एक सीमा तक वे समझते हैं कि आप किस परिस्थिति से होकर गुजर रहे हैं। परन्तु परमेश्वर आपकी पीड़ा को पूर्ण रीति से समझता है, क्योंकि वह सर्वज्ञानी है और उसने स्वयं प्रत्यक्ष रूप से पीड़ा का अनुभव किया है।
तीसरा, आपका स्वर्गीय पिता सहायता कर सकता है। भजन संहिता 34:17-18 में दाऊद लिखता है,
धर्मी दुहाई देते हैं और यहोवा सुनता है,
और उनको सब विपत्तियों से छुड़ाता है।
यहोवा टूटे मनवालों के समीप रहता है, और पिसे हुओं का उद्धार करता है।
पवित्रशास्त्र में ऐसा कई स्थान हैं जहाँ परमेश्वर उन लोगों की सहायता करने की प्रतिज्ञा करता है जो उसकी दोहाई देते हैं। परमेश्वर सर्वशक्तिमान है। वह सब कुछ कर सकता है, और सब बातों पर उसका ही अधिकार है। जब हम पीड़ा में होते हैं, तब अन्य लोग हमारी सहायता करना तो चाहते हैं, परन्तु वे सब कुछ नहीं कर सकते और न ही सब बातों पर उनका अधिकार होता है। वे हमारी सहायता करने में सीमित होते हैं। परन्तु परमेश्वर सीमित नहीं है। यदि आप उसे पुकारेंगे, तो वह आपकी सहायता कर सकता है और अवश्य करेगा।
इसलिए परमेश्वर के सामने अपनी पीड़ा को स्वीकार करना कैसा दिखाई देता है?
बहुत से लोगों को सामान्य दिनों में भी प्रार्थना में परमेश्वर के सामने अपने मन की बात कहने में कठिनाई होती है, इसलिए जब वे पीड़ा में होते हैं, तब उनके लिए उचित शब्द ढूँढ़ना कठिन या असम्भव हो जाता है। सम्भव है कि अपनी पीड़ा में आपने भी ऐसा अनुभव किया होगा। परन्तु प्रभु का धन्यवाद हो कि जब हम पीड़ा में होते हैं, तब प्रार्थना करने के लिए परमेश्वर ने हमें पहले से ही उत्तम शब्द दे रखे हैं।
भजन संहिता की पुस्तक व्यक्तिगत और सामूहिक आराधना में गीतों, प्रार्थनाओं, या दोनों के रूप में उपयोग किए जाने के लिए लिखी गई थी। इन भजनों में से कई—150 में से 60 से भी अधिक—“विलाप वाले भजन” माने जाते हैं, जिनमें लेखक गहरे शोक, पीड़ा, या क्लेश को व्यक्त करता है। कभी लेखक एक व्यक्ति के रूप में बोलता है, और कभी वह परमेश्वर की प्रजा की ओर से बोलता है।
परन्तु प्रत्येक स्थिति में, विलाप के भजन परमेश्वर की प्रेरणा से दिए गए हैं, ताकि जब हम पीड़ा में हों तब वे भजन हमें शब्द प्रदान करें। उदाहरण के लिए, भजन संहिता 31:11-12 के शब्दों पर ध्यान दीजिए, जिन्हें दाऊद ने उस समय लिखा जब वह अपने शत्रुओं के व्यवहार के कारण पीड़ित था:
अपने सब विरोधियों के कारण मेरे पड़ोसियों
में मेरी नामधराई हुई है,
अपने जान-पहचानवालों के लिये डर का कारण हूँ;
जो मुझ को सड़क पर देखते है वह मुझसे दूर भाग जाते हैं।
मैं मृतक के समान लोगों के मन से बिसर गया;
मैं टूटे बर्तन के समान हो गया हूँ।
जब आप विलाप के भजनों के द्वारा प्रार्थना करते हैं, तो आप केवल परमेश्वर के वचन की ही प्रार्थना नहीं कर रहे होते हैं; वरन् आप उन शब्दों के द्वारा प्रार्थना कर रहे होते हैं जिन्हें परमेश्वर ने विशेष रूप से तब उपयोग किए जाने के लिए प्रेरित किया था, जब आप पीड़ा में हों। आप भजन संहिता 31 के शब्दों के द्वारा, या विलाप के किसी अन्य भजन के द्वारा प्रार्थना कर सकते हैं—जो संभवतः परमेश्वर के सामने आपकी भावनाओं को और भी अच्छे ढँग से व्यक्त कर सकें (भजन संहिता 3, 6, 13, 22, 25, 31, 38, 42-43, 51, 55, 71, 88, 102, और 130 पर विचार करें)।
जब आप पीड़ा में होते हैं, तब परमेश्वर पर भरोसा करने का एक तरीका यह है कि सबसे पहले आप यह स्वीकार करें कि आपको वास्तव में ठेस पहुँची है—पहले अपने सामने, और फिर परमेश्वर के सामने स्वीकार करें। अपनी पीड़ा को स्वीकार करने के बाद, तब आप परमेश्वर पर भरोसा करने के दूसरे चरण की ओर बढ़ सकते हैं, अर्थात् कडवाहट से संघर्ष करना। अगले भाग में हम इसी विषय पर विचार करेंगे।
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चिन्तन के लिए प्रश्न:
- अब तक, क्या आपने अपनी पीड़ा को स्वयं के सामने स्वीकार किया है? या आपने उसे भीतर ही दबाकर रखा है और उसे स्वीकार करने से इनकार किया है?
- क्या आपने अपनी पीड़ा को परमेश्वर के सामने स्वीकार किया है? यदि हाँ, तो वह व्यवहार में कैसा दिखाई दिया? यदि नहीं, तो किस बात ने आपको ऐसा करने से रोके रखा है?
- इस भाग में हमने परमेश्वर के सामने अपनी पीड़ा को स्वीकार करने के नमूने के रूप में भजन संहिता 34 पर विचार किया। जब आप अपनी स्वयं की पीड़ा को परमेश्वर के सामने स्वीकार करते हैं, तब दाऊद का उदाहरण आपको किस प्रकार से प्रोत्साहित कर सकता है?
- इस सप्ताह आप कौन-सा ऐसा एक कार्य कर सकते हैं, जिसके द्वारा आप सीखी हुई बातों को व्यवहार में ला सकते हैं?
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भाग II: कडवाहट से संघर्ष
नाओमी का जीवन बहुत कठिनाइयों से भर हुआ था। अकाल के समय उसके पति ने अपने परिवार को इस्राएल के यहूदा देश से मोआब में ले जाकर बसाया, जो एक विदेशी राष्ट्र था और यहाँ के लोग उनके विश्वास को नहीं मानते थे। वहाँ पहुँचने के कुछ ही समय बाद नाओमी के पति की मृत्यु हो गई। उसके दोनों पुत्रों ने मोआबी स्त्रियों से विवाह किया, और फिर उसके दोनों पुत्र भी मर गए। थोड़े ही समय में नाओमी का पूरा जीवन उलट-पुलट हो गया। वह पीड़ा में थी, और उसने इसे स्वीकार किया। नाओमी ने अपनी बहुओं से कहा, “…देखो, यहोवा का हाथ मेरे विरुद्ध उठा है” (रूत 1:13), और उसने उनके साथ ऊँचे स्वर में रो-रोकर विलाप किया।
जब नाओमी यहूदा देश में लौटी, तब स्त्रियों का एक समूह उसे देखने के लिए आया और कहने लगीं, “क्या यह नाओमी है?” परन्तु नाओमी ने उत्तर दिया,
“मुझे नाओमी [अर्थात् सुखद] न कहो, मुझे मारा [अर्थात् कड़वी] कहो, क्योंकि सर्वशक्तिमान ने मुझ को बड़ा दुःख दिया है। मैं भरी पूरी चली गई थी, परन्तु यहोवा ने मुझे खाली हाथ लौटाया है। इसलिए जब कि यहोवा ही ने मेरे विरुद्ध साक्षी दी, और सर्वशक्तिमान ने मुझे दुःख दिया है, फिर तुम मुझे क्यों नाओमी कहती हो?”
(रूत 1:20-21)
नाओमी ने अपनी बहुओं और यहूदा की स्त्रियों के सामने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया कि वह पीड़ा में है। वह अपनी भावनाओं को दबा नहीं रही थी और न ही ऐसा दिखावा कर रही थी कि सब कुछ ठीक है। परन्तु नाओमी उस परीक्षा के आगे झुकने लगी थी जिसका सामना हम सब तब करते हैं जब हमें ठेस पहुँचती है। वह कड़वी होती जा रही थी।
कड़वाहट वह दशा होती है जिसमें व्यक्ति बुरे अनुभवों या परमेश्वर अथवा अन्य लोगों की ओर से हुए अन्याय की भावना के कारण क्रोध, पीड़ा, या मन में बैर रखता है। अन्य सभी परीक्षाओं की भाँति, कड़वाहट की परीक्षा भी उन सभी लोगों के लिए सामान्य है जिन्हें ठेस पहुँची है (1 कुर. 10:13)। समस्या यह है कि किसी दूसरे व्यक्ति के प्रति कड़वाहट पालकर रखना पाप है। इफिसियों 4:31 में पौलुस लिखता है, “सब प्रकार की कड़वाहट और प्रकोप और क्रोध, और कलह, और निन्दा सब बैर-भाव समेत तुम से दूर की जाए।”
हमें स्मरण रखना चाहिए कि हमारा शत्रु, शैतान, चोरी करने, हत्या करने, और नाश करने का उद्देश्य रखता है (यूहन्ना 10:10)। वह हमें नष्ट करने के लिए एक तरीका यह अपनाता है कि वह हमें इस परीक्षा में डालता है कि हम अपनी पहचान अपनी पीड़ा से निर्धारित करें और स्वयं को कड़वाहट के बंदीगृह में कैद कर लें। उस बंदीगृह में हम यह मानने लगते हैं, कि “जिसने भी मेरे साथ जो भी किया, वही मेरी पहचान है।”
परन्तु यह सत्य नहीं है। आपके साथ चाहे जो कुछ भी हुआ हो, फिर आपकी पहचान आपकी पीड़ा से निर्धारित नहीं होती है। आप पीड़ित हो सकते हैं, परन्तु आपको पीड़ित मानसिकता अपनाने की आवश्यकता नहीं है। परमेश्वर हमें आज्ञा देता है कि हम सारी कड़वाहट को दूर कर दें, क्योंकि वह एक घातक विष है, जो हमारे हृदय और मन में फैलता रहता है जब तक कि वे पूरी रीति से उससे ग्रस्त न हो जाएँ। कड़वाहट विष के समान है; उसका थोड़ा-सा अंश भी भीतर रखना सुरक्षित नहीं होता है। तो फिर, हम कड़वाहट को कैसे दूर करें?
कड़वाहट के फल की जाँच
पहला, कड़वाहट के फल की जाँच करें। हम सभी ऐसे लोगों को जानते हैं जिन्होंने पीड़ा का अनुभव किया और कड़वाहट को अपने जीवन में जड़ पकड़ने दी। सम्भव है कि आप किसी ऐसे मित्र या सम्बन्धी की कल्पना कर सकते हैं जो जीवन का आनन्द लेता था और जिसके साथ रहना सुखद लगता था। परन्तु फिर कुछ ऐसा हुआ—जैसे कि कोई बीमारी, आर्थिक हानि, किसी प्रिय जन की मृत्यु, कार्यस्थल पर निराशा—और उस बात ने उन्हें बहुत गहरी ठेस पहुँचाई है। वे अब पहले जैसे नहीं रहे। एक समय था, जब वे एक सुन्दर बगीचे के समान जीवन से भरपूर थे। लेकिन ठेस पहुँचने के बाद, उनके भीतर कड़वाहट ने जड़ पकड़ ली और फिर पूरी रीति से वह कड़वाहट प्रभावी हो गई; ठीक उस बेल के समान जो नियंत्रण से बाहर होकर बगीचे की सारी सुन्दरता और जीवन को नष्ट कर देती है।
इब्रानियों 12:15 में हम पढ़ते हैं, “और ध्यान से देखते रहो, ऐसा न हो, कि कोई परमेश्वर के अनुग्रह से वंचित रह जाए, या कोई कड़वी जड़ फूटकर कष्ट दे, और उसके द्वारा बहुत से लोग अशुद्ध हो जाएँ।” परमेश्वर हमें चेतावनी देता है कि हम कड़वाहट की जड़ को बढ़ने न दें, क्योंकि जड़ें फल उत्पन्न करती हैं। और कड़वाहट का फल अच्छा नहीं होता है। इसलिए यदि आप कड़वाहट को दूर करना चाहते हैं, तो दूसरों के जीवन में कड़वाहट के फलों को देखिए, और कहिए, “मैं अपने जीवन में ऐसा बुरा फल नहीं चाहता हूँ।”
सुसमाचार प्रचार को नियमित रूप से सुनिए।
कड़वाहट को जड़ से मिटाने का दूसरा उपाय यह है कि सुसमाचार प्रचार को नियमित रूप से सुनिए। इसका अर्थ है कि कम-से-कम आपको प्रत्येक सप्ताह अन्य मसीहियों के साथ एक बाइबल आधारित स्थानीय कलीसिया में एकत्र होने को प्राथमिकता देनी चाहिए। एक बाइबल आधारित कलीसिया में आप उस सुसमाचार को सुनेंगे जिसका प्रचार पौलुस ने किया था: “कि मसीह यीशु पापियों का उद्धार करने के लिये संसार में आया, जिनमें सबसे बड़ा मैं हूँ।” जब भी आप सुसमाचार प्रचार सुनते हैं, तब आपको स्मरण दिलाया जाता है कि आप स्वयं सबसे बड़े पापी हैं, इस बात को आप जानते हैं। किसी ने आपके विरुद्ध अपराध किया हो और आपको गहरी ठेस पहुँचाई हो। आप उस पाप को जानते हैं (और सम्भवतः अन्य पापों को भी) जो किसी दूसरे व्यक्ति ने किए हैं। परन्तु आप उन अनेक पापों को भी जानते हैं जो आप प्रतिदिन परमेश्वर और दूसरों के विरुद्ध करते हैं। इसलिए आप जानते हैं कि आपको यीशु मसीह के अनुग्रह और क्षमा की कितनी अधिक आवश्यकता है। नियमित रूप से सुसमाचार प्रचार सुनने से हम अपने पापों को कम करके आँकने और एक ऐसी स्वयं की धार्मिकता वाली सोच अपनाने से बच सकते हैं, जो यह मानती है कि दूसरों को हमसे अधिक क्षमा की आवश्यकता है।
अपने आप से सत्य का प्रचार करें
तीसरा, आपको अपने आप से सत्य का प्रचार करना चाहिए। यदि आप नियमित रूप से सुसमाचार प्रचार सुन रहे हैं, तो आप ऐसे साधनों से तैयार हो रहे हैं जिनकी सहायता से आप अपने हृदय में कड़वाहट की भावनाएँ उठने पर स्वयं को सुसमाचार का स्मरण कराकर सत्य सुनाने में योग्य होंगे।
सुसमाचार प्रचार के अपराध के कारण पौलुस को वर्षों तक रोमी न्याय-व्यवस्था के अधीन घसीटा गया। उन दिनों अपराधियों के साथ सम्बन्ध रखना जोखिम भरा माना जाता था—विशेषकर उनके साथ जिन पर रोमी सम्राट की सत्ता को कमजोर करने का संदेह हो, जैसा कि पौलुस पर किया गया था। अपने जीवन और सेवकाई के अन्त में पहुँचकर, पौलुस ने तीमुथियुस को लिखा और कहा, “पहली बार मेरे पक्ष के समर्थन में किसी ने भी मेरा साथ नहीं दिया, परन्तु सब ने मुझे त्याग दिया था, काश, उनको इसका लेखा न देना पड़े” (2 तीमुथियुस 4:16)। यह नए नियम में विश्वासघात के बारे में सबसे गंभीर बाइबल वचनों में से एक है।
यह कितनी निराशाजनक बात थी कि जिन सभी लोगों की पौलुस ने सेवा की, जिन्हें उसने प्रेम किया, जिन्हें उसने शिक्षा दी थी और जिनकी उसने सहायता की थी, उनमें से कोई भी उसके पहले बचाव के समय उसके साथ खड़ा होने नहीं आया। ऐसा प्रतीत होता है कि पौलुस के लिए कड़वाहट में पड़ने का प्रलोभन रहा होगा। लेकिन पौलुस ने यह प्रार्थना की कि “यह उनके विरुद्ध न गिना जाए,” क्योंकि वह समझता था कि यीशु के सभी मित्र भी उसे छोड़कर भाग गए थे। और आप जानते हैं क्या? कि यीशु ने उन्हें क्षमा कर दिया था। सुसमाचार को सुनना और फिर उसे अपने आप को सुनाना हमें कड़वाहट से सुरक्षित रखने में सहायता करता है।
अपने आस-पास ऐसे मसीहियों के साथ रहें जो आपको प्रोत्साहित कर सकें।
चौथा, अपने आप को उन मसीहियों के साथ रखिए जो आपकी पीड़ा के समय भी आपको परमेश्वर पर भरोसा रखने के लिए प्रोत्साहित करेंगे। इब्रानियों 3:12-13 में हम पढ़ते हैं, “हे भाइयों, चौकस रहो, कि तुम में ऐसा बुरा और अविश्वासी मन न हो, जो जीविते परमेश्वर से दूर हटा ले जाए। वरन् जिस दिन तक आज का दिन कहा जाता है, हर दिन एक दूसरे को समझाते रहो, ऐसा न हो, कि तुम में से कोई जन पाप के छल में आकर कठोर हो जाए।”
जब हम पीड़ा से गुजर रहे होते हैं, तो हम आसानी से इस भ्रम में पड़ सकते हैं कि परमेश्वर हमसे प्रेम नहीं करता है, उसके नियंत्रण में कुछ नहीं है, या उस पर भरोसा नहीं किया जा सकता है। ऐसे झूठे विश्वास और उनके समान अन्य विचार हमें जीवित परमेश्वर से दूर करने की ओर ले जा सकते हैं। हमें ऐसे अन्य मसीहियों की आवश्यकता है जो हमें उत्साहित करें (या “हमसे गंभीरता से आग्राह करें”) कि हम परमेश्वर पर भरोसा करते रहें, ताकि हम पाप के छल-कपट के कारण कठोर न हो जाएँ।
अंततः अदन की वाटिका में भी तो ठीक ऐसा ही हुआ था। शैतान ने आदम और हव्वा को यह सुझाव दिया कि परमेश्वर पर भरोसा नहीं किया जा सकता है वह तुमसे कुछ छिपा रहा है, और यह भी कि सच्ची स्वतंत्रता परमेश्वर की आज्ञा मानने में नहीं, वरन् उसकी आज्ञा का उल्लंघन करने में है।
जब आपको ठेस पहुँचती है, तब आप भी उसी बात पर विश्वास करने के लिए लुभाए जा सकते हैं—कि स्वतंत्रता कड़वाहट से संघर्ष करने में नहीं, वरन् उसके सामने झुक जाने में है। शैतान आपको आपके भीतर कड़वाहट को पालने-पोसने के लिए मनाने का प्रयास करेगा, यह झूठ बताते हुए कि इससे आपके जीवन में बुरा फल उत्पन्न नहीं होगा। लेकिन बुरा फल अवश्य ही उत्पन्न होगा। कड़वाहट हमेशा आपके जीवन में बुरा फल उत्पन्न करती है, क्योंकि कड़वाहट स्वयं एक पाप है। यह आपका ध्यान परमेश्वर से, उसकी दया और अनुग्रह की आपकी आवश्यकता से, और दूसरों से, जिनसे हमें प्रेम करना और जिनकी सेवा करनी है, इन सब बातों से हटा देती है। कड़वाहट यह माँग करती है कि आपका ध्यान केवल अपने आप पर, आपके साथ जो हुआ उस पर, और उसके द्वारा आपके जीवन में पड़े नकारात्मक प्रभावों पर ही केंद्रित रहे। इसलिए, अपनी पीड़ा को अपने आप के सामने और परमेश्वर के सामने स्वीकार करने के बाद, हमें कड़वाहट के विरुद्ध संघर्ष करना चाहिए। इसके लिए हमें कड़वाहट के परिणामों की जाँच करनी चाहिए, नियमित रूप से सुसमाचार के प्रचार को सुनना चाहिए, अपने आप को सत्य का प्रचार करना चाहिए, और ऐसे मसीहियों के साथ रहना चाहिए जो आपकी पीड़ा के समय परमेश्वर पर भरोसा करने के लिए आपको प्रोत्साहित करते रहें। तब आप उस स्थिति में होंगे जहाँ आप उस व्यक्ति के साथ मेल-मिलाप करने का प्रयास कर सकेंगे जिसने आपको ठेस पहुँचाई है।
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चिन्तन के लिए प्रश्न:
- चूँकि आपको ठेस पहुँची है, इसलिए आपके मन में कड़वाहट की ओर झुकने का प्रलोभन कितना प्रबल हुआ है?
- यदि आप कड़वाहट की जड़ को बढ़ने दें और वह समस्या उत्पन्न करे, तो आपके जीवन पर उसके क्या नकारात्मक प्रभाव होंगे?
- क्या आपके जीवन में मसीही मित्र हैं जो आपको परमेश्वर पर भरोसा रखने के लिए प्रोत्साहित करते हैं? जब आप अपनी पीड़ा के कारण कड़वाहट और निराशा महसूस कर रहे होते हैं, तब आप उनकी सहायता कैसे कर सकते हैं ताकि वे आपकी सहायता कर सकें?
- इस सप्ताह आप ऐसा कौन सा एक काम कर सकते हैं, जिससे आप अपनी सीखी हुई बातों को व्यवहार में ला सकते हैं?
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भाग III: मेल-मिलाप का प्रयास करें
जब कोई आपको ठेस पहुँचाता है, तो आप उससे दूर जाना चाहते हैं—कभी कुछ समय के लिए, तो कभी हमेशा के लिए। हो सकता है कि आप उस सम्बन्ध को ही पूरी रीति से समाप्त कर देना चाहते हों। दुर्व्यवहार—चाहे वह शारीरिक, यौन, आर्थिक या मौखिक हो—सम्बन्ध को समाप्त कर देना ही एकमात्र समझदारी भरा और सुरक्षित कदम हो सकता है। यदि आपके साथ दुर्व्यवहार हुआ है (या आपको संदेह है कि आपके साथ दुर्व्यवहार हुआ है), तो किसी विश्वासयोग्य मित्र या पास्टर से मिलें और उन्हें बताएँ कि आपके साथ क्या हुआ है। वे आपको यह तय करने में सहायता कर सकते हैं कि आपको कौन-से कदम उठाने चाहिए।
अधिकाँश परिस्थितियों में, जो लोग हमें ठेस पहुँचाते हैं, वे वास्तव में हानिकारक नहीं होते हैं। इसलिए हमें उनके साथ मेल-मिलाप करने का प्रयास करना चाहिए। आपके मन में यह विचार आ सकता है, कि “मेल-मिलाप का प्रयास? मैं उस व्यक्ति के साथ मेल-मिलाप क्यों करूँ जिसने मुझे ठेस पहुँचाई है? मैंने तो कोई गलती ही नहीं की थी! यदि हमारे सम्बन्ध का उसके लिए कोई महत्व है, तो उसे ही मेरे पास आना चाहिए!”
सांसारिक दृष्टिकोण से यह बात समझ में आती है। परन्तु जब आपको ठेस पहुँची हो, तो आप नहीं चाहेंगे कि आपको फिर से ठेस पहुँचे। सुरक्षित दूरी बनाए रखना एक अच्छा, यहाँ तक कि समझदारी भरा निर्णय हो सकता है। लेकिन परमेश्वर ने हमारे साथ ऐसा व्यवहार नहीं किया। उसने हमारे मेल-मिलाप की प्रतीक्षा नहीं की; वरन् उसने स्वयं आगे बढ़कर हमारे साथ मेल-मिलाप करने की पहल की।
हम बाइबल में यह बात लगभग तुरन्त ही देखते हैं। उत्पत्ति 3 में, आदम और हव्वा ने परमेश्वर की आज्ञा तोड़कर उसके विरुद्ध पाप किया। परमेश्वर ही वह पक्ष था जिसके साथ अन्याय हुआ था। लेकिन परमेश्वर हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठा रहा और न ही उसने आदम और हव्वा की अपने पास आने के लिए प्रतीक्षा की; इसके बजाय, उसने आदम को पुकारकर और यह पूछकर उनके साथ मेल-मिलाप करने की पहल की कि, “तू कहाँ है?” (उत्पत्ति 3:9)। फिर, परमेश्वर ने इस विषय में बात करना आरम्भ किया कि क्या हुआ था। उसने आदम से पूछा, “जिस वृक्ष का फल खाने को मैंने तुझे मना किया था, क्या तूने उसका फल खाया है?” (उत्पत्ति 3:11)।
परमेश्वर का उन लोगों के साथ मेल-मिलाप करना, जिन्होंने उसके विरुद्ध पाप किया है, बाइबल के प्रमुख विषयों में से एक है। रोमियों 5:6–8 में पौलुस सुसमाचार के शुभ सन्देश को इस प्रकार संक्षेप में प्रस्तुत करता है:
क्योंकि जब हम निर्बल ही थे, तो मसीह ठीक समय पर भक्तिहीनों के लिये मरा।किसी धर्मी जन के लिये कोई मरे, यह तो दुर्लभ है; परन्तु क्या जाने किसी भले मनुष्य के लिये कोई मरने का धैर्य दिखाए। परन्तु परमेश्वर हम पर अपने प्रेम की भलाई इस रीति से प्रगट करता है, कि जब हम पापी ही थे तभी मसीह हमारे लिये मरा (रो. 5:6-8)।
हम देखते हैं कि परमेश्वर ने आप जैसे और मेरे जैसे पापी लोगों को उसके पास आने की प्रतीक्षा नहीं की। परमेश्वर ने अपने इकलौते पुत्र, यीशु मसीह, को हमारे लिए “जब हम अभी भी पापी ही थे,” तब जीवित रहने, मरने और फिर से जी उठने के लिए भेजा। जब हमें परमेश्वर के साथ मेल-मिलाप करने की कोई इच्छा नहीं थी, तब भी उसने हमारे साथ मेल-मिलाप किया।
जिन मसीही लोगों को ठेस पहुँची है, उनके लिए हाथ बाँधकर बैठे रहना और अपने हृदय को बन्द कर लेना कोई विकल्प नहीं है। जब आप अपनी पीड़ा को स्वयं और परमेश्वर के सामने स्वीकार कर लेते हैं, तथा जब आप कड़वाहट के विरुद्ध संघर्ष आरम्भ कर देते हैं, तब परमेश्वर पर भरोसा करने का अर्थ यह है कि आपको उस व्यक्ति के साथ मेल-मिलाप करने का प्रयास करना चाहिए जिसने आपको ठेस पहुँचाई है। इसमें क्षमा करने के लिए तैयार होना, अपनी ठेस और अपनी आशा को साझा करना, और पाप की कीमत को सहन करना सम्मिलित होता है।
क्षमा करने के लिए तैयार रहें
मेल-मिलाप का प्रयास करने का पहला कदम क्षमा करने के लिए तैयार होना है। लूका 17:3-4 में, यीशु ने अपने अनुयायियों को आज्ञा दी:
“सचेत रहो; यदि तेरा भाई अपराध करे तो उसे डाँट, और यदि पछताए तो उसे क्षमा कर। यदि दिन भर में वह सात बार तेरा अपराध करे और सातों बार तेरे पास फिर आकर कहे, कि मैं पछताता हूँ, तो उसे क्षमा कर।”
ध्यान दें कि यह एक आज्ञा है, कोई सुझाव नहीं है। यीशु यह नहीं कहता कि यदि तेरा भाई तेरे विरुद्ध अपराध करे और पश्चाताप करे, तो तुझे उसे क्षमा करना चाहिए—परन्तु वह कहता है कि तुझे उसे क्षमा करना ही है। अपराध करने वाले व्यक्ति के अंगीकार और पश्चाताप के बिना सच्चा मेल-मिलाप संभव नहीं है। हालाँकि, जिसने आपको ठेस पहुँचाई है, आप उस व्यक्ति को नियंत्रित नहीं कर सकते; आप केवल स्वयं को नियंत्रित कर सकते हैं। इसलिए, जहाँ तक हो सके, तुम भरसक सब मनुष्यों के साथ मेल मिलाप रखो। (रोमियों 12:18), जिसका अर्थ है कि आपको क्षमा करने के लिए तैयार रहना चाहिए।
क्षमा करने का क्या अर्थ है? अपनी पुस्तक ‘द रीज़न फ़ॉर गॉड’ में टिमोथी केलर लिखते हैं,
“क्षमा का अर्थ है कि उन्होंने जो किया, उसके लिए उनसे कोई भरपाई न करवाना… आप उस ऋण को स्वयं झेल लेते हैं; उसका पूरा बोझ दूसरे व्यक्ति पर डालने के बजाय, आप उसे पूरी रीति से स्वयं उठा लेते हैं। इसमें बहुत अधिक कष्ट होता है। कई लोग तो यहाँ तक कह सकते हैं कि यह एक प्रकार की मृत्यु के समान महसूस होता है।” (पृष्ठ 196)
जब आपको ठेस पहुँचती है, तो उसकी एक कीमत चुकानी पड़ती है और सहन करना पड़ता है। आपके पास केवल दो विकल्प होते हैं: या तो आप स्वयं उस कीमत को सहन करें, अथवा किसी न किसी प्रकार से दूसरे व्यक्ति को वह कीमत चुकाने के लिए विवश करें। आप उनके साथ वही कर सकते हैं जो उन्होंने आपके साथ किया है, या उससे भी कुछ बुरा कर सकते हैं ताकि आप उन्हें उनकी करनी का दण्ड दे सकें। लेकिन आप जो भी करें, वह आपके द्वारा अनुभव की गई पीड़ा को नहीं मिटा सकता है। चंगा होने के लिए आरम्भ करने का एकमात्र तरीका क्षमा करना है, जिसका अर्थ है कि आपको यह चुनना होगा कि आप उस कीमत को स्वयं सहें, बजाय इसके कि आप उस व्यक्ति से कीमत चुकाने का प्रयास करें जिसने आपको ठेस पहुँचाई है।
आप क्षमा करने के लिए, अपनी ठेस की कीमत सहने के लिए, सुसमाचार पर मनन करके स्वयं को तैयार करते हैं। आपने परमेश्वर को ठेस पहुँचाई है—एक बार नहीं, वरन् बार-बार। फिर भी परमेश्वर ने यह चुना कि वह आपके पाप की कीमत स्वयं चुकाए, बजाय इसके कि वह आपको उसकी कीमत चुकाने दे। आपको बहुत क्षमा किया गया है, इसलिए आपको उस कीमत को समझकर क्षमा करने के लिए तैयार रहना चाहिए।
अपनी ठेस और अपनी आशा को साझा करें
एक बार जब आप स्वयं को क्षमा करने के लिए तैयार कर लेते हैं, तो आपका अगला कदम यह होना चाहिए कि आप अपनी ठेस और अपनी आशा उस व्यक्ति के साथ साझा करें जिसने आपको ठेस पहुँचाई है। ऐसा करना बहुत कठिन हो सकता है, क्योंकि इसमें आपको अपने मन को खोलना पड़ता है, और इस बात की भी संभावना बनी रहती है कि सामने वाला कहीं आपको ठुकरा न दे। हमारी स्वाभाविक प्रवृत्ति अपने आप को बचाने की होती है, इसलिए जब आपको ठेस पहुँचती है, तब आप यह नहीं चाहेंगे कि आपको फिर से ठेस पहुँचे—विशेषकर उसी व्यक्ति से जिसने पहले आपको ठेस पहुँचायी है!
आप कुछ भी न करने की परीक्षा में पड़ सकते हैं, क्योंकि आप इस कहावत पर विश्वास करते हैं कि “समय के साथ सभी घाव भर जाते हैं।” समय कुछ घावों को तो भर देता है, लेकिन केवल उन घावों को भरता है जो अधिक गंभीर नहीं होते हैं। यदि आपके घुटने पर खरोंच लग जाए, तो वह एक या दो सप्ताह में पूरी रीति से ठीक हो जाएगी, भले ही आप उस घाव के उपचार के लिए कुछ भी न करें। पर यदि रसोई के चाकू से आपका हाथ गहराई तक कट जाए, तो केवल समय के साथ वह चंगा नहीं होगा—आपको उसका सही से उपचार करना होगा। जिसने आपको ठेस पहुँचायी है, उसके साथ अपनी पीड़ा को साझा करना ऐसा है मानो आप उस घाव का सही उपचार कर रहे हैं, न कि यह गलत मान लेना कि केवल समय के साथ ही आप पीड़ा से चंगे हो जाएँगे।
आप अपनी पीड़ा को स्वयं के सामने और परमेश्वर के सामने स्वीकार करने का कठिन कार्य पहले ही कर चुके हैं। आपने शब्दों में व्यक्त किया है (और सम्भव है कि कागज़ पर भी लिखा हो) कि किस बात ने आपको ठेस पहुँचाई और क्यों पहुँचाई। अब आपको उन बातों को उस व्यक्ति के साथ साझा करना है जिसने आपको ठेस पहुँचाई है। कुछ परिस्थितियों में, जिसने आपको ठेस पहुँचाई है, वह इस बात से अनभिज्ञ हो सकता है कि उसकी बातों या उसके कामों से आपको ठेस पहुँची है। इसलिए यह मानकर न चलें कि उसे पता ही है कि उसने आपको ठेस पहुँचाई है, या उसने जान-बूझकर ऐसा किया है। दूसरी परिस्थिति में, जिसने आपको ठेस पहुँचाई है, उसे भली-भाँति पता है कि उसने क्या किया है। सम्भव है कि उसने जान-बूझकर ही ऐसा किया हो।
दोनों ही परिस्थितियों में, आपका कार्य यह है कि आप उन्हें बताएँ कि किस बात ने आपको ठेस पहुँचाई और क्यों पहुँचाई, साथ ही उनके साथ मेल-मिलाप करने की अपनी आशा भी प्रकट करें। आप इतना ही कर सकते हैं। अब निर्णय उनके हाथ में है। उन्हें यह तय करना होगा कि क्या वे यह स्वीकार करेंगे कि उन्होंने आपको ठेस पहुँचाई है और क्या वे आपसे क्षमा माँगेंगे।
पाप की कीमत चुकाओ
यदि वह व्यक्ति जिसने आपको ठेस पहुँचाई है, आपसे क्षमा माँगता है, तो मेल-मिलाप करने का अन्तिम चरण उसे क्षमा करना है। जब आप कहते हैं कि, “मैं आपको क्षमा करता हूँ,” तब आप यह कह रहे होते हैं, “कि आपने मेरे साथ जो कुछ भी किया है उसकी कीमत मैं स्वयं चुकाऊँगा। मैं किसी भी प्रकार से इसका बोझ आप पर नहीं डालूँगा। आपका ऋण चुका दिया गया है, और मैंने उसे स्वयं चुकाया है।”
जिस व्यक्ति ने आपको ठेस पहुँचाई है, उसे क्षमा करना केवल एक बार का लिया गया निर्णय नहीं है। यह ऐसा निर्णय है जिसे आपको बार-बार लेना पड़ता है—शायद कई सप्ताह तक, शायद कई वर्षों तक, और सम्भव है कि जीवन भर भी लेना पद सकता है। आपकी पीड़ा की प्रकृति, आपका स्वभाव, आपका बीता हुआ जीवन, और कई अन्य बातों के कारण ऐसा हो सकता है कि उस व्यक्ति को क्षमा करने का निर्णय लेने के बहुत वर्षों बाद भी आपको अपनी पीड़ा स्मरण होती रहे। किसी को क्षमा करने का अर्थ यह नहीं कि पीड़ा तुरन्त समाप्त हो जाएगी। सम्भव है कि एक सीमा तक, वह पीड़ा जीवन भर बनी रहे।
इसी कारण सुसमाचार को स्मरण रखना अत्यन्त आवश्यक है—कि परमेश्वर ने हमारे सब पापों की कीमत स्वयं चुका दी और उन पापों को कभी हमारे विरुद्ध न गिनने का निश्चय किया है। यह सम्पूर्ण सृष्टि के इतिहास का सबसे महँगा निर्णय था, क्योंकि हमारी क्षमा के लिए परमेश्वर के इकलौते पुत्र, अर्थात् यीशु मसीह, को अपना जीवन बलिदान करना पड़ा।
और प्रकाशितवाक्य की पुस्तक में परमेश्वर यह प्रतिज्ञा करता है कि नए आकाश और नई पृथ्वी में यीशु—जिसने हमारे पापों की कीमत स्वयं चुका दी—उन सबको शान्ति देगा, जिन्होंने दूसरों के द्वारा अपने विरुद्ध किए गए पापों की कीमत स्वयं चुका दी। प्रेरित यूहन्ना लिखता है, “और वह उनकी आँखों से सब आँसू पोंछ डालेगा; और इसके बाद मृत्यु न रहेगी, और न शोक, न विलाप, न पीड़ा रहेगी; पहली बातें जाती रहीं” (प्रक. 21:4)।
वह कितना महिमामय दिन होगा जब हमारी आँखों से हर आँसू पोंछ दिया जाएगा—उन आँसुओं सहित जो हमने उन लोगों के साथ मेल-मिलाप करते समय बहाए हैं जिन्होंने हमें ठेस पहुँचाई है। यद्यपि मेल-मिलाप करना सदैव पीड़ादायक होता है, फिर भी परमेश्वर हमें ऐसा ही करने के लिए कहता है। और अन्त में, इस जीवन में हमने जो पीड़ा पहुँचाई है और जो पीड़ा सही है, उन सबके लिए वह हमें सिद्ध और अनन्त शान्ति देगा।
एक बार जब आप अपनी पीड़ा को परमेश्वर के सामने स्वीकार कर लेते हैं, कड़वाहट के विरुद्ध संघर्ष करते हैं, और मेल-मिलाप करने का प्रयास करते हैं, तब आप अन्तिम सिद्धान्त को व्यवहार में लाने के लिए तैयार हो जाते हैं, और वह सिद्धान्त फिर से प्रेम करने का चुनाव करना है।
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चिन्तन के लिए प्रश्न:
- अब तक, जिसने आपको ठेस पहुँचाई है, उसके प्रति आपने कैसी प्रतिक्रिया की है? क्या आपको लगता है कि आपकी प्रतिक्रिया परमेश्वर के अनुसार थी या सांसारिक थी?
- हमने क्षमा को किसी और के पाप की कीमत चुकाने के रूप में परिभाषित किया है। क्या आप कहेंगे कि आप इस समय उस व्यक्ति को क्षमा करने के लिए तैयार हैं जिसने आपको ठेस पहुँचाई है? यदि हैं, तो क्यों? यदि नहीं, तो क्यों नहीं?
- जिस व्यक्ति ने आपको ठेस पहुँचाई है, उसके साथ अपनी पीड़ा और अपनी आशा को साझा करने के विषय में आपके मन में कौन-कौन से भय हैं?
- इस सप्ताह आप ऐसा कौन सा एक काम कर सकते हैं, जिससे आप अपनी सीखी हुई बातों को व्यवहार में ला सकते हैं?
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भाग IV: फिर से प्रेम करना चुनें
वह कोई बुरा लड़का नहीं था। अपरिपक्व? निश्चय ही। थोड़ा घमण्डी? हाँ। अपनी बातों में लापरवाह? इसमें कोई सन्देह नहीं। जो कोई भी उसे जानता था, वह देख सकता था कि वह बहुत लाड़-प्यार में पला-बड़ा था और उसे थोड़े कठोर अनुशासन की आवश्यकता थी। परन्तु यूसुफ निश्चित रूप से उस बुरे व्यवहार के योग्य नहीं था जो उसके दस बड़े भाइयों ने उसके साथ किया था।
यूसुफ के भाइयों ने उसे एक गड्ढे में फेंक दिया और फिर केवल बीस चाँदी के टुकड़ों में उसे दासत्व में बेच दिया। यूसुफ को मिस्र ले जाया गया, जहाँ उसके स्वामी की पत्नी ने उस पर झूठा आरोप लगाया और उसे बन्दीगृह में डाल दिया गया। वहाँ उसने एक साथी बन्दी की सहायता की, जिसने स्वतंत्र होने पर यूसुफ की सहायता करने का वचन दिया था, परन्तु वह पूरे दो वर्षों तक यूसुफ को भूल गया। अन्ततः, मिस्र के राजा फ़िरौन की सहायता करने के लिए यूसुफ को बुलाया गया। उसे बन्दीगृह से स्वतंत्र कर दिया गया और मिस्र का शासक बना दिया गया, जो उस देश का दूसरा सबसे ऊँचा पद था। उसने विवाह किया और उसके दो बच्चे हुए, परन्तु उसका मन अपने परिवार के लिए तरसता रहा। जिस दिन उसके भाइयों ने उसे दासत्व में बेच दिया था, उस दिन के बाद से उसने अपने परिवार में से किसी को भी नहीं देखा था।
और फिर एक दिन, एकदम अचानक से उसके भाई मिस्र आ पहुँचे; वे वहाँ अकाल के कारण भोजन सामग्री खरीदने आए थे। वे यूसुफ़ को पहचान नहीं पाए। अंततः कई वर्ष बीत चुके थे, और उन्हें तो यह बिल्कुल भी उम्मीद नहीं थी कि यूसुफ़ उन्हें पृथ्वी के सबसे शक्तिशाली देश पर शासन करते हुए मिलेगा। इस मोड़ पर, यूसुफ़ के सामने एक बहुत ही कठिन चुनाव करना था—ठीक आपके ही समान और ठीक हर उस व्यक्ति के समान जिसे कभी ठेस पहुँची हो—यह चुनाव कि क्या आप फिर से प्रेम करेंगे।
प्रेम करना दो कारणों से जोखिम भरा होता है। पहला, इस पतित संसार में किसी भी वस्तु या व्यक्ति से प्रेम करना जोखिम भरा होता है, क्योंकि अन्ततः आप उसे खो देंगे। मनुष्य, पशु, पौधे और वृक्ष मर जाते हैं। आपकी प्रिय वस्तुएँ घिस जाती हैं, जंग खा जाती हैं, या कीड़ों के द्वारा नष्ट कर दी जाती हैं। समय आता है और चला जाता है। इस संसार में आप जिस किसी से भी प्रेम करते हैं, वह अन्ततः आपसे छिन जाएगा। और जितना अधिक आप किसी से प्रेम करते हैं, उसके खो जाने का दुःख उतना ही अधिक बना रहता है।
दूसरा कारण जिसके कारण से प्रेम करना जोखिम भरा होता है, वह यह है कि जब आप किसी से भी प्रेम करते हैं, तो आप स्वयं को ठेस पहुँचाने की संभावना के लिए खुला छोड़ देते हैं—विशेषकर तब, जब आप लोगों से प्रेम करने का चुनाव करते हैं। यही कारण है कि कुछ लोग विवाह न करने, बच्चे पैदा न करने, या ऐसा कोई भी काम न करने का निर्णय लेते हैं जिससे वे दूसरे लोगों के संपर्क में न आएँ। या तो उन्हें दूसरों से ठेस पहुँची होती है, या वे दूसरों से ठेस मिलने से डरते हैं।
पर यदि हम ऐसे लोग बनना चाहते हैं जो ठेस पहुँचने पर भी परमेश्वर पर भरोसा रखते हैं, तब हमें फिर से प्रेम करने का निर्णय लेना होगा—और इसमें उस व्यक्ति से भी प्रेम करना सम्मिलित है जिसने हमें ठेस पहुँचाई है। पर इसका अर्थ क्या है?
जिस व्यक्ति ने आपको ठेस पहुँचाई है, उसे जाने दें
फिर से प्रेम करने का चुनाव करने का पहला चरण यह है कि जिसने आपको ठेस पहुँचाई है, उसे जाने दें। यह क्षमा का स्वाभाविक परिणाम है, जब आप किसी दूसरे के पाप या गलत काम की कीमत स्वयं चुकाते हैं। जब आप क्षमा करते हैं, तब आप उस व्यक्ति को, जिसने आपको ठेस पहुँचाई है, किसी भी प्रकार की भरपाई करने की आवश्यकता से मुक्त कर देते हैं।
यूसुफ अपने भाइयों को छोड़ देने का एक आदर्श उदाहरण है, उन्हीं भाइयों को जिन्होंने उसे इतनी गहरी पीड़ा दी थी। बाइबल की सबसे मार्मिक घटनाओं में से एक में, यूसुफ ने अपने भाइयों से ये वचन कहकर अपनी वास्तविक पहचान प्रकट की:
अब तुम लोग मत पछताओ, और तुम ने जो मुझे यहाँ बेच डाला, इससे उदास मत हो; क्योंकि परमेश्वर ने तुम्हारे प्राणों को बचाने के लिये मुझे तुम्हारे आगे भेज दिया है। क्योंकि अब दो वर्ष से इस देश में अकाल है; और अब पाँच वर्ष और ऐसे ही होंगे कि उनमें न तो हल चलेगा और न अन्न काटा जाएगा। इसलिए परमेश्वर ने मुझे तुम्हारे आगे इसलिए भेजा कि तुम पृथ्वी पर जीवित रहो, और तुम्हारे प्राणों के बचने से तुम्हारा वंश बढ़े। इस रीति अब मुझ को यहाँ पर भेजनेवाले तुम नहीं, परमेश्वर ही ठहरा; और उसी ने मुझे फ़िरौन का पिता सा, और उसके सारे घर का स्वामी, और सारे मिस्र देश का प्रभु ठहरा दिया है। अतः शीघ्र मेरे पिता के पास जाकर कहो, ‘तेरा पुत्र यूसुफ इस प्रकार कहता है, कि परमेश्वर ने मुझे सारे मिस्र का स्वामी ठहराया है; इसलिए तू मेरे पास बिना विलम्ब किए चला आ। और तेरा निवास गोशेन देश में होगा, और तू, बेटे, पोतों, भेड़-बकरियों, गाय-बैलों, और अपने सब कुछ समेत मेरे निकट रहेगा। और अकाल के जो पाँच वर्ष और होंगे, उनमें मैं वहीं तेरा पालन-पोषण करूँगा; ऐसा न हो कि तू, और तेरा घराना, वरन् जितने तेरे हैं, वे भूखे मरें (उत. 45:5-11)।
यूसुफ अपने भाइयों के साथ जो चाहता, वह कर सकता था, परन्तु उसने उनसे बदला लेने या भरपाई करवाने के स्थान पर उन्हें छोड़ देने का निर्णय लिया। इसी प्रकार, फिर से प्रेम करने का अर्थ है कि जिसने आपको ठेस पहुँचाई है, उस व्यक्ति से बदला या भरपाई न करवाना, वरन् उसे छोड़ दें।
इसका यह अर्थ नहीं कि आप लोगों को उनके कार्यों के लिए उत्तरदायी न ठहराएँगे, या कुछ गलत कार्यों के परिणाम नहीं होंगे। परन्तु जब आप उन लोगों को छोड़ देते हैं जिन्होंने आपको ठेस पहुँचाई है, तब इसका अर्थ यह है कि आप उनके किए हुए काम को अपने मन में पकड़े नहीं रहते, न उनके कामों को उनके साथ या दूसरों के साथ बातचीत में बार-बार उठाते हैं, और न भविष्य में होने वाले विवादों में उसे उनके विरुद्ध हथियार के समान उपयोग करते हैं।
उस व्यक्ति के लिए प्रार्थना करें जिसने आपको ठेस पहुँचाई है
फिर से प्रेम करने का अगला चरण यह है कि जिसने आपको ठेस पहुँचाई है, उसके लिए प्रार्थना करें। यद्यपि इस बात का कोई सीधा प्रमाण नहीं है कि यूसुफ ने अपने भाइयों के लिए प्रार्थना की, फिर भी यह मानना उचित है कि जो व्यक्ति परमेश्वर की बातें करता था और अपने भाइयों से वैसे बोलता था जैसे यूसुफ ने बोला, वह निश्चय ही उनके लिए प्रार्थना भी करता रहा होगा।
यद्यपि हम पूरा प्रयास करें कि दूसरों के पापों को उनके विरुद्ध न पकड़े रहें, फिर भी उनके लिए प्रार्थना करना परमेश्वर से सक्रिय रूप से उनके भले के लिए विनती करना है—अर्थात् जब आपको ठेस पहुँचे, तब ऐसा करना बहुत कठिन होता है। परन्तु देखिए, यीशु ने क्या सिखाया:
परन्तु मैं तुम सुननेवालों से कहता हूँ, कि अपने शत्रुओं से प्रेम रखो; जो तुम से बैर करें, उनका भला करो। जो तुम्हें श्राप दें, उनको आशीष दो; जो तुम्हारा अपमान करें, उनके लिये प्रार्थना करो। जो तुम्हारे एक गाल पर थप्पड़ मारे उसकी ओर दूसरा भी फेर दे; और जो तेरा कोट छीन ले, उसको कुर्ता लेने से भी न रोक। जो कोई तुझ से माँगे, उसे दे; और जो तेरी वस्तु छीन ले, उससे न माँग। और जैसा तुम चाहते हो कि लोग तुम्हारे साथ करें, तुम भी उनके साथ वैसा ही करो (लूका 6:27-31)।
यीशु के लिए ये बातें किसी ऊँचे महल में बैठे दार्शनिक के खोखले आदर्श मात्र नहीं थीं। उसने जो सिखाया, उसे पूर्ण रूप से जीकर भी दिखाया। जब वह क्रूस पर लटका हुआ था और साँस लेने के लिए संघर्ष कर रहा था, तब उसने उन लोगों के लिए प्रार्थना की जिन्होंने उसे क्रूस पर चढ़ाया था,
“हे पिता, इन्हें क्षमा कर, क्योंकि ये जानते नहीं कि क्या कर रहें हैं?” (लूका 23:34) फिर उसके शिष्यों ने भी उसके उदाहरण का अनुसरण किया। स्तिफनुस ने भी लगभग यही प्रार्थना की जब उसे यीशु के विषय में अपनी गवाही देने के कारण पत्थरों से मारा जा रहा था (प्रे. 7:60)। पौलुस ने भी उन लोगों के लिए इसी प्रकार की जिन्होंने आवश्यकता के समय उसका साथ छोड़ दिया था (2 तीम. 4:16)।
जब हम उन लोगों के लिए प्रार्थना करते हैं जिन्होंने हमें ठेस पहुँचाई है, तब हम यीशु मसीह की आज्ञा और उसके उदाहरण का पालन कर रहे होते हैं। प्रार्थना एक ठोस तरीका है जिसके द्वारा हम कड़वाहट के विरुद्ध लड़ते हैं और उन लोगों को निरन्तर छोड़ते रहते हैं जिन्होंने हमें ठेस पहुँचाई है। जिस व्यक्ति के लिए आप नियमित रूप से प्रार्थना करते हैं, उसके विरुद्ध मन में बैर रखना बहुत कठिन होता है!
जिस व्यक्ति ने आपको ठेस पहुँचाई है, उसके लिए आपको कैसी प्रार्थना करनी चाहिए? सबसे पहले, यह प्रार्थना करें कि परमेश्वर उन्हें उस दुर्व्यवहार के लिए क्षमा करे जो उन्होंने आपके साथ किया है। जिस प्रकार आपने अपने पापों के लिए परमेश्वर से क्षमा पाई है, उसी प्रकार आपकी भी यह इच्छा होनी चाहिए कि दूसरे लोग भी उसी अनुग्रहकारी परमेश्वर से उसी क्षमा को प्राप्त करें।
दूसरा, यह प्रार्थना करें कि परमेश्वर उनकी सहायता करे ताकि वे मन फिराएँ और विश्वास में चलते रहें।
तीसरा, यह प्रार्थना करें कि वे आपकी क्षमा के द्वारा परमेश्वर के अनुग्रह का अनुभव करें। जब आप उनसे क्षमा करने वाले वचन बोलते हैं, और साथ ही जब आप उनके साथ ऐसा व्यवहार करते हैं मानो उन्हें क्षमा कर दिया गया है, तब आप इस बात का एक ठोस स्मरण कराते हैं कि हम ऐसे परमेश्वर की सेवा करते हैं जो बड़े से बड़े पापों को भी क्षमा करता है।
अन्त में, यह प्रार्थना करें कि परमेश्वर आपको कड़वाहट से बचाए रखे, और आपको ऐसा विश्वास दे कि आप उनका भला कर सकें—उस व्यक्ति को आशीष दे सकें जिसने आपको ठेस पहुँचाई है।
उस व्यक्ति को आशीष दें जिसने आपको ठेस पहुँचाई है
अपने भाइयों को क्षमा करने के बाद, यूसुफ केवल उन्हें उनके द्वारा किए गए बुरे कार्य से ही स्वतंत्र नहीं करता, वरन् वह हर प्रकार से उन्हें आशीष देने के लिए बहुत आगे तक बढ़ जाता है:
– वह उन्हें यह कहकर उत्साहित करता है कि वे न तो व्याकुल हों और न अपने ऊपर क्रोधित हों (उत. 45:5)।
– वह यह प्रतिज्ञा करता है कि वह उनकी, उनके बच्चों की, और उनके बच्चों के बच्चों की भौतिक आवश्यकताओं को पूरा करेगा (उत. 45:11)।
– उसने उन सबको चूमा और उनसे बातें कीं (उत. 45:15)।
– उसने फ़िरौन के साथ मिलकर कनान लौटने और फिर वापस मिस्र आने के लिए उनके लिए उत्तम यात्रा की व्यवस्था करवाई (उत. 45:16-24)।
– उसने उन्हें यह भी निर्देश दिया कि फ़िरौन से कैसे बात करनी है, ताकि पशु पालने के लिए उन्हें सबसे उत्तम भूमि मिल सके (उत. 46:31–47:6)।
– अपने पिता की मृत्यु के बाद भी उसने उन्हें अपनी क्षमा का आश्वासन दिया
(उत. 50:19–21)।
कभी-कभी जब लोगों को ठेस पहुँची होती है, तो वे कहते हैं कि उन्होंने उस व्यक्ति को क्षमा कर दिया है जिसने उनके साथ गलत किया था। लेकिन उनका जीवन कुछ और ही कहानी बताता है। भले ही वे सक्रिय रूप से शत्रु न हों, फिर भी उस व्यक्ति के प्रति उनका व्यवहार ठण्डा और दूर-दूर रहने वाले ही बना रहता है। वे उनसे बात करना बन्द कर देते हैं और उनके आसपास भी रहना नहीं चाहते हैं। यदि उन्हें एक ही कमरे में रहना पड़े, तो वे अपनी दृष्टि एक-दूसरे से हटा लेते हैं और जितना हो सके उतना दूर रहने का प्रयास करते हैं।
लेकिन यह वह तरीका नहीं है जैसा यूसुफ ने अपने भाइयों के साथ किया, और न ही वह है जिसकी आज्ञा हमें पवित्रशास्त्र में दी गई है। बहुत से लोग जिन्होंने हमें ठेस पहुँचाई है, वे हमारे शत्रु नहीं होते, वरन् मित्र या परिवार के सदस्य होते हैं जो हमसे प्रेम करते हैं। इसी बात को ध्यान में रखते हुए, पौलुस के द्वारा रोमियों 12 में दी गई शिक्षा पर विचार कीजिए, जिसमें वह कहता है कि हमें अपने शत्रुओं के साथ कैसे व्यवहार करना चाहिए:
बुराई के बदले किसी से बुराई न करो; जो बातें सब लोगों के निकट भली हैं, उनकी चिन्ता किया करो। जहाँ तक हो सके, तुम भरसक सब मनुष्यों के साथ मेल मिलाप रखो।हे प्रियो अपना बदला न लेना; परन्तु परमेश्वर को क्रोध का अवसर दो, क्योंकि लिखा है, “बदला लेना मेरा काम है, प्रभु कहता है मैं ही बदला दूँगा।” परन्तु यदि तेरा बैरी भूखा हो तो उसे खाना खिला, यदि प्यासा हो, तो उसे पानी पिला; क्योंकि ऐसा करने से तू उसके सिर पर आग के अंगारों का ढेर लगाएगा।” बुराई से न हारो परन्तु भलाई से बुराई को जीत लो। (रो. 12:17-21)
जब हमें ठेस पहुँचती है, तो जिसने हमें ठेस पहुँचाई है, उसे क्षमा कर देना और बदले में उसके साथ बुरा व्यवहार न करना ही पर्याप्त नहीं होता है। मन में कड़वाहट न रखना या उनके लिए प्रार्थना करना भी पर्याप्त नहीं है। हमें सक्रिय रूप से उन्हें आशीष देने, और ठोस तरीकों से उनका भला करने का प्रयास करना चाहिए। हमें ऐसे अवसरों को ढूँढना चाहिए कि जब वे भूखे हों तो उन्हें खाना खिलाएँ, जब वे प्यासे हों तो उन्हें पानी पिलाएँ, और जिस भी प्रकार से हो सके, उन्हें आशीष देनी चाहिए। जिसने हमें ठेस पहुँचाई है, उसके लिए प्रार्थना करना और मन में द्वेष बनाए रखना कठिन हो जाता है; और जब हम उसके लिए अपना समय, धन और उर्जा लगाकर वास्तविक भलाई करने लगते हैं, तो उसके प्रति कड़वाहट बनाए रखना लगभग असंभव हो जाता है।
जब आपको ठेस पहुँचे, तो फिर से प्रेम करने का निर्णय लेना बहुत कठिन हो जाता है, क्योंकि ऐसा करके आप स्वयं को फिर से ठेस पहुँचाने की संभावना के लिए खोल देते हैं। लेकिन, जिस व्यक्ति ने आपको ठेस पहुँचाई है, उसे क्षमा करके, उसके लिए प्रार्थना करके और उसे आशीष देकर फिर
से प्रेम करने का निर्णय लेना ही वह तरीका है जिससे हम ठेस पहुँचने पर भी परमेश्वर पर भरोसा रखते हैं।
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चिन्तन के लिए प्रश्न:
- उत्पत्ति 37-50 में यूसुफ की कहानी से आपको किस प्रकार से प्रोत्साहन और चुनौती
मिलती है? - उस व्यक्ति को जिसने आपको ठेस पहुँचाई है छोड़ देना, और साथ ही किसी न किसी प्रकार से उसके कामों के लिए उसे उत्तरदायी ठहराना कैसा दिखता है?
- आने वाले समय में आप उस व्यक्ति को, जिसने आपको ठेस पहुँचाई है, किन-किन तरीकों से आशीष दे सकते हैं?
- इस सप्ताह आप ऐसा कौन सा एक काम कर सकते हैं, जिससे आप अपनी सीखी हुई बातों को व्यवहार में ला सकते हैं?
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निष्कर्ष
परमेश्वर के अनुग्रह के बिना, हमें इस संसार में केवल ठेस ही पहुँचती है; हम उसी ठेस में फँसे रह जाते हैं, और चंगाई की बहुत कम या न के बराबर आशा होती है। लेकिन परमेश्वर का धन्यवाद हो, कि यीशु मसीह के व्यक्तित्व और उसके कार्य में चंगाई की आशा है। उसने अपने शिष्यों से कहा था कि इस संसार में हमें क्लेश होगा, लेकिन हमें साहस रखना चाहिए, क्योंकि उसने संसार पर विजय पा ली है (यूह. 16:33)।
मित्र, जब आपको ठेस पहुँची हो, तो आपकी सबसे बड़ी आशा किसी भी चीज़ पर नहीं टिक सकती है, यहाँ तक कि इस पुस्तक में बताए गए बाइबल आधारित सिद्धांतों पर भी नहीं। चंगाई के लिए आपकी अन्तिम आशा को यीशु मसीह के व्यक्तित्व और उसके कार्य में टिकना चाहिए, उसने ही संसार और हमारे पापों के कारण से पैदा हुए सभी क्लेशों पर विजय पाई है। वह संकट में अति सहज से मिलनेवाला सहायक है। (भज. 46:1), और वह न कभी तुम्हें छोड़ेगा और न त्यागेगा (इब्र. 13:5)। यीशु प्रतिज्ञा करता है कि जो कोई उसके पास आता है, वह उसे कभी दूर नहीं करेगा (यूह. 6:37), क्योंकि जो कोई प्रभु का नाम लेगा, वह उद्धार पाएगा (रो. 10:10-13)।
यदि आपने यीशु मसीह पर विश्वास नहीं किया है, तो आज ही करें। उसने उन लोगों के लिए अपना प्राण दिया और फिर जी उठा जिन्होंने दूसरों को ठेस पहुँचाई है, और उन लोगों के लिए भी जिन्होंने दूसरों से ठेस पाई है। परमेश्वर की स्तुति हो, क्योंकि हममें से हर कोई ऐसा ही है!
एक बार जब आप यीशु मसीह पर विश्वास कर लेते हैं, तो अपनी दृष्टि उसी पर लगाए रखें। उसके अनुग्रह और पवित्र आत्मा की सामर्थ्य के द्वारा वह आपको आपकी पीड़ा को स्वीकार करने, कड़वाहट से संघर्ष करने, सम्बन्धों को फिर से सुधारने, और फिर से प्रेम करने का चुनाव करने में सहायता कर सकता है—जिसका सबसे उत्तम उदाहरण उसने स्वयं अपने जीवन में पूरी रीति से दिखाया है।
परमेश्वर आप को आशीषित करे और आपकी रक्षा करे, अर्थात् जब आप अपनी पीड़ा के बीच में परमेश्वर पर भरोसा रखने का प्रयास करते हैं।
लेखक के बारे में
एवन इयूटी, कॉलेज स्टेशन, टेक्सास में स्थित न्यू लाइफ बैपटिस्ट चर्च में सीनियर पास्टर के रूप में सेवकाई करते हैं। उनका विवाह केंड्रा से हुआ है, और उनके तीन सन्तान हैं।
विषयसूची
- भाग I: अपनी ठेस को स्वीकार करें
- अपनी ठेस को स्वीकार करें
- अपनी पीड़ा को परमेश्वर के सामने स्वीकार करें
- चिन्तन के लिए प्रश्न:
- भाग II: कडवाहट से संघर्ष
- कड़वाहट के फल की जाँच
- सुसमाचार प्रचार को नियमित रूप से सुनिए।
- अपने आप से सत्य का प्रचार करें
- अपने आस-पास ऐसे मसीहियों के साथ रहें जो आपको प्रोत्साहित कर सकें।
- चिन्तन के लिए प्रश्न:
- भाग III: मेल-मिलाप का प्रयास करें
- क्षमा करने के लिए तैयार रहें
- अपनी ठेस और अपनी आशा को साझा करें
- पाप की कीमत चुकाओ
- चिन्तन के लिए प्रश्न:
- भाग IV: फिर से प्रेम करना चुनें
- जिस व्यक्ति ने आपको ठेस पहुँचाई है, उसे जाने दें
- उस व्यक्ति के लिए प्रार्थना करें जिसने आपको ठेस पहुँचाई है
- उस व्यक्ति को आशीष दें जिसने आपको ठेस पहुँचाई है
- चिन्तन के लिए प्रश्न:
- निष्कर्ष
- लेखक के बारे में