#69 आत्मिक युद्ध: परीक्षा का सामना करना और अपने भीतर की लड़ाई जीतना
प्रस्तावना
हर मसीही परीक्षा के साथ होने वाली लड़ाई से परिचित है। कुछ लोग रविवार को कलीसिया में पिछली रात के ताजा घावों के साथ लड़खड़ाते हुए आते हैं। दूसरे लोग बाहर से मुस्कुराते हुए बैठते हैं, परन्तु भीतर से टूटा हुआ महसूस करते हैं, और उन्हें पक्का विश्वास होता है कि वे कभी स्वतंत्र नहीं हो पाएँगे। फिर भी दूसरे लोग इतने सुन्न हो चुके होते हैं कि उन्हें अब परीक्षा का एहसास भी नहीं होता—वे बस हार मान लेते हैं। और फिर कुछ ऐसे भी लोग होते हैं, जिन्हें लगता है कि वे अच्छा जीवन जी रहे हैं और दृढ़ता से खड़े हैं। इसके लिए परमेश्वर की स्तुति हो! परन्तु जब आप दृढ़ता से खड़े होते हैं, तब भी पवित्रशास्त्र चेतावनी देता है: “इसलिये जो समझता है, मैं स्थिर हूँ, वह चौकस रहे कि कहीं गिर न पड़े” (1 कुरि. 10:12)। स्वर्ग पहुँचने से पहले, पाप के विरुद्ध इस लड़ाई को कोई भी पूरी तरह से जीत नहीं पाता।
यीशु ने हमें प्रार्थना करना सिखाया: “हमें परीक्षा में न ला, परन्तु बुराई से बचा” (मत्ती 6:13)। यह प्रार्थना केवल एक कोरी कल्पना नहीं, बल्कि युद्ध की एक घोषणा है। यह जीवन कौशल मार्गदर्शिका लड़ना सीखने के बारे में है, मुट्ठियाँ भींचकर या अपनी मानवीय इच्छाशक्ति से नहीं, बल्कि उन हथियारों से है, जो परमेश्वर ने हमें दिए हैं: अर्थात् उसका वचन, उसकी आत्मा, उसके लोग, और सबसे बढ़कर, उसका पुत्र।
यह आत्मिक युद्ध की भाषा है—एक वास्तविक, निरन्तर चलने वाली लड़ाई, जिसमें मसीही व्यक्ति न केवल विरोध करना सीखता है, बल्कि मसीह में दृढ़ बने रहना भी सीखता है।
हम पाप के मामले में ईमानदारी से अपनी कमजोरियों को देखकर अपनी यात्रा को आरम्भ करेंगे। आँगन में खड़े पतरस की तरह, हम भी अक्सर अपनी सामर्थ्य को अधिक आँकते हैं और अपनी परीक्षा को कम आँकते हैं। स्वयं को सही दृष्टिकोण से देखना (कि हम कमजोर हैं और गिरने की सम्भावना रखते हैं) हमें विनम्र बनाता है और हमें प्रेरित करता है कि परीक्षा के हमें नष्ट करने से पहले ही हम सहायता के लिए परमेश्वर को पुकारें।
इसके बाद, हम उद्धार के बारे में विचार करेंगे। शैतान केवल कहानियों की पुस्तकों का कोई काल्पनिक पात्र नहीं है। वह “परीक्षा करने वाला” (1 थिस्स. 3:5) है। पवित्रशास्त्र हमें सिखाता है कि हम उसके फंदों से स्वयं को नहीं बचा सकते। इसी कारण से यीशु हमें अधिक इच्छाशक्ति के लिए प्रार्थना करने को नहीं, बल्कि उद्धार के लिए प्रार्थना करने को कहता है। हमारी जीत अपनी कहानी का नायक होने से नहीं, बल्कि हमारे उद्धारकर्ता मसीह से मिलती है, जो तब हमारी रक्षा करता है, जब हम निर्बल होते हैं।
यहाँ तक कि यीशु ने भी अपनी जंगल की लड़ाई में (मत्ती 4:1–11) यह उदाहरण पेश किया कि परीक्षा का सामना कैसे किया जाए, और यह हमें याद दिलाता है कि मसीह की परीक्षा आज के समय में हमारे लिए परीक्षाओं से लड़ने का आदर्श है।
उद्धार के बाद, हम अपनी पहचान के बारे में सोचेंगे। “आप कौन हैं?” यह प्रश्न आपकी समझ से कहीं अधिक महत्व रखता है। रोमियों 6 अध्याय सिखाता है कि पाप से लड़ने की आपकी क्षमता इस बात पर निर्भर करती है कि आप मसीह में अपनी पहचान को कितनी स्पष्टता से समझते हैं। यह जानना कि आप पाप के लिए मर चुके हैं और परमेश्वर के लिए जीवित हैं, परीक्षाओं का सामना करने के आपके तरीके को दिन-प्रतिदिन बदल देता है।
अगले अध्याय में, हम उपाय पर विचार करेंगे। पौलुस हमें सलाह देता है कि “शरीर की अभिलाषाओं को पूरा करने का उपाय न करो” (रोमि. 13:14)। इस “उपाय” शब्द का अर्थ कुछ हद तक दूरदर्शिता (पहले से की गई तैयारी) जैसा है। जिस तरह हम पवित्रता के लिए (प्रार्थना, पवित्रशास्त्र, संगति और जवाबदेही के माध्यम से) योजना बना सकते हैं, उसी तरह, बड़े दु:ख की बात है कि हम पाप के लिए भी योजना बना सकते हैं। यहाँ हम इस बात पर विचार करेंगे कि शरीर की अभिलाषाओं की आपूर्तियों को काटकर उसे कैसे भूखा रखा जाए, और प्रतिदिन मसीह को पहनकर आत्मा को कैसे पोषित किया जाए।
इसके बाद, हम कलीसिया के बारे में विचार करेंगे। पाप गुप्त में पनपता है, परन्तु संगति के प्रकाश में मर जाता है। इसी कारण से, पाप और परीक्षा से लड़ने के लिए हमें एक विश्वासयोग्य कलीसिया की आवश्यकता होती है। परमेश्वर ने हमारे लिए कभी यह नहीं चाहा कि हम अकेले लड़ें। जब हम कमजोर पड़ते हैं, तो मसीह की देह हमें प्रोत्साहित करती है, हमारी रक्षा करती है और हमें सहारा देती है। परमेश्वर के लोगों से स्वयं को अलग कर लेना, बिना कवच पहने अपनी इच्छा से युद्ध के मैदान में उतर जाना है।
मसीही जीवन को एक आत्मिक युद्ध के रूप में देखने से हमें यह समझने में सहायता मिलती है कि समुदाय मायने क्यों रखता है: कोई भी सैनिक अकेलेपन में अधिक समय तक जीवित नहीं रह पाता।
हमारा अगला भाग दर्शन पर आधारित होगा। यहाँ हमें यह याद दिलाया जाएगा कि हम केवल अपनी इच्छाशक्ति के बल पर अपनी पापी अभिलाषाओं को समाप्त नहीं कर सकते। इसके बजाय, हमें उन अभिलाषाओं को किसी अधिक गहरी और सार्थक इच्छा से बदलना होगा। एक नये लगाव की बाहर निकालने वाली सामर्थ्य का अर्थ यह है कि आप वासना और अन्य परीक्षाओं के पार देखकर उनसे लड़ते हैं, अर्थात्, आप उन परीक्षाओं की वास्तविक कीमत पहचानते हैं और मसीह में मिलने वाले कहीं अधिक बड़े आनन्द का रसास्वादन करते हैं। यही उन मन के शुद्ध लोगों का मार्ग है, जो “परमेश्वर को देखेंगे” (मत्ती 5:8)।
अन्त में, हम स्वयं परमेश्वर तक पहुँचते हैं, जिसे देखने के लिए हमें बनाया गया था। पवित्रता केवल नियमों के बारे में नहीं है, बल्कि यह भूख के बारे में है। ”धन्य हैं वे, जो धार्मिकता के भूखे और प्यासे हैं, क्योंकि वे तृप्त किए जाएँगे”
(मत्ती 5:6)। हम सबसे अधिक जो चाहते हैं, वह केवल पाप से स्वतंत्रता नहीं, बल्कि परमेश्वर का आमने-सामने दर्शन है। और यह भूख हमारी पवित्रता की खोज को तब तक ईंधन देती रहती है, जब तक कि परमेश्वर हमें अपने घर नहीं ले जाता।
मेरी प्रार्थना है कि जैसे-जैसे आप इन पाठों का अध्ययन करेंगे, आप न केवल यह सीखेंगे कि परीक्षा का सामना कैसे करें और उसका विरोध कैसे करें, बल्कि यह भी समझेंगे कि परीक्षाओं से लड़ना अन्त में मसीह से और अधिक प्रेम करने के बारे में है। मसीह ने युद्ध पहले ही जीत लिया है; अब आइए, हम सब मिलकर यह सीखें कि स्वतंत्र सैनिकों की तरह जीवन कैसे बिताएँ।
ऑडियो मार्गदर्शिका
ऑडियो#69 आत्मिक युद्ध: परीक्षा का सामना करना और अपने भीतर की लड़ाई जीतना
भाग I: परीक्षा
आप स्वयं को कैसे देखते हैं? क्या आप सदाचारी, अनुशासित और पवित्र आत्मा के फलों से भरे हुए हैं? यदि ऐसा है, तो परमेश्वर की स्तुति हो! परन्तु क्या यह दृष्टिकोण सही है?
आपके भविष्य के स्वरूप के बारे में क्या? आप स्वयं को पाप से लड़ते हुए कैसे देखते हैं, जब आने वाले दिनों में आपको उसका सामना करना पड़ेगा? हममें से अधिकांश लोग अपने भविष्य के स्वरूप के बारे में बहुत ऊँचा दृष्टिकोण रखते हैं। हम अपेक्षा करते हैं कि नयी खुराक से कोई समस्या नहीं होगी, कि हम बजट पर टिके रहेंगे, और कसरत वाली दिनचर्या किए जाने योग्य होगी। हम अपने भविष्य के स्वरूप की अपनी वास्तविकता से कहीं अधिक साहसी, आत्म-नियंत्रित और शान्त-चित्त के रूप में कल्पना करते हैं।
जब हम इस कड़वी सच्चाई का अनुभव करते हैं कि हमारे भविष्य का स्वरूप उतना दृढ़ नहीं है, जितना हमने सोचा था, तो हमें थोड़ी शर्मिंदगी महसूस हो सकती है। एक और असफल खुराक, बाइबल पढ़ने की प्रतिदिन की योजना, या कसरत वाली दिनचर्या हमारे भोलेपन को उजागर करती है। परन्तु हम आमतौर पर इन भावनाओं को अनदेखा कर देते हैं, स्वयं पर हँसते हैं, और अपने जीवन में वापस लौट आते हैं।
तो, क्या होता है, जब हम आत्मिक रूप से स्वयं को आवश्यकता से अधिक आँकते हैं? क्या होता है, जब हम सोचते हैं कि हम वास्तविकता से कहीं अधिक आत्मिक रूप से परिपक्व, मजबूत और पवित्र हैं? या जब हम सोचते हैं कि हम परीक्षा का सामना करने के लिए तैयार हैं, परन्तु हम नहीं होते? क्या होगा, यदि हमें असल में किसी ऐसे व्यक्ति के द्वारा बचाए जाने, अपनी परीक्षाओं से छुड़ाए जाने की आवश्यकता हो, जो हमसे कहीं अधिक महान हो?
इसी कारण से पवित्रशास्त्र अक्सर मसीही जीवन को आत्मिक युद्ध के रूप में दिखाता है—और याद दिलाता है कि परीक्षा केवल छोड़ने के लिए एक बुरी आदत नहीं है, बल्कि एक ऐसी लड़ाई है, जिसे हम अपनी स्वयं की सामर्थ्य से नहीं जीत सकते।
यीशु के जीवन की सबसे प्रसिद्ध कहानियों में से एक जंगल में उसकी परीक्षा की कहानी है। लूका रचित सुसमाचार में, हमें बताया गया है कि यीशु जंगल में गया, जहाँ उसने चालीस दिनों तक परीक्षा का सामना किया। लूका उस दृश्य का वर्णन इस तरह करता है: “फिर यीशु पवित्र आत्मा से भरा हुआ, यरदन से लौटा; और चालीस दिन तक आत्मा के सिखाने से जंगल में फिरता रहा; और शैतान उसकी परीक्षा करता रहा” (लूका 4:1-2)।
यदि आप यह कहानी जानते हैं, तो आपको मालूम होगा कि यीशु ने शैतान पर जीत हासिल की थी। जंगल में यीशु की परीक्षा की कहानी बहुत शक्तिशाली है, और इसलिए इसे अक्सर मसीहियों को आत्मा की सामर्थ्य और परमेश्वर के वचन के द्वारा परीक्षा से लड़ने के बारे में सिखाने के लिए एक “मार्गदर्शिका” के रूप में उपयोग किया जाता है। और यह गलत नहीं है!
मसीह की परीक्षा हमें न केवल यह दिखाती है कि पाप का विरोध कैसे करें, बल्कि यह भी दिखाती है कि परीक्षा पर जीत व्यक्तिगत् संकल्प में नहीं, बल्कि अन्त में परमेश्वर पर निर्भर होकर मिलती है।
हालाँकि, जो बात मुझे रोचक लगती है, वह यह है कि जब यीशु अपने शिष्यों को सिखाता है कि परीक्षा के बीच कैसे प्रार्थना करें, तो वह उन्हें यह प्रार्थना करना नहीं सिखाता कि उनमें साहस आ जाए या उस विषय के लिए उन्हें सटीक पवित्रशास्त्र याद आ जाए। इसके बजाय, वह उन्हें यह प्रार्थना करना सिखाता है कि वे आरम्भ से ही परीक्षा में न पड़ें। प्रभु की प्रार्थना में, यीशु अपने अनुयायियों को इस तरह प्रार्थना करना सिखाता है: “हमें परीक्षा में न ला” (मत्ती 6:13)। ऐसा लगता है कि मानो जंगल में अपने स्वयं की भयानक परीक्षा के अनुभव को याद करते हुए, यीशु अपने शिष्यों को परमेश्वर से यह माँगना सिखाता है कि उन्हें कभी भी अपने जंगल की घटना के अनुभव से होकर न गुजरना पड़े।
यीशु हमें इस तरह प्रार्थना करना इसलिए सिखाता है, क्योंकि हम अपने पाप और परीक्षा में कमजोर हैं। जबकि यह सच है कि पवित्र आत्मा के उनके भीतर वास करने से मसीहियों को सामर्थ्य मिलती है (इफि. 3:16), परन्तु यह भी सच है कि हम अब भी मृत्यु के इस शरीर में ही जी रहे हैं, जिसकी अभिलाषाएँ आपस में ही संघर्ष करती रहती हैं (गला. 5:17)। मसीही लोग, जब तक स्वर्ग नहीं पहुँच जाते, तब तक हमेशा कमजोरी से घिरे रहेंगे। इस मामले में, थोड़ी-बहुत आत्म-जागरूकता मसीही व्यक्ति के लिए बहुत लाभकारी साबित होगी।
एक मसीही व्यक्ति के लिए सबसे खतरनाक जगह वह है, जहाँ वह अपनी स्वयं की सामर्थ्य पर झूठा भरोसा करके खड़ा होता है—विशेष रूप से जब बात पाप से लड़ने की हो। जोनाथन एडवर्ड्स लिखते हैं, “इस कारण, कोई भी पवित्र जन चाहे वह कितना भी प्रसिद्ध क्यों न हो, और परमेश्वर के कितना भी करीब क्यों न हो, स्वयं को खतरे से बाहर न समझे। जो व्यक्ति स्वयं को खतरे से सबसे अधिक बाहर समझता है, असल में वही सबसे अधिक खतरे में होता है।”[1 – https://www.ccel.org/ccel/edwards/works1.ix.v.i.html] सबसे अधिक चोट पहुँचाने वाला वार वह होता है, जिसे आप आते हुए नहीं देखते, और जो मसीही लोग आवश्यकता से अधिक भरोसा रखते हैं, वे ही शैतान और उसकी चालों के सामने अचानक बेबस होकर फँस जाते हैं।[2 – जेरोम, पत्र 22: टु यूस्टोकियम, नाइसीन एण्ड पोस्ट-नाइसीन फादर्स, (Letter 22: To Eustochium, in Nicene and Post-Nicene Fathers), दूसरी श्रृंखला, खण्ड 6 में, सम्पादक फिलिप शैफ और हेनरी वेस (पीबॉडी, एम.ए.: हेंड्रिकसन, 1994), 23.]
एक प्रशिक्षक ने एक बार मुझसे कहा था कि सभी मसीहियों को स्वयं को ऐसा समझना चाहिए, कि वे पाप की खाई में गिरने ही वाले हों। दूसरे शब्दों में कहें तो, “पाप के मामले में, हमारी परीक्षा हमें उस खाई के किनारे के और करीब ले जाती है, जो ऐसी खाई है, जिसके भीतर हम किसी भी पल गिरकर मृत्यु और तबाही की अथाह गहराई में समा सकते हैं। अपनी पापी अभिलाषाओं के कारण, हम न केवल खाई के किनारे खड़े होते हैं, बल्कि हम एक ऐसी ढलान पर भी खड़े होते हैं, जो नीचे की ओर, उस गहरे कुण्ड की तरफ झुकी हुई होती है। इसके अलावा, हम न केवल खाई के किनारे के पास एक ढलान पर खड़े होते हैं, बल्कि हम एक ऐसी फिसलन भरी भूमि पर भी खड़े होते हैं, जहाँ किसी भी पल हमारा पाँव फिसल सकता है।”
पाप के मामले में हमें स्वयं को इसी तरह देखना चाहिए। यदि हम इस सच्चाई को समझ लें—कि हम मजबूत नहीं, बल्कि कमजोर हैं—तो यह बात पूरी तरह समझ में आती है कि यीशु ने हमें यह प्रार्थना करना क्यों सिखाया कि परमेश्वर हमें परीक्षा से दूर रखे।
अत:, आप स्वयं को किस तरह देखते हैं? सच तो यह है कि हम अक्सर परीक्षा के भारी बोझ तले वैसे ही टूट जाते हैं, जैसे कोई नयी खुराक आरम्भ करने के दो दिन बाद ही हम टूट जाते हैं। “यह खुराक सोमवार से आरम्भ करेंगे” यह झूठ ठीक वैसा ही है, जैसा कि यह कहना कि “मैं उसके साथ अकेला रह सकता हूँ; मैं अपनी वासना के आगे नहीं झुकूँगा,” या “मैं अपने कंप्यूटर से यह सॉफ्टवेयर हटा सकता हूँ, मैंने अश्लील फिल्मों की इस लत पर पूरी तरह काबू पा लिया है।”
प्रेरित पतरस की तुलना में इस तरह के आत्मिक झूठे आत्म-विश्वास का इससे बेहतर उदाहरण मैं कोई और नहीं सोच सकता। यीशु ने शिष्यों से कहा था कि वे उसके सबसे कठिन समय में उसे छोड़ देंगे। यीशु कहता है कि “तुम सब… ठोकर खाओगे” (मत्ती 26:31)।
पतरस ने इसका उत्तर इस तरह दिया, “यदि सब तेरे विषय में ठोकर खाएँ तो खाएँ, परन्तु मैं कभी भी ठोकर न खाऊँगा” (मत्ती 26:33)। यीशु ने पतरस से आगे कहा कि असल में, रात बीतने से पहले वह तीन बार उसका इन्कार करेगा। पतरस ने उत्तर दिया, “यदि मुझे तेरे साथ मरना भी पड़े, तौभी मैं तुझसे कभी न मुकरूँगा!” (मत्ती 26:35)
क्या आपको याद है कि इस कहानी का अन्त कैसे होता है? पतरस न केवल यीशु का इन्कार करता है, बल्कि वह तीन बार शपथ लेकर और अपने सिर पर श्राप लेकर उसका इन्कार करता है (मत्ती 26:74)। अत:, मैं फिर पूछता हूँ, कि आप पाप और परीक्षा के सम्बन्ध में स्वयं को कैसे देखते हैं? क्या आप स्वयं को दाऊद जैसा देखते हैं, जो निडर होकर उस दानव का सामना करता है? या आप स्वयं को पतरस जैसा देखते हैं, जो आँगन में डर से काँप रहा है?
अब आप सोच रहे होंगे, “यह किस तरह का मसीही जीवन है? इसमें जीत कहाँ है? पाप पर परमेश्वर की सामर्थ्य कहाँ है?” निश्चय ही हमें जीत मिलती है, और पाप का विरोध करने तथा परीक्षा से लड़ने की हमारी क्षमता समय के साथ अनुग्रह में बढ़ती है (और निश्चय ही इसमें उतार-चढ़ाव के दौर भी आते हैं)।
हमें निश्चित रूप से पाप और परीक्षा के विरुद्ध युद्ध करने के लिए बुलाया गया है, और जब हम स्वयं को उनके बीच पाते हैं, तो हमें उन लड़ाइयों को जीतने का प्रयास करना चाहिए! इफिसियों 6:11 के शब्दों पर विचार करें… “परमेश्वर के सारे हथियार बाँध लो कि तुम शैतान की युक्तियों के सामने खड़े रह सको।” हमें शैतान और उसकी युक्तियों के विरुद्ध एक ठोस कदम उठाने के लिए बुलाया गया है। और जब हम स्वयं को किसी भीषण संघर्ष के बीच पाते हैं, तो हमें परमेश्वर की सुरक्षा की ढाल पर भरोसा रखते हुए, उसके वचन की तलवार उठाकर सामने आने वाले किसी भी शत्रु का सिर काट देना चाहिए।
यह परीक्षा से लड़ने का सक्रिय पहलू है, जहाँ मसीही व्यक्ति विरोध करता है, दृढ़ता से खड़ा रहता है, और परमेश्वर के द्वारा दी गई सामर्थ्य पर भरोसा रखता है।
परन्तु, और यह बात बहुत आवश्यक है, केवल इसलिए कि हम लड़ाई के लिए तैयार हैं, इसका अर्थ यह नहीं है कि हम लड़ाई की खोज करें। आत्मिक लड़ाई लड़ने की परमेश्वर की दी हुई क्षमता को, हमें उसमें शामिल होने की परमेश्वर की दी हुई इच्छा से कभी नहीं मिलाना चाहिए। 1 कुरिं. की पत्री और 2 तीमु. की पत्री, दोनों में ही, पौलुस अपने पढ़ने वालों से कहता है कि वे परीक्षा और पाप से “बचे रहें”। यौन अनैतिकता से बचे रहो, जवानी के जोश से बचे रहो, बचे रहो, बचे रहो, बचे रहो (1 कुरिं. 6:18, 10:14, 2 तीमु. 2:22)। जब परीक्षा की बात आती है, तो हमारी स्वाभाविक प्रतिक्रिया हमेशा लड़ने के बजाय भागने की होनी चाहिए।
इसी कारण से यीशु ने, अपनी सेवकाई के अन्त में, अपने शिष्यों से यह कहने के लिए समय निकाला: “जागते रहो, और प्रार्थना करते रहो कि तुम परीक्षा में न पड़ो: आत्मा तो तैयार है, परन्तु शरीर दुर्बल है” (मत्ती 26:41)। “आत्मा तो तैयार है” इस बात से यीशु का अर्थ यह है, “मैं जानता हूँ कि तुम्हारे पास एक योद्धा का हृदय है, परन्तु तुम्हारा शरीर तुम्हारी सोच से कहीं अधिक कमजोर है। इसलिए, स्वयं को समझने, विनम्र होने और पाप की ताकत की सही समझ रखने का प्रयास करो। हमारे हृदय बुरे हैं, शरीर की अभिलाषाओं को पाप मीठा लगता है, और अपनी आत्मिक सामर्थ्य को आवश्यकता से अधिक समझने की कीमत हमारे अपने प्राण भी हो सकते हैं।”
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चिन्तन के लिए प्रश्न:
- इसका क्या अर्थ है कि “परीक्षा करनेवाला” शैतान है (1 थिस्स. 3:5)? यह पाप के साथ आपकी प्रतिदिन की लड़ाई के बारे में आपकी सोच को कैसे आकार देता है?
- पाप के विरुद्ध लड़ाई में स्वयं पर निर्भर रहना खतरनाक क्यों है? सुसमाचार हमें परमेश्वर पर निर्भर रहने की ओर कैसे मोड़ता है?
- इस अध्याय में कैप्टन फिलिप्स के बचाव की आवश्यकता वाले उदाहरण का उपयोग किया गया है। यह दृश्य हमें यीशु को अपने बचाने वाले के तौर पर बेहतर ढंग से समझने में कैसे सहायता करता है?
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भाग II: छुटकारा
सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र के पन्नों में शैतान को हर जगह “परीक्षा करनेवाले” के तौर पर जाना जाता है। 1 थिस्स. 3:5 में उसे स्पष्ट रूप से “परीक्षा करनेवाला” कहा गया है: “इस कारण जब मुझ से और न रहा गया, तो तुम्हारे विश्वास का हाल जानने के लिये भेजा, कि कहीं ऐसा न हो कि परीक्षा करनेवाले ने तुम्हारी परीक्षा की हो, और हमारा परिश्रम व्यर्थ हो गया हो” (1 थिस्स. 3:5)।
उसके उपनाम के अलावा, हम देखते हैं कि सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र के पन्नों में शैतान एक परीक्षा करनेवाले की तरह काम करता है। उत्पत्ति 3 अध्याय में, उसने अदन की वाटिका में आदम और हव्वा की परीक्षा की। शैतान जंगल में, दूसरे आदम यीशु की परीक्षा करता है। परमेश्वर की सन्तानों की परीक्षा करना ही शैतान का मुख्य काम है। वह आरम्भ से ही ऐसा करता चला आ रहा है, और जब तक यीशु वापस नहीं आ जाता, तब तक वह ऐसा ही करता रहेगा। यही कारण है कि मसीहियों को परीक्षा को एक निरन्तर चलने वाले आत्मिक युद्ध के भाग के रूप में देखना चाहिए, और यह केवल एक नैतिक संघर्ष नहीं, बल्कि उस जन के साथ सीधा टकराव है, जो परमेश्वर के लोगों का विरोध करता है।
इसमें कोई सन्देह नहीं कि हमें यहाँ इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि हम शैतान को वे गुण न सौंप दें, जो केवल परमेश्वर के हैं। शैतान हर पत्थर के नीचे या हर कोने के पीछे छिपा नहीं बैठा है। परन्तु बाइबल शैतान के बारे में यह अवश्य कहती है कि वह मनुष्यों पर और उनके विरोध में असाधारण रूप से अधिक शक्तिशाली है। असल में, बाइबल ऐसा संकेत देती हुई प्रतीत होती है कि किसी न किसी रूप में, शैतान ही इस पतित संसार की परीक्षाओं और बुराइयों का जनक है, या उनके मूल में है, या उनके पीछे की शक्ति है।
उदाहरण के लिए, यीशु धार्मिक अगुवों से कहता है कि वे उसके बारे में इसलिए झूठ बोलते हैं, क्योंकि वे अपने पिता, शैतान की ओर से हैं (यूह. 8:44)। प्रेरितों 26 अध्याय में, यीशु पौलुस से कहता है कि वह उसे अन्यजातियों के पास इस उद्देश्य से भेज रहा है, ताकि उसे “शैतान के अधिकार से” बचाया जा सके (प्रेरि. 26:17–18)। जब पौलुस कुरिन्थियों को विवाह में यौन सम्बन्धों के बारे में लिखता है, तो वह पतियों और पत्नियों से आग्रह करता है कि वे एक दूसरे को लम्बे समय तक वंचित न रखें। ऐसा क्यों है? क्योंकि वह जानता है कि लम्बे समय तक की गई उपेक्षा शैतान के लिए दरवाजा खोल देती है, कि वह उनके आत्म-संयम की कमी का लाभ उठाकर उनको परीक्षा में डाल सके
(1 कुरिं. 7:5)। पवित्रशास्त्र में शैतान को अपने दूतों के माध्यम से काम करते हुए भी दर्शाया गया है। उदाहरण के लिए, पौलुस अपने “शरीर के काँटे” का उल्लेख “शैतान के दूत” के रूप में करता है (2 कुरिं. 12:7)।
इस तरह के अंश हमें याद दिलाते हैं कि शैतान की परीक्षा सूक्ष्म, लगातार बनी रहने वाली और अक्सर जीवन के साधारण पलों में ही बुनी हुई होती है।
इसलिए, बाइबल के तरीके से और ईश-वैज्ञानिक तरीके से, यह बात समझ में आती है कि जब यीशु “हमें… बुराई से बचा” (मत्ती 6:13) वाली प्रार्थना करना हमें सिखाता है, तो वह एक तरह से हमें यह सिखा रहा होता है कि हम शैतान की परीक्षाओं से बचाव के लिए परमेश्वर को पुकारें। क्या आप पाप के साथ अपनी लड़ाई को इसी तरह, अर्थात् स्वयं शैतान के साथ एक युद्ध के रूप में देखते हैं? चाहे आप ऐसा देखें या न देखें, सच तो यही रहेगा कि: हम स्वयं को नहीं बचा सकते; हमें परमेश्वर की आवश्यकता है कि वह हमें छुड़ाए।
इसी कारण से परीक्षा के विरुद्ध प्रतिदिन प्रार्थना करना कोई वैकल्पिक बात नहीं, बल्कि अत्यन्त आवश्यक बात है—और यीशु ने स्वयं हमें इसी तरह प्रार्थना करने की आज्ञा इसलिए दी थी, क्योंकि वह हमारी कमजोरी जानता है।
हमारी संस्कृति कहती है कि “यदि आप गिर जाओ, तो बस स्वयं को झाड़ लो। यदि किसी गड्ढे में जा पड़ो, तो स्वयं ही ऊपर चढ़कर बाहर आ जाओ। यदि आप कंगाल हो जाओ, तो तब तक और अधिक मेहनत करो जब तक कि आप जीवन में सफल न हो जाओ।” इस तरह का दृढ़ संकल्प विद्यालय या कारोबार में तो आपके काम आ सकता है, परन्तु यह आपको पाप और परीक्षा से नहीं बचा सकता। बाइबल परीक्षा और बुराई को ऐसी बाधाओं के रूप में नहीं दर्शाती, जिन्हें आप केवल अपनी सामर्थ्य से पार कर लें, बल्कि इसके बजाय उन्हें ऐसे शत्रुओं के रूप में दर्शाती है, जिनसे आप किसी छुड़ाने वाले की सहायता के बिना बच नहीं सकते। पाप का विरोध करना कोई ऐसी मारपीट वाली फिल्म नहीं है, जिसके नायक आप स्वयं हों। यह एक बचाव अभियान है, जहाँ मसीह ही छुड़ाने वाला है।
और परीक्षा का विरोध कैसे करें, इसे समझना इस बात को जानने से आरम्भ होता है कि जीत आत्म-निर्भरता से नहीं, बल्कि दूसरों पर निर्भर होने से मिलती है।
शायद आप स्वयं को डाई हार्ड (Die Hard) फिल्म के जॉन मैकक्लेन जैसा देखें, जो नाकाटोमी बाजार में एक मुश्किल परिस्थिति में फँसा हुआ है, (और वह क्रिसमस का दिन भी है!) परन्तु आपको पूरा भरोसा है कि आप कोई न कोई तरीका निकाल लोगे, लड़कर बाहर निकल आओगे, और सबको बचा लोगे। यही तो महानायक का मिथक है: हम हमेशा कोई न कोई रास्ता ढूँढ़ ही लेते हैं। परन्तु आपका जीवन शायद कैप्टन फिलिप्स की कहानी से अधिक मिलता-जुलता है: आप कमजोर पड़ गए हैं, शत्रु आप पर हावी हो गए हैं, और आप पूरी तरह से किसी और पर निर्भर हैं (जैसे SEAL टीम 6 पर) कि वे आकर आपको बचाएँ। जब परीक्षा की बात आती है, तो प्रश्न यह नहीं होता कि आप उसका सामना करेंगे या नहीं, बल्कि यह होता है कि आप उसका सामना कब करेंगे। और जब पाप की बात आती है, तो सच्चाई यह है कि हममें से कोई भी बिना चोटिल हुए स्वर्ग नहीं पहुँच पाएगा।
हर विश्वासी अपना पूरा जीवन परीक्षाओं से लड़ते हुए बिताएगा; यद्यपि ये लड़ाइयाँ अलग-अलग तरह की हो सकती हैं, परन्तु हममें से कोई भी इनसे पूरी तरह बच नहीं पाता।
मुझे सिंह बहुत पसन्द हैं। वे बलवान, शाही और भयंकर होते हैं। तो फिर, इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है कि यीशु को यहूदा का सिंह कहा गया है। सिंहों की जो तस्वीरें मुझे सबसे अधिक पसन्द हैं, वे उनकी उच्च-गुणवत्ता वाली करीब से ली गई तस्वीरें हैं। ताकत के लिए बने उनके जबड़े, बढ़िया शिकारी की तरह उनकी पैनी दृष्टि, और एक अगुवे की तरह उनकी शानदार गर्दन के बाल। परन्तु जो बात मुझे सबसे अधिक पसन्द है, वह उनकी चोटें हैं। किसी सिंह का मुँह जंगल में लड़ी गई, उन सैकड़ों लड़ाइयों की कहानी कहता है, जिनमें वह जीवित बचा है। हर एक चोट एक गवाही है कि उन्होंने मुश्किलों का सामना किया है, वे लड़े हैं, उनका लहू बहा है, और फिर भी वे जीवित हैं।
मेरे विचार से स्वर्ग में हमारे साथ भी कुछ ऐसा ही होगा। यदि आप उस जगह हमारी आत्माओं को देख पाते, तो आपको कुछ बहुत ही शानदार बात दिखाई देती… परन्तु साथ ही, उन पर आत्मिक चोटों के निशान भी होते। हर एक निशान पाप के साथ लड़ी गई लड़ाई के एक और दौर की कहानी कहता। हम निश्चय ही अपने घर पहुँचेंगे, परन्तु हममें से कोई भी बिना चोटों के वहाँ नहीं पहुँचेगा। सिंहों की तरह, हम भी पाप के साथ लड़ी गई अपनी लड़ाइयों के निशान अपने साथ लेकर जाएँगे।
यहाँ एक कड़वी सच्चाई मिलती है कि: प्रश्न यह नहीं है कि आप बुराई के जाल में फँसेंगे या नहीं, और क्या आपको उससे छुड़ाए जाने की आवश्यकता पड़ेगी या नहीं, बल्कि प्रश्न यह है कि ऐसा कब होगा। और जब आप स्वयं को परीक्षा की जकड़ में देखें, तो याद रखें कि यीशु ने आपको प्रार्थना करना कैसे सिखाया था: “हमें… बुराई से बचा” (मत्ती 6:13)।
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चिन्तन के लिए प्रश्न:
- आपके विचार से जब परीक्षा की बात आती है, तो हम अक्सर अपनी स्वयं की सामर्थ्य को आवश्यकता से अधिक क्यों आँक लेते हैं? क्या आप अपने जीवन का कोई ऐसा उदाहरण सोच सकते हैं?
- यीशु हमें प्रार्थना करना सिखाता है कि “हमें परीक्षा में न ला” (मत्ती 6:13)। यदि आप नियमित रूप से और विशेषरूप से यह प्रार्थना करें, तो आपके प्रार्थना के जीवन में क्या बदलाव आ सकता है?
- हम किन तरीकों से परीक्षा से “बचे रहने” का अभ्यास कर सकते हैं (1 कुरिं. 6:18; 2 तीमु. 2:22), इसके बजाय कि हम यह मान लें कि हम उससे लड़ने के लिए पर्याप्त मजबूत हैं?
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भाग III: पहचान
पहचान की राजनीति के इस दौर में, जहाँ मनुष्यों को अनगिनत समूहों में बाँटकर, सांस्कृतिक बिसात पर मोहरों की तरह उपयोग किया जा रहा है, तो हो सकता है कि मसीही लोग शायद “पहचान” की पूरी अवधारणा पर ही सन्देह करने की परीक्षा में पड़ जाएँ, परन्तु यह एक गलती होगी।
पवित्रशास्त्र में पहचान शब्द दिखाई नहीं पड़ता, परन्तु निश्चय ही इसका विचार मिलता है। पहचान बस इस प्रश्न का उत्तर है कि “मैं कौन हूँ?”
रोमियों 6 अध्याय में, पौलुस स्पष्ट कहता है कि: हमारी पहचान और हमारा पवित्र होना, दोनों साथ-साथ चलते हैं (रोमि. 6:4, 6, 11)। इसी कारण से, यदि आपकी पहचान की समझ अधूरी या कमजोर है, तो आपको पाप को समाप्त करने में संघर्ष करना पड़ेगा। परन्तु यदि आप जानते हैं कि यीशु में आप कौन हैं, तो आप उस जीवन की उस नवीनता में चल सकते हैं जो यीशु में आपको मिली है।
यहीं पर बाइबल में परीक्षा गहन रूप से व्यावहारिक हो जाती है, क्योंकि पवित्रशास्त्र लगातार पाप का विरोध करने की हमारी क्षमता को इस समझ से जोड़ता है कि मसीह में हम कौन हैं।
अत:, क्या आप जानते हैं कि आप कौन हैं? जब यह प्रश्न पूछा जाएगा, तो शायद अधिकांश मसीही रुककर कहेंगे, “मुझे लगता है कि हाँ।” परन्तु आपके लिए मेरी प्रार्थना है कि इस खण्ड के अन्त तक, आप पूरी स्पष्टता और दृढ़ विश्वास के साथ कह पाएँगे कि: “मैं जानता हूँ कि मसीह में मैं कौन हूँ।” जब आपको यह मालूम होगा कि यीशु में आप कौन हैं, तो सुसमाचार में आपके लिए उपलब्ध सारी सामर्थ्य के साथ आप पाप और परीक्षा का विरोध कर पाने में सक्षम होंगे। रोमियों 6 अध्याय में, पौलुस हमारी पहचान को समझने में हमारी सहायता करने के लिए बपतिस्मा और दासत्व की दो शक्तिशाली छवियों का उपयोग करता है। और बपतिस्मा मसीह के साथ हमारी एकता को दिखाता है। और दासत्व मसीह के अधीन हमारी नयी प्रभुता को दिखाता है।
ये छवियाँ विश्वासियों के भरोसे को मानवीय इच्छाशक्ति पर नहीं, बल्कि सुसमाचार की सच्चाई पर टिकाने के द्वारा, उन्हें परीक्षाओं से लड़ने के लिए तैयार करती हैं।
थोड़ा समय निकालकर रोमियों 6 अध्याय पढ़ें, और फिर वापस आकर इस खण्ड को पूरा करें।
पौलुस का तर्क यह नहीं है कि “आपको पाप में इसलिए नहीं पड़ना चाहिए, क्योंकि आपने बपतिस्मा लिया है।” बल्कि, उसका तर्क यह है कि “आप पाप में इसलिए पड़ नहीं सकते, क्योंकि आपने बपतिस्मा लिया है।” बपतिस्मा मसीह के साथ आपकी एकता की ओर संकेत करता है: अर्थात् आप पाप के लिए मर चुके हैं और परमेश्वर के लिए जीवित हैं।
पौलुस के द्वारा उपयोग की गई भाषा पर ध्यान दें:
— उसके साथ मृत्यु में गाड़े गए (आ. 4)
— उसके साथ नये जीवन के लिए जिलाए गए (आ. 4)
— उसके साथ मृत्यु की समानता में जुट हुए (आ. 5)
— उसके साथ जी उठने की समानता में जुट जाएँगे (आ. 5)
— मसीह के साथ मर गए (आ. 8)
— उसके साथ जीएँगे (आ. 8)
बपतिस्मा का अर्थ है कि आपकी आत्मा हमेशा के लिए मसीह के साथ जुड़ गई है। आप उसमें हैं, और वह आपमें है।
इसी कारण से पौलुस पूछ सकता है: “हम जब पाप के लिये मर गए तो फिर आगे को उसमें कैसे जीवन बिताएँ?” (रोमि. 6:2)। हम ऐसा नहीं कर सकते। जीवनशैली के तौर पर तो बिलकुल नहीं। हमारा “पुराना मनुष्यत्व” मसीह के साथ क्रूस पर चढ़ाया गया था (आ. 6)। वह भ्रष्ट जड़ मर चुकी है, और एक नयी जड़—मसीह का जीवन—अब हममें बढ़ रही है।
इसमें कोई सन्देह नहीं कि हम अब भी पाप करते हैं। पौलुस इस जीवन में निष्पाप सिद्धता की शिक्षा नहीं दे रहा है। परन्तु वह यह कह रहा है कि यद्यपि मसीही लोग कभी-कभी ठोकर खाते हैं, फिर भी हम एक स्थापित जीवनशैली के रूप में पाप में नहीं पड़ते। ऐसा क्यों है? क्योंकि विश्वासी के जीवन में पाप की प्रभुता समाप्त हो चुकी है (आ. 9)।
इसी कारण से परीक्षा के बारे में रोमि. 6:14 के जैसे बाइबल के वचन इतना गहरा महत्व रखते हैं—वे हमें याद दिलाते हैं कि परीक्षा वास्तविक हो सकती है, परन्तु उसका अधिकार टूट चुका है।
इसका व्यावहारिक निष्कर्ष यह है: धार्मिकता से भरे एक जीवन जीने की आपकी क्षमता इस बात पर निर्भर करेगी कि आप अपने बपतिस्मा में चित्रित वास्तविकता को कितना समझ पाते हैं और उस पर कितना विश्वास करते हैं।
— हम जानते हैं (आ. 6) कि हमारा पुराना मनुष्यत्व मसीह के साथ क्रूस पर चढ़ाया गया था।
— हम विश्वास करते हैं (आ. 8) कि यदि हम उसके साथ मरे हैं, तो उसके साथ जीएँगे भी।
— हम जानते हैं (आ. 9) कि अब मृत्यु की कोई प्रभुता नहीं रही।
— इसी कारण से, पौलुस कहता है (आ. 11), “ऐसे ही तुम भी अपने आप को पाप के लिये तो मरा, परन्तु परमेश्वर के लिये मसीह यीशु में जीवित समझो।”
उस “समझो” शब्द का अर्थ “गणना करना, सक्रिय रूप से मनन करना” है। दूसरे शब्दों में कहें तो उस बात पर विश्वास करने के लिए संघर्ष करना, जिसे आप पहले से ही जानते हैं कि वह सत्य है, अर्थात्: आप पाप के लिए मर चुके हैं और मसीह में परमेश्वर के लिए जीवित हैं।
पौलुस की दूसरी छवि दासत्व की है। यह बात सीधी-सादी है:
— आप पहले पाप के दास थे।
— अब आप स्वतंत्र कर दिए गए हैं।
— आप मसीह के दास के रूप में उसके हैं।
— इसलिए, आज्ञाकारिता में अपने आप को उसे समर्पित करें।
पौलुस पाप और धार्मिकता को दास के स्वामियों के रूप में चित्रित करता है। आपने एक के अत्याचार को छोड़कर दूसरे की सेवा कैसे अपनाई? प्राचीन संसार में, एक दास तीन तरीकों से स्वतंत्रता प्राप्त कर सकता था:
- स्वयं को खरीदकर।
- उसके स्वामी की मृत्यु हो जाने पर।
- उसे किसी नये स्वामी द्वारा खरीद लिए जाने पर।
जब पाप की बात आती है, तो पहला विकल्प हमारे लिए असम्भव है। हम पैसा देकर पाप से मुक्ति नहीं पा सकते। परन्तु अनुग्रह के द्वारा सुसमाचार हमारे लिए दूसरा और तीसरा विकल्प पूरा करता है:
— यीशु ने पाप को क्रूस पर ले जाकर आपके पुराने स्वामी को मार डाला (रोमि. 6:6)।
— यीशु ने आपको अपने लिए मोल ले लिया (1 कुरिं. 6:19–20)।
इसलिए पौलुस कह सकता है: “तुम अपने पुराने स्वामी की सेवा करते नहीं रह सकते। वह तो मर चुका है!”
यह सच्चाई उन विश्वासियों को सीधे तौर पर मजबूत करती है जो आत्मिक युद्ध में लगे हुए हैं, और उन्हें याद दिलाती है कि परीक्षा कोई अकेले लड़े जाने वाली लड़ाई नहीं है, बल्कि इसे पहले ही जीत पाए हुए एक नये स्वामी के साथ मिलकर लड़ा जाता है।
प्रभुता की प्रतिज्ञा
बाइबल में पाई जाने वाली सबसे बहुमूल्य प्रतिज्ञाओं में से एक यह है:
“तब तुम पर पाप की प्रभुता न होगी” (रोमि. 6:14)।
कोई प्रभुता नहीं। कोई शक्ति नहीं। कोई अधिकार नहीं। जब भी परीक्षा आपके जीवन में अपना बुरा सिर उठाए, तो स्वयं से यह कहें: “मुझ पर पाप की कोई प्रभुता नहीं है। मुझ पर केवल मसीह की प्रभुता है।”
परीक्षा आएगी, परन्तु मुझे उसके आगे नहीं झुकना। हो सकता है कि मैं ठोकर खाऊँ, परन्तु मुझे नीचे नहीं पड़े रहना। हो सकता है कि संसार, शरीर की अभिलाषाएँ और शैतान मुझ पर दबाव डालें, परन्तु मैं मजबूती से खड़ा रह सकता हूँ। मैं इसलिए बदल सकता हूँ, क्योंकि मुझ पर पाप की कोई प्रभुता नहीं है। यह कोई स्वयं-सहायता नहीं है—यही सुसमाचार की सच्चाई है।
इसी कारण से बाइबल में पाई जाने वाली परीक्षा का अध्ययन करना बहुत आवश्यक है—यह हमें सिखाती है कि कैसे परमेश्वर ने मसीह के माध्यम से पाप के अधिकार को पहले ही तोड़ दिया है।
इसलिए, जब आप परीक्षा में पड़ें—चाहे वह वासना, क्रोध, चुगली, कड़वाहट, अधिक काम, या निराशा की परीक्षा हो—तो स्वयं से रोमियों 6 अध्याय की बातें कहें: “मैं अब आदम में नहीं हूँ; मैं मसीह में हूँ। मेरा पुराना मनुष्यत्व उसके साथ क्रूस पर चढ़ा दिया गया। मेरा नया मनुष्यत्व उसमें जीवित है। मैं एक नये स्वामी का हूँ।” और फिर होने दें कि वह सच्चाई आपको आराधना भरी आज्ञाकारिता की ओर ले जाए।
और जब दबाव बहुत अधिक महसूस हो, तो याद रखें कि परीक्षाओं से लड़ने में आपको असहाय नहीं छोड़ा गया है—मसीह में आपकी पहचान ही आत्मिक जीत के लिए परमेश्वर का दिया हुआ हथियार है।
मसीह में आपकी पहचान केवल जोश दिलाने वाला कोई नारा नहीं है। यह एक अटल सच्चाई है: आप उसकी मृत्यु और पुनरुत्थान में मसीह के साथ एक हो गए हैं, और आप उसके अनुग्रह से भरी प्रभुता के अधीन हैं। इस पर विश्वास करें, इस पर विचार करें, इस पर मनन करें, और इसी के अनुसार जीएँ। आप असल में यही हैं: पाप के लिए मरे हुए, परमेश्वर के लिए जीवित, और आनन्द के साथ मसीह से जुड़े हुए।
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चिन्तन के लिए प्रश्न:
- बपतिस्मा किस तरह मसीह के साथ आपकी एकता को दिखाता है? पाप का विरोध करने के लिए यह इतना आवश्यक क्यों है?
- पौलुस कहता है, “तब तुम पर पाप की प्रभुता न होगी” (रोमि. 6:14)। यह प्रतिज्ञा परीक्षा के साथ आपकी प्रतिदिन की लड़ाई को कैसे आकार दे सकती है?
- स्वयं को “मसीह के दास” के रूप में देखना क्यों आवश्यक है? यह सच्चाई डर के बजाय स्वतंत्रता कैसे ला सकती है?
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भाग IV: उपाय
“रात बहुत बीत गई है, और दिन निकलने पर है; इसलिये हम अन्धकार के कामों को
त्याग कर ज्योति के हथियार बाँध लें।”
—रोमियों 13:12
पाप एक गंदे चोगे जैसा है। एक मसीही के तौर पर आपका प्रतिदिन का काम पाप के गंदे चिथड़ों को उतार फेंकना और मसीह की ढाल पहन लेना है—अर्थात् उसे उतार फेंकना, जो आपको मार डालेगा और उसे पहन लेना, जो आपको जीवित रखेगा।
यह आत्मिक युद्ध की भाषा है, जो हमें याद दिलाती है कि हर विश्वासी एक ऐसे युद्धक्षेत्र में जागता है, जहाँ उद्देश्य के साथ पवित्रता का अभ्यास करना होता है।
तैनाती पर गए सैनिक युद्ध-क्षेत्र में व्यायामशाला की निक्करें और चप्पलें पहनकर नहीं टहलते। वे ढ़ाल को पहनते हैं: जिनमें टोप, झिलम, हथियार—सब कुछ शामिल है। यदि आप जागे हुए हैं, तो आपने ढाल पहनी हुई है। पौलुस यहाँ यही कह रहा है: “अब आप सोए हुए नहीं हैं। जाग उठो। सूरज निकल आया है। अपनी ढाल पहन लो।”
नये नियम में, ढाल वह तरीका नहीं है, जिससे आप जीत हासिल करते हैं; बल्कि यह वह तरीका है, जिससे आप उस विजय में मजबूती से खड़े रहते हैं, जिसे मसीह पहले ही जीत चुका है। मसीही जीवन के मामले में, आप लड़ाई जीतने के लिए ढाल नहीं पहनते। इसके बजाय, आप एक ऐसे सैनिक की तरह जीते हैं, जो पहले से ही जीतने वाले पक्ष में है। विचार करें कि पौलुस ने रोमियों से क्या कहा था: “वरन् प्रभु यीशु मसीह को पहन लो, और शरीर की अभिलाषाओं को पूरा करने का उपाय न करो” (रोमि. 13:14)।
पौलुस गलातियों से कहता है कि जिन सब लोगों ने मसीह में बपतिस्मा लिया है, उन्होंने पहले ही “मसीह को पहन लिया है” (गला. 3:27)। परिस्थिति के रूप से, जिस पल आप उस पर भरोसा करते हैं, उसी पल आप मसीह से ढक जाते हैं। और फिर भी, रोमियों 13 अध्याय में, पौलुस हमें प्रतिदिन मसीह को पहनते रहने के लिए भी कहता है। ऐसा क्यों है? क्योंकि मसीही जीवन का स्वरूप यही है: जब हम मसीह के पास आते हैं, तो हम पश्चाताप करते हैं, और फिर हम लगातार पश्चाताप करते रहते हैं। इसी रीति से, हम यीशु पर विश्वास करते हैं, और फिर हम लगातार विश्वास करते रहते हैं। हम मसीह की पहचान अपनाते हैं, और जब तक वह हमें अपने घर नहीं बुला लेता, तब तक हम उसी के अनुसार जीते रहते हैं।
पौलुस इसे दूसरी जगह इस तरह कहता है: “पुराना खमीर निकाल कर… तुम अखमीरी हो” (1 कुरिं. 5:7)। और फिर से कहता है: “क्योंकि तुम तो पहले अन्धकार थे, परन्तु अब प्रभु में ज्योति हो, अत: ज्योति की सन्तान के समान चलो” (इफि. 5:8)। जिस शब्द का अनुवाद “उपाय” किया गया है, वह यूनानी भाषा का प्रोनोइया (pronoia), शब्द है, जिसका शाब्दिक अर्थ “दूरदर्शिता” या “पहले से योजना बनाना” होता है। प्राचीन यूनानी भाषा में, यह अक्सर भविष्य के लिए समझदारी भरी योजना बनाने का वर्णन करता था, जैसे संसाधनों का बजट बनाना या किसी यात्रा की तैयारी करना। नये नियम में यह शब्द केवल एक और जगह प्रेरितों के काम 24:2 में दिखाई देता है, जहाँ हाकिम फेलिक्स के उस देश पर शासन करने की “दूरदर्शिता” (प्रोनोइया (pronoia)) के लिए तिरतुल्लुस उसकी चापलूसी करता है।
इसलिए जब पौलुस कहता है ”शरीर की अभिलाषाओं को पूरा करने का उपाय न करो,” तो उसके कहने का अर्थ है, “पाप को आगे बढ़ने का मौका मत दो। उसके लिए योजना मत बनाओ। उसके लिए कोई रास्ता मत बनाओ।” जिस तरह आप धार्मिकता के लिए समझदारी से योजना बना सकते हैं, उसी तरह आप पाप के लिए भी मूर्खतापूर्ण योजना बना सकते हैं। पौलुस की आज्ञा है कि पाप को तभी समाप्त कर दो, जब वह केवल एक विचार के रूप में हो।
बाइबल परीक्षा का विरोध करने के बारे में ठीक यही सिखाती है: हम केवल अपनी जगह पर डटे नहीं रहते—बल्कि हम उन मौकों को ही हटा देते हैं, जो पाप को बढ़ावा देते हैं।
वास्तविकता यह है कि पाप केवल अचानक से नहीं होता; यह तैयारी से पनपता है। धार्मिकता भी अचानक से नहीं होती। यदि आप चाहते हैं कि पवित्रता जीत जाए और पाप हार जाए, तो आपको एक योजना की आवश्यकता पड़ेगी। अपने पैसों के बारे में सोचिए। आपका सबसे पवित्र भाग हर एक रुपये को परमेश्वर की महिमा के लिए खर्च करना चाहता है। आमीन! परन्तु आपका कम पवित्र वाला दूसरा भाग, उसे स्वार्थी होकर खर्च करना चाहता है। कौन-सा भाग जीतता है? वह जिसके लिए आपने योजना बनाई थी। इसी कारण से आप एक बजट बनाते हैं, जिसमें हर एक रुपये को एक पवित्र काम सौंपा जाता है।
या अपनी सेहत के बारे में सोचिए। आप यूँ ही चुस्त नहीं बन जाते। आप खाने की योजना बनाते हैं, कसरत करने का समय निर्धारित करते हैं, और अस्वास्थ्यकर भोजन को घर से बाहर रखते हैं। इसके लिए मंशा रखने की आवश्यकता होती है। ठीक इसी रीति से, धार्मिकता भी अचानक से नहीं बढ़ती। यदि आप पवित्रता में चलना चाहते हैं, तो आपको ऐसा जान-बूझकर करना होगा। इसका अर्थ ऐसी आदतें बनाना है, जो आत्मा को पोषित करें और ऐसी आदतें छोड़नी होंगी, जो शरीर की अभिलाषाओं को बढ़ावा दें।
अपनी आत्मा को उन बातों से पोषित करें जो भक्ति को मजबूत करती हैं—जैसे प्रार्थना, पवित्रशास्त्र, परमेश्वर के लोगों के साथ संगति, और अपनी स्थानीय कलीसिया में जवाबदेही। इसके अलावा, यह सुनिश्चित करें कि आप शरीर की अभिलाषाओं को बढ़ावा देने वाले मौकों को हटाकर उन्हें भूखा रखें। नीचे दी गई उन आम परीक्षाओं और उन तरीकों के बारे में सोचिए, जिनसे आप एक अच्छी योजना बनाकर उन्हें कमजोर कर सकते हैं।
— अवैध सम्बन्ध: बिली ग्राहम के नियम वाला जीवन जीएँ—यह केवल “ऐसा हुआ ही नहीं,” बल्कि यह “ऐसा हो ही नहीं सकता” था, क्योंकि वह कभी भी कहीं अकेले नहीं जाते थे। इसके अलावा, किसी दूसरे जीवन या किसी “आदर्श” जीवनसाथी के बारे में मनगढ़ंत कल्पनाओं में न खोएँ।
— अश्लील सामग्री: इस तक पहुँच ही समाप्त कर दें। अपने सभी यंत्रों पर कवनेंट आइज़ (Covenant Eyes) जैसे सॉफ्टवेयर का उपयोग करके फिल्टर लगाएँ। अपने परीक्षाओं और पापों को किसी जवाबदेह साथी के सामने स्वीकार करें।
— आलस्य और स्क्रीन की लत: अपने फोन पर स्क्रीन उपयोग करने की समय-सीमा निर्धारित करें। अपनी सदस्यताएँ रद्द कर दें। सोशल मीडिया पर लगातार उंगली चलाते रहने के बजाय, पढ़ने या मित्रों के साथ समय बिताने का चुनाव करें।
— ईर्ष्या और झगड़े: यदि सोशल मीडिया आपमें गुस्सा या डाह उत्पन्न करता है, तो उसे हटा दें। उस बात को मत उकसाओ जो आपको जहर से भर दे।
— लालच और जमाखोरी: अपने दान को स्वयं-भुगतान पर लगा दें, ताकि स्वार्थ के हावी होने से पहले ही उदारता काम कर जाए।
— उपभोक्तावाद: ऑनलाइन या मॉल में “बस देखते” न रहें। एक सूची बनाएँ और बजट के भीतर ही खरीदें।
— व्यभिचार: यदि आपका रिश्ता बार-बार सीमाओं को लाँघ रहा है, तो उसे फिर से व्यवस्थित करें या परीक्षा से दूर भागें। उसकी सीमा पर नाचना बन्द करें।
— पेटूपन: भूखे पेट किराने का सामान न खरीदें, और न ही घर को खाने-पीने के सामान से भरकर रखें।
— शराब: यदि शराब पीना एक फंदा है, तो घर में “बस आवश्यकता पड़ने पर” उपयोग करने के बहाने शराब न रखें। यह देखने का प्रयास न करें कि आप खाई में गिरने से पहले उसके किनारे पर कितना निकट तक जा सकते हो।
— लत: उन जगहों, लोगों और परिस्थितियों से दूर रहें, जो आपको वापस बन्धुआई में खींच ले जाती हैं।
यीशु ने हमें प्रार्थना करना सिखाया, “हमें परीक्षा में न ला।” भले ही जंगल में यीशु की परीक्षा हुई थी और उसने शैतान पर पूरी तरह से जीत हासिल की थी, फिर भी वह अपने अनुयायियों को सिखाता है कि वे जान-बूझकर परीक्षा की खोज न करें। उसकी जीत का अर्थ यह नहीं है कि हमें आत्मिक खतरे का पीछा करना चाहिए; इसका अर्थ यह है कि हमें उस एक पर भरोसा करना चाहिए, जिसने उस पर जीत हासिल की।
तो फिर हम स्वयं चलकर उसके मार्ग में क्यों जाएँ?
इस तरह की श्रेणी में खतरा यह होता है कि: यदि आपको केवल यही सुनाई देता है कि “और कठिन प्रयास करो,” तो या तो आप तब घमण्डी हो जाओगे, जब आपको लगेगा कि आप सफल हो रहे हो, या तब निराश हो जाओगे, जब आपको पता चलेगा कि आप असफल हो रहे हो। मुद्दा यह नहीं है। पौलुस यह नहीं कहता कि “मसीह को पहन लो ताकि परमेश्वर आपसे प्रेम करे।” वह कहता है कि “मसीह को पहन लो क्योंकि परमेश्वर पहले से ही आपसे प्रेम करता है।” इसलिए कल सुबह, केवल यह मत कहना कि “मुझे पाप से लड़ना है।” बल्कि यह कहना कि “मसीह ने मेरे लिए युद्ध लड़ा है। युद्ध पहले से ही जीता जा चुका है। और यह मेरे लड़ने के तरीके के बारे में सब कुछ बदल देता है। मैं आज जीत के लिए उपाय करूँगा, और हर दिन तब तक उपाय करूँगा, जब तक यीशु मुझे अपने घर नहीं बुला लेता।”
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चिन्तन के लिए प्रश्न:
- पौलुस हमसे कहता है कि “शरीर की अभिलाषाओं को पूरा करने का उपाय न करो”
(रोमि. 13:14)। “दूरदर्शिता” का यह विचार, परीक्षा का सामना करने के आपके तरीके को कैसे बदलता है? - आप अपने प्रतिदिन के जीवन में “आत्मा को पोषित” कैसे कर सकते हैं और शरीर की अभिलाषाओं को कैसे भूखा रख सकते हैं? इसके कुछ व्यावहारिक तरीके कौन से हैं?
- यह याद रखना क्यों महत्वपूर्ण है कि मसीह को पहन लेना, परमेश्वर का प्रेम कमाने का कोई तरीका नहीं है, बल्कि यह पहले से ही प्रेम किए जाने के निमित्त एक प्रतिक्रिया है?
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भाग V: कलीसिया
जो पहला झूठ परीक्षा हमारे कानों में फुसफुसाती है, वह यह है कि: “तुम बिलकुल अकेले हो।”
चुप्पी और गोपनीयता में ही पाप पनपता है। वह चाहता है कि आप यह मान लें कि आपके इस संघर्ष को कोई और नहीं समझ सकता, कि यदि आपने कुछ कहा, तो केवल आपको ठुकरा दिया जाएगा, और यदि आप लड़खड़ा गए, तो आपको अकेला छोड़ दिया जाएगा। परन्तु यीशु ने हमें अलग-थलग करके नहीं बचाया; उसने हमें एक परिवार में अपना लिया—एक ऐसा परिवार, जो आप ही की तरह पापियों और गलती करने वालों से भरा हुआ है। हर मसीही लड़ता है, परन्तु कोई भी मसीही अकेले रहकर अच्छी तरह से नहीं लड़ सकता। आदम का अकेले रहना अच्छा नहीं है (उत्प. 2:18, इब्रा. 3:12-13, इब्रा. 10:24-25)।
परीक्षा हमें कमजोर कर देती है, हमारी आँखों पर परदा डाल देती है, और हमें सबसे अलग-थलग कर देती है (नीति. 18:1)। दूसरी ओर, परमेश्वर के आत्मा की सहायता से, कलीसिया हमें इस बात की याद दिलाती है कि वास्तविकता क्या है, और जब हम भटक जाते हैं, तो हमें वापस ले आती है; और जब हम लड़खड़ा जाते हैं, तो हमें ऊपर उठाती है (याकू. 5:16)।
कलीसिया हमें सच्चाई याद दिलाती है। परीक्षा हमेशा झूठ का सहारा लेती है। यह आपसे कहती है कि पाप आपको सन्तुष्टि देगा, कि गोपनीयता आपकी रक्षा करेगी, और यह कि पश्चाताप कल तक प्रतीक्षा कर सकता है। परन्तु जब आप सुसमाचार का प्रचार करने वाली कलीसिया से जुड़ते हैं, तो आप अपने आसपास ऐसे लोगों को पाते हैं, जो आपको परमेश्वर के वचन की सच्चाई याद दिलाते हैं। इब्रा. 3:13 कहता है,“हर दिन एक दूसरे को समझाते रहो, ऐसा न हो कि तुम में से कोई जन पाप के छल में आकर कठोर हो जाए।” अकेले रह जाने पर, हम निश्चित रूप से धोखा खा जाएँगे। परन्तु कलीसिया में एक साथ मिलकर, हम पाप को उसके असली रूप में देख पाएँगे।
कलीसिया हमें खतरे से पीछे खींच लेती है। कई बार ऐसा होता है, जब किसी भाई या बहन का कोई तीखा शब्द, आपके हाथ को पकड़े हुए उस हाथ जैसा होता है, जो आपको किसी चट्टान के किनारे से खींचकर दूर ले जाता है। शायद वह शब्द चुभे, परन्तु वह आपको बचाता है। याकूब 5:19–20 हमें याद दिलाता है कि जब कोई किसी भटके हुए पापी को वापस सही मार्ग पर लाता है, तो “वह एक प्राण को मृत्यु से बचाएगा और अनेक पापों पर परदा डालेगा।” अक्सर बचाव किसी चेतावनी, डाँट-फटकार, या विनती के रूप में आता है, परन्तु यह हर हाल में अनुग्रह ही होता है।
युद्ध में कलीसिया हमारे साथ खड़ी रहती है। अक्सर परीक्षा हमें लज्जित और निर्बलता महसूस कराती है। परन्तु परमेश्वर हमें ऐसे भाई-बहन देता है, जो लज्जा को हावी नहीं होने देते। उस लकवे से ग्रस्त व्यक्ति के बारे में सोचिए, जिसके मित्रों ने उसे छत से नीचे उतारकर यीशु के पास पहुँचाया था
(मर. 2:1–12)। वह स्वयं चलकर वहाँ नहीं जा सकता था—वे ही उसे उठाकर ले गए थे। इसी रीति से, जब परीक्षा आपको कमजोर कर देती है, तो कलीसिया प्रार्थना के द्वारा आपको सहारा देती है, आपके लिए मध्यस्थता करती है, और आपको उस उद्धारकर्ता की ओर ले जाती है, जो अपने लोगों को कभी नहीं छोड़ता और न ही कभी उन्हें त्यागता है।
कोई गलती न करें: कलीसिया आपकी उद्धारकर्ता नहीं है—परन्तु यीशु ही आपका उद्धारकर्ता है। बल्कि यीशु ने अपनी देह—अर्थात् कलीसिया—के माध्यम से हमें मजबूत करने का चुनाव किया है। हम योजना बनाते हैं, हम प्रार्थना करते हैं, और हम परीक्षा से दूर भागते हैं; परन्तु यदि हम स्वयं को परमेश्वर के लोगों से अलग कर लेते हैं, तो हम अपनी पराजय की ओर आधे मार्ग पर बढ़ चुके होते हैं। अकेले लड़ना, उस अनुग्रह के साधन के ही विरुद्ध लड़ने जैसा है, जिसे मसीह ने आपको प्रदान किया है। एक साथ मिलकर लड़ना ही, मसीह की इच्छा के अनुसार लड़ना है।
इसलिए, सहायता खोजने से पहले, तब तक प्रतीक्षा न करें, जब तक कि आप पूरी तरह से लड़खड़ाने न लगें। अपने झुण्ड के करीब ही बने रहें। उन भाई-बहनों के निकट रहें, जो आपको सच्चाई की याद दिलाएँगे, आपको खतरे से वापस खींच लेंगे, और युद्ध में आपके साथ खड़े होंगे।
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चिन्तन के लिए प्रश्न:
- पाप के लिए गोपनीयता इतनी उपजाऊ भूमि क्यों है? आपने अपने जीवन में या दूसरों के जीवन में जवाबदेही की सामर्थ्य कैसे देखी है?
- इब्रा. 3:13 हमें बताता है कि “हर दिन एक दूसरे को समझाते रहो।” आपके और आपकी कलीसिया के लिए असल, व्यावहारिक रूप में यह कैसा दिखता है?
- आप मसीह की देह के भीतर बिना किसी डर या लज्जा के सहायता कैसे दे सकते हैं और ले सकते हैं?
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भाग VI: दर्शन
बात सीधी-सादी है, परन्तु सीधी-सादी होने का अर्थ यह नहीं कि यह आसान है: आप अपनी पापी अभिलाषाओं को मार सकते हैं और आपको उन्हें मारना ही होगा। केवल उनका विरोध ही न करें, बल्कि उन्हें समाप्त कर दें। यहीं पर परीक्षा पर काबू पाना बेहद व्यावहारिक हो जाता है—केवल उस पल में “न” कहना ही नहीं, बल्कि एक ऐसा गहरा प्रेम विकसित करना आवश्यक है, जो पाप की शक्ति को बाहर निकाल दे।
मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि यह कोई बटन दबाने जितना आसान है, और निश्चय ही मैं अभी तक वहाँ नहीं पहुँचा हूँ। आपकी तरह, और प्रेरित पौलुस की तरह, और अनुग्रह से बचाए गए हर पापी की तरह, मैं अभी भी उस लक्ष्य की ओर बढ़ रहा हूँ। पौलुस लिखता है, “यह मतलब नहीं कि मैं पा चुका हूँ, या सिद्ध हो चुका हूँ; पर उस पदार्थ को पकड़ने के लिये दौड़ा चला जाता हूँ, जिसके लिये मसीह यीशु ने मुझे पकड़ा था” (फिलि. 3:12)।
परन्तु पाप को समाप्त करना रॉकेट विज्ञान जितना जटिल भी नहीं है (और ऐसा करने के लिए आपको अपना सारा सामान बेचकर किसी मठ में जाकर रहने की आवश्यकता नहीं है)। यहाँ तक कि पुराने समय के भिक्षुओं ने भी पाया था कि जंगल में भी वासना उनका पीछा किया करती थी। आरम्भिक कलीसिया के एक धर्माचार्य, जेरोम ने स्वीकार किया था कि जंगल के एकान्त में बिच्छुओं के बीच रहते हुए भी, उनका हृदय वासना की आग में जलता रहता था। उन्होंने लिखा:
कितनी बार, जब मैं जंगल में रह रहा था, तो सन्यासियों को रहने के लिए एक वीरान जगह देने वाले उस विशाल एकान्त में, जहाँ मैं जलते हुए सूरज की तपिश से झुलस रहा होता था, मुझे ऐसा लगता था कि मानो मैं रोम की विलासिता के बीच में हूँ! मेरा चेहरा पीला पड़ गया था, उपवास से मेरा शरीर ठण्डा पड़ गया था, और फिर भी मेरे इस ठण्डे शरीर के भीतर मेरा मन वासना की आग में जल रहा था, और वासना की लपटें तब भी भड़क उठती थीं, जबकि मेरा शरीर तो पहले से ही लगभग निष्प्राण हो चुका था।
अत:, यदि जंगल आपकी वासनाओं का इलाज नहीं कर सकता, तो आप जहाँ हो, वहीं रहकर उनसे कैसे लड़ सकते हो? यहीं पर आत्मिक युद्ध असली बन जाता है—जो शोर-शराबे वाला और नाटकीय नहीं, बल्कि शान्त और प्रतिदिन लड़ा जाने वाला होता है, जो हृदय के छिपे हुए कोनों में लड़ा जाता है।
चलो एक विचार प्रयोग से आरम्भ करते हैं: कल्पना करें कि आप एक ऐसी स्त्री के साथ अकेले हैं, जो आपकी पत्नी नहीं है। आपने पंद्रह मिनट पहले ही सीमा पार कर दी थी, और अब आप उस मोड़ को पार करने वाले हो जहाँ से वापसी सम्भव नहीं है। अचानक से, आपको सड़क पर एक ट्रक के आने की आवाज सुनाई देती है। वह उसका पिता है। वह कोई बहुत बड़ा व्यक्ति नहीं है, परन्तु वह बंदूकें और अपनी बेटी की रक्षा करने जैसी दो बातों में बहुत बड़ा है।
उस पल में, आपकी पापी अभिलाषाएँ भाप बनकर उड़ जाती हैं। ऐसा क्यों होता है? क्योंकि उन्हें एक और भी अधिक मजबूत अभिलाषा बाहर निकाल देती है, जो कि जीवित रहने की इच्छा है। इसी बात को थॉमस चालमर्स (और बाद में जॉन पाइपर) ने “एक नये लगाव की बाहर निकालने वाली सामर्थ्य” कहा था। इसमें कोई सन्देह नहीं कि इन पास्टर-ईश-वैज्ञानिकों ने यह विचार हवा में ही नहीं गढ़ लिया था; उन्हें यह बाइबल से मिला था। यूहन्ना लिखता है, “तुम न तो संसार से और न संसार में की वस्तुओं से प्रेम रखो…” (1 यूह. 2:15)। और यीशु ने कहा, “स्वर्ग का राज्य खेत में छिपे हुए धन के समान है…” (मत्ती 13:44)। परीक्षा के बारे में बाइबल की जिन कई आयतों को हम जानते हैं, वे असल में इसी बात के बारे में हैं—कि हमारी पसन्द को किसी बेहतर बात से फिर से व्यवस्थित किया जाए।
आप केवल अपनी इच्छाशक्ति से किसी अभिलाषा को समाप्त नहीं कर सकते; आप उसे किसी गहरी अभिलाषा से बदलकर समाप्त करते हैं। परीक्षा पर जय पाने का मूल मंत्र यही है।
एक और स्थिति की कल्पना करें। आप अश्लील सामग्री देखने वाले हैं। आप (एक स्तर पर) ऐसा नहीं करना चाहते, परन्तु आपको लगता है कि आपको ऐसा करना चाहिए। या शायद आपको लगता है कि आप ऐसा करने का हक रखते हैं। या शायद आप इतने थके हुए और सुन्न हो चुके हैं कि आपको कोई परवाह नहीं रही। आप इसे क्यों नहीं रोक पाते? क्योंकि, सड़क वाले उस पिता की परिस्थिति के विपरीत, आपको यहाँ कोई तत्काल खतरा नहीं दिखता। इसलिए, आप अपना फोन या लैपटॉप खोलकर उसमें डूब जाते हैं। परन्तु केवल इसलिए कि आपको खतरा दिखाई नहीं देता, तो इसका अर्थ यह नहीं है कि वह वहाँ मौजूद नहीं है। याद रखिए, पाप हमेशा अपने कुण्डे छिपाकर रखता है। वह अपनी छुरी पर धार लगाते हुए आपको आराम का एहसास दिलाता है। जैसा कि नीतिवचन चेतावनी देता है: “चतुर मनुष्य विपत्ति को आते देखकर छिप जाता है; परन्तु भोले लोग आगे बढ़कर दण्ड भोगते हैं” (नीति. 22:3)।
इसलिए, जब वासना आपको हानिरहित लगे, तो याद रखें कि भले ही वह साफ-साफ दिखाई न दे, परन्तु खतरा असली है। अगली बार जब आप किसी परीक्षा का सामना करें, तो मैं चाहता हूँ कि आप अपनी वासना के पार देखें और दूसरी तरफ होने वाले दुष्परिणामों को पहचानें।
— उस शर्मिंदगी और लज्जा को देखें, जो आपको बाद में महसूस होगी।
— अपनी गवाही के कमजोर पड़ने को देखें, और देखें कि पाखण्ड किस तरह सुसमाचार की सेवकाई को नुकसान पहुँचाता है।
— अपने जीवनसाथी, या भविष्य के जीवनसाथी के उन आँसुओं को देखें, जो आपके विश्वासघात के कारण छले गए हैं।
— अपने बच्चों और अपनी कलीसिया को होने वाले नुकसान को देखें।
— अनन्तकालीन प्रतिफलों के खो जाने को देखें।
परन्तु केवल खतरे को ही न देखें। साथ ही उस आनन्द को भी देखें, जो विश्वासयोग्यता के दूसरी तरफ आपकी प्रतीक्षा कर रहा है।
— अपने भविष्य के रूप को देखें: जो अधिक मजबूत, अधिक स्वतंत्र, अधिक पवित्र है।
— एक ऐसे यौन-सम्बन्ध वाले जीवन को देखें, जो आनन्द और भरोसे से भरा हो, या, यदि आपको अकेले रहने के लिए बुलाया गया है, तो एक ऐसा हृदय देखें, जो पाप की बेड़ियों से स्वतंत्र हो और पूरी तरह से मसीह को समर्पित हो।
— अपने विवाह को सन्देह और पीड़ा से स्वतंत्र देखें।
— अपनी सेवकाई को ईमानदारी से भरा हुआ देखें।
— अपने बच्चों को यह सीखते हुए देखें कि विश्वासयोग्यता कैसी दिखती है।
— जीवन का वह मुकुट देखें, जो उन लोगों के लिए रखा गया है, जो उसके प्रकट होने से प्रेम करते हैं (2 तीमु. 4:8)।
— स्वयं यीशु को देखें, जो आपकी आज्ञाकारिता से प्रसन्न है, क्योंकि आपने अपने चुनावों से यह दिखाया कि वह सचमुच आपका सबसे बड़ा निज धन है।
याद रखें कि यीशु ने क्या कहा था: “धन्य हैं वे, जिन के मन शुद्ध हैं, क्योंकि वे परमेश्वर को देखेंगे।” (मत्ती 5:8) यही सबसे बड़ा प्रतिफल है। यह केवल एक शुद्ध विवेक नहीं, केवल एक मजबूत विवाह नहीं, बल्कि स्वयं परमेश्वर का दर्शन है। मन का शुद्ध होना, भक्ति में एकचित्त होना है, जिसमें “आँखें केवल उसी पर टिकी हों।”
तो फिर, आप वासना से कैसे लड़ते हैं? आप देखकर लड़ते हैं। आप परीक्षा के सस्ते वादे के पार उसकी असली कीमत को देखते हैं, और आप पाप के आकर्षण के पार मसीह के गहरे आनन्द को देखते हैं। यही एक नये लगाव की बाहर निकालने वाली सामर्थ्य है। एक मजबूत इच्छा हमेशा एक कमजोर इच्छा को बाहर निकाल देती है। और सबसे मजबूत इच्छा यह है कि: परमेश्वर को आमने-सामने देखें।
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चिन्तन के लिए प्रश्न:
- थॉमस चालमर्स का “एक नये लगाव की बाहर निकालने वाली सामर्थ्य” से क्या अर्थ है? आपने इस सच्चाई को अपने जीवन में कैसे काम करते हुए देखा है?
- परीक्षा के पार उसके दुष्परिणामों को देखना (नीति. 22:3) उसकी शक्ति को कमजोर करने में कैसे सहायता करता है?
- कौन सा मजबूत लगाव—मसीह में कौन सा बड़ा आनन्द—अभी आपके जीवन में पापी अभिलाषाओं की जगह लेने में आपकी सहायता कर सकता है?
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भाग VII: परमेश्वर
“सबसे मेल मिलाप रखो, और उस पवित्रता के खोजी हो जिसके बिना कोई प्रभु
को कदापि न देखेगा।”
—इब्रानियों 12:14
बस यही बात है। यह दिन की तरह एकदम साफ है। पवित्रता के बिना, कोई भी प्रभु को नहीं देखेगा। इस बात को एक पल के लिए अपने भीतर उतरने दें। पवित्रता नहीं, तो स्वर्ग नहीं। पवित्रता नहीं, तो परमेश्वर नहीं। तो फिर हमें इसके साथ क्या करना चाहिए?
इन शब्दों को सुनकर हम तुरन्त अपने भीतर झाँकने की परीक्षा में पड़ जाते हैं। ठीक है, मुझे और अधिक मेहनत करनी होगी। मुझे इस बात को पूरा जोर लगाकर सम्भालना होगा। मुझे स्वयं को साफ-सुथरा बनाना होगा, ताकि परमेश्वर मुझे अपने पास आने दे।परन्तु इब्रानियों का लेखक, जो कह रहा है वह यह नहीं है। पवित्रता कोई ऐसी वस्तु नहीं है, जिसे आप स्वयं बनाते हैं; यह तो ऐसी वस्तु है, जिसके लिए आप तरसते हैं। यह ऐसी वस्तु है, जिसे परमेश्वर स्वयं अपनी आत्मा के द्वारा आपके भीतर उत्पन्न करता है। क्या आप परमेश्वर को देखना चाहते हैं? तो फिर, उसका अनुग्रह पहले से ही आपके भीतर काम कर रहा है। अब उसके अनुग्रह के द्वारा पवित्रता पाने का प्रयास करें, ताकि आपको इस जीवन में वह वस्तु मिल सके, जिसे आप सबसे अधिक चाहते हैं—अर्थात् स्वयं परमेश्वर।
शायद आपने जो सुना हो, उसके विपरीत पवित्रता मुख्य रूप से नियमों के बारे में नहीं है। यह तो आपकी भूख के बारे में है—कि आप किससे प्रेम करते हैं, किस बात के लिए तरसते हैं, किस बात की आपको तीव्र इच्छा है। दाऊद ने भजन संहिता 27:4 में कहा: “एक वर मैं ने यहोवा से माँगा है, उसी के यत्न में लगा रहूँगा…” क्या आपने देखा? एक वर, दस वर नहीं। परमेश्वर के लिए यही भूख पवित्रता का असली हृदय है।
धन्य वचनों में यीशु इस भूख को आशीष देता है: “धन्य हैं वे, जो धार्मिकता के भूखे और प्यासे हैं, क्योंकि वे तृप्त किए जाएँगे” (मत्ती 5:6)। मूल रूप से, पवित्रता एक नयी भूख का परिणाम है—जो परमेश्वर के द्वारा दी गई स्वयं उसी के लिए एक तीव्र लालसा है। यीशु ने यह भी कहा, “धन्य हैं वे, जिन के मन शुद्ध हैं, क्योंकि वे परमेश्वर को देखेंगे” (मत्ती 5:8)।
यह विस्मयकारी बात है। इससे बड़ा वादा और क्या हो सकता है? परमेश्वर को देखना—अस्पष्ट रूप से नहीं, और न ही दूर से—बल्कि आमने-सामने। मानवीय हृदय इसी के लिए बनाया गया था। यही पवित्रता का बड़ा प्रतिफल है।
क्या आप इस जुड़ाव को देख पा रहे हैं? पवित्रता और दर्शन आपस में जुड़े हुए हैं। केवल शुद्ध मन वाले ही परमेश्वर को देखेंगे। यदि पाप आपके हृदय को धुंधला कर देता है, तो यह आपके दर्शन को भी धुंधला कर देता है। परन्तु यदि आपका हृदय मसीह के द्वारा शुद्ध कर दिया गया है, तो आपका दर्शन तब तक स्पष्ट होता जाता है, जब तक कि आप उसे वैसे ही नहीं देख लेते, जैसा वह वास्तव में है। यूहन्ना हमें बताता है कि हम “उसको वैसा ही देखेंगे जैसा वह है” (1 यूह. 3:2), और यह आशा हमें स्वयं को शुद्ध करने की ओर ले जाती है (आ. 3)। यही कारण है कि मसीही जीवन हमेशा एक प्रकार का आत्मिक युद्ध होता है—जो मसीह पर अपनी आँखें लगाए रखने की एक दैनिक लड़ाई है।
अत: स्वयं से पूछें: किसी भी अन्य बात से बढ़कर आप क्या चाहते हैं? सांत्वना? सफलता? सुख-सुविधा? या परमेश्वर को आमने-सामने देखना? यही वह भूख है, जिसकी ओर पवित्रशास्त्र हमें प्रेरित करता है। आपकी भूख जितनी अधिक बढ़ती है, उतना ही आप परीक्षा की उस सच्ची परिभाषा को पहचानते हैं, जो बाइबल की शिक्षा हमें देती है: परीक्षा केवल एक प्रबल इच्छा नहीं है; यह एक प्रतिद्वंद्वी दर्शन है, जो परमेश्वर के लिए आपकी भूख को चुराने का प्रयास करती है।
द फ्लेमिंगोस (The Flamingos) के सन् 1959 के लोकप्रिय गीत, “आई ओनली हैव आइज़ फॉर यू” (I Only Have Eyes for You) के बारे में सोचिए। यदि आप कभी प्रेम में पड़े हैं, तो आप इस छवि को समझेंगे। जब आप किसी के प्रति पूरी तरह मुग्ध हो जाते हैं, तो बाकी सब कुछ धुंधला पड़ जाता है। ठीक यही तब होता है, जब आप मसीह के प्रति मुग्ध हो जाते हैं। संसार की परीक्षाएँ पृष्ठभूमि का शोर बनकर रह जाती हैं। पवित्रता केवल परीक्षा का विरोध करना मात्र नहीं रह जाती, बल्कि यह एक मुग्ध हृदय का उमड़ता हुआ भाव बन जाती है। यह आत्मिक युद्ध अपने सबसे गहन स्तर पर है—इसमें न तो चीखना-चिल्लाना है, और न ही कोई नाटकीयता है, बल्कि यह मसीह से इतनी गहनता से प्रेम करना है कि पाप अपना आकर्षण खो दे।
परन्तु आइए ईमानदार बनें: हम एक ऐसे संसार में रहते हैं, जो भटकावों से भरा हुआ है। परीक्षाएँ हमें लगातार जीवन के सही मार्ग से भटकाने का प्रयास करती रहती हैं। यदि आप केवल अपनी इच्छाशक्ति के दम पर इनका विरोध करने का प्रयास करेंगे, तो आप हार जाएँगे। आप स्वयं को भूखा रखकर पाप पर विजय नहीं पा सकते; आप मसीह में तृप्त होकर विजय पाते हैं। पौलुस ने कुलुस्सियों से कहा: “स्वर्गीय वस्तुओं पर ध्यान लगाओ…” (कुलु. 3:2–3)। आत्मिक युद्ध के बीच यही आत्मिक स्पष्टता है।
इसलिए, मैं आपसे पूछता हूँ: आपकी आत्मा किस बात की भूखी है? जब कोई आपको देख नहीं रहा होता, जब आप चिन्तारहित होते हैं, तब आप सबसे अधिक किस बात की चाहत रखते हैं?
इब्रानियों की पत्री बताती है कि पवित्रता के बिना आप परमेश्वर को नहीं देख पाएँगे। यीशु कहता है कि केवल वही लोग परमेश्वर को देख पाएँगे, जिनका मन शुद्ध है। यूहन्ना कहता है कि हमारी आशा उसको वैसा ही देखना है, जैसा वह वास्तव में है। भजनकार कहता है कि प्रभु की सुन्दरता ही खोजने योग्य बात है। ये सभी सच्चाइयाँ साथ मिलकर परीक्षा का विरोध करने की एक बुलाहट का निर्माण करती देती हैं—एक ऐसी बुलाहट, जो डर पर नहीं, बल्कि चाहत पर आधारित है।
इसी कारण से बार-बार पवित्रशास्त्र हमें पाप से कोई समझौता करने के लिए नहीं, बल्कि उससे दूर भागने के लिए कहता है। जब पौलुस हमें यौन अनैतिकता से दूर भागने की चेतावनी देता है, या जब यूसुफ पोतीपर की पत्नी से दूर भागता है, तो पवित्रशास्त्र हमें परीक्षा से दूर भागने वाली बाइबल की आयत का एक जीवन्त उदाहरण दिखाता है। भागना कायरता नहीं है; यह बुद्धिमानी है। यह आज्ञापालन के माध्यम से व्यक्त होने वाला आत्मिक युद्ध है।
अत:, जब आप परीक्षा पर जीत पाने के लिए प्रार्थना करते हैं, तो केवल कठोर अनुशासन के लिए प्रार्थना न करें। एक मजबूत इच्छा के लिए प्रार्थना करें—मसीह के एक ऐसे सुन्दर दर्शन के लिए प्रार्थना करें, जिसके सामने पाप बिलकुल ही बेमानी लगने लगे। परमेश्वर से कहें कि वह आपके हृदय को अपनी ओर इतनी जोर से खींचे कि संसार की दूसरी सभी बातों का आकर्षण पूरी तरह से समाप्त हो जाए। पवित्रता की असली शक्ति यही है।
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चिन्तन के लिए प्रश्न:
- इब्रानियों 12:14 कहता है, ”उस पवित्रता के खोजी हो जिसके बिना कोई प्रभु को कदापि न देखेगा।” यह आयत आपको किस तरह चुनौती भी देती है और साथ ही आपको प्रोत्साहित भी करती है?
- इसका क्या अर्थ है कि पवित्रता का सम्बन्ध नियमों से अधिक हमारी भूख से है (अर्थात् हम किस बात के लिए भूखे हैं)?
- आपकी आत्मा सबसे अधिक किस बात की भूखी है? आप परमेश्वर से ऐसी प्रार्थना कैसे कर सकते हैं कि वह आपको बाकी सभी बातों से बढ़कर केवल अपने लिए गहरी भूख प्रदान करे?
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निष्कर्ष
यह आपको थोड़ा अजीब लग सकता है, परन्तु क्या आप इस जीवन कौशल मार्गदर्शिका को मेरे साथ मिलकर प्रार्थना करते हुए समाप्त करना चाहेंगे? “हे प्रभु यीशु, मुझे परमेश्वर का ऐसा सुन्दर दर्शन देकर परीक्षा से बचाए रख, कि मुझे तेरे अलावा और किसी बात की चाह न रहे। और यदि मैं कभी डगमगा जाऊँ और स्वयं को पाप की जकड़ में पाऊँ, तो मुझे अपनी ओर वापस खींचकर बुराई से मेरा उद्धार कर, जहाँ और कुछ नहीं, परन्तु सुन्दरता, भलाई और आनन्द ही सदा-सर्वदा के लिए विद्यमान हैं। आमीन।”
“हे प्रभु यीशु, मुझे परमेश्वर का ऐसा सुन्दर दर्शन देकर परीक्षा से बचाए रख, कि मुझे तेरे अलावा और किसी बात की चाह न रहे। और यदि मैं कभी डगमगा जाऊँ और स्वयं को पाप की जकड़ में पाऊँ, तो मुझे अपनी ओर वापस खींचकर बुराई से मेरा उद्धार कर। आत्मिक युद्ध के लिए मुझे सामर्थ्य दे, पवित्रता के प्रति मेरी अभिलाषा को और गहरा कर, और अपने अनुग्रह से तब तक मुझे थामे रख, जब तक कि मैं आमने-सामने तेरे दर्शन न कर लूँ। आमीन।”
लेखक के बारे में
शॉन डीमार्स डेकाटुर, अलबामा में सिक्स्थ एवेन्यु कम्युनिटी चर्च के पास्टर हैं। “प्रभु ने अठारह वर्ष की आयु में मेरे पापों से मेरा उद्धार किया, और तब से मैंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। (फिलि. 3:14) सेना में पाँच वर्ष सेवा करने के बाद, प्रभु ने हमारे परिवार को मिशनरी के तौर पर पेरू भेजा, और फिर सन् 2015 में हमें वापस संयुक्त राज्य अमेरिका ले आया। एम्बर और मेरे दो प्यारे बच्चे पेशेंस और इसाबेला हैं। जब मैं कलीसिया की सेवा नहीं कर रहा होता, तो मुझे क्रॉसफिट करना, जिउ-जित्सु खेलना, अच्छी पुस्तकें पढ़ना और पिताजी वाले चुटकुले सुनाना पसंद है।”