#76 बाइबल में: विवाह जो स्थिर बना रहता है
परिचय
मृत सागर की पुस्तकें प्राचीन यहूदी हस्तलिपियों का एक संग्रह हैं, जो सन् 1947 से यहूदिया के मरुभूमि क्षेत्र में स्थित कुमरान की गुफाओं में पाई गई थीं। इनमें अन्य बातों के साथ-साथ बाइबल की अब तक की सबसे सुरक्षित प्राचीन प्रतिलिपियाँ भी सम्मिलित हैं, जिनका मूल्य अनमोल है। परन्तु जब कुछ बद्दू चरवाहों को पहली हस्तलिपियाँ मिलीं, तब उन्होंने उन्हें केवल उपयोगी चमड़ा समझा और बैतलहम के एक मोची को बेच दिया। क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि वे बहुमूल्य हस्तलिपियाँ केवल इसलिए जूतों की मरम्मत में प्रयोग होने वाली थीं, क्योंकि वे लोग उनका वास्तविक मूल्य नहीं पहचान पाए थे?
यह सच्ची घटना आधुनिक विवाह का एक दुःखद दृष्टान्त प्रस्तुत करती है। जिस प्रकार मोची ने उन हस्तलिपियों के साथ किया, उसी प्रकार लोग भी किसी महिमामय वस्तु को लेकर उसे अपनी इच्छाओं के अनुसार ढाल लेते हैं। वे एक पवित्र वाचा को अपनी व्यक्तिगत अभिलाषाओं का मंच बना देते हैं, जो सांस्कृतिक अपेक्षाओं और काल्पनिक आदर्शों से प्रभावित होती हैं। लोग अपने विवाह को लेकर अनेक सपने संजोते हैं और योजनाएँ बनाते हैं, वे किससे विवाह करना चाहते हैं, कहाँ रहना चाहते हैं, कितने बच्चे चाहते हैं, आदि। अब हम ऐसे “मनचाहे” विवाहों के आदी हो गए हैं, जहाँ हम स्थान, अतिथियों की सूची, प्रचारक, आराधना का क्रम, गीत, और यहाँ तक कि प्रतिज्ञाएँ भी स्वयं चुनते हैं। मानो परमेश्वर को केवल हमारी योजनाओं पर आशीष देने के लिए बुलाया जाता है। व्यक्तिगत सुख और अपने सपनों को पूरा करना ही विवाह का मुख्य अर्थ बन गया है। इसलिए यह आश्चर्य की बात नहीं कि विवाह संकट में है, यहाँ तक कि मसीही समाज में भी।
यदि मैं आपसे पूछूँ, कि “बाइबल के अनुसार विवाह क्या है?” तो क्या आप इसका उत्तर बाइबल के दृष्टिकोण से दे पाएँगे? मेरा अभिप्राय केवल विवाह के विषय में सामान्य सच्चाइयों से नहीं है, परन्तु उस विशेष उद्देश्य से है जिसके लिए विवाह की रचना की गई है। जब आप विवाह की तैयारी कर रहे होते हैं, तब सबसे महत्वपूर्ण बात यह जानना होता है कि आप किसके लिए तैयारी कर रहे हैं। हम चाहते हैं कि हमारे विवाह केवल अच्छी शुरुआत ही न करें, वरन् उससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि उसका अन्त भी अच्छा हो। हम ऐसा दृढ़ आधार चाहते हैं जो जीवन भर बना रहे।
इसी बात को ध्यान में रखते हुए, इस जीवन-कौशल मार्गदर्शिका का अधिकाँश भाग हम विवाह को समझने में लगाएँगे। हम यह सीखेंगे कि विवाह की रचना ऐसे बड़े काम के रूप में की गई है, जो हमारे सपनों से कहीं बढ़कर है। बाइबल में विवाह का अर्थ समझने के लिए हमें परमेश्वर के वचन की ओर, विशेषकर उत्पत्ति के पहले तीन अध्यायों की ओर जाना होगा। ऐसा करके हम यीशु के उदाहरण का अनुसरण करते हैं। जब उससे तलाक के विषय में प्रश्न किया गया, तब उसने उत्तर दिया: “परन्तु आरम्भ से ऐसा नहीं था” (मत. 19:8ब)।
यह जीवन कौशल मार्गदर्शिका सृष्टि, पतन, और फिर छुटकारे की क्रमबद्ध शिक्षा का अनुसरण करती है। विवाह को समझने के लिए हमें उसकी रचना, उसके असफल हो जाने, और उस कारण को समझना होगा जिसमें मसीह उसे छुटकारा देता है। पूर्णता हमारी आशा है — वही वास्तविकता जिसे हमारे विवाहों को दर्शाना चाहिए और जिसका हमें पहले से अनुमान होना चाहिए।
यह मार्गदर्शिका बाइबल आधारित विवाह अध्ययन के रूप में व्यवस्थित की गई है। मैं आपको आमंत्रित करता हूँ कि आप अपनी बाइबल खोलें और साथ के साथ अध्ययन करते जाएँ। जब हम इस पाठ का अनुसरण करेंगे, तब हमारा ध्यान इसी विषय पर टिका रहेगा: अर्थात् विवाह। हम पाठ के प्रत्येक विवरण पर विचार नहीं करेंगे; इसका कारण यह नहीं कि वे महत्वपूर्ण नहीं हैं, परन्तु इसलिए कि हमारे पास उतना समय नहीं है, और वे उस मुख्य विषय का हिस्सा भी नहीं हैं जिसे हम समझना चाहते हैं।
यदि परमेश्वर की इच्छा हुई, तो इस जून में मार्टा और मैं अपने विवाह के 25 वर्ष पूरे करेंगे। ये वे बातें हैं जिन्हें मैं उस समय सीखना चाहता था जब मैं अविवाहित था, और मसीही सम्बन्धों के विषय में सलाह पाना चाहता था। काश, तब किसी ने मुझे सलाह दी होती। इस मार्गदर्शिका में लिखी गई सच्चाइयों ने मसीही सम्बन्ध के विषय में हमारी समझ को बदल दिया है, और मैं प्रार्थना करता हूँ कि वे आपके लिए भी ऐसा ही करें।
ऑडियो मार्गदर्शिका
ऑडियो#76 बाइबल में: विवाह जो स्थिर बना रहता है
भाग I: सृष्टि: वे एक तन होंगे।
सब कुछ बहुत अच्छा था
उत्पत्ति के पहले अध्याय के अन्त तक, जब परमेश्वर ने सब वस्तुओं की रचना कर ली, तब हम ये शब्द पढ़ते हैं: “तब परमेश्वर ने जो कुछ बनाया था, सबको देखा, तो क्या देखा, कि वह बहुत ही अच्छा है।” (उत. 1:31अ)। यह आयत हमें परमेश्वर को अपनी ही सृष्टि पर विचार करते हुए दिखाती है। परमेश्वर ने अपनी बनाई हुई हर वस्तु को देखा, और निष्कर्ष निकाला कि सब कुछ “बहुत अच्छा” है।
साथ ही, यह भी स्मरण रखें कि जब परमेश्वर संसार की रचना कर रहा था, तब उसने अपनी बनाई हुई वस्तुओं का मूल्याँकन किया, और उसका निष्कर्ष यह था कि वे “अच्छी” हैं (उत. 1:4, 10, 12, 18, 21, 25)। परन्तु जब सारी सृष्टि की रचना पूरी हो गई, तब परमेश्वर ने कहा, “यह बहुत अच्छा है।” परमेश्वर की सृष्टि सिद्ध थी। इसका अर्थ यह है कि हमें परमेश्वर के किए हुए कार्य में सुधार करने की आवश्यकता नहीं है। हमें आवश्यकता है कि हम समझें कि परमेश्वर ने क्या किया है, और उसी प्रकार जीवन जीने का प्रयास करें जैसा परमेश्वर ने हमें रचा और ठहराया है। जैसे कि हम अगले भाग में देखेंगे, मानवता की सही समझ को अनदेखा करना, अर्थात् परमेश्वर के द्वारा स्त्री-पुरुष की रचना करने का क्या अर्थ है, पति और पत्नी होने का क्या अर्थ है, तथा बाइबल आधारित विवाह के विषय में परमेश्वर के द्वारा ठहराई गई व्यवस्था को अनदेखा करने के कारण संसार में पाप आया।
परमेश्वर के स्वरूप में पुरुष और स्त्री
फिर परमेश्वर ने कहा, “हम मनुष्य को अपने स्वरूप के अनुसार अपनी समानता में बनाएँ; और वे समुद्र की मछलियों, और आकाश के पक्षियों, और घरेलू पशुओं, और सारी पृथ्वी पर, और सब रेंगनेवाले जन्तुओं पर जो पृथ्वी पर रेंगते हैं, अधिकार रखें। तब परमेश्वर ने अपने स्वरूप में मनुष्य को रचा, अपने ही स्वरूप में परमेश्वर ने मनुष्य की रचना की; पुरुष और स्त्री के रूप में उसने मनुष्यों की सृष्टि की।” (उत.1:26-27)
जब परमेश्वर कहता है, कि “आओ, हम मनुष्य को बनाएँ,” तब “मनुष्य” (आदम) के लिए उपयोग किया गया शब्द सम्पूर्ण मनुष्यजाति की ओर संकेत करता है। इस आयत में यह किसी विशेष लिंग के लिए नहीं, वरन् सम्पूर्ण मनुष्यजाति, पुरुष और स्त्री दोनों के लिए कहा गया है। इस मनुष्यजाति की विशेषता इन शब्दों में पाई जाती है: “हमारे स्वरूप में… अपने स्वरूप में।” मनुष्य अन्य सभी वस्तुओं और प्राणियों से भिन्न है जिन्हें परमेश्वर ने बनाया है, क्योंकि केवल मनुष्य ही परमेश्वर के स्वरूप में रचा गया है।
यह सत्य है कि परमेश्वर की बनाई हुई हर वस्तु उसके स्वभाव को प्रकट करती है, जैसे किसी कलाकार की रचना उस कलाकार को प्रकट करती है जिसने उसे बनाया है। “आकाश परमेश्वर की महिमा का वर्णन करता है” (भज. 19:1अ)। परन्तु मनुष्य परमेश्वर के स्वभाव को एक विशेष और व्यक्तिगत रीति से प्रकट करता है। मनुष्य परमेश्वर का स्वरूप है, अर्थात् हमें इस प्रकार रचा गया है कि हम परमेश्वर के समान दिखाई दें और उसका प्रतिनिधित्व करें। इसलिए हमारी पहचान ऐसी वस्तु नहीं है जिसे हमें स्वयं बनाना पड़े। वह स्वयं परमेश्वर में पाई जाती है। हम में से प्रत्येक परमेश्वर के स्वरूप में रचा गया है।
यह पाठ आगे स्पष्ट करता है कि “नर और नारी के रूप में उसने उनकी रचना की।” मनुष्यजाति की रचना दो लिंगों के साथ की गई, और दोनों ही परमेश्वर के स्वरूप में रचे गए हैं। यह बाइबल आधारित दृष्टिकोण का एक मूलभूत सत्य है। मानवता में कोई ऊँच-नीच नहीं है। मनुष्यजाति दो लिंगों से मिलकर बनी है—नर और नारी, पुरुष और स्त्री। दोनों मानवता, गरिमा और आदर में समान हैं, और बाइबल इसे स्पष्ट रूप से सिखाती है। पुरुष स्त्री से श्रेष्ठ नहीं है, और न ही स्त्री पुरुष से श्रेष्ठ है। केवल पुरुष या केवल स्त्री से मनुष्यजाति पूरी नहीं होती है। परमेश्वर ने मनुष्यजाति को इस से प्रकार रचा कि उसमें पुरुष और स्त्री दोनों ही आवश्यक हों।
सांस्कृतिक आज्ञा
“और परमेश्वर ने उनको आशीष दी; और उनसे कहा, “फूलो-फलो, और पृथ्वी
में भर जाओ, और उसको अपने वश में कर लो; और समुंद्र की मछलियों, तथा आकाश के पक्षियों, और पृथ्वी पर रेंगनेवाले सब जन्तुओं पर अधिकार रखो।”
(उत. 1:28)
मनुष्य परमेश्वर की सृष्टि में एक विशेष स्थान रखते हैं, क्योंकि केवल उन्हें ही परमेश्वर के स्वरूप में रचा गया है। जैसा कि हम देख चुके हैं, इसका अर्थ है कि उन्हें अपने सृष्टिकर्ता के समान होने और उसका प्रतिनिधित्व करने के लिए बनाया गया। इस पहचान के साथ एक विशेष उद्देश्य और कार्य भी जुड़ा हुआ है, जिसे आदम और हव्वा को दी गई पाँच आज्ञाओं में बताया गया है: 1. फूलो-फलो, 2. बढ़ो, 3. पृथ्वी को भर दो, 4. उसे अपने वश में करो, और 5. उस पर अधिकार रखो। उनकी पहचान ही उनके कार्य को निर्धारित करती है, केवल व्यक्तिगत रूप से नहीं, वरन् एक दम्पत्ति के रूप में भी। उनका विवाह इन उद्देश्यों को पूरा करने के लिए ही अस्तित्व में आया था।
इसका स्पष्ट अर्थ यह है कि पुरुष और स्त्री को सन्तान उत्पन्न करने और पृथ्वी को भरने के लिए रचा गया था। परमेश्वर के स्वरूप को धारण करने वाले होने के कारण, पुरुष और स्त्री परमेश्वर की महिमा को प्रकट करते हैं। जैसे-जैसे उनकी संख्या बढ़ती है, तो तब उद्देश्य यह था कि सम्पूर्ण पृथ्वी परमेश्वर की महिमा के स्वरूप से भर जाए।
दूसरा, उन्हें यह आज्ञा दी गई थी कि वे “पृथ्वी को अपने वश में करें और उस पर अधिकार रखें” अर्थात् उन सभी प्राणियों पर अधिकार रखें जिन्हें परमेश्वर ने बनाया था। पुरुष और स्त्री को सम्पूर्ण सृष्टि पर अधिकार रखना था। परन्तु यह कोई मनमाना अधिकार नहीं था। यह ऐसा अधिकार था जो स्वयं परमेश्वर के अधिकार को दर्शाता है; यह सृष्टि की भलाई के लिए दिया गया ईश्वरीय अधिकार था। पुरुष और स्त्री (और उनकी सन्तान) को परमेश्वर की सृष्टि का प्रबन्धक बनने की आज्ञा दी गई थी। इस प्रकार, मनुष्यजाति में परमेश्वर का स्वरूप केवल उनकी पहचान में ही नहीं, परन्तु उनके उद्देश्य में भी दिखाई देता है। बाइबल रचे गए संसार में मनुष्य के अधिकार को सकारात्मक दृष्टि से देखती है, क्योंकि वह उसके भले के लिए है। यह उत्तरदायित्व, जिसे अधिकतर “सांस्कृतिक आज्ञा” कहा जाता है, पुरुष और स्त्री दोनों को दी गई थी। उन्हें मिलकर सन्तान उत्पन्न करनी थी, ताकि पृथ्वी परमेश्वर के स्वरूप को धारण करने वाले मनुष्यों से भर जाए, और ऐसा प्रबन्धन करते हुए शासन करें जो परमेश्वर
के राज्य को प्रदर्शित कर सके।
परन्तु यह विवरण उत्पत्ति 1 पर ही समाप्त नहीं होता है। उत्पत्ति 2, उत्पत्ति 1 की घटनाओं को बड़ा करके दिखाने वाले काँच के समान कार्य करता है, जिससे हम छठे दिन के दूसरे भाग में हुई घटनाओं को और अधिक विस्तार से देख पाते हैं। जहाँ उत्पत्ति 1 हमें बताता है कि परमेश्वर ने पुरुष और स्त्री को अपने स्वरूप में रचा, वहीं उत्पत्ति 2 इस बात को विस्तार से बताता है कि पुरुष और स्त्री की रचना कैसे हुई। यह पिछले अध्याय पर आगे निर्माण करता है और हमें पुरुष और स्त्री के बीच के भेदों को समझने में सहायता करता है।
यह अच्छा नहीं है
“फिर यहोवा परमेश्वर ने कहा, “आदम का अकेला रहना अच्छा नहीं; मैं उसके लिये एक ऐसा सहायक बनाऊँगा जो उसके लिये उपयुक्त होगा।” (उत. 2:18)
उत्पत्ति 1 को पढ़ने के बाद, जहाँ बार-बार “यह अच्छा है” कहा गया है, और अन्त में परमेश्वर अपनी सारी सृष्टि को देखकर यह घोषणा करता है कि “यह बहुत अच्छा है,” तब यह वचन केवल आश्चर्य ही नहीं, परन्तु एक झटके के समान लगता है। बाइबल में यह पहली बार हुआ जब हम पढ़ते हैं कि कोई एक बात “अच्छी नहीं” है। परन्तु हमें सावधानी से समझना चाहिए कि इस कथन का क्या अर्थ है। इसका यह अर्थ नहीं है कि परमेश्वर ने कुछ गलत किया, क्योंकि पहले अध्याय में हम देख चुके हैं कि उसने जो कुछ भी बनाया वह सब बहुत अच्छा था। परन्तु यहाँ “अच्छा नहीं” है का अर्थ यह है कि कुछ अभी भी अधूरा रह गया है। स्त्री के बिना पुरुष पूर्ण नहीं है; उसकी आवश्यकता है जो अभी तक पूरी नहीं हुई है।
अब इसे उसके संदर्भ में समझिए। उत्पत्ति 1 में पुरुष और स्त्री को फूलो-फलो और पृथ्वी को भरने की आज्ञा दी गई थी। यह स्पष्ट है कि आदम अकेले इस कार्य को पूरा नहीं कर सकता था। इसलिए जब पवित्रशास्त्र कहता है, कि “मनुष्य का अकेला रहना अच्छा नहीं,” तो इसका मुख्य अर्थ मानसिक अकेलेपन या एकान्त की भावना से नहीं है। उसका अकेला रहना इसलिए अच्छा नहीं है, क्योंकि इस स्थिति में वह न तो पूरी रीति से परमेश्वर के स्वरूप को प्रकट कर सकता है और न ही उस कार्य को पूरा कर सकता है जो परमेश्वर ने उनके लिए ठहराया है। आदम को पूर्ण किए जाने की आवश्यकता थी। उसे एक सहायक की आवश्यकता थी। यहाँ स्त्री की भूमिका को स्पष्ट रूप से बाइबल आधारित विवाह में सहायक के रूप में बताया गया है। उसे उस आवश्यक सहायक के रूप में रचा गया है जिसकी पुरुष को आवश्यकता थी। परन्तु सहायक होने का यह अर्थ किसी भी प्रकार से यह नहीं है कि वह उससे निम्न स्तर की है।
उसके लिए एक उपयुक्त सहायक
और यहोवा परमेश्वर ने भूमि में से मैदान के सब पशुओं और आकाश के सब पक्षियों को रचा था, और उन्हें मनुष्य के पास ले आया कि देखे वह उनका क्या नाम रखेगा। और मनुष्य ने जिस-जिस जीवित प्राणी का जो नाम रखा, वही उसका नाम हो गया। मनुष्य ने सब घरेलू पशुओं, आकाश के पक्षियों और मैदान के सब पशुओं के नाम रखे। परन्तु आदम के लिए उसके योग्य कोई सहायक न मिला। तब यहोवा परमेश्वर ने मनुष्य को गहरी नींद में डाल दिया, और जब वह सो गया, तब उसने उसकी एक पसली निकाल ली और उस स्थान को माँस से भर दिया। और यहोवा परमेश्वर ने उस पसली से, जो उसने मनुष्य में से निकाली थी, एक नारी बनाई और उसे मनुष्य के पास ले आया। तब आदम ने कहा, “अब यह मेरी हड्डियों में की हड्डी और मेरे माँस में का माँस है; इसलिए इसका नाम नारी होगा, क्योंकि यह नर में से निकाली गई है।” (उत. 2:18–23)
उत्पत्ति 2 के अनुसार, नारी के अस्तित्व में आने से पहले ही नर सृष्टि पर अधिकार का प्रयोग कर रहा था, क्योंकि वह पशुओं के नाम रख रहा था। फिर भी, परमेश्वर के द्वारा बनाए गए असंख्य प्राणियों के होते हुए भी, हम आयत 20 में पढ़ते हैं कि “आदम के लिए उसके योग्य कोई सहायक न मिला।” कोई भी पशु, चाहे वह कितना ही अद्भुत क्यों न हो, उस सहायक के रूप में उपयुक्त नहीं था जिसकी नर को आवश्यकता थी। कोई न ही कोई अन्य प्राणी उसके योग्य था। आदम को ऐसे सहायक की आवश्यकता थी जो उसी स्तर और समान महत्त्व का हो—कोई ऐसा जो उसके ही समान पूर्ण रीति से मनुष्य हो, और जिसमें वही स्वभाव तथा वही गरिमा हो।
इसी आवश्यकता को पूरा करने के लिए परमेश्वर ने आदम को गहरी नींद में डाल दिया। स्त्री की रचना स्वयं पुरुष के ही अंग से की गई। मैथ्यू हेनरी के प्रसिद्ध और सुन्दर शब्दों में: “स्त्री को आदम की बगल की एक पसली से बनाया गया; उसके सिर से नहीं, कि वह उस पर शासन करे; न उसके पैरों से, कि वह उसके द्वारा रौंदी जाए; परन्तु उसकी बगल से बनाया गया, ताकि वह उसके बराबर ही हो; उसकी हाथों के नीचे, कि उसकी रक्षा की जाए; परन्तु उसके हृदय के निकट, कि वह प्रेम पाए।”[1] यह बाइबल में प्रेम की एक अत्यन्त सुन्दर परिभाषा है।
यह पाठ हमें बताता है कि परमेश्वर ने पुरुष में से ली गई पसली से एक स्त्री को बनाया और उसे उसके पास ले गया। यहाँ यह देखना अत्यन्त महत्वपूर्ण है कि परमेश्वर एक और आदम की रचना नहीं करता है। वह एक स्त्री की रचना करता है—ऐसी स्त्री जो स्वभाव में पुरुष के समान है, परन्तु उससे भिन्न भी है। यदि आदम की आवश्यकता केवल साथ पाने की होती, तो परमेश्वर एक और आदम, या कई अन्य आदम बना सकता था। परन्तु परमेश्वर ने स्त्री की रचना की। यह वही है जो उसके उद्देश्य में उसकी पूरक बन सकती है। वह स्त्री (इश्शाह) कहलाती है क्योंकि वह पुरुष (ईश) में से बनाई गई। जब आदम जागता है और उसे देखता है, तब वह काव्य के रूप में गा उठता है: “अब यह मेरी हड्डियों में की हड्डी और मेरे माँस में का माँस है; इसलिए इसका नाम स्त्री होगा, क्योंकि यह पुरुष में से निकाली गई है।” स्त्री उसी स्वभाव की है; वह भी मनुष्य है और मूल्य में समान है। परन्तु स्त्री पुरुष नहीं है; वह उससे भिन्न है, परन्तु उसी की सहायक बनने के लिए पूरी रीति से उपयुक्त है। विवाह के विषय में बाइबल के ये वचन हमारे विश्वास की आधारशिला हैं।
इस कारण… एक तन
“इस कारण पुरुष अपने माता-पिता को छोड़कर अपनी पत्नी से मिला रहेगा और वे एक ही तन बने रहेंगे।” (उत. 2:24)
ध्यान दीजिए, यहाँ “इस कारण” शब्द का उपयोग किया गया है। यह एक उद्देश्य की ओर संकेत करता है। वह परमेश्वर ही था जिसने पहले दम्पत्ति को एक किया और उन्हें एक तन बनाया। विवाह मनुष्य की कल्पना नहीं थी; यह परमेश्वर की रचना थी। इसलिए आदम और हव्वा, और उनके बाद आने वाले प्रत्येक दम्पत्ति को विवाह की परिभाषा को समझने के लिए परमेश्वर की ओर देखना चाहिए। जैसा कि यीशु विवाह के विषय में पवित्रशास्त्र में स्पष्ट रूप से कहता है: “जिसे परमेश्वर ने जोड़ा है, उसे मनुष्य अलग न करे” (मत. 19:6ब)। उन्हें एक करने वाला परमेश्वर ही था। विवाह की वाचा ऐसा बन्धन है जिसे तोड़ा नहीं जाना चाहिए, क्योंकि इसे परमेश्वर ने बनाया है। विवाह परमेश्वर की योजना है, जिसमें भाग लेने की आशीष मनुष्यजाति को दी गई है।
यह पाठ आगे कहता है कि पुरुष अपने “माता और पिता को छोड़ देगा।” जब दो लोग एक तन बनते हैं, तब पुरुष का अपने मूल परिवार के साथ सम्बन्ध बदल जाता है। वह उनके अधिकार के अधीन नहीं रहता; अब एक नया परिवार बन चुका होता है। विवाह की वाचा केवल पति और पत्नी के बीच की विशेष वाचा है, न कि जीवनसाथी और उसके विस्तृत परिवार के बीच की। वहाँ किसी भी प्रकार का तनाव या बँटी हुई विश्वासयोग्यता नहीं होनी चाहिए। पति स्वयं को पूरी रीति से अपनी पत्नी को समर्पित करता है, और वैसे ही पत्नी भी अपने पति के लिए समर्पित होती है। यही मसीही विवाह के लिए अत्यन्त आवश्यक शिक्षा है।
अन्त में, वे “एक तन” बन जाते हैं। इसका अर्थ है कि वे अब वैसे व्यक्ति नहीं रहते जैसे पहले थे। अपनी पत्नी के साथ एक होने के बाद पुरुष बदल जाता है। वह अब स्वयं को अलग होकर नहीं देख सकता। क्योंकि अब वे एक तन हैं।
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चिन्तन के लिए प्रश्न:
- यह जानना कि परमेश्वर ने विवाह की रचना की है, इससे हम विवाह के प्रति अपने दृष्टिकोण को कैसे बदलते हैं?
- इसका क्या अर्थ है कि पुरुष और स्त्री दोनों परमेश्वर के स्वरूप में बनाए गए हैं?
- विवाह की शुरुआत कब हुई?
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भाग II: पतन: पहला विवाह असफल हो गया
सृष्टि का क्रम
तब यहोवा परमेश्वर ने आदम को भूमि की मिट्टी से रचा, और उसके नथनों में जीवन का श्वास फूँक दिया; और आदम जीवित प्राणी बन गया। (…)तब यहोवा परमेश्वर ने आदम को लेकर अदन की वाटिका में रख दिया, कि वह उसमें काम करे और उसकी रखवाली करे। और यहोवा परमेश्वर ने आदम को यह आज्ञा दी, “तू वाटिका के किसी भी वृक्ष का फल खा सकता है; पर भले या बुरे के ज्ञान का जो वृक्ष है, उसका फल तू कभी न खाना: क्योंकि जिस दिन तू उसका फल खाएगा उसी दिन अवश्य मर जाएगा।” (उत. 2:7, 15-17)
इससे पहले कि हम आगे बढ़ें और पतन के विषय पर विचार करें, हमें उत्पत्ति 2 की परमेश्वर की अच्छी सृष्टि से जुड़े दो विवरणों पर ध्यान देना चाहिए, जो उत्पत्ति 3 में अत्यन्त महत्वपूर्ण बनेंगे: 1—सृष्टि का क्रम, और 2—नैतिक आज्ञा का प्राप्तकर्ता।
पहला, हम देखते हैं कि स्त्री और पुरुष एक ही समय पर नहीं बनाए गए थे। वे एक ही दिन बनाए गए थे, लेकिन अलग-अलग समय पर। यहोवा परमेश्वर ने पहले पुरुष को बनाया, उसे वाटिका में रखा, कि वह उसमें काम करे और उसकी रखवाली करे। यह क्रम संयोग नहीं है; परन्तु यह बाइबल आधारित विवाह में पुरुष और स्त्री के सम्बन्ध की एक संरचना स्थापित करता है।
दूसरा, एक ऐसा विवरण है जिसे हम आसानी से अनदेखा कर सकते हैं, यह है कि भले और बुरे के ज्ञान के वृक्ष के विषय में नैतिक आज्ञा केवल पुरुष को दी गई थी, वह भी स्त्री के बनाए जाने से पहले। इसका संकेत यह है कि परमेश्वर का जन पहले इस उद्देश्य से बनाया गया था कि वह अपने घर की अगुवाई करे। इसका अर्थ यह नहीं है कि वह इस आज्ञा को अकेले ही पूरा करे, वरन् यह कि उसे पहले होने, अपने परिवार का प्रतिनिधित्व करने और उन्हें आज्ञाकारिता की अगुवाई में चलाने के प्राथमिक उत्तरदायित्व दिए गए थे। इस क्रम में यह भी निहित है कि आदम अपने परिवार की अगुवाई करेगा और उन्हें शिक्षा देगा। क्योंकि यह आज्ञा सीधे उसे ही दी गई थी, इसलिए उसका प्राथमिक उत्तरदायित्व बनता है कि वह इसे स्वयं पालन करे और अपने घराने को भी इसे समझने और मानने में अगुवाई करे। यह बाइबल आधारित विवाह के अध्ययन की एक आधारभूत अवधारणा है।
पाप
“यहोवा परमेश्वर ने जितने जंगली पशु बनाए थे, उन सब में सर्प धूर्त था, और उसने स्त्री से कहा…” (उत. 3:1)
उत्पत्ति 3 की पहली आयत में हमें एक नए पात्र से परिचित कराया जाता है: अर्थात सर्प। यह पाठ उसका विशेष गुण के साथ वर्णन करता है: कि वह अन्य सभी पशुओं से “अधिक चतुर” (या धूर्त) था। बाइबल में “चतुर” शब्द का प्रयोग कभी सकारात्मक और कभी नकारात्मक अर्थों में होता है। यहाँ यह एक छोटी छल से भरी कपटी बुद्धि का संकेत करता है।
सामान्यतः लोग सर्प की चतुराई को उन धोखा देने वाले शब्दों से जोड़ते हैं जिनसे वह स्त्री को लुभाता है। लेकिन सर्प का छल केवल शब्दों से आरम्भ नहीं हुआ था। सावधानी पूर्वक ध्यान दें कि सर्प किससे बात करता है। वह स्त्री से बात करता है। यह क्यों महत्वपूर्ण है? उस सृष्टि के क्रम को स्मरण कीजिए जिसकी हमने अभी चर्चा की थी। परमेश्वर ने आज्ञा सीधे पुरुष को दी थी। आदम को दी गई आज्ञा को सिखाने और उसका पालन कराने का उत्तरदायित्व भी उसी का था। स्त्री को लक्ष्य बनाकर, सर्प विवाह-सम्बन्ध की उस संरचना को ही उलट देता है, जिसे परमेश्वर ने स्थापित किया था। वह मुखिया को अनदेखा करके, उसके सहायक को अपनी बातों में फँसाता है।
अब यह समझना बहुत महत्वपूर्ण है कि सर्प स्त्री से इसलिए बात नहीं करता क्योंकि वह बौद्धिक रूप से दुर्बल थी या उसे आसानी से धोखा दिया जा सकता था। यह पाठ किसी भी प्रकार से ऐसी दुर्बलता का संकेत नहीं देता है। इसके विपरीत, हम पहले ही देख चुके हैं कि परमेश्वर के द्वारा बनाई गई वह स्त्री उस पुरुष के लिए बिल्कुल उपयुक्त थी। परन्तु सर्प ने उस स्त्री से इसलिए बात की, क्योंकि यह परमेश्वर के द्वारा बनाए गए सृष्टि के क्रम को पलटने की उसकी एक सोची-समझी चाल थी। परमेश्वर की योजना यह थी कि पुरुष अपने परिवार की अगुवाई और रक्षा करे, और वे मिलकर सृष्टि पर अधिकार करें। पतन के वर्णन में एक दुःखद विडम्बना यह दिखाई देती है कि एक पशु स्त्री पर अधिकार करता है, स्त्री पुरुष की अगुवाई करती है, और पुरुष परमेश्वर की आज्ञा का पालन करने में असफल रहता है। इस प्रकार सृष्टि का सम्पूर्ण क्रम ही उलट जाता है।
“अतः जब स्त्री ने देखा कि उस वृक्ष का फल खाने में अच्छा, और देखने में मनभाऊ, और बुद्धि देने के लिये चाहने योग्य भी है, तब उसने उसमें से तोड़कर खाया; और अपने पति को भी दिया, जो उसके साथ था और उसने भी खाया।” (उत. 3:6)
यह एक ही आयत मानव इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदी का वर्णन करती है। स्त्री वृक्ष को देखती है। वह अपनी संवेदनाओं के आधार पर उसका मूल्याँकन करती है (“खाने में अच्छा,” “देखने में मनभाऊ”) और अपनी स्वतंत्र इच्छा के आधार पर (“बुद्धि देने के लिये चाहने योग्य”)। वह निर्णय लेती है कि उसका अपना निर्णय परमेश्वर की आज्ञा से उत्तम है। तब वह उस फल को लेती है। और खाती है।
लेकिन आयत 6 में एक ऐसा वर्णन मिलता है जो सचमुच चौंकाने वाला है, फिर भी हम अधिकतर उसे अनदेखा कर देते हैं। कुछ लोग ऐसा सोचते हैं कि आदम संभवतः वाटिका के किसी और हिस्से में रहा होगा, शायद बेलों की देखभाल कर रहा होगा, जबकि हव्वा बातचीत कर रही थी। लेकिन यह पाठ कहता है कि उसने अपने पति को भी दिया, “जो उसके साथ था।” आदम वहाँ पूरे समय उपस्थित था! और वह वहीं पर चुपचाप खड़ा था, यह असफलता विवाह में बाइबल आधारित संघर्ष के समाधान के लिए एक मूलभूत शिक्षा है।
वह मनुष्य, जिसे “वाटिका में काम करने और उसकी रखवाली करने” के लिए बनाया गया था, चुपचाप खड़ा रहा जबकि एक पशु वाटिका में आया और उसकी पत्नी को धोखे में डाल दिया। वह मनुष्य, जिसने सीधे परमेश्वर के मुख से आज्ञा पायी थी, चुप रहा जबकि उस आज्ञा को तोड़ा-मरोड़ा गया और उस पर प्रश्न भी उठाया गया। यह बाइबल आधारित पुरुषत्व की पहली असफलता है। आदम रक्षा करने में असफल रहा। वह सत्य बोलने में असफल रहा। वह हस्तक्षेप करने में असफल रहा। वह निष्क्रिय रहा। और न केवल उसने अपनी पत्नी की रक्षा करने में चूक की, वरन् उसने उस वृक्ष के फल को भी खा लिया, जिसके विषय में परमेश्वर ने उसे स्पष्ट रूप से मना किया था।
परिणाम स्वरूप, आदम और हव्वा दोनों ने परमेश्वर के विरुद्ध पाप किया, लेकिन उन्होंने यह पाप अलग-अलग तरीकों से किया, जो उनकी भूमिकाओं में आई विकृति को दर्शाता है। हव्वा ने आगे बढ़कर उस अगुवाई को छीन लिया जो उसके पति को करनी थी। दूसरी ओर, आदम ने परमेश्वर के द्वारा दिया गया उत्तरदायित्व को त्याग दिया। उसने अपनी पत्नी का अनुसरण किया और उसे पाप की ओर जाने से रोकने के बजाय स्वयं भी आज्ञा-उल्लंघन में उसके साथ हो गया। उसने परमेश्वर की आज्ञा मानने के बजाय अपनी पत्नी की बात सुनी। इसी क्षण पहला विवाह अपने उद्देश्य में असफल हो गया। पुरुष और स्त्री का वह सम्बन्ध, जो परमेश्वर की महिमा को प्रकट करने के लिए बनाया गया था, विद्रोह करने के बंधन में बदल गया। यह बात उस मसीही विवाह सम्बन्धी शिक्षा की आवश्यकता को उजागर करती है, जो निष्क्रियता और अधिकार हड़पने की मूल समस्या को सम्बोधित करती है।
दण्ड
“तब यहोवा परमेश्वर, जो दिन के ठंडे समय वाटिका में फिरता था, उसका शब्द उनको सुनाई दिया। तब आदम और उसकी पत्नी वाटिका के वृक्षों के बीच यहोवा परमेश्वर से छिप गए। तब यहोवा परमेश्वर ने पुकारकर आदम से पूछा, “तू कहाँ है?” (उत. 3:8-9)
जैसे ही उन्होंने पाप किया, आदम और हव्वा के बीच का सम्बन्ध अचानक से बदल गया। पाप से पहले वे नंगे थे परन्तु उन्हें लज्जा नहीं आती थी (उत. 2:25)। अब लज्जा संसार में प्रवेश करती है। वे अपने नंगेपन को ढकने के लिए अंजीर के पत्ते जोड़कर वस्त्र बनाते हैं। वे परमेश्वर से छिपते हैं, और एक-दूसरे से भी छिपते हैं। अतः सबसे पहले मसीही सम्बन्ध में निकटता और विश्वास टूट जाते हैं।
अब एक बार फिर, विवरणों पर ध्यान दीजिए। यह पाठ कहता है कि उन्होंने परमेश्वर को वाटिका में चलते हुए सुना। उन्होंने पाप किया, और अब परमेश्वर आता है। तथा जब परमेश्वर न्याय करने के लिए आता है, तो वह सबसे पहले किसे बुलाता है? एक बार फिर, आदम और हव्वा साथ हैं, लेकिन परमेश्वर आदम को बुलाता है। परमेश्वर ठीक-ठीक जानता है कि क्या हुआ है। वह जानता है कि वे कहाँ हैं। वह जानता है कि उन दोनों ने पाप किया है। वह यह भी जानता है कि हव्वा ने पहले खाया था। फिर भी, परमेश्वर सबसे पहले पुरुष से बात करता है। यह उस प्रधानता के सिद्धांत को पूरा करता है जिसे हमने पहले स्थापित किया था। आदम अपने परिवार का मुखिया है। वह अपने घर की नैतिक स्थिति का अन्तिम उत्तरदायित्व निभाता है। परमेश्वर के प्रति आदम की प्रतिक्रिया उसकी कायरता और उस गहरी दरार को प्रकट करती है जो पाप के कारण उनके विवाह में उत्पन्न हुई। जब उससे पूछा जाता है कि क्या उसने उस वृक्ष का फल खाया, तो आदम ने कहा, “जिस स्त्री को तूने मेरे संग रहने को दिया है उसी ने उस वृक्ष का फल मुझे दिया, और मैंने खाया।” (उत. 3:12)।
इस विरोधाभास बात पर विचार कीजिए। उत्पत्ति 2 में, आनन्द के सर्वोच्च स्तर में, आदम एक कवि था: “मेरी हड्डियों में की हड्डी और मेरे माँस में का माँस!” अब, पाप की गहराइयों में, वह उस व्यक्ति के विरुद्ध हो जाता है जिसकी उसे रक्षा करनी थी: “जिस स्त्री को तूने मेरे संग रहने के लिए दिया…” वह उसकी रक्षा नहीं करता है। वह उत्तरदायित्व नहीं निभाता है। वह स्वयं को बचाने के लिए उसे बलि का बकरा बना देता है। यहाँ तक कि वह परमेश्वर पर भी दोष लगता है (“…जिसे तूने मेरे संग रहने के लिए दिया”)। यह हर उस विवाह की दुःखद वास्तविकता है जो पाप से प्रभावित होता है: हम अपने आप को सही ठहराने के लिए स्वाभाविक रूप से दूसरे पर दोष लगा देते हैं।
“फिर स्त्री से उसने कहा, “मैं तेरी पीड़ा और तेरे गर्भवती होने के दुःख को बहुत बढ़ाऊँगा; तू पीड़ित होकर बच्चे उत्पन्न करेगी; और तेरी लालसा तेरे पति की ओर होगी, और वह तुझ पर प्रभुता करेगा।” और आदम से उसने कहा, “तूने जो अपनी पत्नी की बात सुनी, और जिस वृक्ष के फल के विषय में मैंने तुझे आज्ञा दी थी कि तू उसे न खाना, उसको तूने खाया है, इसलिए भूमि तेरे कारण श्रापित है। तू उसकी उपज जीवन भर दुःख के साथ खाया करेगा; और वह तेरे लिये काँटे और ऊँटकटारे उगाएगी, और तू खेत की उपज खाएगा; और अपने माथे के पसीने की रोटी खाया करेगा, और अन्त में मिट्टी में मिल जाएगा; क्योंकि तू उसी में से निकाला गया है, तू मिट्टी तो है और मिट्टी ही में फिर मिल जाएगा।” (उत. 3:16-19)
परमेश्वर न्यायी है, और पाप अपने साथ दोष लाता है, और दोष दण्ड की माँग करता है। इसलिए परमेश्वर ने सर्प, स्त्री और पुरुष तीनों को दण्ड दिया। जो बात स्त्री और पुरुष को दिए गए दण्डों में विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है, वह यह है कि वे एक-दूसरे से भिन्न हैं, और यह उनके विवाह में निभाई जाने वाली अलग-अलग भूमिकाओं को दर्शाता है, जैसा कि बाइबल में बताया गया है।
स्त्री के लिए दण्ड दो क्षेत्रों पर केंद्रित है: संतान उत्पन्न करना और विवाह। पहला, प्रसव की पीड़ा बढ़ा दी जाएगी। जीवन को जन्म देने की वही प्रक्रिया, जो स्त्री की भूमिका के केंद्र में है, अब पीड़ा से चिह्नित होगी। इसके साथ ही उसके और उसके पति के सम्बन्ध में भी परिवर्तन आएगा, और यह अब एक पूर्ण तालमेल वाली एकता भी नहीं रहेगी, वरन् संघर्ष से भरी होगी। अपने पाप में, अपने पति के अधीन स्वेच्छा और आनन्द के साथ रहने के बजाय, वह अपने पति की भूमिका पर अधिकार करने, उसे नियंत्रित करने या उससे आगे बढ़ने की इच्छा रखेगी। इसके प्रत्युत्तर में, पति का प्रेमपूर्ण व्यवहार और रक्षा करने वाली अगुवाई कठोर और प्रभुत्व करने वाले शासन के रूप में विकृत हो जाएगी। यह विकृति मसीही विवाह में पूर्व सलाह का एक महत्वपूर्ण विषय है।
डैनवर्स सभा का कथन इस त्रासदी का बहुत स्पष्ट रूप से सार प्रस्तुत करता है: “पतन ने पुरुष और स्त्री के सम्बन्धों को बिगाड़ दिया (उत. 3:1–7, 12, 16)। परिवार में पति की प्रेमपूर्ण और दीनता वाली अगुवाई का स्थान प्रायः प्रभुत्व करने वाले या निष्क्रियता ने ले लिया; और पत्नी की बुद्धिमानी तथा स्वेच्छापूर्ण अधीनता का भाव प्रायः अधिकार छीनने या दासता ले लेती है।” पतन ने पुरुष और स्त्री की परमेश्वर के द्वारा दी गई भूमिकाओं को मिटाया तो नहीं, परन्तु उसने पति और पत्नी के सम्बन्ध को गहराई से भ्रष्ट कर दिया।
पुरुष के लिए दण्ड उसकी उस मुख्य भूमिका और उत्तरदायित्व पर केन्द्रित था, जो परमेश्वर ने उसे दिया था। आदम की रचना इसलिए की गई थी कि वह वाटिका में काम करे और उसकी देखभाल करे (उत. 2:15)। अब भूमि शापित हो गई। फल उत्पन्न करने के बजाय वह काँटे और ऊँटकटारे उत्पन्न करेगी। अब काम करने में आनन्द नहीं आएगा; वह पीड़ादायक होगा और उसमे पसीना बहाना पड़ेगा।
अन्तिम परिणाम और आशा
“इसलिए आदम को उसने निकाल दिया और जीवन के वृक्ष के मार्ग का पहरा देने के लिये अदन की वाटिका के पूर्व की ओर करूबों को, और चारों ओर घूमने वाली अग्निमय तलवार को भी नियुक्त कर दिया।” (उत. 3:24)
परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह का सबसे बड़ा और सबसे गंभीर परिणाम केवल वैवाहिक संघर्ष या कठिन परिश्रम ही नहीं था। परन्तु वह तो मृत्यु थी—अर्थात् आत्मिक मृत्यु थी। परमेश्वर से दूर हो जाना था। आदम और हव्वा को वाटिका से निकाल दिया गया, परमेश्वर की उपस्थिति से दूर कर दिया गया। पुरुष और स्त्री, जो परमेश्वर के स्वरूप में रचे गए थे, जिन्हें सारी पृथ्वी पर उसकी महिमा को प्रकट करने की आशीष मिली थी, और जो अपने सृष्टिकर्ता के साथ सिद्ध सम्बन्ध में थे, अब दण्ड पाने की स्थिति में पहुँच गए थे।
यही पाप का परिणाम होता है। हमारा पाप केवल एक गलती नहीं है। यह परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह है। पाप मनुष्य को परमेश्वर से हमेशा-हमेशा के लिए दूर कर देता है, क्योंकि वह पवित्र है। पाप के कारण परमेश्वर हमें दण्ड देता है, क्योंकि वह न्यायी है।
मैं चाहता हूँ कि आप एक क्षण रुककर पाप की गंभीरता और उसके परिणामों को समझें। मैं आपको यह समझने के लिए आमंत्रित करना चाहता हूँ कि पुरुष और स्त्री, पति और पत्नी होने का सही अर्थ केवल मानव जीवन का एक छोटा-सा हिस्सा नहीं है। बाइबल में प्रेम की परिभाषा तथा पति और पत्नी की भूमिकाओं को समझना विवाह का आधार, जीवन में हमारे उद्देश्य, और परमेश्वर के साथ हमारे सम्बन्ध के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण है। मैं चाहता हूँ कि आप यह समझें कि विवाह में भूमिकाएँ मुख्य रूप से व्यक्तित्व या व्यक्तिगत विचारों के आधार पर निर्धारित नहीं होनी चाहिए। परमेश्वर के द्वारा पुरुष और स्त्री को दी गई भूमिकाएँ बाइबल आधारित विवाह की उस वाचा के लिए अनिवार्य हैं, जिसे परमेश्वर ने ठहराया है।
परमेश्वर के अनुग्रह से, मानव इतिहास का अन्त यहीं नहीं होता है। अब हमें थोड़ा पीछे जाकर इस घटना को देखना होगा। आदम और हव्वा को वाटिका से निकाले जाने से पहले भी आशा दिखाई देती है। जब परमेश्वर सर्प को शाप देता है, तब हम पढ़ते हैं:
तब यहोवा परमेश्वर ने सर्प से कहा, “तूने जो यह किया है इसलिए तू सब घरेलू पशुओं, और सब जंगली पशुओं से अधिक श्रापित है; तू पेट के बल चला करेगा,
और जीवन भर मिट्टी चाटता रहेगा; और मैं तेरे और इस स्त्री के बीच में, और तेरे वंश और इसके वंश के बीच में बैर उत्पन्न करूँगा, वह तेरे सिर को कुचल डालेगा, और तू उसकी एड़ी को डसेगा।” (उत. 3:14-15)
सर्प पर परमेश्वर का श्राप है और साथ ही उद्धार की प्रतिज्ञा भी है। यह संयोग की बात नहीं है कि उत्पत्ति 3:15 को सुसमाचार की पहली प्रतिज्ञा कहा जाता है। परमेश्वर सर्प और स्त्री के बीच वैर उत्पन्न करने की घोषणा करता है। परन्तु साथ ही परमेश्वर विजयी होने की भी प्रतिज्ञा करता है। परमेश्वर स्त्री के “वंश” की बात करता है। यद्यपि सर्प का वंश उसकी “एड़ी डसेगा”, फिर भी स्त्री का वंश एक दिन सर्प के सिर को कुचल देगा।
क्या आपने कभी सोचा है कि बाइबल में ऐसे बहुत से नामों की लम्बी सूचियाँ क्यों हैं, जिनका उच्चारण करना भी कठिन होता है? इसका कारण यह है कि परमेश्वर के लोग उस प्रतिज्ञा किए गए वंश की प्रतीक्षा कर रहे थे। वे उस वंशावली को ध्यान से देखते आ रहे थे, जब तक कि परमेश्वर अपनी प्रतिज्ञा को पूरा न कर दे। वह न नूह था, न अब्राहम, न मूसा, और न दाऊद। वंशावलियाँ आगे बढ़ती रहती हैं, जब तक कि हम नए नियम तक नहीं पहुँच जाते हैं, जिसका आरम्भ इन शब्दों से होता है: “यीशु मसीह की वंशावली की पुस्तक, जो दाऊद की सन्तान, अब्राहम की सन्तान, है” (मत. 1:1)। यीशु ही स्त्री का वह प्रतिज्ञा किया गया वंश है।
पुरुष और स्त्री दोनों का समान रूप से पतन हुआ है, और दोनों को समान रूप से उद्धार की आवश्यकता है। हम उसी अनुग्रह से, उसी विश्वास के द्वारा, उसी प्रभु में उद्धार पाते हैं। जैसा प्रेरित पौलुस ने लिखा: “क्योंकि तुम सब उस विश्वास करने के द्वारा जो मसीह यीशु पर है, परमेश्वर की सन्तान हो। और तुम में से जितनों ने मसीह में बपतिस्मा लिया है उन्होंने मसीह को पहन लिया है। अब न कोई यहूदी रहा और न यूनानी; न कोई दास, न स्वतंत्र; न कोई नर, न नारी; क्योंकि तुम सब मसीह यीशु में एक हो।” (गल. 3:26-28)
यदि हमारे विवाहों के लिए उद्धार है, यदि हमारे विवाह में छुटकारा है, तो हमें उद्धार और छुटकारे के लिए उस प्रतिज्ञा किए गए वंश की ओर मुड़ना होगा।
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चिन्तन के लिए प्रश्न:
- सृष्टि का क्रम विवाह में, स्त्री और पुरुष के द्वारा निभाई जाने वाली भूमिकाओं के विषय में क्या संदेश देता है?
- सर्प हव्वा के भीतर सृष्टि के क्रम पर किस प्रकार से आक्रमण करता है?
- आज हम विवाहों में पतन के प्रभावों को किस प्रकार से लगातार देखते रहते हैं?
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भाग III: छुटकारा: मसीह एवं कलीसिया
विवाह के अन्तिम उद्देश्य को समझने के लिए, हमें पहले यह समझना होगा कि बाइबल को कैसे पढ़ा जाए। बाइबल अपने लोगों के लिए परमेश्वर का क्रमशः प्रकट किया गया प्रकाशन है। पवित्रशास्त्र की विविधता का अर्थ यह नहीं कि उसमें अलग-अलग या विरोधाभासी संदेश हैं। वरन् यह वही एक संदेश है जो समय के साथ प्रकट किया गया है। इसे समझने के लिए एक वृक्ष के विकास का उदाहरण सहायक हो सकता है। जब एक बीज बोया जाता है, तो उसमें वही डी एन ए पाया जाता है जो एक परिपक्व वृक्ष में पाया जाता है। परिपक्वता की अलग-अलग अवस्थाएँ होती हैं, परन्तु वह वही अस्तित्व होता है। इसी प्रकार उत्पत्ति में दी गई परमेश्वर की प्रतिज्ञाएँ, जैसे उत्पत्ति 3:15 में स्त्री का वंश, उस परिपूर्णता का आरम्भिक रूप हैं जिसका पुरा होना हम मसीह में पाते हैं।
यदि हम विश्वास करते हैं कि पवित्रशास्त्र एक सुसंगठित पुस्तक है, जो सामंजस्य के साथ कथा प्रस्तुत करती है, तब हम उसकी कथा के विवरणों को केवल संयोग नहीं मान सकते। जब हम बाइबल के आरम्भ और अन्त को देखते हैं, तब हमें एक अद्भुत सम्बन्ध दिखाई देता है, जो विवाह के अर्थ और उसके छुटकारे को समझने में हमारी सहायता करता है। जब हम उत्पत्ति के पहले अध्यायों को प्रकाशितवाक्य की अन्तिम अध्यायों के साथ रखते हैं, अर्थात् कहानी के आरम्भ और अन्त को, तब हमें एक जानबूझकर रखा गया सामंजस्य दिखाई देता है। यह दृष्टिकोण बाइबल आधारित विवाह के अध्ययन के लिए बहुत अधिक महत्वपूर्ण है।
पहला और अन्तिम विवाह
पहला, हम सृष्टि को देखते हैं। परमेश्वर के प्रकाशन के आरम्भ में, हम आकाश और पृथ्वी की रचना को देखते हैं (उत. 1:1)। परमेश्वर के प्रकाशन के अन्त में, हम एक नई और इससे उत्तम सृष्टि के विषय में पढ़ते हैं: “फिर मैंने नए आकाश और नयी पृथ्वी को देखा, क्योंकि पहला आकाश और पहली पृथ्वी जाती रही थी, और समुद्र भी न रहा।” (प्रक. 21:1)।
दूसरा, हम पतन और छुटकारे को देखते हैं। उत्पत्ति 3 में, कहानी सम्बन्धों के टूटने के द्वारा चिन्हित है। आदम और हव्वा का सम्बन्ध परमेश्वर के साथ और एक-दूसरे के साथ टूट जाता है। परन्तु जब हम प्रकाशितवाक्य 21 में कहानी के अन्त की ओर देखते हैं, तब हम मेल-मिलाप और पाप के उलट दिए जाने के विषय में देखते हैं। हम सिंहासन की ओर से एक ऊँचे शब्द को सुनते हैं, जो कहता है, “और वह उनकी आँखों से सब आँसू पोंछ डालेगा; और इसके बाद मृत्यु न रहेगी, और न शोक, न विलाप, न पीड़ा रहेगी; पहली बातें जाती रहीं।” (प्रक. 21:4)। उत्पत्ति में, उन्हें परमेश्वर की उपस्थिति से निकाल दिया जाता है। प्रकाशितवाक्य में, परमेश्वर उनके मध्य में वास करता है।
तीसरा, और हमारे अध्ययन के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है, कि हम विवाह को देखते हैं। बाइबल एक विवाह से आरम्भ होती है और एक दूसरे विवाह पर समाप्त होती है। उत्पत्ति 2 में, परमेश्वर स्त्री को पुरुष के पास लाता है। आदम, जो प्रेम में पड़ने वाला पहला मनुष्य था, एक कविता कहता है: “अब यह मेरी हड्डियों में की हड्डी और मेरे माँस में का माँस है।” (उत. 2:23)। मनुष्यजाति का इतिहास पति और पत्नी के तन की एकता के साथ आरम्भ होता है। प्रकाशितवाक्य में, मनुष्यजाति का इतिहास इसी चित्र के साथ समाप्त होता है। यूहन्ना लिखता है: “फिर मैंने पवित्र नगर नये यरूशलेम को स्वर्ग से परमेश्वर के पास से उतरते देखा, और वह उस दुल्हन के समान थी, जो अपने दुल्हे के लिये श्रृंगार किए हो” (प्रक. 21:2)। और प्रकाशितवाक्य 19 में फिर लिखा है: “आओ, हम आनन्दित और मगन हों, और उसकी स्तुति करें, क्योंकि मेम्ने का विवाह आ पहुँचा है, और उसकी दुल्हन ने अपने आपको तैयार कर लिया है” (प्रक. 19:7)।
यह कोई संयोग नहीं है। विवाह केवल एक जैविक आवश्यकता, मानवीय योजना, या सामाजिक समझौता नहीं है। यह सुसमाचार के संदेश, मसीह और कलीसिया के बीच की वाचा, और अपने लोगों के उद्धार के लिए परमेश्वर की योजनाओं का एक प्रतीक है। सम्पूर्ण पुराने नियम में, परमेश्वर ने अपने लोगों के साथ अपने सम्बन्ध को प्रकट करने के लिए विवाह का अधिकाधिक वर्णन किया है। परन्तु नए नियम में, वह छाया वास्तविकता में बदल जाती है। तब हम समझते हैं कि मानवीय विवाह का उद्देश्य सदा से एक प्रतीक होना चाहिए था, अर्थात् मसीह और कलीसिया के बीच के अदृश्य और अनन्त विवाह का एक दृश्यमान चित्रण। नए नियम में विवाह के विषय में क्या कहा गया है, इसे समझने के लिए इस स्वर्गीय सम्बन्ध को देखना आवश्यक है।
यह इस गहरी सच्चाई को समझाता है कि यीशु ने क्यों सिखाया कि पुनरुत्थान में न तो पुरुष विवाह करेंगे और न स्त्रियाँ विवाह में दी जाएँगी (मत. 22:30)। स्वर्ग में हमारे सांसारिक विवाह क्यों समाप्त हो जाएँगे? इसलिए नहीं कि वे महत्वहीन थे, वरन् इसलिए कि वे अपना उद्देश्य पूरा कर चुके होंगे। जब आप अपने गन्तव्य तक पहुँच जाते हैं, तब संकेत-चिह्न की आवश्यकता नहीं होती है। जब वास्तविकता प्रकट हो जाती है, तब छाया की आवश्यकता नहीं रहती। अनन्तकाल में, हमें उस चित्रण की आवश्यकता नहीं होगी, क्योंकि तब हमारे पास भरपूरी होगी: अर्थात् मसीह और उसकी कलीसिया के बीच अनन्तकाल का विवाह।
इसलिए एक पुरुष और एक स्त्री के बीच विवाह केवल जीवन का एक महत्वपूर्ण पहलू ही नहीं है। हमारे विवाहों की रचना स्वयं सुसमाचार का प्रतिनिधित्व करने के लिए की गई थी। परमेश्वर की योजनाओं की भरपूरी, मसीह और कलीसिया के बीच होने वाला विवाह ही वह अनन्त विवाह होगा!
इस पर विचार कीजिए! इस अद्भुत सत्य पर मनन कीजिए, जो प्रत्येक विवाह की नींव और मापदण्ड होना चाहिए। विवाह इसलिए रचा गया कि जब तक मसीह नहीं आता, तब तक हम उसके साथ अनन्तकाल को देख सकें, उसका अनुभव कर सकें, और उसके विषय में सीख सकें। इस अर्थ में, विवाह अनन्तकाल की एक पूर्वझलक है। यही बाइबल में प्रेम की सर्वोच्च परिभाषा है।
संभवतः पवित्रशास्त्र में कोई अन्य पाठ इतना स्पष्ट नहीं है, जितना इफिसियों 5 है, जो एक पति और पत्नी के सम्बन्ध की तुलना मसीह और कलीसिया के सम्बन्ध के साथ करता है।
हे पत्नियों, अपने-अपने पति के ऐसे अधीन रहो, जैसे प्रभु के। क्योंकि पति तो पत्नी का सिर है जैसे कि मसीह कलीसिया का सिर है; और आप ही देह का उद्धारकर्ता है। पर जैसे कलीसिया मसीह के अधीन है, वैसे ही पत्नियाँ भी हर बात में अपने-अपने पति के अधीन रहें। हे पतियों, अपनी-अपनी पत्नी से प्रेम रखो, जैसा मसीह ने भी कलीसिया से प्रेम करके अपने आप को उसके लिये दे दिया, कि उसको वचन के द्वारा जल के स्नान से शुद्ध करके पवित्र बनाए, और उसे एक ऐसी तेजस्वी कलीसिया बनाकर अपने पास खड़ी करे, जिसमें न कलंक, न झुर्री, न कोई ऐसी वस्तु हो, वरन् पवित्र और निर्दोष हो। इसी प्रकार उचित है, कि पति अपनी-अपनी पत्नी से अपनी देह के समान प्रेम रखे, जो अपनी पत्नी से प्रेम रखता है, वह अपने आप से प्रेम रखता है।क्योंकि किसी ने कभी अपने शरीर से बैर नहीं रखा वरन् उसका पालन-पोषण करता है, जैसा मसीह भी कलीसिया के साथ करता है। इसलिए कि हम उसकी देह के अंग हैं।“इस कारण पुरुष माता-पिता को छोड़कर अपनी पत्नी से मिला रहेगा, और वे दोनों एक तन होंगे।” यह भेद तो बड़ा है; पर मैं मसीह और कलीसिया के विषय में कहता हूँ। पर तुम में से हर एक अपनी पत्नी से अपने समान प्रेम रखे, और पत्नी भी अपने पति का भय माने। (इफ. 5:22-33)
मसीह में छुटकारा पति और पत्नी के सम्बन्ध को फिर से स्थापित करता है। यह उन भूमिकाओं को भी फिर से स्थापित करता है, जिन्हें परमेश्वर ने सृष्टि में ठहराया है, परन्तु जो पतन के कारण बिगड़ गई थीं। जैसा कि हमने पहले अध्याय में देखा, परमेश्वर ने पुरुष और स्त्री को परिवार के भीतर भिन्न और एक-दूसरे की आवश्यकता को पूरा करने वाली भूमिकाएँ निभाने के लिए रचा। इफिसियों 5 यह प्रकट करता है कि यह छुटकारा पाया हुआ सम्बन्ध कैसा दिखाई देता है। यही बाइबल आधारित विवाह मूल तत्व है।
पत्नियों के लिए: स्वेच्छिक अधीनता
“हे पत्नियों, अपने-अपने पति के ऐसे अधीन रहो, जैसे प्रभु के।” (इफ.5:22)
स्त्रियों को यह समझने के लिए कहा गया है कि परमेश्वर ने विवाह को एक-दूसरे की पूर्ति करने वाले सम्बन्ध में रचा है, जिसमें पत्नी परिवार में अपने पति की अगुवाई को स्वीकार करती है। परन्तु सावधानी पूर्वक ध्यान दें कि यह आज्ञा क्या सिखाती है। यह सीधे पत्नियों को सम्बोधित करती है। पत्नी की अधीनता एक स्वेच्छा से किया गया कार्य है। कहीं भी पतियों को यह अनुमति नहीं दी गई कि वे अपनी पत्नियों को अधीन रहने के लिए विवश करें। यह मसीही विवाह से पहले की सलाह लेने के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण कदम है।
साथ ही, इस आज्ञा की सीमा भी निश्चित है। यह नहीं कहा गया, कि “हे स्त्रियो, पुरुषों के अधीन रहो।” बिल्कुल नहीं! परमेश्वर के पीछे चलने वाली स्त्री को अपने ही पति के अधीन रहने के लिए कहा गया है। यह सिद्धान्त अत्यन्त मूलभूत है, क्योंकि पत्नी की अधीनता उसके कार्य और भूमिका से सम्बन्धित है, उसके अस्तित्व या मूल्य से नहीं। यह आज्ञा विशेष रूप से विवाह की वाचा के लिए दी गई है: “अपने-अपने पति के अधीन रहो।”
अन्त में, हमें इस अधीनता को दासत्व जैसे सम्बन्ध के साथ नहीं मिलाना चाहिए। सृष्टि में, स्त्री को सहायक के रूप में बनाया गया है, पुरुष के कार्य में एक आवश्यक सहभागी के रूप में। उसकी अधीनता उसकी बुद्धिमानी और स्वेच्छा पर आधारित है। हमें उन सांस्कृतिक धारणाओं को अस्वीकार करना चाहिए, जो स्त्री को केवल सफाई और भोजन बनाने वाली के रूप में दिखाती हैं, जबकि पुरुष सोफे पर बैठकर बीयर पीता है और फुटबॉल मैच देखता रहता है। परमेश्वर का उद्देश्य पुरुष और स्त्री दोनों को मिलकर पूरा करने के लिए दिया गया है, ताकि वे एक-दूसरे की पूर्ति करने वाली सहभागिता में साथ कार्य करें। यही एक स्वस्थ मसीही सम्बन्ध का मापदण्ड है।
पतियों के लिए: त्यागपूर्ण प्रेम
हे पतियों, अपनी-अपनी पत्नी से प्रेम रखो, जैसा मसीह ने भी कलीसिया से प्रेम रखा… (इफ. 5:25)
पतियों को परिवार में अपनी अगुवाई करने का उत्तरदायित्व निभाने के लिए कहा गया है। परन्तु, जैसा पत्नियों के विषय में था, वैसे ही यहाँ भी ध्यान दीजिए कि यह आज्ञा क्या मानकर चलती है। पहला, यह पुरुषों को सम्बोधित करती है। निष्क्रिय रहने के बजाय (जो आदम का पाप था), परमेश्वर के भक्त जन को अपने परिवार की अच्छी मंशा के साथ अगुवाई करनी चाहिए। यह उस आलसी पति की रूढ़िवादी धारणा को तोड़ देती है। एक भक्त पति वह व्यक्ति होता है जो सक्रिय रहता है और अपनी पत्नी की देखभाल के उत्तरदायित्व को स्वीकार करता है।
साथ ही पुरुष को प्रेम के साथ अगुवाई करनी चाहिए। “अपनी-अपनी पत्नी से प्रेम करो…” पुरुष को अपनी पत्नी पर प्रभुत्व करने का कोई अधिकार नहीं है। वास्तव में, पुरुष का स्त्री पर प्रभुत्व करना ही पतन का परिणाम है (उत. 3:16), न कि परमेश्वर की आज्ञा है। परमेश्वर ने कभी यह इच्छा नहीं की कि पुरुष अपनी अगुवाई का प्रयोग एक अत्याचारी के रूप में करे, वरन् प्रेम के साथ परिवार के मुखिया के रूप में करे। यही बाइबल में प्रेम की परिभाषा है।
डैनवर्स का कथन इस सुधारात्मक कार्य को बहुत सुन्दर ढँग से संक्षेप में प्रस्तुत करता है: “मसीह में छुटकारा उस विकृति को दूर करने का लक्ष्य रखता है, जो श्राप के कारण आई है। परिवार में, पतियों को कठोर या स्वार्थी अगुवाई को छोड़कर अपनी-अपनी पत्नियों के प्रति प्रेम और देखभाल में बढ़ना चाहिए; और पत्नियों को अपने पतियों के अधिकार के प्रति विरोध को छोड़कर अपने पतियों की अगुवाई के प्रति स्वेच्छा और आनन्द के साथ अधीनता में बढ़ना चाहिए।” यह संतुलन ही मसीही विवाह सम्बन्धी सलाह का उद्देश्य है।
मसीह ही मापदण्ड और उद्देश्य है।
अब, मैं आपके साथ पूरी रीति से ईमानदार रहना चाहता हूँ। पौलुस के समय के विपरीत, आज इन आज्ञाओं को किसी असुविधा को उत्पन्न किए बिना बताना असंभव है। इतिहास और हमारी आधुनिक संस्कृति ने विवाह के अर्थ को इतना विकृत कर दिया है कि पुरुषों की अगुवाई और महिलाओं की अधीनता की बात करना ही आज के समय का सबसे बड़ा अपराध बन गया है। यह विचार कि पुरुष और महिलाएँ अलग-अलग भूमिकाएँ निभाते हैं, इसे एक पुराने समय का नमूना माना जाता है—अर्थात् पुरुष प्रधान समाज का बुरा स्मरण, जिसने महिलाओं को अपने अधीन कर रखा था।
परन्तु यहाँ हमें रुककर विचार करना चाहिए। पति और पत्नी के सम्बन्ध के लिए बाइबल जिस मापदण्ड को निर्धारित करती है, उस पर विशेष ध्यान दें। “पत्नियाँ… जैसे प्रभु के लिए” (इफ. 5:22); “पति… जैसे मसीह ने कलीसिया से प्रेम किया” (इफ. 5:29)। मसीह ही विवाह का मापदण्ड है। वही मुख्य केन्द्र हैं। पौलुस अपने तर्क के हर चरण में मसीह को विवाह का स्रोत, प्रतिरूप, आदर्श और अन्तिम उद्देश्य के रूप में प्रस्तुत करता है। प्रभु यीशु और सुसमाचार ही विवाह का कारण, प्रेरणा, उर्जा और उसे स्थिर बनाए रखने की सामर्थ्य है। ये विवाह से सम्बन्धित पवित्रशास्त्र के बहुत अधिक आवश्यक वचन हैं।
हमारे पवित्रीकरण के लिए व्यायामशाला
पति और पत्नी के सम्बन्ध में उत्पन्न होने वाली निराशाओं के प्रमुख कारणों में से एक इस मूलभूत समझ की कमी होती है: कि विवाह की रचना हमारी योजना के अनुसार नहीं की गई है, और न ही हम विवाह के केन्द्र हैं। विवाह हमें मसीह के प्रेम को समझाने के लिए बनाया गया है। विवाह का उद्देश्य केवल हमारी सांसारिक योजनाओं और इच्छाओं को पूरा करना नहीं है। यह उससे कहीं अधिक बड़ा और उत्तम है, जितना हम कल्पना कर सकते हैं। विवाह का उद्देश्य हमें मसीह के समान बनना है। पति और पत्नी के द्वारा निभाई जाने वाली भूमिकाएँ इस बड़े उद्देश्य की सेवा करती हैं, कि हम मसीह से अधिक प्रेम करें और उसके समान बनें। यही बाइबल आधारित विवाह का सार है।
परमेश्वर पत्नी से कहता है कि वह अपनी अधीनता के लिए प्रभु यीशु को अपना आधार बनाए। उसका अधीनता में रहना उसके पति की योग्यता के कारण नहीं है (जो वास्तव में संभव नहीं है!), परन्तु प्रभु यीशु की योग्यता के कारण है। “पत्नियाँ अपने-अपने पतियों के अधीन वैसे ही रहें जैसे प्रभु के प्रति।” यह इस सत्य की पहचान है कि मसीह कलीसिया का सिर है, और यही उसके जीवन का मापदण्ड और संदर्भ है, जो उसके पति के साथ उसके सम्बन्ध का मापदण्ड बनता है। पत्नी का पति के साथ सम्बन्ध रखने के ढँग से इस बात को प्रकट होना चाहिए कि वह मसीह के साथ कैसे सम्बन्ध रखती है। यदि पत्नी अपने पति के अधिकार को अपने हाथ में लेने का प्रयास करती है, तो अंततः वह अपने जीवन में मसीह के अधिकार को भी अस्वीकार कर रही होती है। यह बाइबल आधारित विवाह अध्ययन की एक मूल शिक्षा है।
परमेश्वर पति को कहता है कि वह अपनी पत्नी के साथ अपना सम्बन्ध बनाए रखने के लिए प्रभु यीशु को आधार बनाए। ध्यान दें कि पुरुषों को दी गई आज्ञा अधिक बलपूर्वक दी गई है। पति को अपनी पत्नी से प्रेम करने की आज्ञा दी गई है, और इस प्रेम की परिभाषा आयत 25 में दी गई है: “जैसे मसीह ने कलीसिया से प्रेम किया और उसके लिए अपने आप को दे दिया।” यह एक बलिदानी प्रेम है। पति की अगुवाई का नमूना यही प्रेम होना चाहिए। यीशु ने जिस प्रकार हमसे प्रेम किया, वह अपने जीवन को हमारे लिए दे देने के द्वार पर था। उसने अपने स्वार्थ को पूरा करने के लिए प्रेम नहीं किया, वरन् हमारे लिए उसने स्वयं को दे दिया। इसी प्रकार पति के जीवन में भी यही सत्य होना चाहिए। वह अपनी पत्नी के हितों को ध्यान में रखते हुए त्याग के साथ अगुवाई करे। यदि पति अपनी पत्नी से त्यागपूर्ण प्रेम करने में लापरवाह रहता है या असफल होता है, तो वह यह दर्शाता है कि उसने अभी तक मसीह के प्रेम को ठीक से नहीं समझा है। विवाह में बाइबल आधारित विवाद का समाधान चाहने वालों के लिए यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्धांत है।
हमारे प्रभु यीशु ने हमसे एक उद्देश्य के साथ प्रेम किया: “कि वह उसे पवित्र करे, और वचन के द्वारा जल से शुद्ध करके उसे स्वच्छ बनाए… ताकि वह पवित्र और निर्दोष हो।” यीशु ने हमसे हमारे शुद्धिकरण और उद्धार के लिए प्रेम किया। इसी प्रकार, विवाह हमारे पवित्रीकरण के लिए एक व्यायामशाला के समान है। जैसे लोग शारीरिक रूप से स्वस्थ होने के लिए व्यायामशाला जाते हैं, वैसे ही विवाह वह स्थान है जहाँ हमें परमेश्वर के द्वारा आदर दिया जाता है और उसके प्रेम को विशेषकर मसीह का कलीसिया के प्रति प्रेम को सीखते हैं। बाइबल के अनुसार विवाह को समझने का अर्थ है कि उसे पवित्रता के साधन के रूप में देखना।
निश्चित रूप से, केवल व्यायामशाला जाना ही शारीरिक रूप से हृष्ट-पुष्ट बने रहने के लिए पर्याप्त नहीं होता है। हमें उचित आहार और अनुशासन के साथ व्यायाम भी करना चाहिए। यदि हम मूर्खता करें और व्यायामशाला में जाकर उपकरणों का गलत ढँग से उपयोग करें, तो संभव है कि हमें स्वास्थ्य सुधारने के बजाय गंभीर चोटें लग जाएँ। इसी प्रकार, विवाह अपने आप में हमें पवित्र नहीं बनाता। केवल विवाह कर लेने से कोई व्यक्ति अपने आप यीशु के समान नहीं बन जाता है। व्यायामशाला के ही समान विवाह भी पवित्रीकरण का साधन तभी बनता है जब हम समझते हैं कि विवाह क्या है और उसे उसी रीति से जीने का प्रयास करते हैं जैसा परमेश्वर ने उसे ठहराया है। इसी कारण मसीही विवाह के पहले ली गई सलाह उन लोगों के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण है जो विवाह की तैयारी कर रहे हैं, विशेषकर जब वे विवाह में मसीही प्रेम सम्बन्ध की सलाह को लागू करते हैं या यह प्रश्न पूछते हैं कि कैसे जानें कि वही व्यक्ति परमेश्वर की ओर से उनके लिए ठहराया गया है।
जब मैं यात्रा करता हूँ, तो मुझे इस वास्तविकता की एक झलक मिलती है। जब मैं किसी यात्रा पर होता हूँ, तो हर घंटे के साथ घर लौटने की मेरी इच्छा बढ़ती चली जाती है। हर दिन मेरी बेचैनी बढ़ती रहती है। मुझे लोगों के साथ रहना अच्छा लगता है। मुझे कलीसियाओं में जाना अच्छा लगता है। दूसरों की सेवा करना मेरे लिए एक सौभाग्य है। फिर भी घर जैसा और अपनी पत्नी के साथ रहने जैसा कुछ नहीं है। जब हम यीशु को जानते हैं और उसके साथ एक हो जाते हैं, तो हमारे भीतर उसके साथ रहने की लालसा बढ़ती रहती है। जब हम यीशु से प्रेम करते हैं, तो हम उसके साथ रहना चाहते हैं। कलीसिया को यीशु के साथ रहने की ऐसी ही इच्छा विकसित करनी चाहिए, जैसे मेरी अपनी पत्नी के साथ रहने की लालसा हर बीतते दिन के साथ बढ़ती रहती है।
जब मैं यात्रा करता हूँ, तो मुझे इस वास्तविकता की एक झलक मिलती है। जब मैं किसी यात्रा पर होता हूँ, तो हर घंटे के साथ घर लौटने की मेरी इच्छा बढ़ती चली जाती है। हर दिन मेरी बेचैनी बढ़ती रहती है। मुझे लोगों के साथ रहना अच्छा लगता है। मुझे कलीसियाओं में जाना अच्छा लगता है। दूसरों की सेवा करना मेरे लिए एक सौभाग्य है। फिर भी घर जैसा और अपनी पत्नी के साथ रहने जैसा कुछ नहीं है। जब हम यीशु को जानते हैं और उसके साथ एक हो जाते हैं, तो हमारे भीतर उसके साथ रहने की लालसा बढ़ती रहती है। जब हम यीशु से प्रेम करते हैं, तो हम उसके साथ रहना चाहते हैं। कलीसिया को यीशु के साथ रहने की ऐसी ही इच्छा विकसित करनी चाहिए, जैसे मेरी अपनी पत्नी के साथ रहने की लालसा हर बीतते दिन के साथ बढ़ती रहती है।
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चिन्तन के लिए प्रश्न:
- विवाह का उद्देश्य क्या है? यह किस वास्तविकता की ओर संकेत करता है?
- पति का अपनी पत्नी के प्रति क्या उत्तरदायित्व हैं? और पत्नी की अपने पति के प्रति क्या उत्तरदायित्व हैं?
- बाइबल आधारित विवाह का चित्रण संसार के द्वारा प्रस्तुत किया गया चित्रण से किस प्रकार से भिन्न है?
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निष्कर्ष
परमेश्वर की दृष्टि में, एक सफल विवाह इस बात से नहीं आँका जाता है कि दम्पति कितनी अच्छी रीति से साथ निभाते हैं, परन्तु इस बात से आँका जाता है कि उनकी पवित्रता का स्तर कितना है। यह इस बात से नहीं आँका जाता कि वे इस पृथ्वी पर मिलकर कितना कुछ हासिल करते हैं, वरन् इस बात से आँका जाता है कि वे परमेश्वर के राज्य की कितनी सेवा करते हैं। यह इस बात से नहीं आँका जाता कि वे कितनी भौतिक संपत्तियाँ इकट्ठा करते हैं, परन्तु इस बात से आँका जाता है कि वे अपना कितना समय, ऊर्जा और वरदान परमेश्वर के उद्देश्यों में लगाते हैं। अंततः एक सफल विवाह हमारी व्यक्तिगत संतुष्टि से नहीं आँका जाता, वरन् परमेश्वर की महिमा से आँका जाता है। वास्तव में, एक सच्चा सफल विवाह यह होता है कि परमेश्वर की महिमा करना ही उसका सबसे बड़ा आनन्द है।
हमारे विवाह हमें सिखाने और हमें मसीह की ओर ले जाने के लिए होते हैं। जैसे-जैसे हम मसीह के ज्ञान में बढ़ते चले जाते हैं, हम धीरे-धीरे पवित्र आत्मा से भी भरते चले जाते हैं। विवाह परमेश्वर का एक प्रशिक्षण मैदान है, जहाँ वह हमें प्रशिक्षित करता है और हमें अपने पुत्र के स्वरूप में ढालता है। यही मसीही सम्बन्ध का मूल आधार है। मसीह में ही हमें अपने विवाह में सच्चा आनन्द मिलता है, क्योंकि हम मसीह के विषय में और अधिक सीखते हैं, उसका आनन्द लेते हैं, और मसीह तथा कलीसिया के बीच के प्रेमपूर्ण सम्बन्ध का अनुभव करते हैं। हम मसीह के प्रेम के विषय में सीखते हैं, और साथ ही अपने आनन्द और उसकी महिमा के लिए हम प्रेम करना भी सीखते हैं!
जब आप मसीही पूर्व-विवाह सलाह से होकर जाते हैं और विवाह की तैयारी में समय लगाते हैं, तो यह स्मरण रखें कि आपका मिलन एक बहुत बड़ी वास्तविकता को दर्शता है। आपका विवाह ऐसी नींव पर आधारित होना चाहिए जो स्थायी हो, इसलिए नहीं कि वह आपके स्वप्नों पर आधारित है, परन्तु इसलिए कि वह चट्टान पर आधारित है। यही सच्चा बाइबल आधारित विवाह है, जहाँ पति और पत्नी साथ-साथ चलते हैं और एक-दूसरे में परमेश्वर के जन तथा परमेश्वर की भक्त स्त्री का सम्मान करते हैं।
अन्तिम टिपण्णी
यह पुस्तिका मेरे द्वारा लिखी गई है, परन्तु इसमें कुछ भी मौलिक नहीं है। पहला कारण यह है कि मुझे पूरा विश्वास है कि आगे आने वाले अध्याय विवाह के विषय में बाइबल की शिक्षाओं का ही विवरण प्रस्तुत करते हैं। साथ ही, मैं जॉन पाइपर, केविन डीयंग, टिमोथी केलर और अन्य लोगों का आभारी हूँ, जिनके द्वारा परमेश्वर ने मुझे शिक्षा दी। विवाह के विषय में उन्होंने जो लिखा है, उसे आगे के अध्ययन के लिए मैं आपको पढ़ने की सलाह देता हूँ।
लेखक के बारे में
टियागो ओलिवेरा लिस्बन, पुर्तगाल में फर्स्ट बैप्टिस्ट चर्च ऑफ लिस्बन के वरिष्ठ पास्टर के रूप में सेवकाई करते हैं। वे अपनी पत्नी मार्ता के साथ विवाहित हैं, और दोनों के तीन बच्चे हैं।
विषयसूची
- भाग I: सृष्टि: वे एक तन होंगे।
- सब कुछ बहुत अच्छा था
- परमेश्वर के स्वरूप में पुरुष और स्त्री
- सांस्कृतिक आज्ञा
- यह अच्छा नहीं है
- उसके लिए एक उपयुक्त सहायक
- इस कारण… एक तन
- चिन्तन के लिए प्रश्न:
- भाग II: पतन: पहला विवाह असफल हो गया
- सृष्टि का क्रम
- पाप
- दण्ड
- अन्तिम परिणाम और आशा
- चिन्तन के लिए प्रश्न:
- भाग III: छुटकारा: मसीह एवं कलीसिया
- पहला और अन्तिम विवाह
- पत्नियों के लिए: स्वेच्छिक अधीनता
- पतियों के लिए: त्यागपूर्ण प्रेम
- मसीह ही मापदण्ड और उद्देश्य है।
- हमारे पवित्रीकरण के लिए व्यायामशाला
- चिन्तन के लिए प्रश्न:
- निष्कर्ष
- अन्तिम टिपण्णी
- लेखक के बारे में