#77 आलोचना का सामना कैसे करें—राय के द्वारा आगे बढ़ना
परिचय
“यह बिलकुल भी सही नहीं है; आपको इस पूरे काम को फिर से करना होगा।” जब मैंने पहली बार ये शब्द सुने, तो ये मुझे बहुत चुभे, परन्तु मैं जानता था कि ये सच थे। मैं एक प्रशिक्षु मुनीम था और मैंने अपने कार्य प्रबन्धक को उस काम का एक ऐसा हिस्सा सौंपा था, जिसके बारे में मुझे मालूम था कि वह मेरा सबसे अच्छा काम नहीं था। उसके शब्द कठोर, परन्तु सही थे। और उस पूरे लेखे-जोखे पर फिर से काम करने के बाद, मैंने एक बहुमूल्य सबक सीखा कि: अपने उच्च अधिकारी को कोई परियोजना सौंपने से पहले हमें उस पर और अधिक मेहनत करनी चाहिए। बाद में उस पल ने आलोचना का सामना करने की मेरी समझ को, केवल भावनात्मक रूप से प्रतिक्रिया देकर नहीं, बल्कि उससे सीखकर और सुधार करके आकार दिया।
किसी तरह की आलोचना का अनुभव करने के लिए आपको लम्बा जीवन जीने की आवश्यकता नहीं है। और यह बात हमेशा दयालुतापूर्ण नहीं लगती, और न ही यह हमेशा उचित होती है। कभी-कभी यह सही होती है, और कई बार सही नहीं होती, और आमतौर पर यह दोनों का मिला-जुला रूप होता है। परन्तु एक बात तो निश्चित है कि: हम सभी को अपने जीवन में किसी न किसी तरह की आलोचना का सामना करना पड़ेगा। इसी कारण से विनम्रता, बाइबल-आधारित ज्ञान और भावनात्मक परिपक्वता के साथ आलोचना का सामना करना सीखना इतना महत्वपूर्ण हो जाता है।
अत:, प्रश्न यह है कि जब हमारे सामने आलोचना आए, तो हम कैसी प्रतिक्रिया दें? और, हे मेरे मित्र, ऐसा अवश्य होगा। टिप्पणियाँ चाहे सही हों या गलत, कोमल हों या तीखी, हमें इस बात पर विचार करना होगा कि ऐसे तरीकों से आलोचना का सामना कैसे करें, जो परमेश्वर का आदर करें और हमारे चरित्र को आकार दें।
सबसे पहले, आइए आलोचना की एक परिभाषा पर विचार करें। आलोचना वे शब्द हैं, जो किसी व्यक्ति या उसकी गतिविधि में किसी वास्तविक या कथित कमी को उजागर करते हैं।
और इस तरह समझने पर, आलोचना को आमतौर पर स्वाभाविक रूप से नकारात्मक माना जाता है। अर्थात् कुछ ऐसा, जिससे हर कीमत पर बचा जाना चाहिए। इसी कारण से हममें से अधिकांश लोग स्वाभाविक रूप से आलोचना से कतराते हैं। हम सुधार की आवश्यकता बताने वाले शब्दों के बजाय, बड़ाई के शब्द सुनने की लालसा रखते हैं। वैसे भी, कौन अपनी गलतियों पर ध्यान देना चाहता है, या अपनी विफलताओं के बारे में किसी व्यक्ति के साथ चिन्ता से भरी बातचीत करना चाहता है?
परन्तु मैं यह तर्क देना चाहता हूँ कि जबकि आलोचना नकारात्मक हो सकती है, फिर भी उसे सकारात्मक बनाया जा सकता है। अर्थात्, हम किसी व्यक्ति या उसकी गतिविधि में किसी कमी को धर्मी तरीके से उजागर कर सकते हैं, जो उनके भले के लिए हो। और इसके अलावा, परमेश्वर के द्वारा—अनुग्रह में होकर—हमें परिपक्व बनाने के लिए अधार्मिकता से भरी आलोचना का भी उपयोग किया जा सकता है, कि हम मसीह की समानता में बढ़ सकें। आलोचना का सामना कैसे करें, इस बात को समझना चिन्ता करने या रक्षात्मक होने के बजाय हमें बढ़ोतरी के लिए एक ढाँचा प्रदान करता है।
और इस जीवन कौशल मार्गदर्शिका का लक्ष्य आपको उस समय के लिए सुसज्जित होने में सहायता करना है, जब आपको आलोचना से भरे शब्दों का सामना करना पड़े, और उन समयों के लिए भी तैयार होने में सहायता करना है, जब आपको दूसरों की आलोचना करनी पड़े। मेरा उद्देश्य आपको ऐसे साधन उपलब्ध कराना है, जो आपको विभिन्न प्रकार की आलोचनाओं को पहचानने में सहायता करें, और आपको बुद्धिमानी, शालीनता तथा सच्चाई के साथ उनका उत्तर देने के तरीके सुझाएँ।
रणनीति
यह जीवन कौशल मार्गदर्शिका पाँच हिस्सों में बँटी होगी। सबसे पहली बात, हम अपनी अपेक्षाओं को ठीक करेंगे, ताकि आलोचना आने पर हम हैरान न हों। दूसरी बात, हम अलग-अलग प्रकार की आलोचनाओं पर विचार करेंगे। तीसरी बात, हम धार्मिकता से भरी आलोचना को समझने के तरीके पर विचार करेंगे। चौथी बात, हम अधार्मिकता से भरी आलोचना से निपटने के तरीके पहचानेंगे। और अन्त में, हम देखेंगे कि जब आपको दूसरों की आलोचना करने के लिए कहा जाए, तो कोमलता और स्पष्टता के साथ आलोचना का सामना कैसे करें।
आइए, आरम्भ करें:
ऑडियो मार्गदर्शिका
ऑडियो#77 आलोचना का सामना कैसे करें—राय के द्वारा आगे बढ़ना
भाग I: आलोचना की अपेक्षा करें
Praemonitus, praemunitus. यदि आपकी लातीनी भाषा थोड़ी कमजोर है, तो इसका अर्थ है, “पहले से सावधान रहना ही पहले से तैयार रहना है।” यह कथन 16वीं शताब्दी के संयुक्त राज्य के सैन्य युद्धों से आया है। परन्तु यह एक ऐसा कथन है, जो हमारे जीवन के दूसरे क्षेत्रों पर भी उतना ही सही बैठता है, जिनमें हमारी तरफ फेंके जाने वाले आलोचना के वे हथगोलों भी शामिल हैं।
तो बात यह है कि—लगातार रक्षात्मक होने का भाव अपनाए बिना—हम आलोचना को स्वीकार करने और दूसरों की आलोचना करने के लिए अपने हृदयों को तैयार कर सकते हैं। इसकी तैयारी का पहला कदम इस बात पर विचार करना है कि आलोचना कहाँ से आती है और बाइबल में उसकी जड़ों को ढूँढ़ना है। आलोचना आने से पहले ही यह समझना कि उसका सामना कैसे करें, हमें हैरान होने के बजाय बुद्धिमानी से उत्तर देने में सहायता करता है।
अब, आरम्भ में ही हमें यह मान लेना चाहिए कि “आलोचना” शब्द असल में बाइबल में नहीं मिलता। हालाँकि, बाइबल में आलोचना से जुड़े दूसरे विचारों के माध्यम से यह दिखाई देता है। “रचनात्मक आलोचना” के विचार के बारे में पवित्रशास्त्र बहुत कुछ कहता है, जिसके लिए यह “डाँट” और “सुधार” जैसे शब्दों के उपयोग को संदर्भित करता है। वहीं दूसरी ओर, अधार्मिकता से भरी प्रतिक्रियाएँ—जैसे “बड़बड़ाना” और “कुड़कुड़ाना”—विनाशकारी आलोचना की जगह लेती हैं। ये विषय हमें एक ऐसा ढाँचा प्रदान करते हैं, जिसे हम बाइबल-आधारित आलोचना कह सकते हैं, जो हमें धर्मी सुधार और पापपूर्ण गलतियाँ ढूँढ़ने के बीच का अन्तर समझने में सहायता करता है। पूरे पवित्रशास्त्र में, हम दोनों तरह की आलोचनाओं के कई उदाहरण देखते हैं, जो किसी औपचारिक परिभाषा से कहीं अधिक, एक जीवित-ईशविज्ञान के रूप में काम करते हैं।
और जबकि बाद में विद्वानों ने बाइबल-आधारित आलोचना की चार श्रेणियों की पहचान की (जो कि ऐतिहासिक, साहित्यिक, स्वरूप और सम्पादन की आलोचना है), परन्तु हमारे उद्देश्य के लिए, यह देखना अधिक व्यावहारिक है कि परमेश्वर के लोग सुधार, जवाबदेही और डाँट को किस तरह अपने जीवन में उतारते हैं। जब पवित्रशास्त्र में धार्मिकता से भरी आलोचना दिखाई देती है, तो उसमें अक्सर रचनात्मक आलोचना का सार मिलता है—जो बढ़ोतरी, पश्चाताप और आत्मिक परिपक्वता के लिए की जाती है।
परन्तु आइए, सबसे पहले हम यह देखें कि आलोचना कहाँ से आती है, अर्थात् उसकी जड़ क्या है। और ऐसा करना, हमें बिलकुल आरम्भ में—अर्थात् अदन की वाटिका में वापस लेकर जाएगा।
आदि में, परमेश्वर ने सब वस्तुएँ बनाईं, और बाइबल में यह स्पष्ट है कि परमेश्वर ने सब वस्तुएँ अच्छी बनाईं (उत्प. 1:4, 10, 12, 18, 21, 25)। परमेश्वर की सृष्टि का सबसे ऊँचा काम पहले मनुष्यों को बनाना था। आदम और हव्वा को बनाने के बाद, परमेश्वर ने हर बात को “बहुत अच्छा” घोषित किया (उत्प. 1:31)। सब कुछ ठीक था, और आलोचना करने के लिए वहाँ कुछ भी या कोई भी नहीं था। ऐसी कोई बात नहीं थी, जिसमें सुधार की आवश्यकता हो या जो किसी अतिरिक्त सलाह से बेहतर हो सकती हो।
और फिर भी, यह जल्दी ही बदल गया। जब शैतान ने आदम-हव्वा को परमेश्वर की अनाज्ञाकारिता करने की परीक्षा में डाला, तब आलोचना के पहले शब्द उसी के मुँह से निकले थे। उत्पत्ति 3 अध्याय में, शैतान ने उस पहले जोड़े को दी गई परमेश्वर की आज्ञा की (कुछ हद तक) छिपी हुई आलोचना की। शैतान ने यह तर्क देकर परमेश्वर की आलोचना करने का प्रयास किया कि वह आदम-हव्वा के साथ भलाई करना नहीं चाहता। परमेश्वर ऐसा कैसे कर रहा था? उसने उन्हें भले और बुरे के ज्ञान के वृक्ष का फल खाने से मना किया था: “वरन् परमेश्वर आप जानता है कि जिस दिन तुम उसका फल खाओगे उसी दिन तुम्हारी आँखें खुल जाएँगी, और तुम भले बुरे का ज्ञान पाकर परमेश्वर के तुल्य हो जाओगे।”
और दु:ख की बात यह है कि आदम-हव्वा ने परमेश्वर के बारे में शैतान की आलोचना का साथ देकर वह फल खा लिया। जिस पल आदम-हव्वा ने अनाज्ञाकारिता की, तभी पाप इस संसार में आ गया। और जिस संसार ने केवल सुन्दरता, भलाई और आनन्द को जाना था, वह अब कठोरता, क्रूरता, और आलोचना की सम्भावना एवं आलोचना की आवश्यकता के अधीन हो गया। उस समय से आगे, मानवता को यह सीखना पड़ा कि आलोचना का सामना कैसे करें, चाहे वह मिली हुई आलोचना हो या की गई आलोचना हो, क्योंकि टूटेपन ने आलोचना की उपस्थिति को पक्का कर दिया था।
और जैसे-जैसे हम बाइबल की इस कहानी में आगे बढ़ते हैं, आलोचना को फैलने में अधिक समय नहीं लगता। असल में, जैसे ही परमेश्वर आदम से हिसाब लेने आता है, तुरन्त ही आदम अपने “बचाव” में हव्वा की (और यहाँ तक कि परमेश्वर की भी) आलोचना करता है! “आदम ने कहा, “जिस स्त्री को तू ने मेरे संग रहने को दिया है उसी ने उस वृक्ष का फल मुझे दिया, और मैं ने खाया” (उत्प. 3:12)। यह पल बाइबल में आलोचना के सबसे आरम्भिक वर्णित उदाहरणों में से एक है, जो यह दिखाता है कि पाप कैसे सुधार, दोष और व्यक्तिगत् जिम्मेदारी को तोड़-मरोड़ देता है।
जैसे-जैसे पवित्रशास्त्र आगे बढ़ता है, हमें आलोचना के बारे में बाइबल की आयतें भी मिलती हैं, जिनमें से बहुतों में डाँट, सुधार और जवाबदेही की बात की गई है (नीति. 27:5; नीति. 9:8; मत्ती 18:15; 1 तीमु. 5:20)। ये अंश हमें याद दिलाते हैं कि धार्मिकता से भरी डाँट एक वरदान है, जबकि अधार्मिकता से भरी आलोचना एक आत्मिक खतरा है। इस अन्तर को समझने से हम रचनात्मक आलोचना को बढ़ोतरी के एक रास्ते के रूप में पहचान पाते हैं।
और उत्पत्ति 3 अध्याय के समय से ही, आलोचना करने वाले लोग और बातें मौजूद रही हैं। और ऐसे बहुत सारे लोग भी रहे हैं, जो आलोचना करने में प्रसन्न होते रहे हैं।
तो फिर, हर तरह की आलोचना का मूल पाप में ही मिलता है। और इस बात पर और अधिक गहराई से सोचने की आवश्यकता है। तो, आइए एक पल के लिए इस सच्चाई पर थोड़ा और ध्यान दें।
हमें आलोचना की अपेक्षा इसलिए करनी चाहिए, क्योंकि हम पापी हैं, और क्योंकि हर मानवीय रिश्ता टूटेपन से प्रभावित होता है। परन्तु बाइबल-आधारित ज्ञान, परिपक्वता और जागरूकता के माध्यम से, हम इस समझ को विकसित कर सकते हैं कि आलोचना का सामना कैसे करें—चाहे वह आलोचना रचनात्मक हो, विनाशकारी हो, धर्मी हो, या अधर्मी हो।
सबसे पहले, हम देखते हैं कि हमें आलोचना की अपेक्षा इसलिए करनी चाहिए, क्योंकि हम पापी हैं। इस संसार में पाप का आना कोई अलग-थलग घटना नहीं थी। इसका प्रभाव केवल एक परिवार पर नहीं पड़ा। इसका प्रभाव हम सब पर पड़ा है। जहाँ हम परमेश्वर के मानकों के अनुसार जीवन जीने में विफल हो जाते हैं, वहाँ पाप पाया जाता है। इसमें वे अच्छे काम भी शामिल हैं, जो हमें करने चाहिए, परन्तु हम नहीं करते, और इसमें वे गलत काम भी शामिल हैं, जो हमें नहीं करने चाहिए, परन्तु फिर भी हम परमेश्वर के प्रति विद्रोह की भावना से उन्हें करते हैं।
परमेश्वर हमसे कहता है कि हम उससे अपने सम्पूर्ण हृदय, प्राण, शक्ति और मन से प्रेम करें, और दूसरों से भी वैसे ही प्रेम करें, जैसा हम स्वयं से करते हैं (मत्ती 22:37-39)। फिर भी, जब हम स्वयं के प्रति ईमानदार होते हैं, तो हम जानते हैं कि हम उन बातों का पालन नहीं करते, जिनकी परमेश्वर हमसे माँग करता है। और इसका अर्थ है कि कई तरह की बातों के लिए हमारी आलोचना होना बिलकुल सही है। अपने आप में, हम दोषी हैं, और हमारे द्वारा किए गए काम भी दोषपूर्ण होते हैं। और यही वास्तविकता मसीहियों के लिए यह सीखना एक महत्वपूर्ण जीवन कौशल बनाती है कि आलोचना का सामना कैसे करें।
अब, हम सभी को अपने पापी होने को स्वीकार करने के लिए तैयार रहना चाहिए। और समस्या यह है कि पाप धोखा देता है। हम अक्सर अपने ही पापों के प्रति अंधे हो जाते हैं, और इसलिए हम हमेशा उन तरीकों को नहीं देख पाते, जिनसे हम दूसरों को नुकसान पहुँचाते हैं। यह बात नीतिवचन 12:15 में कही गई है, जो हमें याद दिलाता है कि “मूढ़ को अपनी ही चाल सीधी जान पड़ती है, परन्तु जो सम्मति मानता, वह बुद्धिमान है।” विनम्रता विकसित करने से हमें यह सीखने में सहायता मिलती है कि आलोचना होने पर रक्षात्मक होकर प्रतिक्रिया देने के बजाय, आलोचना को कैसे स्वीकार किया जाए।
इसके अलावा, यह समस्या केवल हमारे उन जानबूझकर किए गए पापों के बारे में ही नहीं है, जिनके कारण हमारी आलोचना हो सकती है, बल्कि यह समस्या हमारी स्वाभाविक मानवीय सीमाओं के अनजाने दुष्परिणामों की भी है। दूसरे शब्दों में कहें, तो हम सही अभिप्राय के साथ भी सही काम कर सकते हैं या सही बात कह सकते हैं, परन्तु फिर भी अनजाने में दूसरों को नुकसान पहुँचा सकते हैं। और इसलिए, अच्छे उद्देश्य होने पर भी, हमारी आलोचना पूरी तरह से वैध हो सकती है। कुछ लोग इससे इसलिए संघर्ष करते हैं, क्योंकि वे आलोचना को स्वीकार नहीं कर पाते, परन्तु पवित्रशास्त्र हमें बताता है कि बुद्धिमानी के साथ सुधार को स्वीकार करें, भले ही वह हमें कितना भी असहज क्यों न लगे।
तो फिर, इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है कि पौलुस हमें संयमित विवेक के साथ स्वयं पर विचार करने की आज्ञा देता है (रोमि. 12:3)। नीतिवचन की पुस्तक में इस भाव पर कई बार जोर दिया गया है। नीतिवचन 12:1 कहता है, “जो शिक्षा पाने से प्रीति रखता है वह ज्ञान से प्रीति रखता है, परन्तु जो डाँट से बैर रखता, वह पशु सरीखा है” और नीतिवचन 15:31-32 कहता है, “जो जीवनदायी डाँट कान लगाकर सुनता है, वह बुद्धिमानों के संग ठिकाना पाता है। जो शिक्षा को सुनी–अनसुनी करता, वह अपने प्राण को तुच्छ जानता है, परन्तु जो डाँट को सुनता, वह बुद्धि प्राप्त करता है।” ये आयतें हमें याद दिलाती हैं कि यह सीखना बुद्धि में परिपक्व होने का ही एक भाग है कि आलोचना का सामना कैसे करें।
आलोचना हमारे पाप और हमारी स्वाभाविक सीमाओं के कारण हमारे सामने आती है।
हमें आलोचना की अपेक्षा इसलिए करनी चाहिए, क्योंकि दूसरे लोग भी पापी हैं।
हम न केवल अपने हृदयों के भीतर से निकलने वाले पाप से प्रभावित होते हैं, बल्कि हमारे हृदय उन पापों से भी गहरे तौर पर प्रभावित होते हैं, जो हमारे विरोध में किए जाते हैं। तो हाँ, हमें आलोचना की अपेक्षा इसलिए करनी चाहिए, क्योंकि हम पापी हैं, परन्तु हमें आलोचना की अपेक्षा इसलिए भी करनी चाहिए, क्योंकि दूसरे लोग भी पापी हैं।
आलोचना अधर्मी लोगों के मुँह से भी निकल सकती है। यह उन हृदयों से उमड़कर बाहर आ सकती है, जो ईर्ष्या, डाह और लालच से भरे होते हैं। चोट खाए हुए लोग अक्सर दूसरों को चोट पहुँचाना चाहते हैं। और इसलिए, हमें इस बात पर हैरान नहीं होना चाहिए कि जो शब्द हम कभी-कभी दूसरों से सुनते हैं, वे सहायता करने या सुधारने के सच्चे प्रयास नहीं होते, बल्कि वे ऐसे शब्द होते हैं, जो बदनाम करने और चोट पहुँचाने का प्रयास करते हैं। इस बात को समझने से हमें हर कड़वे शब्द को अपने भीतर समेटे बिना आलोचना का सामना करने में सहायता मिलती है।
यीशु को भी इसी प्रकार की आलोचना का सामना करना पड़ा था। याद रखें कि यीशु ने कभी कुछ गलत नहीं किया था। उसने हमेशा परमेश्वर से प्रेम किया और अपने पड़ोसी से प्रेम किया। उसने जो कुछ भी किया या कहा, उसमें आलोचना करने योग्य कुछ भी नहीं था। और फिर भी, अपने सम्पूर्ण जीवन में, यीशु दूसरों की कठोर और चुभने वाली बातों से कभी दूर नहीं रहा, और उन लोगों ने उसके जीवन और कामों पर टिप्पणियाँ की। हम लूका 5 अध्याय में पढ़ते हैं:
तब लेवी ने अपने घर में उसके लिये एक बड़ा भोज दिया; और चुंगी लेनेवालों की और अन्य लोगों की जो उसके साथ भोजन करने बैठे थे, एक बड़ी भीड़ थी। इस पर फरीसी और उनके शास्त्री उस के चेलों से यह कहकर कुड़कुड़ाने लगे, “तुम चुंगी लेनेवालों और पापियों के साथ क्यों खाते–पीते हो?”
(लूका 5:29-30)
इस घटना में, यीशु कुछ सही काम कर रहा था—अर्थात् समाज से निकाले गए लोगों तक पहुँचकर उन पर दया दिखा रहा था—परन्तु एक प्रश्न के रूप में ही सही, फरीसियों और व्यवस्था के शिक्षकों ने “गलत लोगों” के साथ समय बिताने के लिए उसकी आलोचना की। और जब हम नया नियम पढ़ते हैं, तो हम देखते हैं कि यह कोई अकेली घटना नहीं थी। यीशु हमें आलोचना का सामना करने का एक उदाहरण प्रदान करता है: वह बिना किसी बदले की भावना के उत्तर देता है और स्वयं को परमेश्वर के हाथों में सौंप देता है।
यदि यीशु की आलोचना हुई थी, तो जब हमारी भी आलोचना हो, तो हमें हैरान नहीं होना चाहिए। और यीशु के अनुयायियों के तौर पर, हमें इस संसार से और भी अधिक आलोचना की अपेक्षा करनी चाहिए। यूहन्ना 15 अध्याय में यीशु के इन शब्दों को सुनें:
“यदि संसार तुम से बैर रखता है, तो तुम जानते हो कि उसने तुम से पहले मुझ से बैर रखा। यदि तुम संसार के होते, तो संसार अपनों से प्रेम रखता; परन्तु इस कारण कि तुम संसार के नहीं, वरन् मैं ने तुम्हें संसार में से चुन लिया है, इसी लिये संसार तुम से बैर रखता है।” (यूहन्ना 15:18-19)
दूसरे शब्दों में कहें तो एक और कारण है कि हमें आलोचना का सामना क्यों करना पड़ सकता है। क्योंकि हम यीशु का अनुसरण करते हैं। संसार यीशु से बैर रखता है, और हम उसी के लिए जीते हैं। जब हमारा जीवन प्रभु यीशु को प्रतिबिम्बित करता है और जब हम उसके नाम से उसकी सच्चाई बोलने का प्रयास करते हैं, तो लोगों को यह पसन्द नहीं आता। जैसा कि प्रेरित पौलुस ने कहा था, ”पर जितने मसीह यीशु में भक्ति के साथ जीवन बिताना चाहते हैं वे सब सताए जाएँगे।”
अत:, हमने देखा है कि इस संसार में और असल में व्यक्ति के हृदय में पाप की उपस्थिति ही आलोचना का स्रोत है;
जो हमारे विरुद्ध होती है, और असल में जो हमारी तरफ से भी होती है। जब हम पूछते हैं कि“आप आलोचना को कैसे स्वीकार करते हैं?” तो पवित्रशास्त्र हमें विनम्रता, धीरज और परमेश्वर पर भरोसे की ओर ले जाता है।
सुसमाचार और आलोचना
परन्तु परमेश्वर की स्तुति हो, क्योंकि सुसमाचार से ही हम जान पाते हैं कि पाप की अन्तिम बात काम नहीं करती। हम जानते हैं कि यीशु मसीह पाप के लिए मरने आया था—जो सारी आलोचनाओं का सबसे बड़ा कारण है।
यहाँ तक कि जब वह क्रूस पर था, और विश्वास करने वाले सभी लोगों के लिए उद्धार का काम पूरा कर रहा था, तब भी यीशु को उन पापियों की आलोचना का सामना करना पड़ा, जिनके लिए वह अपना प्राण दे रहा था। जिन लोगों ने उसे क्रूस पर लटका हुआ देखा, उन्होंने उसे ठठ्ठों में उड़ाया। उस पर थूका। और फिर भी, जब वह वहाँ लटका हुआ था, तो वह उन सभी के पापों के लिए मर रहा था, जो उस पर भरोसा करेंगे। पतरस जिस तरह इसे बताता है और हमारे लिए आज इसका अर्थ समझाता है, वह यहाँ दिया गया है:
और तुम इसी के लिये बुलाए भी गए हो, क्योंकि मसीह भी तुम्हारे लिये दु:ख उठाकर तुम्हें एक आदर्श दे गया है कि तुम भी उसके पद–चिन्हों पर चलो। न तो उसने पाप किया और न उसके मुँह से छल की कोई बात निकली। वह गाली सुनकर गाली नहीं देता था, और दु:ख उठाकर किसी को भी धमकी नहीं देता था, पर अपने आप को सच्चे न्यायी के हाथ में सौंपता था। वह आप ही हमारे पापों को अपनी देह पर लिये हुए क्रूस पर चढ़ गया, जिससे हम पापों के लिये मरकर धार्मिकता के लिये जीवन बिताएँ: उसी के मार खाने से तुम चंगे हुए। क्योंकि तुम पहले भटकी हुई भेड़ों के समान थे, पर अब अपने प्राणों के रखवाले और अध्यक्ष के पास लौट आए हो। (1 पत. 2:21-25)
इन शब्दों में हमें आलोचना के सामने अनुग्रह और आशा का एक समुद्र दिखाई देता है। उस सारी आलोचना के लिए जो हमें मिली और जिसके हम हकदार थे, और हमने जो आलोचना भरे शब्द कहे हैं, उन सबके लिए हमारी आशा सुसमाचार में मिलती है। जैसा कि पतरस 24वीं आयत में कहता है कि यीशु हमारे पापों को अपनी देह पर लिये हुए क्रूस पर चढ़ गया, जिससे कि हमें क्षमा मिल सके और हम अपने पापों से शुद्ध हो सकें।
यद्यपि हम परमेश्वर को अपने जीवन जीने के तरीके से नाराज होने के सारे कारण देते हैं, फिर भी उसका प्रिय पुत्र हमारी गलतियों को उठाए हुए क्रूस पर चढ़ गया। जब प्रभु यीशु क्रूस पर लटका हुआ था, तो उसने केवल भीड़ के अपमान और आलोचना को ही नहीं सुना; बल्कि उसने परमेश्वर के सही और निश्चित दण्ड का भी सामना किया। ऐसा क्यों हुआ? ताकि हमें क्षमा मिल सके और हम अपने पापों से चंगे हो सकें, और हमारी आत्माओं के रखवाले और अध्यक्ष परमेश्वर के साथ एक जीवित रिश्ते में हम फिर से बहाल हो सकें।
और इसलिए, सुसमाचार हमें दोषी और पाप से कलंकित पाते हुए हमारे हृदयों का सटीक आंकलन करता है, परन्तु यीशु में हमें दोषी ठहराने के बजाय, परमेश्वर हम पर अपना अनुग्रह बरसाता है। वह हमारे सारे पापों को देखता है, और फिर भी प्रेम में होकर उसने अपने पुत्र को हमें छुड़ाने और बचाने के लिए भेजा है। उसने हमें उन कठोर और प्रेम-रहित शब्दों से बचाया है, जो हमने बोले हैं। उसने हमें कड़वाहट, लालच और डाह की उस बाढ़ से बचाया है, जो हमारे अपने ही मुँह से निकलती है।
और इसका अर्थ यह है कि हमारी विफलताएँ और पाप हमारी पहचान नहीं हैं। ये उनकी अन्तिम बात काम नहीं करती; परन्तु यीशु की बात काम करती है। हमारा जीवन मसीह के साथ परमेश्वर में छिपा हुआ है, और हमारे द्वारा किए जाने वाले कामों या कहे जाने वाले शब्दों की तुलना में, उसमें हमारी पहचान हमारे अस्तित्व के लिए कहीं अधिक प्रमुख है।
और यीशु में, परमेश्वर हमें नया बना रहा है। परमेश्वर चुभने वाले शब्दों को भी सार्थक बना सकता है और उन्हें हमारी भलाई के लिए उपयोग करने में सहायता कर सकता है। और वह कठोर, चुभने वाली बातों को भी सार्थक बना सकता है, ताकि वे बदलकर उसके आत्मा की सामर्थ्य से, हममें उसके पुत्र का स्वरूप गढ़ने के लिए रचनात्मक साधन बन सकें। आलोचना का सामना करने में सुसमाचार हमारी सहायता करता है, और हमें असुरक्षा या लगातार आलोचना के डर के बजाय साहस, कोमलता और बुद्धि प्रदान करता है।
अत:, हमने आलोचना की पृष्ठभूमि को देख लिया है। और हमने यह भी देख लिया है कि हममें या दूसरों में उपस्थित पाप में आलोचना कैसे उत्पन्न हो सकती हैं।
इस आधार को समझने के बाद, अब हम यह प्रश्न पूछते हैं—कि हमें आलोचना पर कैसी प्रतिक्रिया देनी चाहिए? और अब हम इसी विषय की ओर आगे बढ़ेंगे।
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चिन्तन के लिए प्रश्न:
- आलोचना अन्त में पाप से ही उत्पन्न होती है (चाहे वह हमारा पाप हो या दूसरों का), यह समझना इस बात को कैसे बदल देता है कि आप आलोचना करने और उसे सुनने को किस दृष्टि से देखते हैं?
- सुसमाचार हमारे पापों को उजागर भी करता है और उनसे हमें चंगाई भी प्रदान करता है। जब कोई हमें सुधारे या हमारा सामना करे, तो यह सच्चाई हमें उस समय रक्षात्मक होने से कैसे स्वतंत्र कर सकती है?
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भाग II: हमें अलग-अलग तरह की आलोचनाओं को समझना चाहिए
हमारा परिवार इंग्लैंड में अपने घर लौटने से पहले, सेमिनरी की पढ़ाई के लिए तीन वर्ष तक संयुक्त राज्य में रहा। संयुक्त राज्य में बिताया गया हमारा समय एक यादगार सांस्कृतिक अनुभव था, और विशेष रूप से इसलिए, क्योंकि हम एक ऐसे देश में रह रहे थे, जहाँ ऐसे पशु भी थे, जो एक बार काटने से आपको मार सकते थे! एक धूप वाली सुबह, मैंने सामने का दरवाजा खोलकर देखा कि हमारे बरामदे में एक साँप धूप सेंक रहा है। जब मेरा डर कम हुआ, तो मैंने यह पता लगाने का प्रयास किया कि यह एक हानिरहित दूधिया साँप है या फिर एक जहरीला कॉपरहेड (इन दोनों को इतना एक जैसा दिखने की क्या आवश्यकता है?!)। मुझे यह समझने में थोड़ा समय लगा (और मुझे गुगल पर भी खोजना पड़ा) कि यह हानिरहित साँप है, परन्तु इसमें कोई सन्देह नहीं कि अनुभवी आँखों के लिए यह पहचानना बहुत आसान होता कि कौन-सा साँप किस तरह का है। और यद्यपि यह अन्तर जानना बहुत महत्वपूर्ण था कि मैं यह तय कर सकूँ कि मुझे क्या करना है—अर्थात् भागना है या रुकना है!
साँपों की तरह ही, आलोचना भी अलग-अलग रूपों में हमारे सामने आती है, और हमें यह समझना सीखना होगा कि हम किस तरह की आलोचना का सामना कर रहे है।
इससे पहले कि हम इस बारे में सोचें कि आलोचना का सामना कैसे किया जाए, यह बहुत महत्वपूर्ण है कि हम एक पल रुककर यह पहचानें कि जो आलोचना हमें मिल रही है, वह धार्मिकता से भरी है या अधार्मिकता से भरी है। बहुतेरे विश्वासी इसलिए परेशान नहीं होते कि उन्हें आलोचना का सामना करना बिलकुल भी नहीं आता, बल्कि वे इसलिए परेशान होते हैं, क्योंकि उन्होंने कभी रुककर स्वयं से यह बुनियादी प्रश्न नहीं पूछा कि: “जब आपको यही निश्चय न हो कि यह आलोचना किस तरह की है, तो आप उसका सामना कैसे करेंगे?” सबसे पहले हमें आलोचना को समझना होगा, क्योंकि स्पष्टता से हमें अधिक बुद्धिमानी, शान्ति और विनम्रता के साथ उत्तर देने में सहायता मिलती है।
इस प्रकार की आलोचना में अन्तर करने में हमारी सहायता के लिए, आइए हम उन संदर्भों को देखें, जहाँ वे बाइबल में दिखाई देती हैं।
सबसे पहले, आइए हम धार्मिकता से भरी आलोचना या सुधार के दो उदाहरणों पर विचार करें। पहला उदाहरण नातान भविष्यद्वक्ता का है, जिसने राजा दाऊद को तब चुनौती दी थी, जब उसने बहुत बड़ा पाप किया था। बाइबल की यह सच्ची कहानी 2 शमूएल 12 अध्याय में मिलती है।
राजा दाऊद ने एक बहुत ही गम्भीर यौनाचार पाप किया था, और फिर उसे छिपाने का प्रयास किया था, जिसका परिणाम यह हुआ कि उसने दस आज्ञाओं में से अधिकांश आज्ञाओं को तोड़ दिया। इसके बाद, नातान भविष्यद्वक्ता ने राजा दाऊद का सामना किया। अब नातान सीधे-सीधे दाऊद के सामने नहीं आता; वह बुद्धिमानी से दाऊद के पाप की गम्भीरता के प्रति उसकी आँखें खोलने के लिए एक कहानी सुनाता है। और यह तरीका काम करता है। नातान द्वारा दाऊद का सामना करना ही दाऊद के पश्चाताप का कारण बनता है, जब नातान द्वारा सामना किए जाने के बाद दाऊद कहता है, “मैं ने यहोवा के विरुद्ध पाप किया है” (2 शमू. 12:13)।
दाऊद के पश्चाताप के कारण परमेश्वर ने उसे तुरन्त क्षमा कर दिया (कितना बढ़िया अनुग्रह है!)। हालाँकि, दाऊद के पाप के कारण उसे और उसके परिवार को सांसारिक दुष्परिणाम तो भुगतने ही पड़े। यद्यपि, हमारे उद्देश्य के लिए यहाँ हम नातान द्वारा दाऊद को धर्मी सुधार देते हुए देखते हैं, जिससे उसने पश्चाताप किया और उसे क्षमा मिली। उसने दाऊद से बिलकुल सच कहा, और दाऊद बहाल हो गया।
धार्मिकता से भरी आलोचना का दूसरा उदाहरण वह है, जब पौलुस गलातिया में पतरस को सुधारता है। गलातियों 2 अध्याय में, हम पढ़ते हैं कि कैसे पतरस मनुष्यों की राय से डर गया था और इसी कारण से उसने दूसरे मसीहियों के साथ मेज की संगति करना छोड़ दिया था। पौलुस को एहसास हुआ कि यह कोई छोटी-मोटी बात नहीं थी कि आप दोपहर के खाने पर किसके बगल में बैठे हैं। नहीं, यह एक ऐसा व्यवहार था, जिसने सुसमाचार की बुनियादी बातों को ही कमजोर कर दिया था (गला. 2:14)। और इसलिए, पौलुस ने पतरस के “मुँह पर उसका सामना किया” (गला. 2:11)। यह एक धार्मिकता से भरी आलोचना थी और यह सार्वजनिक रूप से की गई थी (गला. 2:14)। पौलुस ने पतरस के कामों को चुनौती दी, और इस पत्री (और बाकी बाइबल) से यह संकेत मिलता है कि पतरस ने पौलुस का वह सुधार मान लिया, और सुसमाचार की पवित्रता बनी रही।
यहाँ हमें एक विश्वासी द्वारा दूसरे विश्वासी के धर्मी सुधार के उन तरीकों के बारे में दो उदाहरण मिलते हैं (जिनमें एक निजी है, और एक सार्वजनिक है), जिनमें वे अपने विश्वासी पेशे के अनुसार काम नहीं कर रहे थे। दोनों ही मामलों में किया गया सुधार उस व्यक्ति को प्रेम करने, परमेश्वर के आदर की खोज करने, और उसके वचन की सच्चाई को बनाए रखने के द्वारा प्रेरित था। ये सुधार स्पष्ट एवं विशेष थे तथा और निकटता से परमेश्वर का अनुसरण करने में एक भाई की सहायता करने की मंशा से थे।
और इस प्रकार का सुधार और आलोचना जीवनदायक होती है। नीतिवचन 27:5-6 कहता है, ”खुली हुई डाँट गुप्त प्रेम से उत्तम है। जो घाव मित्र के हाथ से लगें वह विश्वास योग्य हैं परन्तु बैरी अधिक चुम्बन करता है।”
और फिर भी, हमें बाइबल में अधार्मिकता से भरी आलोचना के उदाहरण भी मिलते हैं। इसका एक उदाहरण गिनती 16 अध्याय में कोरह के बेटे हैं।
इस कहानी में, हम देखते हैं कि जब इस्राएली लोग जंगल में भटक रहे थे, तब मूसा और हारून के विरुद्ध एक विद्रोह हुआ। गिनती 16 अध्याय में, कोरह ने दूसरों के साथ मिलकर मूसा और हारून के अधिकार को चुनौती दी। उनके शब्द मूसा के प्रति बहुत ही आलोचनात्मक थे:
फिर मूसा ने एलीआब के पुत्र दातान और अबीराम को बुलवा भेजा; और उन्होंने कहा, “हम तेरे पास नहीं आएँगे। क्या यह एक छोटी बात है कि तू हम को ऐसे देश से जिसमें दूध और मधु की धाराएँ बहती हैं इसलिये निकाल लाया है, कि हमें जंगल में मार डाले, फिर क्या तू हमारे ऊपर प्रधान भी बनकर अधिकार जताता है? फिर तू ने हमें ऐसे देश में जहाँ दूध और मधु की धाराएँ बहती हैं नहीं पहुँचाया, और न हमें खेतों और दाख की बारियों के अधिकारी किया। क्या तू इन लोगों की आँखों में धूल डालेगा? हम तो नहीं आएँगे।”
परन्तु उनका अनुमान गलत था। सबसे पहले तो, मूसा के पास लोगों की अगुवाई करने के लिए परमेश्वर की ओर से एक स्पष्ट आदेश था, और इससे भी बढ़कर, (भज. 106:16 को देखें) ऐसा लगता है कि वे धार्मिकता से भरी चिन्ता से प्रेरित नहीं थे, बल्कि ईर्ष्या और डाह से प्रेरित थे। दु:ख की बात यह है कि उनकी खुली आलोचना से मूसा का नहीं, बल्कि उनका अपना ही नाश हो गया। जैसा कि अध्याय 16 अध्याय में आगे बताया गया है कि पृथ्वी फट गई और उसने कोरह, दातान और अबीराम को निगल लिया, जबकि धूप जलाने वाले 250 लोगों को आग ने भस्म कर दिया (गिन. 16:31-35)।
अत:, ये अलग-अलग तरह की आलोचनाएँ हैं। धार्मिकता से भरी आलोचना, जो पश्चाताप और जीवन की ओर ले जाती है, और अधार्मिकता से भरी आलोचना, जो कठोर, कड़वे हृदयों से निकलकर नाश की ओर ले जाती है। इसलिए, जब हम आलोचना का सामना करें, तो सबसे पहला महत्वपूर्ण कदम यह पहचानना है कि यह आलोचना धार्मिकता से भरी है या अधार्मिकता से भरी है।
अब, यह कहना जितना आसान है, करना उतना ही मुश्किल है! हमें हमेशा यह नहीं बताया जाता कि कौन सी आलोचना किस तरह की है! काश यह पृथ्वी उन लोगों को निगलने के लिए फट जाती है, जो अधार्मिकता से भरी आलोचना करते हैं (यद्यपि यदि ऐसा होता, तो हममें से कौन बच पाता?!)।
परन्तु, जबकि शायद यह पहचानना कठिन हो कि जो आलोचना हमें मिल रही है वह धार्मिकता से भरी या अधार्मिकता से भरी है, फिर भी कम से कम इन दो श्रेणियों को अपने मन में रखना सहायक होता है।
परन्तु हम ऐसा कैसे करें?
वैसे, इस प्रश्न का कोई आसान उत्तर नहीं है! परन्तु ऊपर दिए गए उदाहरणों से, हम देख सकते हैं कि कुछ ऐसे सिद्धान्त हैं, जो धार्मिकता से भरी आलोचना को अधार्मिकता से भरी आलोचना से अलग करते हैं।
धार्मिकता से भरी आलोचना लोगों से प्रेम करने और सच्चाई को बनाए रखने का प्रयास करती है, जबकि अधार्मिकता से भरी आलोचना ईर्ष्या और स्वार्थी महत्वाकांक्षा से उत्पन्न होती है। धार्मिकता से भरे सुधार का लक्ष्य किसी व्यक्ति को परमेश्वर की सच्चाई के अनुरूप लाना होता है, जबकि अधार्मिकता से भरी आलोचना दूसरों को नीचा दिखाने और नुकसान पहुँचाने का प्रयास करती है। अक्सर, धार्मिकता से भरी आलोचना इस तरह से की जाती है, जो ढिठाई भरी और आरोप लगाने वाली होने के विपरीत स्पष्ट और विनम्र होती है।
यहाँ एक सहायक तालिका दी गई है, जिसमें हम उन अलग-अलग तरह की आलोचनाओं की विशेषताओं और गुणों पर विचार कर सकते हैं, जिनका हमें सामना करना पड़ सकता है।
| श्रेणी | धार्मिकता से भरी आलोचना | अधार्मिकता से भरी आलोचना |
| बाइबल-आधारित उदाहरण | नातान द्वारा दाऊद का सामना करना (2 शमू. 12 अध्याय); पौलुस द्वारा पतरस को सुधारना (गला. 2) | कोरह, दातान और अबीराम का मूसा के विरुद्ध विद्रोह करना (गिनती 16 अध्याय) |
| प्रेरणा | उस व्यक्ति के प्रति प्रेम; परमेश्वर का आदर करना; सत्य को बनाए रखना | ईर्ष्या, घमण्ड, विद्रोह, स्वार्थी महत्वाकांक्षा |
| मंशा / लक्ष्य | प्रेमपूर्वक पाप को सुधारना और परमेश्वर के साथ रिश्ता बहाल करना | दूसरों को नीचा दिखाना, नुकसान पहुँचाना, या बदनाम करना; अपनी बड़ाई करना |
| लहजा और तरीका | विनम्र, स्पष्ट, विशिष्ट, (कभी निजी तौर पर, कभी सार्वजनिक तौर पर) | अनादरपूर्ण, आरोप लगाने वाला, अवज्ञाकारी |
| मुख्य बात | ऐसा व्यवहार जो विश्वास या सत्य के अनुरूप न हो | व्यक्तिगत् आक्रमण या परमेश्वर द्वारा दिए गए अधिकार को चुनौती देना |
| प्रभाव / परिणाम | पश्चाताप, क्षमा और आत्मिक बढ़ोतरी की ओर ले जाता है | फूट, दण्ड और विनाश की ओर ले जाता है |
| उदाहरण परिणाम | दाऊद ने पश्चाताप किया और उसे क्षमा मिली; पतरस ने अपना व्यवहार सुधारा | कोरह के विद्रोह ने विनाश करवा दिया |
| नीतिवचन 27:5–6 का सिद्धान्त | “जो घाव मित्र के हाथ से लगें वह विश्वास योग्य हैं”—यह जीवनदायी है | “बैरी अधिक चुम्बन करता है”—यह नुकसान पहुँचाता है |
इस आंकलन में कुछ समय लग सकता है, और हमें यह पहचानने के लिए बहुत समझदारी की आवश्यकता पड़ेगी कि, हम जो शब्द सुन रहे हैं, वे किस श्रेणी में आते हैं (और किस हद तक आते हैं)। परन्तु प्रभु के सामने यह काम करना बहुत ही महत्वपूर्ण है।
आइए अब हम विचार करें कि दोनों प्रकार की आलोचनाओं को लेने का सामना हम कैसे कर सकते हैं, और फिर हम इस बात पर विचार करेंगे कि हम सबसे अच्छे तरीके से धार्मिकता से भरी आलोचना कैसे कर सकते हैं।
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चिन्तन के लिए प्रश्न:
- यह पहचानना क्यों महत्वपूर्ण है कि सभी आलोचनाएँ एक जैसी नहीं होतीं, और जब कोई आपकी आलोचना करे, तो यह जागरूकता आपकी आरम्भिक प्रतिक्रिया को कैसे बदल सकती है?
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भाग III: हमें धार्मिकता से भरी आलोचना का स्वागत करना चाहिए और उसे आमंत्रित करना चाहिए
हैंस क्रिश्चियन एण्डरसन की प्रसिद्ध काल्पनिक कथा कुछ इस तरह है कि एक बार एक सम्राट था, जिसे अपने रूप के अलावा किसी दूसरी बात की परवाह नहीं थी। और दो चालाक बुनकरों ने उसके पास आकर यह दावा किया कि वे कपड़ों का एक ऐसा बढ़िया जोड़ा बना सकते हैं, जो मूर्ख और अयोग्य लोगों को दिखाई नहीं देगा। अपनी बुद्धिमानी साबित करने की उत्सुकता में, सम्राट ने उन्हें खूब पैसा दिया। बुनकरों ने कुछ भी नहीं बुना था, फिर भी हर कोई—मंत्री, दरबारी, यहाँ तक कि सम्राट स्वयं भी—उस शानदार कपड़े को देखने का दिखावा करते रहे, क्योंकि उन्हें डर था कि कहीं उन्हें अपने पदों के लिए अयोग्य न मान लिया जाए। अन्त में, सम्राट अपने लोगों के सामने पूरी तरह नंगा होकर उन “नये कपड़ों” में पैदलयात्रा करने नगर में निकला। डर और घमण्ड से बंधी हुई भीड़, कुछ नहीं बोली—जब तक कि एक छोटे बच्चे ने चिल्लाकर नहीं कहा, “परन्तु उसने तो कुछ भी नहीं पहना है!” केवल तभी सच्चाई ने उस भ्रम को तोड़ दिया।
यह एक चेतावनी से भरी हुई कहानी है, जो हमारे आसपास ऐसे लोगों के होने के महत्व के बारे में बताती है, जो हमारे जीवन में कड़वी सच्चाइयाँ बोलने को तैयार हों।
उस सम्राट की तरह, हम भी स्वयं को ऐसी आवाजों से घेरे रखने की परीक्षा में पड़ जाते हैं, जो हममें सुधार करने के बजाय हमारी चापलूसी करती हैं। हमें ईमानदारी की नहीं, बल्कि बड़ाई की चाह होती है, और इसलिए हम भ्रम में लिपटे हुए, अंधे होकर चलते हैं। परन्तु एक धार्मिकता से भरी आलोचना—जो ईमानदार, विनम्र और प्रेम में जड़ पकड़े हुए हों—उस बच्चे की आवाज की तरह होती है: जो असहज तो लगती है, फिर भी स्वतंत्र कर देती है।
अत:, जिन अलग-अलग प्रकार की आलोचनाओं का हमने सामना किया है, उनमें अन्तर समझने के बाद, आइए अब हम विचार करें कि, जब हमें ये दोनों तरह की आलोचनाएँ मिलें, तो हम कैसी प्रतिक्रिया दें। और सबसे पहले, हम इस बात पर विचार करेंगे कि हमें धार्मिकता से भरी आलोचना, या जिसे बाइबल “सुधार” या “डाँट” कहती है, मिलने पर कैसी प्रतिक्रिया देनी चाहिए।
यहाँ मुख्य बात यह है कि हमें धार्मिकता से भरी आलोचना का स्वागत करना चाहिए। हमें अपने आसपास ऐसे लोगों को रखने का प्रयास करना चाहिए, जो हमारी मंजूरी से अधिक परमेश्वर से डरते हों, क्योंकि झूठ के आराम से तो सच की चुभन बेहतर है।
बाइबल हमें यही भाव अपनाने के लिए कहती है। नीतिवचन 9 अध्याय में सुलैमान कहता है:
ठट्ठा करनेवाले को न डाँट, ऐसा न हो कि वह तुझ से बैर रखे, बुद्धिमान को डाँट, वह तो तुझ से प्रेम रखेगा। बुद्धिमान को शिक्षा दे, वह अधिक बुद्धिमान होगा; धर्मी को चिता दे, वह अपनी विद्या बढ़ाएगा —नीति. 9:8-9.
यहाँ हम देखते हैं कि बुद्धिमान लोग धार्मिकता से भरी आलोचना को खुले हृदय से स्वीकार करते हैं, और सच में उसे पसन्द करते हैं। नीतिवचन 9 अध्याय का बुद्धिमान व्यक्ति यह पहचानता है कि लोगों को हमेशा सुधार की आवश्यकता होती है, और ऐसे तरीके हमेशा उपलब्ध होते हैं, जिनमें वे बढ़ सकते हैं, और इसलिए वे आलोचना का स्वागत करते हैं। धर्मी व्यक्ति यह पहचानते हैं कि दूसरे लोगों के पास ऐसा गहरा ज्ञान होता है, जिससे वे सीख सकते हैं। और इसलिए, जहाँ भी भक्ति बाँटी जाए, उसका स्वागत किया जाना चाहिए।
और बाइबल बताती है कि धार्मिकता से भरी आलोचना और बुराई को सुनकर ही हम बढ़ते हैं। फिर से देखिए कि नीतिवचन 19:20 हमें क्या सिखाता है:
सम्मति को सुन ले, और शिक्षा को ग्रहण कर, कि तू अन्तकाल में बुद्धिमान ठहरे।
और फिर से, नीतिवचन 13:18 को देखें:
जो शिक्षा को सुनी–अनसुनी करता वह निर्धन होता और अपमान पाता है, परन्तु जो डाँट को मानता, उसकी महिमा होती है।
अत:, इन आयतों में हम देखते हैं कि सबसे पहले हमें अपने हृदय को ऐसा बनाने का प्रयास करना चाहिए जो धर्मी सुधार को सुनने के लिए हमेशा खुला रहे। और याद रखें कि यहाँ सुसमाचार ही सबसे प्रमुख बात है। सुसमाचार में जड़ पकड़े और जमे रहने का अर्थ है कि हमें धार्मिकता से भरी आलोचना को स्वीकार करने के लिए अधिक तैयार रहना चाहिए, और रक्षात्मक होने के बजाय, इसे सीखने की जिज्ञासा के साथ लेना चाहिए।
जब हमारे हृदय का भाव ऐसा हो, तो हम धार्मिकता से भरी आलोचना का स्वागत कैसे कर सकते हैं, और सच में उसे कैसे आमंत्रित कर सकते हैं?
यहाँ हमारे द्वारा पालन करने हेतु 3 कदम दिए गए हैं:
1) प्रश्न पूछें
सबसे पहली बात, हमें मिलने वाली उस राय के बारे में हम प्रश्न पूछ सकते हैं, और यदि सम्भव हो, तो सुधार करने वाले व्यक्ति से भी प्रश्न पूछ सकते हैं। कुछ पाठकों के लिए, आलोचना कभी-कभार होने वाली बात नहीं होती, बल्कि यह रिश्तों से जुड़ी हुई होती है: उदाहरण के लिए, कोई स्त्री यह महसूस कर सकती है कि “मेरे पति हमेशा मेरी आलोचना करते हैं,” और बिना किसी स्पष्टता के लगातार मिलने वाली इस तरह की राय से वह अभिभूत हो सकती है। ऐसी परिस्थितियों में, प्रश्न पूछना केवल एक शिष्टाचार नहीं है — बल्कि यह बात को समझने का एक महत्वपूर्ण साधन है। यह आपको उस बात को समझने में सहायता कर सकता है कि क्या उस आलोचना में बढ़ोतरी के लिए सही जगहें दिख रही हैं, या फिर वह आलोचना तनाव, गलतफहमी, या अनसुलझे झगड़े के कारण की जा रही है।
सुसमाचार में जमे रहने से हमें बातों को समझने का खुलापन मिलता है और हम आलोचना करने वाले से भी और स्वयं से भी अच्छे प्रश्न पूछ पाते हैं। जो आपकी आलोचना कर रहा है, उससे प्रश्न पूछने से किसी भी गलतफहमी से बचने में सहायता मिल सकती है। इसलिए, इस तरह के प्रश्न पूछें:
– जिस बात की आपने पहचान की है, क्या आप उसका कोई विशेष उदाहरण दे सकते हैं?
– आपके विचार से क्या ऐसे और भी तरीके हैं, जिनमें मुझे बढ़ने की आवश्यकता है?
– आपके विचार से इस मुद्दे का मेरे आसपास के लोगों पर क्या प्रभाव पड़ता है?
अब, मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि इस प्रकार के प्रश्न पूछना कोई आसान काम है। ये प्रश्न हमें आगे की आलोचना के लिए खुला छोड़ सकते हैं और हमें आलोचनीय महसूस करवा सकते हैं। हालाँकि, हमें यह याद रखना होगा कि बाइबल बताती है कि “परमेश्वर अभिमानियों का विरोध करता है, पर दीनों पर अनुग्रह करता है।” और जब जिज्ञासा एवं दयालुता के साथ ऐसा किया जाए, तो अक्सर इस प्रकार के आलोचनीय प्रश्न पूछने से बहुत आशीष मिलती है।
सुसमाचार की सुरक्षा की स्थिति से पूछे गए इस तरह के प्रश्न, हमें स्वयं को और बेहतर ढंग से समझने की ओर बढ़ने में सहायता करते हैं। इनके उत्तर एक दर्पण की तरह काम करते हैं: वे हमें स्वयं को देखने का एक बेहतर कोण प्रदान कर सकते हैं कि हम असल में कौन हैं।
हालाँकि, जब हमें इस तरह की राय मिले, तो हम स्वयं से भी कुछ प्रश्न पूछ सकते हैं। अपने घमण्ड के कारण रक्षात्मक प्रतिक्रिया देने और अपनी प्रतिष्ठा या छवि को बचाने का प्रयास करने के बजाय, हम अपने बारे में जिज्ञासु हो सकते हैं। और इसलिए, हम स्वयं से इस तरह के प्रश्न पूछ सकते हैं:
– इस सुधार के माध्यम से परमेश्वर मुझे क्या बदलने के लिए आमंत्रित कर रहा है?
– पश्चाताप और बढ़ोतरी की दिशा में मैं कौन से व्यावहारिक कदम उठा सकता हूँ?
– क्या इस राय ने मेरे जीवन की अन्य समस्याओं या गहरे पापों के संघर्षों को उजागर किया है?
ये ऐसे प्रश्न नहीं हैं, जिनके उत्तर जल्दी-जल्दी में दिए जाएँ। मेरा सुझाव है कि जब भी आपकी आलोचना हो, तो आप उन प्रश्नों के उत्तरों पर विचार करने के लिए अच्छा-खासा समय निकालें और अपनी एक डायरी में उन्हें लिखें।
इस तरह, हम जिज्ञासा के साथ धार्मिकता से भरी आलोचना का उत्तर दे सकते हैं। ऐसा करने से, हम स्वयं की अपनी समझ में और मसीह की समानता की ओर आगे बढ़ते हैं।
प्रार्थना करें
दूसरी बात, जब आपको धार्मिकता से भरी आलोचना मिले, तो प्रार्थना करना एक धार्मिकता से भरी प्रतिक्रिया है। प्रार्थना में ही हम अपने जीवन के बारे में परमेश्वर से मल्लयुद्ध कर सकते हैं (भजन संहिता को देखें)। और जब हमारे सामने आलोचना आए, तो प्रार्थना में उसे प्रभु के सामने रखना ही वह तरीका है, जिससे हम उससे निपट सकते हैं।
जब आपको धर्मी सुधार मिले, तो प्रार्थना करें कि परमेश्वर आपको एक कोमल हृदय प्रदान करे। प्रार्थना करें कि परमेश्वर आपको रक्षात्मक होने से बचाए रखे। उन बातों को परमेश्वर के सामने रखें, जिन्हें सुनना आपके लिए मुश्किल हो रहा है—ऐसी बातें, जो शायद आपको चुभ रही हों। उस व्यक्ति के लिए प्रार्थना करें, जिसने आपको यह राय दी है। ऐसी राय देने की उनकी इच्छा और प्रेम के लिए परमेश्वर का धन्यवाद करें। और प्रार्थना करें कि आप उनके शब्दों को एक मित्र के विश्वासयोग्य घावों के रूप में देखें।
इसलिए, सुधार या डाँट के प्रति दो अच्छी प्रतिक्रियाएँ मौजूद हैं।
और फिर भी, आलोचना का अच्छे से सामना करने के लिए, मुझे पूरा विश्वास है कि हमें अपने दृष्टिकोण में केवल प्रतिक्रिया देने वाला नहीं, बल्कि सक्रिय होना चाहिए। केवल अपने सामने आने वाली आलोचना से निपटने के बजाय, हम अपने जीवन के अलग-अलग क्षेत्रों में भरोसेमन्द लोगों से उचित प्रतिक्रिया माँगकर और भी अधिक उन्नति कर सकते हैं। और तीसरी बात, हमें यह करना चाहिए…
धार्मिकता से भरी राय को आमंत्रित करें
अब हो सकता है कि यह आपको पागलपन लगे, परन्तु मेरी बात ध्यान से सुनें! अपने जीवन में उचित और धार्मिकता से भरी राय आमंत्रित करने के कई लाभ हैं। और इसका सबसे बड़ा लाभ यह है कि आलोचना आमंत्रित करके, आप अपने हृदय के स्वास्थ्य का ध्यान रख रहे होते हैं।
आप देखिए कि यदि हम सारी आलोचना से स्वयं को बचाते हैं, तो इस बात का खतरा रहता है कि हमारे हृदय घमण्डी और कठोर हो जाएँ। परन्तु ऐसे रास्ते खोलकर, जहाँ धार्मिकता से भरी आलोचना को प्रेम और विनम्रता से स्वीकार किया जा सके, हम (परमेश्वर के अनुग्रह से) अपने हृदय को नरम और विनम्र बनाए रखने का प्रयास कर सकते हैं।
मैं एक पास्टर को जानता हूँ, जो इस बात का बहुत अच्छा उदाहरण हैं। हर रविवार की शाम को, वह लोगों का एक समूह इकट्ठा करके उस दिन की सभाओं की समीक्षा करते हैं। हर सत्र के आरम्भ में, वह कहते हैं कि “धार्मिकता से भरी प्रोत्साहन और आलोचना देने और लेने का एक उदाहरण पेश करना ही इस समय का उद्देश्य है।” इस रीति से, एक ऐसा रास्ता बन जाता है, जहाँ उचित और नपी-तुली आलोचना (और प्रोत्साहन) दिया जा सकता है।
और यह तरीका केवल सेवकाई या हमारे द्वारा किए जाने वाले कामों तक ही सीमित नहीं होना चाहिए। यह हमारे दैनिक जीवन में भी एक बढ़िया भाव हो सकता है। हमारे विवाहों, परिवारों और कार्यस्थलों में, हम भरोसेमन्द लोगों से उचित राय माँग सकते हैं। उदाहरण के लिए, काम पर आलोचना का सामना कैसे करें, यह सीखना अक्सर तनावपूर्ण प्रदर्शन वाली समीक्षाओं की प्रतीक्षा करने के बजाय, पर्यवेक्षक या दल के साथियों की ओर से कौशल-निर्माण की राय को सक्रिय रूप से आमंत्रित करने से आरम्भ होता है। जब राय एक नियमित और विनम्रता भरा अभ्यास बन जाती है, तो कार्यस्थल पर सुधार कम डरावना तथा शिष्यत्व और बढ़ोतरी का हिस्सा अधिक लगता है।
अत:, आप एक या दो ऐसे धर्मी मित्रों के साथ आरम्भ क्यों नहीं करते, जो आपको अच्छी तरह जानते हैं, शायद वह व्यक्ति, जो आपका मार्गदर्शन कर रहा हो? और उनकी राय को आमंत्रित करके, आगे बढ़ने की अपनी इच्छा प्रकट करें।
यदि आप हर किसी के साथ यह भाव अपनाएँगे, तो यह सहायक नहीं होगा। यह महत्वपूर्ण है कि आप किसी ऐसे व्यक्ति को चुनें, जिसके साथ आप सहज महसूस करते हों, जो आपको जानता हो, और जिस पर आप भरोसा करते हों। (यदि इस समय पर आपके जीवन में ऐसा कोई नहीं है, तो प्रार्थना करें कि परमेश्वर आपको ऐसा कोई व्यक्ति दे!) और वहीं से आरम्भ करें। और प्रार्थना करें कि आप एक दूसरे को निखारने और सुधारने के लिए परमेश्वर के हाथों में एक साधन बनें।
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चिन्तन के लिए प्रश्न:
- अगली बार जब आपको राय या आलोचना मिले, तो रक्षात्मक होने के बजाय, जिज्ञासा के साथ उत्तर देना आपके लिए कैसा होगा?
- आपके जीवन में ऐसा कौन है, जिसे आप जान-बूझकर ईमानदार, धार्मिकता से भरी आलोचना देने के लिए आमंत्रित कर सकते हैं—कोई ऐसा व्यक्ति, जो आपको आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित भी करे और चुनौती भी दे?
- अपने जीवन के किन विशेष क्षेत्रों में (जैसे कि काम, रिश्ते, सेवकाई में) आप नियमित तौर पर लोगों से राय लेना और जो आप सुनें, उसके बारे में प्रार्थना करना आरम्भ कर सकते हैं?
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भाग IV: हमें अधार्मिकता से भरी आलोचना को परखना चाहिए
अत:, हमने इस बात पर विचार किया कि धार्मिकता से भरी आलोचना का उत्तर कैसे दिया जाए। और सच कहूँ तो, कई तरीकों में यह भाग आसान है! हालाँकि, ऐसे समय आएँगे, जब धार्मिकता से भरी आलोचना नहीं होगी और उसका लक्ष्य आपको ऊपर उठाने के बजाय, नीचा गिराना अधिक होगा।
हमें इस प्रकार की आलोचना का उत्तर कैसे देना चाहिए?
शायद यह परीक्षा सामने आ जाए कि या तो पलटकर आलोचना करें और स्वयं भी कुछ हथगोले फेंकें, या इस विस्तार के दूसरी तरफ, बस भाग खड़े हों (चाहें तो ऐसा सच में करें या लाक्षणिक रूप से करें) और इस तरह उस बारे में सोचना या बात करना ही पूरी तरह से बन्द कर दें। या तो लड़ो या भाग जाओ। कई बार ऐसा हो सकता है कि उत्तर देना सही हो, और कई बार ऐसा भी हो सकता है कि उस परिस्थिति से स्वयं को हटा लेना ही बुद्धिमानी हो। परन्तु ऐसा तभी करें, जब आपने अपने हृदय पर कुछ काम कर लिया हो।
इसलिए, अधार्मिकता से भरी आलोचना पर विचार करने के लिए यहाँ पाँच कदम दिए गए हैं:
1) रुकें
इस परिस्थिति में हमें सबसे पहले जो काम करना चाहिए, वह रुक जाना है। याकूब 1:19-20 में वह कहता है, “हे मेरे प्रिय भाइयों, यह बात तुम जान लो: हर एक मनुष्य सुनने के लिये तत्पर और बोलने में धीर और क्रोध में धीमा हो, क्योंकि मनुष्य का क्रोध परमेश्वर के धर्म का निर्वाह नहीं कर सकता।”
जब हम गुस्से में उत्तर देना चाहें, तो याकूब की सलाह है कि हम रुक जाएँ। हम सुनने के लिये तत्पर और बोलने में धीर बनें। याकूब की यह सलाह मानकर कितने झगड़े और लड़ाइयाँ टाली जा सकती थीं? जैसा कि नीतिवचन 10:19 में कहा गया है, “जहाँ बहुत बातें होती हैं, वहाँ अपराध भी होता है, परन्तु जो अपने मुँह को बन्द रखता वह बुद्धि से काम करता है।”
उत्तर देने से पहले रुकने का एक लाभ यह है कि हमें कही गई बात पर विचार करने के लिए अधिक समय मिल जाता है, और ऐसा विशेष रूप से तब होता है, जब आवेगपूर्ण ढंग से प्रतिक्रिया दिए बिना हमें इस बात में मुश्किल होती हो कि आलोचना का सामना कैसे करें। और विशेष रूप से, क्या आलोचना करने वाला व्यक्ति हमें इतनी अच्छी तरह जानता है कि वह हमारे जीवन के बारे में इस तरह की बातें कह सके।
हमारे सामने आने वाली आलोचना को लेकर अधिक चिड़चिड़े होने से पहले, हमें स्वयं को उस प्रसिद्ध प्रचारक सी.एच. स्पर्जन की बात याद दिलाना लाभकारी होगा, जिन्होंने एक बार बुद्धिमानी से कहा था, “यदि कोई व्यक्ति आपके बारे में बुरा सोचता है, तो उससे नाराज न हों, क्योंकि जितना वह आपके बारे में सोचता है, आप उससे भी अधिक बुरे हैं।”
2) प्रार्थना करें
दूसरी बात, जैसा हम धार्मिकता से भरी आलोचना के साथ करते हैं, वैसे ही जब हम अधार्मिकता से भरी आलोचना का सामना करें, तो हमें प्रार्थना करना याद रखना चाहिए। जैसे एक गीत कहता है,
दोस्त जब छोड़े और सतावें, बाप से तुम बयान करो। तब वह गोद में तुमको लेके, खोवेगा सब दुःख को।
फिर से, जो कुछ हमने सुना है, उसके आधार पर हमें अपने हृदयों के लिए प्रार्थना करनी चाहिए। प्रार्थना करें कि प्रभु उस व्यक्ति से प्रेम करने में हमारी सहायता करे, जिसने हमारी आलोचना की है, और यह भी कि उस आलोचना से हमारे हृदय कड़वे न हों। प्रार्थना करें कि प्रभु हमें ऐसा अनुग्रह और बुद्धि प्रदान करे कि हम अच्छे से और उसका आदर करने वाले तरीके से उत्तर दें। प्रार्थना हमारी आत्मा को कोमल बनाती है और हमें यह समझने में सहायता करती है कि आलोचना का सामना उस तरीके से कैसे करें, जो मसीह को दर्शाए।
3) पाँच प्रतिशत् पर विचार करें
किसी ने एक बार मुझे सलाह दी थी कि भले ही आप किसी आलोचना के अधिकांश हिस्से से सहमत न हों, फिर भी जो कुछ कहा गया है, उसमें हमेशा कुछ न कुछ सच्चाई अवश्य होगी। शायद वह पाँच प्रतिशत्, या शायद उससे भी कम हो। और इसलिए, जो कुछ कहा गया है, उसके बारे में प्रार्थना करने के बाद, यह देखना लाभकारी होगा कि उनके कड़े शब्दों में से हम कितनी सच्चाई निकाल सकते हैं।
जैसा किसी ने बुद्धिमानी से लिखा है कि “ऐसा बहुत कम होता है कि आप कूड़े के सबसे बड़े ढेर में से भी थोड़ा-सा सोना न निकाल पाएँ।” और जैसे नीतिवचन में हमें याद दिलाया गया है, ऐसा दृष्टिकोण एक बुद्धिमान व्यक्ति को और भी अधिक बुद्धिमान बना देता है। इसलिए, आपके सामने आने वाले शब्दों को सबसे अच्छे दृष्टिकोण से परखने पर ध्यान दें, जिससे आप यह देख पाएँ कि आपकी आलोचना करने वाले व्यक्ति की बात में कहाँ तक सच्चाई हो सकती है। यह विनम्र भाव आलोचना को स्वीकार करने के लिए बहुत महत्वपूर्ण है, बिना इसके कि वह आपकी पहचान बन जाए।
4) अनुग्रह के साथ उत्तर दें
इस जीवन कौशल मार्गदर्शिका में पहले हमने यीशु पर और इस बात पर ध्यान दिया था कि उसने आलोचना का सामना कैसे किया था: “वह गाली सुनकर गाली नहीं देता था, और दु:ख उठाकर किसी को भी धमकी नहीं देता था, पर अपने आप को सच्चे न्यायी के हाथ में सौंपता था” (1 पत. 2:23)। इस तरह से यीशु ने गलत आलोचना का सामना किया था। उसे हमेशा पलटकर उत्तर देने की आवश्यकता महसूस नहीं हुई, और जब उसने उत्तर दिया भी, तो अनुग्रह से भरे शब्दों में उत्तर दिया।
कई बार ऐसा भी होगा जब कुछ न कहना ही सही होगा। परन्तु यदि हमें उत्तर देने की आवश्यकता महसूस हो, तो फिर हमें प्रेम से सच बोलने के लिए बुलाया गया है (इफि. 4:15), और “सब प्रकार की कड़वाहट, और प्रकोप और क्रोध, और कलह, और निन्दा, सब बैरभाव समेत तुम से दूर की जाए। एक दूसरे पर कृपालु और करुणामय हो, और जैसे परमेश्वर ने मसीह में तुम्हारे अपराध क्षमा किए, वैसे ही तुम भी एक दूसरे के अपराध क्षमा करो” (इफि. 4:31-32)। शालीनता भरी बातचीत इस बात का सबसे पक्का संकेत है कि हमने बिना किसी मनमुटाव के यह सीख लिया है कि आलोचना को कैसे स्वीकार करें।
5) मसीही समुदाय का सहारा लें
अन्त में, इस परिस्थिति में, हम अपने मसीही समुदाय का सहारा ले सकते हैं। मसीही जीवन ऐसा नहीं है, जिसे हमें अकेलेपन में जीना है। यह बात अच्छे समय और कठिन समय, दोनों में सच है। और इसलिए, जब हमें अधार्मिकता से भरी आलोचना का सामना करना पड़े, तो हमें उचित रूप से अपने मसीही समुदाय का सहारा लेना चाहिए।
यह कैसा दिखता है? इसका अर्थ यह हो सकता है कि हम किसी प्रशिक्षक या अनुभवी विश्वासी से यह समझने में सहायता माँगें कि हमें असमय की आलोचना को कैसे स्वीकार करना चाहिए या उस पर कैसी प्रतिक्रिया देनी चाहिए। अब, ऐसा करते समय हमें सावधानी बरतनी चाहिए। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि हम स्वयं पर तरस खाने, गपशप करने या बदनामी करने के जाल में न फँसें।
हालाँकि, हम किसी भरोसेमन्द व्यक्ति से उसकी राय माँग सकते हैं कि वह आलोचना कितनी और किस हद तक सही है। शायद किसी भरोसेमन्द मित्र से पूछें कि यह “पाँच प्रतिशत् सच्चाई” क्या हो सकती है। और उनसे कहें कि वे समय-समय पर इस परिस्थिति के बारे में आपका और आपके हृदय का हाल पूछते रहें।
एक प्रेम भरे, जवाबदेह कलीसियाई समुदाय का हिस्सा होने से एक ऐसा वातावरण बनता है, जहाँ आलोचना पर प्रतिक्रिया देना कम डरावना लगता है, क्योंकि आप ऐसे लोगों से घिरे होते हैं, जो आपसे प्रेम करते हैं, आपकी बढ़ोतरी चाहते हैं, और आपकी कमजोरियों को समझते हैं।
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चिन्तन के लिए प्रश्न:
- जब आपको कोई कठोर या अनुचित आलोचना मिले, तो ऐसे कौन से व्यावहारिक कदम हैं, जो आपको धीमा होने और गुस्सा या रक्षात्मक होकर प्रतिक्रिया देने से बचने में सहायता कर सकते हैं?
- उस समय के बारे में सोचें, जब आपको कोई ऐसी आलोचना मिली हो, जो आपको अनुचित या दु:ख देने वाली लगी हो। पीछे मुड़कर देखने पर, क्या उसमें सच्चाई का कोई छोटा सा अंश (“वह पाँच प्रतिशत्”) था, जिसे शायद परमेश्वर आपको दिखाना चाहता था? आप उस सीख का उपयोग विनम्रता और बुद्धिमानी में बढ़ने के लिए कैसे कर सकते हैं?
- आप यह कैसे सुनिश्चित कर सकते हैं कि अधार्मिकता से भरी आलोचना पर आपकी प्रतिक्रिया में मसीह का अनुग्रह और सच्चाई झलकती हो? जब आप ऐसी परिस्थितियों का सामना करते हैं, तो अपने मसीही समुदाय में आप किस पर भरोसा करके प्रार्थना और जवाबदेही के लिए सहारा ले सकते हैं?
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भाग V: हमें धार्मिकता से भरी आलोचना करने का प्रयास करना चाहिए
इस जीवन कौशल मार्गदर्शिका में, अब तक हमने आलोचना को स्वीकार करने के बारे में विचार किया है। हालाँकि, कई बार ऐसा भी होगा, जब हमें दूसरों को अपनी राय देने की आवश्यकता पड़ेगी। और जब वे समय आएँ, तो हमें ऐसा धर्मी तरीके से करने का प्रयास करना चाहिए। ऐसी राय देने का हमारा लक्ष्य किसी बहस को जीतना नहीं, बल्कि मसीह में किसी भाई या बहन को मजबूत बनाना है।
अत:, हम धार्मिकता से भरी आलोचना कैसे कर सकते हैं? ऐसी राय देने के पाँच कदम यहाँ दिए गए हैं।
1) प्रार्थना करें
एक बार फिर से, सुधारने या डाँटने-फटकारने से पहले हमें प्रार्थना करनी चाहिए। प्रार्थना के माध्यम से, हम बातचीत के लिए सही समय, लहजा और तरीका समझने के लिए परमेश्वर की बुद्धि माँगते हैं।
प्रार्थना हमारे हृदयों में भी काम कर सकती है, ताकि हमें कठोर बातचीत के लिए तैयार कर सके। प्रार्थना हमारी आत्मा को नरम बनाती है और कठोरता की जगह करुणा और रक्षात्मक होने की जगह धीरज लाने में सहायता करती है। मुझे मालूम है कि जिन लोगों के लिए मैं प्रार्थना करता हूँ, उनके साथ चिड़चिड़ा होना और गुस्सा करना मेरे लिए अधिक कठिन होता है।
प्रार्थना करें कि आप अनुग्रह, विनम्रता और प्रेम से बोलें। और दूसरे व्यक्ति के हृदय के लिए भी प्रार्थना करें। प्रभु से यह माँगने से आरम्भ करें कि वे लोग आपकी सुधार वाली बात को समझदारी और खुलेपन से स्वीकार करें।
2) विशिष्ट बनें
अपनी सारी राय में, हमारा लक्ष्य विशिष्ट होना चाहिए। अस्पष्ट सामान्यीकरण उन लोगों के लिए उतने सहायक नहीं होते, जिन्हें हम सुधार रहे होते हैं, और उनके गलतफहमी में पड़ने की सम्भावना भी अधिक होती है। विशिष्ट राय दूसरों को यह स्पष्ट रूप से समझने में सहायता करती है कि उन्हें क्या बदलने या सुधारने की आवश्यकता है, इसके बजाय कि वे अस्पष्ट टिप्पणियों से भ्रमित या हतोत्साहित महसूस करें।
इसलिए, ऐसा लगे बिना कि आप गलतियों का हिसाब रख रहे हैं (1 कुरिं. 13:5), हमें उस काम के विशिष्ट उदाहरण देने का लक्ष्य रखना चाहिए, जिसमें सुधार की आवश्यकता है। यह हममें से उन लोगों के लिए मुश्किल होता है, जिन्हें दूसरों को नाराज करना पसन्द नहीं होता। परन्तु ऐसे मामले में, यह याद रखना अच्छा होता है कि जब प्रतिक्रिया ठोस और प्रेम पर आधारित हो, तो उससे परमेश्वर का चरित्र झलकता है।
और अन्त में, धार्मिकता से भरी राय में विशिष्टता इस बात को सुनिश्चित करती है कि हमारे शब्द दूसरे व्यक्ति का उत्थान करें (इफि. 4:29) और उन्हें धार्मिकता एवं सच्चाई की ओर ले जाएँ।
3) विनम्र और कोमल बनें
जैसा हमने इस जीवन कौशल मार्गदर्शिका में पहले भी देखा है कि जब हम दूसरों को प्रतिक्रिया दें, तो हमारा लहजा और तरीका मायने रखता है। पवित्रशास्त्र हमें दूसरों को कोमलता और प्रेमपूर्वक सुधारने के लिए कहता है। और इसलिए, पौलुस गलातियों 6:1 में कहता है,
“हे भाइयों, यदि कोई मनुष्य किसी अपराध में पकड़ा भी जाए तो तुम जो आत्मिक हो, नम्रता के साथ ऐसे को सम्भालो, और अपनी भी चौकसी रखो कि तुम भी परीक्षा में न पड़ो।”
कोमलता दर्शाती है कि हम ऐसे शब्द बोलने का प्रयास कर रहे हैं, जो नुकसान पहुँचाने के बजाय चंगा करें, और दूसरों को करुणा एवं दया के साथ सच्चाई की ओर ले जाएँ। ऐसा करते हुए, मसीह के हृदय को दर्शाना ही हमारा लक्ष्य होता है, जो अनुग्रह और सच्चाई से परिपूर्ण था (यूहन्ना 1:14)।
4) आलोचनात्मक भावना के प्रति सचेत रहें
यदि आपको नियमित रूप से राय देनी पड़े, तो हो सकता है कि आप आलोचनात्मक भावना उत्पन्न होने की परीक्षा में पड़ जाएँ, और हमें इस प्रवृत्ति से अपने हृदयों की रक्षा करनी होगी।
हम यह कैसे सुनिश्चित कर सकते हैं कि हम अपने हृदयों को आलोचनात्मक भावना से दूर रखें? वैसे, जब हम किसी मसीही भाई या बहन को कोई राय देने के बारे में सोचते हैं, तो हमें स्वयं से यहाँ दिए हए कुछ प्रश्न पूछने चाहिए:
– क्या मैं इस व्यक्ति को सही रास्ते पर लाने का प्रयास कर रहा हूँ, या मैं बस उसकी बुराई करना चाहता हूँ?
– क्या उन्हें सच्चाई के पास आते हुए देखकर मुझे आनन्द मिलेगा?
– क्या मैं चाहता हूँ कि परमेश्वर का आदर हो, या बस स्वयं को सही साबित करना चाहता हूँ?
इस प्रकार के प्रश्न पूछने से हमें यह समझने में सहायता मिल सकती है कि हम यह काम शुद्ध मंशा से कर रहे हैं या अशुद्ध मंशा से। प्रभु के सामने ईमानदारी से इन प्रश्नों के उत्तर देने से हम अपने हृदयों को आलोचनात्मक भावना विकसित करने से बचा सकते हैं।
5) प्रोत्साहित करें
यदि कोई सुधार सही तरीके से दिया जाना है, तो प्रोत्साहन की संस्कृति और रिश्ते बहुत महत्वपूर्ण होते हैं। एक लेखक ने बड़ी सहायक बात कही है कि
“यदि जानबूझकर, लगातार और ईमानदारी से प्रोत्साहन दिया जाए, तो आलोचना एक दूसरे के हृदयों को चमकाने वाले कपड़े की तरह काम करती है। यदि ऐसा न हो, तो यह आग फेंकने वाले हथियार में बदल जाती है।”
मेरे विचार से यह बात बिलकुल सही है। जब लोगों को यह समझ आ जाए कि आपका लहजा प्रोत्साहन भरा है, तो वे आपके विचारों को सुनने के लिए अधिक तैयार रहते हैं, क्योंकि उन्हें आपकी मंशा पर भरोसा होता है। यह बात तब और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है, जब हम दैनिक जीवन में यह सीख रहे होते हैं कि आलोचना का सामना कैसे करें, और विशेष रूप से जब हम रिश्तों में आलोचना को सम्भाल रहे होते हैं।
इसी उद्देश्य से, हमें नियमित रूप से यह सोचना चाहिए कि हमारे मुँह से कौन से शब्द निकलते हैं, और जो विशेष रूप से उन लोगों के लिए निकलते हैं, जिनके हम बहुत करीबी सम्पर्क में हैं। क्या हमारे मुँह से आलोचना की तुलना में प्रोत्साहन अधिक आसानी से निकलता है? यदि नहीं, तो क्या हमें कुछ बदलाव करने (और क्षमा माँगने) की आवश्यकता है? जब प्रोत्साहन से रिश्तों का भरोसा मजबूत होता है, तो मुश्किल बातचीत भी सुरक्षित महसूस होती है, और रिश्तों में पाई जाने वाली आलोचना कम नुकसान पहुँचाने वाली और अधिक सुधार लाने वाली बन जाती है।
अत:, हमने ऐसे कई तरीके देखे हैं, जिनसे हम धार्मिकता से भरी आलोचना करने में बढ़ सकते हैं। यदि इसे सही तरीके से किया जाए, तो यह एक शानदार माध्यम बन सकता है जिसका उपयोग प्रभु हमें निखारने और हमें अपने प्रभु यीशु की अनुग्रह एवं ज्ञान में आगे बढ़ाने के लिए करता है (2 पत. 3:18)। और इसी भावना में, विनम्रता और अनुग्रह के साथ यह सीखना कि आलोचना का सामना कैसे करें, हमारे सबसे करीबी रिश्तों में मसीह को प्रतिबिम्बित करने का एक भाग बन जाता है।
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चिन्तन के लिए प्रश्न:
- हाल ही की किसी ऐसी घटना के बारे में विचार करें, जब आपको किसी को सुधारने की आवश्यकता महसूस हुई हो। और उस बातचीत से पहले प्रार्थना करना, कैसे आपकी मनोवृत्ति, लहजे, या शब्दों के चुनाव को बदल सकता था?
- ऐसे कौन से व्यावहारिक तरीके हैं, जिनसे आप अपने मौजूदा रिश्तों (परिवार, कलीसिया, कार्यस्थल, सेवकाई) में, जानबूझकर प्रोत्साहन की संस्कृति का निर्माण कर सकते हैं, जिससे कि भविष्य में मिलने वाली राय को रक्षात्मक होने के बजाय भरोसे के साथ स्वीकार किया जाए?
- जब आप किसी को कोई राय दे रहे हों, तो आप यह सुनिश्चित करने के लिए अपने हृदय को कैसे टटोल सकते हैं कि आप आलोचनात्मक भावना विकसित करने के बजाय विनम्र और कोमल बने हुए हैं? ऐसे कौन से विशेष संकेत यह दर्शा सकते हैं कि आपकी मंशा प्रेम के बजाय घमण्ड या दोष लगाने की तरफ झुक रही है?
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लेखक के बारे में
जेमी साउथकॉम्ब इंग्लैंड के गिल्डफ़ोर्ड स्थित ग्रेस चर्च में पास्टर के रूप में सेवा करते हैं। वे अपनी पत्नी ग्रेसी के साथ वहीं रहते हैं और अपने चार बच्चों का पालन-पोषण करते हैं।
विषयसूची
- भाग I: आलोचना की अपेक्षा करें
- हमें आलोचना की अपेक्षा इसलिए करनी चाहिए, क्योंकि दूसरे लोग भी पापी हैं।
- सुसमाचार और आलोचना
- चिन्तन के लिए प्रश्न:
- भाग II: हमें अलग-अलग तरह की आलोचनाओं को समझना चाहिए
- चिन्तन के लिए प्रश्न:
- भाग III: हमें धार्मिकता से भरी आलोचना का स्वागत करना चाहिए और उसे आमंत्रित करना चाहिए
- 1) प्रश्न पूछें
- प्रार्थना करें
- धार्मिकता से भरी राय को आमंत्रित करें
- चिन्तन के लिए प्रश्न:
- भाग IV: हमें अधार्मिकता से भरी आलोचना को परखना चाहिए
- 1) रुकें
- 2) प्रार्थना करें
- 3) पाँच प्रतिशत् पर विचार करें
- 4) अनुग्रह के साथ उत्तर दें
- 5) मसीही समुदाय का सहारा लें
- चिन्तन के लिए प्रश्न:
- भाग V: हमें धार्मिकता से भरी आलोचना करने का प्रयास करना चाहिए
- 1) प्रार्थना करें
- 2) विशिष्ट बनें
- 3) विनम्र और कोमल बनें
- 4) आलोचनात्मक भावना के प्रति सचेत रहें
- 5) प्रोत्साहित करें
- चिन्तन के लिए प्रश्न:
- लेखक के बारे में