#85 जोखिम उठाना: भय के ऊपर विश्वास
परिचय
“पर हम हटनेवाले नहीं, कि नाश हो जाएँ पर विश्वास करनेवाले हैं, कि प्राणों को बचाएँ।” (इब्रानियों 10:39)
मुझे हवा में बहुत ऊँचाई पर तनी हुई रस्सी पर चलने के विचार में बिलकुल भी रुचि नहीं है। वास्तव में, घर के कामों के लिए साधारण सीढ़ी पर चढ़ना भी मेरी सीमाओं की परीक्षा होती है। किसी पहाड़ी की चोटी के किनारे पर पहुँचना तो मेरे लिए लगभग असंभव सी बात है। उसे तो भूल ही जाइए। केवल किसी और को बेहतर दृश्य या उत्तम चित्र लेने के लिए किनारे के पास जाते हुए देखकर ही मेरा हृदय बहुत तेजी से धड़कने लगता है।
ऊँचाई का भय वास्तविक है, और यह हमें स्मरण कराता है कि भय की आत्मा कितनी सरलता से हमारी इन्द्रियों पर प्रभावी हो कर सकती है। इसी कारण जाँ-फ़्राँस्वा ग्रावले के जीवन की घटनाएँ लगभग किसी दूसरे संसार की लगती हैं। उसने मंच पर “चार्ल्स ब्लॉन्डिन” नाम अपनाया था। उसे “महान ब्लॉन्डिन,” “रस्सी पर चलने वाला” निडर व्यक्ति और “मनीला का राजकुमार” जैसे नामों से भी पुकारा जाता था। उन्नीसवीं शताब्दी के आरम्भ में, जब वह फ्रांस में बड़ा हो रहा था, तब एक सर्कस दल उसके क्षेत्र के पास आया। उसी समय से उसकी रुचि ऊँचाई पर तनी रस्सी पर कलाबाजी दिखाने के लिए जाग उठी। ग्रावले उस रस्सी पर चलने वाले कलाकार को देखकर अत्यन्त मोहित हो गया और तुरन्त अपने घर के पिछले आँगन में उसी करतब की नकल करने में लग गया।
उसका सबसे प्रसिद्ध साहसिक कार्य सन् 1859 में हुआ, जब वह नियाग्रा जलप्रपात के ऊपर तनी हुई रस्सी पर चलकर उसे पार करने वाला पहला व्यक्ति बन गया। इसके बाद जलप्रपात के ऊपर उसका प्रत्येक अगला प्रयास को पहले से भी अधिक साहसिक होना पड़ता था। इनमें से कुछ प्रयास ऐसे भी थे, जैसे आँखों पर पट्टी बाँधकर चलना, एक पहिए वाली हाथगाड़ी को धकेलते हुए जाना, अपने प्रबन्धक को पीठ पर उठाकर ले जाना, अपने साथ एक छोटा चूल्हा ले जाकर मार्ग में आमलेट बनाना, कलाबाजियाँ करना, और ऊँचे-ऊँचे डण्डों पर चलकर पार करना था।
ब्लॉन्डिन की नाटकीय शैली सत्तर वर्ष की आयु के बाद भी चलती रही, और वह संसार के अनेक स्थानों पर अपना प्रदर्शन करता रहा। उसने जो जोखिम उठाए, वे केवल खतरनाक ही नहीं थे; वे इतने रोमांचकारी भी हुआ करते थे कि वे किसी भी समय हजारों लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच लेते थे। वह सांसारिक अर्थ में साहसिक जोखिम उठाने वालों का एक उदाहरण था, जो दिखाता है कि शारीरिक संकट के सामने निडर होने के विषय में पवित्रशास्त्र क्या कहता है। फिर भी, उसकी मृत्यु को चुनौती देने वाली कला को देखने के लिए बहुत से लोग तैयार रहते थे, परन्तु उनमें से बहुत कम लोग उसके समान कार्य करने के लिए उसके पदचिह्नों पर चलने को तैयार हुए।
इसके विपरीत, हमारे जीवन में अनेक प्रकार के जोखिम भरे अवसर आते हैं। कुछ अपेक्षाकृत छोटे होते हैं, जबकि कुछ विश्वास के बहुत बड़े कदम होते हैं। जब हम परमेश्वर के लिए अपने आरामदायक क्षेत्र से बाहर कदम रखते हैं, तब हम प्रायः सोचते हैं कि भविष्य में भय होने पर परमेश्वर पर कैसे भरोसा करें। हम यह कैसे पहचानें कि हमारा भय उचित है और आने वाले संकट से दूर रहने की चेतावनी के रूप में परमेश्वर की ओर से दिया गया है? इसके लिए विश्वास और मूर्खता के बीच के अन्तर को समझना तथा जोखिम उठाने से पहले ईश्वरीय सलाह लेना आवश्यक होता है। और हम कैसे जान सकते हैं कि वह हमें भय पर विजय पाने और असंभव को संभव करने के लिए तथा उस पर विश्वास करने के लिए प्रेरित कर रहा है?
प्रभु का धन्यवाद हो कि उसका वचन विश्वास और भय दोनों के विषय में बहुत कुछ कहता है। यदि आप यह जानना चाहते हैं कि भय का सामना कैसे करें, तो आप पाएँगे कि विश्वास के विषय में बाइबल की शिक्षाएँ एक दृढ़ आधार प्रदान करती हैं। यह जीवन-कौशल मार्गदर्शिका इब्रानियों 11 को आधार बनाकर पुराने नियम के पवित्र लोगों के विश्वास से सीखने में हमारी सहायता करेगी। हम उन कार्यों पर ध्यान देंगे जो उन्होंने परमेश्वर की आज्ञाओं का पालन करने और उसके मार्गदर्शन के अनुसार चलने के लिए किए, साथ ही उन संभावित भयों पर भी जो उनके साथ जुड़े हुए हो सकते थे। हम यह भी जानेंगे कि भय के विषय में बाइबल क्या कहती है, और विश्वास से संबंधित बाइबल की विशेष आयतों का अध्ययन करेंगे, जो हमारी इस यात्रा में हमारा मार्गदर्शन करेंगी।
ऐसा करते हुए, मैं प्रार्थना करता हूँ कि प्रभु हमारी सहायता करे, ताकि हम यह समझ सकें कि जिन जोखिमों को उठाने के लिए वह हमें कह रहा है, वे उसकी प्रशंसा और उसकी आने वाली निश्चित प्रतिज्ञाओं की तुलना में बहुत छोटे हैं। हम यह भी सीखेंगे कि भयभीत होना कैसे छोड़ें, इस सत्य को दृढ़ता से थामे रखते हुए कि परमेश्वर ने हमें भय की आत्मा नहीं, परन्तु सामर्थ्य, प्रेम और संयम की आत्मा दी है।
ऑडियो मार्गदर्शिका
ऑडियो#85 जोखिम उठाना: भय के ऊपर विश्वास
भाग I: विश्वास की परिभाषा तथा सराहना
“अब विश्वास आशा की हुई वस्तुओं का निश्चय, और अनदेखी वस्तुओं का प्रमाण है।” (इब्रानियों 11:1)
हममें से कौन ऐसा नहीं चाहेगा कि वह प्रतिदिन पूर्ण निश्चय और दृढ़ विश्वास के साथ चले? हमारे जीवन में ऐसे क्षण आते हैं जब हम हर चुनौती का सामना करने के लिए तैयार होते हैं। कई बार प्रभु ने जो कार्य अपनी महिमा करने के लिए हमारे सामने रखा होता है, उसे करने में हमें पूरा भरोसा होता है। परन्तु फिर जीवन की वास्तविकताएँ सामने आती हैं, और दूसरी बातें हमारे समय और ध्यान के लिए प्रतिस्पर्धा करने लगती हैं। तब हमें समझ में आता है कि विश्वास में जोखिम और भय दोनों सम्मिलित होते हैं, और यह प्रतिदिन हमें प्रभु पर अपनी निर्भरता का स्मरण कराता है।
विश्वास कैसे प्रकट होता है
यदि हम ऊपर दी गई इस प्रसिद्ध आयत को उसके संदर्भ से अलग कर दें, तो यह हमारे भविष्य को स्वयं बनाने वाली सोच जैसा प्रतीत हो सकता है—अर्थात् यह विश्वास कि हम जो कुछ भी ठान लें, वही बन सकते हैं, और ऐसी ही अन्य बातें। ऐसा माना जाता है कि पर्याप्त एकाग्रता, कल्पना और सकारात्मक ऊर्जा के द्वारा हम अपनी इच्छाओं को पूरा कर सकते हैं और उन्हें अपने जीवन की वास्तविकता बना सकते हैं। यह विचार सुनने में बहुत आकर्षक लगता है, विशेषकर तब जब हम किसी ऐसे व्यक्ति से इसके बारे में सुनें जिसने कोई बहुत बड़ा काम किया हो या बड़ी उपलब्धि प्राप्त की हो।
फिर हम यह भी देख सकते हैं कि इस प्रकार की सोच के अनुसार जिया गया जीवन कितने विनाशकारी परिणाम ला सकता है। तब क्या होता है जब कोई व्यक्ति अपने मन में किसी बात की ऐसी कल्पना कर लेता है, जो वास्तव में असंभव होती है? और तब क्या होता है जब किसी व्यक्ति की अपनी इच्छाएँ उसे वैसी संतुष्टि नहीं दे पातीं, जैसी उसने आरम्भ में सोची थी? और परमेश्वर तथा उसके वर्तमान और आने वाले जीवन के लिए उसकी योजनाओं से जुड़े हुए बड़े प्रश्नों का क्या होगा?
धन्यवाद हो कि, इब्रानियों 11:1 हमारे नहीं, वरन् परमेश्वर के दृष्टिकोण से विश्वास को प्रस्तुत करता है। जिन बातों की आशा की जाती है, उनके विषय में यह आश्वासन ऐसा अन्धा विश्वास नहीं है जिसमें ऐतिहासिक प्रमाणों का अभाव हो। वास्तव में, हमारे विश्वास का आधार सृष्टि के आरम्भ से ही परमेश्वर और उसके वचन की विश्वासयोग्यता पर दृढ़ता से टिका हुआ है। इसके अतिरिक्त, यह विश्वास सदियों से परमेश्वर के लोगों में दिखाई देने वाली उसकी विश्वासयोग्यता के द्वारा हम तक पहुँचाया गया है। और अन्ततः यह प्रभु यीशु मसीह के व्यक्तित्व और उसके कार्यों के द्वारा स्पष्ट रूप से प्रकट और प्रमाणित किया गया है।
अतः सच्चा विश्वास क्या है? विश्वास की बाइबल आधारित परिभाषा हाइडलबर्ग धर्म प्रश्नोत्तरी के प्रश्न-उत्तर 21 में बहुत सुन्दर रूप से व्यक्त किया गया है: “सच्चा विश्वास केवल यह निश्चित ज्ञान नहीं है, जिसके द्वारा मैं उन सब बातों को सत्य मानता हूँ जिन्हें परमेश्वर ने पवित्रशास्त्र में हम पर प्रकट किया है; वरन् यह पूरे मन का भरोसा भी है, जिसे पवित्र आत्मा सुसमाचार के द्वारा मुझ में उत्पन्न करता है। इस भरोसे के द्वारा मैं यह मानता हूँ कि परमेश्वर ने केवल दूसरों को ही नहीं, परन्तु मुझे भी पापों की क्षमा, अनन्त धार्मिकता और उद्धार अनुग्रह से प्रदान किया है। ये सब केवल मसीह के गुणों के कारण दिए गए अनुग्रह के दान हैं।”1
बाइबल आधारित विश्वास की समझ उस व्यक्तिगत सहमति से कहीं अधिक बढ़कर है, जिसे हम अपनी सीमित समझ से देख या कल्पना कर सकते हैं। विश्वास में दो बातें सम्मिलित होती हैं, पहली, उस सत्य को दृढ़ता से थामे रखना जिसे “परमेश्वर ने पवित्रशास्त्र में हम पर प्रकट किया है,” और दूसरी, उस कार्य पर “पूरे मन से भरोसा” रखना जो पवित्र आत्मा ने हमारे भीतर उत्पन्न किया है, जो केवल मसीह के द्वारा परमेश्वर के अनुग्रह पर आधारित है। यह विश्वास हमें अपने ऊपर नहीं,परन्तु उसमें विश्वास रखते हुए, उसके वचन के अनुसार जीने के योग्य बनाता है। बाइबल विश्वास के विषय में यही कहती है।
बलिदान के द्वारा विश्वास
हमें स्पष्ट रूप से यह नहीं बताया गया कि हाबिल की भेंट कैन की भेंट से अधिक ग्रहण योग्य क्यों थी। फिर भी, परमेश्वर ने उसकी भेंट को स्वीकार किया, और परमेश्वर पर उसके विश्वास के कारण उसे धर्मी ठहराया गया। इसके विपरीत, कैन बहुत क्रोधित हो गया। तब परमेश्वर ने उससे पूछा कि वह क्यों क्रोधित है, “यदि तू भला करे, तो क्या तेरी भेंट ग्रहण न की जाएगी? और यदि तू भला न करे, तो पाप द्वार पर छिपा रहता है, और उसकी लालसा तेरी ओर होगी, और तुझे उस पर प्रभुता करनी है।” (उत. 4:7)।
बजाय अपनी शर्तों के, विश्वास के द्वारा जीवन जीने के लिए हमें परमेश्वर की शर्तों के अनुसार त्याग करना पड़ता है। क्या आपने कभी प्रभु के लिए किसी बात का त्याग किया है, जिसे आपने एक उचित बलिदान समझा हो, लेकिन जब ऐसा लगा कि उसे परमेश्वर के द्वरा स्वीकार नहीं किया गया, तो आपके भीतर क्रोध उत्पन्न होता है? हम सब किसी न किसी स्तर पर कभी न कभी ऐसा ही अनुभव करते हैं।
जब हम इन भावनाओं से संघर्ष करते हैं, तब अपने मन को सही दिशा में ले जाने के लिए हमें चिन्ता और भय से संबंधित बाइबल की आयतों की आवश्यकता होती है। रॉबर्ट एक ऐसे कलीसियाई वातावरण से आया था जो रीति-रिवाजों और कठोर नियमों से बँधा हुआ था। उसके मन में यह धारणा बैठ गई थी कि दूसरों के अनुसार उचित समझी जाने वाली बातों के आधार पर बहुत सी चीज़ों का त्याग करना ही सच्ची आत्मिकता है। वर्षों तक इस प्रकार जीवन जीने के बाद उसने अपने परिवार को भी उसी मार्ग पर चलाया, और इसके नकारात्मक प्रभाव धीरे-धीरे स्पष्ट होने लगे। पवित्रशास्त्र से बढ़कर किन बातों को स्वीकार किया जाए, इस सोच ने उसके और उसके आसपास के लोगों के विवेक को बुरी तरह जकड लिया था। वह और मैं समय-समय पर चाय पीने के लिए मिलते थे, ताकि इस विषय पर बात कर सकें कि उसका जीवन वैसा क्यों नहीं बन पा रहा है जैसा वह समझता था कि वह इसके योग्य है।
हमने परमेश्वर, उसके परिवार, और कलीसिया के प्रति उसके मन में भरे हुए बहुत से क्रोध और कड़वाहट के विषयों पर गहराई से चर्चा की। जिन बातों से उसने स्वयं को वंचित रखा था, उनका परिणाम यह नहीं हुआ कि प्रभु ने उसे वैसा भरपूर जीवन दिया हो जैसा वह अपेक्षा करता था। परन्तु वह भीतर से निराश और भ्रमित हो चुका था, और उसके लिए प्रभु पर भरोसा करना लगभग असंभव हो गया था। यहाँ तक कि कलीसिया में से किसी ऐसे व्यक्ति पर भी विश्वास करना उसके लिए कठिन हो गया था, जो मसीह के समान जीवन जीने में उसके साथ चलने का प्रयास कर रहा था।
अपने संघर्ष के बीच उसे यह समझने की आवश्यकता थी कि अनुग्रह के स्थान पर नियमों के अधीन नियंत्रित होने के भय पर कैसे विजय पाई जाए। जैसा कि आप शायद पहले ही समझ गए होंगे, कि वह अपने जीवन और परिवार के पतन के लिए बहुत जल्दी दूसरों को दोष देने लगता था। अपने पिछले कार्यों का उत्तरदायित्व स्वीकार करना और यह सोचने के लिए तैयार होना कि आगे विश्वास के द्वारा जीवन जीने में प्रभु उसे किस प्रकार से अगुवाई करना चाहता है, ये बातें उसके लिए मानो असंभव थीं। उसके भीतर इतना अधिक क्रोध भर चुका था कि वह दूसरों के प्रति अपने कठोर हृदय को भी उचित ठहराने लगा था।
अच्छा होता यदि मैं यह कह पाता कि उसने समय रहते मन फिराया लिया होता, ताकि लगातार हो रहे विनाश को रोका जा सकता था। दुर्भाग्यवश, रॉबर्ट के साथ ऐसा नहीं हुआ, और इसकी बहुत भारी कीमत उसे अपने परिवार तथा कई घनिष्ठ मित्रों को खोकर चुकानी पड़ी। अपनी असफलताओं और प्रतिष्ठा के सम्बन्ध में भय की भावना पर विजय पाना उसके लिए ऐसी बाधा सिद्ध हुई, जिसे पार करने के लिए वह अभी भी तैयार नहीं था।
कभी-कभी हम सभी कैन की उस प्रवृत्ति का शिकार हो सकते हैं, जिसमें वह अपने ही तरीकों और शर्तों पर विश्वास के द्वारा जीवन जीने का प्रयास करता है। प्रभु हम में से प्रत्येक की सहायता करे कि हम हाबिल के उदाहरण से सीखें। आइए, हम परमेश्वर को वही अर्पित करने से आरम्भ करें, जिसे उसने हमसे विश्वास के द्वारा त्याग करने के लिए कहा है, न कि उन बातों पर भरोसा रखते हुए जिन्हें हमने या दूसरों ने अपनी ओर से गढ़ लिया है।
परमेश्वर को प्रसन्न करने वाला विश्वास
जब जीवन को इस दृष्टिकोण से देखा जाता है कि हमें परमेश्वर को प्रसन्न करना है, मनुष्य को प्रसन्न करना है, या स्वयं को प्रसन्न करना है—तो इनमें से केवल एक ही विकल्प ऐसा लगता है जो बहुत अधिक दूर की न सोचने वाला और केवल अपने लाभ का नहीं है। फिर भी, किसी भी क्षण इन सबके बीच डगमगाने का प्रलोभन बना रहता है। ऊपर से देखने पर हम सोचते हैं, कि यह कैसे हो सकता है?
उन सभी के लिए जिन्हें यीशु के क्रूस पर किए गए कार्य के द्वारा अपने पापों की क्षमा मिली है, ऐसा प्रतीत होता है कि परमेश्वर को प्रसन्न करना ही हमारी स्वाभाविक प्रवृत्ति होनी चाहिए। फिर भी, हम और दूसरे लोग बार-बार इसके विपरीत मार्ग चुनने की ओर इतना अधिक क्यों झुक जाते हैं?
अधिकतर ऐसा इसलिए होता है क्योंकि हमारे भीतर भय पर विजय पाने वाला वह विश्वास नहीं होता, जो सत्य के लिए अकेले खड़े रहने के लिए आवश्यक होता है। अब इब्रानियों अध्याय 11 में अगला उल्लेखनीय व्यक्ति हनोक है। उसके विषय में हम उत्पत्ति 5:21-24 से बहुत कम जानते हैं। फिर भी, उसके जीवन का सार बताने वाला एक वाक्य दो बार दोहराया गया है — “हनोक परमेश्वर के साथ चलता था।” और ऐसा करने के लिए विश्वास की आवश्यकता होती है, यह भरोसा करना कि परमेश्वर आपकी देखभाल करेगा। इसके लिए यह विश्वास करना पड़ता है कि परमेश्वर आपकी आवश्यकताओं को पूरा करेगा, जबकि आपकी परिस्थितियाँ कुछ और ही कहती हैं। ऐसे समय में, और कई अवसरों पर हम अपनी स्थितियों को स्वयं सँभालने और अपने बल पर अपना बचाव करने के लिए प्रलोभित हो जाते हैं।
इब्रानियों 11:6 इसे स्पष्ट रूप से बताता है। “और विश्वास बिना उसे प्रसन्न करना अनहोना है, क्योंकि परमेश्वर के पास आनेवाले को विश्वास करना चाहिए, कि वह है; और अपने खोजनेवालों को प्रतिफल देता है।” यदि आप भी मेरे ही समान हैं, तो संभव है कि आप इन बातों को अपने मन से तो आसानी से जानते होंगे, फिर भी अपने हृदय में उन पर विश्राम करने में असफल हो जाते होंगे। मैं आपसे पूछना चाहता हूँ कि आप कहाँ उसके साथ चलते रहने और उसके निकट आने से भटक गए हैं? आज वह आपको किस प्रकार अपनी ओर लौटने के लिए बुला रहा है?
यदि आप संघर्ष कर रहे हैं, तो विश्वास से सम्बन्धित बाइबल की आयतों पर मनन करना आपके ध्यान को फिर से सही दिशा में केन्द्रित करने में सहायता कर सकता है। यदि ये प्रश्न कुछ अधिक मानकर चल रहे हों, तो हम यह मानकर नहीं चलना चाहते कि इस आयत का दूसरा भाग आपके जीवन में दृढ़ता से स्थापित है। यदि आपके मन में कोई प्रश्न है या आपके हृदय में कोई संदेह है कि मसीह आपके पापों का मूल्य चुकाने के लिए,लिए मरा, ताकि आपको परमेश्वर के साथ अनन्त शान्ति मिल सके, तो कृपया आज ही किसी को यह बात बताएँ। वह व्यक्ति आपके साथ इसे पढ़ने वाला हो सकता है या कोई दूसरा विश्वासयोग्य मसीही जिसे आप जानते हों। उनके लिए यह कितने आनन्द की बात होगी कि वे आपके जीवन में भी उद्धार के दिन को आते हुए देखें।
आदरपूर्ण के भय के द्वारा विश्वास
हनोक के समान, उत्पत्ति 6:9 कहता है कि नूह “परमेश्वर के साथ चलता था।” परन्तु जिस मार्ग पर वह प्रभु के साथ चला, वह सबसे अलग था। परमेश्वर ने उसे चेतावनी दी कि पाप के कारण संसार जलप्रलय से नष्ट कर दिया जाएगा। तब नूह को परमेश्वर पर विश्वास करने और एक जहाज बनाने के लिए कहा गया, ताकि वह और उसका परिवार जीवित बच सकें।
मुझे पूरा विश्वास है कि कई बार नूह ने स्वयं को अकेला महसूस किया होगा। हम भी कभी-कभी ऐसा सोच सकते हैं कि कार्यस्थल पर, अपने पड़ोस में, या समाज में अपनी भागीदारी के बीच हम ही जंगल में पुकारने वाली अकेली आवाज़ हैं, जो विश्वास के द्वारा जीवन जीने का प्रयास कर रही है। परन्तु विरोधी संसार के बीच धार्मिकता का जीवन जीने का नूह का उदाहरण एक बिल्कुल अलग स्तर का था। उसे यह सीखना पड़ा कि भविष्य के भय के बीच परमेश्वर पर कैसे भरोसा रखा जाए, जबकि उसके चारों ओर का संसार उसकी आज्ञाकारिता का उपहास कर रहा था।
फिर भी, नूह के उदाहरण से हम बहुत कुछ सीख सकते हैं। एक मुख्य बात यह है कि विश्वास के द्वारा चलने के लिए परमेश्वर के प्रति आदरपूर्ण भय आवश्यक है।
यही विश्वास और मूर्खता के बीच का अन्तर है; नूह लापरवाह नहीं था, वरन् वह परमेश्वर की चेतावनी के प्रति आज्ञाकारी था। यह हमें उस उत्कृष्ट तरीके का स्मरण दिलाता है, जिससे सभोपदेशक की पुस्तक समाप्त होती है। जब सुलैमान को यह अनुभव हो जाता है कि बेजोड़ बुद्धि के साथ जीवन जीना कैसा होता है, तो वह संसार की जाँच पड़ताल करके यह देखता है कि केवल काम, सुख और धन-संपत्ति के द्वारा संतुष्ट होने का प्रयास करना कैसा होता है। वह पाता है कि इनमें से प्रत्येक मार्ग अंततः व्यर्थता की ओर ही ले जाता है।
इस प्रकार, सभोपदेशक 12:13-14 के ये प्रसिद्ध वचन इस पुस्तक का समापन करते हैं। “सब कुछ सुना गया; अन्त की बात यह है कि परमेश्वर का भय मान और उसकी आज्ञाओं का पालन कर; क्योंकि मनुष्य का सम्पूर्ण कर्तव्य यही है। क्योंकि परमेश्वर सब कामों और सब गुप्त बातों का, चाहे वे भली हों या बुरी, न्याय करेगा।” भय के विषय में बाइबल यही कहती है—उसका सबसे उत्तम और पवित्र रूप वह आदरपूर्ण भय है, जो जीवन की ओर ले जाता है।
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चिन्तन के लिए प्रश्न:
हाल ही में प्रभु ने आपसे ऐसी कौन-सी बात उसे समर्पित करने के लिए कही है, जिसे देने में आप हिचकिचा रहे थे?
- हाल ही में प्रभु ने आपसे ऐसी कौन-सी बात उसे समर्पित करने के लिए कही है, जिसे देने में आप हिचकिचा रहे थे?
- इस बात का वर्णन कीजिए कि मनुष्यों या स्वयं को प्रसन्न करने के बजाय परमेश्वर को प्रसन्न करने वाला जीवन आपके लिए कैसा रहा है।
- पवित्रशास्त्र के किन उदाहरणों ने प्रभु के प्रति आपके भीतर आदरपूर्ण भय उत्पन्न करने में सहायता की है?
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भाग II: अब्राहम और कुलपिताओं का विश्वास
“पर वे एक उत्तम अर्थात् स्वर्गीय देश के अभिलाषी हैं, इसलिए परमेश्वर उनका परमेश्वर कहलाने में नहीं लजाता,
क्योंकि उसने उनके लिये एक नगर तैयार किया है।” (इब्रानियों 11:16)
इब्रानियों की पुस्तक में पहले भी विश्वास की धारणा इस्राएलियों की आज्ञा न मानने के संदर्भ में प्रस्तुत की गई है। इब्रानियों 4:2 कहता है, “क्योंकि हमें उन्हीं के समान सुसमाचार सुनाया गया है, पर सुने हुए वचन से उन्हें कुछ लाभ न हुआ; क्योंकि सुननेवालों के मन में विश्वास के साथ नहीं बैठा।” उन्होंने सुसमाचार का संदेश तो सुना, परन्तु उसे विश्वास के साथ ग्रहण नहीं किया। धन्यवाद हो कि कुछ अन्य लोगों ने परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं को सुना और उन पर विश्वास किया। यह विश्वास और मूर्खता के बीच के अन्तर को स्पष्ट करता है; विश्वास परमेश्वर के वचन पर आधारित होता है, जबकि मूर्खता उसकी सलाह को अनदेखा करती है।
प्रतिज्ञा का देश
मेरी कलीसिया में कुछ मित्रों का एक छोटा समूह है जिन्हें पहाड़ी पैदल यात्रा करना बहुत पसंद है। हम सामान्यतः पहाड़ों पर उस नए क्षेत्र में जाने की योजना बनाते हैं जहाँ हम पहले कभी नहीं गए होते हैं। फिर हम साथ मिलकर कुछ दिन और रात वहाँ बिताने की योजना बनाते हैं, और उस यात्रा के दृश्यों का आनन्द लेते हैं। हममें से एक व्यक्ति इस समूह की अगुवाई करता है। वह सामान्यतः सबसे आगे रहता है। वही अधिकतर पूरे समूह को संदेश भेजता है, जिससे हमें पता चलता है कि अब हमारी अगली यात्रा की योजना बनाने का समय आ गया है।
यह वह व्यक्ति होता है जिसके पास हर प्रकार का सामान होता है। । पैदल यात्रा के लिए सबसे नया उपकरण होता है, हर यात्रा के लिए पहले से बेहतर किया गया भोजन का चयन, और ऐसे मार्गों के नक्शे जिनमें कई विकल्पों पर विचार किया गया होता है। फिर भी, इतनी अच्छी रीति से बनाई गई योजना और मार्ग में उपलब्ध हर संभव उपग्रह-आधारित सहायता के बावजूद भी कुछ ऐसे क्षण आते हैं जब अनिश्चितता बनी रहती है। ऐसे समय में जब हमें मार्ग पहचानने के लिए बहुत पुराने, परन्तु पर भरोसेमंद मार्गों के निशानों पर ही निर्भर रहना पड़ता है। और तब भी कई बार ऐसी स्थिति बन जाती है जब हमें यह स्वीकार करना पड़ता है कि हम भटक गए हैं। यही वे क्षण होते हैं जब हम अपने मन को शान्त करने के लिए भय के विषय में बाइबल की आयतों को ढूँढते हैं।
अब कल्पना कीजिए कि आप अब्राहम के स्थान पर होते, और परमेश्वर को यह कहते हुए सुनते हैं कि अपना देश, अपने लोग और अपने पिता के घर को छोड़कर एक अज्ञात देश की ओर चले जा (उत. 12:1)। विश्वास के द्वारा अब्राहम ने वह सब कुछ और उन सभी लोगों को छोड़ दिया जिन्हें वह जानता था। वह परमेश्वर के लिए अपने आरामदायक क्षेत्र से बाहर कदम रख रहा था, और इस यात्रा का आधार केवल परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं के अलावा उसके पास और कुछ नहीं था।
उसके कार्य किसी ऐसी वस्तु पर आधारित नहीं थे जिसे वह देख सकता था, या जिस पर वह भरोसा कर सकता था, या जिसे वह पहले से ही जानता था। इसके बजाय, विश्वास के द्वारा वह निकल पड़ा, यह न जानते हुए कि परमेश्वर उसे कहाँ ले जाएगा, लेकिन परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं को पूरा करने पर भरोसा रखते हुए वह निकल पड़ा। अब्राहम बाइबल में उन सबसे बड़े उदाहरणों में से एक है जो साहस के साथ जोखिम उठाने वालों का चित्र प्रस्तुत करता है, और यह दिखाता है कि सृष्टिकर्ता के बुलावे पर बाइबल साहस के विषय में क्या सिखाती है।
हम और आप अधिकतर यह नहीं देख पाते कि परमेश्वर पर विश्वास करने से हमें कहाँ ले जाया जाएगा? अधिकतर हमें परमेश्वर की पिछली प्रतिज्ञाओं को स्मरण दिलाने की आवश्यकता पड़ती है ताकि हम उसके वचन की आज्ञाकारिता के वर्तमान बुलाहट में भरोसा कर सकें? कितनी बार हमें अपनी आँखें उठाकर यह देखने की आवश्यकता होती है कि हमारी सहायता कहाँ से आती है? “मुझे सहायता यहोवा की ओर से मिलती है, जो आकाश और पृथ्वी का कर्ता है।” (भज. 121:2)। वही प्रभु, जिसने अब्राहम को उन जोखिमों के बीच में संभाला जिनके लिए उसे बुलाया गया था, निश्चित रूप से हमें भी उन जोखिमों से पार ले जाएगा जिनके लिए वह हमें बुलाता है, और हमें यह दिखाएगा कि पूरे भरोसे के द्वारा भय पर कैसे विजय पाई जाती है।
प्रतिज्ञा किया हुआ पुत्र
परमेश्वर ने अब्राहम के साथ केवल भूमि की ही प्रतिज्ञा नहीं की थी, परन्तु उसने उसके साथ यह प्रतिज्ञा भी की कि, “इस कारण एक ही जन से जो मरा हुआ सा था, आकाश के तारों और समुद्र तट के रेत के समान, अनगिनत वंश उत्पन्न हुए। ” (इब्र.11:12)। इस विश्वास की यात्रा में अब्राहम स्पष्ट रूप से अकेले नहीं था। उसकी पत्नी सारा भी विश्वास के द्वारा जीवन जीती थी, यद्यपि वह और उसका पति “मृत के समान” थे (इब्र.11:12), जिसका अर्थ है कि वे वृद्ध थे और उनके कोई संतान नहीं थी। इस प्रकार के वर्णन को देखते हुए, हम केवल यह कल्पना कर सकते हैं कि लम्बे समय तक संतान पाने की उनकी अभिलाषा किस प्रकार पूरी नहीं हुई होगी और वे भीतर ही भीतर कैसी प्रतीक्षा और तड़प महसूस करते रहे होंगे।
यदि आप या कोई दम्पत्ति जिसे आप जानते हैं, जो बांझपन से जूझ चुके हैं, तो आप उस निराशा को समझते हैं जो संतान न होने की स्थिति में आ सकती है। ऐसी परीक्षा अधिकतर भविष्य को लेकर भारी भय की भावना भी साथ लाती है। संतान होना इस संसार में जीवन की बड़ी इच्छाओं में से एक है। इसलिए विज्ञान ने इस सपने को पूरा करने के लिए लोगों की सहायता करने के लिए कई तरीके विकसित करने का प्रयास किया है। परन्तु इब्रानियों 11:11 बताता है कि सारा ने केवल परमेश्वर की सामर्थ्य के द्वारा ही गर्भ धारण किया।
यह केवल उन इच्छाओं के विषय में नहीं है जो हम अपने बाद आने वाली पीढ़ियों के लिए रखते हैं, वरन् यह हमें यह भी सिखाता है कि हम इच्छा करने और उसे न पाने की स्थिति से कैसे निपटें। समय-समय पर यह उपयोगी होता है कि हम प्रभु के साथ समय बिताएँ और प्रार्थना के साथ इस बात पर विचार करें कि कब हम सबसे अधिक किस वस्तु की लालसा करते हैं। यह भय और निराशा से निपटने का एक तरीका है—अर्थात् इन गहरी भावनाओं को अनुग्रह के सिंहासन के सामने लाना। मैं आपको प्रोत्साहित करना चाहता हूँ कि आप अभी या इस भाग के अन्त में रुककर प्रभु से यह समझने के लिए सहायता माँगें कि आप इस समय सबसे अधिक क्या चाहते हैं और वह अभी देने से क्यों रोक रहा है।
क्या यह विवाह करने के लिए गहरी लालसा है? या एक धर्मी जन और विश्वास करने वाले जीवनसाथी के लिए अभिलाषा है, जिसके साथ आप मसीह का अनुसरण करते हुए अपना जीवन साझा कर सकें? क्या यह किसी निकटतम परिवार के सदस्य या मित्र के उद्धार के लिए अभिलाषा है? कोई एक ऐसा जिसके लिए आप प्रार्थना कर रहे हैं और जिसे बचाने के लिए आप परमेश्वर से विनती कर रहे हैं? क्या ऐसा करने से परमेश्वर के द्वारा आपके जीवन का गहराई से उपयोग हो रहा है, जिससे उसकी और अधिक महिमा हो? या क्या यह चिन्ता या निराशा के एक विशेष कठिन समय से गुजरना है? एक ऐसा समय जिसने आपको अलग-थलग और अकेला महसूस कराया है? यदि ऐसा है, तो उसकी उपस्थिति में सांत्वना पाने के लिए भय और चिन्ता के विषय में बाइबल की आयतों की ओर देखें।
ये सब अच्छी इच्छाएँ हैं। जब अच्छी इच्छाओं के संदर्भ में परमेश्वर की प्रतीक्षा करने की बात आती है, तो आपको कैसे आगे बढ़ना चाहिए? आपको प्रार्थना करते रहना चाहिए। प्रार्थना करके आप अपने ही मन और दूसरों के सामने यह दिखाते हैं कि परमेश्वर विश्वसयोग्य है और वह वही करता है जो सही होता है, भले ही हम उसके मार्गों को न समझ सकें। यही भय पर विश्वास का विजयी होने का सार है।
प्रतिज्ञा किया हुआ जीवन
यदि यही जीवन सब कुछ होता, तो इब्रानियों 11:13 बाइबल की सबसे निराशाजनक आयतों में से एक होती। इस आयत पर सोचें कि “ये सब विश्वास ही की दशा में मरे; और उन्होंने प्रतिज्ञा की हुई वस्तुएँ नहीं पाईं; पर उन्हें दूर से देखकर आनन्दित हुए और मान लिया, कि हम पृथ्वी पर परदेशी और बाहरी हैं।” यह आयत मन में एक अधूरी सी भावना छोड़ जाती है। परमेश्वर की स्तुति हो, उन्होंने यह समझ लिया था कि वे यहाँ से होकर जा रहे हैं, और यह संसार उनका अन्तिम घर नहीं है। यदि वे केवल इसी संसार के विषय में सोचते रहते, तो वे शायद उस ओर लौट जाते जिसे उन्होंने पीछे छोड़ दिया था।
ओह, यदि आने वाले जीवन की प्रतिज्ञा न होती, तो आप और मैं कहाँ होते? यह बात उस भजन की पंक्ति और उसमें बार-बार दोहराए गए प्रश्न का स्मरण दिलाती है:
ओह, जब पहली तुरही बजेगी, तब मैं कहाँ रहूँगा?
ओह, जब वह अति ऊँची आवाज के साथ बजेगी, तब मैं कहाँ रहूँगा?
जब वह इतनी तीव्रता के साथ बजेगी कि मुर्दे भी उठ उठेंगे?
ओह, जब वह बजेगी, तब मैं कहाँ रहूँगा?”2
परमेश्वर के अनुग्रह से विश्वास के द्वारा जीने के परिणामस्वरूप, वह “उनका परमेश्वर कहलाने से लज्जित नहीं होता” (इब्र. 11:16)। ओह, स्वर्ग की यह प्रतिज्ञा हमारे लिए कितनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, यह हमें हमारी यात्रा में, स्वर्गीय नगर की ओर बढ़ते हुए, संभालती भी है और हमें सामर्थ्य भी देती है।
यह दृष्टिकोण मृत्यु और अज्ञात भय पर विजय पाने में सहायता करता है। यह जानने के बाद, यह पूछना उपयोगी है कि हम कितनी बार स्वयं को अपने उद्धार के इस अन्तिम परिणाम का स्मरण दिलाने देते हैं। मैं स्वयं यह स्वीकार करता हूँ कि मैं अधिकतर इस निश्चित आशा पर पर्याप्त मनन नहीं करता हूँ, और दूसरों को भी ऐसा करने के लिए पर्याप्त रूप से प्रोत्साहित नहीं करता हूँ। यदि हम यह स्मरण रखें कि परमेश्वर ने आने वाले संसार के जीवन में हमसे प्रतिज्ञा की है, तो हमारे विश्वास में हमें कितना अधिक प्रोत्साहन मिल सकता है और हम परमेश्वर के लिए जोखिम उठाने में और अधिक साहसी हो सकते हैं। यही तरीका है कि जब आप भविष्य से डरते हैं, तो आप परमेश्वर पर विश्वास करना सीखते हैं।
यह आपके लिए और उस व्यक्ति के लिए, जिसके साथ आप इसे पढ़ रहे हैं, मिलकर चर्चा करने के लिए एक बहुत अच्छा प्रश्न हो सकता है। इस पर विचार करें कि आप में से प्रत्येक व्यक्ति एक-दूसरे से यह कैसे सीख सकता है कि वह स्वर्ग के विषय में किस प्रकार सोचता है। आप एक-दूसरे के लिए किस प्रकार से सहायता करने वाले बन सकते हैं, ताकि हम आने वाले जीवन की प्रतिज्ञा पर और अधिक गहन और संतोषजनक ढँग से मनन कर सकें?
प्रतिज्ञाओं में परखा जाना
परमेश्वर के साथ चलना और उसकी प्रतिज्ञाओं पर भरोसा करना एक बात है। लेकिन जब मार्ग हमें समझ में न आए, तब भी परमेश्वर के साथ चलना और उसकी आज्ञा का पालन करना एक अलग ही बात है। कौन जानता है कि अब्राहम के मन में क्या-क्या विचार आए होंगे, जब परमेश्वर ने उसकी परीक्षा लेते हुए उससे कहा कि वह अपने इकलौते प्रिय पुत्र इसहाक को बलिदान कर दे।
हम सोचते हैं कि अब्राहम किस प्रकार उस स्तर तक परमेश्वर की आज्ञा का पालन कर सका। हम यह भी सोचते हैं कि जब इसहाक ने होमबलि के लिए मेमने के बारे में पूछा, तब उसके और इसहाक के बीच कैसी बातचीत हुई होगी। हम यह भी विचार करते हैं कि जब अब्राहम ने यह सोचते हुए छुरी उठाई कि उसका विश्वास उसे अपने ही पुत्र को मारने तक ले जा सकता है, उस समय उसके मन में क्या-क्या चल रहा होगा। उस क्षण में, अब्राहम को यह निर्णय लेना पड़ा कि वह उस वस्तु को खोने के भय से कैसे स्वतंत्र हो, जिसे वह सबसे अधिक प्रेम करता था।
और हम यह सोचते हैं कि अब्राहम जैसे विश्वास की संभावना कैसे की जा सकती है, जब हम रोमियों 4:20-22 में पौलुस के द्वारा उसका वर्णन पढ़ते हैं: “और न अविश्वासी होकर परमेश्वर की प्रतिज्ञा पर संदेह किया, पर विश्वास में दृढ़ होकर परमेश्वर की महिमा की, और निश्चय जाना कि जिस बात की उसने प्रतिज्ञा की है, वह उसे पूरा करने में भी सामर्थी है। इस कारण यह उसके लिये धार्मिकता गिना गया।”
अच्छा होता यदि हम परमेश्वर की महिमा करते हुए अपने विश्वास में और अधिक दृढ़ होते, और इस बात पर पूरी रीति से विश्वास करते कि जो प्रतिज्ञा उसने आपसे और मुझ से की है, उसे पूरा करने में वह पूरी रीति से योग्य है। भला होता यदि हम परमेश्वर का भय इतनी गहराई से मानते कि उससे कुछ भी न छिपाते (उत. 22:12)। अच्छा होता यदि हम इस बात पर विश्वास करते कि यदि वह चाहे, तो वह मरे हुए लोगों को भी फिर से जीवित कर सकता है (इब्र. 11:19)। एक मसीही होने के नाते असफलता के भय पर विजयी होने की यही वास्तविक परिभाषा है—अर्थात् यह एहसास होना कि भले ही सब कुछ खोया हुआ सा लगे, फिर भी प्रत्येक वस्तु परमेश्वर के नियंत्रण में है।
मेंरे मित्र, यदि आप इस बात पर भरोसा करने में संघर्ष कर रहे हैं कि परमेश्वर ने मसीह में आपसे जो प्रतिज्ञाएँ की हैं, उन्हें पूरा करने में वह सक्षम है, तो स्मरण रखें कि वह आपसे ठीक उसी परिस्थिति में वहीं मिलता है जहाँ आप अभी हो। हो सकता है कि आपको अब्राहम जैसा कोई असाधारण काम न सौंपा गया हो। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि वह आपसे उस मार्ग पर चलते हुए, जो उसने हमारे लिए तय किया है, अपने विश्वास में और अधिक दृढ़ होने के लिए नहीं बुला रहा है। स्मरण रखें कि परमेश्वर ने हमें भय की आत्मा नहीं, वरन् सामर्थ्य, प्रेम और संयम की आत्मा दी है।
इस समय आपका परमेश्वर पर विश्वास उसकी प्रतिज्ञाओं के संदर्भ में किस प्रकार परखा जा रहा है? प्रभु ने आपके जीवन में ऐसे किस व्यक्ति को रखा है जो आपके लिए प्रार्थना करे और इस परखे जाने के विषय में आपसे बातचीत करे? क्या आप उन कदमों को उठाने से पहले, जिन्हें प्रभु आपके सामने रख रहा है, ईश्वरीय सलाह की खोज कर रहे हैं? परमेश्वर ने अतीत में ऐसा क्या प्रदान किया है जिसने आपके विश्वास को दृढ़ किया है? अब वह आपको आपके विश्वास में बढ़ने के लिए किस दिशा में ले जा रहा है? ये प्रश्न आगे होने वाली बातचीत को फलदायक बनाएँगे।
सौंपी गई प्रतिज्ञाएँ
निश्चय ही, विश्वास की मशाल को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक जाते हुए देखने में कुछ विशेष बात है। अब्राहम के बाद, इसहाक की सराहना इस कारण की गई कि उसने भविष्य के विषय में याकूब और एसाव को आशीष दी। याकूब की सराहना इस कारण की गई कि उसने यूसुफ के पुत्रों को आशीष दी। और यूसुफ की सराहना इस कारण की गई कि उसने परमेश्वर की उस प्रतिज्ञा को फिर से दोहराया कि वह अपने लोगों को छुड़ाकर प्रतिज्ञा के देश में ले जाएगा।
आशा है, यह आपको उन लोगों का स्मरण कराएगा जिनका उपयोग प्रभु ने आप तक विश्वास की मशाल पहुँचाने के लिए किया है। क्या वे प्रभु के प्रति समर्पित दादा-दादी की प्रार्थनाएँ थी? क्या वे मसीह के समान एक आदर्श उदाहरण थे? क्या वे विश्वासयोग्य माता-पिता थे जिन्होंने लगन से, परन्तु आधे-अधूरे तरीके से आपको प्रभु के विषय में सिखाया? या फिर यह दूसरों की आज्ञाकारिता थी, जिन्हें परमेश्वर ने अपने सही समय पर आपके जीवन में भेजा, ताकि वे आपको उसकी ओर ले जा सकें?
उन प्रत्येक लोगों के लिए परमेश्वर की स्तुति करें जिन्हें उसने आपकी सहायता करने के लिए उपयोग किया है, ताकि आप सीख सकें और देख सकें कि मसीह में विश्वास के द्वारा जीवन जीने का क्या अर्थ होता है। उसकी इस बात के लिए भी स्तुति करें कि उसने आपके जीवन में ऐसे लोगों को आने दिया जिन्होंने उसके पीछे चलने में आपकी सहायता की है। और यदि आपके अपने बच्चे हैं, तो उनके लिए भी उसकी स्तुति करें, क्योंकि वे अद्भुत दान हैं, और इस सौभाग्य के लिए भी कि आप उन्हें मसीह में विश्वास की शिक्षा दे सकते हैं और मसीह के विश्वास में आगे बढ़ने में उनकी अगुवाई कर सकते हैं।
यह विरासत चिन्ता और भय के विषय में बाइबल की आयतों को समझने और उन पर चलने के लिए एक सामर्थी उपाय है। जब आप इस समय अपने जीवन के सम्बन्धों पर ध्यान देते हैं, तो परमेश्वर आपको किसकी सहायता करने के लिए प्रेरित कर रहा है, ताकि वह उसके पुत्र में विश्वास करने के द्वारा जीवन जी सके? हो सकता है कि इस समय आपके जीवन में उतने ही लोग हों जितनों की देखभाल आप कर सकते हैं। और आपका ध्यान इस बात पर अधिक हो कि आप उनके लिए बुद्धि माँगने के लिए प्रार्थना करें, ताकि वे विश्वास की मशाल को किसी और तक पहुँचा सकें।
संभव है कि प्रभु आपको उन लोगों के लिए भी प्रार्थना करने के लिए प्रेरित कर रहा हो जिन्हें आप जानते हैं और जिन्हें प्रभु की आवश्यकता है, या जिन्हें उसके पीछे चलने के लिए दूसरों की सहायता की आवश्यकता है, परन्तु वे अभी तक उसके लिए खुले नहीं हैं। जिस किसी भी प्रकार से प्रभु आपको एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक विश्वास को आगे बढ़ते देखने में सहभागी बना रहा है, आप यह जानकर ऐसा करें कि आप इस संसार के सबसे महत्वपूर्ण कार्य में लगे हुए हैं।
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चिन्तन के लिए प्रश्न:
- स्वर्ग में अनन्त जीवन का कौन-सा पहलू आपका ध्यान सबसे अधिक आकर्षित करता है? यह प्रतिज्ञा आपके प्रतिदिन के जीवन में आपको किस प्रकार आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती है?
- क्या आपके जीवन में कभी ऐसा क्षण आया है जब प्रभु ने आपसे मानो “अब्राहम से इसहाक को बलि चढ़ाने के लिए कहने” जैसा कोई कठिन त्याग करने के लिए कहा हो? यदि हाँ, तो वह अनुभव कैसा था, और प्रभु ने आपको उस कठिन घड़ी में कैसे सम्भाला?
- क्या आप इस बात से संतुष्ट हैं कि इस समय प्रभु ने आपको किन लोगों तक विश्वास की मशाल पहुँचाने के लिए कहा है? यदि हाँ, तो परमेश्वर की स्तुति करें! यदि नहीं, तो दूसरों के लिए आपके हृदय में किस प्रकार की हलचल हो रही है?
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भाग III: मूसा और इस्राएल का विश्वास
“और मसीह के कारण निन्दित होने को मिस्र के भण्डार से बड़ा धन समझा क्योंकि उसकी आँखें फल पाने की ओर लगी थीं।” (इब्रानियों 11:26)
ऐसे जोखिम उठाना, जिनमें इस जीवन के प्रतिफलों को आने वाले जीवन के प्रतिफल के बदले छोड़ना पड़े, यह कहना जितना आसान लगता है, पर करना उतना आसान नहीं होता है। प्रतिदिन… बल्कि यूँ कहें, कि हर क्षण, हम इसके विपरीत करने के लिए प्रलोभित होते हैं। इसी में हम समझते हैं कि यीशु ने अपने पीछे चलने से पहले “मूल्य गिन लेने” के लिए क्यों कहा। मूसा के ऐसे विश्वास की सराहना की गई है, क्योंकि वह एक अपूर्ण उदाहरण होते हुए भी यह दिखाता है कि परमेश्वर की बुलाहट का अनुसरण करना और दूसरों को भी ऐसा करने में अगुवाई करना कैसा होता है। यही उस बात का सार है जो बाइबल विश्वास के विषय में कहती है, अर्थात् तात्कालिक बातों से आगे बढ़कर अनन्तकाल की बातों पर दृष्टि लगाए रखना।
बच्चों जैसा विश्वास
इब्रानियों 11:23 में पहली बार हम देखते है कि विश्वास के अनुसार जीने में भय किस प्रकार भूमिका निभाता है। निर्गमन की पुस्तक फिरौन की उस क्रूर आज्ञा से आरम्भ होती है जिसमें उसने सभी इब्रानी बालकों को जन्म के समय मार डालने की आज्ञा दी थी। नए नियम में स्तिफनुस अपने प्रसिद्ध उपदेश में इसी घटना का उल्लेख करता है, जब वह परमेश्वर के लोगों को, उसे और उसके कार्य को अस्वीकार करने के लिए दोषी ठहराता है। प्रेरितों के काम 7:20 कहता है कि मूसा “परमेश्वर की दृष्टि में बहुत ही सुन्दर बालक” था।
इसे परमेश्वर की कृपा का चिन्ह मानकर, मूसा के परिवार ने भय के स्थान पर विश्वास को चुना, लेकिन राजा की आज्ञा का उल्लंघन करने के परिणामस्वरूप उनके साथ क्या हो सकता है, इस भय में जीवन नहीं बिताया। हम केवल कल्पना ही कर सकते हैं कि इसका प्रभाव मूसा के जीवन में किस प्रकार दिखाई दिया, जब उसने राजा के महल में फिरौन की बेटी के द्वारा पाले जाने से मिलने वाले सुख-सुविधाओं और आराम को त्याग दिया। इसके स्थान पर उसने यह चुनाव किया कि “इसलिए कि उसे पाप में थोड़े दिन के सुख भोगने से परमेश्वर के लोगों के साथ दुःख भोगना और भी उत्तम लगा। और मसीह के कारण निन्दित होने को मिस्र के भण्डार से बड़ा धन समझा क्योंकि उसकी आँखें फल पाने की ओर लगी थीं।” (इब्र. 11:25-26)।
हमारे लिए यह कितना बड़ा उदाहरण है, जिससे हम प्रेरणा लें और अपने जीवन में उसका अनुसरण करें। इस संसार के लिए जीने से मिलने वाले थोड़े समय के लाभों के आकर्षण और बहकावे में न आने के लिए परमेश्वर से सहायता माँगना, संसारिक प्रतिष्ठा को खो देने के भय पर विजय पाने को भी सम्मिलित करता है। कई बार इसका अर्थ यह होता है कि जो बात ऊपर से देखने में सबसे अच्छी प्रतीत होती है, उसे तुरन्त स्वीकार न कर लिया जाए; वरन् किसी कदम को उठाने से पहले पर्याप्त समय लेकर प्रार्थना की जाए और प्रभु के प्रति समर्पित लोगों की सलाह ली जाए, ताकि यह समझा जा सके कि वास्तव में सबसे उत्तम क्या है। अधिकतर परमेश्वर का मार्ग हमारी अपेक्षाओं से, या दूसरों की हमारे लिए की गई अपेक्षाओं से भिन्न दिखाई देता है।
इस कारण हमें उन लोगों की ओर से गलत व्यवहार का सामना भी करना पड़ सकता है, जो यह नहीं समझते कि हम उस बात को क्यों छोड़ रहे हैं जो उन्हें इतनी स्पष्ट और उचित दिखाई देती है। कई बार यह छोटे तरीकों से भी हो सकता है, जब वे हमारी समझ और सोचने के तरीके पर प्रश्न उठाते हैं। और कभी-कभी यह अधिक खुलकर सामने आता है, जब कुछ लोग हम पर दोष लगते हुए यह कह देते हैं कि हम बिल्कुल गलत हैं या हम भविष्य में एक उत्तम जीवन पाने के अपने अवसरों को नष्ट कर रहे हैं। ऐसे क्षणों में हमें स्मरण रखना चाहिए कि परमेश्वर ने हमें भय की आत्मा नहीं, वरन् सामर्थ्य, प्रेम और संयम की आत्मा दी है।
यदि आपने कभी यह प्रश्न पूछा है कि मसीह के पीछे चलने के लिए अतीत में लिए गए आपके निर्णय वास्तव में मूल्यवान थे या नहीं, तो उत्साहित हो जाएँ, क्योंकि इसका उत्तर निश्चय ही “हाँ” है! और यदि इस समय आप किसी ऐसे निर्णय को लेकर संघर्ष कर रहे हैं जिसमें आपको उसके पीछे चलना है या किसी ऐसे विकल्प को चुनना है जो शीघ्र लाभ दे सकता है, तो मूसा के उदाहरण पर ध्यान दें, जिसने अंततः हर बात से बढ़कर परमेश्वर पर भरोसा करने में मसीह के उदाहरण का अनुसरण किया।
वयस्क के रूप में विश्वास
पवित्रशास्त्र के जिन अध्यायों को प्रभु ने मेरे जीवन के लिए विशेष रूप से उपयोग किया है, उनमें निर्गमन 3 और 4 भी सम्मिलित हैं। जब मूसा जलती हुई झाड़ी को देखने के लिए मुड़ता है, तब उसके और प्रभु के बीच जो वार्तालाप होता है, वह अत्यंत अनमोल है। यह बात मुझे कभी आश्चर्यचकित होने से नहीं रोकती कि उसने पाँच बार परमेश्वर से “नहीं” कहा, फिर भी परमेश्वर ने अपने अनुग्रह से उसी मूसा को अपने लोगों की अगुवाई करने के लिए उपयोग किया। मैं कल्पना भी नहीं कर सकता कि मैं प्रभु से इतने सीधे तरीके से बात करूँ, फिर भी कई अवसरों पर मैंने अधिक छोटे रूप में उसकी अगुवाई को अस्वीकार किया है, क्योंकि मैं भी एक मसीही होने के नाते असफलता के भय से संघर्ष करता रहा हूँ।
हम सब मूसा के उन प्रश्नों से स्वयं को जुड़ा हुआ देख सकते हैं, जो उसने प्रभु में अपनी पहचान (निर्ग. 3:11), उसके साथ अपनी निकटता (निर्ग. 3:13), दूसरों के सामने अपना भय (निर्ग. 4:1), बोलने में अपनी अयोग्यता (निर्ग. 4:10), और यह कहकर किसी और को भेजने का आग्रह करने में अपनी हीनभावना (निर्ग. 4:13) के संबंध में उठाए प्रश्न थे।
इन अध्यायों पर मनन करने के सबसे स्मरणीय अवसरों में से ज़ाम्बिया की एक अल्पकालिक सुसमाचार-प्रचार यात्रा के दौरान आयोजित रात्रिकालीन प्रार्थना सभा में मिला। हमारे समूह के अधिकाँश लोगों के लिए यह पहली विदेशी सुसमाचार-प्रचार यात्रा थी। जब हमने इस बात पर चर्चा की कि मूसा की कौन-सी हिचकिचाहट प्रत्येक व्यक्ति को सबसे अधिक प्रभावित करती है, तब हमने मिलकर भय पर विजय पाने के विषय में बहुत कुछ सीखा।
विन्स ने बताया कि इस यात्रा में आने को लेकर वह अपने आप को कितना अयोग्य महसूस कर रहा था। उसने स्वीकार किया कि आरम्भ में उसने केवल इसलिए नाम लिखवाया था क्योंकि उसकी पत्नी को गहराई से लगा कि प्रभु उसे इस यात्रा पर जाने के लिए बुला रहा है। इसलिए उसकी योजना यह थी कि परमेश्वर उसे केवल शारीरिक श्रम के कार्यों में उपयोग करे, और बोलने तथा बाकी सभी बातों को वह हम लोगों पर छोड़ दे। वास्तव में, वह अपनी समझी जाने वाली सीमित योग्यताओं के कारण उत्पन्न भय से संघर्ष कर रहा था।
यात्रा के बीच में पहुँचते-पहुँचते लगभग सब कुछ बदल गया था। विन्स हमारे समूह में सबसे लम्बा व्यक्ति था। यह बात और भी स्पष्ट हो गई जब हम एक झोपड़ी से दूसरी झोपड़ी तक जाकर सुसमाचार सुनाते और लोगों को उनके गाँव में आरम्भ होने वाली नई कलीसिया में आने का निमंत्रण देते थे। जिन लोगों से हमारी भेंट होती थी, उनसे वह कम-से-कम एक फुट अधिक लम्बा था।
उस दोपहर देर से, हम सब वापस उस स्थान पर लौट आए जहाँ हमारे ठहरने की व्यवस्था की गई थी। हम में से कुछ लोगों को छोटे-छोटे समूहों में बाँट दिया गया था, और प्रत्येक समूह के साथ एक अनुवादक भी था। विन्स जिसने यह ठान लिया था कि वह बोलेगा नहीं, अब अत्यन्त प्रसन्न था और परमेश्वर ने जो किया था उससे अभिभूत हो गया था। वास्तव में, अपनी निर्बलता में ही वह मसीह में सचमुच सामर्थी सिद्ध हुआ, और यह बात सामने आई कि सुसमाचार के लिए साहसी होने के विषय में बाइबल क्या कहती है।
उसके अनुवादक ने उसे समझाया कि वह अगली झोपड़ी में जाकर प्रभु के विषय में बताए। वहाँ से केवल एक ऐसा व्यक्ति बाहर निकला जिसकी लम्बाई किसी हद तक उसकी ही लम्बाई के बराबर थी। वर्षों तक सुसमाचार को अस्वीकार करने के बाद, वह व्यक्ति इस बात से अत्यन्त प्रभावित हुआ कि परमेश्वर ने उसके समान कद-काठी वाला व्यक्ति उसके पास भेजा। अब वह इस बात को ग्रहण करने के लिए तैयार था कि मसीह ने उसके लिए क्या किया है।
उनकी बातचीत के दौरान, दोनों ने एक-दूसरे के नाम पूछे, और परमेश्वर के द्वारा उनके विश्वास पर दी गई आशीष को देखकर वे लगभग आश्चर्यचकित हो गए थे। तब पता चला कि विन्स, विन्स से ही बात कर रहा था।
अगुवे के रूप में विश्वास
यद्यपि मूसा का विश्वास सिद्ध नहीं था, फिर भी इब्रानियों का लेखक निर्गमन के समय उसका वर्णन इस प्रकार करता है कि वह फ़िरौन के क्रोध से नहीं डरा (इब्र. 11:27)। इस आयत का शेष भाग उसकी सामर्थ्य के स्रोत के विषय में गहरी समझ प्रदान करता है। मूसा “अदृश्य परमेश्वर को देखता हुआ स्थिर बना रहा।” यह कितना अद्भुत चित्र है कि जब हम अपनी दृष्टि मसीह पर लगाए रखते हैं, जो हमारे विश्वास का कर्ता और उसे सिद्ध करने वाला है, तब हमारा दृष्टिकोण बदल जाता है, और भय तथा चिन्ता के समय आत्मा को स्थिर करने वाली बाइबल की आयतें हमें सामर्थ्य देती हैं।
उदाहरण के लिए, एक क्षण रुककर थोड़ा सोचिए कि इस समय कौन सी बात आपको सबसे अधिक चिन्तित कर रही है। अभी आपको सबसे अधिक किस बात का भय है? यदि आप मेरे ही समान हैं, तो उन भयभीत करने वाली बातों पर बार-बार मन लगाते हुए अधिक देर नहीं लगती, और धीरे-धीरे निराशा मन में घर करने लगती है। यहाँ तक कि आप स्वयं को इस खोज में भी लगा हुआ पा सकते हैं कि चिन्ता के विषय में बाइबल की कौन सी आयतें हैं, ताकि किसी प्रकार आपका मन घबराने से बचा रहे।
दूसरी ओर, कुछ समय निकालकर परमेश्वर से प्रार्थना कीजिए कि वह आपकी दृष्टि मसीह पर लगाए रखने में सहायता करे और अपने वचन के द्वारा आपको दिन-प्रतिदिन उसे और अधिक जानने दे। तब धीरे-धीरे हमारी निराशा आनन्द में बदलने लगती है। हमें स्मरण कराया जाता है कि हम अकेले नहीं हैं। हमारी वर्तमान परिस्थितियाँ कैसी भी क्यों न हों, मसीह हमें कभी नहीं छोड़ेगा। भविष्य में हमारे सामने कुछ भी क्यों न आए, मसीह हमें कभी नहीं त्यागेगा। जब आपको भविष्य से डर लग रहा हो, तो परमेश्वर पर भरोसा करने का यही तरीका है।
आइए, जो इस समय आपके सामने है उसके अनुसार इसे और भी अधिक व्यवहारिक रूप में समझें। जीवन के इस समय में प्रभु ने आपको किन लोगों की अगुवाई करने के लिए रखा है? इसमें आपका जीवनसाथी, बच्चे, कलीसिया के लोग, सहकर्मी, अन्य विद्यार्थी, तथा समुदाय के वयस्क या बच्चे सम्मिलित हो सकते हैं।
उनकी अगुवाई करने के लिए जो बुलाहट आपको मिली है, उसके विषय में आपकी सबसे बड़ी चिन्ता क्या है? अतीत में मसीह की आपके प्रति विश्वासयोग्यता ने इस भूमिका में आपको कैसे प्रोत्साहित किया है? परमेश्वर की यह स्मरण दिलाने वाली बात आपको आगे बढ़ते रहने और स्थिर बने रहने में कैसे सहायता करती है? यह कुछ हद तक तोड़ों के दृष्टान्त का भी भाग है, जोखिम उठाना और अच्छी रखवाली करना; अर्थात् भय होने पर भी उस वस्तु का उपयोग करना जो परमेश्वर ने हमें सौंपी है। आप किन तरीकों से इन लोगों के लिए अधिक मंशा के साथ प्रार्थना कर सकते हैं, व्यक्तिगत रूप से भी और उन लोगों के साथ भी जिनके संग आप इस मार्गदर्शिका को पढ़ रहे हैं?
आइए अब इस बात पर विचार करें कि जिसकी अगुवाई करने का उत्तरदायित्व आपको सौंपा गया है, वह क्या है। क्या आप उसे किसी संस्था, समूह, दल, पहल, परियोजना, या अभी तक केवल एक व्यक्तिगत प्रयास के रूप में ही देखते हैं? उसकी अगुवाई करने के सम्बन्ध में कौन सी बात आपको सबसे अधिक रात भर जागते रहने के लिए विवश करती है? भय के कारण आप किस प्रकार की अगुवाई करने की ओर सबसे अधिक झुक जाते हैं?
एक क्षण निकालकर इब्रानियों 12:1–3 को पढ़िए और उस पर मनन कीजिए। इस समय एक अगुवे के रूप में आपके जीवन में प्रभु इस पाठ के माध्यम से क्या प्रभाव डालना चाहता है, इस पर विचार कीजिए।
इस कारण जब कि गवाहों का ऐसा बड़ा बादल हमको घेरे हुए है, तो आओ, हर एक रोकने वाली वस्तु, और उलझाने वाले पाप को दूर करके, वह दौड़ जिसमें हमें दौड़ना है, धीरज से दौड़ें। और विश्वास के कर्ता और सिद्ध करनेवाले यीशु की ओर ताकते रहें; जिस ने उस आनन्द के लिये जो उसके आगे धरा था, लज्जा की कुछ चिन्ता न करके, क्रूस का दुःख सहा; और सिंहासन पर परमेश्वर के दाहिने जा बैठा। इसलिए उस पर ध्यान करो, जिस ने अपने विरोध में पापियों का इतना वाद-विवाद सह लिया कि तुम निराश होकर साहस न छोड़ दो।
दूसरों का विश्वास
यह कितना अद्भुत दृश्य होता है जब लोगों का एक समूह एक साझा उद्देश्य के लिए एकजुट होता है, और एक समान उद्देश्य को पूरा करने के लिए मिलकर काम करता है। इसे देखकर शायद आपको अपनी पसंदीदा खेल समूह की पिछली भव्य जीत या अपनी किसी पसंदीदा फ़िल्म का कोई उत्कृष्ट दृश्य स्मरण आ जाए।
विचार कीजिए कि परमेश्वर के लोगों को लाल सागर पार करने, यरीहो की दीवारों को गिरते हुए देखने, और राहाब द्वारा अपना जीवन जोखिम में डालकर जासूसों का स्वागत करने के लिए क्या-क्या करना पड़ा। ये सब बाइबल के ऐसे आदर्श उदाहरण हैं जहाँ लोगों ने विश्वास में जोखिम उठाया। व्यक्तिगत इच्छाओं को किनारे रखकर परमेश्वर की आज्ञाओं का पालन करते हुए सबको बड़े उद्देश्य के लिए एक साथ चलना पड़ा। अन्य महत्वाकांक्षाओं और योजनाओं को उन जोखिमों के अधीन करना पड़ा जिनके लिए प्रभु उन्हें बुला रहा था।
विश्वास के द्वारा, उन्हें उस जाने-पहचाने जीवन में लौटने के प्रलोभन को नियंत्रण में करना पड़ा। विश्वास के द्वारा, उन्हें उस वैकल्पिक योजना का विरोध करना पड़ा जो कागज़ पर कहीं अधिक सुरक्षित लगती थी और अधिक तर्कसंगत प्रतीत होती थी। यही विश्वास और मूर्खता के बीच का अन्तर है। विश्वास के द्वारा, राहाब को अपने मन में उठने वाले उन सभी झूठी सोच को दूर करना पड़ा जो बार-बार उसके अतीत को सामने लाकर उसे यह सोचने से रोकते थे कि वह प्रभु के द्वारा अन्य विश्वासियों की महत्वपूर्ण रूप से सहायता करने के लिए उपयोग की जा सकती है। उसे यह सीखना पड़ा कि अपने अतीत के भय को कैसे रोकना है।
हम ऐसे प्रलोभनों की संभावना को जानते हैं क्योंकि या तो हमने स्वयं उनसे संघर्ष किया होता है, या हमने देखा है कि उन्होंने हमारे आसपास के अन्य लोगों को नकारात्मक रूप से प्रभावित किया है। आप और मैं, चाहे प्रभु ने हमें इस समय अपनी कलीसिया में कोई भी भूमिका दी हो, इन प्रलोभनों से दूर भागने के बजाय, हम प्रार्थना करें कि परमेश्वर हमें विश्वास के द्वारा अपनी स्थानीय कलीसिया में जीवन जीने में सहायता करे और दूसरों को भी ऐसा करने में हम सहायता करें। हम विश्वासयोग्य होकर उसकी देह के साथ एकता में अपना भाग पूरा करें, ताकि मसीह ने अपनी कलीसिया को जो उद्देश्य दिया है, उसे पूरा किया जा सके। बाइबल भय के विषय में यही बताती है कि भय परमेश्वर की महिमामय बुलाहट के सामने फीका पड़ जाता है।
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चिन्तन के लिए प्रश्न:
- निर्गमन 3 और 4 में मूसा के पाँच प्रश्नों (पहचान, निकटता, भय, अयोग्यता, हीनता) में से आप सबसे अधिक किससे संघर्ष करते हैं, और क्यों?
- क्या आप स्वयं को एक अगुवे के रूप में विश्वास रखने वाला व्यक्ति मानते हैं? यदि हाँ, तो परमेश्वर आपको इसमें बढ़ने के लिए किस प्रकार बुला रहा है? यदि नहीं, तो कौन सी बात आपको रोक रही है?
- आपका विश्वास आपकी कलीसिया में दूसरों के विश्वास के साथ किस प्रकार से जुड़ रहा है? भविष्य में इस जुड़ाव को बढ़ता हुआ देखने के लिए प्रभु आपको कौन से कदम उठाने के लिए प्रेरित कर रहा है?
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भाग IV: विजेताओं और दुःख सहने वालों का विश्वास
“विश्वास ही के द्वारा इन सब के विषय में अच्छी गवाही दी गई, तो भी उन्हें प्रतिज्ञा की हुई वस्तु न मिली। क्योंकि परमेश्वर ने हमारे लिये पहले से एक उत्तम बात ठहराई, कि वे हमारे बिना सिद्धता को न पहुँचे।”
(इब्रानियों 11:39-40)
जब हम इब्रानियों 11 के अन्तिम भाग की ओर बढ़ते हैं, तो यह यूहन्ना 21:25 का स्मरण दिलाता है, जिसमें लिखा है: “और भी बहुत से काम हैं, जो यीशु ने किए; यदि वे एक-एक करके लिखे जाते, तो मैं समझता हूँ, कि पुस्तकें जो लिखी जातीं वे जगत में भी न समातीं।” इसी प्रकार, यदि इब्रानियों का लेखक पुराने नियम के अन्य लोगों के विश्वास के विषय में और विस्तार से लिखता, तो यह विश्वास का अध्याय एक पूरी विश्वास की पुस्तक बन जाती, या संभवतः कई पुस्तकों का रूप ले लेता!
हर्शल हॉब्स इब्रानियों के इस भाग का सार इस प्रकार प्रस्तुत करते हैं: “इस प्रकार लेखक ने विश्वासयोग्य लोगों की अपनी सूची को समाप्त किया। उन्होंने परमेश्वर के द्वारा दिए गए अपने-अपने दायित्वों को विश्वास के द्वारा पूरा किया। उन्होंने परमेश्वर पर विश्वास किया। उन्होंने परमेश्वर पर भरोसा रखा। और उन्होंने स्वयं को परमेश्वर को समर्पित कर दिया। ये सभी बातें ‘विश्वास’ शब्द में समाहित हैं। और स्पष्ट शिक्षा यह है कि इस पत्र के पाठकों को, तब भी और आज भी, इन पवित्र लोगों के उदाहरण का अनुसरण करना चाहिए। वास्तव में, यदि उन्हें अपने-अपने दायित्व के क्षेत्र में परमेश्वर के लिए कुछ करना है, तो उन्हें ऐसा ही करना होगा।”3
उन लोगों का विश्वास जिन्होंने विजय प्राप्त की
आरम्भ में जिन पुरुषों का उल्लेख किया गया है, वे अपने अधिकार और सामर्थ्य की स्थिति के लिए प्रसिद्ध नहीं हैं। उनका उल्लेख उन महान कार्यों के लिए किया गया है जिन्हें उन्होंने विश्वास के द्वारा पूरा किया। जो कार्य स्वयं के बल पर असंभव और अत्यधिक जोखिम भरे प्रतीत होते थे, वे केवल इसलिए संभव हुए क्योंकि उन्होंने विश्वास और भरोसा किया कि परमेश्वर उनके साथ है। अन्य बातों के साथ, आयत 34 कहती है कि वे “निर्बलता में से बलवन्त किए गए।”
उदाहरण के लिए गिदोन को ही लीजिए। उसकी कहानी न्यायियों की पुस्तक अध्याय 6–8 में मिलती है। जब प्रभु का दूत उसके पास आया, तो वह एकांत में काम कर रहा था। न्यायियों 6:11 कहता है, “गिदोन एक दाखरस के कुण्ड में गेहूँ इसलिए झाड़ रहा था कि उसे मिद्यानियों से छिपा रखे।” हम केवल कल्पना कर सकते हैं कि उस समय वह अपने आप को और अपने जीवन का कैसे वर्णन कर रहा होगा। साथ ही, वह परमेश्वर के लोगों को अपने शक्तिशाली शत्रु के सामने किस प्रकार प्रस्तुत कर रहा होगा।
फिर इसके पश्चात् पवित्रशास्त्र में एक अद्भुत आयत आती है जो इस स्थिति को परमेश्वर के दृष्टिकोण से देखती है। “उसको यहोवा के दूत ने दर्शन देकर कहा, “हे शूरवीर सूरमा, यहोवा तेरे संग है” (न्या. 6:12)।
गिदोन का उत्तर हमें बताता है कि वह वस्तुओं को उसी प्रकार से नहीं देख रहा था। वह उत्तर देते हुए प्रश्न करता है कि यदि ऐसा है, तो फिर ऐसा क्यों लग रहा है कि परमेश्वर ने उन्हें छोड़ दिया है? एक बार फिर, जैसा कि हमने पहले मूसा के जीवन में देखा था, परमेश्वर का अनुग्रह फिर से स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। वह गिदोन के प्रश्नों को अनदेखा करते हुए उससे कहता है, “अपनी इसी शक्ति पर जा और तू इस्राएलियों को मिद्यानियों के हाथ से छुड़ाएगा; क्या मैंने तुझे नहीं भेजा?” (न्या. 6:14)।
फिर, मूसा के ही समान वह सच्चाई से बताता है कि वह स्वयं को और अपने परिवार को कैसे देखता है। उसके मन में यह बिल्कुल स्पष्ट है कि परमेश्वर उसे जिस काम के लिए बुला रहा है, वह उसके लिए या उसके आसपास के लोगों के लिए उचित नहीं है। फिर भी, जैसा कि आप कहानी के अधिक स्मरणीय हिस्सों से स्मरण कर सकते हैं, कि परमेश्वर उसे स्पष्ट रूप से इसके विपरीत देखने में सहायता करता है। यही विश्वास की बाइबल आधारित परिभाषा है: अर्थात् अपनी समझी हुई अयोग्यता के बावजूद भी परमेश्वर की सामर्थ्य पर भरोसा रखना।
यदि आप स्वयं के प्रति और उन लोगों के प्रति जिनके साथ आप इस समय विश्वास और भय के विषय पर चर्चा कर रहे हैं, सच्चे हैं, तो आप स्वयं को वर्तमान में किस रूप में देखते हैं? क्या यह अधिक “शूरवीर पुरुष या स्त्री” के समान है? या फिर यह अधिक “दुर्बल और अयोग्य” महसूस करने जैसा है? इसी प्रकार यह दृष्टिकोण मसीह में विश्वास करने के द्वारा आपको जिस काम को करने के लिए बुलाया गया है, उस पर क्या प्रभाव डाल रहा है? अपने साहस को दृढ़ करने के लिए यह बाइबल में विश्वास के विषय में आयतों को खोजने का एक उत्तम समय है।
परमेश्वर से सहायता के लिए प्रार्थना कीजिए कि आप स्वयं को उसकी दृष्टि से देख सकें और उसके लिए अपने कार्य को उसके दृष्टिकोण से समझ सकें। वह आज आपके विचारों और दृष्टिकोण में जो भी परिवर्तन आवश्यक हो, उसे करे, ताकि आप भय पर विजय पाना सीख सकें।
उन लोगों का विश्वास जिन्होंने दुःख सहा
जैसा कि मेरे एक मार्गदर्शक कहा करते थे, कि “मेरा दृढ़ अनुमान” यह है कि अधिकाँश लोग यह पसंद करेंगे कि उनका विश्वास संघर्षों पर विजय पाने के द्वारा परखा जाए और सच्चा सिद्ध हो, बजाय इसके कि वे दुःख के माध्यम से गुजरें। फिर भी, हममें से अधिकाँश लोगों के लिए मार्ग में दुःख भी सम्मिलित होगा। वास्तव में, पवित्रशास्त्र और मसीह के जीवन में दिखाया गया मार्ग अधिकतर दुःख की ओर झुका हुआ है।
यह वह पहला विषय है जिसे यीशु तब भी संबोधित करता है जब पतरस यह अंगीकार करता है कि यीशु ही मसीह है। यह सुसमाचारों के मुख्य मोड़ों में से एक है। जैसे ही पतरस सही अंगीकार करता है, तुरन्त ही यीशु अपने चेलों को बताता है कि उसे “बहुत से दुःख उठाने होंगे और वह तुच्छ समझा जाएगा” (लूका 9:22)। इसी प्रकार, जो उसके साथ हैं, वे भी इसी प्रकार के मार्ग पर चलेंगे। बाइबल विश्वास के विषय में क्या कहती है, इसे समझने का अर्थ इस वास्तविकता को स्वीकार करना भी है।
इस सच्चाई से बचा नहीं जा सकता है कि इस संसार में एक मसीही होने के नाते जीवन कठिन होगा। विश्वासयोग्य होकर दुःख सहने वालों का एक संक्षिप्त सा अवलोकन भी गहन चुनौतियों का चित्र प्रस्तुत करता है। इसमें ऐसे बच्चे भी सम्मिलित हैं जिन्हें मृत्यु से बचाकर अद्भुत रीति से जीवन में लौटाया गया, और ऐसे लोग भी जो यातना, उपहास, कोड़े खाने, कैद, पत्थरवाह, हत्या और कठोर दुर्व्यवहार से गुज़रे हैं। ऐसे उदाहरण हमें यह समझने में सहायता करते हैं कि साधारण मसीही लोग अपने विश्वास के कारण जिन कठिनाइयों से होकर गुजरते हैं, उन्हें सही दृष्टिकोण से कैसे देखा जाए। जब हम ऐसी परीक्षाओं का सामना करते हैं, तब हमें चिन्ता और भय के विषय में बाइबल की आयतों की आवश्यकता होती है जो हमें संभाले रखे रहती हैं।
एक और सहायक बात जो हमें स्मरण कराती है कि परमेश्वर कैसे उन लोगों के विश्वास का उपयोग करता है जिन्होंने भली प्रकार दुःख सहा है, यह इस बात में दिखाई देता है कि हमारे आसपास के विश्वासयोग्य विश्वासी मसीह में क्या-क्या सहते हैं। स्पष्ट रूप से, ऐसे व्यक्ति के निकट होना अपने आप में गहरा प्रभाव डालता है, जिनकी परिस्थितियाँ सांसारिक दृष्टिकोण से उन्हें परमेश्वर की महिमा करने का कोई कारण नहीं देतीं। फिर भी वे मसीह में उनके प्रति परमेश्वर के अनुग्रह के कारण उसकी महिमा करते रहते हैं। जब हम ऐसे लोगों के बीच होते हैं, तो हम यह प्रार्थना किए बिना नहीं रह पाते कि उनके विश्वास का कुछ भाग हम में भी आ जाए। इसी प्रकार हम इस विकृत संसार में भय से निपटना सीखते हैं।
अपने वर्तमान में या हाल ही में जिन कष्टों से आप गुजर रहे हैं, उनके लिए प्रार्थना कीजिए कि परमेश्वर उनका उपयोग करे। “यह जानकर, कि तुम्हारे विश्वास के परखे जाने से धीरज उत्पन्न होता है। पर धीरज को अपना पूरा काम करने दो, कि तुम पूरे और सिद्ध हो जाओ और तुम में किसी बात की घटी न रहे।” (याक. 1:3-4)। यदि आप संघर्ष कर रहे हैं, तो स्मरण रखिए कि परमेश्वर ने हमें भय की नहीं, वरन् सामर्थ्य, प्रेम और संयम की आत्मा दी है।
उन सभी की सराहना
यह मानवीय स्वभाव है कि हम से जो प्रतिज्ञा की गई है, हम उसे अति शीघ्र पाना चाहते हैं। यह विशेष रूप से तब सच होता है जब हमें यह बताया गया हो कि यदि हम विश्वासयोग्य होकर धीरजवन्त बने रहें, तो हमें क्या मिलेगा। फिर भी, यहीं पर परमेश्वर की प्रतिज्ञाएँ हमारे लिए और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाती हैं, जब हम भय पर विजय पाकर उसके पीछे चलने की यात्रा में आगे बढ़ते हैं।
यह भी उन तरीकों में से एक है जिनके द्वारा प्रभु हमें “बड़े भाई वाली मानसिकता” से बचाने में सहायता करता है। उड़ाऊ पुत्र के दृष्टान्त में, वे मसीही लोग जो स्वयं को सामान्यतः विश्वासयोग्य समझते हैं, इस वास्तविकता का सामना करते हैं कि उनके भीतर भी परमेश्वर से उम्मीदें हो सकती हैं। हर विश्वासी के जीवन में ऐसे क्षण आ सकते हैं जब उन्हें परमेश्वर की सहायता की आवश्यकता होती है, ताकि वे इस धारणा को लेकर शिकायत करने से बच सकें कि उनकी आज्ञाकारिता को अनदेखा किया जा रहा है। हम में से किसने ऐसे विचार नहीं किए हैं, जैसे वह बड़ा भाई अपने मुँह से व्यक्त करता है? “देख; मैं इतने वर्ष से तेरी सेवा कर रहा हूँ, और कभी भी तेरी आज्ञा नहीं टाली, फिर भी तूने मुझे कभी एक बकरी का बच्चा भी न दिया, कि मैं अपने मित्रों के साथ आनन्द करता (लूक. 15:29)।”
कभी-कभी, हमें इस बात से क्रोधित हो सकते है कि प्रभु अविश्वासियों के प्रति कितना धीरज रखता है, और इस पृथ्वी पर उन पर उसका सामान्य अनुग्रह कितना अधिक है। कई बार तो ऐसा भी लगता है कि उनका विद्रोह ही उनके लिए और भी अधिक सांसारिक आशीषें लेकर आ रहा है। इस कारण से हम स्वयं ही यह तय करने में उलझ सकते हैं कि इस संसार में हमारे विश्वास की सराहना का सही अर्थ क्या होना चाहिए। यदि हम सावधान न रहें, तो हमारे हृदय और मन उन सभी वस्तुओं के पीछे अनियंत्रित होकर भाग सकते हैं, जिनके बारे में हम गलती से यह मान लेते हैं कि हम उनके योग्य हैं। इसीलिए, कोई भी जोखिम उठाने या कोई निर्णय लेने से पहले ईश्वरीय सलाह लेना बहुत अधिक महत्वपूर्ण है।
यही वह स्थान है जहाँ परमेश्वर के साथ उसके वचन और प्रार्थना में बिताए गए हमारे समय के महत्व को बढ़ा-चढ़ाकर नहीं बताया जा सकता है। हमें निरंतर इस बात का स्मरण दिलाने की आवश्यकता है कि हम कौन हैं, और यदि परमेश्वर का बहुतायत का अनुग्रह न होता, तो वास्तव में हम किस योग्य थे। उसी प्रकार, हमें कितनी बार अपनी दृष्टि इस वर्तमान जीवन में उत्तम परिस्थितियों पर नहीं, वरन् आने वाली बातों के लिए परिश्रम करने की ओर उठानी चाहिए? इस बात पर मनन करने के लिए कि भय और प्रतिफल के विषय में बाइबल क्या कहती है, हमें अनन्त दृष्टिकोण बनाए रखने में सहायता करती है।
जब आप अनजानी परिस्थितियों में भी परमेश्वर पर भरोसा करते हुए आगे बढ़ते चले जाते हैं, तब तोड़ों के दृष्टान्त पर विचार कीजिए: अर्थात् जोखिम उठाना और भण्डारीपन। परमेश्वर ने आपको अपने राज्य के लिए उपयोग करने हेतु विशेष वरदान दिए हैं। क्या आप परमेश्वर के उपयोग के लिए अपने आरामदायक क्षेत्र से बाहर कदम बढ़ा रहे हैं, या फिर भय की आत्मा आपको पीछे धकेल रही है? स्मरण रखिए, एक मसीही होने के नाते असफलता के भय पर विजय पाना इस समझ से आरम्भ होता है कि परिणाम परमेश्वर के हाथों में है।
“इस कारण हम इस राज्य को पा कर जो हिलने का नहीं, उस अनुग्रह को हाथ से न जाने दें, जिसके द्वारा हम भक्ति, और भय सहित, परमेश्वर की ऐसी आराधना कर सकते हैं जिससे वह प्रसन्न होता है” (इब्र.12:28)। बाइबल साहसी होने के विषय में यही कहती है: कि यह ऐसा साहस है जिसकी जड़ परमेश्वर के राज्य के अटल स्वभाव में स्थिर होटी है।
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चिन्तन के लिए प्रश्न:
- परमेश्वर ने आपके जीवन में आपको कौन-कौन सी विजयी प्राप्त करने वाली जय दी हैं? उसने आपकी दुर्बलताओं में आपको किस प्रकार से सामर्थी बनाया है?
- दुःख ने आपके जीवन को सबसे अधिक किस प्रकार से प्रभावित किया है? उस यात्रा के दौरान परमेश्वर ने किन-किन तरीकों से आपको उत्साहित किया है?
- आप किस प्रकार बड़े भाई के समान व्यवहार करने के प्रलोभन में पड़ जाते हैं? ऐसा करने से बचाने के लिए प्रभु ने आपकी सहायता हेतु क्या प्रदान किया है?
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निष्कर्ष
जब विश्वास पर आधारित यह प्रसिद्ध अध्याय समाप्त होता है, तब इब्रानियों का लेखक अगले भाग को आरम्भ करने के लिए “इस कारण” शब्द का उपयोग करता है। प्राचीन पवित्र लोगों के विश्वास से समर्थित उनके भरोसे, आज्ञाकारिता, और जोखिम उठाने के उदाहरण को देखते हुए हमें यह शिक्षा दी जाती है कि हम हर उस बात को दूर कर दें जो हमारे समय में वैसा ही विश्वास प्रकट करने से हमें रोक सकती है। उनके बाद आने वाले प्रत्येक मसीही को उनके पद चिन्हों पर चलने के लिए बुलाया गया है, क्योंकि गवाहों का वह बड़ा बादल उसकी महिमा की स्तुति के लिए निरंतर बढ़ता जा रहा है।
एक क्षण रुककर उन पवित्र लोगों के विषय में सोचिए जिन्हें जानने का आपको सौभाग्य मिला है। उनमें से जो अपनी दौड़ पूरी करके सुरक्षित रूप से अपने स्वर्गीय घर पहुँच चुके हैं, इब्रानियों 11 जैसे विश्वास के द्वारा उनमें से किसने आपके जीवन पर विशेष प्रभाव डाला? प्रभु ने उन्हें जो “ऊँची रस्सी पर चलने जैसे जोखिम भरे विश्वास” को प्रकट करने के लिए बुलाए गए, उसमें ऐसी कौन-सी बात थी जिसने आपको सबसे अधिक प्रभावित किया? आप इन गुणों को अपने लिए और अपने आसपास के अन्य विश्वासियों के लिए प्रार्थना के विषयों में किस प्रकार सम्मिलित कर सकते हैं?
अब विचार कीजिए कि आगे बढ़ते हुए आप विश्वास की इस मशाल को किन लोगों को सौंपना चाहते हैं। जब वे अपने विश्वास को दूसरों और अगली पीढ़ी तक पहुँचाने का प्रयास कर रहे हैं, तब आप उनके लिए और अपनी कलीसिया के अन्य सदस्यों के लिए किस प्रकार लगातार प्रार्थना कर सकते हैं?
भविष्य में आप और आपके आसपास के लोग इस बात में और अधिक दृढ़ हो सकते हैं कि “विश्वास के बिना उसे प्रसन्न करना अनहोना है” (इब्र.11:6)। उन वार्तालापों के विषय में प्रार्थना कीजिए जो आप दूसरों के साथ और उस व्यक्ति के साथ कर सकते हैं जिसके साथ आप यह पढ़ रहे हैं। ऐसी बातचीत, जिसके द्वारा आप इस बात पर चर्चा करें कि प्रभु ने अपने वचन के द्वारा आपके विश्वास को और अधिक दृढ़ किए जाने की आवश्यकता के विषय में क्या प्रकट किया है। और साथ मिलकर इसका परिणाम गवाहों के एक ऐसे निरंतर बढ़ते हुए समूह के रूप में हो, जो एक दिन सिद्ध किए जाएँगे और सदा के लिए एक साथ परमेश्वर की महिमा करने में आनन्दित होंगे।
अन्तिम टिप्पणियाँ
- हाइडलबर्ग धर्म प्रश्नोत्तरी (1563), प्रश्न 21, उत्तर 21, 1 जनवरी, 2026 को देखा गया, https://www.crcna.org/welcome/beliefs/confessions/heidelberg-catechism
- मैं कहाँ रहूँगा?, 2 जनवरी 2026 को प्राप्त किया, https://hymnary.org/text/when_judgment_day_is_drawing_nigh. .
- हर्शल एच. हॉब्स, हीब्रूज़: चैलेंजेस टू बोल्ड डिसाइपलशिप (फिनकैसल, वर्जीनिया: ब्रॉडमैन प्रेस, 1971), पृष्ठ 119।
लेखक के बारे में
टॉड स्मेल्टज़र, लंदन बैपटिस्ट चर्च, लंदन, ओहायो में वरिष्ठ पास्टर के रूप में सेवकाई करते हैं। वे अपनी पत्नी जूली के साथ विवाहित हैं, और उनके तीन बच्चे हैं: एबिगेल, विल, और बेन।
विषयसूची
- भाग I: विश्वास की परिभाषा तथा सराहना
- विश्वास कैसे प्रकट होता है
- बलिदान के द्वारा विश्वास
- परमेश्वर को प्रसन्न करने वाला विश्वास
- आदरपूर्ण के भय के द्वारा विश्वास
- चिन्तन के लिए प्रश्न:
- भाग II: अब्राहम और कुलपिताओं का विश्वास
- प्रतिज्ञा का देश
- प्रतिज्ञा किया हुआ पुत्र
- प्रतिज्ञा किया हुआ जीवन
- प्रतिज्ञाओं में परखा जाना
- सौंपी गई प्रतिज्ञाएँ
- चिन्तन के लिए प्रश्न:
- भाग III: मूसा और इस्राएल का विश्वास
- बच्चों जैसा विश्वास
- वयस्क के रूप में विश्वास
- अगुवे के रूप में विश्वास
- दूसरों का विश्वास
- चिन्तन के लिए प्रश्न:
- भाग IV: विजेताओं और दुःख सहने वालों का विश्वास
- उन लोगों का विश्वास जिन्होंने विजय प्राप्त की
- उन लोगों का विश्वास जिन्होंने दुःख सहा
- उन सभी की सराहना
- चिन्तन के लिए प्रश्न:
- निष्कर्ष
- अन्तिम टिप्पणियाँ
- लेखक के बारे में