#86 सादा जीवन: परमेश्वर के लिए जीवन को अव्यवस्था-मुक्त करना
परिचय: आपका शोर-से-भरा और अव्यवस्थित जीवन
हाल ही में, एक रविवार की दोपहर कलीसिया से लौटने के बाद, मैंने बैठकर टी.वी. चालू किया, और पाया कि मेरे पास एक ही स्क्रीन पर एक साथ फुटबॉल के आठ मुकाबले देखने का विकल्प था। (जैसा जुरासिक पार्क की अराजकता के सिद्धान्तकार ने कहा था: “आपके वैज्ञानिक इस बात में इतने व्यस्त थे कि वे ऐसा कर सकते हैं या नहीं, जिसके चलते उन्होंने रुककर यह सोचा भी नहीं कि उन्हें ऐसा करना चाहिए या नहीं!”)
मैं केवल जिज्ञासावश उसे देखने लगा और तुरन्त ही उस अनुभव से आश्चर्य में भर गया। यद्यपि अचानक मेरे पास बहुत सारी जानकारी उपलब्ध थी, क्योंकि मैं एक ही समय पर चल रहे आठ मुकाबले देख रहा था, परन्तु मुझे जल्दी ही यह एहसास हो गया कि मैं उनमें से किसी एक पर भी ध्यान केन्द्रित नहीं कर पा रहा हूँ। वहाँ इतना कुछ चल रहा था कि मैं पूरी तरह सुन्न हो गया था और किसी एक विशेष मुकाबले पर ध्यान नहीं लगा पा रहा था। इस दृश्य में दो जिज्ञासु छोटे बच्चे भी शामिल थे, जो एक दूसरे से आगे निकलकर प्रश्न पूछ रहे थे, और एक नन्हा बच्चा बैटरी से चलने वाले एक खिलौने से खेल रहा था, जो शायद केवल तेज रोशनी चमकाने और जितना हो सके उतना अधिक शोर मचाने के लिए ही बनाया गया था, और एक कुत्ता बाहर जाने के लिए भौंक रहा था… सचमुच, यह कैसा विश्राम का दिन था!
हमारी संस्कृति बहुत तेज गति वाली और शोर-से-भरी है। हम हमेशा और बड़े, और बेहतर तथा और तेज की ओर भागते हैं। परन्तु क्या यह हमेशा सचमुच बेहतर होता है? मुझे नहीं लगता, और अधिकांश लोग यह जानते हैं। आज के समय में, हम काम की थकावट, निराशा और अकेलेपन में भी उसी अनुपात में बढ़ोतरी देख रहे हैं, और साथ ही, हमारा ध्यान केन्द्रित करने का समय भी घटता चला जा रहा है, हमारी मित्रता भी सतही होती चली जा रही है, और हममें यह भावना भी बढ़ती चली जा रही है कि हम इन सब बातों को एक साथ सम्भाल नहीं सकते।
सादा जीवन हमें इस निरन्तर शोर-शराबे और भटकाव से बचने का एक रास्ता दिखाता है। जब हम थोड़ा पीछे हटकर यह सोचते हैं कि हम उन सचमुच महत्वपूर्ण बातों पर कैसे ध्यान दें, तो हम यह देखने लगते हैं कि सादा जीवन जीने का अर्थ इसके निमित्त कम काम करना नहीं है, परन्तु इसका अर्थ यह पहचानना है कि कौन सी बात अधिक मायने रखती है और फिर उसी पर अपना पूरा ध्यान केन्द्रित करना है।
जीवन की उन सभी बातों के बारे में सोचें, जो आपके समय, प्रयास और ऊर्जा को पाने के लिए होड़ मचा रही हैं। ध्यान दें कि आपका कैलेंडर कितनी तेजी से भर जाता है। और कितनी बार ऐसा होता है कि आप सुबह इस सोच के साथ जागते हैं कि इस दिन में आपको कौन-कौन से काम करने हैं, और फिर भी जब रात को आप सोने जाते हैं, तो आप पाते हैं कि आपने उनमें से केवल कुछ ही काम पूरे किए हैं? हाल ही में, किसी ने मुझसे पूछा कि वे मेरे लिए कैसे प्रार्थना कर सकते हैं, और मेरी पहली प्रतिक्रिया यह उत्तर थी कि “प्रार्थना करें कि एक दिन में 28 घण्टे हों!” हमारी सहज प्रतिक्रियाएँ अक्सर हमारे हृदय की बात बता देती हैं, है न?
हर दिन आप कुछ बातों के लिए “हाँ” और “न” कहेंगे और ये बातें अति महत्वपूर्ण से लेकर कम महत्वपूर्ण तक हो सकती हैं, और अच्छी एवं धर्मी बातों से लेकर शायद पापपूर्ण परीक्षाओं तक भी हो सकती हैं। हमारा जीवन जल्दी ही बहुत सी बातों से भर जाता है। जैसे पानी बहकर जिस भी बर्तन में जाता है, उसी का आकार ले लेता है, वैसे ही हमारा समय, ऊर्जा और प्रयास जल्दी ही कई तरह की माँगों में बँट जाते हैं, और ये सभी हमारा ध्यान खींचने की होड़ में लगे रहते हैं। जैसे तहखाने में रखी वह भूली जा चुकी अलमारी, जिसमें धीरे-धीरे परन्तु निश्चित रूप से हर तरह की वस्तुएँ, बक्से और फालतू का सामान जमा हो जाता है… वैसे ही हमारा जीवन भी मुलाकातों, अभ्यासों, निजी अनुशासनों, दावतों, शौकों और जीवन में अचानक से आने वाली बातों से भर जाता है। हम अपने घरों की साफ-सफाई करते हैं कि उन अच्छी वस्तुओं के लिए जगह बना सकें, जिनकी हमें चाहत और आवश्यकता है। इसी रीति से, सादा जीवन अपनाने से हमें उन बातों के लिए जगह बनाने का अवसर मिलता है, जो सचमुच मायने रखती हैं। सादा जीवन जीना केवल भौतिक बातों को अव्यवस्था-मुक्त करना ही नहीं है, बल्कि यह मानसिक रूप से उन भटकावों को भी दूर करना है, जो हमें सबसे महत्वपूर्ण बातों पर ध्यान केन्द्रित करने से रोकते हैं।
इस मामले में बाइबल हमारे लिए बहुत शिक्षाप्रद है। परमेश्वर का वचन हमें दिखाता है कि अपने लक्ष्य के रूप में यीशु की आज्ञा का सादगी से पालन करना, हमें यह निर्णय लेने में सहायता करता है कि कौन सी बात हमारे समय, हमारी प्रतिभा और हमारे धन के योग्य है। और यह हमें दिखाता है कि परमेश्वर के अनुग्रह के प्रति अपनी प्रतिक्रिया के रूप में हम कैसे कड़ी मेहनत कर सकते हैं, और साथ ही मसीह में मिलने वाले सब्त के अनन्त विश्राम की अपेक्षा करते हुए अपने कामों से विश्राम भी ले सकते हैं।
इस जीवन कौशल मार्गदर्शिका का लक्ष्य आपको कुछ व्यावहारिक सुझाव देना है, जिससे कि आप ऐसे दैनिक प्रश्नों से निपट सकें कि आप किन कामों को करते हुए अपना जीवन बिताएँगे। यह आपको अपनी प्राथमिकताओं को सीमित करने और अपने जीवन को सरल बनाने में सहायता करेगी, जिससे कि आप अपने उद्धारकर्ता की बेहतर सेवा, आराधना और अनुसरण कर सकें। कम से कम साधानों के साथ जीवन जीने का अर्थ केवल भौतिक बातों से छुटकारा पाने से कहीं बढ़कर है; इसका अर्थ उस आत्मिक सादगी पर ध्यान केन्द्रित करना है, जो तब आती है, जब हम परमेश्वर के राज्य को सबसे पहले रखते हैं। एक सादी जीवनशैली अपनाकर, हम परमेश्वर का आदर करनेवाला जीवन जी सकते हैं, जो इस संसार के भटकावों के बजाय, उसकी इच्छा पर केन्द्रित हो।
असल में, सादा जीवन जीने की यह बुलाहट किसी सांस्कृतिक प्रतिक्रिया, या फिर अपनी व्यक्तिगत् प्रसन्नता बढ़ाने के किसी माध्यम के बारे में नहीं है। यह जीवन के बारे में सलाह नहीं है कि आप एक व्यवस्थित जीवन जीकर अपने लक्ष्यों को बेहतर ढंग से हासिल कर सकें। यह तो उद्धारकर्ता के रूप में मसीह के पीछे हो लेने के बारे में है। वह हमें अपने पास बुलाता है और फिर अपनी सेवा में शामिल कर लेता है। वह हमारा पूरा स्नेह और भक्ति चाहता है।
वास्तव में कौन सी बात मायने रखती है? सच में कौन सी बात महत्वपूर्ण है? इन प्रश्नों पर स्पष्टता पाने से हम अपने मन की उलझनों को दूर कर पाते हैं और अपना ध्यान स्वर्गीय वस्तुओं की खोज में लगाते हैं। एक अधिक सादा जीवन जीने का अर्थ अपने ध्यान को परमेश्वर की इच्छा के साथ जोड़ना है, जिससे कि हम एक उद्देश्य, स्पष्टता और शान्ति के साथ जीवन जी सकें। जब आप इन प्रश्नों पर विचार करेंगे और किसी मित्र के साथ मिलकर इस सामग्री पर काम करेंगे, तो यह मार्गदर्शिका आपको अपने जीवन पर ध्यान केन्द्रित करने में सहायता करेगी।
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चिन्तन के लिए प्रश्न:
- इस समय पर आपके जीवन में “शोर मचाने वाली” कौन सी बात है? किस बात में आपका बहुत अधिक समय, प्रयास और मानसिक बोझ लगता है? जब आप रात को सोने जाते हैं, तो आप किस बारे में सोचते हैं?
- इस समय पर आपके जीवन में कौन सी बात “अव्यवस्थित” है? कौन से रिश्ते, जिम्मेदारियाँ या परेशानियाँ आपके रास्ते में रुकावट डालती हैं या जिनकी आपके जीवन में कोई विशेष “जगह” नहीं है?
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ऑडियो मार्गदर्शिका
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भाग I: ध्यान और कड़ी मेहनत का सन्तुलन
यह विषय केवल “कम करो!” या “अधिक करो!” कहने से कहीं अधिक गहरा है। अपने घर से बेकार का सामान हटाना केवल उन बातों से छुटकारा पाना नहीं है, जिनकी अब आपको आवश्यकता नहीं है; बल्कि यह उन अच्छी बातों के लिए जगह बनाना है, जिनकी आपको सचमुच आवश्यकता है। पवित्रशास्त्र में हमें उन लोगों की जो तस्वीर मिलती है, जो अपने जीवन में यीशु का अनुसरण करना चाहते हैं, वह परमेश्वर के राज्य के लिए कड़ी मेहनत करने के साथ ही, अपने लिए मसीह द्वारा पूरे किए गए काम में सन्तुष्ट रहना है। सादगी से जीवन जीने के अनुशासन का अर्थ हमारी इस क्षमता में बढ़ना है कि हम उन बातों को “न” कहें जो हमारे लिए सहायक नहीं हैं, और परमेश्वर की अच्छी बातों को “हाँ” कहें।
सादा जीवन जीना जिम्मेदारियों से पीछे हटने के बारे में नहीं है, बल्कि जो बातें महत्वपूर्ण हैं, उन्हें आसान बनाने और उन बातों पर ध्यान देने के बारे में है, जो सचमुच मायने रखती हैं। यही वह सन्तुलन है, जिसकी हमें विश्वासयोग्यता के साथ मसीह का अनुसरण करने के लिए आवश्यकता है।
सादा जीवन जीने में बढ़ने का प्रयास करते समय, ऐसे दो सहायक अंश हैं, जिन्हें हमें साथ लेकर चलना चाहिए: 1 थिस्स. 4:11 और 1 कुरिं. 15:10। ये दोनों अंश प्रेरित पौलुस ने लिखे थे। और ये दोनों मिलकर हमें एक ऐसा ढाँचा प्रदान करते हैं, जिसका लक्ष्य हमें अपने जीवन में रखना चाहिए।
एक शान्त जीवन जीने की इच्छा रखें
सबसे पहले, 1 थिस्स. 4:1-12 में मसीहियों के तौर पर जीवन जीने के लिए पौलुस के प्रबोधन पर विचार करें। जबकि इस पूरे अंश में हमारे लिए बहुत सारे व्यावहारिक प्रोत्साहन मिलते हैं, फिर भी हमारे उद्देश्यों के लिए, हम विशेष रूप से 11वीं आयत में रुचि रखते हैं: “…और जैसी हम ने तुम्हें आज्ञा दी है, वैसे ही चुपचाप रहने और अपना–अपना काम–काज करने और अपने अपने हाथों से कमाने का प्रयत्न करो…”
कुछ मायनों में, यह वाक्य किसी बीते हुए युग का सा सुनाई पड़ता है। जब समय अधिक सादा था। और फिर भी, ये आज के समय के हर मसीही व्यक्ति के लिए परमेश्वर के वचन से दी गई आज्ञाएँ हैं। आइए, इन तीनों आज्ञाओं पर संक्षेप में विचार करें।
दूसरी बात, हमें एक सादा जीवन जीने की इच्छा रखनी चाहिए। हमारे आज के समय और युग के लिए यह कितना सटीक प्रबोधन है! उन सभी तरीकों पर ध्यान दें, जिनसे हमारा सोशल मीडिया का दौर जीवन की “आवाज” को और बढ़ा देता है। हमें बताया जाता है कि दूसरे लोगों को हमारे जीवन की हर “दशा” के बारे में मालूम होना चाहिए: हम कहाँ गए थे, हम किसके साथ थे, हमने क्या खाया, हमने क्या किया, इत्यादि। स्मार्टफोन के साथ 24 घण्टे चलने वाले समाचार चक्र के इस अपवित्र मेल का अर्थ यह है कि हम इससे हर समय जुड़े रहते हैं और सम्पर्क करने के लिए उपलब्ध रहते हैं। इसने आमने-सामने वाले रिश्ते, और एक दूसरे से सीधे रिश्तों पर एक बोझ डाल दिया है (अगली बार जब आप किसी मित्र के साथ चाय पीने जाएँ, तो मेज पर से अपना फोन हटाकर देखें कि आपकी बातचीत बेहतर होती है कि नहीं।) परन्तु इससे भी आगे, हमें हर त्रासदी, हर काण्ड, हर ताजा समाचार की जानकारी उसी समय मिल जाती है। आपकी जेब में रखे फोन ने आपको संसार की चीखें सुनने की क्षमता दे दी है। आपको एक ही बार में इतनी सारी पीड़ा सहने के लिए नहीं बनाया गया था।
सादा जीवन जीने का अर्थ यह नहीं है कि आप मुसीबतों को देख आँखें बन्द कर लें और स्वयं को संसार से पूरी तरह अलग कर लें। असल में, हमारा लक्ष्य ऐसे जागरुक नागरिक बनना होना चाहिए, जो यह जानने की इच्छा रखते हैं कि उनके आसपास क्या हो रहा है। वैसे भी, इस दु:खियारे संसार में प्रार्थना करने के लिए बहुत कुछ है। परन्तु यदि आप ईमानदार हों, तो आप यह मानेंगे कि आपके दिमाग की अधिकांश उलझनें आपके ऑनलाइन जीवन से लगातार मिलने वाले डोपामाइन अर्थात् लहू के तेज बहाव वाले पदार्थ से आती हैं। हमारे रिश्तों से जुड़ा “कुछ छूट जाने का डर” हमें लगातार ऑनलाइन रहने के लिए उकसाता है, कहीं ऐसा न हो कि हम किसी ऐसे व्यक्ति के बारे में अगली चटपटी गपशप से चूक जाएँ, जिसे हम असल जीवन में शायद जानते हों, या शायद न भी जानते हों।
सादी जीवनशैली को जीने का अर्थ है कि हमारी आँखें अपनी ही चिन्ताओं और मसलों पर टिकी हों। इसका अर्थ है कि हम अपने घर-परिवार को सही और व्यवस्थित ढंग से चलाने की इच्छा रखते हैं। हमें अपने भाई की आँख में पड़े तिनके के बजाय, अपनी आँख में पड़े लट्ठे की अधिक चिन्ता होनी चाहिए (मत्ती 7:3-5)।
अगली आज्ञा आज के समय में हम पर भी उसी तरह लागू होती है: अपने काम से काम रखो। और सच्चाई यह है कि हम संसार की सारी समस्याओं को हल नहीं कर सकते। हम हर आवश्यकता को पूरा नहीं कर सकते। आप संसार के उद्धारकर्ता नहीं हैं। परमेश्वर के अनुग्रह से, हम सच्चे उद्धारकर्ता की आराधना करते हैं। सादा जीवन हमें यह सिखाता है कि हम उन बातों पर ध्यान केन्द्रित करें, जो हमारे नियंत्रण में हैं, और बाकी सब के लिए परमेश्वर पर भरोसा रखें। यदि हम यह पूछें कि एक सादा जीवन कैसे जिया जाए, तो इसका आरम्भ संसार की भारी-भरकम माँगों के बजाय, अपनी प्राथमिकताओं को सही दिशा देकर परमेश्वर की इच्छा पर ध्यान केन्द्रित करने से होता है। इसका अर्थ है कि हम जान-बूझकर उन भटकावों को छोड़ दें, जो हमें परमेश्वर द्वारा सौंपी गई हमारी जिम्मेदारियों से दूर ले जाते हैं।
विश्वासयोग्यता का अर्थ है कि हम हर दिन ऐसे निर्णय लेने का लक्ष्य रखें, जिनसे मसीह का आदर हो, चाहे वे बड़े मामले हों या छोटे मामले हों, और उनके परिणामों के लिए प्रभु पर भरोसा रखें। हम सब के पास कुछ विशेष जिम्मेदारियाँ हैं, जो प्रभु ने हमें सौंपी हैं। एक ऐसा क्षेत्र, जहाँ हम अपने मन में बोझ जमा कर लेते हैं, वह परमेश्वर के द्वारा हमारे सामने रखी गई अच्छी बातों की उपेक्षा करना है, और उनके बजाय गलत या पापपूर्ण बातों के पीछे भागना है। आज यीशु आपसे क्या करवाना चाहेगा? पवित्र आत्मा जैसे आपकी अगुवाई करे, वैसा ही करें, और फिर अगले दिन भी उसी लक्ष्य को अपनाएँ। आप हर समस्या का हल तो नहीं निकाल सकते, परन्तु आप उन बातों में विश्वासयोग्यता दिखाने का लक्ष्य अवश्य रख सकते हैं, जो परमेश्वर ने आपके सामने रखी हैं।
और अन्त में, हमें अपने हाथों से काम करने का निर्देश दिया गया है। जहाँ तक हमारे मानसिक जीवन की बात है, तो इसके लिए तोड़ने या नष्ट करने के बजाय, निर्माण करने की आज्ञा है। परमेश्वर की प्रजा होने के नाते, हम उसका अनुसरण करते हैं और निर्माण करने, रचने और एकजुट करने का प्रयास करते हैं। बाइबल हमारे सांस्कृतिक परिवेश पर बात करती है। एक ऐसे संसार में जिसे तोड़ना-फोड़ना पसन्द है, उस अंधकार का मुकाबला करने का इससे बेहतर तरीका क्या हो सकता है कि हम निर्माण करें। एक सरल विश्वास, सांसारिक सफलता के दबाव से आश्चर्यचकित हुए बिना, हमें अपने हाथ के काम पर ध्यान केन्द्रित करने और उस काम में आनन्द पाने की अनुमति देता है, जो परमेश्वर ने हमें सौंपा है। रिश्तों में विश्वासयोग्य रहें और विवाह में समर्पित रहें। बच्चे उत्पन्न करें, किसी स्थानीय कलीसिया से जुड़ें, कोई व्यवसाय आरम्भ करें, या सुन्दर वस्तुएँ बनाने के लिए काम करें। मसीही लोग परमेश्वर की सृष्टि और रचना की सुन्दरता का आनन्द ले सकते हैं और उसका उत्सव मना सकते हैं। परमेश्वर के राज्य में जीवन ऐसा ही होता है, और यह बाइबल-आधारित सादगी की एक झलक है—और यह सांसारिक भटकावों के बजाय परमेश्वर की प्राथमिकताओं पर ध्यान केन्द्रित करते हुए जीवन जीना है।
कुल मिलाकर, ये आज्ञाएँ हमें मसीह के एक शिष्य के तौर पर, शान्त विश्वासयोग्यता की एक तस्वीर दिखाती हैं। हम इस संसार के सर्वज्ञानी और सर्वशक्तिमान उद्धारकर्ता नहीं हैं… वह तो केवल यीशु है! यद्यपि हम निश्चित रूप से इस संसार के टूटेपन की चिन्ता कर सकते हैं, और हमें अपनी क्षमता के अनुसार सहायता करने का प्रयास करना चाहिए, और अपने आसपास की जो भी परिस्थितियों के बारे में हम देखते या सुनते हैं, उनके लिए प्रार्थना करनी चाहिए। एक सरल मसीही जीवन कैसे जिया जाए, यह एक ऐसा प्रश्न है, जो हमें हर दिन स्वयं से पूछना चाहिए। यह संसार की उस भारी-भरकम जटिलता का समर्पण करने, और मसीह की उन सरल परन्तु गहरी शिक्षाओं पर ध्यान केन्द्रित करने का चुनाव करने के बारे में है। हमें इस बात पर भी भरोसा रखना चाहिए कि सब कुछ परमेश्वर के अधिकार में है। उसने हमारी बड़ी से बड़ी आवश्यकता के बारे में कुछ न कुछ किया हुआ है। यह बात हमें उन कामों में विश्वासयोग्य बने रहने की प्रेरणा देती है, जो प्रभु ने हमारे हाथों में सौंपे हैं, और उनके परिणामों के लिए हम उसी पर भरोसा रखते हैं। वही तो है, जो उन सभी लोगों को, जो परिश्रम करते हैं और बोझ से दबे हुए हैं, विश्राम पाने के लिए अपने पास आने के लिए कहता है।
परमेश्वर के अनुग्रह से, कड़ी मेहनत करें
अब, 1 कुरिन्थियों 15 अध्याय के सन्देश पर विचार करें। इसका संदर्भ यह है कि पौलुस उन लोगों के विरुद्ध, जो उसे बदनाम करने का प्रयास कर रहे थे, अपने काम और अपनी सेवकाई का बचाव करने के लिए लिख रहा था। तीसरी आयत में, पौलुस हमें वह बात याद दिलाता है, जो हमारे विश्वास के लिए सबसे अधिक महत्वपूर्ण है: कि यीशु मसीह मर गया, वह गाड़ा गया, और पवित्रशास्त्र के अनुसार वह फिर से जी उठा। और उसके बाद जी उठा मसीह अपने कई अनुयायियों को दिखाई दिया। वह पौलुस को “सब के बाद” दिखाई दिया, क्योंकि पौलुस मसीह का मूल अनुयायी नहीं था, बल्कि वह “अधूरे दिनों का जन्मा” था। पौलुस कहता है कि वह प्रेरितों में सबसे छोटा है, क्योंकि अपने हृदय परिवर्तन से पहले उसने परमेश्वर की कलीसिया को सताया था। अब 10वीं आयत को देखें। पौलुस के आत्मिक जीवन में जो कमजोरियाँ और कमियाँ दिखती थीं, उनके बावजूद वह अपने जीवन पर परमेश्वर के अनुग्रह को सबसे ऊपर रखता है, जिसने उसे जीवन और सेवकाई में आगे प्रेरित किया: “परन्तु मैं जो कुछ भी हूँ, परमेश्वर के अनुग्रह से हूँ। उसका अनुग्रह जो मुझ पर हुआ, वह व्यर्थ नहीं हुआ; परन्तु मैं ने उन सबसे बढ़कर परिश्रम भी किया: तौभी यह मेरी ओर से नहीं हुआ परन्तु परमेश्वर के अनुग्रह से जो मुझ पर था।”
पौलुस प्रकट रूप से परमेश्वर के मुफ्त अनुग्रह और दया का बहुत बड़ा समर्थक है। और फिर भी, अनुग्रह का यही विचार उसे मसीह और उसके राज्य के निमित्त दूसरे प्रेरितों की तुलना में “कड़ी मेहनत” करने के लिए प्रेरित करता है। ध्यान दें कि काम और उत्पादकता के बारे में यह हमें क्या सिखाता है। सादा जीवन जीने का अर्थ यह नहीं है कि हम किसी झील के किनारे बनी कुटिया में जाकर बैठ जाएँ और अपने प्रभु के दूसरे आगमन की प्रतीक्षा करें। इसके बजाय, अनुग्रह हमें मसीह और उसके राज्य के लिए कड़ी मेहनत करने को प्रेरित करता है। यह हमें अपनी निजी इच्छाओं के बजाय मसीह की आज्ञाओं के अनुसार चलने के लिए अपनी प्राथमिकताओं को सीमित करने और अपने मिशन को सरल बनाने के लिए उकसाता है।
आत्मा की सामर्थ्य से, पौलुस जितनी हो सके, उतनी कड़ी मेहनत कर रहा है, क्योंकि अपने उद्धारकर्ता, यीशु मसीह का नाम और महिमा फैलाना ही उसकी एकमात्र इच्छा है। शायद हमें ऐसा लगे कि हमारे कंधों पर बहुत अधिक जिम्मेदारियाँ हैं, क्योंकि एक तरफ तो हम मसीह के प्रति अपनी भक्ति में, और दूसरी तरफ अपने स्वयं के राज्यों में बँटे हुए हैं। इससे निश्चित रूप से और भी कई चिन्ताएँ उत्पन्न हो जाती हैं। सादा जीवन हमें उस बात पर ध्यान केन्द्रित करने में सहायता करता है, जो सबसे अधिक मायने रखती है,—जो कि मसीह के साथ हमारा रिश्ता है,—ताकि हम सांसारिक भटकावों के अनावश्यक बोझ से स्वयं को स्वतंत्र कर सकें।
इस मामले में पौलुस का उदाहरण बहुत शिक्षाप्रद है। क्योंकि परमेश्वर के अनुग्रह ने उसके जीवन पर इतनी गहरी छाप छोड़ी थी और उसे बदल दिया था, इसलिए वह उस जीवन का निडरता से सामना करने में सक्षम हुआ, जो परमेश्वर ने उसके लिए ठहराया था। चाहे कुछ भी हो जाए, उसे ऐसी स्वतंत्रता, शान्ति और आत्मविश्वास इसलिए प्राप्त था, क्योंकि वह मसीह में सुरक्षित था। सादा जीवन हमें उसी शान्ति को अपनाने में, और इस बात पर भरोसा रखते हुए कि परमेश्वर हर चुनौती में हमारा मार्गदर्शन करेगा, हमें अस्थायी बातों के बजाय अनन्त बातों पर ध्यान केन्द्रित करने में सक्षम बनाता है।
कुछ पल रुककर सोचें कि आपका जीवन कैसा होता, यदि आप यह विश्वास करते कि परमेश्वर ने आपसे जो भी वादे किए हैं, वे सच हैं। यदि आप मसीह में हमेशा के लिए सुरक्षित और संरक्षित होते, तो इससे आपको आने वाली चुनौतियों का सामना करने का कितना साहस मिलता? यदि आप यह विश्वास करते कि जिस पल आप इस पृथ्वी पर अन्तिम बार अपनी आँखें बन्द करेंगे, उसी पल आप नये स्वर्ग और नयी पृथ्वी में जागेंगे, तो इसका आपके मूल्यों पर, आपके निर्णयों पर, और आपके रिश्तों पर क्या प्रभाव पड़ता?
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चिन्तन के लिए प्रश्न:
- क्या आप आलसी स्वभाव के हैं या फिर हर काम में सबसे आगे रहने वाले हैं? यदि कोई व्यक्ति इन दोनों में से किसी भी दशा से जूझ रहा हो, तो परमेश्वर का वचन उसे क्या कहेगा?
- मसीही होने के नाते, 1 थिस्सलुनीकियों 4:11 और 1 कुरिन्थियों 15:10 का संयोजन हमें एक केन्द्रित और सादा जीवन जीने के महत्व को समझने में कैसे सहायता करता है? परमेश्वर का सत्य आपको आपके जीवन में अपने ध्यान को “सीमित” करने की ओर कैसे ले जाता है?
- इस विषय पर हमारी सोच को जानकारी देने के लिए पवित्रशास्त्र के अन्य कौन से अंश और वादे आपके मन में आते हैं?
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भाग II: सादगी की जड़
इस पड़ाव पर, हमें रुककर अपने जीवन का आंकलन करना चाहिए। ऐसी कौन सी बातें हैं, जो आपके समय, प्रयास और मानसिक ऊर्जा के लिए होड़ मचा रही हैं? यदि आप अपनी हर माँग या उन सभी बातों के लिए “हाँ” कह देते हैं, जिन्हें आप स्वयं करना चाहते हैं, तो इसके लिए आपको दिन में कितना अतिरिक्त समय चाहिए होगा?
इसके अलावा, आप अपना अधिकांश समय किस बारे में सोचने में बिताते हैं? जब आपका मन भटकता है, तो वह किस बात पर केन्द्रित होता है? ये बातें भी इसी समीकरण का हिस्सा हैं। कई बार ऐसा होता है, जब छोटी-छोटी समस्याएँ या चिन्ताएँ हमारी मानसिक क्षमता का अनुपातहीन रूप से एक बहुत बड़ा हिस्सा घेर लेती हैं। इससे उन दूसरी चिन्ताओं पर भी दबाव पड़ता है, जिन्हें हम पहले से ही ढो रहे होते हैं।
हम इसका अनुभव ऐसे समय और संस्कृति में करते हैं, जो बार-बार हमसे कहती है कि हमें और अधिक करने की, और बेहतर बनने की, और अधिक उत्पादन करने की आवश्यकता है। हमारा मूल्यांकन और आंकलन इस आधार पर किया जाता है कि हम क्या कर सकते हैं और कितना हासिल कर सकते हैं। सादा जीवन हमें एक अलग दृष्टिकोण प्रदान करता है: यह हमें महत्वपूर्ण बातों पर ध्यान केन्द्रित करके अपने मन की उलझनों को दूर करने में सहायता करता है, तथा हमें लगातार और अधिक करने एवं और बेहतर बनने के दबाव से स्वतंत्र करता है।
बाजार-संचालित हमारी संस्कृति का सुसमाचार-आधारित तोड़ यह सत्य है कि हम केवल यीशु मसीह के पूरे किए गए कार्य के द्वारा ही प्रेम किए गए हैं, क्षमा किए गए हैं, स्वीकार किए गए हैं और उद्धार पाए हुए हैं। जब यीशु ने “पूरा हुआ” कहा, तो उसका यही अर्थ था! विचार करें कि यह अद्भुत सत्य आपके जीवन के लिए क्या मायने रखता है (और न केवल आपके अनन्त भविष्य के लिए, बल्कि आपके अभी के वर्तमान जीवन के लिए भी)। मसीह से अलग होकर, हम जीवन में लक्ष्यहीन होते हैं। यदि आप अपने भविष्य के बारे में सुरक्षित महसूस नहीं करते, और वर्तमान की तो बात ही छोड़ दें, तो मन में ढेर सारी “व्यर्थ की बातें” जमा कर लेना बहुत आसान होता है। उस पिता की तरह, जो अपने गैरेज को इस अपेक्षा में अलग-अलग सामानों से भर कर रखता है कि शायद किसी दिन उसे लकड़ी के उस बढ़िया टुकड़े की आवश्यकता पड़ जाए… और यदि आप मसीह में सुरक्षित नहीं हैं, तो आप अपनी क्षमता से कहीं अधिक बातों को थामे रखने का प्रयास करेंगे। सादा जीवन हमें सिखाता है कि हम अतिरिक्त बातों को छोड़कर, उन बातों में शान्ति पा सकते हैं, जो सच में मायने रखती हैं। यीशु के अलावा, हम इस जीवन में किसी पर भरोसा नहीं कर सकते।
तो फिर, एक सादा जीवन क्या है? यह सब कुछ हटा देने के बारे में नहीं है, बल्कि उन बातों पर ध्यान केन्द्रित करने के बारे में है, जो हमें परमेश्वर के निकट लाती हैं। सादा जीवन अपनाकर, हम स्वयं को सुसमाचार के हृदय से जोड़ते हैं: जिसका अर्थ स्वयं को अनावश्यक भटकावों से मुक्त करना और मसीह के अनन्त वादों पर ध्यान केन्द्रित करना है।
उस समस्याग्रस्त परिस्थिति की तुलना उस चट्टान जैसे मजबूत भरोसे से करें, जो एक मसीही अपने दैनिक जीवन में रख सकता है। क्योंकि हमारा भविष्य मसीह में सुरक्षित है, और अब हम परमेश्वर के सम्मुख अपनी स्वीकृति पाने या उसने हमें जो दिया है, उसका बदला चुकाने का प्रयास नहीं करते, इसलिए हम जीवन में मायने रखने वाली बातों पर ध्यान केन्द्रित कर सकते हैं। निश्चित रूप से यह कहना इसे करने से आसान है। परन्तु जब हम परमेश्वर के लिए सादा जीवन जीने के बारे में सोचते हैं, तो इसका अर्थ है कि हमने अपने जीवन की उन कम-महत्व वाली, अधिक ऊर्जा खर्च करने वाली बातों को बाहर निकाल दिया है, और इसके बजाय हम उन अनन्त, आत्मिक बातों में और भी अधिकाई से निवेश कर सकते हैं, जो परमेश्वर ने हमारे लिए रखी हैं।
सन्तुष्टि
परमेश्वर अपने लोगों को जो वरदान देता है, उनमें से एक हम जो उसके सामने हैं, उस पर स्थिर भरोसा रखना है। संस्कृति और परिस्थितियों की हवाओं से हर दिशा में बह जाने के बजाय, जो यीशु ने हमारे लिए किया है, उस पर हम सुदृढ़ भरोसा रख सकते हैं। मसीह में सन्तुष्ट होने का हमारा यही अर्थ है। सादा जीवन उस स्थिर भरोसे को पाने की एक कुंजी है, क्योंकि यह हमें उन अनन्त सच्चाइयों पर ध्यान केन्द्रित करने में सहायता करता है, जो हमारे जीवन में शान्ति और स्पष्टता लाती हैं।
उन सभी तरीकों पर विचार करें, जिनसे आप अपने जीवन में असन्तुष्ट रहे हैं: जैसे कि काम, परिवार या रिश्तों से जुड़ी निराशाएँ। “अधेड़ आयु के संकट” का सार यह है कि लोगों को अपने जीवन में एक ऐसे पड़ाव पर पहुँचकर यह एहसास होता है कि उनका जीवन वैसा नहीं बीता, जैसा उन्होंने सोचा था। जब हमारी आशाएँ इस संसार की नश्वर बातों पर टिकी होती हैं, तो निराश होना आसान हो जाता है, क्योंकि वे लोग और बातें अक्सर हमें निराश और हताश कर देती हैं।
मसीह पर भरोसा रखना, हमें इस संसार की अंधी दौड़ से बाहर निकालता है। यीशु से पहले, हम सभी को अपने आसपास के लोगों से स्वीकृति, सुरक्षा, प्रेम, इत्यादि जैसी कुछ विशेष बातों की आवश्यकता होती है। मसीह में, हमें वे सभी बातें मिल जाती हैं, जिनकी हमारी आत्माएँ प्यासी होती हैं। और बदले में, यह हमारे जीवन में एक बड़ी स्वतंत्रता लाता है। हो सकता है कि पहले आप रिश्तों को इस अवचेतन आवश्यकता के साथ देखते रहे हों कि आपको स्वीकार किया जाए। एक बार जब आप मसीह को स्वीकार कर लेते हैं, तो आप मित्रता को कहीं अधिक स्वतंत्रता के जैसे देखने लगेंगे। अपने जीवनसाथी से प्रेम और सुरक्षा की अपेक्षा करने के बजाय, आप यह अपने उद्धारकर्ता, यीशु में पा सकते हैं। और फिर, आपका जीवनसाथी आपको जो भी प्रेम और सुरक्षा दे सकता है, वह उस सब के ऊपर एक आशीष की तरह होता है, जो आपको पहले से ही यीशु में मिला हुआ है। सादा जीवन जीने से हमें दूसरों से अपनी पहचान और स्वीकृति पाने के अनावश्यक दबावों को छोड़ने में सहायता मिलती है, जिससे हम मसीह के प्रेम की स्वतंत्रता में जीवन बिता पाते हैं।
इस वास्तविकता के लिए एक और शब्द सन्तोष है। इसका अर्थ है कि हम सुख-शान्ति में हैं। हम एक साथ हैं। हम स्थिर हैं। यह एक अद्भुत वरदान है, जो मसीह अपने लोगों को देता है।
एक बाइबल लें और कुछ समय निकालकर यशायाह 7 अध्याय को पढ़ें और उस पर विचार करें। इस्राएल युद्ध में था, और उसके शत्रुओं ने उसके विरुद्ध हाथ मिला लिए थे। दूसरी आयत में, हम पढ़ते हैं कि, “तब उसका और प्रजा का भी मन ऐसा काँप उठा जैसे वन के वृक्ष वायु चलने से काँप जाते हैं।” यह डर था। यह भ्रम था। यह एक अनजान भविष्य की चिन्ता थी। परमेश्वर अपने लोगों को फिर से आश्वासन देने और यह याद दिलाने के लिए बात करता है कि यह मायने नहीं रखता कि युद्ध में दूसरी तरफ से कौन लड़ रहा है। जिस बात से फर्क पड़ता है, वह यह है कि हमने परमेश्वर पर भरोसा रखा है या नहीं। परमेश्वर ही है, जो फर्क उत्पन्न करता है। 9वीं आयत में परमेश्वर की वाणी के अन्त में, वह अपने लोगों को याद दिलाता है, “यदि तुम लोग इस बात की प्रतीति न करो; तो निश्चय तुम स्थिर न रहोगे।”
इस विरोधाभास पर विचार करें। जब हम परमेश्वर में सन्तुष्ट नहीं होते, तो हमारी आत्माएँ हवा में पेड़ों की तरह काँपती हैं, और बदलाव की तेज हवाओं से इधर-उधर उछाली जाती हैं। परन्तु जो मसीह में है, वह उसमें दृढ़ रह सकता है। सादा जीवन हमें उस दृढ़ नींव पर विश्राम करने के लिए प्रोत्साहित करता है, जो इस संसार के द्वारा हम पर थोपी गई अराजकता और भ्रम से मुक्त है।
प्यूरिटन समुदाय के जेरेमिया बरोज़ ने इस विषय पर एक उत्कृष्ट ग्रंथ लिखा, जिसका शीर्षक “ईसाई सन्तोष का दुर्लभ रत्न” (The Rare Jewel of Christian Contentment) है। वह लिखते हैं कि “मसीही सन्तुष्टि आत्मा का वह मधुर, आन्तरिक, शान्त और अनुग्रहकारी ढाँचा है, जो हर परिस्थिति में परमेश्वर के बुद्धिमान और पिता-तुल्य स्वभाव के प्रति स्वतंत्रता के साथ समर्पित होता है और उसमें आनन्द पाता है।” मसीह पर विश्वास करने के द्वारा, एक मसीही दृढ़ खड़ा रह सकता है, चाहे कुछ भी हो जाए, क्योंकि हमारे प्रभु यीशु मसीह में और उसके द्वारा हमें एक स्थिर सन्तोष और सन्तुष्टि मिलती है।
यदि हमारा मन कुछ हद तक इसलिए अव्यवस्थित रहता है, क्योंकि हम अपने जीवन से आमतौर पर असन्तुष्ट हैं, तो यह कितनी अद्भुत बात है कि हम यीशु के कारण दृढ़ रह सकते हैं। अपनी बुद्धि और दया में, प्रभु देता भी है और ले भी लेता है, और जो लोग मसीह में हैं, उनके लिए हम भरोसा कर सकते हैं कि हमारी वर्तमान परिस्थितियों के बावजूद, हमारे प्रति परमेश्वर का पिता-तुल्य स्वभाव बदला नहीं है।
यहीं पर “मसीही न्यूनतमवाद” अर्थात् कम से कम साधनों पर जीने वाला जीवन वास्तव में अपनी चमक दिखाता है। जीवन को सरल बनाकर और मसीह पर ध्यान केन्द्रित करके, हम भटकावों को दूर कर सकते हैं और उसमें पूर्ण सन्तुष्टि का अनुभव कर सकते हैं। इस तरीके से जीवन को सरल बनाना हमें उन बातों पर ध्यान केन्द्रित करने की ओर ले जाता है, जो अनन्त हैं, न कि उन अस्थाई बातों पर जो हमें आश्चर्यचकित कर सकती हैं।
विश्राम, चिन्ता और मानवीय सीमाएँ
मनोवैज्ञानिक अध्ययन अब वह दिखाना आरम्भ कर रहे हैं, जो हम सभी सहज रूप से जानते हैं और जिसे बाइबल ने हमें हज़ारों वर्षों से बताया है—कि मानवीय शरीर को विश्राम की आवश्यकता होती है। जब हम लगातार काम करते हैं और बिना रुके आगे बढ़ते रहते हैं, तो इससे न केवल हम थक जाते हैं, बल्कि हमारे काम की गुणवत्ता भी कम होने लगती है। हमारे जीवन की अधिकांश जटिलताएँ अत्यधिक काम के बोझ के कारण होने वाली भारी थकावट से उत्पन्न होती हैं। हम सीमित क्षमता वाले प्राणी हैं, और हमारे सृष्टिकर्ता ने हमें बताया है कि हमें अपने परिश्रम से विश्राम करना चाहिए। यहाँ फिर से सन्तुलन पर ध्यान दें। हमें उन कार्यों को लगन से करना चाहिए, जो परमेश्वर ने हमारे लिए रखे हैं। हमें उस काम से विश्राम करने के लिए विशेष रूप से सप्ताह में एक दिन का समय भी निकालना चाहिए। प्रभु का दिन हमें अपने उद्धारकर्ता की महानता की याद दिलाने के लिए है। इसी कारण से हम, उसकी प्रजा होने के नाते, उसकी आराधना करते हैं।
इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए प्रभु ने हमें एक और ऐसा साधन दिया है, जिस पर अक्सर ध्यान नहीं दिया जाता, परन्तु जो अत्यन्त व्यावहारिक है, और वह नींद है। जब आप जीवन में किसी परेशानी में पड़े हों, तो सबसे पहले आपको इस प्रश्न पर विचार करना चाहिए कि आप पर्याप्त नींद ले रहे हैं या नहीं। इब्रानियों 4 अध्याय में हमसे यह वादा किया गया है कि परमेश्वर के लोगों के लिए एक अनन्त सब्त का विश्राम अभी भी बाकी है, जिसे हमारा बड़ा महायाजक, यीशु मसीह लेकर आएगा। और मसीह में, हम आज उस स्वर्गीय विश्राम का स्वाद पहले से चख सकते हैं, जो भविष्य में आने वाला है। हम जितना अधिक यीशु की ओर ताकते रहेंगे और परमेश्वर की बातों पर ध्यान केन्द्रित करेंगे, उतना ही कम हम संसार की उन परेशानियों और चिन्ताओं की ओर मुड़ेंगे, जिन्हें सुलझाने की सामर्थ्य हमारे पास नहीं है।
परमेश्वर अपने लोगों को यह आज्ञा देता है कि वे उस विश्राम को प्राप्त करने का प्रयास करें, जिसके लिए उन्हें रचा गया था, और ऐसा केवल इसलिए न करें कि हमारा काम पूरा हो गया है। हम यह बात यीशु के अपने जीवन और उसकी सांसारिक सेवकाई में भी देख सकते हैं। मरकुस 6:31 में हम पढ़ते हैं: “उसने उनसे कहा, “तुम आप अलग किसी एकान्त स्थान में चलकर थोड़ा विश्राम करो।” क्योंकि बहुत लोग आते जाते थे, और उन्हें खाने का अवसर भी नहीं मिलता था।” यह एक ऐसा दृश्य है, जिसमें यीशु अपने मिशन को अधिक प्रभावी ढंग से पूरा करने के लिए विश्राम और एकाग्रता को प्राथमिकता देते हुए दिखाई देता है। विश्राम करने और प्रभु के दिन का आदर करने के लिए बहुत अधिक व्यस्त रहना इस बात का एक बड़ा संकेत है कि आपका जीवन इतना अधिक शोर-शराबे और अव्यवस्था से भरा हुआ है कि आप अपनी सेवकाई में प्रभावी नहीं हो पा रहे हैं। यद्यपि हम एक ऐसे परमेश्वर की आराधना करते हैं, जो न कभी थकता है और न कभी सोता है, फिर भी हमें इन बातों की आवश्यकता पड़ती है।
मत्ती 6:25-34 के पहाड़ी उपदेश के बीच में, यीशु अपने लोगों को सिखाता है कि वे चिन्ता न करें। और यह पहली बार है, जब हमने इस जीवन कौशल मार्गदर्शिका में इस शब्द का उपयोग किया है, परन्तु हमारे मन की उथल-पुथल के लिए यह कितना सही शब्द है। हम उस समय चिन्तित हो जाते हैं, जब हमारी चिन्ताएँ तात्कालिक और ठोस बातों से आगे बढ़कर काल्पनिक सम्भावनाओं के दायरे तक पहुँच जाती हैं। यीशु अपने लोगों से कहता है, “अत: कल की चिन्ता न करो, क्योंकि कल का दिन अपनी चिन्ता आप कर लेगा; आज के लिये आज ही का दु:ख बहुत है।”
पौलुस ने फिलिप्पियों 4:6-7 में जो लिखा है, उस पर विचार करें, “किसी भी बात की चिन्ता मत करो; परन्तु हर एक बात में तुम्हारे निवेदन, प्रार्थना और विनती के द्वारा धन्यवाद के साथ परमेश्वर के सम्मुख उपस्थित किए जाएँ। तब परमेश्वर की शान्ति, जो सारी समझ से परे है, तुम्हारे हृदय और तुम्हारे विचारों को मसीह यीशु में सुरिक्षत रखेगी।”
यह कितनी शान्ति देने वाली बात है कि परमेश्वर की शान्ति, जो समझ से परे है, हमारे हृदयों और विचारों को हमारे जीवन के शोर-शराबे से बचा सकती है। जब हम यीशु में विश्राम करते हैं, तो इससे हमारा ध्यान उसी पर केन्द्रित हो जाता है। यह हमें याद दिलाता है कि भले ही इस संसार में हमारे सामने परीक्षाएँ और परेशानियाँ आएँ, परन्तु हर समस्या कोई आपातकाल नहीं होती। कुछ समस्याओं पर आज ही हमारा तुरन्त ध्यान देना महत्वपूर्ण होता है, परन्तु हमारे मनों में जगह घेरने वाली कई बातें असल में “आने वाले कल की” समस्याएँ होती हैं। यह केवल टालमटोल करना नहीं है। यह एक सच्चाई है कि बहुत से वार्तालाप, ई-मेल्स, फोन कॉल्स या घर के काम तब तक प्रतीक्षा कर सकते हैं, जब तक आप उन पर ठीक से ध्यान न दे पाएँ।
यदि तहखाने में रखी अलमारी की साफ-सफाई करने का अर्थ जगह बनाना और उसे इस तरह से व्यवस्थित करना है कि आप उस जगह का बेहतर उपयोग कर सकें, तो परमेश्वर के लिए अपने जीवन को सादा बनाने का अर्थ स्पष्ट रूप से समझना यह है कि अभी कौन सी बात अत्यावश्यक और महत्वपूर्ण है, और किस बात से बाद में भी उतनी ही आसानी से निपटा जा सकता है। इसका अर्थ मसीह में सन्तुष्ट रहना है, ताकि हम उसमें विश्राम कर सकें।
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चिन्तन के लिए प्रश्न:
- आपके जीवन के किन हिस्सों में अस्थिरता या अशान्ति है? क्या मसीह में सन्तुष्ट रहना आपको कोई अनजान-सा विचार लगता है? कैसा लगेगा यदि आप मसीह के पूरे किए गए काम से सन्तुष्ट हों?
- अपने जीवन के अलग-अलग रिश्तों से आपको किस बात की “आवश्यकता” है? जब वे लोग उन क्षेत्रों में आपकी अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतरते, तो आप क्या करते हैं?
- आपके जीवन में विश्राम कैसा दिखता है? क्या रविवार का दिन आपके लिए अफरा-तफरी से भरा हुआ होता है या विश्राम वाला होता है? मसीह की आज्ञा का पालन करते हुए और साथ ही अपने परिश्रम से सच्चा विश्राम पाने के लिए आप अपने जीवन में कौन से व्यावहारिक बदलाव कर सकते हैं?
- इस समय पर आपको किस बात की चिन्ता सता रही है? उनमें से किन बातों पर तुरन्त ध्यान देना आवश्यक है, और कौन सी बातें प्रतीक्षा कर सकती हैं? अपने काम का बोझ एक ही बार में अपनी मेज पर इकट्ठा करने के बजाय, उसे अधिक व्यवस्थित तरीके से बाँटने के लिए आप कौन से अनुशासन अपना सकते हैं?
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भाग III: सादगी का फल
इस पड़ाव तक हमने जो भी काम किया है, उसका अधिकांश हिस्सा जगह खाली करने और अपने काम के बोझ को बाँटने से जुड़ा रहा है। इस कौशल मार्गदर्शिका का एक मुख्य शब्द ”ध्यान केन्द्रित करना” है। हम अपने मन और अपने जीवन में परमेश्वर की अच्छी बातों के लिए जगह बनाते हैं। इस खण्ड में, हम इस बात पर ध्यान देने के लिए मत्ती 6 अध्याय में दिए गए यीशु के पहाड़ी उपदेश पर फिर से लौटेंगे कि हमें जीवन में किस बात की खोज करनी चाहिए। सादगी से ही स्पष्टता आती है।
सबसे पहले परमेश्वर के राज्य की खोज करें
मत्ती 6:25-33 को एक बार फिर से पढ़ें। यहाँ यीशु अपने शिष्यों को सिखा रहा है कि चिन्ता न करना। हमने पहले इस आज्ञा के नकारात्मक पहलू “चिन्ता न करना…” पर चर्चा की थी, परन्तु इसका एक सकारात्मक पहलू भी है। आयत 31-33 में, यीशु कहता है, “इसलिये तुम चिन्ता करके यह न कहना कि हम क्या खाएँगे, या क्या पीएँगे, या क्या पहनेंगे। क्योंकि अन्यजातीय इन सब वस्तुओं की खोज में रहते हैं, पर तुम्हारा स्वर्गीय पिता जानता है कि तुम्हें इन सब वस्तुओं की आवश्यकता है। इसलिये पहले तुम परमेश्वर के राज्य और उसके धर्म की खोज करो तो ये सब वस्तुएँ भी तुम्हें मिल जाएँगी।”
यहाँ “अन्यजाति” शब्द अविश्वासी लोगों के लिए उपयोग किया गया है। वे इस वर्तमान संसार में अपनी शारीरिक समस्याओं का हल ढूँढ़ रहे थे। उन्हें केवल अपनी तात्कालिक आवश्यकताओं की चिन्ता थी। यह एक उलझा हुआ जीवन है। ऐसा नहीं है कि हम क्या खाएँगे या क्या पहनेंगे, ये प्रश्न मायने नहीं रखते। आपका स्वर्गीय पिता पहले से ही जानता है कि आपको इन बातों की आवश्यकता है, और वह अपने लोगों की आवश्यकताएँ पूरी करता है। वे प्रश्न अपने आप हल हो जाएँगे। इसके बजाय, यीशु हमें बुलाता है कि हम सबसे पहले परमेश्वर के राज्य और उसके धर्म की खोज करें। इसका परिणाम यह होता है कि “ये सब वस्तुएँ भी तुम्हें मिल जाएँगी।” अर्थात्, जब हमारा ध्यान अधिक महत्वपूर्ण बातों पर होगा, तो कम महत्वपूर्ण चिन्ताएँ अपने आप दूर हो जाएँगी।
एक सादा जीवन क्या है? यह एक ऐसा जीवन है, जो संसार की कभी न समाप्त होने वाली माँगों के बजाय, सबसे पहले परमेश्वर के राज्य की खोज करने पर केन्द्रित हो। सादगी से जीवन जीने से हम अनावश्यक भटकावों से बचते हुए उन बातों को प्राथमिकता दे पाते हैं, जो सचमुच मायने रखती हैं।
यह मत्ती 14 अध्याय में पतरस के पानी पर चलने की कहानी जैसा है। जब पतरस की दृष्टि अपने उद्धारकर्ता पर टिकी होती है, तो वह यीशु की सामर्थ्य से पानी पर चल पाता है। परन्तु जब वह नीचे देखकर अपने प्रदर्शन के बारे में सोचने लगता है, केवल तभी वह डूबने लगता है। यदि हमारा ध्यान इतना सीमित हो जाए कि हम लगातार यह आँकते रहें कि हम कैसा कर रहे हैं (क्या हम पर्याप्त हैं? क्या हमने पर्याप्त किया है?), तो हम परेशान हो जाएँगे। परन्तु यदि हम यीशु की ओर ताकते रहें, तो हम हर बोझ को उतारकर फेंक सकते हैं और सचमुच उस दौड़ में दौड़ सकते हैं, जो हमारे सामने रखी गई है (इब्रा. 12:2)।
यह कहना तो बहुत आसान है कि हम अपने जीवन में सबसे पहले परमेश्वर के राज्य की खोज कर रहे हैं। परन्तु असल में, व्यवहार में लाकर ऐसा करना कठिन हो सकता है। परन्तु विश्वास का जीवन ऐसा ही होता है। किसी कुर्सी को देखकर, आपको सहारा देने की उसकी क्षमता के बारे में आप जितना चाहें, उतनी बातें कर सकते हैं। आप उसकी भार सहने की क्षमता या जिस धातु से वह बनी है, उसके बारे में कारखाने की जानकारी का संदर्भ भी दे सकते हैं। परन्तु जब तक आप उस कुर्सी पर बैठ नहीं जाते और अपना भार उस पर डाल नहीं देते, तब तक आपने उस पर भरोसा नहीं किया है। सच्चा विश्वास, कर्म में बदलना ही चाहिए।
हमें केवल अपने शब्दों के द्वारा नहीं, बल्कि अपने कार्यों, अपने विचारों और अपनी भावनाओं के द्वारा भी, सबसे पहले परमेश्वर के राज्य की खोज करनी चाहिए। एक साधारण मसीही की यह महत्वपूर्ण पहचान ही हमें अपने जीवन के अन्य पहलुओं को सही ढंग से व्यवस्थित करने की अनुमति देती है।
पूछें कि सबसे महत्वपूर्ण क्या है?
जब हम अपने जीवन की प्राथमिकताएँ निर्धारित करने का प्रयास करते हैं, तो मरियम और मार्था वाली बाइबल की कहानी हमारे लिए बहुत शिक्षाप्रद है। यह लूका 10 अध्याय में मिलती है:
जब वे जा रहे थे, तो वह एक गाँव में गया, और मार्था नामक एक स्त्री ने उसे अपने घर में उतारा। मरियम नामक उसकी एक बहन थी। वह प्रभु के चरणों में बैठकर उसका वचन सुनती थी। परन्तु मार्था सेवा करते करते घबरा गई, और उसके पास आकर कहने लगी, “हे प्रभु, क्या तुझे कुछ भी चिन्ता नहीं कि मेरी बहन ने मुझे सेवा करने के लिये अकेली ही छोड़ दिया है? इसलिये उससे कह कि मेरी सहायता करे।” प्रभु ने उसे उत्तर दिया, “मार्था, हे मार्था; तू बहुत बातों के लिये चिन्ता करती और घबराती है। परन्तु एक बात अवश्य है, और उस उत्तम भाग को मरियम ने चुन लिया है जो उससे छीना न जाएगा।” (लूका 10:38-42)
एक अव्यवस्थित जीवन का एक और उदाहरण, “…तू बहुत बातों के लिये चिन्ता करती और घबराती है।” मार्था की चिन्ताएँ शायद अच्छी थीं। परन्तु वह सबसे महत्वपूर्ण बातों को प्राथमिकता देने और उन पर ध्यान लगाने में सक्षम नहीं हो पाई, जो कि यीशु के साथ रहना था। मार्था जीवन के कामों में इतनी व्यस्त थी कि वह उस व्यक्ति से विचलित हो गई, जिसे सुनने और जिसके साथ रहने की उसे सबसे अधिक आवश्यकता थी।
यह कहानी हमें अपनी कहानी जैसी लगती है, क्योंकि हम सब मरियम जैसा बनना चाहते हैं, परन्तु बहुत सी बार हम मार्था जैसा महसूस करते हैं।
– “कामों की सूची बहुत लम्बी है।”
– “बर्तन अपने आप तो धुलेंगे नहीं।”
– “मेरा काम कैसे पूरा होगा?”
– “बगीचे में जंगली पौधे बहुत अधिक बढ़ गए हैं।”
– “रात के खाने में क्या बनेगा?”
यह सूची चलती चली जाती है। यदि मार्था आरम्भ से ही मरियम जैसी होती तो हम नहीं जानते कि कहानी का अन्त कैसा होता। वह निश्चित रूप से कम विचलित और चिन्तित होती। मैं कल्पना करता हूँ कि घर के काम तब भी पूरे हो जाते। शायद यीशु स्वयं भी सहायता करने के लिए कह देता।
जब हम केवल तात्कालिक बातों पर ही ध्यान केन्द्रित करते हैं, तो हमारा सारा समय उसी में लग जाता है, और हम उन बातों पर विचार नहीं कर पाते, जो अधिक समय तक टिकने वाली हैं। यीशु हमेशा तक रहने वाला है। वह अनन्त है। इसका अर्थ है कि हमें उसके साथ अपने रिश्ते को प्राथमिकता देनी चाहिए। जैसा यशायाह ने लिखा है, “जब तक यहोवा मिल सकता है तब तक उसकी खोज में रहो, जब तक वह निकट है तब तक उसे पुकारो।” (यशा. 55:6)
मूर्तियों को पहचानें
परमेश्वर के अलावा किसी भी ऐसी बात के लिए जिसे हम देवता जैसा मानते हैं, बाइबल “मूर्ति” शब्द का उपयोग करती है। हम आमतौर पर स्वयं ऐसी भाषा का उपयोग नहीं करते, परन्तु हमारा जीवन और हमारे लगाव यह कहानी बताते हैं कि हम कार्यात्मक रूप से किसकी उपासना करते हैं। बहुत कम लोग सीधे-सीधे यह कहेंगे कि वे अपनी नौकरी या अपने बच्चों की उपासना करते हैं, परन्तु उनके जीवन यही कहते हैं कि वे ऐसा करते हैं।
हमारे जीवन को अव्यवस्थित करने वाली बहुत सी बातें “अच्छी” होती हैं। परन्तु जब हम उन्हें आवश्यकता से अधिक प्रभाव और महत्व देते हैं, तो वे अपनी योग्यता से अधिक जगह घेर लेती हैं। आपकी नौकरी परमेश्वर की ओर से एक वरदान है। आपका परिवार परमेश्वर की ओर से एक वरदान है। आपके बच्चे, आपकी जीवनसाथी, आपके मित्र, इत्यादि परमेश्वर की ओर से वरदान हैं। हमें जीवन के इन सभी पहलुओं के प्रति अपनी जिम्मेदारी को समझना चाहिए। इस समीकरण का एक हिस्सा यह समझना भी है कि हमारी सबसे पहली जिम्मेदारी केवल परमेश्वर की आराधना करना है, किसी और की आराधना करना नहीं।
लूका 8:19-21 में यीशु के इन शब्दों पर ध्यान दें: “उसकी माता और उसके भाई उसके पास आए, पर भीड़ के कारण उस से भेंट न कर सके। उससे कहा गया, “तेरी माता और तेरे भाई बाहर खड़े हुए, तुझ से मिलना चाहते हैं।” उसने इसके उत्तर में उनसे कहा, “मेरी माता और मेरे भाई ये ही हैं, जो परमेश्वर का वचन सुनते और मानते हैं।”
यीशु अपने सांसारिक परिवार के प्रति न तो कठोर और न ही लापरवाह हो रहा है। वह हमें यह दिखा रहा है कि उसकी सबसे पहली भक्ति परमेश्वर के प्रति है, और उसके बाद उन लोगों के प्रति “जो परमेश्वर का वचन सुनते और मानते हैं,” और अन्त में उसके सांसारिक परिवार के सदस्यों के प्रति है। यदि उसने इस परिस्थिति में अपने भाइयों को प्राथमिकता दी होती, तो इससे परमेश्वर की बनाई हुई व्यवस्था गड़बड़ा जाती। यीशु निश्चित रूप से उनकी परवाह करता था, परन्तु उसका उन लोगों के साथ एक गहरा जुड़ाव था, जो विश्वास के द्वारा से उससे जुड़ने वाले थे। (इसमें कोई सन्देह नहीं कि अपने भाइयों के साथ हुई ये आरम्भिक बातचीत बाद में उन लोगों की गवाही का हिस्सा बन गई, जब उन्हें यह समझ आया कि यीशु को प्रभु मानकर उस पर भरोसा रखने और एक अनन्त, आत्मिक भाई के तौर पर उसके पीछे चलने का क्या अर्थ होता है।)
जब हम अपने जीवन की अच्छी बातों को ही ईश्वर मान बैठते हैं, तो इससे हम भ्रमित हो जाते हैं, हमारा मन उलझन में पड़ जाता है, और हम अपने आसपास के लोगों पर ऐसा बोझ डाल देते हैं, जिसे वे उठा नहीं सकते। जब हम परमेश्वर को सबसे पहले प्राथमिकता देते हैं, तभी हम उसका आदर कर पाते हैं और अपने आसपास के लोगों से बेहतर प्रेम और उनकी बेहतर सेवा कर पाते हैं।
अपने जीवन को अव्यवस्थता-मुक्त करने का अर्थ अपनी अलमारियों से उन मूर्तियों को हटाना है, ताकि आप उस एकमात्र सच्चे परमेश्वर की आराधना कर सकें और उसके पीछे चल सकें। आत्मिक सादगी हमें यह सिखाती है कि हम परमेश्वर को हर बात से ऊपर रखें और इस तरह से जीवन जीएँ, जिसमें कोई भी अनावश्यक भटकाव या उलझन न हो।
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चिन्तन के लिए प्रश्न:
- अपने जीवन में आप सबसे पहले परमेश्वर के राज्य की खोज कैसे कर रहे हैं? क्या आपके जीवन के कुछ ऐसे क्षेत्र हैं, जिन पर यीशु के सुसमाचार का कोई प्रभाव नहीं पड़ा है? अपने जीवन के उस क्षेत्र को यीशु को सौंपना कैसा लगेगा?
- परमेश्वर के अनुग्रह के अनुसार जीवन जीने के बजाय, आप किन तरीकों से अपने स्वयं के काम पर अधिक ध्यान दे रहे हैं? आप कौन सी बात बदल सकते हैं, ताकि आप इस बारे में कम चिन्ता करें कि “आप कैसा कर रहे हैं” और इसके बजाय मसीह के पूरे किए गए काम में विश्राम पाएँ? इससे क्या फर्क पड़ेगा?
- कौन सी “मूर्तियाँ” या नकली देवता आपके प्रेम और उपासना के लिए होड़ मचा रहे हैं? ये बातें आपके जीवन में कैसे अव्यवस्थता लाती हैं? आपके लिए उन्हें निकाल फेंकना कैसा लगेगा?
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भाग IV: सादगी अपनाना
जब हम परमेश्वर के लिए जीने हेतु अपने जीवन से फालतू बातें हटाते हैं, तो हम किस प्रकार की बातें हटाना चाहते हैं? यह अन्तिम भाग आपको सोचने के लिए कुछ व्यावहारिक रास्ते दिखाना आरम्भ करता है, ताकि आप अपने जीवन के अलग-अलग हिस्सों को सही प्रभाव और ध्यान दे सकें। सादा जीवन जीने का अर्थ केवल व्यर्थ की बातें हटाना मात्र नहीं है; इसका अर्थ जीवन और विश्वास में उन बातों के लिए जगह बनाना है, जो सच में मायने रखती हैं।
सोचें कि आप विशेष रूप से किन बातों के लिए जिम्मेदार हैं
जीवन में कुछ काम सामान्य होते हैं जिन्हें कोई भी कर सकता है। आपके जीवन में कुछ दूसरी बातें भी होती हैं, जिन्हें केवल आप ही पूरा कर सकते हैं। वे आपकी अनूठी जिम्मेदारी होती हैं। आप अपने बच्चे के माता-पिता हैं। आप अपने जीवनसाथी के एकलौते जीवनसाथी हैं। यदि आप कोई नौकरी करते हैं, तो उस नौकरी के साथ कुछ जिम्मेदारियाँ भी आती हैं, जिन्हें आपको व्यक्तिगत् रूप से निभाना होता है।
फिर से उस सहायक रूपक के बारे में सोचें कि कैसे घर के काम हमारे जीवन से व्यर्थ की बातें हटाने की बात को समझाते हैं। आपके घर या अपार्टमेंट में ऐसी बहुतेरी बातें होती हैं, जिनका नियमित रूप से ध्यान रखना महत्वपूर्ण होता है। उनमें से हर बात के लिए कौन जिम्मेदार है? ऐसा बहुत कम ही होता है कि कोई एक व्यक्ति अपने घर के रखरखाव के लिए आवश्यक सारे काम कर पाए। इसके बजाय, कामों को आपस में बाँट लिया जाता है, जिसमें अलग-अलग लोग अपने क्षेत्र के लिए जिम्मेदार होते हैं, और यदि हर कोई अपना काम कर ले, तो सारे काम पूरे हो जाते हैं।
अब इसी बात को अपने जीवन पर लागू करके देखें। वे कौन से काम हैं, जिन्हें करने के लिए आपसे आपके जीवनसाथी के द्वारा, आपके मालिक के द्वारा, या परमेश्वर के द्वारा विशेष रूप से कहा जा रहा है? आपको विश्वासयोग्यता के साथ उन कामों को करने का प्रयास करना चाहिए। उसके बाद आप अपने आसपास देखकर यह पता लगा सकते हैं कि आप और कहाँ सहायता कर पाने में सक्षम हैं। यदि आप अपनी क्षमता से अधिक काम अपने सिर पर लेने का प्रयास करते हैं, तो हो सकता है कि आप उन कामों को बिलकुल भी पूरा न कर पाएँ, या यदि आप उन्हें कर भी लें, तो आपके काम की गुणवत्ता पर बुरा प्रभाव पड़ेगा, क्योंकि आप पर काम का बहुत अधिक बोझ होगा। यहीं पर जीवन को सादा बनाना महत्वपूर्ण हो जाता है। अपनी मुख्य जिम्मेदारियों पर ध्यान देकर आप एक सादा मसीही जीवन जीने के लिए जगह बनाते हैं, जो परमेश्वर की प्राथमिकताओं से मेल खाता है।
सादा जीवन जीने का अर्थ इस बात का ध्यान रखना है कि हमें सच में किन बातों की आवश्यकता है, और संसार के अनुसार हमें किन बातों की आवश्यकता है। कम से कम बातों के साथ जीने का तरीका हमें उन बातों को प्राथमिकता देने और उन पर ध्यान देने के लिए प्रोत्साहित करता है, जो हमारे जीवन में महत्व उत्पन्न करती हैं।
अपनी बाइबल निकालकर मत्ती 25:14-30 में दिए गए यीशु के तोड़ों के दृष्टांत पर विचार करें। जिन लोगों को पाँच और दो तोड़े दिए गए थे, उन्होंने उनका उपयोग किया, और वे उनके प्रति जिम्मेदार थे। जो उन्हें मिला था, उसी के आधार पर उन्होंने और भी अधिक उत्पन्न किया। जिस मनुष्य को केवल एक तोड़ा मिला था, उसने उसे छिपाकर रख दिया और उससे कुछ भी उत्पन्न नहीं किया। वह न केवल अपने स्वामी से, बल्कि इस बात से भी डरता था कि उसे जो थोड़ा-सा सौंपा गया था, कहीं वह उसे खो न दे। पहले दो मनुष्यों से, जिन्होंने अपने वरदानों का अच्छे से प्रबन्धन किया था, उस स्वामी ने कहा, “धन्य, हे अच्छे और विश्वासयोग्य दास!” परन्तु स्वामी ने तीसरे मनुष्य को दुष्ट एवं आलसी कहा, और उससे वह एकमात्र तोड़ा भी वापस ले लिया।
परमेश्वर ने हममें से हर किसी को अलग-अलग वरदान और जिम्मेदारियाँ सौंपी हैं। हमारा काम यह नहीं है कि उससे प्रश्न करें, उसे चुनौती दें, या उससे और अधिक की माँग करें… बल्कि जो कुछ भी हमें दिया गया है, उसमें विश्वासयोग्य रहें। यह जानना हमारे जीवन में बहुत चैन और शान्ति लाता है कि हम वहीं हैं, जहाँ परमेश्वर चाहता है कि हम हों, और वही कर रहे हैं, जो परमेश्वर चाहता है कि हम करें। यही मसीही सादगी का सार है—अर्थात् अनावश्यक भटकाव या चिन्ता के बिना, उन कामों को करने में शान्ति पाना जो परमेश्वर ने हमें सौंपे हैं।
अपने आसपास के लोगों के चुनावों के लिए प्रभु के सामने आप जिम्मेदार नहीं हैं। आप केवल उसी बात के लिए जिम्मेदार हैं, जो परमेश्वर ने विशेष रूप से आपको सौंपी है। इसी कारण से, यह समझना महत्वपूर्ण है कि वे विशेष जिम्मेदारियाँ कौन सी हैं, और फिर यह पूछना कि आप उन अलग-अलग बुलाहटों में मसीह का आदर कैसे कर सकते हैं। एक आत्मिक अनुशासन के तौर पर सादगी का अर्थ उन बातों के लिए काम और आराधना दोनों में जगह बनाना है, जो सचमुच मायने रखती हैं।
उत्पादकता की तालिका
अपने जीवन पर ध्यान केन्द्रित करने में सहायता के लिए हम जिस साधन का उपयोग कर सकते हैं, वह यह सोचना है कि कोई काम अत्यावश्यक है या नहीं, अथवा महत्वपूर्ण है या नहीं। इससे 2×2 का एक वर्गाकार ढाँचा बनता है, और हम हर चतुर्थांश के लिए अलग-अलग रणनीतियाँ अपना सकते हैं।
– अत्यावश्यक + महत्वपूर्ण: ये आपके जीवन के सबसे महत्वपूर्ण काम हैं। आपको इन्हें करना है, और अच्छे से करना है। ये वे काम हैं, जिन पर आपका सबसे अधिक ध्यान और मानसिक ऊर्जा लगती है। इन जिम्मेदारियों को पूरा करने या निभाने के लिए एक योजना बनाएँ।
– अत्यावश्यक नहीं + महत्वपूर्ण: इन पर भी आपका ध्यान जाना चाहिए, परन्तु ये “बाद के लिए” टाले जा सकने वाले काम हैं। आप इनके बारे में भूलना तो नहीं चाहेंगे, परन्तु आप इन्हें बाद में पूरा कर सकते हैं। और यह ध्यान देना महत्वपूर्ण है कि: यदि इन मामलों की देखरेख न की जाए, तो कुछ समय बाद ये अत्यावश्यक की श्रेणी में आ सकते हैं।
– अत्यावश्यक + महत्वपूर्ण नहीं: ये इस प्रकार के काम हैं, जिनके लिए आप किसी से सहायता माँग सकते हैं, या इन्हें किसी और को सौंप सकते हैं। ये ऐसे काम हैं, जिस पर तुरन्त ध्यान देने की आवश्यकता होती है, परन्तु इनमें आपका सीधे तौर पर शामिल होना आवश्यक नहीं है। अक्सर यही वो बातें होती हैं, जो हमारे दिमाग में उलझन उत्पन्न करती हैं। हम ठीक अपने सामने उपस्थित किसी ऐसी बात को लेकर परेशान होते रहते हैं, जो अन्त में मायने नहीं रखती।
– अत्यावश्यक नहीं + महत्वपूर्ण नहीं: यह उन बातों की श्रेणी है, जिन्हें हम फेंक देना चाहते हैं। ये महत्वपूर्ण नहीं होतीं। अगले वर्ष तो आप इनके बारे में सोचेंगे भी नहीं, और न ही याद रखेंगे। हमें इन बातों के साथ ऐसा ही बर्ताव करना चाहिए। इन्हें आपके अधिक समय, प्रयास या तनाव की न तो आवश्यकता होती है और न ही ये इसके योग्य होती हैं। और फिर भी, यही वो बातें हैं, जो हमारे दिमाग की अलमारियों पर इतनी अधिक जगह घेर लेती हैं।
थोड़ा समय निकालें, एक कागज और पेन लें, और अपने लिए यह तालिका तैयार करें। आप इसे विशेष कामों और यहाँ तक कि सामान्य जिम्मेदारियों से भी भर सकते हैं। इसका लक्ष्य अपने कैलेंडर और सोच को इस तरह व्यवस्थित करना है कि आप अत्यावश्यक नहीं/महत्वपूर्ण नहीं श्रेणी पर कम समय बिताएँ, और अपने अधिकांश प्रयास अत्यावश्यक/महत्वपूर्ण बातों पर ध्यान केन्द्रित करने में लगाएँ।
सादगी की बाइबल की परिभाषा जीवन के दैनिक कामों में परमेश्वर की इच्छा जानने के महत्व पर जोर देती है। असल में, जब हम ध्यान भटकाने वाली बातों को हटाकर परमेश्वर की प्राथमिकताओं पर ध्यान केन्द्रित करते हैं, तो कम से कम साधनों पर जीना अर्थात् न्यूनतमवाद और मसीही विश्वास साथ-साथ चलते हैं। अपने जीवन को सरल बनाकर, हम स्वयं को उसके उद्देश्य के साथ और अधिक निकटता से जोड़ते हैं, और हम अनावश्यक बोझ उतार फेंकते हैं और अपने हृदयों एवं दिमागों को पूरी तरह से उन बातों के प्रति समर्पित कर पाते हैं, जो उसके राज्य में सचमुच मायने रखती हैं।
परमेश्वर के अनुग्रह के उत्तर में उदारतापूर्ण जीवन जीना
यदि आप मसीह में सन्तुष्ट हैं, तो आप अब अपने आसपास के लोगों से कुछ “लेने” के लिए विवश नहीं हैं। इसके बजाय, आप यह पूछने के लिए स्वतंत्र हैं, “आपको किस बात की आवश्यकता है?” या “मैं कैसे सहायता कर सकता हूँ?” यह आपको अपने स्वर्गीय पिता के हाथों से मिली हर बात के लिए धन्यवादी होने की अनुमति देता है, जिससे आपके भीतर दान देने की भावना जागृत होती है। आप अपने समय, अपनी प्रतिभा और अपने धन के मामले में खुले हाथ वाले बन सकते हैं। ये सब वरदान परमेश्वर की ओर से, उसके अनुग्रह से मिले हैं। यह आपको वह जगह देता है, जहाँ आप विश्वासयोग्यता के साथ अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास कर सकते हैं, जब आप “हाँ” कह सकते हैं। यह आपको समय और क्षमताओं के मामले में अपनी सीमाओं को जानने में भी सहायता करता है, ताकि जब आप “न” कहें, तो आपको कोई अपराध-बोध न हो।
जब हमारा जीवन व्यर्थ की बातों से भरा होता है, तो शायद हम इस मामले में अनिश्चित हों कि सच में कौन सी बात महत्वपूर्ण है। शायद आपको हर बात को एक बराबर महत्व इसलिए देना चाहिए, क्योंकि आप इस मामले में अनिश्चित होते हैं कि कौन सी बात मूल्यवान है। जब आप मसीह पर भरोसा रखते हैं और उसे अपने जीवन में प्राथमिकता देते हैं, तो यह आपको बाकी सभी बातों को दूसरे दर्जे पर दिखाता है। इससे संसार की नश्वर बातों पर आपकी पकड़ ढीली हो जाती है। वे अच्छी बातें हो सकती हैं। आप उन्हें उन वरदानों के रूप में पाकर आनन्दित हो सकते हैं, जो वे वास्तव में हैं। परन्तु यदि प्रभु उन्हें आपसे लेकर किसी और को दे दे, तौभी आप इससे इसलिए परेशान नहीं होंगे, क्योंकि आप मसीह में सन्तुष्ट हैं।
लूका 6:32-36 में अपने “मैदानी उपदेश” के दौरान यीशु यही कहता है—“यदि तुम अपने प्रेम रखनेवालों के साथ प्रेम रखो, तो तुम्हारी क्या बड़ाई? क्योंकि पापी भी अपने प्रेम रखनेवालों के साथ प्रेम रखते हैं। यदि तुम अपने भलाई करनेवालों ही के साथ भलाई करते हो, तो तुम्हारी क्या बड़ाई? क्योंकि पापी भी ऐसा ही करते हैं। यदि तुम उन्हें उधार दो जिनसे फिर पाने की आशा रखते हो, तो तुम्हारी क्या बड़ाई? क्योंकि पापी पापियों को उधार देते हैं कि उतना ही फिर पाएँ। वरन् अपने शत्रुओं से प्रेम रखो, और भलाई करो, और फिर पाने की आशा न रखकर उधार दो; और तुम्हारे लिये बड़ा फल होगा, और तुम परमप्रधान के सन्तान ठहरोगे, क्योंकि वह उन पर जो धन्यवाद नहीं करते और बुरों पर भी कृपालु है। जैसा तुम्हारा पिता दयावन्त है, वैसे ही तुम भी दयावन्त बनो।”
यह मसीह का उदारता भरा मार्ग है। परमेश्वर सरल है। वह हर किसी को उसके कर्मों का फल देगा। जब हम मसीह में स्वतंत्र होते हैं, तो यह हमें प्रेम करने और मसीह ने हमें जो बहुतायत दी है, उसमें से दूसरों को देने के लिए खोल देता है। अपने शत्रुओं से प्रेम करना और उनका भला करना; तथा बदले में कुछ भी पाने की आशा किए बिना उधार देना, यह एक गहरी मसीही सादगी है। यीशु की बातें उस अविश्वासी संसार को समझ में नहीं आती, जो सबसे पहले और सबसे बढ़कर अपने लिए भागता है। जो लोग यीशु के प्रेम और अनुग्रह को जानते हैं, वे अब एक ऐसी दृढ़ नींव पर खड़े हैं, जहाँ परमेश्वर ने उन्हें सदा के लिए स्वीकार कर लिया है और अपने परिवार में सदा के लिए उनका स्वागत किया है।
एक अव्यवस्था-मुक्त जीवन आपको वह स्थान और स्वतंत्रता प्रदान करता है, जिसमें आप दूसरों को वह समय, प्रतिभा और धन दे सकते हैं, जिनकी आपको अब अपनी सेवा कराने के लिए आवश्यकता नहीं है। यह उदारता हमारे संसार के अंधकार में भी सुसमाचार का प्रकाश फैलाती है।
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चिन्तन के लिए प्रश्न:
- आपके जीवन की सबसे महत्वपूर्ण बातें कौन सी हैं, जिनके लिए आप विशेष रूप से जिम्मेदार हैं? क्या आप उन जिम्मेदारियों को विश्वासयोग्यता के साथ निभाने के लिए पर्याप्त समय और विचार देते हैं? आप किन बातों की उपेक्षा कर रहे हैं और ऐसा क्यों है?
- उत्पादकता की तालिका के साथ कुछ समय बिताने के बाद, इस अभ्यास के बारे में आपको किस बात ने आश्चर्यचकित किया? ऐसी कौन सी बातें हैं, जिन्हें आप अपने सप्ताह की समयसारणी और जिम्मेदारियों से किसी और को सौंप सकते हैं या हटा सकते हैं?
- क्या आप न केवल अपने धन से, बल्कि अपने समय और परमेश्वर द्वारा दिए गए वरदानों से भी उदारतापूर्वक जीवन जीने में सक्षम हैं? ऐसी कौन सी चिन्ताएँ या रुकावटें हैं, जो आपको अपने दैनिक जीवन में उदार बनने से रोकती हैं?
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निष्कर्ष
यदि आपने कभी अपने दादा-दादी या कलीसिया के किसी बुज़ुर्ग सदस्य की घर बदलने में सहायता की है, तो आप जानते होंगे कि समय के साथ हम कितना सारा सामान जमा कर लेते हैं। हम अक्सर अलमारी में रखे उस बक्से को देखकर हैरान रह जाते हैं, जिसे दशकों से खोला ही नहीं गया होता, और हमें अब यह भी निश्चय नहीं होता कि उसके भीतर आखिर है क्या।
यही बात हमारे जीवन में भी सच है। हम स्वाभाविक रूप से, केवल अपना जीवन जीने के कारण ही, कई तरह के काम, बोझ, तनाव और चिन्ताएँ अपने ऊपर ले लेते हैं। हमारे पास रिश्तों, जिम्मेदारियों और सपनों का एक जाल होता है, जिन्हें पूरा करने की हम अपेक्षा रखते हैं। हो सकता है कि हम बहुत अधिक करने का प्रयास कर रहे हों, अपनी क्षमता से कहीं अधिक हासिल करने का प्रयास कर रहे हों, या एक ही समय पर बहुत सारी बातों को सम्भालने का प्रयास कर रहे हों। हमने इसे “अव्यवस्था” का नाम दिया है। यदि हम परमेश्वर का आदर करने की इच्छा रखते हैं, उसे जानना चाहते हैं और उसके बारे में बताना चाहते हैं, तो हमें उसी पर ध्यान केन्द्रित करना होगा। यह जीवन कौशल मार्गदर्शिका निश्चित रूप से व्यावहारिक सहायता और जीवन से जुड़ी सलाह देती है। परन्तु इसका उद्देश्य केवल आपकी व्यक्तिगत् प्रसन्नता बढ़ाना नहीं है, और न ही यह इसलिए है, क्योंकि हमारी संस्कृति में आजकल “सादगी” का बहुत अधिक चलन है। हमें ऐसा इसलिए करना चाहिए, क्योंकि हम यीशु की आराधना और उसका अनुसरण करना चाहते हैं। मरियम की तरह, हमें भी सबसे अच्छी बात की चाह रखनी चाहिए, अर्थात् हमारे प्रभु यीशु को जानना और उसके द्वारा पहचाने जाना, और अपने जीवन में उसका अनुसरण करना।
जेरेमिया बरोज़ लिखते हैं, “यदि आप एक सन्तुष्ट जीवन जीना चाहते हैं, तो इस संसार को बहुत कसकर न पकड़ें, संसार के उन कामों में आवश्यकता से अधिक न उलझें, जिनके लिए परमेश्वर ने आपको नहीं बुलाया है।” निश्चित रूप से यह कहना तो आसान है, परन्तु करना मुश्किल है! परन्तु परमेश्वर के अनुग्रह से, वह हमें अपने साथ शान्ति, सन्तोष और सन्तुष्टि से भरे जीवन की ओर बुलाता है। जब आप मसीह के निमित्त अपने जीवन को सरल बनाने का प्रयास करते हैं, तो यह आपको उन सभी कामों को विश्वासयोग्यता के साथ करने के लिए स्वतंत्र कर देता है, जिनके लिए उसने आपको बुलाया है।
लेखक के बारे में
मेसन और वैलेरी गुड के दो बच्चे जूडा और एलाइज़ा हैं। मेसन ने वेवरली हाई स्कूल और द ओहियो स्टेट यूनिवर्सिटी से स्नातक किया है। उन्होंने वेस्टमिंस्टर थियोलॉजिकल सेमिनरी से पासबानी की सेवकाई में ईश-विज्ञान में स्नातकोत्तर किया है। मेसन को शिष्यत्व और स्थानीय कलीसिया में गहरी रुचि है, और वह अपना पूरा जीवन सेवकाई में देना चाहते हैं।
विषयसूची
- भाग I: ध्यान और कड़ी मेहनत का सन्तुलन
- एक शान्त जीवन जीने की इच्छा रखें
- परमेश्वर के अनुग्रह से, कड़ी मेहनत करें
- चिन्तन के लिए प्रश्न:
- भाग II: सादगी की जड़
- सन्तुष्टि
- विश्राम, चिन्ता और मानवीय सीमाएँ
- चिन्तन के लिए प्रश्न:
- भाग III: सादगी का फल
- सबसे पहले परमेश्वर के राज्य की खोज करें
- पूछें कि सबसे महत्वपूर्ण क्या है?
- मूर्तियों को पहचानें
- चिन्तन के लिए प्रश्न:
- भाग IV: सादगी अपनाना
- सोचें कि आप विशेष रूप से किन बातों के लिए जिम्मेदार हैं
- उत्पादकता की तालिका
- परमेश्वर के अनुग्रह के उत्तर में उदारतापूर्ण जीवन जीना
- चिन्तन के लिए प्रश्न:
- निष्कर्ष
- लेखक के बारे में