#34 बच्चों को भक्त और ज़िम्मेदार बनाना
परिचय
माता-पिता होना हमें सबसे बड़ा सुख देता है, परन्तु यह सबसे चुनौतीपूर्ण ज़िम्मेदारी भी है। यही निर्धारित करती है कि आप के बच्चों के मन, विचार, और भविष्य क्या आकार लेंगे। माता-पिता होने के नाते हम चाहते हैं कि हमारे बच्चे सफल, धर्मी, और ज़िम्मेदार हों। परन्तु इन आधुनिक दिनों के ध्यान बँटाने और दबाव डालने वाले सभी प्रभावों के कारण, यह कार्य घबरा देने वाला हो सकता है।.
बहुत से माता-पिता सोचते हैं:
– मैं किस तरह से एक धर्मी पिता हो सकता हूँ, जो अपने बच्चों की ऐसी अगुवाई करे, कि वे परमेश्वर की अवहेलना
करने वाले इस संसार में भी,परमेश्वर के पीछे चलने वाले बनें?
– मैं उनमें जिम्मेदारी और चरित्र किस तरह से सिखा सकता हूँ, जबकि इतने सारे प्रभाव इन गुणों के विरुद्ध प्रभाव
डालते हैं?
– बाइबल के अनुसार, माता-पिता होना, वास्तव में कैसा होता है?
अच्छा समाचार यह है कि हमें इस सब के लिये अकेले ही कार्य नहीं करना पड़ेगा। परमेश्वर ने हमारे मार्गदर्शन के लिये अपना वचन हमें उपलब्ध किया है और हम से कहा है कि हम अपने बच्चों की परवरिश उसकी बुद्धिमानी और सत्य में होकर करें। नीतिवचन 22:6 हमें याद दिलाता है:
“लड़के को उसी मार्ग की शिक्षा दे जिसमें उसको चलना चाहिए, और वह बुढ़ापे में भी उससे न हटेगा।”
यह पद हमें यह समझने में सहायता करता है कि बच्चों की आत्मिक बढ़ोतरी पर ध्यान केन्द्रित करने से, हमे उनकी दीर्घकालीन बढ़ोतरी में सहायता करते हैं।
तो, इस सत्य के साथ हम क्या करें? यहीं पर उद्देश्यपूर्ण परवरिश करने की भूमिका आती है। बच्चों का धार्मिकता में बड़े होना अनायास ही नहीं हो जाता है—इसके लिये प्रार्थना के साथ निर्भरता, बाइबल की बुद्धिमानी, निरन्तर मार्गदर्शन, और बच्चों को मसीह की ओर अग्रसर करते रहने के लिये दृढ़ निश्चित मन की आवश्यकता होती है।
ऑडियो मार्गदर्शिका
ऑडियो#34 बच्चों को भक्त और ज़िम्मेदार बनाना
भाग I: माता-पिता होने के लिये परमेश्वर की योजना को समझना
मुख्य वचन: नीतिवचन 22:6
“लड़के को उसी मार्ग की शिक्षा दे जिसमें उसको चलना चाहिए, और वह बुढ़ापे में भी उससे न हटेगा।”
माता-पिता को आत्मिक अगुवे क्यों होना चाहिये
माता-पिता होना केवल अपने बच्चों को भोजन, वस्त्र, और सुरक्षा देते रहना मात्र ही नहीं है। हमारे माता-पिता होने की भूमिका में, उसने हमें और भी बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी दी है—कि हम अपने बच्चों के आत्मिक मुखिया भी हों।
आज के समय और युग में, बहुत सारे माता-पिता अपने बच्चों के लिये सर्वोत्तम शिक्षा, पाठ्यक्रम के अतिरिक्त की सर्वोत्तम गतिविधियाँ, और सफलता के लिए सर्वोत्तम सम्भावनाओं को उपलब्ध करवाना चाहते हैं। ये बातें अति आवश्यक हैं, परन्तु सबसे आवश्यक बात है, उनके मनों को मसीह के लिये तैयार करना। जिस प्रकार से उनके बचपन में ही हम इस नींव को रख देते हैं, वही निर्धारित करती है कि वे किस प्रकार के वयस्क बनेंगे।
नीतिवचन 22:6 हमें सिखाता है कि, “लड़के को उसी मार्ग की शिक्षा दे जिसमें उसको चलना चाहिए।” इसका अर्थ है कि—हम जिस तरह से उनकी परवरिश करते हैं, उन्हें जो सिखाते हैं, किस तरह से उन्हें विश्वास को दिखाते हैं, किन मूल्यों को बनाने में हम उनकी सहायता करते हैं — ये बातें उनके साथ लम्बे समय तक बनी रहेंगी।
परन्तु वास्तविकता यह है: हम बच्चों के धर्मी होने की परवरिश अनायास ही नहीं करते हैं। इसका आरम्भ उद्देश्यपूर्ण योजना, प्रार्थना, और उन्हें प्रभु की ओर बढ़ाते रहने के लिए प्रतिबद्ध रहने के साथ होता है।
अच्छा समाचार क्या है? प्रभु की यह अपेक्षा नहीं है कि आप अकेले ही यह करें। उसने दिशा-सूचक के रूप में हमें अपना वचन उपलब्ध करवाया है और इस बुलाहट के लिए हमें सामर्थी बनाने के लिये अपना आत्मा दिया है।
माता-पिता होना केवल एक ज़िम्मेदारी नहीं है, यह एक बुलाहट है
बहुत से माता-पिता को यह करना असहनीय लगता है। किसी दिन हम धीरजवन्त नहीं रहते हैं; कभी हम सन्देह करते हैं; किसी अन्य समय पर हम अपने प्रयासों पर ही प्रश्न उठाते हैं। परन्तु, माता-पिता होना एक ज़िम्मेदारी से बढ़कर है; इसे एक ईश्वरीय आदेश के समान लेना चाहिये।
परमेश्वर ने व्यवस्थाविवरण 6:6-7 में माता-पिता को आज्ञा दी है: “और ये आज्ञाएँ जो मैं आज तुझ को सुनाता हूँ वे तेरे मन में बनी रहें; और तू इन्हें अपने बाल–बच्चों को समझाकर सिखाया करना, और घर में बैठे, मार्ग पर चलते, लेटते, उठते, इनकी चर्चा किया करना।”
यह खण्ड हमें याद दिलाता है कि माता-पिता होना, प्रतिदिन, एक उद्देश्यपूर्ण प्रयास का निर्वाह करना है। यह इतवार के दिन अपने बच्चों को कलीसिया में लाने या उनके सोने से पहले उन्हें बाइबल की कहानियाँ पढ़ कर सुनाने से कहीं बढ़कर है। यह जीवन के हर पहलू में विश्वास का समावेश करना है—भोजन की मेज़ पर हम क्या बातें करते हैं, हम परेशानियों का सामना कैसे करते हैं, हम लोगों के साथ कैसा व्यवहार करते हैं, परिवार के रूप में हमारी प्राथमिकताएँ क्या हैं।
हमारे बच्चे हमेशा सुन रहे होते हैं। वे देखते हैं कि हम दबाव से किस तरह से व्यवहार करते हैं, अपने जीवन-साथी के साथ कैसा व्यवहार करते हैं, अवरोधों को किस तरह से पार करते हैं, और हम जिसका प्रचार करते हैं, क्या वास्तव में उसका पालन भी करते हैं।
जब हम माता-पिता होने को एक ईश्वरीय बुलाहट समझते हैं, तब हम बातों को भिन्न दृष्टिकोण से देखते हैं। लक्ष्य केवल अच्छे बच्चे बड़े करना नहीं है, बल्कि, परमेश्वर के ऐसे अनुयायी बड़े करना है जो अपने विश्वास में दृढ़ हों, जो उनके वयस्क होने तक उनके साथ बना रहेगा।
मुख्य वचन: इफिसियों 6:4
“हे बच्चेवालो, अपने बच्चों को रिस न दिलाओ, परन्तु प्रभु की शिक्षा और चेतावनी देते हुए उनका पालन–पोषण करो।”
प्रेम और अनुशासन के मध्य सन्तुलन
माता-पिता की ज़िम्मेदारी में एक बारीक सी रेखा होती है। उस रेखा के एक ओर तो हम अपने बच्चों से प्रेम करना चाहते हैं, उन्हें उठाना, और प्रोत्साहित करना चाहते हैं। दूसरी ओर, हम समझते हैं कि उन्हें ज़िम्मेदार और धर्मी वयस्क बनाने के लिये अनुशासन में बनाए रखना आवश्यक है। तो, हम प्रेम और अनुशासन के मध्य सन्तुलन किस प्रकार से बैठाएँ?
बिना प्रेम के कठोर होने से क्रोध और विरोध उत्पन्न होता है। यदि आप को अपने बच्चों को सही प्रकार से दण्ड देना नहीं आता है, तो वे गैर-ज़िम्मेदार, और हर बात पर अधिकार रखने की समझ के साथ बड़े होंगे। माता-पिता होने के लिये परमेश्वर की योजना दोनों बातों की है—प्रेम और सुधार, जो साथ मिलकर बच्चे के मन को स्वरूप दें।
इफिसियों 6:4 हमें याद दिलाता है कि हमें अपने बच्चों का पालन-पोषण प्रभु की शिक्षा और चेतावनी देते हुए करना है। हमें उन्हें केवल सही और गलत के नियमों के अनुसार नहीं, बल्कि परमेश्वर को आदर देने वाला जीवन जीना सिखाना है।
बाइबल का अनुशासन, नियन्त्रण करना नहीं है—वरन् मार्गदर्शन करना है। यह बच्चों को उनके किये के परिणामों को सिखाना, आत्म-संयम को सीखना, और अपने निर्णयों के लिये ज़िम्मेदारी लेना सीखना है।कृपया हमारे साथ इस खोज में जुड़िये, कि किस प्रकार से प्रेम और अनुशासन के साथ बच्चों को ज़िम्मेदारी का पाठ पढ़ाने से परमेश्वर की महिमा और हमार बच्चों के चरित्र का निर्माण हो सकता है।
ज़िम्मेदारी महत्वपूर्ण क्यों है
परमेश्वर ने हमें, हमारे कार्यों, शब्दों, और दूसरों के प्रति व्यवहार के लिए ज़िम्मेदार होने के साथ सृजा है। बच्चों को छोटी आयु से ही यह सीखना है कि उनके द्वारा किये गए चुनावों के परिणाम होंगे, और ज़िम्मेदार होना कोई बोझ नहीं है, बल्कि एक सौभाग्य है।
बाइबल इन तरीकों के द्वारा हमें ज़िम्मेदार होना सिखाती है:
– “यदि कोई काम करना न चाहे तो खाने भी न पाए।” (2 थिस्सलुनीकियों 3:10) – यह पद कड़े परिश्रम का मूल्य सिखाता है।
– “क्योंकि हर एक व्यक्ति अपना ही बोझ उठाएगा।” (गलातियों 6:5) – यह पद सिखाता है कि हम अपने कार्यों और चुनावों के लिये ज़िम्मेदार हैं।
– “जो थोड़े से थोड़े में सच्चा है, वह बहुत में भी सच्चा है : और जो थोड़े से थोड़े में अधर्मी है, वह बहुत में भी अधर्मी है।” (लूका 16:10) – यह पद सिखाता है कि ज़िम्मेदारी हमें और बड़े अवसर देती है।
माता-पिता होने के नाते यह हमारी ज़िम्मेदारी है कि हम अपने बच्चों को ज़िम्मेदारी सिखाएँ। न केवल दैनिक कार्यों को करने के लिये, परन्तु विश्वास, सम्बन्धों, और निर्णय लेने में भी।
प्रेम और अनुशासन के द्वारा ज़िम्मेदारी को विकसित करना
नियम स्थापित करना, ज़िम्मेदारी सिखाना नहीं है। इसका अर्थ अपने बच्चों के मनों को उभारना होता है, जिससे कि वे ज़िम्मेदारी के महत्व को समझ सकें, न कि केवल नियमों की एक सूची का पालन करें।
प्रेम और अनुशासन के साथ ज़िम्मेदारी सिखाने के कुछ व्यावहारिक तरीके ये हैं:
1. स्पष्ट अपेक्षाओं और परिणामों को परिभाषित करके रखिये
जब बच्चों को पता होता है कि उनसे क्या आशा की जा रही है, तब वे सबसे अच्छा करते हैं। क्योंकि नियम स्पष्ट और सीधे हैं, इसलिये बच्चे एक ही समय पर अधिक और कम चिन्तित तथा ज़िम्मेदार होते हैं। एक सीमा तक, ज़िम्मेदारी की अनदेखी करना कोई विकल्प नहीं है।
अस्पष्ट बात कभी समाधान नहीं होती है; बजाए यह कहने के कि “ठीक से व्यवहार करो,” यह कहने का प्रयास कीजिये “अपने भाई के प्रति भले रहो,” या “खेलने के बाद अपने खिलौनों को उठा लेना।”
परिणामों के द्वारा बात के निर्वाह को पूरा कीजिये—जब कोई बच्चा किसी कार्य को पूरा नहीं करता है, तब उन्हें स्वाभाविक परिणामों का सामना करने दीजिये। आप का उद्देश्य उन्हें दण्ड देना नहीं है बल्कि उन्हें ज़िम्मेदारी को इस प्रकार से सिखाना है कि उससे उन्हें विकसित होने में सहायता मिले।
2. क्रोध से नहीं, बल्कि प्रेम के साथ अनुशासित करें
अनुशासन बच्चों में डर बैठाना नहीं है—यह बुद्धिमानी की ओर उनकी अगुवाई करना है।
नीतिवचन 13:24 हमें बताता है: “जो बेटे पर छड़ी नहीं चलाता वह उसका बैरी है,परन्तु जो उस से प्रेम रखता, वह यत्न से उसको शिक्षा देता है।”
यह पद कठोर या क्रूर अनुशासन का समर्थन नहीं करता है; बल्कि यह सप्रेम सुधारने पर बल देता है। एक प्रेमी माता-पिता बुरे व्यवहार की अनदेखी नहीं करेंगे, परन्तु आप को वापस सही मार्ग पर लेकर आएँगे जिससे कि आप, अपने लिए बुरा अनुभव किये बिना, अपनी गलतियों से सीख सकें।
यदि आप क्रोधित हैं, तो परिस्थिति को सम्बोधित करने से पहले प्रार्थना करें। साथ ही, यह भी समझाएँ कि नियम क्यों लागू किया गया है। हमेशा सम्बन्धों पर कार्य करें। अनुशासित करने के बाद, अपने बच्चे को याद दिलाएँ कि आप उनसे प्रेम करते हैं और वे बहुमूल्य हैं।
3. आयु के अनुसार उचित ज़िम्मेदारियाँ सौपें
ज़िम्मेदारी उठाने के लिये, उसके योग्य बनना पड़ता है, और उसके साथ यह ज़िम्मेदारी भी आती है कि उन कामों को भी न दें, जो बच्चे की योग्यता से परे हैं।
– छोटे बच्चे (2 से 4 वर्ष की आयु): खिलौने को उठा कर रखना, मेज को फिर से ठीक से कर देना।
– स्कूल की आयु से छोटे (3–6 आयु): बिस्तर ठीक करना, पालतू जानवरों को भोजन देना, प्लेटें उठाना।
– बड़े बच्चे (9 से 12 वर्ष की आयु): कपड़े धोना, सहज भोजन पकाना, जेब-खर्च का हिसाब रखना।
– किशोर: अपने पैसों का सदुपयोग करना और हिसाब रखना, परिवार के कार्यों में हाथ बँटाना और अपने समय की सारिणी बनाना।
बच्चों को दी गई वास्तविक ज़िम्मेदारियाँ उन्हें उस स्तर के लिये स्वावलंबी होना और ज़िम्मेदारी उठाना सिखाती हैं, जिस में वे विकसित हो रहे हैं।
4. समस्याओं का समाधान निकालने और निर्णय लेने के अवसर बना कर दें
बच्चों को ज़िम्मेदारी सिखाने के सर्वोत्तम तरीकों में से एक है उन्हें स्वयं ही परेशानियों के समाधान खोजने देना। उनके लिये हर बात को सुलझाने की बजाए, उनसे कहें, “तुम्हारे विचार से, तुम्हें इसके लिये क्या करना चाहिये?” उन्हें गलत निर्णयों के कारण उत्पन्न स्वाभाविक परिणामों का सामना (एक सीमा तक) कर लेने दें। जब वे सही निर्णय लेते हैं, तब उनके प्रयासों की सराहना करें। उन्हें नियन्त्रित करने के स्थान पर उन्हें प्रशिक्षित करने के द्वारा हम उन्हें वास्तविक जीवन में ज़िम्मेदारियाँ उठाने वाले बनाते हैं।
5. अपने जीवन से ज़िम्मेदारी का आदर्श बनें
हमें अपने बच्चों के लिये आदर्श बनना चाहिये। यदि आप चाहते हैं कि वे ज़िम्मेदारी निभाना सीखें, तो पहले हमें इसे अपने जीवनों में कर के दिखाना चाहिये। बच्चे जब भले कार्यों को देखेंगे, तब उनकी स्वाभाविक प्रतिक्रिया उन की नकल करने की होगी।
प्रभु में बच्चे की परवरिश करने का क्या अर्थ होता है?
बच्चे को ज़िम्मेदार होने की परवरिश देने के लिये, आप को उसे भला व्यवहार सिखाने की आवश्यकता नहीं है; आप को उन्हें यीशु का अनुसरण करने के लिये मार्गदर्शन और प्रोत्साहन देना चाहिये।
इफिसियों 6:4 हमें याद दिलाता है कि: “प्रभु की शिक्षा और चेतावनी देते हुए उनका पालन–पोषण करो।”
यह अनुवाद हमें बताता है कि ज़िम्मेदारी का अर्थ कार्यों को करना और अनुशासन नहीं हैं, बल्कि बच्चों को जीवन के प्रत्येक भाग में परमेश्वर से प्रार्थना करना सीखना चाहिये।
हम किस के बारे में बातें करते हैं:
– “प्रभु में बच्चे का पालन-पोषण करो” को परिभाषित करना।
– अनुशासित करने का कोई विषय, परमेश्वर के प्रेम और अनुग्रह को दिखाने और सिखाने के लिये उपयोगी कैसे बनाया जा सकता है?
– प्रेम और अनुशासन में सन्तुलन बनाने के लिये माता-पिता को कौन सी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है?
– हम अपने बच्चों को अपने विश्वास की ज़िम्मेदारी लेने में किस प्रकार से सहायता कर सकते हैं?
यह एक चुनौतीपूर्ण यात्रा तो है, किन्तु साथ ही बहुत सन्तुष्टि प्रदान करने वाली भी है।
प्रेम और अनुशासन के द्वारा बच्चों को ज़िम्मेदारी सिखाने में समय लगाने से, न केवल बच्चे अच्छे बनते हैं, परन्तु ऐसे धर्मी वयस्क भी हो जाते हैं जो अपने जीवनों में विश्वास और बुद्धिमानी लागू करते हैं।
परमेश्वर ने आप को आप के बच्चों के मन की ज़िम्मेदारी सौंपी है।
प्रत्येक सुधारना, प्रत्येक शिक्षा देना, प्रत्येक प्रोत्साहित करना वह बीज बोना है जो परमेश्वर के समय में उगकर बड़े होंगे।
इस सप्ताह, अपने माता-पिता होने के बारे में प्रार्थना करने में कुछ समय बिताएँ। परमेश्वर से माँगें कि वह आपको प्रेम के साथ ज़िम्मेदारी सिखाने की बुद्धिमानी दे। साथ ही धीरज और अनुशासन को भी माँगें, ताकि उन से उसके अनुग्रह को भी दिखा सकें। और अन्तिम, परन्तु सबसे छोटी बात नहीं, प्रार्थना करें कि आप एक नमूना बनने के द्वारा अगुवाई कर सकें।
ध्यान रखिये कि आप की विश्वासयोग्यता का भावी पीढ़ियों पर बहुत बड़ा प्रभाव पड़ेगा। इसलिये, आप को प्रतिबद्ध रहना है, प्रार्थना करनी है, और आपके बच्चे के जीवन के लिये, परमेश्वर पर भरोसा रखना है। “लड़के को उसी मार्ग की शिक्षा दे जिसमें उसको चलना चाहिए, और वह बुढ़ापे में भी उससे न हटेगा।” — नीतिवचन 22:6
भाग II: बाइबल के मूल्यों और चरित्र को अन्दर बैठाना
मुख्य वचन: व्यवस्थाविवरण 6:6-7
“और ये आज्ञाएँ जो मैं आज तुझ को सुनाता हूँ वे तेरे मन में बनी रहें; और तू इन्हें अपने बाल–बच्चों को समझाकर सिखाया करना, और घर में बैठे, मार्ग पर चलते, लेटते, उठते, इनकी चर्चा किया करना।”
ऐसा चरित्र स्थापित करना जो स्थाई बना रह सके
प्रत्येक माता-पिता की इच्छा होती है कि बच्चों को नम्र, सच्चे, और चरित्रवान बनाएँ। हम चाहते हैं कि वे सही निर्णय लेने वाले बनें, शिष्ट हों, और अन्ततः ऐसे लोग बनें जो अपने सभी कार्यों में परमेश्वर को आदर दें। एक ऐसे समाज में जो उपलब्धियों को सद्गुणों से अधिक बढ़कर मानता है, हम बाइबल के सिद्धान्तों को किस प्रकार से सम्मिलित कर सकते हैं?
उत्तर है शिक्षा देने और नमूना बनने के द्वारा।
व्यवस्थाविवरण 6:6-7 के अनुसार, हमें अपने बच्चों को परमेश्वर की आज्ञाएँ सिखानी हैं, न केवल इतवार के दिन कलीसिया में, परन्तु उनके दैनिक जीवनों में। जब हम उन्हें अपने शब्दों के साथ कार्यों के द्वारा भी सिखाते हैं, तब दयालुता, खराई, और ईमानदारी केवल शब्द नहीं रह जाते हैं।
बच्चों में सद्गुण वाला चरित्र डालना, इस प्रश्न के उत्तर पर निर्भर है कि उनके मनों को क्या प्रभावित करता है। यह उन्हें पालन करने के लिए उनसे रखी गई अपेक्षाओं की एक सूची पकड़ाना नहीं है। चरित्र को वयस्कों द्वारा पोषित किया, सुधारा, और सबसे महत्वपूर्ण बात, निर्धारित किया जाता है।
चलिये पता लगाते हैं कि मसीहियत को तथा विश्वास और नैतिकता को स्वीकार करने की इच्छा रखने वाले होने के लिए बच्चों को बड़ा करना कैसा होता है।
बच्चों को खराई, दयालुता, और ईमानदारी सिखाना
यह सबसे महत्वपूर्ण है कि हम बच्चों को ईमानदारी का गुण सिखाएँ। सच बोलने वाला होना अत्याधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि इस से भरोसे, खराई, और दृढ़ सम्बन्धों पर आधारित रिश्ते बनते हैं। ईमानदारी के बिना, सर्वोत्तम उद्देश्य भी अर्थ हीन हो जाते हैं।
बाइबल सच्चाई के महत्व के बारे में स्पष्ट है:
“झूठों से यहोवा को घृणा आती है, परन्तु जो विश्वास से काम करते हैं, उन से वह प्रसन्न होता है।” (नीतिवचन 12:22)
“जो खराई से चलता है वह निडर चलता है, परन्तु जो टेढ़ी चाल चलता है उसकी चाल प्रगट हो जाती है।” (नीतिवचन 10:9)
ईमानदारी सिखाना:
बच्चों में ईमानदारी विकसित होने के लिये, उन्हें पहले उसे अपने माता-पिता से सीखना होगा। यदि आप कोई गलती करें तो उसे स्वीकार कर लें, और यदि कुछ ऐसा है जिसे आप नहीं जानते हैं, तो उसके बारे में सुस्पष्ट रहें। जब एक बच्चा सच बोलता है, वह चाहे जितना भी कठिन क्यों न हो, परन्तु उसकी ईमानदारी की सराहना कीजिये और उन्हें समझाइए कि यही करना हमेशा सर्वोत्तम होता है। अपने बच्चों को सिखाएँ कि झूठ बोलने से औरों का भरोसा जाता रहता है। उनके साथ बाँटिए कि किस प्रकार से किसी को धोखा देना सरल लग सकता है, परन्तु उससे और भी अधिक समस्याएँ उत्पन्न होती हैं। आप झूठ और सच को बोलने से सम्बन्धित बाइबल के पदों पर चर्चा कर सकते हैं और समझा सकते हैं कि यह परमेश्वर के लिये इतना महत्वपूर्ण क्यों है। जब बच्चे यह समझने लगते हैं कि ईमानदारी से भरोसा बढ़ता है और उससे स्वतन्त्रता आती है, तो उनमें वे सकारात्मक आदतें विकसित होंगी जो जीवन भर उनका मार्गदर्शन करेंगी।
दयालुता: औरों से यीशु के समान प्रेम करना
ऐसे संसार में जो दयाहीन प्रतीत हो सकता है, मसीह की दयालुता, पृथ्वी पर उसके जीवन की सबसे सामर्थी अभिव्यक्ति थी। यह शिष्टता से बढ़कर होता है; इसमें स्वेच्छा और प्रेम के साथ औरों की सेवा करने का चुनाव करना सम्मिलित होता है, फिर उसकी कीमत चाहे जो भी हो।
बाइबल में हमें दयालु होने की आज्ञा दी गई है:
“एक दूसरे पर कृपालु और करुणामय हो, और जैसे परमेश्वर ने मसीह में तुम्हारे अपराध क्षमा किए, वैसे ही तुम भी एक दूसरे के अपराध क्षमा करो।” (इफिसियों 4:32)
“जैसा तुम चाहते हो कि लोग तुम्हारे साथ करें, तुम भी उनके साथ वैसा ही करो।” (लूका 6:31)
दयालुता सिखाना:
यह सुनिश्चित करें कि आप के बच्चे आप की दयालुता के गवाह हों – लोगों से नम्रता से बोलना, धीरजवन्त बने रहना, तब भी सहायता करना, जब सहायता माँगी नहीं जा रही है। अपने बच्चों के सामने चुनौती रखें कि दयालुता के कार्यों को करने के अवसरों की खोज में रहें – अपने भाई-बहन की सहायता करना, किसी मित्र को सान्त्वना देना, किसी ऐसे से, जो अकेला अनुभव कर रहा है मृदु-भाव दिखाना। यदि कोई बच्चा असभ्य या स्वार्थी होता है, तो इसे शिक्षा देने का अवसर बनाएँ। उससे पूछें कि, “यदि कोई तुम्हारे साथ ऐसे व्यवहार करे, तो तुम्हें कैसा लगेगा?” परिवार के अन्दर, निर्णय लें कि एक समूह के रूप में दयालु किस तरह से रहा जा सकता है, जैसे कि प्रोत्साहक सन्देश लिखना, पड़ोसी की सहायता करना, अन्य लोगों के लिये बिचवई का कार्य करना। किसी कार्य को करने के बजाए, दयालुता अधिक गहरी एवं गम्भीर होती है। जब हम अपने बच्चों को यीशु के समान प्रेम करने का मार्गदर्शन देते हैं, तब हम उन्हें भलाई करने की, और जिस समाज में वे रहते हैं, उसमें एक सकारात्मक परिवर्तन लाने की योग्यता देते हैं।
खराई: वह करना जो सही है, तब भी जब कोई भी नहीं देख रहा है
खराई, सही को चुनना है, तब भी जब उससे परेशानी हो। यह एक ऐसा नैतिक अनुशासन रखना है, जो निर्णय लेने को दिशा निर्देश देता है, इसलिये नहीं क्योंकि दण्ड मिलने की सम्भावना है, बल्कि इसलिये क्योंकि सही कार्य करने के लिये प्रतिबद्धता चाहिये होती है।
पवित्रशास्त्र में खराई पर अनेकों बार बल दिया गया है:
“सीधे लोग अपनी खराई से अगुवाई पाते हैं, परन्तु विश्वासघाती अपने कपट से नष्ट होते हैं।” (नीतिवचन 11:3)
“इसलिये तुम चाहे खाओ, चाहे पीओ, चाहे जो कुछ करो, सब कुछ परमेश्वर की महिमा के लिये करो।” (1 कुरिन्थियों 10:31)
खराई सिखाना:
यदि वे कहते हैं कि वे कुछ करेंगे, तो उन्हें उसे करने के लिये प्रोत्साहित करें। खराई छोटी प्रतिबद्धताओं से आरम्भ होती है। जब वे बेईमानी और अन्याय को देखें, तब उन्हें प्रेम के साथ सत्य बोलना सिखाएँ। जब वे गलती करें, तो उनका मार्गदर्शन करें कि बहाने बनाने या औरों को दोष देने के स्थान पर ज़िम्मेदारी लेना सीखें। जब कठिन होने के बावजूद आप का बच्चा सही चुनाव करे, तो उस पर ध्यान दें, और उनके निर्णय की पुष्टि करें। जब हमें कोई नहीं देख रहा होता है, तब हम जो होते हैं, वही खराई है। जब बच्चे खराई की कीमत सीखते हैं, तब वे परमेश्वर को आदर देने वाले बुद्धिमानी के निर्णय लेंगे, तब भी जब यह सरल नहीं भी हो।
बाइबल के मूल्यों को दैनिक जीवन में जीना
भक्तिपूर्ण चरित्र डालना, एक विस्तृत वार्तालाप करना नहीं है—यह प्रतिदिन उचित शिक्षा देते रहने के बारे में है।
व्यवस्थाविवरण 6:6-7 एक सीधा सा, परन्तु सामर्थी निर्देश देता है: “और ये आज्ञाएँ जो मैं आज तुझ को सुनाता हूँ वे तेरे मन में बनी रहें; और तू इन्हें अपने बाल–बच्चों को समझाकर सिखाया करना, और घर में बैठे, मार्ग पर चलते, लेटते, उठते, इनकी चर्चा किया करना।”
इसका अर्थ है कि, ईमानदारी, दयालुता, और खराई सिखाना केवल बाइबल अध्ययन के समय तक ही सीमित नहीं है। यह इन परिस्थितियों में भी किया जा सकता है:
– भोजन की मेज पर – जीवन के वास्तविक उदाहरणों के आधार पर मूल्यों के बारे में बात करने के द्वारा।
– स्कूल जाते समय – अपने सहपाठियों के प्रति दयालुता दिखाने को प्रोत्साहित करने के द्वारा।
– अनुशासित किये जाने के समय – बुरे व्यवहार के लिये केवल दण्ड देने की बजाए, ज़िम्मेदारी सिखाना।
– असफलता के पलों में – अनुग्रह दिखाने और उन्हें बेहतर चुनाव करने की ओर मार्गदर्शन करते समय।
विश्वास और चरित्र एक के बाद एक पल में, क्रमवार बनाए जाते हैं—जीवन के सामान्य दैनिक भागों में।
उदाहरण के द्वारा मार्गदर्शन: मसीह के समान व्यवहार का नमूना बनना
मुख्य वचन: 1 कुरिन्थियों 11:1
“तुम मेरी सी चाल चलो जैसा मैं मसीह की सी चाल चलता हूँ।”
माता-पिता के रूप में उदाहरण की सामर्थ्य
बच्चे हमेशा देखते रहते हैं। हम जो कहते हैं, वे उसे सुनते हैं, परन्तु उससे भी अधिक, हम जो करते हैं, वे उसे देखते हैं। हमारे तनाव के साथ व्यवहार करने से लेकर औरों के प्रति हमारे व्यवहार करने तक, हमारे बच्चे हमें देखते हैं कि हम अपने प्रतिदिन के जीवन को किस प्रकार से जीते हैं।
मसीही माता-पिता होने के नाते, अपने बच्चों को सिखाने के लिये, सबसे महत्वपूर्ण तरीका हमारा मसीह के समान व्यवहार करने का नमूना बनना है। हम उनसे दृढ़ विश्वास, दयालुता, धीरज, और ईमानदारी विकसित करने की आशा तब तक नहीं रख सकते हैं, जब तक वे इन गुणों को पहले हमारे जीवनों में न देखें।
पौलुस इस बात को समझता था, और उसने कुरिन्थियों से कहा, “तुम मेरी सी चाल चलो जैसा मैं मसीह की सी चाल चलता हूँ।” (1 कुरिन्थियों 11:1)।वह यह नहीं कह रहा था कि वह सिद्ध था—वह कह रहा था कि उसका जीवन, उद्देश्य के साथ, मसीह पर केन्द्रित था। हमें अपने बच्चों के लिये इसी प्रकार का उदाहरण बनने के लिये कहा गया है।
सत्य यही है कि हमें सिद्ध माता-पिता होने के लिये नहीं बुलाया गया है। परन्तु अपने विश्वास को जी कर दिखाने में हमें सुसंगत, वास्तविक, और उद्देश्यपूर्ण होना ही चाहिये। जब हमारे बच्चे हमें सच में परमेश्वर के साथ चलते हुए देखेंगे—केवल उससे बात करते हुए नहीं—तो एक सामर्थी रीति से यह उनके विश्वास को स्वरूप प्रदान करेगा।
मसीह के समान व्यवहार का नमूना बनने का क्या अर्थ है?
मसीह के समान व्यवहार का नमूना बनने का अर्थ पवित्र होने का नाटक करना या हर बात की समझ रखना नहीं है। यह एक ऐसा जीवन जीना है जो यीशु को दिखाता है, प्रतिदिन के छोटे-छोटे पलों में भी।
इसका अर्थ है:
– खिसियाहट की प्रतिक्रिया देने के स्थान पर, अनुग्रह प्रदर्शित करना।
– जब बातें योजना के अनुसार न हो रहीं हों, तब भी धैर्य दिखाना।
– जब हम विचलित होते हैं, तब भी दयालुता के साथ वार्तालाप करना।
– चाहे झूठ बोलना सहज ही क्यों न हो, परन्तु फिर भी ईमानदार बने रहना। असुविधाजनक होने पर भी, औरों को प्राथमिकता देना।
हमारे बच्चों को केवल नियमों की आवश्यकता नहीं है—उन्हें यह देखना है कि ये मूल्य वास्तविक जीवन में किस प्रकार से जिये जाते हैं। उन्हें यह दिखाने की आवश्यकता है कि किस प्रकार से हमारा विश्वास, हमारे निर्णयों, रवैये, और सम्बन्धों को निर्धारित करता है।
1. दैनिक जीवन में विश्वास का नमूना बनना
विश्वास केवल इतवार को सिखाई जाने वाली बात नहीं है—इसे हमारे दैनिक जीवन का अभिन्न अंग होना चाहिये।
दैनिक जीवन में विश्वास को किस तरह से दिखाएँ:
सबके सामने प्रार्थना करने से आप के बच्चे आप को प्रार्थना करते हुए देख पाते हैं—केवल भोजन से पहले ही नहीं, बल्कि तनाव, कृतज्ञता, और निर्णय लेने के पलों में भी। जब आप प्रतिदिन बाइबल को पढ़ते हैं, तो बच्चे देखते हैं कि बाइबल आप के लिये महत्वपूर्ण है, और वे अपने जीवनों में उसके महत्व को समझेंगे। आप को स्वाभाविक रीति से परमेश्वर के बारे में भी बात करनी होगी। बताइये कि वह किस प्रकार से आप के जीवन में कार्य कर रहा है, अपने विश्वास से सम्बन्धित प्रश्नों के उत्तर दीजिये, और पवित्रशास्त्र को जीवन की वास्तविक परिस्थितियों के साथ सम्बन्धित कीजिये।
जब विश्वास आप के घर का एक स्वाभाविक भाग होगा, तब आप के बच्चे देखेंगे कि यीशु के पीछे चलना केवल एक धारणा नहीं है—यह एक जीवन-शैली है।
2. नम्रता और अनुग्रह के साथ अगुवाई करना
मसीह के समान व्यवहार का नमूना बनने के सबसे महत्वपूर्ण तरीकों में से एक नम्रता दिखाना है।
हमें अपने बच्चों के लिये सिद्ध नहीं होना है; हमें उनके लिये वास्तविक होना है। उन्हें यह दिखना चाहिये कि जब भी हमसे गलतियाँ हो जाती हैं, हम ज़िम्मेदारी लेते हैं, क्षमा माँगते हैं, और परमेश्वर के अनुग्रह पर भरोसा करते हैं।
नम्रता दिखाने के व्यावहारिक तरीके:
अपनी गलतियों को मान लेना, बच्चों को सिखाता है कि गलती मान लेना कमज़ोरी का नहीं, सामर्थ्य का चिन्ह है। नम्रता दिखाने का एक अन्य तरीका है, क्षमा माँग लेना, चाहे अपने बच्चे से ही क्यों न माँगनी पड़े। जब हम अपने बच्चों से क्षमा माँगते हैं, तो यह उन्हें दिखाता है कि कार्यकारी रूप में अनुग्रह कैसा दिखता है। और सबसे महत्वपूर्ण बात, परमेश्वर पर भरोसा रखें। वे यह देखने पाएँ कि आप बुद्धिमानी, सामर्थ्य, और धीरज के लिये परमेश्वर पर निर्भर रहते हैं। यीशु विनम्र था, और हमारे बच्चे नम्रता सबसे अच्छे से तब सीखते हैं, जब वे उसे हम में देखते हैं।
3. दयालु तथा कृपालु होना कार्यों के द्वारा सिखाएँ
हम अपने बच्चों से दयालु होने के लिये कह सकते हैं, परन्तु वे उसे तब ही सच में सीख पाएँगे, जब वे देखेंगे कि हम उसे जी कर दिखाते हैं।
दयालुता और कृपालु होने के नमूने किस प्रकार से बनें:
औरों के बारे में दयालुता के साथ बोलें। बकवाद तथा नकारात्मक वार्तालाप न करें—आप के बच्चे इस पर ध्यान करेंगे। वरन् साथ मिलकर, परिवार के समान सेवकाई करने पर केन्द्रित रहें। जो आवश्यकता में हैं, उनकी सहायता करने के तरीके खोजें, चाहे स्वयं-सेवा, पड़ोसी की सहायता, या किसी के लिये प्रार्थना करने के द्वारा। आप को धीरजवन्त और कोमल होना चाहिये। कठिन परिस्थितियों के प्रति हमारी प्रतिक्रिया हमारे बच्चों को सिखाती है कि अपनी कुण्ठा से वे किस प्रकार से व्यवहार करें । यीशु ने हमेशा प्रेम और सहानुभूति के साथ अगुवाई की—और जब हम भी ऐसा ही करते हैं, हमारे बच्चे, हमारा अनुसरण करेंगे।
4. बड़े और छोटे तरीकों से ईमानदारी दिखाना
ईमानदारी, तब भी सही बात करना होता है, जब कोई देख नहीं रहा होता है। यदि हम चाहते हैं कि हमारे बच्चे दृढ़ चरित्र के साथ बड़े हों, तो उन्हें हम में ईमानदारी दिखनी चाहिये।
ईमानदारी का नमूना बनने के तरीके:
सच्चे रहिये, छोटी-छोटी बातों में भी—जैसे तब जब दुकानदार आप को अधिक पैसे लौटा देता है—ईमानदारी चुनना बच्चों को सिखाता है कि सत्य का महत्व है।
प्रतिबद्धताओं का पालन करें। यदि आप कुछ करने का वायदा करते हैं, तो उसे पूरा कीजिये। यह दिखाता है कि हमारे शब्दों की कीमत है। और, सभी के साथ आदर पूर्वक व्यवहार करें। सेवकों से लेकर सहकर्मियों और अजनबियों तक, हमारे बच्चे ध्यान करते हैं कि हम लोगों से कैसे व्यवहार करते हैं। जब ईमानदारी जीवन का एक सामान्य भाग होगी, बच्चे सीखेंगे कि परमेश्वर को आदर देना औरों से अनुमोदन प्राप्त करने से अधिक महत्वपूर्ण है।
5. विश्वास के द्वारा कठिन परिस्थितियों से व्यवहार करना
जीवन हमेशा ही सहज नहीं होता है, और हमारे बच्चों को चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। हम जिस तरह से तनाव, निराशाओं, और कठिनाइयों का सामना करते हैं, वह उन्हें शब्दों से कहीं अधिक बढ़कर सिखाता है।
– क्या आप आतंकित हो जाते हैं, या आप प्रार्थना करते हैं?
– क्या आप शिकायतें करते हैं, या आप परमेश्वर पर भरोसा रखते हैं?
– क्या आप औरों पर दोष लगाते हैं, या आप ज़िम्मेदारी लेते हैं?
यदि हम चाहते हैं कि हमारे बच्चे कठिन समयों में परमेश्वर पर निर्भर रहें, तो पहले उन्हें यह हमें करते हुए देखना होगा।
व्यावहारिक उदाहरण: जब कुछ तनावपूर्ण घटित हो जाता है, तब कहिये: “मुझे नहीं पता कि इसका समाधान क्या होगा, परन्तु मुझे विश्वास है कि नियन्त्रण परमेश्वर के हाथों में है। चलो, हम साथ मिलकर प्रार्थना करते हैं।”
यह एक साधारण सा पल आप के बच्चे को सिखाता है कि विश्वास केवल अच्छे समयों में ही नहीं किया जाता है—उसे प्रत्येक परिस्थिति में करना होता है।
चर्चा: हमारे कार्य, हमारे बच्चों के विश्वास को किस तरह से स्वरूप देते हैं?
- कुछ ऐसे तरीके कौन से हैं जब बच्चे शब्दों से अधिक, कार्यों द्वारा सीखते हैं?
- यदि आप अपने बच्चे के सामने कोई गलती कर देते हैं, तो आप उसके लिये क्या प्रतिक्रिया देते हैं?
- मसीह के समान व्यवहार को आप और भी अधिक उद्देश्यपूर्ण रीति से किस प्रकार दिखा सकते हैं?
- अपनी कौन सी आदतों के लिये आप चाहते हैं कि, आप को देखते हुए, आप का बच्चा भी उन्हें अपनाए?
मसीह के उदाहरण के समान जीना
कोई भी माता-पिता सिद्ध नहीं होते हैं। हम सभी पर कुण्ठा, अधीरता, और असफलता के समय आते हैं। परन्तु जिसका वास्तव में महत्व है, वह है सुसंगत और विश्वसनीय बने रहना।
हमारे बच्चों को यह दिखना चाहिये कि हम बड़े और छोटे, दोनों तरीकों से परमेश्वर से प्रेम करते हैं। आप को ईमानदारी, दयालुता, और नम्रता के साथ जीवन भी जीना चाहिये।
इस सप्ताह, एक ऐसी बात को चुनें, जिसमें आप एक नमूना बनकर अगुवाई करना चाहते हैं। चाहे वह धीरजवन्त होना, दयालुता दिखाना, या अधिक खुलकर प्रार्थना करना हो, याद रखें:
आप के बच्चे आप को देख रहे हैं। और जो वे आप में देखेंगे, वही निर्धारित करेगा कि वे क्या बनेंगे।
“तुम मेरी सी चाल चलो जैसा मैं मसीह की सी चाल चलता हूँ” — 1 कुरिन्थियों 11:1
भाग III: अनुशासन, सुधारना, और प्रोत्साहित करना
मुख्य वचन: इब्रानियों 12:11
“वर्तमान में हर प्रकार की ताड़ना आनन्द की नहीं, पर शोक ही की बात दिखाई पड़ती है; तौभी जो उसको सहते–सहते पक्के हो गए हैं, बाद में उन्हें चैन के साथ धर्म का प्रतिफल मिलता है।”
अनुशासन को अनुग्रह से सन्तुलित करना
माता-पिता के लिये अनुशासन बनाए रखना कठिन हो सकता है। यद्यपि यह सबसे कठिन कार्य हो सकता है, परन्तु यह बच्चों की अच्छी परवरिश के लिये सबसे महत्वपूर्ण बात भी हो सकती है। हम अपने बच्चों से बहुत प्यार करते हैं और उन्हें सही मार्ग पर चलने का मार्गदर्शन देना चाहते हैं। इसलिये, उन्हें अनुग्रह के साथ सुधारना एक चुनौती हो सकती है।
कुछ माता-पिता अनुशासन पर बहुत अधिक ध्यान केन्द्रित रखते हैं, और वे नियम और परिणाम स्थापित करने लग जाते हैं। अन्य, इसकी अनदेखी करते हैं, इस आशा में कि बच्चे बड़े होते समय स्वयं ही सुधर भी जाएँगे। परन्तु इन दोनों में से कोई भी छोर, परमेश्वर के मन के अनुसार नहीं है।
परमेश्वर हमें अनुशासित करता है—क्रोध के नहीं, बल्कि प्रेम के कारण। वह हमारी उन्नति के लिये हमें सुधारता है न कि हमें लज्जित करने के लिये। इब्रानियों 12:11 हमें बताता है कि अनुशासन कठोर हो सकता है, परन्तु वही धार्मिकता और शान्ति की कुँजी है। हमें अपने बच्चों से यही चाहिये: केवल आज्ञाकारिता नहीं बल्कि ईश्वरीय बुद्धि वाला मन।
यदि प्रेम और अनुग्रह के साथ किया जाए, तो अनुशासन बच्चों की परमेश्वर के सत्य में निरन्तर अगुवाई करते हुए, उन्हें जवाबदेही, आत्म-नियन्त्रण, और आदर में प्रशिक्षित कर सकता है।
जब यह प्रेम और अनुग्रह में किया जाता है, तब अनुशासन बच्चों की जवाबदेही, आत्म-नियन्त्रण, और आदर में अगुवाई करता है, और उन्हें परमेश्वर के सत्य को दिखाता है।
तो चलिये, उन तरीकों को देखते हैं, जिनसे हम अनुशासन को सुरक्षित रीति से लागू कर सकते हैं, ताकि वह बढ़ोतरी के अवसर का कार्य करे, न कि केवल दण्ड देने के।
अनुशासन के उद्देश्य को समझना
अनुशासन बच्चों पर अधिकार रखना नहीं है—यह हमारे जीने की शैली में बुद्धिमानी के बारे में है। वास्तव में, बाइबल बिल्कुल स्पष्ट है कि अनुशासन बढ़ोतरी का एक अनिवार्य भाग है:
“जो बेटे पर छड़ी नहीं चलाता वह उसका बैरी है, परन्तु जो उस से प्रेम रखता, वह यत्न से उसको शिक्षा देता है।” (नीतिवचन 13:24)
“क्योंकि यहोवा जिस से प्रेम रखता है उसको डाँटता है, जैसे कि बाप उस बेटे को जिसे वह अधिक चाहता है।” (नीतिवचन 3:12)
धार्मिकता-पूर्ण अनुशासन का अर्थ बच्चों को भय में बड़ा करना या फिर उनकी आत्मा को तोड़ देना नहीं है। वह उनके मनों को प्रेम करने तथा सही बात का चुनाव करने के लिये प्रशिक्षित करना है।
हम अनुशासित करते हैं, क्योंकि:
– हम उनसे प्रेम करते हैं। जिस प्रकार परमेश्वर हमारी भलाई के लिये हमें अनुशासित करता है, हम भी उनका मार्गदर्शन करने के लिये अपने बच्चों को अनुशासित करते हैं।
– हम चाहते हैं कि वे बुद्धिमानी में बढ़ें। बिना सुधारे, बच्चे सही और गलत के मध्य अन्तर समझने में संघर्ष करते रहेंगे।
– हम उन्हें सुरक्षित रखना चाहते हैं। सीमाएँ, दीवारें नहीं हैं—वे अनावश्यक दुःख उठाने से बचाव के लिये सुरक्षा हैं।
–अनुशासन को कभी भी क्रोध या खिसियाहट से सम्बन्धित नहीं होना चाहिये—उसे हमेशा प्रेम और बढ़ोतरी के लिये होना चाहिये।
दण्ड और अनुशासन में अन्तर
एक सबसे बड़ी गलती जिसे माता-पिता करते हैं, वह है दण्ड को अनुशासन समझ लेना (शब्द ‘को’ उनके उद्देश्य की तुलना को बेहतर व्यक्त करता है)।
दण्ड पिछले व्यवहार पर ध्यान केन्द्रित करता है। बच्चे ने जो गलती की थी, यह उसके लिये उसे दुःख देना है। जबकि अनुशासन भावी व्यवहार पर ध्यान केन्द्रित करता है। यह बच्चे को आगे बढ़ते हुए, बेहतर चुनाव करने का तरीका सिखाता है।
उदाहरण:
एक बच्चा गृह-कार्य पूरा कर लेने के बारे में झूठ बोलता है। उनको दण्ड देने के लिये, उनके सबसे प्रिय खिलौने को उनसे ले लेना, उनके गृह-कार्य को पूरा नहीं कर देगा। इसकी बजाए, उन्हें एक परिणाम देना, जैसे कि खेलने के समय से पहले गृह-कार्य पूरा करना, उन्हें ज़िम्मेदारी लेने के लिये प्रोत्साहित करेगा। परमेश्वर हमें धार्मिकता में ले जाने के लिये हमें अनुशासित करता है—न कि हमें हानि पहुँचाने के लिए। यही हमारे लिये नमूना है कि हमें अपने बच्चों को किस प्रकार से सुधारना चाहिये।
अनुग्रह के साथ सुधारने के व्यावहारिक तरीके
परमेश्वर का अनुशासन दोनों, दृढ़ और प्रेम सहित होता है। वह अपेक्षाओं को स्पष्ट बताता है साथ ही गलती करने पर अनुग्रह भी दिखाता है।
बुद्धिमानी के साथ अनुशासित करने के लिए ये कुछ व्यवहारिक कदम हैं:
1. स्पष्ट और सुसंगत सीमाएँ स्थापित करें
बच्चों को यह जानना चहाइए कि उनसे क्या आशा रखी गई है। अस्पष्ट नियम असमंजस और खिसियाहट को उत्पन्न करते हैं।
– घर के नियमों को बाइबल पर आधारित करके बनाएँ।
– नियमों के पीछे के “कारण” को समझाएँ। (उदाहरण: “हम दयालुता के साथ इसलिये बोलते हैं क्योंकि परमेश्वर चाहता है कि हम औरों से प्रेम करें।”)
– सुसंगत रहें। यदि हर बार परिणाम बदलते रहेंगे, तो बच्चे अपेक्षाओं के प्रति अनिश्चित हो जाएँगे।
सीमाएँ सुरक्षा प्रदान करती हैं—बच्चे नियमों का प्रतिरोध तो कर सकते हैं, परन्तु अपने अन्दर वे सुरक्षित अनुभव करते, उन्हें पता होता है कि एक ढाँचा है।
2. ऐसे परिणामों का प्रयोग करें जो सिखाते हैं, न कि केवल दण्ड देते हैं
परिणाम उचित, वैध, और की गई बात से सम्बन्धित होने चाहिएँ।
– यदि बच्चा सब्जियाँ खाने का प्रतिरोध करता है, तो उनके मन के अनुसार कुछ भी (मिठाई भी) खा लेने के अधिकार को कुछ समय के लिये हटा देना चाहिये।
– यदि वे असभ्य व्यवहार करते हैं, तो उन्हें क्षमा पाने के लिये एक निवेदन लिखना चाहिये ताकि वे ज़िम्मेदारी के निर्वाह का अभ्यास कर सकें।
यह उन्हें दुःखी अनुभव करवाने के लिये नहीं है—बल्कि उन्हें ज़िम्मेदारी और बुद्धिमानी सिखाने के लिये है।
3. शान्त आत्मा के साथ सुधारिये, न कि क्रोध के साथ
जब बच्चे असभ्य व्यवहार करते हैं, तब भावनात्मक प्रतिक्रिया देना सहज होता है। परन्तु, अनुशासन तब ही सबसे अधिक सहायक होता है जब वह शान्त और उद्देश्यपूर्ण हो।
– प्रतिक्रिया देने से पहले थोड़ा सा ठहरें। विषय को सम्बोधित करने से पहले लम्बी साँस लें, प्रार्थना करें, और तब कार्यवाही करें।
– अपनी आवाज़ नीची रखें। चिल्लाने से तुरन्त आज्ञाकारिता तो मिल सकती है, परन्तु यह भय सिखाता है, आदर नहीं। – प्रश्न पूछिये। बजाए इसके कि, “तुमने यह क्यों किया?!” यह करके देखिए, “क्या हुआ? अगली बार तुम क्या भिन्न कर सकते हो?”
अनुशासन सबसे प्रभावी तब ही होता है जब वह प्रेम के स्थान से किया जाता है, न कि खिसियाहट से।
प्रोत्साहन: अनुशासन का दूसरा पहलू
सुधारना महत्वपूर्ण है, परन्तु प्रोत्साहित करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। बच्चों ने जो गलत किया है, उन्हें केवल वही नहीं सुनना—वे जो सही कर रहे हैं, उन्हें वह भी पता होना चाहिये।
अपने बच्चे को प्रोत्साहित किस प्रकार करें:
उनके प्रयासों की सराहना कीजिये, न कि केवल परिणामों की। यदि वे ईमानदार होना चाहें, परन्तु उन्हें संघर्ष करना पड़ता है, तो भी उनके प्रयासों की सराहना कीजिये और निरन्तर बढ़ोतरी को प्रोत्साहित कीजिये। उन पर जीवन के शब्द बोलिये, बजाए यह कहने के कि, “तुम हमेशा काम बिगाड़ते हो,” कहिये, “मुझे पता है कि तुम अगली बार इससे बेहतर चुनाव कर सकते हो।” और बढ़ोतरी के लिये आनन्दित होने को न भूलें। जब वे कोई सही चुनाव करें, तो उसका अनुमोदन करें।
बिना प्रोत्साहन के अनुशासन से निराशा उत्पन्न होती है, परन्तु जब सुधार पुष्टि के साथ किया जाता है, तो बच्चे उन्नति करते हैं।
यीशु: अनुशासन और अनुग्रह का सिद्ध उदाहरण
यीशु ने सुधार और अनुग्रह के सही अनुपात का सिद्ध नमूना दिखाया। उसने कभी पाप की अवहेलना नहीं की, परन्तु उसने बिना प्रेम और बहाली के, भर्त्सना भी नहीं की।
उदाहरण: व्यभिचार में पकड़ी गई स्त्री (यूहन्ना 8:1-11) जब एक स्त्री पाप करते हुए पकड़ी गई, फरीसी उसे कठोर दण्ड देना चाहते थे। परन्तु यीशु ने सत्य और अनुग्रह, दोनों के साथ प्रतिक्रिया दी।
– उसने उसकी की हुई गलती को स्वीकार किया (“जा और फिर पाप न करना”)।
– परन्तु उसने दया भी दिखाई (“मैं भी तुझ पर दोष नहीं लगाता।”)
यह धार्मिकता-पूर्ण अनुशासन का मन है: अर्थात् बिना कुचले सुधारना, बिना लज्जित किये मार्गदर्शन करना।
चर्चा: हम प्रेम के साथ अनुशासित किस तरह से कर सकते हैं?
- अनुशासित करने और दण्ड देने में क्या अन्तर है?
- अपने घर में आप सुधारने और प्रोत्साहन देने के मध्य सन्तुलन किस प्रकार रखते हैं?
- हम बच्चों को ज़िम्मेदार बनाए रखने के साथ ही, उनके लिये परमेश्वर के अनुग्रह का नमूना किस प्रकार
से हो सकते हैं? - और भी अधिक बुद्धिमानी तथा प्रेम के साथ अनुशासन बनाए रखने के लिये आप कौन सा एक बदलाव
ला सकते हैं?
प्रेम और सत्य के साथ बच्चों की परवरिश करना
अनुशासन कभी सरल नहीं होता है, परन्तु हम अपने बच्चों के लिये जो प्रेमपूर्ण व्यवहार कर सकते हैं, यह उनमें से एक सर्वाधिक प्रेमपूर्ण बात है। यह उन्हें ज़िम्मेदारी, बुद्धिमानी, और परमेश्वर के मार्गों पर चलने के महत्व को सिखाता है।
इस सप्ताह, परमेश्वर से माँगे कि:
– प्रेम के साथ सुधारने के लिये धैर्य।
– सार्थक और उचित परिणाम स्थापित करने के लिये बुद्धिमानी।
– प्रोत्साहित करने का अनुग्रह, सुधार करते समय भी।
परमेश्वर सिद्ध पिता है, और वह हमारी भलाई के लिये हमें प्रेम के साथ सुधारता है। जब हम अपने बच्चों को अनुशासित करते हैं, तब हम याद रखें कि हमारा लक्ष्य केवल आज्ञाकारिता नहीं है—बल्कि यह मनों को यीशु का अनुसरण करने के लिये तैयार करना है।
“वर्तमान में हर प्रकार की ताड़ना आनन्द की नहीं, पर शोक ही की बात दिखाई पड़ती है; तौभी जो उसको सहते–सहते पक्के हो गए हैं, बाद में उन्हें चैन के साथ धर्म का प्रतिफल मिलता है।”—इब्रानियों 12:11
जवाबदेह होना तथा परिणामों को सिखाना
मुख्य वचन: गलातियों 6:7
“धोखा न खाओ; परमेश्वर ठट्ठों में नहीं उड़ाया जाता, क्योंकि मनुष्य जो कुछ बोता है वही काटेगा।”
माता-पिता का दायित्व निभाने में जवाबदेह होने का महत्व क्यों है
अपने बच्चों को जो सबसे महत्वपूर्ण शिक्षाएँ हम दे सकते हैं, उनमें से एक है कि उनके कार्यों के परिणाम होते हैं। ऐसे संसार में जो औरों को दोषी ठहराने, बहाने बनाने, और दावा करने को प्रोत्साहित करता है, बाइबल के अनुसार माता-पिता का दायित्व निभाना जवाबदेह होना सिखाता है—अपने चुनावों के लिये ज़िम्मेदारी लेना और उन से सीखना।
बचपन के आरम्भिक दिनों से ही, बच्चे सीमाओं को परखते हैं। वे सीमा लाँघने के प्रयास करते हैं, गलतियाँ करते हैं, और कभी-कभी ज़िम्मेदारी से बचने के प्रयास करते हैं। माता-पिता होने के नाते प्रलोभन बना रहता है कि या तो उन्हें बचा कर रखें, या खिसियाहट की प्रतिक्रिया दें—परन्तु इन दोनों में से कोई सी भी बात, बढ़ने में उनकी सहायता नहीं करती है।
परमेश्वर, हमारे पिता के रूप में, न तो हमारी गलतियों की अनदेखी करता है और न ही क्रोध में आकर हमें अनुशासित करता है। बल्कि, वह प्रेम के साथ हमें सुधारता है, ताकि हमारे चरित्र को बना सके। इसी प्रकार से जवाबदेही सिखाना भी नियन्त्रित रखने या दण्ड देने के बारे में नहीं होना चाहिये—वरन् उससे हमारे बच्चों को मार्गदर्शन मिलना चाहिये जिससे वे बुद्धिमान, ज़िम्मेदार, और धर्मी वयस्क बनें।
जवाबदेही केवल “मुझे क्षमा करें” कहने के बारे में ही नहीं होती है—यह अपने चुनावों को स्वीकार करने, बातों को ठीक करने, और अपनी गलतियों से सीखकर बढ़ने के बारे में होती है। बच्चे जब यह समझते हैं, तब वे ऐसे वयस्क बनते हैं जो जीवन की चुनौतियों के साथ बुद्धिमानी और ईमानदारी से व्यवहार करते हैं।
बाइबल पर आधारित जवाबदेही की नींव
बाइबल स्पष्ट है: हमारे चुनावों के परिणाम होते हैं, भले और बुरे, दोनों ही।
“सीधे लोग अपनी खराई से अगुवाई पाते हैं, परन्तु विश्वासघाती अपने कपट से नष्ट होते हैं।” (नीतिवचन 11:3)
“जो अपने अपराध छिपा रखता है,उसका कार्य सफल नहीं होता,परन्तु जो उनको मान लेता और छोड़ भी देता है,उस पर दया की जायेगी।” (नीतिवचन 28:13)
“मनुष्य जो कुछ बोता है वही काटेगा।” (गलातियों 6:7)
परमेश्वर की रूपरेखा स्पष्ट है: जब हम भले चुनाव करते हैं, तब हमें भले परिणाम प्राप्त होते हैं। जब हम बुरे चुनाव करते हैं, तब हमें उनके स्वाभाविक परिणाम झेलने पड़ते हैं।
माता-पिता होने के नाते यह हमारी ज़िम्मेदारी है कि हम इस सिद्धान्त को ऐसे लागू करें जो बुद्धिमानी सिखाए—भय, लज्जा, या कठोर दण्ड के द्वारा नहीं, बल्कि प्रेमपूर्ण सुधार, सुस्पष्ट मार्गदर्शन, और स्वाभाविक परिणामों को उनका कार्य करने देने के द्वारा।
जवाबदेही और परिणामों को किस तरह से सिखाएँ
जवाबदेही सिखाना रातों-रात नहीं हो जाता है—यह बच्चों को प्रतिदिन जवाबदेह होने की ओर मार्गदर्शन करते रहने की प्रक्रिया है। ये कुछ व्यावहारिक तरीके हैं जिनके द्वारा इस गुण को इस प्रकार से दिया जा सकता है, जिससे चरित्र और विश्वास का विकास हो:
1. परिणामों को शिक्षा सिखाने दें
बच्चों को जवाबदेही सिखाने के सर्वोत्तम तरीकों में से एक है कि उन्हें अपने कार्यों के स्वाभाविक परिणामों का अनुभव करने दें।
– यदि वे अपने गृह-कार्य को करना भूल जाते हैं, तो उन्हें आँकलन का निम्न स्तर मिलेगा।
– यदि वे खिसिया कर कोई खिलौना तोड़ देते हैं, तो उन्हें उसके स्थान पर दूसरा नहीं मिलेगा।
– यदि वे सफाई करने से मना करेंगे, तो उन्हें खेलने का समय गँवाना पड़ेगा।
जब बच्चे अपने चुनावों के परिणामों को अनुभव करते हैं, तब उससे वे बेहतर सीखते हैं, बजाए माता-पिता द्वारा उन्हें केवल डाँट दिये जाने के।
कुछ बातों में स्वाभाविक परिणाम असुरक्षित या अव्यावहारिक हो सकते हैं। ऐसी स्थितियों में, उचित परिणामों के साथ प्रेमपूर्ण सुधार करना आवश्यक होता है। कुँजी यह सुनिश्चित करना है कि परिणाम उचित हैं, व्यवहार से सम्बन्धित हैं, और शिक्षा देने पर केन्द्रित हैं, केवल दण्ड देने पर नहीं।
2. कार्य करने को स्वीकार करना सिखाएँ
बहुत से बच्चे, जब बात बिगड़ जाती है, तब स्वाभाविक रीति से दोष किसी अन्य पर डालने का प्रयास करते हैं:
– “यह मेरी गलती नहीं थी!”
– “मेरे भाई ने मुझ से यह करवाया!”
– “मैं यह करना नहीं चाहता था!”
परन्तु जवाबदेही का अर्थ है, यह कहना सीखना कि, “यह मेरा चुनाव था, और मैं इसके परिणाम स्वीकार करता हूँ।”
माता-पिता होने के नाते हम अपने बच्चों की इन बातों के द्वारा सहायता कर सकते हैं:
– ईमानदारी को प्रोत्साहित करें – यदि वे अपनी गलतियों को मान लेते हैं, तो उनकी ईमानदारी की सराहना करें, बजाए गलती पर ही केन्द्रित रहने के। (“साहस” कहना अमूर्त विचार होगा—ईमानदारी वह गुण है जिसे सुदृढ़ किया जा रहा है।)
– प्रश्न पूछना – बजाए दोष देने के, पूछिये कि: “क्या हुआ?” “इससे भिन्न और क्या कर सकते थे?” “तुम इसे ठीक किस प्रकार से करोगे?”
– बातों को सही करने में उनकी सहायता करें – यदि उन्होंने किसी की भावनाओं को ठेस पहुँचाई है, तो उन्हें क्षमा माँगनी चाहिये। यदि उन्होंने कुछ तोड़ा है, तो उन्हें उसे ठीक करना चाहिये या फिर उसके स्थान पर दूसरा देना चाहिये।
अपने किये हुए को स्वीकार करने में उनका मार्गदर्शन करने के द्वारा, हम उन्हें ईमानदारी, नम्रता, और ज़िम्मेदारी सिखाते।
3. अपेक्षाओं और परिणामों के बारे में सुसंगत रहें
बच्चे स्पष्ट अपेक्षाओं में अच्छे से बढ़ते हैं। यदि नियम और परिणाम बार-बार बदलते रहते हैं, तो इससे असमंजस और कुण्ठा उत्पन्न होते हैं।
स्पष्ट सीमाएँ निर्धारित करने से आपके बच्चों को पता रहेगा कि क्या आशा की गई है और परिणाम क्या होंगे। यदि किसी परिणाम की प्रतिज्ञा की गई है, तो उसका निर्वाह करें, क्योंकि असंगत होना शिक्षा को दुर्बल करता है। साथ ही प्रत्येक परिस्थिति में शान्त बने रहना महत्वपूर्ण है। जब बच्चों को पता होता है कि क्या आशा रखी गई है तथा परिणाम उचित और सुसंगत होंगे, तब वे सुरक्षित अनुभव करते हैं।
4. अपने जीवन को जवाबदेही का नमूना बनाएँ
बच्चे हमारे कहे हुए की बजाए हमारे किये हुए से अधिक सीखते हैं। यदि वे हमें, हमारे किये हुए के लिये ज़िम्मेदारी लेते हुए देखेंगे, तो उनके भी वैसा ही करने की सम्भावना अधिक होगी।
– अपनी गलतियों को मान लें। यदि आप कोई अनुचित प्रतिक्रिया दें, तो कहें, “मुझे चिल्लाना नहीं चाहिये था। क्षमा चाहता हूँ।”
– प्रतिबद्धताओं को पूरा करें। यदि आप ने किसी बात की प्रतिज्ञा की है, तो अपने कहे का पालन करें।
– उन्हें दिखाएँ कि बातों को सही किस प्रकार से करना है। यदि आप किसी महत्वपूर्ण बात को भूल जाते हैं, तो उन्हें दिखना चाहिये कि आप ने क्षमा माँगी या गलती को सुधारा है।
जब बच्चे जवाबदेही को व्यावहारिक जीवन में देखेंगे, तब स्वाभाविक है कि वे भी उदाहरण का अनुसरण करेंगे।
5. बढ़ोतरी की मानसिकता को प्रोत्साहित करें
जवाबदेही का अर्थ बच्चों को दोषी या लज्जित अनुभव करवाना नहीं है—इसका अर्थ है बढ़ने में उनकी सहायता करना।
– उन्हें याद दिलाएँ कि गलतियाँ, सीखने के अवसर होते हैं।
– बजाए असफलताओं में पड़े रहने के, उन्हें फिर से प्रयास करने के लिए प्रोत्साहित करें।
– उन पर जीवन के शब्द बोलें: “मुझे पता है कि अगली बार तुम इससे बेहतर कर सकते हो।”
लक्ष्य केवल व्यवहार को बदलना नहीं वरन चरित्र को संवारना है—बच्चों की यह समझने में सहायता करना कि ज़िम्मेदारी कोई बोझ नहीं है बल्कि बुद्धिमानी और सफलता का मार्ग है।
चर्चा: बाइबल के अनुसार किया गया अनुशासन बच्चे के भविष्य को किस प्रकार निर्धारित करता है?
- कुछ ऐसे तरीके कौन से हैं, जहाँ स्वाभाविक परिणाम बच्चों को ज़िम्मेदारी सिखाते हैं?
- जवाबदेही बच्चों को वयस्क होने के लिये किस प्रकार से तैयार करती है?
- अनुशासन में अनुग्रह की क्या भूमिका है?
- माता-पिता सुधारने और प्रोत्साहित करने में सन्तुलन किस प्रकार बनाए रख सकते हैं?
ज़िम्मेदारी लेने के लिये बच्चों की परवरिश करना
जवाबदेही उन सबसे बड़े उपहारों में से है जिन्हें हम अपने बच्चों को दे सकते हैं। यह उन्हें अपने किये हुए को स्वीकार करना, गलतियों से सीखना, और ज़िम्मेदार तथा धर्मी वयस्क बनना सिखाती है।
इस सप्ताह, इन पर ध्यान केन्द्रित करें:
– अति-शीघ्रता से बचा लेने की बजाए, परिणामों से सीखने दीजिये।
– ईमानदारी को प्रोत्साहित करें, चाहे यह कठिन ही क्यों न हो।
– अपने किये हुए में जवाबदेही का नमूना बनें।
याद रखिये: हम केवल बच्चों की परवरिश नहीं कर रहे हैं—हम भावी वयस्कों को बड़ा कर रहे हैं जो इन शिक्षाओं को अपने विश्वास, कार्य, और सम्बन्धों में लेकर जाएँगे।
हमारे जीवनों में परमेश्वर का अनुशासन हमेशा हमारी बढ़ोतरी और भलाई के लिये होता है। जब हम उसी के समान बुद्धिमानी, अनुग्रह, और सुसंगत रहने के द्वारा अपने बच्चों का मार्गदर्शन करते हैं, हम भरोसा रख सकते हैं कि वह उनके मनों में कार्य कर रहा है।
“क्योंकि मनुष्य जो कुछ बोता है वही काटेगा।” — गलातियों 6:7
भाग IV: बच्चों को विश्वास के जीवन के लिये तैयार करना
मुख्य वचन: 3 यूहन्ना 1:4
“मुझे इस से बढ़कर और कोई आनन्द नहीं, कि मैं सुनूं, कि मेरे बच्चे सत्य पर चलते हैं”।
जीवन भर बना रहने वाला विश्वास
माता-पिता होने के नाते, हमारी सबसे बड़ी लालसा रहती है कि हमारे बच्चे दृढ़, और विश्वासयोग्य, विश्वासी बनें जो यीशु का अनुसरण केवल इसलिये नहीं करें क्योंकि हमने उन्हें यह सिखाया है, बल्कि इसलिये क्योंकि उन्होंने विश्वास को अपना लिया है। हम चाहते हैं कि वे परमेश्वर से प्रेम करें, जीवन की प्रत्येक परिस्थिति में उस पर भरोसा रखें, और अपने विश्वास में दृढ़ता से स्थापित रहें—तब भी जब उनके मार्गदर्शन के लिये हम वहाँ न हों।
परन्तु ध्यान भंग करने वाली बातों, प्रलोभनों, बदलते हुए मूल्यों के संसार में बच्चों की ऐसी परवरिश करना कि उनमें एक वास्तविक, स्थाई विश्वास हो, एक चुनौती प्रतीत हो सकता है।
हम उन पर विश्वास को थोपे बिना आत्मिक उन्नति और स्वतन्त्रता को किस प्रकार प्रोत्साहित कर सकते हैं? चुनौतियों का सामना करते समय, हम उन्हें अपने विश्वास की बातों में दृढ़ बने रहने के लिये किस प्रकार से तैयार कर सकते हैं?
अच्छा समाचार यह है कि हम इस यात्रा में अकेले नहीं हैं। परमेश्वर ही है जो अन्ततः हमारे बच्चों के मनों में कार्य करता है, परन्तु उसने हमें सौंपा है कि उनके विश्वास में बढ़ने के लिये हम उनमें नींव को रखें। हमारी भूमिका उनके विश्वास को नियन्त्रित करने की नहीं है, परन्तु उसकी देख-भाल करने, उसको पोषित करने, और जब वे मसीह में अपने व्यक्तिगत सम्बन्ध को विकसित करते हैं, तब उन्हें प्रोत्साहित करने की है।
चलिये पता लगाते हैं कि हम अपने बच्चों को जीवन भर बने रहने वाले विश्वास के लिये किस तरह तैयार कर सकते हैं।
लक्ष्य: ऐसा विश्वास जो व्यक्तिगत तथा स्वतन्त्र हो
छोटे बच्चों का अपने माता-पिता के विश्वास पर निर्भर होना स्वाभाविक है। वे प्रार्थना करते हैं क्योंकि हम उन्हें इसे याद दिलाते हैं, वे कलीसिया में जाते हैं क्योंकि हम उन्हें लेकर जाते हैं, और वे विश्वास करते हैं क्योंकि हम उन्हें सिखाते हैं।
परन्तु उनके आयु में बढ़ने के साथ, उनका विश्वास व्यक्तिगत होना चाहिए—न कि कुछ ऐसा जो उन्हें अपने परिवार से विरासत में मिला है। उन्हें यीशु के साथ एक व्यक्तिगत सम्बन्ध विकसित करने की आवश्यकता है, जो आस्था पर आधारित हो न कि किसी रीति पर।
बाइबल हमें इसके बारे में याद दिलाती है, 3 यूहन्ना 1:4: “मुझे इससे बढ़कर और कोई आनन्द नहीं कि मैं सुनूँ, कि मेरे बच्चे सत्य पर चलते हैं।“
ध्यान कीजिये कि यह नहीं कहा गया है कि “यह सुनना कि मेरे बच्चे केवल कलीसिया में सम्मिलित हुआ करते हैं” या “नियमों का पालन करते हैं।” वह कहता है कि सत्य पर चलते हैं। इसका अर्थ है कि हम दैनिक जीवन में अपने विश्वास को जी कर दिखाते हैं—ईश्वरीय चुनाव करते हैं, कठिनाइयों में मसीह के खोजी होते हैं, और अपने आप ही उस पर भरोसा रखते हैं।
तो, हम अपने बच्चों के, हम पर निर्भर रहने वाले विश्वास से, अपने स्वतन्त्र विश्वास में विकसित होने में सहायता किस प्रकार कर सकते हैं?
1. उन्हें सिखाएँ कि स्वयं परमेश्वर के खोजी हों
जो सबसे बड़े उपहार हम अपने बच्चों को दे सकते हैं, उनमें से एक है स्वतन्त्र होकर परमेश्वर के खोजी होने की योग्यता।
बजाए हमेशा उन्हें उत्तर प्रदान करते रहने के, उन्हें दिखाएँ कि परमेश्वर के वचन से सत्य किस प्रकार खोजा जाता है। बजाए इसके कि हम उनके लिये प्रार्थनाएँ करते रहें, उन्हें प्रोत्साहित करें कि वे परमेश्वर से प्रार्थना करें।
आत्मिक स्वतन्त्रता प्रोत्साहित करने के तरीके:
उन्हें बाइबल को पढ़ना और अध्ययन करना सिखाएँ। उन्हें सिखाएँ कि उनके संघर्ष को सम्बोधित करने वाले पद को किस प्रकार से खोजें। साथ ही, उन्हें स्वयं प्रार्थना करना सिखाएँ। छोटे कदमों के साथ आरम्भ करें, जैसे कि भोजन से पहले उन्हें प्रार्थना करने को कहें, या तब जब वे चिन्तित अनुभव कर रहे हों। उन्हें परमेश्वर की आवाज़ को पहचानने में सहायता करें। उनसे पूछें, “तुम को क्या लगता है कि परमेश्वर इन दिनों में तुम्हें क्या सिखा रहा है?” उन्हें प्रश्नों के साथ जूझने दें। जब हम जिज्ञासा और ईमानदारी के वार्तालाप के लिये स्थान देते हैं, तो विश्वास और गहरा होता है। हम चाहते हैं कि हमारे बच्चे स्वयं ही परमेश्वर की ओर मुड़ें, न कि केवल उसके साथ हमारे सम्बन्ध पर ही निर्भर रहें।
2. यीशु के साथ एक वास्तविक सम्बन्ध का नमूना बनें
बच्चे सुनने से उतना नहीं सीखते हैं, जितना देखने से सीखते हैं। यदि वे देखते हैं कि हम अपने विश्वास को जी कर दिखा रहे हैं—प्रार्थना करना, पवित्रशास्त्र पढ़ना, संघर्षों में परमेश्वर पर निर्भर रहना—तो उनके, हमारे उदाहरण का अनुसरण करने की सम्भावना अधिक होगी।
वास्तविक विश्वास का नमूना किस प्रकार बनें:
उन्हें आप को प्रार्थना करते हुए देखने दें। केवल भोजन से पहले ही नहीं, परन्तु दैनिक जीवन में— निर्णयों को लेते समय, और धन्यवाद देते हुए। विश्वास को कार्यकारी रूप में दिखाएँ। उन्हें दिखाएँ कि विश्वास केवल कलीसिया में उपस्थित होना नहीं है—बल्कि यह औरों के प्रति हमारे व्यवहार, तनाव के प्रति हमारे रवैये और बर्ताव, और कठिन समयों में हमारे परमेश्वर पर भरोसा रखने के बारे में है।
अपने संघर्षों के बारे में ईमानदार रहें। यदि आप किसी कठिन समय से होकर निकल रहे हैं, तो उसके बारे में उनसे बाँटें (आयु के अनुसार), कि आप किस तरह से उस परिस्थिति में भी परमेश्वर पर भरोसा बनाए हुए हैं। अपने विश्वास में आनन्दित रहने को दिखाएँ। उन्हें यह देखने दें कि मसीह का अनुसरण करना केवल कुछ नियमों का पालन करना नहीं है—बल्कि यह प्रेम, आनन्द, और परमेश्वर के साथ एक गहरे सम्बन्ध के बारे में है। जब बच्चे देखेंगे कि विश्वास वास्तविक और दैनिक जीवन में प्रासंगिक है, तो उनमें भी यीशु के साथ वैसा ही सम्बन्ध बनाने की लालसा उत्पन्न होगी।
3. उन्हें अपने विश्वास को बाँटने और सेवा करने के लिये प्रोत्साहित कीजिये
विश्वास को कार्यान्वित करने से वह बढ़ता है। बच्चों को अपने विश्वास को बाँटना, तथा औरों की सेवा करना सिखाने से उन्हें परमेश्वर के लिये जीने के आनन्द का अनुभव लेने में सहायता मिलती है।
विश्वास को बाँटने और सेवा करने के तरीके:
उन्हें औरों की सेवा करने में सम्मिलित करें। उन्हें दयालुता के कार्य करने में समभागी बनाएँ, जैसे कि किसी पड़ोसी की सहायता करना, किसी कार्य के लिये स्वयं-सेवक बनना, या किसी की आवश्यकताओं के समय में उसके लिये प्रार्थना करना।
उन्हें प्रोत्साहित करें कि वे अपने मित्रों को कलीसिया या युवाओं की सभा में आमन्त्रित करें। उन्हें अगुवाई करने के अवसर दें। परिवार की प्रार्थना में, भोजन की प्रार्थना में अगुवाई करने में उनकी सहायता लें, या वे पवित्रशास्त्र से जो भी सीख रहे हैं उसे बाँटने के लिये कहें।
सेवा करने के बारे में उनसे वार्तालाप करें और उन्हें याद दिलाएँ कि हम परमेश्वर के प्रेम को कमाने के लिये सेवा नहीं करते हैं, परन्तु क्योंकि परमेश्वर हमसे प्रेम करता है, इसलिये हम उसकी सेवा करते हैं। जो विश्वास सक्रिय रहता है और बाहरी प्रकटीकरण पर केन्द्रित होता है, वह दृढ़ बना भी रहता है।
4. उन्हें विश्वास में दृढ़ बने रहने के लिये तैयार करें
किसी-न-किसी समय पर, प्रत्येक बच्चे को अपने विश्वास के लिये चुनौतियों का सामना करना ही पड़ेगा—साथियों से दबाव, सन्देह, या संस्कृति का विरोध। हमारा काम है कि हम उन्हें तैयार करें कि जब भी ऐसा हो, तब वे दृढ़ खड़े रह सकें।
उन्हें बाइबल के सत्य सिखाएँ। यह सुनिश्चित करें, कि वे जिस पर विश्वास करते हैं, और उस पर क्यों करते, इन बातों को वे भली-भाँति समझते भी हैं। उन्हें कठिन प्रश्नों के लिये तैयार करें। इस प्रकार के विषयों पर चर्चा करें, जैसे कि, “यदि कोई मेरे विश्वास के बारे में प्रश्न करे, तब मैं क्या उत्तर दूँ?” या “यदि मैं हमेशा ही परमेश्वर की निकटता को अनुभव नहीं करूँ, तब क्या करूँ?” उन्हें स्वयं को अन्य विश्वासियों से घेरे रखने के लिये प्रोत्साहित करें। ऐसे मित्र और सलाहकार जो यीशु से प्रेम करते हैं, वे उन्हें उनके बढ़ने में प्रोत्साहित करेंगे। उन्हें याद दिलाएँ कि सन्देह आना सामान्य है। सन्देह का अर्थ यह नहीं है कि उनका विश्वास कमजोर है—बल्कि इसका अर्थ है कि वे गहन विचार कर रहे हैं। पवित्रशास्त्र में से उनके प्रश्नों के उत्तर समझने में उनकी सहायता करें। जिस विश्वास को परख कर दृढ़ किया जाता है, वह स्थाई बना भी रहता है।
मसीह में अपने विश्वास को विकसित करने में बच्चों की सहायता करना
मुख्य वचन: कुलुस्सियों 2:6-7
“अत: जैसे तुम ने मसीह यीशु को प्रभु करके ग्रहण कर लिया है, वैसे ही उसी में चलते रहो, और उसी में जड़ पकड़ते और बढ़ते जाओ; और जैसे तुम सिखाए गए वैसे ही विश्वास में दृढ़ होते जाओ, और अधिकाधिक धन्यवाद करते रहो।”
विश्वास जो बचपन के बाद भी बना रहता है
माता-पिता होने के नाते हम अपने बच्चों के लिये केवल अच्छे व्यवहार और जीवन में सफलता से अधिक भी कुछ चाहते हैं—हम चाहते हैं कि वे व्यक्तिगत रीति से यीशु को जानें और उसका अनुसरण करें। हम चाहते हैं कि उनका विश्वास केवल वहीं तक सीमित न रहे जो उन्होंने बचपन में सीखा था, बल्कि ऐसा हो जो उनके वयस्क होने में उनके साथ ही बढ़ता भी चला जाए।.
परन्तु यहाँ एक चुनौती है: विश्वास वंशागत नहीं होता है। हो सकता है कि बच्चे की परवरिश एक मसीही परिवार में हुई हो, वह प्रति इतवार कलीसिया में जाता रहा और बाइबल के पद भी याद किये हों—परन्तु यदि उनका विश्वास केवल उनके माता-पिता का अनुसरण करना मात्र ही है, तो जब वास्तविक संसार की चुनौतियों का सामना करना होगा, तब बहुत सम्भव है कि वह स्थिर बना न रहे।.
तो, हम अपने बच्चों में एक वास्तविक, व्यक्तिगत विश्वास के विकसित होने में—ऐसा विश्वास जो मसीह में जड़ पकड़े हुए है न कि पारिवारिक परम्पराओं में, उनकी सहायता किस प्रकार से कर सकते हैं?
कुलुस्सियों 2:6-7 हमें याद दिलाता है कि विश्वास सक्रिय, बढ़ता हुआ, और मसीह में गहरी जड़ें पकड़े हुए होना चाहिये। बच्चों का अपने माता-पिता से विश्वास “उधार” ले लेना पर्याप्त नहीं है—उन्हें उसे अपना बनाना होगा।
इस सत्र में हम ऐसे व्यावहारिक तरीकों के बारे में बात करेंगे, जो बच्चों को एक व्यक्तिगत, दृढ़, और समय द्वारा परखे जाने पर भी स्थिर बने रहने वाले विश्वास की ओर लेकर जाने में मार्गदर्शन करें।
बच्चों को व्यक्तिगत विश्वास विकसित करने की आवश्यकता क्यों है
बच्चों के लिए मसीहियत के हाव-भाव प्रदर्शित करना सरल है—कलीसिया में उपस्थित रहना, भोजन से पहले प्रार्थना करना, और पारिवारिक परम्पराओं का पालन करना—बिना व्यक्तिगत रीति से यह समझे कि यीशु कौन है।
परन्तु जैसे-जैसे वे बड़े होते जाएँगे, उन्हें प्रश्नों का सामना करना पड़ेगा:
– “मैं परमेश्वर में विश्वास क्यों करता हूँ?”
– “मैं कैसे जानता हूँ कि मसीहियत सही है?”
– “क्या मेरा विश्वास, वास्तव में मेरा अपना है, या केवल वह है जिसमें मेरे माता-पिता ने मुझे विश्वास करने के
लिये कहा था?”
यदि बच्चे ऐसे प्रश्नों से सामना और संघर्ष एक सुरक्षित, सहायक, माहौल में नहीं करते हैं, तो वयस्क होने पर वे अपने विश्वास को त्याग सकते हैं।
स्थिर बने रहने वाला विश्वास वह होता है जो जाँचा और परखा गया है, और परमेश्वर के सत्यों में गहराई से जड़
पकड़े हुए है।
मसीह के साथ व्यक्तिगत सम्बन्ध बनाने में बच्चों की सहायता कैसे करें
विश्वास केवल सही उत्तर जानने के बारे में ही नहीं है—बल्कि यह यीशु के साथ एक वास्तविक सम्बन्ध बनाना है। हम इन तरीकों से बच्चों को नियमों का पालन करने से, स्वयं ही मसीह का अनुसरण करने वाले होने में सहायता कर सकते हैं।
1.प्रश्नों को और खोजने को प्रोत्साहित कीजिये
बच्चों में विश्वास के बारे में प्रश्न होंगे—यह एक अच्छी बात है! जब विश्वास के बारे में खोजा जाता है, उसे जाँचा जाता है, और उसे समझा जा सकता है, तब वह और दृढ़ हो जाता है।
कठिन प्रश्नों को चुप करवा देने के स्थान पर, उनका स्वागत करें। यदि बच्चा पूछे कि, “हम कैसे जानते हैं कि परमेश्वर वास्तव में है?” या “परमेश्वर दुःख क्यों आने देता है?” तब यह प्रतिक्रिया दें,“यह एक अच्छा प्रश्न है। चलो साथ मिलकर इसके बारे में खोजते हैं।”
यदि आप को उत्तर नहीं पता है तो इसे स्वीकार कर लें और साथ मिल कर उत्तर का पता लगाएँ। इससे वे सीखते हैं कि विश्वास, कुछ निश्चित उत्तरों का समूह नहीं, बल्कि एक यात्रा है।
उन्हें विश्वास के अपने संघर्षों के बारे में बताएँ। उन्हें देखने दें कि सन्देह सामान्य हैं और परमेश्वर हमारे प्रश्नों के साथ व्यवहार करने योग्य बड़ा है। विश्वास, कठिन प्रश्नों से बचने के द्वारा नहीं, बल्कि सत्य और अनुग्रह के साथ उन पर कार्य करने के द्वारा बढ़ता है।
2. उन्हें स्वयं ही परमेश्वर की आवाज़ को सुनना सिखाएँ
व्यक्तिगत विश्वास का अर्थ है कि बच्चे परमेश्वर की आवाज़ को पहचानना और प्रतिक्रिया देना सीखें—केवल अपने माता-पिता की ही आवाज़ को न सुनें।
परमेश्वर की आवाज़ को सुनने में बच्चों की सहायता करना:
व्यक्तिगत प्रार्थना को प्रोत्साहित करें। बजाए रटी हुई प्रार्थनाएँ करने के, उन्हें अपने ही शब्दों में प्रार्थना करने दें। और उन्हें परमेश्वर की बात को को सुनना सिखाएँ। पूछें, “तुम्हें क्या लगता है कि परमेश्वर आजकल तुम्हें क्या सिखा रहा है?” या आप उन्हें पवित्रशास्त्र दे सकते हैं, और उन्हें दिखाएँ कि उनके संघर्षों, भय, और प्रश्नों से सम्बन्धित पदों को किस प्रकार से खोजें।
जब बच्चे स्वयं परमेश्वर की उपस्थिति को अनुभव करते हैं, तब उनका विश्वास वास्तविक हो जाता है।
3. उन्हें अपने विश्वास से सम्बन्धित कार्यों को अपना लेने दें
किसी समय पर आकर, बच्चों को अपनी आत्मिक बढ़ोतरी के लिये ज़िम्मेदारी लेनी होती है। इसका अर्थ है कि उन्हें निष्क्रिय सहभागी होने से यीशु के सक्रिय अनुयायी होने की ओर जाने में सहायता करना।
व्यक्तिगत बाइबल पढ़ने को प्रोत्साहित करें। केवल पारिवारिक प्रार्थनाओं तक सीमित रहने के स्थान पर, उन्हें प्रोत्साहित करें कि वे परमेश्वर के वचन को पढ़ने की अपनी आदत को विकसित करें।
उन्हें चुनने दें कि वे सेवा किस प्रकार से करना चाहते हैं। चाहे वह कलीसिया में सहायता करना हो, स्वयं-सेवक बनना हो, या अपने विश्वास को बाँटना हो, उन्हें पता करने दें कि वे अपने विश्वास को किस प्रकार से जीना चाहते हैं।
कलीसिया के कार्यों में सम्मिलित होने के लिये उन्हें स्वयं चुनाव कर लेने दें। बजाए उपस्थित होने को उन पर थोपने के, उन्हें प्रोत्साहित करें कि वे युवाओं की सभाओं में, बाइबल अध्ययन में, या आराधना की सेवकाई में, जिसमें भी उनकी रुचि हो, उसमें भाग लें।
जब बच्चों को लगता है कि वे परिवार की अपेक्षाओं को पूरा करने की बजाए, स्वयं परमेश्वर के प्रति प्रतिबद्ध हो रहे हैं, तो विश्वास बढ़ता है।
4. उन्हें विश्वास को वास्तविक जीवन पर लागू करने दीजिये
विश्वास केवल बाइबल के बारे में जानकारी रखना नहीं है—बल्कि उसे जी कर दिखाना है। बच्चों को यह दिखाना चाहिये कि विश्वास किस प्रकार से वास्तविक संघर्षों, सम्बन्धों, और निर्णयों पर लागू होता है।
विश्वास को व्यावहारिक बनाने के तरीके:
वार्तालाप कीजिये कि किस प्रकार से विश्वास प्रतिदिन के जीवन पर प्रभाव डालता है। पूछें, “इस परिस्थिति में हम किस प्रकार से परमेश्वर पर भरोसा रख सकते हैं?” या “इस संघर्ष में यीशु क्या करता?”
उन्हें कठिन समयों में परमेश्वर पर निर्भर रहना सिखाएँ। जब वे निराशाओं का सामना करें, तब “कोई बात नहीं” कहने के स्थान पर, उन्हें प्रोत्साहित करें कि वे प्रार्थना करें और परमेश्वर की सांत्वना के खोजी हों।
औरों की सेवा करने के लिये प्रोत्साहित करें। उन्हें दिखाएँ कि विश्वास लोगों से प्रेम करने के बारे में है, केवल कलीसिया में उपस्थित होने के बारे में नहीं।
जब बच्चे देखते हैं कि विश्वास उनके वास्तविक जीवन में उनकी सहायता करता है, तो फिर वह केवल एक मान्यता नहीं रहता—वह एक आधार बन जाता है।
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चर्चा: माता-पिता, आज के संसार में बच्चों को ज़िम्मेदारी से जीवन जीने के लिये किस प्रकार से तैयार
कर सकते हैं?
- माता-पिता ऐसा वातावरण किस तरह से बना सकते हैं कि बच्चे प्रश्न पूछने के लिए स्वतन्त्र अनुभव करें?
- बच्चों द्वारा व्यक्तिगत आत्मिक आदतें विकसित करने के लिये कुछ व्यावहारिक तरीके क्या हो सकते हैं?
- प्रतिदिन की परिस्थितियों में विश्वास को लागू करने के लिये माता-पिता बच्चों का मार्गदर्शन किस प्रकार से कर सकते हैं?
- आज के संसार में, अपने विश्वास को थामे रखने के लिये युवा किन चुनौतियों का सामना करते हैं? माता-पिता किस प्रकार सहायता कर सकते हैं?
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अन्तिम प्रोत्साहन
अन्ततः, विश्वास एक व्यक्तिगत यात्रा है। हम मार्गदर्शन दे सकते हैं, सिखा सकते हैं, और नमूना बन सकते हैं, परन्तु अन्ततः केवल परमेश्वर ही बच्चे के मन को बदल सकता है।
यदि आप को यह चिन्ता है कि क्या आप के बच्चे का विश्वास बना रहेगा, तो यह याद रखिये:
– परमेश्वर हमेशा उनके मनों में कार्य करता रहता है—तब भी जब हमें परिणाम तुरन्त दिखाई नहीं देते हैं।
– हमारा कार्य बीज बोना है—उन्हें बढ़ोतरी देने वाला परमेश्वर है।
– प्रार्थना हमारा सबसे बड़ा साधन है। अपने बच्चे के विश्वास की यात्रा को प्रभु के सामने उठाए रखें।
इस सप्ताह इस पर केन्द्रित रहें
विश्वास के बारे में ईमानदारी के वार्तालापों को प्रोत्साहित करें, अपने बच्चों की सहायता करें कि वे अपनी आत्मिक बढ़ोतरी के लिये ज़िम्मेदारी लें, और भरोसा रखें कि परमेश्वर कार्य कर रहा है—उनके संघर्षों में भी। ऐसा विश्वास जो मसीह में जड़ पकड़े हुए है, वह सरलता से हिलेगा नहीं। बीज बोते रहिये, प्रार्थना करते रहिये, और भरोसा रखिये कि परमेश्वर आपके बच्चे के मन में कुछ मनोहर उगा रहा है।
“सो जैसे तुम ने मसीह यीशु को प्रभु कर के ग्रहण कर लिया है, वैसे ही उसी में चलते रहो। और उसी में जड़ पकड़ते और बढ़ते जाओ; और जैसे तुम सिखाए गए वैसे ही विश्वास में दृढ़ होते जाओ, और अत्यन्त धन्यवाद करते रहो।”
— कुल्लुस्सियों 2:6-7
लेखक के बारे में
Christian Lingua टीम विश्व की सबसे बड़ी मसीही अनुवाद एजेंसी है, जो विश्वभर में वीडियो, ऑडियो और मीडिया परियोजनाओं के लिए अनुवाद और ओवरडब सेवाएँ प्रदान करती है।
विषयसूची
- भाग I: माता-पिता होने के लिये परमेश्वर की योजना को समझना
- मुख्य वचन: नीतिवचन 22:6
- माता-पिता को आत्मिक अगुवे क्यों होना चाहिये
- माता-पिता होना केवल एक ज़िम्मेदारी नहीं है, यह एक बुलाहट है
- मुख्य वचन: इफिसियों 6:4
- प्रेम और अनुशासन के मध्य सन्तुलन
- ज़िम्मेदारी महत्वपूर्ण क्यों है
- प्रेम और अनुशासन के द्वारा ज़िम्मेदारी को विकसित करना
- 1. स्पष्ट अपेक्षाओं और परिणामों को परिभाषित करके रखिये
- 2. क्रोध से नहीं, बल्कि प्रेम के साथ अनुशासित करें
- 3. आयु के अनुसार उचित ज़िम्मेदारियाँ सौपें
- 4. समस्याओं का समाधान निकालने और निर्णय लेने के अवसर बना कर दें
- 5. अपने जीवन से ज़िम्मेदारी का आदर्श बनें
- प्रभु में बच्चे की परवरिश करने का क्या अर्थ होता है?
- भाग II: बाइबल के मूल्यों और चरित्र को अन्दर बैठाना
- मुख्य वचन: व्यवस्थाविवरण 6:6-7
- ऐसा चरित्र स्थापित करना जो स्थाई बना रह सके
- बच्चों को खराई, दयालुता, और ईमानदारी सिखाना
- ईमानदारी सिखाना:
- दयालुता: औरों से यीशु के समान प्रेम करना
- दयालुता सिखाना:
- खराई: वह करना जो सही है, तब भी जब कोई भी नहीं देख रहा है
- खराई सिखाना:
- बाइबल के मूल्यों को दैनिक जीवन में जीना
- उदाहरण के द्वारा मार्गदर्शन: मसीह के समान व्यवहार का नमूना बनना
- मुख्य वचन: 1 कुरिन्थियों 11:1
- माता-पिता के रूप में उदाहरण की सामर्थ्य
- मसीह के समान व्यवहार का नमूना बनने का क्या अर्थ है?
- 1. दैनिक जीवन में विश्वास का नमूना बनना
- 2. नम्रता और अनुग्रह के साथ अगुवाई करना
- नम्रता दिखाने के व्यावहारिक तरीके:
- 3. दयालु तथा कृपालु होना कार्यों के द्वारा सिखाएँ
- दयालुता और कृपालु होने के नमूने किस प्रकार से बनें:
- 4. बड़े और छोटे तरीकों से ईमानदारी दिखाना
- 5. विश्वास के द्वारा कठिन परिस्थितियों से व्यवहार करना
- चर्चा: हमारे कार्य, हमारे बच्चों के विश्वास को किस तरह से स्वरूप देते हैं?
- मसीह के उदाहरण के समान जीना
- भाग III: अनुशासन, सुधारना, और प्रोत्साहित करना
- मुख्य वचन: इब्रानियों 12:11
- अनुशासन को अनुग्रह से सन्तुलित करना
- अनुशासन के उद्देश्य को समझना
- दण्ड और अनुशासन में अन्तर
- उदाहरण:
- अनुग्रह के साथ सुधारने के व्यावहारिक तरीके
- 1. स्पष्ट और सुसंगत सीमाएँ स्थापित करें
- 2. ऐसे परिणामों का प्रयोग करें जो सिखाते हैं, न कि केवल दण्ड देते हैं
- 3. शान्त आत्मा के साथ सुधारिये, न कि क्रोध के साथ
- प्रोत्साहन: अनुशासन का दूसरा पहलू
- अपने बच्चे को प्रोत्साहित किस प्रकार करें:
- यीशु: अनुशासन और अनुग्रह का सिद्ध उदाहरण
- चर्चा: हम प्रेम के साथ अनुशासित किस तरह से कर सकते हैं?
- प्रेम और सत्य के साथ बच्चों की परवरिश करना
- जवाबदेह होना तथा परिणामों को सिखाना
- मुख्य वचन: गलातियों 6:7
- माता-पिता का दायित्व निभाने में जवाबदेह होने का महत्व क्यों है
- बाइबल पर आधारित जवाबदेही की नींव
- जवाबदेही और परिणामों को किस तरह से सिखाएँ
- 1. परिणामों को शिक्षा सिखाने दें
- 2. कार्य करने को स्वीकार करना सिखाएँ
- 3. अपेक्षाओं और परिणामों के बारे में सुसंगत रहें
- 4. अपने जीवन को जवाबदेही का नमूना बनाएँ
- 5. बढ़ोतरी की मानसिकता को प्रोत्साहित करें
- चर्चा: बाइबल के अनुसार किया गया अनुशासन बच्चे के भविष्य को किस प्रकार निर्धारित करता है?
- ज़िम्मेदारी लेने के लिये बच्चों की परवरिश करना
- भाग IV: बच्चों को विश्वास के जीवन के लिये तैयार करना
- मुख्य वचन: 3 यूहन्ना 1:4
- जीवन भर बना रहने वाला विश्वास
- लक्ष्य: ऐसा विश्वास जो व्यक्तिगत तथा स्वतन्त्र हो
- 1. उन्हें सिखाएँ कि स्वयं परमेश्वर के खोजी हों
- आत्मिक स्वतन्त्रता प्रोत्साहित करने के तरीके:
- 2. यीशु के साथ एक वास्तविक सम्बन्ध का नमूना बनें
- वास्तविक विश्वास का नमूना किस प्रकार बनें:
- 3. उन्हें अपने विश्वास को बाँटने और सेवा करने के लिये प्रोत्साहित कीजिये
- विश्वास को बाँटने और सेवा करने के तरीके:
- 4. उन्हें विश्वास में दृढ़ बने रहने के लिये तैयार करें
- मसीह में अपने विश्वास को विकसित करने में बच्चों की सहायता करना
- मुख्य वचन: कुलुस्सियों 2:6-7
- विश्वास जो बचपन के बाद भी बना रहता है
- बच्चों को व्यक्तिगत विश्वास विकसित करने की आवश्यकता क्यों है
- मसीह के साथ व्यक्तिगत सम्बन्ध बनाने में बच्चों की सहायता कैसे करें
- 1.प्रश्नों को और खोजने को प्रोत्साहित कीजिये
- 2. उन्हें स्वयं ही परमेश्वर की आवाज़ को सुनना सिखाएँ
- 3. उन्हें अपने विश्वास से सम्बन्धित कार्यों को अपना लेने दें
- 4. उन्हें विश्वास को वास्तविक जीवन पर लागू करने दीजिये
- चर्चा: माता-पिता, आज के संसार में बच्चों को ज़िम्मेदारी से जीवन जीने के लिये किस प्रकार से तैयार कर सकते हैं?
- अन्तिम प्रोत्साहन
- लेखक के बारे में