#24 संयम: सच्ची स्वतंत्रता का मार्ग
परिचय
कल्पना कीजिए कि बजाने के लिए तैयार, एक दर्जन जैज़ संगीतकारों वाला एक समूह एक साथ इकट्ठा हुआ है: उसमें कुछ तुरही बजाने वाले हैं, कुछ ट्रॉम्बोन बजाने वाले हैं, कुछ सैक्सोफोन बजाने वाले हैं, एक पियानो बजाने वाला है, एक बेस बजाने वाला है और एक ड्रम बजाने वाला है। उनके स्टैंड पर कोई संगीत नहीं है। आरम्भ करने के लिए, उनमें से एक कहता है, “जो भी सुर आप चाहें, उसे बजाएँ, और जिस भी गति से आप चाहें, उसमें बजाएँ। चलो, आरम्भ करें!” आपको क्या लगता है, इसका परिणाम क्या होगा? यह निश्चित रूप से संगीतमय अराजकता होगी, जो संगीत और शोर के बीच की रेखा को धुंधला कर देगी।
अब संगीतकारों के उसी समूह की कल्पना कीजिए, परन्तु उनमें से एक यह निर्धारित करता है कि समूह किस जाने-पहचाने सुर पर बजाएगा (इस प्रकार इन बातों के विकल्प सीमित हो जाते हैं कि कौन से सुर बजाने चाहिए), और वह स्पष्ट रूप से गति एवं समय निर्धारित करता है, और यह भी निर्देश देता है कि अलग-अलग लोग कब बजाएँगे। स्पष्ट रूप से और निर्विवाद रूप से इसके परिणामस्वरूप संगीत निकलेगा। और, संगीतकारों की गुणवत्ता के आधार पर, यह काफी अच्छा हो सकता है।
दोनों परिदृश्यों में क्या अन्तर है? इनमें सीमाओं की उपस्थिति में अन्तर है। पहला दृश्य स्वतंत्रता के लिए एक नुस्खे जैसा सुनाई पड़ता है, परन्तु परिभाषित सीमाओं का अभाव अराजकता और अव्यवस्था की ओर ले जाता है। दूसरा दृश्य वास्तविक स्वतंत्रता के लिए अपनी जगह बनाता है, और संगीतकारों को कुछ अच्छा एवं सुन्दर बनाने की स्थिति में रखता है।
बुद्धिमान सीमाएँ व्यवस्था, भलाई और आनन्द को बढ़ावा देती हैं। और सीमाओं का अभाव उन्हीं गुणों को रोक देता है, जिससे अक्सर भ्रम और अव्यवस्था उत्पन्न होती है।
यह सिद्धान्त संगीत और जीवन दोनों में सत्य है। यदि हम सीमाओं को हटा दें और अपने आप को हर उस इच्छा को पूरा करने की अनुमति दें, जिसे हम महसूस करते हैं — चाहे वह खाने, पीने, यौन-सम्बन्ध, नींद या किसी और बात के लिए हो — तो हम निश्चित रूप से स्वयं को दु: खी और पछतावे के बोझ तले दबे पाएँगे। भोग-विलास की तथाकथित स्वतंत्रता बन्धन बन जाती है।
इस बीच, सीमाओं का होना — अर्थात् कुछ बातों के लिए “न” कहने की क्षमता और कौशल — हमें सही बातों के लिए “हाँ” कहने और ऐसा जीवन जीने में सक्षम बनाता है जो हमारे सृष्टिकर्ता की महिमा करती हैं।
सीमाएँ निर्धारित करने और उनके अनुसार जीवन जीने की इसी क्षमता को बाइबल “संयम” कहती है। और संयम सभी प्रकार के बन्धनों से मुक्ति का मार्ग है।
हमारे लिए एक चुनौती यह है कि हम ऐसे युग और संस्कृति में रहते हैं, जहाँ आत्म-संयम के प्रति दृष्टिकोण बिलकुल भिन्न हैं। कुछ लोगों के लिए, संयम प्रामाणिकता और आत्म-अभिव्यक्ति जैसे सांस्कृतिक गुणों के विपरीत है। यदि सीमाएँ आपको “अवास्तविक” तरीके से जीवन जीने के लिए इसलिए प्रोत्साहित करती हैं, क्योंकि आप हमेशा उन सीमाओं के अनुसार जीवन जीने और स्वयं को सुखों से दूर रखने के “जैसा महसूस” नहीं करते, तो उन सीमाओं को समाप्त करना होगा। या यदि सीमाएँ आपके सच्चे व्यक्तित्व को अभिव्यक्त होने से रोकती हैं, तो आत्म-अभिव्यक्ति की जीत होनी ही चाहिए।
दूसरी ओर, ऐसी पुस्तकें, पॉडकास्ट और कार्यक्रम मौजूद हैं, जो लोगों को अधिक उत्पादक बनने, अच्छी आदतें बनाने और जीवन जीने के नये तरीके विकसित करने में सहायता करने का वादा करते हैं। और स्पष्ट है कि कुछ लोग अपने जुनून और जीवन को नियंत्रण में रखना चाहते हैं। इस तथ्य के बारे में नीचे और अधिक जानकारी दी गई है।
परमेश्वर अपने लोगों को प्रामाणिकता से बेहतर कुछ करने के लिए बुलाता है और हमें जीवन जीने के नये तरीकों से बेहतर वादे देता है। इस क्षेत्रीय मार्गदर्शिका के माध्यम से, हम संयम पर बाइबल की शिक्षाओं को और बेहतर ढंग से समझने का प्रयत्न करेंगे, बाइबल आधारित उद्देश्यों का पता लगाएँगे, और फिर इन अवधारणाओं को जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में लागू करेंगे। मैं प्रार्थना करता हूँ कि आप परमेश्वर की महिमा, अपनी स्वयं की भलाई और अपने आसपास के लोगों की भलाई के लिए संयम के साथ जीवन जीने के नये जोश के साथ उस पार आएँ।
ऑडियो मार्गदर्शिका
ऑडियो#24 संयम: सच्ची स्वतंत्रता का मार्ग
1 संयम को परिभाषित करना
“संयम” का अर्थ स्वयं स्पष्ट है, अत: हमें इसे अधिक जटिल बनाने की आवश्यकता नहीं है। परन्तु यह ध्यान देने योग्य बात है कि नये नियम में “संयम” के रूप में अनुवादित कुछ अलग-अलग शब्द मिलते हैं। और, जबकि उनके अर्थों में समानता तो बहुत है, फिर भी कुछ अन्तर हैं। आइए दो उदाहरणों पर विचार करें।
गलातियों 5:22–23
ये प्रसिद्ध आयतें उन बातों की सूची देती हैं, जिन्हें पौलुस “आत्मा का फल” कहता है — जो इस बात का प्रमाण है कि हम मसीह के हैं और उसका आत्मा हम में वास करता है: प्रेम, आनन्द, शान्ति, धीरज, कृपा, भलाई, विश्वास, नम्रता, और संयम; पौलुस कहता है, “ऐसे ऐसे कामों के विरोध में कोई भी व्यवस्था नहीं” (5:23)।
सूची में अन्तिम शब्द “संयम” है, जिसे हिन्दी बाइबल संस्करण में “संयम” कहा गया है। गलातियों में यहाँ पाया जाने वाला यह शब्द सम्भवत: यौन इच्छाओं पर विशेष ध्यान देते हुए, किसी व्यक्ति के लिए अपनी भूख और इच्छाओं पर नियंत्रण रखने का विचार धारण किए हुए है।
गलातियों 5 अध्याय में पौलुस जो कहता है, उसके व्यापक संदर्भ में इच्छाओं पर ध्यान केन्द्रित करना समझ में आता है। आत्मा के कार्यों को सूचीबद्ध करने से ठीक पहले, वह शरीर के कार्यों का एक नमूना प्रस्तुत करता है, जो आत्मा के विरुद्ध हैं: “व्यभिचार, गन्दे काम, लुचपन, मूर्तिपूजा, टोना, बैर, झगड़ा, ईर्ष्या, क्रोध, विरोध, फूट, विधर्म, डाह, मतवालापन, लीलाक्रीड़ा और इनके जैसे और–और काम” (5:19–21)।
क्या आपने इस सूची के बारे में किसी बात पर ध्यान दिया है? इसमें सूचीबद्ध कई दुर्गुणों का वर्णन पापी इच्छाओं में लिप्त होने के रूप में किया जा सकता है। यदि इन कार्यों की हमारे जीवनों पर निशानी लगी हुई है, तो हम निश्चित हो सकते हैं कि हम आत्मा के अनुसार नहीं, बल्कि शरीर के अनुसार चल रहे हैं। परमेश्वर का आदर करने वाले मार्गों पर चलने के लिए, हमें आत्मा के द्वारा प्रेरित संयम की आवश्यकता है। जैसा कि टॉम श्राइनर ने गलातियों की पुस्तक पर अपनी टिप्पणी में लिखा है, “जिन लोगों में संयम होता है, वे स्वयं को उन लोगों के विपरीत नियंत्रित कर पाने में सक्षम होते हैं, जो शरीर की अभिलाषाओं के वश में होते हैं।”1
पौलुस मसीहियों से यही चाहता है कि वे स्वतंत्रता में जीवन बिताएँ। यदि हम शरीर के अनुसार चलते हैं, तो हम दासत्व में चल रहे हैं। यदि हम आत्मा के अनुसार चलते हैं, तो हम स्वतंत्र हैं, क्योंकि “ऐसे ऐसे कामों के विरोध में कोई भी व्यवस्था नहीं” (गला. 5:23)। ऐसी ही स्वतंत्रता के लिए “मसीह ने… हमें स्वतंत्र किया है” (गला. 5:1)।
तीतुस 2 अध्याय
यदि आपने तीतुस को लिखी गई पौलुस की पत्री को ध्यान से पढ़ा है, तो आपने अवश्य ही ध्यान दिया होगा कि उसमें संयम कितनी बार आता है। विशेष रूप में अध्याय दो में, यह शब्द अलग-अलग रूप में पाँच बार आता है। इन आयतों में, पौलुस तीतुस को सलाह देता है कि कलीसिया के विभिन्न समूहों के लोगों को: बूढ़े पुरुषों, बूढ़ी स्त्रियों, जवान स्त्रियों और जवानों पुरुषों को कैसे प्रोत्साहित किया जाए।
पौलुस लिखता है:
- “बूढ़े पुरुष… संयमी हों।”
- “जवान स्त्रियाँ… संयमी हों।”
- “जवान पुरुष… संयमी हों।”
- बूढ़ी स्त्रियाँ “जवान स्त्रियों को चेतावनी देती रहें”, और “चेतावनी देती रहें” के रूप में अनुवादित क्रिया का मूल “संयम” ही है।
दूसरे शब्दों में कहें तो संयम सभी मसीहियों — जवान और बूढ़े, स्त्री और पुरुषों के जीवन में स्पष्ट होना चाहिए।
आगे बढ़ने से पहले, इसे पढ़ रहे जवान पुरुषों के लिए एक संक्षिप्त शब्द कहना चाहूँगा। तीतुस अध्याय 2 में, पौलुस कई गुणों की सूची देता है, जो बूढ़े पुरुषों, बूढ़ी स्त्रियों और जवान स्त्रियों के जीवन की पहचान होनी चाहिए। परन्तु जब बात आपकी अर्थात् — जवान पुरुषों — की बात आती है, तो वह ऐसी कोई सूची नहीं देता। इसके बजाय, जवान पुरुषों का यह केवल एक गुण है: उसने तीतुस से कहा कि “जवान पुरुषों को भी समझाया कर कि संयमी हों” (तीतुस 2:6)। केवल इतना ही। वह इसे जवान पुरुषों के लिए इतना सरल क्यों रखता है? क्योंकि यदि जवान पुरुष संयम हासिल कर सकें, तो वे उन कई बुराइयों से बच जाएँगे, जो आमतौर पर जवान पुरुषों को परेशान करती हैं। कुछ ऐसे पापों के बारे में सोचें, जो जवान पुरुषों में आम पाए जाते हैं, यद्यपि अलग-अलग पुरुषों में इनकी मात्रा अलग-अलग होती है: जैसे आलस्य, अभिमान, अति-आक्रामकता, वासना, क्रोध। ऐसे और भी कई पाप हैं, जिनका उल्लेख किया जा सकता है, परन्तु इनमें से हर एक बुराई के पीछे संयम की कमी छिपी है। इस कारण, जवान पुरुषों को इस गुण को विकसित करने में अपनी पूरी ऊर्जा लगानी चाहिए। यह आपकी और आपके आसपास के लोगों की भलाई के लिए होगा।
तीतुस की बात पर वापस आते हैं: तीतुस की पत्री में पौलुस के द्वारा “संयम” के लिए उपयोग किया गया शब्द गलातियों 5 अध्याय में उपयोग किए गए शब्द से अलग है। और जबकि हम इन अन्तरों को बढ़ा-चढ़ाकर नहीं बताना चाहते, फिर भी तीतुस की पत्री में इस शब्द पर थोड़ा अलग जोर दिया गया है। अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण का वर्णन करने के बजाय, यह “एक स्थिर मन” का विचार देता है।2
गलातियों की पत्री की तरह, इस शब्द का अर्थ आसपास की आयतों में पौलुस के द्वारा कही गई हर बात से और पुष्ट होता है। तीतुस की पत्री जिन गुणों को प्रोत्साहित करना चाहती है, उनमें शान्त-चित्त, गरिमा, दृढ़ता, श्रद्धा, पवित्रता, सत्यनिष्ठा और इसी तरह के अन्य गुण शामिल हैं। ये गुण इच्छाओं पर लगाम लगाने और भोग-विलास से बचने के बारे में कम, बल्कि आत्मा में संयम और मन की स्थिरता विकसित करने के बारे में अधिक हैं। असल में, तीतुस 2 अध्याय में पौलुस के द्वारा उपयोग किए गए शब्द का अनुवाद “शान्तचित्त” (KJV; NKJV) और “समझदार” (NASB) के रूप में किया गया है।
यह समझ में आता है कि कुछ अनुवाद गलातियों 5 अध्याय और तीतुस 2 अध्याय में दोनों शब्दों को “संयम” के रूप में प्रस्तुत करते हैं, परन्तु दोनों के अर्थों पर ध्यान देना आवश्यक है। इन शब्दों में दिए गए अन्तरों को देखते हुए, हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि जब नया नियम संयम की बात करता है, तो वह हमारे सम्पूर्ण व्यक्तित्व को अर्थात्: मन और इच्छा दोनों को समान रूप से सम्बोधित करता है।
तो फिर, संयम क्या है? हम इसे अपनी इच्छाओं और कार्यों को नियंत्रित करने और परमेश्वर की महिमा के लिए हृदय और मन की स्थिरता का अनुसरण करने की आत्मा द्वारा सशक्त क्षमता के रूप में परिभाषित कर सकते हैं।
यीशु के जीवन में संयम
जब हम किसी बात को परिभाषित करना चाहते हैं, तो उदाहरण हमेशा सहायक होते हैं, और — हर एक गुण के साथ — हमारे पास प्रभु यीशु में एक सिद्ध आदर्श है। और जबकि वह मुख्य रूप से हमारा स्थान लेने और हमें उस धार्मिकता को प्रदान करने के लिए आया था, जिसे हम स्वयं कभी प्राप्त नहीं कर सकते, इसलिए हमारे उदाहरण के रूप में हमें उसी की ओर ताकना चाहिए। और अन्त में, आत्मा हमें उसकी समानता में ही रूपांतरित कर रहा है। अत: हमारे प्रतिमान के रूप में उसकी ओर ताकना हमारे लिए उचित और अच्छा है।
आइए हम कुछ ऐसे दृश्यों पर विचार करें, जहाँ यीशु संयम का प्रदर्शन करता है।
- परीक्षा करने वाले के सामने
यीशु के बपतिस्मा लेने के बाद, आत्मा उसे जंगल में ले जाता है, जहाँ वह चालीस दिन और चालीस रात बिना भोजन के रहता है। अवसर को देखकर, शैतान प्रकट होता है और यीशु की भूख पर निशाना साधता है। प्राचीन साँप चालाक है, और उसकी योजना चतुराई से भरी हुई है। मत्ती हमें यह भी बताता है कि जब शैतान आया, उस समय यीशु को “भूख लगी” थी (मत्ती 4:2)। अत: परीक्षा करने वाले ने अपना निशाना साधा: “यदि तू परमेश्वर का पुत्र है, तो कह दे, कि ये पत्थर रोटियाँ बन जाएँ” (मत्ती 4:3)। परीक्षा का मुँह ताककर यीशु व्यवस्थाविवरण 8:3 को उद्धृत करते हुए उत्तर देता है: “मनुष्य केवल रोटी ही से नहीं, परन्तु हर एक वचन से जो परमेश्वर के मुख से निकलता है, जीवित रहेगा” (मत्ती 4:4)।
यीशु इस तरह से प्रतिक्रिया देने में सक्षम कैसे है? उसकी भूख निश्चित रूप से भड़की हुई थी, और रोटी की पेशकश सचमुच उस परीक्षा में डालने वाली रही होगी। यीशु इस तरह से प्रतिक्रिया देने में सक्षम इसलिए हुआ, क्योंकि पवित्रशास्त्र का सत्य उसके लिए उसकी शारीरिक भूख से कहीं अधिक नियंत्रणकारी था। उस परीक्षा के प्रति उसके “न” ने उसे परमेश्वर के वादों के प्रति “हाँ” कहने की अनुमति दी। दूसरे शब्दों में कहें तो उसने अपनी वास्तविक और वैध भूख को परमेश्वर के वचन के अधीन रहने दिया। यही संयम है।
- उस पर दोष लगाने वालों के सामने
यीशु के पकड़े जाने, पूछताछ करने, कोड़े मारने और मृत्यु का दृश्य अन्यायों की एक लम्बी श्रृंखला है। वे आरोप झूठे थे, और दण्ड दिए जाने का हर एक क्षण अनुचित था। फिर भी यीशु कभी नहीं डगमगाया।
जब यीशु कैफा और बाकी की महासभा के सामने था, तो वह एक विक्षिप्त धार्मिक भीड़ के बीच था। वहाँ झूठे गवाह और दुष्ट बैरी मौजूद थे, जो यीशु पर थूक रहे थे और उसे मार रहे थे। फिर भी “यीशु चुप रहा” (मत्ती 26:63)।
जब पुन्तियुस पिलातुस ने उससे पूछताछ की, तो यीशु बातचीत करने के लिए तैयार था, परन्तु उसने कभी क्रूस से बचने का प्रयत्न नहीं किया। और मरकुस लिखता है कि जब यीशु ने यह निर्णय लिया कि इस तरह के आदान-प्रदान अब आवश्यक नहीं हैं, तो “यीशु ने फिर कुछ उत्तर नहीं दिया; यहाँ तक कि पिलातुस को बड़ा आश्चर्य हुआ” (मर. 15:5)।
यीशु इतने बैर को, यहाँ तक कि शारीरिक आक्रमण को भी कैसे सहन कर पाया, और फिर भी मौखिक या शारीरिक रूप से प्रतिशोध नहीं लिया? इब्रानियों का लेखक हमें बताता है कि यीशु “उस आनन्द के लिए जो उसके आगे धरा था” (इब्रा. 12:2) ऐसे दुर्व्यवहार का सामना करने में सक्षम हुआ। और पतरस कहता है कि, “वह गाली सुनकर गाली नहीं देता था, और दु: ख उठाकर किसी को भी धमकी नहीं देता था, पर अपने आप को सच्चे न्यायी के हाथ में सौंपता था” (1 पत. 2:23)। यीशु जानता था कि प्रतिशोध की अपेक्षा आज्ञाकारिता में अधिक आनन्द मिलता है — और वह अपने सभी दोष लगाने वालों को केवल एक शब्द से ही निष्फल कर सकता था। परन्तु पिता पर उसका भरोसा डगमगाया नहीं। परमेश्वर की वास्तविकता और अनन्त प्रतिफलों ने उसे अपनी जीभ पर नियंत्रण रखने और अपने मार्ग पर बने रहने में सक्षम बनाया।
- भीड़ के सामने
यीशु ने पृथ्वी पर अपनी संक्षिप्त सेवकाई में बहुत से लोगों के साथ व्यवहार किया। मत्ती रचित सुसमाचार की इन चंद आयतों पर ध्यान दें:
- “…भीड़ की भीड़ उसके पीछे हो ली” (मत्ती 4:25)।
- “…यीशु वहाँ से चला गया। और बहुत लोग उसके पीछे हो लिए, और उस ने सब को चंगा किया” (मत्ती 12:15)।
- “उसी दिन यीशु घर से निकलकर झील के किनारे जा बैठा। और उसके पास ऐसी बड़ी भीड़ इकट्ठी हुई” (मत्ती 13:1-2)।
- यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले की हत्या के बाद, यीशु “नाव पर चढ़कर वहाँ से किसी सुनसान जगह को, एकान्त में चला गया। लोग यह सुनकर नगर-नगर से पैदल ही उसके पीछे हो लिए। …और [उसने] उन पर तरस खाया, और उनके बीमारों को चंगा किया” (मत्ती 14:13-14)।
ऐसे कई उदाहरण हो सकते हैं। इस तथ्य के बावजूद कि यीशु के पास एकान्त का लगभग कोई अवसर नहीं था और लोग लगातार उससे चंगा करने की माँग करते रहते थे, परन्तु ध्यान दें कि उसने एक बार भी कभी चिढ़ या क्रोध से प्रतिक्रिया नहीं दी। उसने भीड़ की आवश्यकताओं पर या उसका ध्यान आकर्षित करने के उनके हठीलेपन पर कभी नाराजगी नहीं जताई। जब पौलुस लिखता है कि प्रेम “धीरजवन्त है, और कृपालु है… वह अनरीति नहीं चलता; झुँझलाता नहीं, बुरा नहीं मानता… वह सब बातें सह लेता है” (1 कुरिं. 13:4–5, 7), तो शायद कोई आश्चर्य करे कि क्या उसके मन में यीशु का उदाहरण था।
यूहन्ना रचित सुसमाचार में एक और विचलित करने वाला दृश्य है, जहाँ यीशु ने पाँच हज़ार लोगों को भोजन कराया और भीड़ ने इतने उत्साह से प्रतिक्रिया दी कि यीशु समझ गया कि “वे मुझे राजा बनाने के लिए पकड़ना चाहते हैं।” उसने स्वयं को मुकुट पहनाने की अनुमति देकर नहीं, बल्कि “पहाड़ पर अकेले” जाकर प्रतिक्रिया व्यक्त की (यूह. 6:15)।
ऐसा कैसे हुआ कि यीशु ने कभी भी बिना परेशान या क्रोधित हुए, अपनी प्रतिक्रियाओं पर पूरी तरह नियंत्रण रखा? वह कैसे उस भीड़ को अपने ऊपर हावी होने से रोक पाया, जिससे उसे अपने पिता की सेवा करने और दूसरों से प्रेम रखने की स्वतंत्रता मिली? वह उस उद्देश्य को जानता था, जिसके लिए वह आया था, और उसने सबसे पहले राज्य की खोज की, और वह जानता था कि सच्चा आनन्द दूसरों की भलाई करने में मिलता है। यही संयम है।
यीशु ने संयम की हमारी परिभाषा को शानदार ढंग से प्रस्तुत किया: जो कि इच्छाओं और कार्यों को नियंत्रित करने और परमेश्वर की महिमा के लिए हृदय और मन की स्थिरता का पालन करने की आत्मा-सशक्त-क्षमता है। कितना बढ़िया उद्धारकर्ता है!
चर्चा एवं मनन:
- क्या आप संयम को परिभाषित कर सकते हैं? आपके जीवन में कौन सा व्यक्ति संयम का अच्छा उदाहरण प्रस्तुत करता है?
- मसीह के जीवन का कौन सा दृश्य उस प्रकार के संयम को दर्शाता है, जिसे आप अपने जीवन में विकसित करना चाहते हैं?
- क्या आपने गलातियों 5:22-23 को कंठस्थ कर लिया है? उसे आजमाएँ!
2 संयम और हृदय
इससे पहले कि हम अनुप्रयोग के व्यावहारिक क्षेत्रों पर विचार करें, हृदय से सम्बन्धित ऐसे तीन प्रश्न हैं, जिन पर हमारा विचार करना महत्व रखता है।
1. क्या संयम एक मसीही सद्गुण है?
जैसा कि ऊपर ध्यान दिया गया है, हमारा युग प्रामाणिकता और आत्म-अभिव्यक्ति को पसन्द करता है। एक बार जब आप अपने उस संस्करण को खोज लेते हैं, जिसे आप अपनाना चाहते हैं, तो ऐसी कोई भी बात जो उसकी पूर्ण अभिव्यक्ति में बाधा डालती हो, उसे दूर कर देना चाहिए। ऐसे प्रतिबन्ध आपको अप्रामाणिक बनाने का जोखिम उत्पन्न करेंगे। अत:, कुछ तरीकों में, संयम इस युग की भावना के विपरीत है।3
और फिर भी, पुस्तकों की दुकान में से एक पुस्तक आपको बताएगी कि प्रकाशन जगत का एक पूरा खण्ड आत्म-सहायक संसाधनों, जीवन के नुस्खों और उत्पादकता को अधिकतम करने के लिए — अर्थात् ऐसी पुस्तकों के लिए समर्पित है, जो कामों को पूरा करने और स्वयं पर नियंत्रण पाने का रहस्य खोलने का वादा करती हैं। अत:, कुछ तरीकों में, संयम की — या कम से कम इसके किसी न किसी रूप की — अब भी अत्यधिक खोज की जाती है।
जबकि प्रामाणिकता का जुनून हमारे समय की एक अनूठी विशेषता हो सकती है, परन्तु यह अपनी भावनाओं पर संयम की खोज नहीं है। और न ही संयम केवल परमेश्वर के लोगों तक ही सीमित रहा है। प्लेटो और अरस्तू जैसे दार्शनिकों ने आत्म-नियंत्रण को — जो कि संयम का एक रिश्तेदार है — प्रमुख सद्गुणों में सूचीबद्ध किया है। संयम जैसे सद्गुणों पर सम्पूर्ण स्तोइक दार्शनिक विचारधारा पर निर्भर करता है।
इससे एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है: क्या अरस्तू का आत्म-नियंत्रण, स्तोइक का संयम और आज के गुरुओं का स्वयं को उच्चतम सीमा तक ले जाना, परमेश्वर की आत्मा के द्वारा उत्पन्न फल के समान हैं?
इसका संक्षिप्त उत्तर है: नहीं, यह वैसा नहीं है।
इसका दीर्घ उत्तर यह है कि मसीही सद्गुण और उसके गैर-मसीही समकक्षों के बीच का अन्तर हमेशा स्पष्ट नहीं होगा। मसीही चरित्र के कई तत्वों के साथ ऐसा ही है: दयालुता, आनन्द, धीरज, और भी बहुत कुछ। क्योंकि अधिकांश रूप से, आप इस बात पर ध्यान देने में सक्षम नहीं होंगे कि आप जो देख रहे हैं, वह पवित्र आत्मा का कार्य है या केवल सामान्य अनुग्रह का प्रदर्शन है।
स्पष्ट रूप से संयम के साथ, कुछ ऐसी मसीही बातें भी हो सकती हैं, जिन पर आप ध्यान दे सकते हैं। उदाहरण के लिए, हम अपने समय के साथ अनुशासित रहना चाहते हैं, जिससे कि हम वचन और प्रार्थना में समय बिता सकें। हम अपनी वित्तीय आदतों में बुद्धिमान होना चाहते हैं, जिससे कि हम अपनी कलीसियाओं को दान देकर उदार हो सकें। फिर भी, हो सकता है कि इन उदाहरणों में भी, हम केवल आत्मा के किसी नकली रूप पर ही ध्यान दे रहे हों।
ऐसा इसलिए है, क्योंकि आत्मा के द्वारा निर्मित संयम का सच्चा मसीही स्वरूप अर्थात् हृदय वह बात है, जिसे आप देख नहीं सकते। मसीही संयम और दूसरे संयम के बीच का अन्तर व्यवहार के पीछे का कारण है। सीमाओं के भीतर जीवन जीने का बड़ा लक्ष्य क्या है?
जिस अरस्तू ने आत्म-नियंत्रण को भोग-विलास और अभाव के बीच का माध्यम बताया, उसी ने इन सद्गुणों को सुख का मार्ग माना। यही उनका कारण था।4
स्तोइक अतिरेक से बचते थे तथा आंतरिक सामंजस्य और सद्गुणी जीवन जीने के लिए बाहरी कारकों के प्रति एक प्रकार की उदासीनता का अभ्यास करते थे।
संयम पर आज के समय के अधिकांश साहित्य का उद्देश्य स्वयं का सबसे अधिक उत्पादक और अनुकूलित संस्करण बनना है।
नि: सन्देह, इनमें से कोई भी इच्छा बुरी नहीं है। प्रसन्नता, सामंजस्य और उत्पादक आदतें सभी सार्थक लक्ष्य हैं। परन्तु प्रश्न यह है कि क्या ये अन्तिम लक्ष्य के रूप में सार्थक हैं।
आप शायद इसका उत्तर जानते होंगे: नहीं, ये नहीं हैं। समस्या यह है कि इन लक्ष्यों का पीछा किया जा सकता है, और यहाँ तक कि, परमेश्वर के प्रति किसी भी प्रकार का आदर दिखाए बिना, इन्हें हासिल भी किया जा सकता है। उत्पादकता और प्रसन्नता जैसी बातें केवल हमीं से सम्बन्धित हैं; उनका दायरा इस धरती और हमारे क्षणभंगुर जीवनों तक ही सीमित है। बाइबल की पहली ही आयत — “आदि में परमेश्वर ने आकाश और पृथ्वी की सृष्टि की” (उत्प. 1:1) — ऐसी धारणाओं का सीधा-सीधा सामना करती है। यह जीवन ही सब कुछ नहीं है, हमारा एक सृष्टिकर्ता है, तथा वह स्वर्ग और पृथ्वी दोनों को परिपूर्ण करता है। अत: हमारे जीवन का कोई भी विचार जो परमेश्वर से आरम्भ और समाप्त न हो, अधूरा है और मसीही धर्म के विरुद्ध है।
परमेश्वर हमें संयम, प्रसन्नता, उत्पादकता, आंतरिक शान्ति जैसे ही कुछ लक्ष्यों के लिए बुलाता है। परन्तु इनके पीछे की प्रेरक प्रेरणा यूनानियों या गुरुओं के द्वारा वर्णित किसी भी बात से ऊँची और बढ़कर है:
- मसीहियों को कठोर परिश्रम करना चाहिए और उत्पादक बनने का प्रयास करना चाहिए। ऐसा क्यों है? “जो कुछ तुम करते हो, तन मन से करो, यह समझकर कि मनुष्यों के लिए नहीं परन्तु प्रभु के लिए करते हो; क्योंकि तुम जानते हो कि तुम्हें इस के बदले प्रभु से मीरास मिलेगी; तुम प्रभु मसीह की सेवा करते हो” (कुलु. 3:23-24)।
- मसीहियों को अपनी पापी इच्छाओं पर लगाम लगाने का प्रयास करना चाहिए। ऐसा क्यों है? “क्योंकि परमेश्वर का वह अनुग्रह प्रकट है, जो सब मनुष्यों के उद्धार का कारण है, और हमें चेतावनी देता है कि हम… इस युग में संयम और धर्म और भक्ति से जीवन बिताएँ; और उस धन्य आशा की अर्थात् अपने महान् परमेश्वर और उद्धारकर्ता यीशु मसीह की महिमा के प्रकट होने की बाट जोहते रहें” (तीतु. 2:11–13)।
- मसीहियों को अपने समय के उपयोग में अनुशासित होना चाहिए। ऐसा क्यों है? “इसलिए ध्यान से देखो, कि कैसी चाल चलते हो : निर्बुद्धियों के समान नहीं पर बुद्धिमानों के समान चलो। अवसर को बहुमूल्य समझो, क्योंकि दिन बुरे हैं। इस कारण निर्बुद्धि न हो, पर ध्यान से समझो कि प्रभु की इच्छा क्या है” (इफि. 5:15-17)।
ध्यान दें कि हमें इस तरह सावधानी से जीवन जीने के लिए कौन सी बात से प्रेरित होना चाहिए: वह यह जागरुकता है कि हम सर्वशक्तिमान परमेश्वर और प्रभु यीशु मसीह के प्रति जवाबदेह हैं। उसने हमें बनाया है, उसने यह ठहराया है कि हमें कैसे जीवन बिताना चाहिए, और उसकी आज्ञाएँ ही सच्चे आनन्द का मार्ग हैं।
तो हमें संयम क्यों रखना चाहिए? परमेश्वर के आदर और महिमा के लिए।
क्या हम प्रसन्नता हासिल करना चाहते हैं? बिलकुल। क्या हम उत्पादक बनना चाहते हैं? मुझे आशा है। परन्तु इन बातों के पीछे की अन्तर्निहित प्रेरणा केवल स्वयं का सर्वश्रेष्ठ संस्करण बनना, या अपने आत्म-सम्मान को बढ़ाना, या स्वयं को केन्द्र में रखने वाली कोई भी बात नहीं है। इसकी मूल प्रेरणा यह होनी चाहिए कि हम “सब कुछ परमेश्वर की महिमा के लिए” करना चाहते हैं (1 कुरिं. 10:31)।
यीशु के जीवन के जिन उदाहरणों पर हमने ऊपर विचार किया, वे इसी बात को सिद्ध करते हैं। परीक्षा और पाप को “न” कहने और सभी सही बातों के लिए “हाँ” कहने की उसकी क्षमता, परमेश्वर की महिमा के प्रति उसकी भक्ति का प्रतिबिम्ब थी। यह हृदय-स्तरीय प्रेरणा ही संयम को आत्मा का एक सच्चा फल बनाती है।
2. क्या संयम केवल नियमों या सीमाओं के बारे में है?
हमारा दूसरा प्रश्न संयम की खोज में बुद्धि की भूमिका पर केन्द्रित है। सच्चा मसीही संयम नियम बनाने और फिर उनका पालन करने के बारे में नहीं है। यदि ऐसा होता, तो हम अपने द्वारा अभी-अभी स्थापित किए गए परमेश्वर-केन्द्रित उद्देश्यों को भूल सकते थे। हम अपनी ही योजनाओं के दास बनने का जोखिम भी उठा सकते थे, जो हमें ईश्वरीय और अप्रत्याशित अवसरों के प्रति अंधा बना देता।
और अपने स्थापित किए गए नियमों के अनुसार जीवन जीने से हम यह समझने से भी बच सकते हैं कि हमारा अधिकांश संयम मसीही स्वतंत्रता के दायरे में ही होता है।
इस बात को समझने में हमारी सहायता के लिए, हम संयम की दो अलग-अलग “गलियों” के बारे में सोच सकते हैं।
सबसे पहले, एक चौड़ी गली है। हम इसे संयम-या-पाप की गली कह सकते हैं। इस गली में कहीं भी आने-जाने की स्वतंत्रता है, परन्तु जैसे ही आप एक सीमा पार करते हैं, आप पाप की ओर बढ़ जाते हैं। उदाहरण के लिए, इंटरनेट के उपयोग पर विचार करें। ऑनलाइन आप बहुत कुछ कर सकते हैं जो अच्छा और लाभदायक है; वहाँ स्वतंत्रता है। परन्तु ऑनलाइन कुछ ऐसे क्षेत्र भी हैं — जैसे, अश्लील सामग्री — जो पूरी तरह से उस गली से बाहर और साथ ही साथ उस मार्ग से दूर है। वहाँ पहुँचने के लिए आपको पाप करना ही होगा। और उसमें मौजूद विकल्प यह हैं कि या तो संयम रखें और गली में रहें, या संयम की कमी से पाप में गिर पड़ें।
या अपनी बातचीत पर विचार करें। बोलने के ऐसे कई तरीके मौजूद हैं, जो परमेश्वर को आदर देते हैं, परन्तु अपनी जीभ का उपयोग करने के कुछ ऐसे तरीके भी मौजूद हैं, जो स्पष्ट रूप से पापपूर्ण हैं: अर्थात् झूठ बोलना, ईशनिंदा करना, गपशप मारना, और भी कई सारे। और उसमें मौजूद विकल्प यह हैं कि या तो संयम रखें और इन तरीकों से न बोलें, या संयम की कमी से पाप में गिर पड़ें।
इन दोनों ही उदाहरणों में, उस गली में बने रहने और स्वाभाविक रूप से पापपूर्ण गतिविधि से बचने के लिए संयम की आवश्यकता होती है।
परन्तु इंटरनेट के उपयोग और बातचीत दोनों में, हम चौड़ी गली के भीतर एक दूसरी, संकरी गली की पहचान कर सकते हैं। हम इसे संयम-या-नासमझी की गली कह सकते हैं। यह संकरी गली नियमों से नहीं, बल्कि बुद्धिमत्ता से परिभाषित होती है। इंटरनेट के उपयोग पर फिर से विचार करें, तो ऐसे कई तरीके मिलते हैं, जिनसे कोई व्यक्ति ऑनलाइन काम कर सकता है, जो स्वाभाविक रूप से पापपूर्ण नहीं हैं, परन्तु नासमझी भरे हैं। या जो आपके लिए या कुछ समय के लिए नासमझी भरे हो सकते हैं। चाहे वे ऐसी वेबसाइटें हों जो आपका समय बर्बाद करती हों या कम शिक्षाप्रद साबित हों — आपको विवेकपूर्ण सीमाएँ बनाकर संयम रखने की आवश्यकता हो सकती है।
यही हमारी बातचीत पर भी लागू होता है। ऐसे कई प्रकार के तरीके मौजूद हैं, जिनसे लोग अपनी बातचीत का उपयोग कर सकते हैं, जो शायद स्वाभाविक रूप से पापपूर्ण न हों, परन्तु नासमझी भरे होते हैं। यह बहुत अधिक बोलने की, या बहुत कम बोलने की आदत हो सकती है, या ऐसे कई तरीके हो सकते हैं, जिनसे हम अपनी जीभ का दुरुपयोग करने के लिए प्रवृत्त होते हैं। यह चाहे जो भी हो, इसके लिए समझदारी से सीमाएँ निर्धारित करने की आवश्यकता है।
कुरिन्थियों को पत्री लिखते समय पौलुस ने बुद्धिमानी भरी सीमाओं का प्रोत्साहन दिया। कुरिन्थ के लोगों का स्वतंत्रता के बारे में एक गलत दृष्टिकोण था, जैसा कि उनके एक नारे में झलकता है: “सब वस्तुएँ मेरे लिए उचित तो हैं” (1 कुरिं. 6:12; 10:23)। वे इस पंक्ति का उपयोग पापपूर्ण व्यवहार को वैध ठहराने के लिए कर रहे थे, और पौलुस ने इस पर आपत्ति जताई। पहली बात तो यह है कि सामान्य रूप से यह बात सच नहीं है कि सब वस्तुएँ उचित हैं। मसीही लोग मसीह की व्यवस्था के अधीन हैं (1 कुरिं. 9:21), और यद्यपि हम पाप और मूसा की व्यवस्था के बन्धन से मुक्त हैं, फिर भी हमें धार्मिकता के दास होना चाहिए (रोमि. 6:17-19)। और दूसरी बात यह है कि मसीह की व्यवस्था के अन्तर्गत भी, अन्य विचार हो सकते हैं।
पौलुस ने कुरिन्थियों के इस नारे का खण्डन करते हुए कुछ ऐसे ही विचार प्रस्तुत किए: “सब लाभ की नहीं” और “मैं किसी बात के अधीन न हूँगा” (1 कुरिं. 6:12)।
कोई वस्तु “लाभ की” है या नहीं, इसका निर्धारण इस बात से हो सकता है कि वह मसीह के साथ — या दूसरों के साथ हमारे चलने में सहायक है या बाधा, क्योंकि “लाभ की” शब्द का अर्थ कभी-कभी दूसरों का कल्याण होता है (10:23–24; 12:7)। और हम पर “किसी बात की प्रभुता” है या नहीं, इसका निर्धारण इस बात से हो सकता है कि क्या हमारे पास कठोर उपायों के बिना उसे त्यागने की स्वतंत्रता है।
हम इस डर में नहीं जीना चाहते कि हम हमेशा नियंत्रण खोने के छोर पर खड़े हैं। यह आश्चर्यजनक रूप से सत्य है कि “परमेश्वर की सृजी हुई हर एक वस्तु अच्छी है, और कोई वस्तु अस्वीकार करने के योग्य नहीं; पर यह कि धन्यवाद के साथ खाई जाए” (1 तीमु. 4:4)। परन्तु यदि आप स्वयं को अच्छी तरह जानते हैं और पाप के अंधकार को समझते हैं, तो आपके लिए किसी ऐसी वस्तु के बारे में सोचना कठिन नहीं होगा, जिसका आप आनन्द लेते हैं और जो भोग-विलास में बदल सकती है। यह सम्भव है कि किसी अच्छी वस्तु का आनन्द, बिना जाँचे छोड़ दिए जाने पर, दासत्व में बदल सकता है। संयम ही परमेश्वर को आदर देने वाले आनन्द और पापपूर्ण भोग-विलास के बीच का अन्तर है।
एकमात्र बात जिसे हम चाहते हैं, वह यह है कि परमेश्वर का आत्मा हमें नियंत्रित करे। ऐसा तब होता है, जब हम नियमों का पालन करने वाली व्यापक गली में जीवन बिताते हैं और, आवश्यकता पड़ने पर, सीमाएँ निर्धारित करते हैं, जिससे कि हम किसी भी बात के अधीन न हों। यह हमें हमारे तीसरे प्रश्न की ओर ले जाता है।
3. नियंत्रण किसके पास है?
संयम के सम्बन्ध में किसी व्यक्ति को यह मिथ्याबोध हो सकता है कि ऐसा लगे कि मानो इसे करने वाले लोग हम ही हैं, और इस तरह के प्रयास वाले हावभाव परमेश्वर के अनुग्रह और सम्प्रभुता के विपरीत प्रतीत होते हैं। यह तनाव केवल संयम तक ही सीमित नहीं है, यद्यपि “स्वयं” शब्द इस विशेष सद्गुण के साथ इसे और बढ़ा सकता है।
अत: आइए कुछ स्पष्टता की खोज करें।
नये नियम के लेखकों को हमें भक्ति की खोज में प्रयास करने के लिए कहने में बिलकुल भी समस्या नहीं है:
- “…डरते और काँपते हुए अपने उद्धार का कार्य पूरा करते जाओ” (फिलि. 2:12)।
- “परमेश्वर के सारे हथियार बाँध लो” (इफि. 6:11)।
- “अत: हम उस विश्राम में प्रवेश करने का प्रयत्न करें…” (इब्रा. 4:11)।
- “…भक्ति की साधना कर” (1 तीमु. 4:7)।
- “…तुम भी अपने सारे चालचलन में पवित्र बनो” (1 पत. 1:15)।
- “क्योंकि परमेश्वर की इच्छा यह है कि तुम पवित्र बनो:… और तुम में से हर एक पवित्रता और आदर के साथ अपनी पत्नी को प्राप्त करना जाने” (1 थिस्स. 4:3–4)।
यह मसीह की उस बुलाहट का जिसमें हमें अपना क्रूस उठाकर उसके पीछे हो लेने के लिए कहा गया था, या जीवन के मार्ग के सकरा होने के उसके वचन का उल्लेख नहीं है।
तो फिर अपने जीवन में पवित्रता — और विशेष रूप से संयम — उत्पन्न करने के लिए क्या हम जिम्मेदार हैं? हाँ, हम ही जिम्मेदार हैं। या तो हम जिम्मेदार हैं या फिर ऊपर दी गई ये आयतें अर्थहीन हैं।
परन्तु यह पूरी तस्वीर नहीं है। इन शर्तों को समेटते हुए और हमारे प्रयासों को प्रेरित करते हुए परमेश्वर ने वादे किए हैं:
- “…क्योंकि परमेश्वर ही है जो अपनी सुइच्छा के निमित्त तुम्हारे भीतर इच्छा और काम, दोनों करने का प्रभाव डालता है” (फिलि. 2:13)।
- “…जिसने तुम में अच्छा काम आरम्भ किया है, वही उसे यीशु मसीह के दिन तक पूरा करेगा” (फिलि. 1:6)।
- “तुम्हारा बुलाने–वाला सच्चा है, और वह ऐसा ही करेगा” (1 थिस्स. 5:24)।
- “जिन्हें उसने पहले से जान लिया है उन्हें पहले से ठहराया भी है कि उसके पुत्र के स्वरूप में हों, ताकि वह बहुत भाइयों में पहिलौठा ठहरे” (रोमि. 8:29)।
- “…और [तुमने] नये मनुष्यत्व को पहन लिया है, जो अपने सृजनहार के स्वरूप के अनुसार ज्ञान प्राप्त करने के लिए नया बनता जाता है” (कुलु. 3:10)।
यह मसीह के उन वादों का उल्लेख नहीं है कि कोई भी हमें पिता के हाथ से अलग नहीं कर सकता और जो कोई उसके पास आएगा, उसे निकाला नहीं जाएगा।
तो फिर क्या परमेश्वर, अन्त में हमारे भक्ति और संयम में बढ़ने के प्रयासों पर भी प्रभुता रखता है? हाँ, वह प्रभुता रखता है।
जब तक हमारा सांसारिक प्रवास समाप्त न हो जाए, तब तक हमें पाप को त्यागना है और जो भी बात हमें उलझाती है, उसे एक तरफ रख देना है, तथा प्रेम, संयम और पूर्ण भक्ति धारण करनी है। जैसा कि केंट ह्यूजेस कहते हैं कि इसके लिए थोड़ा “पवित्र पसीना बहाना” होगा।5
यह उन्नति धीमी हो सकती है, परन्तु परमेश्वर वादा करता है कि ऐसा होगा। वह स्वयं इसका ध्यान रखेगा। जैसे माता-पिता अपने बच्चों को दिन-प्रतिदिन लम्बे होते हुए नहीं देख सकते, परन्तु एक तस्वीर इसे स्पष्ट कर देती है, वैसे ही आत्मिक उन्नति के साथ भी है। जब हम पीछे मुड़कर उस उन्नति के प्रमाण देखते हैं, तो चाहे हम उसे अभी देखें, या अपने जीवन के अन्त में देखें, या कहीं बीच में देखें, इसमें कोई सन्देह नहीं होगा कि वास्तविक परिवर्तन और परिपक्वता घटित हुई है। और यह भी उतना ही स्पष्ट होगा कि यह परमेश्वर का आत्मा ही था, जिसने इसे सम्भव बनाया। और उसे महिमा मिलेगी।
चर्चा एवं मनन:
- यीशु का क्रूस पर किया गया कार्य आपके संयम को क्यों प्रेरित करे?
- आपके जीवन में “अविवेकी” क्षेत्र कौन से हैं?
- स्वयं से पूछें कि आप संयम में जीवन बिताने की इच्छा क्यों रखते हैं। कौन सी बात आपको प्रेरित कर रही है?
3 संयम को लागू करना
परमेश्वर चाहता है कि आप एक संयमित जीवन बिताएँ। उसने “हमें भय की नहीं, पर सामर्थ्य और प्रेम और संयम की आत्मा दी है” (2 तीमु. 1:7)। और उसने यह सुनिश्चित करने के लिए अपना आत्मा भी दिया है कि ऐसा घटित हो। अत: इस क्षेत्रीय मार्गदर्शिका के इस भाग में, मैं आपको चुनौती देना चाहता हूँ कि आप संयम धारण करें। यीशु ने आपके लिए जो कुछ पहले ही पूरा कर लिया है, उसे अर्जित करने के लिए नहीं, बल्कि परमेश्वर की महिमा करने और यीशु ने आपके लिए जो कुछ भी पूरा किया है, उसकी प्रशंसा करने के लिए ऐसा करें।
ऐसा करने के लिए, आइए कुछ ऐसे क्षेत्रों पर दृष्टि डालें, जिनमें लोगों को संघर्ष करना पड़ सकता है, और आइए उन बातों पर विचार करें, जो पवित्रशास्त्र कहता है, और अपने जीवन में परमेश्वर की महिमा के निमित्त उस पर काम करने के लिए प्रतिबद्ध हों।
समय
“हम को अपने दिन गिनने की समझ दे कि हम बुद्धिमान हो जाएँ।” – भजन संहिता 90:12
समय का भण्डारीपन हममें से कई लोगों के लिए संघर्ष का क्षेत्र रहा है। यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है, क्योंकि जब पौलुस हमें “समय का सर्वोत्तम उपयोग” करने के लिए प्रोत्साहित करता है, तो वह हमें यह भी बताता है कि “दिन बुरे हैं” (इफि. 5:15-16)। जिस युग में हम जी रहे हैं — और यह हर युग के लिए सत्य रहा है और रहेगा, जब तक कि मसीह का राज्य पूर्ण रूप से न आ जाए — वह मसीही विश्वासयोग्यता को प्रोत्साहित नहीं करता। अत: यदि हम सावधान नहीं हैं, तो हम अपने समय का उपयोग ऐसे तरीकों से करेंगे, जो मसीह का अपमान करते हैं: अर्थात् आलस्य और सुस्ती, सांसारिक गतिविधियाँ, पापपूर्ण कार्य, या विश्राम करने से इन्कार। इनमें से कोई भी हमारे मिनटों, घण्टों, दिनों और वर्षों का प्रबन्धन करने के विश्वासयोग्य तरीके नहीं हैं।
समय हमारा सबसे अनमोल संसाधन है, और विश्वासयोग्यता की दिशा में काम करना अत्यन्त महत्वपूर्ण है। समय के भण्डारीपन पर एक उपदेश में, जोनाथन एडवर्ड्स ने कहा,
“यह अनन्त काल के लिए एक क्षण के समान है। समय बहुत कम है, और इसमें हमें जो कार्य करना है, वह इतना बड़ा है कि हमारे पास उसे छोड़ने के लिए कुछ भी नहीं है। अनन्त काल की तैयारी के लिए हमें जो कार्य करना है, उसे समय पर पूरा करना होगा, अन्यथा यह कभी नहीं हो सकता।”6
यदि एडवर्ड्स सही हैं कि हमें जो कार्य करना है, वह “बहुत बड़ा” है (और वह सही हैं), तो हमें अपने समय के बारे में कैसे सोचना चाहिए?
राजा सुलैमान अपने पुत्र को इस विषय पर निर्देश देने के लिए एक महत्वपूर्ण उदाहरण देता है, और हम उसके शब्दों पर विचार करने से बेहतर कुछ नहीं कर सकते:
“हे आलसी, चींटियों के पास जा;
उनके काम पर ध्यान दे, और बुद्धिमान हो।
उनके न तो कोई न्यायी होता है,
न प्रधान, और न प्रभुता करनेवाला,
तौभी वे अपना आहार धूपकाल में संचय करती हैं,
और कटनी के समय अपनी भोजनवस्तु बटोरती हैं।
हे आलसी, तू कब तक सोता रहेगा?
तेरी नींद कब टूटेगी?
कुछ और सो लेना, थोड़ी सी नींद, एक और झपकी,
थोड़ा और छाती पर हाथ रखे लेटे रहना,
तब तेरा कंगालपन राह के लुटेरे के समान
और तेरी घटी हथियार बन्द के समान आ पड़ेगी।” (नीति. 6:6–11)
चींटियों पर इस ध्यान देने में, सुलैमान देखता है कि वे बिना किसी निगरानी के वह सब करती हैं, जो कुछ आवश्यक है। चींटियों को काम पर बने रहने के लिए किसी को कोड़े मारने की आवश्यकता नहीं होती। क्या हमारे बारे में भी यही कहा जा सकता है? या क्या हमारा भण्डारीपन इतना खराब है कि हम पर कभी भी काम के लिए भरोसा करना मुश्किल है?
8वीं आयत में, सुलैमान बताता है कि चींटी “अपना आहार धूपकाल में संचय करती हैं, और कटनी के समय अपनी भोजनवस्तु बटोरती हैं।” अलग-अलग मौसमों के लिए अलग-अलग गतिविधियाँ होती हैं: अर्थात् गर्मियों में तैयारी करना, अर्थात् कटनी के समय इकट्ठा करना। दूसरे शब्दों में कहें तो चींटी सही काम करने का सही समय जानती है।
उत्पादकता के बारे में यह एक ऐसा दृष्टिकोण है, जिसे अपनाना हमारे लिए अच्छा है। हर समय जितना हो सके, उतना ही काम करने की प्रतिबद्धता के साथ जीवन बिताना परमेश्वर का आदर नहीं करता। सृष्टि के सप्ताह में परमेश्वर ने ऐसा नहीं किया था, और न ही यीशु ने अपने जीवन के केवल तीन वर्ष सार्वजनिक सेवकाई में सक्रिय रूप से बिताकर ऐसा किया था। और अधिकतम उत्पादकता का दृष्टिकोण निश्चित रूप से थकावट का कारण बनता है। जैसा कि सुलैमान ने कहीं और कहा है, “चैन के साथ एक मुट्ठी उन दो मुट्ठियों से अच्छा है, जिनके साथ परिश्रम और मन का कुढ़ना हो” (सभो. 4:6)।
यह दृष्टिकोण रिश्तों में उपलब्ध रहना भी बहुत कठिन बना देता है। यदि जीवन के प्रति हमारा दृष्टिकोण अधिकतम उत्पादकता का है, तो किसी प्रियजन को बिना पूर्वनिर्धारित फोन करने या अस्पताल में किसी मित्र से तत्काल मिलने जाने का समय किसके पास है?
समय के हमारे उपयोग में संयम का अर्थ है, सही समय पर सही तरीके से सही काम करना। जब हम काम पर हों, तो हमें काम करना चाहिए। और जो बात हमारे काम में बाधा डालती है, उसके लिए सीमाएँ निर्धारित करना बुद्धिमानी है। और जब हम घर पर हों, तो हमें घर पर ही रहना चाहिए, और उस समय की रक्षा के लिए सीमाएँ निर्धारित करनी चाहिए। जब हमें सोना हो, तो हमें सोना चाहिए। इस सिद्धान्त को हमारी सभी जिम्मेदारियों पर लागू किया जा सकता है: सही समय पर सही तरीके से सही काम करें। गर्मियों में तैयारी करें, अर्थात् कटनी के समय इकट्ठा करें।
जब सुलैमान चींटी पर अपना अवलोकन समाप्त करता है, तो वह आलसी की ओर अपना ध्यान लगाता है: तू कब उठकर कुछ करेगा? वह नींद की बात कर रहा है, परन्तु हम इसे आसानी से अपने संघर्षों से भी जोड़ सकते हैं: “तू कब तक अपनी स्ट्रीमिंग सेवा का भरपूर आनन्द लेगा?” “इससे पहले कि तू वास्तव में उठ खड़ा हो, तू कब तक उस फोन पर स्क्रॉल करता रहेगा?”
उचित और परमेश्वर का आदर करने वाले विश्राम का एक समय होता है। परन्तु नींद और विश्राम तो भूख हैं, और यदि आप थोड़ा-बहुत इधर-उधर करते हो, तो ये भूख बढ़ती जाएगी। और एक दिन आप जागोगे और महसूस करोगे कि आप अपना जीवन परमेश्वर के भय में नहीं जी रहे हो।
एक पीड़ादायी सच्चाई यह है कि समय के हमारे खराब भण्डारीपन का दाम हमेशा किसी न किसी को चुकाना पड़ेगा। यदि हम काम में आलसी हैं, तो हमारे नियोक्ता और सहकर्मी इसके प्रभाव को महसूस करते हैं। परन्तु यदि हमें अपने आलस्य की भरपाई उस समय से करनी पड़े, जो हमें अपने परिवार, कलीसिया और मित्रों के लिए बचाना चाहिए, तो हमारे प्रियजनों के साथ भी ऐसा ही होगा।
मूल्यांकन करें कि आप अपने समय का प्रबन्धन कैसे करते हैं, और ध्यान दें कि कौन सी बात को बदलने की आवश्यकता है। यदि आप निश्चित नहीं हैं, तो अपने सबसे करीबी लोगों से उनके विचार साझा करने के लिए कहें। उसके बाद कार्य करें: यदि ऐसी स्थिति आए, तो उन लोगों के सामने स्वीकार करें जिनके विरुद्ध आपने पाप किया है। सीमाएँ निर्धारित करें, और इस सबसे अनमोल बात के साथ परमेश्वर का आदर करें।
विचार करना
“इस संसार के सदृश न बनो; परन्तु तुम्हारे मन के नये हो जाने से तुम्हारा चाल–चलन भी बदलता जाए।” — रोमियों 12:2
अपने जीवन के विचारों में संयम रखना शायद सम्भव न लगे, परन्तु यह प्रयास करने के योग्य है। हमें अपने मन, प्राण और बुद्धि से परमेश्वर से प्रेम करना है (मत्ती 22:37)। पवित्रशास्त्र यह मानता है कि हम अपनी सोच में सवार होकर यात्रा करने वाले मात्र यात्री नहीं हैं, बल्कि हमारे मन में जो कुछ भी घटित होता है, उस पर हमारा नियंत्रण है।
प्रेरित पौलुस लिखता है,
“इसलिए हे भाइयों, जो जो बातें सत्य हैं, और जो जो बातें आदरणीय हैं, और जो जो बातें उचित हैं, और जो जो बातें पवित्र हैं, और जो जो बातें सुहावनी हैं, और जो जो बातें मनभावनी हैं, अर्थात् जो भी सद्गुण और प्रशंसा की बातें हैं उन पर ध्यान लगाया करो।” (फिलि. 4:8)
क्या आपने वह अन्तिम भाग समझ लिया? यह एक अनिवार्य बात है: उन पर ध्यान लगाया करो।
यदि ये बातें असम्भव होतीं, तो पौलुस हमें ऐसा करने के लिए नहीं कहता। हम भजन संहिता अध्याय 1 में भी अधिकार की यही बाइबल आधारित अवधारणा देखते हैं, जहाँ धन्य व्यक्ति को दिन-रात परमेश्वर की व्यवस्था पर ध्यान करने के लिए कहा गया है। इस प्रकार के ध्यान में यह निर्णय लेना शामिल है कि हमें किस विषय पर विचार करना है और किस बात को अपने मन से निकाल देना है। कहने का अर्थ है कि बाइबल हमें अपने मनों में संयम रखने के लिए कहती है।
ऐसा मानसिक अनुशासन एक चुनौती है, और यहाँ कुछ लोग ऐसे भी हैं, जिनके लिए कुछ विशेष तरह के विचार “चिपचिपे” साबित होते हैं, 7 परन्तु हम सभी को इस बात के लिए प्रोत्साहित किया जाता है कि “तुम्हारे मन के नये हो जाने से तुम्हारा चाल–चलन भी बदलता जाए” (रोमि. 12:2)।
हमारी सोच के ऐसे कई क्षेत्र हैं, जहाँ संयम सहायक हो सकता है, परन्तु आइए उनमें से दो: अर्थात् वासनापूर्ण विचार और अपरिपक्व सोच पर विचार करें।
वासना
यदि आप स्वतंत्रता को स्वीकार कर लेते हैं और अपने विचारों को अपने साथ घटित होने देते हैं, तो वासना एक हारी हुई लड़ाई साबित होगी। आपको संघर्ष करने के लिए तैयार रहना चाहिए और उसका मुकाबला करने के लिए सुसज्जित रहना चाहिए। जो लोग लगातार वासना से जूझते रहते हैं, उनकी सहायता करने का एक तरीका वास्तव में व्यावहारिक होना है: एक नोटकार्ड से आरम्भ करें। उस नोटकार्ड पर, बाइबल की एक या दो आयतें लिखें जो 1 थिस्सलुनीकियों 4:3 के जैसे आपको वासनापूर्ण विचार से लड़ने में सहायता कर सकती हैं, “क्योंकि परमेश्वर की इच्छा यह है कि तुम पवित्र बनो: अर्थात् व्यभिचार से बचे रहो।” या इसे कुछ ऐसा बनाएँ जिसकी ओर आप अपना मन लगाना चाहते हैं, जिससे कि आप वासना को त्यागकर कुछ शिक्षाप्रद बातों को अपनाएँ, जैसे “भाईचारे के प्रेम से एक दूसरे से स्नेह रखो; परस्पर आदर करने में एक दूसरे से बढ़ चलो” (रोमि. 12:10)।
उस कार्ड को अपनी जेब में रखें, या उसे अपने डैशबोर्ड या कंप्यूटर पर चिपका दें, और जब कोई वासनापूर्ण विचार आपके मन में प्रवेश करे, तो उस कार्ड को निकालकर पढ़ें, और तब तक प्रार्थना करें, जब तक कि आपको उस पर विश्वास न हो जाए। यदि आप अभी भी संघर्ष कर रहे हैं, तो इसे दोबारा करें। ऐसा तब तक करें जब तक आप वह अनुभव न कर सकें जो यीशु ने अपनी परीक्षा में अनुभव किया था: अर्थात् सत्य की वास्तविकता, प्रचण्ड भूख पर भारी पड़ रही है। यह अपने विचारों को बन्दी बनाने और संयम रखने का एक तरीका है।
अपरिपक्वता
1 कुरिन्थियों 14:20 में, पौलुस कहता है, “हे भाइयों, तुम समझ में बालक न बनो: बुराई में तो बालक रहो, परन्तु समझ में सियाने बनो।”
परिपक्व सोच कैसी दिखती है?
उदाहरण के रूप में, नीतिवचन 18:17 बताता है, “मुकद्दमे में जो पहले बोलता, वही सच्चा जान पड़ता है, परन्तु बाद में दूसरे पक्षवाला आकर उसे जाँच लेता है।” अपरिपक्व, बचकाने तरीके वाली सोच कहानी का एक पक्ष सुनती है और फिर प्रतिक्रिया में भावुक राय बना लेती है। परिपक्व, संयमित तरीके वाली सोच प्रतीक्षा करती है, सतही सोच से संतुष्ट नहीं होती, और जब तक अधिक जानकारी एकत्र न हो जाए, तब तक धीरज धरकर एक राय बनाती है।
चूँकि हम क्लिकबेट, अर्थात् तीखी टिप्पणियों और भावुकतावाद की संस्कृति में रहते हैं, इसलिए संयम का यह रूप आपको हमारे युग की भावना के बिलकुल विपरीत खड़ा कर देगा। व्यावहारिक रूप से: अगली बार जब आप किसी विवाद के बारे में सुनें, या समाचारों में कोई वायरल वीडियो देखें, तो आरम्भिक कहानी पर विश्वास करने की परीक्षा का विरोध करें। सोचने का परिपक्व तरीका कहानी का एक पक्ष सुनकर यह सोचना है, “हो सकता है कि वह बिलकुल सही हो, परन्तु हमें देखना होगा।”
बाकी सभी को अपनी राय रखने दें और उन्हें सोशल मीडिया पर जोरदार तरीके से व्यक्त करें। अपनी सोच में परिपक्व, शान्तचित्त और आत्म-संयमित रहें।
भावनाएँ
“विलम्ब से क्रोध करना वीरता से, और अपने मन को वश में रखना, नगर को जीत लेने से उत्तम है।” – नीतिवचन 16:32
“मूर्ख अपने सारे मन की बात खोल देता है, परन्तु बुद्धिमान अपने मन को रोकता, और शान्त कर देता है।” – नीतिवचन 29:11
हमारे भावनात्मक जीवन में संयम कैसा दिखता है? यह अपनी आत्मा को पूरी तरह से खोल देने की नहीं, बल्कि उस पर शासन करने की क्षमता जैसा दिखता है। ऐसा लगता है कि हम हमारी भावनाओं को हमारी सोच का मार्गदर्शन करने देने के बजाय, उन्हें अपनी सोच की सेवा करने की अनुमति दे रहे हैं।
यह एक ऐसा क्षेत्र है, जहाँ प्रामाणिकता की चिन्ता परिपक्वता को कमजोर कर सकती है। हमारी संस्कृति में, जुनून लगभग एक भावनात्मक तुरुप का पत्ता बन गया है, अत: यदि मैं बस पर्याप्त जुनून के साथ कुछ कहूँ, तो वह सच होना चाहिए या कम से कम गम्भीरता से लिया जाना चाहिए। परन्तु कुछ जुनून हमारी आत्माओं को “पूरी तरह से बाहर निकालने” से अधिक कुछ नहीं है। समझदारी इसी में है कि हम संयम रखें और ऐसा व्यक्ति बनें जो उसे “रोकता, और शान्त कर देता है” (नीति. 29:11)।
यही अधिकार भावनात्मक प्रतिक्रियाओं को भी दिया गया है। यदि आप कुछ कहते या करते हैं और मेरी भावनाएँ आहत होती हैं, तो यह महत्व नहीं रखता कि आपने जो किया या कहा वह गलत था या चोट पहुँचाने की मंशा से था, जो तथ्य महत्व रखता है, वह यह है कि मेरी भावनाएँ आहत हुई हैं। यह बचकानी बात है, और उस बात के बिलकुल विपरीत है, जिसकी सुलैमान प्रशंसा करता है: “जो मनुष्य बुद्धि से चलता है वह विलम्ब से क्रोध करता है, और अपराध को भुलाना उसको शोभा देता है” (नीति. 19:11)।
भावनाएँ अच्छी बातें हो सकती हैं। प्रभु यीशु ने लाज़र की कब्र पर दुःख प्रकट किया (यूह. 11:35), मन्दिर को शुद्ध करते समय क्रोध प्रकट किया (यूह. 2:13-22), गतसमनी में चिन्ता प्रकट की (मत्ती 26:38-39), और प्रार्थना करते समय “पवित्र आत्मा में होकर आनन्द से भर गया” (लूका 10:21)। और मसीहियों के रूप में, हमें आनन्दित होने और रोने की आज्ञा दी गई है (रोमि. 12:15)।
तो फिर, भावनात्मक परिपक्वता भावनाओं का अभाव नहीं हो सकती। इसके बजाय, यह हमारी भावनाओं पर शासन करने और उनके द्वारा शासित न होने की क्षमता में है।
अपरिपक्व भावनाएँ क्षणभंगुर, सतही होती हैं, और हमारे मन एवं इच्छा के अनुरूप नहीं हो सकती हैं। वे हमारे भीतर उठती हैं और एक बड़ा प्रभाव डालती हैं।
ऐसी अपरिपक्वता का एक उदाहरण वह है, जब बच्चे (या वयस्क, इस मामले में) नखरे दिखाते हैं। वे नियंत्रण खो देते हैं और अक्सर ऐसे तरीकों से अपनी भावनाओं को हावी होने देते हैं, जिनके लिए उन्हें बाद में शर्मिंदगी उठानी पड़ती है। जब मेरा बेटा छोटा था और गुस्से वाले नखरे दिखाता था, तो हम उसे याद दिलाते थे कि “बड़े लड़कों में संयम होता है।” अब वह नखरे दिखाने से आगे निकल गया है, परन्तु यह एक ऐसा सन्देश है, जो उसे अब भी सुनाई देता है।
परिपक्व, संयमित भावनाएँ — जिन्हें स्नेह कहना अधिक सही होगा — हमारी मान्यताओं और इच्छाओं के अनुरूप होते हुए पूरे व्यक्ति को प्रभावित करती हैं, और स्थायी साबित होती हैं। ये हमारे भीतर उठती हैं और हमें उन तरीकों से प्रेरित करती हैं, जो उन परिस्थितियों के लिए अच्छे और उपयुक्त हों। ये सही समय पर और सही मात्रा में दुःख, आनन्द और बाकी सब कुछ व्यक्त करती हैं।
यदि हम इस विकृत पीढ़ी में ज्योति की तरह चमकना चाहते हैं, तो अपने भावनात्मक जीवन में संयम का अभ्यास करना बहुत सहायक साबित होगा।
जीभ
“जो कोई वचन में नहीं चूकता वही तो सिद्ध मनुष्य है।” — याकूब 3:2
जीभ को वश में करना एक विश्वव्यापी लड़ाई है, परन्तु यह अलग-अलग लोगों के लिए अलग-अलग मोर्चों पर होती है। कुछ लोग बहुत जल्दी बोल जाते हैं, जबकि दूसरे तब नहीं बोलते, जब उन्हें बोलना चाहिए। कुछ लोग बोलना आरम्भ करते ही बहुत लम्बी-चौड़ी बातें करने लगते हैं, जबकि कुछ लोग कठोर, अश्लील और अशिष्ट होने से जूझते हैं। कुछ लोग झूठ बोलने से बच नहीं पाते, जबकि दूसरे लोग अपनी बात पर बने रहने में असफल रहते हैं।
हमारी बोली में संयम कैसे दिखता है? यह इफिसियों 4:29 को अपना मानक बनाने जैसा है: “कोई गन्दी बात तुम्हारे मुँह से न निकले, पर आवश्यकता के अनुसार वही निकले जो उन्नति के लिए उत्तम हो, ताकि उससे सुननेवालों पर अनुग्रह हो।”
यदि आप बोलते समय शिक्षाप्रद होने को अपना लक्ष्य बनाते हैं, तो आप अपने शब्दों का उपयोग प्रोत्साहित करने, पुष्टि करने, सच बोलने और गवाही देने के लिए करेंगे। यह सब परमेश्वर को प्रसन्न करता है और आपके आसपास के लोगों पर अनुग्रह करता है।
संयमित जीभ वाले लोग अक्सर अच्छी तरह सुनने का भी कौशल रखते हैं। आप शायद किसी ऐसे व्यक्ति को जानते होंगे, जो इतना खराब सुनता है कि आप सोच में पड़ जाते हैं कि उनसे बात करने के प्रयत्न से क्या लाभ, या जो स्पष्ट रूप से आपके रुकने की प्रतीक्षा कर रहा है, जिससे कि वे अपनी बात कह सकें। ऐसे गुण न केवल खराब सुनने को दर्शाते हैं, बल्कि एक स्वार्थी, आत्म-मुग्ध हृदय को भी दर्शाते हैं। यदि कोई सुनेगा ही नहीं, तो उनकी बातें अक्सर स्वार्थी होंगी।
अपने आसपास के लोगों को प्रोत्साहित करने और उनकी सेवा करने की प्रतिबद्धता हमारी मौखिक बातचीत, हमारे सुनने और हमारी लिखित बातचीत में झलकनी चाहिए। चाहे वे हमारे ग्रंथ हों, हमारी सोशल मीडिया पोस्ट हों, या कुछ और हों, हम सभी को इस सच्चाई से काँपना चाहिए कि “जो जो निकम्मी बातें मनुष्य कहेंगे, न्याय के दिन वे हर एक उस बात का लेखा देंगे” (मत्ती 12:36)।
जैसा कि याकूब ने भी ध्यान दिया है, यदि कोई अपनी जीभ पर लगाम लगा सकता है, “वही तो सिद्ध मनुष्य है” (याकू. 3:2)। हममें से कोई भी ऐसा नहीं करता जैसा हमें करना चाहिए, इसी कारण से पवित्रशास्त्र इसके बारे में इतना कुछ कहता है।
परमेश्वर का वचन हमारी बोली को जैसे निर्देशित करता है, इसके तरीकों के एक नमूने पर विचार करें और ध्यान दें कि कौन सी आयतें आपके लिए विशेष रूप से प्रासंगिक हैं:
- “जहाँ बहुत बातें होती हैं, वहाँ अपराध भी होता है, परन्तु जो अपने मुँह को बन्द रखता, वह बुद्धि से काम करता है” (नीति. 10:19)
- “परन्तु तुम्हारी बात ‘हाँ’ की ‘हाँ,’ या ‘नहीं’ की ‘नहीं’ हो; क्योंकि जो कुछ इस से अधिक होता है वह बुराई से होता है” (मत्ती 5:37)।
- “पर अब तुम भी इन सब को, अर्थात् क्रोध, रोष, बैरभाव, निन्दा और मुँह से गालियाँ बकना ये सब बातें छोड़ दो” (कुलु. 3:8)।
- “एक ही मुँह से धन्यवाद और शाप दोनों निकलते हैं। हे मेरे भाइयों, ऐसा नहीं होना चाहिए” (याकू. 3:10)।
- “बातें करने में उतावली न करना, और न अपने मन से कोई बात उतावली में परमेश्वर के सामने निकालना, क्योंकि परमेश्वर स्वर्ग में है और तू पृथ्वी पर है; इसलिए तेरे वचन थोड़े ही हों” (सभो. 5:2)।
हमारी बोली में ठोकर खाने के इतने सारे तरीके मौजूद हैं कि पूरी तरह चुप रहना भी परीक्षा में डालने वाला हो जाता है। और फिर भी हमें बोलना ही होगा!
परमेश्वर का भय मानो, दूसरों से प्रेम रखो, और दूसरों को प्रोत्साहित करने एवं अनुग्रह प्रदान करने का प्रयास करके अपनी जीभ पर नियंत्रण रखो। इससे तुम अपने आसपास के लोगों को आशीषित करोगे और स्वयं को अधिक झगड़ों से बचाओगे।
देह
“और तुम अपने नहीं हो? क्योंकि दाम देकर मोल लिए गए हो, इसलिए अपनी देह के द्वारा परमेश्वर की महिमा करो।” — 1 कुरिन्थियों 6:19–20
हमारी देह हमारी नहीं हैं, हम तो बस उनके भण्डारी हैं, जब तक वे हमारे पास हैं। और इस जीवन में हमें उनमें से केवल एक ही मिली है।8
दैहिक भण्डारीपन में संयम की कमी से पेटूपन, मतवालापन, आलस्य, यौन अनैतिकता, और भी बहुत कुछ हो सकता है। संयम धारण करने का आरम्भ इस दृढ़ विश्वास से होता है कि परमेश्वर हमारी देह का स्वामी है, और प्रभु की सेवा करते हुए अपने सांसारिक निवासों की देखभाल करना हमारी जिम्मेदारी है।
इससे भोजन के साथ हमारा सम्बन्ध प्रभावित होना चाहिए। हमें इसे परमेश्वर की ओर से एक अच्छे वरदान के रूप में भोगना चाहिए, परन्तु जैसा कि पौलुस कहता है, हमें किसी भी वस्तु की अति-निर्भरता या लत के वशीभूत नहीं होना चाहिए।
व्यायाम के साथ हमारे सम्बन्ध को इसी से प्रभावित होना चाहिए। शारीरिक प्रशिक्षण का भले ही अनन्त मूल्य न हो, परन्तु इसका कुछ मूल्य तो अवश्य है (1 तीमु. 4:8)। शारीरिक प्रशिक्षण के मूल्य को कम महत्व देना भी एक ऐसी बात है, जो खराब भण्डारीपन का प्रतीक है। और शारीरिक प्रशिक्षण को अधिक महत्व देना भी एक ऐसी बात है, जो गलत प्राथमिकताओं का संकेत हो सकती है। जिस रीति से एक कारीगर यह सुनिश्चित करने के लिए अपने उपकरणों की देखभाल करता है कि वे अपना उद्देश्य पूरा कर सकें, उसी रीति से हमें अपने शरीर का भी ध्यान रखना चाहिए, कहीं ऐसा न हो कि वे विश्वासयोग्यता में बाधा बन जाएँ।
और यह वास्तविकता कि हम अपनी देह के भण्डारी हैं, हमें यौन अनैतिकता से घृणा करने और उससे दूर भागने के लिए प्रेरित करनी चाहिए। हमारी देह परमेश्वर की है, और अनैतिकता के लिए इसका उपयोग करके अपनी देह का अपमान करना हमारे सृष्टिकर्ता का अपमान करना है। बुद्धिमान व्यक्ति यह सुनिश्चित करने के लिए सीमाएँ निर्धारित करता है कि हम पाप से दूर रहें।
ये पाँच क्षेत्र ऐसे हैं, जहाँ संयम हमारी सहायता करेगा, परन्तु आप अपने जीवन के किसी भी क्षेत्र को लेकर यह निर्धारित कर सकते हैं कि संयम कैसा दिखता है। ऐसे प्रयास कठिन होते हैं, और इसके लिए मार्ग में अंगीकार और पश्चाताप की आवश्यकता होगी, परन्तु परमेश्वर हमसे यही चाहता है, और अपनी आत्मा के द्वारा वह इसे साकार कर सकता है।
चर्चा एवं मनन:
- इनमें से किस क्षेत्र पर आपके जीवन में सबसे अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है?
- संयम में प्रगति करने के लिए आप कौन-सी सीमाएँ निर्धारित कर सकते हैं?
- आपको जवाबदेह ठहराने के लिए आप अपने जीवन में किसे आमंत्रित कर सकते हैं?
निष्कर्ष
“इसी कारण तुम सब प्रकार का यत्न करके अपने विश्वास पर सद्गुण, और सद्गुण पर समझ, और समझ पर संयम, और संयम पर धीरज, और धीरज पर भक्ति, और भक्ति पर भाईचारे की प्रीति और भाईचारे की प्रीति पर प्रेम बढ़ाते जाओ। क्योंकि यदि ये बातें तुम में वर्तमान रहें और बढ़ती जाएँ, तो तुम्हें हमारे प्रभु यीशु मसीह की पहचान में निकम्मे और निष्फल न होने देगी।” — 2 पतरस 1:5–8
संयम स्वतंत्रता का मार्ग है। यह हमें उसी प्रकार के जीवन जीने में सक्षम बनाता है, जैसे हम जीना चाहते हैं। यह बिना किसी दासत्व के हमें परमेश्वर के अच्छे वरदानों का आनन्द लेने देता है, और यह पूरे संसार को दिखाता है कि हम यीशु मसीह के अतिरिक्त किसी और के अधीन नहीं हैं।
तो यहाँ से आप कहाँ जाएँगे?
मेरी आशा यह है कि आपने जो पढ़ा है, उसके प्रति आपकी प्राथमिक प्रतिक्रिया निराशा की नहीं होगी। अपने जीवन के किसी क्षेत्र को मसीह के अधीन करने का सही समय हमेशा यही होता है। हो सकता है कि आपको लगे कि आप किसी क्षेत्र में बहुत आगे निकल गए हैं, परन्तु यह एक झूठ है, जिसे आपको अस्वीकार करना होगा। और यह जान लें कि सीमाओं और संयम की लड़ाई में, आप कभी-कभी असफल भी होंगे। आप परमेश्वर के अनुग्रह और पापों की क्षमा की अपनी आवश्यकता से कभी आगे नहीं बढ़ पाएँगे। परन्तु, परमेश्वर की स्तुति हो कि हमारे जुनून और कमजोरियाँ परमेश्वर के आत्मा के सामने कुछ भी नहीं हैं। निराशा के आगे न झुकें।
एक और प्रतिक्रिया जो फलदायी नहीं होगी, वह बेहतर बनने की एक अस्पष्ट प्रतिबद्धता है। बाइबल के परामर्शदाता एड वेल्च कहते हैं कि “संयम की इच्छा के साथ एक योजना भी होनी चाहिए… चूँकि हमारा बैरी धूर्त और चालाक है, इसलिए एक रणनीति आवश्यक है।”9
सुलैमान चेतावनी देता है कि “जिसकी आत्मा वश में नहीं वह ऐसे नगर के समान है जिसकी शहरपनाह घेराव करके तोड़ दी गई हो” (नीति. 25:28)। जिस नगर में शहरपनाह न हो, वह बैरी के विरुद्ध निराश होता है। और जो नगर युद्ध के लिए तैयार होने की अस्पष्ट आशा रखता है, वह पतन के लिए अभिशप्त होता है। यही बात उस मसीही के लिए भी लागू होती है, जो बुद्धिमानी से सीमाएँ निर्धारित करना चाहता है। या तो आपके पास कोई योजना है, या आप उस विचार को जिसे आप बदलना चाहते हैं, केवल दिखावटी रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं।
मेरी सलाह यह होगी:
- अपने जीवन के उस क्षेत्र की पहचान करें, जिसे आप मसीह की प्रभुता के अधीन और आगे बढ़ाना चाहते हैं। यह कोई ऐसा क्षेत्र हो सकता है, जिसकी हमने इस मार्गदर्शिका में खोज की है या मनोरंजन, वित्त आदि जैसा कुछ और हो सकता है। हम सभी में कमजोरियों के क्षेत्र होते हैं, इसलिए प्रश्न यह है कि क्या हम इसके बारे में कुछ करने की मंशा रखते हैं।
- एक बार जब आप अपने उस लक्षित क्षेत्र की पहचान कर लें, तो योजना बनाएँ कि आप कैसे उन्नति करना चाहते हैं और आप कौन सी सीमाएँ निर्धारित करना चाहते हैं। याद रखें कि संयम का अर्थ केवल नियम बनाना और फिर उनका पालन करना नहीं है। परन्तु हो सकता है कि अल्पावधि में कड़ी सीमाएँ बनाने से हमें दीर्घावधि में अधिक स्वतंत्रता से चलने की अनुमति मिलेगी।
- जवाबदेही को आमंत्रित करें। यह कोई मार्गदर्शक, कोई पास्टर, या कोई मित्र हो सकता है। उस व्यक्ति को अपनी योजना बताएँ, और उन्हें आपको जवाबदेह बनाए रखने की अनुमति दें। एक नियमित समय निर्धारित करें, जब आप वर्तमान स्थिति का ब्यौरा दे सकें और वे कुछ आक्रामक प्रश्न पूछ सकें। या आप कुछ प्रश्नों का एक समूह रख सकते हैं, जिनका उत्तर आप हर सप्ताह लिखित रूप में देंगे। ऐसा करने के कई तरीके हैं, परन्तु मसीह में किसी भाई या बहन को इस संघर्ष में शामिल करना एक गम्भीर सहायता हो सकती है।
- अपनी आँखें ऊपर की ओर लगाएँ। संयम के अपने संघर्ष को संयम की मूर्तिपूजक खोज से अलग न होने दें। बार-बार प्रार्थना करें, और परमेश्वर से अपनी आत्मा के फल प्रदान करने की विनती करें। पवित्रशास्त्र पढ़ें, उसे कंठस्थ करें और उस पर मनन् करें। यीशु पर और उसमें अपने नये जीवन पर विचार करें। भजनकार ने परमेश्वर के वचन को अपने हृदय में छिपा लिया था, “कि मैं तेरे विरुद्ध पाप न करूँ” (भज. 119:11)। और परमेश्वर का भय मानने, अर्थात् यह स्वीकार करने के लिए चाहे जो कुछ भी करना पड़े, वह करें कि आप उसके सामने जीवन बिताते हैं और उसके प्रति जवाबदेह हैं।
मसीही जीवन ही मौजूदा सर्वोत्तम जीवन है। सकरा मार्ग मसीह का मार्ग है, जहाँ सच्चा जीवन और स्थायी आनन्द मिलता है। और जब हम संयम धारण करते हैं, तो हम सुसमाचार की भलाई का स्वाद चखने के लिए स्वयं को तैयार कर रहे होते हैं: “मसीह ने स्वतंत्रता के लिए हमें स्वतंत्र किया है” (गला. 5:1)। यही संयम का फल है।
अन्तिम टिप्पणियाँ
1 थॉमस आर. श्राइनर, गलेशियन्स (Galatians), नये नियम पर व्याख्यात्मक टिप्पणी (ग्रैंड रैपिड्स: ज़ोंडरवान, 2010), 350.
2 विलियम डी. मौंस, पास्टरल एपिस्टल्स (Pastoral Epistles), वचन की बाइबल आधारित टिप्पणी (थॉमस नेल्सन, 2000), 407.
3 हमारी कुछ सांस्कृतिक वास्तविकताओं को समझने के लिए, कार्ल आर. ट्रूमैन की इस पुस्तक को पढ़ें, द राइज़ एंड ट्रायम्फ ऑफ द माडर्न सेल्फ: कल्चरल एम्नेशिया, एक्सप्रेसिव इंडिविजुअलिस्म, एंड द रोड टु सेक्सुअल रेवल्यूशन (The Rise and Triumph of the Modern Self: Cultural Amnesia, Expressive Individualism, and the Road to Sexual Revolution) (क्रॉसवे, 2020).
4 चार्ल्स यंग, “संयम पर अरस्तू,” द सोसाइटी फॉर एन्शिएंट ग्रीक फिलॉसफी न्यूजलेटर (The Society for Ancient Greek Philosophy Newsletter) (1985), 125.
5 आर. केंट ह्यूजेस, डिसिप्लिन्स ऑफ अ गॉडली मैन (Disciplines of a Godly Man) (क्रॉसवे, 2019).
6 जोनाथन एडवर्ड्स, “समय की बहुमूल्यता और उसे फिर से प्राप्त करने का महत्व,” (दिसंबर, 1734)। https://redeemingproductiv-ity.com/wp-content/uploads/2018/06/Jonathan-Edwards-The-Precious-ness-of-Time.pdf पर उपलब्ध।
7 इस तरह के संघर्षों के बारे में अधिक जानकारी के लिए, माइकल आर. एमलेट की इस पुस्तक को पढ़ें, फ्रीडम फॉर द ऑब्सेसिव-कंपल्सिव (Freedom for the Obsessive-Compulsive) (पी. एंड आर. बुक्स, 2004).
8 इस विषय पर विस्तृत जानकारी के लिए, मैट डैमिको द्वारा लिखित क्षेत्रीय मार्गदर्शिका पर इस पुस्तक को पढ़ें, स्टीवर्डिंग योर बॉडी (Stewarding Your Body).
9 एड वेल्च, “संयम: ‘एक और’ के विरुद्ध लड़ाई.” द जर्नल ऑफ बाइबिलिकल काउंसलिंग (The Journal of Biblical Counseling), खण्ड 19, अंक 2, शीतकालीन 2001, पृष्ठ 24-31.
विषयसूची
- 1 संयम को परिभाषित करना
- गलातियों 5:22–23
- तीतुस 2 अध्याय
- यीशु के जीवन में संयम
- चर्चा एवं मनन:
- 2 संयम और हृदय
- 1. क्या संयम एक मसीही सद्गुण है?
- 2. क्या संयम केवल नियमों या सीमाओं के बारे में है?
- 3. नियंत्रण किसके पास है?
- चर्चा एवं मनन:
- 3 संयम को लागू करना
- समय
- विचार करना
- भावनाएँ
- जीभ
- देह
- चर्चा एवं मनन:
- निष्कर्ष
- अन्तिम टिप्पणियाँ