
#80 नये आरम्भ: बर्बादी के बाद जीवन को फिर से बनाना
परिचय
“टेलर! अभी बाहर आओ! मेरे लिए सहायता लाओ!” मेरे पिताजी के इन शब्दों का चीखना सुनना मैं कभी नहीं भूलूँगा। मैं दस वर्ष की आयु का था। हम क्लीवलैंड से एक नयी एंड्योर डर्ट बाइक लेकर अभी-अभी घर लौटे थे। यह मेरे लिए बहुत बड़ी बात थी, क्योंकि मेरे पास एक चौपहिया गाड़ी थी, और मैं बहुत अधिक प्रसन्न था कि मेरी दादी माँ के जंगलों में पिताजी भी मेरे साथ बाइक चलाने में शामिल होने वाले थे। जब मैंने अन्तिम बार पिताजी को देखा, तो वे गैराज में उस बाइक को बैटरी के चार्जर से जोड़ रहे थे। मैं अपने मित्र इवान को बुलाने के लिए दौड़कर भीतर गया और उसे यह बात बताई। जब मैं भीतर था, तो पिताजी ने बाइक को किक मारकर चालू किया, और उस पर बैठकर बाड़े में एक चक्कर लगाया। तभी सब कुछ बहुत गड़बड़ हो गया। जब वे घर के सामने से मुड़ रहे थे, तो बाइक का अगला पहिया फुटपाथ से टकरा गया और वे एक तरफ गिर गए, जबकि बाइक दूसरी तरफ चली गई। तभी मैंने उन्हें चीखते हुए सुना, “टेलर!…”
जब मैं बाहर आया, तो मैंने देखा कि पिताजी सड़क पर गिरे पड़े थे और उठ नहीं पा रहे थे। उन्होंने मुझे भीतर जाकर तुरन्त माँ को बुलाने के लिए कहा। इससे पहले कि मैं कुछ जान पाता, मेरी माँ, दादाजी और दादी माँ निकलकर हमारी सड़क पर आ गए, और उनके साथ दो आपातकालीन चिकित्सा तकनीशियन भी थे, जो पिताजी को तुरन्त अस्पताल ले जाने के लिए तैयार थे। सबसे अच्छा दिन अचानक सबसे बुरे दिन में बदल गया। अस्पताल पहुँचने के कुछ ही समय बाद, हमें पता चला कि उनके पाँव की अंतर्जंघिका हड्डी दो हिस्सों में टूट गई थी और उनके बाएँ घुटने के तीन मुख्य स्नायुबन्धन बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गए थे। उस एक अचानक से हुई बाइक दुर्घटना के कारण आठ शल्य-चिकित्साएँ हुईं, और 2 करोड़ 40 लाख रुपयों का मेडिकल बिल बना, घर जब्त हो गया, आखिरकार दिवालिएपन का सामना करना पड़ा, और माँ-पिताजी को—तथा इसी कारण से मेरी बहन और मुझे भी—कई वर्षों तक भावनात्मक सदमे से होकर गुजरना पड़ा। एकदम सच कहूँ तो, तब और विशेष रूप से अब भी, वह दिन हमारे परिवार के बर्बाद होने का दिन माना जाता है। हम निश्चित रूप से कभी पहले जैसे नहीं रहे।
आपके बारे में क्या कहें? क्या आपने कभी किसी तरह की बर्बादी का अनुभव किया है? इसमें कोई सन्देह नहीं कि बर्बादी हमेशा सबके-लिए-एक-ही-माप वाले डिब्बे में नहीं आती। यह हमारे अनुभव के हिसाब से होती है। उदाहरण के लिए, मेरे बीस महीने के बेटे को लगता है कि जब वह चीरियोस के डिब्बे की तली तक पहुँच जाता है तथा उसकी माँ और डिब्बे मंगाना भूल जाती है, तो वह बर्बादी का अनुभव कर रहा है। दूसरी ओर, बड़े लोग शायद ही कभी खिचड़ी समाप्त होने को बर्बादी से जोड़ते हैं। उनके लिए, बर्बादी का अर्थ किसी ऐसी वस्तु (या जन) को खो देना है, जिसकी जगह कोई और नहीं ले सकता; या ऐसी बीमारी का पता चलना है, जो जीवन को हमेशा के लिए बदल देगी; या ऐसा दबाव महसूस करना है, जिससे बचने का एकमात्र तरीका स्वयं को भीतर से समाप्त कर लेना लगे। हो सकता है कि जब सब कुछ खोया हुआ सा लगता है, उस कठिन समय में आप भी सामर्थ्य या आशा देने वाले बाइबल के वचन ढूँढ़ रहे हों।
मैं वापस उसी प्रश्न पर आता हूँ: आपके बारे में क्या कहें? क्या आपने कभी बर्बादी का अनुभव किया है? यदि हाँ, तो यह जीवन कौशल मार्गदर्शिका आपके लिए है। असल में, यदि आप बर्बादी के दौर से बाहर निकलकर सब बातों को सही दृष्टिकोण से देखने लगे हैं, तो काश आप मेरे साथ होते और मेरे इस मार्गदर्शिका को लिखते समय अपने अनुभव भी इसमें जोड़ पाते। मुझे भरोसा है कि आपके पास बताने के लिए ऐसे सबक होंगे, जो इसे और बेहतर बना देते। यदि आपने अभी तक बर्बादी का अनुभव नहीं किया है, तो डरते हुए मुझे एक बुरी खबर देनी पड़ रही है, और वह खबर यह है कि: जीवन में कभी न कभी आपको इसका सामना करना ही पड़ेगा। मेरी दादी माँ हमेशा कहती थी, “या तो आप मुसीबत में हैं, या मुसीबत से बाहर निकल रहे हैं, या शायद मुसीबत की ओर बढ़ रहे हैं।” मुझे लगता है कि इस पतित संसार में जीवन का यही स्वभाव है, जहाँ वस्तुएँ खो जाती हैं, लोग बीमार पड़ते हैं और मर जाते हैं, और बिना किसी बचाव के दबाव बढ़ता जाता है। इसलिए, यदि आपने ऐसा जीवन जिया है, जिसे बर्बादी ने छुआ नहीं है, तौभी बने रहें। हो सकता है कि आपको यहाँ कुछ ऐसा मिल जाए, जो भविष्य में आपके काम आए। कम से कम, मुझे तो यह आशा है कि आपको ऐसा गूढ़ज्ञान मिलेगा, जो आपके उन मित्रों के लिए शान्ति और बुद्धिमानी का स्रोत बनेगा, जिनका जीवन मानो बर्बाद होने पर है और जिन्हें कठिन समय में आत्मिक चंगाई की आवश्यकता है।
इतना जान लेने के बाद, आइए आरम्भ करते हैं।
ऑडियो मार्गदर्शिका
ऑडियो#80 नये आरम्भ: बर्बादी के बाद जीवन को फिर से बनाना
भाग I: जीवन क्यों बिखर जाता है
बर्बादी आने के बाद क्या करना है, इस पर बात करने से पहले हमें यह समझना होगा कि बर्बादी क्यों आती है। ऐसा क्यों होता है कि जीवन कभी न कभी गड़बड़ा ही जाता है? इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए, मैं एक बहुत पुराने व्यक्ति, अरस्तू के तरीके का उपयोग करना चाहता हूँ, जिसके बारे में आपने शायद सुना होगा। अरस्तू ने ध्यान दिया कि “क्यों” वाले प्रश्नों के उत्तर आमतौर पर चार तरीकों से दिए जा सकते हैं, जिसमें किसी बात के चार अलग-अलग “कारणों” पर विचार किया जाता है: भौतिक, औपचारिक, प्रभावी और अन्तिम। यदि आपको उलझन हो रही है, तो घबराएँ नहीं। मेरा वादा है कि उस बूढ़े अरस्तू ने यहाँ हमारी सहायता ही की है।
बर्बादी के भौतिक कारण
बर्बादी के भौतिक कारण क्या हैं? वैसे, भौतिक का अर्थ है कि वह वस्तु (इस मामले में, बर्बादी) किस बात से बनी है। सबसे सामान्य तौर पर, हम कह सकते हैं कि बर्बादी उन बातों से बनती है, जिनका घटित होना हम बिलकुल नहीं चाहते—अर्थात् बुरी बातें। जब कोई यह वाक्य बोलता है कि “मेरा जीवन बर्बाद हो गया है!” तो आमतौर पर ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि उन्होंने कोई ऐसी वस्तु या कोई ऐसा व्यक्ति खो दिया है, जिससे वे प्रेम करते थे। अब, खोई हुई बात कुछ भी हो सकती है। असल मुद्दा यह है कि बर्बादी ऐसी बात को झेलने से बनती है, जिसे दुर्भाग्यपूर्ण, भारी नुकसान वाली, अक्सर हमेशा के लिए बनी रहने वाली और अवांछित माना जाता है। ऐसे पलों में, लोग अक्सर आगे बढ़ने का मार्ग ढूँढ़ने के लिए बाइबल के उन वचनों को ढूँढ़ते हैं, जो फिर से आरम्भ करने में सहायता करते हैं।
बर्बादी का औपचारिक कारण
बर्बादी के औपचारिक कारण या वजहें कई सारी हो सकती हैं, परन्तु हमारे उद्देश्य के लिए हम बस इतना कह सकते हैं कि यही वह बात है, जिससे हमें पीड़ा होती है। नुकसान, दबाव, बीमारी या मृत्यु के कारण बर्बादी या दु:ख आ सकता है, परन्तु हम इन बातों से इसलिए परेशान होते हैं, क्योंकि ये पीड़ादायी होती हैं। इनसे चोट पहुँचती है, और हम इनको पसन्द नहीं करते। हमने कुछ और सोचा था, परन्तु उसका उल्टा मिला, और दूसरों को यह बताने के लिए कि यह कितना बुरा है, हम इसे बर्बादी कहते हैं।
हे मेरे मित्र, मसीहियत में सभी तरह के पहलू मिलते हैं, जो दु:ख का कारण बताने के लिए संघर्ष करते हैं। कुछ मसीही ऐसा महसूस करते हैं कि कमजोरी को मान लेना विश्वास की कमी के बराबर है। दूसरे मसीहियों का मानना है कि कमजोरी का अनुभव करना विश्वास की कमी का परिणाम है। असल में ये दोनों बातें ही सही नहीं है। परमेश्वर हमें यह मानने के लिए आमंत्रित करता है कि हम पीड़ित हैं और हमें यह पसन्द नहीं है। असल में, इससे पहले कि हम ऐसी बातें ऊँचे स्वर में कह पाएँ, उसे पहले से ही पता है कि यह ऐसा ही है। भजनकार लिखता है, “जैसे पिता अपने बालकों पर दया करता है, वैसे ही यहोवा अपने डरवैयों पर दया करता है। क्योंकि वह हमारी सृष्टि जानता है; और उसको स्मरण रहता है कि मनुष्य मिट्टी ही है” (भजन 103:13-14)। यदि आप अपने जीवन के बिखरने से हुई पीड़ा से परेशान हैं, तो प्रार्थना में परमेश्वर के सामने इसे मानने में हिचकिचाएँ नहीं। वह आपकी कमजोरी जानता है, और यदि आप उसका भय मानते हैं, तो वह आप पर दया करता है। यह मसीही जीवन के प्रशिक्षण वाले दृष्टिकोण का एक मुख्य हिस्सा है: अर्थात् यह समझना है कि जीवन की चुनौतियों पर जीत पाने का आरम्भ, सृष्टिकर्ता के सामने ईमानदार रहने से होता है।
बर्बादी का प्रभावी कारण
अरस्तू का प्रभावी कारण उस बात को संदर्भित करता है, जो किसी वस्तु को अस्तित्व में लाती है। उदाहरण के लिए, चित्रकला का प्रभावी कारण उसका चित्रकार होता है। बर्बाद जीवन के मामले में, मुझे लगता है कि इसके दो मुख्य कारण होते हैं: व्यक्तिगत् पाप और बिखरते हुए संसार में रहने के कारण अनचाहा दु:ख।
आइए व्यक्तिगत् पाप से आरम्भ करते हैं। मुझे नहीं लगता कि मैं यहाँ कोई धरती को हिला देने वाली बात कह रहा हूँ, परन्तु यह सुनिश्चित करने के लिए कि हम सब एक ही बात को समझ रहे हैं, मैं यह कहना चाहूँगा कि: पाप आपका जीवन बर्बाद कर सकता है। और असल में, वह निश्चित रूप से ऐसा करेगा। पाप का पीछा करने से हर बार बर्बादी ही मिलेगी, जब तक कि अन्त में आपको वह न मिल जाए, जिसके हकदार आपके पाप हैं—अर्थात् परमेश्वर से अलग होकर नरक नाम की जगह पर यातना सहना (मर. 9:43-48)। यह बात गम्भीर है, परन्तु सच है।
मुझे लगता है कि हमें बर्बादी के एक प्रभावी कारण के तौर पर अपने व्यक्तिगत् पाप को पहचानना चाहिए, क्योंकि अन्यथा हम यही सोचने की परीक्षा में पड़ते रहेंगे कि गलती हमेशा किसी और की है। “मुझे नौकरी से इसलिए निकाला गया, क्योंकि मेरा मालिक बहुत बुरा था।” “मेरा जीवन इसलिए खराब है, क्योंकि मेरा पति सबसे बुरा है!” “मैं अपने बिल इसलिए नहीं भर पा रहा, क्योंकि चुनाव में गलत राजनेता जीत गया।” “मेरा बच्चा इसलिए मर गया क्योंकि… परमेश्वर ने ऐसा होने दिया!” और साफ-साफ कहूँ तो, मैं इस बात से इन्कार नहीं कर रहा कि हमारी बर्बादी के अनुभव में अक्सर दूसरों की भी भूमिका होती है। असल में, कभी-कभी हम बिना किसी ऐसे संकेत के भी दु:ख उठाते हैं कि इसमें हमारा पाप भी शामिल है! (इस पर थोड़ी देर में बात करेंगे)। और फिर भी, हमारे दु:ख उठाने में दूसरों की भूमिका पर ध्यान देने से पहले, हमें स्वयं से पूछना चाहिए कि हमारी क्या जिम्मेदारी है। हे मेरे मित्र, परमेश्वर और दूसरों के विरुद्ध मेरे व्यक्तिगत् पापों के कारण मैंने नौकरियाँ, रिश्ते, मौके और अपनी प्रतिष्ठा खोई है, और ये तो बस कुछ के ही नाम हैं! दूसरों को दोष देने से मेरा कोई भला नहीं होता, जब कि असल में, मुझे अक्सर वही मिलता है, जिसके हकदार मेरे पाप हैं।
जो लोग अपने पापों के कारण से दु:ख उठा रहे हैं, उनके लिए एक छोटी सी बात कहूँगा: यीशु के पास जाएँ। आपको क्षमा की आवश्यकता है, और वह इसे सेंत-मेंत में देता है। असल में, आज ही आपके सारे पाप क्षमा किए जा सकते हैं! बाइबल सिखाती है कि “यदि हम अपने पापों को मान लें, तो वह हमारे पापों को क्षमा करने और हमें सब अधर्म से शुद्ध करने में विश्वासयोग्य और धर्मी है” (1 यूहन्ना 1:9)। अपनी गलतियों को या उनसे आपकी जो बर्बादी हुई है, उसे अनदेखा न करें। अपनी की हुई गड़बड़ के लिए दूसरों को दोष न दें। इसके बजाय, अपने पापों का अंगीकार करें और यीशु से पूरी एवं अन्तिम क्षमा पाएँ। वह पापों का बोझ उठाने वाले एक सिद्ध बलिदान के तौर पर मरा, ताकि यदि आप उस पर भरोसा करें, तो आपको वह अन्तिम दण्ड भुगतना नहीं पड़ेगा, जिसकी आपके पापों को आवश्यकता है। मैं आपसे आग्रह करता हूँ कि आज ही यीशु पर भरोसा करें। यह पिछली गलतियों पर जयवन्त होने और विफल होने पर परमेश्वर का अनुग्रह पाने का पहला कदम है।
बर्बादी का दूसरा प्रभावी कारण, इस संसार की ओर से हमें मिलने वाला अनचाहा दु:ख है। कभी-कभी जीवन इसलिए बिखर जाता है, क्योंकि हमारी कोई प्रत्यक्ष गलती नहीं होती। हम ऐसे संसार में रहते हैं, जो पाप से टूटा हुआ है, और इसलिए बातें भी टूट जाती हैं—जिनमें वे बातें भी शामिल हैं, जो हमारे लिए सबसे अधिक महत्व रखती हैं। बाइबल में अनचाहा दु:ख उठाने का एक बेहतरीन उदाहरण अय्यूब है। अय्यूब “परमेश्वर का भय मानता और बुराई से दूर रहता था” (अय्यूब 1:1)। फिर भी, अय्यूब ने लगभग वह सब कुछ खो दिया, जो उसे बहुत प्रिय था। उसने अपनी सम्पत्ति, अपने बच्चे और अपनी सेहत खो दी। और अय्यूब के मामले में, शैतान के साथ-साथ यह बिखरा हुआ संसार ही उसके दु:ख का प्रभावी कारण था। अक्सर हमारे साथ भी ऐसा ही होता है।
क्या आपको कभी अय्यूब जैसा महसूस हुआ है? आप एक अच्छे जीवनसाथी बनने का प्रयास कर रहे हैं, परन्तु आपका पति या पत्नी गुस्से में आपा खो बैठते हैं। आपने एक अच्छा कर्मचारी बनने का प्रयास किया, परन्तु फिर भी आपके मालिक ने आपको नौकरी से निकाल दिया। आपने अपने बच्चों को प्रभु के भय और चेतावनी में पालने का प्रयास किया (इफि. 6:4), परन्तु घर छोड़ने के बाद, वे न तो आपसे और न ही मसीहियत से कोई रिश्ता रखना चाहते हैं। और ऐसी बातें भी हैं, जो हमें प्रभावित करती हैं और जिनका हमारे प्रयासों से कोई लेना-देना नहीं होता। आपका दिन ठीक-ठाक चल रहा होता है और तभी फोन की घण्टी बजती है और आपको पता चलता है कि आपके किसी प्रियजन का देहान्त हो गया है। आपका संसार तब हिल जाता है, जब अचानक कोई खर्च सामने आता है और आपको समझ नहीं आता कि उसका भुगतान कैसे करें। विद्यालय पहुँचते ही आपको पता चलता है कि आपके मित्र मण्डली ने आपको धोखा दिया है।
अय्यूब के बारे में अच्छी बात यह है कि: उसने परमेश्वर को कोसने के कारण के रूप में कभी भी अपने दु:खों का उपयोग नहीं किया। असल में, सब कुछ खोने के बावजूद, अय्यूब का मानना था कि परमेश्वर सही है और अन्त में उसे भी सही साबित कर देगा। और ठीक वैसा ही हुआ। चाहे आप सबसे बुरे दौर से होकर गुजरने के बाद फिर से आरम्भ कर रहे हों या इस बात पर हैरान हो रहे हों कि सब कुछ खोने के बाद अपने जीवन को फिर से कैसे बनाएँ, तो अय्यूब की कहानी बहुत महत्वपूर्ण है।
बाइबल इस बात को स्पष्ट करती है कि हम एक बिखरे हुए संसार में रहते हैं, और एक ऐसा संसार है, जो पाप और मृत्यु से बर्बाद हो गया है। पौलुस ने रोम की कलीसिया को लिखा, “इसलिये जैसा एक मनुष्य के द्वारा पाप जगत में आया, और पाप के द्वारा मृत्यु आई, और इस रीति से मृत्यु सब मनुष्यों में फैल गई, क्योंकि सब ने पाप किया” (रोमियों 5:12)। क्या आप पाप और मृत्यु के बीच का जुड़ाव देख पा रहे हैं? पहला बाद वाले को जन्म देता है और सूरज के नीचे होने वाली हर बात को प्रभावित करता है। इस कारण, जब हम इस जीवन में दु:ख उठाते हैं, तो हमें हैरान नहीं होना चाहिए, और न ही हमें परमेश्वर को दोष देना चाहिए। इसके बजाय, हमें परमेश्वर में अपनी आशा रखनी चाहिए, जो हमारे सबसे बुरे दु:खों का भी हमारी भलाई और अपनी महिमा के लिए उपयोग करता है, जो हमें बर्बादी के अन्तिम कारण तक ले जाता है।
बर्बादी का अन्तिम कारण
ठीक है, अब बर्बादी का अन्तिम कारण जानते हैं, और यह वाला आपको हैरान कर सकता है। हम पवित्रशास्त्र से सीखते हैं कि इस जीवन में होने वाली हर बात का अन्तिम कारण या वजह स्वयं परमेश्वर ही है—जिसमें आपका दु:ख भी शामिल है! आपकी ईश-वैज्ञानिक पृष्ठभूमि के आधार पर, ऐसी बात आपको न केवल हैरान कर सकती है; बल्कि बुरी तरह नाराज भी कर सकती है! परन्तु अभी हार न मानें। नीचे दिए गए उन वचनों की सूची पर दृष्टि डालें, जो सिखाते हैं कि जीवन में होने वाली हर बात पर परमेश्वर का अधिकार है:
— यशायाह 45:7—“मैं उजियाले का बनानेवाला और अन्धियारे का सृजनहार हूँ, मैं शान्ति का दाता और विपत्ति को रचता हूँ, मैं यहोवा ही इन सभों का कर्ता हूँ।”
— विलापगीत 3:37–38—“यदि यहोवा ने आज्ञा न दी हो, तब कौन है कि वचन कहे और वह पूरा हो जाए?
विपत्ति और कल्याण, क्या दोनों परमप्रधान की आज्ञा से नहीं होते।”
— आमोस 3:6—“क्या यहोवा के बिना भेजे किसी नगर में कोई विपत्ति पड़ेगी?”
— उत्पत्ति 50:20—यूसुफ ने अपने भाइयों से कहा: “यद्यपि तुम लोगों ने मेरे लिये बुराई का विचार किया था; परन्तु परमेश्वर ने उसी बात में भलाई का विचार किया…”
— प्रेरितों के काम 2:23—“उसी यीशु को, जो परमेश्वर की ठहराई हुई योजना और पूर्व ज्ञान के अनुसार पकड़वाया गया, तुम ने अधर्मियों के हाथ से क्रूस पर चढ़वाकर मार डाला।”
— प्रेरितों के काम 4:27–28—“हेरोदेस और पुन्तियुस पिलातुस भी अन्य जातियों और इस्राएलियों के साथ इस नगर में इकट्ठे हुए, कि जो कुछ पहले से तेरी सामर्थ्य और मति से ठहरा था वही करें।”
— नीतिवचन 16:33—“चिट्ठी डाली जाती तो है, परन्तु उसका निकलना यहोवा ही की ओर से होता है।”
— रोमियों 13:1—“क्योंकि कोई अधिकार ऐसा नहीं जो परमेश्वर की ओर से न हो; और जो अधिकार हैं, वे परमेश्वर के ठहराए हुए हैं।”
इसलिए, जो कुछ भी होता है—जिसमें हमारा दु:ख भी शामिल है—उसका अन्तिम कारण परमेश्वर ही है। तो फिर यह प्रश्न बदल जाता है कि ऐसा क्यों होता है? सबसे पहले तो परमेश्वर हमारे दु:ख आने ही क्यों देता है? हमारी कठिनाइयों से उसे क्या मिलता है? और हमें क्या मिलता है? इन प्रश्नों के उत्तर के लिए, आइए उस समय पर विचार करें, जब यीशु ने एक मनुष्य को चंगा किया था, जो अंधा जन्मा था। एक दिन यीशु और उसके चेले जा रहे थे, तभी उन्हें यह मनुष्य मिला। चेलों ने यीशु से पूछा, “हे रब्बी, किसने पाप किया था कि यह अंधा जन्मा, इस मनुष्य ने या इसके माता–पिता ने?” (यूहन्ना 9:2)। यीशु ने उत्तर दिया, “न तो इसने पाप किया था, न इसके माता–पिता ने; परन्तु यह इसलिये हुआ कि परमेश्वर के काम उसमें प्रकट हों” (9:3)।
चेलों को दिए गए यीशु के उत्तर को इस संसार में परमेश्वर के कामों के समूह के ऊपर रखा जा सकता है। परमेश्वर ऐसे काम करता है, ताकि जिन लोगों को उसने अपने स्वरूप में बनाया है, वे उन्हें सही ढंग से देख और समझ सकें। परमेश्वर ऐसे काम करता है, ताकि उसे उस महान् और महिमामयी परमेश्वर के रूप में देखा जाए, जो कि वह वास्तव में है। उस अंधे व्यक्ति के मामले में, अंधेपन ने एक ऐसा मंच तैयार किया, जिस पर परमेश्वर ने आकर एक ऐसा आश्चर्यकर्म किया, जो कोई और नहीं कर सकता था। देखने वालों पर उस दिन इसका क्या प्रभाव पड़ा होगा? परमेश्वर महान् है और अपने सभी अद्भुत कामों के लिए प्रशंसा के योग्य है, जिसमें उस अंधे व्यक्ति को चंगा करना भी शामिल है। यह सबसे कठिन परिस्थितियों में भी विश्वास के नये आरम्भ को दर्शाता है।
परन्तु इसमें आपके क्या मिलेगा? क्या यह सच में अच्छी बात है कि परमेश्वर आपके जीवन में दु:ख आने दे, ताकि उसे महिमा मिले? इसका छोटा सा उत्तर “हाँ” है, और इसका कारण यह है कि इससे परमेश्वर आपका अपना हो जाता है। यीशु के द्वारा, उसने स्वयं को आपको दे दिया है। उसने आपको अपने परिवार में अपना लिया है। उसने आपसे स्वर्ग का वादा किया है। जैसा कि हम पहले ही जान चुके हैं, यह संसार पाप के कारण बिखरा हुआ है, और यही हमारे बहुत सारे दु:खों की प्रभावी वजह या कारण है। और फिर भी, हम अक्सर इस संसार से ऐसे प्रेम करते हैं कि मानो यही सब कुछ हो, जबकि असल में, यह समाप्त हो रहा है। दु:ख के द्वारा, परमेश्वर अपने लोगों को याद दिलाता है कि वही उनका सबसे बड़ा प्रतिफल है और केवल वही उनके लिए पर्याप्त है। यही परमेश्वर की बहाली की योजना की बुनियाद है। पौलुस हमें यही सब तो दिखाता है, जब वह स्वयं का और अपने साथियों का वर्णन ऐसे करता है कि वे: “शोक करनेवालों के समान हैं, परन्तु सर्वदा आनन्द करते हैं; कंगालों के समान हैं, परन्तु बहुतों को धनवान बना देते हैं; ऐसे हैं जैसे हमारे पास कुछ नहीं तौभी सब कुछ रखते हैं” (2 कुरिं. 6:10)।
इसलिए हमारे दु:ख और बर्बादी का अनुभव उन बुरी बातों के कारण आता है, जो पीड़ादायी होती हैं और हमारे पाप एवं इस संसार के बिखराव के कारण से आती हैं, और यह सब अन्त में परमेश्वर की महिमा के लिए होता है। कुछ समझे? बहुत बढ़िया। अब हमें यह आँकलन करना होगा कि बर्बादी कितनी गम्भीर होती है, ताकि हम अपनी परिस्थिति में फिर से आरम्भ करने के लिए बाइबल-आधारित सिद्धान्तों को लागू कर सकें और इसके द्वारा मजबूत हो सकें। इस यात्रा में संकट के बाद आत्मिक नवीनीकरण के कदम शामिल हैं, जब हम सीखते हैं कि नये आरम्भ के साथ परमेश्वर पर कैसे भरोसा किया जाए। चाहे आप विफलता के बाद उद्देश्य ढूँढ़ रहे हों या नये आरम्भ की खोज में हों, याद रखें कि फिर से आरम्भ करना व्यक्तिगत् संकट से उबरने की दिशा में मसीही जीवन की यात्रा का हिस्सा है।
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मनन के लिए प्रश्न:
- आप अभी किन दु:खों का अनुभव कर रहे हैं? आपने अतीत में कौन से दु:ख उठाए हैं? अपने मार्गदर्शक
के साथ साझा करें। - दु:ख के कारणों में से कौन सा कारण आपको सबसे अधिक उलझन भरा या स्वयं को समझाने में सबसे कठिन लगता है?
- आपने कैसे देखा है कि दु:ख ने आपको परमेश्वर को और अधिक मूल्यवान समझने में सहायता की है?
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भाग II: नुकसान को कम करना
मैं मानता हूँ कि यह खण्ड छोटा होगा। असल में, मैंने कई बार इसे हटाने के बारे में सोचा है! हालाँकि, मुझे लगता है कि जीवन के बिखरने के तुरन्त बाद क्या करना चाहिए, इस पर थोड़ा गहराई से सोचना महत्वपूर्ण है। हम तीन प्रश्न पूछकर इस स्थिति से निपटेंगे: 1. आपने क्या खोया है? 2. किसे चोट पहुँची है? 3. क्या बचाया जा सकता है?
आपने क्या खोया है?
दु:ख पर प्रतिक्रिया देने का एक हिस्सा यह भी है कि आप यह समझें कि आपने क्या खोया है। 6 जनवरी, 2025 को, मेरे माता-पिता के घर पर एक पेड़ गिर गया, जिससे घर लगभग दो हिस्सों में बँट गया। परमेश्वर के अनुग्रह से, किसी को चोट नहीं आई। फिर भी, नुकसान का आँकलन करने और आगे के चरणों की योजना बनाने में कई सप्ताह लग गए। असल में, (इसे लिखे जाने के समय तक) तेरह महीने बीत चुके हैं, और वे अभी भी अपने घर में वापस नहीं गए हैं। उन्हें ढाँचा बनाने वाले अभियंताओं, ठेकेदारों और बिजली के मिस्त्रियों के साथ यह तय करने के लिए काम करना पड़ा कि क्या बचाया जा सकता है और क्या खो गया है।
आपने क्या खोया है? हो सकता है कि हाल ही में आपने अपनी वह नौकरी खो दी हो, जो आपको पसन्द थी, या कोई मित्र खो दिया हो, जो आपका करीबी था, या वह घर खो दिया हो, जहाँ आपने अपने परिवार का पालन-पोषण किया था, या विद्यालय का कोई मित्र मण्डली को खो दिया हो। चाहे कुछ भी हो, नुकसान को अनदेखा करने के बजाय उसका सामना करना महत्वपूर्ण है, कि मानो वह हुआ ही न हो। यह पीड़ादायी हो सकता है, विशेष रूप से जब खोई हुई बात को बदला न जा सके। कभी-कभी हमें लगता है कि हमारा नुकसान हमेशा के लिए है, परन्तु असल में ऐसा नहीं होता। जिस दिन आपकी नौकरी छूटती है, तो ऐसा लगता है कि आपको फिर कभी इतना अच्छा मौका नहीं मिलेगा, परन्तु ऐसा होना आवश्यक नहीं है। इस बारे में थोड़ी देर में बात करेंगे। हालाँकि, किसी प्रियजन की मृत्यु से हुआ नुकसान ऐसा है, जिसे पूर्ववत् नहीं किया जा सकता, चाहे आप कितना भी चाहें कि ऐसा न हुआ हो। यदि आप नुकसान से जूझ रहे हैं, तो मैं आपको उत्साहित करना चाहूँगा कि आप अपने मित्रों, पास्टरों और सबसे महत्वपूर्ण, परमेश्वर के साथ इस बारे में ईमानदारी से बात करें। नुकसान सहना कठिन है, परन्तु जब आप इसे अकेले सहने का प्रयास करते हैं, तो यह असम्भव लग सकता है। जो लोग सोच रहे हैं कि नया आरम्भ कैसे करें, तो उनके लिए बर्बादी के बाद जीवन को फिर से बनाने के कई व्यावहारिक कदमों में से यह ईमानदारी पहला कदम है।
किसे चोट पहुँची है?
हम अक्सर केवल अपने बारे में ही सोचते हैं। ऐसा तब और भी अधिक होता है, जब हम दु:ख उठाते हैं। हालाँकि, मैं आपको अपने आसपास के उन लोगों को देखने के लिए प्रोत्साहित करना चाहता हूँ, जिन पर इसका प्रभाव पड़ा है। हो सकता है कि आपने अपनी नौकरी खो दी हो, परन्तु यदि बड़े पैमाने पर छँटनी हुई थी, तो शायद आपके कुछ मित्रों पर भी इसका प्रभाव पड़ा होगा। आप अपने परिवार के सदस्य को खोने का दु:ख मना रहे हैं, परन्तु ऐसे आप अकेले नहीं हैं। आपके परिवार के दूसरे सदस्यों को भी दु:ख पहुँचा है। आप भारी आर्थिक दबाव से जूझ रहे हैं और ऐसा लगता है कि आपके पास कोई विकल्प नहीं बचा है, परन्तु इस परिस्थिति का सामना आप अकेले नहीं कर रहे हैं। आपका जीवनसाथी भी इस दबाव को महससू करता है। यह साझी पीड़ा अक्सर तलाक या रिश्तों में आई दरारों के बाद जीवन को फिर से सँवारने के कारण बनती है, जब हमें एहसास होता है कि हम अपने दु:ख में अकेले नहीं हैं।
मैं जानता हूँ कि जब आप बर्बादी का अनुभव कर रहे हों, तो दूसरों की सेवा करने के बारे में सोचना या ऐसा करने का प्रयास करना कठिन होता है, परन्तु मैं आपको फिर भी ऐसा करने का पूरा-पूरा प्रयास करने के लिए प्रोत्साहित करता हूँ। आपको सेवा करने का प्रयास इसलिए करना चाहिए, क्योंकि: 1. यीशु ने इसका नमूना दिखा दिया है और आपको उसका अनुसरण करने के लिए कहा है (मर. 10:45), और साथ ही 2. दूसरों की सेवा करने से, आपको शायद अपने बोझ को उठाना थोड़ा आसान लगेगा। यह अन्तिम बात अजीब लग सकती है, परन्तु यह सच है। जब हमें पता चला कि मेरी पत्नी आखिरकार गर्भवती हो गई है, तो उससे पहले मेरी पत्नी और मैंने कई वर्षों तक बाँझपन से संघर्ष किया था। हम बहुत आनन्दित थे। प्रभु ने हमारी पुकार सुनकर हमें एक बच्चा दिया था! और फिर भी, दु:खद रूप से, दो महीने बाद गर्भपात के कारण हमने उस बच्चे को खो दिया।
मैं आहत, भ्रमित और क्रोधित था। पेन्सिलवेनिया एवेन्यू पर खड़े होकर, मैंने अपनी दादी माँ को फोन किया, जिनके पास सुनने की अद्भुत क्षमता थी। उन्होंने मेरे द्वारा महसूस की जाने वाली मेरी सभी भावनाओं को सुना, और फिर उन्होंने यह सुझाव दिया: “टेलर, क्या तुम जानते हो कि तुम अपनी कलीसिया में ऐसे लोगों को ढूँढ़ने के बारे में सोच सकते हो, जो उसी स्थिति में हैं, जहाँ तुम पहुँचना चाहते हो, और देखो कि क्या कोई ऐसा ठोस तरीका है, जिससे तुम दु:ख के इस समय में उनकी सेवा कर सको।” मुझे वह अजीब सलाह लगी और मैंने उसे जल्दी से अनदेखा कर दिया। दो सप्ताह भी नहीं बीते थे कि मैं और मेरी पत्नी एक ऐसे जोड़े से मिले, जो हमारे कुछ सबसे प्रिय मित्रों में से एक बन गए। हमें जल्दी ही पता चला कि वे अपने पहले बच्चे की आशा कर रहे थे, और उस स्त्री की बच्चे को जन्म देने की तारीख लगभग वही थी, जो मेरी पत्नी की होती। मेरी दादी माँ की सलाह मेरे मस्तिष्क में फिर से ताजा हो गई। मैंने सोचा कि हमें इस जोड़े की सेवा करने का प्रयास करना चाहिए। यह विश्वास-आधारित चंगाई की मार्गदर्शिका का एक व्यावहारिक रूप था—अर्थात् जब हृदय भीतर की ओर मुड़ना चाहता हो, तब बाहर की ओर देखना।
अधूरेपन के बावजूद पूरे हृदय से, हमने उनके लिए प्रार्थना करना और उनके नन्हे बेटे के आगमन की तैयारी में उनकी सहायता करने के व्यावहारिक तरीके खोजना आरम्भ किया। यहाँ उन सभी तरीकों को बताने के लिए जगह नहीं है, जिनसे प्रभु ने हमें तब आशीष दी, जब हमने उन्हें आशीष देने का प्रयास किया। असल में, मुझे निश्चय है कि इस सौदे से हमें ही अधिक लाभ हुआ। आज, उनका बेटा हमारे भतीजे जैसा है, और वे सभी हमें परिवार जैसे लगते हैं। प्रभु ने हार्टले परिवार में चंगाई लाने के लिए उनका उपयोग किया, और हम बहुत आभारी हैं।
आपके आसपास कौन दु:ख में पड़ा हुआ है? भले ही आप स्वयं भी दु:खों में संघर्ष कर रहे हों, तौभी प्रभु से उन तरीकों के बारे में पूछें, जिनसे वह चाहता है कि आप उन लोगों की सेवा करने का प्रयास करें। आप कभी नहीं जान सकते कि ऐसा करने से वह आपके द्वारा और आपमें कितना अच्छा काम कर सकता है। अक्सर, जब आपकी पहचान बिखरी हुई लगे, तो अपना ध्यान दूसरों पर लगाना ही स्वयं को फिर से पाने का मुख्य तरीका होता है।
क्या बचाया जा सकता है?
क्या आपको मेरे माता-पिता का घर याद है? यद्यपि वह घर नीलाम किए जाने के छोर पर था, तौभी ऐसा लगता है कि इस वसंत के अन्त में या गर्मी के आरम्भ में हम उन्हें उस घर में फिर से देखने जा रहे हैं। प्रभु ने इस दौरान बहुत कुछ दिया है और उनके घर की लगभग हर वस्तु को ठीक करने और उसे पहले से बेहतर बनाने का मार्ग भी निकाला है।
प्रभु बहाली में माहिर है। और वैसे भी, उसने ही हमें हमारे पापों की दलदल की कीच से निकालकर उस मजबूत चट्टान पर खड़ा किया है, जो मसीह है (भज. 40:2)। स्पष्ट कहूँ तो, हो सकता है कि जो हमने खोया है, वह हमें कभी उसे वापस न दे। हमसे यह वादा नहीं किया गया है कि जीवन आसान होगा। इतने पर भी, हम अय्यूब की तरह कह सकते हैं, “मैं अपनी माँ के पेट से नंगा निकला और वहीं नंगा लौट जाऊँगा; यहोवा ने दिया और यहोवा ही ने लिया; यहोवा का नाम धन्य है” (अय्यूब 1:21)। और फिर भी, हम एक बात निश्चित तौर पर जान सकते हैं कि: हमारे दु:खों में भी प्रभु का हमारे लिए एक उद्देश्य है। उसने वादा किया है कि वह हमारे जीवन की हर बात को उस स्वर्गीय भलाई के अनुसार ढालेगा, जो उसने पृथ्वी की नींव रखने से पहले हमारे लिए सोची थी (रोमि. 8:28)। बाइबल की यह सच्चाई जीवन को नये सिरे से बनाने के लिए एक मार्गदर्शक कार्यक्रम की तरह काम करती है।
यह जानना कि परमेश्वर ने आपके लिए भलाई की योजना बनाई है, आपको बर्बादी के बीच भी आशा के साथ यहाँ-वहाँ देखने में सक्षम करता है। परमेश्वर काम कर रहा है, इसलिए पूछें, “मैं क्या सीख सकता हूँ? क्या बचाया जा सकता है? उसकी क्या योजना है?” और हो सकता है कि आपको इन प्रश्नों का गूढ़ज्ञान तुरन्त न मिलें, परन्तु धीरज धरें। प्रभु समय आने पर आपको अपनी योजना के बारे में कुछ न कुछ अवश्य दिखाएगा। और उसकी महिमा में, आप उस योजना को पूरी तरह से जान जाएँगे, और आप कहने पाएँगे, “प्रभु का नाम धन्य है।” यदि आप महिमा में होकर ऐसा कहेंगे, तो इसे अभी से कहना आरम्भ कर दें। यह निश्चित रूप से सच है। अपने जीवन को नये सिरे से कैसे आरम्भ करें, इसे सीखने का आरम्भ दृष्टिकोण में इस बदलाव को लाने से होता है—अर्थात् यह भरोसा करना कि जीवन को फिर से आरम्भ करना उसके साथ सम्भव है। जब हम बाइबल में ऐसे लोगों के उदाहरण देखते हैं, जिन्होंने फिर से आरम्भ किया, तो हम देखते हैं कि उन सबमें परमेश्वर का अनुग्रह ही आम बात है। नये आरम्भ के बारे में बाइबल क्या कहती है? वह कहती है कि उसकी दया हर सुबह नयी होती है।
विलियम काउपर की लिखी हुई कविता मेरी पसन्दीदा कविताओं में से एक है। इसका नाम ‘गॉड मूव्स इन अ मिस्टीरियस वे’ (‘God Moves in a Mysterious Way’) है। इसका आखिरी अन्तरा कुछ इस तरह से है:
परमेश्वर के उद्देश्य तेजी से पूरे होंगे,
हर घण्टे वे खुलते जाएँगे।
कली का स्वाद भले ही कड़वा हो,
परन्तु फूल तो मीठा होगा।
अंधे अविश्वास का गलती करना निश्चित है
और उसके काम को व्यर्थ ही समझेंगे।
परमेश्वर स्वयं ही अपना अनुवादक है,
और वह इसे स्पष्ट कर देगा।
ये शब्द कितने सच हैं। भले ही आपके जीवन की समाप्ति के समय आसमान में धुआँ उठ रहा हो, तौभी आप जान सकते हैं कि परमेश्वर के उद्देश्य विफल नहीं होते। वह सबसे बुरी और सबसे पीड़ादायी बातों में भी आपकी भलाई करने के लिए तेजी से काम करता है।
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मनन के लिए प्रश्न:
- क्या कभी आपकी कोई ऐसी वस्तु खो गई है, जिसके लिए आपको लगा कि हमेशा के लिए चली गई है, परन्तु फिर वह आपको वापस मिल गई? अपने मार्गदर्शक को वह कहानी सुनाएँ।
- किसी वस्तु को हमेशा के लिए खो देने बनाम कुछ समय के लिए खोकर उसे वापस पा लेने में क्या अन्तर है?
- अपने दु:ख के बीच दूसरों की सेवा करना कठिन क्यों होता है?
- आप अपने दु:ख में अभी परमेश्वर को किस तरह काम करते हुए देखते हैं?
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भाग III: आरम्भिक कदम
आपका संसार बिखर गया है, और आप स्वयं से पूछ रहे हैं, “अब क्या करें?” इस प्रश्न का उत्तर देना ही इस खण्ड का लक्ष्य है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि मैं आपको ठीक-ठीक यह नहीं बता सकता कि क्या करना है, परन्तु मुझे आशा है कि मैं आपको कुछ ऐसी श्रेणियाँ बता पाऊँगा, जिनका आप इस मुसीबत से निकलने के तरीके खोजते समय तुरन्त उपयोग कर सकते हैं।
प्रार्थना करें
मुझे पता है कि यह रविवार की पाठशाला जैसा उत्तर लगता है। फिर भी, दु:ख के समय प्रार्थना हमारे लिए सबसे बड़े सहारों में से एक है। भजन संहिता की पुस्तक में, पंद्रह गीतों को “यात्रा के गीत” कहा गया है। और ऐसा माना जाता है कि ये वही भजन हैं, जिन्हें प्राचीन यहूदी तीर्थयात्री एक-दूसरे के साथ तब गाते थे, जब वे यहोवा के लिए बलिदान चढ़ाने और प्रार्थना करने को मन्दिर की ओर ऊपर जाते थे। भजन संहिता 121 ऐसा ही एक भजन है, और इसमें भजनकार पूछता है, “मुझे सहायता कहाँ से मिलेगी?” (भज. 121:1)। और वह उत्तर देता है:
मुझे सहायता यहोवा की ओर से मिलती है,
जो आकाश और पृथ्वी का कर्ता है।
वह तेरे पाँव को टलने न देगा,
तेरा रक्षक कभी न ऊँघेगा।
सुन, इस्राएल का रक्षक,
न ऊँघेगा और न सोएगा।
यहोवा तेरा रक्षक है;
यहोवा तेरी दाहिनी ओर तेरी आड़ है। (भज. 121:2-5)
हे मेरे मित्र, आपकी सहायता भी प्रभु की ओर से ही आती है। अपने दु:खों में भी, आप यह जान सकते हैं कि परमेश्वर न तो सोता है और न ही ऊँघता है। वह आपकी रक्षा करता है, अर्थात् वह यहाँ आपके सभी दिनों में और स्वर्ग में उसके साथ बिताए जाने वाले अनन्तकाल के दिनों में आपकी पूरी सुरक्षा का आश्वासन देता है। क्योंकि ये बातें सच हैं, इसलिए मुसीबत के समय आपको उसके पास अवश्य जाना चाहिए, जो आपकी सहायता करता है।
आप प्रभु के पास कैसे जाते हैं? आप प्रार्थना के द्वारा उसके पास जाते हैं। कभी-कभी जब दु:ख बहुत अधिक होता है, तो आप बस इतना ही कह पाते हैं, “हे परमेश्वर, मेरी सहायता कर। मुझे तेरी आवश्यकता है!” यह बिलकुल ठीक है। प्रभु वह भी जानता है जो हम कह नहीं सकते। और हमें इस बात से डरने की आवश्यकता नहीं है कि उसे हमारे संकट में कोई रुचि नहीं है। इसके बजाय, हम अपने दु:ख प्रभु के पास इसलिए ले जाते हैं “क्योंकि उसको तुम्हारा ध्यान है” (1 पत. 5:7)।
भरोसा करना
स्पष्ट रूप से कहें तो, प्रार्थना कोई ऐसी बात नहीं है, जिसमें आप सूची की जाँच करके आगे बढ़ जाएँ। इसके बजाय, आप प्रार्थना करते हैं और प्रार्थना करते ही रहते हैं। और फिर भी, जब आप प्रार्थना में प्रभु के सामने अपना दु:ख रख देते हैं, तो आप उन लोगों पर भरोसा करना आरम्भ करना चाहते हैं, जिन्हें प्रभु ने आपके आसपास रखा है, और जिन लोगों पर आप भरोसा कर सकते हैं। आमतौर पर, इसका अर्थ अपने माता-पिता, परिवार के अन्य सदस्यों, करीबी मित्रों और/या अपनी कलीसिया के पास्टरों से बात करना है।
दूसरों पर भरोसा क्यों करें? अक्सर, दूसरे मसीही ही वह साधन होते हैं, जिनका उपयोग परमेश्वर हमें दिलासा देने के लिए करता है। आंशिक रूप से इसी कारण परमेश्वर सभी मसीहियों से कहता है कि “तुम एक दूसरे का भार उठाओ, और इस प्रकार मसीह की व्यवस्था को पूरी करो” (गला. 6:2)। यदि आपको दूसरों पर भरोसा करने की आदत नहीं है, तो अब इसे आरम्भ करने का समय आ गया है, विशेष रूप से यदि आप अभी किसी बहुत बड़े दु:ख में न पड़े हों। अपने हृदय की बात साझा करने का अभ्यास करें और अपने सबसे करीबी परिवार एवं मित्रों से आपको वह याद दिलाने के लिए कहें, जिसे परमेश्वर का वचन सच बताता है। वैसे भी, हम केवल अपनी भड़ास निकालने या “सुलझाने” के लिए ही भरोसा नहीं करते। इसके बजाय, हम अपनी बातें इसलिए साझा करते हैं, ताकि दूसरे लोग जान सकें कि हमारे लिए प्रार्थना कैसे करनी है और आवश्यकता के समय हमारी सहायता कैसे करनी है। यदि आपको लगे कि आपका जीवन बिखर गया है, तो फिर से आरम्भ करने का सबसे अच्छा तरीका है कि आप मसीह में किसी भरोसेमन्द भाई या बहिन पर भरोसा करें।
आशा
जब आपका जीवन बिखर जाता है, तो आशा सबसे दूर की बात लगती है। असल में, जीवन का बिखरना और निराशा साथ-साथ चलते हैं। और फिर भी, आशा ही तो है, जो हर मसीही को सबसे खराब परिस्थितियों के बीच में भी मिलती है। एक बात तो यह है कि हमारे पास हमेशा स्वर्ग की आशा होती है। पौलुस के पास भी यही आशा थी जब उसने ये शब्द लिखे थे:
इसलिये हम हियाव नहीं छोड़ते; यद्यपि हमारा बाहरी मनुष्यत्व नष्ट होता जाता है, तौभी हमारा भीतरी मनुष्यत्व दिन प्रतिदिन नया होता जाता है। क्योंकि हमारा पल भर का हल्का सा क्लेश हमारे लिये बहुत ही महत्वपूर्ण और अनन्त महिमा उत्पन्न करता जाता है; और हम तो देखी हुई वस्तुओं को नहीं परन्तु अनदेखी वस्तुओं को देखते रहते हैं; क्योंकि देखी हुई वस्तुएँ थोड़े ही दिन की हैं, परन्तु अनदेखी वस्तुएँ सदा बनी रहती हैं। (2 कुरिं. 4:16-18)।
यदि आप मसीह में हैं, तो इस जीवन में ऐसी कोई बात नहीं है जो आपकी आशा को खतरे में डाल सके। जैसे मसीह का स्वर्ग में होना निश्चित है, वैसे ही हम भी पौलुस की तरह अपने दु:खों के बारे में कह सकते हैं कि वह “पल भर का हल्का सा क्लेश” है।
हम आशा इसलिए भी रखते हैं, क्योंकि हम जानते हैं कि हमारा परमेश्वर पूरी सृष्टि में किसी भी बात से अधिक हमारी चिन्ता करता है। यीशु ने हवा में उड़ने वाले पक्षियों की ओर लोगों का ध्यान दिलाकर यह बात समझाई थी। उसने उनके बारे में कहा, “क्या पैसे में दो गौरैयें नहीं बिकतीं? तौभी तुम्हारे पिता की इच्छा के बिना उनमें से एक भी भूमि पर नहीं गिर सकती। तुम्हारे सिर के बाल भी सब गिने हुए हैं। इसलिये डरो नहीं; तुम बहुत गौरैयों से बढ़कर हो” (मत्ती 10:29-31)। देखिए, आपकी दशा चाहे कितनी भी खराब क्यों न हो, आप आशा इसलिए रख सकते हैं, क्योंकि स्वर्ग का परमेश्वर आपको जानता है और वह देखता है कि आप कहाँ हैं। इसके अलावा, उसने स्वयं से वादा किया है कि स्वर्ग पहुँचने तक वह आपकी चिन्ता करता रहेगा।
आशा सब कुछ बदल देती है। जब हमें आशा होती है कि सुबह होगी, तो अन्धेरे की पकड़ ढीली पड़ जाती है। जब हमें लगता है कि हम सफल होंगे, तो निराशा दूर हो जाती है। जब हमें पता होता है कि हम सुरक्षित हैं, तो डर गायब हो जाता है। हे मेरे मित्र, यदि आप यीशु में हैं, तो आपके पास अटूट आशा है। वह आपको कभी निराश नहीं करेगा।
एक पाँव दूसरे के आगे
क्या आपने कभी क्लेमेशन का चलचित्र “सांता क्लॉज़ इज़ कमिंग टू टाउन” (“Santa Claus Is Coming to Town”) देखी है? यह मेरे पसन्दीदा चलचित्रों में से एक है। और मुझे विशेष तौर पर वह दृश्य पसन्द है, जिसमें क्रिस क्रिंगल बूढ़े विंटर वॉरलॉक को बदलना सिखाते हैं। वह एक संगीतमय धुन का उपयोग करते हैं, और उसके बोल कुछ ऐसे हैं: “तुम एक पाँव दूसरे के आगे रखो, और जल्दी ही तुम भूमि पर चलने लगोगे। तुम एक पाँव दूसरे के आगे रखो, और जल्दी ही तुम दरवाजे से बाहर निकल जाओगे।” शायद यह बात घिसी-पिटी लगे, परन्तु जब बर्बादी से उबरने की बात आती है तो मुझे सच में लगता है कि सांता-टू-बी (Santa-to-be) की बात में दम है। जब जीवन बिखर जाता है, तो हमें उठकर, फिर से चलना आरम्भ करना होता है।
जीवन का बिखरना आम तौर पर ऐसी बातों के कारण से होता है, जिन पर आपका कोई नियंत्रण नहीं होता। वैसे भी, यदि सब कुछ आपके नियंत्रण में होता, तो आप उसे बिखरने ही नहीं देते। यदि आप बीमारी को रोक सकते, तो उसे अवश्य रोकते। यदि आप अपने मित्रों की सोच बदल सकते, तो उसे अवश्य बदलते। यदि आप उस घटना को रोक सकते, तो उसे अवश्य रोकते। जीवन इसलिए बिखरता है, क्योंकि हमारे नियंत्रण से बाहर की बातें वैसे नहीं घटतीं जैसे हम चाहते हैं। परन्तु इससे हमें यह नहीं समझना चाहिए कि हमारा किसी भी बात पर कोई नियंत्रण नहीं है।
अपने सबसे बड़े दु:खों के बीच भी, कुछ बातें तो हमारे नियंत्रण में होती हैं। सबसे पहले और सबसे ऊपर, हमारी प्रतिक्रिया हमारे नियंत्रण में होती है। क्या हम बर्बादी महसूस होने पर परमेश्वर और बाकी सब पर गुस्सा करेंगे? या हम प्रभु पर भरोसा करेंगे और इस दौरान उससे तथा दूसरों से प्रेम करने का प्रयास करेंगे? क्या हम अपनी त्रासदी का उपयोग पाप करने के बहाने के तौर पर करेंगे, या हम विश्वास रखकर परमेश्वर के वचन का पालन करेंगे, और ऐसा तब भी करेंगे, जब दूसरे हमें छूट दे रहे हों? यदि आपका जीवन बर्बाद हो गया है, तो अगला सबसे अच्छा काम करने का प्रयास करें। जब आप प्रभु की उसके उद्देश्य को प्रकट करने की प्रतीक्षा कर रहे हों, तो उसके सामने एक बार में आज्ञाकारिता का एक कदम उठाएँ। मेरे विचार से आप पाएँगे कि इससे न केवल समय थोड़ा तेजी से बीतता चला जाता है, बल्कि यह आपको स्वयं के और अपनी परिस्थिति के बारे में अधिक सोचने से भी स्वतंत्र करता है। और जब आप प्रभु पर भरोसा करके उसकी बात मानने का प्रयास करते हैं, तो वह आपकी परिस्थिति को आपकी भलाई में बदल देने का वादा करता है। इसलिए, आगे बढ़ें, और एक पाँव दूसरे के आगे रखें। “जहाँ तुम जा रहे हो वहाँ कभी नहीं पहुँच पाओगे (बा बाबाबा) यदि तुम कभी अपने पाँवों पर खड़े नहीं होओगे। इसलिए आओ, अच्छी हवा चल रही है! तेज चलने वाले मनुष्य को हराना कठिन है!”
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मनन के लिए प्रश्न:
- जब आप बहुत अधिक दु:ख में होते हैं, तो आप किस बात के लिए प्रार्थना करते हुए समय बिताते हैं?
- परमेश्वर ने आपके जीवन में किसे रखा है, जिसके लिए आपको लगता है कि आप उस पर भरोसा कर सकते हैं?
- क्या आपको अपने दु:ख के बारे में दूसरों पर भरोसा करना कठिन लगता है? यदि हाँ, तो ऐसा क्यों है?
- अपने दु:ख का सामना करते हुए, आज आप आज्ञाकारिता के लिए कौन-से छोटे-छोटे कदम उठा सकते हैं?
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भाग IV: पीछे मुड़कर देखना
मैं शर्त लगा सकता हूँ कि कभी-न-कभी आपने किसी को यह वाक्य कहते सुना होगा, “काश जो मुझे अब मालूम है, वह मुझे उस समय मालूम होता,” या वे इससे मिलता-जुलता कोई वाक्य कहते हैं। इस विचार को एक और वाक्य में ऐसे कहा जाता है: “बाद में सब साफ-साफ समझ आता है”। अक्सर किसी घटना के होने के बाद ही हम उसकी परिस्थिति को एकदम साफ-साफ देख पाते हैं। बाद में सब साफ-साफ समझ आने का यही विचार मेरे पसन्दीदा लेखकों में से एक, पी.जी. वुडहाउस की विलक्षण कहानियों का मुख्य आधार है। उनकी कहानियों में बर्टी वूस्टर और उसका चालाक खानसामा, जीव्स होते हैं। बर्टी हमेशा किसी मूर्खता से भरी बात में बुरी तरह फँस जाता है, और जब मामला बिगड़ जाता है, जो कि हमेशा होता ही है, तो जीव्स एक बढ़िया योजना के साथ आकर सब बातें ठीक कर देता है। किसी घटना के समाप्त होने पर, बर्टी पीछे मुड़कर देखता है और उस जीत में अपने योगदान को बढ़ा-चढ़ाकर देखने के बावजूद, उसे यह बेहतर समझ आता है कि आरम्भ में सारा झगड़ा किस बात को लेकर था। बाद में सब साफ-साफ समझ आना ही बर्टी और जीव्स की पूरी कहानियों का सार है।
क्या कभी आपने कुछ ऐसी बात का सामना किया है, जिसे बाद में साफ-साफ समझने के लिए आपको उस पर विचार करना पड़ा हो? उससे जो सीखा, उसका आपने क्या किया? बर्टी और जीव्स के मामले में, बाद में साफ-साफ समझ आने से भविष्य में बेहतर निर्णय लेने में शायद ही कभी सहायता मिलती है। असल में, वुडहाउस ने हर कहानी में दिखाया है कि वे दोनों किसी न किसी तरह गड़बड़ कर ही देते हैं। परन्तु आपके साथ वैसा नहीं होना चाहिए। प्रभु हमें दु:ख इसलिए सहने देता है, ताकि हम उस पर निर्भर रहना और भरोसा करना सीख सकें। और दु:ख सहने से हमें बुद्धि मिलती है, जिसे हम भविष्य में अप्रिय समयों का सामना करते समय लागू कर सकते हैं। यह खण्ड इस बारे में है कि भविष्य में दु:ख के समयों में लागू करने के लिए बुद्धि कैसे प्राप्त की जाए।
चिन्तन करें और सीखें
दु:ख से पार होने के बाद सबसे पहला काम यह चिन्तन करना है कि वह सब क्या था और उस सब का क्या अर्थ था। यह सुनने में आसान तो लगता है, तौभी अधिकांश लोग इस कदम से बचना चाहते हैं। असल में, कठिन बातों के बारे में चिन्तन करना उतना ही बुरा लग सकता है, जितना बुरा उसी परिस्थिति में होना लगता है! यदि आप भी ऐसा ही सोचते हैं, तो मैं आपसे आग्रह करता हूँ कि दु:ख को दबाने की अपनी आदत को छोड़ दें। इसके बजाय, उस पर चिन्तन करें। प्रभु से समझदारी माँगें। बाहरी दृष्टिकोण के लिए परिवार और मित्रों का सहारा लें।
आपके चिन्तन करने की इच्छा का एक स्पष्ट कारण यह है कि आप भविष्य में काम आने वाली किसी भी बात को पीछे न छोड़ दें। याद रखें कि आपका दु:ख प्रभु की ओर से आता है, और उसने आपकी स्वर्गीय भलाई के अनुसार, जो उसने यीशु में आपके लिए सुरक्षित किया है, सब बातों की पहले से ही योजना बना रखी है। इसका अर्थ यह है कि दु:ख का सच में एक कारण होता है, और आप उसे अनदेखा करके बर्बाद नहीं करना चाहेंगे।
मुझे यह मान लेना चाहिए कि मैं डायरी लिखने का बहुत अधिक आदी नहीं हूँ। मेरी अलमारियों में रखी खाली डायरियाँ इस बात का सबूत हैं कि मैंने कई बार यह आदत डालने का प्रयास किया, परन्तु ऐसा करने में विफल रहा। हालाँकि, मैंने पाया है कि दु:ख में सीखी गई शिक्षाओं की सूची बनाना बड़ा फलदायी होता है। मैं आमतौर पर कठिन समय की बातों के बारे में अपने मन में सोचने का प्रयास करता हूँ और फिर अपने चिन्तन को एक-एक बिन्दु करके लिख लेता हूँ। शायद मैं ऐसी बातें लिखूँ: “मैंने सीखा कि प्रभु मेरे प्रति उससे कहीं अधिक विश्वासयोग्य है जितना कि मैं उसके प्रति हूँ।” “मैंने अपनी पत्नी में संतोष और स्थिरता का प्रदर्शन देखा, और मैं बहुत आभारी हूँ।” “मुझे अपने पाप से चोट पहुँची। मैं अब आगे को ऐसा नहीं करना चाहता।” इन विचारों को लिखने से, मेरे उन्हें भूलने की सम्भावना कम हो जाती है। और उन्हें न भूलने का अर्थ है कि अगली बार जब मेरी नाव लहरों में हिचकोले खाने लगेगी, तो मैं उनका उपयोग कर पाऊँगा।
एक बार जब आप चिन्तन कर लें, तो मेरे विचार से, यह सुनिश्चित करने के लिए कि आप दु:ख में प्रभु से मिली शिक्षाओं को सीखें, एक और बढ़िया कदम जो आप उठा सकते हैं, वह अपनी सूची किसी मित्र के साथ साझा करना है। वैसे भी, हमें अच्छे और बुरे समय में एक-दूसरे का साथ देना है। और हम ऐसा एक-दूसरे को जवाबदेह ठहराकर करते हैं। यदि आपको भरोसा है कि प्रभु ने अपने चरित्र, अपने तरीकों या अपनी व्यवस्था के बारे में आपको कुछ सिखाने के लिए आपके दु:ख का उपयोग किया है, तो किसी ऐसे मित्र को यह बताएँ, जो अगली बार आपकी परीक्षा के समय में आपको यह याद दिला सके। हम अक्सर सबसे महत्वपूर्ण बातें भी भूल जाते हैं। हमारे मित्र हमें उन सच्चाइयों को याद रखने में सहायता करते हैं, जो सबसे बुरे समय में भी हमारी आत्मा को सुरक्षित रखती हैं।
धन्यवाद कहें
एक बार जब आप चिन्तन कर लें, तो मैं आपको कुछ ऐसा करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहता हूँ, जो अधिकांश लोगों को थोड़ा अजीब लग सकता है—और वह धन्यवाद कहना है। परीक्षाएँ उस प्रभु का धन्यवाद करने का अवसर होती हैं, जिसने आपकी भलाई के लिए ही उन लोगों को आपके पास आने दिया। याद रखें कि दु:ख कभी भी बेकार नहीं होता। प्रभु के कुछ उद्देश्य होते हैं, जिन्हें हम शायद तुरन्त या इस जीवन में कभी न देख पाएँ, परन्तु ऐसा स्वर्गीय दिन आएगा, जब हमें पूरी तरह समझ आ जाएगा कि प्रभु ने हमारे लिए ये चुनौतियाँ क्यों चुनी थीं। इसका अर्थ है कि हमारी परीक्षाएँ भी प्रभु का धन्यवाद करने और उसकी स्तुति करने का एक सही कारण हैं।
हमारे परमेश्वर जैसा बुद्धिमान कोई नहीं है। हमारे परमेश्वर जैसा जानने वाला कोई नहीं है। हमारे परमेश्वर जैसा सामर्थी कोई नहीं है। और हमारे परमेश्वर जैसा भला कोई नहीं है। इन्हीं गुणों का संयोजन उसे सबसे कठिन परीक्षाओं के बीच भी हमारे लिए भलाई की योजना बना पाने में सक्षम बनाता है। क्या आपको बाइबल का पात्र यूसुफ याद है? मैं उस बेचारे व्यक्ति की बात कर रहा हूँ, जिसे उसके निकम्मे भाइयों ने एक पराए देश में दास बनाकर बेच दिया था, और फिर उसके मालिक की विश्वासघाती पत्नी ने उस पर झूठा आरोप लगाया और उसे एक ऐसे बन्दीगृह में डाल दिया गया, जहाँ से निकलने का कोई मार्ग नहीं था? हाँ, वही व्यक्ति। प्रभु ने दो देशों को बचाने के लिए उसके दु:खों के हर चरण को निर्धारित किया था। आरम्भ में तो यूसुफ को परमेश्वर का काम दिखाई नहीं दिया। परन्तु जब कहानी लगभग समाप्त होने पर थी, तब उसे पता चला कि सबसे अच्छी बात को पूरा करने के लिए उसके सबसे बुरे दिनों के पीछे परमेश्वर था। इसी कारण उत्पत्ति 50:20 में यूसुफ कहता है, “यद्यपि तुम लोगों ने मेरे लिये बुराई का विचार किया था; परन्तु परमेश्वर ने उसी बात में भलाई का विचार किया, जिससे वह ऐसा करे, जैसा आज के दिन प्रकट है, कि बहुत से लोगों के प्राण बचे हैं।”
हो सकता है कि आपके दु:ख ऐसे न हों कि परमेश्वर किसी पूरे देश को, या दो देशों को बचा सके! परन्तु आप भरोसा रख सकते हैं कि आपको बन्दीगृह में डालने के पीछे उसके कई कारण होंगे, और वे सभी उसकी सिद्धता एवं वादों के अनुसार होंगे। परमेश्वर आपके सिर के एक बाल को भी बिना किसी ऐसे कारण के नुकसान नहीं पहुँचने देता, जिसमें आपकी भलाई न हो। आप उस पर भरोसा कर सकते हैं, और असल में, आपको उस पर भरोसा करना ही चाहिए। और क्योंकि आप उस पर भरोसा करते हैं, इसलिए आपको उसका धन्यवाद करना चाहिए।
कोरी टेन बूम की कविता ‘द टेपेस्ट्री पोएम’ (The Tapestry Poem) लम्बे समय से मेरी पसन्दीदा कविता रही है। मुझे इसके बारे में सबसे पहले अपनी बहन से पता चला, जिसने दु:ख के समय में इसे मेरे साथ साझा किया था। और मैं गिन नहीं सकता कि तब से मैंने कितनी बार इसे पढ़ा है। मैं इसे आपके सामने पूरा का पूरा प्रस्तुत कर रहा हूँ, और जब आप इसे पढ़ें, तो स्वयं से पूछें कि अपने दु:खों में आपके जीवन में परमेश्वर के द्वारा किए गए कामों के लिए उसे धन्यवाद देने की कौन सी बातें हैं। ऐसा करने से, शायद आप उसे धन्यवाद देने की बेहतर स्थिति में आ जाएँगे:
मेरा जीवन और कुछ नहीं बस एक बुनाई है,
मेरे और मेरे परमेश्वर के बीच।
मैं रंग नहीं चुन सकती और
वह लगातार बुनता जाता है।
अक्सर वह दु:ख बुनता है;
और मैं मूर्खतापूर्ण घमण्ड में
भूल जाती हूँ कि वह ऊपरी भाग देखता है
और मैं अन्दरूनी भाग देखती हूँ
जब तक करघा शान्त नहीं हो जाता,
और बुनाई की नलियाँ आगे-पीछे होना बंद नहीं कर देतीं
क्या परमेश्वर वह परदा हटाएगा
और उसका कारण बताएगा कि ऐसा क्यों किया।
गहरे रंग के धागे भी उतने ही आवश्यक हैं
बुनने वाले के कुशल हाथों में
जितने कि सोने और चाँदी के धागे
जिस तरीके से उसने योजना बनाई है
वह जानता है, वह प्रेम करता है, वह चिन्ता करता है;
कोई भी बात इस सच्चाई को धुंधला नहीं कर सकती।
वह उन लोगों को सबसे बेहतरीन वस्तुएँ देता है
जो चुनाव उसी पर छोड़ देते हैं।
दूसरों की सहायता करें
आपने दु:ख उठाया है और उससे उबर भी आए हैं। अब क्या करना है? दूसरों की सहायता करें। असल में, मैं कहूँगा कि जो कुछ भी आपने सहा है, उससे एक पक्की बात जो आप सीख सकते हैं, वह यह है कि परमेश्वर की मंशा है कि आप अपने अनुभव का उपयोग दूसरों की सहायता करने के लिए करें। क्या आपने पाप करने के बाद पश्चाताप किया, और पाया कि परमेश्वर की दया अभी भी बहुत बड़ी है? तो पापी को भी ऐसी ही क्षमा पाने के लिए बुलाएँ, ताकि उसे भी वह क्षमा मिल सके, जो आपको मिली है। क्या आपने किसी ऐसे प्रियजन को खो दिया है, जिसकी जगह कभी नहीं भरी जा सकती? तो उन लोगों के साथ रोएँ, जो किसी ऐसे व्यक्ति के चले जाने का ही शोक मना रहे हैं। क्या आपने चोरी, आपदा या उत्पीड़न के कारण अपनी सांसारिक सम्पत्ति खो दी है? तो अपने आसपास के उन लोगों की देखभाल करें, जिनके पास कभी ये वस्तुएँ थीं और उन्होंने भी इन्हें खो दिया है।
देखिए, दु:ख उठा रहे लोगों की देखभाल करने के लिए आपका दु:ख आपको तैयार करता है। और असल में, दु:ख उठाने के बाद ही हम अक्सर दूसरों की देखभाल करने की सबसे बेहतर स्थिति में होते हैं। इसके कई कारण हैं। और इसका सबसे मुख्य कारण यह है कि दु:ख हमें अनुभव देता है, और अनुभव हमें करुणा से—अर्थात् उन लोगों के लिए करुणा से भर देता है, जो उसी मार्ग पर चल रहे हैं। मैं बहुत सी बार दूसरों के मार्ग को उनकी बताई बातों से अधिक आसान समझने का दोषी ठहरा हूँ, जब तक कि मुझे स्वयं उस मार्ग पर नहीं चलना पड़ा। अनुभव हमें हमारी वास्तविकता का एहसास कराता है। एक बार जब हमें अपनी वास्तविकता पता चल जाती है, तो हम उन लोगों को देख पाते हैं और उनकी देखभाल कर पाते हैं, जिन्हें हम शायद पहले आसानी से अनदेखा कर देते। अपने दु:ख उठाने को बेकार न जाने दें, इसके बजाय, उनका उपयोग करें, और दूसरों के निमित्त उनका उपयोग करें।
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मनन के लिए प्रश्न:
- क्या दु:ख पर चिन्तन करना आपके लिए कठिन है? आपके विचार से ऐसा क्यों है?
- आपके दु:ख ने आपको परमेश्वर के बारे में क्या सिखाया है? स्वयं के बारे में क्या सिखाया है? और दूसरों के बारे में क्या सिखाया है?
- हाल ही में आपने किस दु:ख का सामना किया है, जिसके लिए आप परमेश्वर का धन्यवाद कर सकते हैं?
- क्या कभी किसी ऐसे व्यक्ति ने आपकी सहायता की है, जिसने आपके जैसा ही दु:ख उठाया हो? उनके अनुभव ने उन्हें विशेष तौर पर आपकी सेवा करने में कैसे सक्षम किया?
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निष्कर्ष
बर्बादी के बाद नया आरम्भ करने के बारे में मैंने जो सबसे रोचक और प्रेरणादायक कहानियाँ सुनी हैं, उनमें से एक फ्रांसीसी लेखक एलेक्ज़ेण्डर डुमास की अद्भुत कहानी, द काउण्ट ऑफ मोण्टे क्रिस्टो (The Count of Monte Cristo) है। यदि आपको पढ़ने की आदत नहीं है, तो कम से कम सन् 2002 में इस पर बने चलचित्र को अवश्य देखें! इस कहानी का मुख्य पात्र एडमण्ड डैण्टेस है, जिसके मित्र और शत्रु उसे तब धोखा देते हैं, जिस रात उसकी प्रेमिका से उसकी सगाई हो रही होती है और उसे उस व्यापारिक जहाज के कप्तान के तौर पर पदोन्नति मिलने वाली होती है, जिस पर वह पहले काम कर चुका था। डैण्टेस को चौदह वर्षों के लिए ‘शैटो डी’इफ’ (Chateau d’If) नाम के भयानक बन्दीगृह में डाल दिया जाता है। और अन्त में, वह भाग निकलता है, उसे खजाना मिलता है, और वह उन सभी लोगों से बदला लेने के लिए अपनी सम्पत्ति का उपयोग करने का लक्ष्य बनाता है, जिन्होंने उसका जीवन बर्बाद कर दिया था। हालाँकि, अपने शत्रुओं को समाप्त करने के मार्ग पर, उसका गुस्सा शान्त हो जाता है और उसका हृदय नरम पड़ जाता है। और बदला लेने के बजाय, एडमण्ड अपने शत्रुओं पर दया दिखाने का चुनाव करता है। जहाँ तक उसकी अपनी बात है, वह अपने दु:ख-भरे जीवन को अपना लेता है और बचे हुए समय में भलाई करने का प्रयास करता है।
कुछ तरीकों से, द काउण्ट ऑफ मोण्टे क्रिस्टो (The Count of Monte Cristo) उन प्रमुख सच्चाइयों की एक तस्वीर है, जिन्हें यह मार्गदर्शिका आपको समझाना चाहती है। जैसे कि आपके दु:खों पर परमेश्वर का अधिकार, आपकी भलाई के लिए आपके दु:ख का उपयोग करने का उसका वादा, और दु:ख के द्वारा मजबूत, अधिक परिपक्व और अपने जीवन को सार्थक बनाने के लिए बेहतर ढंग से तैयार होने का आपका अवसर। हालाँकि, इस संसार की सारी सच्चाइयाँ और सबक महत्व नहीं रखते, यदि आप उन्हें अपने हृदय में लागू करने से इन्कार करते हैं। मेरी यह प्रार्थना है कि आप दु:ख में ऐसे न बैठे रहें कि मानो सब समाप्त हो गया हो। इसके बजाय, मैं प्रार्थना करता हूँ कि आप अपने प्रभु परमेश्वर पर विश्वास करें और अपने मरने के दिन तक उसकी एवं दूसरों की सेवा करके उसकी महिमा करें। मुझे भरोसा है कि दु:ख का हर अनुभव आपको उस अन्त समय की ओर अधिक प्रभावी होने में सहायता कर रहा है, जब तक कि अन्त न आ जाए और प्रभु आपको अपने पास न बुला ले।
लेखक के बारे में
टेलर हार्टले वॉशिंगटन, डी.सी. स्थित 9Marks में संपादकीय निदेशक के रूप में सेवा करते हैं। वे अपनी पत्नी रैचेल (Rachel) के साथ विवाहित हैं और उनके एक पुत्र हैं, जिनका नाम बोदे (Bode) है। टेलर ने साउदर्न बैपटिस्ट थियोलॉजिकल सेमिनरी से एम.डिवि. (M.Div.) की उपाधि प्राप्त की है और वर्तमान में यूनाइटेड किंगडम के लंदन सेमिनरी में थ.एम. (Th.M.) की पढ़ाई कर रहे हैं।
विषयसूची
- भाग I: जीवन क्यों बिखर जाता है
- बर्बादी के भौतिक कारण
- बर्बादी का औपचारिक कारण
- बर्बादी का प्रभावी कारण
- बर्बादी का अन्तिम कारण
- मनन के लिए प्रश्न:
- भाग II: नुकसान को कम करना
- आपने क्या खोया है?
- किसे चोट पहुँची है?
- क्या बचाया जा सकता है?
- मनन के लिए प्रश्न:
- भाग III: आरम्भिक कदम
- प्रार्थना करें
- भरोसा करना
- आशा
- एक पाँव दूसरे के आगे
- मनन के लिए प्रश्न:
- भाग IV: पीछे मुड़कर देखना
- चिन्तन करें और सीखें
- धन्यवाद कहें
- दूसरों की सहायता करें
- मनन के लिए प्रश्न:
- निष्कर्ष
- लेखक के बारे में