#82 बूढ़े माता-पिता की देखभाल करना: कठिन समयों में उनका आदर करना

By Dr. Richard John Perhai, Dr. Larry Oats

परिचय

रसोई की मेज पर बैठे हुए, मैंने अपने पिताजी को अपनी गाड़ी की चाबियाँ छोड़ने की सच्चाई से संघर्ष करते हुए देखा। कई वर्षों तक, उन्हीं के हाथों ने हमारा संसार बनाया था, और मुझे काम करना तथा दृढ़ता से खड़े रहना सिखाया था। परन्तु उस दिन, वे पहले से कहीं अधिक छोटे लग रहे थे। उनके हाथ काँपते रहे, और गुस्सा करने के बजाय, वे भारी खामोशी में बैठे रहे। उन्होंने गाड़ी चलाने के अपने सारे वर्षों के बारे में बात करते हुए बताया कि अपने बेटे से यह सुनना कितना कठिन था कि वह अब लोहे की वस्तुओं की दुकान तक गाड़ी चलाकर नहीं जा सकते।

बूढ़े माता-पिता की देखभाल करने का अर्थ केवल उनकी दवाइयों का प्रबन्ध करना या उन्हें चिकित्सक के पास ले जाने का प्रबन्ध करना नहीं होता है। इसका अर्थ किसी ऐसे व्यक्ति को धीरे-धीरे सहायता की आवश्यकता वाला मनुष्य बनते हुए देखना है, जो कभी दूसरों के लिए मजबूत सहारा रहा था। यह बदलाव परिवार में दूरियाँ उत्पन्न कर सकता है, और अक्सर घमण्ड इसमें बाधा बनता है। यह एक उलझा हुआ और मुश्किल काम है।

हम अक्सर पाँचवीं आज्ञा को बच्चों के लिए कही गई कोई बात, या पालन करने के लिए एक साधारण सा नियम मानते हैं। परन्तु अपने माता-पिता का आदर करना उससे कहीं अधिक बढ़कर है। बचपन में, इसका अर्थ अपना कमरा साफ करना हो सकता है। बड़े होने पर, इसका अर्थ गाड़ी की चाबियाँ ले लेना या ऐसे माता या पिता की देखभाल करना हो सकता है, जिन्होंने कभी आपकी देखभाल की थी। बहुत से लोग सोचते हैं कि जब देखभाल करना कठिन लगे, तो अपने माता-पिता का आदर कैसे करें। आदर करना केवल एक अच्छी भावना नहीं है—यह एक जिम्मेदारी है और उन लोगों की देखभाल करने का एक तरीका है, जो महत्व रखते हैं।

हम अक्सर भण्डारीपन को धन से जोड़कर देखते हैं, परन्तु असल में इसका अर्थ उन वस्तुओं की देखभाल करना है, जो हमारी नहीं हैं। आपके माता-पिता यहाँ इसलिए नहीं हैं कि आप उन्हें नियंत्रण में रखें या उन्हें ठीक करें। वे परमेश्वर के स्वरूप में बने हुए लोग हैं, और आपको इस कठिन दौर में उनकी देखभाल करने का काम सौंपा गया है। उनकी गरिमा की रक्षा करना आपकी जिम्मेदारी है, विशेष रूप से तब जब वे स्वयं ऐसा नहीं कर सकते। असली मसीही जीवन—केवल कलीसिया में ही नहीं, बल्कि उन शान्त पलों में भी ऐसा ही दिखता है, जब आप थके हुए हों और बार-बार एक ही प्रश्न का उत्तर दे रहे हों।

यहीं पर विश्वास वास्तविकता बन जाता है, क्योंकि हम जानते हैं कि यह संसार बिखरा हुआ है। बुढ़ापे की समस्याएँ—जैसे मनोभ्रंश, भूलने की बीमारी और कमजोर शरीर—एक दु:खी संसार की निशानियाँ हैं। इसमें कुछ भी सुन्दर नहीं है। यह बस कठिन है। मैं ऐसी बेटियों से मिला हूँ, जो स्वयं को दोषी महसूस करती हैं और ऐसे बेटों से मिला हूँ, जो इसलिए परेशान हैं, क्योंकि उनके माता-पिता में बहुत अधिक बदलाव आ गया है। कई लोग सोचते हैं कि परमेश्वर लोगों को इस तरह कमजोर क्यों होने देता है।

परमेश्वर हमसे नायक बनने की आशा नहीं करता, परन्तु वह चाहता है कि हम सेवा करें। इतिहास में कई विश्वासयोग्य लोगों ने बिना किसी आधुनिक सहायता के मरते हुए लोगों की देखभाल की। उनके पास ब्लॉग या वेबसाइट से मिलने वाली कोई सलाह नहीं थी; उनके पास बस अपना विश्वास और अपनी बुलाहट की समझ थी। वे समझ गए थे कि किसी शान्त और कठिन जगह पर किसी व्यक्ति की देखभाल करना ही प्रेम का काम है। उनका लक्ष्य व्यक्तिगत् भरपूरी नहीं, बल्कि विश्वासयोग्य रहना था। उन्होंने इसे अपनी सेवा में रुकावट नहीं, बल्कि सेवा करने का एक और रूप माना।

यह आसान या आकर्षक काम नहीं है। आप थक जाएँगे, और अकेले होने पर रो भी सकते हैं। परन्तु यदि आप आज की रात अपने माता-पिता की देखभाल कर रहे हैं, तो आप अकेले नहीं हैं। मसीह समझता है कि आप किस दौर से होकर गुजर रहे हैं, और वह आपको सामर्थ्य देगा।

आइए इस आज्ञा पर दृष्टि डालें।

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#82 बूढ़े माता-पिता की देखभाल करना: कठिन समयों में उनका आदर करना

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