#94 परमेश्वर की इच्छा क्या है — अपने मार्ग की खोज करना
परिचय
आप यहाँ क्यों हैं? यह एक ऐसा प्रश्न है जिसका उत्तर प्रत्येक व्यक्ति को देना चाहिए। बहुत से लोग इसका उत्तर देने से बचने का प्रयास करते हैं। वे अपने आप को इस संसार की तुच्छ वस्तुओं और व्यर्थ की बातों में उलझाकर अपना ध्यान भटकाते रहते हैं, परन्तु यह भटकाव अधिक समय तक कार्य नहीं करता है। अंततः प्रत्येक व्यक्ति को इस सत्य का सामना करना पड़ता है कि हम इस पृथ्वी पर क्यों हैं, और यह पूछना ही पड़ता है कि, “मेरा उद्देश्य क्या है?”
इस प्रश्न का उत्तर ही हमारे जीवन की लगभग हर बात को अर्थ बताता है—हमारा जीवन, हमारा कार्य, हमारी पढ़ाई, हमारे सम्बन्ध, यहाँ तक कि हमारी प्रत्येक साँस भी। यह प्रश्न अत्यंत गम्भीर है, और इसका उत्तर हमारे प्रत्येक कदम को बदल देता है। प्रायः लोग वर्षों तक यह सोचते रहते हैं कि स्वयं को कैसे पहचानें या ऐसे संसार में अपने जीवन का उद्देश्य कैसे खोजें, जो दिन-प्रतिदिन अधिक अव्यवस्थित होता चला जा रहा है।
इस जीवन-कौशल मार्गदर्शिका में हम अपने उद्देश्य को समझने का प्रयास करेंगे—कि हम यहाँ क्यों हैं और किसके लिए हैं। हम यह जानेंगे कि जीवन के विषय में पवित्रशास्त्र क्या कहता है, और उद्देश्यपूर्ण जीवन जीने से सम्बन्धित बाइबल की आयतों को खोजेंगे ताकि हमारे प्राण दृढ़ता से स्थिर रह सकें। इसे समझने के लिए हम पहले आरम्भ की ओर दृष्टि करेंगे, फिर यह विचार करेंगे कि हम अभी कहाँ हैं, और अन्त में उस दिशा को देखेंगे जहाँ हम जा रहे हैं। परमेश्वर की सहायता से मेरी आशा है कि जब हम इन बातों को परमेश्वर के वचन की अगुवाई में समझेंगे, तब आप इस बात को और अधिक समझ पाएँगे कि उद्देश्य के साथ जीवन कैसे जीना है, और आपकी इस यात्रा के लिए परमेश्वर की क्या इच्छा है।
ऑडियो मार्गदर्शिका
ऑडियो#94 परमेश्वर की इच्छा क्या है — अपने मार्ग की खोज करना
भाग I: हम कहाँ थे?
संयुक्त राज्य अमेरिका के दक्षिण-पूर्वी भाग में बड़े होते हुए यह देखना कि पतझड़ का समय और फ़ुटबॉल का समय मानो एक ही बात थी। बहुत से लोग खेल देखते-देखते बड़े होते हैं, और कुछ स्वयं भी उन खेलों में भाग लेते हैं। विद्यालय का उत्साह जीत और हार के साथ ऊपर-नीचे होता रहता है। हमारे लिए जब किसी खेल के दौरान बातें बिगड़ने लगती थीं, तो मेरे प्रशिक्षक यह वाक्य कहते थे: कि “हमें फिर से मूल बातों पर लौटना होगा!” कठिन चालों और विशेष योजनाओं के विषय में सोचने से पहले, हमें अपने सबसे आधारभूत और स्पष्ट कर्तव्यों को समझना होगा। यही वे “मूल बातें” हैं जो किसी भी परिस्थिति में एक समान बनी रहती हैं। यदि हम आरम्भिक बिन्दु से ही चूक जाएँ, तो आगे चलकर भटक जाएँगे और सोचते रह जाएँगे कि मेरी बुलाहट क्या है और मैं कहाँ गलत हूँ।
बाइबल के लिए उत्पत्ति की पुस्तक इसी प्रकार से काम करती है। अपने पाप और परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह के कारण हमारी समझ धुंधली हो गई है। इसलिए संभवतः आज पहले से कहीं अधिक हमें एक दृढ़ आधार की आवश्यकता है। हमें अपने सर्वज्ञानी, सब कुछ जानने वाले और सर्वशक्तिमान सृष्टिकर्ता के वचनों की आवश्यकता है। उत्पत्ति की पुस्तक हमारे लिए जीवन के कई “क्यों” का उत्तर देने के लिए एक आधार का काम करती है और यह बताती है कि आपके जीवन के लिए परमेश्वर की एक योजना है। सृष्टि से पहले भी परमेश्वर था। “आदि से परमेश्वर था—अर्थात् आनन्द, जीवित, अनन्त और बिना किसी रचना के अस्तित्व में रहने वाला परमेश्वर। जब हम उससे अलग सृष्टि के अस्तित्व की बात करते हैं, तो हमें यह समझना होगा कि परमेश्वर को कुछ भी बनाने की आवश्यकता नहीं थी। उसके स्वभाव को देखते हुए, हम उसके विषय में ऐसा नहीं सोच सकते कि उसे किसी वस्तु की “आवश्यकता” थी (प्रेरितों के काम 17:25)। इसलिए, कुछ भी अस्तित्व में आने पहले ही, त्रिएक परमेश्वर भलाई और आनन्द के अनन्त स्रोत के रूप में विद्यमान था। मूल रूप से एक प्राणी होने का अर्थ है कि आपका अस्तित्व में आना आवश्यक नहीं था। दूसरे शब्दों में कहें तो, परमेश्वर के बाहर किसी भी वस्तु का अस्तित्व एक अद्भुत वरदान है। तो हम क्यों अस्तित्व में हैं? क्योंकि परमेश्वर हमारी रचना करके आनन्दित हुआ। इसलिए जो कोई भी यह पूछता है कि मेरे लिए परमेश्वर की योजना क्या है, उसके लिए यह आरम्भिक बिंदु है।
यह मनुष्यों को दीनता के साथ अधीनता के सम्बन्ध में रखता है। यद्यपि हम सृष्टि की देखभाल करते हैं और उस पर “अधिकार रखते” हैं, फिर भी हम उस परमेश्वर के अधीन हैं जो अपनी सम्पूर्ण सृष्टि को परिभाषित करता है। उसने पक्षियों को उड़ने के लिए, मछलियों को तैरने के लिए, और मनुष्यों को बोलने तथा तर्क-वितर्क करने की योग्यता के साथ बनाया। इस पृथ्वी पर हम क्या करते हैं और क्या कर सकते हैं, उसकी सीमाएँ हैं। हमारे अस्तित्व का उद्देश्य उसी के द्वारा निर्धारित होता है जिसने हमें बनाया है। सृष्टिकर्ता ही सृष्टि को परिभाषित करता है और उस पर शासन करता है। परमेश्वर की इच्छा को जानना तथा सीखने का यह पहला कदम है।
शुभ सन्देश यह है कि हम जानते हैं कि हमारा उद्देश्य अच्छा है, क्योंकि परमेश्वर धर्मी, भला और पवित्र है। हम भरोसा कर सकते हैं कि उसकी वाणी में प्रकट किया गया उद्देश्य सबसे उत्तम उद्देश्य है जिसकी कल्पना की जा सकती है। मसीही लोग उचित रूप से अपने आप को उस परमेश्वर के अधीन कर देते हैं जिसके पास अपने विषय में और अपने से बाहर की सभी बातों का असीम और अनन्त ज्ञान है। उसी ने हमें एक भले उद्देश्य के साथ बनाया है। यदि आप एक मसीही व्यक्ति होते हुए भी अपने जीवन को उद्देश्यहीन महसूस कर रहे हैं, तो इस मूलभूत सत्य की ओर फिर से लौट आइए।
हम उत्पत्ति की पुस्तक से सीखते हैं कि गुरुत्वाकर्षण जैसे शब्द केवल उस व्यवस्था और संरक्षण का वर्णन मात्र हैं जिन्हें सृष्टिकर्ता बनाए रखता है। समुद्र की ज्वार-भाटा परमेश्वर की सामर्थ्य और बुद्धि की घोषणा करती है। सृष्टि में दिखाई देने वाली सुन्दर विविधता अब परमाणुओं की अव्यवस्थित हलचल का परिणाम नहीं समझा जाता, वरन् रचयिता की सुन्दर कारीगरी के रूप में देखा जाता है। मनुष्य को अन्य प्राणियों से ऊपर ठहराया गया है और उसे परमेश्वर का स्वरूप प्रदान किया गया है। नर और नारी दोनों के रूप में लैंगिकता इस संसार की भलाई के लिए रचा गया एक वरदान है, और सृष्टि में रखे गए उनके भिन्न-भिन्न गुण उनके अलग-अलग अधिकार क्षेत्रों को दृढ़ करने के लिए हैं। विवाह पापमय वासना का परिणाम नहीं, परन्तु मनुष्यजाति को दिया गया परमेश्वर की ओर से एक वरदान है।
इतना ही नहीं, परमेश्वर ने हमें अन्धकार में भटकने के लिए नहीं छोड़ा है। उसने झुककर आदम के साथ एक वाचा बाँधी। परमेश्वर ने झुककर बड़ी उदारता के साथ आदम और हव्वा के साथ ऐसा सम्बन्ध स्थापित किया, ताकि वे केवल उसके शासन के अधीन ही न रहें, वरन् सदा उसके साथ सहभागिता में भी जीवन बिताएँ। उसने उन्हें अपने स्वरूप में इसलिए बनाया ताकि वे सृष्टि में उसको दर्शाएँ। उसने उन्हें आज्ञा दी कि वे पृथ्वी को और अधिक परमेश्वर के स्वरूप धारण करने वाले लोगों से भर दें और शेष सृष्टि पर अधिकार रखें। जीवन के विभिन्न समयों में मनुष्य का यही मूल उद्देश्य है।
क्योंकि परमेश्वर सम्पूर्ण सृष्टि पर प्रभुता करता है, इसलिए उसकी आज्ञा का पालन करना हमारा कर्तव्य है, और यह उसका अधिकार है। परन्तु हमारा स्वभाव और वाचा के द्वारा स्थापित वह स्नेहपूर्ण सम्बन्ध हमारी आज्ञाकारिता को एक बिल्कुल नया रूप देता है। परमेश्वर के प्रति हमारी आज्ञाकारिता दासत्व में रहने वालों दासों के समान अनिच्छापूर्ण और विवशता की आज्ञाकारिता नहीं है, परन्तु यह परमेश्वर के उस इतिहास में एक सक्रिय, सम्बन्ध पर आधारित और उद्देश्यपूर्ण आज्ञाकारिता है, जिसके माध्यम से वह अपनी महिमा प्रकट करता है। आदम के सम्बन्ध में बात यह है कि यदि वह आज्ञाकारी रहता, तो वह अनन्त जीवन और परमेश्वर के साथ सहभागिता का आनन्द उठाता। यही हमारे दैनिक जीवन की साधारण बातों में परमेश्वर की महिमा करने का आधार है।
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मनन के लिए प्रश्न:
- परमेश्वर हमारा सृष्टिकर्ता है, यह सच्चाई उसके साथ हमारे सम्बन्ध को कैसे प्रभावित करती है?
- यह सच्चाई है कि परमेश्वर सृष्टिकर्ता है, यह बात हमारे जीवन के उद्देश्य को कैसे प्रभावित करती है?
- हम कैसे जान सकते हैं कि हमारे लिए परमेश्वर के उद्देश्य भले हैं?
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भाग II: हमसे कहाँ गलती हुई?
जब हम अपनी मूल रचना और परमेश्वर के साथ सहभागिता के विषय में पढ़ते हैं, तो आज के पतित संसार को देखते हुए यह प्रश्न उठाता है, कि “क्या हुआ था?” सृष्टि बनाने के छह दिनों के बाद परमेश्वर ने अपना कार्य पूरा किया और उसे “बहुत अच्छा” कहा (उत, 1:31)। परन्तु जब हम अपने चारों ओर देखते हैं, तो भीतर और बाहर हर स्थान पर बिखराव दिखाई देता है। हमारे हृदय बुराई की ओर झुके हुए हैं। मृत्यु और विनाश चारों ओर फैला हुआ है। भलाई की कुछ झलकियाँ दिखाई देने पर भी, हमें अपने अस्तित्व में विलाप करने योग्य बातें अधिक दिखाई देती हैं।
आदम के साथ मूल वाचा के सम्बन्ध में आदम की आज्ञाकारिता पर आधारित प्रतिज्ञाएँ और श्राप दोनों सम्मिलित थे। यदि वह पूरी रीति से और निरन्तर आज्ञा का पालन करता, तो वह परमेश्वर के साथ उस अनन्त विश्राम के आनन्द में सदा बना रहता। परन्तु यदि वह भले और बुरे के ज्ञान के वृक्ष का फल खाकर आज्ञा का उल्लंघन करता है, तो वह मर जाएगा। जैसा कि हम उत्पत्ति 3 में देखते हैं, आदम ने परमेश्वर को अस्वीकार कर दिया, वाचा को तोड़ दिया, और स्वयं को तथा समस्त मानवजाति को श्राप और मृत्यु के अधीन कर दिया (रो. 5:12-21)। सृष्टि अनेक भिन्न-भिन्न टुकड़ों में बिखर गई, जिससे उसके उद्देश्य को समझना कठिन हो गया। अब हम एक उजड़े और जले-बुझे कला-संग्रहालय के बीच चल रहे हैं। हम यह पहचानने की लालसा रखते हैं कि पहले वह कैसी थी। हमें परमेश्वर के शासन के अधीन जीवन बिताने और सदा उसका आनन्द लेने के लिए रचा गया था, परन्तु अब मनुष्यजाति ने अपने अनन्त पवित्र परमेश्वर के विरुद्ध सम्पूर्ण सृष्टि के स्तर पर विद्रोह करके इस सम्बन्ध को खो दिया है। हमारा समबन्ध टूट गया है, और अब हमारे लिए अनन्त दण्ड है।
इसके परिणामस्वरूप, अपने विषय में हमारी समझ बिखर गई है। जीवन का उद्देश्य और उसका अर्थ हमारे हृदयों में खाली स्थान के समान हो चुका है। बेचैनी में हम उस खाली स्थान को वस्तुओं या लोगों से भरने का प्रयास करते हैं, परन्तु जो कमी है, उसे भरने के लिए वे लोग या वस्तुएँ पर्याप्त नहीं हैं। अब हमारा पाप हमें सही बातों को भी गलत रीति से प्राथमिकता देने और गलत बातों को सही ठहराने के लिए प्रेरित करता है, साथ ही इस प्रकार अपनाने के लिए प्रेरित करता है। यह हमारे उद्देश्य को भ्रमित कर देता है, हमारे मार्ग को भटका देता है, और हमारे अन्तिम उद्देश को विकृत कर देता है। पतन के मलबे के बीच बहुत से लोग यही पूछते रह जाते हैं कि, “मेरा उद्देश्य क्या है?”
आदम में हमारे पतन ने हमें स्वाभाविक रूप से परमेश्वर के विरोध के मार्ग पर लाकर खड़ा कर दिया है, जिसके परिणामस्वरूप हम भटकते रहते हैं और उद्देश्यपूर्ण जीवन के विषय में अनेक भिन्न-भिन्न विचारों के पीछे भटकते रहते हैं। परन्तु यह सब व्यर्थ है। परमेश्वर ने भविष्यद्वक्ता यिर्मयाह के द्वारा यहूदा को इन व्यर्थ प्रयासों के लिए ललकारा। यिर्मयाह के संदेश में हम पतन के बाद अपने हृदयों की दशा के विषय में गहरी समझ देखते हैं।
“क्योंकि मेरी प्रजा ने दो बुराइयाँ की हैं:
उन्होंने मुझ जीवन के जल के सोते को त्याग दिया है,
और, उन्होंने हौद बना लिए,
वरन् ऐसे हौद जो टूट गए हैं,
और जिनमें जल नहीं रह सकता।” (यिर्म. 2:13)
यहूदा ने जीवन के रचयिता और जीवन के स्रोत को अस्वीकार कर दिया। परमेश्वर ने “जीवन के जल” वाक्यांश का उपयोग एक अत्यन्त सजीव चित्र के रूप में किया। परमेश्वर एक प्राकृतिक सोते के समान था—अर्थात् शुद्ध जल का अनन्त स्रोत, जो उन्हें जीवन देता था। परमेश्वर स्वयं अपने आप में जीवन है। परन्तु यहूदा ने उसी को छोड़ दिया जो उनके प्राणों को तृप्त कर सकता था। इसके स्थान पर उन्होंने अपने लिए जल इकट्ठा करने के लिए “हौदे बनाए”, परन्तु वे ऐसे टूटे हुए हौद थे जिनमे पानी नहीं रुकता था।[1] दूसरे शब्दों में कहूँ तो, जिन मूर्तियों को उन्होंने अपने लिए बनाया, उन्होंने उन्हें उतना ही सूखा और खाली छोड़ दिया जितने वे आरम्भ में थे। वे उन्हें भरते तो रहते थे, परन्तु वे निरन्तर खाली होते रहते थे। आज भी हमारे पास ऐसे “टूटे हुए हौदों” की कोई कमी नहीं है। जब हम मसीही होते हुए भी अपने जीवन में उद्देश्यहीन होने का अनुभव करते हैं, तब प्रायः इसका कारण यह होता है कि हम इन टूटे हुए हौदों में सन्तुष्टि खोजने लगते हैं। आइए ऐसे कुछ उदाहरणों पर विचार करें।
धन-दौलत। हम परमेश्वर और दूसरों के लिए त्याग करने के बजाय उन वस्तुओं के पीछे भागते हैं जो हमें सबसे अधिक सुख-सुविधा देती हैं। हम सबसे पहले जीवन का सबसे अधिक आर्थिक रूप से सुरक्षित मार्ग खोजते हैं और फिर परमेश्वर पर भरोसा करने की सोचते हैं, बजाय इसके कि त्यागपूर्ण प्रेम करते हुए परमेश्वर पर भरोसा रखें कि वही हमारी देखभाल करेगा। इससे प्रायः व्यवसाय और बुलाहट के बीच का अन्तर धुंधला हो जाता है। गर्म क्षेत्रों में बना मजबूत घर भी कटाव या तूफान में सुरक्षित नहीं रहता है। गैर-जिम्मेदार सन्तान सरलता से विरासत को उड़ा सकती हैं। वास्तव में, “धनी का धन उसकी दृष्टि में शक्तिशाली नगर है, और उसकी कल्पना ऊँची शहरपनाह के समान है।” (नीत. 18:11)। धन-दौलत और सबसे आसान मार्ग को अपनाना, प्रकोप के दिन काम नहीं आएँगे (लूक. 12:20)। जिस जीवन का उद्देश्य हमेशा के लिए एक सा न हो, उसे जीने का कोई लाभ नहीं है।
सामर्थ्य। शायद लोग यह सोचते हैं कि एक सार्थक जीवन जीने के लिए सामर्थ्य पाना आवश्यक है? बहुत से लोग इस महत्वाकाँक्षा के साथ आरम्भ करते हैं कि वे संसार को बदल देंगें और अपने आपको ऊँचे राजनीतिक पदों, लाभ पहुँचाने वाले मित्रों, या ऑनलाइन समूहों के साथ जोड़ देते हैं। मनुष्य चाहे जितनी ऊँचाई तक पहुँच जाए, उसकी सामर्थ्य सीमित ही रहती है। क्योंकि “ऐसा कोई मनुष्य नहीं जिसका वश प्राण पर चले कि वह उसे निकलते समय रोक ले, और न कोई मृत्यु के दिन पर अधिकारी होता है” (सभ. 8:8)। यहाँ तक कि संसार के इतिहास के सबसे शक्तिशाली लोग भी किसी पाठ्य पुस्तक में केवल एक छोटा सा अनुच्छेद बनकर रह जाते हैं, और बहुत से उच्च विद्यालय के विद्यार्थियों के उपहास का कारण बनते हैं। “और उसकी पीड़ा के डर के मारे वे बड़ी दूर खड़े होकर कहेंगे, हे बड़े नगर बाबुल! हे दृढ़ नगर, हाय! हाय! घड़ी ही भर में तुझे दण्ड मिल गया है।” (प्रक. 18:10)। पृथ्वी की शक्ति अपना प्रभाव खो देगी और अन्त में आनेवाली पीढ़ियों की स्मृति से भी मिट जाएगी। जो यहाँ सबसे ऊँचे होते हैं, वे अधिकाँश नरक में सबसे नीचे होते हैं।
स्वयं। प्रामाणिकता के इस युग में हम यह मान लेते हैं कि हमारे जीवन का अर्थ हम स्वयं निर्धारित करते हैं। अर्थात्, प्रत्येक व्यक्ति को अपना “मार्ग” चुनने की स्वतंत्रता है। बहुत सी पुस्तकें यह दावा करती हैं कि वे स्वयं को खोजने का मार्ग सिखाएँगी, परन्तु वे सृष्टिकर्ता से दूर ले जाती हैं। हम में से प्रत्येक एक छोटे सृष्टिकर्ता के समान स्वयं को रचने वाला जीवन जीता है। हम अपने प्राण के स्वयं स्वामी बनना चाहते हैं। हम क्या करते हैं, कौन से चुनाव करते हैं, और कैसी भावनाएँ रखते हैं, इन्हीं से हम अपनी पहचान बनाते हैं। दूसरे शब्दों में, वास्तविकता का कोई निश्चित उद्देश्य नहीं माना जाता है। प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन का अर्थ तय करने की पूर्ण स्वतंत्रता है। इसलिए अन्ततः कोई स्थायी अर्थ रह ही नहीं जाता है। यह मूर्ति मनुष्य को उद्देश्यहीन जीवन की ओर ले जाती है। कोई अर्थ नहीं बचता, सिवाय उस अर्थ के जिसे हर व्यक्ति स्वयं बना लेता है, चाहे वे एक-दूसरे के विरोध में ही क्यों न हों। अन्त में, यह वास्तविकता के सचमुच अर्थहीन होने को स्वीकार करने के बाद एक आशावादी प्रतिक्रिया है।
सक्रियता। आरम्भ में, सक्रियता उन “टूटे हुए हौदों” में सबसे उत्तम और आदरणीय प्रतीत होती है। वास्तव में ऐसा लगता है, कि उसमें संसार की भलाई की चिन्ता भी है। परन्तु पतित संसार में उद्देश्य खोजने के लिए यह एक अस्थिर आधार है। सक्रियतावादियों के लिए उद्धार प्रायः मतपत्र, किसी राजनीतिक नेता, किसी विचारधारा, या शिक्षा-प्रणाली के रूप में होता है। मुझे नहीं लगता कि आपको यह बताने की आवश्यकता है कि सरकार या कोई राजनेता आपके भरोसे और संसार के उद्धार के लिए सुरक्षित आधार नहीं है। सक्रियतावादी इसी संसार में अभी स्वर्ग बनाने का प्रयास करते हैं, जबकि यह केवल तब होगा जब यीशु लौटेगा और एक बार में ही सदा-सर्वदा के लिए बुराई का अन्त कर देगा।
शैक्षणिक उपलब्धियाँ। परमेश्वर और उसकी बनाई हुई सृष्टि के विषय में सीखना एक उत्तम और योग्य कार्य है। परन्तु जो व्यक्ति अपनी आशा और उद्देश्य को केवल ज्ञान प्राप्त करने में लगाता है, वह देर-सवेर देखेगा कि यह भी व्यर्थ है। सचमुच, “बहुत पुस्तकों की रचना का अन्त नहीं होता, और बहुत पढ़ना देह को थका देता है।” (सभ. 12:12)। हम सबकुछ कभी नहीं जान सकते हैं, फिर भी विद्वान ऐसे प्रयास करते हैं कि मानो यह सम्भव है। यदि स्मरण-शक्ति साथ छोड़ दे या ये प्रयास रुक जाएँ, तब जीवन का क्या अर्थ रह जाएगा? क्या तब जीवन अर्थहीन हो जाएगा?
भोग-विलास। मान लीजिए कि आपको साकार जीवन का कोई उत्तर नहीं मिलता है, इसलिए आप निश्चय कर लेते हैं कि इस पृथ्वी पर आप अपने सम्पूर्ण दिनों को सांसारिक सुखों के लिए ही जीएँगे। जैसे कामुकता, रंगरलियाँ, भोजन, विलासिता और आराम, ये सब भोग-विलासता में डूबे हुए जीवन की पहचान हैं। यदि जीवन के बाद कोई अर्थ ही नहीं है, तो फिर क्यों न वही किया जाए जो हमें अच्छा लगता है? जीवन से न टलने वाली पीड़ाओं के बीच जितना हो सके उतना क्षणिक सुख बटोर लिया जाए। यदि हमारे जीवन का कोई बड़ा अर्थ नहीं है, तो शायद जीवन का अर्थ केवल वही करना है जिससे अच्छा महसूस हो। ऐसा जीवन या तो इस प्रश्न को पूछने में देर करता है, या फिर उसके उत्तर को ही नकार देता है। पहला दृष्टिकोण युवाओं में अधिक दिखाई देता है। दूसरा प्रायः उन लोगों में पाया जाता है जो निचले स्तर के जीवन संकट से गुजर रहे होते हैं। इस प्रकार के जीवन में मनुष्य भोजन, पेय और आराम में डूबते-डूबते स्वयं को क्षीण कर लेता है। फिर भी अनुभव और सर्वश्रेष्ठ परमेश्वर का वचन हमें दिखाता है कि “जैसे अधोलोक और विनाशलोक, वैसे ही मनुष्य की आँखें भी तृप्त नहीं होती।” (नीत. 27:20)।
ये तो केवल कुछ उदाहरण हैं कि पतित मनुष्य किस-किस प्रकार से उद्देश्यपूर्ण जीवन की खोज करते हैं। हमें यह भी स्मरण रखना चाहिए कि अर्थ खोजने के ये मार्ग कोई साधारण यात्रा नहीं है। ये मार्ग हर एक मनुष्य के हृदय की किसी न किसी मूर्ति को प्रकट करते हैं। धन हमारा शरणस्थान बन जाता है। शक्तिशाली लोग खुलकर तो नहीं परन्तु अधिकतर मन ही मन स्वयं को परमेश्वर समझने लगते हैं। आधुनिक मनुष्य स्वयं को मानो ईश्वरीय व्यवस्था बनाने वाला समझता है। सामाजिक-राजनीतिक सक्रियता में लगे लोग संस्थाओं या सरकारों या राष्ट्रों को चंगाई देने वाला मानने लगते हैं। विद्वान अपनी बुद्धि और ज्ञान को मनुष्य की समस्याओं का समाधान समझ बैठते हैं। भोग-विलास में डूबे लोग सांसारिक इच्छाओं के सामने झुक जाते हैं। एक आधुनिक धर्म-प्रश्नोत्तरी इसे इस प्रकार कहती है: “मूर्तिपूजा क्या है? मूर्तिपूजा यह है कि हम अपनी आशा, आनन्द, महत्व और सुरक्षा के लिए सृष्टि के रचियता के स्थान पर रची हुई वस्तुओं पर भरोसा करें।”
चाहे वह भोग-विलास हो या स्वयं का अहंकार, ये सभी मूर्तियाँ अपने उपासकों के साथ नष्ट हो जाएँगी। उनके उपासकों को यिर्मयाह 2:28 के ये वचन सुनेंगे: “परन्तु जो देवता तूने अपने लिए बनाए हैं, वे कहाँ रहे? यदि वे तेरी विपत्ति के समय तुझे बचा सकते हैं तो अभी उठें; क्योंकि हे यहूदा, तेरे नगरों के बराबर तेरे देवता भी बहुत हैं।”
परन्तु मसीही उत्तर क्या है? जब हम अपने जीवन के उद्देश्य को खोजने का प्रयास करते हैं, तब हमें समझना चाहिए कि बाइबल के अनुसार जीवन का मुख्य उद्देश्य फिर से सही स्थिति में लाना है। यीशु से पहले, बाइबल हमारे जीवन का वर्णन इस प्रकार करती है कि हम “आशाहीन और जगत में ईश्वर रहित थे।” (इफ. 2:12)। यीशु ही उत्तर है, पर शायद उस प्रकार नहीं जैसा आप पहले सोचते थे। वह केवल हमें जीवन का अर्थ देने नहीं आया, परन्तु वह इससे कहीं अधिक बड़ी समस्या का समाधान करने आया। मसीह में खोए हुए लोगों को फिर से ढूँढा गया, और अब हम अपने वास्तविक स्वरूप को पुनः प्राप्त करते हुए साधारण बातों में भी परमेश्वर की महिमा कर सकते हैं।
मनन के लिए प्रश्न:
- उत्पत्ति 1–2 जीवन के उद्देश्य को कैसे दिखाता है?
- उत्पत्ति के आरम्भिक तीन अध्यायों से वास्तविकता के विषय में कौन-कौन सी मूल बातें आप समझते हैं?
- आपने प्रश्न “मेरे जीवन का उद्देश्य क्या है?” के कौन-कौन से उत्तर सुने हैं? और वे पवित्रशास्त्र के साथ कैसे मेल खाते हैं?
- क्या आपने हमारे समाज में किसी “खाली हौद” पर ध्यान दिया है? वे परमेश्वर के सामने कैसे कम पड़ जाते हैं?
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भाग III: मसीह में पाया गया
जब से हमने जीवित के जल के सोते को ठुकराकर उससे दूरी बना ली है, तब से हम खोए हुए हैं। जिन मार्गों पर हम अब चलते हैं, वे हमें अनन्त शून्यता की ओर ले जाते हैं। पाप इसमें एक ऐसी स्थिति जोड़ देता है जो अधिकतर लुका-छिपी के खेल के समान होती है। “खोए हुए” लोग सक्रिय रूप से स्वयं को छिपा रहे होते हैं और परमेश्वर का विरोध करते हैं। विचार करें कि कैसे आदम और हव्वा ने पाप करने के बाद “परमेश्वर यहोवा के सामने से अपने आप को छिपा लिया था” (उत. 2:8)। या पौलुस के शब्दों में, “कोई परमेश्वर को खोजनेवाला नहीं” (रो. 3:11)। पाप हमें स्वेच्छा से खोया हुआ बना देता है।
परन्तु परमेश्वर, जो अति दयालु है, उसने अनन्तकाल से ही छुटकारे एक की योजना बनाई ताकि खोए हुए लोगों को घर वापस लाया जा सके। हमने अपने पाप के द्वारा आत्मा का घोर विनाश किया है, परन्तु जैसे कि द्वितीय लंदन बैपटिस्ट विश्वास-वचन कहता है, कि “प्रभु ने अनुग्रह की वाचा स्थापित करना उचित समझा।” प्रतिज्ञा के रूप में परमेश्वर ने उत्पत्ति 3:15 में एक आने वाले उद्धारकर्ता की घोषणा की। परमेश्वर का अनन्तकाल से उत्पन्न पुत्र स्वर्ग से उतरा, कुँवारी स्त्री से मनुष्य शरीर में जन्म लिया, ताकि वह “खोए हुओं को ढूँढ़े और उनका उद्धार करे” (लूक.19:10)। यीशु में उद्धार हमें यह समझने का संदर्भ देता है कि हम परमेश्वर की योजना में कहाँ स्थान रखते हैं, और यह भी प्रकट करता है कि उन मनुष्यों के लिए परमेश्वर की इच्छा क्या है जो पहले उससे दूर थे।
परमेश्वर का अनन्त उद्देश्य
हमें अपने उद्देश्य के बारे में सोचने से पहले परमेश्वर के उद्देश्य पर विचार करना चाहिए। सम्पूर्ण इतिहास और सृष्टि परमेश्वर के उस उद्देश्य के चारों ओर केन्द्रित हैं जिसमें वह स्वर्ग और पृथ्वी को यीशु मसीह में एक कर रहा है। आश्चर्य की बात यह है कि जो लोग खोए हुए थे, वे कभी भी परमेश्वर से छिपे नहीं थे। उसने उन्हें “जगत की उत्पत्ति से पहले” (इफ. 1:4) चुना, उन्हें जाना और उनसे प्रेम किया। पौलुस इस विचार को इफिसियों में कई बार फिर से उठाता है:
– इफिसियों 1:9–11: “उसने अपनी इच्छा का भेद, अपने भले अभिप्राय के अनुसार हमें बताया, जिसे उसने अपने आप में ठान लिया था, कि परमेश्वर की योजना के अनुसार, समय की पूर्ति होने पर, जो कुछ स्वर्ग में और जो कुछ पृथ्वी पर है, सब कुछ वह मसीह में एकत्र करे।मसीह में हम भी उसी की मनसा से जो अपनी इच्छा के मत के अनुसार सब कुछ करता है, पहले से ठहराए जाकर विरासत बने…।”
– इफिसियों 3:11 “उस सनातन मनसा के अनुसार जो उसने हमारे प्रभु मसीह यीशु में की थीं।”
परमेश्वर ने अनन्तकाल से पहले ही दया करते हुए छुटकारे की योजना बनाई थी, ताकि पापियों को बचाया जा सके। परमेश्वर पुत्र ने प्रेम पूर्वक पिता के साथ सहमति दी कि वह बीच में खड़ा होकर मध्यस्थ बनेगा, और पिता के द्वारा मसीह में चुने गए लोगों को सभी लाभ प्रदान करेगा। पुत्र ने पिता से प्रार्थना की, और पिता ने उसको जाति-जाति के लोगों को उसकी निज भूमि बनने के लिये दे दिया। (भज. 2:8)। पवित्र आत्मा ने भी सहमति दी कि वह पुत्र को उसके उद्देश्य के लिए “बिना माप” तैयार करेगा और उसके द्वारा दिए गए छुटकारे को चुने हुओं पर लागू करेगा (यूह. 3:34)। पिता परमेश्वर ने पुत्र परमेश्वर के साथ एक वाचा बाँधी, जिसके अनुसार उसे एक राज्य दिया गया, जिसे वह फिर उन लोगों को देता है जो जगत की उत्पत्ति से पहले उसमें चुने गए थे (लूक. 22:29; इफ. 1:4)। यीशु ने पिता के द्वारा दिए गए “कार्य” को हमारे उद्धार के लिए पूरा किया और वह “अपने वंश को देखेगा” (यूह.17:4; यशा.53:10)। परमेश्वर के लोगों का उद्धार निश्चित है।
तो इस सम्पूर्ण ईश्वर विज्ञान सम्बन्धी बातों का उद्देश्यपूर्ण जीवन से क्या सम्बन्ध है? यदि परमेश्वर का सृष्टि और छुटकारे के लिए अनन्तकाल से योजना है, तो क्या यह स्वाभाविक नहीं है कि हमारा उद्देश्य भी उसी के अनुरूप हो? हमारा उद्धार एक बड़े उद्देश्य का हिस्सा है, अर्थात् यह कि परमेश्वर के लोग मसीह में पाए जाएँ और मसीह में छुटकारा पाएँ। यीशु मसीह और उसकी इच्छा पर केन्द्रित जीवन निस्संदेह एक सार्थक जीवन है। इसलिए हमारे लिए प्रश्न यह है कि हम परमेश्वर की इच्छा को कैसे जानें और वह इस अनन्त योजना को संसार में कैसे पूरा करता है। जब हमें सही उत्तर मिल जाता है, तब हमें अपना जीवन उसी में पूरी रीति से समर्पित कर देना चाहिए।
पुनर्निर्देशित और पुनः स्थापना
हमने अपने अध्ययन के आरम्भ में उत्पत्ति को देखा था। हमारा आरम्भ करना इस बात को समझने में सहायता करता है कि हम कौन हैं और पृथ्वी पर हमारा उद्देश्य क्या है। पहले आदम में हमने अपना मूल उद्देश्य खो दिया था। परन्तु अब मसीह यीशु में, जो दूसरा आदम है, हम पुनः स्थापित किए गए हैं। हम नए हृदय के साथ नया जन्म पाए हुए हैं, उसके प्रेम के द्वारा पुनर्निर्देशित किए गए हैं, और आने वाली नई सृष्टि में सहभागी बनने के लिए नए सिरे से बनाए गए हैं। यही वह स्थान है जहाँ हम अधिकतर परमेश्वर के इस संकेत को देखते हैं कि वह हमारे जीवन को अपनी मूल योजना की ओर पुनः निर्देशित कर रहा है। पवित्र आत्मा केवल हमारे व्यवहार को मसीह के समान बनाने के लिए सुधारता ही नहीं है, वरन् वह हमारे मन को नया भी करता है ताकि हम समझ सकें कि हम कहाँ से आए हैं, और अभी कहाँ हैं, तथा कहाँ जा रहे हैं (तीत. 3:5; इफ. 4:23–24; रो. 12:2)। वह हमारे हृदय की मूर्तियों को नष्ट करता है जो हमें विनाश के मार्ग पर ले जाती हैं, और हमें मसीह में सभी वस्तुओं के मूल और महिमामय उद्देश्य पर स्थिर करता है। अब हम वास्तविकता के द्वारा आकार पाए हुए हैं, अर्थात सृष्टि और छुटकारे की कहानी के द्वारा। जे. आई. पैकर इसे इस प्रकार संक्षेप में प्रस्तुत करते हैं:
लगभग पन्द्रह सौ वर्षों की अवधि में लिखे गए पवित्रशास्त्र की उन 66 पुस्तकों को तैयार करने वाले चालीस से अधिक लेखकों ने स्वयं को और अपने पाठकों को परमेश्वर के संसार के लिए उसकी विश्वव्यापी योजना के पूरा होने की प्रक्रिया में सहभागी माना। यह वही योजना है जिसने परमेश्वर को सृष्टि की रचना करने के लिए प्रेरित किया, जिसे पाप ने बिगाड़ दिया था, और जिसे उसका छुटकारे का कार्य वर्तमान में पुनःस्थापित कर रहा है। उस योजना का सार यह था, और अब भी है, अर्थात परमेश्वर और उसकी विवेकशील सृष्टि के बीच प्रेम की अनन्त अभिव्यक्ति और उसका आनन्द। यह प्रेम उसकी आराधना, स्तुति, धन्यवाद, सम्मान, महिमा और सेवा के रूप में परमेश्वर को दिया जाता है, और बदले में परमेश्वर के द्वारा मनुष्यों को दी गई संगति, सुअवसर, आनन्द और वरदानों में प्रकट होता है।
परमेश्वर ने अनन्तकाल से पहले ही अपने लोगों पर अपना प्रेम प्रकट किया। इसलिए सम्पूर्ण इतिहास परमेश्वर के उस परिवर्तनकारी प्रेम को प्रकट करता है, जो पापी लोगों तक मसीह यीशु में अनुग्रह के द्वारा उन्हें पुनः स्थापित करता है। जब हम पूछते हैं, कि “मेरे जीवन का उद्देश्य क्या है?”, तो हमें इसका आरम्भ इसी पुनःस्थापना से करना चाहिए।
मनुष्य के उद्देश्य को संक्षेप में बताने के अनेक बाइबल आधारित प्रयास किए गए हैं। शायद इनमें सबसे उत्तम विवरण वेस्टमिंस्टर संक्षिप्त धर्म-प्रश्नोत्तरी के माध्यम से मसीही शिक्षा के प्रश्न संख्या 1 में मिलता है:
“प्रश्न: मनुष्य का मुख्य उद्देश्य क्या है?
उत्तर: मनुष्य का मुख्य उद्देश्य परमेश्वर की महिमा करना और सदा उसके आनन्द में बनें रहना है।”
मनुष्यजाति अन्ततः परमेश्वर की महिमा करने और सदा उसके आनन्द में रहने के लिए अस्तित्व में है। अब जब हम मसीह में पाए गए हैं, तो हम पौलुस के साथ 1 कुरिन्थियों 8:6 के अनुसार अंगीकार कर सकते हैं: “तो भी हमारे निकट तो एक ही परमेश्वर है: अर्थात् पिता जिसकी ओर से सब वस्तुएँ हैं, और हम उसी के लिये हैं, और एक ही प्रभु है, अर्थात् यीशु मसीह जिसके द्वारा सब वस्तुएँ हुई, और हम भी उसी के द्वारा हैं।” जितने भी गौण उद्देश्य हम गिना सकते हैं, वे सभी महिमामय परमेश्वर के अधीन हैं। अब जो जीवन हम जीते हैं, वह हम उस यीशु पर विश्वास के द्वारा जीते हैं जिसने हमसे प्रेम किया और हमारे लिए मरा (गल. 2:20)। छुटकारा पाए हुए लोगों का जीवन फिर से उसी मूल उद्देश्य की ओर लौट जाता है: अर्थात परमेश्वर की महिमा को प्रकट करना है।
धर्म-प्रश्नोत्तरी हमारे अन्तिम उद्देश्य के दो पहलुओं को उजागर करती है: 1) परमेश्वर की महिमा करना और 2) सदा उसके आनन्द में बनें रहना। 1 कुरिन्थियों 10:31 में पौलुस मसीहियों को दिए गए दायित्व को दिखाता है: “इसलिए तुम चाहे खाओ, चाहे पीओ, चाहे जो कुछ करो, सब कुछ परमेश्वर की महिमा के लिये करो।” साधारण और दैनिक बातों में परमेश्वर की महिमा करना इसी का एक महत्वपूर्ण भाग है। यह कोई नई आज्ञा नहीं है, परन्तु नए बनाए गए लोगों के लिए पुरानी ही आज्ञा है। “तेरे लोग सब के सब धर्मी होंगे; वे सर्वदा देश के अधिकारी रहेंगे, वे मेरे लगाए हुए पौधे और मेरे हाथों का काम ठहरेंगे, जिससे मेरी महिमा प्रगट हो।” (यशा. 60:21)। परमेश्वर की महिमा करना अक्सर एक “रविवारीय पाठशाला” जैसा उत्तर माना जाता है, जिसे हम पूरी रीति से नहीं समझते हैं। परमेश्वर में स्वयं ही सम्पूर्ण महिमा है, और उसे अपनी महिमा बढ़ाने के लिए मनुष्यों की आवश्यकता नहीं है। परमेश्वर की महिमा न बढ़ती है, न घटती है। जब हम कहते हैं कि हम परमेश्वर की महिमा करते हैं, तो इसका अर्थ यह नहीं है कि हम उसे बेहतर बना रहे हैं। परन्तु हम परमेश्वर की महिमा इस उद्देश्य से करते हैं कि परमेश्वर जैसा वास्तव में है, वैसा ही उसे जाना जाए, अर्थात् अत्यन्त महिमामय के रूप में जाना जाए। हम अपने प्रेम, विचार, उद्देश्यों और कार्यों के द्वारा यह प्रदर्शित करते हैं कि परमेश्वर कितना अद्भुत है। इसी प्रकार हर कार्य में अपने जीवन का उद्देश्य पाया जा सकता है।
दूसरा उद्देश्य इससे अलग नहीं किया जा सकता। यदि परमेश्वर ही सबसे अधिक भला है, तो उससे बढ़कर कोई और उद्देश्य नहीं हो सकता जिसके लिए हमें बनाया गया है, सिवाय इसके कि हम उसकी भलाई में आनन्दित हों। हम अभी भी और सदा-सर्वदा परमेश्वर में आनन्द पाते हैं। यही कारण है कि अन्य उद्देश्य कभी सच्ची तृप्ति नहीं दे सकते हैं, क्योंकि हमें उससे कहीं अधिक उत्तम और अनन्त बात के लिए बनाया गया है। परमेश्वर के स्वरूप में पुनःस्थापित होने का अर्थ है—कि ऐसा आराधना करने वाला बनना जो परमेश्वर में आनन्दित रहता है, उससे आनन्दित होता है, और उसी में सन्तोष पाता है। जैसा दाऊद भजन संहिता 16:11 में प्रार्थना करता है, “तू मुझे जीवन का रास्ता दिखाएगा; तेरे निकट आनन्द की भरपूरी है, तेरे दाहिने हाथ में सुख सर्वदा बना रहता है।” अन्त में, परमेश्वर हमारा परमेश्वर होगा, और वह हमारे साथ वास करेगा (प्रक. 21:3)। परमेश्वर ही हमारा भाग होगा, और हम बिना किसी रुकावट के सदा उसमें आनन्दित होते रहेंगे। यही उस प्रश्न की अन्तिम भरपूरी है कि बाइबल जीवन के विषय में क्या कहती है।
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मनन के लिए प्रश्न:
- पाप में भटके रहने और मसीह में पाए जाने में आपका अनुभव कैसा रहा है?
- क्या परमेश्वर की अनन्त योजना आपके वास्तविकता को देखने और समझने के तरीके को आकार देती है? यदि हाँ, तो किन-किन तरीकों से?
- छुटकारे की वाचा विश्वासी को क्यों सांत्वना प्रदान करती है?
- परमेश्वर की महिमा करना और उसमें आनन्दित होने का क्या अर्थ है? अपने जीवन से इस सम्बन्ध में कुछ विशेष उदाहरण बताइए।
- आप परमेश्वर में आनन्द पाने का प्रयास किस प्रकार करते हैं? कौन से अभ्यास आपको सहायक लगते हैं?
- स्थानीय कलीसिया किस प्रकार परमेश्वर की महिमा करने और उसमें आनन्दित होने के लिए आपकी सहायता करती है?
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भाग IV: वर्तमान में जीना
आपका उद्धार कैसे हुआ? सम्भव है कि मसीह के पास आपका आना धीरे-धीरे हुआ हो। सम्भव है कि आप एक मसीही परिवार में पले-बड़े हुए हों और आपको ऐसा समय स्मरण न हो जब आप मसीही नहीं थे। यह भी सम्भव है कि किसी संकट के समय आप मसीह के पास आए हों। यह सब अच्छा है। परन्तु पवित्रशास्त्र प्रायः सुसमाचार में मसीह के साथ एकता से मिलने वाले दोहरे अनुग्रह की बात करता है, जिसे लैटिन में “डुप्लेक्स ग्रातिया कहा जाता है। मसीहियों को केवल मसीह की धार्मिकता के आधार पर ही धर्मी नहीं ठहराया जाता (रो. 4:5), वरन् मसीह के वास करने वाले आत्मा के कार्य के द्वारा वे धर्मी बनाए जाते हैं (रो. 6:11)। यही कारण है कि नीतिवचन 4:18 में वर्णित “परन्तु धर्मियों की चाल, भोर के प्रकाश के समान है, जिसकी चमक दोपहर तक बढ़ती जाती है।” यह परिवर्तन यीशु के अनुयायी के रूप में मेरी बुलाहट का एक मुख्य भाग है।
पवित्रता का मार्ग
प्रत्येक सच्चे विश्वासी के लिए पवित्रता का मार्ग यशायाह 35:8 में पाया जाता है:
8“वहाँ एक सड़क अर्थात् राजमार्ग होगा,
उसका नाम पवित्र मार्ग होगा;
कोई अशुद्ध जन उस पर से न चलने पाएगा;
वह तो उन्हीं के लिये रहेगा और उस मार्ग पर जो चलेंगे;
वह चाहे मूर्ख भी हों तो भी कभी न भटकेंगे।”
यशायाह एक ऐसे मार्ग का वर्णन करता है जिस पर सब छुटकारा पाए हुए लोग सिय्योन की ओर जाएँगे। न्याय और बन्धुआई से भरे इन अध्यायों के बीच परमेश्वर निर्गमन के समान एक और छुटकारे की प्रतिज्ञा करता है। छुटकारा पाए हुए लोगों का एक समूह ऐसे मार्ग से जाएगा जो उन्हें उनके अनन्त घर, शुद्ध आनन्द के स्थान की ओर ले जाएगा। (यशा. 35:10)। यद्यपि हम केवल विश्वास के द्वारा धर्मी ठहराए जाने के सत्य की रक्षा करना चाहते हैं, फिर भी हम उन वचनों को अनदेखा नहीं कर सकते जो उसी प्रकार हमारी पवित्रता पर भी बल देते हैं। हमें सुसमाचार की यह समझ चाहिए: कि “मैंने आपको जीवित किया है; अब उसी के अनुसार जीवन बिताइए।” दूसरे शब्दों में, ऐसा एक भी विश्वासी नहीं है जिसे धर्मी ठहराया गया हो परन्तु उसे पवित्रता के मार्ग पर न रखा गया हो। क्योंकि इसके बिना “कोई प्रभु को कदापि न देखेगा” (इब्र. 12:14)।
पवित्रता वह आवश्यक मार्ग है जिस पर प्रत्येक विश्वासी को चलना चाहिए। कुछ लोग इस विचार को इस प्रकार संक्षेप में कहते हैं—कि हम अच्छे कार्यों के कारण उद्धार नहीं पाए हैं, परन्तु अच्छे कार्यों के लिए उद्धार पाए हैं। साधारण जीवन की बातों में परमेश्वर की महिमा करना इसी का मूल भाव है।
आज परमेश्वर का मेरे लिए क्या उद्देश्य है? जब मैं निराश होने के प्रलोभन में पड़ता हूँ, तब कभी-कभी मैं यह प्रश्न ऐसे पूछता हूँ कि मानो परमेश्वर ने इसे स्पष्ट ही न किया हो। “और नये मनुष्यत्व को पहन लिया है जो अपने सृजनहार के स्वरूप के अनुसार ज्ञान प्राप्त करने के लिये नया बनता जाता है।” (कुल. 3:10)। हमें यह कहना चाहिए, “आज, परमेश्वर के अनुग्रह से, मैं एक मसीही हूँ। मैं एक नई सृष्टि हूँ। मैं वह हूँ जिसे मेम्ने के लहू से मोल लिया गया है, और अब पवित्र आत्मा मेरे भीतर वास करता है ताकि वह मुझे सुसमाचार के अनुसार नई आज्ञाकारिता में चलने के योग्य बनाए। आज मेरे लिए जो बात स्पष्ट है, वह ऐसा उद्देश्य है जो साधारण दैनिक बातों से कहीं अधिक बढ़कर है। यह पवित्रता का उद्देश्य है।” यही वह जीवन है जो सुसमाचार के योग्य है।
पवित्रता का यह नया मार्ग मसीहियों के लिए पौलुस की अनेक प्रार्थनाओं को समझने के योग्य बना देता है। उसने कुलुस्सियों को लिखा:
“इसलिए जिस दिन से यह सुना है, हम भी तुम्हारे लिये यह प्रार्थना करने और विनती करने से नहीं चूकते कि तुम सारे आत्मिक ज्ञान और समझ सहित परमेश्वर की इच्छा की पहचान में परिपूर्ण हो जाओ, ताकि तुम्हारा चाल-चलन प्रभु के योग्य हो, और वह सब प्रकार से प्रसन्न हो, और तुम में हर प्रकार के भले कामों का फल लगे, और परमेश्वर की पहचान में बढ़ते जाओ, और उसकी महिमा की शक्ति के अनुसार सब प्रकार की सामर्थ्य से बलवन्त होते जाओ, यहाँ तक कि आनन्द के साथ हर प्रकार से धीरज और सहनशीलता दिखा सको” (कुल. 1:9-11)।
वह उनके लिए प्रार्थना करता है कि वे समझ और बुद्धि के साथ यह जान सकें कि उनके जीवन पर परमेश्वर की इच्छा कैसे लागू होती है। यह सब इसलिए है कि उनका चालचलन “प्रभु के योग्य” हो। ऐसा जीवन जो विश्वास के द्वारा जिस यीशु से वे जुड़े हुए हैं, उसके समान होता चला जाए। उसकी प्रार्थना यह है कि परमेश्वर पवित्रता के उस मार्ग पर उनके कदमों का मार्गदर्शन करे जो उनके सामने रखा गया है। जब कोई अपने जीवन के उद्देश्य को खोज रहा होता है, तब यह वास्तव में एक महत्वपूर्ण प्रार्थना होती है।
आज का सबसे बड़ा सौभाग्य
जब भी आपको यह लगे कि धर्मी ठहराए जाने के बाद आपको केवल बाहरी नैतिकता से भरा जीवन जीने के लिए बुलाया गया है, तब फिर से विचार कीजिए। सत्रहवीं शताब्दी में एक पास्टर-ईश्वर विज्ञानी ने अपनी मृत्यु से एक वर्ष पहले मसीही जीवन पर मनन किया। कई दशकों तक मसीही जीवन जीने और लगभग अस्सी लाख शब्द प्रकाशित करने के बाद, उन्होंने इस निष्कर्ष पर पहुँचकर बताया कि इस पृथ्वी पर हमारा सबसे बड़ा सौभाग्य क्या है:
एक विश्वासी के सबसे बड़े सौभाग्य में से एक, चाहे इस जीवन में हो या अनन्तकाल में, मसीह की महिमा को निहारना है। केवल उसकी महिमा का दर्शन, और कुछ नहीं, वास्तव में यही परमेश्वर के लोगों को तृप्त कर सकता है। वास्तव में, मसीह की महिमा को निहारते हुए ही विश्वासी धीरे-धीरे उसके स्वरूप में बदलते चले जाते हैं, और फिर उसकी महिमा के अनन्त आनन्द में प्रवेश करते हैं, क्योंकि वे “सदैव उसके समान” होंगे, और “उसे वैसा ही देखेंगे जैसा वह है” (2 कुर. 3:18; 1 यूह. 3:1-2)। इसी पर हमारी वर्तमान शान्ति और भविष्य की आशीष निर्भर होती है। यही हमारे प्राणों का जीवन और प्रतिफल है (यूह. 14:9; 2 कुर. 4:6)।
आगे चलकर हम अनन्तकाल में इस दर्शन के विषय में चर्चा करेंगे। अभी के लिए, हमारा ध्यान आज पर ही है। इन “वर्तमान सांत्वनाओं” को प्राप्त करना और अभी परमेश्वर में आनन्दित होना कैसा दिखाई देता है? हम उसे निहारते हैं। हम इस जीवन में उसी के लिए जीते हैं और उसी की अभिलाषा करते हैं। इसी प्रकार हम यह समझते हैं कि हमारे लिए परमेश्वर की क्या योजना है। जैसे-जैसे हम यीशु को जानते जाते हैं, अर्थात् उसके गुणों को, उसकी महिमा को, उसकी सुन्दरता को, उसके व्यक्तित्व और उसके कार्यों को—तो हम बदलते चले जाते हैं।
हम पवित्रशास्त्र में प्रकट किए गए यीशु की ओर देखते हैं ताकि उसे वैसे ही जान सकें जैसा वह वास्तव में है। हम पवित्रशास्त्र को इसलिए खोजते हैं क्योंकि हम उससे प्रेम करते हैं, और जितना अधिक हम उसे जानने लगते हैं, उतना ही अधिक उससे प्रेम करने लगते हैं। इसी प्रकार हम परमेश्वर की वाणी सुनते हैं, कि परमेश्वर हमसे कैसे बोलता है—वह हम से जीवित वचन के द्वारा बोलता है। पवित्र आत्मा हमें उसी के स्वरूप में बदलता है जिसे हम निहारते हैं। तब हम संसार में उसे प्रदर्शित करते हैं; वास्तव में हमें इसी उद्देश्य के लिए बनाया गया था। मसीह-केंद्रित यह दर्शन हमारे मार्ग को हमारे भीतर विद्यमान मसीह की महिमा और सामर्थ्य से प्रज्वलित कर देता है। अंततः यीशु ने इसी के लिए प्रार्थना की थी: “”हे पिता, मैं चाहता हूँ कि जिन्हें तूने मुझे दिया है, जहाँ मैं हूँ, वहाँ वे भी मेरे साथ हों कि वे मेरी उस महिमा को देखें जो तूने मुझे दी है, क्योंकि तूने जगत की उत्पत्ति से पहले मुझसे प्रेम रखा।”” (यूह. 17:24)।
परमेश्वर के द्वारा ठहराया गया निर्धारित स्थान
किसी भी संस्था में प्रत्येक कर्मचारी साझा उद्देश्य को आगे बढ़ाने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जितना अधिक कार्य-विवरण स्पष्ट होता है, उतनी ही अधिक कर्मचारी को मन की शान्ति मिलती है कि वह अपना कार्य सही प्रकार से कर रहा है। प्रत्येक व्यक्ति सम्पूर्ण व्यवस्था में एक विशेष भाग निभाता है। मसीही जीवन का उद्देश्य संसार की सबसे बड़ी कंपनियों से भी कहीं अधिक बड़ा है। फिर भी हम प्रायः अपने कार्य-विवरण की स्पष्ट बातें जानना चाहते हैं ताकि हमें यह शान्ति मिल सके कि क्या हम वास्तव में परमेश्वर की महिमा कर रहे हैं। हम अधिकतर व्यवसाय और बुलाहट के बीच का अन्तर समझने में संघर्ष करते रहते हैं, जबकि दोनों ही उसकी प्रभुता के अधीन हैं। हम कैसे जानें कि हम उन भले कार्यों के लिए सृजे गए हैं जिन्हें परमेश्वर ने पहले से हमारे करने के लिये तैयार किया है। (इफ. 2:10)?
संसार के सम्पूर्ण इतिहास और परमेश्वर के उस कार्य की तुलना में, जिसमें वह संसार भर के लोगों को अपने पास एकत्र कर रहा है, हमारा जीवन बहुत छोटा और क्षणिक है। फिर भी इससे हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि आज का दिन महत्वहीन है। परमेश्वर की व्यवस्था और देखरेख का सिद्धान्त यह दर्शाता है कि प्रत्येक व्यक्ति का जीवन और हमारे जीवन का प्रत्येक क्षण महत्वपूर्ण और उद्देश्यपूर्ण है। यह वास्तव में उस सत्य की वास्तविकता है कि परमेश्वर के पास आपके जीवन के लिए एक योजना है, जैसा कि बाइबल की आयतों में प्रकट किया गया है। हाइडेलबर्ग प्रश्नोत्तरी का प्रश्न #27 इस प्रकार समझाता है:
प्रश्न: परमेश्वर की प्रावधान से आपका क्या तात्पर्य है?
त्तर: परमेश्वर की सर्वशक्तिमान और सर्वव्यापी सामर्थ्य, जिसके द्वारा वह मानो अपने हाथ से स्वर्ग, पृथ्वी और सब प्राणियों को संभालता है और उनका संचालन करता है; ताकि वनस्पतियाँ और घास, वर्षा और सूखा, उपजाऊ और बाँझ वर्ष, भोजन और पेय, स्वास्थ्य और बीमारी, धन और निर्धनता—हाँ, सब वस्तुएँ संयोग से नहीं, वरन् उसके पिता समान हाथों से प्राप्त होती हैं।
हमारे जीवन का प्रत्येक विवरण, प्रत्येक सम्बन्ध, और प्रत्येक क्षण उद्देश्य से भरा हुआ है, क्योंकि परमेश्वर ने उसे ठहराया है। यदि हम यह जानना चाहते हैं कि परमेश्वर की महिमा “कैसे” करनी है, तो हमें “अभी” पर ध्यान देना होगा। इसी प्रकार हम जीवन के भिन्न-भिन्न समयों में अपने उद्देश्य को समझते हैं। मेरे जीवन के कौन-कौन से क्षेत्र ऐसे हैं जो विशेष रूप से मुझे सौंपे गए हैं, और सुसमाचार की बुलाहट के योग्य जीवन उस विशेष क्षण में मेरी सोच, इच्छा और कार्यों को कैसे आकार देता है? हो सकता है कि केवल आप ही ऐसी स्थिति में हों कि उस सहकर्मी को उत्साहित कर सकें या उसे सुसमाचार सुना सकें। सब लोगों में से आपको ही धैर्य और प्रेम के साथ अपने निकट रहने वाले वृद्ध माता-पिता की देखभाल करने के लिए बुलाया गया है। आप उस स्थानीय कलीसिया के सदस्य हैं, और विशेष रूप से उन्हीं लोगों से प्रेम करने और उनकी देखभाल करने के लिए आपको बुलाया गया है।
हो सकता है कि आप भीतर से अपने आप को प्रेरित होना महसूस करें, और आपको अपनी कलीसिया से स्वीकृति भी मिल जाए तथा ऐसे किसी विशेष देश में सुसमाचार प्रचार-प्रसारक के रूप में सेवा करने का खुला अवसर पाएँ जहाँ न कोई कलीसिया है और न ही सुसमाचार का कोई गवाह है। फिर भी पवित्र आत्मा की सहायता से हमें यह पहचानना होगा कि प्रभु की दृष्टि में क्या भला है, और प्रत्येक परिस्थिति में जो भी उत्तम है उसे दृढ़ता से थामे रहना है। क्योंकि प्रत्येक विशेष परिस्थिति उद्देश्यपूर्ण होती है। यह उस प्रक्रिया का भी एक भाग है जिसके द्वारा हम अपने आत्मिक वरदानों को खोजते हैं।
इस विचार को पौलुस 1 कुरिन्थियों 7 में विस्तार से समझाता है। वह कहता है, “पर जैसा प्रभु ने हर एक को बाँटा है, और जैसा परमेश्वर ने हर एक को बुलाया है; वैसा ही वह चले: और मैं सब कलीसियाओं में ऐसा ही ठहराता हूँ।” ऐतिहासिक रूप से, प्यूरिटन समुदाय के लोगों ने इस विचार को एक मसीही व्यक्ति का “नियुक्त स्थान” कहा है। केवल राजाओं के निर्णय और पद ही नहीं, वरन् छोटे बच्चों का जन्म-क्रम भी परमेश्वर की व्यवस्था के अधीन हैं। प्रत्येक कार्य, सेवा का प्रत्येक अवसर, और स्नातक होने का प्रत्येक वर्ष हमारे सर्वसामर्थी और सर्वज्ञानी परमेश्वर के द्वारा ठहराया गया है। कई बार हम इन्हीं नियुक्त स्थानों के माध्यम से यह संकेत देखते हैं कि परमेश्वर हमारे जीवन की दिशा बदल रहा है।
प्रश्न यह है कि हम परमेश्वर के द्वारा ठहराए गए इस स्थान का प्रबन्ध कैसे करेंगे? यह इस प्रकार दिखाई दे सकता है कि कोई सफल व्यापारी साधारण आय पर जीवन बिताए ताकि वह अपनी स्थानीय कलीसिया से भेजे गए सुसमाचार प्रचार-प्रसारकों के समूह को अधिक से अधिक सहायता पहुँचा सके। यह ऐसा भी हो सकता है जैसेएडोनिराम जडसन ने मसीह के लिए अपना पूरा जीवन बर्मा में समर्पित कर दिया था। यह किसी विद्यार्थी के रूप में भी हो सकता है, जो अपना समय फोन पर व्यर्थ न गँवाकर लगन से अपनी पढ़ाई पर ध्यान दे, या अपने खाली समय का उपयोग कलीसिया के किसी वृद्ध सदस्य को चिकित्सक के पास ले जाने में करे। हम में से प्रत्येक को इस प्रश्न का उत्तर देना है: परमेश्वर ने आज मुझे जिन योग्यताओं, कौशलों, अधिकार, साधनों और समय के साथ जिस स्थिति में रखा है, उसका उपयोग मैं मसीह के स्वरूप को प्रकट करने, दूसरों की सेवा करने, और परमेश्वर की महिमा करने के लिए कैसे करूँ? विश्वास के द्वारा अपनी बुलाहट और लगन को पहचानने का यही मार्ग है।
जब हम अविश्वासी थे, तब हम इस प्रकार नहीं सोचते थे। घटनाएँ बस यूँ ही घटित हो जाती थीं। संयोग और आकस्मिक घटनाएँ केवल क्षणिक जिज्ञासा उत्पन्न करने वाली बातें थीं। जीवन का बहुत बड़ा भाग ऐसा प्रतीत होता था मानो वह तुच्छ या केवल प्राकृतिक कारणों से निर्धारित परिणामों से भरा हो। और कठोर रूप से देखें तो जीवन को केवल परमाणुओं का आपस में टकराना और रासायनिक प्रतिक्रियाओं तक सीमित कर दिया जा सकता था। परन्तु केवल परमेश्वर के अनुग्रह से, मसीही लोग अब सत्य को छुपाते नहीं हैं। वे देखते हैं कि वर्षा का आकाश से होना भी सम्पूर्ण मनुष्यजाति पर परमेश्वर की भलाई है (मत. 5:45)। पत्ता भूमि पर गिरता है और फूल हमारे स्वर्गीय पिता की इच्छा से खिलता है (मत. 6:30)। सब कुछ उसकी योजना का ही हिस्सा है। कुछ भी व्यर्थ या बिना उद्देश्य के नहीं है।
मसीह और उसके वचन पर एक दृढ़ आधार रखने के बाद, जब भविष्य से जुड़े अनेक निर्णय हमारे सामने होते हैं, तब हम असहाय होकर बँधे नहीं रहते। चाहे वह नौकरी हो, घर हो, या सुसमाचार का प्रचार करने वाली कोई कलीसिया हो, इसलिए अपने हृदय और परिस्थिति को परमेश्वर के वचन के अनुसार परखिए। अपने उद्देश्य के लिए परमेश्वर के समय की प्रतीक्षा करना अक्सर इस यात्रा का एक हिस्सा होता है। परमेश्वर से प्रार्थना कीजिए कि वह आपको समझ प्रदान करे। ऐसे भक्तिपूर्ण मसीहियों से सलाह लीजिए जो ऐसा ही करते हैं। फिर मसीही की स्वतंत्रता में परमेश्वर और उसके राज्य की महिमा के लिए एक मार्ग चुन लीजिए।
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मनन के लिए प्रश्न:
- “पवित्रता का मार्ग” आपके लिए और दूसरों के लिए आपकी प्रार्थनाओं को कैसे आकार देता है?
- 2 कुरिन्थियों 3:18 और 1 यूहन्ना 3:1-2 का अध्ययन कीजिए। यीशु को निहारते रहने से हम किस प्रकार बदलते जाते हैं?
- क्या मसीह को निहारना आपका सबसे बड़ा सौभाग्य है? यदि हाँ, तो क्यों? यदि नहीं, तो क्यों नहीं? आपके विचार से इसमें कौन-कौन सी बाधाएँ आती हैं?
- कौन सी बातें आपको यीशु को निहारने में सहायता करती हैं? इससे आपके जीवन में क्या परिवर्तन आया है?
- आप अपने जीवन में परमेश्वर की अगुवाई को कहाँ देखते हैं, और बीते समय में निर्णय लेने में किस बात ने आपकी सहायता की? भविष्य के निर्णयों के लिए आपने उससे क्या सीखा?
- क्या आप अपने “स्थान” को परमेश्वर के द्वारा ठहराया गया मानते हैं? इससे आपके “साधारण” कार्य के प्रति आपका दृष्टिकोण कैसे बदलता है? यह कठिनाइयों को सहने में आपकी सहायता किस प्रकार कर सकता है?
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भाग V: सड़क का अन्त
अन्त की वास्तविकता के उजियाले में जीवन जीना
अन्त की वास्तविकता के उजियाले में जीवन जीना: मेरे घर में अधिकतर ऐसा होता है कि मैं किसी फर्नीचर को बनाना आरम्भ करता हूँ, तो इससे पहले कि मुझे यह ठीक से पता चले कि अन्त में वह कैसा दिखाई देगा। परन्तु कई बार इसका परिणाम उलझन और खराब निर्माण के रूप में निकलता है। अलमारी का किनारा उलटी दिशा में लग जाता है। कोई छेद उसके पेंच के साथ मेल नहीं खाता, क्योंकि मैंने मान लिया था कि मुझे पता है कि यह काम किस दिशा में जा रहा है। मैं सोचता हूँ, “यह तो केवल एक मेज़ ही है। इसमें भला क्या कठिनाई हो सकती है?” देखिए, अन्तिम उद्देश्य को जानना पूरी प्रक्रिया में सही मार्ग को खोजने में सहायता करता है। परमेश्वर अनुग्रह के साथ अन्त की एक स्पष्ट झलक प्रकट करता है, ताकि वह यह आकार दे सके कि हम वर्तमान में उद्देश्यपूर्ण जीवन कैसे जिएँ। जो कोई यह पूछता है कि वह स्वयं को कैसे पाए, तो उसके लिए यही आधार है कि—अपने भीतर देखने से नहीं, वरन् उसकी ओर देखने से स्वयं को पाए, जिसके हाथ में पूरी कहानी का अन्त है।
पवित्रशास्त्र में “अन्तिम बातों के अध्ययन” का प्रभाव सदैव इस बात से पड़ता है कि हम आज कैसा जीवन जी रहे हैं। अन्तिम समय से सम्बन्धित शिक्षा और जीवन का आचरण साथ-साथ चलते हैं। वास्तव में, स्वर्गीय बातों पर मन लगाना हमारे पृथ्वी के कदमों को दिशा देता है। हमारे अध्ययन का यह अन्तिम भाग इस बात पर केन्द्रित होगा कि भविष्य किस प्रकार हमारे वर्तमान को उद्देश्य और दिशा प्रदान करता है। यह उद्देश्यपूर्ण जीवन जीने के विषय में बाइबल की आयतों का सर्वोच्च संग्रह प्रस्तुत करता है।
हमारे भविष्य की आशा को, जिसे विश्वास के द्वारा अपनाया जाता है, सबसे व्यवहारिक रूप से समझाने वाले अध्यायों में से एक इब्रानियों का ग्यारहवाँ अध्याय है। बहुत से लोग इस अध्याय को “विश्वास के वीरों का सभागृह” कहते हैं, क्योंकि इसमें पुराने नियम के पवित्र लोगों के संक्षिप्त जीवन विवरण दिए गए हैं, जो दिखाते हैं कि उनके विश्वास ने उनके दैनिक जीवन को कैसे आकार दिया। भूमिका के रूप में, इब्रानियों का लेखक विश्वास की एक संक्षिप्त परिभाषा देता है: “अब विश्वास आशा की हुई वस्तुओं का निश्चय, और अनदेखी वस्तुओं का प्रमाण है।” (इब्र. 11:1)। पुराने नियम के पवित्र लोगों का जीवित विश्वास हमारे सामने यह चित्र प्रस्तुत करता है कि भविष्य की महिमा, जो वर्तमान में निश्चित ठहराई गई है, किस प्रकार सब कुछ बदल देती है।
नूह ने विश्वास के द्वारा उद्धार का जहाज़ बनाया, क्योंकि परमेश्वर ने उसे बताया था कि दण्ड आने वाला है। अब्राहम एक पराए देश की ओर निकल पड़ा और परदेशी तथा थोड़े समय के लिए डेरा डालकर रहने को तैयार हुआ, क्योंकि उसने परमेश्वर के अनन्त नगर को थाम लिया था। मूसा अपमान सह सकता था और मिस्र की धन-सम्पत्ति छोड़ सकता था, क्योंकि उसने मसीह को संसार की प्रत्येक वस्तु से बढ़कर माना। इन पवित्र लोगों ने और बहुतों ने अपना जीवन परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं के प्रकाश में बिताया। अन्त से सम्बन्धित वे प्रतिज्ञाएँ, जिन्हें उन्होंने दूर से देखकर ग्रहण किया, उनके आज्ञापालन को आकार देती थीं और पृथ्वी पर उनके थोड़े समय के जीवन में उन्हें धीरज देती थी। अनन्तकाल सब कुछ बदल देता है।
मसीह की वापसी
मसीह पहले ही अपने लोगों के पापों को उठाने के लिए आ चुका है, परन्तु उसके स्वर्गारोहण के बाद से हम उसकी प्रतीक्षा कर रहे हैं। फिर भी, एक ऐसा दिन आने वाला है जब यीशु पाप से निपटने के लिए नहीं, परन्तु मसीह से अलग रहने वालों के लिए दण्ड और अपने लोगों के लिए उद्धार लेकर आएगा। प्रेरित पतरस अपने पत्रों में मसीह के दूसरे आगमन को स्मरण में बनाए रखने के महत्व के विषय में लिखता है। 1 पत. 1:13 में वह हमें अपने मन को तैयार करने के लिए कहता है। वह हमें बुलाता है कि जब तक हम प्रभु की वापसी की प्रतीक्षा कर रहे हैं, तब तक संयमी और सचेत बने रहें। इस भाग में पतरस का मुख्य आग्रह पवित्र जीवन जीने के लिए है। क्योंकि हम प्रभु से मिलने वाले हैं और उसे वैसा ही देखेंगे जैसा वह है, इसलिए हमें पवित्र और सचेत होकर जीवन जीना चाहिए।
पतरस अपनी दूसरी पत्री के तीसरे अध्याय में मसीह की वापसी के इस आग्रह को आगे बढ़ाता हुआ कहता है, क्योंकि वह पवित्र लोगों को उत्साहित करता है कि प्रभु अपनी प्रतिज्ञा को पूरा करने में देर नहीं करता है। तीसरे अध्याय के दसवीं आयत में वह कहता है कि प्रभु का दिन “रात में चोर” के समान आएगा। अर्थात्, हम यह नहीं जानते कि वह कब आएगा, परन्तु हम यह जानते हैं कि वह दिन अवश्य आएगा। इस प्रतीक्षा के समय में हमें हर दिशा में प्रलोभन और आकर्षण खींचेंगे, ताकि हम इस सत्य पर ध्यान न दें। फिर भी, यह सच्चाई है कि हम अनन्तकाल की दहलीज़ पर खड़े हैं, और हमसे तैयार और सचेत होकर जीने की माँग की गई है, क्योंकि हम उस दिन की प्रतीक्षा कर रहे हैं जब हमारा विश्वास प्रत्यक्ष दर्शन में बदल जाएगा—जब हम अन्ततः उससे मिलेंगे जिसने हमसे इतनी भरपूर रीति से प्रेम किया है। यही हमारा उद्देश्य है, और इसी उद्देश्य के कारण प्रतीक्षा के इस समय में सबसे बड़ी आज्ञा हमारा मुख्य कार्य बन जाता है।
अनन्त विरासत
इफिसियों की पुस्तक में उस अनुग्रह की सम्पत्ति का वर्णन करने के लिए बहुत गहरी भाषा का प्रयोग किया गया है, जो हमें मसीह यीशु में प्राप्त हुई है। पौलुस हमारे सामने हमारे लेपालक होने और स्वर्ग में मिलने वाली महिमामय विरासत को रखता है। यदि भविष्य में हमारे लिए इतनी बड़ी विरासत रखी हुई है, तो फिर हम क्यों इतनी मूर्खता से पृथ्वी की धन-सम्पत्ति से चिपके रहते हैं? जब स्वर्ग की महिमा हमारी प्रतीक्षा कर रही है, तब क्यों कोई व्यक्ति धन को अपना स्वामी बनाता है? यीशु अपने शिष्यों को इसी प्रकार सोचने की आज्ञा देता है: “अपने लिये पृथ्वी पर धन इकट्ठा न करो; जहाँ कीड़ा और काई बिगाड़ते हैं, और जहाँ चोर सेंध लगाते और चुराते हैं। परन्तु अपने लिये स्वर्ग में धन इकट्ठा करो, जहाँ न तो कीड़ा, और न काई बिगाड़ते हैं, और जहाँ चोर न सेंध लगाते और न चुराते हैं। क्योंकि जहाँ तेरा धन है वहाँ तेरा मन भी लगा रहेगा” (मत. 6:19-21: साथ ही 1 तीम. 6:19 भी देखें। शुद्ध, स्थायी, और स्वर्गीय धन, जो मार्ग के अन्त में उसकी प्रजा की प्रतीक्षा कर रहा है, वर्तमान युग में उन्हें साहसी और उदार देने वाले लोगों में बदल देता है।
पुनरुत्थान Bदेह
जीवन केवल हमारी भौतिक देह तक ही सीमित नहीं है। क्योंकि मसीह यीशु मृतकों में से जी उठा है, वैसे ही हम भी उसी के समान जी उठेंगे। वह पहला फल ठहरा, और उसी के द्वारा हमें भी “मृतकों में से पुनरुत्थान” प्राप्त होता है (1 कुर. 15:21)। अन्तिम दिन में हम ऐसी देह पाएँगे जो अब श्राप के अधीन नहीं होगी। प्रभु प्रतिज्ञा करता है कि वहाँ न कोई बीमारी रहेगी, न कोई विकलांगता, और न ही मृत्यु रहेगी (प्रक. 21:4)। पुनरुत्थान जीवन को देखने और उद्देश्यपूर्ण ढँग से जीने का पूरा दृष्टिकोण बदल देता है।
व्यायाम को लाभदायक माना गया है, परन्तु आत्मा के प्रशिक्षण और दूसरों के लिए जीवन जीने जितना मूल्यवान नहीं है (1 तीम. 4:8)। क्यों न इन अस्थायी रूप से स्वस्थ शरीरों का उपयोग सोशल मीडिया पर व्यर्थ महिमा पाने के बजाय कलीसिया में और अधिक उत्साह से परमेश्वर की सेवा करने में करें? यदि हमें किसी असाध्य बीमारी का निदान मिल जाए, तब भी हम जीवन की आशा के साथ मृत्यु का सामना करेंगे। ऐसे समय में हम पुनरुत्थान पर विश्वास के लिए कैसे दृढ़ता से संघर्ष कर सकते हैं और साथ ही अपनी पीड़ा के बीच में भी परमेश्वर की महिमा कैसे कर सकते हैं? यदि हम अमरता से परिपूर्ण एक नयी देह पाने वाले हैं, तब हम उस राज्य के लिए त्याग करने को भी तैयार रहते हैं जिसके लिए प्रभु ने हमें यह अस्थायी देह दी है। सुसमाचार प्रचार-प्रसारक निरन्तर ऐसा करते हैं, जब वे भिन्न-भिन्न जातियों के बीच परमेश्वर की आराधना करने के लिए मैले या शारीरिक रूप से खतरनाक स्थानों में रहते हैं। संसार के कुछ भागों में इसका अर्थ यीशु के कारण इस सांसारिक शरीर को खो देना भी हो सकता है। हमारे शरीरों के अन्तिम समय में पुनरुत्थान की आशा, इस जीवन में परमेश्वर की महिमा करने के श्रेष्ठ उद्देश्य के सामने हमारे भौतिक शरीरों के प्रति हमारे दृष्टिकोण और उनके मूल्य को भी बदल देती है।
महिमा में आमने-सामने देखना
अन्त में हम परमेश्वर को देखेंगे। अन्तिम दिन में अपने पुनरुत्थित देह और आत्मा के साथ हम उस प्रिय प्रभु से आमने-सामने मिलेंगे। हम बिना किसी बाधा के और अनन्तकाल तक उसकी महिमा और सुन्दरता को निहारते रहेंगे:
– भजन संहिता 17-15: “परन्तु मैं तो धर्मी होकर तेरे मुख का दर्शन करूँगा जब मैं जागूँगा तब तेरे स्वरूप से सन्तुष्ट होऊँगा।”
– 1 कुरिन्थियों 13-12: “अब हमें दर्पण में धुँधला सा दिखाई देता है; परन्तु उस समय आमने-सामने देखेंगे, इस समय मेरा ज्ञान अधूरा है; परन्तु उस समय ऐसी पूरी रीति से पहचानूँगा, जैसा मैं पहचाना गया हूँ।“
– 1 यूहन्ना 3:2-3: “हे प्रियों, अब हम परमेश्वर की सन्तान हैं, और अब तक यह प्रगट नहीं हुआ, कि हम क्या कुछ होंगे! इतना जानते हैं, कि जब यीशु मसीह प्रगट होगा तो हम भी उसके समान होंगे, क्योंकि हम उसको वैसा ही देखेंगे जैसा वह है। और जो कोई उस पर यह आशा रखता है, वह अपने आप को वैसा ही पवित्र करता है*, जैसा वह पवित्र है।”
– प्रकाशितवाक्य 22:4-5: “वे उसका मुँह देखेंगे, और उसका नाम उनके माथों पर लिखा हुआ होगा। और फिर रात न होगी, और उन्हें दीपक और सूर्य के उजियाले की आवश्यकता न होगी, क्योंकि प्रभु परमेश्वर उन्हें उजियाला देगा, और वे युगानुयुग राज्य करेंगे।”
ये परमेश्वर के उस धन्य दर्शन का वर्णन करने वाले केवल कुछ ही पवित्रशास्त्र के वचन हैं। भविष्य में होने वाला यह दर्शन आज हमारे जीवन को प्रभावित करता है, क्योंकि यह हमारी आत्मा की उस सर्वोच्च इच्छा के किसी भी प्रतिद्वन्द्वी को नष्ट कर देता है। तब हम प्रार्थना कर सकते हैं: “स्वर्ग में मेरा और कौन है? तेरे संग रहते हुए मैं पृथ्वी पर और कुछ नहीं चाहता।” (भज. 73:25)।
इस “आनन्दमय” दर्शन की आशा हमें यहाँ और अभी के दुखों को सहने में सहायता करती है। हम सब कुछ खो सकते हैं, पर अन्त में इस वस्तु को प्राप्त करना ही सब कुछ है। मित्रों, नौकरी, स्वास्थ्य, संपत्ति और प्रतिष्ठा का खो जाना उस तुलना में कुछ भी नहीं है कि हम किसके हैं, हम किसे देखेंगे, और हम क्या बनेंगे। उसकी उपस्थिति, सब बातों से ऊपर है, और वही आवश्यक है और वही वह अन्तिम उद्देश्य है जिसके लिए हम बनाए गए हैं। हमारा परमेश्वर, जिससे हम प्रेम करते हैं, वही हमारा स्वर्ग है और वही हमारा अनन्त निवास स्थान होगा।
यहाँ हमें विश्वास के साथ मनन करने से आनन्द मिलता है, लेकिन आगे चलकर बाद में भरपूर आनन्द मिलेगा। जैसे काम से लौटते समय पति को अपनी पत्नी और बच्चों से मिलने की लालसा होती है, वैसे ही अन्तिम दिन में पवित्र लोगों की यह लालसा पूरी होगी। ऑगस्टीन के शब्दों में:
ऐसे आनन्द में प्रवेश करो जिसमें कोई दुःख न हो, परन्तु हर प्रकार का सुख हो; जहाँ केवल भलाई हो और कोई बुराई न हो। जहाँ जीवन सजीव, मधुर और प्रिय होगा, और सदा स्मरणीय रहेगा; जहाँ कोई शत्रु आक्रमण करने वाला नहीं होगा, न ही कोई फंदे होंगे, वरन् परम और निश्चित सुरक्षा, सुरक्षित शान्ति, शान्त मन और सुखद आनन्द होगा; एक सुखमय अनन्तता, अनन्त आशीष और परमेश्वर का धन्य दर्शन, जो आपके परमेश्वर के आनन्द का कारण है। हे आनन्द से भी ऊपर आनन्द! सब आनन्दों से बढ़कर आनन्द; वह आनन्द जिसके अतिरिक्त कोई अन्य आनन्द नहीं… मैं कब तेरे भीतर प्रवेश करूँगा, कि मैं अपने परमेश्वर को देख सकूँ, जो तुझमें वास करता है?
इस अन्तिम दर्शन की ओर विश्वास के द्वारा देखने वाला जीवन फिर कभी पहले जैसा नहीं रहेगा। न कोई स्थिति इतनी नीची और न कोई स्थान इतना ऊँचा; न कोई सांसारिक वस्तु इतनी बड़ी और न कोई साधन इतना छोटा; न कोई अनुभव इतना परिपूर्ण और न कोई स्वप्न इतना विशाल होगा, यह दर्शन उस आने वाली भरपूरी की तुलना कर सकता है जो परमेश्वर को आमने-सामने देखने में प्रकट होगी। तब ही केवल उस अन्त, उस अनन्त जो कभी समाप्त नहीं होगा, तक पहुँचा जाएगा। अभी हम विश्वास के द्वारा चलते हैं, न कि देखने के द्वारा।
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मनन के लिए प्रश्न:
- अन्तिम समय की और कौन सी सच्चाइयाँ हैं जो हमारे वर्तमान जीवन को आकार देती हैं? क्या आप कुछ और सोच सकते हैं?
- परमेश्वर को आमने-सामने देखने से हमारे वर्तमान जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है?
- आपने किस प्रकार भविष्य के बजाय वर्तमान संसार के लिए जीवन जिया है?
- आपके जीवन में इन अनन्त वास्तविकताओं के लिए जीने में वर्तमान चुनौतियाँ क्या हैं?
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निष्कर्ष
मुझे आशा है कि इस संक्षिप्त अध्ययन ने आपको यह देखने में सहायता की होगी कि एक उद्देश्यपूर्ण जीवन परमेश्वर-केंद्रित जीवन होता है। सृष्टि, पतन, छुटकारा और पूर्णता के माध्यम से परमेश्वर की इस कहानी को जानने से हमें उसमें अपना स्थान और उद्देश्य खोजने में सहायता मिलती है। हम परमेश्वर के लिए बनाए गए हैं, परन्तु हम परमेश्वर से दूर हो गए, लेकिन परमेश्वर के द्वारा ही हमार छुटकारा हुआ है, इसलिए हम परमेश्वर में ही पूर्ण होंगे, सब कुछ परमेश्वर की महिमा और स्तुति के लिए है। हमारे व्यक्तिगत जीवन के विशेष विवरण इस बड़े और अधिक महिमामय उद्देश्य की सेवा करते हैं। इससे कम कुछ भी पापमय और असंतोषजनक होगा। इसलिए, आज आपके लिए प्रश्न है: कि क्या आपने मार्ग पा लिया है?
लेखक के बारे में
विल्सन रैमसे, वॉशिंगटन, डी.सी. में स्थित कैपिटल हिल बैपटिस्ट चर्च में पास्टर के सहायक के रूप में सेवकाई करते हैं। उनकी पत्नी का नाम यूनिस है, और उनका एक बेटा है, जिसका नाम हैडन है।
विषयसूची
- भाग I: हम कहाँ थे?
- मनन के लिए प्रश्न:
- भाग II: हमसे कहाँ गलती हुई?
- मनन के लिए प्रश्न:
- भाग III: मसीह में पाया गया
- परमेश्वर का अनन्त उद्देश्य
- पुनर्निर्देशित और पुनः स्थापना
- मनन के लिए प्रश्न:
- भाग IV: वर्तमान में जीना
- पवित्रता का मार्ग
- आज का सबसे बड़ा सौभाग्य
- परमेश्वर के द्वारा ठहराया गया निर्धारित स्थान
- मनन के लिए प्रश्न:
- भाग V: सड़क का अन्त
- अन्त की वास्तविकता के उजियाले में जीवन जीना
- मसीह की वापसी
- अनन्त विरासत
- पुनरुत्थान Bदेह
- महिमा में आमने-सामने देखना
- मनन के लिए प्रश्न:
- निष्कर्ष
- लेखक के बारे में