#60 आलसी होना कैसे छोड़ें: उद्देश्य के साथ जीवन जिएँ
परिचय
हर सुबह लगभग साढ़े चार बजे, मिलर्सबर्ग, ओहायो के ठीक पूर्व में, मेरे दादा जी प्रभु के साथ समय बिताने के लिए जागते हैं और फिर अपने कार्य पर चले जाते हैं। उनकी आयु अस्सी वर्ष है। संभवतः आप सोच रहे होंगे, “वाह, इस व्यक्ति को अपनी सेवानिवृत्ति के लिए बेहतर योजना बनानी चाहिए थी।” परन्तु बात यह है कि—पैसा उनकी प्रेरणा नहीं है। वह काम करते हैं, क्योंकि यही उनकी पहचान है—यही उनका काम है। उन्हें आलसी बने रहने में कोई रुचि नहीं है। अब वह न तो घड़ी देखकर काम करते हैं, न ही जनवरी में किसी न्योक्ता से उन्हें वेतन और कर विविरण फॉर्म मिलता है, और आप उन्हें काम के दौरान कभी भी आलसी नहीं पाएँगे। लेकिन परमेश्वर के वचन पढ़ने और प्रार्थना में समय बिताने के बाद, वह अपनी गाड़ी में बैठकर हमारे शहर के ठीक उत्तर में स्थित एक कस्बे के बॉब इवांस के भोजनालय में जाते हैं, जहाँ वह दो में से किसी एक समूह के सज्जनों—जैसे नल ठीक करने वाले मिस्त्री और पासबानों (या कभी-कभी किसी रेल अभियन्ता) के साथ भेंट करने के लिए पहुँच जाते हैं।
आप देखिए, साठ वर्ष पहले मेरे दादाजी ने नलसाज का काम आरम्भ किया था, पहले एक सहायक के रूप में, और फिर अंततः एक मुख्य नलसाज अर्थात् प्लंबर बन गए। आज वह अपनी प्रशिक्षण देने वाली संस्था के माध्यम से नलसाजों को पढ़ाते हैं, जो ओहायो के नलसाजों के लिए है, जिन्हें हर वर्ष निश्चित घण्टों की अतिरिक्त शिक्षा लेना आवश्यक होता है। लगभग उसी समय के आसपास उन्हें सेवकाई के लिए बुलाहट हुई, और इसलिए उन्होंने अपने परिवार को साथ लिया और वर्जीनिया के लिंचबर्ग शहर में चले गए, जहाँ उन्होंने ईश्वर विज्ञान की शिक्षा प्राप्त की। तब से वह विश्वासयोग्यता के साथ पासबानी और प्रचार करते चले आ रहे हैं। आज वह ओहायो के वाड्सवर्थ में स्थित रिजवुड बैपटिस्ट चर्च के अल्पकालिक पास्टर के रूप में सेवकाई कर रहे हैं।
मैं आपको यह सब क्यों बता रहा हूँ? सच कहूँ तो, मुझे अपने दादाजी पर गर्व है। उससे भी बड़ी बात यह है कि मैं उनके ही जैसा बनना चाहता हूँ। मैंने अपना पूरा जीवन उन्हें देखते हुए बिताया है और यह आशा की है कि मैं भी उन्हीं के समान परिश्रमी बनूँगा ताकि मुझे कभी स्वयं से यह न पूछना पड़े कि “मैं इतना आलसी क्यों हूँ?” इस प्रकार आप उन्हें मेरे मार्गदर्शक के रूप में समझ सकते हैं। सच कहूँ तो, मुझे बहुत ही अच्छा मार्गदर्शक मिला है।
इसलिए जब मुझे आलस्य छोड़कर परिश्रम करने के विषय में यह मार्गदर्शिका लिखने का अवसर मिला, तो मैंने तुरन्त इसे स्वीकार कर लिया। वैसे मैं कोई परिपूर्ण व्यक्ति नहीं हूँ। क्योंकि आलस्य पर विजय पाने और परिश्रम करने के विषय में मुझे अभी बहुत कुछ सीखना है। मेरा अनुमान है कि आप भी मेरे ही समान हैं—“मैं आलसी हूँ” यह स्वीकार करने के बजाय कार्य-नैतिकता के क्षेत्र में आगे बढ़ना चाहते हैं। मेरे पास आपके लिए एक शुभ सन्देश है। मेरे जीवन में उत्तम कार्य-नैतिकता के अद्भुत उदाहरण हैं, और आशा है कि आपके जीवन में भी होंगे। इसके अतिरिक्त, बाइबल में इस विषय पर बहुत कुछ कहा गया है, और आलस्य के विषय में कई आयतें भी मिलती हैं। इसीलिए इस मार्गदर्शिका में हम अपना ध्यान बाइबल में वर्णन किए गए आलस्य पर केंद्रित करेंगे।
हम पतन से पहले और उसके बाद हमारे कार्य के लिए परमेश्वर के उद्देश्य पर विचार करते हुए आरम्भ करेंगे। इसके बाद, हम इस विषय को ध्यान से देखेंगे कि आलस्य क्या है और उसके कारण क्या हैं, साथ ही उन परिणामों पर भी विचार करेंगे जो इसके कारण होते हैं। आलस्य पर विचार करने के बाद, हम परिश्रम के क्यों और कैसे पर ध्यान देंगे। और अन्त में हम कुछ व्यावहारिक तरीकों पर विचार करेंगे कि आलस्य पर कैसे विजयी हों और परिश्रम तथा अनुशासन के क्षेत्र में कैसे आगे बढ़ा जाए। इसलिए बिना देर किए आरम्भ करते हैं।
ऑडियो मार्गदर्शिका
ऑडियो#60 आलसी होना कैसे छोड़ें: उद्देश्य के साथ जीवन जिएँ
भाग I: हमारे कार्य के लिए परमेश्वर का उद्देश्य
परमेश्वर कार्य करने वाला
बाइबल प्रसिद्धता के साथ इस पंक्ति के साथ आरम्भ होती है, “आदि में परमेश्वर ने आकाश और पृथ्वी की सृष्टि की” (उत्पत्ति 1:1)। इस वाक्य से हम परमेश्वर के विषय में बहुत कुछ सीखते हैं। सबसे पहले, हम यह सीखते हैं कि परमेश्वर अनन्त है—अर्थात् वह समय से परे है, और सदा से वही है जो वह है। क्या आपने कभी ध्यान दिया है कि मूसा (उत्पत्ति का लेखक) केवल परमेश्वर के अस्तित्व को मानकर चलता है। सम्पूर्ण सृष्टि की प्रत्येक वस्तु की रचना करनी पड़ी, परन्तु परमेश्वर की नहीं। परमेश्वर सदा से अस्तित्व में है। जब हम यह खोजते हैं कि बाइबल आलस्य के विषय में क्या कहती है, तो हमें यहीं से परमेश्वर के अनन्त स्वभाव के विषय में आरम्भ करना चाहिए।
दूसरा, हम सीखते हैं कि परमेश्वर असाधारण सामर्थ्य रखने में योग्य है। अंततः उसी ने सम्पूर्ण जगत की रचना की है! यदि हम उत्पत्ति की पुस्तक में आगे पढ़ते हैं, तो हमें पता चलता है कि सृष्टि की रचना के लिए परमेश्वर का तरीका उसकी अपनी वाणी है। यह पाठ बार-बार कहता है कि, “और परमेश्वर ने कहा…” (उत्पत्ति 1:3, 6, 9, 11, 14, 20, 24)। जब उसने अपना सामर्थी वचन कहा, तो जो उसने चाहा वह अस्तित्व में आ गया। वह परिश्रम का सर्वोच्च उदाहरण है, जो आलस्य से कोसों दूर है।
अन्त में, इन दोनों सच्चाइयों को एक साथ मिलाकर, हम यह सीखते हैं कि परमेश्वर आलसी नहीं है, या इसे सकारात्मक रूप से कहें तो, परमेश्वर कार्य करने वाला है।1 इस पर विचार करें। परमेश्वर का अस्तित्व सदैव से ही रहा है। इसका अर्थ है कि अपने जीवन के लिए वह स्वयं में पूर्ण रीति से पर्याप्त है। फिर भी परमेश्वर ने जान-बूझकर समय के भीतर कार्य करते हुए संसार की रचना करने का निर्णय लिया। कल्पना कीजिए कि आपके पास बहुत बड़ी मात्रा में धन आ जाए—मैं ऐसी धनराशि की बात कर रहा हूँ कि आप संसार के जेफ़ बेज़ोस और एलन मस्क जैसे लोगों की श्रेणी में आ जाएँ, तो शून्यों को गिन लेने के बाद आपका पहला कदम क्या होगा? मुझे लगता है कि हम में से बहुत से लोग कार्य करना छोड़ देंगे और आलसी हो जाएँगे। परन्तु परमेश्वर ऐसा नहीं है। परमेश्वर, जो एकमात्र अनन्त, पूरी रीति से पर्याप्त और संतुष्ट है, उसने संसार को अस्तित्व में लाने के लिए कार्य करना चुना।
परमेश्वर ने हमें अपने समान कार्य करने के लिए सृजा है।
ठीक है, तो परमेश्वर एक कार्य करने वाला है और उसने पूरे संसार और जो कुछ उसमे है, सबकी रचना की। यह बात समझ में आ गई है। अब आइए ध्यान दें कि इस कहानी में आप और मैं कहाँ आते हैं। उत्पत्ति 1:26 कहता है, “फिर परमेश्वर ने कहा, ‘हम मनुष्य को अपने स्वरूप के अनुसार अपनी समानता में बनाएँ; और वे समुद्र की मछलियों, और आकाश के पक्षियों, और घरेलू पशुओं, और सारी पृथ्वी पर, और सब रेंगनेवाले जन्तुओं पर जो पृथ्वी पर रेंगते हैं, अधिकार रखें। ’” जिस प्रकार हम उत्पत्ति 1:1 से परमेश्वर के विषय में बहुत कुछ सीख सकते हैं, उसी प्रकार हम उत्पत्ति 1:26 से अपने विषय में भी बहुत कुछ सीख सकते हैं।
हम परमेश्वर के समान बनाए गए हैं। अब (एक छोटी सी आवश्यक बात), कुछ वास्तविक अर्थों में आप और मैं कभी भी उसके समान नहीं बन सकते हैं। परमेश्वर में एक ऐसी “ईश्वरता” है जिसमें हम कभी सहभागी नहीं हो सकते हैं। यदि यह बात आपको आश्चर्यचकित करती है, तो हमें केवल उत्पत्ति 1:1 और उत्पत्ति 1:26 को फिर से देखना चाहिए, ताकि हम महसूस कर सकें कि परमेश्वर कुछ बातों में पूर्ण रीति से अद्वितीय है। वह रचियता है और हम रचना हैं। जीवन उसमे स्वयं है, और हमारा जीवन उससे है। वह कुछ नहीं में से भी संसार की रचना करने के लिए कार्य कर सकता है, जबकि हमारे कार्य के लिए परमेश्वर के द्वारा पहले से प्रदान की गई सामग्री की आवश्यकता होती है। ये सब केवल कुछ भिन्नताओं को बताने के लिए है, ताकि कहीं हम स्वयं को कुछ अधिक ही बड़ा न समझने लगें, जैसा कि मेरी दादी कहा करती थी।
फिर भी, कुछ वास्तविक अर्थों में हम परमेश्वर के समान हैं। विशेष रूप से, हमें कार्य करने के लिए बनाया गया है। परमेश्वर कार्य करता है, इसलिए हम भी कार्य करते हैं। उत्पत्ति 1:1 को फिर से देखें। आकाश और पृथ्वी पर प्रभुत्व किसका है? परमेश्वर का। अर्थात् उसने संसार की रचना की है, इसलिए उस पर उसका अधिकार है—अर्थात् वह उसमें अपनी इच्छा के अनुसार कार्य कर सकता है। हम इस बात को समझते हैं, ठीक है न? रचना करने की सामर्थ्य शासन करने के अधिकार में बदल जाती है। अब उत्पत्ति 1:26 को फिर से देखें और अपने आप से वही प्रश्न पूछें—प्रभुत्व किसका है? उत्तर—हमारा है! वाह! परमेश्वर रचना करता है और हमें उस सब पर अधिकार करने का उत्तरदायित्व सौंपता है जिसे उसने बनाया है। वाह! तो कार्य करना मनुष्य के उत्तरदायित्व का एक हिस्सा है—यह उस बात का हिस्सा है कि हम परमेश्वर के स्वरूप को धारण करते हैं। यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण अवधारणा है, जब हम यह समझने का प्रयास करते हैं कि बाइबल आलस्य और हमारे रचे जाने के उद्देश्य के विषय में क्या कहती है।
कभी-कभी कार्य को गलत तरीके से मनुष्य के पतन से जोड़ दिया जाता है, मानो यदि पाप न होता, तो कार्य करने का कोई कारण ही न होता। लेकिन ध्यान दें कि पाप के संसार में प्रवेश करने से पहले ही कार्य मनुष्य के अस्तित्व का एक आधार था। यह सृष्टि की उस व्यवस्था का हिस्सा है जो पाप और मृत्यु से अछूती थी। इसलिए अगली बार जब आप कार्य को किसी बुरी वस्तु से जोड़ने लगें या अपने आप को कार्य में आलसी होने का बहाना बनाते हुए पाएँ, तो रुकें और अपने आप को स्मरण दिलाएँ कि, “परमेश्वर ने मुझे कार्य करने के लिए बनाया है। यही मेरे अस्तित्व का कारण है।”
परमेश्वर हमें उसकी महिमा के लिए कार्य करने हेतु बुलाता है
ठीक है, परमेश्वर ने हमें कार्य करने के लिए बनाया है। अब अगला प्रश्न यह है कि क्यों? बाइबल हमें इसका पहला उत्तर उपयोगिता के रूप में देती है, और हम इसे उस अंश में देखते हैं जिसे हम देख रहे थे—अर्थात् उत्पत्ति 1:26-28 हमें उन सब वस्तुओं का भण्डारी बनने के लिए बनाया गया है जिन्हें परमेश्वर ने सृजा है। जैसे पेड़-पौधे, जीव-जन्तु और शेष सब कुछ, परमेश्वर के स्वरुप धारण करने वाले मनुष्यों की देखरेख में हैं; और मनुष्यों की देखभाल में इन सभी चीज़ों को फलना-फूलना चाहिए। जब मूसा उत्पत्ति 2 में आदम और हव्वा की रचना की कहानी को दोबारा बताता है, तो वह लिखता है कि, “तब यहोवा परमेश्वर ने आदम को लेकर अदन की वाटिका में रख दिया, कि वह उसमें काम करे और उसकी रखवाली करे” (उत्पत्ति 2:15)। कार्य करने और उसकी रक्षा करना बुलाहट को बनाए रखने और विस्तार करने के उत्तरदायित्व को दर्शाता है; अर्थात् सुरक्षित रखना और उसमे सुधार करना। इससे हम यह सीखते हैं कि परमेश्वर ने संसार को अच्छा बनाया, परन्तु उसमें उन्नति करने की क्षमता भी रखी है। हम यह भी सीखते हैं कि उस उन्नति को आगे बढ़ाने के लिए मनुष्य उसका चुना हुआ साधन था। इसलिए, परमेश्वर की योजना में मनुष्य का कार्य करना एक उपयोगिता है।
बाइबल हमें मानवीय कार्य के लिए एक लक्ष्य आधारित उद्देश्य भी देती है। इस बड़े शब्द से घबराइए मत। इसका केवल इतना ही अर्थ है कि यह किसी अन्तिम या सर्वोच्च वस्तु को दर्शाता है। हमारे कार्य का एक सर्वोच्च उद्देश्य है, और यह केवल अभी और यहीं तक ही सीमित नहीं है। हाँ, परमेश्वर चाहता है कि आदम अदन की वाटिका का विस्तार इस प्रकार से करे कि वह पूरी पृथ्वी को भर दे, लेकिन न तो केवल वाटिका के लिए, और न ही केवल आदम के लिए, हालाँकि ये दोनों बातें भी इसमें सम्मिलित हैं। नहीं, परमेश्वर अंततः चाहता है कि आदम यह सब उसके लिए करे—अर्थात् परमेश्वर की महिमा के लिए करे।
इसी कारण, नए नियम में मसीहियों को निर्देश दिया गया है कि “…और जो कुछ तुम करते हो, तन मन से करो, यह समझकर कि मनुष्यों के लिये नहीं परन्तु प्रभु के लिये करते हो” (कुल. 3:23)। इसका व्यावहारिक अर्थ क्या है? इसका अर्थ है कि आपके जीवन में कार्य से जुड़ी हर व्यावहारिक बात का एक बड़ा उद्देश्य है, जितना आप समझते हैं संभवतः उससे भी बड़ा। इसके बजाय, आपके जीवन में कार्य कोई ऐसी असुविधाजनक बात नहीं है जिसे आप कम करने का प्रयास करें या जिसमें आप आलसीपन दिखाएँ; वरन् आपको अपना कार्य इस समझ के साथ करना चाहिए कि जब आप परमेश्वर के लिए कार्य करते हैं, तो उसकी महिमा प्रकट होती है।
मुझे स्मरण है, कि एक बार मेरे पिताजी ने मुझ से घर के सामने से लकड़ी का गठ्ठर उठाकर पीछे के आँगन में रखने को कहा था। मैं उस समय केवल आठ या नौ वर्ष का था, इसलिए मुझे तो ऐसा लगा मानो मेरे पिताजी ने मुझ से हमारे घर के पीछे के जंगल की सारी लकड़ियाँ काटने के लिए कह दिया हो। मुझे उस कार्य के आकार को देखकर डर और घबराहट महसूस हुई। लेकिन फिर मैंने उसमें कुछ ऐसा देखा जिसे आप एक अवसर कह सकते हैं। जब मैं लकड़ी से भरी पहली ठेला गाड़ी खींचकर ले जा रहा था, तो मैंने देखा कि हमारे घर के बगल वाले आँगन में एक बहुत बड़ा चीड़ का पेड़ है, जिसकी डालियाँ दूर तक फैली हुई थीं और भूमि के बहुत अधिक निकट थीं। डॉ. स्यूस के संसार के ग्रिंच के समान, मेरे मन में “…एक भयानक विचार आया! …एक अद्भुत, भयानक विचार आया।” लेकिन मुझे जल्दी काम करना था। आठ वर्ष की आयु में यह समझ पाना कठिन था कि बड़े लोग आपकी चालों को कब भाँप लेते हैं। मैं जल्दी से लकड़ियों को घसीटकर उस चीड़ के पेड़ के नीचे ले जाने लगा। इससे दूरी लगभग 75% कम हो गई और इसलिए, जितना समय लगना चाहिए था, उसके चौथाई समय में ही मेरा कार्य पूरा हो गया।
केवल एक समस्या थी। हमारे घर की ओर उस चीड़ के पेड़ से बस कुछ ही फीट की दूरी पर एक खिड़की थी। और ऐसा हुआ कि मेरे पिता उसी खिड़की के पास खड़े थे और मुझे उस पेड़ के नीचे एक-एक करके सारी लकड़ियाँ फेंकते हुए देख रहे थे। मैं पकड़ा गया और न्यायाधीश ने मुझे अधिकतम दण्ड सुनाया। लेकिन मुझे मिले दण्ड से भी अधिक दुःख इस बात का था कि मुझे अपने पिता की आज्ञा माननी चाहिए थी, क्योंकि वे मेरे पिता थे और मैं उनसे प्रेम करता था। मुझे स्मरण है कि उन्होंने मुझसे पूछा था कि, “टेलर, तुमने मेरी आज्ञा क्यों नहीं मानी? मैं तुमसे प्रेम करता हूँ, और तुम मुझ पर भरोसा कर सकते हो कि जब मैं तुमसे कुछ करने को कहता हूँ, तो वह तुम्हारे भले और हमारे परिवार के भले के लिए होता है। तुम अविश्वास क्यों करते हो और मेरी आज्ञा क्यों नहीं मानते?” ये बहुत अधिक चुभने वाले प्रश्न थे।
अपने उस शरारती और बुरे और व्यवहार को स्मरण करते हुए जो मैंने आठ वर्ष की आयु में किया था, परमेश्वर की महिमा के लिए कार्य करने के विषय में एक महत्वपूर्ण सबक सामने आता है। उसकी महिमा के लिए कार्य करने का एक हिस्सा यह है कि हम प्रेरित हों, केवल परमेश्वर के प्रति हमारे प्रेम से ही नहीं, वरन् हमारे प्रति उसके प्रेम से भी। देखिए, जो हमारे पास है, वह सब कुछ परमेश्वर ने हमें दिया है। हमारे पास ऐसा क्या है जो हमें नहीं मिला है? उत्तर: कुछ भी नहीं छोड़ा है। परमेश्वर ने हमें सभी वस्तुओं में बहुतायत के साथ आशीषित किया है। उसकी आज्ञाओं का उद्देश्य और भी अधिक आशीष लाता है, क्योंकि केवल उसी का भय मानने में ही सुरक्षा है। इसलिए उसकी महिमा के लिए कार्य करना तो स्वाभाविक होना चाहिए। लेकिन यहाँ एक समस्या है। जैसे, जब मैं आठ वर्ष का था… अधिकतर हमारा मन प्रलोभित होता है कि हम कार्य करने में लापरवाही करें, कम कार्य करें, उत्तरदायित्व से बचें, जवाबदेही से कतराएँ और कार्य करने से घृणा करें। ऐसा क्यों होता है? यह प्रश्न हमें इस जीवन-कौशल मार्गदर्शिका के उस भाग तक ले जाता है जो आलस्य के कारणों से संबंधित है।
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मनन के लिए प्रश्न:
- अपने हृदय की जाँच करें और सच्चाई से उत्तर दें कि: आप कार्य के विषय में कैसा महसूस करते हैं? और क्यों?
- आप अभी किन तरीकों से आलसी होने या आलस्य की कला को अपनाने के लिए प्रलोभित हो रहे हैं?
- कार्य परमेश्वर की महिमा कैसे करता है?
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भाग II: आलस्य क्या है और यह क्यों होता है?
आलस्य क्या है?
मैं आपके लिए आलस्य की एक सरल परिभाषा प्रस्तुत करता हूँ। आलस्य का अर्थ है कि जो कार्य आपको करना चाहिए, उसमें कोई रूचि न होना या उसे करने की इच्छा न होना; इसके बजाय, खाली बैठे रहना या सोने, टीवी देखने, या लगातार नकारात्मक समाचार देखते/पढ़ते रहना या किसी अन्य व्यर्थ की गतिविधि जैसे आसान तथा अधिक आनन्ददायक वस्तुओं में आवश्यकता से अधिक लिप्त रहना। आप पूछ सकते हैं कि, “मैं इतना आलसी क्यों हूँ?” हालाँकि मेरा अनुमान यह है कि—आपको शायद अपने जीवन या दूसरों के जीवन में आलस्य पहचानने के लिए उसकी परिभाषा की आवश्यकता नहीं होती है। क्योंकि आलस्य साफ दिखाई दे जाता है।
एक पत्नी ने अपने पति से कहा कि कचरा बाहर ले जाओ, लेकिन वह फुटबॉल का खेल समाप्त होने तक प्रतीक्षा करता है। फिर वह दूसरे फुटबॉल खेल के समाप्त होने तक प्रतीक्षा करता है। फिर वह सुबह तक प्रतीक्षा करता है। वह क्या कर रहा था? अन्य बातों के साथ वह आलसी बन रहा था!
विश्वविद्यालय का एक छात्र है जिसे अपनी रसायन विज्ञान की कक्षा उत्तीर्ण करने के लिए एक बड़ी परीक्षा में अच्छे नंबर लाने हैं, लेकिन वह पढ़ाई करने के लिए तब तक प्रतीक्षा करता है जब तक वह अपने पसंदीदा नेटफ्लिक्स (अर्थात् इंटरनेट के माध्यम से फिल्में, टीवी शो, और डॉक्युमेंट्रीज़ देखने की सुविधा देता है) कार्यक्रम का प्रसारण नहीं देख लेता। और फिर एक और प्रसारण। और फिर एक और दूसरा प्रसारण। और बहुत ही शीघ्र वह अपनी माँ को फोन करके बताता है कि वह परीक्षा में अनुत्तीर्ण हो गया है। यह सब कैसे हो रहा है? फिर से वही, आलस्य या टालमटोल और आलस्य।
एक पिता सीढ़ियों के ऊपर से अपने किशोर बेटे को पुकारता है, उससे कहता है कि वह जाकर गैराज साफ कर दे, लेकिन अभी तो सुबह के 10 बजे हैं और आज शनिवार है! बेटे ने उस अनुरोध को सोते-सोते टाल दिया और उसे पता भी नहीं चला कि कब दोपहर के 1:30 बज गए। एक बार फिर…से आलस्य!
आपके बारे में क्या कहा जाए? आप किन तरीकों से आलस्य से जूझ रहे हैं? मेरा अनुमान है कि आज आलस्य का एक सबसे स्पष्ट रूप हमारे स्मार्टफ़ोन पर व्यर्थ समय बिताना है। मेरे पास इसे सिद्ध करने के लिए आँकड़े तो नहीं हैं (परन्तु मैं शर्त लगाता हूँ कि ये आँकड़े कहीं न कहीं अवश्य उपलब्ध होंगे!), लेकिन अल्पकालिक सामग्री के साथ किसी व्यक्ति के लिए यह सोचना बहुत सरल हो जाता है कि, “केवल एक और वीडियो, फिर मैं उस परियोजना पर कार्य आरम्भ कर दूँगा।” फिर एक वीडियो तीस मिनट या यहाँ तक कि एक घंटे के वीडियो देखने में बदल जाता है, और आपने अपने कार्य के सम्बन्ध में कुछ भी काम नहीं किया। इसे टालमटोल कहिए, चिन्ता से राहत पाने का तरीका (या शायद आप सोचते हो कि बिना सोचे समझे व्यवहार करना ही आलस्य है), या कुछ और है। जो भी हो, पर यह आलस्य से कम नहीं है।
आलस्य भगाने के लिए आप जिस भी “नशे” को चुनते हैं, उसे अभी पहचानें। अपनी प्रवृत्तियों को जानने से, जीवन-कौशल से जुड़ी यह मार्गदर्शिका आपके लिए अधिक उपयोगी सिद्ध होगी।
आलस्य क्यों होता है?
ठीक है, आलस्य का अर्थ आसान से कार्य के लिए उत्तरदायित्व से बचना है। यह वह है जब आप वह नहीं करते जो आपको करना चाहिए, या जब आपको करना चाहिए। अब हम आलस्य के अस्तित्व के विषय की ओर बढ़ते हैं। हम ऐसे संसार में जन्म क्यों नहीं ले सकते जहाँ हम वही करना चाहें जो हमें करना चाहिए, या जब हमें करना चाहिए, और कभी भी आलस्य करने के लिए प्रलोभित न हों? इसका संक्षिप्त उत्तर पाप है। यह इस प्रश्न का उत्तर देता है कि, “क्या आलस्य पाप है? संसार में पाप के प्रवेश ने कई चीज़ों को बिगाड़ दिया, जिनमें मनुष्य के परिश्रम की भलाई और उससे मिलने वाला आनन्द भी सम्मिलित है। आलस्य के मूल कारणों में से एक यही है।
उस आदम को स्मरण करें, जो पहला मनुष्य था और जिसे अदन की वाटिका में रखा गया था? उसके पाप का प्रभाव न केवल उस पर, वरन् हम सब पर पड़ा। वास्तव में, एक प्रकार से जब उसने पाप किया, तब हम उसी में मौजूद थे और उसी के द्वारा हमारा प्रतिनिधित्व किया जा रहा था। पौलुस रोम की कलीसिया को लिखता है, “इसलिए जैसा एक मनुष्य के द्वारा पाप जगत में आया, और पाप के द्वारा मृत्यु आई, और इस रीति से मृत्यु सब मनुष्यों में फैल गई…”(रो. 5:12)। इस प्रकार पाप, मृत्यु और इस संसार की हर बुरी बात जिसमें आलस्य भी सम्मिलित है, आदम के पाप के द्वारा आया। अब आप शायद सोच रहे होंगे, “वाह, यह कितना अधिक अन्यायपूर्ण कार्य है! मैं तो वहाँ था ही नहीं, फिर भी मुझे आदम की गलती की कीमत चुकानी पड़ रही है?” इतनी शीघ्रता से निष्कर्ष पर मत पहुँचिए, मेरे मित्र। हाँ, हमने आदम में पाप किया। लेकिन हम स्वयं भी व्यक्तिगत रूप से और नियमित रूप से हर समय पाप करते रहते हैं। हम अपनी इच्छा से, या प्रसन्नता के साथ पाप करते हैं, और कभी-कभी उसके बाद थोड़ा सा भी पछतावा नहीं होता; कि “मैं आलसी हूँ” पाप को हम केवल तब स्वीकार करते हैं जब हम पकड़े जाते हैं। इसलिए पाप, मृत्यु और हर बुरी बात जिसमें आलस्य भी सम्मिलित है, केवल आदम के पाप के कारण ही नहीं, वरन् हमारे अपने पाप के कारण भी अस्तित्व में हैं। यही बाइबल के अनुसार आलस्य की वास्तविकता है।
आलस्य के क्या परिणाम होते हैं?
इसलिए, आलस्य का अर्थ वह कार्य न करना है जो आपको करना चाहिए, या जब आपको करना चाहिए; अतः यह इसलिए अस्तित्व में है क्योंकि हम सब पापी हैं। अगला प्रश्न जिस पर हमें ध्यान देना है, वह यह है कि आलस्य के क्या परिणाम होते हैं। इस प्रश्न का उत्तर देते समय बाइबल बिल्कुल भी बात को घुमा-फिराकर नहीं कहती है। बाइबल में आलस्य से संबंधित पवित्रशास्त्र से कुछ आयतों को संक्षिप्त रूप से प्रस्तुत करना उचित होगा।
- “थोड़ी सी नींद, एक और झपकी, थोड़ा और छाती पर हाथ रखे लेटे रहना,तब तेरा कंगालपन राह के लुटेरे के समान और तेरी घटी हथियारबंद के समान आ पड़ेगी।”—नीतिवचन 6:10-11
- “आलसी का प्राण लालसा तो करता है, परन्तु उसको कुछ नहीं मिलता, परन्तु कामकाजी हष्ट-पुष्ट हो जाते हैं।”—नीतिवचन 13:4
- “जो काम में ढिलाई करता है, वह निर्धन हो जाता है, परन्तु कामकाजी लोग अपने हाथों के द्वारा धनी होते हैं।”—नीतिवचन 10:4
- “आलस्य के कारण छत की कड़ियाँ दब जाती हैं, और हाथों की सुस्ती से घर चूता है।”—सभोपदेशक 10:18
- “और जब हम तुम्हारे यहाँ थे, तब भी यह आज्ञा तुम्हें देते थे, कि यदि कोई काम करना न चाहे, तो खाने भी न पाए। हम सुनते हैं, कि कितने लोग तुम्हारे बीच में आलसी चाल चलते हैं; और कुछ काम नहीं करते, पर औरों के काम में हाथ डाला करते हैं। ऐसों को हम प्रभु यीशु मसीह में आज्ञा देते और समझाते हैं, कि चुपचाप काम करके अपनी ही रोटी खाया करें।”—2 थिस्सलुनीकियों 3:10-12
- “प्रयत्न करने में आलसी न हो; आत्मिक उन्माद में भरे रहो; प्रभु की सेवा करते रहो।”—रोमियों 12:11
इन आयतों से हम देखते हैं कि आलस्य निर्धनता, भूख, और यहाँ तक कि कलीसिया में विश्वासियों के बीच संगति के टूटने का कारण बनता है। इसकी कीमत बहुत भारी होती है! इससे भी बुरी बात यह है कि यीशु स्पष्ट रूप से सिखाता है कि आत्मिक आलस्य का परिणाम अनन्त विनाश होता है (मत्ती 25:23)।
मेरे मित्र, यदि आप आलस्य करने की ओर आकर्षित हो रहे हैं, तो आप शायद इस प्रकार की सोच से परिचित होंगे: कि “और पाँच मिनट से क्या फर्क पड़ता है?” “मुझे वह काम करने की अभी आवश्यकता नहीं है, मैं इसे बाद में कर सकता हूँ!” “यदि मैं आज अपनी बाइबल नहीं पढ़ता, तो यह कोई बहुत बुरी बात नहीं है। मुझे नींद आ रही है।” अतः बहुत सावधान रहें, क्योंकि आलस्य आपको अपनी ओर खींचता है और फिर आपको नींद में डाल देता है। समस्या यह है कि आप यह सुनिश्चित नहीं कर सकते कि आप अपनी नींद से जागेंगे। आलस्य की कीमत आपको अभी चुकानी पड़ेगी, और अन्त में इसकी कीमत आपको बहुत भारी पड़ेगी। मुझे आशा है कि जिन कारणों से आप इस मार्गदर्शिका की ओर आकर्षित हुए हैं, उनमें से एक यह भी है कि आप आलस्य से जुड़े जोखिमों को समझते हैं और उनसे बचना चाहते हैं तथा आलसीपन छोड़ना चाहते हैं। मैं प्रार्थना करता हूँ कि प्रभु आपको आलस्य पर विजय पाने में बड़ी सफलता प्रदान करें।
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मनन के लिए प्रश्न:
- आलस्य पाप कैसे है?
- आलस्य से जुड़े कुछ दुष्परिणाम क्या हैं?
- दुष्परिणाम को गिनना आपको कठोर परिश्रम करने और आलसी न होने के लिए कैसे प्रेरित करता है?
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भाग III: अनुशासन क्यों और कैसे
अनुशासन क्यों
थॉमस एडिसन ने एक युवा सभा को, जिसने उनसे आलस्य छोड़ने के तरीके पर एक संदेश का अनुरोध किया था, तो उन्होंने निम्नलिखित सुझाव भेजे:
- जो भी कार्य आप करते है, उसमें हमेशा रुचि रखिए।
- घड़ी की चिन्ता न करें, केवल अपना कार्य करते रहें; और जब विश्राम की आवश्यकता हो,
तो प्रकृति को ही इसका संकेत देने दें। - जिसे हम असफलताएँ कहते हैं, वे वास्तव में उन लोगों के लिए सही दिशा दिखाने वाले संकेत होते हैं, जो सीखने के लिए तैयार रहते हैं।
- कठोर परिश्रम और उन सभी चीज़ों में सच्ची रुचि रखना मानवीय प्रगति में योगदान देती हैं, पुरुषों और महिलाओं को अपने लिए और संसार के लिए अधिक मूल्यवान और स्वीकार्य बना देती हैं।2
मुझे कहना पड़ेगा कि यह बहुत अच्छी सलाह है। ये बातें दर्शाती हैं कि एडिसन इस बात के पक्ष में थे कि युवाओं को अनुशासन में बढ़ना चाहिए और आलस्य छोड़ना सीखना चाहिए। निस्संदेह, उन्होंने यह स्पष्ट रूप से नहीं बताया कि उन्हें किस बात में अनुशासन दिखाना चाहिए। वास्तव में, अपने पहले बिंदु में वह यह संकेत देते हैं कि व्यक्ति को अपने किसी भी कार्य में चाहे वह जो भी हो, अपनी रुचि को ही अनुशासन का आधार बनने देना चाहिए। मेरी माँ भी इस बात से पूरी रीति से सहमत होती, केवल वह इसे कुछ इस प्रकार से कहती, “यदि कोई कार्य करने योग्य है, तो उसे सही रीति से ही किया जाना चाहिए।” ऐसी मानसिकता आलस्य की कला के लिए कोई स्थान नहीं छोडती है।
इसलिए, थॉमस के अनुसार, आप जो भी करें, उसे आपको रुचि और अनुशासन के साथ करना चाहिए। लेकिन आपको क्या करना चाहिए? वह उत्तर देते हैं कि व्यक्ति की रुचि और अनुशासन का लक्ष्य मनुष्यजाति की उन्नति होना चाहिए। दूसरे शब्दों में, कठोर परिश्रम केवल कार्य तक ही सीमित नहीं है; यह आलस्य पर विजय पाने की कुंजी भी है। कठोर परिश्रम उन्नति के विषय में होता है, और यह केवल स्वयं की उन्नति तक सीमित नहीं होता, वरन् अपने सबसे निकट के लोगों से आरम्भ होकर सब की उन्नति के लिए भी होता है।
हम पहले ही इस बात पर विचार कर चुके हैं कि कार्य परमेश्वर की महिमा करने के लिए होता है, और हमने यह भी देखा है कि बाइबल आलस्य के विषय में क्या कहती है। लेकिन यह समझने के लिए कि किस प्रकार का कार्य परमेश्वर की महिमा को सबसे अधिक बढ़ाता है, हमें अपने कार्य का दूसरों पर पड़ने वाले प्रभाव पर विचार करना चाहिए। हालाँकि एडिसन अपने अन्तिम बिंदु में किसी महत्वपूर्ण बात की ओर संकेत कर रहे थे, फिर भी उन्होंने यहाँ उसे परमेश्वर की महिमा के आधार पर नहीं रखा। अब हम यह दिखाना चाहते हैं कि अपने कार्य के माध्यम से दूसरों की उन्नति करके परमेश्वर की महिमा करना, स्वयं की उन्नति के साथ कैसे जुड़ा हुआ है, और यह भी कि ऐसा करते हुए हम आलस्य से कैसे बच सकते हैं।
इस सम्बन्ध को समझने के लिए, आइए दो सबसे बड़ी आज्ञाओं पर विचार करें। एक बार एक व्यवस्थापक ने यीशु के पास आकर उससे पूछा, “हे गुरु, व्यवस्था में कौन सी आज्ञा बड़ी है?” (मत्ती 22:36) उसने एक ही प्रश्न के बदले दो उत्तर दिए। यीशु ने कहा, “तू परमेश्वर अपने प्रभु से अपने सारे मन और अपने सारे प्राण और अपनी सारी बुद्धि के साथ प्रेम रख। बड़ी और मुख्य आज्ञा तो यही है। और उसी के समान यह दूसरी भी है, कि तू अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रख” (आयत 37-39)। अपने पहले उत्तर में यीशु मूलतः यह कहता है कि मनुष्य का परम उद्देश्य परमेश्वर की महिमा करना है, अर्थात् उससे प्रेम करना है, जो आत्मिक आलस्य का सर्वोच्च समाधान है। संक्षिप्त-धर्म-शिक्षा-प्रश्नोत्तरी इस व्यवस्था को उस प्रश्न के उत्तर में प्रस्तुत करती है कि, “मनुष्य का मुख्य उद्देश्य क्या है?” यह उत्तर देता है कि: “मनुष्य का मुख्य उद्देश्य परमेश्वर की महिमा करना और सदा उसके साथ आनन्दित रहना है।”3
इसलिए, मसीहियों आपका सम्पूर्ण जीवन परमेश्वर की महिमा करने के लिए होना चाहिए, और आप यह कार्य आंशिक रूप से अनुशासन दिखाकर और कठोर परिश्रम करके करते हो, तथा आलसी कहलाने से अपने आप को परिभाषित होने से अस्वीकार करते हो। यीशु की दूसरी आज्ञा हमें यह समझने में सहायता करती है कि किस प्रकार का अनुशासन परमेश्वर की महिमा करता है—वह जो अपने पड़ोसी से प्रेम करता है और उसकी उन्नति करता है। इसलिए आपको परिश्रम करना चाहिए कि आप दूसरों की भलाई कर सकें, भौतिक और आत्मिक दोनों रूपों में कर सकें, और ऐसा आप परमेश्वर और दूसरों के प्रति प्रेम के कारण करें।
आप तो यहाँ तक कह सकते हैं कि बाइबल में अनुशासन का यही अर्थ है कि अपने जीवन का उपयोग परमेश्वर और अपने पड़ोसी से प्रेम करने के लिए करना चाहिए। आलस्य पर विजय पाने का यही रहस्य है। क्या आप अपने कार्य को चाहे वह कोई भी कार्य क्यों न हो इसी दृष्टिकोण से करते हैं? या फिर आपके लिए कार्य करने का उद्देश्य केवल वेतन पाना या किसी कार्य को पूरा कर देना मात्र है? हे मेरे मित्र, अपने आप को परख। क्या आप टालमटोल कर रहे हो और आलस्य के आगे घुटने टेक रहे हो? बाइबल आपको केवल औपचारिक रूप से कार्य पूरा करने से बढ़कर कुछ और करने के लिए बुलाती है। आप समय पूरा करते हैं और उत्कृष्टता के साथ कार्य करते हैं, ताकि आप अपने प्रति परमेश्वर की भलाई को प्रकट कर सकें और उन लोगों की आवश्यकताओं को भी पूरा कर सकें जिन्हें उसने आपके अधीन और आपके साथ रखा है। आप परमेश्वर की महिमा करने और अपने पड़ोसी से प्रेम करने के लिए कार्य करते हैं। यदि हमारा कार्य प्रभु को स्वीकार्य और प्रिय होना है, और यदि हम सचमुच आलसी होना छोड़ना चाहते हैं, तो हमारे कार्य करने के पीछे यही उद्देश्य होना चाहिए।
अनुशासन का तरीका
अब हम व्यावहारिक पक्ष की ओर बढ़ना आरम्भ करते हैं, जो अभी से आरम्भ होकर अगले भाग में समाप्त हो जाएगा।
मेरे सबसे बड़े बेटे का जन्म 4 जून, 2024 को हुआ था। उसके जन्म के चौबीस घंटों के भीतर ही मैंने एक बहुत महत्वपूर्ण सबक सीखा: उसे मेरी नींद की बिल्कुल भी चिन्ता नहीं थी … बिलकुल भी नहीं। उसे इससे थोड़ा भी फर्क नहीं पड़ता था कि रात के 2 बज रहे हैं और इस समय यहाँ पर सब सभ्य लोग सो रहे हैं। वह जाग रहा था, और इस तथ्य ने माँग की कि मैं भी जागते रहूँ। आरम्भ के पाँच महीने मेरे और मेरी पत्नी के लिए बहुत अधिक कठिन थे। हम बहुत थके हुए थे। और कार्य भी बहुत अधिक कठिन था।
और फिर भी यह जानते हुए कि हमारे जीवन का उद्देश्य परमेश्वर और अपने पड़ोसियों से प्रेम करना है (विशेषकर उन पड़ोसियों से जो हमारे सबसे निकट हैं, और इस स्थिति में हमारा सबसे निकट पड़ोसी हमारा बेटा ही था) इसने सब कुछ बदल दिया। इसने मुझे यह पूछने से रोक दिया कि, “मैं इतना आलसी क्यों हूँ?” और मुझे कार्य करने में सहायता की। जब मेरा बेटा रात के 2 बजे अचानक जागता था, तब परमेश्वर मुझ से क्या चाहता था कि मैं करूँ? उसे कुछ खाने को देना, उसका लंगोट बदलना, उसे एक गीत सुनाना, या उसे गोद में लेकर सुलाना। क्यों? क्योंकि विश्वास के साथ अपने बेटे की देखभाल करना उसके लिए भलाई थी और इससे परमेश्वर की महिमा होती थी।
एक प्रकार से अनुशासन का तरीका इस बात से आरम्भ होता है कि हर बात को परमेश्वर और पड़ोसी के प्रति प्रेम की कसौटी पर परखा जाए। यह आलस्य पर विजय पाने का आधार है। क्या यह कार्य संसार के सामने परमेश्वर के चरित्र को प्रकट करेगा? क्या यह मेरे पड़ोसी की उन्नति करेगा? अपने आप से ये प्रश्न पूछना न केवल आपको गलत बातों को ना कहने और आलस्य छोड़ने में सहायता करेगा, वरन् यह आपको सही कार्य करते हुए परिश्रम करने के लिए प्रेरित भी करेगा।
सही बातों का उल्लेख करते हुए, यदि मैं यह न कहूँ कि किसी और के लिए आप जो सबसे उत्तम कार्य कर सकते हैं, और जिसके माध्यम से आप परमेश्वर की सबसे अधिक महिमा करते हैं, वह स्वभाव से आत्मिक होता है, तो यह मेरी एक बड़ी भूल होगी। हमें आत्मिक आलस्य के विरुद्ध सतर्क रहना चाहिए। मुझे गलत न समझें, प्यासे को पानी देना, भूखे को भोजन देना, बेघर को आश्रय देना अच्छा है। हर सुबह अपने बच्चों को स्कूल ले जाना, काम पर पानी का जग खाली होने पर उसे फिर से भरना (और कार्य करने में आलसी न होना), बर्फ पड़ने के बाद अपने पड़ोसी के फुटपाथ से बर्फ हटाना, ये सब अच्छे कार्य हैं। सेवा के ये भौतिक कार्य या कठोर परिश्रम का प्रदर्शन जो पड़ोसियों की सेवा करते हैं और इस प्रकार परमेश्वर की महिमा करते हैं, अच्छे कार्य हैं; इसलिए, ऐसे कार्य और भी अधिक करने चाहिए!
परन्तु सबसे महत्वपूर्ण कार्य जो आप कर सकते हैं, वह आत्मिक स्वभाव है। इसका यह अर्थ नहीं है कि इसे पढ़ने वाला हर व्यक्ति अपनी नौकरी या कामकाज छोड़ दे और पास्टर बनने के लिए सेमिनरी चला जाए (हालाँकि आप में से कुछ को ऐसा करना चाहिए!)। इसका अर्थ यह है कि आपके कार्य में आपका सबसे बड़ा उद्देश्य यह होना चाहिए कि आप इस सच्चाई को बताएँ कि परमेश्वर कौन है और दूसरों को यह समझने में सहायता करें कि उसका अनुसरण करने का क्या अर्थ है। अंततः एक मसीही होने के लिए यह विश्वास करना आवश्यक है कि स्वर्ग और नरक वास्तविक स्थान हैं, और पापों की क्षमा पाने का एकमात्र मार्ग यीशु है, और यह भी कि सबसे उत्तम जीवन वही है जो यीशु का अनुसरण करके जिया जाता है। यदि आप इन सब बातों पर विश्वास करते हुए अपने पड़ोसी का कूड़ा तो बाहर निकाल देते हैं, परन्तु उन्हें यह नहीं बताते कि वे परमेश्वर के साथ सही सम्बन्ध कैसे बना सकते हैं, तो वास्तविकता में आपने उनका क्या भला किया?
इस विषय पर मैं अन्त में यह कहना चाहता हूँ कि सेवा के भौतिक और आत्मिक कार्य, या कठोर परिश्रम करना, एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। आप अपने बच्चों को स्कूल क्यों ले जाते हैं? इसलिए कि वे पढ़ना सीखें और अपनी समालोचनात्मक सोचने की क्षमता में आगे बढ़ें। शिक्षा के लाभ तब उन्हें बहुत अधिक सहायता करेंगे, जब वे बड़े हो जाएँगे और उन्हें नौकरी की आवश्यकता होगी। क्या आप जानते हैं कि शिक्षा उन्हें और क्या करने में सहायता करेगी? वे अपनी बाइबल पढ़ेंगे तब वे और भी अधिक जानेंगे कि परमेश्वर कैसा है? तो फिर आपको क्यों यह सुनिश्चित करना चाहिए कि आपके बच्चे शिक्षा ग्रहण करें? ताकि वे समाज को योगदान देने वाले सदस्य बनें और साथ ही वे अपने प्रभु परमेश्वर को जानना और उससे प्रेम करना सीखें।
आइए एक और प्रयास करें ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि आप बात को समझ गए हैं। आप शनिवार की सुबह देर तक सोने के बजाय अपने समुदाय के स्थानीय निशुल्क भोजनालय में बेघर लोगों को नाश्ता क्यों परोसते हैं? आलस्य की कला का अभ्यास करने के बजाय? एक उचित उद्देश्य यह होना चाहिए कि जो भूखे हैं वे तृप्त होकर जाएँ! लेकिन आपका इससे भी बड़ा उद्देश्य यह होना चाहिए कि जिन लोगों की आप सेवा कर रहे हैं, वे आपकी सेवा के कार्यों और आपकी बातों में यीशु की झलक देखें और सुनें, उसी यीशु के विषय में जो “जीवन की रोटी” है (यूहन्ना 6:35)।
आप देखिए, कि आपका परिश्रम का फल जो भौतिक सेवा के कार्य हैं, वे आत्मिक सेवा की पूर्ति करते हैं। आप अपने जीवनसाथी, अपने बच्चों, अपनी कलीसिया, अपने नियोक्ता, अपने मित्रों और अपने समुदाय की सेवा करने के लिए कार्य करते हैं, ताकि परमेश्वर की महिमा हो और उनका जीवन अधिक उत्तम हो सके; और साथ ही आप उन्हें यीशु में मिलने वाले अनन्त जीवन की ओर भी ले जाते हैं। यदि आप उनके लिए परिश्रम करें, तो आपके लिए बहुत सी आशीषें रखी हैं। परन्तु इसमें कोई गलती न करें, आलसी होना आपको इन सभी से वंचित कर देगा। यदि आप दूसरों के लिए परिश्रम करते हैं, तो आप उन्हें परमेश्वर में इस प्रकार से बढ़ा सकते हैं कि वे उसके अनुग्रह को देखें और उसे ग्रहण करें, साथ ही उनकी भौतिक आवश्यकताएँ भी पूरी हों। परन्तु यदि आप आलसी बने रहना चाहते हैं, तो आप इतना बड़ा प्रभाव डालने की बात भूल ही जाइए।
इससे हम यह सीखते हैं कि आलस्य भले ही अपने लाभ का लगता है, लेकिन वास्तव में इसकी बहुत बड़ी क़ीमत चुकानी पड़ती है। आलस्य को छोड़ना सीखने के लिए यह एहसास बहुत ही अधिक महत्वपूर्ण है। आलस्य का प्रलोभन कहता है कि, “आपके लिए अभी अपने आप पर ध्यान देना अच्छा है इसलिए वह मत करो जो आपको करना चाहिए।” परन्तु इस बात के लिए हाँ कहने का अर्थ है कि आप अपने परिश्रम के द्वारा दूसरों को आशीष देने और इस प्रकार परमेश्वर की महिमा करने का अवसर गँवा देंगे। यदि आप ऐसे अवसर को गँवा देते हैं, तो केवल दूसरों को ही नहीं, वरन् आपको भी इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी। स्मरण रहे कि आप वास्तव में कभी भी अपनी सेवा तब तक नहीं कर सकते, जब तक कि आप वह कार्य न करें जिसके लिए परमेश्वर ने आपको बनाया है, और उसने आपको इसलिए बनाया है, ताकि आप उससे और अपने पड़ोसी से प्रेम करें।
ठीक है, इस भाग में हमने कहा है कि कठोर परिश्रम करने के पीछे का कारण परमेश्वर की महिमा और दूसरों का भला करना है। हमने यह भी देखा है कि ये दोनों उद्देश्य आपस में जुड़े हुए हैं और ऐसे मापदण्ड बनाते हैं, जिसके द्वारा हम समझना आरम्भ कर सकते हैं कि हमें किन कार्यों के लिए हाँ कहना चाहिए; इससे हमें टालमटोल और आलस्य पर विजय पाने में सहायता मिलती है। अन्त में, हमने यह भी देखा कि हम जो सबसे महत्वपूर्ण कार्य कर सकते हैं, वह स्वभाव में आत्मिकता है, हालाँकि, यह अक्सर भौतिक कार्यों के साथ-साथ और उनके माध्यम से ही संपन्न होता है।
इसलिए, आपको कठोर परिश्रम करने और अनुशासन बनाए रखने के लिए प्रेरित होना चाहिए। आपके पास इस बात का कुछ वैचारिक अनुमान भी होना चाहिए कि इसके लिए क्या आवश्यक होगा। हमारे अगले और अन्तिम भाग में, हम एक ऐसी कार्य-योजना पर दृष्टि डालेंगे, जिसकी सहायता से आप उस दिशा में कदम बढ़ाना आरम्भ कर सकते हैं।
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मनन के लिए प्रश्न:
- परमेश्वर से प्रेम करने और अपने पड़ोसी से प्रेम करने के बीच क्या सम्बन्ध है?
- अपने कार्य को दूसरों की उन्नति के रूप में देखने से आपको कठोर परिश्रम करने की प्रेरणा कैसे मिलती है और आप यह पूछना कैसे बन्द कर देते हैं कि “मैं इतना आलसी क्यों हूँ?”
- भौतिक कार्य का आत्मिक कार्य से क्या सम्बन्ध है?
- आत्मिक कार्य वह सबसे महत्वपूर्ण कार्य क्यों है जिसे हम कर सकते हैं?
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भाग IV: कार्य-योजना
अब कुछ सच्ची और स्पष्ट बातें करने का समय है। अब तक हमने जिन अधिकाँश बातों पर चर्चा की है, वे मसीहियों के लिए अनिवार्य हैं। उदाहरण के लिए परमेश्वर से प्रेम करना और अपने पड़ोसी से प्रेम करना वैकल्पिक नहीं, वरन् अनिवार्य है। अब हम यह बताने जा रहे हैं कि आप एक अधिक अनुशासित व्यक्ति बनने और आलस्य को छोड़ना सीखने के लिए कैसे आरम्भ कर सकते हैं। मैं सच में मानता हूँ कि ये बातें आपकी सहायता कर सकती हैं, पर मैं नहीं चाहता कि आप यह सोचें कि ये पूरी रीति से अचूक (हर हाल में कार्य करने वाली) निश्चितिता है। इसके अलावा, मैं नहीं चाहता कि आपको यह लगे कि अनुशासन में बढ़ने के लिए केवल यही बातें हैं जो आप कर सकते हैं या करनी चाहिए। हम अधिक अनुशासित बनने के लिए अनेक व्यावहारिक बातें कर सकते हैं। हम अधिक अनुशासित बनने के लिए कई व्यावहारिक कदम उठा सकते हैं। अतः इन्हें आरम्भिक बिंदु मानें और यहीं से आगे बढ़ें।
योजना बनाएँ
यह आश्चर्य की बात है कि बिना योजना के आप कितना कम प्राप्त कर पाते हैं। प्रायः किसी उद्देश्य का होना एक योजना के सहारे ही आगे बढ़ता है। मेरे मित्र, यदि आप आज एक आलसी व्यक्ति हैं, जो काम को टालने और आलस्य से संघर्ष कर रहे हैं, तो कल एक अनुशासित व्यक्ति बनने के लिए आपको किसी न किसी रूप में एक योजना की आवश्यकता होगी।
मैं आपको पहले ही बता चुका हूँ कि मेरा पुत्र 4 जून 2024 को जन्मा था। उसके तीन महीने बाद एक अद्भुत घटना घटी। मैंने अपनी पत्नी को आधे मैराथन दौड़ में दौड़ते हुए देखा; जब वह अन्तिम रेखा पार कर रही थी, तब उसकी गोद में हमारा तीन महीने का बच्चा था (नहीं, वह पूरे 13.1 मील तक उसके साथ नहीं दौड़ा—मैंने उसे अन्तिम 100 गज की दूरी पर उसे दे दिया था)। उसे यह सब करते हुए देखकर मैं जितने गर्व से भर गया, उतना गौरवान्वित शायद पहले मैं कभी नहीं हुआ था। उस दिन मैं उसके साथ उस दौड़ से यह सोचकर निकला कि, “मुझे भी एक मैराथन दौड़नी चाहिए। यदि वह कर सकती है, तो मैं भी कर सकता हूँ।”
परन्तु केवल एक समस्या थी—कि मुझे दौड़ना बिल्कुल पसन्द नहीं था। मैं हँसी-हँसी में कहा करता था कि, “मैं केवल तब दौड़ता हूँ जब मैं बास्केटबॉल को टपकाते हुए आगे बढ़ता हूँ या जब मेरा पीछा किया जाता है।” मुझे दौड़ने का हर पहलू नापसन्द था। ऐसा लगता था कि आलस्य की कला ही मेरे स्वभाव के अधिक निकट है। लेकिन मैंने एक मैराथन दौड़ने का निश्चय किया! मैंने जल्दी ही यह सीखा: कि बिल्कुल भी न दौड़ने से लेकर 26.1 मील दौड़ने तक की यात्रा तय करने के लिए एक योजना की आवश्यकता है—अर्थात् एक ऐसी योजना जो हज़ारों अलग-अलग क़दमों से मिलकर बनी हो। ऐसा लगता है कि 26.1 मील की दूरी में सब कुछ सम्मिलित होता है: जैसे आहार, नींद, शरीर का खींचाव, धीमी दौड़, तेज़ दौड़, बीच-बीच की दौड़, और हाँ—बहुत सारी बर्फ और आईबुप्रोफेन नामक दवा।
यह बात मैंने बहुत कठिनाई से सीखी कि मुझे एक योजना की आवश्यकता है। आप मैराथन कैसे दौड़ते हैं? अच्छा, आप अपनी पहली दौड़ दौड़ते हैं और केवल जितना दूर और जितना तेज़ हो सके दौड़ते हैं, जब तक कि आप 26.1 मील तक दौड़ने के योग्य नहीं हो जाते हैं। फिर आप यही प्रतिदिन करते रहते हैं, जब तक कि दौड़ने का दिन न आ जाए। मेरी पहली दौड़ 2 मील की थी, और मुझे पूरा विश्वास था कि यही दौड़ मेरा अन्त कर देगी। मुझे जल्दी ही यह समझ आ गया था कि यदि मुझे सच में लम्बी दूरी तक दौड़ना है, तो गति को संतुलित रखना, हृदय गति के अनुसार अभ्यास करना, बीच-बीच में विश्राम करना और धीरे-धीरे अभ्यास बढ़ाना आवश्यक था। ये सभी बातें भी उस योजना में सम्मिलित करनी थीं।
अनुमान लगाइए की क्या हुआ होगा? सन् 2025 में मैंने अपनी पहली दो मैराथन दौड़ दौड़ी (हालाँकि धीरे-धीरे ही सही)! यह कभी सम्भव नहीं होता यदि मेरे पास कोई योजना न होती। मुझे और आपको आलस्य पर विजय पाने के लिए अपने प्रयासों को सही दिशा देने के लिए एक योजना की आवश्यकता होती है।
ठीक है, तो आप अनुशासित होना चाहते हैं और इसके लिए एक योजना की आवश्यकता होती है। एक अच्छी योजना में क्या-क्या सम्मिलित होता है? पहला, आपको सबसे महत्वपूर्ण चीज़ों को प्राथमिकता देनी चाहिए। दूसरा, आपको यह तय करना चाहिए कि आप अपना समय कैसे बिताएँगे। तीसरा, आपको ध्यान भटकाने वाली बातों को सीमित करना चाहिए और बहाने बनाने बन्द करने चाहिए (जैसे यह कहना कि यह केवल एकाग्रता की कमी या आलस्य है)। और अन्त में, सुधार के लिए आपको मूल्याँकन करना चाहिए। अब इन बातों को विस्तार से समझते हैं।
प्राथमिकताओं से आरम्भ करते हैं। यदि आप मसीही व्यक्ति हैं, तो आपका सर्वोच्च लक्ष्य अपने परमेश्वर से प्रेम करना है, और आप यह उसके वचन और प्रार्थना में समय बिताए बिना नहीं कर सकते हैं। बहुत से मसीही लोग इन आत्मिक अनुशासनों के लिए सुबह का समय सबसे उत्तम मानते हैं। लेकिन बाइबल यह निर्धारित नहीं करती कि आपको किस समय पढ़ना चाहिए। यदि कुछ कहा जाए तो, पवित्रशास्त्र से हमें यह चित्रण मिलता है कि हमें हर समय परमेश्वर के वचन में बने रहना चाहिए। यहोशू ने इस्राएल की सन्तान से कहा, “व्यवस्था की यह पुस्तक तेरे चित्त से कभी न उतरने पाए, इसी में दिन-रात ध्यान दिए रहना, इसलिए कि जो कुछ उसमें लिखा है उसके अनुसार करने की तू चौकसी करे; क्योंकि ऐसा ही करने से तेरे सब काम सफल होंगे, और तू प्रभावशाली होगा” (यहो. 1:8)। इसी प्रकार पौलुस ने कुलुस्सियों को लिखा, “मसीह के वचन को अपने हृदय में अधिकाई से बसने दो…”(कुल.3:16)। यदि आप कभी बाइबल पढ़ने या प्रार्थना करने में समय नहीं बिताते हैं तो आप परमेश्वर के वचन पर कैसे मनन कर सकते हैं या मसीह के वचन को अपने हृदय में अधिकाई से कैसे बसने देंगे?
मेरे मित्र, यदि आप आत्मिक बातों में अनुशासन नहीं रखते और आत्मिक आलस्य के आगे झुक जाते हैं, तो अन्य बातों में आपका अनुशासन बहुत कम महत्व रखता है। इसलिए, अपने आप से यह पूछिए कि प्रतिदिन शान्त समय बिताने के लिए आपके लिए सबसे उत्तम समय कब होता है? यदि आप प्रतिदिन परमेश्वर के वचन और प्रार्थना में समय बिताने के आदी नहीं हैं, तो प्रतिदिन पंद्रह मिनट से आरम्भ कीजिए, जिसमें आप वचन पढ़ें और प्रार्थना करें। चाहे दिन का कोई भी समय हो, यह सुनिश्चित कीजिए कि आप अनुशासित रहें और ऐसा प्रतिदिन करें।
दूसरी प्राथमिकता जिस पर मैं आपको ध्यान देने के लिए प्रोत्साहित करूँगा, वह आपका परिवार है। आप एक जीवनसाथी, माता-पिता या भाई-बहन हो सकते हैं। आप निश्चित रूप से एक पुत्र या पुत्री हो सकते हैं। आप जो भी हैं, परन्तु अपने परिवार के सम्बन्धों को दृढ़ बनाने पर ध्यान दीजिए। परमेश्वर ने जिन्हें आपको दिया है, उनकी सेवा कीजिए। अपने परिवार के सदस्यों की आवश्यकताओं के समय उनकी देखभाल और सहायता करने का प्रयास कीजिए। उनके लिए परिश्रम को प्राथमिकता दीजिए, बजाय उन बिना उद्देश्य वाली गतिविधियों के जैसे लगातार व्यर्थ में फोन को नीचे से ऊपर करके देखते रहना, जो अक्सर आलस्य के सामान्य कारण होते हैं। यह मेरे लिए एक चुनौती हो सकती है। लम्बे दिन के बाद, मुझे कार्य करने में आलस्य महसूस हो सकता है और मैं घर आकर किसी शान्त कमरे में बैठना और समाचार देखना या पढ़ना पसन्द कर सकता हूँ। लेकिन क्या आप जानते हैं कि मेरा छोटा बच्चा मुझे कहाँ देखना चाहता है? भूमि पर पड़े खिलौनों के साथ खेलते हुए, या कम्बल से बने छोटे-छोटे किले बनाते हुए, या बड़े-बड़े ट्रक और छोटे द्वीप की कहानी पढ़ते हुए। आप क्या सोचते हैं कि कौन सा विकल्प उत्तम है? हर बार अपने बच्चे की सेवा करना। आपके जीवन में ऐसे जो भी अवसर आएँ, उन्हें अपनाइए और आलस्य करना छोड़ दीजिए।
तीसरी प्राथमिकता, जिसमें मैं आपको अनुशासित रहने के लिए दृढ़ता से प्रोत्साहित करना चाहता हूँ, वह अपनी कलीसिया के अन्य सदस्यों की देखभाल करना है। नया नियम “एक-दूसरे” से सम्बन्धित आज्ञाओं से भरा हुआ है। ये वे दायित्व हैं जो कलीसिया के सदस्यों के एक-दूसरे के प्रति होते हैं। जैसे एक-दूसरे से प्रेम करो। एक-दूसरे की सेवा करो। एक-दूसरे के लिए प्रार्थना करो। एक-दूसरे को समझाओ। इन आज्ञाओं के सामूहिक महत्व को देखते हुए हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि हमारी कलीसियाओं की सदस्यता हमारे लिए एक बहुत बड़ी बात है! आप सोच रहे होंगे कि, “सदस्यता का अनुशासन से क्या लेना-देना है?” रविवार की सुबह जब आप कलीसिया जाने के बजाय देर तक सोने या अपने सहकर्मियों या मित्रों के साथ गोल्फ़ खेलने के लिए ललचाते हैं, तो इसका इससे बहुत कुछ लेना-देना होता है। जब आपके सामने अपने स्वार्थ की सेवा करने या अपनी कलीसियाई परिवार की सेवा करने का विकल्प हो, तो आत्मिक आलस्य के आगे न झुकें; अनुशासित रहें और अपनी कलीसियाई परिवार की सेवा करें।
चौथी प्राथमिकता जिसमें आपको अनुशासित होना चाहिए, वह आपका कार्य है। चाहे आपका व्यवसाय चिकित्सक हो, वकील हो, या घर पर रहकर बच्चों की देखभाल करने वाला अभिभावक हो, परमेश्वर ने आपको यह कार्य दिया है, और आपको उसे उसके लिए ही करना चाहिए। इसका अर्थ है कि आप कार्य करने में किसी प्रकार की ढिलाई नहीं करते हैं और न ही अपने नियोक्ता के कार्य के समय का दुरुपयोग करते हैं। आप आलस्य नहीं करते। आप झूठ नहीं बोलते। आप अपने सहकर्मियों की बदनामी नहीं करते। आप गुस्से में अपने बच्चों को अनुशासित नहीं करते। आप टालमटोल और आलस्य करने से बचते हैं। सकारात्मक रूप से, इसका अर्थ है कि अपनी ओर से सर्वश्रेष्ठ करना। अपने आसपास के लोगों का जीवन बेहतर बनाने के लिए जो कुछ आप कर सकते हैं, वह करें। अपनी कम्पनी या परिवार के भले के लिए विचार करें और परिश्रम में योगदान दें।
“9 से 5” के समय में आप जो भी करें, उसे पूरे मन से करें और परमेश्वर की महिमा के लिए करें।
आपको इन सभी प्रत्येक क्षेत्रों में भलाई की योजना बनानी चाहिए। उन व्यावहारिक तरीकों के बारे में सोचें जिनसे आप मसीह के अधिक अनुशासित अनुयायी, एक बेहतर जीवनसाथी, माता-पिता या सन्तान, कलीसिया के सदस्य और एक कार्यकर्ता बन सकते हैं; और यह सीखें कि आलस्य करना कैसे छोड़ना है। इन बातों को लिखकर आलस्य पर विजय पाने की एक योजना बनाइए और फिर कार्य आरम्भ कीजिए।
जवाबदेही खोजें
ठीक है, एक योजना बनाएँ, ऐसा करना अच्छा है। अगला कदम यह है कि अपनी योजना किसी और व्यक्ति के साथ साझा करें। आप किसी ऐसे व्यक्ति से आरम्भ कर सकते हैं जो पहले से ही आपके निकट है, जैसे कि आपका जीवनसाथी; या इसके लिए एक उत्तम स्थान आपकी कलीसिया हो सकती है। अपने किसी सहकर्मी सदस्य से कहें कि वह आपकी योजना की समीक्षा करे और आपको उत्तरदायी बनाए रखे। इस सम्बन्ध में, मेरा विचार है कि हम अक्सर यह समझ लेते हैं कि हमारे कार्यों से हमारे साथी कलीसिया के सदस्यों का कोई लेना-देना नहीं है। हो सकता है कि हमें इस बात से कोई आपत्ति न हो कि कोई हमसे हमारे प्रार्थना-जीवन या हमारे प्रचार-कार्य के बारे में पूछे, लेकिन बेहतर यही होगा कि वे हमारे पैसों, हमारी खाने-पीने की आदतों या हमारे पारिवारिक सम्बन्धों के विषय में न पूछें। मेरे मित्र, यदि आप इस प्रकार की “निजी” मसीहियत को अपनाने की लालसा कर रहे हैं, जिसमें आप अपनी टालमटोल और आलस्य को छिपाते हैं, तो मैं आपको विशेष रूप से यह सलाह दूँगा कि आप अपनी कलीसिया में किसी भरोसेमंद व्यक्ति को ढूँढें, और अनुशासन में आगे बढ़ने की अपनी पूरी योजना उनके साथ स्पष्टता से साझा करें। इससे न केवल आप जवाबदेही होंगे, जो आलस्य को दूर करने और अनुशासन में बढ़ने के लिए बहुत सहायक होती है, वरन् आप यह भी सीखेंगे कि आप दूसरों के साथ कैसे व्यवहार करेंगे, जैसे वे आपके साथ करते हैं। अनुशासन और पारदर्शिता में बढ़ने के लिए जवाबदेही आवश्यक है, और आत्मिक रूप से बढ़ने के लिए परस्पर निर्भरता भी आवश्यक है। इस प्रकार यहाँ हमें एक साथ दो चीजों का विशेष लाभ मिलता है!
अक्सर प्रार्थना करें
मुझे यह देखकर आश्चर्य होता है कि मैं कितनी बार इस भ्रम में रहता हूँ कि मैं प्रार्थना के बिना भी आगे बढ़ सकता हूँ। मुझे आश्चर्य होता है कि क्या आप भी कभी मेरे ही समान होते हैं और यह पूछते हैं कि “मैं इतना आलसी क्यों हूँ,” लेकिन इस सम्बन्ध में प्रार्थना नहीं करते हैं। मेरे मित्र, अनुशासन में आगे बढ़ने और आलस्य को दूर करना सीखने के लिए उस सामर्थ्य की आवश्यकता होती है जो आपके पास नहीं है, और उस बुद्धि की भी आवश्यकता होती है, जिसे आप अपने प्रयास से उत्पन्न नहीं कर सकते हैं। मैराथन दौड़ के बारे में मुझे एक और बात बतानी है। मैं वर्तमान में अपनी तीसरी दौड़ के लिए पंजीकृत हूँ। इस बार अन्तर यह है कि मैंने एक प्रशिक्षक रखा है। योजना बहुत अधिक विस्तृत थी, और अपने प्रशिक्षण को बेहतर बनाने के लिए मेरे पास पर्याप्त जानकारी नहीं थी। इसलिए मैंने एक प्रशिक्षक रखा, जिसे मैं फ़ोन करके पूछ सकता था कि, “मुझे यहाँ क्या करना चाहिए?”
हम पहले ही इस विषय में बात कर चुके हैं कि अनुशासन में आगे बढ़ने के लिए परमेश्वर के वचन के पास जाना (आलस्य पर बाइबल के वचन पढ़ना) और प्रार्थना करना आवश्यक है। यहाँ मैं इस बात पर विशेष बल देना चाहता हूँ कि अनुशासन में बढ़ने के लिए विशेष रूप से परमेश्वर से सहायता माँगने के लिए प्रार्थना करना आवश्यक है। दिन की शुरुआत में, कुछ इस प्रकार से प्रार्थना करें: “हे प्रभु, मैं जानता हूँ कि मुझे समय बर्बाद करने और आलस्य करने की आदत है। कृपया आज मेरी सहायता कर कि मैं तुझे और दूसरों को उस पूरी सामर्थ्य के साथ सेवा कर सकूँ जो तूने मुझे दी है।” फिर, जब आप कार्य आरम्भ करें, तो प्रभु से कहें: “हे प्रभु, क्या मेरे लिए इस कार्य में समय बिताना बुद्धिमानी है? क्या इस कार्य से तेरी महिमा होती है, या मुझे कुछ और ही करना चाहिए? हे प्रभु, मुझे बाइबल के अनुसार आलस्य से बचने में सहायता कर। मुझे बुद्धि की आवश्यकता है, कृपया मुझे दें!” याकूब लिखता है, “पर यदि तुम में से किसी को बुद्धि की घटी हो, तो परमेश्वर से माँगो, जो बिना उलाहना दिए सब को उदारता से देता है; और उसको दी जाएगी” (याकूब 1:5)।
अनुशासन को अक्सर ऐसा मान लिया जाता है जिसे आप अपनी ही सामर्थ्य से, आलस्य के कारणों को ठीक करने के लिए करते हैं। मसीही अनुशासन ऐसा बिल्कुल नहीं है। क्योंकि मसीहियत इस विश्वास पर आधारित है कि आपके पास ऐसी कोई सामर्थ्य नहीं है जो परमेश्वर से न आती हो। क्या आप अनुशासन में आगे बढ़ना चाहते हैं? तो आपको प्रभु की सहायता की आवश्यकता होगी। इसलिए, प्रार्थना करें। बहुत अधिक प्रार्थना करें। प्रभु अपने बच्चों की प्रार्थनाएँ सुनता है और उन्हें उत्तर देने से आनन्दित होता है।
विश्राम
अन्त में, अनुशासन की अपनी इस खोज में मैं आपको प्रोत्साहित करना चाहूँगा कि स्मरण रखे कि विश्राम भी आवश्यक है। परमेश्वर ने आपको यह जीवन इसलिए दिया है, ताकि आप सेवा के माध्यम से उसकी महिमा करें; और सेवा के लिए अनुशासन आवश्यक है। परन्तु यह सच है कि परमेश्वर ने आपको विश्राम भी दिया है, ताकि आप अपने शरीर और आत्मा को फिर से तरोताज़ा कर सकें। आप हर बार पूर्ण सफलता नहीं पाएँगे, और यदि आप लगभग सफलता के बहुत निकट पहुँच भी जाएँ, तब भी कभी-कभी आपको बैठकर विश्राम करने की आवश्यकता है। कभी-कभी आपको केवल उस चीज़ का आनन्द लेना होता है जो परमेश्वर ने आपको दिया है, चाहे वह कोई पुस्तक हो, कोई चलचित्र हो, थोड़ी नींद हो या फिर सैर करना हो। मैं अपनी कलीसिया में एक समुदाय के समूह की अगुवाई करता हूँ और हम वर्तमान में सभोपदेशक की पुस्तक का अध्ययन कर रहे हैं। निश्चित ही, सभोपदेशक की पुस्तक में कार्य और आलस्य के विषय में बहुत कुछ कहा गया है, और बाइबल आलस्य के विषय में क्या सिखाती है, यह भी स्पष्ट रूप से बताती है। परन्तु मुझे लेखक की उस बात की स्पष्ट दिशा ने प्रभावित किया, जो विश्राम और परमेश्वर के द्वारा दिए गए वरदानों के आनन्द लेने के विषय में है। वह लिखता है, “सुन, जो भली बात मैंने देखी है, वरन् जो उचित है, वह यह कि मनुष्य खाए और पीए और अपने परिश्रम से जो वह सूर्य के नीचे करता है, अपनी सारी आयु भर जो परमेश्वर ने उसे दी है, सुखी रहे क्योंकि उसका भाग यही है” (सभ.5:18)।
विश्राम मुझे मेरे द्वारा बताई गई इस बात का स्मरण दिलाता है कि हम परमेश्वर पर निर्भर हैं। विश्राम हमारे शरीर और आत्मा को फिर से तरोताजा कर देता है। विश्राम हमें तब प्रोत्साहित करता है, जब हम थककर पूरी रीति से टूटकर प्रलोभन में पड़ सकते हैं। विश्राम परमेश्वर की महिमा करता है, क्योंकि यह हमें उस वस्तु का आनन्द लेने का अवसर देता है जो परमेश्वर ने हमें दी है।
इसलिए, मेरे मित्र, अनुशासन के प्रयास में विश्राम को अनदेखा न करें। उचित मात्रा में विश्राम आपको आलसी नहीं बनाता, और न ही आपको आलसी होने के लिए दोषी ठहराता है। वास्तव में, उचित विश्राम अनुशासित रहने और टालमटोल तथा आलस्य से बचने के लिए आवश्यक है। इसलिए, विश्राम करें और उस वस्तु का आनन्द लें जो परमेश्वर ने आपको दी है।
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चिन्तन के लिए प्रश्न:
- आलस्य छोड़ने की इस योजना का कौन सा भाग आपको सबसे कठिन लगता है? और क्यों?
- क्या आपने पहले कभी जवाबदेही का अनुभव किया है? यदि हाँ, तो किस रूप में किया? आपको यह कैसे सहायक लगा?
- अभी आपके जीवन में ऐसा कौन है, जिसके प्रति आप जवाबदेह हो सकते हैं?
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निष्कर्ष
अनुशासन वह चीज़ है जिसका आपको अपने पूरे जीवन भर पीछा करना होगा। ऐसा नहीं है कि किसी दिन आप अनुशासन के लिए कोई पुरस्कार जीत लेते हैं और फिर अपने शेष जीवन भर अपनी उपलब्धियों के लिए विश्राम करते रहते हैं। नहीं, अनुशासित लोग इसलिए अनुशासित होते हैं क्योंकि वे उस कार्य को करने के लिए लगातार “हाँ” कहते हैं जिसे उन्हें करना चाहिए, और तब करते हैं जब उसे करना चाहिए। कोई भी सिद्ध नहीं है, परन्तु वास्तविक उन्नति सम्भव है, जिससे हम इस प्रकार के अनुशासन से पहचाने जा सकते हैं और आलस्य पर सफलतापूर्वक विजय प्राप्त कर सकते हैं। और हमें ऐसा बनना ही चाहिए, क्योंकि अनुशासन से परमेश्वर की महिमा होती है। यह इस बात को स्पष्ट करता है कि हम परमेश्वर के स्वरूप में बनाए गए हैं। यह हमारे आसपास के लोगों की भी सेवा करता है। और अन्त में, अनुशासित होकर हम स्वयं उन्नति करते हैं और आलस्य करना छोड़ देते हैं।
आपने आलस्य पर विजय पाने के लिए इस पूरी मार्गदर्शिका को पढ़ लिया है। अब आप क्या करेंगे? मैं प्रार्थना करता हूँ कि उत्तर यह हो कि आप परमेश्वर की महिमा और दूसरों के भले के लिए कार्य करेंगे।
अन्तिम टिप्पणियाँ
- मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि संसार में अपनी सृजनात्मक कार्य से बाहर परमेश्वर का अस्तित्व आलस्य से भरा हुआ था, या कि उसने केवल उसी समय कार्य करना आरम्भ किया जब उसने रचना की। वरन् मैं परमेश्वर के उस स्वतंत्र निर्णय पर विचार कर रहा हूँ जिसमें उसने अपने आनन्द के लिए संसार की रचना करने हेतु अपने आप से बाहर कार्य किया। उसका यह चुनाव स्वतंत्र था, क्योंकि उस पर कार्य करने की कोई बाध्यता नहीं थी। फिर भी उसने कार्य किया।
- जक, रॉय बी. द स्पीकर्स कोट बुक: सभी अवसरों के लिए 4,500 से अधिक दृष्टांत और उद्धरण। ग्रैंड रैपिड्स, एम्.आई: क्रेगेल पब्लिकेशन्स, 1997।
- वेस्टमिंस्टर संक्षिप्त-धर्म-शिक्षा-प्रश्नोत्तरी: पवित्रशास्त्र के प्रमाणों सहित। तीसरा संस्करण। ओक हार्बर, डब्लू.ए: लोगोस रिसर्च सिस्टम्स, निगमित।, 1996।
लेखक के बारे में
टेलर हार्टली वॉशिंगटन, डी.सी. में 9मार्क्स में संपादकीय निदेशक के रूप में सेवा करते हैं। वे अपनी पत्नी रैचल के साथ विवाहित हैं, और दोनों का एक पुत्र है, जिसका नाम बोदे है। टेलर ने साउदर्न बैपटिस्ट थियोलॉजिकल सेमिनरी से एम.डिव. किया है और वर्तमान में वे यूनाइटेड किंगडम लन्दन सेमिनरी में एम. टीएच. कर रहे हैं।
विषयसूची
- भाग I: हमारे कार्य के लिए परमेश्वर का उद्देश्य
- परमेश्वर कार्य करने वाला
- परमेश्वर ने हमें अपने समान कार्य करने के लिए सृजा है।
- परमेश्वर हमें उसकी महिमा के लिए कार्य करने हेतु बुलाता है
- मनन के लिए प्रश्न:
- भाग II: आलस्य क्या है और यह क्यों होता है?
- आलस्य क्या है?
- आलस्य क्यों होता है?
- आलस्य के क्या परिणाम होते हैं?
- मनन के लिए प्रश्न:
- भाग III: अनुशासन क्यों और कैसे
- अनुशासन क्यों
- अनुशासन का तरीका
- मनन के लिए प्रश्न:
- भाग IV: कार्य-योजना
- योजना बनाएँ
- जवाबदेही खोजें
- अक्सर प्रार्थना करें
- विश्राम
- चिन्तन के लिए प्रश्न:
- निष्कर्ष
- अन्तिम टिप्पणियाँ
- लेखक के बारे में