#59 सीमाओं को निर्धारित करना: रिश्ते खराब किए बिना न कैसे कहे

By ERIC YEE (एरिक यी)

परिचय

शोंडा राइम्स कहती हैं कि “एक शब्द की शक्ति अद्भुत होती है।” वह स्वयं को एक “दिग्गज” मानती हैं, जो संसार भर में टीवी के चार नाटक, सत्तर घण्टे के कार्यक्रम और हर दौर में 35 करोड़ डॉलर की कमाई करती हैं।

वह एक शब्द क्या है?

“‘हाँ’ ने मेरा जीवन बदल दिया।’ हाँ’ ने मुझे बदल दिया।”1

परन्तु फिर, वॉरेन बफेट, जो जाने-माने निवेशक और परोपकारी व्यक्ति हैं, जिनकी कुल सम्पत्ति लगभग 150 अरब डालर है, इसके बिलकुल उलट ही तर्क देते हैं।

“सफल लोगों और सचमुच सफल लोगों में यही अन्तर है कि सचमुच सफल लोग लगभग हर बात के लिए ‘न’ कहते हैं।”2

कुछ लोग “हाँ” वाली छावनी में रहते हैं (कुछ लोकप्रिय फिल्मों के सन्देश के बारे में विचार करें3), और कुछ लोग “नहीं” वाली छावनी में रहते हैं (उत्पादकता सम्बन्धी बहुत सी पुस्तकों पर परामर्श के बारे में सोचें)।

अत:, इसमें से कौन सी सही रहेगी?

इस जीवन कौशल मार्गदर्शिका का शीर्षक न कहना रखा गया है, तो आपको यह लग सकता है कि हम नहीं वाली छावनी का समर्थन कर रहे हैं, परन्तु यह बिलकुल सत्य नहीं है।

हमारी रूचि किसी छावनी में शामिल होने में नहीं है, बल्कि अपने सृष्टिकर्ता, प्रभु परमेश्वर के साथ स्वयं को जोड़ने में है—जिसके स्वरूप में हमें रचा गया है।

तो क्या परमेश्वर हमसे हाँ करवाना चाहता है या न करवाना चाहता है?

वैसे, यह तो निर्भर करता है। किसे हाँ कहना है या किसे न कहना है? क्या करने के लिए कहना है? किस स्थिति में कहना है? किस क्षण में कहना है? किस कारण से कहना है?

और यह देखते हुए कि इस जीवन कौशल मार्गदर्शिका का उपशीर्षक रिश्ते खराब किए बिना सीमाएँ निर्धारित करना है, जिससे आपको लग सकता है कि सीमाएँ ठहराना हमेशा ही एक अच्छी बात है, परन्तु यह इतनी सरल बात नहीं है।

हाँ, यीशु ने कुछ सीमाएँ ठहराई थीं, विशेष रूप से जब शोर मचाती भीड़ उसका ध्यान खींचने का प्रयास कर रही होती थी, तब “वह जंगलों में अलग जाकर प्रार्थना किया करता था” (लूका 5:15-16; और इसकी तुलना मर. 1:35-39 से करें)।4 परन्तु उसने अपनी व्यक्तिगत् सीमाएँ भी तोड़ी थीं; एक प्रसिद्ध घटना के अनुसार, यद्यपि यीशु अपने शिष्यों के साथ आराम करने के लिए एक जंगल में चला गया था, तौभी शाम ढलने तक उसने वहाँ लोगों को शिक्षा दी, उन्हें चंगा किया और पाँच हज़ार पुरुषों को भोजन खिलाया (यदि स्त्रियों और बच्चों को भी गिनें, तो यह संख्या और भी अधिक होगी!) (मत्ती 14:13-21; मर. 8:30-44; लूका 9:10-17; यूह. 6:1-13)।5

अत:, मसीही होने के नाते, हम इसका अर्थ कैसे समझें?

संक्षेप में कहें तो, बुद्धिमानी का अर्थ केवल हाँ कहना या न कहना नहीं है। मैं जानता हूँ कि हम सोचेंगे कि यह इतना ही आसान है, परन्तु ऐसा नहीं है।

आप स्वयं को किस ओर अधिक झुके हुए पाते हैं? हाँ की ओर या नहीं की ओर? सम्भवत: आप स्वयं में ही जानते हैं कि अपने आप से और अधिक की लगातार अपेक्षा करना कैसा लगता है। आप देर रात तक जागते हैं और सुबह जल्दी उठ जाते हैं, और तिस पर भी आपको लगता है कि दिन में इतना समय नहीं है कि आप उन सभी कामों को पूरा कर सकें, जिनके लिए आपने हाँ कहा है। आप स्वयं से कहते हैं कि यह बस व्यस्तता का एक दौर है, परन्तु यह दौर असल में कभी समाप्त ही नहीं होता। सम्भव है कि आप पहले से ही थक गए हों।

मेरा भरोसा करें कि मैं इस दौर से होकर गुजर चुका हूँ। क्योंकि आप बाकी सब बातों को न कहने के लिए इच्छुक नहीं थे, इसलिए मैं जानता हूँ कि जब आपका मन और शरीर आखिरकार आपको नहीं कहना आरम्भ कर देते हैं, तो कैसा महसूस होता है। अत:, आप जानते हैं कि आपको न कहना आरम्भ करना है, परन्तु आपको इसके बारे में सोचना कैसे है? अधिकांश बातों की तरह, हमें एक लक्ष्य से आरम्भ करना होगा।

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