#25 क्रोध से छुटकारा
परिचय
मैं वर्मोंट राज्य में रहता हूँ। यह नाम फ़्रांसीसी शब्द “हरे पहाड़” से आया है। और ये पहाड़ हरे ही हैं, जिसका अर्थ यह है कि यहाँ बहुत अधिक वर्षा होती है—कभी-कभी तो बहुत ही अधिक वर्षा होती है। मुझे एक चौबीस घंटे का समय स्मरण है जब वरमॉन्ट की राजधानी मॉन्टपेलियर में नौ इंच तक वर्षा हुई थी। विनोस्की नदी अपनी सीमा से बढ़कर फैलाव के साथ बाहर की ओर बह रही थी और पूरा शहर बाढ़ में डूब गया था। मक्के और सोयाबीन से भरे खेत तथा घर समेत सब व्यवसाय नष्ट हो गया था।
क्रोध भी नदी के समान ही है — सामान्यतः यह विनाशकारी नहीं होता है, परन्तु यदि इसे किनारों से बहने दिया जाए, तो यह शीघ्र ही एक प्रचण्ड धारा के समान बन जाता है, जो विनाश का एक विस्तृत क्षेत्र छोड़ जाती है। अतः हम अपने क्रोध को अपने प्रकोप से पहले ही कैसे नियंत्रित कर सकते हैं? यह क्षेत्रीय मार्गदर्शिका आपको इसी प्रश्न का उत्तर देने में सहायता करने के लिए तैयार की गई है।
सर्व प्रथम हम क्रोध को समझने का प्रयास करके एक आधार तैयार करेंगे। जैसा कि पता चलता है, कि क्रोध बहुत ही जटिल होता है, और हम इसके कई मुखौटे हटाकर इसे उजागर करेंगे। दूसरा, हम पापपूर्ण क्रोध और बिना पाप के क्रोध के बीच अन्तर देखेंगे और फिर जाँच करेंगे कि सभी प्रकार के क्रोध का समाधान करना क्यों आवश्यक है। अन्त में, हम अपने क्रोध को नियंत्रित करने के लिए चार महत्वपूर्ण बातों पर विचार करेंगे: अर्थात् क्रोध को नियंत्रण करने की सामर्थ्य, व्यावहारिक कदम, बाधाएँ और अन्त में, क्रोध को नियंत्रित करने में हमारी आशा।
आइए क्रोध को सही रीति से समझना आरम्भ करें।
ऑडियो मार्गदर्शिका
ऑडियो#25 क्रोध से छुटकारा
1 अपने क्रोध को समझें
अपने क्रोध को उजागर करें
हम में से अधिकाँश लोग क्रोध को एक ही दृष्टिकोण से देखते हैं: अर्थात् विस्फोटक, मौखिक रूप से आक्रामक, और कभी-कभी हिंसक रूप से देखते हैं। परन्तु क्रोध कई रूप धारण कर सकता है। यह शान्त और अंतर्मुखी, रूठा हुआ होना और अप्रसन्नता भी हो सकता है। यह असीम और उत्पादक ऊर्जा के रूप में प्रकट हो सकता है या फिर ऊँची आवाज़ और अप्रिय व्यवहार के रूप में भी हो सकता है। क्रोध पर विजय पाने के लिए, हमें पहले उसका वास्तविक रूप पहचानना होगा। परन्तु आप कैसे समझ सकते हैं कि आपके भीतर भी क्रोध होने वाला स्वभाव है?
आप क्रोधित हो सकते हैं यदि, जब आप किसी विशेष व्यक्ति के विषय में सोचते हैं, तो मन ही मन उससे तर्क-वितर्क करने लगते हैं (जिसमें, स्वाभाविक रूप से, हमेशा आपकी जीत होती है) या फिर उसके कम आकर्षक गुणों पर ध्यान देते हैं। जब आप उन्हें व्यक्तिगत रूप से देखते हैं, तो आप हमेशा गुप्त तरीके से उनसे बचने के लिए बहुत परिश्रम करते हैं।
आप क्रोधित हो सकते हैं यदि आप कुछ शारीरिक समस्याओं का अनुभव करते हैं, जैसे सिर दर्द, पाचन सम्बन्धी विकार, अनिद्रा, या निराशा।
यदि आपकी उत्पादकता शक्ति कम हो गई है या आपको साधारण से कार्यों पर भी ध्यान देने में समस्या हो रही है तो आप क्रोधित हो सकते हैं।
यदि आप दूसरों के साथ कम बोलते हैं (मेरी पत्नी इसे “अचानक भड़कना” कहती है) या जीवन के उतार-चढ़ाव के प्रति बेचैन हैं, तो आप क्रोधित हो सकते हैं।
यदि कोई भी छोटे बच्चे— अर्थात् आपके बच्चे, पोते-पोतियाँ, या कलीसिया के बच्चे — जो लगातार आपके लिए समस्या का कारण बनें हुए हैं, तो आप क्रोधित हो सकते हैं।
आप क्रोधित हो सकते हैं यदि दूसरों की आदतें — विशेषकर आपके जीवनसाथी की आदत — आपको लगातार अशांत या दु: खी करती हैं और आपके अन्दर हमेशा शिकायत या कुड़कुड़ाने की प्रवृत्ति उत्पन्न करती हैं।
हाँ, क्रोध के कई रूप होते हैं। इसलिए सबसे पहले उन्हें उजागर करना आवश्यक है, क्योंकि यदि आप लक्षणों को नहीं पहचान पाते हैं, तो रोग से चंगाई पाना असम्भव होता है।
अपने क्रोध का वर्गीकरण करें
अपने क्रोध को उजागर करने के बाद, अब हम उसे वर्गीकृत करने के लिए तैयार हैं, क्योंकि सभी क्रोध समान नहीं होते हैं। क्रोध का निष्पक्ष, पापरहित भावना और क्रोधपूर्ण पाप के बीच गहरा अन्तर होता है।
परमेश्वर ने हमें अनेक भावनाओं और संवेदनाओं के साथ बनाया है — जैसे आनन्द और उदासी, प्रेम और घृणा, ईर्ष्या, उत्साह, क्रोध, और भय। हर एक के पाप और बिना पाप के रूप होते हैं। लोग अधिकाँश पापी न होते हुए भी भयभीत रहते हैं, परन्तु यदि यह परमेश्वर पर विश्वास में कमी को दर्शाता है और उसे लकवे का मारा बना देता है तथा उसे अपना कर्तव्य निभाने से रोकता है, तो यह पाप है। पवित्रशास्त्र हमें आज्ञा देता है कि, “क्रोध तो करो, पर पाप मत करो” (इफिसियों 4:26)। अतः यह स्पष्ट है कि क्रोध हमेशा पापपूर्ण नहीं होता है।
वास्तव में, धार्मिकता वाला क्रोध ही हर बुराई का उचित उत्तर है। सच में, परमेश्वर ने पीनहास के धार्मिकता वाले क्रोध के लिए सराहना की, जब उसने शिमोन और उसकी मिद्यानी प्रेमिका को बरछी से भेदकर महामारी को रोक दिया (गिनती 25:1-15)। उसी प्रकार, शमूएल ने धर्मी क्रोध प्रकट किया जब शाऊल ने यहोवा की आज्ञा का पालन करने और अमालेकियों को नष्ट करने से मना कर दिया था। तब शमूएल ने अमालेकियों के राजा आगाग को मार डाला (1 शमूएल 15:32–33)।
परन्तु निष्पाप क्रोध के अस्तित्व का सबसे प्रमुख प्रमाण स्वयं परमेश्वर है। पवित्रशास्त्र बार-बार इस बात का उल्लेख करता है कि परमेश्वर दुष्टों को दण्ड देने में अपना क्रोध प्रकट करता है। और यीशु मसीह स्वयं भी कई अवसरों पर स्पष्ट रूप से क्रोधित हुआ — जैसे निर्दयी फरीसियों पर (मरकुस 3:1–6) और झूठे मन्दिर के व्यापारियों पर (मरकुस 11:15–19)। वास्तव में, जब यीशु वापस आएगा, तो दुष्ट लोग छिप जाएँगे “और पहाड़ों और चट्टानों से कहेंगे, ‘हम पर गिर पड़ो और हमें उसके मुँह से जो सिंहासन पर बैठा है, और मेम्ने के प्रकोप से छिपा लो, क्योंकि उनके प्रकोप का भयानक दिन आ पहुँचा है, अब कौन ठहर सकता है?’” (प्रकाशितवाक्य 6:15–17)।
यह तो सम्भव है कि कोई व्यक्ति क्रोधित होने के पश्चात् भी पाप न करे, तो क्रोध कब अपनी सीमा को लाँघ जाता है? वह कब अपनी सीमाओं को पार करके दूसरों पर और स्वयं की आत्मा पर विनाश लाने लगता है?
क्रोध तब पाप में बदल जाता है जब यह प्रेम की व्यवस्था, जो दूसरी बड़ी आज्ञा है, के विपरीत व्यवहार और कार्यों को जन्म देता है। कुलुस्सियों 3:8 कहता है कि, “पर अब तुम भी इन सब को अर्थात् क्रोध, रोष, बैर-भाव, निन्दा, और मुँह से गालियाँ बकना ये सब बातें छोड़ दो।” स्पष्ट रूप से, पवित्रशास्त्र यहाँ पापी क्रोध की बात कर रहा है, क्योंकि उसके साथ दुष्टता, निन्दा और अशोभनीय वचन जैसी बातें जुड़ी होती हैं। इफिसियों 4:31 में कड़वाहट और कोलाहल (झगड़ा) को भी जोड़ा गया है: ये सब बातें पवित्र आत्मा को दुःख पहुँचाती हैं (इफिसियों 4:30)
अपने क्रोध नियंत्रित करें
अतः पापमय क्रोध परमेश्वर और दूसरों के साथ हमारे सम्बन्धों को हानि पहुँचाता है। क्रोध एक बहुत ही सामान्य, नियमित और पहले से अनुमान लगाने वाली घटना होती है, परन्तु इसे नियंत्रित भी किया जा सकता है और इसकी अपनी एक अलग ही सुन्दरता भी होती है। क्या हमें सच में प्रतिदिन के छोटे-मोटे क्रोध के समय चिन्तित होने की आवश्यकता है? क्या हमें सच में आपातकाल नम्बर 112 पर फोन करके सूचना देने की आवश्यकता है?
हाँ, बिल्कुल है! क्रोध पर तुरन्त ही और पूरी रीति से नियंत्रण करना आवश्यक है। जानिए ऐसा क्यों करना चाहिए।
सबसे पहले, पवित्रशास्त्र पापमय क्रोध के विषय में गम्भीर और लगातार चेतावनियाँ देता है। “शरीर के कामों” में “बैर, झगड़ा, ईर्ष्या और क्रोध” सम्मिलित है, [और] “जो लोग ऐसे काम करते हैं वे परमेश्वर के राज्य के वारिस नहीं होंगे” (गलातियों 5:20–21)।
याकूब, कलीसियाओं को सच्चे विश्वास और शैतानी विश्वास के बीच अन्तर समझने में सहायता करने के लिए लिखते हुए उन्हें चेतावनी देता है कि “सुनने के लिये तत्पर और बोलने में धीर और क्रोध में धीमा हो; क्योंकि मनुष्य का क्रोध परमेश्वर के धार्मिकता का निर्वाह नहीं कर सकता है (याकूब 1:19-20)। यह वचन पर चलने वाले और केवल सुनने वाले के बीच का अन्तर है जो स्वयं को धोखा देते हैं (याकूब 1:22-25)।
यीशु ने पहाड़ी उपदेश में यह भी स्पष्ट किया है कि अनियंत्रित क्रोध छठी आज्ञा का उल्लंघन करता है, जो हत्या करने से मना करती है: “तुम सुन चुके हो, कि पूर्वकाल के लोगों से कहा गया था कि ‘हत्या न करना’, और ‘जो कोई हत्या करेगा वह कचहरी में दण्ड के योग्य होगा।’ परन्तु मैं तुम से यह कहता हूँ, कि जो कोई अपने भाई पर क्रोध करेगा, वह कचहरी में दण्ड के योग्य होगा और जो कोई अपने भाई को निकम्मा कहेगा वह महासभा में दण्ड के योग्य होगा; और जो कोई कहे ‘अरे मूर्ख’ वह नरक की आग के दण्ड के योग्य होगा” मत्ती 5:21-22। “न्याय के योग्य”, “महासभा में दण्ड के योग्य”, और “नरक की आग के दण्ड के योग्य” समानार्थी वाक्यांश हैं। एक-दूसरे के प्रति क्रोध प्रकट करने से व्यक्ति परमेश्वर के सामने अनन्तकाल तक के लिए दोषी ठहराया जाता है।
क्रोध पर हँसना कोई बुरी बात नहीं है। आदत के अनुसार क्रोध की जीवनशैली, यहाँ तक कि सबसे गम्भीर और सच्चे विश्वासी व्यक्ति को भी शैतानी विश्वास रखने वाला और परमेश्वर के अनन्त क्रोध के अधीन कर देती है। यदि आपका जीवन क्रोध से भरा हुआ है, तो आपको शीघ्र ही सहायता लेनी चाहिए, क्योंकि “जीविते परमेश्वर के हाथों में पड़ना भयानक बात है” (इब्रानियों 10:32)।
परन्तु क्रोध अधिकाँश रूप से सच्चे विश्वासियों के लिए भी एक घेर लेने वाला पाप है। फिर इस पर युद्ध की घोषणा करने की आवश्यकता क्यों है? क्योंकि अनियंत्रित क्रोध अपने किनारों से बाहर बहती हुई नदी के समान है, पिघलते हुए परमाणु संयंत्र के समान है, तथा जंगल में लगी हुई आग के समान है। और यह कदाचित् ही कभी शान्त रहता है, अधिकतर यह विनाशकारी शब्दों के रूप में प्रकट होता है। याकूब ने क्रोधित जीभ का वर्णन करते हुए कहा है कि “वह एक ऐसी बला है जो कभी रुकती ही नहीं; वह प्राणनाशक विष से भरी हुई है।” (याकूब 3:8), और मत्ती कहता है कि “क्योंकि जो मन में भरा है, वही मुँह पर आता है” (मत्ती 12:34)। जब पापमय क्रोध हृदय में भर जाता है, तो “दुर्भावना, निन्दा और गालियाँ” मुँह से निकलती हैं (कुलुस्सियों 3:8)। और शीघ्र ही और भी अधिक हिंसक व्यवहार आरम्भ हो सकता है।
इसलिए पापमय क्रोध आपकी आत्मा के लिए एक खतरा है और आपके सम्बन्धों के लिए भी जोखिम उत्पन्न करता है। इसे गम्भीरता से लिया जाना चाहिए और पूरी दृढ़ता के साथ इसका सामना किया जाना चाहिए। हर कोई कभी न कभी अपना आपा खो देता है, यह क्रोध को अनदेखा करने का बहाना नहीं है। पापमय क्रोध परमेश्वर को अप्रसन्न करता है इसलिए इसको नियंत्रण करना आवश्यक हो जाता है।
परन्तु सुसमाचार यह है कि इस पर विजय पाई जा सकती है। वास्तव में, विश्वासियों के लिए यह एक महिमा से दूसरी महिमा में धीरे-धीरे जीता जा रहा है (2 कुरिन्थियों 3:18)। परन्तु कैसे? हमें क्या जानना चाहिए और क्या करना चाहिए ताकि हम अपने पापमय क्रोध पर विजय पा सकें? अगले भाग में हम क्रोध पर विजय पाने के चार महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर विचार करेंगे।
चर्चा एवं मनन:
- यह भाग आपके अपने क्रोध की समझ पर किस प्रकार प्रकाश डालता है?
- आप किन परिस्थितियों में स्वयं को सबसे अधिक क्रोधित पाते हैं?
- आपको किस बात पर सबसे अधिक क्रोधित होते हैं?
2 क्या आप अपने क्रोध को नियंत्रित कर सकते हैं?
क्रोध को नियंत्रित करने की सामर्थ्य
पवित्रता से सम्बन्धित हर बात में परमेश्वर की सामर्थ्य आवश्यक होती है, और क्रोध के पाप से हमारा संघर्ष भी अछूता नहीं है। परन्तु उस सामर्थ्य का स्रोत क्या है? परमेश्वर इस सामर्थ्य को हम जैसे असहाय और निर्बल पापियों तक कैसे पहुँचाता है? और हमारे जीवन में परमेश्वर की इस सामर्थ्य के होने की प्रतिज्ञा के क्या परिणाम हैं?
सुसमाचार: परमेश्वर की सामर्थ्य का स्रोत
रोमियों 1:16 कहता है कि, “क्योंकि मैं सुसमाचार से नहीं लज्जाता, इसलिए कि वह हर एक विश्वास करनेवाले के लिये, पहले तो यहूदी, फिर यूनानी के लिये, उद्धार के निमित्त परमेश्वर की सामर्थ्य है।” सुसमाचार, हर उस व्यक्ति के लिए जो विश्वास करता है, उद्धार, पवित्रता और क्रोध के पाप पर विजय पाने के लिए परमेश्वर की सामर्थ्य है। यह कैसे कार्य करता है? आइए इसका उत्तर रोमियों 6:1-7 में देखेंगे:
तो हम क्या कहें? क्या हम पाप करते रहें कि अनुग्रह बहुत हो? कदापि नहीं! हम जब पाप के लिये मर गए तो फिर आगे को उसमें कैसे जीवन बिताएँ? क्या तुम नहीं जानते कि हम सब जितनों ने मसीह यीशु का बपतिस्मा लिया तो उसकी मृत्यु का बपतिस्मा लिया? इसलिए उस मृत्यु का बपतिस्मा पाने से हम उसके साथ गाड़े गए, ताकि जैसे मसीह पिता की महिमा के द्वारा मरे हुओं में से जिलाया गया, वैसे ही हम भी नये जीवन के अनुसार चाल चलें। क्योंकि यदि हम उसकी मृत्यु की समानता में उसके साथ जुट गए हैं, तो निश्चय उसके जी उठने की समानता में भी जुट जाएँगे। क्योंकि हम जानते हैं कि हमारा पुराना मनुष्यत्व उसके साथ क्रूस पर चढ़ाया गया, ताकि पाप का शरीर नाश हो जाए, ताकि हम आगे को पाप के दासत्व में न रहें। क्योंकि जो मर गया, वह पाप से स्वतंत्र हो गया है।
पौलुस कह रहा है कि यदि आप विश्वासी हैं, तो आप केवल विश्वास के द्वारा ही यीशु की पाप का नाश करने वाली मृत्यु में उसके साथ एक हो गए हैं। यीशु की मृत्यु में उसके साथ यह एकता इस बात का सबसे बड़ा आश्वासन है कि एक दिन आप भी उसके पुनरुत्थान में उनके साथ एक हो जाएँगे। परन्तु आप एक कैसे होंगे?
पवित्र आत्मा: परमेश्वर की सामर्थ्य का साधन
जब आप मसीह के पास आए, तो एक अद्भुत घटना घटी। परमेश्वर के आत्मा ने आपको मसीह की मृत्यु में उसके साथ जोड़ दिया। उसने आपको एक नया हृदय दिया। विशेष रूप से, उसने आपके पुराने हृदय का खतना किया, पाप की खलड़ी को हटाकर जो पहले उसमें बसी हुई थी और आपके हृदय को नियंत्रित करती थी (रोमियों 2:25-29), और उसने आपके नए हृदय पर परमेश्वर की व्यवस्था लिखकर, जिससे आप उसकी विधियों पर चल सको, भले ही अपूर्ण रूप से ही सही (यहेजकेल 36:26–27; रोमियों 8:1–4; 2 कुरिन्थियों 3:1–3; इब्रानियों 8:10)।
उसने आपको स्वयं अपने से भर दिया और इस प्रकार मसीह के प्रकट होने पर आपको त्रिएक परमेश्वर में पूरी रीति से भरने की प्रक्रिया आरम्भ की है (प्रेरितों के काम 1:4–5, 2:4; 1 कुरिन्थियों 12:13; इफिसियों 3:15–19)। और पवित्र आत्मा ने तुम पर छाप लगा दी, जो तुम्हारे भविष्य की विरासत और मसीह के साथ उसके पुनरुत्थान में एकता का बयाना है (रोमियों 5:9-10, 6:5; इफिसियों 1:13-14)।
अतः परमेश्वर का आत्मा परमेश्वर की सामर्थ्य का साधन है, जो आपको पाप के प्रभुत्व से स्वतंत्र करता है: “क्योंकि जीवन की आत्मा की व्यवस्था ने तुम्हें मसीह यीशु में पाप की और मृत्यु की व्यवस्था से स्वतंत्र कर दिया” (रोमियों 8:2)। तो फिर मसीह की आत्मा के द्वारा उसकी मृत्यु में उसके साथ आपकी एकता का क्या मूल्य है? आप पर पाप की सामर्थ्य नष्ट हो चुकी है।
इसे फिर से पढ़ें: हमारा पुराना मनुष्यत्व उसके साथ क्रूस पर चढ़ाया गया (रोमियों 6:6), पाप की अब कोई प्रभुता नहीं रही, क्योंकि जो मर गया वह पाप से स्वतंत्र हो गया (रोमियों 6:7) जैसा कि पौलुस कहता है, “परन्तु परमेश्वर का धन्यवाद हो, कि तुम जो पाप के दास थे अब मन से उस उपदेश के माननेवाले हो गए, जिसके साँचे में ढाले गए थे, और पाप से छुड़ाए जाकर धार्मिकता के दास हो गए” (रोमियों 6:17-18)।
स्वतंत्रता: परमेश्वर की सामर्थ्य का परिणाम
सुसमाचार में प्रकट मसीह का कार्य ही आपके भीतर परमेश्वर की सामर्थ्य का स्रोत है, और मसीह की आत्मा जो हमें विश्वास के द्वारा मसीह से जोड़ता है, उसका माध्यम है। और परिणाम क्या है? स्वतंत्रता है! अर्थात् पाप के घुटन भरे प्रभुत्व से स्वतंत्रता। रोमियों अध्याय 6 को फिर से सुनिए, आयत 12-14:
इसलिए पाप तुम्हारे नाशवान शरीर में राज्य न करे, कि तुम उसकी लालसाओं के अधीन रहो। और न अपने अंगों को अधर्म के हथियार होने के लिये पाप को सौंपो, पर अपने आपको मरे हुओं में से जी उठा हुआ जानकर परमेश्वर को सौंपो, और अपने अंगों को धार्मिकता के हथियार होने के लिये परमेश्वर को सौंपो। तब तुम पर पाप की प्रभुता न होगी, क्योंकि तुम व्यवस्था के अधीन नहीं वरन् अनुग्रह के अधीन हो।
पाप का राज समाप्त हो गया है। अब विश्वासी स्वतंत्र हैं— अर्थात् पाप करने के लिए नहीं, वरन् स्वयं को और अपने अंगों को धार्मिकता के लिए परमेश्वर को सौपने के लिए। और किस प्रकार यीशु “राज्य का सुसमाचार” और नई वाचा लेकर आया, जिससे आत्मिक व्यवस्था की समझ में परिवर्तन आया है, और जब वह किसी व्यक्ति को स्वतंत्र करता है, तो वह व्यक्ति सच में पाप के बन्धन से स्वतंत्र हो जाता है (यूहन्ना 8:36)। हल्लिलूय्याह!
रोमियों 8:12–13 आत्मा के कार्य के विषय में यह कहता है: “तो हे भाइयों, हम शरीर के ऋणी नहीं, कि शरीर के अनुसार दिन काटें। क्योंकि यदि तुम शरीर के अनुसार दिन काटोगे, तो मरोगे, यदि आत्मा से देह की क्रियाओं को मारोगे, तो जीवित रहोगे।” ध्यान दें कि रोमियों 8:13 एक आज्ञा नहीं है, वरन् सामान्य मसीही जीवन का विवरण है। सभी सच्चे विश्वासी, परमेश्वर की आत्मा के द्वारा, धीरे-धीरे शरीर के कार्यों को नष्ट कर रहे हैं क्योंकि अब वे शरीर के ऋणी नहीं हैं। जैसा कि पौलुस ने पहले ही कहा है कि, “विश्वासी “शरीर में नहीं वरन् आत्मा में होते हैं” (रोमियों 8:9), क्योंकि “जो शरीर पर मन लगाता है… वह परमेश्वर की व्यवस्था के अधीन नहीं होता, और न हो सकता है। जो लोग शारीरिक दशा में हैं, वे परमेश्वर को प्रसन्न नहीं कर सकते हैं” (रोमियों 8:7–8)।
पर ऐसा लगता है कि इसमें एक समस्या है। यदि मसीह सच में हमें पाप की नियंत्रण करने वाली सामर्थ्य से स्वतंत्र करता है, तो फिर हम रोमियों 7 में वर्णित उस “विश्वासी” को कैसे समझाएँ, जो अब भी किसी न किसी रूप में अपने पाप का दास बना हुआ दिखाई देता है? यदि हम वास्तव में जीवन के उतार-चढ़ावों पर क्रोध नहीं, बल्कि आनन्द के साथ प्रतिक्रिया करने के लिए स्वतंत्र हैं, तो हम रोमियों 7:13–25 के साथ क्या करें?
इन आयतों में, पौलुस एक विश्वासी जन का पाप के साथ संघर्ष करने का वर्णन कर रहा है:
और जो मैं करता हूँ उसको नहीं जानता, क्योंकि जो मैं चाहता हूँ वह नहीं किया करता, परन्तु जिससे मुझे घृणा आती है, वही करता हूँ।… क्योंकि मैं जानता हूँ कि मुझ में अर्थात् मेरे शरीर में कोई अच्छी वस्तु वास नहीं करती। इच्छा तो मुझ में है, परन्तु भलाई मुझ से बन नहीं पड़ती। क्योंकि जो अच्छा मैं चाहता हूँ, क्योंकि जिस अच्छे काम की मैं इच्छा करता हूँ, वह तो नहीं करता, परन्तु जिस बुराई की इच्छा नहीं करता, वही किया करता हूँ।… क्योंकि मैं भीतरी मनुष्यत्व से तो परमेश्वर की व्यवस्था से बहुत प्रसन्न रहता हूँ। (रोमियों 7:15, 18–19, 22)
यदि यह व्यक्ति पाप से स्वतंत्र कर दिया गया है, तो हम उसके भीतर वास करने वाली पाप की व्यवस्था का विरोध न कर पाने वाली उसकी अयोग्यता के विषय में कैसे समझा सकते हैं (रोमियों 7:20–21)? क्या यह इस बात का स्पष्ट प्रमाण नहीं है कि विश्वासी, यहाँ तक कि सबसे बड़ा प्रेरित पौलुस भी, किसी न किसी प्रकार से अपने पाप के दास रहे हैं?
परन्तु इस भाग की गहराई से जाँच करने पर पता चलता है कि प्रेरित पौलुस मसीह में आने से पहले अपने जीवन का वर्णन कर रहा है। रोमियों 7:14 कहता है, “क्योंकि हम जानते हैं कि व्यवस्था तो आत्मिक है, परन्तु मैं शारीरिक हूँ और पाप के हाथ बिका हुआ हूँ।” निश्चय ही जो व्यक्ति पाप के दासत्व से स्वतंत्र हो चुका है, उसे पाप के हाथ नहीं बेचा जा सकता है।
पौलुस आगे कहता है कि, “क्योंकि मैं जानता हूँ, कि मुझ में अर्थात् मेरे शरीर में कोई अच्छी वस्तु वास नहीं करती, इच्छा तो मुझ में है, परन्तु भले काम मुझसे बन नहीं पड़ते। क्योंकि जिस अच्छे काम की मैं इच्छा करता हूँ, वह तो नहीं करता, परन्तु जिस बुराई की इच्छा नहीं करता, वही किया करता हूँ” (रोमियों 7:18-19)। और फिर आगे कहता है कि: “क्योंकि मैं भीतरी मनुष्यत्व से तो परमेश्वर की व्यवस्था से बहुत प्रसन्न रहता हूँ। परन्तु मुझे अपने अंगों में दूसरे प्रकार की व्यवस्था दिखाई पड़ती है, जो मेरी बुद्धि की व्यवस्था से लड़ती है और मुझे पाप की व्यवस्था के बन्धन में डालती है जो मेरे अंगों में है” (रोमियों 7:22-23)। रोमियों 7 में मनुष्य लगातार पाप से पराजित होता है और उसका दास बन जाता है, जो उसे बिना नया जन्म पाए हुए व्यक्ति के रूप में दर्शाता है, जो रोमियों 6:1-23, 7:1-12, 8:1-17 और यूहन्ना 8:36 देखने को मिलता है।
हमें इस भाग के मुख्य बिन्दु पर भी विचार करना चाहिए। क्योंकि पौलुस यह बताने का प्रयास कर रहा है कि उसकी मृत्यु का कारण व्यवस्था नहीं, वरन् वह अपनी मृत्यु के लिए पूरी रीति से पाप को दोषी ठहरा रहा है। इस भाग को आरम्भ करने वाला प्रश्न — “तो क्या वह जो अच्छी थी, मेरे लिये मृत्यु ठहरी?” (रोमियों 7:13) — यही आगे होने वाली सारी चर्चा का आधार है। पौलुस अविश्वासी की निन्दा के कारण के विषय में पूछताछ कर रहा है, न कि विश्वासी की पवित्रता के संघर्ष के विषय में। और उसका उत्तर स्पष्ट है: दण्ड — आत्मिक मृत्यु — पवित्र, धर्मी और अच्छी व्यवस्था नहीं, परन्तु भीतर वास करने वाले पाप के कारण मृत्यु हुई। यह भाग केवल यह समझाने के लिए है कि विश्वास से पहले व्यक्ति पाप के बन्धन में कैसे था; इसका विश्वासियों से कोई सम्बन्ध नहीं है। अविश्वासी के रूप में दु: खी होकर उसकी पुकार: “मैं कैसा अभागा मनुष्य हूँ! मुझे इस मृत्यु की देह से कौन छुड़ाएगा?” इसका उत्तर परमेश्वर देता है: “हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा परमेश्वर का धन्यवाद हो!” (रोमियों 7:24)। यीशु मसीह अपनी आत्मा के द्वारा पाप के बन्धन में जकड़े हुए व्यक्ति को स्वतंत्र करता है (रोमियों 8:2)।
अतः रोमियों 7:13–25 उस व्यक्ति का वर्णन करता है जो पाप का दास है और उचित न्याय के अनुसार अनन्त मृत्यु के लिए दण्ड के योग्य ठहराया गया है। यह व्यक्ति आत्मा में नहीं था, वरन् अब भी शरीर में था और छुटकारा पाने के लिए व्याकुल एवं धन्यवादी था कि यीशु ने अपनी आत्मा के द्वारा अब उसे पाप और मृत्यु की व्यवस्था से स्वतंत्र कर दिया है। यदि चार्ल्स वेस्ली प्रेरितों के युग में जीवित होते, तो निस्संदेह रोमियों 7 वाला व्यक्ति पाप की सामर्थ्य से अपने छुटकारे का आनन्द मनाते हुए यह गीत गाता: “लम्बे समय तक मेरी आत्मा बन्दीगृह में पड़ी रही, पाप और स्वभाव के अन्धकार में बंधी हुई; तेरी दृष्टि ने जीवन देने वाली किरण फैलाई. मैं जाग उठा, और काल कोठरी उजियाले से भर गई। मेरी बेड़ियाँ टूट गईं, मेरा हृदय स्वतंत्र हो गया, मैं उठा, बाहर निकला, और तेरे पीछे चलने लगा।”
हाँ, मसीह के सुसमाचार की सामर्थ्य ने, जो परमेश्वर की आत्मा के द्वारा कार्य करती है, बन्दी को स्वतंत्र कर दिया है, परन्तु पाप का बचा हुआ शेष भाग अब भी प्रबल है। सड़क पर दुर्गन्ध छोड़ने वाला पशु जो मरा पड़ा हुआ है उसकी दुर्गन्ध के समान, वह पाप है जिसमें पापमय क्रोध भी सम्मिलित है, जो स्वर्ग तक दुर्गन्ध फैलता है। अगले भाग में, हम उन व्यावहारिक चरणों पर विचार करेंगे जिन्हें आप पाप की उपस्थिति को मार डालने और उसकी भयानक दुर्गंध को दूर करने के लिए उठा सकते हैं।
चर्चा एवं मनन:
- क्या ऊपर दिए गए किसी भी विचार ने आपके जीवन में क्रोध — या किसी अन्य पाप — के प्रति आपके दृष्टिकोण को चुनौती दी है?
- क्या आप अपने शब्दों में व्याख्या कर सकते हैं कि आपको पाप पर विजय पाने की आशा क्यों है?
3 चरण
क्रोध पर विजय पाना
आप मसीह में एक नई सृष्टि हैं (2 कुरिन्थियों 5:17)। आप निडर होकर पाप से लड़ सकते हैं, “अब जो ऐसा सामर्थी है, कि हमारी विनती और समझ से कहीं अधिक काम कर सकता है, उस सामर्थ्य के अनुसार जो हम में कार्य करता है” (इफिसियों 3:20)। परमेश्वर की स्तुति हो!
परन्तु हमें अभी भी उस सामर्थ्य का उपयोग करना सीखना होगा। पाप से लड़ने के लिए यहाँ पाँच व्यावहारिक चरण बताए गए हैं:
- अपने पाप रहित उद्धारकर्ता को जानें
- पाप रहित क्रोध की प्रक्रिया
- पापमय क्रोध को दूर करो
- प्रेम को धारण करों
- निरन्तर संघर्ष के लिए तैयार रहें
चरण 1: अपने पापरहित उद्धारकर्ता को जानें (2 कुरिन्थियों 3:18)
यह पहला चरण, जो पाँचों चरणों में सबसे महत्वपूर्ण है, स्नेह पर केन्द्रित है। जोनाथन एडवर्ड्स ने स्नेह को “आत्मा की प्रबल प्रवृत्ति” के रूप में परिभाषित किया है। वर्ष 1746 में, अपनी प्रमुख रचना धार्मिक स्नेह में, एडवर्ड्स ने यह तर्क दिया कि “सच्चा धर्म मुख्यतः समझ में न होकर, बड़े हिस्से के स्नेह में निहित होता है।” आज, हम कह सकते हैं कि वास्तविक मसीहियत या सच्चा परिवर्तन मुख्यतः हृदय में होता है, न कि मस्तिष्क में।
थॉमस चाल्मर्स, प्रसिद्ध स्कॉटिश प्रचारक जो एडवर्ड्स से लगभग एक शताब्दी बाद तक जीवित रहे, उन्होंने “एक नए स्नेह की निष्कासित करने वाली सामर्थ्य” पर उपदेश दिया। उस उपदेश में, चाल्मर्स सांसारिकता पर विजय पाने की प्रक्रिया समझाते हैं: “आप सभी ने सुना होगा कि प्रकृति शून्य से घृणा करती है। और एक सीमा तक हृदय का स्वभाव भी कुछ ऐसा ही है; [इसे] खाली नहीं छोड़ा जा सकता बिना अत्यधिक असहनीय पीड़ा के अनुभव के… संसार के प्रति प्रेम को केवल संसार के व्यर्थ प्रदर्शन से नहीं मिटाया जा सकता है। परन्तु क्या यह उस प्रेम के बदले नहीं हो सकता जो स्वयं से अधिक योग्य है? … पुराने स्नेह को [हृदय] से निकालने का एकमात्र तरीका नए स्नेह की निष्कासित करने वाली सामर्थ्य है।”
यह नया स्नेह क्या है? यह स्वयं प्रभु यीशु मसीह के प्रति एक शक्तिशाली लगाव है। इस प्रकार, हमारे पापमय क्रोध पर विजय पाने का पहला चरण यह है कि हम मसीह के प्रति इस नए स्नेह को सक्रिय करें और उस आत्मिक स्वतंत्रता का प्रयोग करें जो अब हमारे पास है। और नए स्नेह को सम्मिलित करना, उस आत्मिक स्वतंत्रता को लागू करना कैसे दिखता है?
मसीह की मनोहरता को देखिए (भजन 27:4, 2 कुरिन्थियों 3:12-18, कुलुस्सियों 3:2, इब्रानियों 12:2) “एक वर मैंने यहोवा से माँगा है, उसी के यत्न में लगा रहूँगा; कि मैं जीवन भर यहोवा के भवन में रहने पाऊँ, जिससे यहोवा की मनोहरता पर दृष्टि लगाए रहूँ, और उसके मन्दिर में ध्यान किया करूँ” (भजन संहिता 27:4)।
हमें अपने सृष्टिकर्ता से प्रेम करने, उसका आदर करने और उसकी आराधना करने के लिए बनाया गया था। परन्तु कुछ ऐसे हुआ कि जब आदम ने पाप किया, तो पूरी मनुष्य जाति पाप में डूब गई, और अपनी नैतिक अयोग्यता के कारण न तो उसकी आराधना कर सकी और न ही परमेश्वर को देख सकी।
परन्तु यीशु मसीह के सुसमाचार ने यह सब बदल दिया। दूसरा कुरिन्थियों 3:12-18 हमारी स्वतंत्रता का वर्णन करता है:
क्योंकि हमारे पास आशा है, हम बहुत साहसी हैं, मूसा के समान नहीं, जिसने अपने चेहरे पर परदा डाल लिया था ताकि इस्राएली उस अन्त को न देखें जो होने वाला था। परन्तु उनके मन बहुत हठीले हो गए थे, क्योंकि आज तक भी जब वे पुरानी वाचा पढ़ते हैं, तो वह परदा नहीं उठता, क्योंकि केवल मसीह के द्वारा ही वह परदा हटाया जाता है। हाँ, आज भी जब मूसा की व्यवस्था को पढ़ा जाता है, तो उनके हृदय पर परदा पड़ा रहता है। परन्तु जब कोई प्रभु की ओर फिरता है, तो परदा हट जाता है। क्योंकि प्रभु आत्मा है, और जहाँ प्रभु की आत्मा है, वहाँ स्वतंत्रता है। परन्तु जब हम सब के उघाड़े चेहरे से प्रभु का प्रताप इस प्रकार प्रगट होता है, जिस प्रकार दर्पण में, तो प्रभु के द्वारा जो आत्मा है, हम उसी तेजस्वी रूप में अंश-अंश कर के बदलते जाते हैं।
दूसरे शब्दों में, “मैं एक बार खो गया था परन्तु अब मिल गया हूँ, मैं अन्धा था परन्तु अब देख सकता हूँ।” जहाँ आत्मा है, वहाँ परमेश्वर को उसके पुत्र के रूप में देखने की स्वतंत्रता है; यीशु पर अपनी दृष्टि लगाए रखने की स्वतंत्रता है (इब्रानियों 12:2); स्वर्गीय वस्तुओं पर ध्यान लगाने की स्वतंत्रता है (कुलुस्सियों 3:2)। यद्यपि “हमें दर्पण में धुंधला सा दिखाई देता है” (1 कुरि. 13:12)। परन्तु हमारी दृष्टि इस प्रकार से पुनः सुधारी गई है कि हम विश्वास की आँखों से मसीह को देख सकते हैं और उसके द्वारा अपने महान त्रिएक परमेश्वर की आराधना कर सकते हैं।
अतः हम उसे कैसे देखते हैं? यह अपने आप में एक क्षेत्रीय मार्गदर्शिका हो सकती है। हम उसे सृष्टि में देखते हैं, क्योंकि सब कुछ उसी के द्वारा रचा गया है; हम उसे कलीसिया में देखते हैं, क्योंकि सभी विश्वासियों में वह वास करता है; और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हम उसे पवित्रशास्त्र में देखते हैं, क्योंकि सभी बाइबल के लेखकों ने उसके विषय में लिखा है (यूहन्ना 5:39-46)। बाइबल की प्रत्येक व्यवस्था; जैसे प्रत्येक भविष्यद्वक्ता, याजक और राजा; प्रत्येक बलिदान और वाचा; इस्राएल राष्ट्र के विषय में हम जो कुछ भी पढ़ते हैं; वास्तव में, सम्पूर्ण बाइबल मसीह और परमेश्वर के लोगों के पापों के लिए उसकी मृत्यु, गाड़ा जाना और पुनरुत्थान की ओर संकेत करती है, (लूका 24:27)। हम मसीह को उसके वचन में सबसे स्पष्ट और व्यापक रूप से देखते हैं।
और उसे देखने का परिणाम क्या होता है? परिवर्तन!
परमेश्वर के स्वरूप में परिवर्तित होते चले जाएँ (रोमियों 12:2, 2 कुरिन्थियों 3:18, कुलुस्सियों 3:10) हम वही बन जाते हैं जिसे हम देखते हैं, या जैसा कि ग्रेग बील ने कहा कि: हम वही बन जाते हैं जिसकी हम आराधना करते हैं।1 मसीह को देखने से, जो परमेश्वर की महिमा का प्रकाश है, यह परिणाम होता है कि “हम उसके वास करने वाले आत्मा की सामर्थ्य के द्वारा उसी तेजस्वी रूप में अंश-अंश कर के बदलते जाते हैं” (2 कुरिन्थियों 3:17–18)। अपने मनों को स्वर्गीय वस्तुओं पर—- विशेषकर परमेश्वर के पुत्र पर — केंद्रित करके नया करने से हम अपने महिमामय सृष्टिकर्ता के स्वरूप में परिवर्तित होते जाते हैं (रोमियों 12:2; कुलुस्सियों 3:2, 10)। मसीह की ओर देखना, जो हमारा नया स्नेह है, पापमय क्रोध को निकालने और उसके स्थान पर प्रेम को स्थापित करने का बाइबल आधारित सूत्र है।
परन्तु मसीह को देखने से हमें अपने क्रोध को नियंत्रण करने में व्यावहारिक रूप से कैसे सहायता मिलती है? इसके दो तरीके हैं। पहला, जब हम अपने पापरहित तथा निष्कलंक उद्धारकर्ता को देखते हैं, तो हम धर्मी क्रोध को प्रकट होते हुए देखते हैं, जैसा कि हमने पहले वर्णन किया है। इब्रानियों अध्याय 4 हमें स्मरण कराता है कि यीशु भी सब बातों में हमारे ही समान परखा गया, तौभी पाप रहित रहा। जब हम उसके स्वभाव को समझते हैं, तब यह देखते हैं कि वह क्रोधित होते हुए भी पापरहित रहा, तो हम उसी दिशा में बढ़ना आरम्भ करते हैं। इस प्रकार हम उसके सुन्दर स्वरूप में परिवर्तित होते चले जाते हैं।
दूसरा, जब हम अपने सुन्दर उद्धारकर्ता को देखते हैं, तो हम उसकी व्याकुलता को भी देखते हैं, जो छुटकारे के लिए परमेश्वर से की गई उसकी प्रार्थनाओं में व्यक्त होती है: “यीशु ने अपनी देह में रहने के दिनों में ऊँचे शब्द से पुकार-पुकारकर, और आँसू बहा-बहाकर उससे जो उसको मृत्यु से बचा सकता था, प्रार्थनाएँ और विनती की और भक्ति के कारण उसकी सुनी गई” (इब्रानियों 5:7)। मसीह को समझना, निहारना और देखना हमें बढ़ती हुई व्याकुलता की अवस्था में ले जाता है। स्पष्ट है, यदि स्वयं यीशु छुटकारे के लिए व्याकुल था, तो हम में यह और भी अधिक सत्य क्यों न हो? इसलिए हम पाप की उपस्थिति से, जिसमें हमारा पापमय क्रोध भी सम्मिलित है, छुटकारे के लिए कराहते हैं (रोमियों 8:23)। इस सम्बन्ध में पाँचवें चरण में विस्तार से बताया गया है।
चरण 2: पाप रहित क्रोध की प्रक्रिया (इफिसियों 4:26-27)।
क्रोध अस्थिर होता है। यह शैतान के हाथों में आत्मिक नाइट्रोग्लिसरीन दवा के समान है। और अधिकाँश समय ही एकमात्र ऐसी बात है जो पापपूर्ण क्रोध को पापरहित क्रोध से अलग करती है, क्योंकि पापरहित क्रोध शीघ्र ही भड़क सकता है। इसलिए प्रेरित विनती करता है कि: “क्रोध तो करो, पर पाप मत करो; सूर्य अस्त होने तक तुम्हारा क्रोध न रहे…” (इफिसियों 4:26)।
जब सू और मैंने मुछ समय पहले विवाह किया था, तब मैं अपने बार-बार सताने वाले क्रोध के पाप को मार डालने (उस पर विजय पाने) के लिए प्रयास कर रहा था। मुझे एक आयत से बहुत सहायता मिली जिसका अध्ययन मैं अपने विवाह की पहली गर्मियों में कर रहा था। कुलुस्सियों 3:19 कहता है: “हे पतियों, अपनी-अपनी पत्नी से प्रेम रखो, और उनसे कठोरता न करो।” मुझे यह पता था कि उसके प्रति मेरा कठोर व्यवहार ही उसके प्रति मेरे क्रोध का एक लक्षण था।
इसलिए सू और मैंने एक समझौता किया। हमने तय किया कि हम एक-दूसरे से क्रोधित होकर सोने के लिए नहीं जाएँगे। अधिकाँश ऐसा होता है कि हम आपसी सम्बन्ध में किसी भी क्रोध को पहचानने में देरी कर देते हैं। यदि वह पहले से ही पापमय नहीं हो चुका होता, तो हम उसे विषैला होने से पहले, इफिसियों 4:26 के अनुसार, शीघ्र ही सुलझा लेते। यदि यह पहले ही पापपूर्ण हो चुका होता, तो हम नीचे दिए गए तीसरे चरण का पालन करते हुए इसे नियंत्रित करने का प्रयास करते।
उस समय आप यह नहीं समझ सकते कि वह क्रोध पापमय है या पापरहित। विषय यह है कि क्रोध के साथ खिलवाड़ नहीं किया जा सकता है, यहाँ तक कि स्पष्ट रूप से धर्मी क्रोध के साथ भी नहीं। गोल्फ क्लब को घुमाना और भोज तैयार करना दोनों ही एक जटिल कार्य की चुनौती के लिए उत्कृष्ट उपमाएँ हैं, क्योंकि वे यह दर्शाते हैं कि एक सरल सा दिखने वाला कार्य किस प्रकार अनेक छोटे, परस्पर जुड़े विवरणों पर निर्भर करता है। परन्तु जब क्रोध की बात आती है, तो समय बहुत महत्वपूर्ण होता है। इसलिए यदि सम्भव हो तो आपको क्रोध को दूर करने के लिए तत्परता की भावना विकसित करनी चाहिए, इससे पहले कि यह पाप में बदल जाए और सम्बन्ध और आपकी आत्मा दोनों को विषैला बना दे।
चरण 3: पापमय क्रोध को दूर करें (कुलुस्सियों 3:5–8)
पापमय क्रोध को दूर करना अधिक जटिल प्रक्रिया है। आपको पहले स्वयं पापमय क्रोध को मारना होगा, और फिर उस पापमय क्रोध के स्रोत या स्रोतों को ढूँढकर उन्हें भी मारना होगा।
स्वयं क्रोध को मार डालो
क्रोध को शान्त करने का पहला चरण शीघ्र — और अवश्य — उठाया जाना चाहिए, क्योंकि क्रोध बहुत तेजी से भड़क उठता है। पापमय क्रोध को मारने के तीन तरीके हैं: इसे स्वीकार करो, अंगीकार करो, और इसे मार डालो।
- इसे स्वीकार करो (भजन संहिता 51:4)
विभिन्न बारह चरणों के कार्यक्रम में एक बात समान है: कि जब कोई व्यक्ति अंततः समूह के सामने खड़ा होकर अपनी दशा को स्वीकार करता है, तभी वास्तविक परिवर्तन होता है। पाप के साथ भी यही बात सत्य है। अपने पापमय क्रोध को मारने का पहला चरण है — कि उसे स्वीकार करें: “नमस्ते, मेरा नाम है, और मैं क्रोधित हूँ।”
जब पाप को स्वीकार करने की बात आती है, तो भजन संहिता 51:4 ने हमेशा मुझसे अत्यंत प्रभावशाली ढँग से बात की है। किसी भी दृष्टिकोण से देखें, तो दाऊद ने उन सबसे घोर पापों में से कुछ पाप किए थे जो कोई व्यक्ति दूसरे के विरुद्ध कर सकता है — जिनमें व्यभिचार और हत्या भी सम्मिलित हैं। और उसने अपने विश्वासयोग्य मित्र ऊरिय्याह हित्ती के विरुद्ध पाप किया — जो दाऊद के तीस पराक्रमी सैनिकों में से एक था।
नातान की फटकार (2 शमूएल 12) के उत्तर में, दाऊद अपने पाप को पूरी रीति से स्वीकार करता है। और इस पाप को स्वीकार करने के दो अलग-अलग पहलू हैं। पहला, वह स्वीकार करता है कि उसका पाप अंततः परमेश्वर के विरुद्ध था। पाप को अत्यंत पापमय बनाने वाली बात यह है कि यह उसके विरुद्ध विद्रोह करता है जो अति पवित्र और सुन्दर है—अर्थात् स्वर्ग के परमेश्वर तथा उसकी भली और धर्मी व्यवस्था के विरुद्ध। भजन संहिता 51:4 में दाऊद कहता है, “मैं ने केवल तेरे ही विरुद्ध पाप किया है, और जो तेरी दृष्टि में बुरा है, वही किया है।” दाऊद जानता है कि उसने ऊरिय्याह और बतशेबा के विरुद्ध पाप किया है। परन्तु एक पवित्र और अनुग्रहकारी परमेश्वर के विरुद्ध उसका अपराध सबसे प्रमुख स्थान ले लेता है।
दूसरा, दाऊद ने अपने पाप को बिना किसी शर्त के स्वीकार किया। इसमें किन्तु-परन्तु जैसा कोई शब्द नहीं है। अर्थात् कोई शर्त नहीं थी। दाऊद ने अपने पाप के लिए कोई बहाना नहीं बनाया—न तो बतशेबा की अति सुन्दरता का वर्णन करके, न ही ऊरिय्याह का अपनी पत्नी के पास जाने से मना करने की जिद का उल्लेख करके। इसमें यह दावा नहीं किया गया है कि राजा को अपनी इच्छानुसार किसी भी स्त्री को अपने साथ रखने का अधिकार है, या यह कि ऊरिय्याह को मारना ही उसकी प्रतिष्ठा और राजा के पद की रक्षा करने का एकमात्र तरीका था। भजन संहिता 51:4ब दाऊद अपने पाप के प्रति पूर्ण रीति से स्वीकार करने के गुण को प्रकट करता है, जैसा कि पाप के परिणामों के प्रति उसके पूर्ण अंगीकार में देखा जा सकता है:
यदि क्रोध को नष्ट करना है, तो पहले उसे पूर्ण रीति से स्वीकार करना होगा।
- इसका अंगीकार करें (मत्ती 6:12, याकूब 5:16)
एक बार क्रोध का पूरी रीति से अंगीकार किया जाना चाहिए, और तब क्रोध को दृढ़ता के साथ परमेश्वर के सम्मुख तथा आवश्यकतानुसार मनुष्य के सम्मुख भी स्वीकार किया जाना चाहिए।
कहा जाता है कि पाप का अंगीकार करना आत्मा के लिए अच्छा और प्रतिष्ठा के लिए बुरा होता है। फिर भी, पाप का अंगीकार करना मसीहियत का मूल आधार है। उदाहरण के लिए, प्रभु की प्रार्थना में, यीशु हमें हमारे पापों को स्वीकार करना सिखाता है, और हमारे ऋणों के लिए स्वर्गीय पिता से क्षमा माँगने की प्रेरणा देता है: “और जिस प्रकार हमने अपने अपराधियों को क्षमा किया है, वैसे ही तू भी हमारे अपराधों को क्षमा कर” (मत्ती 6:12)। इस प्रकार के अंगीकार में सच्ची सामर्थ्य होती है, क्योंकि परमेश्वर के द्वारा हमें क्षमा करने का मानक यह है कि हम दूसरों को क्षमा करें। दूसरे शब्दों में, यदि आपने वास्तव में अपने ऋण देने वालों को क्षमा नहीं किया है, और फिर भी यह कहते हैं कि “जैसा मैं क्षमा करता हूँ, वैसे ही तू मुझे क्षमा कर” अपने आप में लगभग आत्मघाती उद्देश्य जैसा है। मत्ती 6:14 इस बात को स्पष्ट करता है: “इसलिए यदि तुम मनुष्य के अपराध क्षमा करोगे, तो तुम्हारा स्वर्गीय पिता भी तुम्हें क्षमा करेगा।”
सबसे पहले अपने क्रोध का परमेश्वर के सामने अंगीकार करें, और फिर दूसरों के सामने भी, क्योंकि क्रोध अधिकाँश एक उग्र नदी के समान होता है जो आपसी सम्बन्धों को गम्भीर क्षति पहुँचाता है। याकूब 5:16 इस बात को स्पष्ट करता है कि: “इसलिए तुम आपस में एक दूसरे के सामने अपने-अपने पापों को मान लो; और एक दूसरे के लिये प्रार्थना करो, जिससे चंगे हो जाओ; धर्मी जन की प्रार्थना के प्रभाव से बहुत कुछ हो सकता है।”2
परमेश्वर के सम्मुख अंगीकार करना व्यक्तिगत होता है और इसके द्वारा बहुत बड़ी लज्जा से बचा जा सकता है। परन्तु दूसरों के सामने, और विशेषकर उन सभी लोगों के सामने जो इससे प्रभावित हुए हैं, अपने पापपूर्ण क्रोध को स्वीकार करने के लिए दीन होकर टूटे हुए मन की आवश्यकता होती है। दाऊद ने इसे इस प्रकार कहा: “टूटा मन परमेश्वर के योग्य बलिदान है; हे परमेश्वर, तू टूटे और पिसे हुए मन को तुच्छ नहीं जानता” (भजन संहिता 51:17)। परमेश्वर का अनुग्रह नम्र लोगों पर होता है (याकूब 4:6), इसलिए परमेश्वर का अनुग्रह उन पर होता है जो दूसरों के सामने अपने पापों को मान लेते हैं, ऐसा करना स्वाभाविक रूप से घमण्ड और अहंकार को चुनौती देता है, जिससे विनम्रता को और अधिक बढ़ावा मिलता है।
और सार्वजनिक रूप से अंगीकार करना प्रार्थना को प्रोत्साहित करता है: “इसलिए तुम आपस में एक दूसरे के सामने अपने-अपने पापों को मान लो; और एक दूसरे के लिये प्रार्थना करो, जिससे चंगे हो जाओ” (याकूब 5:16)। दूसरों के सामने पापों का अंगीकार करने से सामूहिक प्रार्थना का आरम्भ होता है, जो क्रोध के पाप से चंगाई देने की प्रतिज्ञा है, अर्थात् उस क्रोध से जो सरलता से फँसा देता है।
अपने क्रोध को पूर्ण रीति से स्वीकार करने और दीनता के साथ अंगीकार करने के पश्चात् आप इस घातक पाप से लड़ने को तैयार हो जाते हैं।
- इसे मार डालो (इफिसियों 4:30–31, कुलुस्सियों 3:5–8)
जब तक पौलुस इफिसियों 4:31 में पापमय क्रोध को दूर करने की आज्ञा देता है, तब तक वह इसे नई सृष्टि की महिमामय वास्तविकताओं में पहले ही स्थापित कर चुका होता है। अध्याय 1–3 से हम यह सीखते हैं कि विश्वासियों के भीतर कार्य करने वाली पुनरुत्थान की सामर्थ्य कैसी है। इफिसियों 4:17–24 में हम यह सीखते हैं कि विश्वास में आने का अर्थ पुराने मनुष्यत्व को उतार फेंकना और नए मनुष्यत्व को पहिन लेना है। इस प्रकार, पौलुस कलीसिया को वही करने की आज्ञा दे रहा है, जिसके लिए उसे पहले ही परमेश्वर के आत्मा के द्वारा सामर्थ्य प्रदान की गई है।
कुलुस्सियों 3 भी कुछ ऐसा ही है। यह भाग मानता है कि आप पाप की सामर्थ्य के लिए मरकर, मसीह के साथ नए जीवन में जिलाए गए हैं (कुलुस्सियों 3:1-4)। और यह मानता है कि “आपने पुराने मनुष्यत्व को उसके कामों समेत उतार डाला है और नए मनुष्यत्व को पहिन लिया है, जो अपने सृजनहार के स्वरूप के अनुसार ज्ञान प्राप्त करने के लिए नया बनता जाता है” (कुलुस्सियों 3:9–10)। इसलिए उस स्वतंत्रता के आधार पर तुम्हें अपने क्रोध को मार डालने की आज्ञा दी गई है: “सो तुम्हारे जो पृथ्वी पर अंग हैं उन्हें मार डालो… पर अब तुम भी इन सब को अर्थात् क्रोध, रोष, बैरभाव, निन्दा, और मुँह से गालियाँ बकना — ये सब बातें छोड़ दो” (कुलुस्सियों 3:5, 8)।
इस समय स्तुति और धन्यवाद का बलिदान चढ़ाना पूर्ण रीति से उचित होगा। आप पापमय क्रोध को मार डालने, उसे दूर करने, और अपने पाप को नष्ट करने की उस प्रक्रिया में सम्मिलित होने जा रहे हैं जो यीशु के वापस आने पर पूरी होगी। और यह केवल इसलिए सम्भव है क्योंकि आप मसीह में एक नई सृष्टि हैं, और उसके सुसमाचार की सामर्थ्य से पाप को मार डालने के लिए स्वतंत्र हैं। उसी सामर्थ्य ने आपको उसकी पाप का नाश करने वाली आत्मा के द्वारा उसकी पाप का नाश करने वाली मृत्यु में एक कर दिया है।
पुत्र ने आपको स्वतंत्र कर दिया है! पाप को “ना” कहने के लिए स्वतंत्र किया है। और साथ ही पवित्र आत्मा को दु: खी न करने के लिए भी स्वतंत्र किया है। अपने नश्वर शरीर में पापमय क्रोध को राज्य करने से रोकने के लिए स्वतंत्र किया है। उस परमेश्वर की स्तुति करने के लिए स्वतंत्र किया है, जिसके अनुग्रह के द्वारा पाप पर प्रबल विजयी सामर्थ्य की आशीष प्रवाहित होती है। हल्लेलूयाह!
अतः अब मार डालना आरम्भ करें।
परन्तु कैसे? हम पापमय क्रोध को कैसे मार सकते हैं? ऐसा नहीं है कि मैं क्रोधित होना चाहता हूँ। परन्तु मेरा क्रोध अपने आप ही बना रहता है।
आपको स्वयं को यह स्मरण दिलाना आरम्भ करना होगा कि आपके पास एक विकल्प है। अर्थात् आप पापपूर्ण रूप से क्रोधित न होने का चुनाव कर सकते हैं, तब भी कर सकते हैं जब आप उचित रूप से क्रोधित हो रहे हों।जैसा कि प्रेरित पौलुस ने समझाया कि, “क्रोध तो करो, [पर] पाप मत करो।”
ऐसा लग सकता है कि आपके पास कोई विकल्प ही नहीं बचा है, क्योंकि वर्षों तक पाप का चुनाव करने के बाद आपकी चुनने वाली की ज्ञानेन्द्रियाँ क्षीण हो गई है। निराशा प्रतीत होने वाले अन्यायों पर आपकी आदत तुरन्त प्रतिक्रिया देने में पापमय क्रोध से भरी रही है, जिससे आपकी चयन करने वाली ज्ञानेन्द्रियाँ ढीली और अस्वस्थ हो चुकी हैं। ये ज्ञानेन्द्रियाँ धार्मिकता में प्रशिक्षित होने की प्रतीक्षा कर रही है। इसे सही आकार में लाने के लिए कठोर प्रशिक्षण की आवश्यकता है (इब्रानियों 5:14)। साथ ही इसे परमेश्वर के कार्यों में उत्कृष्टता प्राप्त करने के लिए नियमित अभ्यास की आवश्यकता है — अर्थात् इस विषय में कड़वाहट, निन्दा या द्वेष के साथ प्रतिक्रिया नहीं करनी चाहिए।
पवित्र आत्मा आपकी इच्छा के विरुद्ध पाप को नष्ट नहीं करता, वरन् वह आपके सहयोग की भावना को प्रेरित करने के लिए ईश्वरीय अनुशासन या आत्म-निर्माण में आपकी सहायता कर सकता है। और वह उन लोगों के साथ सबसे अच्छा काम करता है जो भय के साथ काँपते हुए अपने उद्धार के लिए यत्न करते रहते हैं (फिलिप्पियों 2:12-13)। और शुभ सन्देश यह है कि: अभ्यास करने से जीवन के अधिकाँश प्रयासों में प्रगति होती है, जिसमें पवित्रता की खोज करना भी सम्मिलित है। जितना अधिक आप क्रोधित न होने के सम्बन्ध में अपनी स्वतंत्रता का अभ्यास करते हैं, उतना ही यह चुनाव करना सरल होता जाता है।
सम्भवतः यह एक उदाहरण सहायता कर सकता है। कुछ समय पहले, जब मैं अपनी पत्नी के साथ छुट्टियों पर था, तो मैं क्रोध से भड़क उठा था। जब मैंने अपने पापमय क्रोध का सामना किया, तो मुझे यह अनुभव हुआ कि मैं ऐसा व्यवहार कर रहा था मानो मैं अब भी पाप का दास हूँ, जैसे कि पुत्र ने मुझे पाप की सामर्थ्य से स्वतंत्र नहीं किया है, और जैसे कि मैं अलग ढँग से प्रतिक्रिया देने में शक्तिहीन हो गया हूँ। इस अनुभव के पश्चात्, मैंने केवल अपनी स्वतंत्रता का प्रयोग किया और अपनी परिस्थितियों पर पापमय क्रोध से प्रतिक्रिया देना बन्द करने का निर्णय लिया, तथा क्रोध करने के स्थान पर परमेश्वर का धन्यवाद किया कि उसने मुझे पवित्र बनाने के लिए ऐसी योजना बनाई है (इब्रानियों 12:7–11)।
मसीह की मृत्यु में उसके साथ हमारी एकता के कारण, और हमारे भीतर उसकी वास करने वाली आत्मा की सामर्थ्य के द्वारा आप (और सभी विश्वासी) पापपूर्ण क्रोधित प्रतिक्रिया को “न” कहने के लिए स्वतंत्र हैं। हर बार जब आप “नहीं” कहते हैं, तो क्रोध करने की आदत निर्बल होती चली जाती है, और उसकी दुर्गंध भी समाप्त हो जाती है। हर बार जब आप अपनी स्वतंत्रता का प्रयोग करते हैं, तो आपके भीतर का नया मनुष्य परमेश्वर के पुत्र की महिमामय स्वरुप में अंश-अंश करके नया होता चला जाता है।
क्रोध के स्रोत को नियंत्रित करें
पर केवल पाप को “ना” कहना ही पर्याप्त नहीं होता है। अधिकाँश कोई न कोई गहरी जड़ वाली समस्या बनी रहती है, जो बार-बार क्रोध को फिर से भड़काने का कारण बनती है। पापमय क्रोध को दूर करने में अधिक प्रभावशाली होने के लिए, आपको अपनी आत्मा में गहराई तक देखना होगा। बार-बार आप एक और पाप (या पापों का समूह) पाएँगे, जिसे अवश्य ही मार डालना चाहिए। यह प्रक्रिया जोनाथन एडवर्ड्स के प्रसिद्ध संकल्पों में से किसी एक के समान ही है। संकल्प 24 कहता है कि, “संकल्प यह है कि: जब भी मैं कोई स्पष्ट रूप से बुरा कार्य करूँगा, तो मैं तब तक उसका पता लगाऊँगा जब तक कि मैं मूल कारण तक नहीं पहुँच जाता; और फिर मैं सावधानी पूर्वक प्रयास करूँगा कि 1) ऐसा दोबारा न करूँ और 2) मुख्य क्रोध के स्रोत के विरुद्ध अपनी पूरी सामर्थ्य से लडूँ और प्रार्थना करूँ।”
परन्तु अधिक गहरी समस्याओं का समाधान करने से पहले, मैं यह दोहराना चाहूँगा कि आपके क्रोध को नियंत्रित करने का स्रोत तनावों की खोज पर निर्भर नहीं होता है। आप क्रोध को दूर करने के लिए स्वतंत्र हैं, भले ही सम्भावित गहरी समस्याएँ रहस्य बनी रहें या उनका समाधान न किया गया हो। परन्तु अपने क्रोध की मुख्य जड़ की पहचान करने से आपको उन गहरे पापों को नष्ट करने में सहायता मिल सकती है, जो पापमय क्रोध को भड़काते हैं।
अपने पापमय क्रोध का पता लगाने और मूल समस्या की पहचान करने के लिए, जो अधिकतर पाप के सर्प-कुण्ड के समान होता है, आपको स्वयं का विद्यार्थी बनना होगा, और अपने क्रोधी व्यवहार की मूल जड़ तक पहुँचना होगा। एक उपयोगी सुझाव: यह है कि एक अच्छा मित्र, और विशेष रूप से एक भक्तिपूर्ण जीवनसाथी, इस आत्म-विश्लेषण में बहुत अधिक सहायक सिद्ध हो सकता है।
पापमय क्रोध के दो सबसे सामान्य कारण होते हैं: सम्बन्धों में तनाव और परिस्थितियाँ जो आपकी योजनाओं और अपेक्षाओं के विरुद्ध जाती हैं। यहाँ हम यह विचार करेंगे कि प्रत्येक की पहचान कैसे करें और उनका समाधान कैसे करें।
- सम्बन्धपरक तनाव: स्पष्ट करें, सहन करें और क्षमा करें (कुलुस्सियों 3:12–14) परिवार और कलीसिया के सम्बन्धों में तनाव ही हमारे क्रोधित होने का मुख्य कारण होते है। मेरे पास्टर होने के अनुभव के आधार पर मैंने इन तनावों को तीन श्रेणियों में विभाजित किया है: गलत धारणा से उत्पन्न तनाव, अनैतिक मतभेदों से उत्पन्न तनाव, तथा वास्तविक अपराध और पाप से उत्पन्न तनाव। अपने पापमय क्रोध का सफलता पूर्वक पता लगाने के लिए, सबसे अच्छा तरीका यह है कि अभी कुछ समय पहले हुए किसी भी टकराव पर विचार करें और फिर उस टकराव के कारण का विश्लेषण करने का प्रयास करें। आप जिस भी कारण से क्रोधित हैं, उस कारण की पहचान करने से आपको उस गहरी समस्या को हल करने में सहायता मिलेगी।
सम्बन्धों में तनाव को हल करने का सरल तरीका यह है कि इस विषय पर दूसरे व्यक्ति को भी सम्मिलित करके सम्बन्धित व्यक्ति के साथ बातचीत करें। क्योंकि बातचीत के द्वारा कभी-कभी आपको यह पता चलता है कि यह तो केवल गलत धारणा थी। आपने सोचा कि उस व्यक्ति ने जो कुछ कहा था उसका अर्थ वही था जो आपने सोच लिया था, परन्तु आगे जाँच-पड़ताल करने पर आपको पता चलता है कि उसकी बात को आपने गलत तरीके से समझा था। इस प्रकार एक बार जब यह गलत धारणा दूर हो जाती है, तो क्रोध समाप्त हो जाता है। और तब कोई नुकसान नहीं होता, न ही कोई गलती होती है और क्रोध करने का भी कोई कारण नहीं रह जाता।
दूसरे प्रकार का तनाव सम्भवतः सबसे अधिक भटकाने वाला होता है। इसमें ऐसे विषयों पर मतभेद हो जाते हैं जो एक या दोनों पक्षों के लिए बहुत महत्वपूर्ण हो सकते हैं, परन्तु आवश्यक नहीं कि उनमें पाप भी सम्मिलित हो। यह राजनीति से सम्बन्धित विषय भी हो सकता है — जैसे कि देश के लिए कौन सा उम्मीदवार राष्ट्रपति पद के लिए सबसे उत्तम है। यह बच्चों के पालन-पोषण के प्रति दृष्टिकोण या शराब जैसे विषय पर अलग-अलग विचार हो सकते हैं। या फिर यह साफ़-सफाई, समय निर्धारित करना, या मोबाइल फोन का उपयोग तथा शिष्टाचार जैसे विषयों के प्रति अलग-अलग दृष्टिकोण हो सकते हैं। सू और मेरे व्यय करने और बचत को लेकर अलग-अलग विचार हैं, परन्तु ये मतभेद पाप नहीं हैं।
इसका उपाय क्या है? इसका उपाय सहनशीलता है। दूसरों के पापरहित मतभेदों को उनके विरुद्ध न पकड़े रहना।
कुलुस्सियों 3:12–13अ में यह बात बहुत अच्छी रीति से कही गई है: “इसलिए परमेश्वर के चुने हुओं के समान जो पवित्र और प्रिय हैं, बड़ी करुणा, और भलाई, और दीनता, और नम्रता, और सहनशीलता धारण करो; और एक-दूसरे की सह लो।” परमेश्वर की स्तुति हो कि आप मसीह में स्वतंत्र हैं और घर तथा कलीसिया में अपने प्रियजनों की उन सभी खीज दिलाने वाली आदतों को सहन कर सकते हो। इससे भी अधिक, परमेश्वर की स्तुति हो कि आपके सभी प्रियजन आपके सभी खीज दिलाने वाले तरीकों को सहन करने के लिए स्वतंत्र हैं।
तीसरा तनाव है, निस्संदेह, यह सबसे अधिक पीड़ा देता है। आपके क्रोध का पाप सम्भवतः किसी गलत कार्य की जड़ में है जो आपके विरुद्ध किया गया हो, संभवतः ऐसा अपराध जो कभी सुधारा ही नहीं गया हो। आप मन में द्वेष पाल रहे हैं, और यह न केवल उस सम्बन्ध को, वरन् आपके सभी सम्बन्धों को विषैला बना रहा होता है। आपका क्रोध चरम पर है। इसका क्या समाधान है?
क्षमा। कुलुस्सियों 3:13 आगे कहता है: “और यदि किसी को किसी पर दोष देने को कोई कारण हो, तो एक दूसरे की सह लो, और एक दूसरे के अपराध क्षमा करो: जैसे प्रभु ने तुम्हारे अपराध क्षमा किए, वैसे ही तुम भी करो।” क्षमा का अर्थ है कि अपनी संतुष्टि के दावे को छोड़ देना; इसका अर्थ है कि आप अपने ऋण को चुका हुआ मानकर उसे स्वीकार कर रहे हैं। और यही परमेश्वर के अन्तिम न्याय पर भरोसा करने की इच्छा है।
यदि आप गलत धारणाओं को दूर करें, मतभेदों को सहन करें, और वास्तविक अपराधों को क्षमा करें, तो आपके क्रोध में बहुत भारी कमी आ जाएगी। और स्मरण रहे कि जैसे आप अपने जीवन में क्रोध को राज नहीं करने देने के लिए स्वतंत्र हैं, वैसे ही आप उन सबसे घातक अपराधों को भी समझने, सहन करने और क्षमा करने के लिए भी स्वतंत्र हैं जो आपके विरुद्ध किए गए हैं। पुत्र ने वास्तव में आपको स्वतंत्र किया है और अपनी आत्मा के द्वारा आपको नए जीवन में चलने की सामर्थ्य दी है।
- विपरीत परिस्थितियाँ: परमेश्वर की इच्छा के अधीन रहें (इब्रानियों 12:7-11, याकूब 4:7) हमारा मूल संघर्ष सम्भवतः सम्बन्धों से उतना नहीं होता है, जितना कि परिस्थितियों से होता है, या और अधिक स्पष्ट रूप से कहें तो, ईश्वरीय हस्तक्षेप से जुड़ा होता है। जीवन वैसा नहीं चल रहा है जैसा आपने योजना बनाई थी। वास्तव में, यह तो आपकी योजनाओं और उम्मीदों के बिल्कुल विपरीत चल रहा है। यह आपके स्वास्थ्य से सम्बन्धित हो सकता है, किसी साधारण असुविधाजनक बीमारी से लेकर कैंसर जैसी गम्भीर बीमारी के निदान तक। सम्भवतः भविष्य में कोई अप्रत्याशित परिवर्तन हो जाए या नौकरी चली जाए। इसमें व्यापक चिन्ताएँ भी सम्मिलित हो सकती हैं— जैसे अर्थव्यवस्था, राजनीतिक परिवर्तन, युद्ध या युद्ध का खतरा होना। थोड़ा सोचिए कि 9/11 या कोविड ने किस प्रकार से सब कुछ बदल दिया था। हर स्थिति में, परमेश्वर की योजना हमारी योजना नहीं थी। तो फिर हम उस क्रोध का सामना कैसे करें जो हमारे जीवन के लिए परमेश्वर की इच्छा से संघर्ष करने के कारण उत्पन्न होता है?
हम इस परिस्थिति को चाहे वह कितनी भी पीड़ादायक क्यों न हो, एक बुद्धिमान स्वर्गीय पिता के दिव्य हाथों से उत्पन्न हुई मानकर आरम्भ करते हैं। इब्रानियों 12:7–11 कहता है:
तुम दुःख को अनुशासन समझकर सह लो; परमेश्वर तुम्हें पुत्र जानकर तुम्हारे साथ बर्ताव करता है, वह कौन सा पुत्र है, जिसकी ताड़ना पिता नहीं करता? यदि वह ताड़ना जिसके भागी सब होते हैं, तुम्हारी नहीं हुई, तो तुम पुत्र नहीं, पर व्यभिचार की सन्तान ठहरे! फिर जब कि हमारे शारीरिक पिता भी हमारी ताड़ना किया करते थे और हमने उनका आदर किया…। वे तो अपनी-अपनी समझ के अनुसार थोड़े दिनों के लिये ताड़ना करते थे, पर यह तो हमारे लाभ के लिये करता है, कि हम भी उसकी पवित्रता के भागी हो जाएँ। और वर्तमान में हर प्रकार की ताड़ना आनन्द की नहीं, पर शोक ही की बात दिखाई पड़ती है, तो भी जो उसको सहते-सहते पक्के हो गए हैं, पीछे उन्हें चैन के साथ धार्मिकता का प्रतिफल मिलता है।
जब तक हम अपने प्रभुता सम्पन्न परमेश्वर को अपनी कठिन परिस्थितियों का रचयिता नहीं मानते, तब तक हम उन्हें केवल अन्याय से भरे मानवीय घटनाक्रम के रूप में देखने के लिए प्रलोभित रहते हैं। इससे निस्संदेह, अंततः परमेश्वर के प्रति क्रोध उत्पन्न होता है, और उसके पश्चात् बड़ी सरलता से कड़वाहट और मन में रोष उत्पन्न हो जाता है।
परन्तु जब हम यह स्वीकार करते हैं कि “प्रभु उसी की ताड़ना करता है जिससे वह प्रेम करता है” (इब्रानियों 12:5), और यह कि दर्द, दुः ख, परीक्षाएँ और क्लेश केवल उसके हाथों के वे साधन हैं जिनसे वह हमारे विश्वास को शुद्ध करता है, तब हम अपने क्रोध को यह कहते हुए त्यागना आरम्भ कर सकते हैं, “मेरी नहीं, परन्तु तेरी ही इच्छा पूरी हो” (मत्ती 26:39) और “उस आनन्द से आनन्दित हो जो वर्णन से बाहर है और महिमा से परिपूर्ण है” (1 पतरस 1:6–8)। यहाँ तक कि पुत्र ने भी दुःख उठाकर आज्ञाकारिता सीखी (इब्रानियों 5:8) और उस अनन्त “आनन्द के लिए जो उसके आगे धरा था” “क्रूस की लज्जा को सह लिया” (इब्रानियों 12:2)। परमेश्वर हमें अनुग्रह के साथ अपने वचन पर भरोसा रखने और उसका पालन करने के लिए प्रशिक्षित कर रहा है, भले ही यह कठिन क्यों न हो।
याकूब 4:7 इसे संक्षेप में कहता है: “इसलिए परमेश्वर के अधीन हो जाओ; और शैतान का सामना करो, तो वह तुम्हारे पास से भाग निकलेगा।” मसीह के सुसमाचार में परमेश्वर की सामर्थ्य ने, हमारे भीतर वास करने वाली आत्मा के द्वारा, जिसने हमें मसीह से जोड़ा है, आपको सभी परिस्थितियों में अपने महान परमेश्वर और उद्धारकर्ता के अधीन रहने के लिए स्वतंत्र किया है।
और अब, पापमय क्रोध और उसकी मूल जड़ को दूर करके, हमें उसके स्थान पर कुछ और ही रखना होगा, क्योंकि, जैसा कि चाल्मर्स ने ऊपर उल्लेख किया है कि, प्रकृति शून्य से घृणा करती है। जैसे-जैसे हम अगले चरण की ओर बढ़ते हैं, यह फिर से उचित और पवित्र है कि हम परमेश्वर को उसके द्वारा मसीह में हमारे लिए किए गए कार्यों के लिए धन्यवाद करें, क्योंकि यह हमें स्मरण कराता है कि हम वास्तव में पाप के प्रभुत्व से स्वतंत्र हैं और साथ ही प्रेम को धारण करने के लिए भी स्वतंत्र हैं।
चरण 4: प्रेम धारण करें (कुलुस्सियों 3:14)
“और इन सब के ऊपर प्रेम को जो सिद्धता का कटिबन्ध है बाँध लो” (कुलुस्सियों 3:14)।
आराधना का मूल उद्देश्य हमारे महान परमेश्वर से प्रेम करना, उसकी आराधना करना और उसे निहारना है। वास्तव में, दो बड़ी आज्ञाएँ हैं: परमेश्वर से अपने सम्पूर्ण हृदय से प्रेम करना और अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम करना। और मसीह में अपने पड़ोसी के प्रति प्रेम, स्वयं परमेश्वर के प्रति प्रेम की कसौटी है (1 यूहन्ना 4:20)।
इफिसियों 5:1-2 उस प्रेम को बलिदान के रूप में परिभाषित करता है: “इसलिए प्रिय बच्चों के समान परमेश्वर का अनुसरण करो; और प्रेम में चलो जैसे मसीह ने भी तुम से प्रेम किया; और हमारे लिये अपने आप को सुखदायक सुगन्ध के लिये परमेश्वर के आगे भेंट करके बलिदान कर दिया।” पवित्र शास्त्र में प्रेम को बलिदान के रूप में प्रस्तुत करना एक सामान्य विषय है। दूसरे के लिए अपना प्राण देना प्रेम का सबसे बड़ा प्रकटीकरण है (यूहन्ना 15:13)। वास्तव में, हम मसीह के द्वारा हमारे लिए किए गए बलिदान से प्रेम को जानते हैं (1 यूहन्ना 3:16)। बलिदानी प्रेम की सबसे विस्तृत और व्यावहारिक अभिव्यक्ति रोमियों के अध्याय 12-15 में देखी जा सकती है। रोमियों 12:1 कहता है, “इसलिए हे भाइयों, मैं तुम से परमेश्वर की दया स्मरण दिलाकर विनती करता हूँ, कि अपने शरीरों को जीवित, और पवित्र, और परमेश्वर को भावता हुआ बलिदान करके चढ़ाओ; यही तुम्हारी आत्मिक सेवा है।”
इस प्रकार, “अपने शरीर को बलिदान के रूप में चढाना” “प्रेम को धारण करना” कहने का एक और तरीका है। रोमी विश्वासियों के लिए, प्रेम का अर्थ था अपने वरदानों का उपयोग करके कलीसिया रूपी देह का निर्माण करना (12:3–8) — एक-दूसरे से सच्चे प्रेम के साथ (12:9–13), बिना बैरभाव के (12:14–13:7), तत्परता से (13:8–14), और दुर्बल या बलवान भाइयों के साथ नम्रता और सम्मानपूर्वक व्यवहार करना (14:1–15:13)। दुर्बल भाई वे हैं जिनका विवेक उन्हें ऐसे कार्यों के लिए बाध्य करता है जो पवित्रशास्त्र की आज्ञाओं के परे हैं, जबकि बलवान भाई इस प्रकार के बन्धनों से नहीं बंधे होते हैं। अतः नम्रता और सम्मानपूर्वक प्रेम करने का अर्थ है कि एक-दूसरे को बिना किसी न्याय या अपमान के स्वीकार करना (14:1–12), और दुर्बल भाई के विवेक का उल्लंघन करने से बचना — ताकि वह ठोकर खाकर विश्वास से दूर न हो जाए (14:13–15:13)।
व्यवहारिक रूप से, रोमियों अध्याय 12 हमें आज इसलिए प्रेरित करता है कि हम प्रेम को धारण करते हुए अपने अनुग्रह के वरदानों का उपयोग मसीह की देह अर्थात् कलीसिया के भले के लिए करें। और हम पवित्र लोगों की आवश्यकताओं में योगदान देकर, यहाँ तक कि अपने शत्रुओं की सहायता करके भी प्रेम करते हैं। क्या मसीह के समान कुछ और हो सकता है, सिवाय इस के कि हम बुराई के बदले आशीष दें, सम्भवतः शत्रु की भलाई के लिए सच्चे मन से प्रार्थना के द्वारा आशीषित करना?
रोमियों 13 हमें प्रेम धारण करने में यह सिखाकर सहायता करता है, कि दस आज्ञाओं में से प्रत्येक आज्ञा का सारांश यही है कि अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम कर। मसीह का पहाड़ी उपदेश हमारे लिए एक व्याख्यात्मक मार्गदर्शक का कार्य करता है। पवित्रता, मेल-मिलाप, सहभागिता और ईर्ष्या न करने से पहचाने गए सम्बन्ध, व्यभिचार न करने, हत्या, चोरी या लालच न करने की आज्ञाओं के अनुरूप हैं (रोमियों 13:8-10)।
और मसीह के आगमन की निकटता को देखते हुए (रोमियों 13:11-14), प्रेम धारण करने की तत्काल आवश्यकता है। हमें विशेष रूप से अपने साथी सदस्यों के साथ मतभेदों को उसके लौटने से पहले शीघ्रता से सुलझा लेना चाहिए, तथा अपने क्रोध को सूर्यास्त तक समाप्त कर देना चाहिए। यदि हम किसी भाई या बहन के साथ असहमति में हैं, तो हमें उन्हें तुरन्त उन्हें फोन करना चाहिए, या कम से कम भविष्य में बात करने का समय तय करने के लिए ऐसा करना चाहिए। हमें शीघ्रता से स्वीकार करना चाहिए और साथ ही शीघ्र ही क्षमाभी करना चाहिए। और जहाँ तक हमारी सामर्थ्य का प्रश्न है, हमें एक-दूसरे के साथ शान्ति के साथ जीवन जीने के लिए जो भी आवश्यक हो करना चाहिए (रोमियों 12:16–18)।
प्रेम धारण करने के लिए निश्चित रूप से एक दूसरे को स्वीकार करना आवश्यक है,न कि एक दूसरे को अनैतिक मतभेदों के आधार पर आँकना, चाहे वे दुर्बल हों या बलवान हों (रोमियों 14:1–15:13)। लोगों की आराधना करने की शैली भी अलग-अलग होती है — कुछ लोग कलीसिया में गीत गाते समय बहुत उत्साही होते हैं, जबकि अन्य लोग बहुत संकोची बनें रहते हैं। और साथी विश्वासियों की यह धारणा भी अलग-अलग होती है कि प्रभु के दिन (विश्राम दिन) में कौन-कौन से कार्य स्वीकार्य हैं — कुछ इसे आराधना और विश्राम का दिन मानते हैं, जबकि अन्य लोग रविवार के दिन टिकट लेकर अपने मन पसन्द समूह का खेल देखने के लिए में कोई आपत्ति नहीं मानते। कुछ मसीही लोग शराब पीने और सिगार पीने को स्वतंत्रता मानते हैं, जबकि दूसरों को यह गलत लगता है। लोकप्रिय संगीत, यहाँ तक कि मसीही लोगप्रिय संगीत भी मसीह की कलीसिया में कुछ लोगों को आपत्तिजनक लगता है, जबकि बहुत से अन्य लोगों को इसमें कोई समस्या नहीं दिखती है। कुछ लोगों के लिए त्वचा पर स्थाई चिन्ह गुदवाना प्रभु के लिए किया जाने वाला कार्य हो सकता है, जबकि दूसरों के लिए हमारा शरीर जो परमेश्वर का मन्दिर है — का अपवित्र करना प्रतीत होता है। हर स्थिति में, प्रेम को धारण करना एक-दूसरे को स्वीकार करना है — इसका अर्थ उन बातों के प्रति बिना आलोचना करने वाली भावना रखना है, जिनके विषय में पवित्रशास्त्र में कोई बन्धन नहीं है।
परन्तु इन सब बातों का क्रोध पर नियंत्रण करने से क्या लेना-देना है? जिस व्यक्ति के लिए आप अपना प्राण बलिदान कर रहे हैं, उस व्यक्ति पर क्रोध करना कठिन होता है। जब आपके सम्बन्धों में स्वीकार करने, क्षमा करने और मेल-मिलाप करने की तत्परता होती है, तब क्रोधित रहना कठिन हो जाता है। और जब आप किसी ऐसे व्यक्ति की निर्बलताओं को सहन करने और उसे जैसा है वैसा ही स्वीकार करने के लिए उत्सुक होते हैं, जो आपसे बिल्कुल भिन्न है, तब उसके प्रति क्रोधित रहना कठिन हो जाता है। अतः जब आप प्रेम को धारण करते हैं, तब क्रोधित रहना कठिन हो जाता है।
चरण 5: निरन्तर संघर्ष के लिए तैयार रहें (1 पतरस 5:5–9)
यह बलिदान — यह प्रेम को धारण करना — उस रिक्त स्थान को भर देता है जो पाप और पापपूर्ण क्रोध को त्यागने से उत्पन्न होता है। फिर भी, सभी पापों को मार देने के बाद भी, पाप की उपस्थिति बनी रहती है। हमारे पापपूर्ण क्रोध पर विजय पाने का अन्तिम चरण अपेक्षाओं के प्रबन्धन को आत्मिक युद्ध के साथ जोड़ देना है।
पवित्रशास्त्र हमें स्मरण दिलाता है कि पाप और शैतान के साथ संघर्ष निरन्तर नहा हुआ है: “सचेत हो, और जागते रहो, क्योंकि तुम्हारा विरोधी शैतान गर्जनेवाले सिंह के समान इस खोज में रहता है, कि किसको फाड़ खाए। विश्वास में दृढ़ होकर उसका सामना करो…” (1 पतरस 5:8-9)। शैतान जीवित है, परन्तु वह स्वस्थ नहीं है। उसे पता है कि उसका समय कम है, और वह मसीह तथा उसकी कलीसिया के प्रति क्रोधित है, सम्भवतः वह अधिक से अधिक मसीही लोगों और कलीसियाओं को नष्ट करने का प्रयास कर रहा है (प्रकाशितवाक्य 12:12–17)।
पाप की सामर्थ्य तोड़ी जा चुकी है, परन्तु पाप की उपस्थिति का शेष भाग हमारे शत्रु को कार्य करने के लिए पर्याप्त अवसर देता है। हमारा एक शत्रु है, जिसका एकमात्र उद्देश्य हमारी आत्माओं को नष्ट करना है, और हमें विश्वास से भटक जाने के लिए परीक्षा में डालता है। इसलिए हमें मृत्यु तक चलने वाले निरन्तर संघर्ष के लिए तैयार रहना चाहिए, जैसा कि लूथर हमें स्मरण दिलाते हैं कि, “पृथ्वी पर उसके समान कोई नहीं है।” परन्तु हमें निराश नहीं होना चाहिए, “क्योंकि जो तुम में है, वह उससे जो संसार में है, बड़ा है” (1 यूहन्ना 4:4)। यदि हम शैतान का सामना करते हैं, तो वह हमारे पास से भाग निकलेगा (याकूब 4:7)। परन्तु हम उसका सामना कैसे कर सकते हैं?
हम निरन्तर स्तुति और प्रार्थना के बलिदान चढ़ाकर अपने आप को परमेश्वर को अर्पित कर सकते हैं।
इब्रानियों 13:15 हमें नई वाचा के याजकों के रूप में आज्ञा देता है कि हम मसीह के द्वारा, अर्थात् उसके नाम का धन्यवाद करने वाले होठों का फल, स्तुतिरूपी बलिदान सर्वदा चढ़ाया करें। ऐसा बलिदान हमें निरन्तर उस महान उद्धार के कार्य का स्मरण कराता है जो पहले ही पूरा हो चुका है: हम नई आत्मा के कारण नयी सृष्टि हैं, जिसने हमें नया जन्म दिया है और एक नया हृदय बनाया है, और यह सब उस नई वाचा पर आधारित है जो मसीह के लहू में मुहरबंद की गई है, ताकि हम नए जीवन में चलें; अर्थात् प्रेम में चलें (2 कुरिन्थियों 5:17, यहेजकेल 36:26–27, यूहन्ना 3:3–8, 1 पतरस 1:3, इब्रानियों 8:8-12, रोमियों 6:4)।
जब हम गाते हैं कि, “मेरी जंजीरें टूट गईं, मेरा हृदय स्वतंत्र हो गया है,” तो हम इस सत्य को बल देते हैं कि अब हम पाप के दास नहीं हैं, वरन् परमेश्वर के दास हैं और उसके अनुसार जीवन जीने के लिए स्वतंत्र हैं। पुरानी बातें बीत गई हैं; सब नई हो गई, जिनमें पापमय क्रोध को त्यागकर प्रेम धारण करने की स्वतंत्रता भी सम्मिलित है। इसलिए आइए हम हर बात में धन्यवाद देते हुए स्तुतिरूपी बलिदान चढ़ाएँ (2 थिस्सलुनीकियों 5:18)।
प्रार्थना का बलिदान चढ़ाना नई वाचा के याजकों के समाज का एक और विशेष अधिकार और कर्तव्य है। पवित्रशास्त्र धूप की वेदी पर प्रतिदिन चढ़ाए जाने वाले बलिदानों को हमारी प्रार्थनाओं के रूप में उपयोग करता है (निर्गमन 30:1-10, प्रकाशितवाक्य 5:8)। पाप की उपस्थिति इतनी व्यापक है कि हमें प्रतिदिन परमेश्वर की सहायता की अत्यन्त आवश्यकता होती है, और प्रार्थना ही परमेश्वर तक पहुँचने का मार्ग है।
हमें किस बात के लिए प्रार्थना करनी चाहिए? उसकी आत्मा के द्वारा पाप को निरन्तर मारते रहने की सामर्थ्य पाने के लिए (कुलुस्सियों 3:5-8, इब्रानियों 4:16), हठीले मन के द्वारा पाप में गिरने से बचाव के लिए (मत्ती 6:13, इब्रानियों 3:12-14), और पाप की उपस्थिति से अन्तिम छुटकारा पाने के लिए (रोमियों 8:23)। पवित्र आत्मा और सृष्टि अन्तिम छुटकारे के लिए विश्वासी के करहाने में सम्मिलित हो जाते हैं (रोमियों 8:18-30)। और हमें यह विश्वास है कि परमेश्वर हमारे उन करहानो और प्रार्थना के उन बलिदानों का उत्तर देगा, और न केवल अन्तिम छुटकारे के लिए, वरन् वर्तमान समय में पाप और शैतान से लड़ने के लिए हमारी जो आवश्यकता है, उसे भी पूरा करेगा (यूहन्ना 15:7; इफिसियों 1:15-23, 3:14-21; 1 यूहन्ना 5:14-15)। हमें हियाव नहीं छोड़ना, और बिना रुके प्रार्थना करनी चाहिए, क्योंकि हमारा महान परमेश्वर “अब जो ऐसा सामर्थी है, कि हमारी विनती और समझ से कहीं अधिक काम कर सकता है, उस सामर्थ्य के अनुसार जो हम में कार्य करता है” (इफिसियों 3:20)
4 क्रोध पर विजय पाने में बाधाएँ और आशा
बाधाएँ
हमारे कदम स्पष्ट हैं, हमारी विजय निश्चित है। फिर भी, जब हम एक निर्दयी शत्रु के विरुद्ध जीवन भर युद्ध का सामना करते हैं, तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि पापपूर्ण क्रोध को समाप्त करने में कई बाधाएँ भी आएँगी। अधिकाँश बाधाएँ उन्हीं रुकावटों से उत्पन्न होती हैं जिनका उल्लेख इस मार्गदर्शिका में पहले ही किया गया है, जैसे कि मसीह में हमारी स्वतंत्रता को लेकर भ्रम, क्रोध की भावना के विषय में अस्पष्टता, और क्रोध का समाधान करने में हमारी दृष्टिकोण में असफलता।
सम्भवतः हमारी सबसे बड़ी बाधा मसीह में हमारी स्वतंत्रता के विषय में भ्रम है। हम अधिकाँश सच में यह विश्वास करने में असफल रहते हैं कि पाप की सामर्थ्य को तोड़ा जा चुका है, जैसे कि पुराना मनुष्यत्व पूरी रीति से उतार कर फेंक दिया गया है और विश्वास के द्वारा मसीह के साथ हमारी एकता के कारण नया मनुष्यत्व धारण कर लिया गया है। रोमियों 7 जैसे भाग कुछ लोगों को ऐसा प्रतीत होते हैं मानो वे उस स्वतंत्रता को सीमित कर रहे हों, जिससे विश्वासी भ्रमित हो जाता है और लगातार पाप को त्यागने तथा धार्मिकता को अपनाने में आत्मविश्वास से वंचित रह जाता है। 3 परन्तु जैसा कि हमने देखा है, कि जब ऐसे भागों को सही रीति से समझा जाता है, तो वे वास्तव में उस स्वतंत्रता को और भी दृढ़ करते हैं जो परमेश्वर के पुत्र द्वारा पहले से ही हमारे लिए सुरक्षित रखी गई है।
पापपूर्ण और बिना पापपूर्ण भावनाओं के बीच अन्तर की अस्पष्टता, क्रोध पर विजय पाने में एक और बाधा होती है। जैसा कि हमने देखा है, कि सभी भावनाओं का एक उदासीन एवं अनैतिक आधार होता है, और यदि सही तरीके से प्रबन्ध न किया जाए, तो पापपूर्ण बन सकता है। अनैतिक क्रोध से कटुता और यहाँ तक कि मौखिक दुर्व्यवहार, वर्षों तक तेजी से आगे बढ़ने के कारण, इस अन्तर को समझने में हमारी योग्यता को धीमा कर देता है, और सम्भवतः हमें इस अन्तर के अस्तित्व को अस्वीकार करने के लिए परीक्षा में भी डाल सकता है। अपने हृदय को क्रोधित होना सिखाना, और फिर भी पाप न करने के लिए स्पष्टता और समय की आवश्यकता होती है।
हम क्रोध को नियंत्रित करने के प्रयास में इस बात में असफल हो सकते हैं कि हम क्रोध को समय पर नियंत्रित नहीं करते या इसके मूल कारण को दूर नहीं करते। इससे भी अधिक मुख्य बात यह है कि हम अपने पापपूर्ण क्रोध की पूर्ण उत्तरदायित्व उठाने में असफल हो जाते हैं। और हम क्रोध के प्रति निर्दयी तथा शून्य सहनशीलता दृष्टिकोण अपनाने में विफल हो सकते हैं, जैसा कि उस बात के लिए उपयुक्त है जो हमारे भीतर की आत्मा को इतना अधिक दु: खी करती है।
सम्भवतः हमारी सबसे बड़ी असफलता यह है कि हमने परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं पर उम्मीद लगाना छोड़ दिया है।
यीशु ने उस आनन्द के लिये जो उसके आगे धरा था, लज्जा की कुछ चिन्ता न करके, क्रूस का दुःख सहा; (इब्रानियों 12:2)। और हमसे भी ऐसा ही करने के लिए आग्रह किया जाता है, “उस अनुग्रह की पूरी आशा रखो, जो यीशु मसीह के प्रगट होने के समय तुम्हें मिलनेवाला है (1 पतरस 1:13)। परन्तु वह आशा, वह आनन्द वास्तव में क्या है? और इसे केवल इच्छाओं पर आधारित कल्पना न बनने से कौन रोकता है?
आशा
“हमारे प्रभु यीशु मसीह के परमेश्वर और पिता का धन्यवाद हो, जिसने यीशु मसीह को मरे हुओं में से जी उठने के द्वारा, अपनी बड़ी दया से हमें जीवित आशा के लिये नया जन्म दिया, अर्थात् एक अविनाशी और निर्मल, और अजर विरासत के लिये जो तुम्हारे लिये स्वर्ग में रखी है, जिनकी रक्षा परमेश्वर की सामर्थ्य से, विश्वास के द्वारा उस उद्धार के लिये, जो आनेवाले समय में प्रगट होनेवाली है, की जाती है” (1 पतरस 1:3-5)।
हमारी आशा क्या है? यह एक प्रतिज्ञा की गई विरासत से कम नहीं है, परमेश्वर की उपस्थिति में अनन्तकाल में जब पाप को अंततः मार डाला जाएगा (प्रकाशितवाक्य 21:9-27), मृत्यु को अंततः पराजित किया जाएगा (प्रकाशितवाक्य 21:1-8), और मेम्ने के साथ हमारा विवाह अंततः संपन्न होगा (प्रकाशितवाक्य 19:6-10)। रोमियों 8:28-30 और 35-39 उस आशा को बड़ी सुन्दरता से व्यक्त करते हैं:
और हम जानते हैं कि जो लोग परमेश्वर से प्रेम रखते हैं, उनके लिये सब बातें मिलकर भलाई ही को उत्पन्न करती हैं; अर्थात् उन्हीं के लिये जो उसकी इच्छा के अनुसार बुलाए हुए हैं। क्योंकि जिन्हें उसने पहले से जान लिया है उन्हें पहले से ठहराया भी है कि उसके पुत्र के स्वरूप में हों ताकि वह बहुत भाइयों में पहलौठा ठहरे। फिर जिन्हें उसने पहले से ठहराया, उन्हें बुलाया भी, और जिन्हें बुलाया, उन्हें धर्मी भी ठहराया है, और जिन्हें धर्मी ठहराया, उन्हें महिमा भी दी है।
कौन हमको मसीह के प्रेम से अलग करेगा? क्या क्लेश, या संकट, या उपद्रव, या अकाल, या नंगाई, या जोखिम, या तलवार? … नहीं, इन सब बातों में हम उसके द्वारा जिस ने हम से प्रेम किया है, जयवन्त से भी बढ़कर हैं। क्योंकि मैं निश्चय जानता हूँ कि न मृत्यु, न जीवन, न स्वर्गदूत, न प्रधानताएँ, न वर्तमान, न भविष्य, न सामर्थ, न ऊँचाई, न गहराई, और न कोई और सृष्टि, हमें परमेश्वर के प्रेम से जो हमारे प्रभु मसीह यीशु में है, अलग कर सकेगी।
अपने लोगों उद्धार करने के लिए परमेश्वर की विश्वासयोग्य ही हमारी आशा है, न केवल पापी क्रोध पर विजय पाने में, वरन् सामान्य रूप से भी हर पाप पर विजय पाने में हमारी आशा हैं। परमेश्वर ने प्रतिज्ञा की है कि जिन्हें पहले से जान लिया गया है, वे सब महिमा पाएँगे, और कोई भी उस योजना को विफल नहीं कर सकता; कोई भी भेड़ों को उनके अच्छे चरवाहे के प्रेम से अलग नहीं कर सकता है।
हमारा भविष्य — जिसे “अभी नहीं” कहा जाता है — निश्चित है। हमें पूरा भरोसा है कि हम पाप की उपस्थिति और आने वाले क्रोध से बचाए जाएँगे (रोमियों 5:1–11, 8:18–39)। परन्तु उस “अभी नहीं” वाली प्रतिज्ञा को सुनिश्चित करने वाली बात रोमियों 5:12–8:17 का “पहले से” पूरा हो चुका कार्य है। ये आयतें हमें यह आश्वासन देती हैं कि परमेश्वर ने अपने लोगों को पहले ही पाप के दण्ड से, और विशेष रूप से पाप की सामर्थ्य से बचा लिया है। विचार कीजिए कि विश्वासियों के जीवन में परमेश्वर पहले से ही क्या-क्या कर चुका है:
- हम अब आदम में नहीं, वरन् मसीह में हैं (रोमियों 5:12–21)।
- हम अब व्यवस्था के अधीन नहीं, वरन् अनुग्रह के अधीन हैं (रोमियों 6:1–14)।
- अब हम पाप के नहीं वरन् धार्मिकता के दास हैं (रोमियों 6:15–7:25)।
- अब हम शरीर में नहीं परन्तु आत्मा में हैं (रोमियों 8:1-17)।
- हम पहले से ही मृत्यु के शरीर से स्वतंत्र हो चुके हैं, जो पाप की सामर्थ्य का प्रतिनिधित्व करता है (रोमियों 7:24, 8:2)।
हमें भविष्य में पाप की उपस्थिति से परमेश्वर के छुटकारे पर इसलिए भरोसा है क्योंकि हम वर्तमान में पाप की सामर्थ्य से परमेश्वर के छुटकारे का अनुभव पहले ही कर चुके हैं। इसलिए, पापी क्रोध पर हमारी अन्तिम विजय निश्चित है। और हमारी आशा भी सुरक्षित है।
निष्कर्ष
सन् 1975 में, जब मैं ओहियो प्रान्त में विद्यार्थी था, तब परमेश्वर ने प्रसन्न होकर मुझे मेरे पाप से बचाया। उस शरद ऋतु में, मैंने जाना कि यीशु मेरे पापों के कारण मरने के लिए आया और जो कोई उन पर विश्वास करेगा, वह बचाया जाएगा। उस वर्ष के अन्त में जब मैंने अपना जीवन मसीह को समर्पित किया, तो मैंने यूहन्ना 8:36 का अनुभव किया; पुत्र ने मुझे न केवल पाप के भयानक और अनन्त दण्ड से, परन्तु पाप की पंगु बनाने वाली और दुर्बल करने वाली सामर्थ्य से भी स्वतंत्र किया। जैसा कि भजनकार ने लिखा है, “मेरी बेड़ियाँ टूट गईं, मेरा हृदय स्वतंत्र हो गया, मैं उठा, आगे बढ़ा और तेरा अनुसरण किया।” तुरन्त ही, मेरे भीतर पवित्र आत्मा ने शरीर के कार्यों को नष्ट करना आरम्भ कर दिया और मैं जीवन के नएपन में चलने लगा।
मुझे यह विचार आता है कि जब आप इस “क्षेत्रीय मार्गदर्शिका” को पढ़ रहे होंगे, तो आप सोच रहे होंगे कि आप एक विश्वासी हैं, फिर भी पाप के दास हैं, या सम्भवतः यह भी जानते होंगे कि आप अभी भी विश्वासी नहीं हैं। आपके जीवन में पाप का निरन्तर बना रहना यह संकेत देता है कि पाप का प्रभुत्व अभी भी समाप्त नहीं हुआ है। कामुकता से भरे हुए पाप की आदतें जैसे अश्लील सामग्री, शराब या भाँग जैसी नशे की आदतें, क्रोध और उससे जुड़े घातक प्रभाव — पाप की सभी आदतें उचित तरीके से स्वयं की जाँच के लिए पर्याप्त कारण होने चाहिए (1 कुरिन्थियों 6:9–10, 2 कुरिन्थियों 13:5, गलातियों 5:19–21)।
परन्तु सुसमाचार यह है: कि यीशु आज भी पापियों को स्वीकार करता है, यहाँ तक कि कलीसिया में जाने वाले लोगों को भी स्वीकार करता है। उस दिन उसे आपसे यह न कहना पड़े कि, “मैंने तुम को कभी नहीं जाना, हे कुकर्म करनेवालों, मेरे पास से चले जाओ” (मत्ती 7:23)। इसलिए आज ही मसीह के पास आओ, और उसकी आत्मा को तुम्हें शुद्ध करने दो, जो पाप के दण्ड को क्षमा करती है और पाप की सामर्थ्य को नष्ट कर देती है। प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास रखो। उसके कार्य में पूरी रीति से विश्राम पाओ और सच्ची स्वतंत्रता का आनन्द लो, क्योंकि “यदि पुत्र आपको स्वतंत्र करेगा, तो आप सच में स्वतंत्र हो जाओगे।”
लगभग पचास वर्ष हो गए हैं जब मैंने अपने पापमय क्रोध को समाप्त करना आरम्भ किया था। परन्तु यह कहना झूठ होगा कि अब मैं इससे संघर्ष नहीं करता हूँ। यही तो बुरी आदतों और मूलभूत पापों का स्वभाव है। वास्तव में, कभी-कभी मैंने क्रोधित स्वभाव को प्रभावी होने दिया है। परन्तु उसके अनुग्रह से मैं पापमय क्रोध के साथ अपने लम्बे समय से चल रहे संघर्ष में सफलता पा रहा हूँ। मुझे एक कहानी साझा करने दीजिए जो आपको अपनी लड़ाई में आपको प्रोत्साहित कर सकती है।
विवाह के 16 वर्ष के पश्चात् मुझे मेरी पत्नी के द्वारा वार्षिक, विशेष रूप से निर्मित, वर्ष भर मनाए जाने वाले बड़े दिन के आभूषण के रूप में एक सर्वाधिक प्रतिष्ठित पुरस्कार मिला, जिसे उसने परिवार के प्रत्येक सदस्य के लिए बनाया था। परन्तु तब तक, बड़ा दिन मेरे लिए एक कठिन समय था। सच कहूँ तो, मुझे दूसरों को, विशेषकर अपनी पत्नी और बच्चों को, उपहार देना बहुत पसन्द है। परन्तु मुझे ऐसा करने के लिए विवश होना बिल्कुल भी पसन्द नहीं था, विशेषकर इस बहाने कि हम किसी तरह यीशु मसीह और उनके जन्म का उत्सव मना रहे थे। इसलिए हमारे विवाह के पहले 16 वर्षों तक, सू को बड़े दिन के पूरे समय में एक कंजूस पति को सहना पड़ा।
परन्तु सन् 1997 में, मैंने शान्ति स्वीकार की और यह मान लिया कि बड़े दिन का समय धार्मिक त्यौहार की तुलना में परिवारिक अवकाश अधिक है (गल. 4:12)। इससे मुझे बड़े दिन के समय में सच्चे आनन्द के साथ सम्मिलित होने का अवसर मिला और मेरे न्हीटर कोई पाखण्ड की भावना नहीं रही, जो मेरे पापमय क्रोध का महत्वपूर्ण स्रोत सिद्ध हुई। मेरा बड़े दिन पर गुस्से से भरा हुआ चेहरा अब अनुग्रह से भर गया। और मेरा सन् 1997 का आभूषण? एक सांता टोपी जिस पर लिखा था: “सबसे अधिक सुधार।”
लगभग पाँच दशकों से, परमेश्वर ने न केवल क्रोध के पाप को, वरन् कई अन्य पापों को भी नष्ट करने में मेरी सहायता की है, क्योंकि वह मुझे अपने प्रिय पुत्र के सुन्दर स्वरूप में ढालता रहा है। परमेश्वर ने जो अद्भुत कार्य किए हैं उसके लिए उसकी महिमा हो!
अन्तिम टिप्पणियाँ
- जी. के. बील, हम वही बनते जाते हैं जिसकी हम आराधना करते हैं: मूर्तिपूजा से सम्बन्धित बाइबल आधारित ईश्वर विज्ञान (आईवीपी शैक्षणिक संस्थान, 2008)।
- यह याकूब 5:16ब का अंग्रेजी मानक संस्करण (ESV) वैकल्पिक पठन है।
- गलातियों 5 एक सम्बन्धित भाग है जिसकी गलत व्याख्या ने बहुत भ्रम उत्पन्न किया है। गलातियों 5:16-18 की उपयोगी व्याख्या के लिए, गलातियों पर संत ऑगस्टिन की टिप्पणी देखें।