#50 अपने मन की रक्षा करना: प्रलोभनों से भरे संसार में अपनी आत्मा को सुरक्षित रखना
परिचय
“सबसे अधिक अपने मन की रक्षा कर; क्योंकि जीवन का मूल स्रोत वही है।”
— नीतिवचन 4:23
सीमाओं को सुरक्षित रखने की धारणा, जीवन के कई बातों में देखी जा सकती है। इतिहास दिखाता है कि बाहर के खतरों से अन्दर वालों को सुरक्षित रखने के लिये दीवारों, गढ़ों, और खन्दकों का प्रयोग किया गया है। अतीत की ये संरचनाएँ हानि के उद्देश्य से आने या आक्रमण करने वालों से बचाव के लिये कार्य करती थीं। उनकी अवहेलना करने से लोग खुले और असुरक्षित हो जाते थे।
सेना या कानून के पालन को लागू करने के परिप्रेक्ष्य से, एक सुरक्षित क्षेत्र का निर्माण कर लेना, कार्य को ज़ारी रखने में सहायक होता है, और सम्भावित व्यवधानों की रोक-थाम हो जाती है। किसी देश की सेना के किसी खतरनाक क्षेत्र में जाने और अपनी योजना के अगले चरण को कार्यान्वित करने के लिए, तुरन्त ही अपने चारों ओर सुरक्षा का घेरा बना लेने की कल्पना कीजिये। इसी प्रकार से हम किसी हिंसक घटना के घटित हो जाने के बाद, खतरे को नियंत्रित करने और किसी अन्य हानि के होने को कम करने के लिए, चारों ओर एक बाड़ा बना लेने के बारे में भी सोच सकते हैं।
हम भवनों और रिहायशी इलाकों के चारों ओर सुरक्षा के प्रबन्ध होने की अपेक्षा करते हैं। कैमरा, द्वार, और कुछ स्थानों पर पहरेदार, यह सुनिश्चित करते हैं कि केवल वे ही लोग अन्दर आ सकें जिन्हें आने का अधिकार है। रहने के व्यक्तिगत स्थानों के लिये, द्वार पर लगी घण्टी के साथ ही अब कैमरे भी लगाये जाने लगे हैं, ताकि वे घर के सामने होने वाली हर गतिविधि को रिकॉर्ड कर लें। ऐसा लगता है कि अपनी सम्पत्ति और सामग्री की सुरक्षा के लिये हम हर सम्भव प्रयास करेंगे। उस आवारा पशु या सामान लाने वाले व्यक्ति के कारण चाहे जितनी भी बार हल-चल होने की सूचना मिले, परन्तु हम सन्तुष्ट रहते हैं कि जो भी हो रहा है, हम उसे देख सकते हैं।
हम इस पर ध्यान लगाए नहीं रखते हैं कि हमारे चारों ओर क्या खतरे बने रहते हैं, परन्तु हमें एहसास है कि उचित सुरक्षा की लापरवाही करने में बुद्धिमानी नहीं है, विशेषकर तब, जब संभावित खतरों की सूची बढ़ती ही चली जा रही है। हमने साइबर सुरक्षा के बारे में बात ही नहीं की है, और न ही औरों को हानि पहुँचाने के लिए तकनीक के अनगिनत तरीकों से प्रयोग किए जाने के बारे में कोई बात की है।
और जिसे हानि पहुँचाई जा सकती है उसकी सुरक्षा करने की आवश्यकता, उस सुरक्षित की जा रही वस्तु की कीमत के अनुसार बढ़ती चली जाती है। निरीक्षण करने के माध्यम के द्वारा किसी भवन या डिजिटल माध्यम की देखभाल करना एक बात है, किन्तु जब प्रश्न जीवनों का होता है, तो बात बिलकुल भिन्न हो जाती है।
यही बात हमारे लिये व्यक्तिगत रीति से भी सही है। हम जिन बातों को अपने मन और मस्तिष्क में आ लेने देते हैं, उनके प्रभाव विनाशकारी हो सकते हैं। इसलिये, खतरों की अनन्त सूची को ध्यान में रखते हुए, हमें यह प्रश्न पूछना चाहिये: “इतने अधिक प्रलोभनों से भरे हुए संसार में, हम अपनी आत्मा की और भी बेहतर सुरक्षा किस प्रकार कर सकते हैं?”
यह धन्यवाद की बात है कि परमेश्वर का वचन हमें आत्मिक खतरों से सुरक्षित रखने के बारे में अँधकार में नहीं रखता है। यह क्षेत्रीय मार्गदर्शिका नीतिवचन 4:20-27 को आधार बना कर उन मुख्य बातों को देखेगी जो परमेश्वर ने हमें अपने मनों की रक्षा करने के लिये सिखाई हैं। सुलैमान के बुद्धिमानी के ये शब्द हमें अपनी आत्मा के चारों ओर एक सुरक्षित घेरा बनाने के लिये एक बहु-आयामी तरीका प्रदान करते हैं, जो खतरों से बचाते हैं और सत्य का स्वागत करते हैं।
ऑडियो मार्गदर्शिका
ऑडियो#50 अपने मन की रक्षा करना: प्रलोभनों से भरे संसार में अपनी आत्मा को सुरक्षित रखना
भाग I: अपने कान लगाएँ
“हे मेरे पुत्र, मेरे वचन ध्यान धरके सुन, और अपना कान मेरी बातों पर लगा।”
— नीतिवचन 4:20
हो सकता है कि शब्द “लगा” का अर्थ तुरन्त ही आप की समझ में न आए। इस शब्द का सीधा सा अर्थ होता है एक ओर खींचना, फैला देना, बढ़ा देना, या किसी ओर कर देना, जिससे कि जो साझा किया जा रहा है उसे ग्रहण कर सकें। हमें क्या सुनने के लिये लगाना है? परमेश्वर के वचन। सुलैमान जिन शब्दों को बाँटने जा रहा है, वे सृष्टि के सृष्टिकर्ता से आए हैं। परन्तु, हम यह भी समझते हैं कि हमारे कान अन्य अनेकों बातों की ओर लग सकते हैं।
क्या आप को ध्यान देना कठिन लगता है?
संसार ध्यान बँटाने वाली बातों से भरा हुआ है। बहुधा लिखित सन्देशों, ईमेल, और फोनकॉल से मेरा ध्यान बँटता रहता है। ऐसा लगता है मानो हर तरह की बातें हमारे ध्यान को पाने के लिए हमारे अन्दर एक संघर्ष में लगी हुई हैं। ध्यान बनाए रखने के लिये हर सम्भव बचाव को कर लेने के बाद भी, क्षण भर में ध्यान बँटाने वाला कोई अन्य विचार या बात आने के लिये तैयार रहते हैं। प्रलोभन हर सम्भव आकार और प्रकार के होते हैं, और हर सम्भव ओर से आते हैं।
जिन विचारों की बौछार हमारे ध्यान को केंद्रित रखने से भटका सकती है वे बहुत अधिक, और कभी-कभी अपरिहार्य होते हैं। इन में न केवल पाप करने के प्रलोभन होते हैं, बल्कि बहुत से ऐसे विचार भी होते हैं जो हमें हमारे मन में ही खोया हुआ रखते हैं। हमें अपनी ओर खींच लेने वाले उन विचारों से निकल कर, विचारों की उस कड़ी का पता लगाना जो हमें वहाँ तक लेकर गई, एक कठिन कार्य हो सकता है। इस विचार से वह विचार उत्पन्न होता है, जिससे कोई और पिछला अनुभव याद आता है, या भविष्य के लिये कोई अन्य विचार आ जाता है।
जैसे-जैसे हमारा ध्यान एक से दूसरी बात को जाता रहता है, जटिलता का स्तर भी बढ़ता चला जाता है। हमारी भावनाओं पर प्रभाव पड़ता है, जिस से अनुभूतियों के इस परिवर्तन के बारे में कुछ करने की हमारी इच्छा जागृत होती है। फिर आप उसमें अन्य लोगों के साथ हुई बातचीत को डाल देते हैं, और इसके बाद कुछ पता नहीं होता है कि क्या होगा। इससे पहले कि आप कुछ समझने पाएँ, अपनी मन पसन्द कॉफी पीते हुए परमेश्वर के वचन के साथ जो समय आप ने बिताना था, उस में पिछले दिन में किसी अन्य के द्वारा कही गई किसी बात को लेकर खिसियाहट घुस आती है। अब, जब आप अपने शान्त समय में थे, तो वह बात बीच में कहाँ से घुस आई?
कारणों की सूची अन्त हीन प्रतीत होती है। देखिये, वास्तविकता यह है कि हम में से प्रत्येक का मस्तिष्क, भिन्न प्रकार से कार्य करता है। हम सभी ने अपने मस्तिष्क को प्रशिक्षित किया हुआ है कि एक से दूसरी बात पर जाता रहे। ध्यान भटकाने वाली बातों के मध्य में हमें यह एहसास भी रखना चाहिये कि हम एक आत्मिक युद्ध में भी लगे हुए हैं। हमारे पास यह जानने का कोई तरीका नहीं है कि हम पर किन बातों से निशाना लगाया जा रहा है, ताकि हमें मार्ग से गिरा दे, या प्रभु पर ध्यान केन्द्रित करने से भटका दे।
मेरे मन में नियमित रीति से एक चित्रण आता रहता है, “दुष्ट के सब जलते हुए तीरों” (इफिसियों 6:16) का, जिन्हें बुझाने के लिये हमें विश्वास की ढाल की आवश्यकता होती है। ये “जलते हुए तीर” अनेकों आकारों में आते हैं। यह अपने जीवन साथी के साथ हुए हाल के किसी वार्तालाप को लेकर, जो आप के द्वारा अपेक्षित दिशा में नहीं गया, खिसियाहट या गहरी लज्जा हो सकती है। यह आप की किसी सन्तान के साथ हुई बातचीत हो सकती है, जिस पर आप यह विचार करते रहते हैं कि उस बात को और भी बेहतर कैसे किया जा सकता था। कलीसिया या कार्य-स्थल के किसी व्यक्ति के साथ कोई अनसुलझा हुआ विषय हो सकता है, जिसके बारे में सोचना बन्द करना कठिन हो रहा है।
इसलिये हम अपनी समस्या को अपने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के सामने लाते हैं और उसके इस विषय पर ध्यान देने और हम पर अनुग्रह करने के लिये विनती करते हैं कि हमारे ध्यान को प्रभावित करे। जैसा कि दाऊद ने भजन 86:1-6 में लिखा, “हे यहोवा, कान लगाकर मेरी सुन ले, क्योंकि मैं दीन और दरिद्र हूँ। मेरे प्राण की रक्षा कर, क्योंकि मैं भक्त हूँ; तू मेरा परमेश्वर है, इसलिये अपने दास का, जिसका भरोसा तुझ पर है, उद्धार कर। हे प्रभु, मुझ पर अनुग्रह कर, क्योंकि मैं तुझी को लगातार पुकारता रहता हूँ। अपने दास के मन को आनन्दित कर, क्योंकि हे प्रभु, मैं अपना मन तेरी ही ओर लगाता हूँ। क्योंकि हे प्रभु, तू भला और क्षमा करने वाला है, और जितने तुझे पुकारते हैं उन सभों के लिये तू अति करुणामय है। हे यहोवा, मेरी प्रार्थना की ओर कान लगा, और मेरे गिड़गिड़ाने को ध्यान से सुन।”
आप का ध्यान किस पर है?
डॉनल्ड व्हिटने ने अपनी पुस्तक स्पिरिचुअल डिसिप्लिन्स फॉर द क्रिश्चियन लाईफ में कहा है, “और मैं अपने पास्टर होने तथा व्यक्तिगत मसीही अनुभवों से यह कह सकता हूँ कि, मैं ऐसे किसी भी पुरुष अथवा स्त्री को नहीं जानता हूँ जो अनुशासित हुए बिना आत्मिक परिपक्वता तक पहुँचा हो। भक्ति केवल अनुशासन ही से आती है।”1
इस पुस्तक में प्रमुख किया गया पवित्रशास्त्र का एक मुख्य अंश है “भक्ति की साधना कर। क्योंकि देह की साधना से कम लाभ होता है, पर भक्ति सब बातों के लिये लाभदायक है, क्योंकि इस समय के और आने वाले जीवन की भी प्रतिज्ञा इसी के लिये है” (1 तीमुथियुस 4:7b-8)। फिर भी, हम भली-भाँति समझते हैं कि स्वयँ को प्रशिक्षित और अनुशासित करना स्वाभाविक रीति से नहीं होता है, जैसे कि इसकी लालसा को भी प्रभु से आना होता है।
शिष्यता के लिये मैं जिन लोगों से मिला हूँ, उनमें से एक ने अचम्भा किया कि मैं हमारी सभाओं को किस प्रकार से चलाना चाहता हूँ। उसने आरम्भ तो इस बात के लिये खुले होने के साथ किया था कि हम प्रति सप्ताह मिलेंगे, बाइबल को पढ़ेंगे और उस पर चर्चा करेंगे, साथ ही प्रार्थना भी करेंगे कि प्रभु हमारी अगुवाई करे कि हम उसके वचन को अपने जीवनों में लागू करें। परन्तु, एक दूसरे को जानने में बिताए गए कुछ समय के बाद उसने निःसंकोच स्वीकार कर लिया कि उसकी प्रवृत्ति इधर से उधर भटकते रहने की थी, शीघ्रता से एक कार्य या परिस्थिति से दूसरी पर चले जाने की। क्योंकि वह अकेला है, पिता है, एक छोटा व्यवसाय चलाता है, और क्योंकि उसका ध्यान एक से दूसरी बात पर जाता रहता है, इसलिये ध्यान से बाइबल पढ़ना और प्रार्थना करना हमेशा ही उसके लिये संघर्ष पूर्ण रहा है।
हमारे साथ बिताये जाने वाले समय को एक ढाँचा देने के हमारे आरम्भिक प्रयासों का आरम्भ उसके द्वारा यह कहने से हुआ था, “देखिये, मैं आप को यह बताना चाहता हूँ कि मैं कभी भी किसी बाइबल पढ़ने के क्रम का पालन नहीं कर पाया हूँ, और न ही पढ़ने और प्रार्थना करने में नियमित रहा हूँ।” मैंने उसे चुनौती दी कि हर सप्ताह वह परमेश्वर के वचन से एक बात को ढूँढ़ कर, हमारे परस्पर चर्चा करने के लिये ले कर आए।
कुछ सप्ताह तक हमारे मिलते रहने के बाद, यह रोचक रहा कि उसके पास प्रति सप्ताह बाँटने के लिये कुछ न कुछ होता था। जब कुछ और समय बीता, मेरे मित्र को अचम्भा हुआ कि परमेश्वर का वचन उसके जीवन के लिये कितना प्रासंगिक है।
क्या वर्तमान में आप भी मेरे मित्र के समान अनुभव कर रहे हैं, जैसा जब हम बाइबल अध्ययन के लिये मिलने लगे थे, तब वह करता था? क्या ऐसा लगता है कि परमेश्वर के वचन और प्रार्थना के लिये समय देने के लिये आप का ध्यान बहुत बँटा हुआ है? मैं आपको प्रोत्साहित करना चाहता हूँ कि स्वयं की सहायता करने के लिये, किसी को अपने जीवन में आमन्त्रित करें, ताकि आप पढ़ने और प्रार्थना करने में सुदृढ़ हो सकें। आप वैसी ही कार्य विधि को चुन सकते हैं जो मैंने और मेरे और मेरे मित्र ने तय की थी, जिस में आप सप्ताह में एक बार मिलकर उस एक बात पर विचार करें जो आप के लिये उस सप्ताह में महत्वपूर्ण थी। आप सप्ताह में एक बार पन्द्रह मिनट की एक फोनकॉल के लिये प्रतिबद्ध होने के साथ आरम्भ कर सकते हैं, जिस में आप केवल प्रार्थना के विषय साझा करें और साथ मिल कर प्रार्थना करें। छोटे से आरम्भ करें और आगे बढ़ते हुए उन्नति करते चले जाएँ।
आप किस की सुन रहे हैं?
हम पर प्रभाव डालने का प्रयास करने वाली आवाज़ों की सँख्या विस्मित कर देने वाली है। वे अनगिनत दिशाओं से आती हैं और उन्हें किसी भी दिन या समय पर, सोशल मीडिया या अन्य किसी माध्यम से तुरन्त ही बुलाया जा सकता है। और उन में क्षमता होती है कि वे प्रभु के प्रति हमारे स्नेह को या तो दबा दें अथवा बढ़ा दें। जोनाथन एडवर्ड्स ने एक बार कहा था कि मसीही का आनन्द दोहरा होता है: पहला, यह “मसीह के सर्वोत्तम होने, उस के अनुग्रह के सर्वोत्तम होने, और उस में मिलने वाले उद्धार के मार्ग की सुन्दरता से आता है।” दूसरा, मसीही का आनन्द इस तथ्य से आता है कि “ऐसा सर्वोत्तम उद्धारकर्ता और ऐसा सर्वोत्तम अनुग्रह उनके हैं।”2
क्या आज यही आनन्द आप का भी है? मसीह में आनन्द और यह तथ्य कि विश्वास के द्वारा वह आप का है? यदि नहीं, तो अन्य “प्रभाव डालने वालों” के द्वारा ध्यान बँटाए जाने ने, मसीह में आप के आनन्द को किस प्रकार से दबा दिया है? यीशु का अनुसरण करने का अर्थ केवल उस पर ध्यान केंद्रित रखना नहीं है बल्कि उस में आनन्दित रहना भी है। जब हमारा ध्यान बँटा हुआ होता है, तब बहुधा हमारा आनन्द भी घट जाता है।
क्रिस लुंडगार्ड, अपनी पुस्तक, द एनिमी विदिन में इस चुनौती का वर्णन इस प्रकार करता है: “जब मस्तिष्क परमेश्वर को जानना चाहता है, तब शरीर अज्ञानता, अँधकार, गलतियाँ, और व्यर्थ विचार हावी कर देता है। इच्छाशक्ति, उसे रोके रखने वाले ढिठाई के बोझ को अनुभव किए बिना, परमेश्वर की ओर नहीं बढ़ पाती है। और स्नेह, जो परमेश्वर की लालसा के लिये लालायित हैं, उन्हें निरन्तर शारीरिक भावनाओं के संक्रमण से या बेपरवाह होने के रोग से लड़ते रहना पड़ता है।”3
इसलिये क्या इसमें कोई अचरज की बात है कि, हम में से प्रत्येक जिस प्रकार के युद्ध का सामना करता है, उसे ध्यान में रखते हुए, पौलुस कहता है “हर एक भावना को कैद करके मसीह का आज्ञाकारी बना देते हैं” (2 कुरिन्थियों 10:5)? हमें कितना कृतज्ञ होना चाहिये कि हमारा अच्छा चरवाहा, इसलिये आया कि हम “जीवन पाएँ, और बहुतायत से पाएँ” जब हम उसका “शब्द सुनती हैं, और मैं उन्हें जानता हूं, और वे मेरे पीछे पीछे चलती हैं” (यूहन्ना 10:10, 27) चाहे हमारे विरोध में कुछ भी क्यों न हो।
हम किस की बात को सुनते हैं, उसे जाँचने-परखने की आवश्यकता और अधिक बढ़ जाती है जब हम पारिवारिक सम्बन्धों और जिन लोगों से नियमित संपर्क में रहते हैं, उन को भी अपने आँकलन में ले लेते हैं। यह जानने के लिये कि हमें अपने जीवनों में किसे बोलने देना चाहिये, हमें प्रभु की बुद्धिमानी की आवश्यकता होती है। हमें यह जानने और पहचानने के लिये भी बुद्धिमानी चाहिये, जिससे कि परमेश्वर हमारे जीवनों में किसे लेकर आया है कि हम उनके जीवनों में बात कर सकें।
खतरे निकट और दूर से आते हैं। यदि आप उन सभी आवाज़ों की सूची बनाएँ जिन्हें आप वीडियो, पॉडकास्ट, पुस्तकों, और सोशल मीडिया से आ लेने देते हैं, तो आप उन में से प्रत्येक के आप को प्रभावित करने की सामर्थ्य को कितना मापेंगे? चाहे वे, आप के कार चलाते समय, समय बिताने के लिये, पृष्ठभूमि में ही क्यों न बज रहे हों, फिर भी उन्हें अपनी सूची में सम्मिलित करें ताकि आप को पता चल सके कि आप क्या कुछ अपने अन्दर ले रहे हैं। क्या ये प्रभाव आप को यीशु से और अधिक प्रेम करने में सहायता करते हैं, या वे आप को उस से दूर ले जाते हैं? आप जिस व्यक्ति के साथ इस क्षेत्रीय मार्गदर्शिका का अध्ययन कर रहे हैं, उससे पूछने के लिये यह एक अच्छा प्रश्न हो सकता है।
—
चर्चा और मनन
- ध्यान को केंद्रित करना आप को किन बातों के कारण कठिन लगता है? इस से प्रभु की ओर अपने कान लगाने पर क्या प्रभाव पड़ता है?
- क्या ऐसी कोई बात है जिस पर आप अपना ध्यान लगा रहे हैं, और आप को पुनः विचार करने की आवश्यकता है? क्या ऐसी कोई बात है जो आप की आत्मिक उन्नति में विशेषतः सहायक है, और आप को उस पर और अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है?
- आप जिस की सुन रहे हैं, वह मसीह की समानता में और अधिक बढ़ने के लिये आप का प्रोत्साहक कैसे है?
—
भाग II: अपने मन में भर लें
“इनको अपनी आँखों की ओट न होने दे; वरन् अपने मन में धारण कर। क्योंकि
जिनको वे प्राप्त होती हैं, वे उनके जीवित रहने का, और उनके सारे शरीर के
चंगे रहने का कारण होती हैं।” — नीतिवचन 4:21-22
पवित्रशास्त्र हमारे मनों को एक भण्डार घर के समान दिखाता है जिस में अनेकों प्रकार की वस्तुएँ रखी जा सकती हैं। वे वस्तुएँ भी साथ रखी जा सकती हैं जो परस्पर बिलकुल विपरीत हैं और हम पर विरोधी प्रभाव डालती हैं। इस खण्ड में हम परमेश्वर के वचन से मन के बारे में कुछ वर्णन, और मन की रक्षा करने पर वे क्या प्रभाव डालते हैं देखेंगे।
आप के मन की पट्टियाँ
डिजिटल सन्दर्भ में शब्द टैबलेट के प्रयोग से हट कर, बाइबल के अनुसार प्रयोग में, यह शब्द हमें मूसा को दी गई दस आज्ञाओं की याद दिलाता है। निर्गमन 24:12 में लिखा है, “तब यहोवा ने मूसा से कहा, “पहाड़ पर मेरे पास चढ़ आ, और वहीं रह; और मैं तुझे पत्थर की पटियाएँ, और अपनी लिखी हुई व्यवस्था और आज्ञा दूँगा कि तू उनको सिखाए।” ये आज्ञाएँ, जिन्हें परमेश्वर की उँगली से लिखा गया था, परमेश्वर के लोगों को उनका पालन और अनुसरण करने के लिये दी गई थीं। परमेश्वर के लोगों को उन्हें दिये गये उसके वचन को भूलना नहीं था, परन्तु जो उन्हें बताया गया था, उसका पालन करना था।
सुलैमान ने इसी चित्रण को नीतिवचन 3:3 में लिया, जब उसने कहा कि, “कृपा और सच्चाई तुझ से अलग न होने पाएँ; वरन् उनको अपने गले का हार बनाना, और अपनी हृदय रूपी पटिया पर लिखना।” वह इसे फिर से नीतिवचन 7:2-3 में दोहराता है, “मेरी आज्ञाओं को मान, इस से तू जीवित रहेगा, और मेरी शिक्षा को अपनी आँख की पुतली जान; उनको अपनी उँगलियों में बाँध, और अपने हृदय की पटिया पर लिख ले।” यह करने के द्वारा इस्राएल यह सुनिश्चित कर लेगा कि परमेश्वर ने उनसे जो कहा है, वह हमेशा उनके साथ रहेगा।
परन्तु हम इस्राएल ही के उदाहरण से हम बार-बार यह सीखते हैं कि परमेश्वर के वचन के उनके पास होने से यह निश्चित नहीं हुआ कि वे वही करेंगे जो सही होगा। सच में, परमेश्वर ने, उसके लोगों के उससे भटक जाने के अनगिनत तरीकों को ढाँपने के लिये एक पूरी बलिदान प्रणाली स्थापित कर के दी। यद्यपि परमेश्वर का वचन उनके पास था, परन्तु उनके मन पत्थर से बने हुए थे।
यहीं पर परमेश्वर की चमत्कारिक प्रतिज्ञा कार्यान्वित होती है। परमेश्वर ने यहेजकेल 36:26-27 में, अपने लोगों से कहा, “मैं तुम को नया मन दूँगा, और तुम्हारे भीतर नई आत्मा उत्पन्न करूँगा, और तुम्हारी देह में से पत्थर का हृदय निकाल कर तुम को मांस का हृदय दूँगा। मैं अपना आत्मा तुम्हारे भीतर देकर ऐसा करूँगा कि तुम मेरी विधियों पर चलोगे और मेरे नियमों को मानकर उनके अनुसार करोगे।” ये शब्द सुसमाचार के मर्म को प्रकट करते हैं, जब यीशु दृढ़ निश्चय के साथ क्रूस की ओर गया कि हमारे पापों की कीमत चुकाए। यह करने के द्वारा, पिता ने प्रतिज्ञा की, कि प्रत्येक मसीही में निवास करने के लिये अपना पवित्र आत्मा भेजेगा, जिससे उनके माँस के हृदय ऐसे हृदय हो जाएँगे जिन में परमेश्वर का वचन लिखा हुआ है।
अपनी पुस्तक, द रूल ऑफ लव, में जोनाथन लीमैन इस परिवर्तन से आने वाले चमत्कारिक अन्तर को समझाता है। उसने लिखा, “परमेश्वर के आत्मा के अतिरिक्त, निश्चय ही, परमेश्वर की व्यवस्था में हमें बदल देने की सामर्थ्य नहीं है। फिर भी, उस की आत्मा के द्वारा, परमेश्वर से प्रेम करने का अर्थ है उसकी व्यवस्था से प्रेम करना, क्योंकि वह उसके चरित्र को व्यक्त करता है, और ऐसा प्रेम, परमेश्वर की आत्मा की सामर्थ्य से, हमारे जीवनों में उत्पन्न करने वाला बन जाता है। जब हम परमेश्वर की नकल करने लगते हैं, तब हम बढ़ते हैं, फैलते हैं, तथा और बड़े हो जाते हैं। हम परमेश्वर की हस्ती को, परमेश्वर के स्वभाव को, परमेश्वर के नियमों को, उस के चरित्र को अपने अन्दर ले लेते हैं। इस स्थिति में हम उस फलवन्त वृक्ष के समान बन जाते हैं, जो अपने चारों ओर के लोगों को आशीष देने लगते हैं।”4
आप के मन का खज़ाना
मन का एक और विवरण जो भरने की क्रिया और अन्दर भर कर के रखी हुई वस्तु, दोनों को दिखा सकता है, अन्दर पाया जाने वाला खज़ाना है। शब्द खज़ाना उस के लिये भी प्रयोग किया जाता है, जिसे मैं और आप यहाँ पृथ्वी पर या स्वर्ग में जमा कर के रख लेते हैं। यीशु द्वारा पहाड़ी उपदेश में दी गई शिक्षाओं के अनेकों आयामों में से एक आयाम उसके द्वारा भीड़ से कहना है कि, “परन्तु अपने लिये स्वर्ग में धन इकट्ठा करो, जहाँ न तो कीड़ा और न काई बिगाड़ते हैं, और जहाँ चोर न सेंध लगाते और न चुराते हैं” (मत्ती 6:20)। फिर वह जहाँ हम ने खज़ाना इकट्ठा किया हुआ होता है, उसमें, और हमारे मन की चाहतों में एक सम्बन्ध स्थापित करता है।
इसलिये हम भी विचार करें कि हमारे खज़ाने कहाँ पर रखे हुए हैं। विचार कीजिये कि आप जिस के लिये परिश्रम करते चले आ रहे हैं, वह सभी एक ही स्थान पर इकट्ठा है। अब स्वयं से यह प्रश्न पूछिये: आप के द्वारा इकट्ठी की हुई वस्तुएँ क्या स्वर्ग के लिये उपयुक्त हैं, या फिर पृथ्वी के लिये हैं? क्या आप के खज़ाने आत्मिक हैं (अर्थात्, अनुग्रह और भक्ति में बढ़ते जाना) या पार्थिव (भौतिक) हैं? एक दूसरे की तुलना में इन का आकार परस्पर कैसा दिखाई देता है? जब आप अपने मन की रक्षा करने के प्रयास कर रहे हैं, तो आप के अन्दर यह इच्छा होनी चाहिये कि स्वर्गीय खज़ानों का आप का ढेर इतना बड़ा हो कि वह आप के सांसारिक लाभों से कहीं अधिक बड़ा दिखाई दे।
भर कर रखने के लिये पर्याप्त स्थान हमारे पास न केवल बाहर है, बल्कि हमारे अन्दर भी एक गहरा कुआँ है जो हमारी बाहरी क्रियाओं को प्रभावित करता है। सुलैमान ने लिखा:
हे मेरे पुत्र, यदि तू मेरे वचन ग्रहण करे, और मेरी आज्ञाओं को अपने हृदय में रख छोड़े, और बुद्धि की बात ध्यान से सुने, और समझ की बात मन लगाकर सोचे; और प्रवीणता और समझ के लिये अति यत्न से पुकारे, और उस को चाँदी के समान ढूँढ़े, और गुप्त धन के समान उस की खोज में लगा रहे; तो तू यहोवा के भय को समझेगा, और परमेश्वर का ज्ञान तुझे प्राप्त होगा। क्योंकि बुद्धि यहोवा ही देता है; ज्ञान और समझ की बातें उसी के मुँह से निकलती हैं। वह सीधे लोगों के लिये खरी बुद्धि रख छोड़ता है (नीतिवचन 2:1-7a)।
सुलैमान के अनुसार अन्दर भर कर के रखना कैसा दिखता है?
- परमेश्वर के वचन को ग्रहण करना
- ज्ञान और समझ के लिये सुनना
- प्रवीणता और समझ को माँगना
- उसे चाँदी के समान ढूँढ़ना और गुप्त धन के समान खोजना
- क्योंकि बुद्धि यहोवा ही देता है और अपने बच्चों के लिये खरी बुद्धि रख छोड़ता है
आज आप की प्रार्थना यही हो कि, “हे स्वर्गीय पिता, अपने बच्चों के लिए खरी बुद्धि रख छोड़ने वाले उदार पिता होने के लिये आप का धन्यवाद। उद्यम के साथ उसे नहीं ढूँढ़ने के लिये हमें क्षमा करें। हमारी सहायता करें कि हम सुन सकें तथा और भी अधिक लालसा एवं प्रतिबद्धता के साथ प्रवीणता और समझ को माँग सकें। यीशु के नाम में, आमीन।”
आप के मन की लालसाएँ
कई वर्ष पहले, मैं जिन लोगों के साथ परिश्रम कर रहा था, उन में से एक को, कम आयु में ही अपनी माँ के चले जाने का सामना करना पड़ा। इस ने उसे इस बात का पुनः आँकलन करने के लिये उभारा कि जीवन के उस समय तक उसने मसीह का अनुसरण कैसे किया था। वह प्रभु को जानता था और हमारी कलीसिया का एक भरोसेमन्द सदस्य था। परन्तु उसे एहसास हुआ कि उसकी लालसाएँ अब उस से बदलने लगी हैं, जिन की वह पहले लालसा रखा करता था। हमने साथ मिलकर पवित्रशास्त्र जितना अधिक समय बिताना आरंभ किया, उतना ही हमारा वार्तालाप बदलता चला गया।
पहले तो वह सोचा करता था कि वह आत्मिकता में काफी आगे बढ़ चुका है। आखिरकार वचन पढ़ने और प्रार्थना करने, और वचन पर चर्चा करने की उसकी प्रतिबद्धता उसे काफी लगती थीं। परन्तु जैसे-जैसे हमारा साथ बिताया गया समय आगे बढ़ता गया, हमारे वार्तालाप में एक कथन ऐसा था जो विशेषतः स्मरणीय था। उस में वह याद किया करता था कि वह यह सोचता था कि परमेश्वर के प्रति विश्वासयोग्य होने के लिये उसे जो और जितना देना चाहिये, उसे वह दे चुका है।
परन्तु जब परमेश्वर का वचन उसके मन में और अधिक घुसता चला गया, और पवित्र आत्मा ने साथ बिताए गए हमारे समय को हम दोनों को मसीह में और अधिक बढ़ने के लिये प्रयोग किया, तो जीवन से उसे जो चाहिये था, वह बदलने लगा। परमेश्वर के साथ एक सौदा करते रहने का सम्बन्ध अब घटने लगा था। और उसके साथ और आगे बढ़ने के विचार अब कोई बहुत बड़ी अपेक्षा प्रतीत नहीं होते थे। इसके स्थान पर, समय के साथ, धीरे-धीरे उसके मन की लालसाएँ बदलने लगी थीं। अब उसे परमेश्वर में अधिक, और अधिक आनन्द चाहिये था।
यह यूहन्ना 15:7-8 का एक जी कर दिखाया गया सजीव उदाहरण था। “यदि तुम मुझ में बने रहो और मेरा वचन तुम में बना रहे, तो जो चाहो माँगो और वह तुम्हारे लिये हो जाएगा। मेरे पिता की महिमा इसी से होती है कि तुम बहुत सा फल लाओ, तब ही तुम मेरे चेले ठहरोगे।” वह जितना अधिक परमेश्वर में बना रहने लगा और परमेश्वर का वचन जितना अधिक उसमें बना रहने लगा, उसके मन की लालसाएँ बदलने लगीं। यह वास्तव में साथ मिल कर आनन्दित होने वाली बात थी, हम पौलुस के शब्दों को भी पूरा होते हुए देख रहे थे। “तब परमेश्वर की शान्ति, जो सारी समझ से परे है, तुम्हारे हृदय और तुम्हारे विचारों को मसीह यीशु में सुरक्षित रखेगी (फिलिप्पियों 4:7)।”
हमारे मनों में जो भी भरा हुआ होता है, उसका सीधा प्रभाव हमारे दैनिक जीवन पर पड़ता है, अभी के लिये भी और अनन्तकाल के लिये भी। काश कि हमारे दिन अपनी नहीं परन्तु अधिकाई से उसी की इच्छा का पालन करने से भरे हुए हों।
—
चर्चा और मनन
- आप के मन की पटिया पर परमेश्वर हाल में क्या लिख रहा है?
- आपको बढ़ोतरी देखने के लिये नीतिवचन 2:1-7a के किस भाग सबसे अधिक आवश्यकता है? और क्यों?
- मसीह में बने रहने ने आप के मन की लालसाओं पर क्या प्रभाव डाला है?
—
भाग III: अपने मुँह की रक्षा करें
“टेढ़ी बात अपने मुँह से मत बोल, और चालबाज़ी की बातें कहना तुझ से दूर रहे।”
— नीतिवचन 4:24
आखिरी बार ऐसा कब हुआ था कि आप ने कुछ कहा, और जैसे ही शब्द आप के मुँह से बाहर निकले, आप तुरन्त उन्हें वापस लेने के तरीके ढूँढ़ने लगे? हो सकता है कि यह कोई व्यंग्यात्मक टिप्पणी रही हो जिसकी धार अपेक्षा से अधिक पैनी थी। हो सकता है कि आप किसी कठोर वार्तालाप को टालना चाह रहे हों, जिस में अन्दर का तनाव उभर कर बाहर आ गया और बात को और बिगाड़ दिया। या, हो सकता है कि आप मेरे समान हैं, और कभी-कभी सावधानी पूर्वक नहीं बल्कि असावधानी से बोल देते हैं। अपने शब्दों से खेदित होने के स्थान पर, हम परमेश्वर के वचन को आनन्दित होने के लिये कैसे बोल सकते हैं?
आप जो कहते हैं
इस क्षेत्रीय मार्गदर्शिका का यदि कोई एक भाग ऐसा है जिस के लिये हम सोचते हैं कि उसे हम अपने उद्देश्यपूर्ण प्रयासों के द्वारा नियन्त्रित कर सकते हैं, तो सम्भवतः वह बोलना ही है। मेरा अर्थ है कि अपने माता-पिता के इस परामर्श का पालन करना कितना कठिन हो सकता है कि, “यदि तुम्हारे पास कहने के लिये कुछ अच्छा नहीं है, तो कुछ मत कहो।” देखिये, जैसा हम सब एहसास कर चुके हैं, यह करना उससे बहुत कठिन है, जैसा आरम्भ में हमें लगता था।
देखने में तो पौलुस के इन निर्देशों के अनुसार करना बहुत सहज लगता है कि, “कोई गन्दी बात तुम्हारे मुँह से न निकले, पर आवश्यकता के अनुसार वही निकले जो उन्नति के लिये उत्तम हो, ताकि उससे सुनने वालों पर अनुग्रह हो” (इफिसियों 4:29)। समझ गये। वही कहें जो औरों को बढ़ाने के लिये भला हो। ऐसा कुछ न कहें जो बिगाड़ सकता है। सीधी सी बात है।
परन्तु हम सभी इस अनुभव से होकर निकले हैं जब और अधिक प्रयास करना पर्याप्त नहीं था। टेढ़ी बातें मुँह से फिसल कर बाहर आ ही जाती हैं। जैसा कि मेरे एक जानकार ने दुःखी होकर कहा, “मेरे सारे शरीर के अन्य सभी अँग साथ मिल कर भी मुझे उतनी परेशानी में नहीं डालते हैं, जितनी में अकेला मेरा मुँह मुझे डाल देता है।”
यहीं पर आकर हम एहसास करते हैं कि अपने मन के चारों ओर एक ठोस घेरा लगाने के हमारे सारे नैतिक प्रयास पर्याप्त नहीं होते हैं। इसलिये, जिस सुसमाचार से पौलुस इन निर्देशों का पालन करने के लिये हम से कहता है, हम उसे ही अपना आधार बनाते हैं। इफिसुस की मण्डली के लिये उसकी प्रार्थनाओं का एक भाग यह है:
“और तुम्हारे मन की आँखें ज्योतिर्मय हों कि तुम जान लो कि उसकी बुलाहट की आशा क्या है, और पवित्र लोगों में उसकी मीरास की महिमा का धन कैसा है, और उसकी सामर्थ्य हम में जो विश्वास करते हैं, कितनी महान है, उसकी शक्ति के प्रभाव के उस कार्य के अनुसार जो उसने मसीह में किया कि उसको मरे हुओं में से जिलाकर स्वर्गीय स्थानों में अपनी दाहिनी ओर (इफिसियों 1:18-20)।”
परमेश्वर की महान सामर्थ्य, वही सामर्थ्य जिस ने यीशु को मृतकों में से जिलाया, प्रत्येक विश्वासी में निवास करती है कि परमेश्वर की इच्छा पूरी हो और वह उन में होकर कार्य करे। इस में औरों बढ़ाने, न कि उन्हें तोड़ कर गिराने के लिये प्रार्थना करने के शब्दों की समझ और सामर्थ्य प्राप्त होना भी सम्मिलित है।
आप कैसे कहते हैं
काश कि हम केवल अपने मुँह की रक्षा करने से आगे बढ़ पाते और इसे ही कार्य को पूरा कर लेना मान सकते। दुर्भाग्यवश, हो सकता है कि उपरोक्त उप-शीर्षक से ही हमें अपने मस्तिष्क में छिपी हुई एक अन्य अनर्थक बात याद आ गई हो। “महत्वपूर्ण वह नहीं है जो आप कहते हैं, बल्कि जैसे आप कहते हैं।”
जीवन कितना भिन्न हो जाएगा, यदि यह बात हमारी स्वाभाविक प्रवृत्ति का वर्णन होती: “बुद्धिमान का मन उसके मुँह पर भी बुद्धिमानी प्रगट करता है, और उसके वचन में विद्या रहती है। मनभावने वचन मधुभरे छत्ते के समान प्राणों को मीठे लगते, और हड्डियों को हरी–भरी करते हैं (नीतिवचन 16:23-24)।”
परन्तु, जब हम वैसा करना नहीं चाहते हैं, तब भी औरों से हमारा वार्तालाप इन बहुत कठोर शब्दों के समान होता है। “ऐसे लोग हैं जिनका बिना सोच–विचार का बोलना तलवार के समान चुभता है,” न कि उसके साथ के “परन्तु बुद्धिमान के बोलने से लोग चंगे होते हैं (नीतिवचन 12:18)” के समान होने के।
इससे मुझे एक विवाह कार्यशाला याद आती है, जिसमें मैं और मेरी पत्नी सम्मिलित हुए थे। एक बहुत जाना-माना वक्ता अपनी बात को चित्रित करने के लिये उसकी पत्नी के साथ हुए एक संवाद का प्रयोग कर रहा था। उस संवाद में उसने जिस प्रकार से अपनी टिप्पणी को बताया था, उसकी पत्नी ने उस के बारे में उसे अपनी प्रतिक्रिया दी।
सबसे पहले, उसकी उन टिप्पणियों में जैसा उसकी पत्नी ने उसे समझा था, वह उसके निकट भी नहीं आ रहा था। इसलिये वह चाहता था कि गलती को सुधारने के लिये श्रोता भी चर्चा में भाग लें। इस बिन्दु पर आने पर वह अपने उस संवाद को एकल नाटिका के समान, दोनों की ओर से बोलकर दिखाने लगा; और जब वह उन टिप्पणियों पर पहुँचा जिन का इनकार किया जा रहा था, उसने हम से यह बताने के लिये कहा कि उसका बोलने का लहज़ा हमें कैसा लग रहा था।
जैसे ही उसने वही लहज़ा प्रयोग करने का प्रयास किया जो उसने अपनी पत्नी के साथ किया था, और वहाँ जितने लोग उपस्थित थे उसके शब्दों के तीखेपन से चकित रह गये। उसके बाद, बहुत नम्रता से उसने साझा किया कि उसके लिये यह कितना आँखों को खोलने वाला था कि उस की बात उस की प्रिय दुल्हन को कैसी लग रही थी।
ऐसा कितनी बार होता है कि हमारे लहज़े के कारण हमारे शब्दों का उद्देश्य विफल हो जाता है? क्या आप ने गलत रीति से कुछ कहा है और आपने जीवन साथी, बच्चों, परिवार के सदस्यों, सह-कर्मियों, मित्रों, और पड़ोसियों को आहत किया है? हमारा प्रभु हमें समझ दे कि हम अपने शब्दों के उद्देश्यों और प्रभावों का और बेहतर ध्यान रख सकें ताकि हम बनाने वाले हों, न कि तोड़कर गिराने वाले।
आप उसे कब कहते हैं
इन दो किनारों के बीच में, आप किस ओर होने का रुझान अधिक रखते हैं: बहुत निष्क्रिय रहना और जो कहा जाना है उसे कहने के लिये बहुत समय तक प्रतीक्षा करना? क्या आप शायद ही कभी कुछ कहते हैं, या आप तुरन्त ही प्रतिक्रिया देने लग जाते हैं और समय से पहले ही बोलना आरम्भ कर देते हैं।
अपनी प्रवृत्तियों को ध्यान में रखते हुए, प्रोत्साहन और प्रतिक्रिया के लिये क्या इसके बारे में किसी के साथ चर्चा करना सहायक होगा। एक किनारे पर हम याकूब 1:19-20 से अनमोल बुद्धिमानी को देखते हैं, “हे मेरे प्रिय भाइयो, यह बात तुम जान लो: हर एक मनुष्य सुनने के लिये तत्पर और बोलने में धीर और क्रोध में धीमा हो, क्योंकि मनुष्य का क्रोध परमेश्वर के धर्म का निर्वाह नहीं कर सकता।” शीघ्रता से बोलना क्रोध का, और स्वार्थी, असंयमी होने, या जिस से हम बात कर रहे हैं उसके प्रति बहुत असंवेदनशील होने का लक्षण हो सकता है।
दूसरी ओर, नीतिवचन 25:11 कहता है, “जैसे चाँदी की टोकरियों में सोने के सेब हों, वैसा ही ठीक समय पर कहा हुआ वचन होता है।” बुद्धिमानी की यह बात सही समय पर और सही तरीके से कहे गये शब्दों के मूल्य और प्रभाव को प्रमुख करती है।
प्रभु आप से ऐसे कौन से व्यवहारिक कदम उठाने की अपेक्षा करेगा ताकि आप सही बात को सही समय पर बोलें? जब आप उस से मसीह में होकर पवित्र आत्मा की अगुवाई में स्पष्टता, साहस और आत्मविश्वास से बोल पाना माँगते हैं, तब क्या यह अधिक दृढ़ता से बात को कहना होना चाहिये? या, क्या यह, उस व्यक्ति के प्रति, जिस से आप बात कर रहे हैं, अधिक धैर्य और प्रेम दिखाना है; पवित्र आत्मा से सहायता माँगते हुए कि आप सुनने में तत्पर और बोलने में धीमे हों तथा स्वयँ से पहले औरों को बोलने का पूरा अवसर दें? आप के लिये जो भी सही हो, प्रभु आप में अपने महान कार्य को ज़ारी रखे, और आप को मसीह के स्वरूप में और भी अधिक ढालता चला जाए।
आप उसे किस से कहते हैं
क्या आप विश्वास कर सकते हैं कि कभी-कभी कानाफूसी करने से बचना कितना कठिन हो सकता है? यदि आप मेरे समान हैं, तो आप समझ सकते हैं कि, लोगों को ऐसी बातें बताने का, जिन्हें उन्हें सच में जानना नहीं चाहिये, और निश्चय ही मुझे बताना भी नहीं चाहिये, प्रलोभन कितना तीव्र होता है।
और हम जो जानते हैं, उसे दूसरे व्यक्ति को बताने के अनेकों कारणों को तैयार कर लेने के लिये हम बहुत रचनात्मक होते हैं। हम इसे कई बातों की आड़ में कर सकते हैं, जैसे कि अपना बोझ हल्का करने के लिये, या नैतिक सहारे और प्रोत्साहन की हमारी आवश्यकता के लिये। हम कानाफूसी को प्रार्थना में छिपा कर भी सही ठहरा सकते हैं जब कि इसका वास्तविक कारण, इससे बहुत कम आदरणीय होता है।
पवित्रशास्त्र जीभ की सामर्थ्य से सम्बन्धित चेतावनियों तथा अनुचित बातों को बोलने के विरुद्ध चेतावनियों से भरा पड़ा है। परन्तु फिर भी कानाफूसी करने और बदनाम करने का प्रलोभन समय-समय पर हम पर हावी हो सकता है। ऐसे ही पलों में होता है कि हम इस सत्य को पहचान पाते हैं कि, “कानाफूसी करने वाले के वचन स्वादिष्ट भोजन के समान लगते हैं; वे पेट में पच जाते हैं (नीतिवचन 18:8)।”
हमें यह एहसास भी है कि हम चाहे जितना प्रयास कर लें, अपनी सामर्थ्य से हम अपनी जीभ को काबू में रखने में असमर्थ हैं। “पर जीभ को मनुष्यों में से कोई वश में नहीं कर सकता; वह एक ऐसी बला है जो कभी रुकती ही नहीं, वह प्राणनाशक विष से भरी हुई है। इसी से हम प्रभु और पिता की स्तुति करते हैं, और इसी से मनुष्यों को जो परमेश्वर के स्वरूप में उत्पन्न हुए हैं शाप देते हैं। एक ही मुँह से धन्यवाद और शाप दोनों निकलते हैं। हे मेरे भाइयो, ऐसा नहीं होना चाहिए (याकूब 3:8-10)।”
परिणामस्वरूप, हमें यह मानना होगा कि, हम में से कोई भी इस बात में प्रभु के सामने सिद्ध नहीं है। इसलिये, हमारे जीवन के इस भाग में, हम बुद्धिमानी और सामर्थ्य में किस प्रकार बढ़ सकते हैं? विचार करने के लिये यहाँ तीन बातें हैं:
1. औरों की भलाई के खोजी रहें। बोलने से पहले प्रार्थना करें। प्रभु से समझ माँगें कि आप जो कहने जा रहे हैं, या जिस से आप कहने जा रहे हैं, क्या आप की बात से उस का भला होगा।
2. पूछिये, “क्या वह व्यक्ति सहायता कर सकता है?” मुझे याद है कि एक बार मेरे एक परामर्शदाता ने मुझ से पूछा था, “तुम जिस व्यक्ति से बात करने की सोच रहे हो, क्या वह उस परिस्थिति के लिये कुछ कर सकता है?” उस के इस प्रश्न ने मुझे वहीं रोक दिया। उस परिस्थिति के लिये उत्तर था, नहीं। और इस प्रश्न को अपने मस्तिष्क में बनाए रखना मेरे लिये अनेकों अन्य अवसरों पर लाभदायक रहा है।
3. अपने उद्देश्यों पर विचारे करें। जैसा कि याकूब 3:13-18 में वर्णन किया गया है, मैं जिस बुद्धिमानी को किसी अन्य से पाना चाह रहा हूँ, क्या उसकी लालसा स्वर्गीय बुद्धिमानी प्राप्त करने से उत्पन्न हुई है, या संसार की बुद्धिमानी प्राप्त करने से? क्या वह आप के मन में ईर्ष्या और स्वार्थी लालसाओं से आती है, या पक्षपात रहित और ईमानदार होने तथा शान्ति के खोजी होने के लिये, पवित्र आत्मा द्वारा आप की अगुवाई से?
—
चर्चा और मनन
- आप जो कहते हैं, उसकी निगरानी करने के लिये आप को प्रभु से किस बात के लिये सबसे अधिक सहायता की आवश्यकता है?
- आप बोलने में नम्र अधिक हैं या उत्तेजित अधिक रहते हैं? औरों के साथ बेहतर वार्तालाप कर पाने के लिये, आप को इस बात के बारे में क्या करने की आवश्यकता है?
- जब आप कुछ बोलते हैं, तब जानते-बूझते हुए अपने मुँह की रक्षा करना किस प्रकार का प्रभाव डालता है?
- किसी से कोई बात करते समय आप को किस बात में सबसे अधिक सावधानी रखने की आवश्यकता रहती है?
—
भाग IV: अपनी आँखों की रक्षा करें
“तेरी आँखें सामने ही की ओर लगी रहें, और तेरी पलकें आगे की ओर खुली रहें।”
— नीतिवचन 4:25
अब, मैं अंदाज़ा लगा रहा हूँ कि आप समझ रहे थे कि यह बात कभी न कभी तो अवश्य ही आएगी। प्रलोभनों से भरे संसार में अपनी आत्मा को बचाए रखने की चर्चा में किसी स्थान पर आ कर आँखों के बारे में तो बात करनी ही पड़ेगी। इसलिये, चलिये, साथ मिल कर आगे बढ़ते हैं, यह जानते हुए कि जब बात प्रलोभन की आती है तो यह एक ऐसा क्षेत्र है जिस में हम सभी भिन्न तरीकों और भिन्न स्तर तक संघर्ष अवश्य ही करते हैं।
पीछे की ओर देखें
सबसे पहले हमें यह समझ लेना चाहिए कि पीछे देखना बुरा बिलकुल भी नहीं है। पीछे जा कर परिचय के बारे में विचार कीजिये, जब सुरक्षा और बचाव के लिए परिधि पर घेरा लगाने की बात आई थी, तो निरन्तर अपने पीछे की ओर न देखते रहना मूर्खतापूर्ण होता। पवित्रशास्त्र का यह एक निरन्तर बने रहने वाला विषय भी है कि हमेशा याद रखें कि परमेश्वर ने अतीत में क्या कुछ किया है। जैसा भजन 143:5 कहता है, “मुझे प्राचीनकाल के दिन स्मरण आते हैं, मैं तेरे सब अद्भुत कामों पर ध्यान करता हूँ, और तेरे काम को सोचता हूँ।”
परन्तु फिर भी एक प्रलोभन यह होता है कि पीछे मुड़कर बीते दिनों की ओर उनके केवल भले ही होने की समझ से देखें। क्या कभी आप ने स्वयँ को यह विचार करते हुए पाया है कि भला होता यदि आप पीछे की ओर वहाँ पर जा पाते और उन दिनों को फिर से बना पाते? “फिर जो मिली–जुली भीड़ उनके साथ थी वह कामुकता करने लगी; और इस्राएली भी फिर रोने और कहने लगे, “हमें मांस खाने को कौन देगा। हमें वे मछलियाँ स्मरण हैं जो हम मिस्र में सेंतमेंत खाया करते थे, और वे खीरे, और खरबूजे, और गन्दने, और प्याज, और लहसुन भी (गिनती 11:4-5)।” इससे क्या फर्क पड़ता है कि तब वे दासत्व में थे, और अब जब मूसा उन्हें वाचा किये हुए देश की ओर ले जा रहा था, और परमेश्वर भी प्रतिदिन उनकी आवश्यकताओं को पूरा कर रहा था। फिर भी, ओह, हमारे लिए भी इसी फँदे में फँसना कितना सहज होता है।
जब हम अपनी आँखों को अतीत में देखने देते हैं, तब प्रलोभन का एक अन्य स्रोत होता है उन सम्बन्धों की लालसा करना, जिनका आनन्द हमने पहले लिया था। इस में प्रकट पापमय बातें भी होती हैं, जैसे कि हाई स्कूल के अपने भूतपूर्व प्रेमी के बारे खोजना, जिसके बारे में हम उत्सुक हैं, यद्यपि अब हमारा विवाह हो चुका है। यह पुराने मित्रों की वर्तमान मित्रों से तुलना करना भी हो सकता है, यहाँ तक कि हम उन से असन्तुष्ट हों, जिन्हें परमेश्वर ने इस समय में हमारे जीवन में रखा है।
बीते दिनों के मसीह में हमारे भाइयों या बहनों के साथ सम्बन्ध बनाए रखना फलवन्त हो सकता है। परन्तु यदि हम यहीं पर अटके रहते हैं, तो यह हानिकारक भी हो सकता है। कैसे? देखिये, एक बात तो यह है कि पीछे देखते रहना, अब हमें अन्य लोगों की मसीह में बढ़ने में सहायता करने में, तथा प्रभु हमें भविष्य में औरों के लिये परामर्शदाता होने के जो अवसर देगा, उन में बाधा बन सकता है। हाल ही में शिष्यता के बारे में एक व्यक्ति से बात करते समय, उसने इस के लिये असन्तोष व्यक्त किया कि अभी भी उसके सभी मित्र उस के हाई स्कूल के दिनों के ही लोग थे। और अब वह चालीस के दशक में था, और इस से यह दुःखद तथ्य प्रकट था कि वह तब से ही अपनी स्थानीय कलीसिया में सार्थक सदस्य नहीं रहा है।
पीछे की ओर देखना लाभकारी और स्वस्थ लग सकता है, परन्तु यदि इससे आप को और मुझे अब तथा भविष्य में शिष्य बनाने में बाधा आती है, तो यह अनन्त काल के लिये महँगा पड़ेगा।
चारों ओर देखें
जैसे पीछे देखना महत्वपूर्ण है, उसी तरह चारों ओर देखना भी है। चारों ओर देखने का महत्व इसलिये है क्योंकि हमारे चारों ओर खतरे बने रहते हैं। नीतिवचन से हमारे मुख्य खण्ड में सुलैमान के निर्देशों में धर्मियों का मार्ग भी है (नीतिवचन 4:18), जिस की तुलना दुष्टों से की गई है (नीतिवचन 4:19)। एक को भोर के प्रकाश के समान कहा गया है तो दूसरे को घोर अँधकार के समान। एक हमारे सामने का सीधा मार्ग है तो दूसरा हमें अन्य मार्गों से नीचे को ले जाता है।
और हम साइकिल या कार चलना सीखने से जानते हैं कि हमारी आँखें जिस ओर भी देखेंगी, हम उसी ओर जाने लगेंगे। यह सकारात्मक होता है यदि हम भिन्न स्थानों या भिन्न लोगों के जीवनों में प्रभु द्वारा हमें प्रयोग करने के अवसर खोज रहे हों। परन्तु यदि बिना अपने मन की रक्षा किये हुए, यह यूँ ही इधर-उधर देखना है, तो फिर हम अनेकों अन्य बातों को देखने लगेंगे। हमारे चारों ओर का भौतिक संसार तथा हमें हमेशा उपलब्ध रहने वाला ऑनलाइन संसार हमें असीम आत्मिक खतरे उपलब्ध करवाता है। पापी प्राणी होने के कारण, हम खतरनाक बातों की लालसा करते रहने की प्रवृत्ति रखते हैं। क्योंकि याकूब 1:14-15 कहता है, “परन्तु प्रत्येक व्यक्ति अपनी ही अभिलाषा से खिंचकर और फँसकर परीक्षा में पड़ता है। फिर अभिलाषा गर्भवती होकर पाप को जनती है और पाप जब बढ़ जाता है तो मृत्यु को उत्पन्न करता है।”
कई वर्ष पहले मैं अपने एक मित्र के साथ गवाही बाँट रहा था। उस का नाम स्टीव था, और वह एक छोटा पारिवारिक उद्योग चलाता था। हमारे वार्तालाप में, व्यवसाय से ले कर, उसके परिवार तक के कई विषय सम्मिलित होते थे, जिन में विभिन्न आत्मिक प्रश्न भी थे, जिन्हें वह चर्चा के लिये उठाया करता था। समय के साथ हमारा सम्बन्ध इतना बढ़ गया कि वह उन कुछ चुनौतियों के बारे में भी बात करना चाहता था, जिन का उसे सामना करना पड़ रहा था। उसे परेशान करने वाला एक प्रमुख संघर्ष, अश्लीलता की लत के साथ लम्बे समय से चलता आ रहा उसका संघर्ष था। वह बहुत चाहता था कि उससे उस के जीवन पर पड़ रहे प्रभाव और नियन्त्रण से वह मुक्त हो सके, परन्तु उसकी पकड़ से निकल पाने में वह स्वयं को असमर्थ अनुभव करता था। हमारी बात-चीत में एक बार उसने एक टिप्पणी की, जो वर्षों बाद भी मुझे याद है। उसने कहा, “मुझे समझ में नहीं आता है कि मैं क्यों लौट कर बारम्बार उस बात पर जाना चाहता हूँ, जिसे मैं अच्छे से जानता हूँ कि बहुत विनाशकारी है। परन्तु मैं तुम्हें यह बता सकता हूँ… मैं इसे इतने लम्बे समय से करता आ रहा हूँ कि अब, जब मैं अपने कंप्यूटर के सामने बैठ कर गलत बातों पर क्लिक करता हूँ, तो मुझे स्क्रीन के पीछे विद्यमान दुष्टता का भौतिक रीति से एहसास होता है।”
क्या आप किसी ऐसी बात में फँसे हुए हैं, जिसे आप जानते हैं कि वह बुरी है? यदि हाँ, तो प्रभु के सामने उसे स्वीकार कर लें। उसे अपने परामर्शदाता को बताएँ। जवाबदेह होने के बारे में माँग करें। परमेश्वर के अनुग्रह से, यीशु द्वारा कलवरी पर पूर्ण किये गए कार्य के द्वारा, आप जिन बंधनों का अनुभव कर रहे हैं, वे तोड़े जा सकते हैं।
आगे की ओर देखें
तो, दृष्टि के क्षेत्र में हम अपनी सुरक्षा को और दृढ़ कैसे कर सकते हैं? पहला, हम सभी इसे याद रखें कि हम जो देखते हैं उस के करण हमारा गिर जाना कितना सहज है। यीशु ने लूका 11:34-36 में कहा:
तेरे शरीर का दीया तेरी आँख है, इसलिये जब तेरी आँख निर्मल है तो तेरा सारा शरीर भी उजियाला है; परन्तु जब वह बुरी है तो तेरा शरीर भी अन्धेरा है। इसलिये चौकस रहना कि जो उजियाला तुझ में है वह अन्धेरा न हो जाए। इसलिये यदि तेरा सारा शरीर उजियाला हो और उसका कोई भाग अन्धेरा न रहे तो सब का सब ऐसा उजियाला होगा, जैसा उस समय होता है जब दीया अपनी चमक से तुझे उजाला देता है।
दूसरा, आँकलन करें कि हाल में आप अपनी दृष्टि की रक्षा करने के लिए आप कितने सचेत रहे हैं। क्या अपने शरीर के दिये की सुरक्षा में आप कहीं ढीले तो नहीं पड़ गये हैं? क्या अंधकार ने आप के मन के किसी भाग को हथिया लिया है?
तीसरा, प्रभु से अपनी आँखों की रक्षा करने और उन का मार्गदर्शन करने के लिये विशिष्ट रीति से प्रार्थना करें। “मेरी आँखों को व्यर्थ वस्तुओं की ओर से फेर दे; तू अपने मार्ग में मुझे जिला (भजन संहिता 119:37)।”
चौथा, किसी मुख्य व्यक्ति या उन लोगों के साथ, जिन्हें परस्पर सहारे और प्रोत्साहन के लिये, प्रभु आप के जीवन में लाया है, पाप अंगीकार, पश्चाताप करने, और सामर्थ्य प्राप्त करने के लिए मार्ग खोल लें।
यद्यपि अपनी आँखों की रक्षा करने से सम्बन्धित वार्तालाप भद्दा और असुविधाजनक हो सकता है, यह ध्यान रखना कि इस युद्ध में आप अकेले नहीं है, बहुत सहायक होता है। यदि यह आप के जीवन का एक ऐसा क्षेत्र है जिसके बारे में आप और आप का परामर्शदाता बहुधा बात करते हैं, तो प्रभु की स्तुति करें। यदि नहीं, तो इसे शीघ्र आरम्भ करें यह जानते हुए कि ऐसा करने से आप को बहुत लाभ होगा।
—
चर्चा और मनन
- आप अनुचित रीति से पीछे देखने के लिये किस प्रकार के प्रलोभनों में पड़ते हैं?
- चारों ओर देखने के प्रलोभन के बारे में आप एक दूसरे के लिये किस प्रकार प्रार्थना कर सकते हैं?
- परमेश्वर ने आप के सामने क्या रखा है जिस की ओर आप सीधे सामने देख सकते हैं? ऐसा करने के लिये आप एक दूसरे को किस प्रकार से प्रोत्साहित कर सकते हैं?
—
भाग V: अपने मार्ग के बारे में विचार करें
“अपने पाँव रखने के लिये मार्ग को समथर कर, और तेरे सब मार्ग ठीक रहें। न तो दाहिनी ओर मुड़ना,
और न बाईं ओर; अपने पाँव को बुराई के मार्ग पर चलने से हटा ले।”— नीतिवचन 4:26-27
मैं कभी नहीं भूलूँगा कि बीस से भी अधिक वर्ष पहले क्रिस मेरे पास आया था कि प्रभु के साथ थोड़ा लम्बा समय बिताएँ। मसीह में उन्नति में परस्पर सहायक होने के लिये, हम एक दूसरे से मिलते रहते थे, और यह फलवन्त भी रहा था। परन्तु हाल ही में उसे यह विचार आया था कि बिना समय के किसी दबाव के, यीशु के साथ समय बिताया जाए। यह कुछ घण्टे, आधा दिन, या कहीं पर रात भर रुकने के द्वारा हो सकता था।
हम दोनों ही उसके वचन के साथ नियमित समय व्यतीत करते थे और हमारी अधिकाँश प्रातः प्रार्थना में ही व्यतीत होती थीं, परन्तु यह कुछ भिन्न था। हम सोचने लगे कि अपनी सामान्य दैनिक ध्यान बाँटने वाली बातों से दूर, केवल अपनी बाइबलों, कॉपी, और एक पेन साथ, जंगल में साइकिल चलाने जाना कैसा रहेगा? इसलिये हमने योजना बनाई कि हम एक रात के लिये उसके साथ अतिरिक्त समय बिताने के लिये, और वह हमारे जीवन में किस तरह से काम कर रहा है, उसके बारे में बात करने के लिये जाएँगे।
यह उस अभ्यास का आरम्भ था, जिसे मैं वर्ष में एक या दो बार अभी भी करता रहता हूँ, विशेषकर तब जब मैं प्रभु के साथ जिस मार्ग पर चल रहा हूँ उस पर मनन करता हूँ। अधिकांशतः यह मेरी सामान्य दिनचर्या से हट कर किसी उद्यान में कुछ घण्टे बिताना होता है। कभी मैं किसी बड़े प्रश्न के साथ जाता हूँ जिसके साथ मैं संघर्ष कर रहा हूँ, और अन्य समय यह केवल कुछ ताज़गी के लिये बिताया गया समय होता है।
मैं ईमानदारी के साथ कह सकता हूँ कि हर बार प्रभु बहुत ही दयालु और विश्वासयोग्य रहा है कि अपने वचन के द्वारा बातों को स्पष्ट कर दे। कई बार प्रभु ने मेरे कदमों का मार्गदर्शन करते समय मुझे दाहिने अथवा बाएँ भटकने से रोक के रखा है। यदि आप ने कभी उसके साथ ऐसा बिना दबाव का समय नहीं बिताया है, तो मेरा परामर्श है कि अकेले या किसी के साथ यह करने के लिए अभी अपने कैलेण्डर में कोई तिथि निर्धारित करें।
पत्थरीले मार्ग
हम सब उस अनुभव से होकर निकले हैं जब जीवन हमारी अपेक्षा के अनुसार नहीं चल रहा होता है। यह चाहे किसी अनायास परीक्षा के कारण हो, या हमारी अपनी अधर्मी इच्छाओं के कारण, पत्थरीले मार्ग हमेशा छलने वाले होते हैं। यदि ऐसा आप के अपने किसी कारण से हुआ है, तो उस परिस्थिति में पड़ने के बारे में ईमानदार होना बहुत महत्वपूर्ण होता है। यदि ऐसा किसी अन्य के कारण है या पतित संसार में जीवन जीने के कारण है, तब भी बिलकुल ईमानदार होना अति आवश्यक है। बात को केवल अपने तक ही सीमित रखने के आवेग का सामना करना, और प्रभु के साथ मिलकर उस बात से जूझना बहुत महत्वपूर्ण है।
यदि हम प्रभु से यह विनती कर रहे हैं कि अपने मनों की पूरी देखभाल के साथ रक्षा कर सकें, तो फिर यह उचित है कि हम उसके द्वारा हमें दिये गये सभी साधनों का प्रयोग भी करें। इस में वे प्रमुख लोग भी सम्मिलित हैं, जिन्हें वह हमारे जीवनों में लाया है। इसकी एक छोटी सूची में हमारा जीवन साथी, परिवार, जिनके साथ हमारा शिष्यता का सम्बन्ध है या कलीसिया के साथी हो सकते हैं।
आप के चारों ओर मसीही भाई बहनों के होने से, क्या आप यह कह सकते हैं कि आप के पास लोगों का एक सुदृढ़ समूह है, जिन के साथ आप अपने मार्ग के पत्थरों के बारे में खुल कर बात कर सकते हैं? यदि हाँ, तो प्रभु की स्तुति हो। यदि नहीं, तो उसे किन बातों में सुदृढ़ करने की आवश्यकता है?
या क्या ऐसा लगता है कि, उसके द्वारा आप को उपलब्ध करवाए गये सम्बन्धों से आप को एक और अधिक उद्देश्यपूर्ण व्यवहार करना चाहिये? यदि ऐसी बात है, तो प्रभु आप को किस के साथ और अधिक ईमानदार होने के लिये अगुवाई कर रहा है? क्या कोई ऐसी बात है जिसे डर या लज्जा के कारण आप बाँटने से हिचकिचाते हैं?
यदि हाँ, तो आने वाले दिन ऐसा समय हों जिस में आप पत्थरीले मार्ग की वास्तविकता को पहचान सकें… एक कठिन मार्ग जो हमें ठोकर खिला सकता है। और हम उस के सर्वोत्तम भण्डारी हों, जिसे परमेश्वर हमारे जीवनों में लाया है, या लेकर आएगा, कि उसे हमारा मार्गदर्शक होने और हमारे कदमों को दिशा देने के लिये प्रयोग करे।
टेढ़े-मेढ़े मार्ग
क्या हम सभी यही नहीं चाहते हैं कि यदि हम प्रार्थना करें और परमेश्वर के वचन को अपने जीवन में लागू करें, तो जीवन भर हमारे मार्ग सीधे और भली-भाँति चिह्नित होंगे? परन्तु हमें यह समझने में देर नहीं लगती है कि ऐसा होता नहीं है। हाई स्कूल कर लेने के बाद, जब मैं इस विचार के साथ संघर्ष कर रहा था कि परमेश्वर मुझे किस दिशा में जाने की अगुवाई कर रहा है, तब मेरे पिता के साथ हुए कई वार्तालापों में से एक विशेष था। उन्होंने मुझे बताया कि यद्यपि वे कुछ दशकों से कार्य करते आ रहे हैं, परन्तु आज भी उन्होंने जो मार्ग चुना था, उस के बारे में सोचते हैं।
अब जब पीछे की ओर देखता हूँ, तो सोचता हूँ कि अन्य वार्तालापों के साथ ही उस वार्तालाप का परिणाम मेरा वहीं पर सन्तुष्ट हो जाना होता, जहाँ पर परमेश्वर ने मुझे रखा हुआ था। परन्तु, इस के स्थान पर बेचैनी और असन्तुष्ट होना बहुधा मेरे जीवन के दिनों पर हावी रहते थे। मेरे लिये ऐसी किसी भी परिस्थिति या समय, जिसमें ऐसा लगता था कि मैं अपनी किस्मत आज़मा रहा हूँ, को पचा पाना कठिन होता था। ऐसा लगता था कि जैसे प्रेरित पौलुस ने हर परिस्थिति में सन्तुष्ट रहना सीख लिया था (फिलिप्पियों 4:11), मेरे लिये वैसा ही करना असम्भव था।
हमारे पहले बच्चे के जन्म के बाद ही अन्ततः प्रभु को मेरा ध्यान इस ओर खींचने का अवसर मिला कि मेरे पास जो भी अवसर थे, मैं उन्हीं का भरपूरी से उपयोग करना सीखूँ। उस समय तक, मुझे अब उसके बारे में सोच कर भी कंपकंपी होती है, कि लोगों में वचन की सेवकाई के कितने अवसर मैंने ऐसे ही जा लेने दिये, क्योंकि मेरा ध्यान उस अनिश्चितता पर केन्द्रित था कि मैं कहाँ हूँ और प्रभु मेरा मार्गदर्शन किस ओर जाने के लिये कर रहा है। यह बात एक ऐसे मन से आई थी जो अन्दर की ओर देख रहा था, जिसका दृष्टिकोण बाहरी नहीं था कि अपने सामने के उन लोगों को देखूँ जिन्हें सुसमाचार की आवश्यकता थी, और उचित प्रतिक्रिया दूँ।
वह, जो मुझे टेढ़ा-मेढ़ा मार्ग लगता था, उसका एक अन्य परिणाम था अपनी इस सोच में ढीठ होना कि मुझे प्रभु से बेहतर पता था कि किस स्थान पर कितना समय बिताना है। ऐसे प्रश्नों पर समय लगाना हमें प्रलोभन देता है कि इधर-उधर अन्य दिशाओं में निकल जाएँ।
काश कि मैंने व्यवस्थाविवरण 5:32-33 के इन शब्दों पर अधिक विश्वासयोग्यता से ध्यान दिया होता कि, “इसलिये तुम अपने परमेश्वर यहोवा की आज्ञा के अनुसार करने में चौकसी करना; न तो दाहिने मुड़ना और न बाएँ। जिस मार्ग पर चलने की आज्ञा तुम्हारे परमेश्वर यहोवा ने तुम को दी है उस सारे मार्ग पर चलते रहो, कि तुम जीवित रहो, और तुम्हारा भला हो, और जिस देश के तुम अधिकारी होगे उसमें तुम बहुत दिनों के लिये बने रहो।”
हमारा प्रभु हम में से प्रत्येक को और अधिक सन्तुष्टि तथा दृढ़ता दे कि उसके राज्य में कार्य करने के लिये उसने हमें कहाँ पर रखा है और हम लोगों की उसके पास आने में अगुवाई करें।
समथर मार्ग
मैं और आप जिस मार्ग पर हैं, उसके बारे में कितना कुछ और भी है, और हम उसके बारे में कितना कम जानते हैं। इस बारे में प्रार्थना करने के लिये भजन 25:4-5 पवित्रशास्त्र का एक अद्भुत भाग है। “हे यहोवा, अपने मार्ग मुझ को दिखला; अपना पथ मुझे बता दे। मुझे अपने सत्य पर चला और शिक्षा दे, क्योंकि तू मेरा उद्धार करने वाला परमेश्वर है; मैं दिन भर तेरी ही बाट जोहता रहता हूँ।” यह करना इस एहसास के साथ आता है कि हम जिसे अपने लिये समथर मार्ग समझती हैं, यह आवश्यक नहीं है कि वे मार्ग प्रभु की दृष्टि में भी समथर ही हों।
हमें यह देखने और समझने के लिये कि परमेश्वर के दृष्टिकोण से समथर होने का अर्थ निश्चय ही सहज और दुःख भरा नहीं होता है, केवल 2 कुरिन्थियों के पन्ने पलटने और 11 अध्याय में दिये गये पौलुस के दु:खों के वर्णन पर ध्यान देने भर की आवश्यकता है। पौलुस के जीवन में आत्मा की सामर्थ्य और दुःख उठाने में एक स्पष्ट सम्बन्ध है। इसलिये, हमारा मार्ग, हमें तथा औरों को, ऊपर से चाहे जैसा भी क्यों न दिखाई दे, परन्तु, जब हम परमेश्वर के आज्ञाकारी रहने का प्रयास करते हैं, तब हमारे जीवनों में, हमारे एहसास करने से भी बढ़कर, और भी बहुत कुछ चल रहा होता है।
“परन्तु हमारे पास वह धन मिट्टी के बरतनों में रखा है कि यह असीम सामर्थ्य हमारी ओर से नहीं, वरन् परमेश्वर ही की ओर से ठहरे (2 कुरिन्थियों 4:7)।” इस पत्री के परिचय में ESV अध्ययन बाइबल में “पौलुस के प्रेरिताई के जीवन, सेवकाई, और सन्देश में दुःख उठाने और आत्मा की सामर्थ्य का सम्बन्ध”5 को प्रमुख किया गया है। यही हमारे जीवनों के लिये भी सच है, यद्यपि हमारे अस्थाई संसार में यह बहुधा ऐसा दिखाई नहीं देता है। इसकी बजाए, यह एक बहुत लंबे दृष्टिकोण का रूप ले लेता है। वास्तव में, हम जिस मार्ग पर हम चल रहे हैं, पौलुस उसे खींच कर अनन्तकाल तक ले जाता है, ताकि हमें सही दृष्टिकोण प्राप्त हो सके (2 कुरिन्थियों 4:16-18)।
तो, अपने मार्ग के बारे में विचार करते समय, हाल में आप के मन की भावना क्या रही है? आप ने जिन्हें अपने जीवन में बात कहने की अनुमति दी है, उन से आप को क्या आभास मिला है? इस बात का और अधिक एहसास करने से कि उस का अनुसरण करने में, प्रभु ने आप को ठीक उसी स्थान पर रखा हुआ है, जहाँ वह चाहता है कि आप को होना चाहिये, क्या आप के दृष्टिकोण में कुछ परिवर्तन हुआ है?
—
चर्चा और मनन
- अपने मन की रक्षा करने के मार्ग में आप ने हाल ही में किन पत्थरों को पाया है?
- जब बात मसीह का अनुसरण करने की आती है, तो आप दाहिने या बाएँ भटक जाने के कितने निकट रहते हैं?
- आप को किन बातों के लिये एक बार फिर आप के मार्ग को समथर बनाने के लिये धन्यवाद देने की आवश्यकता है?
—
निष्कर्ष
“हे मेरे पुत्र, मेरे वचन ध्यान धर के सुन, और अपना कान मेरी बातों पर लगा। इनको अपनी आँखों की ओट न होने दे; वरन् अपने मन में धारण कर। क्योंकि जिनको वे प्राप्त होती हैं, वे उनके जीवित रहने का, और उनके सारे शरीर के चंगे रहने का कारण होती हैं। सबसे अधिक अपने मन की रक्षा कर; क्योंकि जीवन का मूल स्रोत वही है। टेढ़ी बात अपने मुँह से मत बोल, और चालबाज़ी की बातें कहना तुझ से दूर रहे। तेरी आँखें सामने ही की ओर लगी रहें, और तेरी पलकें आगे की ओर खुली रहें। अपने पाँव रखने के लिये मार्ग को समथर कर, और तेरे सब मार्ग ठीक रहें। न तो दाहिनी ओर मुड़ना, और न बाईं ओर; अपने पाँव को बुराई के मार्ग पर चलने से हटा ले।” (नीतिवचन 4:20-27)
जैसा हमने देखा है, पूर्ण सावधानी से अपने मन की रक्षा करना एक अति उत्तम उद्यम है, विशेषकर यह देखते हुए कि जीवन के सोते वहीं से निकलते हैं। परन्तु फिर भी जीवन में कई अनावश्यक उद्यम होते हैं, सहज और अधिक आनन्द देने वाले मार्ग को चुनने के कारण, हम जिनका प्रयास करते रहते हैं।
ऐसा करने का एक अन्य कारण शब्द सावधानी में छुपा हुआ है। मेरियम-वेबस्टर शब्दकोश के अनुसार, इस शब्द की परिभाषा होती है, “किसी भी अवसर, गतिविधि, या खतरे के चिन्ह के लिये निरन्तर ध्यान बनाए रखने तथा प्रतिक्रिया देते रहने की दशा।”6 इसीलिये, हमारे मनों के चारों ओर अति आवश्यक जीवन देने और सुरक्षित रखने का सुदृढ़ घेरा बनाए रखना आवश्यक है।
इसी तरह से कल्पना कीजिये क्या हो यदि हम अपने परिवार जनों तथा अपनी स्थानीय कलीसिया में विश्वास के द्वारा बने आत्मिक पुत्र और पुत्रियों को निर्देश दें, जैसा सुलैमान ने अपने कहावती पुत्र को दिये। और कल्पना कीजिये कि परमेश्वर के अनुग्रह से वे बुद्धिमानी के इन वचनों पर ध्यान देते हैं तथा इन्हें आगे, औरों को भी पहुँचा देते हैं। ऐसे में, इस निरन्तर प्रलोभन देते रहने वाले संसार में हम सभी के मन कितने अधिक सुरक्षित रह पाएँगे? हमारी कलीसियाएँ, सुसमाचार की रक्षा और प्रचार करने में कितनी अधिक स्वस्थ रह सकेंगी।
अपने मन की परिधि को बेहतर सुरक्षित रखने के लिये प्रभु क्या करने के लिये आप की अगुवाई कर रहा है? इस समय किस क्षेत्र में आप सबसे कमज़ोर हैं: अपने कान लगाने, अपने मन में अनन्तकालीन खज़ाना भरने, अपने मुँह की रक्षा करने, अपनी आँखों की रक्षा करने, या अपने मार्ग पर विचार करने? इन क्षेत्रों में आप तथा वे, जिन के साथ आप प्रभु का अनुसरण कर रहे हैं, एक दूसरे की सहायता किस प्रकार से कर सकते हैं जिस से कि मसीह में आप के आगे बढ़ने का मार्ग और भी निश्चित रहे?
पाद-टिप्पणियाँ
- डॉनल्ड एस. व्हिटने, स्पिरिचुअल डिसिप्लिन्स फॉर द क्रिश्चियन लाईफ (कोलोराडो स्प्रिंग्स: नावप्रेस, 2014), ***पीजी #???
- जोनाथन एडवर्ड्स, द रिलीजियस अफेक्शन्स (करलीसले: बैनर ऑफ ट्रुथ ट्रस्ट, 2004), 176.
- क्रिस लुंडगार्ड, द एनिमी विदिन (फिलिपसबर्ग: पी & आर पब्लिशिंग, 1998), 42.
- जोनाथन लीमैन, द रूल ऑफ लव, (व्हीटन: क्रॉसवे, 2018), 74.
- ESV अध्ययन बाइबल: इंग्लिश स्टैण्डर्ड वर्ज़न (क्रॉसवेबाइबाल्स, 2008), ***पीजी#???
- “विजिलेन्स,” Merriam-Webster.com (मेरियम-वेबस्टर, 2011). जून 1, 2025.
लेखक के बारे में
टॉड समेलटज़ेर लंदन, ओहायो स्थित लंदन बैपटिस्ट चर्च में वरिष्ठ पादरी के रूप में सेवा करते हैं। वे अपनी पत्नी जूली से विवाहित हैं, और उनके तीन बच्चे हैं।
विषयसूची
- भाग I: अपने कान लगाएँ
- क्या आप को ध्यान देना कठिन लगता है?
- आप का ध्यान किस पर है?
- आप किस की सुन रहे हैं?
- चर्चा और मनन
- भाग II: अपने मन में भर लें
- आप के मन की पट्टियाँ
- आप के मन का खज़ाना
- आप के मन की लालसाएँ
- चर्चा और मनन
- भाग III: अपने मुँह की रक्षा करें
- आप जो कहते हैं
- आप कैसे कहते हैं
- आप उसे कब कहते हैं
- आप उसे किस से कहते हैं
- चर्चा और मनन
- भाग IV: अपनी आँखों की रक्षा करें
- पीछे की ओर देखें
- चारों ओर देखें
- आगे की ओर देखें
- चर्चा और मनन
- भाग V: अपने मार्ग के बारे में विचार करें
- पत्थरीले मार्ग
- समथर मार्ग
- चर्चा और मनन
- निष्कर्ष
- पाद-टिप्पणियाँ
- लेखक के बारे में