
#51 संघर्ष समाधान: लड़ाई-झगड़ों को फलदायी बातचीत में बदलना
संघर्ष समाधान: लड़ाई-झगड़ों को फलदायी बातचीत में बदलना
मुझे संघर्ष बिल्कुल भी पसन्द नहीं है। स्वभाव से मैं एक मिलनसार व्यक्ति ही रहा हूँ, जो लड़ाई-झगड़े के बजाय आपसी मेलजोल को अधिक महत्व देता है। मुझे गलत न समझें, मैं अलग-अलग विचार रखने और आवश्यकता पड़ने पर वाद-विवाद करने में आनन्दित होता हूँ। आख़िरकार, एक पास्टर होने के नाते, संसार अक्सर कई बातों पर मुझसे असहमत रहता है।
फिर भी, उन असहमतियों के बावजूद भी मैं अपने आसपास के लोगों के साथ मिल-जुलकर रहना पसन्द करता हूँ। परन्तु कभी-कभी मेरी मुलाकात ऐसे व्यक्ति से हो जाती है जिसके साथ संघर्ष का होना लगभग निश्चित सा लगता है। वह वही क्षण होता है जब एक साधारण सा मतभेद बढ़कर अधिक गम्भीर हो जाता है—अर्थात् एक तनावपूर्ण बातचीत, या लगातार बना रहने वाला तनाव, या यहाँ तक कि सम्बन्ध टूटते हुए से लगते हैं। एक पास्टर होने के नाते मैंने इसे अपने जीवन में और दूसरों के जीवन में भी देखा है। ऐसा लगता है कि संघर्ष एक अनचाहे अतिथि के समान है जो बिना बुलाए ही आ जाता है, फिर भी हमें इसे अनुग्रह और बुद्धिमानी के साथ सुलझाना सीखना चाहिए।
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ऑडियो#51 संघर्ष समाधान: लड़ाई-झगड़ों को फलदायी बातचीत में बदलना
भाग I: संघर्ष क्या है?
संघर्ष को इस प्रकार परिभाषित किया जा सकता है: “एक गम्भीर असहमति या वाद-विवाद, जो सामान्यत लम्बे समय तक चलने वाला होता है।” कुछ लोग सरल परिभाषा को पसन्द करते हैं और संघर्ष को सामान्य रूप से “लड़ाई-झगड़ा” कहते हैं। ये दोनों परिभाषाएँ संघर्ष के मूल तत्व को तो समेटती हैं, परन्तु वे उसके साथ जुड़े हुए तनाव का अदृश्य, मनोवैज्ञानिक बोझ को पूरी रीति से व्यक्त नहीं कर पाती हैं।
आप संघर्ष को चाहे जैसे भी परिभाषित करें, परन्तु जब आप उसमें फँसते हैं तो आप उसे जान लेते हैं। यह वह एहसास है जब आपके पेट में गाँठ-सी पड़ जाती है, जब आपको पता होता है कि एक कठिन बातचीत होने वाली है। यह जागकर बिताई गई वह रात है, जिसमें आप एक तीखी बातचीत को दोहराते रहते हैं। उस कमरे में यह वह असहज सन्नाटा होता है जहाँ दो लोगों के बीच मतभेद होते हैं। विश्वासियों के लिए, संघर्ष अधिकाँश उस एकता के साथ विश्वासघात करना जैसे महसूस होता है, जिसमें हमें मसीह की देह के रूप में सम्मिलित होने के लिए बुलाया गया है।
संघर्ष आसानी से आपके विचारों पर प्रबल हो सकता है, जिससे सामान्य बातचीत में सम्मिलित होना भी कठिन हो जाता है, विशेषकर उस व्यक्ति के साथ जिस के साथ आपका संघर्ष चल रहा हो। ऐसा लगता है मानो आप दोनों के बीच का वातावरण तनाव से भर गया है, जिससे हर शब्द एक सम्भावित बारूदी सुरंग जैसा महसूस होता है। कुछ लोगों के लिए, संघर्ष क्रोध या स्वयं के बचाव को भड़काता है; जबकि दूसरों के लिए, यह घबराहट या पीछे हटने की प्रवृत्ति को जन्म देता है। यह चाहे जिस भी रूप में प्रकट हो, परन्तु यह हमारे सम्बन्धों में उस मेल-मिलाप को बिगाड़ देता है जिसकी हम लालसा करते हैं। यदि आप भी मेरे ही समान हैं, तो संघर्ष अत्यंत निराशाजनक हो सकता है।
आपका क्या विचार है?
आप संघर्ष पर कैसे प्रतिक्रिया करते हैं? क्या आप हर हाल में इससे बचने का प्रयास करते हैं, यह आशा करते हैं कि यह अपने आप ही सुलझ जाएगा? या आप इसके आगे झुक जाते हैं, संभवतः कुछ अधिक ही उत्साह के साथ, हमेशा अपने पक्ष का बचाव करने के लिए तैयार रहते हैं? आप जहाँ कहीं भी गिरते हो, वहाँ आप अकेले नहीं हैं। संघर्ष एक सर्वव्यापी अनुभव है जो हर एक सम्बन्ध को प्रभावित करता है, चाहे वह सम्बन्ब्ध जीवनसाथी, सहकर्मी, मित्र या साथी विश्वासी के साथ हो।
यह जानाने के लिए मैंने बहुत से लोगों से बात की कि शान्ति पसन्द करने के मामले में मैं अकेला नहीं हूँ। फिर भी, संघर्ष बना रहता है, और ऐसा नहीं लगता कि यह शीघ्र ही समाप्त हो जाएगा। वास्तव में, मत्ती 24 में, यीशु अपने शिष्यों को स्पष्ट रूप से बताता है कि जब तक वह लौटकर वापस नहीं आता, तब तक संघर्ष बना रहेगा (मत. 24:6)। यीशु ने लड़ाइयों और लड़ाइयों की चर्चा, तथा विभाजन और कलह को एक ऐसे पतित संसार के लक्षणों के रूप में बताया, जो छुटकारे की प्रतीक्षा कर रहा है। यह केवल वैश्विक संघर्षों की बात नहीं है; वरन् यह हमारे व्यक्तिगत जीवन में भी सच है। परिवार के तीखे वाद-विवादों से लेकर कलीसिया के मतभेदों तक, महिमा के इस पक्ष में हमारे अस्तित्व के ताने-बाने में संघर्ष बुना हुआ है।
आपने यह मार्गदर्शिका इसलिए उठाई है, क्योंकि इसका एक कारण है। सम्भवतः यह कोई पुराना संघर्ष है, जो बहुत पहले हुआ था, या फिर कोई ऐसा संघर्ष है जिसमें आप अभी भी उलझे हुए हैं। हो सकता है कि आपको भविष्य में कोई संघर्ष दिखाई दे रहा हो, इसलिए आप पहले से ही बुद्धि की खोज में हों।
हो सकता है कि आप इसे इसलिए पढ़ रहे हों, क्योंकि आपका व्यक्तित्व संघर्ष की ओर झुका हुआ है। हो सकता है कि आपको लड़ाई-झगड़े में कुछ अधिक आनन्द आता हो। आप बहस करना पसन्द करते हैं और अपनी बात को प्रमाणित करने का अवसर पाकर आनन्दित होते हैं। परन्तु इन वर्षों के दौरान, आपने ध्यान दिया होगा कि इन छोटी-छोटी सफलताओं की कीमत चुकानी पड़ती है: जैसे तनावपूर्ण मित्रता, परिवार में आपसी खिंचाव, ऐसे सहकर्मी जो आपका सम्मान करने के बजाय आपसे डरते हैं, या फिर अन्य लोगों के बीच एक झगड़ालू व्यक्ति के रूप में आपका नाम जाना जाता है।
आपकी स्थिति चाहे जो भी हो, इसे पढ़ने का अर्थ है कि आप किसी भी संघर्ष को इस प्रकार से सुलझाने का प्रयास कर रहे हैं जिससे परमेश्वर का सम्मान हो और सम्बन्ध फिर से ठीक हो सकें। यह एक अच्छी बात है।
शुभ सन्देश यह है कि एक दिन, सभी संघर्ष समाप्त हो जाएँगे। मसीह फिर आएगा, अपना राज्य स्थापित करेगा, और संघर्ष केवल एक दूर की स्मृति बनकर रह जाएगा। कल्पना कीजिए एक ऐसे संसार की, जहाँ हर बातचीत प्रेम से भरी हो, जहाँ मतभेद अब विभाजन का कारण नहीं बनेगा, और जहाँ सभी के मन में शान्ति का राज होगा। एक विश्वासी के रूप में हम इसी आशा से जुड़े रहते हैं—अर्थात् एक ऐसा भविष्य से जहाँ संघर्ष परमेश्वर के राज्य के सिद्ध मेल-मिलाप में बदल दिया जाएगा (प्रक. 21:4)। इसलिए यदि आप आपसी संघर्ष से निराशा महसूस करते हैं, परन्तु साथ ही मसीह पर भरोसा रखते हैं, तो यह जान लें कि यह स्थिति केवल कुछ समय के लिए ही है!
परन्तु उस दिन तक, हम एक टूटे हुए संसार के तनाव के बीच रहते हैं, अतः इसमें चलने के लिए हमें परमेश्वर की बुद्धि की आवश्यकता है। बुद्धि पाने के लिए, हम परमेश्वर के वचन की ओर मुड़ते हैं। पवित्रशास्त्र के पृष्ठों के माध्यम से हम उन सिद्धांतों और अभ्यासों को पाते हैं, जो हमें लड़ाई-झगड़ों को ऐसी फलदायी बातचीत में बदलने के लिए सक्षम बनाते हैं, जो हमारे उद्धारकर्ता के हृदय को दर्शाते है।
पहला सिद्धान्त
सिद्धान्त #1: शान्ति के लिए प्रयास करें
रोमियों की पुस्तक गहन ईश्वर विज्ञान से भरी हुई है। मैं अपने आप को बार-बार इस पुस्तक की ओर पाता हूँ ताकि उद्धार, विश्वास, धर्मी ठहराए जाने, पाप तथा परमेश्वर की प्रभुता को उत्तम रीति से समझ सकूँ। परन्तु जब मैं रोमियों की पुस्तक के बारे में सोचता हूँ, तो संघर्ष का विषय मेरे मन में नहीं आता है। फिर भी, इसमें एक अनमोल बात है जो सभी प्रकार के संघर्षों के प्रति हमारे दृष्टिकोण को दिशा देती है।
रोम की कलीसिया को लिखे अपने पत्र के लगभग मध्य भाग में, सच्चे मसीही के लक्षणों पर चर्चा करते हुए, पौलुस अपने पाठकों को प्रोत्साहित करता है कि, “जहाँ तक हो सके, तुम भरसक सब मनुष्यों के साथ मेल मिलाप रखो” (रो.12:18)। यह आयत हमें स्मरण कराती है कि शान्ति केवल एक निष्क्रिय अवस्था नहीं, वरन् एक सक्रिय प्रयास है, जिसके लिए परिश्रम, नम्रता और मंशा से किया गया संकल्प आवश्यक होता है। कुछ ही अध्यायों के पश्चात् पौलुस रोमियों 14:19 में कुछ इस प्रकार से कहता है, “इसलिए हम उन बातों का प्रयत्न करें जिनसे मेल मिलाप और एक दूसरे का सुधार हो।” पौलुस के ये वचन हमें इस बात की चुनौती देते हैं कि हम ऐसा जीवन जिएँ जो सुसमाचार को प्रकट करे, यहाँ तक कि जब संघर्ष हमें अलग करने की धमकी देता है।
यह बात विशेषकर तब और भी अधिक गहरी हो जाती है, जब आप उसकी पत्री के संदर्भ पर विचार करते हैं।
जब रोम के मसीहियों ने पहली बार पौलुस के वचन पढ़े, तो वे सम्भवतः अपेक्षाकृत शान्ति का अनुभव कर रहे थे। वे किसी प्रकार के सताव से नहीं गुजर रहे थे। संघर्ष बहुत कम था। “सब लोगों के साथ मेल-मिलाप से रहना” मानो सहज रूप से प्रतीत होता था।
परन्तु केवल कुछ ही वर्षों में, रोम के मसीहियों को सम्राट नीरो के शासनकाल में बहुत अधिक सताव का सामना करना पड़ा। विश्वासियों को कठोर अत्याचार सहना पड़ता और सार्वजनिक रूप से मृत्यु दण्ड दिया जाता था। सोचिए कितना बड़ा संघर्ष था! फिर भी उनके मन के किसी कोने में पौलुस के प्रेरित करने वाले वचन थे, “जहाँ तक हो सके, तुम भरसक सब मनुष्यों के साथ मेल मिलाप रखो” (रो. 12:18)।
कल्पना कीजिए कि जब विश्वासियों को शत्रुता, विश्वासघात और यहाँ तक कि मृत्यु का सामना करना पड़ा, तब इन वचनों का उन पर कितना गहरा प्रभाव रहा होगा। उन्हें इसलिए बुलाया गया था कि वे प्रतिशोध या कड़वाहट के साथ नहीं, वरन् जहाँ तक उनसे हो सके, शान्ति के प्रति समर्पण के साथ उत्तर दें। यह उनके विश्वास से समझौता करने की बुलाहट नहीं थी, वरन् अकल्पनीय संघर्ष के बीच सुसमाचार की मेल-मिलाप कराने वाली सामर्थ्य को अपने जीवन में प्रकट करने की बुलाहट थी।
मैं जानता हूँ कि यह एक बहुत ही गम्भीर मामला है,परन्तु मित्रों, यह बुलाहट आज भी हम पर समान रूप से लागू होती है। मसीह के अनुयायी होने के नाते, हम संघर्षों का सामना विश्वासयोग्यता से इसलिए नहीं करते कि हम अपने विरोधियों पर कोई रणनीतिक बढ़त प्राप्त कर सकें। परन्तु हम ऐसा इसलिए करते हैं कि हम मसीह की इस आज्ञा को पूरा कर सकें कि हम सबके साथ मेल-मिलाप से रहें। ऐसा करने से हमें अपने आसपास के लोगों के सामने शान्ति के सुसमाचार को और भी स्पष्ट रूप से प्रदर्शित करने के अधिक अवसर मिलते हैं।
दूसरों के साथ मेल-मिलाप से रहना तब और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है जब संघर्ष मसीही भाइयों-बहनों के बीच होता है। इस पर विचार करें: बहुत सी बातों में से जिनके आधार पर लोग हमें पहचान सकते हैं, प्रभु हमें बताता है कि एक-दूसरे के प्रति हमारा प्रेम ही इस बात का मुख्य प्रमाण है कि हम उसके चेले हैं (यूहन्ना 13:35)।
न हमारे शब्द।
न पड़ोसी के प्रति हमारा प्रेम।
न हमारा दान।
न हमारी कलीसिया में उपस्थिति।
न हमारा सुसमाचार-प्रचार।
न हमारा प्रचार-कार्य।
न यह कि हम हर सप्ताह कितने लोगों को चेले बनाते हैं।
निस्संदेह, इनमें से प्रत्येक महत्वपूर्ण है। आज्ञाकारिता के ये कार्य हमारे विश्वास से प्रवाहित होते हैं और हमारी गवाही के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। परन्तु आश्चर्य की बात यह है कि दूसरे लोग परमेश्वर के लोगों को जिस प्रकार से पहचानते हैं, वह हमारा एक-दूसरे के प्रति प्रेम है। इस बात को अनदेखा न करें!
छुटकारा पाए हुए लोगों के रूप में, जो अभी भी अपनी शारीरिक इच्छाओं से जूझ रहे हैं, हमारे बीच संघर्ष होना स्वाभाविक है। और जब यह उत्पन्न होता है, तो हमें चकित नहीं होना चाहिए। परन्तु इसे गलत तरीके से सुलझाना हमारे विश्वास के विरुद्ध एक आरोप बन जाता है। ऐसी कलीसिया जो अनसुलझे संघर्ष या कड़वाहट से पहचानी जाती है, अपनी गवाही को कमजोर कर देती है। इसके विपरीत, वह कलीसिया जो बाइबल आधारित—प्रेम, क्षमा और मेल-मिलाप के द्वारा—संघर्ष को सुलझाती है, आशा का प्रकाश स्तंभ बन जाती है और दूसरों को मसीह की परिवर्तित करने वाली सामर्थ्य की ओर संकेत देती है। आइए हम ऐसे लोग बनने का प्रयास करें, जो शान्ति के लिए बहुत अधिक परिश्रम करते हैं और अपने मतभेदों के बीच भी परमेश्वर के प्रेम को दर्शाते हैं।
सिद्धान्त #2: शान्ति को आदर्श न मानें।
हालाँकि रोमियों 12:18 हमें शान्ति की खोज करने के लिए बुलाता है, अतः हम पौलुस की प्रेरणा के आरम्भ को अनदेखा नहीं कर सकते हैं। वह कहता है कि, “जहाँ तक हो सके, तुम भरसक सब मनुष्यों के साथ मेल मिलाप रखो।” उसकी यह शर्त—“यदि संभव हो”—एक पतित संसार की वास्तविकता को स्वीकार करती है। कभी-कभी हमारे उत्तम से उत्तम प्रयासों के बावजूद भी शान्ति हमसे दूर ही रहती है। हो सकता है कि दूसरा पक्ष सुलह करने से इनकार कर दे, या फिर यह संघर्ष सुसमाचार की किसी ऐसी सच्चाई से उत्पन्न हुआ हो जिस पर कोई समझौता नहीं किया जा सकता है। ऐसे क्षणों में, हमें अपने सिद्धान्तों से समझौता किए बिना, अपनी बुलाहट पर दृढ़ रहना चाहिए।
हो सकता है कि यह परीक्षा की घड़ी हो, फिर भी शान्ति को विश्वासयोग्यता से अधिक महत्व नहीं मिलना चाहिए। हम एक-दूसरे के साथ शान्ति बनाने का प्रयास करते हैं, परन्तु परमेश्वर के साथ शान्ति की कीमत पर नहीं करते हैं। यह एक महत्वपूर्ण भेद है। किसी भी कीमत पर शान्ति की खोज करना समझौते की ओर ले जा सकती है—चाहे वह अपमान से बचने के लिए सत्य को कमजोर करना हो या शान्ति बनाए रखने के लिए पाप की अनदेखी करना हो। ऐसे कार्य थोड़े समय के लिए मेल-मिलाप तो ला सकते हैं, परन्तु अंततः परमेश्वर का अपमान करते हैं और सम्बन्धों को हानि पहुँचाते हैं। सच्ची शान्ति मसीह में पाई जाती है, न कि संसार में।
यही बात यीशु ने अपने चेलों को लूका 12:51 में चेतावनी देते हुए कहा, जब उसने कहा कि, “क्या तुम समझते हो कि मैं पृथ्वी पर मिलाप कराने आया हूँ? मैं तुम से कहता हूँ; नहीं, वरन् अलग कराने आया हूँ।” हाँ, यीशु शान्ति का राजकुमार है (यशा. 9:6)। हाँ, यीशु उस समय शान्ति लाएगा, जब उसका राज्य पृथ्वी पर पूर्ण रीति से आएगा (यशा. 11:6-9; रो. 14:17; कुल. 1:19-20; प्रक. 11:15)। परन्तु केवल वही लोग जो स्वेच्छा से मसीह के सामने घुटने टेकते हैं, उस शान्ति को पाएँगे जो वह देता है।
यीशु हमें चेतावनी देता है कि उसके प्रति अपनी विश्वासयोग्यता को व्यक्त करना उन लोगों के साथ विभाजन का कारण बन सकता है जो उसे अस्वीकार करते हैं। यह विभाजन ऐसा नहीं है जिसे हम खोजते हैं, परन्तु यह ऐसी वास्तविकता है जिसे हमें स्वीकार करना ही होगा। जब कोई संघर्ष उत्पन्न होता है, तो शान्ति पाने के लिए मसीह से मुँह मोड़ लेना कोई विकल्प नहीं है। ऐसा करना मूर्तिपूजा के समान होगा, जिसमें हम दूसरों के साथ अपने सम्बन्ध को मसीह के साथ अपने सम्बन्ध से ऊपर रख देते हैं।
शान्ति की मूर्तिपूजा छोटे तरीकों से प्रकट हो सकती है:
— सुविधाजनक बनाए रखने के लिए कठिन बातचीत से बचना
— तनाव से बचने के लिए गलती के साथ सहमत होना
— परमेश्वर के बजाय मानवीय स्वीकृति को प्राथमिकता देना
विश्वासी होने के नाते हमें शान्ति की मूर्तिपूजा के प्रलोभन से सावधान रहना चाहिए और इस सत्य में स्वयं को दृढ़ रखना चाहिए कि सच्ची शान्ति दूसरों को प्रसन्न करने से नहीं, परन्तु परमेश्वर की आज्ञा पालन करने से आती है।
इन बातों को ध्यान में रखते हुए, अब आइए संघर्ष की जड़ों पर विचार करें, और जब हम इस बात को समझ जाते हैं, तो हम यह भी जान सकते हैं कि संघर्ष को फलदायक बातचीत में कैसे बदलें।
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चर्चा के प्रश्न:
- जब किसी संघर्ष का सामना होता है, तो क्या आप उसका डटकर सामना करते हैं, या उससे भाग खड़े होते हैं, या फिर शान्त भाव से प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं? यह आपके व्यक्तित्व के विषय में क्या कहता है, और उससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि यह आपकी आत्मिक परिपक्वता के विषय में क्या कहता है?
- शान्तिपूर्ण सम्बन्धों के क्या लाभ होते हैं?
- आप अपने जीवन में उन सम्बन्धों में शान्ति लाने के लिए कौन से कदम उठा सकते हैं, जो संघर्ष से भरे हुए होते हैं?
- क्या कभी आपको शान्ति को ही सब कुछ मान लेने का प्रलोभन हुआ है? आपने इसे किस प्रकार से समझौते की ओर ले जाते हुए देखा है?
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भाग II: संघर्ष के कैसे और क्यों को समझना
जड़ें (कैसे)
सन् 2004 से 2012 तक, हाउस कार्यक्रम ने संसार भर के दूरदर्शन के परदों पर अपना दबदबा बनाए रखा। यह एक काल्पनिक नाटक था जो प्रिंसटन प्लेंसबोरो शिक्षण अस्पताल में एक बुद्धिमान, परन्तु थोड़े से झगड़ालू, डॉ.ग्रेग हाउस और उपचार करने वाले उनके समूह की कहानी बताता था। यह एक बहुत बड़ी सफलता थी, जिसने आठ अवसरों पर 50 से भी अधिक पुरस्कार अपने नाम किए थे! किरदारों के अतिरिक्त, जिस बात ने इस कार्यक्रम को इतना आकर्षक बनाया, वह यह था कि डॉ. हाउस और उनके समूह को चिकित्सा सम्बन्धी कुछ ऐसे सबसे जटिल मामले मिलते थे, जिनकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता है। प्रत्येक प्रकरण एक पहेली के समान होता था जिसका समाधान करना होता था। उनके रोगियों के बाहरी लक्षण उनके शरीर के अन्दर हो रही घटनाओं का परिणाम होते थे। हाउस के समूह का कठिन कार्य लक्षणों के मूल कारण तक पहुँचना था, ताकि वे रोगी का सही ढँग से उपचार कर सकें।
रोग की गलत पहचान = गलत उपचार
गलत उपचार = अप्रभावी उपचार और/या मृत्यु
हम एक पतित संसार में संघर्ष की निश्चितता पर पहले ही विचार कर चुके हैं। परन्तु उस संघर्ष का कारण क्या है? जिस प्रकार गलत चिकित्सीय रोग पहचान अप्रभावी उपचार का कारण बन जाता है, ठीक उसी प्रकार संघर्ष के कारण को गलत समझना तनाव को बढ़ा सकता है या विभाजन को लम्बे समय तक बनाए रख सकता है। हमें यह समझने के लिए एक स्पष्ट, बाइबल आधारित रूपरेखा की आवश्यकता है कि संघर्ष क्यों उत्पन्न होता है और उसका प्रभावी ढँग से कैसे समाधान करना है।
निदान सम्बन्धी बातें
याकूब अपनी पत्री में लिखते हुए मूल कारण प्रस्तुत करता है, “तुम में लड़ाइयाँ और झगड़े कहाँ से आते है? क्या उन सुख-विलासों से नहीं जो तुम्हारे अंगों में लड़ते-भिड़ते हैं?” (याक. 4:1, बी.एस.आई.) मैंने यहाँ “सुख-विलासों” (यूनानी: hēdonē) के शाब्दिक अनुवाद के कारण इस अनुवाद को चुना है, यह उन स्वार्थी इच्छाओं को उजागर करता है जो संघर्ष को बढ़ावा देती हैं। ये आन्तरिक इच्छाएँ—नियंत्रण, पहचान या आराम के लिए हमारी लालसाएँ—अधिकाँश हमारे विवादों के मूल में होती हैं।
इस विषय में सोचिए।
पिछली बार जब आपका किसी के साथ गम्भीर मतभेद हुआ था, तो क्या आप वही चाहते थे जिसकी वे वकालत कर रहे थे? क्या आप चाहते थे कि जो वे कह रहे थे वह सच हो जाए? आपकी इच्छाएँ और उनकी इच्छाएँ मूल रूप से एक-दूसरे के विरोध में थीं, और याकूब हमें बताता है कि जब ऐसा होता है, तो “झगड़े और विवाद” उत्पन्न होते हैं।
हाल ही में हुए किसी विवाद पर विचार करें। सम्भवतः यह विवाद पैसे खर्च करने को लेकर जीवनसाथी के साथ हुआ हो—आपमें से एक बचत करना चाहता था, जबकि दूसरा खुलकर खर्च करना चाहता था। या सम्भवतः यह किसी मित्र के साथ उस निर्णय को लेकर मतभेद था, जिसका प्रभाव आप दोनों पर पड़ रहा था। हर मामले में टकराव केवल उस विवाद के विषय में नहीं था, वरन् उन आन्तरिक इच्छाओं को लेकर था जो आपके दृष्टिकोण को संचालित कर रही थीं।
तलाक से गुजर रहे दंपत्तियों के द्वारा अधिकतर दिए जाने वाले तर्क पर विचार करें: “हमें एहसास हुआ कि हम अलग-अलग चीजें चाहते हैं।” बाइबल के अनुसार, वे वही कह रहे हैं जो याकूब ने कहा था। उनका संघर्ष इस सच्चाई में निहित है कि उनकी इच्छाएँ एक-दूसरे के साथ मेल नहीं खाती हैं। विवाह के लिए परमेश्वर की योजना (इफ. 5:22-33) के प्रति साझा प्रतिबद्धता के बिना, उनकी परस्पर विरोधी इच्छाएँ उनके अलग होने का कारण बनती है। परन्तु जब दम्पति अपनी इच्छाओं को परमेश्वर की इच्छा के साथ मिला लेते हैं—और मसीह के प्रेम और बलिदान को दर्शाने का प्रयास करते हैं—तो आपसी संघर्ष विनाश का कारण बनने के बजाय उन्नत्ति का कारन बन सकता है।
हमारे संघर्ष का मूल कारण, या निदान, हमारी इच्छाओं में पाया जाता है। यहाँ पर हम कम से कम दो लक्षण देखते हैं।
दो लक्षण
पहला, संघर्ष तब उत्पन्न होता है जब एक या दोनों पक्षों की इच्छाएँ परमेश्वर की इच्छा से मेल नहीं खाती है। इसलिए इससे पहले कि उनके आपस में कोई संघर्ष उत्पन्न हो, उनमें से कम-से-कम किसी एक व्यक्ति का संघर्ष परमेश्वर के साथ चल रहा होता है। आखिरकार, यदि दोनों परमेश्वर की इच्छाओं का अनुसरण कर रहे होते, तो संघर्ष होता ही नहीं। यह एक गम्भीर सच्चाई है। दूसरों के साथ हमारा संघर्ष अधिकतर भीतर के एक गहरे संघर्ष को प्रकट करता है—अर्थात् एक ऐसा हृदय जो परमेश्वर की इच्छा के साथ तालमेल में नहीं रहता है।
उदाहरण के लिए, जब मैंने किसी छोटी सी बात पर परिवार के किसी सदस्य पर गुस्सा किया, तो मुझे पीछे हटकर ऐसा एहसास हुआ कि मेरी झुंझलाहट मेरे नियंत्रण या विश्राम की इच्छा से उत्पन्न हुई थी, न कि परमेश्वर के प्रति समर्पित हृदय से। जब दोनों पक्ष परमेश्वर की इच्छा—उसकी महिमा, उसके सत्य और उसके प्रेम का अनुसरण करते हैं, तो संघर्ष अपनी पकड़ खो देता है।
दूसरा, संघर्ष तब उत्पन्न होता है जब एक या दोनों पक्ष स्वयं को दूसरे से अधिक महत्वपूर्ण समझते हैं। जब पौलुस फिलिप्पियों को मसीह के समान बनने के लिए प्रोत्साहित कर रहा था, तब उसने मसीह की दीनता पर विस्तार से समझाया और उनसे आग्रह किया कि, “स्वार्थ या मिथ्यागर्व के लिये कुछ न करो, पर दीनता से एक दूसरे को अपने से अच्छा समझो” (फिलि. 2:3) यह आयत हमारी आत्मा के लिए दर्पण है। कितनी बार हम किसी संघर्ष में, दूसरे व्यक्ति की भलाई चाहने के बजाय, अपना ही बचाव करते हुए दिखाई देते हैं?
ये दोनों समस्याएँ परमेश्वर की योजना के विपरीत जाती हैं।
परमेश्वर की योजना
जब परमेश्वर हमें छुटकारा देता है, औरअन्धकार के राज्य से निकालकर हमें अपने पुत्र के राज्य में लाता है (कुल. 1:13), तो हम एक नई सृष्टि बन जाते हैं (2 कुर. 5:17)। हमारा पुराना पत्थर का हृदय माँस के हृदय से बदल जाता है (यहेज. 36:26)। हम अंश-अंश करके बदलते जाते हैं ताकि हम और अधिक यीशु के समान दिखें (2 कुर. 3:18)। यह बदलाव किसी आश्चर्यकर्म से कम नहीं है। जिस परमेश्वर ने सम्पूर्ण सृष्टि को बोलकर बनाया, वही हमारे हृदयों को नया आकार देता है, हमारी इच्छाओं को सही दिशा में मोड़ता है और हमारे मन को नया करता है। जैसे-जैसे हम मसीह में बढ़ते हैं, हम संसार को उसी की दृष्टि से देखने लगते हैं, और उन चीज़ों को महत्व देते हैं जिन्हें वह महत्व देता है, और वैसे ही प्रेम करते हैं जैसे वह करता है।
यीशु अपने पिता की इच्छा पूरी करना चाहता था (यूह. 5:19, 30; 6:38; मत. 26:39)। इसलिए, जैसे-जैसे हम मसीह के समान बनते चले जाते हैं, हम परमेश्वर की इच्छा की और भी अधिक अभिलाषा करने लगते हैं।
यीशु के समान और अधिक बनने की इस प्रक्रिया को पवित्रीकरण कहा जाता है। यीशु का जीवन पिता के प्रति पूर्ण समर्पण से भरा था, यहाँ तक कि तब भी जब इस समर्पण का परिणाम क्रूस था। जैसे-जैसे हम उसका अनुसरण करते हैं, हमारी इच्छाएँ स्वयं-केंद्रित उद्देश्यों से हटकर परमेश्वर केंद्रित उद्देश्यों की ओर मुड़ जाती हैं। यह बदलाव एक ही रात में नहीं होता है, परन्तु आत्मा के कार्य के द्वारा होता है, तब हम सबसे बढ़कर परमेश्वर को प्रसन्न करने की अपनी अभिलाषा में बढ़ते चले जाते हैं।
परमेश्वर की इच्छा का एक भाग यह है कि हम दूसरों को अपने से अधिक महत्वपूर्ण समझें (फिलि. 2:3)। अंततः परमेश्वर के पाप रहित पुत्र ने स्वयं को दीन बनाया, मनुष्य बना, दास का स्वरूप धारण किया, और पापियों की मृत्यु मरा, ताकि हम पापी उसके धर्मी उत्तराधिकार की बहुतायत का आनन्द ले सकें। जैसे-जैसे हम यीशु के समान बनते चले जाते हैं, वैसे-वैसे हम भी दूसरों को अपने से अधिक महत्वपूर्ण समझने लगते हैं, ठीक वैसे ही जैसे यीशु ने समझा। यही संघर्ष का उपाय है। जब हम अपनी आवश्यकताओं से ऊपर दूसरों की आवश्यकताओं को प्राथमिकता देते हैं, तब हम मेल-मिलाप के लिए स्थान बनाते हैं।
परमेश्वर की योजना उसके द्वारा छुटकारा पाए हुए लोगों के लिए यह है कि (1) हमारी इच्छाएँ उसकी इच्छाओं में बदल दी जाए, और (2) उसके पुत्र के समान, हम दूसरों को अपने से अधिक महत्वपूर्ण समझें। यदि ये दोनों बातें दोनों पक्षों में कार्य कर रही हों, तो संघर्ष समाप्त हो जाता है।
यदि आप मसीही लोगों के बीच पर्याप्त समय बिताते हैं, तो आप पाएँगे कि हम कुछ थोड़ी अटपटी (बनावटी) बातें भी करते हैं। मैं आज भी अपने बचपन के वे चाय पीने के बड़े-बड़े प्याले स्मरण कर सकता हूँ, जिन पर सुन्दर सुलेख में बाइबल की प्रसिद्ध आयतें लिखी होती थीं। इस प्रकार के संदर्भ में एक प्रसिद्ध और अधिकाँश उपयोग की जाने वाली आयत रोमियों 8:28 है। “और हम जानते हैं, कि जो लोग परमेश्वर से प्रेम रखते हैं, उनके लिये सब बातें मिलकर भलाई ही को उत्पन्न करती है; अर्थात् उन्हीं के लिये जो उसकी इच्छा के अनुसार बुलाए हुए हैं।” कितनी अद्भुत आयत है! वास्तव में लम्बे समय तक यदि आप मुझसे पूछते कि मेरी मन पसन्द बाइबल की आयत कौन सी है, तो मैं कहता कि रोमियों 8:28 ही है।
जब मेरे पिता को कैंसर का पता चला, जब मंदी के पश्चात् मेरे माता-पिता दिवालिया हो गए, और जब मेरे पिता की कैंसर से मृत्यु हो गई, तथा जब मेरी पत्नी ने माँसपेशी सम्बन्धी कमजोरी के कारण अपने भाइयों को खो दिया, और जब हमारी कलीसिया ने घोर कष्टों का अनुभव किया। मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि प्रभु ने उन सभी पीड़ादायक अनुभवों का उपयोग मुझे पवित्र करने के लिए, मुझे अपने बारे में और अधिक बताने के लिए, मुझे ऐसी बातें सिखाने के लिए किया जो मैं सम्भवतः कभी नहीं सीख पाता, और मुझे अपने और समीप लाने के लिए किया।
भले ही प्रत्येक परीक्षा कष्टकारी थी, परन्तु वही परमेश्वर के हाथ में मुझे आकार देने का एक साधन थी। जब मेरे पिता का निधन हुआ, मैंने परमेश्वर की प्रभुता पर भरोसा करना सीखा, ऐसे तरीकों से जो मैंने पहले कभी नहीं सीखे थे। जब हमारी कलीसिया को दुखों का सामना करना पड़ा, तो मैंने देखा कि मसीह की देह एकजुट हो गयी, उन्होंने जिस प्रेम और दृढ़ता का प्रदर्शन किया, उससे हमारा विश्वास और भी अधिक गहरा हो गया।
जब हम किसी संघर्ष से गुज़रते हैं, तब यही प्रतिज्ञा सच साबित होती है। रोमियों 5:3-5 में पौलुस के वचनों पर ध्यान दें: “… वरन् हम क्लेशों में भी घमण्ड करें, यही जानकर कि क्लेश से धीरजऔर धीरज से खरा निकलना, और खरे निकलने से आशा उत्पन्न होती है; और आशा से लज्जा नहीं होती, क्योंकि पवित्र आत्मा जो हमें दिया गया है उसके द्वारा परमेश्वर का प्रेम हमारे मन में डाला गया है।”
पौलुस के द्वारा सूचीबद्ध प्रत्येक लाभ (धैर्य, चरित्र, और आशा) पवित्रिकरण का एक तत्व है। इसलिए, जब हम संघर्ष का सामना करते हैं, तो हमें यह जानकर शान्ति मिल सकती है कि परमेश्वर इसका उपयोग हमें पवित्र बनाने के लिए कर रहा है। इस प्रकार का हमारा दृष्टिकोण संघर्ष को देखने का तरीका बदल देता है। इसे एक खतरे के रूप में देखने के बजाय, हम इसे एक ईश्वरीय अवसर के रूप में देख सकते हैं। परमेश्वर सबसे जटिल विवादों में भी काम करता है, हमें शुद्ध करने, हमारे विश्वास को दृढ़ करने, और हमें अनन्तकाल के जीवन के लिए तैयार करने के लिए काम करता है। आइए देखें कि इस सत्य ने मेरे स्वयं के जीवन में कैसे काम किया है, और यह आपके संघर्षों में आपको कैसे उत्साहित कर सकता है।
महाविद्यालय के दिन
जब मैं महाविद्यालय गया, तो मुझे पास्टर सेवकाई में काम करने की कोई इच्छा नहीं थी। यह बात तो मेरे मन में थी ही नहीं। मैं एक मसीही व्यक्ति तो था, परन्तु मेरी इच्छा थी कि मैं बहुत सारा पैसा कमाऊँ और अपनी कलीसिया का एक विश्वासयोग सदस्य बनूँ (इमानदारी से कहूँ तो, मैं शायद इसी प्रकार का व्यक्ति बनना चाहता था)।
मेरे मन में या तो बेसबॉल खेलकर पैसा कमाना था, या फिर व्यवसाय करके बहुत अधिक परिश्रम करके पैसा कमाना था। इसलिए स्वाभाविक रूप से मैं बेसबॉल खेलने और व्यवसाय में उपाधि प्राप्त करने के लिए एक मसीही महाविद्यालय में गया।
परन्तु मेरे दूसरे वर्ष ने सब कुछ बदलकर रख दिया।
अपने दूसरे वर्ष के दौरान, मैं बेसबॉल से पूरी तरह से थक चुका था। इसके अतिरिक्त मैंने “मसीही विश्वास” सम्बन्धी पढ़ाई की थी, जिसने मुझे पूरी रीति से हिलाकर रख दिया था। मेरे प्रोफेसर हमारी अधिकतर कक्षाओं में मसीही विश्वास के मुख्य पहलुओं को “गलत साबित” करने का प्रयास करते थे। जैसे कि पवित्रशास्त्र की त्रुटिहीनता और अचूकता, सृष्टि का विवरण, नरक की वास्तविकता और पाप के विरुद्ध परमेश्वर का न्याय, जलप्रलय आदि। मैं जानता था कि मैं उनसे असहमत हूँ, और मैं अधिकतर अपनी असहमति व्यक्त भी करता था, परन्तु मैं उनके साथ बराबरी से तर्क-वितर्क करने के लिए तैयार नहीं था। उनके तर्क बहुत गहरे होते थे, और एक युवा विश्वासी होने के नाते मुझे लगा कि मैं उनके सामने कमजोर पड़ रहा हूँ। मुझे स्मरण है कि मैं कक्षा में बैठा रहता था, और मेरा हृदय तेजी से धड़क रहा होता था, फिर भी मैं अपनी आपत्तियाँ व्यक्त करने का प्रयास करता था, परन्तु अन्त में मैं निराश और अपने-आप को अयोग्य महसूस करते हुए वहाँ से चला जाता था। वे संघर्ष के क्षण असहज तो थे, परन्तु अत्यधिक महत्वपूर्ण भी थे।
इसने मुझे बाइबल अध्ययन के लिए बहुत गहराई से प्रेरित किया। जैसे-जैसे मैंने पवित्रशास्त्र की विश्वसनीयता और भरोसेमंद होने के बारे में और अधिक सीखा, वैसे-वैसे मैं दूसरों को भी यह बात समझाने के लिए और अधिक उत्साहित होता चला गया। मुझे इस बात का बहुत दुःख हुआ कि मेरे कई सहपाठियों को परमेश्वर के वचन से स्वयं को अलग करने के लिए मनाया जा रहा था। मैंने कई-कई घंटों पुस्तकें को पढ़ने, उपदेश सुनने और मित्रों के साथ ईश्वर विज्ञान पर चर्चा करने में बिताए। मेरे प्रोफेसर के साथ उस संघर्ष के समय ने मेरे भीतर सत्य के लिए एक ऐसी भूख जगा दी थी, जिसे मैंने पहले कभी नहीं जाना था।
यह नई-नई लगन, और साथ में मेरे पासबानों के मार्गदर्शन ने मुझे पूर्णकालिक सेवकाई के हेतु आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। आज, प्रभु ने मुझे हमारी कलीसिया में एक पास्टर के रूप में पूर्णकालिक सेवा करने का बहुत बड़ा सौभाग्य प्रदान किया है। अब मुझे अपने दिन के सबसे अच्छे घंटे परमेश्वर के वचन का अध्ययन करने और उसे अपने जीवन तथा हमारी मण्डली के लोगों के जीवन में लागू करने में बिताने का अवसर मिलता है। यह एक ऐसा आनन्द है, जो बेसबॉल, व्यवसाय या पैसे से मिलने वाली किसी भी वस्तु से कहीं अधिक बढ़कर है।
प्रोफेसर के साथ हुए मेरे संघर्ष एक मुख्य स्रोत था, जिसने मेरे जीवन की दिशा को बदल दिया और मुझे एक ऐसी बुलाहट की ओर ले गया जिसे मैं स्वयं कभी नहीं चुनता। परमेश्वर ने एक चुनौतीपूर्ण प्रोफ़ेसर का उपयोग करके, अपने वचन के प्रति गहरी रूचि और अपने लोगों की सेवा करने की इच्छा जगाई।
प्रभु हमारे संघर्षों का उपयोग बहुत अधिक भला करने के लिए करता है। यही परमेश्वर की प्रभुता की सुन्दरता है। जिसे हम पीड़ादायक या बाधा डालने वाला समझते हैं, उसका उपयोग करके वह हमें अपने पुत्र के स्वरूप में ढालने के लिए करता है। जब संघर्ष को रोमियों 8:28 की दृष्टि से देखा जाता है, तो यह ऐसे प्रेमी परमेश्वर के हाथों में एक साधन बन जाता है, जो हमारे पवित्रीकरण के लिए समर्पित है।
सेवकाई के दिन
कहीं आप यह न सोच बैठें कि मसीही जीवन में संघर्ष केवल एक ही बार होने वाली घटना है, मैं एक और हाल का उदाहरण बताना चाहता हूँ। इस बार, मेरी स्नातक की पढ़ाई के दिनों से नहीं, वरन् मेरी पास्टर सेवकाई से। यह कहानी मेरे हृदय के बहुत निकट है, क्योंकि इसमें वे लोग सम्मिलित हैं जिनकी अगुवाई करने के लिए मुझे बुलाया गया है, और साथ ही एक शरुआती कलीसिया को कठिन परिस्थितियों से पार ले जाने की चुनौतियाँ भी थीं।
स्नातक के बाद, मैं परास्नातक उपाधि के लिए सेमिनरी गया। स्नातक की पढ़ाई पूरी होने के आसपास, मैंने एक छोटे से बैपटिस्ट कलीसिया में पास्टर प्रशिक्षण लेना आरम्भ किया। यह प्रशिक्षण एक वर्ष तक चलने के लिए बनाया गया था, और उसके बाद मुझे ओहायो के कोलंबस शहर के उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में एक कलीसिया स्थापित करने के लिए भेजा जाना था। वह एक रोमांचक और डरावना समय था।
मेरी अपनी कमियों के बावजूद भी परमेश्वर हम पर बहुत अधिक दयालु था। उस बहुत बढ़िया कलीसिया ने हमें भेजा, और हमने उम्मीद से अधिक तेजी से होने वाली उन्नत्ति देखी। इसके अतिरिक्त, हम अपनी योजना से पहले ही प्राचीनों की नियुक्ति करने में सक्षम हुए। इन सभी बातों से मैं अत्यंत उत्साहित था! वे आरम्भिक दिन आनन्द से भरे हुए थे। परिवार जुड़ रहे थे, जीवन बदल रहे थे, और सुसमाचार आगे बढ़ रहा था। सीधे शब्दों में कहें तो, हमारी कलीसिया के आरम्भिक दो वर्ष अविश्वसनीय थे! सब कुछ सही दिशा में जाता हुआ लग रहा था।
और अगले दो वर्ष बहुत ही कष्टकारी थे।
क्या हुआ था?
संघर्ष
हमारा प्राचीनों का समूह विभिन्न मुद्दों पर लगातार विभाजित होता चला गया। जिन बातों पर हमें लगता था कि हम सहमत हैं, वे ही असहमति का कारण बन गए। कुछ बातों को छोटी-मोटी पसन्द मानकर अनदेखा किया जा सकता है। अन्य बातें बहुत महत्वपूर्ण थीं जो हमारी कलीसिया के लिए ईश्वर विज्ञान के क्षेत्र में एक बड़े परिवर्तन का कारण बन सकती थीं। यह लगातार चलने वाला संघर्ष लगभग दो वर्षों तक चला और अत्यंत कठिनाइयों से भरा हुआ था। शायद मैं उन नींद रहित रातों, तनावपूर्ण सभाओं और उन सन्देह के क्षणों को कभी नहीं भूल पाऊँगा जो मेरे मन में घर कर गए थे।
हालाँकि, परमेश्वर ने उस समय का उपयोग मुझे उन तरीकों से पवित्र करने के लिए किया, जिनकी मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी। उसने मेरे स्वभाव के उन नुकीले किनारों को समतल कर दिया, जिनके बारे में मुझे एहसास भी नहीं था। उसने मूर्तियों को उजागर किया। और उसने मेरी निर्भरता अपने ऊपर और बढ़ा दी। उसने मुझे पाप के लिए दोषी ठहराया। उसने मुझे (व्यक्तिगत एवं सार्वजनिक) रूप से दीन बना दिया। उसने मुझे सहनशक्ति दी। उसने मेरी सोच को तेज किया। उसने मुझे उन तरीकों से तैयार किया, जिनके बारे में मुझे पता नहीं था कि मुझे इनकी आवश्यकता है। इनमें से कोई भी बात उस लम्बे समय तक चले संघर्ष के बिना सम्भव न होती।
इसके अतिरिक्त, उसने उस समय का उपयोग हमारी कलीसिया को पवित्र करने के लिए किया! हमारी सैद्धान्तिक एकता, आपसी सम्बन्धों की गहराई और सुसमाचार प्रचार-प्रसार के प्रति उत्साह—इन सभी कार्यों में स्पष्ट रूप से सामर्थ्य आई, जो अन्यथा शायद कभी न आ पाती। संघर्ष ने हमें अपने विश्वास को स्पष्ट करने, अपने सम्बन्धों को गहरा करने और अपने सुसमाचार प्रचार-प्रसार के प्रति फिर से समर्पित होने के लिए बाध्य किया। वे परिवार जो जा सकते थे, उन्होंने जाने के बजाय ठहरने और तनाव के बीच मिलकर आगे बढ़ने का चुनाव किया, और उनकी विश्वासयोग्यता आज भी फल ला रही है। आज हमारी कलीसिया संघर्ष के बावजूद नहीं, वरन् इसी कारण अधिक दृढ़ है।
संक्षेप में, परमेश्वर ने उस संघर्ष (जिसे कोई भी नहीं चाहता था) का उपयोग मेरी और हमारी कलीसिया की भलाई के लिए किया। यह रोमियों 8:28 की प्रतिज्ञा का प्रत्यक्ष कार्य है। परमेश्वर उन बातों को, जिनसे हम बचना चाहते हैं, उन्हीं को लेकर हमारी भलाई और अपनी महिमा के लिए उपयोग करता है। भले ही चाहे संघर्ष पीड़ादायक ही क्यों न हो, परन्तु परमेश्वर की अनन्त योजना में कभी भी व्यर्थ नहीं होता है।
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चर्चा के प्रश्न:
- जब आपका किसी के साथ संघर्ष होता है, तो आप सामान्यतः कैसे प्रतिक्रिया करते हैं?
- आपके जीवन में ऐसा कौन है जिसके साथ आपका संघर्ष होने की सबसे अधिक सम्भावना बनी रहती है?
- आपकी इच्छाएँ किस प्रकार उस संघर्ष में योगदान देती हैं जिसका आप दूसरों के साथ अनुभव करते हैं?
- यीशु ने सेवा करवाने की माँग करने के बजाय स्वयं सेवा की। इस प्रकार मसीह के समान सेवा करने का अनुसरण करना आपको संघर्ष को सुलझाने में कैसे सहायता कर सकता है?
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भाग III: लड़ाई-झगड़ों को फलदायी बातचीत में बदलने के लिए व्यावहारिक कदम
अपने हृदय को तैयार करें
अपने जीवन भर, मैंने बीच-बीच में होने वाली पाचन सम्बन्धी समस्याओं का अनुभव किया है, जिनके कारण कभी-कभी मुझे तीव्र उल्टी के दौरे पड़ते थे। यह कोई विशेष रूप से सुकून देने वाली बात नहीं है, विशेषकर यह देखते हुए कि मेरे पिता का निधन बड़ी आँत के कैंसर के कारण हुआ था। हालाँकि, बड़े होने पर भी परिस्थिति में सुधार नहीं हो रहा था, इसलिए सन् 2023 में मेरे चिकित्सक ने मुझे आन्तरिक शारीरिक जाँच करवाने की सलाह दी।
मैंने सहमति दी, क्योंकि मैं इस समस्या को एक ही बार में हमेशा-हमेशा के लिए सुलझाना चाहता था। आन्तरिक शारीरिक जाँच की संभावना बिल्कुल भी रोमांचक नहीं थी—क्योंकि गले के अन्दर कैमरा डाले जाने से चीजें कम आकर्षक होती हैं। परन्तु मैं जानता था कि समस्या को अनदेखा करने से वह दूर नहीं होगी। मुझे इसका सीधे सामना यह भरोसा रखते हुए करना था कि भले ही यह प्रक्रिया असुविधाजनक होगी, परन्तु अंततः परिणाम और चंगाई तक पहुँचने में सहायक होगी।
इस प्रक्रिया के सफल होने के लिए, मुझे इसके लिए तैयारी करनी थी। मुझे कड़े निर्देश दिए गए थे कि एक निश्चित समय तक कुछ भी न खाऊँ और कुछ विशेष तरल पदार्थों से भी परहेज़ करूँ। यह केवल नियमों का पालन करने की बात नहीं थी; परन्तु यह सुनिश्चित करने की बात थी कि चिकित्सक स्पष्ट रूप से यह देख सकें कि किसी भी समस्या का सही रीति से समाधान किया जा सके। मैंने निर्देशों का पालन किया, और परमेश्वर के अनुग्रह से प्रक्रिया अच्छी रीति से पूरी हुई और सब कुछ ठीक हो गया।
यदि हम संघर्ष को सुलझाने के लिए प्रतिबद्ध हैं, तो असुविधाजनक प्रक्रिया के समान हमें विचारपूर्वक असहज बातचीत के लिए तैयारी करनी होगी। उचित तैयारी ही हमें स्पष्ट रूप से देखने में सहायता करती है, कि हम समस्याओं का समाधान कर सकें।
अपने हृदय को विचारपूर्वक तैयार करने के तीन तरीके नीचे दिए गए हैं:
1. प्रार्थना
मैं कुछ ऐसे लोगों को जानता हूँ जो असुविधाजनक बातचीत में भी सफल हो जाते हैं। वे विशेषकर ऐसी बातचीत करने में निपुण होते हैं, और ऐसा लगता है मानो वे ऐसी बातचीत में सम्मिलित होने से आनन्दित होते हैं। यदि आप मेरे ही समान हैं, तो यह आपकी वास्तविकता नहीं है। असहज बातचीत मुझे उत्साहित होने के बजाय अधिक चिन्तित कर देती है।
परन्तु मैं जानता हूँ कि मुझे ऐसी बातें करनी ही होंगी। परमेश्वर के प्रति विश्वासयोग्यता इसकी माँग करती है। विश्वासी होने के नाते, हमें संघर्ष से बचने के लिए नहीं, वरन् संघर्ष का सामना करने के लिए बुलाया गया है। मुद्दों को अनदेखा करना उस समय भले ही आसान लगे, परन्तु यह अधिकाँश गहरे घाव और लम्बे समय तक बनी रहने वाली विभाजन की स्थिति को उत्पन्न करता है। परमेश्वर हमें मेल-मिलाप करने के लिए बुलाता है, यहाँ तक कि जब यह कठिन हो तब भी मेल-मिलाप का पीछा करें।
हमें फिलिप्पियों 4:6 में बताया गया है कि, “किसी भी बात की चिन्ता मत करो; परन्तु हर एक बात में तुम्हारे निवेदन, प्रार्थना और विनती के द्वारा धन्यवाद के साथ परमेश्वर के सम्मुख उपस्थित किए जाएँ।” यह आयत हम में से उन लोगों के लिए एक जीवनरेखा है जो कठिन बातचीत करने से डरते हैं। यह हमें स्मरण कराता है कि हमें संघर्ष का सामना अकेले नहीं करना पड़ता—परन्तु परमेश्वर हमारे साथ है, वह हमारी प्रार्थनाएँ सुनने और हमें अपनी शान्ति देने के लिए तत्पर रहता है।
कठिन बातचीत की तैयारी करने में हमारा पहला कदम यह होना चाहिए कि हम प्रार्थना में उस मुद्दे को प्रभु के सामने रखें। “अरे, हम तो अधिकाँश शान्ति खो देते हैं; अरे, हम कितना अनावश्यक कष्ट सहते हैं! और यह सब इसलिए होता है, क्योंकि हम सब कुछ प्रार्थना में परमेश्वर के सामने नहीं रखते हैं।” (हमारे पास यीशु में कितना अद्भुत मित्र है)
अपनी चिन्ताओं को परमेश्वर पर डाल दो। पतरस हमें आज्ञा देता है कि, “अपनी सारी चिन्ता उसी पर [डाल] दो, क्योंकि उसको तुम्हारा ध्यान है” (1.पत.5:7)। उन चिन्ताजनक विचारों को प्रार्थना में परमेश्वर के पास ले जाएँ, और उसे उसकी इस प्रतिज्ञा का स्मरण कराएँ कि, “तब परमेश्वर की शान्ति, जो सारी समझ से बिलकुल परे है, तुम्हारे हृदय और तुम्हारे विचारों को मसीह यीशु में सुरक्षित रखेगी” (फिलि.4:7)।
अपने डर का परमेश्वर के सामने अंगीकार करें। परमेश्वर से कहो कि आप उस बातचीत को लेकर घबराहट महसूस कर रहे हैं। अपने भीतर बसे हुए लोगों के प्रति किसी भी डर को स्वीकार करें। पाप को स्वीकार करें। यह कदम अत्यंत महत्वपूर्ण है। मैंने देखा है कि जब भी मैं किसी बातचीत को लेकर बेचैन होता हूँ, तो अक्सर इसका कारण यह होता है कि मुझे इस बात की चिन्ता होती है कि लोग मेरे बारे में क्या समझेंगे। क्या वे मुझे कम समझेंगे? क्या वे क्रोधित हो जाएँगे? इस प्रकार के भय को परमेश्वर के सामने स्वीकार करने से मुझे स्मरण कराया जाता है कि उसकी स्वीकृति ही सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। “मनुष्य का भय खाना फंदा हो जाता है, परन्तु जो यहोवा पर भरोसा रखता है उसका स्थान ऊँचा किया जाएगा” (नीत. 29:25)।
परमेश्वर से निवेदन करें। उससे प्रार्थना करो कि वह आपको सामर्थ्य दे, आपके पाप को प्रकट करे, बातचीत के दौरान सही शब्द आपके मन में डाले, ऊपर से आने वाली बुद्धि प्रदान करे, और समाधान करे। उससे प्रार्थना करो कि वह आपके मार्ग को तैयार करे और आपके प्रयासों को आशीषित करे। कभी-कभी, किसी कठिन बातचीत से पहले मैं विशेष और छोटी-सी प्रार्थना करता हूँ: “हे प्रभु, सच्चाई को प्रेम के साथ बोलने में मेरी सहायता कर। मुझे मेरी
कमियाँ देखने में सहायता कर। उनके और मेरे हृदय को कोमल बना। ताकि इस बातचीत से तुझे महिमा मिल सके।” ये प्रार्थनाएँ मुझे मेरी अपनी नहीं, वरन् परमेश्वर की सामर्थ्य में स्थिर करती हैं।
परन्तु संघर्ष के समाधान की ओर कोई भी कदम उठाने से पहले आपको सबसे पहले प्रार्थना करनी चाहिए। प्रार्थना केवल आरम्भिक चरण नहीं है; यह तो आधार है। यह हमारे हृदय को परमेश्वर के हृदय के साथ जोड़ती है, हमारे भय को शान्त करती है, और हमें अनुग्रह तथा विनम्रता के साथ दूसरों तक पहुँचने के लिए तैयार करती है।
2. आत्म-चिन्तन करें
यदि आप स्वयं को एक पापी मानते हैं (और आप हैं भी!), तो विनम्रता की माँग यह है कि आप समय निकालकर इस बात पर विचार करें कि इस संघर्ष में आपके पाप का क्या योगदान रहा है। संघर्ष के समाधान में यह सबसे कठिन, परन्तु सबसे अधिक परिवर्तनकारी कदमों में से एक है। दूसरों पर ऊँगली उठाना और दूसरे व्यक्ति की गलतियाँ साफ़-साफ़ देखना सरल होता है। परन्तु विनम्रता की माँग यह है कि हम सबसे पहले अपने आप को दर्पण में देखें और स्वयं से पूछें कि, “मैंने इसमें क्या योगदान दिया है? मैंने कहाँ पाप किया है?”
मुझे स्मरण है, कि कुछ लोगों के साथ मेरी एक निजी सभा हुई थी, जिसमें हम सब मिलकर एक महत्वपूर्ण विषय पर काम कर रहे थे। हममें से कोई भी इस बात से प्रसन्न नहीं था कि परिस्थितियाँ किस प्रकार से सामने आई थीं, और हम समाधानों पर विचार कर रहे थे—साथ ही इस बात को भी स्वीकार कर रहे थे कि वर्तमान समस्या में हममें से प्रत्येक ने किसी न किसी रूप में अपना योगदान दिया था। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि यद्यपि यह कठिन था, फिर भी नम्रता के कारण कुछ उन्नति सम्भव हो पा रही थी।
तभी उन लोगों में से एक ने, जो अब तक चुप था, अपनी चुप्पी तोड़ी और कहा, “मैं इसकी थोड़ी सी भी ज़िम्मेदारी नहीं लेता हूँ।”
उलझन भरी दृष्टि
उस सभा में जो भी उन्नति होती हुई हमें दिखाई दे रही थी, वह एक ही वाक्य के साथ समाप्त हो गई। कमरा भारी-सा महसूस होने लगा, मानो उसकी सारी हवा निकल गई हो। अपनी किसी भी गलती को स्वीकार करने से उसके इनकार ने बातचीत को वहीं पर रोक दिया।
अंततः हम अपने-अपने मार्ग पर चले गए। परन्तु आज तक वह संघर्ष अनसुलझा ही बना हुआ है। यह एक पीड़ादायक स्मरण दिलाता है कि नम्रता के बिना मेल-मिलाप लगभग असम्भव है। जब हम अपने ही हृदय की जाँच करने से इनकार करते हैं, तो हम पुल बनाने के बजाय दीवारें खड़ी कर देते हैं।
यदि हमें अपने मन को इस प्रकार से तैयार करना है कि संघर्ष को फलदायी बातचीत में बदला जा सके, तो हमें आत्म-चिन्तन करने और अपने पाप को स्वीकार करने के लिए समय निकालना होगा।
“यदि हम कहें, कि हम में कुछ भी पाप नहीं, तो अपने आप को धोखा देते हैं और हम में सत्य नहीं” (1 युहन्ना 1:8)। यह आयत ईमानदारी के लिए एक गम्भीर बुलाहट है। आत्म-चिन्तन का अर्थ अपराध-बोध में डूबे रहना नहीं, वरन् स्वयं को सत्य के साथ जोड़ना होता है। जब हम अपने पाप को स्वीकार करते हैं—चाहे वह घमण्ड, क्रोध, या स्वार्थ हो—तो हम पश्चाताप, क्षमा और चंगाई के द्वार खोल देते हैं।
आत्म-चिन्तन का अभ्यास करने के लिए, इस अभ्यास को परखें: कठिन बातचीत करने से पहले, कुछ क्षण प्रार्थना में बिताएँ और परमेश्वर से प्रार्थना करें कि वह आपके पाप को प्रकट करे। किसी भी मनोभावों, शब्दों या कार्यों को लिखें, जिन्होंने उस संघर्ष में योगदान दिया हो। विस्तृत ढँग से कहें। फिर, इन्हें परमेश्वर के सामने अंगीकार करें और, यदि उचित हो, तो दूसरे व्यक्ति के सामने भी स्वीकार करें। नम्रता का ऐसा कार्य तनाव को कम कर सकता है और फलदायी बातचीत के लिए भी आधार तैयार कर सकता है।
3. ईश्वरीय बुद्धि की खोज करें
यह मान लेना कि आपको दूसरों की बुद्धि की आवश्यकता नहीं है, एक मूर्खतापूर्ण प्रयास है। नीतिवचन 26 एक अद्वितिय अध्याय है। पहली ग्यारह आयतें एक मूर्ख व्यक्ति की दयनीय स्थिति का वर्णन करने के लिए समर्पित हैं, और फिर बल देते हुए सुलैमान आयत 12 में कहता है, “यदि तू ऐसा मनुष्य देखे जो अपनी दृष्टि में बुद्धिमान बनता हो, तो उससे अधिक आशा मूर्ख ही से है।”
इससे न चूकें।
एक मूर्ख व्यक्ति के लिए उस व्यक्ति की तुलना में अधिक आशा है, जो अपने आप को पर्याप्त रूप से बुद्धिमान समझता है। इस बात को अच्छी रीति से समझने के लिए, नीतिवचन 26:1-11 में दिए गए सजीव चित्रण पर ध्यान दें। इन ग्यारह आयतों के आधार पर, मूर्ख लोगों के विषय में:
- सम्मान के बजाय कोड़े पड़ने चाहिए
- तर्कों का कोई उत्तर नहीं दिया जाना चाहिए (जब तक कि निश्चित रूप से,
उन्हें उनकी मूर्खता का स्मरण न कराया जाए) - महत्वपूर्ण सन्देश नहीं सौंपने चाहिए
- कभी भी नीतिवचन नहीं बोलने चाहिए
- नियुक्त नहीं किया जाना चाहिए
मूर्ख को पूरी रीति से अविश्वसनीय बताया गया है, फिर भी सुलैमान कहता है कि उस व्यक्ति की तुलना में मूर्ख के लिए अधिक आशा है, जो अपनी ही बुद्धि पर भरोसा करता है। ऐसा क्यों? क्योंकि आत्मनिर्भरता हमें परमेश्वर और दूसरों की आवश्यकता के प्रति अन्धा बना देती है।
शुभ सन्देश यह है कि बुद्धि उन लोगों को बिना उलाहना और उदारता से दी जाती है जो परमेश्वर से इसकी माँग करते हैं (याक. 1:5)। यह प्रतिज्ञा संघर्ष के समाधान के लिए जीवनरेखा है। जब हम यह नहीं जानते कि आगे कैसे बढ़ना है, तो परमेश्वर हमें अपनी बुद्धि माँगने के लिए आमंत्रित करता है, और वह उसे देने की प्रतिज्ञा करता है। यह बुद्धि केवल बौद्धिक ज्ञान नहीं है; वरन् यह एक व्यावहारिक और ईश्वरीय गहरी समझ है, जो शान्ति की ओर ले जाती है (याक. 3:17)।
जिस तरीके से परमेश्वर अधिकाँश वह बुद्धि प्रदान करता है, वह उन विश्वासयोग्य भाइयों-बहनों के माध्यम से होता है जिन्हें उसने आपके आसपास रखा है। यदि आप अभी तक किसी स्थानीय कलीसिया से नहीं जुड़े हैं, तो जुड़ जाइए! यह ईश्वरीय बुद्धि का एक केंद्र है! वहाँ गहरी मित्रताएँ बनाइए, और फिर बुद्धि में बढ़ने के लिए निम्नलिखित काम करें:
- परमेश्वर से निरन्तर बुद्धि माँगते रहें (नीत. 2:6-7; याक. 1:5)।
- नियमित रूप से बाइबल में समय बिताते रहें, यह जानते हुए कि सच्ची बुद्धि यहीं पाई जाती है (नीत. 2:1-5)।
- कलीसिया के अन्य सदस्यों से उन बातों को साझा करने के लिए कहें, जो उन्होंने अपने अनुभव से बुद्धि के रूप में अर्जित की हैं।
- अपनी कलीसिया के बाहर के अन्य मसीहियों से भी बुद्धि माँगें।
- बुद्धि में बढ़ने के लिए मसीही संसाधनों (पुस्तकें, लेख, प्रसारण, वीडियो आदि)
का उपयोग करें।
इस बिन्दु पर अन्तिम स्पष्टता के रूप में, हमें दूसरों से बात करते समय (विशेषकर कलीसिया के अन्य सदस्यों से) उस व्यक्ति के बारे में सावधान रहना चाहिए जिससे हमारा संघर्ष चल रहा है। हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि हमारे शब्द उस व्यक्ति के नाम या प्रतिष्ठा को नुकसान न पहुँचाएँ।
बुद्धि की खोज का अर्थ यह नहीं है कि हम दूसरे पक्ष के बारे में चुगली या बदनामी करें। दूसरों से सलाह लेते समय, अपना ध्यान अपने मन और अपने कार्यों पर केंद्रित करें, न कि दूसरे व्यक्ति की कमियों को उजागर करने पर। उदाहरण के लिए, “वे अनुचित व्यवहार कर रहे हैं” कहने के बजाय आप यह कह सकते हैं: कि “मैं इस स्थिति में धैर्यपूर्वक प्रतिक्रिया देने के लिए परिश्रम कर रहा हूँ—क्या आप मेरी सहायता कर सकते हैं कि मैं कहाँ गलत हो सकता हूँ?” ऐसा दृष्टिकोण परमेश्वर का आदर करता है और मसीह की देह की एकता की रक्षा करता है।
इसे लागू करने के लिए एक या दो भरोसेमंद विश्वासियों की पहचान करने पर विचार करें, जो आपको ईश्वरीय सलाह दे सकते हैं। अपनी स्थिति को ईमानदारी से लेकिन सावधानीपूर्वक साझा करें, और उनसे उनकी स्पष्ट सलाह माँगें। मैंने अपने स्वयं के संघर्षों में भी ऐसा किया है। मैं सामान्य सलाह के लिए कई भाइयों से प्रसन्नता से सम्पर्क करूँगा (नीत.11:14), परन्तु गोपनीयता बनाए रखने के लिए मैं विशेष विवरण केवल कुछ लोगों (सामान्यतः साथी प्राचीनों) के साथ ही साझा करूँगा। उनकी बुद्धि ने अधिकतर मुझे अपनी कमियों को देखने और बातचीत को बहुत अधिक स्पष्टता और अनुग्रह के साथ आगे बढ़ाने में सहायता की है।
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चर्चा के प्रश्न:
- जब आप संघर्ष में होते हैं, तो क्या आपको अपनी गलती देखना कठिन लगता है? आपके जीवन में ऐसा कौन है, जो आपको यह देखने में सहायता कर सकता है कि आप कहाँ गलती कर रहे हैं?
- क्या आपके लिए अपने जीवन के संघर्षों के बारे में परमेश्वर से बात करना आसान है या कठिन है?
- कोई ऐसा उदाहरण बताएँ, जब आपने बुद्धि को खोजा हो और प्रभु ने उसे प्रदान किया हो, चाहे उसके वचन में समय दिताने के माध्यम से किया हो, या फिर अपने लोगों के द्वारा।
- क्षमा माँगने और क्षमा पाने की आपकी अपनी इच्छा ने संधर्ष को सुलझाने में किस प्रकार से सहायता की है? क्या आप दूसरों को क्षमा करने के लिए तैयार हैं? ऐसा करना कठिन क्यों होता है?
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भाग IV: बातचीत करना
हमने इस विषय पर चर्चा की है कि संघर्ष कैसे उत्पन्न होता है, और परमेश्वर इसे क्यों होने देता है। बातचीत के लिए अपने मन को तैयार करने के बाद, अब हम कुछ ऐसे व्यावहारिक कदमों पर विचार करने के लिए समय निकालेंगे, जो हमारी बातचीत को फलदायी बनाने में सहायक हो सकते हैं।
1. प्रतीक्षा न करें
यीशु अपने अनुयायियों को प्रोत्साहित करता है कि वे जितनी जल्दी हो सके संघर्ष को सुलझा लें (मत. 5:23-24; इफ. 4:26-27)। एक बार जब आपको यह एहसास हो जाए कि आप किसी संघर्ष में हैं, तो उसका शीघ्र ही समाधान करना आवश्यक हो जाता है। ऐसा न करने से केवल कड़वाहट की जड़ पनपने लगती है और वे भारी विनाश लाती है (इब्र. 12:15)। दुर्भाग्य से, मैंने अपने जीवन में स्वयं इस बात का अनुभव यह उम्मीद करते हुए किया है, कि किसी समस्या का समाधान अपने आप ही हो जाएगा। इसके बजाय, उस चुप्पी ने क्रोध को बढ़ने दिया, जिससे अंततः होने वाली बातचीत और भी अधिक पीड़ादायक हो गई थी।
2. स्पष्ट रहें
स्पष्टता ही दया है। यह सिद्धान्त आपकी बातचीत से पहले और बातचीत के दौरान दोनों परिस्थितियों में लागू होता है।
पहले से ही, जब आप मिलने का अनुरोध करें, तो उस सभा के लिए अपनी मंशा स्पष्ट रखें। यह कहीं बेहतर है कि आप सीधे-सीधे बात करें, बजाय इसके कि सामने वाला यह सोचता रहे कि यह मामला आपके संघर्ष से जुड़ा है या नहीं। अस्पष्टता चिन्ता को बढ़ा सकती है या गलत धारणाओं को उत्पन्न कर सकती है, जिससे बातचीत की शुरुआत ही गलत तरीके से हो सकती है।
यह कहने के बजाय कि, “हे जॉन, चलो जल्दी चाय पीते हैं!”, कुछ ऐसा कहने का प्रयास करें: “हे जॉन, मुझे पता है कि हाल की परियोजना के सम्बन्ध में हमारे बीच कुछ मतभेद रहे हैं।” क्या हम शीघ्र ही चाय पर इस विषय पर बात कर सकते हैं? संघर्ष के दौरान अस्पष्ट और अनुमान-आधारित अनुरोध भ्रम या सन्देह उत्पन्न कर सकते हैं। दूसरे व्यक्ति का सम्मान करने और एक सार्थक चर्चा हेतु वातावरण तैयार करने के लिए सभा के उद्देश्य के बारे में स्पष्ट रहें।
बातचीत के दौरान, अपनी बात स्पष्टता से कहें। यदि आपको लगता है कि आपके साथ कुछ गलत काम हुआ है, तो इस बात को सुनिश्चित करें कि सामने वाले व्यक्ति को इस बात की जानकारी हो। यदि आपको लगता है कि वे पाप में हैं, तो इस बात को घुमा-फिराकर न कहें। आपके विचार में जो भी संघर्ष का कारण है, उस पर प्रकाश डालें ताकि दोनों पक्ष स्पष्ट रूप से देख सकें। मैंने पर्याप्त रूप से स्पष्ट न होने की गलती की है, और इसमें सम्मिलित सभी लोगों को और भी अधिक पीड़ा हुई है।
बातचीत में जाने से पहले अपने मुख्य बिंदुओं को लिखने पर विचार करें। इससे आपको अपने मामलों को बिना भटके या विषय से भटके बिना स्पष्ट रूप से व्यक्त करने में सहायता मिलेगी। स्पष्टता का अर्थ कठोर होना नहीं है; इसका अर्थ है कि इस प्रकार से ईमानदार होना, जिससे समझ और समाधान को बढ़ावा मिले।
3. अनौपचारिक बातों से बचें
जब आप बातचीत करने के लिए बैठें, तो बेहतर होगा कि सीधे-सीधे वर्तमान विषय पर आ जाएँ। विषय तक पहुँचने के लिए धीरे-धीरे बात को आगे न बढ़ाएँ। दोनों पक्ष जानते हैं कि क्या चल रहा है, और अनौपचारिक बातचीत चालाकी पूर्ण और कपटी प्रतीत होगी तथा सन्देह भी उत्पन्न कर सकती है। यह मूल्यवान समय को नष्ट कर सकता है, और आप दोनों के बीच तनाव और अधिक लम्बा चल सकता है।
अनौपचारिक बातचीत से बचकर आप शीघ्र ही मूल विषय पर पहुँच सकते हैं। इससे आप दोनों को बातचीत के दौरान शुरुआती झटके से उबरने के लिए अधिक समय मिल जाता है, और आप उस समय का कुछ हिस्सा मेल-मिलाप करने की दिशा में भी समर्पित कर सकते हैं।
ऐसा करने का एक व्यावहारिक तरीका यह है कि आप एक संक्षिप्त और विनम्र शुरुआत करें, जो इस सभा के उद्देश्य (और सम्भावित असहजता) को स्वीकार करे। आप कुछ इस प्रकार से कह सकते हैं, “मुझसे मिलने के लिए धन्यवाद। मैं जानता हूँ कि शायद आप अपने दोपहर के भोजन का समय इस प्रकार से नहीं व्यतीत करना चाहते थे, लेकिन मुझे उम्मीद थी कि हम इस विषय में बात कर सकें, कि क्या चल रहा है, एक-दूसरे को अच्छे ढँग से समझ सकें और आगे बढ़ने का कोई मार्ग निकाल सकें।” यह एक केंद्रित और ईमानदार वातावरण तैयार करता है, साथ ही फलदायी चर्चा के लिए मार्ग आसान करता है।
4. ध्यान से सुनें
यदि हमें किसी के साथ भी, विशेषकर उस व्यक्ति के साथ जिससे हमारा संघर्ष चल रहा है—फलदायी बातचीत करना चाहते हैं, तो हमें अच्छा श्रोता होना चाहिए। ध्यानपूर्वक सुनना प्रेम का कार्य है, जो यह दर्शाता है कि हम दूसरे व्यक्ति के दृष्टिकोण को महत्व देते हैं और अपनी धारणाओं को एक ओर रखने के लिए तैयार हैं। यह केवल शब्दों को सुनने की बात नहीं है, वरन् उन शब्दों के पीछे निहित भाव को समझने का प्रयास करना है।
एक जासूस के कार्य पर विचार करें। यह निष्कर्ष निकालने के बाद कि कोई अपराध हुआ है, तो वह संदिग्ध व्यक्तियों की पहचान करना आरम्भ करता है। इसके बाद वह प्रश्न पूछता है—एक के बाद एक, लगातार प्रश्न पूछता रहता है। इस प्रक्रिया में वह पर्याप्त रूप से अपनी टिप्पणियाँ भी लिखता रहता है। वह यह सब इस उद्देश्य से करता है कि वास्तव में क्या हुआ था ताकि सब बातों को भली-भाँति समझ सके। एक अच्छा जासूस दोष मानकर नहीं चलता, वरन् सावधानीपूर्वक सबूत एकत्र करता है और निष्कर्ष पर पहुँचने से पहले प्रत्येक विवरण को ध्यानपूर्वक सुनता है।
एक बुरा जासूस पहला सबूत मिलने के आधार पर ही निष्कर्ष पर पहुँच जाता है। जबकि इसके विपरीत, एक अच्छा जासूस बेहतर समझ रखता है। वह जानता है कि उसे प्रश्न पूछते रहना चाहिए।
जब हम स्वयं को दूसरों के साथ संघर्ष की स्थिति में पाते हैं, तो हम उनके प्रति सन्देह भरी दृष्टि से जाने के लिए प्रलोभित होते हैं। परन्तु स्मरण रखें, पहले प्रश्न पूछे बिना निष्कर्ष पर पहुँच जाना सहायक नहीं होता है। नीतिवचन 18:13 को अपना मार्गदर्शक बनने दें: “जो बिना बात सुने उत्तर देता है, वह मूर्ख ठहरता है, और उसका अनादर होता है।” यह आयत एक गम्भीर स्मरण दिलाती है कि समय से पहले किए गए निर्णय न केवल समाधान में बाधा डालते हैं, वरन् परमेश्वर का अपमान भी करते हैं।
निर्णय सुनाने से पहले सुनना हमारा कर्तव्य है। बातचीत के आरम्भ में अपनी चिन्ताएँ साझा करने के बाद, इस सम्भावना को स्वीकार करें कि आपके पास समस्त आवश्यक जानकारी नहीं भी हो सकती हैं। आप ऐसा इस प्रकार के प्रश्न पूछकर कर सकते हैं:
- “मेरी कही बातों के आधार पर, क्या यह सम्भव है कि मैंने परिस्थिति को गलत समझा है?”
- “मैंने जो साझा किया है, क्या वह घटी हुई घटनाओं का सही आकलन है?”
- “क्या मुझसे कोई महत्वपूर्ण जानकारी छूट गई है?”
- “क्या मैंने स्थिति को निष्पक्ष रूप से प्रस्तुत किया है?”
यह सूची पूर्ण नहीं है, परन्तु ये प्रश्न नीतिवचन 18:13 का सम्मान करने की इच्छा को दर्शाते हैं। निष्कर्ष पर तुरन्त पहुँचने के बजाय, यह उन बातों को सुनने की तत्परता को दर्शाता है जो सम्भवतः छूट गई हों, और जहाँ आवश्यकता हो वहाँ सुधार स्वीकार करने की नम्रता को भी प्रकट करता है।
कुछ समय पहले, मैं कलीसिया के एक युवा व्यक्ति का आत्मिक मार्गदर्शन कर रहा था, जिसका कलीसिया के एक वृद्ध व्यक्ति के साथ कुछ विवाद हो गया था। वे आमने-सामने बात करने वाले थे, और मैंने उस युवा व्यक्ति को सलाह दी कि वह नम्रता के साथ बातचीत आरम्भ करे, यह मानते हुए कि बृद्ध व्यक्ति सही हो सकता है, उनसे सीखने की इच्छा रखे, और बोलने में धीमा रहे।
उस युवा व्यक्ति की प्रसंशा करनी होगी कि उसने मेरी सलाह मानी और पूरी विनम्रता के साथ बातचीत आरम्भ की। बृद्ध व्यक्ति के लिए लज्जा की बात यह थी कि उसने मेरी अपेक्षा से कम बुद्धिमानी दिखाई। नीतिवचन 18:13 का उदाहरण प्रस्तुत करने और वास्तव में अपने भाई को समझने का प्रयास करने के बजाय, उसने उस युवा व्यक्ति के विरुद्ध आरोप लगाने आरम्भ कर दिए। उसने बलपूर्वक कहा कि उसकी राय से असहमत होने के कारण वह पाप में है। वह यह समझता था कि उसके पास निर्णय लेने के लिए सभी आवश्यक जानकारी है, परन्तु उसने कभी सुनने के लिए समय नहीं निकाला, जिससे समाधान की हर सम्भावना समाप्त हो गई और अंततः दोनों ही निराश हो गए। नीतिवचन 18:13 की बुद्धिमानी का उदाहरण प्रस्तुत करने के बजाय, वह नीतिवचन 18:2 में वर्णित मूर्ख का उदाहरण बन गया, “मूर्ख का मन समझ की बातों में नहीं लगता, वह केवल अपने मन की बात प्रगट करना चाहता है।”
सुनने में असफल होना उन सबसे तेज़ तरीकों में से एक है, जिससे एक ऐसी बातचीत भी बन्द हो जाती है जो अन्यथा फलदायी हो सकती थी। जब आप कठिन बातचीत में प्रवेश करें, तो पर्याप्त नम्रता के साथ जाएँ ताकि आप अच्छी रीति से सुन सकें। जब दोनों पक्ष ऐसा करते हैं, तो बातचीत की भूमि को बहुत फल उत्पन्न करने का अवसर मिलता है।uit.
5. प्रेम में सच बोलें
इन सब बातों में, प्रेम के साथ सच बोलना महत्वपूर्ण (इफिसियों 4:15)। आज भी मेरे कुछ ऐसे मित्र हैं, जो कुछ सच्चाइयों को सुनने से इसलिए इनकार कर देते हैं, क्योंकि किसी ने उन सच्चाइयों को कठोर और प्रेम-रहित ढँग से उनके सामने रखा था। मैं चुप रहने की वकालत नहीं कर रहा हूँ। परन्तु मैं इस बात की वकालत कर रहा हूँ कि हमारी वाणी को नीतिवचन 15:1 को दर्शाना चाहिए: “कोमल उत्तर सुनने से जलजलाहट ठण्डी होती है, परन्तु कटुवचन से क्रोध भड़क उठता है।” यह संतुलन अत्यंत महत्वपूर्ण है। प्रेम के बिना सत्य गहरे घाव दे सकता है, जबकि सत्य के बिना प्रेम पाप को बढ़ावा दे सकता है। प्रेमपूर्वक सच बोलने के लिए, समस्या का सामना करने का साहस और उस व्यक्ति की देखभाल करने के लिए करुणा, दोनों की आवश्यकता होती है।
कुछ लोग चाहे कुछ भी कहें, परन्तु उनके बोलने का तरीका महत्वपूर्ण होता है। कठोर तरीका संघर्ष को बढ़ा सकता है, जबकि कोमल तरीका उसे शान्त कर सकता है। उन व्यक्तियों पर विचार करें जिन्होंने आपके जीवन पर सबसे गहरा प्रभाव डाला है। क्या उनके बोलने का तरीका आपके साथ कठोर था या कोमल?
पूरे संघर्ष के दौरान, यह सुनिश्चित करें कि आप सत्य को स्पष्ट रूप से इस प्रकार व्यक्त करें कि वह उन लोगों के प्रति प्रेम को दर्शाए जिनसे आप असहमत हैं। इसका अर्थ है कि ऐसे शब्दों को चुनें जो तोड़ने के बजाय उन्नति के लिए कार्य करें (इफ. 4:29)। उदाहरण के लिए, यह कहने के बजाय कि, “आप गलत हैं,” यह कहने का प्रयास करें कि, “मैं इसे अलग तरीके से देखता हूँ, परन्तु मैं आपका दृष्टिकोण समझना चाहता हूँ।” मेरी सहायता कीजिए।” यह तरीका बातचीत को रचनात्मक बनाए रखता है और असहमति के बीच भी मसीह के प्रेम को दर्शाता है।
6. शीघ्र क्षमा करें
यदि प्रभु इस बातचीत पर आशीष दें, और दूसरा पक्ष अपने पाप को स्वीकार करते हुए क्षमा माँगे (लूका. 17:3-4; कुल. 3:13), तो उन्हें क्षमा करने में शीघ्रता करें! क्षमा न करना न केवल मेल-मिलाप के लिए विनाशकारी होता है, वरन् मसीहियत के भी विपरीत है (मत. 6:14-15)। क्षमा सुसमाचार के केन्द्र में है। जैसे परमेश्वर ने मसीह के बलिदान के द्वारा हमें क्षमा किया है, ठीक वैसे ही हमें भी दूसरों के प्रति उसी अनुग्रह को बढ़ाने के लिए बुलाया गया है, भले ही ऐसा करना कठिन ही क्यों न हो।
जब हम क्षमा के लिए विनती करते हैं, तो परमेश्वर हमें प्रतीक्षा करने के लिए विवश नहीं करता है। हम से यह प्रतिज्ञा की गई है कि जब भी हम दया के लिए याचना करते हैं, वह उसे प्रदान करता है (1 यूहन्ना 1:9)। इसलिए पापी होने के नाते जिन्होंने परमेश्वर की क्षमा प्राप्त की है, हम भी उन लोगों को शीघ्र क्षमा कर देते हैं जिन्होंने हमारे विरुद्ध अपराध किया है (मत. 6:12)।
मसीह में हमने जो दया पायी है, उसने हमें एक नई प्रजा बना दिया है (1 पत. 2:10), ऐसी प्रजा जो परमेश्वर की मेल-मिलाप कराने वाली दया के शुभ समाचार को अपने आस-पास के लोगों तक पहुँचाती है। हमें “मेल-मिलाप की सेवा करने वाले” का पद दिया गया है
(2 कुरिन्थियों 5:18)। इसलिए, जब जिन लोगों के साथ हमारा संघर्ष होता है, और वे अपने पाप को स्वीकार करते हुए क्षमा माँगते हैं, तो हम ठीक वैसे ही प्रतिक्रिया करते हैं जैसे हमारा परमेश्वर और राजा करता है: तुरन्त आनन्दपूर्ण मेल-मिलाप के साथ क्षमा करते हैं (लूक. 15:11-32)! उड़ाऊ पुत्र का दृष्टांत इस बात को बहुत सुन्दर तरीके से दर्शाता है—पिता अपने पश्चाताप करने वाले पुत्र को गले लगाने के लिए दौड़ता है, और उसके पापों को उसके विरुद्ध पकड़ कर नहीं रखता है। हमें अपने सम्बन्धों में भी उसी प्रकार से असीम अनुग्रह को दर्शाने के लिए बुलाया गया है।
7. प्रक्रिया का पालन करें
यदि आपका संघर्ष कलीसिया के किसी साथी सदस्य से है, यदि समस्या पाप से सम्बन्धित है, और यदि आपकी बातचीत से पश्चाताप नहीं हुआ, तो यह महत्वपूर्ण है कि आप उस प्रक्रिया का पालन करें जो यीशु ने मत्ती 18:15-20 में बताई है। अपनी बुद्धि में, परमेश्वर ने अपनी कलीसिया को कलीसिया के भीतर बिना पश्चाताप किए गए पाप से निपटने के लिए चरण-दर-चरण मार्गदर्शिका प्रदान की है। यह प्रक्रिया दण्ड देने के विषय में नहीं है, वरन् पुनः स्थापित करने के विषय में है, जिसका उद्देश्य भटके हुए भाई-बहनों को परमेश्वर और कलीसिया की संगति में वापस लाना है।
यदि दूसरा पक्ष अपने पाप को स्वीकार करने से इनकार करता है, तो आपका अगला कदम यह है कि आप उनके साथ फिर से बातचीत करें, परन्तु इस बार एक या दो अन्य लोगों को साथ लेकर जाएँ (मत्ती 18:16)। इसका कारण यह है कि अन्य लोग यह निर्धारित करने में सहायता कर सकें कि क्या आप आवश्यकता से अधिक प्रतिक्रिया दे रहे हैं या फिर यह ऐसा पाप है जिस पर पश्चाताप न करने के कारण ध्यान देने की आवश्यकता है। इसे उन पापों के लिए सुरक्षित रखना बुद्धिमानी है जो (1) सत्यापित किए जा सकते हैं, (2) महत्वपूर्ण हैं, और (3) जिनका पश्चाताप नहीं किया गया है।[i]
यदि आपका किसी ऐसे मसीही व्यक्ति के साथ संघर्ष है जो किसी दूसरी कलीसिया का सदस्य है, तो संघर्ष की गम्भीरता के आधार पर, उसके किसी पास्टर से सम्पर्क करना सहायक हो सकता है। उन लोगों का यह उत्तरदायित्व होता है कि वे अपनी देखरेख में दिए गए लोगों की आत्माओं की देखभाल करें, और यदि कोई ऐसा पाप है जिसके लिए पश्चताप नहीं किया गया है और जिसके विषय में उन्हें जानकारी नहीं है, तो यह उनके लिए जानना सहायक होगा ताकि वे उसका निपटारा कर सकें। ऊपर बताए गए तरीकों के समान ही, इसे भी केवल ऐसे पापों के लिए सिमित रखना चाहिए जो प्रमाणित किए जा सके, जो गम्भीर हों और जिनके लिए कोई पश्चाताप न किया गया हो।
यदि आपका संघर्ष किसी गैर-मसीही से चल रहा है, तो मैं आपको प्रोत्साहित करता हूँ कि अगला कदम उठाने के लिए अपने पास्टर (रों) से इस विषय पर चर्चा करें। अविश्वासियों के साथ होने वाले संघर्ष में बुद्धि की आवश्यकता होती है, क्योंकि वे आपके बाइबल आधारित मूल्यों को साझा नहीं कर सकते हैं। आपके पास्टर आपको यह समझने में सहायता कर सकते हैं कि आपको आगे बातचीत करनी चाहिए, मध्यस्थता की सहायता लेनी चाहिए, या इस मामले को परमेश्वर को सौंप देना चाहिए (रो. 12:18)। 1
यदि आपका संघर्ष किसी आपराधिक गतिविधि से सम्बन्धित है, तो मैं आपको प्रोत्साहित करता हूँ कि आप अधिकारियों से सम्पर्क करें और सरकार को वह अधिकार प्रयोग करने दें जो परमेश्वर ने उसे दिया है (रो. 13)। यह सबसे अच्छा होगा कि यह काम आपके पासबानों की देखरेख में किया जाए।
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चर्चा के प्रश्न:
- क्या आपके साथ कभी कोई कठिन बातचीत गलत तरीके से हुई है? यदि हाँ, तो वह कैसे गलत हुई और क्यों?
- ऊपर दिए गए कठिन बातचीत करने के सुझावों में से कौन-सा सुझाव आपको अपने जीवन में लागू करने में सबसे कठिन लगता है, और क्यों?
- यह विचार करना कि परमेश्वर ने हमें क्षमा किया है, हमें दूसरों को क्षमा करने में कैसे सहायता करता है?
- मत्ती 18 में यीशु की बुद्धि हमें अपनी कलीसियाओं के भीतर के संघर्षों को सुलझाने में कैसे सहायता करती है?
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निष्कर्ष
मत्ती 5:9 में यह ध्यान देने योग्य बात है कि यीशु यह नहीं कहता कि, “धन्य हैं वे जो शान्ति का आनन्द लेते हैं।” परन्तु वह कहता है कि, “धन्य हैं वे जो मेल कराने वाले हैं।” इस पतित संसार में हमें संघर्ष का अनुभव होता है परन्तु इस संघर्ष के बावजूद, हम शान्ति स्थापित करने का प्रयास करते हैं, और इसके लिए परिश्रम करना पड़ता है।
कभी-कभी, हम झगड़ों से दूर रहकर (नीत. 20:3), शान्त स्वभाव दिखाकर (नीत. 17:27-28), बदले की भावना न रखकर (1 पत. 3:9), या केवल उसमें सम्मिलित होने से इनकार करके (नीत. 26:4; 29:9) शान्ति के लिए काम करते हैं। ये तरीके आग में घी न डालने जैसा है।
फिर भी, कभी-कभी हमारे उत्तम प्रयासों के बावजूद भी हम स्वयं को संघर्ष की स्थिति में पाते हैं। ऐसे ही समय में हमें अपनी उस बुलाहट का स्मरण दिलाया जाता है कि हमें मेल-मिलाप की सेवा के लिए बुलाया गया है (2 कुर. 5:18)। शीघ्रता से कार्य करके, स्पष्टता से बोलकर, ध्यान से सुनकर, और क्षमा करके, हम परमेश्वर को अपनी बातचीत के माध्यम से काम करने के अवसर देते हैं। ये कदम आसान नहीं हैं, परन्तु वे इसके योग्य हैं। ये लड़ाई-झगड़ों को ऐसे फलदायी बातचीत में बदल देते हैं जो परमेश्वर की महिमा करते हैं और सम्बन्धों को दृढ़ बनाते हैं। हम हर संघर्ष के प्रति अपने उद्धारकर्ता की दीनता और अनुग्रह के साथ आगे बढ़ें, और उस पर भरोसा रखें कि वह हमार शान्ति की ओर मार्गदर्शन करेगा।
अन्तिम टिप्पणियाँ
- मैं इन सहायक मापदण्डों के लिए जॉनाथन लीमैन का आभारी हूँ।
लेखक के बारे में
रॉब केन ओहायो के वेस्टर्विल स्थित सिटिजन्स कलीसिया के पास्टर है। उनका विवाह डेनिएल से हुआ है, और उनके तीन बच्चे हैं: फिनले, लेनन और एडा।
विषयसूची
- भाग I: संघर्ष क्या है?
- आपका क्या विचार है?
- पहला सिद्धान्त
- सिद्धान्त #1: शान्ति के लिए प्रयास करें
- सिद्धान्त #2: शान्ति को आदर्श न मानें।
- चर्चा के प्रश्न:
- भाग II: संघर्ष के कैसे और क्यों को समझना
- जड़ें (कैसे)
- निदान सम्बन्धी बातें
- दो लक्षण
- परमेश्वर की योजना
- महाविद्यालय के दिन
- सेवकाई के दिन
- चर्चा के प्रश्न:
- भाग III: लड़ाई-झगड़ों को फलदायी बातचीत में बदलने के लिए व्यावहारिक कदम
- अपने हृदय को तैयार करें
- 1. प्रार्थना
- 2. आत्म-चिन्तन करें
- 3. ईश्वरीय बुद्धि की खोज करें
- चर्चा के प्रश्न:
- भाग IV: बातचीत करना
- 1. प्रतीक्षा न करें
- 2. स्पष्ट रहें
- 3. अनौपचारिक बातों से बचें
- 4. ध्यान से सुनें
- 5. प्रेम में सच बोलें
- 6. शीघ्र क्षमा करें
- 7. प्रक्रिया का पालन करें
- चर्चा के प्रश्न:
- निष्कर्ष
- अन्तिम टिप्पणियाँ
- लेखक के बारे में