
#54 ईमानदारी से जीना: भ्रष्ट संसार में खराई
परिचय
अपने ही शिष्यों के द्वारा विश्वासघात किया गया, गिरफ्तार किया गया, और अस्वीकार किया गया, सत्य न्याय के कटघरे में खड़ा था। क्रूस की ओर जाते समय अगुवों ने सत्य से प्रश्न किए। रोमी राज्यपाल पुन्तियुस पिलातुस ने सत्य को स्वयं उसी के पक्ष में बोलने का अवसर दिया। एक महत्वपूर्ण क्षण में यीशु ने कहा, “मैंने इसलिए जन्म लिया, और इसलिए जगत में आया हूँ कि सत्य पर गवाही दूँ जो कोई सत्य का है, वह मेरा शब्द सुनता है” (यूहन्ना 18:37)। राज्यपाल ने एक ऐसा प्रश्न पूछा जिसे हमारा आधुनिक युग या तो अनदेखा करता है या तोड़-मरोड़ देता है, “सत्य क्या है?” यदि हम ईमानदारी से और सत्य के अनुसार जीना चाहते हैं, तो यह एक ऐसा प्रश्न है जिस पर हमारा ध्यान जाना चाहिए। हमारे सामाजिक माध्यमों के मंच और समाचार प्रवाह अधिकाँश सत्य के प्रश्नों के प्रति उदासीन प्रतीत होते हैं। हमारे ऑनलाइन संसार में झूठ का लाभ उठाने का प्रयास करने वाले लोगों की कोई कमी नहीं है। नकली वीडियो, नकली स्वास्थ्य सम्बन्धी दिनचर्या और नकली व्यक्तित्व हमारे समाचार प्रवाह को भर देते हैं, जो तेजी से फैलने की होड़ में लगे रहते हैं। शीघ्रता से खोज करने पर धोखाधड़ी और छल-कपट करने में पकड़े गए लोगों के विरुद्ध मुकदमों के एक के बाद एक उदाहरण सामने आते हैं। पूरी रीति से प्राकृतिक आहार योजना में रासायनिक दवाइयों का प्रभाव भी देखी दे रहा है। और वह चित्र अंततः ए.आई. द्वारा बनाई गई छवि निकलती है। दुःख की बात यह है कि तकनीकी क्षेत्र में इतनी प्रगति होने के बावजूद भी यह ‘जादूई नुस्खे’ बेचने वाले ठगों का खात्मा नहीं कर पाई है। बेईमानी प्रचुर मात्र में है, इसलिए यिर्मयाह के समान विलाप करने और यह कहने का कारण है कि, “देश में सत्य नहीं, वरन् असत्य प्रबल हो गया है” (यिर्म. 9:3)। इस पतित संसार में हम सत्य कहाँ ढूँढ सकते हैं?
मसीही होने के नाते हम जानते हैं कि सत्य प्राप्त किया जा सकता है। न केवल यह प्राप्त किया जा सकता है, वरन् परमेश्वर ने अपने पुत्र, यीशु मसीह के द्वारा अपने आप को प्रकट करके इसे वरदान के रूप में दिया है। इसके अतिरिक्त, हम जानते हैं कि परमेश्वर हमसे यह अपेक्षा करता है कि हम सत्य से प्रेम करें, क्योंकि यह उसी से आता है। हमारा परमेश्वर और छुटकारा देने वाला सत्य है। वह सत्य को प्रकट करने वाला है। उसकी दुल्हन, अर्थात कलीसिया, को अपने विश्वासयोग्य दूल्हे के द्वारा कहे गए सत्य के अनुसार कार्य करने के लिए बुलाया गया है। ईमानदारी और सच्चाई ऐसे सुन्दर गुण हैं, जिनके द्वारा विश्वासियों को परमेश्वर के स्वरूप को धारण करने वाले होने के नाते इस संसार में प्रज्वल्लित होना चाहिए।
ईमानदारी का जीवन वह है जो सत्य के प्रति समर्पित रहता है, चाहे उसकी कीमत कुछ भी क्यों न हो। इस अध्ययन के माध्यम से मेरी आशा है कि परमेश्वर के प्रति आपका समर्पण एक ईमानदार जीवन के रूप में प्रकट होगा, यहाँ तक कि इस कपटी संसार में भी। इस प्रकार की मसीही ईमानदारी, सच्चे देहधारी यीशु मसीह के साथ गहरे अनुभव से उत्पन्न होती है। यह उस हृदय का परिणाम है, जो यीशु के साथ गहराई से बंधा हुआ होता है, और जो अब उसी के द्वारा इस संसार में ईमानदारी से जीवन जीने के लिए प्रेरित है। एक बार धर्मी ठहराए जाने के बाद, मसीही विश्वासी सत्य के प्रति निरन्तरता और समर्पण के ऐसे मार्ग पर चल पड़ते हैं, जो धीरे-धीरे और अधिक प्रकाशमान होता चला जाता है, ठीक अपने परमेश्वर और उद्धारकर्ता के समान। सत्य को सही ढँग से समझने के लिए, हमें अपने अध्ययन का आरम्भ सत्य के स्रोत और मापदंड, अर्थात् परमेश्वर से करना चाहिए।
ऑडियो मार्गदर्शिका
ऑडियो#54 ईमानदारी से जीना: भ्रष्ट संसार में खराई
भाग I: सच्चा परमेश्वर
हम यह भी जानते हैं, कि परमेश्वर का पुत्र आ गया है
और उसने हमें समझ दी है, कि हम उस सच्चे को पहचानें,
और हम उसमें जो सत्य है, अर्थात् उसके पुत्र यीशु मसीह में रहते हैं।
सच्चा परमेश्वर और अनन्त जीवन यही है।
— 1 यूहन्ना 5:20
बाइबल एक ऐसे सत्य के मानक की बात करती है जो स्वयं परमेश्वर का ही पर्यायवाची है। वह न केवल सत्य है, वरन् वही परम सत्य है। अर्थात्, वही वास्तविकता का मापदंड है। झूठी मूर्तियों के विपरीत, वही सच्चा परमेश्वर है। जिस प्रकार से उसने संसार को उसके हर बारीक पहलू के साथ रचा है, वही वास्तविकता है न कि वह विकृत धारणा जो हम में हो सकती है। वही सच्चा, एकमात्र जीवित और विश्वासयोग्य परमेश्वर है। यीशु, “जो परमेश्वर का प्रकाश, और उसके तत्व की छाप है” (इब्रा. 1:3), उसने प्रसिद्धता के साथ कहा, “मार्ग और सत्य और जीवन मैं ही हूँ; बिना मेरे द्वारा कोई पिता के पास नहीं पहुँच सकता” (यूहन्ना 14:6)। दूसरे शब्दों में कहें तो, परमेश्वर होना ही सत्य होना है। सत्य का परमेश्वर से वही सम्बन्ध है, जैसा पानी का गीलेपन से, आग का गर्मी से, और गोंद का चिपचिपाहट से होता है। हम किसी एक की कल्पना दूसरे के बिना, उसकी परिभाषा के एक भाग के रूप में नहीं कर सकते हैं। परमेश्वर होना अर्थात सत्य होना, सत्य से परिपूर्ण होना और सच्चा होना है। यदि हममें से कोई परमेश्वर की चिन्ता करता है, तो उसे सत्य की भी चिन्ता करनी चाहिए। यदि हममें से कोई यह दावा करता है कि मैं यीशु से प्रेम करता है, तो हमें सत्य से भी प्रेम करने वाला होना चाहिए। क्योंकि हमारा परमेश्वर और छुटकारा देने वाल ही सत्य है!
पवित्रशास्त्र की आज्ञाएँ हमारे परमेश्वर के इस पवित्र स्वभाव को दर्शाती हैं। उदाहरण के लिए, दस आज्ञाओं में से किसी भी आज्ञा को ले लीजिए, तो आप उसमें परमेश्वर का न्याय, भलाई और शुद्धता को देखेंगे। ये आज्ञाएँ उस परम मानक का प्रतिबिंब हैं, जो स्वयं परमेश्वर की नैतिक सिद्धता और शुद्धता से उत्पन्न होता है। हमारे अध्ययन के लिए पवित्रशास्त्र की एक महत्वपूर्ण आज्ञा यह प्रकट करती है कि परमेश्वर की खराई उसके द्वारा छुड़ाए गए लोगों की सच्चाई में कैसे प्रतिबिंबित होती है। नौवीं आज्ञा कहती है, “तू अपने पड़ोसी के विरुद्ध झूठी गवाही न देना” (निर्ग. 20:16)। जिस प्रकार विशेष गुणसूत्र शारीरिक रूप में प्रकट होते हैं,
उसी प्रकार परमेश्वर का धर्मी स्वभाव उसकी आज्ञाओं के द्वारा प्रकट होता है। क्योंकि परमेश्वर सत्य है, इसलिए उसकी आज्ञाएँ न तो मनमानी हैं और न ही भ्रामक हैं। यदि परमेश्वर ही सत्य है, तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं कि वह उन लोगों के भीतर सत्य को अंकित कर देता है, जो छुडाए गए हैं और जिन्हें यीशु मसीह के स्वरूप में फिर से ढाला गया है। झूठ बोलना परमेश्वर की दृष्टि में एक घिनौनी बात है, न केवल इसलिए कि यह उसकी आज्ञा के विरुद्ध विद्रोह है, वरन् इसलिए भी कि यह उसके स्वभाव को बिल्कुल विपरीत तरीके से प्रकट करता है (नीत. 12:22)। गिनती 23:19 इस विचार को और भी दृढ़ करता है: “परमेश्वर मनुष्य नहीं कि झूठ बोले, और न वह आदमी है कि अपनी इच्छा बदले।”
यह बहुत ही उत्तम समाचार है। जब मित्र, परिवार के सदस्य या किसी अधिकारी ने अपना वचन तोड़ा है, तो हम सभी ने हानि का अनुभव किया है। यह हमें सन्देह या निराशा के भंवर में धकेल सकता है। जब वचन तोड़ दिए जाते हैं, तो हम ऐसे प्रश्न पूछ सकते हैं जैसे कि, “क्या मेरा जीवनसाथी सच में मुझसे प्रेम करता है?” क्या मेरे अधिकारी का अर्थ सच में प्रोत्साहन को बढ़ावा देना है? क्या वे सचमुच ऐसा सोचते हैं? वास्तविकता तो यह है कि किसी पर हमारा भरोसा कुछ हद तक इस बात पर निर्भर करता है कि वह अपने वचन को निभाने में पहले कितना स्थिर रहा है। सत्य का पूर्ण और कभी न बदलने वाला परमेश्वर हमारे भरोसे के हर अंश का भार उठा सकता है। उस परमेश्वर की स्तुति हो, जिसका सच्चा स्वभाव उसके कहने और करने की हर बात में धन्य स्थिरता के साथ प्रकट होता है। इसी कारण हमें उस पर और उसके वचन पर निर्भर रहना चाहिए।
परमेश्वर का वचन सत्य है
क्योंकि परमेश्वर सत्य है, इसलिए उसका हर एक वचन सत्य है। उसके होंठों से कभी झूठ नहीं निकलता है। इसका अर्थ है कि हम बाइबल पर भरोसा कर सकते हैं, जो कि परमेश्वर का वचन है। बाइबल में परमेश्वर ने स्वयं को हमारे लिए प्रकट किया है। उसने हमें यह भी बताया कि हम अपने पापों की क्षमा कैसे पा सकते हैं—अर्थात् मसीह के द्वारा पूरे किए गए कार्य पर भरोसा करके पा सकते हैं। इसी कारण विश्वास के द्वारा मसीही लोग नम्र भरोसे के साथ परमेश्वर के सामने झुकते हैं ताकि वे समझ सकें कि उसने क्या कहा है। क्योंकि परमेश्वर के वचन उद्धार हैं। शमूएल की बुलाहट के समान हम भी प्रभु से कहते हैं, “कह, क्योंकि तेरा दास सुन रहा है”(1 शम. 3:10)। हमारे नए जन्म में, पवित्र आत्मा हमारे हृदयों और मनों के दीपक को प्रज्वलित करता है, ताकि हम पवित्रशास्त्र को ठीक वैसे ही देख सकें जैसा वह वास्तव में है, अर्थात् परमेश्वर का अपना वचन (1 थिस. 2:13)। अपने हृदयों में ऐसा अनुग्रह पूर्ण कार्य प्राप्त करने के बाद, हम अपने परमेश्वर के पास जाते हैं, जिसकी खराई उसके प्रकाशन के हर एक शब्द में व्याप्त है। जैसा कि परमेश्वर कहता है, “परमेश्वर मनुष्य नहीं कि झूठ बोले, और न वह आदमी है कि अपनी इच्छा बदले। क्या जो कुछ उसने कहा उसे न करे? क्या वह वचन देकर उसे पूरा न करे?” (गिन.23:19)। जैसे की भजनकार कहता है, “तेरा सारा वचन सत्य ही है; और तेरा एक-एक धर्ममय नियम सदा काल तक अटल है” (भज.119:160)।
हम परमेश्वर का धन्यवाद भी कर सकते हैं कि वह इतनी उदारता और अनुग्रह से सत्य को प्रकट करता है। यद्यपि सृष्टि स्वयं परमेश्वर की महिमा और सामर्थ्य की घोषणा करती है, फिर भी हमारा पाप अधिकाँश प्रकाशन के इस रूप को बिगाड़ कर उसे मूर्तिपूजा की एक जटिल व्यवस्था में बदल देता है। हम पतित संसार में रहते हैं, जो ऐसे झूठ उत्पन्न करता है जिन्हें परमेश्वर के वचन की सच्चाई के साथ परखा जाना चाहिए। उसने हमें पुराना और नया नियम दिया है ताकि हम स्पष्ट रूप से देख सकें, कहीं ऐसा न हो कि हम अन्धकार में ठोकर खाएँ। उसका वचन एक मशाल के समान है जो हमारे मार्ग में उजियाला करता है, ताकि हम हर कदम पर भरोसे के साथ आगे बढ़ सकें, जब तक कि हम महिमा तक न पहुँच जाएँ। सत्य के प्रति समर्पित होने से पहले, व्यक्ति को यह जानना आवश्यक है कि सत्य को कहाँ पाना है। हमारे हाथों में जो बाइबल है, वह हमारे सच्चे और सच्चाई से परिपूर्ण परमेश्वर का वचन है। वह हमें धोखा नहीं देगा। हम इस बात पर पूरा भरोसा रख सकते हैं कि परमेश्वर ने एक भी झूठा वचन नहीं कहा है। इसलिए परमेश्वर के लोग पवित्रशास्त्र में प्रकट की गई उसकी प्रतिज्ञाओं पर अपनी आशा रख सकते हैं, क्योंकि परमेश्वर “कभी झूठ नहीं बोलता है” (तीत. 1:2)।
सत्य में पवित्रीकरण
हमारे हाथों में जो बाइबल है और जिसे हम अपने हृदय में संजोकर रखते हैं, वह एक पारदर्शी स्कैन के समान है, जो यह प्रकट करती है कि सत्य कहाँ निहित है। जितना अधिक हम स्वयं को परमेश्वर के सत्य में डुबोते हैं, उतना ही अधिक हम जीवन रहित झूठ के बीच सत्य की गर्माहट को देख सकते हैं। संसार की यह नयी बनायी गई जाँच प्रणाली हमें अच्छे और बुरे—सत्य और असत्य—के बीच का भेद जाँचने में सहायता करती है। सही पहचान करने के लिए, हमें परमेश्वर के वचन के द्वारा अपने मन को नया करने की आवश्यकता है “जिससे तुम परमेश्वर की भली, और भावती, और सिद्ध इच्छा अनुभव से मालूम करते रहो” (रो. 12:2)। वास्तव में, मसीही परिपक्वता परमेश्वर के सत्य में एक लम्बी और निरन्तर होने वाली यात्रा का परिणाम है, जिसमें “भले और बुरे” के बीच भेद किया जाता है (इब्र. 5:14)। जैसा कि एक ईश्वर विज्ञानी कहता है कि, “बाइबल सत्य का एक शुद्ध स्रोत है—ठीक वैसे ही, जैसे संसार में शुद्ध जल का कोई झरना होता है, जहाँ अन्य सभी स्रोत हानिकारक पदार्थों और भ्रष्ट मानवता की गतिविधियों से दूषित हो चुके हैं।” मसीही खराई के साथ जीने के लिए हमें हर बात को परमेश्वर के भरोसेमंद और परिवर्तनकारी वचन के मानक के अनुसार परखना चाहिए।
शैतान: झूठ का पिता
यदि परमेश्वर सत्य है और उसका वचन भी सत्य है, तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि शैतान इसके विपरीत होने का प्रतिनिधित्व करता है। शैतान परमेश्वर का शत्रु होने के नाते, सभी सत्य और सत्य बोलने के विरुद्ध खड़ा रहता है। वह झूठ का पिता है, और परमेश्वर तथा उसके वचन के विषय में सन्देह उत्पन्न करके परमेश्वर के लोगों पर आक्रमण करता है। वह आकाश के अधिकार का अधिपति है, और अविश्वासियों को अपने झूठ के अनुसार जीने के लिए प्रेरित करता है। मसीहियों को इतना भोला नहीं होना चाहिए कि वे इस वास्तविकता को अनदेखा करें या कम करके आँकें। आत्मिक युद्ध का टकराव तब होता है जब शैतान लोगों को झूठ के द्वारा धोखा देता है और उन्हें बहकाता है, और जब वह पाप को प्रलोभन के परदे से ढक देता है, या लोगों को असत्य की ओर ले जाता है।
क्या आपको इस बात पर विश्वास नहीं होता? तो अदन की वाटिका की ओर देखिए। आदम और हव्वा परमेश्वर की सृष्टि की बहुतायत के बीच में पूर्ण आनन्द के साथ थे। वे उस समय परमेश्वर की संगति का आनन्द लेते थे, जब वे सृष्टि की उन आज्ञाओं को पूरा कर रहे थे जो फलवन्त होने, संख्या में बढ़ने और प्रभुत्व करने से सम्बन्धित थीं। परन्तु शैतान एक झूठ के साथ आदम और हव्वा पर आक्रमण करने के लिए रेंगता हुआ आ गया। उसने उन्हें एक प्रश्न के द्वारा परीक्षा में डाल दिया: “क्या परमेश्वर ने सच में ऐसा कहा था?” “यदि परमेश्वर सच में भला होता, तो उसने तुम्हें इस फल में से कुछ लेने के लिए कहा होता।” शैतान के इस प्रश्न ने अंततः उन्हें सन्देह करने पर विवश कर दिया कि क्या परमेश्वर भला है। शैतान ने परमेश्वर को झूठ के रूप में प्रस्तुत किया। उसने आदम और हव्वा को परमेश्वर और उसके वचन पर सन्देह करने के लिए परीक्षा में डाल दिया। आज भी शैतान की चालें उतनी ही पुरानी हैं जितनी कि संसार के आरम्भ में थीं।
या आरम्भिक कलीसिया को देखें। पौलुस कुरिन्थुस के विश्वासियों को शैतान के साथ इस युद्ध का स्मरण दिलाने के लिए समय निकालता है, जब वे लोग चतुर बुद्धिमानों की झूठी शिक्षा के खतरे में थे। चाहे उनकी बातें कितनी भी बढ़ा-चढ़ाकर कही गई हों या कितनी भी प्रभावशाली थीं, ये झूठे शिक्षक झूठ ही फैला रहे थे। परन्तु लोगों को अपनी बातों से प्रभावित करने की कला में निपुण थे, उन्होंने ‘क्रूस की बुद्धि पर भी प्रहार किया (1 कुर. 1)। परन्तु विरोधी चाहे कितने भी शक्तिशाली क्यों न लगते हों, पौलुस इन विश्वासियों को सत्य के हथियार भी स्मरण कराता है। एक अन्य पत्री में, वह झूठे शिक्षकों से निपटते हुए उन्हें यह स्मरण कराता है कि: “क्योंकि हमारी लड़ाई के हथियार शारीरिक नहीं, पर गढ़ों को ढा देने के लिये परमेश्वर के द्वारा सामर्थी हैं।हम कल्पनाओं को, और हर एक ऊँची बात को, जो परमेश्वर की पहचान के विरोध में उठती है, खण्डन करते हैं; और हर एक भावना को कैद करके मसीह का आज्ञाकारी बना देते हैं” (2 कुर. 10:4-5)।
शैतान की कुटिलता और उसकी कुटिल चालों को देखकर हमें सचेत हो जाना चाहिए। परमेश्वर का वचन और परमेश्वर का पवित्र आत्मा हमारी लड़ाई के वे हथियार हैं, जिनसे हम उन झूठों का सामना करते हैं जो हम पर आक्रमण करते हैं, चाहे व्यक्तिगत रूप से हों या सामूहिक कलीसिया के रूप में। शैतान चाहता है कि हम झूठ पर विश्वास करें और झूठ के सहारे जिएँ, क्योंकि यह परमेश्वर के विरुद्ध उसके विद्रोह की योजना के अनुसार है। पौलुस इस चिन्ता को आगे भी जारी रखता है, “परन्तु मैं डरता हूँ कि जैसे साँप ने अपनी चतुराई से हव्वा को बहकाया, वैसे ही तुम्हारे मन उस सिधाई और पवित्रता से जो मसीह के साथ होनी चाहिए कहीं भ्रष्ट न किए जाएँ” (2 कुर. 11:3)। अतः हे मसीहियों, दुष्ट के झूठ का नाश करने के लिए सत्य की तलवार उठा लो। आपका परमेश्वर सच्चा परमेश्वर है और उसके वचन सच्चे वचन हैं। संसार में ईमानदारी से जीवन जीने के लिए आपको उसी के पास आना होगा, जो सत्य का स्रोत है।
—
चर्चा के प्रश्न:
- बाइबल में परमेश्वर ने अपने विषय में जो कुछ कहा है, उसे लेकर आपके मन
में क्या सन्देह हैं? - आपको परमेश्वर के विषय में कौन से झूठ मानने का प्रलोभन होता है?
- क्या आपके जीवन में ऐसे प्रभाव पड़े हैं जो आपको परमेश्वर पर अविश्वास
करने के लिए प्रलोभित करते हैं? - परमेश्वर की विश्वासयोग्यता पर आपके भरोसे में किस प्रकार से उन्नति हुई है?
—
भाग II: सच्चा सुसमाचार
“अब, जहाँ वह सुसमाचार की सच्चाई के विषय में कहता है, वहाँ वह दिखाता है
कि वहाँ दो सुसमाचार हैं—एक सच्चा और एक झूठा सुसमाचार। वास्तव में,
सुसमाचार अपने आप में एक ही है—सरल, सच्चा और निष्कपट।
परन्तु शैतान के सेवकों की दुष्टता के कारण यह भ्रष्ट और बिगाड़ दिया जाता है।”1
— मार्टिन लूथर, गलातियों 2:5 पर टीका
हम झूठ और असत्य से घिरे हुए थे।
मसीहियों के पास सच्चा सुसमाचार है। परमेश्वर की दया करने से पहले हम अन्धकार के राज्य के अधीन थे (कुल. 1:13)। हम अपने अपराधों और पापों में मरे हुए थे, और झूठ के पिता के मार्ग पर चल रहे थे। पाप से कलंकित हममें से प्रत्येक के लिए झूठ ही स्वाभाविक रूप से उपयुक्त था। हम में से प्रत्येक के लिए यह स्वाभाविक था कि हम जानकारी को अपने लाभ के अनुसार तोड़-मरोड़ दें। प्रत्येक झूठ के साथ, हमने अपने लिए, परमेश्वर के सिंहासन को छीनने का प्रयास किया है। एक लेखक लिखते हैं कि, “अक्सर हम अपनी सारे कौशल को इस कार्य में लगा देते हैं कि सत्य को बदलें, उसे नया रूप दें और अपने अनुसार ढालें, कि वह हमें उतना डरावना न लगे, परन्तु हमारी इच्छाओं के लिए अधिक अनुकूल बन जाए। हम ऐसा सत्य में कुछ जोड़कर या उसमें से कुछ घटाकर कर सकते हैं, परन्तु परिणाम एक ही होता है: उस घातक भ्रम में गिरना, जो मनुष्य की भ्रष्टता के सबसे निराशाजनक पहलुओं में से एक है।” आदम और हव्वा के पतन के बाद जन्म लेने वाला प्रत्येक मनुष्य स्वभाव से ही झूठ और बेईमानी की ओर झुका हुआ है। हम झूठ में सहभागी होते हैं क्योंकि हम मानते हैं कि इससे हमें किसी न किसी प्रकार का लाभ होगा।
हमारा सुसमाचार हमारे भ्रष्ट हृदयों के विपरीत, पूरी रीति से सच्चा है, क्योंकि यह मानवता की वास्तविक स्थिति के विषय में कहता है। सुसमाचार का सन्देश यह नहीं है कि हमें अपने भीतर की मूलभूत भलाई को सुधारने की आवश्यकता है। सुसमाचार यह नहीं है कि हमें अपनी सुन्दरता को खोजना है, या सच्चाई से रहकर अपने लिए जीना है। बात यह भी नहीं है कि हमारे भीतर आनन्द की कोई ऐसी कमी है जिसे केवल परमेश्वर ही पूरा कर सकता है (हलाँकि यह सच है!)। सुसमाचार बुरे समाचार अर्थात् कठोर सच्चाई से आरम्भ होता है। परमेश्वर रोमियों 3:10–18 में कहता है:
“कोई धर्मी नहीं, एक भी नहीं;
11 कोई समझदार नहीं;
कोई परमेश्वर को खोजनेवाला नहीं।
12 सब भटक गए हैं, सब के सब निकम्मे बन गए;कोई भलाई करनेवाला नहीं,
एक भी नहीं।
13 उनका गला खुली हुई कब्र है;
उन्होंने अपनी जीभों से छल किया है।
उनके होंठों में साँपों का विष है।
14 और उनका मुँह श्राप और कड़वाहट से भरा है।
15 उनके पाँव लहू बहाने को फुर्तीले हैं;
16 उनके मार्गों में नाश और क्लेश है,
17 उन्होंने कुशल का मार्ग नहीं जाना।
18 उनकी आँखों के सामने परमेश्वर का भय नहीं।”
मनुष्य की दशा हर प्रकार के असत्य से दूषित है। सुसमाचार सबसे पहले इस वास्तविकता से सहमत होने की एक बुलाहट है। हमारे भले और पवित्र परमेश्वर ने हमें बनाया, परन्तु हमने उसके विरुद्ध विद्रोह किया। हमारा पवित्र परमेश्वर इतना शुद्ध तथा सिद्ध है कि वह बुराई की ओर देख भी नहीं सकता है (हब. 1:13)। न्याय के दिन हर एक व्यक्ति अपनी निकम्मी बातों का लेखा देगा (मत्ती 12:36)। पाप और उसके फल जितने बुरे होते हैं, उतने ही विनाशकारी भी होते हैं। हमारा पाप हमारे और परमेश्वर के बीच विभाजन उत्पन्न करता है। सुसमाचार यह स्वीकार करता है कि हम पापी हैं और अपने पापों के कारण नरक में उचित और अनन्त दण्ड के योग्य हैं।
सुसमाचार में परमेश्वर लोकप्रियता की अपेक्षा सत्य की अधिक चिन्ता करता है। इसी कारण यह मनुष्य की दशा के विषय में इतने भयानक समाचार से आरम्भ होता है—क्योंकि यह सत्य है। हम नष्ट हो चुके पापी हैं जिन्हें परमेश्वर के अनुग्रह की अत्यंत आवश्यकता है। इस बुरे समाचार के बिना कोई शुभ सन्देश नहीं है। परन्तु परमेश्वर हमें दृढ़ बने रहने में सहायता कर सकता है। आरम्भिक कलीसिया ने विरोध के बीच में साहस के लिए प्रार्थना की, जैसा कि प्रेरितों के काम में वर्णन किया गया है। किसी भी ऐसे विरोध में हमारे लिए भी यही आवश्यक है, जिसका हमें सामना करना पड़ सकता है। पवित्र आत्मा, जो हम में वास करता है, हमारे सुसमाचार प्रचार में बिना समझौता किए सत्य के प्रति हमारे समर्पण को दृढ़ करता है। सामान्य विश्वास के विपरीत, सच्चा सुसमाचार हमारी ईमानदारी की कमी और उसके लिए मिलने वाले अनन्त दण्ड से आरम्भ होता है। मसीहियों, यीशु से मिलने से पहले हमारी यही दशा थी।
मसीह का कार्य
यद्यपि हमारे झूठ उत्पन्न करने वाले हृदय का बुरा समाचार सत्य है, ठीक वैसे ही उसके विषय में सुसमाचार भी सत्य है, जो “अनुग्रह और सच्चाई से परिपूर्ण” था (यूहन्ना 1:15)। यह यीशु ही था जिसने सत्य कहा, और अपने होठों पर तथा अपने जीवन में सत्य के प्रति दृढ़ प्रतिबद्धता बनाए रखी। उसकी वाणी में कोई झूठ या छल नहीं पाया गया, परन्तु एक सिद्ध याजक के रूप में “सच्ची शिक्षा उसके मुख में थी, और उसके होंठों पर कोई अधर्म की बात नहीं पाई गई” (मला. 2:6)। यीशु सत्य को प्रकट करने के लिए आया, और साथ ही परमेश्वर के पाप रहित पुत्र के रूप में सत्य के अनुसार जीवन जीने के लिए भी आया। अपने जन्म से ही लेकर उसने न तो कोई बड़ा झूठ बोला और न ही छोटा झूठ बोला। अपने कार्य में उसने अनुचित लाभ के लिए कभी कोई गलत तरीका नहीं अपनाया। अपने उद्देश्य में वह उस कार्य पर अटल बना रहा जिसे परमेश्वर ने उसे सौंपा था। यह सब उसने अपने लोगों के लिए किया।
परन्तु यीशु का भी विरोध किया गया था। अपने बपतिस्मा के कुछ ही दिनों बाद, पवित्र आत्मा यीशु को शैतान के विरुद्ध युद्ध में शामिल करने के लिए जंगल में ले गया (मत. 4)। इस वृत्तांत में आगे बढ़ते हुए, हम इस्राएल की उस मरुभूमि की यात्रा से इसकी समानता देख सकते हैं, जहाँ वे शैतान के प्रलोभनों के आगे डगमगा गए थे। क्या यीशु भी इस्राएल के समान सच्चाई से डगमगा जाएगा? शैतान वही करने का प्रयास करता है, जिसमें वह सबसे अधिक कुशल है—अर्थात् झूठ बोलने में।
शैतान तीन अलग-अलग प्रलोभनों का उपयोग करता है। ध्यान दें कि झूठ में कुछ सच्चाई भी शामिल होती है। शैतान अपने उद्देश्यों के लिए पवित्रशास्त्र को तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत करता है। पहला प्रलोभन (मत. 4:3-4) परमेश्वर की भलाई और उसकी व्यवस्था पर सन्देह करना था। यीशु ने उस झूठ को पवित्रशास्त्र का सन्दर्भ देकर पराजित किया। दूसरा प्रलोभन (मत. 4:5-7) भजन संहिता 91 का दुरुपयोग करके परमेश्वर की विश्वासयोग्यता और उसकी सुरक्षा का गलत लाभ उठाने का प्रयास किया गया। परमेश्वर वास्तव में उन लोगों की चिन्ता करता है जो उस पर भरोसा करते हैं। लेकिन शैतान ने इसे अन्य वचनों की अनदेखी करने के अवसर के रूप में लिया। यीशु अन्य वचनों के प्रकाश में शैतान के सुझाव की जाँच करके एक और झूठ को पराजित करता है। तीसरा प्रलोभन (मत. 4:8-10) महिमा पाने के लिए झूठा मार्ग प्रस्तुत करता है। यह सच था कि यीशु एक स्वीकृत उद्देश्य पर था, जिसमें महिमा भी शामिल थी। शैतान एक छोटा तरीका प्रस्तुत करता है यदि यीशु उसे दण्डवत कर दे, जिसके योग्य केवल परमेश्वर है। यीशु परमेश्वर के वचन की सच्चाई के द्वारा एक और झूठ को पराजित करता है। यीशु ने सत्य के प्रति समर्पित रहकर शैतान पर विजय प्राप्त की। उसने यह अपने लोगों की ओर से किया।
यीशु ने अपनी खराई बनाए रखी, जबकि शेष सब के सब असफल हो गए थे। उसने कुँवारी मरियम के गर्भ से लेकर क्रूस पर अपनी मृत्यु तक सत्य को थामे रखा। अपने जीवन और शिक्षाओं में पूरी रीति से निष्कलंक रहते हुए, वह क्रूस पर चढ़ा और उस मृत्यु को सहा, जो हमें सहनी थी। यीशु को पापियों, यहाँ तक कि सबसे बड़े झूठे लोगों के लिए क्रूस पर चढ़ाया गया, ताकि जो लोग पाप से फिरकर केवल उसी पर भरोसा करें, उन्हें अनन्त जीवन मिल सके। उसका सच्चा जीवन हमारा बन गया। हमारा झूठा जीवन उसका बन गया, और इसके परिणाम स्वरूप उसे शाप भोगना पड़ा। विश्वासी अब यीशु की धार्मिकता में विश्राम पाते हैं, जो हमारे कारण अपने जीवन को दाँव पर लगाते हुए सत्य के प्रति समर्पित रहा।
पवित्र आत्मा, जिसने हमें अनुग्रह के द्वारा पश्चाताप और विश्वास प्रदान किया, उसे “सत्य की आत्मा” (यूह. 14:17) भी कहा जाता है। यीशु ने प्रतिज्ञा की कि वह अपने शिष्यों में वास करने के लिए सत्य की आत्मा को भेजेगा, ताकि वह यीशु की सच्चाई को प्रकट करे और हमें मसीह के स्वरूप में ढाले (1 पत. 1:2)। इसलिए विश्वासी होने के नाते, हम विश्वास के द्वारा पायी गई मसीह की धार्मिकता के कारण धर्मी (धर्मी ठहराए) गिने जाते हैं। हम भी धर्मी बनाए जाते हैं (पवित्र किए जाते हैं), क्योंकि पवित्र आत्मा की सामर्थ्य के द्वारा जो हमारे भीतर कार्य करती है हमें महिमा की ओर नया बनाती है।
व्यक्तिगत सुसमाचार की खराई
यदि सुसमाचार की सच्चाई मसीही विश्वासी की स्वतंत्रता और उद्धार है, तो यह आश्चर्य की बात नहीं कि शैतान यहीं पर तीखे आक्रमण करता है। और सच्चाई यह है कि जब हम विश्वासी बन जाते हैं, तब भी शैतान हम पर आक्रमण करना बन्द नहीं करता है। जिस प्रकार बपतिस्मा के द्वारा हमें परमेश्वर की सन्तान और मित्र के रूप में अलग किया जाता है, उसी प्रकार हमें ‘झूठ के पिता’ अर्थात् शत्रु के रूप में भी पहचाना जाता है। हम पहले उसके साथ मिलकर षड्यंत्र में सम्मिलित थे, लेकिन अब हमने युद्ध भूमि में पाला बदल दिया है। अब हम यीशु के साथ मिलकर लड़ते हैं। यद्यपि यीशु ने शैतान को पराजित कर दिया है, फिर भी वह गर्जनेवाले सिंह के समान इस खोज में रहता है, कि किसको फाड़ खाए (1 पत. 5:8)।
“क्या सचमुच परमेश्वर ने यह कहा” कि मसीह ने आपके पाप अपने ऊपर ले लिए हैं, और उसकी सिद्ध धार्मिकता आपकी कर दी गई? इस बात पर विचार कीजिए कि आप किस प्रकार से परमेश्वर की आज्ञा पालन करने का प्रयास करते हैं, जबकि साथ ही यह सन्देह भी करते रहते हैं कि क्या परमेश्वर आपसे प्रेम करता भी है या नहीं। “क्या परमेश्वर ने सच में कहा है” कि कोई भी हमें मसीह के प्रेम से अलग नहीं कर सकता है? विचार करें कि उसके साथ आपको अपने आचरण में किस बात से डर लगता है। “क्या परमेश्वर ने सच में कहा है” कि क्षमा के लिए यीशु पर भरोसा रखते हुए, अपने पापों का परमेश्वर के सामने अंगीकार करो? विचार करें कि कौन सी बातें आपको अनुग्रह के सिंहासन के पास प्रार्थना में आने से निराश करती हैं। “क्या परमेश्वर ने सच में कहा है,” कि आप यीशु में लेपालक उसकी सन्तान हो? विचार करें कि किन-किन तरीकों से हम एक अजनबी के समान व्यवहार करते हैं।“क्या परमेश्वर ने सच में कहा है,” कि वह ऐसा पिता है जो जानता है कि उसकी सन्तान को क्या चाहिए, और हमारे भले तथा अपनी महिमा के लिए अच्छे वरदान देता है? विचार करें कि जब हमें अपनी इच्छा के अनुसार, अपने मन पसन्द समय पर कुछ नहीं मिलता, तो हम अपने मन में कैसी कड़वी बातें पाल लेते हैं। सुसमाचार की खराई का अर्थ सुसमाचार की सच्चाई को बनाए रखना है। हमें उस प्रश्न पर विचार करने की आवश्यकता है जो पौलुस ने गलातियों 3:3 में उठाया था: “क्या तुम ऐसे निर्बुद्धि हो, कि आत्मा की रीति पर आरम्भ करके अब शरीर की रीति पर अन्त करोगे?
भाइयों और बहनों, हमें सुसमाचार की सच्चाई में डूब जाना चाहिए। सुसमाचार के ऐसे समृद्ध वचनों को लिख लें, जिन्हें आप पूरे दिन स्मरण कर सकें और उन पर मनन भी कर सको। मसीह के उस प्रेम में स्वयं को निरन्तर तरोताजा करते रहें, जो प्रेम वह आपसे करता है। आप किसी अन्य कलीसिया के सदस्य को खोजने पर विचार करें, जिसके साथ आप हमारे स्थान पर प्रायश्चित पर पुस्तकों का अध्ययन करें या सुसमाचार की उस सच्चाई पर चर्चा करें, जिस पर विश्वास करने में आप संघर्ष कर रहे हैं। स्वयं के द्वारा उद्धार पाना पतित मनुष्य का स्वाभाविक सन्देश है। यह धार्मिक रूपों में भी आ सकता है जो मसीही नाम धारण करते हैं। सावधान रहें कि सुसमाचार के दोपहर के सूर्य के प्रकाश में चलें, और उसका प्रकाश हर उस बात को प्रकट कर देगा जो उससे सम्बन्धित नहीं है।
सामूहिक सुसमाचार की खराई
खराई के लिए संघर्ष केवल व्यक्तिगत युद्ध नहीं है; परन्तु यह एक सामूहिक प्रयास है। गलातियों के पहले अध्याय में पौलुस, मसीह में कलीसिया के उद्धार से सम्बन्धित एक हृदयस्पर्शी स्मरण के साथ आरम्भ करता है। मसीह में प्राप्त पूर्ण उद्धार ही पूरी पुस्तक का स्वर निर्धारित करता है। परन्तु यह स्वर, यद्यपि स्तुति से भरा हुआ है, फिर भी डाँट-फटकार के रूप में भी सामने आता है। पौलुस पूरी रीति से आश्चर्यचकित है कि गलातियों ने सुसमाचार की सच्चाई से मुँह मोड़ लिया है। वह स्पष्ट है कि केवल एक ही सुसमाचार है, और उसकी रक्षा करने का उत्तरदायित्व उन्हीं का है। पौलुस एक ऐसा मापदंड प्रस्तुत करता है कि हर किसी की शिक्षा (यहाँ तक कि उसकी अपनी भी, भले ही वह प्रेरित है!) को परखा जाना चाहिए। किसी भी शिक्षक की पृष्ठभूमि या स्तर महत्वपूर्ण नहीं होता है। मण्डली को यह पूछना चाहिए: कि क्या यह व्यक्ति सुसमाचार प्रचार करता है? यदि ऐसा नहीं है, तो परमेश्वर घोषणा करता है कि “वह शापित हो” (गल. 1:9)। यदि गलातियों या कोई भी स्थानीय कलीसिया सुसमाचार की अपनी खराई को बनाए रखना चाहती है, तो उन्हें पहले यह समझना होगा कि परमेश्वर के द्वारा ठहराया गया उनका उत्तरदायित्व है कि वे उन शिक्षकों को अस्वीकार करें जो परमेश्वर के वचन के अतिरिक्त कुछ और ही सिखाते हैं। उन्हें मोतियों जैसे सफ़ेद दाँतों वाले हास्य कलाकारों, वक्ताओं या कानों को सुख देने वालों को इकट्ठा नहीं करना चाहिए, वरन् परमेश्वर के ऐसे लोगों को चुनना चाहिए जो खराई के साथ उन्हें सुसमाचार सुनाएँ (2 तीम. 4:3)। आपकी स्थानीय कलीसिया, हे मसीही, “सत्य का खंभा और आधार” है (1 तीमुथियुस 3:15)।
पासबानों को भी यह जिम्मेदारी दी गई है कि वे केवल वही सिखाएँ जो सत्य और उचित है। वे परमेश्वर के भेदों के भण्डारी और सत्य के सेवक हैं। झूठे शिक्षकों के विपरीत, पास्टर परमेश्वर के वचन को अपनी अशुद्धता से भ्रष्ट नहीं करते और न ही अपनी लालसाओं के अनुसार सत्य को तोड़ते-मरोड़ते हैं। परन्तु पौलुस के समान पास्टर, परमेश्वर के लोगों की सेवा “सत्य के वचन और परमेश्वर की सामर्थ्य के द्वारा” करते हैं (2 कुर. 6:7)।उन्हें यह आज्ञा दी गई है कि वे वचन का प्रचार करें, न कि अपने विचारों या सांसारिक महत्वाकांक्षाओं का। 1 तीमुथियुस 3:3 में “सिखाने के योग्य” का अर्थ केवल यह नहीं है कि वह भीड़ के सामने अच्छे ढँग से संवाद कर सके या लोगों को प्रभावित कर सके। यह पास्टर के द्वारा परमेश्वर के वचन को सही रीति से संभालने की सटीकता की ओर संकेत करता है। एक पास्टर को सच्चाई के प्रति समर्पित होना और उसे स्पष्ट रूप से बताने की क्षमता परमेश्वर के लिए महत्वपूर्ण होती है। इसीलिए, हे मसीहियों, आप स्वयं को और अपने परिवार को ऐसे पासबानों के अधीन रखना चाहिए जो परमेश्वर का वचन विश्वासयोग्यता से सिखाते हैं।
आज के समय में भी झूठे सुसमाचार उतनी ही बहुतायत से फैल रहे हैं जितना पौलुस के समय में फैल रहे थे। झूठे सुसमाचार स्वयं को वैसे प्रचारित नहीं करते, लेकिन जैसे किसी दुकान में नकली ब्रांड का सोडा होता है, उसे ध्यान से देखने पर ही पता चलता है कि वह असली नहीं है। भले ही उनमें कई समानताएँ हों, परन्तु उनका स्रोत शैतान है, परमेश्वर नहीं है, चाहे वे किसी भी पवित्रशास्त्र का हवाला दें या कोई मसीही टी-शर्ट ही क्यों न पहनें। स्मरण रखें, शैतान भी पवित्रशास्त्र का सन्दर्भ दे सकता है। क्या आप ऐसी कलीसिया से जुड़े हैं जहाँ पास्टर और सदस्य सुसमाचार पर स्थिर रहते हैं?
सुसमाचार का महत्व अनन्त है, और इसकी शिक्षा को सहेजकर रखना तथा उसकी रक्षा करनी चाहिए। यह शुभ समाचार बुरे समाचार के बारे में भी ईमानदार है, ताकि पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा का उद्धार का कार्य और भी अधिक तेज चमक सके। सुसमाचार सच्चा है। क्या हम उसे दूसरों को बताते समय सच्चाई के साथ बोलते हैं?
—
चर्चा के प्रश्न:
- परमेश्वर से यह सुनना कि आप पापी हैं, आप कैसा महसूस करता हैं? क्या आप अपने पापीपन से जुड़े बुरे समाचार को अस्वीकार करने के लिए प्रलोभित होते हैं?
- अपने मार्गदर्शक/शिष्य के साथ यह साझा करने के लिए समय निकालें कि आपने पहली बार कैसे यीशु मसीह के सुसमाचार पर विश्वास किया था।
- आपके पापों की क्षमा होने से आपके जीवन में क्या परिवर्तन आया है?
- क्या कभी आपको दूसरों की पसन्द बनने के लिए, सुसमाचार के बारे में अपनी बात को हल्का करने या पूरी रीति से झूठ बोलने का प्रलोभन हुआ है?
—
भाग III: सच्चा जीवन
“जब उन्नति नहीं होती, तो जीवन भी नहीं होता है”
— आर्चिबॉल्ड अलेक्ज़ेंडर
व्यवहार में बदलाव से भी अधिक
जब मैं कॉलेज में था, तब मैंने कृषि विज्ञान और मृदा विज्ञान का अध्ययन किया था। मैं अब मिट्टी को कभी भी पहली जैसी दृष्टि से नहीं देखूँगा। भूमि में हमारी सोच से कहीं अधिक है। जंगल की भूमि, सड़ी-गली पत्तियों, मलबे और उन सूक्ष्मजीवों से बने गहरे रंग के जैविक पदार्थ से एक जीवित पारिस्थितिकी तंत्र को ऊर्जा देती है, जिन्हें हम अपनी आँखों से नहीं देख सकते हैं। मिट्टी के वे ढेले, जिन्हें मैं बचपन में इधर-उधर फेंका करता था, अब पहले से कहीं अधिक गहरा अर्थ रखते हैं। अधिकाँश मसीही जीवन में भी ऐसा ही होता है। जब परमेश्वर किसी ऐसे पापी की आत्मा में, जिसने अभी तक अपना जीवन नहीं बदला है, अपने प्रेम की वर्षा करता है, तो वहाँ जो कुछ घटित होता है, वह आँखों से दिखाई देने वाली वस्तुओं से कहीं अधिक गहरा होता है। बाहरी बदलाव और व्यवहार में सुधार स्पष्ट हैं, लेकिन कुछ अधिक गहरा घटित हुआ है। परमेश्वर यीशु के लहू के द्वारा उनके पापों को क्षमा करता है और उनके हृदय को नया करता है, तथा उनके जीवन को उनके उद्धारकर्ता के समान बनने की दिशा में स्थापित करता है। जिस प्रकार जंगल की उपजाऊ भूमि भरपूर वनस्पति उत्पन्न करती है। ठीक उसी प्रकार, मसीही व्यक्ति में वास करने वाला पवित्र आत्मा अच्छे और सच्चे फल उत्पन्न करता है।
मसीही जीवन में ईमानदारी हमारे शब्दों से भी आगे तक जाती है। यह हमारे कार्यों से झलकता है। परमेश्वर के विषय में हमारे अध्ययन के बाद, इसमें कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। यदि हमारा त्रिएक परमेश्वर ही सत्य है, और उसने हमें अपने ही स्वरूप में बनाया है, तो सत्य के अनुसार चलकर हम उसी को दर्शाते हैं। परन्तु हमारे पाप ने इस स्वरूप को बिगाड़ दिया हैं। लेकिन यीशु तो सबसे बड़े झूठों को भी बचाने के लिए आया है। उसकी मृत्यु झूठ बोलने वाले झूठों के समान इसलिए हुई ताकि उसके चुने हुए अनन्त जीवन पा सकें। वह हमें नया करने और नई सृष्टि में भागीदार बनाने के लिए पवित्र आत्मा भेजता है (2 कुर. 5:17)। यह नयापन मसीह में नई मानवता के रूप में, सत्य के प्रति हमारे समर्पण को भी सम्मिलित करता है।
इसके विपरीत सच है। बाइबल में ऐसे लोगों की एक श्रेणी है जो सही बातें तो करते हैं, परन्तु स्वयं का जीवन झूठे तरीके से जीते हैं। वे शायद यह भी कहें कि वे मसीही हैं और बड़े ही भावुक होकर ‘हे प्रभु, हे प्रभु’ कहकर पुकारें, लेकिन अन्त में उन्हें परमेश्वर से ये शब्द सुनने को मिलेंगे: “मैंने तुम को कभी नहीं जाना, हे कुकर्म करनेवालों, मेरे पास से चले जाओ” (मत्ती 7:23)। या जैसा कि 1 यूहन्ना 4 कहता है, “जो कोई यह कहता है, “मैं उसे जान गया हूँ,” और उसकी आज्ञाओं को नहीं मानता, वह झूठा है; और उसमें सत्य नहीं।” वे “इस्राएल के परमेश्वर की चर्चा तो करते हैं, परन्तु सच्चाई और धार्मिकता से नहीं करते” (यशा. 48:1)। यह तो सरासर पाखण्ड है। पूर्व प्राथमिक शिक्षा से ही, शिक्षक बच्चों में यह सीख देने का प्रयास करते हैं। आपको शायद अपने शिक्षकों का यह कहना स्मरण होगा कि, “चरित्र वही है जो आप तब करते हैं जब कोई आपको देख नहीं रहा होता है।” यह अन्य मनुष्यों के सामने सत्य है। यह कहावत इस वास्तविकता को व्यक्त करती है कि आपका अच्छा चरित्र इस बात पर निर्भर नहीं करता कि अन्य लोग उसे देखते हैं या नहीं। आपका अच्छा कार्य कोई प्रदर्शन नहीं है—यह तो आपके हृदय को दर्शाता है। बुरा कार्य धोखे का एक रूप होता है। यह बेईमानी है। परन्तु मसीही होने के नाते हम जानते हैं कि कोई भी व्यक्ति परमेश्वर की दृष्टि से बच नहीं सकता है। परमेश्वर को आपके पूर्व प्राथमिक शिक्षा के शिक्षिक, आपके माता-पिता, आपके मित्रों या आपकी कलीसिया के अन्य सदस्यों के समान धोखा नहीं दिया जा सकता है।
तीतुस की पुस्तक इस चिन्ता को दोहराती है। “परमेश्वर के चुने हुओं के विश्वास और सत्य के उस ज्ञान के लिए जो भक्ति के अनुसार है” (तीतुस 1:1)। जो सत्य हम परमेश्वर से सीखते हैं और उसे सच्चे हृदय से ग्रहण करते हैं, वह अपने प्रभावों के प्रति समर्पित जीवन उत्पन्न करता है। यदि हम परमेश्वर की सन्तान हैं, तो हम परमेश्वर के लिए अजनबियों के समान जीवन क्यों जिएँ? क्रेते में जो लोग थे, उनके साथ ऐसा नहीं था। तीतुस के साथ रहने वालों में से कई लोगों ने सत्य को स्वीकार तो किया, परन्तु अपने जीवन से उसका इनकार किया। परमेश्वर इन लोगों के विषय में कहता है, “वे कहते हैं, कि हम परमेश्वर को जानते हैं पर अपने कामों से उसका इन्कार करते हैं, क्योंकि वे घृणित और आज्ञा न माननेवाले हैं और किसी अच्छे काम के योग्य नहीं” (तीतुस 1:16)। दूसरे शब्दों में, जो लोग अपने होठों से प्रभु का नाम लेते हैं, वे बुराई का मार्ग अपनाकर अपने ही दावों का खण्डन करते हैं। उनका दावा झूठा है।
इस प्रकार का धोखाधड़ी वाला जीवन अधिकाँश उन क्षेत्रों में फैलता है जहाँ सांस्कृतिक मसीहीयत प्रचुर मात्रा में होती है, या जहाँ मसीहियों की परिभाषा अस्पष्ट हो जाती है। जब मसीही बनने का अर्थ यह हो कि आप धार्मिक त्योहारों में भाग लें, अपेक्षाकृत रूढ़िवादी नैतिक दृष्टिकोण अपनाएँ, जितनी बार युवा शिविर में गए हों उतनी बार बपतिस्मा ले चुके हों, और बड़े दिन पर कम से कम वर्ष में एक बार प्रभु भोज लेते हों, तो यह आश्चर्य की बात नहीं कि ऐसे वातावरण में पाखण्ड बहुत बढ़ जाता है। औपचारिकता का पालन मसीह के प्रति प्रेम के बिना, और अच्छे विवेक के साथ आनन्द या संतुष्टि का गलत तरीके से पीछा करते हुए भी किया जा सकता है। परन्तु यह सच्ची मसीहीयत नहीं है। यह झूठी मसीहीयत दिखाती है कि इसके अनुयायी वास्तव में सच्चाई से परमेश्वर को नहीं जानते हैं। इन लोगों के कार्य इस बात का प्रमाण हैं कि वे वास्तव में विश्वास नहीं करते हैं (याकूब 2)। मसीही व्यक्ति केवल विश्वास से उद्धार पाता है, लेकिन वह विश्वास कभी भी अकेला नहीं होता है। परमेश्वर हमसे वहीं मिलता है जहाँ हम होते हैं, लेकिन वह हमें वहीं नहीं छोड़ता जहाँ हम होते हैं। भले ही भले कार्यों से उद्धार न होता हो, लेकिन सच्चा आन्तरिक चरित्र ही अच्छे फल उत्पन्न करता है। जो लोग धर्मी ठहराए जाते हैं, वे पवित्र भी किए जाते हैं (हालाँकि इस जीवन में पूर्ण रूप से नहीं होता है)।
एक सांस्कृतिक मसीही वातावरण में सत्य के प्रति समर्पण का अर्थ यह हो सकता है कि यदि आप मसीही की बाइबल आधारित परिभाषा पर बल देते हैं, तो आपको अत्यधिक कट्टर रुदिवादी समझा जाए। जाँच करने की शुरुआत हमसे ही होती है। क्या हम वास्तव में विश्वास में हैं? क्या आप विश्वास में हैं? (2 कुर. 13:5)? इसके पश्चात् इस प्रकार की जाँच कलीसिया की सदस्यता तक पहुँचती है। कलीसिया राज्य की कुंजियों का उपयोग करके केवल विश्वासियों को अपनी संगति में शामिल करती है (मत. 18:18)। क्या हम नए जन्म पाए हुए हैं? ये ऐसे प्रश्न हैं जिनका महत्व अनन्त है। हमारी ईमानदारी यह प्रकट करती है कि क्या हमने वास्तव में पहले ही सत्य को समझा है या नहीं (इब्र. 10:26)।
ईमानदारी से जीना
हमारे जीवन में बेईमानी छोटे स्तर पर भी दिखाई दे सकती है। बचपन में आपके माता-पिता ने शायद आपके लिए सोने का समय निर्धारित किया होगा। आप अपने मन में उनकी आवाज़ फिर से सुन सकते हैं, “ठीक है। बत्तियाँ बुझा दो। अब सोने का समय हो गया है।” आप अपने सिर तक चादर ओढ़ लेते हैं और तब तक अपनी आँखें बन्द रखते हैं, जब तक आपके माता-पिता दरवाज़े से बाहर नहीं चले जाते। बत्तियाँ खट की आवाज के साथ बन्द हो जाती हैं, कमरा अँधेरा हो जाता है, और आप दरवाज़ा बन्द होने की प्रतीक्षा करते हैं। फिर, आप राहत की साँस लेते हैं। “फ्यू! वे यहाँ से चले गए हैं।” एक और खट की आवाज होती है, और आपके बिस्तर के पास की बत्ती जल जाती है। अब असली खेल शुरू हो सकता है। इसी प्रकार की बचकानी बेईमानी हमारे वयस्क जीवन में भी होती है। जैसे ही सहकर्मी या अधिकारी कमरे से बाहर जाते हैं, तो हम तुरन्त फिर से उस सोशल मीडिया पेज पर चले जाते हैं, इस प्रकार हम अपने “काम” के लिए पैसे लेते हुए भी अपना समय नष्ट करते हैं।
ईमानदारी को कई तरीकों से चुनौती दी जा सकती है। कभी-कभी आप वह सहकर्मी या सहपाठी होते हैं, जो मसीही कहलाए जाते हैं। लोग आपको “आत्मिक” व्यक्ति के रूप में जानते हैं। आपको हल्के-फुल्के मज़ाक सुनने पड़ते हैं और कभी-कभी तीखे प्रश्न भी, जैसे, “क्या आप सच में विश्वास करते हैं____?” शायद दूसरे लोग व्यवस्था को अपने अनुसार तोड़ने-मरोड़ने और उन लोगों को धोखा देने का तरीका निकाल लेते हैं जो प्रभारी होते हैं, चाहे वे शिक्षक हों या अधिकारी। यहाँ ईमानदारी का अर्थ हो सकता है कि आप अपने अधिकारी के लक्ष्य का सम्मान करें और दूसरों के धोखेबाज़ तरीकों से बचें। हो सकता है कि इसमें सम्मिलित न होने के कारण आपको आलोचना का सामना करना पड़ सकता है। सच के प्रति आपके समर्पण के लिए आपको सामाजिक कीमत भी चुकानी पड़ सकती है।
कभी-कभी सच्चे जीवन का मूल्य किसी अच्छी वस्तु का त्याग भी हो सकता है। हाई स्कूल के फ़ुटबॉल अभ्यास में हमारी टीम शारीरिक तैयारी के लिए लम्बे आयताकार मैदान के चारों ओर दौड़ लगाती थी। पूरी टीम एक ही स्थान की ओर दौड़ना आरम्भ करती थी, और सबसे तेज़ दौड़ने वाले खिलाड़ियों की सामान्यतः प्रशिक्षक के द्वारा प्रशंसा की जाती थी। वे प्रशिक्षक की कृपादृष्टि पा सकते थे और संभवतः उन्हें खेलने का अधिक समय भी मिल सकता था। उस क्षण में, उन तेज़ 90-डिग्री के कोनों को काटने से अधिक आकर्षक कुछ भी नहीं होता, जिनके कारण आपकी गति और आगे बढ़ने की लय कम हो जाती है। आप कल्पना कर सकते हैं कि यदि आप टीम के कदमों का अनुसरण करें, तो आप इस निष्कर्ष पर पहुँचेंगे कि एक फुटबॉल मैदान बड़ा अंडाकार आकार का होता है। परन्तु कोनों को हमेशा छोटा किया जा सकता है।
यह प्रलोभन हाईस्कूल के खेलों तक ही सीमित नहीं रहता है। कार्यालय में भी काम में कटौती करने का प्रलोभन बना रहता है। सच्चाई से समझौता करने वाला व्यक्ति अपने अधिकारी से प्रशंसा पा सकता है। परन्तु ईमानदारी से काम करने का अर्थ यह हो सकता है कि आप पदोन्नति से चूक जाएँ, जबकि दूसरे लोग ऊँचे पद की सीढ़ियों पर चढ़ते चले जाते हैं। या हो सकता है कि न्यासी मंडल के सदस्य आपसे व्यवसाय को “बचाने” के लिए कुछ गलत काम करने को कहे। आप या तो मान लेते हैं या इस्तीफ़ा दे देते हैं। “ईमानदारी का अर्थ है कि आप सत्य के प्रति अपना समर्पण बनाए रखते हैं: सृष्टि की कोई वस्तु परमेश्वर से छिपी नहीं है वरन् जिसे हमें लेखा देना है, उसकी आँखों के सामने सब वस्तुएँ खुली और प्रगट हैं” (इब्र.4:13)। परमेश्वर देखता है और परवाह करता है। इस भ्रष्ट संसार में सच्चाई के साथ जीवन जीने का अर्थ यह हो सकता है कि आपको अपने लाभ का त्याग करना पड़े।
ईमानदारी से जीवन की कीमत आपकी जान भी हो सकती है। संसार के उन हिस्सों में जहाँ मसीहियत के प्रति विरोध है, बहुत से मसीहियों को कलीसिया के रूप में एकत्र होने से रोका जाता है। उन्हें परमेश्वर की आज्ञा के अनुसार, एक कलीसिया के रूप में एक-दूसरे को उत्साहित करने के लिए, “भूमिगत” होकर या गुप्त रूप से मिलना पड़ता है (इब्र. 10:24-25)। ऊँचे स्वर में गाना या प्रार्थना करना पड़ोसियों को जगा सकता है और तब सताव का सामना करना पड़ सकता है। उनके फ़ोन गुप्त रीति से सुने जा सकते हैं, और इस प्रकार उन्हें गिरफ़्तार करने के लिए सभा के स्थान का पता लगाया जा सकता है। राष्ट्रीय विश्वासियों के लिए और भी अधिक भ्रमित करने वाली बात यह है कि विदेशी लोग उन्हें सताव से बचने के लिए, मतभेद दूर करके एकता में आने के लिए प्रोत्साहित कर सकते हैं। यहाँ ईमानदार जीवन का अर्थ यह नहीं है कि सारी बुद्धिमानी और विवेक को त्याग दिया जाए। इसका अर्थ यह है कि जीवन यीशु के वचनों की सच्चाई के प्रति समर्पित हो: “इसी रीति से तुम में से जो कोई अपना सब कुछ त्याग न दे, तो वह मेरा चेला नहीं हो सकता” (लूक. 14:33)। ऐसे विरोध के बीच उन लोगों के लिए बुद्धि और साहस पाने के लिए प्रार्थना करें।
स्मरण रखें, यीशु को केवल इतना करना था कि वह विश्राम पाने के लिए सच्चाई से समझौता कर सकता था; लेकिन उसने निर्दोष होकर भी आज्ञाकारिता के साथ परीक्षा का सामना किया (इब्र. 4:15)। पौलुस को केवल मनुष्य के भय के आगे झुकना था और यहूदी धर्म मानने वालों से स्वीकृति पानी थी, परन्तु उसका लक्ष्य मनुष्य की अपेक्षा परमेश्वर की स्वीकृति पाना था (गल. 1:11)। सत्य के प्रति समर्पित जीवन जीने की कीमत आपके सामाजिक या व्यावसायिक स्तर, आपका घर, कारावास, या यहाँ तक कि मृत्यु के रूप में भी चुकानी पड़ सकती है। परन्तु सामर्थ्य के लिए हमें यीशु की ओर, और उन लोगों की ओर देखना चाहिए जिन्होंने हमसे पहले कष्ट सहे हैं: “तुम ने पाप से लड़ते हुए उससे ऐसी मुठभेड़ नहीं की, कि तुम्हारा लहू बहा हो” (इब्र.12:4)। इस भ्रष्ट संसार में ईमानदारी से जीने की एक कीमत चुकानी पड़ती है। क्या आप वह कीमत चुकाने के लिए तैयार हैं?
—
चर्चा के प्रश्न:
- किन-किन तरीकों से आप घर पर, कार्यस्थल पर या अपने मित्रों के साथ बेईमानी करने के लिए प्रलोभित होते हैं?
- क्या आपको कभी सच्चाई के लिए कोई कीमत चुकानी पड़ी है? यदि हाँ, तो वह क्या थी? क्या आपको उसका पछतावा है?
- आपके जीवन में ईमानदारी के कौन-कौन से उदाहरण हैं? आप उनसे कैसे सीख सकते हैं?
—
Parte IV: सच्ची वाणी
ईमानदारी के विषय में सोचते समय अधिकाँश लोग वाणी के बारे में सोचते हैं। क्या आपके शब्द सच्चे हैं? अर्थात्, क्या आप वही बोलते हैं जो सत्य है? आइए, हम दस आज्ञाओं पर फिर लौटें, जो परमेश्वर और अपने पड़ोसी के प्रति हमारे प्रेम का सार हैं। ये आज्ञाएँ परमेश्वर के स्वभाव को प्रकट करती हैं और बताती हैं कि वह हमसे, जिन्होंने उसके स्वरूप को धारण किया है, क्या अपेक्षा करता है। नौवीं आज्ञा विशेष रूप से हमें दिखाती है कि परमेश्वर सत्य का परमेश्वर है। यदि परमेश्वर सच्चा है, तो उसके लोगों को भी सच्चाई के लिए बुलाया गया है। उसके लोग अपनी वाणी के द्वारा सत्य का अनुसरण करते हैं और उसे बढ़ावा देते हैं। आज्ञा यह है कि, “तू किसी के विरुद्ध झूठी गवाही न देना” यह विशेष रूप से न्यायालय के संदर्भ में लागू होता है, परन्तु यह सामान्य रूप से सत्य और असत्य के हर विषय पर भी लागू होता है (निर्गमन 20:16)। सत्रहवीं शताब्दी में, पासबान और ईश्वर विज्ञानी इस आज्ञा पर मनन करने के लिए एकत्र हुए, ताकि विचार कर सकें कि वे इस शिक्षा को आने वाली पीढ़ियों तक कैसे पहुँचाएँ। उसका परिणाम वेस्टमिन्स्टर लार्जर कैटेकिज़्म विस्तृत धर्म प्रश्नोत्तरी का प्रश्न 144 था। उन्होंने लिखा:
“नौवीं आज्ञा में जिन कर्तव्यों की अपेक्षा की गई है, वह मनुष्य और मनुष्य के बीच सत्य की रक्षा करना और उसे बढ़ावा देना, तथा अपने पड़ोसी के अच्छे नाम की, और साथ ही अपने स्वयं के अच्छे नाम की भी रक्षा करना है: सत्य के लिए प्रकट होना और उसके पक्ष में दृढ़ता से खड़े रहना; और हृदय से, सच्चाई के साथ, स्वतंत्रता के साथ, स्पष्ट रूप से, और पूरी रीति से सत्य कहना, तथा न्याय और निर्णय के विषयों में, और अन्य सभी बातों में भी, केवल सत्य ही बोलना; अपने पड़ोसियों के प्रति हृदय खोलकर सम्मान करना; उनके अच्छे नाम से प्रेम करना, उसकी इच्छा करना, और उनके अच्छे नाम में आनन्दित होना; उनकी दुर्बलताओं पर दुःखी होना, और उन्हें ढाँपना; उनके वरदानों और आत्मिक गुणों को खुले मन से स्वीकार करना, तथा उनके निर्दोष होने पर उनका का समर्थन करना; उनके विषय में अच्छी बातों को तत्परता से ग्रहण करना, और बुरी बातों को स्वीकार करने में अनिच्छुक रहना; चुगली करने वालों, चापलूसी करने वालों, और बदनामी फैलाने वालों को निराश करना; अपने अच्छे नाम से प्रेम रखना और आवश्यकता पड़ने पर उसकी रक्षा करना; वैध प्रतिज्ञाओं को निभाना; और जो कुछ सत्य, सम्मान योग्य, प्रिय, और सराहनीय है, उन सब बातों का अध्ययन करना और उनका अभ्यास करना।”
दोषी ठहराने वाला? हाँ। शान्तिपूर्ण? निश्चय ही। हम केवल उस संसार की कल्पना कर सकते हैं जो सच्चाई के ऐसे सुन्दर वर्णन का पालन करता हो। जिस पापमय संसार में हम रहते हैं, वह इसे एक पराई अभिलाषा बना देता है। केवल उन न्यायिक न्यायालयों पर विचार करें जो इस प्रकार से कार्य कर रहे हैं। सोचिए, आज के मीडिया को सहजता से देखते हुए आपको झूठ, आधे-सच, या बदनामी फैलाने वाली बातों की छानबीन करने की आवश्यकता नहीं है। उस कलीसिया की कल्पना कीजिए जहाँ भेड़ों के भेष में भेड़िए अपने अधीन लोगों को अपने लाभ के लिए विनाश की ओर न ले जाते हों। क्या आप केवल इसकी कल्पना ही कर सकते हैं?
संसार के सभी स्थानों में, स्थानीय कलीसिया वह स्थान होना चाहिए जहाँ ऐसी ईमानदारी पाई जाती हो। नई सृष्टि में सहभागी होने के नाते, कलीसिया वह स्थान है जहाँ सच्चाई से प्रेम किया जाता है, उसके लिए प्रयत्न किया जाता है, और उसे बढ़ावा दिया जाता है। पौलुस यहाँ तक कहता है कि झूठ हमारे पुराने स्वभाव से जुड़ा हुआ है, अर्थात् वह आत्मिक रूप से मरा हुआ जीवन जो मसीह के द्वारा हमारे हृदयों में अपना प्रेम उंडेलने से पहले था। वह कुलुस्सियों 3:9 में कहता है, “एक दूसरे से झूठ मत बोलो क्योंकि तुम ने पुराने मनुष्यत्व को उसके कामों समेत उतार डाला है।” और इसी प्रकार इफिसियों 4:25 में कहता है, “इस कारण झूठ बोलना छोड़कर, हर एक अपने पड़ोसी से सच बोले, क्योंकि हम आपस में एक दूसरे के अंग हैं।” आदम के वंशज होने के नाते, हम जन्मजात पापी हैं; इसलिए झूठ बोलना हमारे लिए उतना ही स्वाभाविक है, जितना कि साँस लेना। मसीह में नया जन्म होने पर, हमारे झूठ पुराने मनुष्यत्व के साथ क्रूस पर चढ़ा दिए जाते हैं। जब विश्वासी अपने पुराने स्वभाव को उतारकर मसीह को धारण करते हैं, तब वे झूठ को छोड़कर सच्चाई को अपना लेते हैं।
पाप का अंगीकार
जैसे कि पहले ही वर्णन किया जा चुका है, कि सुसमाचार हमारे पाप के विषय में सच्चाई बताता है। उसी प्रकार, हमें भी अन्य विश्वासियों के साथ अपने पापों के विषय में ईमानदार रहना चाहिए। पवित्रशास्त्र इसे “ज्योति में चलना” कहता है, और यह एक-दूसरे के साथ हमारी सहभागिता का हिस्सा है (1 यूहन्ना 1:7)। अन्य स्थान पर हमें “एक-दूसरे के सामने” अपने पापों को अंगीकार करने की आज्ञा दी गई है (याकूब 5:16)। यह स्थानीय कलीसिया में हमारे जीवन का एक हिस्सा है। स्थानीय कलीसिया की सदस्यता का अर्थ है कि अपने जीवन को उन लोगों के सामने खोल देना जो भले ही जिज्ञासु प्रश्न पूछते हों, पर वास्तव में वे आपसे प्रेम करते हैं और चाहते हैं कि आप मसीह के साथ अपने चाल-चलन में आगे बढ़ें। अधिकाँश यह मसीह में कुछ भाइयों या बहनों के साथ उत्तरदायित्व वाले सम्बन्धों का रूप ले लेता है। मसीही लोग ऐसा व्यवहार नहीं करते जैसे उनके जीवन में सब कुछ पूरी रीति से ठीक है, वरन् वे स्वीकार करते हैं कि उन्हें क्षमा और अपने लोगों की प्रार्थनाओं की आवश्यकता है ताकि वे अधिक से अधिक यीशु के समान बन सकें। संसार के समान अपने पापों को छिपाने के बजाय, कलीसिया वह स्थान है जहाँ पापों को खुले रूप से स्वीकार किया जाता है। एक अच्छा प्रश्न जो आप आपस में बिताए गए समय के अन्त में पूछ सकते हैं, यह है कि: “क्या आज आपने किसी भी बात के विषय में झूठ बोला है?” क्या कोई ऐसा पाप है जिसे आपने छिपाकर या सफाई के साथ प्रस्तुत किया है?” ऐसे प्रश्न ईमानदारी को प्रोत्साहित करते हैं।
पवित्र आत्मा से झूठ बोलना
जब हम झूठ बोलते हैं, अर्थात् उन लोगों से असत्य बोलते हैं जिनके सामने हमें सच बोलना चाहिए, तब हम केवल मनुष्य से ही नहीं, वरन् परमेश्वर से भी झूठ बोलते हैं। प्रेरितों के काम अध्याय 5 में हनन्याह और सफीरा के मामले में झूठ बोलने की गम्भीरता का वर्णन किया गया है। आरम्भिक मसीहियों के बीच अत्यधिक उदारता से देने के समय में, एक दम्पति ने अपने “दान” का दिखावा करने का निर्णय लिया। उन्होंने दावा किया था कि उन्होंने इतना बड़ा त्याग किया कि उन्होंने कलीसिया को देने के लिए अपनी सम्पूर्ण भूमि बेच दी है। लेकिन परमेश्वर जानता था कि क्या हो रहा था। उनका पाप उनकी निजी सम्पत्ति का कुछ भाग अपने पास रखने में नहीं था, परन्तु इस बात में था कि वे कितना दे रहे थे, इस सम्बन्ध में उन्होंने झूठ बोला था। परमेश्वर ने पतरस के द्वारा उनका भेद यह कहते हुए खोल दिया, कि वे शैतान के साथ मिलकर षड्यंत्र करने वाले हैं और पवित्र आत्मा से झूठ बोलने के दोषी है। हनन्याह और सफीरा उदारता का कोई असाधारण उदाहरण नहीं हैं, वरन् वे तो शैतान के कार्यों और झूठ बोलने की गम्भीरता के प्रति एक गम्भीर चेतावनी हैं।
प्रत्येक शब्द जो लापरवाही से बोले गए हैं उनको परमेश्वर के न्याय सिंहासन के सामने लाया जाएगा, ऐसे सटीक न्याय के मापदंड पर जिसे इस पतित संसार में हमने कभी नहीं देखा है (मत. 12:36)। हम जो कहते हैं, वह महत्वपूर्ण है। एक भ्रष्ट संसार उस बात को हल्के में लेता है जिसे परमेश्वर गम्भीरता से लेता है। नीतिवचन 6:16–19 में जिन पापों से परमेश्वर घृणा करता है, उनमें से दो झूठ से सम्बंधित हैं! अब विचार करें कि सुलैमान झूठ के विषय में और क्या लिखता है:
— “जो बैर को छिपा रखता है, वह झूठ बोलता है, और जो झूठी निन्दा फैलाता है, वह मूर्ख है।” (नीतिवचन 10:18)
— “सच्चा साक्षी झूठ नहीं बोलता, परन्तु झूठा साक्षी झूठी बातें उड़ाता है।” (नीतिवचन 14:5)
— “सच्चाई सदा बनी रहेगी, परन्तु झूठ पल भर का होता है।”
(नीतिवचन 12:19)
— “झूठों से यहोवा को घृणा आती है परन्तु जो ईमानदारी से काम करते हैं, उनसे वह प्रसन्न होता है।” (नीतिवचन 12:22)
— “जो धन झूठ के द्वारा प्राप्त हो, वह वायु से उड़ जाने वाला कोहरा है, उसके ढूंढ़ने वाले मृत्यु ही को ढूंढ़ते हैं।” (नीतिवचन 21:6)
— “जिस ने किसी को झूठी बातों से घायल किया हो वह उससे बैर रखता है,
और चिकनी चुपड़ी बात बोलनेवाला विनाश का कारण होता है।”
(नीतिवचन 26:28)
चाहे वह झूठ हो, बदनामी हो, झूठी गवाही हो, चापलूसी हो या झूठी प्रतिज्ञाएँ हों, ये सब सत्य के विरोध में सीधे-सीधे बेईमानी को दर्शाते हैं। प्रभु का सही भय, जैसा कि नीतिवचन 8:13 में कहा गया है, हर प्रकार की बुराई से घृणा करना है, यहाँ तक कि हमारे झूठ बोलने से भी।
यदि हम केवल अपने ही कहे गए शब्दों पर ही ध्यान दें, तो यह ग़लत होगा। यीशु हमें और अधिक गहराई में ले जाता है। वह हमें हमारे हृदयों को देखने के लिए प्रेरित करता है। “क्योंकि जो मन में भरा है, वही मुँह पर आता है” (मत.12:34 ब)। इसलिए, जो झूठ हम बोलते हैं, वे हमारे हृदय की समस्याओं को प्रकट कर सकते हैं। जब हम किसी दूसरे से ईर्ष्या करते हैं, तो हम उन्हें नीचा दिखाने के लिए उन पर आरोप लगाते हैं या उनके बारे में अफ़वाहें फैलाते हैं। जब हम चाहते हैं कि हमें कलीसिया के विश्वासयोग्य सदस्यों के रूप में देखा जाए, तो हम प्रतिस्पर्धी की भावना के साथ दूसरों के अनुग्रहों को कम करके आँकते हैं। जब कोई सम्मानित व्यक्ति कमरे में आता है, तो हम ईमानदारी की माँग की परवाह किए बिना उसकी चापलूसी और प्रशंसा करने लगते हैं। हम ऐसी प्रतिज्ञा कर देते हैं जिन्हें पूरा करने की न तो हमारी इच्छा होती है और न ही क्षमता होती है, हम ऐसा इसलिए करते हैं ताकि हमें एक दयालु व्यक्ति के रूप में देखा जा सके। हम दूसरों से प्रशंसा, सम्मान या हँसी पाने के लिए अपने अतीत के बारे में मनगढ़ंत कहानियाँ बनाते हैं। हृदय के कौन से पाप आपको झूठ बोलने के लिए प्रलोभन में डालते हैं?
—
चर्चा के प्रश्न:
- क्या आप कभी झूठ बोलते हुए पकड़े गए हैं? उस कहानी को अपने मार्गदर्शक/शिष्य के साथ साझा करें। आपने बेईमानी की कीमत चुकाने के विषय में क्या सीख पायी है?
- आपके जीवन के किन क्षेत्रों में आपको सबसे अधिक झूठ बोलने का प्रलोभन होता है?
- क्या आपके जीवन में ऐसे लोग हैं जो आपकी बातों को चुनौती देते हैं?
आप अपने पापों का अंगीकार किसके सामने करते हैं? कौन आपको उनके साथ और परमेश्वर के साथ
ईमानदार बने रहने की चुनौती देता है? - आपकी कलीसिया ईमानदारी से जीवन जीने के लिए कैसे प्रोत्साहित करती है?
- ईमानदारी से जीने के क्या लाभ हैं?
—
निष्कर्ष
मुझे आशा है कि इस अध्ययन ने आपको परमेश्वर के ईमानदारी के मानक के अनुसार अपने जीवन का मूल्याँकन करने और प्रभु यीशु मसीह, जो सर्व-पर्याप्त उद्धारकर्ता है, से दृढ़ता से जुड़े रहने में सहायता की है। एक ईश्वर विज्ञानी विचार करते हैं,
“एक गवाह के रूप में, यीशु मसीह सच में शहीद है: उसका जीवन और अस्तित्व, उसके शब्द और कार्य, ये सभी सत्य की ओर संकेत करते हैं,
वह केवल और पूर्ण रीति से इस बात का गवाह है कि वास्तविक स्थिति क्या है। वह कोई समझौता नहीं करता और न ही किसी प्रकार से टालमटोल करता है। वह जो नहीं है, उसे नहीं कहता है; और जो है, उसे कहने से चूकता भी नहीं है। वह ऐसा है जैसा यूहन्ना रचित सुसमाचार में कहा गया है, “सच्चाई से परिपूर्ण” (यूहन्ना 1:14)। और उसकी गवाही विश्वासयोग्य है—अर्थात्, उसकी गवाही निरन्तर, निस्संकोच, भरोसेमंद और स्थायी है। उसकी सच्चाई पूर्ण रीति से अटल है। यह झूठ या आधे सत्य के साथ समझौता करने के प्रलोभन के सामने टूटता नहीं है। यह केवल वही कहता है जो है, और उसी के अनुसार कार्य करता है, और इस प्रकार अस्वीकार कर देता है।”2
हमारे संसार में सत्य कोई लोकप्रिय वस्तु नहीं है। सच को एक खजाने के रूप में देखने के बजाय, पापी लोग उसे कुम्हार के चाक पर रखी गीली मिट्टी के समान ढालने का प्रयास करते हैं। परन्तु सत्य उतना ही अपरिवर्तनीय है जितना कि परमेश्वर स्वयं अपरिवर्तनीय हैं। सच्चाई हमारी विश्वासयोग्यता की माँग करती है, क्योंकि वह सच्चे परमेश्वर से आती है। सुसमाचार में, यीशु मसीह के मुख से सच्चाई चमकती है। पौलुस इस वास्तविकता का उदाहरण अपनी पत्री के अन्त, 2 कुरिन्थियों 13:8 में प्रस्तुत करता है। मसीहियों जो शुद्ध विवेक के साथ चलते हैं, उन्हें उन लोगों के समान होना चाहिए जो “सत्य के विरुद्ध कुछ भी नहीं कर सकते, वरन् केवल सत्य के लिए ही कार्य करते हैं।” क्या यह आपका भी वर्णन करता है?
यदि नहीं, तो सुसमाचार की इस सच्चाई को स्मरण रखें: कि यीशु झूठ बोलने वाले लोगों के कारण मर गया, और उसने वह दण्ड अपने ऊपर ले लिया जिसका दण्ड उनके झूठ को मिलना चाहिए था। वह सत्य है। उसने सच्चाई के अनुसार कार्य किया। और उसने सत्य कहा। समझौतों से भरे इस संसार में उसने कभी समझौता नहीं किया। यीशु ने सत्य के अनुसार और सत्य के प्रति अटल समर्पण के साथ, हमारी ओर से पूर्ण रीति से निष्कलंक जीवन जिया। यह यीशु ही हमारी धार्मिकता है, जिसे केवल विश्वास के द्वारा प्राप्त किया जाता है। उसके लहू के द्वारा उसके लोगों के सभी झूठ क्षमा कर दिए जाते हैं। पुनरुत्थान की सामर्थ्य और पवित्र आत्मा के द्वारा, वह हमें इस वर्तमान दुष्ट युग की विपरीत धारा में, सत्य के प्रति समर्पण के साथ चलने की सामर्थ्य देता है, यहाँ तक कि अपने जीवन की कीमत पर भी। यदि आप मसीही नहीं हैं, तो उन झूठी बातों पर विचार करें जो आपने बोली हैं और उन तरीकों पर भी विचार करें जिसमें आप परमेश्वर की पवित्रता के मानक से चूक जाते हैं। अपने पापों से फिरें और केवल मसीह पर विश्वास करें कि वही आपको आपके पापों से और उस क्रोध के दिन से बचाएगा, जब मसीह अपनी महिमा में आएगा।
अन्तिम टिप्पणिया
- मार्टिन लूथर, गलातियों पर टीका (ओक हार्बर, डब्ल्यूए: लॉगोस रिसर्च सिस्टम्स, निग., 1997), पृ. 97–98।
- जॉन। डैनियल जे. बुश (बेलिंगहैम,डब्लू ए: लेक्सहैम प्रेस, 2020), 70।
लेखक के बारे में
विल्सन रैमसे, वॉशिंगटन, डी.सी. में स्थित कैपिटल हिल बैपटिस्ट चर्च में पास्टर के सहायक के रूप में सेवकाई करते हैं। उनकी पत्नी का नाम यूनिस है, और उनका एक बेटा है, जिसका नाम हैडन है।
विषयसूची
- भाग I: सच्चा परमेश्वर
- परमेश्वर का वचन सत्य है
- सत्य में पवित्रीकरण
- शैतान: झूठ का पिता
- चर्चा के प्रश्न:
- भाग II: सच्चा सुसमाचार
- हम झूठ और असत्य से घिरे हुए थे।
- मसीह का कार्य
- व्यक्तिगत सुसमाचार की खराई
- सामूहिक सुसमाचार की खराई
- चर्चा के प्रश्न:
- भाग III: सच्चा जीवन
- व्यवहार में बदलाव से भी अधिक
- ईमानदारी से जीना
- चर्चा के प्रश्न:
- Parte IV: सच्ची वाणी
- पाप का अंगीकार
- पवित्र आत्मा से झूठ बोलना
- चर्चा के प्रश्न:
- निष्कर्ष
- अन्तिम टिप्पणिया
- लेखक के बारे में