
#55 अहंकार से बचना: एक जीवन कौशल के रूप में विनम्रता
परिचय
एक कहानी है, जो अक्तूबर, सन् 1995 में न्यूफाउण्डलैण्ड के तट पर एक अमेरिकी नौसेना के जहाज और कनाडाई अधिकारियों के बीच हुई एक बातचीत पर आधारित है।
अमेरिकी: “कृपया टक्कर से बचने के लिए आप अपना रास्ता 15 डिग्री उत्तर की ओर मोड़ लें।”
कनाडाई: “हमारा सुझाव है कि टक्कर से बचने के लिए आप अपना रास्ता 15 डिग्री दक्षिण की ओर मोड़ लें।”
अमेरिकी: “मैं अमेरिकी नौसेना के जहाज का कप्तान बोल रहा हूँ। मैं फिर से कहता हूँ कि आप अपना रास्ता मोड़ लें।”
कनाडाई: “नहीं, मैं फिर से कहता हूँ, आप अपना रास्ता मोड़ लें।”
अमेरिकी: “यह विमानवाहक जहाज यू.एस.एस. अब्राहम लिंकन है, जो संयुक्त राज्य अमेरिका के अटलांटिक बेड़े का दूसरा सबसे बड़ा जहाज है। हमारे साथ तीन डिस्ट्रॉयर, तीन क्रूज़र और कई सहायक जहाज हैं। मैं यह माँग करता हूँ कि आप अपना रास्ता 15 डिग्री उत्तर की ओर बदल लें। मैंने कहा पंद्रह डिग्री उत्तर की ओर, अन्यथा इस जहाज की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए जवाबी कदम उठाए जाएँगे।”
कनाडाई: “यह एक लाइटहाउस अर्थात् प्रकाश-स्तंभ है। अब निर्णय आपको लेना है।”1
वैसे यह घटना कभी हुई ही नहीं, परन्तु इस कहानी को अक्सर अहंकार के प्रति चेतावनी के रूप में सुनाया जाता है। इसका संदेश स्पष्ट है—अहंकार जहाज को डुबो देता है, अत: इससे बचकर रहें, कहीं ऐसा न हो कि आप अपने जीवन के जहाज को ही डुबो बैठें।
इस क्षेत्रीय मार्गदर्शिका में, हम अहंकार पर अच्छे से और गहराई से विचार करेंगे, कि इसके खतरे क्या हैं, यह कहाँ से उत्पन्न होता है, और (परमेश्वर की सहायता से) हम इसे कैसे पराजित कर सकते हैं। मेरी प्रार्थना है कि अनियंत्रित अहंकार से आपके जीवन के जहाज को डुबोने के बजाय, आप बढ़ती हुई विनम्रता वाला जीवन अपनाकर इससे पूरी तरह बचकर रहना सीखें।
अब (रूपकों को थोड़ा बदलते हैं), अहंकार एक फिसलने वाली मछली है। हम सभी इसे पहचान सकते हैं (और आमतौर पर दूसरों में इसे पहचानना सबसे आसान होता है), परन्तु हममें से बहुत कम लोग ही रुककर इस बारे में विचार करते हैं कि असल में अहंकार क्या है। और इस क्षेत्रीय मार्गदर्शिका को आरम्भ करने की हमारे लिए सबसे अच्छी जगह यह होगी कि हम अहंकार की एक परिभाषा पर विचार करें।
अत:, यहाँ मेरी ओर से एक प्रयास किया गया है:
अहंकार स्वयं की बड़ाई करने की हृदय की एक प्रवृत्ति है, जिसमें मैं स्वयं को परमेश्वर की जगह पर रखने का प्रयास करता हूँ।
इसे विस्तार से समझें तो, सबसे पहली बात यह है कि अहंकार हृदय की एक प्रवृत्ति है। इसकी जड़ें हमारे हृदय में होती हैं। हृदय ही वह जगह है, जहाँ से हमारे विचार और इच्छाएँ उत्पन्न होती हैं। इस कारण, अहंकार कोई ऐसी बात नहीं है, जो हमारे पास बाहर से आती हो, जैसे कोई विदेशी योद्धा बाहर से आक्रमण कर रहा हो, परन्तु इसके बजाय यह हमारे भीतर छिपा एक प्राणघाती शत्रु है, जो हमारे मसीही जीवन को हर पड़ाव पर नुकसान पहुँचाने का प्रयास करता रहता है।
और दूसरी बात यह है कि मेरी परिभाषा बताती है कि अहंकार तब उत्पन्न होता है, जब मैं स्वयं को परमेश्वर की जगह पर रखने का प्रयास करता हूँ। इस तरह की अदला-बदली की सबसे बड़ी श्रेणी को मूर्तिपूजा कहा जाता है। हालाँकि, अहंकार जिस वस्तु को परमेश्वर की जगह पर रखना चाहता है, वह मेरे बाहर की कोई बात नहीं है। वह मैं स्वयं हूँ। मैं स्वयं को परमेश्वर की जगह पर रख देता हूँ। अहंकार का अर्थ किसी और वस्तु या किसी और व्यक्ति की उपासना करना या उसकी सेवा करना नहीं है, परन्तु यह इस बात पर अड़े रहना है कि उपासना और सेवा तो केवल मेरी ही होनी चाहिए।
और इसलिए, जब हम इसे इस तरह से समझते हैं, तो हम देखते हैं कि अहंकार कितना खतरनाक और विनाशकारी है। अहंकार चाहता है कि मैं स्वयं को परमेश्वर की जगह पर रख लूँ। इसमें कोई हैरानी की बात नहीं कि ऑगस्टीन ने कहा था, “अहंकार करना ही पाप का आरम्भ है।”2 और इस बात से सहमत होते हुए, सी.एस. लुईस ने आगे विस्तार से बताया, “अहंकार हर दूसरी बुराई की ओर ले जाता है: यह पूरी तरह से मन की परमेश्वर-विरोधी दशा है।”3
और इसलिए, अहंकार से ही कई दूसरे पाप उत्पन्न होते हैं। इस पर विचार कीजिए कि—अहंकारी लोग अक्सर दूसरों की बुराई करने, कड़वाहट, लोगों से डरने, स्वयं पर तरस खाने, दम्भ भरने जैसी बुराइयों से भी जूझते रहते हैं… और ये तो बस कुछ ही उदाहरण हैं।
और अहंकार बहुत ही अधिक धोखेबाज भी होता है। यह अलग-अलग रूपों और आकारों में आता है। हर तरह का अहंकार प्रकट नहीं होता। अहंकार शिष्टाचार, प्रार्थना, या यहाँ तक कि वर्षों की सच्ची मसीही सेवा के पीछे भी छिपा हो सकता है। यह हमारे जीवन में ऊपरी विनम्रता का रूप धरकर भी छिपा रह सकता है।
तो यह स्पष्ट है कि आरम्भ से ही यदि हम मसीही के रूप में बढ़ना चाहते हैं और स्वयं को एवं दूसरों को बड़े नुकसान से बचाना चाहते हैं, तो अहंकार से बचे रहना बहुत आवश्यक है।
परन्तु परमेश्वर की स्तुति हो, क्योंकि आशा अभी भी बाकी है! बाइबल हमें सिखाती है कि परमेश्वर का अनुग्रह हमारे पापों से कहीं अधिक बड़ा है। इसके अलावा, परमेश्वर ने हमें अहंकार से बचे रहने का एक मार्ग भी उपलब्ध करवाया है। और इससे भी बढ़कर, जब हम परमेश्वर की सहायता से, धीरे-धीरे परन्तु निश्चित रूप से अहंकार को समाप्त करते जाएँगे, तो हमें अपने जीवन के दूसरे क्षेत्रों में भी जीत की अपेक्षा करनी चाहिए।
जीत की इस सम्भावना से हमें अहंकार का सामना करने और विनम्रता भरा जीवन जीने की प्रेरणा मिलनी चाहिए। मैं आशा करता हूँ कि यह क्षेत्रीय मार्गदर्शिका आपके जीवन में इस दिशा में उठाया गया एक अहम कदम साबित होगी।
इस क्षेत्रीय मार्गदर्शिका को तीन हिस्सों में बाँटा जाएगा। सबसे पहले, हम यह देखेंगे कि अहंकार हमारे जीवन को कैसा नुकसान पहुँचाता है। इसके बाद, हम अहंकार की जड़ों पर ध्यान देंगे। और अन्त में, हम यह सीखेंगे कि अपने अहंकार को कैसे समाप्त किया जाए और एक विनम्रता का जीवन कैसे जिया जाए। हर अध्याय के अन्त में कुछ प्रश्न दिए जाएँगे, जिन पर आप अपने मार्गदर्शक या प्रशिक्षु के साथ मिलकर विचार कर सकते हैं।
तो, चलिए आरम्भ करते हैं (मैं ब्रिटिश हूँ!)।
ऑडियो मार्गदर्शिका
ऑडियो#55 अहंकार से बचना: एक जीवन कौशल के रूप में विनम्रता
भाग I: अहंकार का विनाश
मैं अच्छे से जानता था। मैं अपनी सास से भी अधिक अच्छे से जानता था। मैं जी.पी.एस. से भी अधिक अच्छे से जानता था। मैं सड़क पर लगे सूचना-संकेतों से भी अधिक अच्छे से जानता था। मैं सड़क पर मौजूद अधिकांश दूसरे चालकों से तो बहुत अधिक अच्छे से जानता था। वह एक सर्दियों का दिन था, और लगातार बर्फ गिर रही थी। जहाँ मैं रहता हूँ, वहाँ आधा मिलीमीटर बर्फ गिरने से भी अक्सर पूरी तरह से अफरा-तफरी मच जाती है, और वह दिन भी कुछ अलग नहीं था। काम पर एक लम्बे दिन के बाद मेरी सास मुझे लेने आई थीं और हम परिवार के साथ रात के खाने के लिए उनके घर जा रहे थे। हालाँकि, सड़कों पर बहुत अधिक भीड़ थी और यातायात जाम पड़ा हुआ था। और मुझे भूख लगी थी। तभी मेरे मन में एक बढ़िया तरकीब आई—जो एकदम शानदार थी! मुझे एक गाँव से होकर जाने वाला एक छोटा रास्ता मालूम था। और मुझे पूरा निश्चय था कि उससे हम जल्दी घर पहुँच जाएँगे। और मैं जिस सड़क के बारे में सोच रहा था, वह एक गाँव का रास्ता था, जिसमें बीच में एक बहुत तेज और तीखा मोड़ था। और जब हम उसी मोड़ पर पहुँचे, तो हमारी गाड़ी फिसलकर घूम गई, और अन्त में सड़क के किनारे बनी एक खाई में फँस गई। वहाँ कीचड़ में फँसे बैठे मुझे एहसास हुआ कि मेरी वह शानदार तरकीब असल में उतनी शानदार नहीं थी। धन्यवाद हो कि गाड़ी को या किसी और को कोई बड़ा नुकसान नहीं पहुँचा, परन्तु हम बाल-बाल बचे। इससे भी अच्छी बात यह थी कि मेरी सास अभी भी मुझसे बात कर रही थीं।
मेरे अहंकार की वजह से उस दिन बहुत बड़ा नुकसान हो सकता था। क्योंकि अहंकार यही करता है। यह जिस भी वस्तु से टकराता है, उसे बर्बाद कर देता है।
यदि हमें यह जानना है कि हमें प्रतिदिन अपने अहंकार को समाप्त करने का प्रयास क्यों करना चाहिए, तो हमें यह सोचना चाहिए कि अहंकार किस तरह से बर्बाद करता है। जबकि अहंकार के खतरों को पहचान लेना, इस बात का आश्वासन नहीं देता कि हम उसे पूरी तरह से समाप्त कर पाएँगे, इसलिए परमेश्वर अक्सर हमें नुकसान से बचाने के लिए चेतावनी का सहारा लेता है। असल में, यीशु ने स्वयं लूत की पत्नी का उदाहरण देकर हमें इस संसार से लगाव न रखने की चेतावनी दी थी (उत्पत्ति 19 अध्याय देखें)।
हम अहंकार के नुकसान को दो दिशाओं में होते हुए सोच सकते हैं: ऊर्ध्वाधर और क्षैतिज। आइए, मैं इसे समझाता हूँ: अहंकार परमेश्वर के साथ हमारे रिश्ते को बर्बाद कर देता है, अर्थात् ऊपर की ओर (ऊर्ध्वाधर), और यह दूसरों के साथ हमारे रिश्तों को भी नुकसान पहुँचाता है, अर्थात् सामने की ओर (क्षैतिज)। अहंकार से होने वाला सबसे मुख्य नुकसान परमेश्वर के साथ ही होता है, और इसका परिणाम आपस में होने वाले बाकी सभी नुकसान में मिलता है।
सी.एस. लुईस ने इसे इस तरह कहा है, “परन्तु अहंकार का अर्थ हमेशा शत्रुता होता है—यह अपने आप में शत्रुता है। और यह शत्रुता केवल मनुष्य और मनुष्य के बीच ही नहीं, बल्कि परमेश्वर के साथ भी है।”4
तो फिर, ऊर्ध्वाधर रूप में, अहंकार परमेश्वर के साथ हमारे रिश्ते को तोड़ देता है। ऐसा क्यों होता है? क्योंकि यह हमें उसका सामना करने के लिए उकसाता है। यदि हम स्वयं को उसकी जगह पर रख रहे हैं, तो यह बात स्पष्ट है कि हम स्वयं को उसके विरुद्ध खड़ा कर रहे हैं, और उस हैसियत के लिए लड़ रहे हैं, जो अनूठे रूप से केवल उसी की है। और इसका दुष्परिणाम क्या होगा? परमेश्वर हमारा विरोध करेगा।
परमेश्वर अभिमानियों का विरोध क्यों करता है? क्योंकि इस जगत का केवल एक ही सर्वशक्तिमान प्रभु हो सकता है, और अहंकार मुझे चाहे कुछ भी कहे, मैं वह नहीं हूँ। परमेश्वर यशा. 42:8 में कहता है कि वह अपनी महिमा दूसरों के साथ साझा नहीं करता।
तब अहंकार हमें परमेश्वर के पूर्ण विरोध में खड़ा कर देता है। और इसके परिणामस्वरूप, परमेश्वर के साथ हमारा रिश्ता न केवल अहंकार से दूषित या खराब होता है—बल्कि वह पूरी तरह से टूट जाता है।
और इससे भी बढ़कर, यदि अहंकार को बिना रोके छोड़ दिया जाए, तो इसके दुष्परिणाम न समाप्त होने वाले निकलते हैं। क्योंकि यदि हम लगातार परमेश्वर के विरोध में जीते हैं, तो बाइबल बताती है कि जब हम मरेंगे, तो हम हमेशा के लिए उसके विरोध का अनुभव करेंगे।
यहाँ रुककर अहंकार के दुष्परिणामों पर विचार करना उचित है। अहंकार हमें परमेश्वर के पूर्ण विरोध में खड़ा कर देता है। इसका अर्थ है कि हम स्वयं को उसके विरुद्ध खड़ा करते हैं, और इसकी प्रतिक्रिया में, वह हमारे विरुद्ध हो जाता है।
परन्तु सभी पापों की तरह, अहंकार के भी दुष्परिणाम इस जीवन में और आने वाले जीवन में होते हैं। यदि हम इस बारे में सोचें, तो यह बात समझ में आती है। यदि हम सब स्वयं को छोटे-मोटे देवता समझते हुए घूमते हैं, और यह माँग करते हैं कि परमेश्वर और बाकी सब लोग हमारी सेवा करें, तो इसमें कोई हैरानी की बात नहीं कि जब हम बिलकुल वैसा ही व्यवहार करने वाले दूसरे लोगों के सम्पर्क में आते हैं, तो टकराव उत्पन्न होता है।
और इसमें कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि अहंकार से भरे इस संसार में, कहा-सुनी और तर्क-वितर्क, लड़ाई-झगड़े और यहाँ तक कि युद्ध भी होते हैं। अहंकार पारिवारिक रिश्तों को तोड़ सकता है, और यह देशों को एक-दूसरे पर युद्ध छेड़ने के लिए भी उकसा सकता है।
थोड़े शब्दों में कहें? तो अहंकार सब कुछ बर्बाद कर देता है।
और हम इस सच्चाई को बाइबल में घटित होते हुए देखते हैं। असल में, बाइबल हमें ऐसे कई उदाहरण देती है कि अहंकार कितना विनाशकारी होता है। परन्तु आइए हम पुराने नियम से केवल एक उदाहरण पर विचार करें। जो राजा नबूकदनेस्सर का है।
राजा नबूकदनेस्सर बेबीलोन का राजा था, और अपने शासनकाल में, उसने अपार शक्ति और वैभव प्राप्त किया। दानिय्येल 3 अध्याय में, हम देखते हैं कि उसने एक मूर्ति स्थापित की थी, जिसके सामने पूरे देश को झुकने का आदेश दिया गया था…
तब ढिंढोरिये ने ऊँचे शब्द से पुकारकर कहा, “हे देश–देश और जाति–जाति के लोगो, और भिन्न–भिन्न भाषा के बोलनेवालो, तुम को यह आज्ञा सुनाई जाती है कि, जिस समय तुम नरसिंगे, बाँसुली, वीणा, सारंगी, सितार, शहनाई आदि सब प्रकार के बाजों का शब्द सुनो, तुम उसी समय गिरकर नबूकदनेस्सर राजा की खड़ी कराई हुई सोने की मूरत को दण्डवत् करो। जो कोई गिरकर दण्डवत् न करेगा वह उसी घड़ी धधकते हुए भट्ठे के बीच में डाल दिया जाएगा।” (दानि. 3:4-6)
और जबकि बाइबल में यह साफ तौर से नहीं बताया गया है कि वह मूर्ति किसकी थी, परन्तु इससे यह जोरदार संकेत मिलता है कि वह मूर्ति नबूकदनेस्सर की ही थी। वह मूर्ति बिलकुल उसी की तरह दिखती थी।
अब यह मेरे अहंकार की उस परिभाषा का लगभग एक सटीक उदाहरण है: अहंकार स्वयं की बड़ाई करने की हृदय की एक प्रवृत्ति है, जिसमें मैं स्वयं को परमेश्वर की जगह पर रखने का प्रयास करता हूँ।
नबूकदनेस्सर ने स्वयं को ऊँचा उठाया। उसने पूरे देश को इस मूर्ति के सामने झुकने की आज्ञा दी। और ऐसा करके, उसने अपने राज्य की महानता का श्रेय लेने, और उसके लिए महिमा एवं बढ़ाई पाने का प्रयास किया। उसने उस जगह को पाने का प्रयास किया, जिसके योग्य केवल परमेश्वर है।
परन्तु जैसा कि हम जानते हैं, परमेश्वर अभिमानियों का विरोध करता है। इस कहानी में, हम देखते हैं कि परमेश्वर बीच में आकर नबूकदनेस्सर का विरोध करता है। “जो लोग अहंकार से चलते हैं, उन्हें वह नीचा कर सकता है।” (दानि. 4:37)
और दानिय्येल 4 अध्याय में ठीक यही होता है, जब नबूकदनेस्सर को परमेश्वर के द्वारा विनम्र किया गया।
यह सब कुछ नबूकदनेस्सर राजा पर घट गया। बारह महीने के बीतने पर जब वह बेबीलोन के राजभवन की छत पर टहल रहा था, तब वह कहने लगा, “क्या यह बड़ा बेबीलोन नहीं है, जिसे मैं ही ने अपने बल और सामर्थ्य से राज-निवास होने को और अपने प्रताप की बड़ाई के लिये बसाया है?” यह वचन राजा के मुँह से निकलने भी न पाया था कि आकाशवाणी हुई, “हे राजा नबूकदनेस्सर, तेरे विषय में यह आज्ञा निकलती है: राज्य तेरे हाथ से निकल गया, और तू मनुष्यों के बीच से निकाला जाएगा, और मैदान के पशुओं के संग रहेगा; और बैलों के समान घास चरेगा; और सात काल तुझ पर बीतेंगे, जब तक कि तू न जान ले कि परमप्रधान, मनुष्यों के राज्य में प्रभुता करता है और जिसे चाहे वह उसे दे देता है।” उसी घड़ी यह वचन नबूकदनेस्सर के विषय में पूरा हुआ। वह मनुष्यों में से निकाला गया, और बैलों के समान घास चरने लगा, और उसकी देह आकाश की ओस में भीगती थी, यहाँ तक कि उसके बाल उकाब पक्षियों के परों से और उसके नाखून चिड़ियों के पंजों के समान बढ़ गए। (दानि. 4:28-33)
हम देखते हैं कि नबूकदनेस्सर का मानसिक संतुलन उससे छीन लिया गया। वह एक पशु की तरह व्यवहार करने लगा और उन लोगों के बीच से निकाल दिया गया, जिन्हें उसने अभी-अभी अपने सामने झुकने का आदेश दिया था। संक्षेप में कहें तो, उसका जीवन बिखर गया।
नबूकदनेस्सर हमारे लिए अहंकार के खतरों की एक चेतावनी है। और ऐसा तो हो नहीं सकता कि हम सचमुच अपनी कोई मूर्ति बनाकर दूसरों से उसके सामने झुकने के लिए कहें, परन्तु हम कुछ ऐसे तरीकों से व्यवहार तो कर ही सकते हैं, है न? हम भी अपनी मर्जी चलाने की जिद कर सकते हैं, और इस बात पर अड़ सकते हैं कि हम ही सबसे अधिक जानते हैं, और हम दूसरों को अपनी बात मानने के लिए विवश कर सकते हैं, भले ही वह भावनात्मक हेर-फेर जैसे सूक्ष्म तरीकों से ही क्यों न हो। और हम स्वयं भी अपने जीवन की उन बातों का श्रेय, बड़ाई और सम्मान लेने का प्रयास कर सकते हैं, जो परमेश्वर के अनुग्रह भरे हाथों से मिलती हैं। हम स्वयं को इस विचार से मूर्ख बना सकते हैं कि हम अपने मूल से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हैं।
और तब पर भी, यह खण्ड हमें चेतावनी देता है कि अन्त में परमेश्वर को ठठ्ठों में नहीं उडाया जा सकता। वह अपनी महिमा दूसरों के साथ साझा नहीं करता, और यदि हम उसे प्रभु के रूप में स्वीकार करने से इन्कार करते हैं, तो इसके दुष्परिणाम भुगतने पड़ेंगे। ऐसा तो हो नहीं सकता कि हम नबूकदनेस्सर की तरह अपना मानसिक संतुलन खो बैठें, परन्तु बाइबल स्पष्ट रूप से कहती है कि हम जैसा बोएँगे, वैसा ही काटेंगे। इस जीवन में, या अगले जीवन में, किसी न किसी रूप में ऐसा होगा। यदि हम लगातार, अनियंत्रित अहंकार के साथ जीते हैं, तो हमें इस सच्चाई का सामना करने के लिए विवश होना पड़ेगा कि हम ईश्वर नहीं हैं। और यही बात हमारे विनाश का कारण बनेगी।
और नीतिवचन की पुस्तक हमें ठीक यही बात सिखाती है।
नीतिवचन 16:18 कहता है, “विनाश से पहले गर्व, और ठोकर खाने से पहले अहंकार आता है।”
और नीतिवचन 11:2 कहता है, “जब अभिमान होता, तब अपमान भी होता है, परन्तु नम्र लोगों में बुद्धि होती है।”
चाहे राजा नबूकदनेस्सर के उदाहरण से हो, या सुलैमान की लेखनी से, बाइबल लगातार एक ही संदेश देती है: अहंकार सब कुछ बर्बाद कर देता है। यह विनाश और अपमान लाता है।
और ऐसा लगता है कि या तो हम पवित्रशास्त्र की चेतावनियों पर ध्यान दें, या अपने जीवन में अपने अहंकार के दुष्परिणामों का सामना करें। इसलिए, आइए हम यहीं रुककर सबसे पहले अपने हृदय से कुछ जाँच-परख वाले प्रश्न पूछें, जिससे कि यह जान सकें कि क्या हमारे जीवन में कोई ऐसा अहंकार है, जिस पर हमने ध्यान नहीं दिया है।
आप एक कलम और कागज लेकर, भटकावों से दूर किसी शान्त जगह पर चले जाइए, और इन सभी प्रश्नों के उत्तर लिखें। और वापस आकर, अपने मार्गदर्शक या प्रशिक्षु के साथ अपने उत्तर साझा करें:
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मनन के लिए प्रश्न:
- मेरे जीवन की कौन सी स्थिति में मैं यह मानकर चलता हूँ कि मैं दूसरों से बेहतर—शायद परमेश्वर से भी “बेहतर जानता हूँ”?
- क्या मैं नबूकदनेस्सर की तरह, अपने जीवन की किसी भी बात के लिए श्रेय या बड़ाई की खोज में रहता हूँ, भले ही वह सूक्ष्म तरीकों से क्यों न हो?
- क्या मैं उन लोगों के साथ मिलकर आनन्दित हो पाता हूँ, जो आनन्दित हैं? यदि ऐसा नहीं है, तो यह संघर्ष किन क्षेत्रों में पाया जाता है?
- मैं आलोचना का सामना कैसे करता हूँ? जब कोई मेरे बारे में कोई बुराई करता है,
तो क्या मैं बचाव करने लगता हूँ?
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भाग II: अहंकार की जड़ें
मैंने हाल ही में बागवानी आरम्भ की है, परन्तु इस काम में अभी मैं बिलकुल नया हूँ (क्या आप इस मुहावरे का अर्थ समझ पाए?) मेरी बागवानी की इस आरम्भिक यात्रा की पहली चुनौती यह समझना थी कि एक पौधे और एक खरपतवार के बीच अन्तर कैसे किया जाए। और तभी से, वे खरपतवार मेरे जीवन के लिए एक बहुत बड़ी मुसीबत बन गए हैं! वे हर जगह उग आते हैं! आरम्भ में, खरपतवारों के उन हिस्सों को जो मुझे दिखाई देते थे, उखाड़ने ही मैं सन्तुष्ट था; और आप जानते हैं कि ये वे हिस्से थे, जो भूमि के ऊपर थे। मैं बहुत खुश था कि बगीचा बहुत सुन्दर लग रहा था, कम से कम कुछ समय के लिए तो ऐसा ही था। इसमें समस्या यह हुई कि अधिक समय नहीं बीता था और वह खरपतवार फिर से जोर-शोर से वापस आ गई।
जब मैंने अपनी यह परेशानी एक अधिक अनुभवी माली को बताई, तो उसने मुस्कुराते हुए मुझसे कहा कि मुझे नीचे तक खोदकर सारी जड़ें निकालनी होंगी, और केवल तभी वे दोबारा नहीं उगेंगे। मुझे जड़ तक पहुँचना था।
जो बात खरपतवारों के लिए सच है, वही बात हर तरह के पाप के लिए, और अहंकार के लिए भी सच है। यदि हमें लम्बे समय तक सफल बने रहना है, तो हमें इसकी जड़ को ढूँढ़कर वहीं इसका सामना करना होगा।
अत:, अहंकार से होने वाली बर्बादी पर विचार करने के बाद, अब हम इसकी जड़ पर विचार करेंगे। ऐसा करके, हम स्वयं को यह सीखने के लिए तैयार करेंगे कि इसे सबसे अच्छे तरीके से कैसे उखाड़ा जाए।
आइए, हम यह देखने के लिए पीछे जाकर आरम्भ करें कि अहंकार कहाँ से आया। और हम देखते हैं कि अहंकार की जड़ें बहुत गहरी हैं। असल में, अहंकार मनुष्य के अस्तित्व से भी पहले का है। बाइबल बताती है कि अहंकार का आरम्भ इस संसार के बनने से भी पहले शैतान के साथ हुआ था।
बाइबल में कई बार इसका संकेत मिलता है। ऐसी ही एक जगह यशायाह 14 अध्याय में है, जहाँ यशायाह लिखता है:
“हे भोर के चमकनेवाले तारे, तू कैसे आकाश से गिर पड़ा है?
तू जो जाति जाति को हरा देता था,
तू अब कैसे काटकर भूमि पर गिराया गया है?
तू मन में कहता तो था,
‘मैं स्वर्ग पर चढ़ूँगा;
मैं अपने सिंहासन को
ईश्वर के तारागण से अधिक ऊँचा करूँगा;
…मैं परमप्रधान के तुल्य हो जाऊँगा।’
परन्तु तू अधोलोक में
उस गड़हे की तह तक उतारा जाएगा।” (यशा. 14:12-15)
वास्तव में, इस खण्ड में जिस “भोर के तारे” का उल्लेख है, वह बेबीलोन के मानवीय राजा को संदर्भित करता है; हालाँकि, कई ईश-वैज्ञानिकों और पास्टरों ने यह समझा है कि यहाँ किसी और का संदर्भ दिया गया है। यह खण्ड शैतान के अहंकार और उसके पतन की ओर संकेत करता है।
यद्यपि आरम्भ में शैतान एक सुन्दर, तेजस्वी स्वर्गदूत था, जो परमेश्वर की महिमा को प्रतिम्बित करता था, परन्तु ऐसा लगता है कि उसे जलन होने लगी और उसने उस महिमा को, जो केवल परमेश्वर की है, स्वयं के लिए पाने की इच्छा की। शैतान ने उस सिंहासन की इच्छा की, जो परमेश्वर का है, और अपने अहंकार में होकर, उसका पतन हो गया।
यदि इतिहास में अहंकार का वह पहला क्षण था, तो इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है कि हमें बाइबल के तीसरे अध्याय तक ही पहुँचने की आवश्यकता पड़ती है, जहाँ अहंकार फिर से एक विनाशकारी रूप में सामने आता है। उत्पत्ति 3 अध्याय में, हम देखते हैं कि अब गिरा हुआ शैतान, हव्वा को भले और बुरे के ज्ञान के वृक्ष का फल खाने के लिए परीक्षा में डाल रहा है। आइए, हम उत्पत्ति 3:1 से इस कहानी को आगे देखते हैं:
“यहोवा परमेश्वर ने जितने बनैले पशु बनाए थे, उन सब में सर्प धूर्त था; उसने स्त्री से कहा, “क्या सच है कि परमेश्वर ने कहा, ‘तुम इस वाटिका के किसी वृक्ष का फल न खाना’?” स्त्री ने सर्प से कहा, “इस वाटिका के वृक्षों के फल हम खा सकते हैं; पर जो वृक्ष वाटिका के बीच में है, उसके फल के विषय में परमेश्वर ने कहा है कि न तो तुम उसको खाना और न उसको छूना, नहीं तो मर जाओगे।” तब सर्प ने स्त्री से कहा, “तुम निश्चय न मरोगे! वरन् परमेश्वर आप जानता है कि जिस दिन तुम उसका फल खाओगे उसी दिन तुम्हारी आँखें खुल जाएँगी, और तुम भले बुरे का ज्ञान पाकर परमेश्वर के तुल्य हो जाओगे।” अत: जब स्त्री ने देखा कि उस वृक्ष का फल खाने के लिए अच्छा, और देखने में मनभाऊ, और बुद्धि देने के लिये चाहनेयोग्य भी है; तब उसने उसमें से तोड़कर खाया, और अपने पति को भी दिया, और उसने भी खाया। तब उन दोनों की आँखें खुल गईं, और उनको मालूम हुआ कि वे नंगे हैं; इसलिए उन्होंने अंजीर के पत्ते जोड़ जोड़ कर लंगोट बना लिये।”—उत्प. 3:1-7
परमेश्वर ने आदम और हव्वा को (अपनी असीम उदारता में) वाटिका के एक पेड़ के अलावा किसी भी पेड़ का फल खाने की अनुमति दी थी। वे अपनी इच्छा से हर वस्तु का आनन्द ले सकते थे, और परमेश्वर की कृपा से मिले प्रतिफल का आनन्द ले सकते थे। और यहाँ तक कि उस एक पेड़ का फल न खाने की मनाही भी एक कृपालु कार्य था। यह मनाही आदम और हव्वा को याद दिलाती थी कि वे ईश्वर नहीं हैं। वे परमेश्वर के भले अधिकार के अधीन मनुष्य थे।
और तब पर भी, आदम और हव्वा को उस एक पेड़ का फल खाने की परीक्षा में डालने के लिए शैतान आया, जिसे न खाने का उन्हें आदेश दिया गया था। उसकी चाल क्या थी? उसी अहंकार को जगाना, जिसके कारण स्वयं उसका पतन हुआ था।
शैतान के सरासर झूठ और चालाकी भरे आधे-अधूरे सच ने उस दिन हव्वा के हृदय को धोखा दे दिया। शैतान ने परमेश्वर की बात को तोड़ा-मरोड़ा और हव्वा के मन में सन्देह के बीज बो दिए। फिर उसने परमेश्वर पर विश्वास नहीं किया और उसकी बात नहीं मानी, क्योंकि उसने परीक्षा के आगे हार मान ली, और उसने एवं आदम ने वह फल खा लिया।
आदम और हव्वा परमेश्वर के जैसा बनना चाहते थे, और उन्होंने सोचा कि उस फल को खाने से वे किसी न किसी तरह परमेश्वर के तुल्य हो जाएँगे।
अहंकार का वह पाप, जो शैतान के पतन का जिम्मेदार था, अब आदम और हव्वा के हृदयों और मनों को भी संक्रमित कर चुका था। और उस समय से लेकर अब तक, अहंकार को एक संक्रमण की तरह पूरे संसार में फैलने में थोड़ी भी देर नहीं लगी। चाहे वह परमेश्वर के प्रश्नों के आदम और हव्वा के उत्तरों में हो (कि इसमें मेरी कोई गलती नहीं है!), या फिर सबसे ऊँचे स्वर्ग तक पहुँचने का प्रयास में बेबीलोन के गुम्मट के निर्माण में हो, अहंकार एक विषाणु की तरह तेजी से फैला, और उसने हर मनुष्य को बेहिसाब नुकसान पहुँचाया।
और तब से लेकर अब तक, अहंकार का यह पाप हर उस मनुष्य के हृदय में मौजूद रहा है, जिसने भी इस संसार में जन्म लिया है। जो अहंकार आदम और हव्वा के हृदयों में था, वही आज मेरे हृदय में भी और आपके हृदय में भी जीवित है। यह वही बात है, जो यीशु ने मरकुस 7 अध्याय में समझाई है। सुनिए कि वह क्या कहता है:
“क्योंकि भीतर से, अर्थात् मनुष्य के मन से, बुरे बुरे विचार, व्यभिचार, चोरी, हत्या, परस्त्रीगमन, लोभ, दुष्टता, छल, लुचपन, कुदृष्टि, निन्दा, अभिमान, और मूर्खता निकलती हैं। ये सब बुरी बातें भीतर ही से निकलती हैं और मनुष्य को अशुद्ध करती हैं।” (मर. 7:21-23)
यहाँ यीशु के शब्द बहुत महत्वपूर्ण इसलिए हैं, क्योंकि यदि हम अहंकार से सही तरीके से निपटना चाहते हैं, तो यह समझना बहुत आवश्यक है कि अहंकार आखिरकार आता कहाँ से है। जैसे मेरे बगीचे के खरपतवारों के साथ होता है, वैसे ही यदि हम अपने जीवन से अहंकार को समाप्त करना चाहते हैं, तो हमें उसकी जड़ तक पहुँचना होगा। हमें यह समझना होगा कि अहंकार हमारे हृदयों में ही बसता है। हमारा हृदय ही हमारी इच्छाओं, भावनाओं और सोच-विचार का केंद्र होता है।
और हमें यह समझ लेना चाहिए कि कोई भी ऐसा उपाय, जो आखिर में हमारे हृदय तक न पहुँचे, वह कभी भी कोई स्थायी समाधान नहीं दे पाएगा। हो सकता है कि वह एक-आधे घण्टे या अधिकाधिक एक दिन के लिए काम कर जाए, परन्तु जब तक उसकी जड़ पर वार न किया जाए, तब तक अहंकार बार-बार, और भी जोर-शोर से अपना बुरा सिर उठाता रहेगा।
अहंकार के उपचार के बारे में विचार करने के लिए हम अगले भाग में फिर मिलेंगे, परन्तु अभी के लिए मैं चाहता हूँ कि हम यह समझ लें कि अहंकार कहाँ आता से है। उसकी जड़ कहाँ है।
और मैं चाहता हूँ कि हम यह समझ लें कि हममें से हर किसी को जिसकी सबसे अधिक आवश्यकता है, वह नये हृदय हैं। हमें एक ऐसे हृदय की आवश्यकता है, जो पापी और विषैला फल नहीं, परन्तु अच्छा और जीवनदायी फल उत्पन्न करे।
और एक प्रोत्साहित करने वाली सच्चाई यह है कि परमेश्वर, यीशु में होकर, लोगों को नये हृदय देने का काम कर रहा है। वह हमें ऐसे लोग बनने से बदलने में सक्षम है, जो केवल अपनी ही महिमा और हैसियत की चाह रखते हैं, और वह हमें ऐसे लोग बना सकता है, जो परमेश्वर की महिमा की चाह रखें और दूसरों की सेवा करने को तैयार रहें।
असल में, पुराने नियम में उसने यह प्रतिज्ञा की है कि वह यही करने वाला है। यहेजकेल भविष्यद्वक्ता ने जो भविष्यद्वाणी की थी, वह इस प्रकार है:
“मैं तुम को जातियों में से ले लूँगा, और देशों में से इकट्ठा करूँगा; और तुम को तुम्हारे निज देश में पहुँचा दूँगा। मैं तुम पर शुद्ध जल छिड़कूँगा, और तुम शुद्ध हो जाओगे; और मैं तुम को तुम्हारी सारी अशुद्धता और मूरतों से शुद्ध करूँगा। मैं तुम को नया मन दूँगा, और तुम्हारे भीतर नई आत्मा उत्पन्न करूँगा, और तुम्हारी देह में से पत्थर का हृदय निकालकर तुम को मांस का हृदय दूँगा। मैं अपना आत्मा तुम्हारे भीतर देकर ऐसा करूँगा कि तुम मेरी विधियों पर चलोगे और मेरे नियमों को मानकर उनके अनुसार करोगे।”—यहे. 36:24-27.
यहेजकेल हमें यह सिखाता है कि परमेश्वर स्वयं ही हमारे जीवनों से अहंकार को जड़ से उखाड़ने में सक्षम और इच्छुक है। वह हमें दिखाता है कि केवल परमेश्वर ही हमें नये हृदय देने में सक्षम और इच्छुक है—ऐसे हृदय, जो उसका आदर करना और उसके पीछे चलना चाहते हैं।
परन्तु हमें यह हृदय कैसे मिलता है? और मसीही बनने के बाद भी, हम अपने अहंकार से संघर्ष क्यों करते रहते हैं?
आइए, इन प्रश्नों के उत्तर देखने के लिए और कैसे हम अपने जीवनों में विनम्रता कैसे विकसित कर सकते हैं, हम अपने अन्तिम अध्याय की ओर जाएँ।
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मनन के लिए प्रश्न:
- आप अपने जीवन से “अहंकार की खरपतवार” को निकालने का प्रयास कैसे
करते हैं? क्या आपके तरीके केवल ऊपरी तौर पर हैं, या वे हृदय तक पहुँचने का प्रयास करते हैं? - पाप के आत्मिक मूल को पहचानने से, उसे दूर करने की आपकी लगन और गहरी कैसे हो जाती है?
- आप किन तरीकों से देखते हैं कि दूसरों को देखने या उनके साथ व्यवहार करने के आपके तरीके पर अहंकार प्रभाव डालता है?
- प्रार्थना करें कि परमेश्वर आपकी आँखें खोल दे, जिससे कि आप अहंकार के उन हिस्सों को देख सकें, जिनको आप अभी नहीं देख सकते।
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भाग III: अहंकार का उपचार
इस आखिरी हिस्से में, हम अहंकार से दूर रहने के तरीकों को देखेंगे। सबसे पहले, हम देखेंगे कि कैसे केवल यीशु ही हमें एक नया हृदय दे सकता है, जिससे वह प्रसन्न होता है। इसके बाद, हम उन चार तरीकों पर विचार करेंगे, जिनसे हम (परमेश्वर की सहायता से) अपने जीवन में अहंकार से लड़ सकते हैं।
जहाँ अहंकार समाप्त हो जाता है
पिछले भाग में, हमने देखा कि अहंकार हमारे भीतर से, हमारे हृदयों से आता है। और इस कारण हमने इस बारे में विचार किया कि यदि हमें आखिरकार अहंकार को हराना है, तो हमें नये हृदयों की आवश्यकता पड़ेगी।
और परमेश्वर की स्तुति हो कि इसी को लाने के लिए यीशु पृथ्वी पर आया था। पौलुस 2 कुरिन्थियों में लिखता है, “इसलिये यदि कोई मसीह में है तो वह नई सृष्टि है: पुरानी बातें बीत गई हैं; देखो, सब बातें नई हो गई हैं” (2 कुरि. 5:17)।
केवल यीशु ही हमें आत्मिक रूप से नया बना सकता है। केवल वही हमें नये हृदय देने की यहेजकेल की उस प्रतिज्ञा को पूरा कर सकता है—ऐसे हृदय जो अपनी महिमा नहीं चाहते, बल्कि सब बातों में परमेश्वर के लिए जीना चाहते हैं।
परन्तु वह ऐसा कैसे करता है?
वैसे, जिस तरह स्वयं को परमेश्वर की जगह रखना अहंकार की समस्या है, उसी तरह एक विकल्प ही अहंकार का समाधान भी है—बस इस बार परमेश्वर स्वयं को हमारी जगह रखता है।
यीशु ही एकमात्र ऐसा व्यक्ति है, जिसने पूरी तरह से अहंकार-मुक्त जीवन जिया है। यद्यपि उसके पास अहंकार करने का हर कारण था (वह देहधारी परमेश्वर है!), तौभी उसने एक बार भी सोच में या शब्दों में या कामों में कभी पाप नहीं किया।
सच तो यह है कि यद्यपि पृथ्वी पर आने से पहले, उसने स्वर्ग की स्तुति और स्वर्गदूतों की आराधना का आनन्द लिया, तौभी उसने इच्छुक होकर हमारी मानवता को अपनाकर स्वयं को विनम्र कर लिया। परमेश्वर के दिव्य पुत्र ने देहधारण कर लिया। और उसका जन्म किसी महल या वैभव में नहीं, बल्कि बैतलहम की एक गुफा के भीतर, पशुओं की चरनी में हुआ था।
जब आप सुसमाचारों में उसके जीवन के बारे में पढ़ते हैं, तो आप देखते हैं कि यीशु ने एक विनम्र जीवन जिया। उसका जीवन विलासिता का या अपनी महिमा का आडंबर और शान-शौकत दिखाने वाला नहीं था, बल्कि विनम्रता से दूसरों से प्रेम करने और उनकी सेवा करने वाला था। यहाँ तक कि उसने अपनी मृत्यु तक दूसरों की सेवा की।
यीशु ने स्वयं कहा, “क्योंकि मनुष्य का पुत्र इसलिये नहीं आया कि उसकी सेवा टहल की जाए, पर इसलिये आया कि आप सेवा टहल करे, और बहुतों की छुड़ौती के लिये अपना प्राण दे” (मर. 10:45)।
यीशु आया और उसने स्वयं को मृत्यु तक विनम्र किया, यद्यपि वह अब तक जन्मे लोगों में से एकमात्र ऐसा व्यक्ति था, जो मृत्यु के योग्य नहीं था। परन्तु जैसा यीशु ने कहा, उसकी मृत्यु का एक उद्देश्य था। आप देखिए, यीशु की मृत्यु किसी अच्छे नैतिक शिक्षक का दु:खद अन्त नहीं थी। यीशु एक कारण से मरने आया था—और उसकी मृत्यु का एक उद्देश्य था।
यीशु की मृत्यु एक विकल्प के रूप में हुई थी। वह दूसरों के स्थान पर मरा। वह दूसरों की छुड़ौती के लिए मरा। अपनी मृत्यु में, यीशु ने उस दण्ड का भुगतान किया, जिसके पात्र पापी लोग थे।
यीशु ने ऐसा इसलिए किया, ताकि हम उस वस्तु का आदान-प्रदान कर सकें, जो आधिकारिक तौर पर हमारी है (और वह हमारे पाप के कारण परमेश्वर का क्रोध है) और उस वस्तु से आदान-प्रदान कर सकें, जो आधिकारिक तौर पर उसकी है (परमेश्वर के साथ एक सिद्ध रिश्ता, जो एक शुद्ध हृदय से उत्पन्न होता है)। यीशु इसे सम्भव बनाता है, जिससे कि अब तक की सबसे उत्तम अदला-बदली हो सके—जो हमारे पाप के बदले यीशु की सिद्धता है।
यीशु ने विनम्रता में होकर, मूर्तिपूजक और अभिमानी लोगों के स्थान पर स्वयं को रख दिया। जिससे कि उसके दु:ख उठाने से हमें न केवल क्षमा मिल सके, बल्कि हम उसकी धार्मिकता को भी प्राप्त कर सकें।
हमारे लिए यह संदेश समझना और उस पर स्वयं प्रतिक्रिया देना अत्यंत मौलिक है। असल में, इस अध्याय में (कम से कम लम्बे समय के लिए) और कुछ भी प्रभावी नहीं होगा, जब तक कि यह नींव हमारे जीवन में स्थापित न हो जाए।
अत:, फिर से याद करें कि: अहंकार में परमेश्वर के स्थान पर स्वयं को स्थापित करने की हमारी समस्या का समाधान यह है कि यीशु विनम्रता में हमारे स्थान पर स्वयं को प्रस्तुत करे।
और तब पर भी, आपको यह जानने के लिए बहुत लम्बे समय से मसीही होने की आवश्यकता नहीं है कि पाप अभी भी बना हुआ है। और यही बात अहंकार के लिए भी सच है। मसीही लोग अभी भी अहंकार से संघर्ष करते हैं। और ऐसा इसलिए है, क्योंकि अहंकार फिसलन भरा और हठी, दोनों ही प्रकार का होता है।
यद्यपि यीशु ने हमारे पापों की क्षमा के लिए वह सब कुछ कर दिया है, जो आवश्यक था, फिर भी स्वर्ग के इस पार रहते हुए, हमें अपने जीवन में प्रतिदिन इसे समाप्त करने का प्रयास करते रहना चाहिए। मसीही होने के नाते, हमें उस वस्तु को समाप्त करने के लिए बुलाया गया है, जो हमारे भौतिक स्वभाव का हिस्सा है (कुलु. 3:5)। और हमें “डरते और काँपते हुए अपने अपने उद्धार का कार्य पूरा” करना है (फिलि. 2:12)।
हाँ, हमारा उद्धार हो चुका है। मसीही होने के नाते, हमारे सभी पाप क्षमा कर दिए गए हैं। परमेश्वर की स्तुति हो! और तब पर भी, इसका यह अर्थ नहीं है कि हम अपने मसीही जीवन में निष्क्रिय हो सकते हैं। नहीं, हमें काम करना है। परमेश्वर के अनुग्रह से, हमें अहंकार से लड़ना है।
अत:, व्यावहारिक रूप से, अहंकार को समाप्त करने का प्रयास करना कैसा दिखता है? हम अपने जीवन में ऐसा मार्ग कैसे चुन सकते हैं, जो उससे पूरी तरह दूर रहे?
यहाँ चार ऐसे तरीके दिए गए हैं, जिनसे हम सभी अपने जीवन में अहंकार से दूर रहने का प्रयास कर सकते हैं और विनम्रता का जीवन अपना सकते हैं।
1. ऊपर देखें, नीचे नहीं
सबसे पहले, जैसे-जैसे हम अपनी आँखें परमेश्वर पर लगाते हैं, हमारे जीवन में विनम्रता बढ़ती चली जाती है। दूसरे शब्दों में कहें, तो हमें हमेशा ऊपर देखना चाहिए, नीचे नहीं। सी.एस. लुईस ने कहा था, “एक अहंकारी मनुष्य हमेशा वस्तुओं को और लोगों को नीचा दिखाता है: और, स्पष्ट है कि जब तक आप नीचे देखते रहेंगे, आप उस वस्तु को नहीं देख पाएँगे, जो आपसे ऊपर है।”5
अब, स्पष्ट है कि इसका अर्थ यह नहीं है कि हमें सचमुच में भूमि की ओर नहीं, केवल ऊपर आसमान की ओर ही देखते रहना चाहिए और ऐसा करना अजीब और कुछ हद तक खतरनाक हो सकता है। नहीं, इसका अर्थ यह है कि हमें अपने हृदय की आँखें अपने आसपास के लोगों के बजाय परमेश्वर पर अधिक लगाए रखनी चाहिए।
आप देखिए कि हमारे विचार और हमारी भावनाएँ उसी की ओर निर्देशित होनी चाहिए। और जब हम ऐसा करते हैं, तो उसकी महिमा और अनुग्रह के प्रकाश में मनुष्य के विचार और बड़ाई अजीब तरह से धुँधली पड़ जाती हैं।6
अब वापस नबूकदनेस्सर पर आते हैं; हम दानिय्येल 4 अध्याय में देखते हैं कि जब उसने अपनी आँखें स्वर्ग की ओर उठाईं और यह स्वीकार किया कि केवल परमेश्वर ही सर्वशक्तिमान है, तब उसका जीवन उसे वापस मिल गया।
ध्यान दीजिए कि दानिय्येल 4 अध्याय के अन्त में नबूकदनेस्सर क्या कहता है:
उन दिनों के बीतने पर, मुझ नबूकदनेस्सर ने अपनी आँखें स्वर्ग की ओर उठाईं, और मेरी बुद्धि फिर ज्यों की त्यों हो गई; तब मैं ने परमप्रधान को धन्य कहा, और जो सदा जीवित है उसकी स्तुति और महिमा यह कहकर करने लगा: उसकी प्रभुता सदा की है, और उसका राज्य पीढ़ी से पीढ़ी तक बना रहनेवाला है। पृथ्वी के सब रहनेवाले उसके सामने तुच्छ गिने जाते हैं, और वह स्वर्ग की सेना और पृथ्वी के रहनेवालों के बीच अपनी ही इच्छा के अनुसार काम करता है; और कोई उसको रोककर उस से नहीं कह सकता है, “तू ने यह क्या किया है?”
—दानि. 4:34-35
जब नबूकदनेस्सर ने स्वयं को देखा, और नीचे दूसरे लोगों को देखा, तो उसका हृदय अहंकार से फूल गया, जिसके कारण उसका विनाश हो गया। परन्तु जब उसने परमेश्वर की ओर ऊपर देखा और उसकी महिमा एवं महानता पर ध्यान लगाया, तो उसका मानसिक संतुलन और उसका राज्य उसे वापस मिल गया।
एक बार फिर, नबूकदनेस्सर हमारे लिए एक उदाहरण है।
यहाँ मुख्य बात यह है कि हम परमेश्वर की महानता में इतने लीन हो जाएँ कि हमारे जीवनों में अहंकार के लिए कोई जगह ही न बचे। हमें अपनी आँखें ऊपर उठाकर उसकी महानता को पहचानना चाहिए, जिससे कि हमारे मन में गलती से भी यह विचार न आए कि हम ही ईश्वर हैं।
सच कहूँ तो, मैंने पाया है कि जब मेरा हृदय परमेश्वर की महानता और महिमा में पूरी तरह से लीन होता है, तो मुझे दूसरों से कम डर लगता है और मैं अहंकार भरा व्यवहार करने की परीक्षा में कम ही पड़ता हूँ।
परन्तु व्यवहारिक रूप से हमारे लिए इसका क्या अर्थ है?
बहुत ही सरल शब्दों में कहें, तो इसका अर्थ प्रभु के साथ अक्सर समय बिताना है, जिससे कि हम उसकी महिमा के बारे में पढ़ सकें और उस पर मनन कर सकें। परमेश्वर के वचन में उसकी महिमा को देखना, जिससे कि हमारी आँखें उसी पर टिकी रहें। और जब हम परमेश्वर के प्रताप, उसकी महिमा और उसकी सामर्थ्य को निहारते हैं, तब हमारी यह माँग कम होती जाती है कि लोग हमारी सेवा करें और हमारी उपासना करें। जब हम इस बात में लीन होते जाते हैं कि वह कितना महान है, तब हमारे इस धोखे में पड़ने की सम्भावना कम हो जाती है कि हम उसके तुल्य हैं।
बाइबल में ऐसे कई खण्ड मिलते हैं, जिन पर हम मनन कर सकते हैं, जिससे कि हम परमेश्वर की महिमा पर ध्यान लगा सकें और हमारी आँखें उसी पर टिकी रहें।
तो फिर क्यों न यशायाह 40 अध्याय, या अय्यूब 38 और 39 अध्याय, या भजन संहिता 8 अध्याय को पढ़ने में और उन पर मनन करने में कुछ समय बिताया जाए? इससे भी बेहतर तो यह होगा कि आप उन खण्डों के कुछ हिस्सों को कंठस्थ कर लें, ताकि आप पूरे दिन परमेश्वर की महिमा की यादों को अपने साथ रख सकें।
और जब आप इन वचनों और अध्यायों पर ध्यान लगाएँ, तो यह प्रार्थना करें कि परमेश्वर की महानता को देखने के लिए आपकी आँखें निरंतर खुली रहें। प्रार्थना करें कि परमेश्वर अपने वचन के द्वारा अपने बारे में और अपनी महानता के बारे में आप पर स्वयं को और अधिक प्रकट करे।
2. अपने पापों को मान लें
दूसरी बात, अपने जीवनों में अहंकार को पराजित करने के लिए, हमें एक-दूसरे के सामने अपने पापों को मान लेना चाहिए। याकूब 5:16 बताता है, “तुम आपस में एक दूसरे के सामने अपने-अपने पापों को मान लो… जिस से चंगे हो जाओ।”
परमेश्वर यह आज्ञा इसलिए नहीं देता, क्योंकि वह चाहता है कि हम हर समय अपने पापों को याद करते रहें, बल्कि इसलिए कि जब हम पाप स्वीकार करते हैं, तो हम परमेश्वर की क्षमा को और भी अधिक जान पाते हैं (1 यूह. 1 वचन)। परमेश्वर की क्षमा को जानने के अलावा, नियमित रूप से अंगीकार करना हमें विनम्रता में बढ़ने में भी सहायता करता है।
अहंकारी लोग शायद ही कभी अपने पापों का अंगीकार करते हैं। अहंकारी लोग हमेशा अपने द्वारा की गई गलतियों के लिए दूसरों पर दोष मढ़ने का प्रयास करते हैं।
परन्तु अपने पापों को मान लेना इस सच्चाई को अपनाने का एक अहम हिस्सा है कि हम ईश्वर नहीं हैं—कि हम सर्वशक्तिमान नहीं हैं—कि हम इस योग्य नहीं हैं कि हमारी आराधना हो और हमारी सेवा की जाए, क्योंकि हम अक्सर इसे गलत समझ लेते हैं। पापों को मान लेना परमेश्वर और अपने आसपास के लोगों के सामने यह स्वीकार करना है कि हम अभी भी सुधार की प्रक्रिया में हैं। दूसरों से स्वयं को दण्डवत् करने के लिए कहने के बजाय, पापों को मान लेना तब होता है, जब हम टूटे हुए मन से प्रभु के सामने दण्डवत् करते हैं।
दूसरों के सामने अपने पापों को मान लेने का अर्थ है कि हम यह दिखावा करना बंद कर सकते हैं कि सब कुछ हमारे नियंत्रण में है। इसका अर्थ है कि हम स्वयं को वास्तविकता से बेहतर दिखाने वाला मुखौटा हटा सकते हैं। और अंगीकार करने के द्वारा, हम अपने पापों के लिए परमेश्वर का अनुग्रह प्राप्त कर सकते हैं और उसका अनुभव कर सकते हैं।
सुसमाचार की याद दिलाते रहना अहंकार का एक बेहतरीन तोड़ है। जैसा कि मिल्टन विंसेंट अपनी उपयोगी पुस्तक अ गोस्पल प्राइमर (A Gospel Primer) में यह तथ्य बताते हैं कि परमेश्वर के पुत्र को मेरे पापों के लिए मरना पड़ा, यह मुझे किसी भी तरह से भला नहीं दिखाता! यह एक विनम्र कर देने वाला विचार है कि मेरे पापों का निपटारा करने के लिए यीशु की मृत्यु की आवश्यकता पड़ी। और यह देखते हुए कि क्रूस संसार के सामने मेरे पापों की गहराई को उजागर करता है, और साथ ही मेरी क्षमा की भी घोषणा करता है, मैं स्वयं को अपने से बेहतर दिखाने का दिखावा करने से बच जाता हूँ।
यहाँ पूछे जाने के योग्य एक अच्छा प्रश्न यह है कि क्या आपकी कलीसिया में आपका किसी ऐसे व्यक्ति के साथ आत्मिक रूप से महत्वपूर्ण रिश्ता है? क्या कोई ऐसा व्यक्ति है, जिसके सामने आप अपने पापों को मान सकें और जो आपको नियमित रूप से परमेश्वर का अनुग्रह याद दिलाता रहे?
आपको अपने पाप हर किसी के सामने मानने की आवश्यकता नहीं है, परन्तु क्या आप किसी एक के सामने उन्हें मान रहे हैं?
और याद रखें कि हमारा अंगीकार सच्चा और विशिष्ट होना चाहिए। यह भी हमें विनम्रता में बढ़ाता है और अपने पाप को सामान्य बातों से छिपाने या उसे कम करके दिखाने के बजाय, हम सच्चाई और खुलेपन से उन सभी का अंगीकार यह जानते हुए कर सकते हैं कि वे सभी यीशु के लहू से ढके हुए हैं।
हे मित्र, अहंकार अकेलेपन में ही पनपता है। परन्तु जब अपने पापों का खुला अंगीकार करते हैं और उन्हें मान लेते हैं और परमेश्वर का अनुग्रह याद करते हैं, तो यह हमारे भीतर विनम्रता को बढ़ाता है।
यदि आपके पास ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है, जिसके साथ आप ऐसा कर सकें, तो प्रार्थना करें कि आपको अपनी कलीसिया में कोई ऐसा व्यक्ति मिल जाए। आप अपने किसी पास्टर के पास जाकर उनसे भी पूछ सकते हैं कि क्या वे किसी ऐसे व्यक्ति को जानते हैं, जिससे आप अपने पापों को मानने, पवित्रशास्त्र पढ़ने, और एक-दूसरे के प्रोत्साहित करने के लिए नियमित रूप से मिल सकें।
3. यीशु की विनम्रता पर विचार करें
इसके बाद, अहंकार से बचने के लिए, हम यीशु की विनम्रता पर विचार कर सकते हैं।
कहा जाता है कि जो लोग नकली नोटों की पहचान करने में माहिर होते हैं, वे उनका अध्ययन करने में अपना समय बर्बाद नहीं करते। वे वहाँ जाली नोटों के अलग-अलग रूपों के बारे में सोचने के लिए नहीं होते। वे ऐसा नहीं करते, वे अपना समय असली नोटों का अध्ययन करने में बिताते हैं। असली और प्रामाणिक वस्तु को जानकर, वे हर तरह की धोखाधड़ी को पहचानने की सबसे अच्छी स्थिति में होते हैं।
मेरे विचार से यहाँ भी यही बात काम करती है। हम अहंकार के अलग-अलग रूपों को देखने में समय बिता सकते हैं। और इसमें निश्चित रूप से कुछ सार्थकता हो सकती है। हालाँकि, विनम्रता विकसित करने के लिए, हम असली बात—अर्थात् यीशु का अध्ययन करने से बेहतर और कुछ नहीं कर सकते। वह यीशु ही है, जो वास्तव में और पूरी तरह से, बाकी सबसे बढ़कर विनम्र था।
हाँ, यीशु ही हमारा उद्धारकर्ता है; वही है, जो हमें नया हृदय दे सकता है, और वही हमारा नमूना भी है। हमें उसी के पीछे हो लेना है।
मसीह का अनुकरण करने के बारे में पतरस कहता है,
“और तुम इसी के लिये बुलाए भी गए हो, क्योंकि मसीह भी तुम्हारे लिये दु:ख उठाकर तुम्हें एक आदर्श दे गया है कि तुम भी उसके पद-चिह्नों पर चलो। न तो उसने पाप किया और न उसके मुँह से छल की कोई बात निकली।”—1 पत. 2:21-22
और फिलिप्पियों 2 अध्याय में पौलुस हमें यीशु जैसी ही सोच रखने के लिए कहता है, विशेष रूप से उसकी विनम्रता में:
“अत: यदि मसीह में कुछ शान्ति, और प्रेम से ढाढ़स, और आत्मा की सहभागिता, और कुछ करुणा और दया है, तो मेरा यह आनन्द पूरा करो कि एक मन रहो, और एक ही प्रेम, एक ही चित्त, और एक ही मनसा रखो। विरोध या झूठी बड़ाई के लिये कुछ न करो, पर दीनता से एक दूसरे को अपने से अच्छा समझो। हर एक अपने ही हित की नहीं, वरन् दूसरों के हित की भी चिन्ता करे। जैसा मसीह यीशु का स्वभाव था वैसा ही तुम्हारा भी स्वभाव हो; जिसने परमेश्वर के स्वरूप में होकर भी परमेश्वर के तुल्य होने को अपने वश में रखने की वस्तु न समझा। वरन् अपने आप को ऐसा शून्य कर दिया, और दास का स्वरूप धारण किया, और मनुष्य की समानता में हो गया। और मनुष्य के रूप में प्रगट होकर अपने आप को दीन किया, और यहाँ तक आज्ञाकारी रहा कि मृत्यु, हाँ, क्रूस की मृत्यु भी सह ली। इस कारण परमेश्वर ने उसको अति महान् भी किया, और उसको वह नाम दिया जो सब नामों में श्रेष्ठ है, कि जो स्वर्ग में और पृथ्वी पर और पृथ्वी के नीचे हैं, वे सब यीशु के नाम पर घुटना टेकें; और परमेश्वर पिता की महिमा के लिये हर एक जीभ अंगीकर कर ले कि यीशु मसीह ही प्रभु है।”—फिलि. 2:5-11
यीशु हमारा उद्धारकर्ता और हमारा उदाहरण है। वह हमें अनुसरण करने के लिए विनम्रता का एक उदाहरण देता है। अपने जीवन, मृत्यु और पुनरुत्थान के द्वारा, उसने हमें दिखाया है कि सच्ची विनम्रता का जीवन कैसा होता है।
अत:, हम यीशु की विनम्रता पर कैसे विचार करते हैं?
ऐसा करने का एक प्रभावी तरीका है, सुसमाचार वृत्तांतों को पढ़ना, और जब आप ऐसा करते हैं, तो इस बात पर विचार करें कि यीशु महान विनम्रता को किस प्रकार प्रदर्शित करता है। विचार करें कि वह अपने आसपास के लोगों के साथ कितने कोमल और धीरजवन्त तरीके से व्यवहार करता है। कैसे वह समाज से बहिष्कृत या अलग-थलग किए गए लोगों को भी अपना समय और ध्यान देने से नहीं चूकता। कैसे उसने दूसरों की सेवा करने के लिए अपने आराम और एकांत की इच्छाओं का त्याग कर दिया। कैसे वह अपने चेलों के साथ कठोरता से बात करने के बजाय उनके साथ धीरजवन्त तरीके से व्यवहार करता है।
यीशु और उसकी विनम्रता का अध्ययन करें। और प्रार्थना करें कि जब आप ऐसा करते हैं, तो आपका जीवन आपके उद्धारकर्ता के जीवन को और भी अधिक प्रतिबिम्बित करे। प्रार्थना करें कि जब आप पढ़ते हैं, तो परमेश्वर आपको मसीह जैसा बनने में और अधिक बढ़ाए। केट विल्किंसन के उस उत्तम भजन के शब्दों में प्रार्थना करें:
मेरे उद्धारकर्ता मसीह का मन,
प्रतिदिन मुझमें वास करे,
उसके प्रेम और सामर्थ्य से नियंत्रित होकर,
जो कुछ भी मैं करता और कहता हूँ।
4. दूसरों की सेवा चुपचाप करें
अन्त में, विनम्रता विकसित करने और अहंकार से दूर रहने का एक तरीका यह है कि आप दूसरों की सेवा करने के प्रति सचेत रहें। और ऐसा चुपचाप करने के लिए, परदे के पीछे रहने वाले तरीके अपनाएँ।
संयुक्त राज्य में, एक संक्षिप्त नाम BNOC है, जिसे मैंने हाल ही में अपनी कलीसिया के छात्रों से सीखा। इसका अर्थ है Big Name on Campus (परिसर में बड़ा नाम)। मूल रूप से, परिसर में कुछ ऐसे छात्र होते हैं, जिन्हें हर कोई जानता है। वे खेल-कूद वाले दलों में होते हैं और सामाजिक कार्यक्रमों में भी काफी लोकप्रिय होते हैं। यदि आपको BNOC का तमगा मिल जाए, तो आपने सफलता प्राप्त कर ली है।
हालाँकि, अपने छात्रों के साथ हुई उस बातचीत ने मुझे एक दूसरे संक्षिप्त नाम के बारे में सोचने पर विवश कर दिया: BNIH—Big Name in Heaven (स्वर्ग में बड़ा नाम)। मेरे विचार से कुछ ऐसे लोग भी होते हैं, जिन्हें इस संसार में कोई नहीं जानता, परन्तु स्वर्ग में हर कोई उनके बारे में बातें करता है। इस जीवन में जो लोग लोकप्रिय हैं, वे शायद उन्हें नीची दृष्टि से देखें, परन्तु वे पूरी विश्वासयोग्यता के साथ प्रभु की सेवा करते हैं।
अब मैं आपको एड के बारे में बताता हूँ। एड 60 वर्षों तक हमारी कलीसिया के सदस्य रहे। सांसारिक दृष्टिकोण से देखें, तो एड कोई बहुत विशेष मनुष्य नहीं थे। वे एक शान्त और सीधे-सादे मनुष्य थे।
और हर सप्ताह, वे हमारी कलीसिया के बाहर खड़े होकर, सड़कों से आने-जाने वाले लोगों को हमारी प्रार्थना सभा में आने के लिए आमंत्रित करते थे। वे अक्सर कलीसिया के ऐसे कामों के लिए भी अपनी मर्जी से आगे आते थे, जिन्हें कोई और नहीं करता था और वे पूरी विश्वासयोग्यता के साथ बहुत ही सादगी में अपनी सेवा देते थे। मैं एड को एक BNIH मानता हूँ। वे एक ऐसे मनुष्य थे, जिनके बारे में यह संसार शायद अधिक न सोचता हो, परन्तु स्वर्ग में जिनके जयकार लग रहे हों।
अब फिर से, हमें प्रभु की सेवा करने हेतु इसलिए बुलाया गया है क्योंकि वह इसके योग्य है। हालाँकि, जब हम दूसरों की सेवा करने के प्रति सचेत होते हैं, तो हमारी अपनी विनम्रता बढ़ती है। स्वयं को ऊँचा उठाने और अपनी सेवा करवाने की माँग करने के बजाय, जब हम जानबूझकर दूसरों की सेवा करने का प्रयास करते हैं (भले ही हमारा मन हमेशा इसके लिए तैयार न हो), तो हम स्वयं को याद दिलाते हैं कि इस संसार के मुख्य व्यक्ति हम नहीं हैं। हम स्वयं को दूसरों की याद दिलाते हैं और अपने हृदयों को उनकी सेवा करने और उनकी देखभाल करने के लिए प्रशिक्षित करते हैं।
और इसलिए, यहाँ रुककर यह सोचना अच्छा है कि आप दूसरों की सेवा कैसे कर रहे हैं। क्या ऐसे कोई तरीके हैं, जिनसे आप अपनी कलीसिया की सेवा करने का प्रयास कर सकते हैं, विशेष रूप से जो अनदेखे तरीके हों?
शायद यह पौधशाला में सेवा करना हो, या शौचालय साफ करने के लिए स्वयं-सेवा देनी हो। शायद इसमें यह देखना हो कि आप किसी ऐसे परिवार या व्यक्ति को कैसे आशीष दे सकते हैं, जिसके बारे में आप जानते हैं कि वह किसी मुश्किल समय से होकर गुजर रहा है। दूसरों की सेवा करने के लिए अपना समय और संसाधन देना, विनम्रता में बढ़ने का एक अद्भुत तरीका है।
और वास्तव में, दूसरों की सेवा करने में एक बहुत ही आनन्ददायक बात यह जानना है कि स्वर्ग में विराजमान आपका पिता ही एकमात्र वह व्यक्ति है, जो इसे देखता है, और वह मुस्कुरा रहा है।
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मनन के लिए प्रश्न:
- आपके हृदय की आँखें परमेश्वर की महिमा से और अधिक कैसे भर सकती हैं?
- क्या आपकी कलीसिया में कोई ऐसा व्यक्ति है, जिसके सामने आप अपने पापों को मान सकते हैं? यदि नहीं, तो प्रार्थना करें कि प्रभु आपको किसी व्यक्ति के साथ ऐसा रिश्ता प्रदान करे।
- सोचिए कि इस सप्ताह आप अपनी कलीसिया में किसी की सेवा ‘पर्दे के पीछे’ से किन 3 तरीकों से कर सकते हैं।
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निष्कर्ष
जैसे-जैसे हम इस क्षेत्रीय मार्गदर्शिका के अन्त की ओर पहुँच रहे हैं, मेरी प्रार्थना है कि आपका हृदय न केवल अहंकार और विनम्रता के विषय के ज्ञान से, बल्कि उस परमेश्वर के द्वारा जो सब कुछ नया कर रहा है, बदले जाने की इच्छा से भी प्रेरित हुआ हो।
अहंकार सूक्ष्म, लगातार बना रहने वाला और धोखेबाज होता है, परन्तु परमेश्वर की स्तुति हो कि यह उसके अनुग्रह से अधिक शक्तिशाली नहीं है। हे मित्र, यीशु अभिमानियों के लिए मरने आया था। वह हमें हमारी आत्म-पर्याप्तता, हमारे आत्म-महिमान्वन और हमारी आत्म-निर्भरता से बचाने आया था।
मुझे आशा है कि आपने यह देख लिया होगा कि अहंकार से बचने का अर्थ केवल अपने बाहरी व्यवहार को बदलना नहीं है, परन्तु इसका अर्थ यीशु मसीह की वह बदलने वाली सामर्थ्य है, जो हमारे भीतर काम करती है। सबसे पहले, वह हमें पश्चाताप और विश्वास के द्वारा नये हृदय देता है, और फिर जब हम अपने जीवन की उन सभी बातों को जान-बूझकर जड़ से उखाड़ फेंकने का प्रयास करते हैं, जो उसके विपरीत हैं, तो वह हमारी सहायता करता है। और उसने प्रतिज्ञा की है कि जो काम उसने हमारे भीतर आरम्भ किया है, उसे वह तब तक पूरा करेगा, जब तक कि हमारे भीतर थोड़ा सा भी अहंकार बाकी न रह जाए।
हमने इस बात पर विचार किया है कि कैसे मसीह ने स्वयं को विनम्र बनाया और फिर वह ऊँचा उठाया गया। और यही तरीका उन लोगों के लिए भी है, जो परमेश्वर के शक्तिशाली हाथ के नीचे स्वयं को विनम्र बनाते हैं। जिस तरह अहंकार के सांसारिक और अनन्त, दोनों तरह के दुष्परिणाम होते हैं, उसी तरह विनम्रता के भी होते हैं।
जो लोग इस जीवन में विनम्र होते हैं, वे चमकते-दमकते रहते हैं, क्योंकि वे परमेश्वर को बहुत अधिक महत्व देते हैं और उसी को प्रतिबिम्बित करते हैं। और ऐसा नहीं है कि हम विनम्रता के दुष्परिणाम केवल इसी जीवन में देखते हैं। परमेश्वर ने अपने वचन में जो प्रतिज्ञा की है, वह यह है कि विनम्र लोगों को सही समय आने पर ऊँचा उठाया जाएगा (याकू. 4:10)। विनम्रता परमेश्वर की महिमा करती है—और इसका परिणाम उससे अनन्त महिमा प्राप्त होते में मिलता है।
यही वह मार्ग है, जिस पर चलने के लिए हमें बुलाया गया है। आशीष और आनन्द का मार्ग यही है।
इस क्षेत्रीय मार्गदर्शिका को एक और राजा—राजा दाऊद—की प्रार्थना के साथ समाप्त करना उचित जान पड़ता है। 1 इतिहास 29 अध्याय में, हम राजा दाऊद के शासनकाल के अन्त में पहुँचते हैं। लोग इकट्ठा थे और उन्होंने मन्दिर के निर्माण में अपना योगदान दिया था। और इस समय पर, दाऊद अहंकारी होने की परीक्षा में आसानी से पड़ सकता था। और तब पर भी उसने यह स्वीकार किया कि मन्दिर बनाने के लिए सभी संसाधन और इच्छा-शक्ति उसकी ओर से या लोगों की ओर से नहीं, परन्तु परमेश्वर की ओर से आई थी।
इस प्रार्थना में, दाऊद इस बात पर जोर देता है कि सब कुछ परमेश्वर का ही है, और लोगों द्वारा दी गई भेंटों का अर्थ तो बस परमेश्वर को वही वस्तुएँ वापस लौटाना हैं, जो पहले से ही उसकी हैं। आइए, दाऊद को अन्तिम शब्द कहने का समय दें।
तब दाऊद ने सारी सभा के सम्मुख यहोवा का धन्यवाद किया, और दाऊद ने कहा, “हे यहोवा! हे हमारे मूल पुरुष इस्राएल के परमेश्वर! अनादिकाल से अनन्तकाल तक तू धन्य है। हे यहोवा! महिमा, पराक्रम, शोभा, सामर्थ्य और वैभव, तेरा ही है; क्योंकि आकाश और पृथ्वी में जो कुछ है, वह तेरा ही है; हे यहोवा! राज्य तेरा है, और तू सभों के ऊपर मुख्य और महान् ठहरा है। धन और महिमा तेरी ओर से मिलती हैं, और तू सभों के ऊपर प्रभुता करता है। सामर्थ्य और पराक्रम तेरे ही हाथ में हैं, और सब लोगों को बढ़ाना और बल देना तेरे हाथ में है। इसलिये अब हे हमारे परमेश्वर! हम तेरा धन्यवाद करते और तेरे महिमायुक्त नाम की स्तुति करते हैं।”—1 इति. 29:10-13.
अन्तिम टिप्पणियाँ
- https://www.snopes.com/fact-check/the-obstinate-lighthouse/
- ऑगस्टीन, कंफेशन्स
- सी.एस. लुईस, मेएर क्रिस्चियनिटी
- सी.एस. लुईस, मेएर क्रिस्चियनिटी
- नीति. 3:34, याकू. 4:6, 1 पत. 5:5 सी.एस. लुईस, मेएर क्रिस्चियनिटी
- अपनी आँखें यीशु पर लगाओ।
लेखक के बारे में
जेमी साउथकोम्ब इंग्लैंड के गिल्डफोर्ड में स्थित ग्रेस कलीसिया के पास्टर हैं, जहाँ वे और उनकी पत्नी, ग्रेसी, रहकर अपने चार बच्चों का पालन-पोषण करते हैं।