#58 लालच से बचना: भौतिकवादी संसार में संतोष
परिचय
क्या आप आनन्दित हैं?
यह संतोष पर आधारित जीवन-कौशल मार्गदर्शिका है, परन्तु इसके स्थान पर मैं आन्दन्दित शब्द का उपयोग कर रहा हूँ। संतोष को स्पष्ट रूप से समझना कुछ अधिक कठिन प्रतीत होता है। और वास्तव में संतोष यही है कि अपनी दशा या परिस्थिति में आनन्दित रहना। इसलिए मैं आपसे पूछना चाहता हूँ कि: क्या आप आनन्दित हैं? और अधिक स्पष्ट रूप से कहूँ तो क्या आप अपने जीवन से, जैसे वह अभी है, आनन्दित हैं? यदि आप आन्दनित नहीं हैं, तो मेरा अनुमान है कि इसका कारण यह है कि आपके पास वह कुछ नहीं है जिसे आप चाहते हैं या जिसे आप अपनी आवश्यकता समझते हैं, जैसे नौकरी, जीवनसाथी, सन्तान, घर, वेतनवृद्धि, या एक मित्र। यदि आपके पास ये सब चीजें हैं, तो सम्भव है कि आप सोचते होंगे कि ये सब गलत है। यदि आप के पास इनमें से किसी एक चीज़ का और भी अधिक उत्तम रूप होता तो आप आन्दनित होते।
अब, मैं आपसे एक और प्रश्न पूछता हूँ: यदि आपको वह सब मिल जाए जिसकी आप के पास कमी है (अधिक वेतन वाली नौकरी, बड़ा घर, प्रेम करने वाला/वाली जीवनसाथी, आज्ञाकारी सन्तान, विश्वासयोग्य मित्र, या जो भी आप चाहें), तो क्या इससे आपका आनन्दित होना निश्चित हो जाएगा? क्या आनन्दित होने का उपाय आप स्वयं और वह वस्तु है, जिसकी आप के पास कमी है?
दूसरे शब्दों में कहें तो, क्या आपके और आनन्द के बीच केवल परिस्थितियों में बदलाव ही आड़े आ रहा है?
बॉबी जैमीसन, एक पास्टर, विद्वान और लेखक हैं, जो पास्टर सेवकाई तथा ईश्वर विज्ञान सम्बन्धी लेखन में अपने कार्य के लिए जाने जाते हैं, वह गहरी समझ के साथ यह कहते हैं कि आप दो कारणों में से किसी एक कारण से दुःखी हो सकते हैं—या तो इसलिए कि आपके पास वह नहीं है जिसे आप चाहते हैं, या फिर, ध्यान दीजिए, इसलिए कि आपके पास सब कुछ है और फिर भी आपको लगता है कि वह पर्याप्त नहीं है। [1]
मैं सभोपदेशक की पुस्तक से आपको यह विश्वास दिलाना चाहता हूँ कि प्रसन्नता परिस्थितियों पर निर्भर करने वाली वस्तु नहीं है। मैं विशेष रूप से आपकी सहायता करना चाहता हूँ कि आप प्रसन्नता को अपनी भौतिक संपत्ति से अलग कर दें। आप धनी हों या निर्धन, दोनों ही दशाओं में दुःखी हो सकते हैं। आप धनी हों या निर्धन, दोनों ही दशाओं में आनन्दित भी हो सकते हैं। सरल शब्दों में कहें तो, आनन्द (या सामान्य रूप से जीवन) ऐसी वस्तु नहीं है जिसे प्राप्त किया जा सकता है; यह परमेश्वर का वरदान है।
संतुष्ट रहने की कुंजी यह है कि संसार से अपनी अपेक्षाएँ घटाएँ और परमेश्वर में उन अपेक्षाओं को बढ़ाएँ।
परन्तु पहले, आइए विचार करें कि आप असंतुष्ट क्यों हैं।
ऑडियो मार्गदर्शिका
ऑडियो#58 लालच से बचना: भौतिकवादी संसार में संतोष
भाग I: सम्पूर्ण जगत की खोज
यह कोई आश्चर्य की बात नहीं कि आप आनन्दित नहीं हैं। इससे भी कम आश्चर्य की बात यह है कि आप आनन्दित होना चाहते हैं। सभोपदेशक का लेखक (उपदेशक, जैसा वह स्वयं को कहता है) यह जानने के लिए निकला कि “मनुष्यों के लिए आकाश के नीचे अपने जीवन के थोड़े दिनों में क्या करना अच्छा है” (सभ. 2:3)। परन्तु आनन्द की खोज में ऐसी यात्रा पर निकलने वाला केवल उपदेशक ही नहीं है। परमेश्वर ने सब मनुष्यों को जीवन अथवा आनन्द खोजने का यही कार्य सौंपा है (सभ. 1:13)। आप इसे एक खोज मान सकते हैं।
कल्पना या मिथक के सबसे सामान्य पहलुओं में से एक खोज है। कोई न कोई ऐसी समस्या होती है, जिसका समाधान केवल एक विशेष उद्देश्य के अन्तर्गत ही हो सकता है। रिवेन्डेल में अँगूठी के भविष्य का निर्णय करने के लिए एक सभा बुलाई जाती है। और एलरॉन्ड ठीक ही घोषणा करता है कि इसे माउंट डूम में नष्ट कर देना चाहिए। छोटा फ्रोडो साहसपूर्वक उसे ले जाने के लिए स्वयं आगे आता है, और शेष पूरा तीन नाटकों का समूह है, अर्थात् नाज़गूलों और ऑर्कों के विरुद्ध एक खोज, प्रलोभन और शारीरिक परीक्षाएँ, ये सब मध्य-पृथ्वी को बचने के लिए है।2
सभोपदेशक का पहला आधा भाग मूलतः उपदेशक की खोज है। वह किसी अँगूठी को नष्ट करने या खोया हुआ खजाना वापस पाने के लिए नहीं निकला है। इन सब में सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण बात यह है कि उसकी खोज जीवन में अर्थ और आनन्द के लिए है। और उपदेशक जिस मुख्य साधन का उपयोग करता है, वह बुद्धि है। सभोपदेशक की पुस्तक पूरी रीति से उसके इस प्रयास के विषय में है कि वह अनुभव करे, फिर उसे तौले, उस पर विचार करे, और हमें बताए कि उसने क्या पाया है।
उसने आनन्द की खोज उन सब बातों का पीछा करके और उनका आनन्द लेकर की, जिन्हें परखने के लिए आप भी झुकते हैं। (सभ. 2:1-11)। उसने धन और संपत्तियाँ इकट्ठी कीं। उसने दाखमधु, बुद्धि, मूर्खता और यौन सम्बन्धों का अनुभव किया। उसने उत्सव मनाए। उसने बहुत से लोगों को काम पर रखा। उसकी प्रतिष्ठा और मान-सम्मान बढ़ गया।
आप जो भी कहें, उसके पास सब कुछ था। उसने उसे देखा, चाहा, और प्राप्त किया (सभ. 2:10)। उसने अपने आप से किसी भी चीज़ को नहीं रोका। और जब सब कुछ हो चुका, तब उसने अपने सभी कार्यों पर विचार किया, और पाया कि वह सब “व्यर्थ और वायु को पकड़ना” था (सभ. 2:11)। आपके अनुवाद में “व्यर्थ” या “अर्थहीन” हो सकता है। परन्तु बात यह है कि इससे उसे निराशा हुई।
वास्तव में, यदि आप इस पाठ का अध्ययन करें, तो आप पाएँगे कि इसमें उत्पत्ति 1 और 2 की भाषा लिखी हुई है। मृत्यु, अन्याय, सताव, अकेलापन, नीरसता और हृदय-पीड़ा से भरे इस संसार में, उसने अपने आपको स्वर्गलोक जैसे जीवन के भीतर सीमित कर लिया। उसने अदन को फिर से बनाने का प्रयास किया, लेकिन उस प्रकार की किसी रोक-टोक के बिना जैसे कि “पर भले या बुरे के ज्ञान का जो वृक्ष है, उसका फल तू कभी न खाना” (उत्पत्ति 2:17)। परन्तु परमेश्वर के विपरीत, जिसने अपनी सृष्टि को देखकर उसे “बहुत अच्छा” कहा, उपदेशक ने अपने बगीचे को देखकर उसे बुरा कहा: अर्थात् “व्यर्थ और वायु को पकड़ना”।
ध्यान दें: उसने वह सब कुछ प्राप्त कर लिया था, जिसकी शायद आप भी इच्छा रखते हैं, हो सकता है उससे भी अधिक। यह पर्याप्त नहीं था। हम अधिकाँश इतने निराश इसलिए होते हैं क्योंकि हम उत्पत्ति 3 के संसार में उत्पत्ति 1 को जीने का प्रयास करते हैं। संसार की वस्तुओं में जीवन पाने का प्रयास करना हवा को पकड़ने जैसा है। जिस घड़ी आप उसे पकड़ते हैं, और जैसे ही आप अपने हाथ खोलते हैं तो पाते हैं कि वह आपके हृदय के समान ही खाली है। जीवन की खोज हाथ न आने वाली और क्षणिक है; यह धुएँ को पकड़ने और उसे थामे रखने का प्रयास करने जैसा है।
तो फिर आप असंतुष्ट क्यों हैं? किसी न किसी स्तर पर आप संसार में आनन्द, जीवन, अर्थ और मूल्य खोजने का प्रयास कर रहे हैं। और इस प्रकार से आप हमेशा पीछा करते तो रहते हैं, परन्तु वहाँ तक कभी पहुँच नहीं पाते हैं।
उपदेशक चाहता है कि आप उसके अनुभव से सीखें। स्वाभाविक है कि आप यह सोचने के लिए प्रलोभित होते हैं कि आपके लिए परिणाम अलग होगा। परन्तु आपने अभी तक वही निष्कर्ष इसलिए नहीं निकाला है क्योंकि आपका अनुभव उसके जैसा नहीं है। सच कहें तो, संभवतः आप किसी भी क्षेत्र के शिखर पर नहीं हैं। आपका यह सोचने की ओर झुकाव होता है कि यदि आपको वह वेतन-वृद्धि मिल जाए, यदि आपको वह उपाधि मिल जाए, यदि आपको वह घर मिल जाए, तो आप अंततः आनन्दित हो जाएँगे, क्योंकि आपके पास अभी भी पाने के लिए बहुत कुछ शेष है। उपदेशक के पास वह बहाना नहीं था, और इसी कारण वह आनन्द की खोज में एक आदर्श जाँच करने वाला व्यक्ति ठहरा।
आपके जीवन की सभी खोजों की तुलना एक घुमावदार सीढ़ी पर चढ़ने से की जा सकती है—हर क्षेत्र में लोग आपसे आगे होते हैं, परिश्रम थका देने वाला होता है, क्योंकि सीढ़ियाँ धुमावदार होती हैं, आप यह नहीं देख पाते कि अन्त तक कब पहुँचेंगे। हमेशा और अधिक पैसा कमाने की सम्भावना बनी रहती है, अधिक अनुयायी बनाने की चाह रहती है, यौन सम्बन्धों की खोज रहती है, और नई तकनीकें खरीदने का आकर्षण बना रहता है। आप अपने से आगे चल रहे लोगों का अनुसरण यह सोचकर करते हैं, कि उनके समान आप भी शीघ्र ही शिखर तक पहुँच जाएँगे, लेकिन आप कभी वहाँ तक नहीं पहुँच पाते हैं।
उपदेशक के पास आपकी समस्या नहीं थी। वह हर सीढ़ीदार पड़ाव पर सबसे आगे चल रहा था, और उसके तथा सबसे निकट पीछे चलने वाले के बीच इतनी दूरी थी कि वह देख सकता था, कि वह अभी भी गंतव्य के निकट नहीं पहुँचा है। वह अपने अनुभव पर इस प्रकार से विचार कर रहा था, जैसे बहुत कम लोग कर पाते हैं: क्या एक और सम्पत्ति वह कर पाएगी, जो पिछली 30 सम्पत्तियाँ नहीं कर पाई थीं? क्या मैं सचमुच केवल एक और उपलब्धि के अवसर भर दूर हूँ, जहाँ पहुँचकर मैं संतुष्ट हो जाऊँगा? एक रखैल। और एक घरेलू नौकर। उसे यह समझ आने लगा था कि ताल-मेल नहीं बैठ पा रहा है।
ब्लेज़ पास्कल कहते हैं कि यह हमेशा प्रयास करते रहने पर भी, कभी न पहुँच पाने का अनुभव “इतना व्यापक है कि यह निश्चय ही हमें इस बात का विश्वास दिलाता है कि हम अपने स्वयं के प्रयासों से भलाई तक पहुँचने में असमर्थ हैं। परन्तु उदाहरण हमें बहुत कम सिखाता है… और इस प्रकार, जहाँ वर्तमान हमें कभी संतुष्ट नहीं कर पाता, वहीं अनुभव हमें धोखा देता है, और एक विपत्ति से दूसरी विपत्ति की ओर ले जाते हुए अंततः हमें मृत्यु तक पहुँचा देता है।”3
जब तक कि आपकी मृत्यु नहीं हो जाती तब तक आप सीढ़ियाँ ही चढ़ते रहते हो, परन्तु कहीं पहुँच नहीं पाते हो। सूर्य के समान, आप हर दिन अपनी शुरुआत के स्थान पर हाँफते हुए लौट आते हो, पर कभी रुककर यह नहीं पूछते कि क्या आप कहीं पहुँचे भी हो (सभ 1:5)। आप नहीं पहुँच पाते हो।
अतः मुझे आपसे यह पूछना है कि यदि आपको वह सब कुछ मिल जाए जो आप चाहते हो, तो क्या उससे आपका आनन्दित होना निश्चित हो जाएगा?
नहीं होगा। ऐसा हो ही नहीं सकता है।
उपदेशक के पास वह सब कुछ था (वह सब जो आप भी चाहते हैं), और उसने देखा कि वह सब पर्याप्त नहीं है।
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चिन्तन के लिए प्रश्न:
- क्या कभी ऐसा हुआ है कि आपको वह वस्तु मिल गई हो जिसकी आपको सबसे अधिक चाहत थी, परन्तु बाद में आपको एहसास हुआ हो कि वह पर्याप्त नहीं है? उस समय आपको कैसा महसूस हुआ था?
- आपके जीवन के इस समय में संतोष को विकसित करना आपको कैसा दिखाई देता है?
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भाग II: स्थान और समय से परे
तो यह स्पष्ट है कि परमेश्वर ने ही आनन्द की इस विश्वव्यापी खोज को ठहराया है, पर कैसे? जहाँ तक मेरी बात है, मुझे तो स्मरण नहीं है कि इस काम के लिए मैं ‘स्वर्ग के मानव संसाधन विभाग’ के साथ कभी बैठा था।
परमेश्वर ने इसे हमारे भीतर गहराई से रच दिया है। उसने आपको इसी प्रकार बनाया है।
जीवन के बदलते हुए समय पर एक कविता सुनाने के बाद (जो अन्तिम संस्कार में और बर्ड्स का गीत “बदलाव! बदलाव! बदलाव!” के कारण लोकप्रिय हुई), उपदेशक बताता है कि समय के भीतर जीवन हमें इतना निराशाजनक क्यों लगता है।
पहले, वह दोहराता है कि परमेश्वर ने आदम की सन्तानों को यह कार्य (कि क्या करना अच्छा है, इसे खोजें) दिया, ताकि वे उसमें लगे रहें (सभ. 3:10)। यह अपने स्वभाव से ही निराशा जनक कार्य है, क्योंकि जैसा कि उसके समय की सूची दिखाती है, कि जीवन जन्म से आरम्भ होता है और मृत्यु पर समाप्त हो जाता है। इससे भी बढ़कर, इनके बीच का सब कुछ इन दोनों के बीच झूलते रहने जैसा प्रतीत होता है। जीवन बोने और उखाड़ने, घात करने और चंगा करने, ढाने और बनाने, रोने और हँसने, छाती पीटने और नाचने, गले लगाने और अलग हो जाने, और ऐसी ही बहुत-सी बातों से मिलर बना है (सभ. 3:1-8)।
हम चाहते हैं कि पूरा जीवन हँसते-नाचते, अर्थात आनन्द के साथ बीते। परन्तु जीवन अधिकतर ऐसा होता है जैसे किसी विवाह में अपने प्रिय जन के साथ नाचना, और फिर इस बात पर रोना कि जिस व्यक्ति के साथ आप नाच रहे थे उसकी मृत्यु हो गई है।
संसार की बिखरी हुई दशा हमारे असंतोष को और बढ़ा देती है। जिन बातों को हम अपने आनन्द के लिए आवश्यक समझते हैं, वे बहुत बार हमसे छीन ली जाती हैं। और हम चाहे कितना भी प्रयास कर लें, परन्तु हम उन्हें हमसे छीने जाने से रोक नहीं सकते हैं (सभ. 3:14)।
निस्संदेह, इसी कारण यीशु हमें बताता है कि हम अपने लिए पृथ्वी पर धन इकट्ठा न करें, जहाँ कीड़ा, जंग और चोर उसे नष्ट करते और चुरा लेते हैं, परन्तु स्वर्ग में धन इकट्ठा करो (मत. 6:19-20)। जब हम खो देते हैं, तब जो निराशा का अनुभव हम करते हैं, वह निराशा हमें संसार और अपने विषय में कुछ सिखाने के लिए होती है। मेरी कलम को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि उसका उपयोग हो रहा है, या वह दूसरी कलमों के साथ दराज़ में पड़ी है, या खो गई है या मिल गई है। परन्तु आपको फर्क पड़ता है। क्योंकि परमेश्वर ने आपको कुछ भिन्न रीति से बनाया है।
अपने चारों ओर के समय पर अपनी कविता सुनाने के बाद, और मनुष्य की सामान्य प्रवृत्ति (जीवन की विश्वव्यापी खोज) को दोहराने के पश्चात, उपदेशक अंततः यह बताता है कि ऐसा क्यों है—अर्थात् हमारे भीतर का “समय” इस भावना से मेल खाता है:
परमेश्वर ने “मनुष्यों के मन में अनादि-अनन्तकाल का ज्ञान उत्पन्न किया है” (सभ.3:11)।
परमेश्वर ने आपको भिन्न बनाया है, और इसी कारण आप अपने चारों ओर की हर वस्तु से भिन्न हैं।
द लायन किंग में एक प्रसिद्ध दृश्य है, जो तब आता है, जब सिम्बा को उसके लोगों के प्रति उसकी ज़िम्मेदारी की कमी को लेकर उसका सामना करता है। क्योंकि वह अपने पिता की मृत्यु का दोष, अपनी पहचान को लेकर अपनी उलझन, और अपने लोगों के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी से जूझ रहा होता है।
मुफासा बादलों में सिम्बा के सामने प्रकट होता है और अपने पुत्र को पुकारता है (इसे जेम्स अर्ल जोन्स के समान पढ़ने का प्रयास करें):
सिम्बा, तुम मुझे भूल गए हो। तुम भूल गए हो कि तुम कौन हो, इसलिए तुम मुझे भूल गए हो। अपने भीतर झाँको, सिम्बा। तुम उससे कहीं अधिक हो, जो तुम बन गए हो। तुम्हें जीवन के चक्र में अपना स्थान लेना होगा। स्मरण करो कि तुम कौन हो। तुम मेरे पुत्र हो। एकमात्र सच्चा राजा—स्मरण रखना।
मुफासा सिम्बा को उसके भीतर और अतीत की ओर देखने के लिए पुकारता है, ताकि उसे वर्तमान के प्रति जागृत कर सके। सिम्बा जो है और जिस प्रकार से वह जी रहा है, उसके बीच एक असमानता है। यदि वह अपने भीतर और पीछले जीवन की ओर देखेगा, तो उसे पता चलेगा कि यह सच है।
क्या आप जानते हैं कि संसार के इतिहास में कितने शेरों ने अस्तित्व से जुड़ी बेचैनी में तारों की ओर देखा है? कितने मीरकैट (छोटे रेगिस्तानी नेवले जैसे पशु) ने कभी यह सोचा है कि वे क्या हैं? कितने जंगली सूअरों को अपनी पहचान स्मरण करनी पड़ी है?
किसी ने भी कभी नहीं सोचा, न ही स्मरण किया है।
क्या आप जानते हैं कि कितने स्वस्थ वयस्कों ने जीवन के अर्थ पर विचार किया है? हम में से कितने लोगों ने यह सोचा है कि, “इन सबका अर्थ क्या है?” कितने लोगों ने यह जानने का प्रयास किया है कि, “मैं यहाँ क्यों हूँ?” कितनों ने यह पूछा है कि, “जब हमारी मृत्यु होती है तो क्या होता है?”
क्या आप जानते हैं कि इतिहास में कितनी संस्कृतियों ने जीवन के अर्थ से जुड़े हुए प्रश्नों के उत्तर खोजने का प्रयास किया है: जैसे कि हम यहाँ कैसे आए? हम कहाँ जा रहे हैं? परिस्थितियाँ जैसी होनी चाहिए वैसी क्यों नहीं हैं? क्या और कैसे सब कुछ फिर से ठीक किया जाएगा?
मानव जाति पृथ्वी पर अपने दुःख के कारण सामूहिक रूप से कराहती है। वह जानती है कि उसे उससे कहीं अधिक पाने के लिए बनाया गया था, जितना कि यह संसार उसे देता है।
आप देखिए, कि सभी प्राणी समय के अनुसार जीते हैं। आप एक पत्थर के अस्तित्व को भी समय के माध्यम से माप सकते हैं। आप एक पौधे के जीवन को भी समय के माध्यम से माप सकते हैं। आप एक कुत्ते के जीवन को भी समय के माध्यम से माप सकते हैं। सभी सृजित वस्तुएँ समय पर पूरी होती हैं, लेकिन मनुष्य इस सम्बन्ध में अद्वितीय है क्योंकि किसी रहस्यमय तरीके से समय स्वयं उसके भीतर रख दिया गया है।
इस ग्रह पर एकमात्र जीवित प्राणी जो असंतुष्ट है, वह मनुष्य है; क्योंकि परमेश्वर ने हमें उससे कहीं अधिक के लिए बनाया है, जितना कि हमारे पास अभी है। कुत्ता अपनी हड्डी से संतुष्ट है। पौधे के पास अपना प्रकाश है। लेकिन हमें उससे अधिक के लिए बनाया गया है, जितना भौतिक संसार दे सकता है।
आप के द्वारा निरंतर प्रयास करने पर भी वह कभी पूरी न होने वाली आनन्द की खोज (अपने अन्दर झाँकना) आपको इस समझ तक पहुँचा सकती है कि जब आप पीछे मुड़कर देखते हैं, तो आप यह जान जाते हैं कि हमें बहुत अधिकता के लिए बनाया गया है।
पास्कल लिखते हैं कि अपने आस-पास की वस्तुओं से स्वयं को संतुष्ट न कर पाने की हमारी अयोग्यता से हमें यह निष्कर्ष निकालना चाहिए कि “कभी मनुष्य में एक सच्चा आनन्द हुआ करता था, जिसका अब उसके पास केवल एक चिन्ह और खालीपन ही रह गया है; और जिसे वह अपने आस-पास की हर वस्तु से भरने का व्यर्थ प्रयास करता रहता है…परन्तु ये सभी अपर्याप्त हैं, क्योंकि उस अनन्त खाई को केवल एक अनन्त, कभी न बदलने वाला ही भर सकता है—अर्थात् स्वयं परमेश्वर ही भर सकता है।”4
एक और वेतन-वृद्धि, एक अलग से घर, या सोशल मीडिया पर अधिक अनुयायी पाकर संतुष्ट होने का प्रयास, ठीक वैसा ही है जैसे कोई एक-एक करके या उससे भी बेहतर, शून्य को आपस में जोड़कर अनन्त तक पहुँचने का प्रयास करता है। यह जोड़ कभी भी मेल नहीं
खाता है।
यदि आप आनन्दित नहीं हैं, तो संभवतः इसका कारण यह है कि आप सोचते हैं कि आपके पास किसी न किसी वस्तु की कमी है। जिस कमी को आप महसूस करते हैं, उसे संसार की भौतिक वस्तुओं से तथा बहुतायत से प्राप्त करके पूरा नहीं किया जा सकता है। शुरुआत के लिए इतना समझ लीजिए कि मृत्यु यह सुनिश्चित कर देगी कि यह सब आपसे छीन लिया जाएगा। आपको परमेश्वर के लिए बनाया गया है, और आपका हृदय इस बात को जानता है।
परमेश्वर ने आपके मन में अनन्तता को रख दिया है। यह परमेश्वर का ज्ञान है, परन्तु यह एक स्मृति के समान है। हम इसकी तुलना घर का स्मरण आने से कर सकते हैं। मुझे विश्वास है कि बचपन का कोई ऐसा स्मरण होगा, जब आपको दादा-दादी के घर, या किसी चचेरे भाई-बहन के घर, या किसी मित्र के घर छोड़ दिया गया हो। आरम्भ में तो बहुत आनन्द आया होगा, परन्तु जैसे-जैसे समय बीतने लगा तो पारिवारिक और सांस्कृतिक भिन्नताएँ खटकने लगीं। वहाँ के दृश्य, ध्वनियाँ, गंध और रीति-रिवाज आपको पराया सा महसूस कराने लगते हैं। आप मन ही मन सोचते हैं कि, “हमारे घर में यह कार्य भिन्न प्रकार से होता है।” “मेरे घर में ऐसा नहीं होता है।” हर बार जब आप किसी भिन्नता का सामना करते हैं, तो आप उस घर से दूर धकेल दिए जाते हैं और तब आप अपने ही घर की ओर फिर से खिंचने लगते हैं।
यह उस कार्य का एक हिस्सा है जिसे परमेश्वर जीवन के उन समयों के साथ कर रहा है, जिन्हें ‘ उपदेशक हमें इस कविता में दिखाता है (जैसे—मरना, उखड़ना, शोक मनाना, रोना, खोना, अलग होना, घृणा और युद्ध)। जीवन के नकारात्मक या प्रतिकूल समय इसलिए आते हैं कि वे आपको पृथ्वी की वस्तुओं से असंतुष्ट कर दें और आपके भीतर घर का स्मरण जगा दें। हमारी समस्या यह है कि जब हम ऐसे समयों का अनुभव करते हैं, तो हम पृथ्वी पर अधिक पाने के अपने प्रयासों को और तेज़ कर देते हैं। हम और अधिक परिश्रम करते हैं ताकि परमेश्वर के वरदानों से वह करवाएँ जो वे कर ही नहीं सकते हैं। परन्तु उनका उद्देश्य तो आपको इसके ठीक विपरीत सिखाना है। मृत्यु से हर सामना, हर उखाड़ा जाना, हर बार जब आपको शोक करना और रोना पड़ता है, हर बार जब आप अलग कर दिए जाते हैं या आपसे घृणा की जाती है—इन सबका उद्देश्य आपके हृदय को इस स्थान से हटाना है: “मेरे घर में ऐसा नहीं होता है।” और जीवन के अनुकूल समय के अनुसार —जीना, हँसना, नाचना, प्रेम करना, निर्माण करना, आलिंगन करना और शान्ति से रहना—वे सब आपके हृदय को स्मरण दिलाते हैं कि, “यह घर जैसा लगता है।”
यह दोहरी अनुभूति कि क्या ठीक है और क्या ठीक नहीं है, फिर भी कभी पूरी रीति से उस तक न पहुँच पाना, अधिकतर मसीही और गैर-मसीही दोनों प्रकार के विचारकों के द्वारा घर का बहुत अधिक स्मरण आने के समान बताया गया है। अर्थात् यह भावना कि हमें किसी और अधिक बड़ी वस्तु के लिए बनाया गया है, मानो हमें उसकी धुंधली-सी स्मृति है, पर किसी प्रकार हम उसे पा नहीं सकते, यह इतनी विश्वव्यापी है कि इसके लिए एक पारिभाषिक शब्द भी है।
सी. एस. लुईस इसका इस प्रकार से वर्णन करते हैं:
स्पष्ट है कि हमारा जीवनभर की यह पुरानी स्मृतियाँ, हमारी वह लालसा कि हम सम्पूर्ण सृष्टि में किसी ऐसी वस्तु से फिर मिल जाएँ जिससे अब हम अगल-थलग होने का अनुभव करते हैं, और ऐसे द्वार के भीतर पहुँच जाएँ जिसे हम सदा बाहर से ही देखते आए हैं, यह कोई मात्र सनकी कल्पना नहीं है, वरन् हमारी वास्तविक दशा का सबसे सच्चा संकेत है। और अंततः भीतर बुलाया जाना हमारी सारी योग्यताओं से कहीं बढ़कर महिमा और सम्मान की बात होगा, और साथ ही उस पुरानी पीड़ा की चंगाई भी होगी।5
आपको आनन्दित होने के लिए बनाया गया है। आपका हृदय इस बात को जानता है। मानो उसे इसका धुंधला-सा स्मरण भी है। परन्तु समस्या यह है कि आप उसे गलत स्थान पर ढूँढ रहे हैं।
इसलिए हमें जिस बात की आवश्यकता है, वह परिस्थितियों में परिवर्तन करना नहीं है (कम-से-कम सामान्य तरीके से तो नहीं), वरन् दृष्टिकोण में परिवर्तन करना है। परमेश्वर के अस्थायी वरदान आपके हृदय को वह स्थायी शान्ति नहीं दे सकते हैं, जिसकी अभिलाषा आपका हृदय बहुत अधिक करता है। जब आप अपने घर की यात्रा पर होते हैं, तब उनका उद्देश्य केवल इतना होता है कि आप उनका आनन्द वैसे ही लें जैसे वे हैं, उससे अधिक कुछ नहीं।
संतुष्ट होने का पहला कदम यह है कि आप संसार से अपनी अपेक्षाएँ कम कर लें कि वह आपके लिए क्या कर सकता है।
कल्पना कीजिए कि दो अलग-अलग व्यक्ति रेत के महल बना रहे हैं। एक व्यक्ति सोचता है कि वही उसका वास्तविक घर होगा। आप उसकी दृढ़ता की कल्पना कर सकते हैं, उसके माथे पर पसीना है। चिन्ता। क्रोध। और हर बार जब हवा, लहर, या कोई छोटा बच्चा उसे गिरा देता है, तो वह अति क्रोधित हो जाता है।
यदि आप उसे देखते, तो शायद आप हँस पड़ते या मुँह बना लेते। आप बुद्धिमानी से उस स्थिति का विश्लेषण करते। उसने एक अच्छे लक्ष्य (घर) के लिए मूर्खतापूर्ण साधन (रेत का महल) चुन लिया है।
दूसरे व्यक्ति की परिस्थितियाँ भी वही हैं। वही रेत, वही पानी, वही हवा और वही लहरें। फिर भी उसके पास सही दृष्टिकोण है। वह समझता है कि रेत का महल अस्थायी है। उसे रहने के लिए इसकी आवश्यकता नहीं है। और इसलिए, एक हाथ में फावड़ा और दूसरे में कोई बढ़िया पेय पदार्थ (सभ. 9:7) लिए, वह अपने बच्चों के साथ मिलकर निर्माण यह जानते हुए भी करता है, कि यह अधिक समय तक टिकने वाला नहीं है; फिर भी, जब तक यह टिका रहेगा, वह इसका भरपूर आनन्द लेगा।
एक बार फिर, यीशु हमसे कहता है:
“अपने लिये पृथ्वी पर धन इकट्ठा न करो; जहाँ कीड़ा और काई बिगाड़ते हैं, और जहाँ चोर सेंध लगाते और चुराते हैं। परन्तु अपने लिये स्वर्ग में धन इकट्ठा करो, जहाँ न तो कीड़ा, और न काई बिगाड़ते हैं, और जहाँ चोर न सेंध लगाते और न चुराते हैं। क्योंकि जहाँ तेरा धन है वहाँ तेरा मन भी लगा रहेगा।”— मत्ती 6:19-21 (बी.एस. आई.)
और फिर हमारा प्रभु अपने निर्देश में यह जोड़ता है:
“कोई मनुष्य दो स्वामियों की सेवा नहीं कर सकता, क्योंकि वह एक से बैर और दूसरे से प्रेम रखेगा, या एक से निष्ठावान रहेगा और दूसरे का तिरस्कार करेगा। तुम परमेश्वर और धन दोनों की सेवा नहीं कर सकते।— मत्ती 6:24 (बी.एस. आई.)
अधिकाँश हमारा असंतोष धन के प्रेम में जड़ें जमाए होता है, क्योंकि हम उससे वह पाने की आशा रखते हैं जो केवल परमेश्वर ही दे सकता है। मसीह चेतावनी देता है कि आप दोनों की सेवा नहीं कर सकते हैं। मेरा विचार है कि धन के विषय में अपनी शिक्षा के द्वारा उपदेशक जो कुछ दिखाना चाहता है उसका एक हिस्सा यह है कि आप दोनों की सेवा एक साथ नहीं कर सकते हैं। केवल एक ही आपको सुरक्षा, आश्रय, शान्ति, जीवन और आनन्द दे सकता है: धन या परमेश्वर। एक आपको झूठा सोना देता है; तो दूसरा, अनन्त स्वर्गीय धन देता है।
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चिन्तन के लिए प्रश्न:
- समय के संदर्भ में मनुष्यों को शेष संसार से क्या अलग करता है?
- हमारी लालसाएँ हमें इस विषय में क्या बताती हैं कि हम किसके लिए और किस लिए बनाए गए हैं?
- इस संसार से बहुत अधिक अपेक्षाएँ रखना हमें असफलता की ओर कैसे ले जाता है?
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भाग III: बढ़ी हुई तीव्र लालसाएँ
यह कैसे संभव हुआ कि उपदेशक ने संपत्तियाँ, बाग-बगिचे, घरेलू नौकर-चाकर, रखैलें, मनोरंजन करने वाले साधन, प्रतिष्ठा और बहुत कुछ एकत्र कर लिया? इसके लिए एक शब्द है पैसा। और हमारी असंतोष की बहुत सी जड़ें अधिकतर पैसे के कारण ही उत्पन्न होती हैं। क्योंकि हम और अधिक चाहते हैं, और हमें लगता है कि पैसा हमें सब कुछ दे सकता है।
समस्या यह है कि जैसे हम पहले ही देख चुके हैं कि सीमित वस्तुएँ अनन्त खालीपन को नहीं भर सकती हैं।
उपदेशक इस समस्या को अध्याय 5 और 6 में सीधे-सीधे संबोधित करता है।
5:10 जो रुपये से प्रीति रखता है वह रुपये से तृप्त न होगा; और न जो बहुत धन से प्रीति रखता है, लाभ से यह भी व्यर्थ है।
6:7 मनुष्य का सारा परिश्रम उसके पेट के लिये होता है तो भी उसका मन नहीं भरता।
मुझे विश्वास है कि आप उस अनुभव को जानते हैं, जैसे भूख से बेहाल होने का एहसास, और फिर खाने से मिलने वाली राहत और संतोष।
आपके अन्दर स्वभाव से ही एक भूख होती है। और यह केवल पैसे के लिए नहीं है (वास्तव में यह उन वस्तुओं के लिए है जो आपको लगता है कि पैसा ही आपको दिला सकता है)। इससे भी अधिक मूल रूप से आप आनन्द, शान्ति, स्थिरता, और मूल्य की इच्छा रखते हैं—जिसे एक शब्द में जीवन कह सकते हैं।
भोजन करके अपनी भूख मिटाने के विपरीत, जो व्यक्ति चाँदी या धन-दौलत से वह पाने की उम्मीद करता है जो केवल परमेश्वर ही दे सकता है, वह कभी भी तृप्त नहीं होता। अपने हृदय को धन से संतुष्ट करने का प्रयास करना हवा को पकड़ने के समान है और फिर भी यदि आपने जो पकड़ लिया है उससे पेट भरने का प्रयास करना जैसा है। कहने का तात्पर्य यह है कि आप हवा की चाहे कितनी भी मुट्ठियाँ भर के खा लें, फिर भी आपका पेट कभी नहीं भरेगा।
पैसा आपके हृदय के खालीपन को देखता है और कहता है, “यदि तुम मेरा पीछा करो तो मैं उसे भर सकता हूँ।” परन्तु वह जो प्रतिज्ञा करता है, उसे पूरा नहीं करता है।
मेरी एक चार वर्ष की बेटी है। वह नियमित रूप से अपने तीन बड़े भाई-बहनों और अपने माता-पिता से पूछती है, “क्या आज ही कल है?” हम सभी को यह बहुत मनोरंजक बात लगती है। बच्चे विशेषकर उसे “नहीं” कहकर उत्तर देना बहुत पसन्द करते हैं।
मैंने उसे यह समझाने का पूरा प्रयास किया कि आज कल नहीं हो सकता और यह संभव भी नहीं है। हमारे हर उत्तर और हर डाँट-फटकार के साथ, वह और अधिक गुस्सा करने लगती है। “नहीं, क्या आज ही कल है?!” मैं समझता हूँ कि वह क्यों परेशान है। वह किसी न किसी प्रतिज्ञा के साथ सोने चली गई थी—उदाहरण के लिए जैसे कल हम तालाब पर जाएँगे। और इसलिए वह जागकर पूछती है, “क्या कल आ गया है?” अर्थात् क्या मेरे साथ की गई प्रतिज्ञा का समय आ गया है? जब हम उसे बताते हैं कि अभी कल नहीं आया है, तो उसे ऐसा लगता है जैसे हम उसके साथ की गई प्रतिज्ञा को आगे बढ़ा रहे हैं।
धन भी आपके साथ प्रतिदिन ऐसी ही प्रतिज्ञा करता है—यदि आप मेरा पीछा करेंगे, तो मैं आपको कल आनन्दित कर दूँगा। समस्या यह है कि वह हमेशा उस प्रतिज्ञा को आगे ही धकेलता रहता है। आप पाएँगे कि वास्तव में आपको आनन्द महसूस करने के लिए एक और वेतन वृद्धि की आवश्यकता है। आपको वास्तव में सुरक्षित महसूस करने के लिए कर-लाभ वाली सेवानिवृत्ति बचत योजना में थोड़ी और धनराशि की आवश्यकता है। आपको वास्तव में शान्ति पाने के लिए एक बड़ी आपातकालीन पूँजी चाहिए।
चाँदी से संतुष्ट होने का प्रयास करना ऐसा है, जैसे सैर पर निकलकर क्षितिज तक पहुँचने का प्रयास करना है, परन्तु वह और भी दूर-दूर खिसकता जाता है। आप उसका पीछा करते रहते हैं, और अन्त में पाते हैं कि आप तो केवल एक अलग नाम के साथ हवा का ही पीछा कर रहे थे।
इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप एक वर्ष में पचास हजार कमाते हैं या पचास करोड़। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आपकी शुरुआत कितने से होती है या धन में आपकी वृद्धि की कितनी संभावना है—यदि पैसा ही लक्ष्य है, तो आप कभी आनन्दित नहीं हो सकते। एक बहुत ही ठोस और भौतिक अर्थ में, आप सीमित चीज़ों को जोड़कर अनन्त तक पहुँचने का प्रयास कर रहे हैं। आप अपने हृदय के गहरे खालीपन वाले स्थान को भरने के लिए चाहे कितने भी रुपए जमा कर लो, वह नहीं भरेगा—सच तो यह है कि आप अपने हृदय को ही खाली कर रहे हैं।
यही लोभ की समस्या है। बात केवल इतनी नहीं कि धन आपको तृप्त नहीं करता; वरन् यह वास्तव में आपकी लालसा को और बढ़ा देता है। इस सोच के साथ धन का पीछा करना कि वह आपको तृप्त कर देगा, परन्तु यह तो समुद्र का खारा पानी पीने के समान है। यह केवल आपकी प्यास को और बढ़ा देता है। यह आपके शरीर में और भी अधिक पानी की कमी कर देता है। या, आप इसकी तुलना नशे की लत से कर सकते हैं, पहले जितने से असर हो जाता था, अब उसी असर के लिए आपको और अधिक चाहिए। यदि आप बोनस पाने के लिए जी रहे हैं, और इस वर्ष का बोनस पिछले वर्ष की तुलना में आधा है, तो यह अतिरिक्त धनराशि भी किसी न किसी प्रकार से घाटे जैसा ही महसूस होता है। बहुत कम लोग प्रसन्नता से अपने जीवन-स्तर को नीचे करते हैं। लोभ आत्मा को चूस लेने वाला प्रभाव डालता है।
न तो धन, न ही वे वस्तुएँ जिन्हें धन खरीद सकता है, आनन्द का आश्वासन नहीं दे सकते हैं; क्योंकि आनन्द बिकाऊ नहीं होता। वह तो वरदान है।
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चिन्तन के लिए प्रश्न:
- पैसा आपको किस विचित्र तरीके से यह सोचने पर विवश कर देता है कि यदि आपके पास थोडा और अधिक पैसा होता, तो आपकी सारी समस्याएँ दूर हो जाती?
- यह जानते हुए कि आनन्द अधिकार नहीं, वरन् एक वरदान है, आपके दृष्टिकोण को कैसे बदलता है?
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भाग IV: थोड़े में असंतोष और बहुत में भी असंतोष
अध्याय 5 और 6 में उपदेशक एक ऐसे मनुष्य की कहानी बताता है, जिसके पास सब कुछ था, फिर भी वह आनन्दित नहीं था (सभ. 5:10)। उसके धन ने गलत लोगों को अपनी ओर आकर्षित किया (सभ. 5:11)। उसके कार्यों ने चिन्ता उत्पन्न कर दी (सभ. 5:12)। उसे नींद का अभाव होने लगा था (सभ. 5:12)। उसके पास मित्रों का भी अभाव था (सभ.4:7), और सबसे विडंबनापूर्ण बात यह थी कि उसके पास वह भी नहीं था, जिसे वह समझता था कि वह धन से खरीद सकता है—अर्थात् आनन्द।
परन्तु उस मनुष्य के पास केवल धन ही नहीं था; उसके पास वह भी था जिसे पुराने नियम का स्वप्न माना जाता था: अर्थात् धन-संपत्ति, संतान और दीर्घायु (सभ. 6:3)। फिर भी वह संतुष्ट नहीं था।
ग्रैमी और अकादमी पुरस्कार विजेता विल स्मिथ ने हाल ही में एक साक्षात्कार दिया जिसमें उन्होंने “सबसे निचले स्तर” पर पहुँचने की बात नहीं की, वरन् एक ऐसे स्थान के विषय में बात की जिसे वे “चट्टान की चोटी” कहते हैं।
वह कहते हैं, “यह वह क्षण होता है जब आप इतने ऊँचे उठ जाते हैं कि आपको यह एहसास होता है… कि सचमुच, इनमें से कोई भी वस्तु आपको प्रसन्न नहीं कर सकती… तो आप भौतिक संसार के अन्त तक पहुँच जाते हैं। आप धन की सीमा तक पहुँच जाते हैं। आप यौन-सम्बन्धों की सीमा तक पहुँच जाते हैं। आप प्रसिद्धि की सीमा तक पहुँच जाते हैं। आपके पास इतना अधिक हो जाता है… और फिर अचानक से ऐसा लगता है मानो आप चट्टान की चोटी से गिरकर एक गहरी खाई में जा पड़े हों… जहाँ जीवन, आपको सम्भालने और प्रसन्न करने की अपनी सारी योग्यता खो देता है।”
यह संभव है कि आपके पास सब कुछ हो, और फिर भी आपको लगे कि यह पर्याप्त नहीं है। उपदेशक के साथ भी ऐसा ही था। ऐसा प्रतीत होता है कि विल स्मिथ के साथ भी ऐसा ही है या था।
यदि किसी पुरुष के सौ पुत्र हों, और वह बहुत वर्ष जीवित रहे और उसकी आयु बढ़ जाए, परन्तु न उसका प्राण प्रसन्न रहे और न उसकी अन्तिम क्रिया की जाए, तो मैं कहता हूँ कि ऐसे मनुष्य से अधूरे समय का जन्मा हुआ बच्चा उत्तम है।— सभोपदेशक 6:3 (बी.एस.आई.)
उस मनुष्य का जीवन मृत्यु से भी बुरा है। मेल गिब्सन का विलियम वालेस वाला किरदार सही था, जो कहता है कि: सभी मनुष्य मरते हैं, लेकिन सभी जीते नहीं हैं। आप जीवित तो रह सकते हैं, पर वास्तव में जीते नहीं हो। इस मनुष्य के पास, संसार की दृष्टि में जीने के लिए सब कुछ है; फिर भी वह अन्दर से मरा हुआ है।
वह बहुत-सी बातों से असंतुष्ट था। और फिर एक बुरे कार्य में उसने अपना सारा धन गँवा दिया (सभ. 5:14; 6:2)। अब वह थोड़े में भी असंतुष्ट है। वह बिल्कुल पतन की गहराई तक पहुँच चुका है।
यदि किसी पुरुष के सौ पुत्र हों, और वह बहुत वर्ष जीवित रहे और उसकी आयु बढ़ जाए, परन्तु न उसका प्राण प्रसन्न रहे और न उसकी अन्तिम क्रिया की जाए, तो मैं कहता हूँ कि ऐसे मनुष्य से अधूरे समय का जन्मा हुआ बच्चा उत्तम है।— सभोपदेशक 6:3 (बी.एस.आई.)
उस मनुष्य का जीवन मृत्यु से भी बुरा है। मेल गिब्सन का विलियम वालेस वाला किरदार सही था, जो कहता है कि: सभी मनुष्य मरते हैं, लेकिन सभी जीते नहीं हैं। आप जीवित तो रह सकते हैं, पर वास्तव में जीते नहीं हो। इस मनुष्य के पास, संसार की दृष्टि में जीने के लिए सब कुछ है; फिर भी वह अन्दर से मरा हुआ है।
वह बहुत-सी बातों से असंतुष्ट था। और फिर एक बुरे कार्य में उसने अपना सारा धन गँवा दिया (सभ. 5:14; 6:2)। अब वह थोड़े में भी असंतुष्ट है। वह बिल्कुल पतन की गहराई तक पहुँच चुका है।
जैसा वह माँ के पेट से निकला वैसा ही लौट जाएगा; नंगा ही, जैसा आया था, और अपने परिश्रम के बदले कुछ भी न पाएगा जिसे वह अपने हाथ में ले जा सके। यह भी एक बड़ी बला है कि जैसा वह आया, ठीक वैसा ही वह जाएगा; उसे उस व्यर्थ परिश्रम से और क्या लाभ है?केवल इसके कि उसने जीवन भर अन्धकार में भोजन किया, और बहुत ही दुःखी और रोगी था और क्रोध भी करता था।—सभोपदेशक 5:15-17 (बी.एस.आई.)
वह अँधेरे में अकेला खाता है, एक दीपक भी नहीं जलाना चाहता था, क्योंकि जो थोड़ा-सा तेल उसके पास है, उसे वह जमा करके रख रहा है। आप इस चित्रण को समझ सकते हैं। यद्यपि वह सूर्य के नीचे जी रहा है, फिर भी वह अन्धकार में जीवन बिताता है, उस कब्र की प्रतीक्षा करता हुआ जिसकी ओर वह बढ़ रहा है।
उपदेशक हमें धन के द्वारा आनन्द पाने की खोज में दोहरी त्रासदी दिखा रहा है। यह आपको उसे कमाने में भी दुःखी कर देता है, और उसे खोने में भी दुःखी करता है। उसे कमाने में दुःखी: चिन्तित, नींद से वंचित, मित्रों का न होना, सदा पीछा करते हुए भी मंज़िल तक न पहुँचने वाला होता है। और अब उसे खोने में भी दुःखी होना। विडम्बना यह है कि जिस मनुष्य ने सब कुछ खो दिया, वह धनी होने पर भी आनन्द के कहीं निकट नहीं था, क्योंकि भौतिक सुख-सुविधाएँ आनन्द के लिए अनिवार्य शर्त नहीं है। परन्तु उसने अपने आनन्द को भौतिक धन से जोड़ रखा था, इसलिए अब जब वह निर्धन हो गया है, तो वह आनन्दित होने से और भी अधिक दूर होता चला गया।
ध्यान दें: धन न केवल आपके लिए आनन्द नहीं खरीद सकता, वरन् उसका लोभ आपसे वह थोड़ी सा आनन्द भी छीन लेगा है जो संभवतः आपके पास था।
समाधान क्या है?
उपदेशक हमें बताता है:
चैन के साथ एक मुट्ठी उन दो मुट्ठियों से अच्छा है, जिनके साथ परिश्रम और वायु को पकड़ना हो।
यह सभोपदेशक की उस कहावत के जैसी शिक्षा है: “आँखों से देख लेना मन की चंचलता से उत्तम है।” जो आपके एक हाथ में है, उसी से संतुष्ट रहना उत्तम है; बजाय इसके कि आप दोनों हाथों से उस वस्तु के पीछे भागें जो आपके पास नहीं है, और इस प्रक्रिया में आप उस वस्तु को भी निश्चित रूप से खो देते हैं जिसकी आपको सच में आवश्यकता है—अर्थात् विश्राम।
स्पष्ट रूप से कहें तो धन अपने आप में समस्या नहीं है— वरन् धन का लोभ समस्या है। यह वह सोच है कि पैसा आपके लिए वह कर देगा, जो केवल परमेश्वर ही कर सकता है। धन का मोह अधिकतर हमारी असंतुष्टि की जड़ होता है, क्योंकि यह हमारी हर इच्छा को पूरा करने की प्रतिज्ञा करता तो है। लेकिन यह ऐसा कर नहीं पाता है।
आपके पास जो कुछ भी है (जो परमेश्वर ने आपको दिया है), उसी में संतुष्ट रहना उत्तम है, ताकि आप उस वस्तु का अनुभव कर सकें जिसकी आपको वास्तव में अभिलाषा और आवश्यकता है: अर्थात् आनन्द।
संतुष्ट रहने की कुंजी दोहरी है: आपके पास जो वस्तुएँ हैं (और जो नहीं हैं) उनके विषय में सही सोच रखना, और उसके साथ सही सम्बन्ध रखना जो उन वस्तुओं को देता है।
आनन्द कोई ऐसी वस्तु नहीं है जिसे अधिक प्रयास करके पाया जा सके। यह परमेश्वर का अभी एक वरदान है।
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चिन्तन के लिए प्रश्न:
- वह ‘सब कुछ’ क्या है जिसे आप इस संसार से पाने के लिए प्रलोभित होते हैं? आपको क्या लगता है कि अंततः आपको वास्तव में कौन आनन्दित करेगा?
- यदि आप “सब कुछ” पाकर भी संतुष्ट नहीं होते, तो यह कैसे सुनिश्चित करता है कि कुछ भी न पाकर आप संतुष्ट नहीं हो पाएँगे?
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भाग V: स्वर्ग से नमूने
उस व्यक्ति के विपरीत, जिसके पास सब कुछ था (और वह दु:खी था) और फिर उसने वह सब खो दिया (और तब भी उतना ही दुःखी था), उपदेशक हमें एक ऐसे व्यक्ति के विषय में बताता है जिसे परमेश्वर ने “धन-सम्पत्ति” दी। और “उनसे आनन्द भोगने और उसमें से अपना भाग लेने और परिश्रम करते हुए आनन्द करने की सामर्थ्य भी दी है” (सभ. 5:19)।
ध्यान दें कि धन और संपत्ति का अर्थ अनिवार्य रूप से आनन्द और विश्राम नहीं है (इसलिए हमारी स्थिति चाहे जैसी भी हो, हम असंतुष्ट भी हो सकते हैं और संतुष्ट भी)। आनन्द तो केवल परमेश्वर ही देता है। वास्तव में, परमेश्वर भी वरदान उसी कारण से देता है जिस कारण से पिता अपने बच्चों को उपहार देते हैं—अर्थात् अपने बच्चों को प्रशन्न करते के लिए। यह भी परमेश्वर का ही वरदान है, जब कोई मनुष्य खाता-पीता है और अपने सारे परिश्रम का आनन्द लेता है (सभ. 3:19)। समस्या तब आती है, जब हम परमेश्वर की दी हुई चीज़ों से असंतुष्ट होते हैं (सभ. 6:3, 7)।
मैं दोहराने का जोखिम ले रहा हूँ, परन्तु इस बात को फिर से कहना आवश्यक है: कि महत्वपूर्ण आपकी परिस्थितियाँ नहीं, वरन् आपका दृष्टिकोण है। संतुष्ट या प्रसन्न रहने की कुंजी यह है कि आप इस संसार से अपनी अपेक्षाएँ कम करें और परमेश्वर से अपनी अपेक्षाएँ बढ़ाएँ। यदि आप धन-संपत्ति, भोजन-पानी, मित्रों और काम, या मदिरा पर भरोसा करते हैं कि वे आपके लिए वह कर देंगे जो केवल परमेश्वर कर सकता है, तो आप आनन्दित नहीं हो पाएँगे। यदि आप उन्हें वही मानकर स्वीकार करते हैं जो वे वास्तव में हैं, और उनसे अधिक की अपेक्षा नहीं रखते हैं, तो आप उनका आनन्द ले सकते हैं।
मेरी पत्नी और मेरे चार बच्चे हैं, और इसलिए हम आजकल अपनी बहुत सी खरीदारी उस एकमात्र स्थान से करते हैं जो इन दिनों हमारे अनाज-भंडार और फ्रिज को ठीक से भर सकता है: कॉस्टको (यदि आप इससे परिचित नहीं हैं, तो यह एक ऐसी दुकान होती है जिसकी उच्च-गुणवत्ता वाले उत्पादों, बड़ी मात्रा में सामान, और कम कीमतों के कारण लोगों में लगभग असाधारण ग्राहक समुदाय जैसी लोकप्रियता है)। कॉस्टको की सबसे अच्छी बातों में से एक वहाँ मिलने वाले निःशुल्क नमूने होते हैं।
कल्पना कीजिए कि आप कॉस्टको में हैं और किसी नमूने के लिए कतार में खड़े हैं। अब कल्पना कीजिए कि आपके सामने वाला व्यक्ति माइक्रोवेव में बना पिज़्ज़ा का एक बहुत छोटा टुकड़ा खाता है और फिर अचानक घबराहट में नमूने देने वाले व्यक्ति पर जोर-जोर से चिल्लाने लगता है।
“मैं अभी भी भूखा हूँ!”
“मैं अभी भी भूखा हूँ, और यह पिज़्ज़ा बहुत खराब है!”
यह कुछ-कुछ समुद्र तट पर रेत का महल बनाते उस मूर्ख को देखने जैसा है, परन्तु आप इस घटना को बुद्धि और सही दृष्टिकोण से देखते हैं। आप जानते हैं कि ये नमूने आपको पेट भरने के लिए नहीं दिए गए हैं। और न ही उन्होंने कोई ऐसी प्रतिज्ञा की थी। वे तो केवल छोटे-छोटे उपहार हैं।
यदि आप कॉस्टको में आधी गोल ब्रेड का छोटा टुकड़ा यह सोचकर खाते हैं कि वह न्यूयॉर्क शहर की ऊना पिज़्ज़ा नेपोलिटन के पूरे पिज़्ज़ा के समान होगा, तो आप निराश होंगे। हताश होंगे। और असंतुष्ट भी होंगे। इसी प्रकार उपदेशक हमारे उन प्रयासों को देखता है, जिनमें हम धन, काम, प्रतिष्ठा, अनुयायियों, यौन सुख, नई तकनीक, ज्ञान, मूर्खता, और ऐसी बहुत-सी बातों से सुरक्षा, मूल्य, शान्ति, स्थिरता, जीवन, और आनन्द पाने का प्रयास करते हैं। हम झुंझलाहट के साथ उनमें यह न समझते हुए भाग लेते हैं, कि ये नमूने हमें तृप्त करने के लिए नहीं हैं। उन्हें केवल वैसे ही ग्रहण किया जाना चाहिए जैसे वे हैं, और इससे अधिक कुछ नहीं: स्वर्ग से मिले छोटे-छोटे वरदानों का आनन्द हमें अपने घर की यात्रा करते हुए लेना चाहिए।
अपने जीवन के किन क्षेत्रों में आप असंतुष्ट हैं? आपकी असंतुष्टि की जड़ में यह विश्वास (झूठ) छिपा है कि कोई भौतिक उपहार पा लेने से आपको वह मिल सकता है, जो आप समझते हैं कि परमेश्वर अभी आपको नहीं दे रहा है। क्या इतिहास और परमेश्वर का वचन आपको इससे भिन्न बात नहीं सिखाता है? वे आपको संतुष्ट नहीं कर सकते। केवल परमेश्वर ही कर सकता है। किन-किन तरीकों से आप स्वर्ग के वरदानों को उनकी वास्तविकता से बढ़कर बनाने का प्रयास कर रहे हैं?
नमूने की बात केवल इतनी सी है कि वह किसी बड़ी और बेहतर वस्तु की एक छोटी सी झलक होती है। यदि आपको यह पसन्द आए, तो आप अधिक जानकारी के लिए स्रोत पर जा सकते हैं। यदि वह छोटा पिज़्ज़ा आपकी तीव्र इच्छा को शान्त कर सकता है, तो आप उसका पूरा डिब्बा खरीद सकते हैं। वरदानों का उद्देश्य यह है कि हम उनका आनन्द उसी रूप में लें जैसे वे हैं, और अपनी दृष्टि उस ज्योतियों के पिता की ओर उठाएँ, जिससे वे आते हैं (याक. 1:17)।
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चिन्तन के लिए प्रश्न:
- अपने आनन्द को अपनी दृष्टिकोण के बजाय अपनी परिस्थितियों से जोड़ने में क्या समस्या है?
- यदि वरदान परमेश्वर का स्थान लेने के लिए नहीं हैं, तो उनका क्या लाभ है? हमें वरदानों के विषय में कैसे सोचना चाहिए?
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भाग VI: खाली हाथ, भरे हुए हृदय
उपदेशक के बोझ का एक हिस्सा यह है कि वह आपको जीवन जीने के लिए एक नया क्षितिज प्रदान करे। चौंकाने वाली बात यह है कि वह मृत्यु है। और अधिक स्पष्ट रूप से कहें तो, मृत्यु और परमेश्वर का न्याय (सभ. 11:8-9)। वह आपको इस सत्य के प्रति जगाने का प्रयत्न कर रहा है कि आप मरने वाले हैं, और वह समय शीघ्र आने वाला है। यहाँ आपका समय उस धुएँ के समान है जो मोमबत्ती बुझने के बाद भी कुछ क्षण के लिए ठहरा रहता है।
उसकी रणनीति का एक हिस्सा, जो आपको मृत्यु का सीधे सामना करने में सहायता करता है, यह है कि वह तुम्हें स्वयं को भटकाने वाली बातों (धन, मनोरंजन, काम आदि) से रुकने के लिए प्रेरित करता है। वह उन सब बातों से पर्दा हटा देता है, जिनका हम अपनी निकट आती मृत्यु से होने वाली मुलाकात से स्वयं को बचाने के लिए सहारा लेते हैं, ताकि हम जीवन के लिए बुद्धिमान बन सकें।
यदि आप ज्ञान-साहित्य से परिचित हैं (विशेषकर नीतिवचन के विषय में सोचिए), तो उनका उद्देश्य आपको परमेश्वर की बुद्धि और व्यवस्था से आकर्षित करना है। सभोपदेशक के लेखक को जो बात व्याकुल करती है, वह अपवाद है। दौड़ हमेशा वेग से दौड़ने वालों की नहीं होती, युद्ध बलवानों का नहीं होता, रोटी बुद्धिमानों को नहीं मिलती, पदोन्नति योग्य लोगों को नहीं मिलती, मृत्यु दुष्टों पर ही नहीं आती, आदि (सभ. 9:11)। जीवन न तो समझ में आता है और न ही न्यायपूर्ण प्रतीत होता है। और जीवन की निरर्थकता पर अन्तिम शक्तिशाली चिन्ह मृत्यु है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप धनी हों या निर्धन, बुद्धिमान हों या मूर्ख, दुष्ट हों या धर्मी—सब मरेंगे (सभ. 9:2-3)। मृत्यु सबको एक समान कर देती है।
क्योंकि आदम की संतानों और पशुओं का भाग्य एक ही है। जैसे एक मरता है, वैसे ही दूसरा भी मरता है; उन सब में एक ही श्वास है। मनुष्य को पशुओं पर कोई लाभ नहीं है, क्योंकि सब कुछ व्यर्थ है। सब एक ही स्थान पर जाते हैं; सब मिट्टी से बने हैं, और सब मिट्टी में लौट जाते हैं।—सभोपदेशक 3:19-20 (बी.एस.आई.)
मृत्यु पापियों और पवित्र लोगों में भेद नहीं करती—वह लेती है, लेती है, और लेती ही जाती है। उसमें कुछ ऐसा है जो सही नहीं लगता है। हालाँकि, निश्चय ही एक मसीही व्यक्ति यह समझता है कि यह उचित है। पाप की मजदूरी तो मृत्यु है (रो. 6:23)। पाप असन्तोष का सबसे बड़ा कारण है। आदम ने सोचा कि वह परमेश्वर के समान हो सकता है, और अब मनुष्य कुत्तों के समान मरता है।
सुसमाचार का अद्भुत समाचार यह है कि परमेश्वर ने मनुष्य बनकर स्वयं को दीन किया। और इससे भी आगे बढ़कर, वह क्रूस पर मृत्यु तक आज्ञाकारी बना रहा। ऐसा करते हुए, उसने अपने लोगों के पापों के लिए दुःख उठाया और प्राण दिए, ताकि वे जीवन पाएँ।
इसलिए मसीही जन के लिए मृत्यु अब डरने जैसी बात नहीं, वरन् एक बेहतर जीवन का द्वार बन जाती है; और इस प्रकार आज वह मृत्यु हमारी उपदेशक बनती है। मृत्यु हमें कम से कम दो ऐसे महत्वपूर्ण सबक सिखाती है, जो संतोष की ओर ले जाते हैं।
सबसे पहले, मृत्यु आपसे सब कुछ छीन लेगी। आप उतने ही निर्धन होकर मरेंगे, जितने कि आप जन्म के समय थे। आप नंगे आए थे और नंगे ही जाएँगे (सभ. 5:15)।
सभोपदेशक की पुस्तक इस प्रकार आरम्भ होती है:
1 यरूशलेम के राजा, दाऊद के पुत्र और उपदेशक के वचन।
2 उसको क्या लाभ प्राप्त होता है? उपदेशक का यह वचन है,
व्यर्थ ही व्यर्थ, व्यर्थ ही व्यर्थ!
3 सब कुछ व्यर्थ है।
उस सब परिश्रम से जिसे मनुष्य सूर्य के नीचे करता है? —सभोपदेशक 1:1-3
उपदेशक का प्रश्न अलंकारिक है, इसलिए उसका उत्तर जितना स्पष्ट है उतना ही पीड़ादायक भी है। सूर्य के नीचे हमें क्या लाभ मिलता है? कुछ भी नहीं।
हम यहाँ कोई स्थायी लाभ नहीं पा सकते, क्योंकि जब तक हम इस संसार में हैं, यह हमें तृप्त नहीं करेगा; और मृत्यु यह निश्चित कर देगी कि अन्त में हमारे पास कुछ भी नहीं बचेगा। अंततः जब सब कुछ समाप्त हो जाएगा, तो मृत्यु यह सुनिश्चित कर देगी कि हमारे खाते में शून्य ही बचा है। जो कुछ भी हमने इकट्ठा करने के लिए परिश्रम किया है, वह सब हमसे छीन लिया जाएगा (सभ. 2:21; मत. 21:43)।
यह मृत्यु का पहला सबक है। यदि पृथ्वी पर इकट्ठा की गई वस्तुएँ आपको मृत्यु होने से नहीं बचा सकतीं और मृत्यु के समय वे वस्तुएँ आपसे छीन ली जाएँगी, तो वे आपको जीवन भी नहीं दे सकतीं। एक बेहतर घर, नई कार और उच्च वेतन वाली नौकरी न तो आपके जीवन को (मात्रा के हिसाब से) बढ़ा सकती हैं, और न ही यह सुनिश्चित कर सकती हैं कि आप वास्तव में मरने से पहले सही अर्थों में जिएँ (गुणवत्ता की हिसाब से)।
मसीह इस बात को यूहन्ना अध्याय 6 में कहता है:
“मैं तुम से सच-सच कहता हूँ, कि तुम मुझे इसलिए नहीं ढूँढ़ रहे हो कि तुमने चिन्ह देखे हैं, वरन् इसलिए कि तुमने रोटियाँ खाईं और तृप्त हो गए। उस भोजन के लिए परिश्रम मत करो जो नाश हो जाता है, परन्तु उस भोजन के लिए करो जो अनन्त जीवन तक बना रहता है, जिसे मनुष्य का पुत्र तुम्हें देगा।” … तब उन्होंने कहा, “हे प्रभु, हमें यह रोटी हमेशा दिया कर। यीशु ने उनसे कहा, “जीवन की रोटी मैं हूँ।” “और मेरे भेजनेवाले की इच्छा यह है कि जो कुछ उसने मुझे दिया है, उसमें से मैं कुछ न खोऊँ परन्तु उसे अन्तिम दिन फिर जिला उठाऊँ। क्योंकि मेरे पिता की इच्छा यह है, कि जो कोई पुत्र को देखे, और उस पर विश्वास करे, वह अनन्त जीवन पाए; और मैं उसे अन्तिम दिन फिर जिला उठाऊँगा।” —यूहन्ना 6:39-40 (बी.एस.आई.)
मसीह को पाँच हजार से अधिक से ज़्यादा लोगों को खिलाने के लिए रोटी और मछली बढ़ाते हुए देखने के बाद, भीड़ ने उसे ढूँढ़ निकाला। लेकिन वे उस अद्भुत कार्य (नमूने) के वास्तविक अर्थ को नहीं समझ पाए, और केवल अपना पेट भरना चाहते थे। मसीह के मन में इससे भी उत्तम वरदान है: अर्थात स्वयं वह—स्वर्ग की रोटी, जो आपको फिर कभी भूखा नहीं रहने देती और कब्र पर आपका विजयी होना निश्चित करती है। यह कुछ ऐसा है जो खमीर वाली रोटी नहीं कर सकती है। यह ऐसी चीज़ है जो न कोई उपाधि, न कोई आय, न कोई अवकाश, और न ही कोई भौतिक सुख-सुविधा दे सकती है। मसीह जीवन—अनन्त जीवन, हाँ, वह आनन्दमय जीवन, वरदान के रूप में देता है। जिसका अर्थ है कि यह ऐसी चीज़ नहीं है जिसे अर्जित या परिश्रम से प्राप्त किया जा सके, वरन् इसे केवल उस से ही प्राप्त किया जाता है। इसका यह भी अर्थ है कि यह ऐसी चीज़ है जिसे मृत्यु भी छीन नहीं सकती है। वास्तव में, मसीही जन ही यह जानता है कि मृत्यु ही वह स्थान है जहाँ उसे लाभ होता है, क्योंकि वहाँ उसे मसीह की प्राप्ति होती है (फिलि. 1:21)।
मसीह के द्वारा बढ़ाई गई रोटी का दोहरा प्रभाव पड़ा। यह रोटी के रूप में आनन्द लेने के लिए थी, और साथ ही इसका उद्देश्य भीड़ की दृष्टि को स्वर्ग की रोटी, अर्थात् यीशु मसीह की ओर उठाना था।
नए नियम की शिक्षा नियमित रूप से हमारी दृष्टि को वरदानों से हटाकर देने वाले की ओर उठाने का काम करती है।
“इसलिए जब परमेश्वर मैदान की घास को, जो आज है, और कल भाड़ में झोंकी जाएगी, ऐसा वस्त्र पहनाता है, तो हे अल्पविश्वासियों, तुम को वह क्यों न पहनाएगा? इसलिए तुम चिन्ता करके यह न कहना, कि हम क्या खाएँगे, या क्या पीएँगे, या क्या पहनेंगे? क्योंकि अन्यजाति इन सब वस्तुओं की खोज में रहते हैं, और तुम्हारा स्वर्गीय पिता जानता है, कि तुम्हें ये सब वस्तुएँ चाहिए। इसलिए पहले तुम परमेश्वर के राज्य और धार्मिकता की खोज करो तो ये सब वस्तुएँ तुम्हें मिल जाएँगी। अतः कल के लिये चिन्ता न करो, क्योंकि कल का दिन अपनी चिन्ता आप कर लेगा; आज के लिये आज ही का दुःख बहुत है।”— मत्ती 6:30-34 (बी.एस.आई.)
ध्यान दें, यहाँ एक प्रकार का उलटे लौटने का प्रभाव होता है। जब आप उन वस्तुओं पर कम ध्यान देते हैं जिन्हें आप अपनी आवश्यकता समझते हैं (यहाँ वे सचमुच की आवश्यकताएँ हैं, जैसे भोजन और वस्त्र; पर इसी सिद्धांत पर सूची और भी बढ़ सकती है), और अपनी पूर्ति के लिए परमेश्वर की ओर देखते हैं, तब हमें कुछ बेहतर मिलता है—स्वयं परमेश्वर से। और क्योंकि परमेश्वर एक भला पिता है, इसलिए हमें हमारी आवश्यक वस्तुएँ मिलती हैं (और बहुत बार तो उससे भी कहीं अधिक बढ़कर मिलती हैं)।
जब आप परमेश्वर पर अपनी आशाएँ बढ़ाते हैं, जब आप मसीह में तृप्त होते हैं, जब आप स्वर्ग में अपना धन इकठ्ठा इकट्ठा करते हैं, तब आप अपने आप पृथ्वी की वस्तुओं में संतुष्ट हो जाते हैं, क्योंकि आपको उन पर निर्भर रहने की आवश्यकता नहीं होती है। जिस जीवन, शान्ति, सुरक्षा, स्थिरता और आनन्द की आप अभिलाष करते हैं, वह आपको पहले ही मिल चुका है। और इस प्रकार आप स्वतंत्र हो जाते हैं कि परमेश्वर के वरदानों का आनन्द वैसा ही लें जैसे वे हैं, उससे अधिक कुछ नहीं।
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चिन्तन के लिए प्रश्न:
- अपने मार्गदर्शक को उस समय के विषय में बताइए जब आपको यह एहसास हुआ कि यीशु ही अकेला इस संसार की सारी वस्तुओं से बढ़कर है।
- मृत्यु की निश्चितता और अनन्त जीवन की प्रतिज्ञा, अधिक से अधिक भौतिक वस्तुएँ इकट्ठा करने के विषय में आपके दृष्टिकोण को कैसे बदलती है?
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भाग VII: खाओ-पियो, क्योंकि कल तो हमें मरना ही है।
जब परमेश्वर और उसके वरदानों के प्रति आपकी अपेक्षाएँ सही रूप से निर्धारित हो जाती हैं, तब आप जीवन में अपनी स्थिति और अपनी वस्तुओं के साथ आनन्दित रहते हुए संतुष्ट हो जाते हैं।
मृत्यु आपको जो दूसरा सबक सिखाना चाहती है, वह यह है कि आज का आनन्द लो—कल का नहीं, परन्तु आज का।
यह कितनी दुःख की बात है कि आप पुरे जीवन भर असंतुष्ट रहते हुए भविष्य की ओर देखते हैं कि अंततः आप वहाँ आनन्दित होंगे।
क्योंकि आप इस संसार में जो कुछ अनुभव कर रहे हैं उससे कहीं अधिक के लिए बनाया गया है (आपके हृदय में अनन्तता बसी है), इसलिए आपका झुकाव अब अदन को खोजने की ओर होगा, परन्तु परमेश्वर की ओर नहीं, वरन् उनके दिए हुए वरदानों में होगा। क्योंकि उन वरदानों में से कोई भी आपको वह नहीं दे सकता जिसकी आप अभिलाषा करते हैं, इसलिए आपकी प्रवृत्ति यह सोचने की होती है कि मंज़िल तक पहुँचने से आप बस कुछ ही कदम दूर हैं। इसलिए असंतुष्ट व्यक्ति हमेशा कल के लिए जीता है, कल की चिन्ता करता है, कल के लिए कार्य करता है, और आज का कभी आनन्द नहीं ले पाता (और सच तो यह है: वह कल कभी आता ही नहीं है)।
पास्कल इसे इस प्रकार कहते हैं:
“हम में से प्रत्येक अपने विचारों की जाँच करे; तो वह पाएगा कि वे पूरी रीति से अतीत या भविष्य की चिन्ताओं में लगे हुए हैं। हम शायद ही कभी वर्तमान के विषय में सोचते हैं, और यदि सोचते भी हैं, तो केवल यह देखने के लिए कि वह हमारे भविष्य की योजनाओं पर किस प्रकार से प्रकाश डालता है। वर्तमान कभी हमारा अन्त नहीं होता है। अतीत और वर्तमान हमारे साधन हैं; केवल भविष्य ही हमारा लक्ष्य है। इस प्रकार हम वास्तव में कभी जीते ही नहीं हैं, परन्तु जीने की आशा करते रहते हैं; क्योंकि हम हमेशा यह योजना बनाते रहते हैं कि कैसे आनन्दित रहें, इसलिए यह अनिवार्य है कि हम कभी आनन्दित हो ही न पाएँ।”5
परमेश्वर अपनी सन्तान के प्रति इतना उदार है कि वह हमें मसीह में वह सब कुछ देता है जिसकी हमें आवश्यकता है, और उससे भी बढ़कर देता है। वह हमें भोजन, पेय, काम और मित्र देता है ताकि हम उनका आनन्द लें (सभ. 3:15)। और फिर भी, मेज़ पर शिकायत करने वाले छोटे बच्चे के समान यह सोचते हुए हम उसकी उदारता को ठुकरा देते हैं, कि कल के लिए जिसकी प्रतिज्ञा नहीं की गई है, वह भी हमें आज ही मिलना चाहिए।
असंतोष एक दुष्चक्र है। यदि हम केवल कल के घर, कल की पदोन्नति, कल की उपाधि और परिवार के लिए ही जीते रहें, तो आज हमारे पास केवल चिन्ता और बेचैनी ही होगी। अध्याय 5 और 6 के उस मनुष्य के समान जो पाने में भी दुखी था और खोने में भी दुखी था, असंतुष्ट व्यक्ति न तो आज का आनन्द लेता है और न ही कभी “कल” तक पहुँच पाता है। वे कल की हवा के लिए जीते हैं, पर उसे कभी पकड़ नहीं पाते हैं।
और जैसा कि उपदेशक उत्सुकता से दिखाना चाहता है, कि आपका जीवन भाप के समान है। आपका “कल” बहुत तेजी से समाप्त हो रहा है। ऐसा मत करो कि आज का आनन्द लिए बिना ही जीवन बीत जाए।
जीने का एक उत्तम तरीका है—अर्थात् इस दिन को परमेश्वर के वरदान के रूप में ग्रहण करो। जैसा ऊपर देखा गया है, यदि आप मसीह में संतुष्ट हैं, तो आपको और अधिक वरदानों की आवश्यकता नहीं रहती, और इस प्रकार जो कुछ भी आपके पास है उसका आनन्द लेने के लिए स्वतंत्र हो जाते हैं।
प्रेरित पौलुस की सुनिए, जब वे मृत्यु की शिक्षा से यह बात प्रस्तुत करते हैं:
पर सन्तोष सहित भक्ति बड़ी लाभ है। क्योंकि न हम जगत में कुछ लाए हैं और न कुछ ले जा सकते हैं। और यदि हमारे पास खाने और पहनने को हो, तो इन्हीं पर सन्तोष करना चाहिए— 1 तीमुथियुस 6:6-8 (बी.एस.आई.)
ध्यान दें कि पौलुस भी मृत्यु से यही शिक्षा देता है। हम नंगे आए थे, और नंगे ही जाएँगे। अपना जीवन उन वस्तुओं पर आधारित मत करो जिन्हें मृत्यु आपसे छीन लेगी। वरन् यदि आपके पास खाने और पहनने के लिए पर्याप्त है, तो आप संतुष्ट रह सकते हो। एक अर्थ में पौलुस का “जीवन स्तर” बहुत नीचा है। पर दूसरे अर्थ में, वह इससे ऊँचा हो ही नहीं सकता है। उसके संतुष्ट होने का कारण यह है कि उसके पास मसीह है।
मैं यह बात किसी आवश्यकता के कारण नहीं कह रहा हूँ, क्योंकि मैंने उन सभी परिस्थितियों में संतुष्ट रहना सीख लिया है जिनमें मैं स्वयं को पाता हूँ। मैं जानता हूँ कि थोड़े में कैसे निर्वाह करना है, और यह भी जानता हूँ कि बहुत में कैसे रहना है। हर एक और सभी परिस्थितियों में मैंने संतुष्ट रहने का भेद सीख लिया है—चाहे पेट भरा हो या भूखा रहूँ, चाहे बहुतायत हो या कमी। मैं उस के द्वारा सब कुछ कर सकता हूँ जो मुझे सामर्थ देता है। — फिलिप्पियों 4:11-13 (बी.एस.आई.)
पौलुस ने संसार से अपनी उम्मीदें कम कर दी हैं, और परमेश्वर पर उसने अपनी उम्मीदें बढ़ा दी हैं।
यदि पौलुस का अच्छे जीवन का वर्णन—अर्थात् शेष सब कुछ खोकर भी मसीह को पाना (फिलि. 2:7-8)—आपको बहुत ही सादा या अधूरा लगता है, तो इसका कारण यह है कि आप अभी भी संसार से बहुत अधिक उम्मीदें लगाए बैठे हैं, और परमेश्वर से बहुत कम। जब आप मसीह में संतुष्ट होते हैं, तब आपको उससे, भोजन और वस्त्र से अधिक किसी और वस्तु की आवश्यकता नहीं रहती है। इसके अतिरिक्त जो कुछ भी है, वह परमेश्वर की ओर से बहुत बड़ी आशीष है, जो आनन्द लेने के लिए दी गई है।
इसलिए, सभोपदेशक में सूर्य के नीचे जीवन के विषय में बाहरी रूप से देखने पर चाहे दृष्टिकोण कितना ही कठोर क्यों न लगे (आप मर जाओगे, संसार टूटा हुआ है, आपको स्मरण नहीं किया जाएगा), फिर भी वह एक ही बात को बार-बार लागू करने के लिए कहता है। सात बार वह स्वर्ग से गहरी समझ देने के लिए बादलों के ऊपर अपना सिर निकालता है।
मनुष्य के लिये खाने-पीने और परिश्रम करते हुए अपने जीव को सुखी रखने के सिवाय और कुछ भी अच्छा नहीं। मैंने देखा कि यह भी परमेश्वर की ओर से मिलता है। क्योंकि खाने-पीने और सुख भोगने में मुझसे अधिक समर्थ कौन है?—सभोपदेशक 2:24-25 (बी.एस.आई.)
एक व्यर्थ बात पृथ्वी पर होती है, अर्थात् ऐसे धर्मी हैं जिनकी वह दशा होती है जो दुष्टों की होनी चाहिये, और ऐसे दुष्ट हैं जिनकी वह दशा होती है जो धर्मियों की होनी चाहिये। मैंने कहा कि यह भी व्यर्थ ही है। तब मैंने आनन्द को सराहा, क्योंकि सूर्य के नीचे मनुष्य के लिये खाने-पीने और आनन्द करने को छोड़ और कुछ भी अच्छा नहीं, क्योंकि यही उसके जीवन भर जो परमेश्वर उसके लिये सूर्य के नीचे ठहराए, उसके परिश्रम में उसके संग बना रहेगा।—सभोपदेशक 8:14-15 (बी.एस.आई.)
ये अंश तभी समझ में आते हैं, जब आप संतोष की कुंजियों को अपने दोनों हाथों में थाम लेते हैं। खाना, पीना, कार्य, विवाह और ऐसी बहुत सी बातें आपको जीवन नहीं देंगी। परन्तु परमेश्वर बड़ी उत्सुकता और उदारता से आपको जीवन देना चाहता है। जब आप इन दोनों बातों को समझ लेते हैं और मसीह में संतुष्ट हो जाते हैं, तब आप फिर से मिलने वाले का अनुभव करते हैं, जिसके द्वारा आप वास्तव में उन बातों का आनन्द ले सकते हैं जिनमें पहले आप जीवन खोजने के लिए ललचाते थे। और उन्हें कल का आनन्द पाने के साधन के रूप में देखने के बजाय, आप उनका आनन्द आज ही ले सकते हैं।
आनन्द आज परमेश्वर का वरदान है।
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चिन्तन के लिए प्रश्न:
- कौन आपको आज उसके वरदानों का आनन्द लेने से रोकता है?
- किन तरीकों से आप असंतुष्ट होने के लिए प्रलोभित होते हैं?
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निष्कर्ष
अतः मैं आपसे फिर से पूछता हूँ, क्या आप आनन्दित हैं? यदि नहीं, तो क्यों? मेरा अनुमान है कि इसका कारण यह है कि आपको वह चीज़ नहीं मिली है जिसे आप अपने लिए आवश्यक मानते हैं। क्योंकि जिस चीज़ की आपको कमी है, आप सोचते हैं कि वह आज आपके लिए वह कर देगी जो आप मानते हैं कि परमेश्वर पहले से ही आपको नहीं दे रहा है।
इसका समाधान क्या है? संसार की चीज़ों से अपनी अपेक्षाएँ कम कर दीजिए। और परमेश्वर से अपनी अपेक्षाएँ बढ़ा दीजिए। यदि आपके पास भोजन, वस्त्र और परमेश्वर है, तो आपके पास पर्याप्त है—परन्तु वास्तव में उससे भी अधिक है। आपके पास वह अनन्त परमेश्वर है जो आपके हृदय के खालीपन को भर देता है। और आपके पास (संभवतः) आपकी आवश्यकता से अधिक अस्थायी वरदान भी हैं, जिन्हें उसने आपको इस उद्देश्य से दिए हैं कि आप उनका आनन्द लें, जब आप उसकी उपस्थिति में आमने-सामने मिलने की यात्रा में आगे बढ़ रहे हैं।
प्रश्न यह है, कि क्या आपके लिए वही पर्याप्त है?
पौलुस की बात यह ध्यान रखते हुए फिर से सुनिए, कि संसार में पाने के लिए कुछ भी स्थायी नहीं है (भौतिक वस्तुएँ तृप्त नहीं कर सकती हैं और मृत्यु के समय सब कुछ छीन लिया जाएगा):
परन्तु जो-जो बातें मेरे लाभ की थीं, उन्हीं को मैंने मसीह के कारण हानि समझ लिया है*। वरन् मैं अपने प्रभु मसीह यीशु की पहचान की उत्तमता के कारण सब बातों को हानि समझता हूँ। जिसके कारण मैंने सब वस्तुओं की हानि उठाई, और उन्हें कूड़ा समझता हूँ, ताकि मैं मसीह को प्राप्त करुँ। और उसमें पाया जाऊँ; न कि अपनी उस धार्मिकता के साथ, जो व्यवस्था से है, वरन् उस धार्मिकता के साथ जो मसीह पर विश्वास करने के कारण है, और परमेश्वर की ओर से विश्वास करने पर मिलती है, ताकि मैं उसको और उसके पुनरुत्थान की सामर्थ्य को, और उसके साथ दुःखों में सहभागी होने के मर्म को जानूँ, और उसकी मृत्यु की समानता को प्राप्त करुँ। ताकि मैं किसी भी रीति से मरे हुओं में से जी उठने के पद तक पहुँचूँ।—फिलिप्पियों 3:7-11 (बी.एस.आई.)
लाभ केवल मसीह में ही संभव है। केवल वही संतुष्ट कर सकता है। केवल वही कब्र पर विजय पाता है। उसमे संतुष्टि पाएँ, तब आप हर बात में संतुष्टि पा सकते हैं।
अन्तिम टिप्पणियाँ
- बॉबी जैमीसन, सब कुछ कभी पर्याप्त नहीं होता है (न्यूयॉर्क: वाटरब्रुक, 2025, x).
- यदि आप समझ नहीं पा रहे हैं, तो जे. आर. टॉल्किन की द लॉर्ड ऑफ द रिंग्स पढ़ना या देखना आपके लिए लाभदायक होगा!
- ब्लेज़ पास्कल, पेन्सीज़, 425. https://www.ccel.org/ccel/pascal/pensees.viii.html.
- पास्कल, पेन्सीज़, 425, https://www.ccel.org/ccel/pascal/pensees.viii.html.
- सी. एस. लुईस, द वेट ऑफ ग्लोरी (सैन फ़्रांसिस्को: हार्पर, 1980), पृष्ठ 41-45.
- पास्कल, पेन्सीज़, 172, https://www.ccel.org/ccel/pascal/pensees/pensees.iii.html.
लेखक के बारे में
जॉन सार्वर मेम्फिस, टेनेसी में मिडटाउन बैपटिस्ट चर्च में पास्टर के रूप में सेवकाई करते हैं। उनकी पत्नी का नाम जेसिका है, और उनके चार बच्चे हैं।
विषयसूची
- भाग I: सम्पूर्ण जगत की खोज
- चिन्तन के लिए प्रश्न:
- भाग II: स्थान और समय से परे
- चिन्तन के लिए प्रश्न:
- भाग III: बढ़ी हुई तीव्र लालसाएँ
- चिन्तन के लिए प्रश्न:
- भाग IV: थोड़े में असंतोष और बहुत में भी असंतोष
- चिन्तन के लिए प्रश्न:
- भाग V: स्वर्ग से नमूने
- चिन्तन के लिए प्रश्न:
- भाग VI: खाली हाथ, भरे हुए हृदय
- चिन्तन के लिए प्रश्न:
- भाग VII: खाओ-पियो, क्योंकि कल तो हमें मरना ही है।
- चिन्तन के लिए प्रश्न:
- निष्कर्ष
- अन्तिम टिप्पणियाँ
- लेखक के बारे में