#52 संकट में परमेश्वर पर भरोसा रखना: तब विश्वास रखना जब जीवन बिखर जाए

By टेलर हार्टली

परिचय

3 फरवरी, सन् 2025 को, सुबह लगभग 6:39 बजे, मेरे पिताजी ने मुझे फोन किया। वह इस समय कभी फोन नहीं करते थे। मेरे नाइट-स्टैंड पर रखा फोन बजने लगा, और जब मैं उसे उठाने लगा, तो वह मुझसे फिसलकर नीचे गिर गया। इससे पहले कि फोन वॉइसमेल पर चला जाए, मैंने बिस्तर से नीचे पैर लटकाए और झुककर फोन उठा लिया। मैं अभी भी नींद में ही था। मैंने कहा, “हाँ पिताजी,” वह बोले, “टे, मुझे तुम्हें यह बताते हुए बहुत दु:ख हो रहा है, परन्तु आज सुबह दादी माँ गुजर गईं।”

मुझे इस बात का विश्वास नहीं हुआ। ऐसा नहीं हो सकता। ऐसे अचानक मृत्यु नहीं हो सकती, है न? आपको पहले से कोई चेतावनी तो मिलनी चाहिए। आपको एक एकदम नयी वास्तविकता के लिए अपने आपको तैयार करने का समय मिलना चाहिए। मैं अपनी कहूँ तो मेरी दादी मेरे लिए एक नायक थीं। परमेश्वर के वचन से कैसे प्रेम करना है, यह उन्होंने मुझे सिखाया। उन्होंने मुझे कहानी की सामर्थ्य के बारे में बताया। उन्होंने मुझे सिखाया कि कैसे सुनना चाहिए, कैसे प्रेम करना चाहिए और कैसे हँसना चाहिए। मेरी दादी सबसे अच्छी थीं, और मैं जो कुछ भी हूँ, उसका श्रेय उन्हीं को जाता है। और अब उन्हें गुजरे हुए छह महीने हो चुके हैं…

आपके विचार से पूरे जीवन में ऐसा कितनी बार महसूस होता है कि आपका जीवन बिखर रहा है? यदि आप मुड़कर अपने जीवन को देखें, तो कितनी बार आपको पहले ही ऐसा महसूस हो चुका है कि आपका जीवन बिखर गया है? जहाँ तक मेरी बात है, तो मेरे विचार से मैं नौ ऐसे अवसरों को याद कर सकता हूँ, जब जीवन में ऐसा महसूस हुआ था। और इसमें कोई सन्देह नहीं कि ये सभी नौ अवसर गम्भीरता में एक जैसे नहीं थे। और प्रश्न यह नहीं है कि जीवन कितनी बार बिखरा, बल्कि यह है कि कितनी बार ऐसा महसूस हुआ कि जीवन बिखर गया है। अत:, मेरे लिए ऐसा नौ बार हुआ है, और वह नौवाँ अवसर मेरी दादी माँ का गुजर जाना था। आपके लिए ऐसा कितनी बार हुआ है?

एक बार, मैं और मेरे पास्टर सेवकाई सम्बन्धी एक यात्रा पर थे। एक रात भोजन के बाद, उन्होंने हमें एक ऐसा खेल खेलने का सुझाव दिया, जो कि पारिवारिक इतिहास पर केन्द्रित हो। इसमें एक दौर पाँच वर्ष के अन्तराल को दर्शाता था, और हर दौर में हममें से हर व्यक्ति वह सब कुछ बताता था, जो हम अपने-अपने दादा जी के जीवन के बारे में जानते थे। अगली रात, हमने वही खेल खेला, और इस बार हमने अपने-अपने पिता जी के जीवन के बारे में बातें कीं। और जो मैंने सीखा वह यह था: मेरे दादा जी और मेरे पिता जी ने अपने जीवनकाल में बहुत से नुकसान उठाए। और मैंने यह भी सीखा कि जैसे-जैसे उनकी आयु बढ़ती चली गई, उन नुकसानों का होना भी बढ़ता गया। इस संसार में जीवन के बारे में एक बात यह है कि यह जितना लम्बा होता है, उतना ही अधिक यह आपसे माँग करता है।

आप अपने हृदय से इसका दाम चुकाते हैं। परिवार के जिन सदस्यों से आप प्रेम करते हैं, वे गुजर जाते हैं। जो मौके आप चाहते थे, वे किसी और को मिल जाते हैं। जिन बातों का अनुभव आप कभी नहीं करना चाहते, वे आपके साथ… या किसी ऐसे व्यक्ति के साथ जिससे आप प्रेम करते हैं, घटित हो जाते हैं। इस संसार में जीवन कष्टदायी होने वाला है। ऐसा लगेगा कि जैसे जीवन बिखर रहा है। अत:, ऐसा आपके साथ कितनी बार होगा? और वास्तविकता यह है… कि ऐसा चाहे कितनी भी बार हो, आप जितना लम्बा जिएँगे, इसकी संख्या निश्चित रूप से बढ़ती ही चली जाएगी। आपको कोई फोन कॉल, कोई बीमारी की जाँच, या कोई सूचना मिलेगी, और ऐसा लगेगा कि जैसे कमरे से सारी हवा ही निकल गई हो; जैसे कि इस संसार की सारी भलाई बुराई में बदल गई हो; जैसे कि सूरज से निकलने वाला सारा प्रकाश अंधेरा हो गया हो। तब आप क्या करेंगे?

इस प्रश्न का उत्तर ही इस मार्गदर्शिका के पीछे के बोझ का निर्माण करता है। इस मार्गदर्शक परियोजना में, हम बाइबल के सिद्धान्तों पर आधारित ऐसी व्यावहारिक मार्गदर्शिकाएँ तैयार करना चाहते हैं, जो उन अनेक परिस्थितियों के लिए जिनका आप सामना करेंगे और उन जीवन-कौशलों के लिए, जिनकी आपको आवश्यकता पड़ेगी, उपयोगी हों। फिर भी, कष्ट उठाने से सम्बन्धित इस मार्गदर्शिका में, मुझे आपको सचेत करना होगा कि इस विषय पर कि कष्टों का सामना कैसे करें, मैं जो कुछ भी कहूँ, वह सब व्यर्थ हो जाएगा, यदि आप यह नहीं जानते कि परमेश्वर कौन है और जीवन के सबसे कष्टदायी अनुभवों में वह क्या भूमिका निभाता है। अतः, जब आप अपने मार्गदर्शक या प्रशिक्षु के साथ इस मार्गदर्शिका का अध्ययन करें, तो इस बारे में प्रश्न अवश्य पूछें कि कष्ट उठाते समय क्या करना है और कैसी प्रतिक्रिया देनी है। परन्तु इससे भी बढ़कर महत्वपूर्ण इस बारे में प्रश्न पूछना है कि आपका परमेश्वर कौन है और यीशु में उसने आपसे क्या प्रतिज्ञा की है। प्रश्नों की इस दूसरी पंक्ति के जो उत्तर आपको मिलेंगे, वे प्रश्नों की पहली पंक्ति के मेरे द्वारा दिए गए किसी भी उत्तर की तुलना में कहीं अधिक फलदायी सिद्ध होंगे। दोनों पंक्तियों के उत्तर आपस में जुड़े हुए होंगे और इस मार्गदर्शिका के चारों हिस्सों में मौजूद होंगे। मेरी यह प्रार्थना है कि जब आप आज कोई कष्ट उठाएँ या कल कोई कष्ट उठाने की तैयारी करें, तो यह आपको उपयोगी लगे।

अत:, जब जीवन बिखर जाता है, तब हम क्या करते हैं?

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#52 संकट में परमेश्वर पर भरोसा रखना: तब विश्वास रखना जब जीवन बिखर जाए

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