#55 अहंकार से बचना: एक जीवन कौशल के रूप में विनम्रता

By जेमी साउथकोम्ब

परिचय

एक कहानी है, जो अक्तूबर, सन् 1995 में न्यूफाउण्डलैण्ड के तट पर एक अमेरिकी नौसेना के जहाज और कनाडाई अधिकारियों के बीच हुई एक बातचीत पर आधारित है।

अमेरिकी: “कृपया टक्कर से बचने के लिए आप अपना रास्ता 15 डिग्री उत्तर की ओर मोड़ लें।”

कनाडाई: “हमारा सुझाव है कि टक्कर से बचने के लिए आप अपना रास्ता 15 डिग्री दक्षिण की ओर मोड़ लें।”

अमेरिकी: “मैं अमेरिकी नौसेना के जहाज का कप्तान बोल रहा हूँ। मैं फिर से कहता हूँ कि आप अपना रास्ता मोड़ लें।”

कनाडाई: “नहीं, मैं फिर से कहता हूँ, आप अपना रास्ता मोड़ लें।”

अमेरिकी: “यह विमानवाहक जहाज यू.एस.एस. अब्राहम लिंकन है, जो संयुक्त राज्य अमेरिका के अटलांटिक बेड़े का दूसरा सबसे बड़ा जहाज है। हमारे साथ तीन डिस्ट्रॉयर, तीन क्रूज़र और कई सहायक जहाज हैं। मैं यह माँग करता हूँ कि आप अपना रास्ता 15 डिग्री उत्तर की ओर बदल लें। मैंने कहा पंद्रह डिग्री उत्तर की ओर, अन्यथा इस जहाज की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए जवाबी कदम उठाए जाएँगे।”

कनाडाई: “यह एक लाइटहाउस अर्थात् प्रकाश-स्तंभ है। अब निर्णय आपको लेना है।”1

वैसे यह घटना कभी हुई ही नहीं, परन्तु इस कहानी को अक्सर अहंकार के प्रति चेतावनी के रूप में सुनाया जाता है। इसका संदेश स्पष्ट है—अहंकार जहाज को डुबो देता है, अत: इससे बचकर रहें, कहीं ऐसा न हो कि आप अपने जीवन के जहाज को ही डुबो बैठें।

इस क्षेत्रीय मार्गदर्शिका में, हम अहंकार पर अच्छे से और गहराई से विचार करेंगे, कि इसके खतरे क्या हैं, यह कहाँ से उत्पन्न होता है, और (परमेश्वर की सहायता से) हम इसे कैसे पराजित कर सकते हैं। मेरी प्रार्थना है कि अनियंत्रित अहंकार से आपके जीवन के जहाज को डुबोने के बजाय, आप बढ़ती हुई विनम्रता वाला जीवन अपनाकर इससे पूरी तरह बचकर रहना सीखें।

अब (रूपकों को थोड़ा बदलते हैं), अहंकार एक फिसलने वाली मछली है। हम सभी इसे पहचान सकते हैं (और आमतौर पर दूसरों में इसे पहचानना सबसे आसान होता है), परन्तु हममें से बहुत कम लोग ही रुककर इस बारे में विचार करते हैं कि असल में अहंकार क्या है। और इस क्षेत्रीय मार्गदर्शिका को आरम्भ करने की हमारे लिए सबसे अच्छी जगह यह होगी कि हम अहंकार की एक परिभाषा पर विचार करें।

अत:, यहाँ मेरी ओर से एक प्रयास किया गया है:

अहंकार स्वयं की बड़ाई करने की हृदय की एक प्रवृत्ति है, जिसमें मैं स्वयं को परमेश्वर की जगह पर रखने का प्रयास करता हूँ।

इसे विस्तार से समझें तो, सबसे पहली बात यह है कि अहंकार हृदय की एक प्रवृत्ति है। इसकी जड़ें हमारे हृदय में होती हैं। हृदय ही वह जगह है, जहाँ से हमारे विचार और इच्छाएँ उत्पन्न होती हैं। इस कारण, अहंकार कोई ऐसी बात नहीं है, जो हमारे पास बाहर से आती हो, जैसे कोई विदेशी योद्धा बाहर से आक्रमण कर रहा हो, परन्तु इसके बजाय यह हमारे भीतर छिपा एक प्राणघाती शत्रु है, जो हमारे मसीही जीवन को हर पड़ाव पर नुकसान पहुँचाने का प्रयास करता रहता है।

और दूसरी बात यह है कि मेरी परिभाषा बताती है कि अहंकार तब उत्पन्न होता है, जब मैं स्वयं को परमेश्वर की जगह पर रखने का प्रयास करता हूँ। इस तरह की अदला-बदली की सबसे बड़ी श्रेणी को मूर्तिपूजा कहा जाता है। हालाँकि, अहंकार जिस वस्तु को परमेश्वर की जगह पर रखना चाहता है, वह मेरे बाहर की कोई बात नहीं है। वह मैं स्वयं हूँ। मैं स्वयं को परमेश्वर की जगह पर रख देता हूँ। अहंकार का अर्थ किसी और वस्तु या किसी और व्यक्ति की उपासना करना या उसकी सेवा करना नहीं है, परन्तु यह इस बात पर अड़े रहना है कि उपासना और सेवा तो केवल मेरी ही होनी चाहिए।

और इसलिए, जब हम इसे इस तरह से समझते हैं, तो हम देखते हैं कि अहंकार कितना खतरनाक और विनाशकारी है। अहंकार चाहता है कि मैं स्वयं को परमेश्वर की जगह पर रख लूँ। इसमें कोई हैरानी की बात नहीं कि ऑगस्टीन ने कहा था, “अहंकार करना ही पाप का आरम्भ है।”2 और इस बात से सहमत होते हुए, सी.एस. लुईस ने आगे विस्तार से बताया, “अहंकार हर दूसरी बुराई की ओर ले जाता है: यह पूरी तरह से मन की परमेश्वर-विरोधी दशा है।”3

और इसलिए, अहंकार से ही कई दूसरे पाप उत्पन्न होते हैं। इस पर विचार कीजिए कि—अहंकारी लोग अक्सर दूसरों की बुराई करने, कड़वाहट, लोगों से डरने, स्वयं पर तरस खाने, दम्भ भरने जैसी बुराइयों से भी जूझते रहते हैं… और ये तो बस कुछ ही उदाहरण हैं।

और अहंकार बहुत ही अधिक धोखेबाज भी होता है। यह अलग-अलग रूपों और आकारों में आता है। हर तरह का अहंकार प्रकट नहीं होता। अहंकार शिष्टाचार, प्रार्थना, या यहाँ तक कि वर्षों की सच्ची मसीही सेवा के पीछे भी छिपा हो सकता है। यह हमारे जीवन में ऊपरी विनम्रता का रूप धरकर भी छिपा रह सकता है।

तो यह स्पष्ट है कि आरम्भ से ही यदि हम मसीही के रूप में बढ़ना चाहते हैं और स्वयं को एवं दूसरों को बड़े नुकसान से बचाना चाहते हैं, तो अहंकार से बचे रहना बहुत आवश्यक है।

परन्तु परमेश्वर की स्तुति हो, क्योंकि आशा अभी भी बाकी है! बाइबल हमें सिखाती है कि परमेश्वर का अनुग्रह हमारे पापों से कहीं अधिक बड़ा है। इसके अलावा, परमेश्वर ने हमें अहंकार से बचे रहने का एक मार्ग भी उपलब्ध करवाया है। और इससे भी बढ़कर, जब हम परमेश्वर की सहायता से, धीरे-धीरे परन्तु निश्चित रूप से अहंकार को समाप्त करते जाएँगे, तो हमें अपने जीवन के दूसरे क्षेत्रों में भी जीत की अपेक्षा करनी चाहिए।

जीत की इस सम्भावना से हमें अहंकार का सामना करने और विनम्रता भरा जीवन जीने की प्रेरणा मिलनी चाहिए। मैं आशा करता हूँ कि यह क्षेत्रीय मार्गदर्शिका आपके जीवन में इस दिशा में उठाया गया एक अहम कदम साबित होगी।

इस क्षेत्रीय मार्गदर्शिका को तीन हिस्सों में बाँटा जाएगा। सबसे पहले, हम यह देखेंगे कि अहंकार हमारे जीवन को कैसा नुकसान पहुँचाता है। इसके बाद, हम अहंकार की जड़ों पर ध्यान देंगे। और अन्त में, हम यह सीखेंगे कि अपने अहंकार को कैसे समाप्त किया जाए और एक विनम्रता का जीवन कैसे जिया जाए। हर अध्याय के अन्त में कुछ प्रश्न दिए जाएँगे, जिन पर आप अपने मार्गदर्शक या प्रशिक्षु के साथ मिलकर विचार कर सकते हैं।

तो, चलिए आरम्भ करते हैं (मैं ब्रिटिश हूँ!)।

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